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मौजूदा व्यवस्था का सामना करने के लिए कलेजा भी तो होना चाहिए! : पलाश विश्‍वास

मृणाल सेन

महान फिल्मकार मृणाल सेन की 90 वर्ष की उम्र के बावजूद सृजन प्रक्रिया जारी है। उन पर वरि‍ष्‍ठ लेखक-पत्रकार पलाश वि‍श्‍वास का आलेख-

हमारे लिये यह कोई खबर नहीं कि अपनी 90 वीं वषर्गांठ मना चुके प्रसिद्ध फिल्म निर्माता मृणाल सेन अभी भी काम में लगे हुए हैं और इस उम्र में भी उनमें एक नयी फिल्म बनाने का जज्बा कायम है। भारतीय सिनेमा में सामाजिक यथार्थ को विशुद्ध सिनेमा और मेलोड्रामा की दोनों अति से बाहर अभिव्यक्ति देने में जो पहल उन्होंने की, वह हमारे लिये ज्यादा महत्वपूर्ण है। विचारधारा के प्रति प्रतिबद्धता भावनाओं में बह जाना नहीं है, वस्तुवादी दृष्टिकोण का मामला है, कड़ी आलोचनाओं के बावजूद उन्होंने सिनेमा और जीवन में इसे साबित किया है। लगातार चलते रहने को जिंदगी मानने वाले जाने-माने फिल्मकार मृणाल सेन किसी न किसी तरह से ताउम्र फिल्म जगत से जुड़े रहना चाहते हैं क्योंकि उनके अनुसार अंतिम कुछ नहीं होता, किसी पड़ाव पर कदमों का रुक जाना जिंदगी नहीं है। बेहतरीन फिल्में बना चुके इस वयोवृद्ध फिल्मकार ने मौजूदा दौर की फिल्मों के स्तर पर निराशा जताई। सेन ने कहा आजकल की फिल्में मुझे पसंद नहीं। मैंने कुछ चर्चित फिल्में देखीं लेकिन पसंद नहीं आईं। मैं उनके बारे में बात भी नहीं करना चाहता। हकीकत भी शायद यही है कि जो लोग फिल्में बना रहे हैं, वे इस लिहाज से कम ही सोच पाते हैं। वे अपना काम अच्छा जरूर कर रहे हैं, लेकिन विषयवस्तु के लिहाज से फिल्में बेहद कमजोर हैं। साहित्य हो या फिल्म, समकालीन यथार्थ की चुनौतियों का सामना करने का दुस्साहस तो मृणाल दा जैसे लोगों में ही होती है। मौजूदा व्यवस्था के मुकाबले उठ खड़ा होने के लिये कलेजा भी तो होना चाहिए। कला और माध्यम की दुहाई देकर या बाजार की बाध्यताओं के बहाने यथार्थ से कन्नी काटकर लोकप्रिय और कामयाब होने का रास्ता सबको भाता है।

हमलोग हतप्रभ थे कि सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलनों के दौरान वह प्रतिरोध आंदोलन में शामिल क्यों नहीं हुए और अभिनेता सौमित्र चट्टोपाध्याय के साथ चरम दुर्दिन में भी उन्होंने वामपंथी शासन का साथ क्यों दिया। हमें लग रहा था कि मृणाल दा चूक गये हैं। पर  बंगाल में कारपोरेट साम्राज्यवाद का, वैश्‍वि‍क पूँजी का मुख्य केंद्र बनते हुए देखकर अब समझ में आता है कि परिबोर्तन से उन्हें एलर्जी क्यों थी! मृणाल सेन ने वही किया जो उन्हें करना चाहिए था। मृगया और पदातिक के मृणाल सेन से आप और किसी चीज की उम्मीद नहीं कर सकते। मृणाल सेन नंदीग्राम में अत्याचार के खिलाफ कोलकाता के कॉलेज स्ट्रीट से आज निकले जुलूस में शामिल हुए। वही खादी का कुर्ता, अस्सी साल की काया और मजबूत कदम। लेकिन नंदीग्राम नरसंहार के विरोध को उन्होंने वामपंथ के बदले दक्षिण पंथ को अपनाने का सुविधाजनक हथियार बनाने से परहेज किया।

उन्हीं के समकालीन बांग्ला के महान फिल्मकार ऋत्‍वि‍क घटक ने सिनेमा में सामाजिक यथार्थ की अभिव्यक्ति के लिये ‘मेघे ढाका तारा’ और ‘कोमल गांधार’ जैसी क्लासिक फिल्मों में मेलोड्रामा का खुलकर इस्तेमाल करने से परहेज नहीं किया। पर मृणाल दा अपनी फिल्मों में कटु सत्य को वह जैसा है, उसी तरह कहने के अभ्यस्त रहे हैं जो कहीं-कहीं वृत्तचित्र जैसा लगता है। ‘आकालेर संधाने’ हो या ‘महापृथ्वी’ या फिर बहुचर्चित ‘कोलकाता 71’, उनकी शैली फीचर फिल्मों की होते हुए भी कहीं न कहीं, वृत्तचित्र जैसी निर्ममता के साथ सच को एक्सपोज करती है, जैसे कि यथार्थ की दुनिया में वह स्टिंग आपरेशन करने निकले हों! यहाँ तक कि उनकी बहुचर्चित ‘भुवन सोम’ का कठोर वास्तव कथा की रोमानियत के आरपार सूरज की तरह दमकता हुआ नजर आता है। उनकी फिल्में उस दौर का प्रतिनिधित्व करती हैं, जब देश नक्सलवादी आंदोलनों और बहुत बड़े राजनीतिक उथल-पुथल से जूझ रहा था, अपने सबसे कलात्मक दौर में मृणाल सेन अस्तित्ववादी, यथार्थवादी, मर्क्‍सवादी, जर्मन प्रभाववादी, फ्रेंच और इतालवी नव यथार्थवादी दृष्टिकोणों को फिल्मों में फलता-फूलता दिखाते हैं। उनकी फिल्मों में कलकत्ता किसी शहर नहीं चरित्र और प्रेरणा की तरह दिखता है। नक्सलवाद का केन्‍द्र कलकत्ता, वहाँ के लोग, मूल्य-परम्‍परा, वर्ग-विभेद यहाँ तक की सडकें भी मृणाल की फिल्मों में नया जीवन पाती हैं। ‘एक दिन प्रतिदिन’ जैसी फिल्मों के जरिये मृणालदा ने कोलकाता का रोजनामचा ही पेश किया है, जहाँ सारे परिदृश्य वास्तविक हैं और सारे चरित्र वास्तविक। मृणाल दा ने कोलकाता के बीहड़ में ही अपना कोई चंबल खोज लिया था, जहाँ उनका अभियान आज भी जारी है।

मृणाल दा की प्रतिबद्ध सक्रियता का मायने इसलिये भी खास है कि समानांतर सिनेमा को प्रारम्‍भि‍क दौर में काफी दर्शक मिले, मगर बाद में धीरे-धीरे इस तरह की फिल्मों के दर्शक कम होते चले गये। अस्सी और नब्बे के दशक के आखिर में सार्थक सिनेमा का आंदोलन धीमा पड़ गया। प्रकाश झा और सई परांजपे जैसे फिल्मकार व्यावसायिक सिनेमा की तरफ मुड़ गये। श्याम बेनेगल बीच में लम्‍बे समय तक टेलीविजन के लिये धारावाहिक बनाते रहे। जाहिर है कि समानांतर सिनेमा की अंदरूनी कमियों के कारण भी यह आंदोलन सुस्त पड़ने लगा। फिल्म माध्यम हो या साहित्य, जनता से सीधे जुड़े बगैर अति बौद्धिकता उसके लिये आत्मघाती साबित होती है। जनसरोकारों के बगैर गैर लोकप्रिय कथानक के लिये सरकारी संरक्षण अनिवार्य हो जाता है। जब संरक्षण का वह स्रोत बंद हो जाता है, तो चैनल बदलने के सिवाय वजूद कायम रखना मुश्किल होता है। मुक्तिबोध की कहानी ‘सतह से उठता आदमी’ और दास्तोवस्की की क्लासिक रचना ‘अहमक’ बनाने वाले मणि कौल को ही लीजिए, जिनकी फिल्में देखने को नहीं मिलती। बतौर सहायक निर्देशक मणि के साथ काम करने वाले राजीव कुमार ने पिछले दिनों बताया कि उन्होंने खुद ‘अहमक’ नहीं देखी, जिसके वह सहायक निर्देशक थे। कुमार साहनी की कथा भी यही है। फिर भी दोनों समांतर फिल्मों के ऐसे दिग्गज हैं, जिन्होंने बचाव के लिये कोई वाणिज्यिक रास्ता, शार्ट कट अख्तियार नहीं किया। ऋत्विक घटक की कहानी तो किंवदंती ही बन गयी कि किस किस पड़ाव से होकर उनको गुजरना पड़ा और कैसे वह टूटते चले गये। मृणाल दा की ‘भुवन सोम’ से समांतर सिनेमा की कथा शुरू होती है, इसलिए उनकी कथा समांतर सिनेमा की नियति से अलग भी नहीं है। मृणाल सेन की ‘भुवन शोम’ और मणि कौल की ‘उसकी रोटी’ ने फिल्मों को एक नयी लीक दी। इस लीक को नाम दिया गया कला फिल्म या समांतर सिनेमा। इन फिल्मों ने फिल्म के सशक्त माध्यम के सही उपयोग का रास्ता खोल दिया। फिल्में सम-सामयिक समाज की जुबान बन गयीं। अब वे सिर्फ मनोरंजन तक ही सीमित नहीं रह गयीं। वे सामाजिक संदेश भी देने लगीं। इन फिल्मों में फंतासी के बजाय वास्तविकता पर ज्यादा जोर दिया जाने लगा। दर्शकों को लगने लगा कि फिल्म के रूप में वे अपने गिर्द घिरी समस्याओं, कुरीतियों और भ्रष्टाचार से साक्षात्कार कर रहे हैं। अब फिल्म उनके लिये महज मनोरंजन का जरिया भर नहीं, बल्कि उस समाज का आईना बन गयी जिसमें वे रहते हैं। इस आईने ने उन्हें श्याम बेनेगल की ‘अंकुर’, ‘मंथन’, गोविंद निहलानी की ‘आक्रोश’, ‘अर्धसत्य’ से समाज की कई ज्वलंत समस्याओं से रूबरू कराया। इस लिहाज से स्मिता पाटील अभिनीत ‘चक्र’ (निर्देशक-रवींद्र धर्मराज) भी मील का पत्थर साबित हुई। इस तरह के सिनेमा को समांतर सिनेमा का नाम दिया गया जहाँ वास्तविकता को ज्यादा महत्व दिया गया। जीवन के काफी करीब लगने वाली और समय से सही तादात्म्य स्थापित करने वाली इन फिल्मों का दौर लम्‍बे समय तक नहीं चल पाया। तड़क-भड़क, नाच-गाने और ढिशुंग-ढिशुंग से भरी फिल्मों के आगे ये असमय ही मृत्यु को प्राप्त हुईं। जीवंत सिनेमा कही जाने वाली इन फिल्मों की वित्तीय मदद के लिये राष्ट्रीय फिल्म वित्त निगम आगे आया, जो बाद में फिल्म विकास निगम बन गया। उम्मीद की जाती है कि हम समांतर सिनेमा बनायें, लेकिन समांतर सिनेमा को बढ़ावा नहीं मिलता। इनके लिये अच्छे पैसे नहीं मिलते और आम जनता से समर्थन भी नहीं मिलता।

फिल्मों के बारे में बेबाक राय देने में मृणाल दा ने कभी हिचकिचाहट नहीं दिखायी। मसलन बहुचर्चित आठ आस्कर अवार्ड जीत चुकी फिल्म ‘स्लमडॉग मिलिनेयर’ को खराब फिल्म कहा। मृणाल सेन का मानना है कि ऑस्कर सिनेमाई श्रेष्ठता का पैमाना नहीं है और महान फिल्मकारों को कभी इन पुरस्कारों से नवाजा नहीं गया। उन्होंने कहा, ऑस्कर के लिये फिल्मकार अपनी प्रविष्टियाँ भेजते हैं और महान फिल्मकारों ने कभी इसके लिये अपनी फिल्में नहीं भेजी होंगी। आठ ऑस्कर जीतने वाली भारतीय पृष्ठभूमि पर बनी ‘स्लमडॉग मिलिनेयर’ के बारे में पूछने पर उन्होंने कहा मैंने फिल्म देखी नहीं है, लेकिन यह जरूर बहुत खराब फिल्म होगी। झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले लड़के के करोड़पति बनने की कहानी से पता नहीं वे क्या दिखाना चाहते हैं। इसकी थीम ही खराब है।

मृणाल दा की फिल्म ‘भुवन सोम’ 1969 में बनी थी, जिसे हमने 74-75 में जीआईसी के जमाने में देख लिया। तब तक हमने सत्यजीत राय या ऋत्विक घटक की कोई फिल्म नहीं देखी थी। पर ‘भुवन सोम’ के आगे पीछे ‘अंकुर’, ‘निशांत’,’ मंथन’, ‘दस्तक’, ‘आक्रोश’ जैसी फिल्में हम देख रहे थे। तब हमारे पास कोई टाइमलाइन नहीं थी। मैसूर श्रीनिवास सथ्यू भारतीय फिल्म उद्योग का एक प्रतिष्ठित नाम है। 1973 में बनी उनकी फिल्म ‘गर्म हवा’, न सिर्फ विभाजन पर देश की पहली फिल्म है, बल्कि विभाजन से पैदा मानवीय त्रासदी को संवेदनशील तरीके से सामने लाने वाली फिल्म भी है। सथ्यू हिन्दी और कन्नड़ दोनों भाषाओं में फिल्में बनाते रहे हैं, उनकी बाकी फिल्मों के बारे में नहीं भी बात करें तो भी सिर्फ ‘गर्म हवा’ ही उन्हें भारत के समांतर सिनेमा आंदोलन का सबसे बड़ा नायक साबित करती है। वामपंथी विचारधारा से प्रभावित सथ्यू ने इप्टा के साथ बहुत काम किया। ‘गर्म हवा’ को भी इप्टा के वैचारिक ट्रेंड वाली फिल्म कहा जा सकता है। जिसमें अल्पसंख्यकों के डर और चिंता को बहुत सलीके से उकेरा गया है। साथ ही उनके लौटते आत्मविश्‍वास और भरोसे को भी। चूंकि हम विभाजन पीडि़त परिवार से हैं तो इस फिल्म ने बरसों तक हमारे दिलोदिमाग पर राज किया और आज भी हम इसे विभाजन पर बनी किसी फिल्म से किसी मायने में कमजोर नहीं मानते। इन्हीं मैसूर श्रीनिवास सथ्यू साहब का कहना है कि मृणाल सेन की ‘खंडहर’ हर मायने में विश्‍वस्तरीय फिल्म है। इसमें सिनेमा का हर पहलू चाहे वो कहानी हो, अभिनय हो या फोटोग्राफी सभी कुछ बहुत ऊँचा है।

कौन सी फिल्म पहले बनी और कौन सी बाद में, इसकी सूचना नहीं थी और उम्र के हिसाब से तब हम इंटरमीडिएट के छात्र थे। पर ‘भुवन सोम’ में यथार्थ का जो मानवीय सरल चित्रण मृणाल दा ने पेश किया, वह सबसे अलहदा था। उत्पल दत्त को हमने तरह-तरह की भूमिकाओं में अभिनय करते हुए देखा है, पर भुवन सोम के रूप में उत्पल दत्त की किसी से तुलना ही नहीं की जा सकती।

मृणाल दा की जिन दो फिल्मों की उन दिनों हम छात्रों में सबसे ज्यादा चर्चा थी, वे हैं ‘कोलकाता 71’ और ‘इंटरव्यू’ , जिन्हें देखने के लिये हमें वर्षों इंतजार करना पड़ा। बहरहाल जो बाद में हमें मालूम पड़ा कि बंगाली फिल्मों की तरह ही सेन हिन्‍दी फिल्मों में भी समान रूप से सक्रिय दिखते हैं। इनकी पहली हिन्‍दी फिल्म 1969 की कम बजट वाली फिल्म ‘भुवन सोम’ थी। फिल्म एक अडिय़ल रईसजादे की पिछड़ी हुई ग्रामीण महिला द्वारा सुधार की हास्य-कथा है। साथ ही, यह फिल्म वर्ग-संघर्ष और सामाजिक बाधाओं की कहानी भी प्रस्तुत करती है। फिल्म की संकीर्णता से परे नये स्टाइल का दृश्य चयन और सम्‍पादन भारत में समांतर सिनेमा के उद्भव पर गहरा प्रभाव छोड़ता है। जब हमने ‘भुवन सोम’ देखी तब हमें मालूम ही नहीं था कि जिस श्याम बेनेगल की फिल्मों से हम लोग उन दिनों अभिभूत थे, उनकी वह समांतर फिल्मों की धारा की गंगोत्री ‘भुवन सोम’ में ही है।

हाल में 2010 में मृणाल सेन की फिल्म ‘खंडहर’ कान फिल्म महोत्सव में ‘क्लासिक’ श्रेणी में जब दिखाई गई तो वह उतनी ही ताजा फिल्म लगी जितनी 1984 में लगी थी। उसी साल वह रिलीज हुई थी और इस फिल्मोत्सव में प्रदर्शित भी हुई थी। पुणे के राष्ट्रीय फिल्म लेखागार में अपने नाम के अनुरूप ‘खंडहर’ धूल खा रही थी। बेहतरीन सिनेमा को सहेजने के उद्देश्य से बने इस लेखागार ने पुराने क्लासिक सिनेमा को सहेजने का नया कार्यक्रम शुरू किया है।‘खंडहर’ की रिलायंस मीडियावर्क्‍स ने नये सिरे से रिकॉर्डिंग की है। उस रात थिएटर में मौजूद सेन के प्रशंसकों के लिए ‘खंडहर’ ताजा फिल्म की तरह थी। 87 साल के सेन इस मौके पर मौजूद थे।

हिन्‍दी सिनेमा के समांतर आंदोलन के दिग्गजों श्याम बेनेगल, गोविंद निहलानी, सथ्यू, मणि कौल, गुलजार और बांग्ला के फिल्मकार गौतम घोष, उत्पलेंदु,  बुद्धदेव दासगुप्त जैसे तमाम लोग माध्यम बतौर सिनेमा के प्रयोग और उसके व्याकरण के सचेत इस्तेमाल के लिये मृणाल सेन से कई-कई कदम आगे नजर आयेंगे, सत्यजीत रे की बात छोड़ दीजिये! इस मामले में वह कहीं न कहीं ऋत्विक घटक के नजदीक हैं, जिन्हें बाकी दुनिया की उतनी परवाह नहीं थी जितनी कि अपनी माटी और जड़ों की। ऋत्‍वि‍क की फिल्मों में कर्णप्रिय लोकधुनों का कोलाहल और माटी की सोंधी महक अगर खासियत है तो मृणाल दा की फिल्में यथार्थ की चिकित्सीय दक्षता वाली निर्मम चीरफाड़ के लिये विलक्षण हैं।

बंगाल की साहित्यिक और सामाजिक विरासत में मेलोड्रमा का प्राधान्य है । शायद बाकी भारत में भी कमोबेश ऐसा ही है। हम व्यक्ति पूजा, अति नायकीयता और पाखण्ड के बारमूडा त्रिभुज में जीते-मरते हैं। यथार्थ को वस्तुवादी ढंग से विश्‍लेषित करना बंगाली चरित्र में है ही नहीं, इसीलिए चौंतीस साल के वामपंथी शासन में जीने के बावजूद बंगाल के श्रेणी विन्यास, जनसंख्या संतुलन, वर्ग चरित्र और बहिष्‍कृत समाज की हैसियत में कोई फर्क नहीं आया। जैसे सालभर पहले तक वामपंथी आंदोलन का केन्‍द्र बना हुआ था बंगाल वैसे ही आज बंगाल धुर दक्षिणपंथी अमेरिकापरस्त उपभोक्तावादी निहायत स्वार्थी समाज है, जहाँ किसी को किसी की परवाह नहीं और व्यक्तिपूजा की ऐसी धूम कि बाजार में मां काली और बाबा भोलानाथ के हजारों अवतार प्रचलन में हैं और हर शख्स की आँखों में भक्तिभाव का आध्यात्म गदगद।

यह कोई नयी बात नहीं है। नेताजी, रामकृष्ण, विवेकानंद और टैगोर जैसे आइकनों में ही बंगाल अपना परिचय खोजता है। विपन्न जन समूह और सामाजिक यथार्थ से उसका कोई लेना-देना नहीं है। जिस बंकिम चट्टोपाध्याय को साहित्य सम्राट कहते अघाता नहीं बंगाली और बाकी भारत भी जिसके वंदे मातरम पर न्यौछावर है, उन्होंने समकालीन सामाजिक यथार्थ को कभी स्पर्श ही नहीं किया। ‘दुर्गेश नंदिनी’ हो या फिर ‘आनंदमठ’ या ‘राजसिंह’, सुदूर अतीत और तीव्र जातीय घृणा ही उनकी साहित्यिक सम्‍पदा रही है। ‘रजनी’, ‘विषवृक्ष’ और ‘कृष्णकांतेर विल’ में उन्होंने बाकायदा यथार्थ से पलायन करते हुए थोपे हुए यथार्थ से चमत्कार किये हैं। समूचे बांग्ला साहित्य में रवीन्द्रनाथ से पहले सामाजिक यथार्थ अनुपस्थित है। पर मजे की बात तो यह है कि ‘दो बीघा जमीन’ पर चर्चा ज्यादा होती है और ‘चंडालिका’ या ‘रूस की चिट्ठी’ पर चर्चा कम। ताराशंकर बंद्योपाध्याय का कथा साहित्य फिल्मकारों में काफी लोकप्रिय रहा है। स्वयं सत्यजीत राय ने उनकी कहानी पर ‘जलसाघर’ जैसी अद्भुत फिल्म बनायी। पर इसी फिल्म में साफ जाहिर है कि पतनशील सामंतवाद के पूर्वग्रह से वह कितने घिरे हुए थे। वह बहिष्कृत समुदायों की कथा फोटोग्राफर की दक्षता से कहते जरूर रहे और उन पर तमाम फिल्में भी बनती रहीं, पर इस पूरे वृतांत में वंचितों, उत्पीडि़तों और अस्पृश्यों के प्रति अनिवार्य घृणा भावना उसी तरह मुखर है, जैसे कि शरत साहित्य में।

माणिक बंद्योपाध्याय से लेकर महाश्‍वेता देवी तक सामाजिक यथार्थ के चितेरे बंगाल में कभी लोकप्रिय नहीं रहे। मृणाल दा भी सत्यजीत राय या ऋत्विक घटक के मुकाबले कम लोकप्रिय रहे हैं हमेशा। पर लोकप्रिय सिनेमा बनाना उनका मकसद कभी नहीं रहा। ऋत्विक दा, सआदत हसन मंटो या बांग्लादेश के अख्तरुज्जमान इलियस की तरह मृणाल दा न बागी हैं और न उनमें वह रचनात्मक जुनून दिखता है, पर सामाजिक यथार्थ के निर्मम चीरफाड़ में उन्हें आखिरकार इसी श्रेणी में रखना होगा जो कि सचमुच खुले बाजार के इस उपभोक्तावादी स्वार्थी भिखमंगे दुष्ट समय में एक विलुप्त प्रजाति है। इसीलिए मृणाल दा की सक्रियता का मतलब यह भी हुआ कि सबने बाजार के आगे आत्मसमर्पण किया नहीं है अभी तक। यह भारतीय सिनेमा के लिए एक बड़ी खुशखबरी है।

मृणाल सेन भारतीय फिल्मों के प्रसिद्ध निर्माता व निर्देशक हैं। इनकी अधिकतर फिल्में बांग्ला भाषा में हैं। उनका जन्म फरीदपुर नामक शहर में (जो अब बंगलादेश में है) में 14 मई 1923 में हुआ था। हाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण करने बाद उन्होंने शहर छोड़ दिया और कोलकाता में पढ़ने के लिये आ गये। वह भौतिक शास्त्र के विद्यार्थी थे और उन्होंने अपनी शिक्षा स्कोटिश चर्च कॉलेज एवं कलकत्ता यूनीवर्सिटी से पूरी की। अपने विद्यार्थी जीवन में ही वह कम्युनिस्ट पार्टी के सांस्कृतिक विभाग से जुड़ गये। यद्यपि वह कभी इस पार्टी के सदस्य नहीं रहे पर इप्टा से जुड़े होने के कारण वह अनेक समान विचारों वाले सांस्कृतिक रुचि के लोगों के परिचय में आ गये। संयोग से एक दिन फिल्म के सौंदर्यशास्त्र पर आधारित एक पुस्तक उनके हाथ लग गई। जिसके कारण उनकी रुचि फिल्मों की ओर बढ़ी। इसके बावजूद उनका रुझान बुद्धिजीवी रहा और मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव की नौकरी के कारण कलकत्ता से दूर होना पड़ा। यह बहुत ज्यादा समय तक नहीं चला। वह वापस आये और कलकत्ता फिल्म स्टूडियो में ध्वनि टेक्नीशियन के पद पर कार्य करने लगे जो आगे चलकर फिल्म जगत में उनके प्रवेश का कारण बना। फिल्मों में जीवन के यथार्थ को रचने से जुड़े और पढ़ने के शौकीन मृणाल सेन ने फिल्मों के बारे में गहराई से अध्ययन किया और सिनेमा पर कई पुस्तकें भी प्रकाशित कीं, जिनमें शामिल हैं- ‘न्यूज ऑन सिनेमा’ (1977) तथा ‘सिनेमा, आधुनिकता’ (1992)।

1955 में मृणाल सेन ने अपनी पहली फीचर फि‍ल्म ‘रातभोर’ बनाई। उनकी अगली फिल्म ‘नील आकाशेर नीचे’ ने उनको स्थानीय पहचान दी और उनकी तीसरी फिल्म ‘बाइशे श्रावण’ ने उनको अन्तर्राष्ट्रीय प्रसिद्धि दिलाई। पाँच और फिल्में बनाने के बाद मृणाल सेन ने भारत सरकार की छोटी सी सहायता राशि से ‘भुवन शोम’ बनाई, जिसने उनको बड़े फिल्मकारों की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया और उनको राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्रदान की। ‘भुवन शोम’ ने भारतीय फि‍ल्म जगत में क्रांति ला दी और कम बजट की यथार्थपरक फिल्मों का ‘नया सिनेमा’ या ‘समांतर सिनेमा’ नाम से एक नया युग शुरू हुआ।

इसके उपरान्त उन्होंने जो भी फिल्में बनायीं वह राजनीति से प्रेरित थीं जिसके कारण वह मार्क्‍सवादी कलाकार के रूप में जाने गये। वह समय पूरे भारत में राजनीतिक उतार-चढ़ाव का समय था। विशेषकर कलकत्ता और उसके आसपास के क्षेत्र इससे ज्यादा प्रभावित थे, जिसने नक्सलवादी विचारधारा को जन्म दिया। उस समय लगातार कई ऐसी फिल्में आयीं जिसमें उन्होंने मध्यमवर्गीय समाज में पनपते असंतोष को आवाज दी। यह निर्विवाद रूप से उनका सबसे रचनात्मक समय था।

1960 की उनकी फिल्म ‘बाइशे श्रावण’, जो कि 1943 में बंगाल में आये भयंकर अकाल पर आधारित थी और ‘आकाश कुसुम’ (1965) ने एक महान निर्देशक के रूप में मृणाल सेन की छवि को विस्तार दिया। मृणाल की अन्य सफल बंगाली फिल्में रहीं- ‘इंटरव्यू’ (1970), ‘कलकत्ता 71’(1972) और ‘पदातिक’ (1973), जिन्हें ‘कोलकाता ट्रायोलॉजी’ कहा जाता है।

मृणाल सेन की अगली हिंदी फिल्म ‘एक अधूरी कहानी’ (1971) वर्ग-संघर्ष (क्लास वार) के अन्यतम प्रारूप को चित्रित करती है जिसमें फैक्ट्री मजदूरों और उनके मध्य तथा उच्च वर्गीय मालिकों के बीच का संघर्ष फिल्माया गया है। 1976 की सेन की फिल्म ‘मृगया’ उनकी दूरदर्शिता और अपार निर्देशकीय गुणों को परिलक्षित करती है। भारत की स्वतंत्रता के पूर्व के धरातल को दर्शाती यह फिल्म संथाल समुदायों की दुनिया और उपनिवेशवादी शासन के बीच के संपर्क की अलग तरह की गाथा है।

1980 के दशक में मृणाल की फिल्में राजनीतिक परिदृश्यों से मुड़ कर मध्यवर्गीय जीवन की यथार्थवादी थीमों की ओर अग्रसर होती हैं। ‘एक दिन अचानक’ (1988) में भी तथापि तथाकथित स्टेटस का प्रश्‍न एक गहरे असंतोष के साथ प्रकट होता है।

मृणाल सेन को भारत सरकार द्वारा 1981 में कला के क्षेत्र में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। भारत सरकार ने उनको पद्म विभूषण पुरस्कार एवं 2005 में दादा साहब फाल्के पुरस्कार प्रदान किया। उनको 1998 में मानद संसद सदस्यता भी मिली। फ्रांस सरकार ने उनको ‘कमांडर ऑफ दि ऑर्ट ऐंड लेटर्स’ उपाधि से एवं रूस की सरकार ने ‘ऑर्डर ऑफ फ्रेंडशिप’ सम्मान प्रदान किये।

सत्यजीत रे और ऋत्विक घटक के साथ ही दुनिया की नजरों में भारतीय सिनेमा की छवि बदलने वाले सेन ने कहा कि हर रोज मैं एक नई फिल्म बनाने के बारे में सोचता हूँ। देखते हैं कब मैं उस पर काम करता हूँ। अभिनेत्री नंदिता दास अभिनीत उनकी अंतिम फिल्म ‘आमार भुवन’ (यह, मेरी जमीन) वर्ष 2002 में प्रदर्शित हुई थी। उन्होंने कहा कि मैंने उसके बाद कोई फिल्म नहीं बनाई लेकिन मैंने यह कभी नहीं सोचा कि मैं सेवानिवृत हो गया हूँ।

उनकी फिल्मों में प्रत्यक्ष राजनीतिक टिप्पणियों के अलावा सामाजिक विश्‍लेषण और मनोवैज्ञानिक घटनाक्रमों की प्रधानता रही है। वाम झुकाव वाले निर्देशक भारत में वैकल्पिक सिनेमा आंदोलन के अग्रणी के रूप में जाने जाते हैं और अक्सर उनकी तुलना उनके समकालीन सत्यजीत रे के साथ की जाती है। खंडहर (1984) और भुवन सोम (1969) जैसी फिल्मों में बेहतरीन निर्देशन के लिये चार बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीतने के अलावा उन्हें फिल्म निर्माण में भारत के सबसे बड़े पुरस्कार दादा साहेब फाल्के से वर्ष 2005 में सम्मनित किया गया था। हाल ही में एक बड़े निजी बैंक ने उन्हें फिल्म बनाने के लिए धन देने का प्रस्ताव दिया था।

सेन ने कहा कि मेरे लिए धन की समस्या नहीं है। बैंक ने कहा है कि हम लोग पाँच करोड़ से अधिक की धनराशि देने के लिये तैयार हैं। मैंने उनसे कहा कि मैं पाँच करोड़ में छह फिल्म बना सकता हूँ। जब उनसे उनके जन्मदिन की पार्टी के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि वह जन्मदिन की पार्टी नहीं मनाएंगे। सेन ने कहा कि जन्म या मौत पर जश्‍न मनाना मेरा काम नहीं है। मेरे दोस्त, संबंधी या अन्य लोग जो मेरे लिये सोचते हैं, वे अगर चाहते हैं तो जश्‍न मना सकते हैं।

उन्होंने कहा कि एक बात जो मुझे इस बुढ़ापे में परेशान करती है वह है मेरी फिल्मों के प्रिंट का जर्जर होना। जिसमें कई आज भी दर्शनीय मानी जाती हैं। सेन ने कहा कि उनमें से अधिकांश की स्थिति बहुत खराब है। ऐसा खराब जलवायु और उचित रखरखाव के अभाव के कारण हो रहा है।

मृणाल सेन की कथा के साथ भारतीय सिनेमा के बदलते हुए परिदृश्य को भी जेहन में रखें तो मृणाल सेन के संकल्प का सही मतलब समझ में आयेगा। गौरतलब है कि सत्तर के दशक के आक्रोश के प्रतीक ‘एंग्री यंग मैन’ के रचयिता सलीम-जावेद की जोड़ी बिखर चुकी थी और सदी के महानायक अमिताभ का सितारा अब बुझ रहा था। ‘तेजाब’, ‘परिंदा’, ‘काला बाजार’ जैसी फिल्मों के साथ आधुनिक शहर की अंधेरी गुफाएं सिनेमा में आने लगीं। इन्हीं बरसों में जेन नेक्स्ट के स्टार अनिल कपूर, जैकी श्रॉफ वगैरह उभरे। पॉपुलर फिल्मों के बरक्स समांतर सिनेमा ने इस दशक में अपनी मौजूदगी का अहसास और गहरा किया। ‘जाने भी दो यारों’ ने सत्ता की काली करतूत, ‘अर्धसत्य’ ने सड़ चुके सिस्टम के भीतर जीने की तकलीफ और ‘सलाम बॉम्बे’ ने शहर के हाशिए को जिस असरदार अंदाज में पर्दे पर दिखाया, वह हिन्‍दी समांतर सिनेमा किस ऊँचाई पर पहुंच चुका था, यह बताने के लिये काफी है। कहते हैं कि शुरुआती दिनों में स्क्रीनप्ले रायटर जोड़ी सलीम-जावेद खुद पेंट का डिब्बा हाथ में लेकर अपनी फिल्मों के पोस्टरों पर अपना नाम लिखा करते थे। यही वह जोड़ी थी, जिसने एक सत्तालोलुप और भ्रष्ट समाज के प्रति आम आदमी के विद्रोह को सिनेमाई पर्दे पर जिंदा किया। ‘ऐंग्री यंग मैन’ का जन्म समाज में दहकते नक्सलबाड़ी के अंगारों पर हुआ था और अमिताभ बच्चन के रूप में हिंदी सिनेमा ने सदी के महानायक को इसी जोड़ी के जरिए पाया। अमिताभ दिन में ‘शोले’ की शूटिंग किया करते और मुंबई की जागती रातों में ‘दीवार’ का क्लाइमेक्स फिल्माया जाता था। इसी दशक में समांतर सिनेमा शुरू हुआ, जिसने हिंदी सिनेमा के चालू नुस्खों से अलग जाकर अपना रास्ता बनाया। श्याम बेनेगल की ‘अंकुर’ के साथ शुरू हुआ यह सफर नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी, स्मिता पाटिल, शबाना आजमी जैसे कलाकारों को हिन्‍दी सिनेमा में लेकर आया। 1975 में स्थापित हुई नैशनल फिल्म डिवेलपमेंट कॉरपोरेशन ने इसमें सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हृषिकेश मुखर्जी, गुलजार, बासु चटर्जी की फिल्मों को साथ लेकर देखें तो पता चलेगा कि इस दशक तक आते-आते हिन्‍दी सिनेमा में काफी वेरायटी आ चुकी थी और कई मिजाज, सोच और अप्रोच की फिल्में एक साथ दर्शकों के बीच थीं। लेकिन समांतर सिनेमा के वे चर्चित नाम अब कहीं सुनायी नहीं देते, जबकि हमें मृणाल दा की सिंह गर्जना की गूँज अब भी सुनायी पड़ रही है।

विनोद भारद्वाज के लिखे ये उद्धरण मृणाल दा के अवदान और समांतर सिनेमा दोनों को समझने और जानकारी बढ़ाने में सहायक हैं। उन्होंने जो लिखा है, खासा महत्वपूर्ण है, जरा गौर फरमाये!

साठ के दशक में उभरे नये सिनेमा के कई नाम हैं-समांतर सिनेमा, सार्थक सिनेमा, आर्ट सिनेमा, नयी धारा, प्रयोगधर्मी सिनेमा, गैर-पेशेवर सिनेमा। समांतर सिनेमा (पैरलल सिनेमा) ही शायद सबसे सही नाम है। सन् 1960 में फिल्म वित्त निगम (फिल्म फाइनेंस कार्पोरेशन या एफएफसी) ने सिनेमा के लिये जगह बनानी शुरू की थी और साठ के दशक के अंतिम वर्षों में भारतीय भाषाओं में एक साथ कई ऐसी फिल्में बनीं जिन्होंने नयी धारा आंदोलन को ऐतिहासिक पहचान दी। फ्राँस में पचास के दशक में कुछ युवा फिल्म समीक्षकों ने नयी धारा को विश्‍व सिनेमा के इतिहास में अपने ढंग से रेखांकित किया और जब उन्होंने (गोदार, फ्रांसुआ त्रुफो आदि) अपनी फिल्में बनानी शुरू कीं तो उन फिल्मों को फ्राँसीसी भाषा में नूवेल वाग (न्यू वेव यानी नयी धारा या लहर) नाम दिया गया। एफएफसी ने शुरू में सुरक्षित रास्ता चुना था और वी. शांताराम की ‘स्त्री’ (1962) सरीखी फिल्मों से शुरुआत की थी। सत्यजित राय की ‘चारुलता’, ‘नायक’, ‘गोपी गायन बाघा बायन’ सरीखी फिल्में भी इसी स्रोत से बनीं। राय तब तक अंतर्राष्ट्रीय ख्याति पा चुके थे। शांताराम तो खैर मुख्यधारा के सिनेमा की पैदाइश थे। लेकिन फिल्म पत्रकार बीके करंजिया जब एफएफसी के अध्यक्ष बने, तो कम बजट की प्रयोगधर्मी फिल्मों को बढ़ावा मिलना शुरू हुआ।

उन्होंने जो लिखा है, बांग्ला फिल्मकार मृणाल सेन की ‘भुवन शोम’ (1969) से समांतर सिनेमा की शुरुआत मानी जा सकती है। इस फिल्म का बजट कम था, नायक उत्पल दत्त भले ही नायककार और अभिनेता के रूप में मशहूर थे, लेकिन नायिका सुहासिनी मुले बिलकुल नया चेहरा थीं। ‘भुवन शोम’ का नायक रेलवे में एक अक्खड़-अकड़ू अफसर था जो गुजरात के उजाड़ में चिडि़यों के शिकार के चक्कर में एक ग्रामीण लड़की के सामने अपनी हेकड़ी भूलने पर मजबूर हो जाता है। लड़की को इस तानाशाह अफसर का कोई डर नहीं है। अफसर को जीवन की नयी समझ मिलती है। खुद सत्यजित राय को समांतर सिनेमा का एक नाम कहा जा सकता है। मृणाल सेन, राय और ऋत्विक घटक लगभग एक ही दौर में अपनी फिल्मों से भारत के बेहतर सिनेमा के चर्चित प्रतिनिधि साबित हुए थे। राय को पश्‍चि‍म में अधिक ख्याति और चर्चा मिली, मृणाल सेन राजनीतिक दृष्टि से अधिक प्रतिबद्ध थे और ऋत्विक घटक बाद में भारतीय समांतर सिनेमा के अघोषित गुरु बना दिये गये। मणि कौल, कुमार शहानी आदि नयी धारा के फिल्मकार घटक के छात्रा थे और वे राय के सिनेमा को अपना ‘पूर्ववर्ती’ नहीं मानते थे। कुमार शहानी क्योंकि फ्रांस में रॉबर्ट ब्रेसां सरीखे चर्चित प्रयोगधर्मी फिल्मकार के साथ भी काम कर चुके थे, इसलिये उनकी पहली फिल्म ‘माया दर्पण’ को प्रयोगधर्मी सिनेमा के प्रारम्‍भि‍क इतिहास में मील का पत्थर बना दिया गया। मणि कौल की ‘उसकी रोटी’ एक दूसरा मील का पत्थर थी।

उन्होंने जो लिखा है, समांतर सिनेमा के दो सिरे थे- एक सिरे पर ‘भुवन शोम’, ‘सारा आकाश’ (बासु चटर्जी), ‘गर्म हवा’ (एमएस सथ्यू), ‘अंकुर’ (श्याम बेनेगल) आदि थीं जिनमें सिनेमा के मुख्य गुणों को पूरी तरह से छोड़ नहीं दिया गया था। दूसरे सिरे पर ‘उसकी रोटी’, ‘माया दर्पण’, ‘दुविधा’ (मणि कौल) आदि फिल्में थीं जो सिनेमा की प्रचलित परिभाषा से काफी दूर थीं। राय ने 1971 में ‘ऐन इंडियन न्यू वेव?’ नाम से एक लम्‍बे लेख में विश्‍व सिनेमा को ध्यान में रख कर भारतीय समांतर सिनेमा पर सवाल उठाये थे। सन् 1974 में उन्होंने ‘फोर ऐंड ए क्वार्टर’ नाम से अपने एक दूसरे लेख में ‘गर्म हवा’, ‘माया दर्पण’, ‘दुविधा’, ‘अंकुर’ पर लिखा था।

‘भुवन शोम’, ‘गर्म हवा’, ‘अंकुर’ ऐसी फिल्में नहीं थीं जिन्हें देखकर दर्शक ‘अपना सर पकड़ कर’ बाहर आये। ‘गाइड’ (जो निश्‍चय ही हिन्‍दी सिनेमा की एक उपलब्धि है) के निर्देशक विजय आनंद मुंबई के मैट्रो सिनेमा में अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के दौरान एक फिल्म छोड़कर अपना सर पकड़े बाहर आये और कॉफी पी रहे थे। उन्होंने इन पंक्तियों के लेखक से यह टिप्पणी की थी।

मृणाल सेन की प्रसि‍द्ध फि‍ल्‍में-
रातभोर, नील आकाशेर नीचे, बेशाये श्रावण, पुनश्च, अवशेष, प्रतिनिधि, अकाश कुसुम, मतीरा मनीषा, भुवन शोम, इच्छा पुराण, इंटरव्यू, एक अधूरी कहानी, कलकत्ता 1971, बड़ारिक, कोरस, मृगया, ओका उरी कथा, परसुराम, एक दिन प्रतिदिन, अकालेर संधनी, चलचित्र, खारिज, खंडहर, जेनसिस, एक दिन अचानक, सिटी लाइफ-कलकत्ता माई एल-डराडो,  महापृथ्वी, अन्तरीन, 100 ईयर्स ऑफ सिनेमा और आमार भुवन।

(समकालीन तीसरी दुनिया, जून 2012 से साभार)

भारत का बनेगा क्या : सुधीर सुमन

मुख्यधारा के सिनेमा द्वारा फिल्मों के माध्यम से शहीद भगतसिंह की गलत छवि पेश करने की साजिश को उजागर करे रहे हैं चर्चित लेखक सुधीर सुमन-

मुख्यधारा का हिंदी सिनेमा प्रायः शासकवर्ग की संस्कृति और विचारधारा का  ही प्रचार-प्रसार करता है, अपनी व्यावसायिक बाध्यताओं के कारण वह किसी  क्रांतिकारी विषय या चरित्र को उठाता भी है  तो इतनी सावधानी के साथ कि  शासक वर्ग के लिए वह कोई गंभीर संकट न खड़ा कर दे। गौर से देखें  तो आमतौर पर भारतीय राजनीति और समाज पर जिनका वर्चस्व है- जो शासक वर्ग है,  उसके लिए भगतसिंह की विचारधारा आज भी खतरनाक है। इसके बावजूद इक्कीसवीं सदी की शुरुआत होते ही, पांच-पांच फिल्में बनाने की घोषणाएं हुईं, सन् 2002 में तीन फिल्में प्रदर्शित भी हुईं, जिनमें से धर्मेंद्र और राजकुमार संतोषी द्वारा बनाई गई फिल्में अक्सर देशभक्ति के लिए तय दिवसों को किसी न किसी टीवी चैनल पर दिखाई जाती रही हैं। इनके बाद एक और फिल्म आई- रंग दे बसंती।
भगतसिंह निर्विवाद रूप से आजादी की लड़ाई के सर्वाधिक लोकप्रिय नायक रहे हैं। पोपुलर सिनेमा में गांधी, सावरकर या किसी अन्य चरित्र को लेकर शायद ही कभी ऐसी प्रतिस्पर्धा हुई होगी, जैसी भगतसिंह और उनके साथियों को लेकर  हाल के वर्षों में रही है। बेशक आज देश जिस तरह के संकट से गुजर रहा है, उसमें लोगों की स्वाभाविक आकांक्षा है कि भगतसिंह जैसा राष्ट्रनायक फिर से  पैदा हों। हिंदी सिनेमा इस जनाकांक्षा को भुनाने के चक्कर में ही अचानक  भगतसिंह की जीवन-गाथा की ओर दौड़ पड़ा। लेकिन जिस तरह सर्वव्यापी  भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, महंगाई और अपराधियों और काले धन वालों के वर्चस्व के तले पीस रही जनता के विक्षोभ को संगठित न होने देने और उसे गलत दिशा में भटका देने के लिए शासक वर्ग सांप्रदायिक, जातिवादी-अंधराष्ट्रवादी उन्माद का सहारा लेता है या ऐसे भूतपूर्व नौकरशाहों, कारपोरेट संतों और राजनेता पुत्रों को नायक के बतौर उभारता है, जो वास्तव में पूंजी की सत्ता का विनाश करने वाले नहीं बल्कि उसके चारण होते हैं, उसी तर्ज पर हिंदी सिनेमा ‘सुपरमैन’ से लगने वाले लड़ाकों को पेश करता है, जो किसी भी समस्या  की मूल वजह नहीं तलाशते, उनके सामने कोई एक दुश्मन रहता है, जिसे खत्म कर देना ही हर समस्या का समाधान होता है। उसके लिए भगतसिंह एक ऐसे ‘ही मैन’ हैं, जो देश के दुश्मन अंग्रेजों से दिलेरी के साथ लड़ते हुए फांसी पर चढ़ गए। भगतसिंह साम्राज्यवाद के खिलाफ राष्ट्रीय मुक्ति के नायक हैं और वे और  उनके साथी एक आधुनिक धर्मनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक राष्ट्र निर्माण के लिए राजनैतिक-वैचारिक संघर्ष चला रहे थे, यह तथ्य भगतसिंह पर बनी फिल्मों में  प्रायः नहीं है।
‘राष्ट्रवाद’ की अन्य धाराओं से भगतसिंह और उनके साथियों की जो बहसें थी, जो वैचारिक टकराव थे, वे सामने नहीं आते। भगतसिंह पर बनी फिल्मों में सबसे ज्यादा आपत्तिजनक प्रसंग धर्मेंद्र की फिल्म ‘शहीद: 23 मार्च 1931’ में दिखाई देता है। इसमें भगतसिंह को एक उग्र हिंदू अंधराष्ट्रवादी के रूप में  दिखाया गया है। फिल्म के शुरुआती हिस्से में भगतसिंह जब एक देशभक्ति गीत  गाते हैं तब वहां मंच की पृष्ठभूमि में भारतमाता की जो तस्वीर है, वह आरएसएस द्वारा प्रचारित छवि से मेल खाती है। अकारण नहीं है कि भगतसिंह जो साम्राज्यवाद प्रेरित युद्धों के कट्टर विरोधी थे, उन पर बनी फिल्म को देखते वक्त पाकिस्तान के खिलाफ नारे लगे थे। बॉबी देओल ने बाकायदा एक साक्षात्कार में कहा था- ‘‘भगतसिंह का किरदार निभाने से पता चला कि वे किस मिट्टी के बने थे, वे कितने बुद्धिमान व विचारवान थे और उनके क्या अहसास  थे। अंग्रेज शासकों की तरह पाकिस्तान के खिलाफ भी हम सब भारतीयों को एकजुट  होना चाहिए।’’
‘23 मार्च 1931 शहीद’ में भगतसिंह को हिंदूसभाई लाला लाजपत राय के  अंधअनुयायी की तरह दिखाया गया है। एक लिजलिजी श्रद्धा है, जो भगतसिंह के  व्यक्तित्व से मेल नहीं खाती। इतिहास गवाह है कि भगतसिंह और उनके साथी  लाला लाजपत राय के सांप्रदायिक विचारों के सख्त विरोधी थे। राय की हत्या का प्रतिशोध भावनात्मक कम, राजनीतिक रणनीति अधिक थी। मगर एक दूसरी फिल्म ‘शहीद-ए-आजम’ में भी इसे महज भावनात्मक प्रतिक्रिया के रूप में ही दिखाया गया है। राजकुमार संतोषी की फिल्म ‘लिजेंड ऑफ़ भगतसिंह’ इस मायने में सर्वथा भिन्न है। उसमें भगतसिंह का वैचारिक-राजनैतिक स्टैंड स्पष्ट रूप से सामने आता है। अधिकांश समीक्षकों ने संतोषी की फिल्म को भगतसिंह पर बनी फिल्मों में अधिक तथ्यपरक माना। इसकी वजह यह भी है कि यह पीयूष मिश्रा के नाटक ‘गगन दमामा बाज्यो’ पर आधारित है। इसके गीतों में निहित भावों को एआर  रहमान का संगीत अत्यंत संवेदनात्मक कुशलता से अभिव्यक्त करता है। यह पहली  फिल्म है जो भगतसिंह और उनके साथियों पर पड़े रूसी क्रांति के प्रभावों की ओर संकेत करती है।
अपने शिक्षक विद्यालंकार जी से उनका जब पहले-पहल समाजवादी अवधारणाओं  से परिचय होता है, उस वक्त पृष्ठभूमि में दर्शकों को मार्क्स और लेनिन की तस्वीरें नजर आती हैं। भगतसिंह और उनके साथी समाजवादी हैं, यह तथ्य ‘शहीद-ए-आजम’ में भी है, पर समाजवाद का मकसद क्या है, इसके बारे में यह फिल्म चुप रहती है। संतोषी की फिल्म ‘द लिजेंड ऑफ़ भगतसिंह’ जरूर उस मकसद के बारे में बताती है हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी की प्रसिद्ध फिरोजशाह कोटला मीटिंग के दृश्य में भगतसिंह कहते हैं- ‘‘सिर्फ आजादी हमारा मकसद नहीं है। अगर कांग्रेस की राह से आजादी आ भी गई तो उससे गरीबों, मजदूरों और किसानों की हालत में कोई बदलाव नहीं आएगा। गोरे साहब की जगह भूरे साहब आ जाएंगे और आगे चलकर धर्म और जात-पांत के नाम पर पूरे देश में जो आग  भड़केगी, आने वाली पीढि़यां उसे बुझाते-बुझाते थक जाएंगी। हमारा मकसद इस शोषण करने वाली व्यवस्था को खत्म कर समाजवाद लाना है।’’ इसी मीटिंग में एच.आर.ए. के साथ ‘सोशलिस्ट’ शब्द जुड़ा। इस फिल्म में एच.एस.आर.ए. की बैठकों में क्रांतिकारी एक दूसरे को कामरेड कहकर संबोधित करते हैं। जहां  दूसरी फिल्मों में चंद्रशेखर आजाद को छोड़कर सारे पात्र भगतसिंह के पिछलग्गू जान पड़ते हैं, वहीं ‘द लिजेंड ऑफ़ भगतसिंह’ में कामरेडों का एक पूरा ग्रुप उभरता है। शिव वर्मा और अजय घोष भी नजर आते हैं।
आमतौर पर असेंबली में बम फेंकने की साहसपूर्ण कार्रवाई की चर्चा के क्रम में लोग यह भूल जाते हैं कि भगतसिंह ने मजदूर हड़तालों को कुचलने के लिए बनाए जा रहे ‘ट्रेड डिस्प्यूट बिल’ के विरोध में बम फेंका था। ‘द लिजेंड ऑफ़  भगतसिंह’ इस मामले में सचेत रही है। फिल्म में अन्यत्र भी भगतसिंह अपनी बातों को किसान-मजदूरों तक पहुंचाने की जरूरत पर जोर देते हैं। मगर  वे कौन सी बातें हैं, वे कैसे विचार हैं, जिनको भगतसिंह किसान-मजदूरों, नौजवानों और बुद्धिजीवियों तक पहुंचाना चाहते थे, उनकी आज क्या प्रासंगिकता है, इस बारे में यह फिल्म भी बहुत कुछ नहीं बताती।
इसके लिए राजकुमार संतोषी को जरूर बधाई देना चाहिए कि भगतसिंह के मंगेतर  वाले प्रसंग को छोड़कर उन्होंने आमतौर पर ऐतिहासिक तथ्यों से कोई खिलवाड़ नहीं किया है। एक ओर जहां सन्नी देओल अपनी फिल्म में पार्टी का नाम तक  नहीं लेते, वहीं संतोषी अपनी फिल्म में उस पार्टी का नाम और सोशलिज्म के  प्रति उसकी आस्था को बेझिझक सामने लाते हैं। अपनी फिल्म के अंत में  स्क्रीन पर दर्शकों के लिए वे एक सवाल छोड़ते हैं- ‘‘भगतसिंह और उनके  साथियों ने अपना जीवन एक आजाद, लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष भारत के लिए  बलिदान किया। आज भी हम भारत में सांप्रदायिकता, भ्रष्टाचार और शोषण का सामना कर रहे हैं। क्या हमने उनके बलिदान के साथ विश्वासघात नहीं किया?’’ आखिर अंग्रेजी में लिखे इस सवाल का दर्शकों पर कितना असर पड़ता है ? विश्वासघात आखिर किसने किया, रहनुमाओं ने या आमलोगों ने ?
भगतसिंह पूंजीवाद, साम्राज्यवाद, वर्णभेद, सांप्रदायिकता और अंधविश्वास के विरोधी थे। गांधी से उनका टकराव सिर्फ हिंसा-अहिंसा को लेकर नहीं था, जबकि भगतसिंह पर बनी फिल्में कमोबेश उन्हें हिंसा-अहिंसा के प्रतीकों में  तब्दील कर देती हैं। गांधी जी के वर्ग समन्वय और अध्यात्मवाद से भी क्रांतिकारियों का विरोध था। गांधी और लाला लाजपत राय, दोनों बोल्शेविक किस्म की क्रांति के पक्ष में नहीं थे। उनका मानना था कि साम्यवादी विचारों के प्रचार से पूंजीपति सरकार के साथ मिल जाएंगे। क्रांतिकारियों ने पूंजीपतियों के सहयोग से चलने वाले संघर्ष पर काफी व्यंग्य भी किया था। उन्होंने तो लाला लाजपत राय पर सरकार के लिए क्रांतिकारियों की मुखबिरी  करने का आरोप भी लगाया था। सरकार कांग्रेस और गांधी जी पर इसलिए मेहरबान  थी कि वे किसी जनक्रांति, खासकर कम्युनिस्ट क्रांति के पक्षधर नहीं थे। अपने ‘महात्मापन’ के प्रति सदैव सचेत रहने वाले गांधी जी ने ‘ऐतिहासिक कलंक’ की आशंका के बावजूद अगर भगतसिंह को बचाने के लिए कुछ नहीं किया  तो इसकी एकमात्र वजह यही थी। भगतसिंह पर बनाई गई सारी फिल्मों में यह दिखाया गया है कि ब्रिटिश सरकार भगतसिंह को येन-केन-प्रकारेण खत्म कर देना चाहती थी। आखिर क्यों ? सिर्फ इसलिए नहीं कि भगतसिंह साम्राज्यवाद के खिलाफ आजीवन  समझौताविहीन संघर्ष चलाने के लिए दृढ़प्रतिज्ञ थे, बल्कि इसलिए कि वे क्रांतिकारी कम्युनिस्ट आंदोलन विकसित करना चाहते थे। गुप्तचर ब्यूरो के तत्कालीन निदेशक डेविड पेट्रिक की रिपोर्ट में भी कम्युनिज्म के प्रति सरकार के खौफ को महसूस किया जा सकता है।
साम्राज्यवादियों को आज भी कम्युनिज्म बर्दाश्त नहीं होता। उनकी पिट्ठू सरकारें आज भी कम्युनिज्म के भय से कांपती हैं। अपने देश की सरकारों की साम्राज्यवादपरस्ती तो जगजाहिर है। 2002 में जब ये फिल्में प्रदर्शित हुईं, तब फिल्म सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष ने भगतसिंह द्वारा लेनिन की जीवनी  पढ़ने पर इसलिए एतराज किया था कि कहीं लोग यह न मान लें कि वे वामपंथी विचारधारा के थे। उनका बयान था कि ‘‘हम नहीं चाहते कि दूसरे राष्ट्रीय  नेताओं की कीमत पर भगतसिंह की तारीफ की जाए। जहां तक लेनिन का सवाल है, हम रूस का महिमामंडन क्यों करें?’’ मृत्यु के इतने सालों के बाद भी भगतसिंह के विचारों के प्रति शासकवर्ग के खौफ की यह बानगी है। उनके विचारों और जीवन पर केंद्रित किताबें बेचने को भी इस आजाद देश की सरकारों ने गुनाह  ठहराया और लोगों को जेल में डाला। कुछ ऐसे ही हाल देखकर कभी गीतकार शैलेंद्र ने लिखा था- भगतसिंह इस बार न लेना काया भारतवासी की/देशभक्ति  के लिए आज भी सजा मिलेगी फांसी की। खैर, देखने लायक है कि वे कौन से विचार हैं, जिनके लिए आज भी भगतसिंह को मारने के लिए शासकवर्ग हरसंभव कोशिश करता है। असेंबली बमकांड वाले केस में सेशन कोर्ट में बयान देते हुए उन्होंने कहा था- ‘‘देश को एक आमूल परिवर्तन की आवश्यकता है और जो लोग इस बात को महसूस करते हैं उनका कर्तव्य है कि साम्यवादी सिद्धांतों पर समाज का पुनर्निमाण करें। जब तक यह नहीं किया जाता और मनुष्य द्वारा मनुष्य का शोषण तथा एक राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्र का शोषण, जो साम्राज्यशाही के नाम से विख्यात है, समाप्त नहीं कर दिया जाता, तब तक मानवता को उसके क्लेशों से छुटकारा मिलना असंभव है।’’
यह संयोग मात्र नहीं है कि भगतसिंह पर केंद्रित फिल्मों में साम्राज्यवाद के नए हमलों के प्रति कोई चिंता नहीं दिखाई पड़ती। बल्कि बाद में प्रदर्शित ‘रंग दे बसंती’, जिसमें आज के कुछ नौजवान भगतसिंह और उनके साथियों की जिंदगी को जीने की कोशिश करते हैं और एकाध भ्रष्ट नेताओं की हत्या के जरिए बदलाव का सपना देखते हैं, उसमें भी साम्राज्यवाद के साथ भारतीय शासकवर्ग का रिश्ता कहीं नहीं दिखता, बल्कि भ्रष्टाचार और राष्ट्रवाद का भी जो संदर्भ है, वह सेना से ही जुड़ा हुआ है। अब इसका क्या करें कि देशभक्ति का पर्याय बना दी गई सेना के भ्रष्टाचार के किस्से भी अब सरेआम हो चुके हैं। सवाल यह है कि फौज और पुलिस किनके हितों की रक्षा करती है, किनके हितों के लिए सिपाही कुर्बान होते हैं ? पूरे देश को बहुराष्ट्रीय कंपनियों का चारागाह बना देने वाली सरकारें क्या देशभक्त  हैं? भगतसिंह ने कहा था कि ‘‘अगर कोई सरकार जनता को उसके मूलभूत अधिकारों  से वंचित रखती है तो जनता का केवल यह अधिकार ही नहीं, बल्कि आवश्यक  कर्तव्य बन जाता है कि ऐसी सरकारों को समाप्त कर दे।’’ क्या मौजूदा रंग-बिरंगी पार्टियों की सरकारों ने जनता को उनके मूलभूत अधिकारों से  वंचित नहीं कर रखा है ? और क्या जो लोग अपने मूलभूत अधिकारों के लिए लड़  रहे हैं उनको बर्बरता के साथ कुचलने के मामले में  इन सारी सरकारों के बीच एकता नहीं है?
पाकिस्तान विरोधी अंधराष्ट्रवाद का मामला हो या धर्म और सांप्रदायिकता के राजनीतिक इस्तेमाल का, भारत की अधिकांश पार्टियां और सरकारें इससे व्यवहार  में सहमत दिखती हैं, जबकि भगत सिंह इसके प्रबल विरोधी थे। अपने स्वाधीनता आंदोलन की बुनियादी गड़बड़ी का जिक्र करते हुए उन्होंने ‘सांप्रदायिक दंगों और उसका इलाज’ लेख में लिखा है कि ‘‘ऐसे नेता जो सांप्रदायिक आंदोलन  में जा मिले हैं, वैसे तो जमीन खोदने से सैकड़ों निकल आते हैं, जो नेता हृदय से सबका भला चाहते हैं, ऐसे बहुत ही कम हैं, और सांप्रदायिकता की ऐसी  बाढ़ आई हुई है कि वे भी उसे रोक नहीं पा रहे हैं। ऐसा लग रहा है कि भारत में नेतृत्व का दिवाला पिट गया है।’’ भगतसिंह ने इसीलिए धर्म से राजनीति  को अलग रखने पर जोर दिया और सच्चे इंकलाब और समाजवाद के लिए नास्तिकता के  पक्ष में जोरदार तर्क दिया। बाकुनिन, मार्क्स और लेनिन की नास्तिकता और  सफल क्रांतियों के बीच उन्हें एक सम्बद्धता महसूस होती थी। मगर सिर्फ ‘लिजेंड ऑफ़ भगतसिंह’ फिल्म के भगतसिंह कहते हैं कि रब में उनका यकीन नहीं है। वैसे संतोषी भी नास्तिकता के पक्ष में उनके प्रबल तर्कों को सामने  लाने से कतरा जाते हैं। मजेदार तथ्य यह है कि इसी फिल्म के कैसेट और सीडी  जारी करते हुए पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने कहा था कि फिल्म देखकर ऐसा लगता है, जैसे भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु का एक बार फिर जन्म हो गया है। बात इतनी ही होती तो कोई बात न थी। लेकिन वे यह भी बताना नहीं भूले कि ‘हमारे देश में पुनर्जन्म पर विश्वास किया जाता है।’ राव यह भी कह सकते थे  कि अभिनेताओं ने जीवंत अभिनय किया है। यह महज लहजे का फर्क नहीं है, यह है पुनर्जन्म में विश्वास और आस्तिकता का आग्रह जिसके कारण एक ओर उग्र  हिंदूवादी भगतसिंह (बाबी देओल/शहीद: 23 मार्च 1931) अपनी मां से पुनर्जन्म की बात करता है तथा बताता है कि भगवान का वास हम सबके भीतर है  और थोड़े उदार किस्म का भगतसिंह (सोनू सूद/शहीद-ए-आजम) आस्तिकता-नास्तिकता के संबंध में कही गई विवेकानंद की उक्ति को दुहराता है, जबकि ऐसा नहीं है कि इन फिल्मों को बनाने वाले भगतसिंह के बहुचर्चित लेख ‘मैं नास्तिक क्यों हूं?’ से अनभिज्ञ रहे होंगे।
फिल्मों की तो नहीं,  पर अखबारों की भूमिका की आलोचना करते हुए भगतसिंह ने लिखा था- ‘‘अखबारों का असली कर्तव्य शिक्षा देना, लोगों से संकीर्णता निकालना, सांप्रदायिक भावनाएं हटाना, परस्पर मेल-मिलाप बढ़ाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता बनाना था, लेकिन इन्होंने अपना मुख्य कर्तव्य अज्ञान फैलाना, संकीर्णता का प्रचार करना, सांप्रदायिक बनाना, लड़ाई-झगड़े करवाना, भारत की साझी राष्ट्रीयता को नष्ट करना बना लिया है। यही कारण है  कि भारतवर्ष की वर्तमान दशा पर विचार कर आंखों से रक्त के आंसू बहने लगते हैं और दिल में सवाल उठता है कि ‘भारत का बनेगा क्या?’
विडंबना यह है कि ये फिल्में भगतसिंह के सपनों के विरुद्ध जो भारत बना है, उसकी ओर संकेत कर मौन हो जाती हैं या उस ‘अवांछित भारत’ के लिए जिम्मेवार सामंती-पूंजीवादी, सांप्रदायिक और साम्राज्यवादपरस्त शक्तियों के राष्ट्रवाद के दायरे में ही प्रायः चक्कर लगाती रह जाती हैं। कोई भी फिल्म ‘भारत का बनेगा क्या ?’ यानी भारत के भविष्य, उसके नवनिर्माण के सपनों से  प्रेरित होकर नहीं बनाई गई है। इसलिए इनमें निर्माण की वह ताकत यानी  किसान-मजदूर गायब हैं, जिन्हें संगठित करने का आह्वान भगतसिंह ने नौजवानों से किया था। ‘रंग दे बसंती’ के नौजवानों के सामने से वह वैचारिक-सांगठनिक  पर्सपेक्टिव गायब है। हकीकत में जिन लोगों ने भगतसिंह सरीखी जिंदगी और मौत का चुनाव किया या जो भगतसिंह और उनके साथियों के रास्तों पर चल रहे हैं, उनकी राजनीति की गहराइयों में जाने से व्यावसायिक सिनेमा हमेशा गुरेज करता है। जेएनयू के पूर्व अध्यक्ष और भाकपा-माले के नेता चंद्रशेखर के जीवन पर संभावित फिल्म के बहाने समकालीन जनमत के मार्च 2011 के अंक में कविता कृष्णन ने इस सवाल को उठाया है कि क्या व्यावसायिक सिनेमा क्रांतिकारी के  साथ न्याय कर सकता है ? दरअसल आज के सूचना माध्यमों, खासकर तथाकथित लोकतंत्र के चौथे खंभे यानी अखबारों और टीवी चैनलों में जिनकी पूंजी लगी है, उनके हित में जिस तरह से जनांदोलनों और जनराजनीतिक कार्रवाइयों की उपेक्षा की जाती है या उनकी नकारात्मक छवि बनाई जाती है, लगभग उसी तरह का काम हिंदी सिनेमा भी करता है। कहीं क्रांति का कोई नायक, कोई विचार या कोई संगठित आंदोलन जनता को नायक में तब्दील न कर दे, कोई कहानी इंकलाबी उभार की उत्प्रेरक न बन जाए, इसका फिल्मकार प्रायः ध्यान रखते हैं।

तीसरा लखनऊ फिल्म समारोह 8 से 10 अक्टूबर तक

लखनऊ : तीसरा लखनऊ फिल्म उत्‍सव 8 से 10 अक़टूबर तक वाल्मीकि रंगशाला, उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी, गोमती नगर मे आयोजित किया जाएगा। जन संस्कृति मंच (जसम) ने फिल्म उत्सव को सुपरिचित कलाकार व गायक गिरीश तिवाड़ी गिर्दा की याद को समर्पित किया है।

समारोह 8 अक्टूबर को शाम 4 बजे शुरू होगा। ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ की थीम पर आयोजित इस समारोह का उद़घाटन हिन्दी के जाने-माने आलोचक व जसम के राष्ट्रीय महासचिव प्रणय कृष्ण करेंगे। ‘जीवन और कला: सदर्भ तेभागा किसान आंदोलन और सोमनाथ होड़’ पर प्रसिद्ध चित्रकार अशोक भौमिक के व्याख्यान से समारोह की शुरुआत होगी।

फीचर फिल्मों की श्रृंखला में गौतम घोष की ‘पार’ तथा बेला नेगी की ‘दाँये या बाँये’ दिखाई जायेंगी। ‘दाँये या बाँये’ में गिरीश तिवाड़ी गिर्दा की यादगार भूमिका है। समारोह में पिछली शताब्दी के क्रान्तिकारी फिल्मकार इल्माज गुने की चर्चित फिल्म ‘सुरू’ का प्रदर्शन होगा, वहीं लखनऊ के दर्शक ईरानी फीचर फिल्म ‘टर्टल्स कैन फ्लाई’ देख सकेंगे। ईरान के प्रसिद्ध फिल्मकार बेहमन गोबादी के निर्देशन में युद्ध की पृष्ठभूमि पर बनी यह फिल्म उस विभीषिका को सामने लाती है जिसमें मनुष्य और मनुष्यता को खत्म किया जा रहा है।

लखनऊ फिल्म समारोह में वृतचित्रों के खण्ड में कबीर पर बनाई शबनम विरमानी की फिल्म ‘हद अनहद’ दिखाई जायेगी। पिछले दिनों देश के विभिन्न हिस्सों में हुए सत्ता के दमन और उसके खिलाफ संघर्ष तथा जनजीवन को गहरे प्रभावित करने वाली घटनाओं और त्रासदी को केन्द्र कर कई वृतचित्र बने जैसे कश्मीर पर संजय काक ने ‘जश्ने आजादी’ बनाई तो ओडीशा के कंधमाल में हुए दंगों पर देबरंजन सारंगी ने ‘फ्राम हिन्दू टू हिन्दूत्व’, बनारस के मणिकर्णिका घाट पर चिता जलाने वाले बच्चों की दशा पर राजेश एस जाला ने ‘चिल्ड्रेन ऑफ पायर’, पुणे महानगर में कचरे की राजनीति व सफाई कर्मचारियों के कर्मजीवन पर अतुल पेठे ने ‘कचरा व्यूह’ जैसे वृतचित्रों का निर्माण किया। ये फिल्में लखनऊ फिल्म समारोह का मुख्य आकर्षण होंगी।

इस उत्सव में बच्चों का भी एक सत्र है जिसमें अल्बर्ट लामूरिस्सी की फ्रेंच फिल्म ‘रेड बैलून’ तथा हिन्दी फीचर फिल्म ‘छुटकन की महाभारत’ का आनन्द बच्चे उठा सकेंगे। फिल्मों के अलावा समारोह में संवाद, परिचर्चा तथा गायन के भी कार्यक्रम होंगे। ‘प्रतिपक्ष की भूमिका में सिनेमा’, ‘वृतचित्र: प्रतिरोध के कई रंग’, बदलती दुनिया में सिनेमा’ आदि विषयों पर परिसंवाद में अजय कुमार, अजय सिंह, संजय जोशी, राजेश कुमार, अनिल सिन्हा, भगवान स्वरूप कटियार, मनोज सिंह आदि भाग लेंगे। तरुण भारतीय और के मार्क स्वेअर द्वारा तैयार म्यूजिक वीडियो के गुलदस्ते ‘हम देखेंगे’ का लखनऊ के दर्शक आस्वादन करेंगे। मालविका गायन प्रस्तुत करेंगी।
जसम के संयोजक कौशल किशोर ने बताया कि आज दर्शक स्वस्थ मनोरंजन चाहता है और हमारी कोशिश है कि जनता तक ऐसी कला पहुँचाई जाए जो उन्हें सजग, संवेदनशील, जागरुक और जुझारू बनाये। सिनेमा सशक्त व लोकप्रिय कला माध्यम है। यह आन्दोलन और प्रतिरोध का माध्यम बने। आज जनजीवन और सामाजिक संघर्षों से जुड़ी ऐसी कथा फिल्मों और वृतचित्रों का निर्माण हो रहा है जहाँ समाज की कठोर सच्चाइयाँ हैं, जनता का दुख-दर्द, हर्ष-विषाद और उसका संघर्ष व सपने हैं। इसी तरह की फिल्मों को लेकर तीन दिन का यह कार्यक्रम है। फिल्मों का प्रदर्शन निशुल्क और जनता के सहयोग से किया जा रहा है। इस अवसर पर ‘प्रतिपक्ष की भूमिका में सिनेमा’ स्मारिका भी जारी की जायेगी।

फिल्‍म उत्‍सव के बारे में अधिक जानकारी के लिए कौशल किशोर, संयोजक, जन संस्कृति मंच, लखनऊ से फ़ोन: 09807519227, 09415220306, 09415568836, 09415114685 पर  या kaushalsil.2008@gmail.com और thegroup.jsm@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।