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परीक्षा : प्रेमपाल शर्मा

मम्मी बंटी को संस्कृत पढ़ा रही हैं- ‘जगद्गुरु शंकराचार्य।’

‘जगद्गुरु कैसे हो सकते हैं? सातवीं सदी में क्या हम अमेरिका जा सकते थे? इंग्लैंड जा सकते थे? तब तो अमेरिका की खोज भी नहीं हुई थी।’ बंटी पढ़ाई शुरू होते ही अड़ जाते हैं।

मम्मी चुप। क्या जवाब दें?

‘अच्छा, तू इधर ध्यान दे। पांच बजने वाले हैं और अभी कुछ भी नहीं हुआ।’ वे अर्थ समझाने लगीं, ‘बत्तीस की उम्र में शंकराचार्य भगवान में लीन हो गए।’

‘लीन हो गए? मतलब?’

‘यानी विलीन हो गए? मर गए।’

‘मम्मी लीन में और विलीन में क्या अंतर है ?’

‘एक ही बात है । यानी ईश्वर में समा गए।’

‘मम्मी आप भी क्या कहती हो ? समा कैसे सकता है कोई ?’

‘तपस्या करते-करते ।’

‘लो, अच्छी तपस्या की । खाना नहीं खाया होगा। फैट्स खत्म हो गई होगी । मर गए बेचारे । पागल हैं ये लोग भी । बेकार मर गए । वरना सत्तर साल जीते ।’

‘मजाल कि आगे बढ़ने दे । गाल बजवा लो, बस । ये क्यों ? वो क्यों ? चुप भी तो नहीं रह सकता । कर इसे खुद । सब बच्चे खुद करते हैं । खुद करेगा तब पता चलेगा ।’ वह चली गईं ।

वार्षिक परीक्षा शुरू होने वाली है बंटी की । वैसे बंटी की कम, मम्मी की ज्यादा ।

‘पापा, ये एग्जाम होली के दिनों में ही क्यों होते हैं ? पिछले साल भी इन्हीं दिनों थे ?’ बंटी परीक्षा से ज्यादा होली की तैयारियों में डूबे हैं । ‘इस बार जिंसी को नहीं छोड़ूगा । कह रही थी कि‍ मैं बहुत सारा रंग लेकर आऊंगी । मम्मी, मैं डालता हूं तो भों-भों करके रोने लगती है ।’

बंटी आहिस्ता-आहिस्ता पैर रखते हुए आया । ‘पापा, एक मिनट आओ।’

‘क्यों ? बोलो ।’

उसने होंठ पर अंगुली रखकर चुप रहने का इशारा किया । पापा पीछे-पीछे चल दिए । कोई रास्ता ही नहीं था । उसने खिड़की की तरफ अंगुली से इशारा किया, फुसफुसाते हुए, ‘उधर देखो ।’

पापा को कुछ दिखाई नहीं दिया । उसने खुद पापा की गर्दन ऊपर-नीचे उठाई-गिराई- ‘वो, वो !’

‘उधर है क्या ?’

‘धीरे । खिड़की के किनारों पर देखो न !’

‘क्या है, बताओ तो ?’

‘गिलहरी के बच्चे । तीन-तीन । देखों कैसे सो रहे हैं ? दिखे ?’

खिड़की के बीच अमरूद का पेड़ था । कई बार झांकने के बाद दिखाई दिए तो पापा की भी आंखें खिल गईं । ‘कैसे मजे से सो रहे हैं ! मैंने तो पहली बार देखे हैं ।’

‘गिलहरी के बच्चे ! हैं ना कितने मजेदार, पापा ! देखो उसकी पूंछ पीछे वाले के मुंह पर आ रही है ।’

तभी पापा को जोर की छींक आई ।

‘धीरे-धीरे, पापा ! लो एक तो जग भी गया । च्च-च्च ! अब ये तीनों भाग जाएंगे । आपको भी अभी आनी थी छींक, पापा !’

पापा चाहते हैं कि कहें कि कहां तक याद किया पाठ, लेकिन उसकी तन्मयता देखकर उनकी हिम्‍मत नहीं हुई ।

मम्मी इधर-उधर तलाश कर रही है बंटी को । देखो, अभी यहीं छोड़कर गई थी रसोई तक । यह लड़का तो जाने क्या चाहता है । इसका जरा भी दीदा लगता हो ? ‘बंटी ….ई….ई….’

उनकी आवाज को मील नहीं तो किलोमीटर तक तो सुना ही जा सकता है । लौट-फिरकर झल्‍लाहट फिर पापा पर, ‘अपनी किताबों में घुसे रहोगे। बताओ न कहां गया ? मुझे संस्कृत खत्म करानी है आज । इसे कुछ भी नहीं आता । तुमसे पूछकर गया था ?’

‘मुझसे पूछकर तो कोई भी नहीं जाता । तुम पूछती हो ?’

‘हां, अब पूछ रही हूं ? बताओ ? हाय राम, मैं क्या करूं ? कल क्या लिखेगा यह टेस्ट में ? इसे कुछ भी तो नहीं आता ।’

‘आ जाएगा । सुबह से तो पढ़ रहा है । दस मिनट तसल्ली नहीं रख सकतीं । बच्चा है । थोड़ी मोहलत भी दिया करो ।’

‘इसे आता होता तो मैं क्यों पीछे पड़ती । संस्कृत को भी कह रहा था कि इसे क्यों पढ़ाते हैं ? क्या होगा इससे ? बीजगणित भी क्यों ? भूगोल भी क्यों ? तो इसे घर में क्यों नहीं बिठा लेते ?’ वह रसोई में लौट गईं ।

‘मम्मी ।’ बंटी की आवाज सुनाई दी ।

‘आ गया न ।’ मम्मी रसोई से बाहर थीं । ‘आओ बेटा !’

लेकिन बंटी कहीं नजर नहीं आया । ‘आ जा, आ जा तू ! तेरी धुनाई न की तो मेरा नाम नहीं है ।’ वह फिर वापस लौट गईं ।

बंटी दीवान के नीचे जमीन पर चिपके थे । इतनी पतली जगह में जहां कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था । ‘हमें कोई नहीं ढूंढ सकता और हमने आपकी सारी बातें सुन लीं । पापा से कैसी लड़ाई की आपने ।’

उसकी आंखें पुस्तक पर गड़ी हैं । कुछ लिख रहा है कॉपी में, एक विश्वास के साथ । ‘पापा, वो छोटा-सा कुत्ता था न, वह मर गया ।’ एक पल उसने सिर उठाया और अपने काम में लग गया ? ‘बेचारा गाय की मौत मरा ।’

अब पापा के चौंकने की बारी थी । कुत्ते की मौत तो सुना है, गाय की मौत क्या होती है ? ‘कैसे ?’

‘वैसे ही मरा जैसे गाय मरती है ।’ लंबी-लंबी सांसें ले लेकर । बंटी सांस खींच-खींचकर बताने लगा ।

‘तुमने कहां देखी गाय मरती ?’

‘बहुत सारी । हमारे स्कूल के पीछे जो मैदान है, उसमें उनके मुंह से बड़े झाग निकलते थे । मैं और नारायण रोज देखते थे । पता नहीं वहां कौन-सी चीजें खाकर वे मर जाती थीं । वैटरनरी डॉक्टर भी आते थे। तब भी । वहां तितली भी मरी मिलती थी । अच्‍छा यह बताओ, यह किस चीज का निशान है ?’ उसने कॉपी के अंतिम पन्ने पर छोटा-सा पंजा बना दिया ।

पापा समझे नहीं । पढ़ाई करते-करते अचानक यह कुत्ता, गाय, तितली, निशान कहां से आ गए ?

‘मोर का ! बारिश में मोर के निशान ऐसे ही होते हैं । बहुत मोर भी होते थे स्कूल के पीछे की तरफ ।’

‘बंटी, क्यों गप्पे हांक रहे हो ? कितना काम हुआ है ? मैं आज तुझे खेलने नहीं जाने दूंगी चाहे कुछ भी हो जाए । पापा भी गप्पा मारने को पहुंच गए ।’

पापा-बंटी दोनों धम्म से सीधे होकर बैठ गए ।

‘पापा, मुझे सब फोन पर बहनजी कहते हैं ।’ वह मुस्करा भी रहा था और खुदबदा भी रहा था । ‘बताओ न क्यों ?’

पापा समझे नहीं, ‘बताओ न, क्या हुआ ?’

‘मैंने अभी फोन उठाया तो उधर से आवाज आई- बहनजी नमस्कार । मिश्राजी हैं ? सब ऐसा ही कहते हैं।’

‘तो बहनजी बनने में क्या परेशानी है ?’

बिट्टू ने भी उसका प्रश्न सुन लिया था । ‘पहले मुझसे भी बहनजी कहते थे, फिर मैंने अपनी आवाज मोटी की । अब कोई नहीं कहता ।’

‘हूं ।’ बंटी ने अपनी चिरपरिचित बोली में आवाज निकाली, ‘कैसे ?’

बिट्टू ऐसे किसी उत्तर के लिए तैयार नहीं था । भाग लिया । ‘मैं भी अगले साल टीनेज हो जाऊंगा । तब मुझे कोई बहनजी नहीं कहेगा ।’

‘अब पढ़ेगा भी ! टीनेज हो जाएगा, पर पढ़ना-लिखना आए या न आए ।’ मम्मी की डांट थी ।

‘आपको और कुछ आता है डांटने के सिवाय । जब देखो तब हर समय डांटती रहती हैं ।’

अगली सुबह इतिहास-भूगोल की परीक्षा थी । मां इतिहास में कमजोर है, इसलिए मेरे पास छोड़ गई । हम दोनों को गरियाते हुए- ‘लो, लो इसका टेस्ट । बहुत बड़े इतिहासकार बनते हो ।’ गुस्से, खिसियाहट का लावा जब बहता है तो न तो वह हमारे उत्तर का इंतजार करता है और न हम उत्तर देने की हिम्‍मत करते हैं। बंटी को यह बात पता है । उसके चेहरे से साफ है कि उस पर इसका कोई असर नहीं है । उसे यकीन है कि पापा पर भी नहीं है ।

वह मेरे पास बैठा इतिहास के प्रश्नों के जवाब लिख रहा है । मेरी कई चेतावनियों के बावजूद वह पहले प्रश्न की दूसरी लाइन पर ही खड़ा है ।

‘पापा, टीकू ताऊजी हमारे घर क्यों नहीं आते ?’ उसकी आंखें मेरी आंखों में घुस रही हैं । ‘मैंने तो उन्हें कभी बोलते भी नहीं देखा । बताओ न  ? क्यों नहीं आते ? ’

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम उर्फ गदर की विफलता के कारणों में से उसे यह प्रश्न उठा है उत्तर लिखते-लिखते ।

‘फिर बताऊंगा ।’

‘पहले बताओ । आप कभी भी नहीं बताते । ऐसे ही कहते रहते हो, फिर बताऊंगा ! फिर बताऊंगा !’

‘नहीं । इतिहास के पेपर के बाद पक्का ।’ पापा के पास आते ही उसे सबसे पहले मानो यह रटंत पढ़ाई भूलती है । बंटी की भूगोल की किताबें नहीं मिल रही हैं । ऐसा पहली बार नहीं हो रहा । मासिक टेस्ट हो या छमाही, किसी न किसी विषय की किताब तो गायब हो ही जाती है तब तक ।

काफी देर से कोई आवाज नहीं सुनी तो मम्मी भी बेचैन होने लगती हैं। बंटी और इतनी एकाग्रता से पढ़ रहे हों ?

बंटी का चेहरा उतरा हुआ है ।  ‘मम्मी किताब नहीं मिल रही ।’

‘अच्छा, तो तू उसी की खुसर-पुसर में लगा हुआ था ! मैं कहूं कि आज तो बड़े ध्यान से पढ़ रहा है । बंटी, हर बार तुम ऐसा ही करते हो । भइया की किताब तो कभी नहीं खोती । किताब नहीं मिली तो आज तेरी हत्या कर दूंगी ! ढूंढ़ ।’ मम्मी की आवाज में तैरते चाकू की समझ है बंटी में । तुरंत दौड़कर ढूंढ़ने लग गया। डबल बेड के नीचे, सोफे की गद्दियों के नीचे, पुरानी पत्रिकाओं के पीछे । यह सभी उसकी किताबों की जगहें हैं । चप्पे-चप्पे पर । जानकर भी रखता है, अनजाने में भी । उसे जब पता चलेगा कि पापा ने इतिहास के टेस्ट के लिए कहा था तो उस दिन इतिहास की किताब रहेगी, लेकिन अगले दिन नहीं । इतिहास के टेस्ट का मुहूर्त ढलते ही इतिहास की किताब मिल जाएगी, लेकिन भूगोल की गायब । नहीं खोता तो माचिस के ढक्कन, पुराने सेल, चाक, स्टिकर, डब्‍ल्‍यूडब्‍ल्‍यूओ के कार्ड, चॉकलेट के रैपर्स, सचिन तेंदुलकर का चित्र, पिल्लों के गले में बांधी जाने वाली घंटियां ।

‘बंटी, तुम पानी की टंकी की तरफ से मत जाया करो । उधर एक कुत्ता रहता है कटखना । उसने रामचंद्रन की बेटी को काट लिया है ।’

‘कैसे रंग का है, मम्‍मी ?’ बंटी तुरंत दौड़कर आ गया ।

‘काले मुंह का । लाल-सा ।’

‘वो तो मेरा सिताबी है । एक ही आवाज में मेरे पास आ जाता है । उसे तो मैं और एडवर्ड सबसे ज्यादा ब्रेड खिलाते हैं ।’ मां-बेटे दोनों भूल चुके हैं किताब, टेस्ट, चेतावनी ।

‘मैं कहता हूं, तुम नहीं जाओगे उधर । काट लिया तो चौदह इंजेक्शन लगेंगे इतने बड़े-बड़े, पेट में, समझे!’

बंटी पर कोई असर नहीं । उसे अपने दोस्त पर यकीन है ।  ‘मम्मी, वो तो अभी ज्यादा बड़ा नहीं हुआ । कल ऐनी और उसकी फ्रेंड खेल रही थीं, मम्मी ! बड़ा मजा आया । मैंने बुलाया । टीलू टीलू टीलू ! और ऐनी की ओर इशारा कर दिया । बस ऐनी के पीछे पड़ गया । ऐनी भागते-भागते अपने घर में घुस गई ।’ बंटी का चेहरा सुबह के सूर्य-सा खिल उठता है ऐसी हरकतों के विवरण बताते वक्त ।

मम्मी को शादी में जाना है । मम्मी के तनाव मम्मी के किसिम के ही हैं । पहले इस पक्ष में सोचती रहीं कि साथ ही ले जाती हूं बंटी को । कुछ खा-पी भी लेगा । मस्‍ती कर लेगा तो कल पढ़ाई भी करा लूंगी ।  ‘लेकिन, लेकर तभी जाऊंगी, जब तुम ये, ये काम कर लोगे ।

बंटी चुप रहा । जैसे कोई वास्ता ही न हो इस बात से ।

‘सुना कि नहीं ? जब तक टेस्ट नहीं होंगे तब तक नहीं ले जाऊंगी । और लिखित में लूंगी ।’

उसने ऐन वक्‍त पर मना कर दिया ।  ‘मैं नहीं जाता । कौन जाए बोर होने के लिए ।’ पापा ने भी समझाया पर नहीं माना ।  ‘मैं पढ़ता रहूंगा ।’ यह और जोड़ दिया ।

अब आप क्या करेंगे ? मम्मी की सारी योजनाएं धरी की धरी रह गईं । वह जाने की तैयारी कर रही हैं । बालों को धो रही हैं, पोंछ रही हैं और बीच-बीच में बंटी को आकर देख जाती हैं– पढ़ रहा है या नहीं ? ऐसे छोड़ते वक्त उनकी चिंता और चार गुना ज्यादा हो जाती है । बंटी को जन्म-भर को काफी उपदेश, हिदायतें देंगी । बंटी पूरी तन्‍मयता से मेज पर बैठे हैं । उस्‍ताद की तरह । उसे पता है, इधर मम्मी बाहर, उधर वह । छह बज गए और मम्मी अभी तक नहीं गईं । बंटी उठे और मम्‍मी के सामने थे । ‘मम्मी, क्या कर रही हो ? कैसी बदबू आ रही है ?’

मम्‍मी क्‍या जवाब दें बच्‍चे की प्रतिक्रिया का ।

‘मम्मी, हमारी अंग्रेजी वाली मैम के पास आप चले जाओ तो बदबू के मारे नाक फट जाए । जाने कितने तरह का इत्र लगाकर आती हैं । एक दिन उन्‍होंने मुझे कहा कि मेरी मेज की ड्रार से किताब ले आओ । मम्मी, सुनो तो । उसमें इतनी चीजें थीं – फेयर एंड लवली, पाउडर, लिपस्टिक, जाने क्या-क्या । मम्मी, ये स्कूल में क्यों रखती हैं ये सारी चीजें ?’

गाल रगड़ती मम्मी का मानो दम सूखता जा रहा है ।  ‘अब तू मुझे तैयार भी होने देगा ? तूने काम कर लिया ?’

‘अभी करता हूं न । मैंने आपको बता दिया न । मम्मी ! क्यों लगाती हैं वे इतनी चीजें ?’

‘तुझे अच्‍छी नहीं लगतीं ?’

बंटी चुप । क्या जवाब दे ?

‘तेरी बहू लगाया करेगी, तो….’

‘मुझे सबसे अच्छी सविता सिंह मैडम लगती हैं । उनसे बिलकुल बास नहीं आती ।’

पढ़ने को छोड़कर उसे सारी बातें अच्छी लगती हैं ।

‘मम्‍मी, हमारी क्‍लास में एक लड़की है । वह भी 15 मार्च को पैदा हुई थी । मैं भी ।’

अगले दिन पूछ रहा था । ‘मैं 12 बजे पैदा हुआ था न ? वो साढ़े बारह बजे हुई  थी ।’

‘तू सवा बारह बजे हुआ था ।’

‘हूं ! तब भी मैं 15 मिनट बड़ा तो हुआ ही न ।’

इस हिसाब में उससे कोई गड़बड़ नहीं होती । गड़बड़ होती है तो स्कूल की किताबों के गणित से । ‘पापा, ये बीजगणित क्यों पढ़ते हैं ? क्या होता है इससे ?’ बंटी प्रसन्नचित्‍त मूड में था । शायद पापा भी ।

‘बेटा, हर चीज काम की होती है । कुछ आज, कुछ आगे कभी ।’

‘कैसे ?’

‘जैसे जो आप लाभ-हानि परसेंट के सवाल करते हो, उससे आपको बाजार में तुरंत समझ में आ जाता है कि कितना कमीशन मिलेगा ? कौन-सी चीज सस्ती है, महंगी है । बैंक में ब्याज-दर आदि । तुरंत फायदा हुआ न ? बीजगणित तब काम आएगा, जब बड़ी-बड़ी गणनाएं करोगे, जैसे पृथ्वी से चांद की दूरी, ध्वनि का वेग, आइंस्टाइन का फार्मूला…..’

बंटी की समझ में सिर्फ पहली बात ही आई है, दूसरी नहीं । चुपचाप काम में लग गया । इसलिए भी कि इससे ज्यादा प्रश्‍नों पर पापा-मम्मी चीखकर, डांटकर चुप करा देते हैं । थोड़ी देर बाद उसने फिर चुप्पी तोड़ी, ‘और पापा, किसी को यह सब नहीं पता करना हो तो उसके क्या काम आएगा यह सब ?’

पापा के पास कोई जवाब नहीं है । ‘अब तुम पहले अपना होमवर्क पूरा करो ।’

बीजगणित में फेक्‍टर्स की एक्‍सरसाइज थी । पहले प्रश्‍न पर ही अटका पड़ा है ।

‘जब तुम्हें आता नहीं तो पूछते क्यों नहीं ? बोलो, हमारी परीक्षा है या तुम्‍हारी ?’ तड़ातड़ कई चांटे पड़ गए पापा के ।

बाल पकड़कर बंटी को झिंझोड़ डाला ।  ‘खबरदार ! जो यहां से हिला भी, जब तक ये सवाल पूरे नहीं हो जाते । चकर-चकर प्रश्न करने के लिए अक्‍ल कहां से आ जाती है ? जो सांस भी निकाली तो हड्डी तोड़ दूंगा ।’

पापा छत पर टहल रहे हैं- अपराधबोध में डूबे । क्यों मारा ? क्या मारने से पढ़ाई बेहतर होगी ? और इतनी दुष्टता से !  कहीं आंख पर चोट लग जाती तो ? वह जल्दी रोता नहीं है । लेकिन आज कितना बिलख-बिलखकर रोया था ।

‘मैथ्स, मैथ्स, मैथ्स ! क्या मैं मर जाऊं ? शाम को पांच बजे से आठ बजे तक मैं पढ़ता हूं कि नहीं ? बैडमिंटन नहीं जाना, नहीं गया । कंप्यूटर मत जाओ, वहां नहीं जाता । क्या दुनिया के सारे बच्चे एक जैसे होते हैं? आपको भी तो कुछ नहीं आता होगा ? मारो ! मारो ! मेरी गरदन क्यों नहीं काट लेते !’

बार-बार उसका चेहरा आंखों में उतर रहा है- आंसुओं से लथपथ । डरा हुआ-सा । जल्दी उठकर पढ़ने में लगा है । अलार्म लगाकर सोया था । सुबह के भुकभुके में बरामदे से बंटी की आवाज आई, ‘पापा ! देखो चांद।’

पापा अभी भी उसकी परीक्षा के बारे में सोच रहे थे उठकर उसके पास पहुंचे ।

‘इधर देखो, इधर पापा ! कितना बड़ा है । पेड़ों के बीच । सीनरी ऐसी ही होती है । मैं भी बनाऊंगा ऐसी । एग्जाम के बाद ।’

कोई नहीं कह सकता कि रात को बंटी की पिटाई हुई है और आज उसकी परीक्षा है ।

बाबा साहब अम्बेडकर: साझी विरासत : प्रेमपाल शर्मा

डा. भीमराव अम्बेडकर

डा. भीमराव अम्बेडकर

मुझे अफसोस है कि मैंने बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर को बहुत देर से जाना। देर से तो मैंने महात्मा गांधी को भी पढ़ा, लेकिन बाबा साहेब को उसके भी बाद। क्यों ? कारण उस स्कूली व्यवस्था, शिक्षा में ज्यादा है। मेरी कॉलेज की नियमित पढ़ाई वर्ष 1975 में खुर्जा, उत्तर प्रदेश के एक कॉलेज में बी.एस.सी तक हुई। स्कूली पाठ्यक्रम में एक किताब थी- ‘हमारे पूर्वज’ । इसमें दधीचि‍ से लेकर विनोबा, सुभाष सभी थे। मुझे याद नहीं कि इसमें बाबा अम्बेडकर भी थे। न उन दिनों इनका जन्म दिवस होता था न निर्वाण या कोई और चर्चा। मात्र इतना बताया गया था कि हमारे संविधान बनाने में बाबा साहेब को बड़ा योगदान था। किस की सत्ता थी? कौन थे परिदृश्य पर? नेहरू जी, उनकी कांग्रेस और उनका मिला जुला वंश। किताबों में क्यों नहीं थे अम्बेडकर? मौलान आज़ाद लंबे समय तक शिक्षा मंत्री रहे। फिर उनके एक और शार्गिद नुरूल हसन। शुरू की नूराकुश्‍ती के बाद कम्यूनिस्ट विचारक राजनेता, बुद्धिजीवी भी सन साठ तक कांग्रेसी सांठ-गांठ में शामिल होना शुरू हो गए थे। नेहरू जी की मृत्यु के बाद वे इन्दिरा गांधी की किचन कैबिनेट का हिस्सा थे। पाठ्यक्रम नये बने, बदले गये लेकिन कांशीराम के उदय तक अम्बेडकर लगभग आजादी के सैकड़ों महापुरुषों की भीड़ में एक से ज्यादा नहीं थे। गांधी की तो छोड़ो नेहरू जी के साथ भी आकलन के योग्य नहीं माना जाता था। सार-संक्षेप यह कि जितना नुकसान अम्बेडकर को नेहरू और उनके दरबारियों ने पहुंचाया, उतना किसी दूसरी राजनीतिक सत्ता या व्यक्ति ने नहीं। मुसलमानों के मसीहा हैं तो नेहरू, दलित-गरीबों के तो नेहरू और पंडितों के तो वे हैं ही– पंडित वंश में जन्म लेने के कारण। राजनीति इसी का नाम है। इस विनिर्माण के लिए हर दावपेंच अपनाये गये और इसीलिए कांग्रेस सत्‍ता पहली बार वर्ष 2014 में कुछ हिली है।

उन दिनों के बुद्धिजीवियों की भूमिका भी यहां संदेह के घेरे में है कि क्यों उन्हें अम्बेडकर का संघर्ष, योग्यता, योगदान नहीं दिखाई दिया। क्यों वे नेहरू को खुश करने और बदले में कुछ विश्वविद्यालयों के पद, प्रतिष्ठा लेने के लिए अम्बेडकर को जाति विशेष का नेता ही मानते रहे। बिकी हुई जमात अपने नेता की मंशा सबसे पहले पहचान लेती है और उसी के अनुसार नाचती है। यही कारण है कि उन दिनों हमारी सभी पीढियों को बाबा साहेब अम्बेडकर जैसे महान व्यक्तित्व से सभी अध्ययन, पाठ्यक्रम, विमर्श में दूर रखा गया। सरदार पटेल जैसे और भी इतिहास निर्माताओं के साथ नेहरू वंश ने यही सलूक किया। लेकिन इतिहास की निर्ममता देखिए कि भारतीय समाज को आमूल-चूल बदलने वाले अम्बेडकर आज नेहरू से ज्यादा प्रासंगिक हैं- हर क्षेत्र में। सामाजिक, राजनीतिक आर्थिक सभी में।

एक कहावत है जितना बड़ा संघर्ष होगा, उतना ही बड़ा व्यक्तित्‍व। मनुष्य मनुष्य के बीच जैसा भेदभाव भारतीय समाज में है, वैसा अन्यत्र नहीं। दोहराने की जरूरत नहीं कि बचपन के क्रूर नृशंस आघातों ने ही अम्बेडकर को इतना मजबूत बनाया कि‍ वे भारतीय समाज को गठने वाले सबसे बड़े भारतीय महापुरुष हैं। नेहरू की जकड़न, कांग्रेसी आत्म प्रशंसा-प्रचार से जैसे-जैसे सन 1990 के आसपास देश को मुक्ति मिलती गयी, बाबा साहेब उभर कर आते रहे।

डॉ. भीमराव जैसी शख्सि‍यतें शताब्दियों बाद पैदा होती हैं। क्या उनके विचारों के बिना इक्कीसवी सदी या कहे आधुनिक भारत की कल्पना की जा सकती है? नि:संदेह हर महापुरुष अपने युग की उपज होता है, लेकिन बिरले ही ऐसे होते हैं जो आमूलचूल परिवर्तन के मसीहा बनते हैं। भारत जि‍तनी सामाजिक गैरबराबरी, भेदभाव, ऊंच-नीच शायद ही दुनिया में कहीं है। आश्चर्य की बात यह कि ऐसा हजारों साल तक चलता रहा। या कहें कि यह असमानता लगातार क्रूर और बढ़ती गयी। यहां उस मुस्लिम शासन को भी माफ नहीं किया जा सकता जो धर्म की तलवार तो भांजता रहा, समानता के लिए कोई कदम नहीं उठाया। लेकिन समय चक्र आगे बढ़ता रहा। यूरोप में पंद्रहवी सदी से शुरू हुए पुनर्जागरण ने दुनिया भर को गतिशील बनाया। तर्क, समानता, विज्ञान, स्त्री-पुरुष की बराबरी और धर्म की जकड़न से मुक्ति इस गतिशीलता के प्रस्थान बिंदू बने। औद्यौगिक क्रांति, उपनिवेशवाद के रथ पर सवार ये विचार फ्रांसीसी क्रांति, रूसी क्रांति से गुजरते हुए दुनियाभर में फैले। अम्बेडकर, गांधी, गोखले भी कैसे इनसे अछूते रह सकते थे, बल्कि कहें कि‍ इससे पहले राजा राममोहन राय, महात्मा फुले, सावित्रीबाई फुले भी आधुनि‍क समय की इसी समानता तर्क के दर्शन से अनुप्राणित हुए। बाबा साहेब अम्बेडकर नि:संदेह इनमें सबसे चमकते सितारे हैं।

सब से पहले अम्बेडकर सामाजिक बराबरी के लिए लड़े, फिर आर्थिक फिर मजदूरों के हितों के लिए। कौन सा क्षेत्र अछूता है? व्यक्तिगत स्वतंत्रता हो, स्त्री की बराबरी (हिन्दू कोड बिल), संवैधानिक सुधार से लेकर शिक्षा, पंचायती राज। सही मायनों में ऐसे स्टेसमैन जिनके विचार देश और देश के बाहर लगातार प्रासंगिक हैं। उनकी प्रतिभा का लोहा हर मंच ने माना और आज भी मान रहे हैं।

इस सबके बाद भी हमें भारतीय समाज को परिवर्तन की इस परिधि तक लाने वाली विरासत को एक निष्‍पक्ष दृष्टि, तर्क से समझने की जरूरत है, न कि भावना या राजनीतिक राग-द्वेष में कुतर्क वाली दृष्टि की। मौजूदा सभ्‍यताओं का बड़ा श्रेय इस तर्क पद्धति को है जो यूरोप के पुनर्जागरण से शुरू होती है। पूरा विज्ञान, सोचने का ढंग, धर्म को धकियाता हुआ आगे आता है और यूरोप के कायाकल्‍प के बाद पूरी दुनिया को बदलता है। फ्रांसीसी क्रांति हो या रूसी या अमेरिकी क्रांति और दास प्रथा का अंत- समानता की बुनियाद इन्‍हीं सड़कों से गुजरती है। इसलिए ब्रिटिश काल भारत के लिए एक वरदान भी है, जब हमारे इन सब दिग्‍गजों ने मनुष्‍य-मनुष्‍य की समानता, न्‍याय, भाईचारा, तर्क के अर्थ पहली बार जाने। क्‍या फुले महाराज की शुरू की शिक्षा उस ईसाई मिशनरी स्‍कूल में नहीं हुई होती तो समानता का दर्शन जान पाते ? अम्‍बेडकर का कायाकल्‍प भी एक तरफ भारतीय समाज में भेदभाव जातिगत घृणा के अनुभव और दूसरी और इंग्‍लैंड, जर्मनी, अमेरिकी समाज, विश्‍वविद्यालयों में बराबरी के अहसास से होता है। प्रतिभाशाली तो वे थे ही, कानून अर्थशास्‍त्र, लोकतंत्र, शिक्षा हर क्षेत्र में मौलिकता के स्‍तम्‍भ। सर सैयद अहमद खां भी इंग्लैंड से शि‍क्षा लेकर एक प्रगतिशील समाज की स्‍थापना के लिए मुसलमानों को ललकारते हैं और अलीगढ़ मुस्लिम विश्‍वविद्यालय की स्‍थापना के लिए आगे बढ़ते हैं। स्वयं महात्मा गांधी यदि सत्‍य अहिंसा के हथियारों से आगे बढ़े तो इसलिए कि उन्‍हें ब्रिटिश न्याय व्यवस्था, समाज पर यकीन था।

इसलिए इस पूरी विरासत को न भक्तिभाव से देखने की जरूरत है न नकारवादी भावना से। देश की आजादी भी जरूरी थी और समाज की जकड़न क्रूर जाति व्‍यवस्‍था से भी। गांधी पर वर्ण व्‍यवस्‍था के प्रति नरमी का आरोप सही है तो अम्‍बेडकर पर अंग्रेजों के प्रति नरमी का। दोनों के अपने कारण हैं और सबसे अच्‍छी बात है कि दोनों में एक निडरता, स्‍पष्‍टता और अपने लक्ष्‍य के प्रति पूरी निष्‍ठा है। क्‍या पूना पैक्‍ट सफल नहीं होता तो आजादी की लड़ाई की एकजुटता बनी रह सकती थी? हरगिज नहीं। और यदि अम्‍बेडकर ने सामाजिक बराबरी के लिए ऐसा हट, दृढ़ता न दिखाई होती तो क्‍या संविधान में बराबरी गरीबों के लिए विशेष सुविधाओं की बातें शामिल होंती? दोनों ही लोकतंत्र के खरे प्रहरी हैं। एक पूरे समाज की चिंता में देश भर को जगा रहा है तो दूसरा आजादी की खातिर। यह बात दीगर है कि आजादी के सामाजिक परिवर्तन जितना तेजी से होना चाहिए था, वैसा नहीं हुआ। लेकिन इसके लिए सामाजिक-राजनीतिक कारणों के साथ नेहरू वंश ज्‍यादा जिम्‍मेदार है। नेहरू की अटूट निरंकुश सत्‍ता 1946 से लेकर 1964 तक रही। क्‍या बीस वर्ष कम होते हैं, किसी बुनियादी परिवर्तन के लिए? और उसके बाद भी कुछ अंतराल को छोड़कर कांग्रेस का वंश ही सत्‍ता में रहा है। शायद गांधी न होते और उनका नेहरू को इशारा न होता तो न नेहरू की कांग्रेस अम्‍बेडकर को संविधान पीठ का अध्‍यक्ष बनाती और न वे कैबि‍नेट में आते। आये भी तो नेहरू की नीतियों से निराश होकर तुरंत इस्‍तीफा देकर बाहर हो गये। यहां तक कि हिन्‍दू धर्म को छोड़कर बौद्ध धर्म अपना लिया।

बाबा साहेब को सिर्फ दलित या जाति विशेष तक सीमित रखना उनके साथ ऐतिहासिक ज्‍यादती है। सवर्णों को समझने की जरूरत है कि इक्‍सवीं सदी का भारत धर्म ग्रंथों, उपनिषदों, पुराणों की व्‍याख्‍या से नहीं चलाया जा सकता। समानता नये समाज की बुनियाद है और इसे हासिल करना ही होगा। वहीं दलितों को भी इस विषमता से बचने की जरूरत है कि अम्‍बेडकरवाद होने की शर्त ब्राह्मण-विरोधी होना है। अम्‍बेडकर ब्राह्मणवाद की कट्टरता, ढोंग, नकली रीतिरिवाज के खिलाफ थे, व्‍यक्ति विरोधी नहीं। ऐसा न होता तो उनकी शादी एक ब्राह्मणी से नहीं हुई होती। हिन्‍दू धर्म की हजार बुराइयों के खिलाफ अम्‍बेडकर मृत्‍यु पर्यन्‍त लड़ते रहे, लेकिन मुस्लिम धर्म को वे इससे भी क्रूर मानते थे। उनका कहना था कि हिन्‍दू धर्म में अपनी बुराइयों के खिलाफ बोलने, उन्‍हें सुधारने की आजादी तो है, मुस्लिम धर्म की कट्टरता तो ऐसे प्रश्‍न उठाने की भी स्‍वतंत्रता नहीं देती। यही कारण है कि वर्षों सोचने-विचारने और कई बार कुछ मुस्लिम मित्रों के उकसावे के बावजूद न उन्होंने मुस्लिम धर्म अपनाया न ईसाई। वे बौद्ध धर्म की ओर गये। क्या यह अकारण है कि जितना बाबा साहेब अम्बेडकर का जादू है, उतना उनके अपनाये बौद्ध धर्म का नहीं। यह संतोष की भी बात है क्‍योंकि नयी सदी में और आने वाली सदियों में दुनिया भर से धर्म का मिटना ज्‍यादा स्‍थाई शांति का बंदोबस्त करेगा।

महात्मा गांधी पर एक किताब है- बहुरूप गांधी, अनु गांधी की लिखी हुई। मुझे लगता है कि बाबा साहेब अम्बेडकर के ज्ञान, अनुभव संघर्ष को देखते हुए यह शीर्षक उनके ऊपर और ज्‍यादा स्‍टीक बैठता है। शिक्षा, पंचायती राज, मजदूर बिल, अर्थशास्‍त्र, कानून से लेकर हिन्दू कोड बिल तक का ज्ञान। तीन तलाक मुद्दे पर जो बहस चल रही है, बाबा साहेब के विचार यहां सबसे महत्‍वपूर्ण हैं। 2 दिसंबर 1948 को संविधान सभा में बहस के विस्‍तार का जबाव देते हुए उन्‍होंने कहा था कि धर्म का दखल इतना क्यों होना चाहिए कि वह पूरे सामाजिक जीवन को ही समेट ले और विधानमंडल को उस क्षेत्र में घुसने ही न दे। कानून में बदलाव इसलिए चाहते हैं कि इतने अन्याय, असमानता, भेदभाव से भरी हमारी सामाजिक व्यवस्था हमारे मूलभूत मानवीय अधिकारों के रास्ते में न आये। हम ऐसी कल्पना भी कैसे कर सकते हैं कि कोई पर्सनल लॉ ऐसा भी हो सकता है जो राज्‍य के अधिकार क्षेत्र से एकदम बाहर हो। मौजूदा भारत के लिए सबसे ज्यादा प्रांसगिक महापुरुष।

हम सब का दायित्व है कि हम आत्म सजगता से अम्बेडकर जैसे व्‍यक्तित्व को देवता या मूर्तियों में कैद न होने दें। उन्होंने तो इन मूर्तियों को तोड़कर ही पूरे भारतीय समाज को रास्ता दिखाया था। वे हम सब की साझी विरासत हैं।

गांवों में बहार है : प्रेमपाल शर्मा

प्रेमपाल शर्मा

प्रेमपाल शर्मा

हाल ही में दिल्‍ली के एक प्रोफेसर ने फेसबुक पर लिखा कि बाईस साल बाद वे अपने गांव जा रहे हैं। गांव पश्चिमी उत्‍तर प्रदेश का, दि‍ल्‍ली से मात्र साठ-सत्‍तर किलोमीटर दूर। वे बस से जा रहे थे। रास्‍ते के ढाबे, चाय की चुस्कियों के विवरणों से पता चल रहा था कि जैसे आंखों देखा हाल जानने और लिखने के लिए ही उन्‍होंने बस पकड़ी है।

मेरी नजर में बाईस साल कोई बड़ा रिकार्ड नहीं है। रेलवे में काम करने वाले एक अधिकारी ने बताया कि उन्‍हें अपने बदायूं जिले में गांव छोड़े सैंतीस साल हो गये। उनकी सफाई है- ‘क्‍या बताएं… बच्‍चे तैयार होते नहीं हैं। बड़ी बेटी अमेरिका चली गई तो छोटी ने तो दसवीं के बाद ही अमेरिका जाकर पढ़ने का इरादा कर लिया। बेटा पुणे में है। गांव में रखा भी क्‍या है!’

केवल दिल्ली नहीं, यह बात दूर-दूर तक फैली है। खुर्जा के एक बैंक में तैनात मेरे स्कूल के एक साथी ने बताया- ‘गांव मैं नहीं जाता। आखिर क्यों जाएं? वहां ऐसे देखते हैं जैसे कोई दुश्मन हो। वही लड़ाई-झगड़ों के किस्से। मैंने तो अब शादी-विवाह में जाना भी बंद कर दिया है। उनका गांव करोरा खुर्जा से दस कि‍लोमीटर दूर है और यहां हजरत पैदा हुए, पले, बढ़े, पढ़े।

कम से कम पूरे पश्चिमी उत्‍तर प्रदेश की तो यही कहानी है। किसी के भाई ने जमीन हथिया ली तो किसी को पिता के बंटवारे से असंतोष है। कई को जान तक का डर रहता है। एक साथी ने बड़ी संजीदगी से सलाह दी कि ‘यार, तुम जाते तो हो, पर संभल कर जाओ। रात न करना!’ उन्होंने अपना अनुभव बताया कि एक बार सर्दियों की शाम जैसे ही बस से उतरा तो पुलिया पर चार लोग थे। मुझे खुशी हुई कि एक परिचित मिल गया। मैंने उसकी आवाज से पहचान लिया। वह बोला कि भइया, तुम इस वक्त मत आया करो! यानी अगर पहचान में नहीं आता तो मेरा लुटना-पिटना तय था।

यह वही क्षेत्र है जहां छ: महीने पहले बुलंदशहर के पास जी.टी. रोड पर लूटपाट और बलात्‍कार की घटना हुई थी। जिसे इसी उत्‍तर प्रदेश उर्फ उत्‍तम प्रदेश के एक राजनेता और कद्दावर मंत्री ने राजनीतिक दुष्‍प्रचार बताया था। यह अलग बात है कि उन्‍हें ऐसा कहने पर सुप्रीम कोर्ट में स्‍पष्‍ट शब्‍दों में माफी मांगनी पड़ी।

आखिर हालात ऐसे क्यों हुए कि आपको रात के किसी भी पहर अमेरिका में डर नहीं लगता, आस्ट्रेलिया में छूटा हुआ सामान अगले दिन मिल जाता है, लेकिन अपने देश में आप निश्चिंत नहीं हैं। जिस मातृभूमि को स्वर्ग से बढ़ कर बताते हैं, राष्ट्रगान-राष्ट्रगीत पर इतराते हैं, किसी इलाके के चप्पे-चप्पे को जानते-पहचानते भी हैं, वहां जाने में भी डर लगता हैं। अगर कभी जाते हैं तो उसके बारे में ऐसे बताते हैं, जैसे हम बचपन में कप्तान कुक की उत्तरी ध्रुव की विजय यात्रा या मैंगेलन के दक्षिण अफ्रीका में प्रवेश के भयानक दुस्साहस के विवरण बता रहे हों।

वाकई इस असुरक्षा के बीच जो लोग रहते हैं, उनके जीवट का जवाब नहीं। सरकारी स्कूल बिल्कुल चौपट। नए नुक्कड़ अंग्रेजी के धंधा करते स्कूलों में पढ़ाई के नाम पर बस कुछ सर्टिफिकेट दिए जा रहे हैं। इसका नुकसान और ज्यादा है। दरअसल, ऊंची फीस देने के बाद वे और उनके मां-बाप खेती-क्यारी के अपने पारंपरिक काम से भी बचना चाहते हैं। सरकारी स्कूल की सहज हिंदी में शिक्षा उन्हें यथार्थ से इतना दूर नहीं करती थी। नौकरी खासकर सरकारी नौकरी मिलेगी नहीं, कोई काम, व्यवसाय, उद्योग है नहीं, न समाज या सरकार ने कुछ सिखाया, तो आगे क्या हो! इनमें से कुछ ऐसे निकल जाते हैं जो सड़कों पर खड़े अंधेरे का इंतजार करते हैं कि कब कोई आए और ये उसका शिकार करें!

‘हारे को हरिनाम’ के सटीक उदाहरण के रूप में इस निर्वात में अचानक धार्मिकता ने खूब पैर पसारे हैं। जब भी गांव जाता हूं तो पता लगता है कि किसी पूजा का बड़ा आयोजन चल रहा है। चालीस-पचास साल पहले भी लोग पूजा-पाठ करते थे, लेकिन एक-डेढ़ दिन के भीतर खत्म। अब यह हफ्ते या इससे ज्यादा वक्त तक चलता रहता है। आधा गांव इसी में मशगूल रहता है। बाकी रोजमर्रा के कामकाज या तो किनारे होते गए या फिर टलने लगे हैं। धर्म-कर्म के आगे खेतों की परवाह कम होती गई है।

ऐसे में भक्ति का धंधा पूरे जोरों पर है। सामान्य रोजगार भले असंभव जैसे होते जा रहे हों, बनारस से लेकर पटना तक के पंडों-ज्योतिषियों के रोजगार में तेजी है। जाति-विभाजन के दंश और भी अमानवीय शक्ल में सामने आ जाते हैं। काश! धर्म ने समाज में जाति और इससे उपजने वाले विद्वेष को खत्म करने का काम किया होता। एक अच्छी शिक्षा, खेलकूद या दूसरी व्यावसायिक गतिविधियां और प्रशिक्षण इस निर्वात को भर सकते थे। लेकिन बेईमानी और चौबीसों घंटे की धारावाहिक राजनीति ने उसे भी निगल लिया है। गांव अब वे गांव नहीं रहे जिसका सपना महात्मा गांधी देखते थे। बाबा साहब आंबेडकर सचमुच ज्यादा यथार्थवादी थे। वे जाति-व्यवस्था से जकड़न की मुक्ति शहरीकरण में देखते थे। लेकिन शहर के मेरे दिल्ली के अफसर दोस्त गांव वालों और आदिवासियों को दिल्ली की झुग्गियों में भी नहीं देखना चाहते और खुद गांव जाने से भी डरते हैं। बस दूर से गाते रहते हैं- ‘गांव में बहार है!’

हमारा परिवेश- हमारा विज्ञान : प्रेमपाल शर्मा

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देवेन्द्र मेवाड़ी जाने-माने विज्ञान लेखक हैं। भारतीय परिवेश में बच्‍चों की चेतना और मनोरंजन दोनों को साधते और शिक्षित करने का उनका अपना अनोखा अंदाज है। ‘विज्ञान और हम’ उनकी नई पुस्‍तक है। असल में, हर लेखक पहले स्थानीय होता है, उसके बाद ग्‍लोबल। अंग्रेजी में इसके लिए एक प्रचलित वाक्य है- लोकल इज ग्लोबल। ‘विज्ञान और हम’ में देवेन्द्र मेवाड़ी ने इसलि‍ए सबसे पहले अपने गाँव, बचपन की बातें बच्चों को बताई हैं, स्‍थानीय भाषा की सुगंध और स्वाद के साथ। स्थानीयता का यह स्पर्श एक अलग मिठास पैदा करता है। किताब और लेखन में चस्का ऐसी ही शुरुआत से पैदा होता है। साधारणीकरण का यह ढंग ही पाठकों में असाधारण पैठ बनाता है। विज्ञान जैसे विषय को बच्चों के बीच ले जाने के लिए इससे बेहतर शुरुआत नहीं हो सकती।

पता नहीं यह हमारी शिक्षा पद्धति का दोष हे या उस समाज का जो जीवन को सामान्‍य तर्क से समझने के बजाय उसे पढ़ाई के नाम पर इतना भारी-भरकम उबाऊ बना देता है कि विज्ञान की मोटी-मोटी डिग्रियों वाले भी विज्ञान की सामान्‍य समझ में शून्‍य होते हैं। क्‍या यह कोई अलग से पढ़ने-पढ़ाने, रटने की चीज है? क्‍या रोज आप आकाश में सौरमंडल नहीं देखते? दिन में सूरज उगते ही सारा आकाश चन्‍द्रमा सहित गायब। कितने किस्‍से, रोचक कहानियां गड़ी गई हैं कि‍ताब में। चंदा मामा और इन सितारों के आसपास सदियों से गांवों के किसानों का जीवन और समय का अंदाज इन्‍हीं तारों- हि‍न्नी पैना, सप्तश्री, ध्रुव और उपग्रह चांद के आकार से चलता रहा है। देवेन्द्र मेवाड़ी ने बड़ी सहजता से कोपर्निकस, गैलिलियो, उनकी खोजी दूरबीन आदि‍ के कि‍स्सों के सहारे पूरे सौरमंडल को समझाया है। क्या इस लेख को पढ़ने के बाद बच्चों को कोई चंदामामा की कहानी से गुमराह कर सकता है? शायद नहीं। हां, कविता कहानी में इनकी जगह वैसी ही बनी रहेगी। विज्ञान और गल्प में यही अंतर है।

अगले लेख में मेवाड़ी जी आकाश से जमीन पर उतरते हैं। एक लंबे पत्र के माध्यम से पृथ्वी, पहाड़ और उसकी पूरी संरचना का एक-एक विवरण देते हैं। रोचकता को बनाए रखने के लिए एलियन भी वहां है, पृथ्वीवासियों को सलाह देते हुए कि कल-कारखाने के धुएं से पूरे वातावरण को बचाने की जरूरत है। बातों ही बातों में पत्र के माध्‍यम से कहना और प्रभावी बना देता है। इससे पत्र लिखने की शिक्षा तो बच्‍चों को मिलेगी ही।

आकाश, धरती के बाद मेवाड़ी जी बच्‍चों को समंदर की सैर कराते हैं- ‘समंदर के अंदर है अनोखी दुनिया’ लेख में। कम रहस्‍यमय नहीं है समन्‍दर। हालांकि कई बच्चों ने समुद्र साक्षात नहीं देखा होगा, लेकिन मीडिया की दुनिया ने क्‍या संभव नहीं बना दिया और शेष पूर्ति यह लेख करता है, एक-एक विवरण के साथ। मछुआरों के साहस, डार्विन ओर उनका जहाज बीगल, समुद्र में रहने वाले लाखों जीवों, वनस्‍पतियों की प्रजातियां। स्‍पंज प्रवाल से लेकर केकड़े, मछली जैलीफिश, व्‍हेल, डाल्फिन-समुद्र की इतनी बडी़ दुनिया। पढ़ते-पढ़ते बच्‍चों का कौतूहल आकाश छूने लगेगा। पूरी प्रमाणिक जानकारी भरा लेख।

‘क्यों तपती है इतनी धरती’ लेख तो देश के मौजूदा सूखे के संकट की याद दिला देता है। नंदू, शेफाली, गार्गी विक्रम, देवीदा की बातों से जो शिक्षा मिलेगी, वह भारी भरकम लेखों से नहीं मि‍ल सकती। ऐसे लेखों की सहजता बच्‍चों पर स्‍थायी असर छोड़ती है और यही विज्ञान लेखक देवेन्‍द्र मेवाड़ी का उद्देश्‍य है। हालांकि ऐसे लेखों की लंबाई कुछ कम होती तो और भी अच्‍छा होता। ‘कैसे कैसे मेघ,’ ‘लो आ गया वंसत’ बच्‍चों के लिए ऐसी ही जानकारि‍यों से भरपूर लेख हैं। पंछियों (पक्षियों) से बच्‍चों को विशेष लगाव होता है, गांव के बच्‍चों को और भी ज्‍यादा। आंगन में फुदकती तरह-तरह की चि‍डि़यों को कौन बच्‍चा भूल सकता है? गायब होती गौरया की चिंता, हम सबकी चिंता है। ‘उड़ गयी गौरियां’ (1 मई 2012) और ‘पेड़ों को प्रणाम’ (5 जून 2012) को लेख के बजाय ‘डायरी’ खंड में रखा जाना चाहिए। देवेन्‍द्र मेवाड़ी की एक और पुस्‍तक ‘मेरी विज्ञान डायरी’ बच्‍चों को बहुत सहज ढंग से अपनी दिनचर्या में घटित अनेक वैज्ञानिक बातों, निरीक्षणों और निष्‍कर्षों को लिखने का मौका देती है। अच्छी शिक्षा ऐसी ही प्रक्रियाओं से होकर गुजरती है।

बच्चों के जीवन में सैर सपाटा, यात्रा न हो तो मजा ही क्‍या। ‘फूलों की घाटी में’ और ‘बच्चों का वि‍ज्ञान और कवि का कबूतर’ यात्रा-कथा का आनंद देते हैं। ‘ताबीज’ और ‘पर्यावरण के प्रहरी’ जैसे दो छोटे नाटकों को शामिल करने से पुस्तक की उपयोगिता और बढ़ गई है। पुस्तक में तीन वैज्ञानि‍कों की जीवनी भी दी गई है।

ऐसी पुस्तकों को केवल विज्ञान के खांचों में रखना, उनके असर को सीमित करना है। यह पुस्तक बच्चों को उनके पूरे परिवेश से जोड़ती है और साथ ही शिक्षा और शिक्षण की विविध विधाओं– लेख, डायरी, यात्रा, नाटक, कविता और जीवनी से भी। शि‍क्षा का मूल मंत्र भी तो बच्चों को उनके परिवेश से जोड़कर शिक्षित करना है। पुस्तक में हरे जंगल का कवर तो मंत्रमुग्धकारी है ही।

(बालवाणी, नवम्बर-दि‍सम्बर, 2016 से साभार)

पुस्तक: विज्ञान और हम
लेखक : देवेन्द्र मेवाड़ी
कीमत:140, सजिल्द- 260/- रुपये
प्रकाशक: लेखक मंच प्रकाशन
433 नीति‍खंड-3, इंदि‍रापुरम
गाजियाबाद-20014
Email- anuraglekhak@gmail.com

पहले राष्ट्र, फिर विश्व : प्रेमपाल शर्मा

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विश्व हिन्दी दिवस, विश्व हिन्दी सम्मेलन, विश्व गुरु जैसे शब्द बार-बार सुनते हुए मन में बेचैनी भी पैदा करने लगे हैं कि आखिर कब तक हम दुनिया को ऐसे प्रमाण पत्र दिखाने और उनसे शाबासी लेने के लिए समारोह, सेमिनार आयोजित करते रहेंगे? किसी वक्त 1975 में जब विश्व हिन्दी सम्मेलन का भाव पहली बार जगा था तो हिन्दी समेत सभी भारतीय भाषाओं के लिए दरवाजे खुलने की दस्तक हो रही थी। संविधान, संसद की आवाज सुनते हुए और दक्षिण भारत विशेषकर तमिलनाड़ु आदि राज्‍यों के डर और हिन्‍दी लादने के खिलाफ आक्रोश को भांप कर कुछ-कुछ बीच का रास्ता अख्तियार किया गया था। जैसे पहले इन पन्द्रह-बीस वर्षों में हिन्दी में अनुदित साहित्य उपलब्ध कराया जाएगा, प्रचार-प्रसार, प्रशिक्षण के कदम उठाये जाएंगे जिससे कि हिन्दी अंग्रेजी का स्थन राष्ट्रीय स्तर पर धीरे-धीरे ले सके। शब्दावली आयोग, अनुवाद ब्यूरो, राज्यों में हिन्दी ग्रंथ अकादमियां, संसदीय समिति सभी अपने-अपने स्‍तर पर सक्रिय थे। महत्‍वपूर्ण बात यह भी आजादी दिलाने वाली और उन आदर्शों में डूबी, दबी पीढ़ी राममनोहर लोहिया, टंडन, जयप्रकाश नारायण, आयंगर, सेठ गोविन्द दास जैसों की राष्ट्रीय स्वीकृति और हिन्दी के प्रति एक संतुलित दृष्टि भी धीरे-धीरे सरकार और जनमानस को हिन्दी की तरफ मोड़ रही थी। इसका प्रमाण है कि‍ पहले शिक्षा आयोग (1964-66) की सिफारिशों में और फिर संघ लोक सेवा आयोग की सर्वोच्‍च परीक्षा में वर्ष 1970 से निबंध में अंग्रेजी के साथ-साथ हिन्‍दी में भी लिखने की छूट देना। संसद की बहसों में भी अपनी भाषा के प्रति उत्‍साह और समन्‍वय देखा जा सकता है। स्‍वाभाविक ही था कि इस उत्‍साह को विश्‍व हिन्‍दी सम्‍मेलन के रूप में विश्‍व पटल तक ले जाया जाए।

लेकिन हिन्‍दी को आगे बढ़ाने की कहानी का विश्‍लेषण कई किन्‍तु-परन्‍तु के साथ रुक-रुक कर चलता है। विश्व सम्मेलन तो धडा़धड़ नियत अंतराल पर धूमधाम से हो रहे हैं, लेकिन क्या हिन्दी देश के प्रशासन, शासन, शिक्षा, न्यायालय में भी उसी गति से बढ़ रही है? या बिल्कुल उल्टा हो रहा है कि विश्व भाषा बनाने, संयुक्त राष्ट्र संघ की अधिकृत भाषा की मांग और दुहाई तो बार-बार भाड़े के नारों की तरह दी जाती है, लेकिन अपने देश की न्याय व्यवस्था से लेकर शिक्षा, प्रशासन में हिन्‍दी प्रयोग की बातें सिर्फ हिन्‍दी अधिकारियों के हवाले छोड़कर हम मुक्ति पा लेते हैं। पहली बार जनता सरकार में विदेश मंत्री बने अटल बिहारी बाजपेयी का संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ में हिन्‍दी में दिया ओजपूर्ण भाषण कुछ वर्षों तक तो लोगों को अनुप्रमाणित करता रहा, लेकिन अपनी संस्‍थाओं में ‘हिन्‍दी के प्राण’ स्थाई तौर वह भाषण भी भर नहीं पाया। हकीकत तो यह है कि 1990 आते-आते सत्‍ता अंग्रेजी की देहरी पर घुटने टेकने के लिए पहुंच चुकी थी। उसके बाद आये उदारीकरण और वैश्‍वीकरण के सपने ने तो हिन्‍दी समेत भारतीय भाषाओं पर ऐसा पाटा मारा कि हिन्‍दी विश्‍व में तो तथाकथित दावे करती घूम रही है, सम्‍मेलनों में भी हिन्‍दी के नाम पर खाने-पकाने वाले सपूत गर्व से फूले फिरते हैं, लेकिन अपने देश के साहित्‍य, मानविकी, शिक्षा, चिंतन पुस्‍तकालय में एकदम सूखा पड़ चुका है। सन् 1980 तक विद्वानों की मूल हिन्‍दी में लिखी दर्जनों मशहूर किताबें- इतिहास, राजनीति शास्‍त्र, मनोविज्ञान की मिल जाएंगी, उसके बाद श्‍यामाचरण दुबे, कृष्‍ण कुमार जैसे एकाध विद्वान को छोड़कर शायद ही मिले। वर्ष 1979 में डॉ. दौलत सिंह कोठारी समिति की सिफारिशों को लागू करते हुए संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा में अपनी भाषाओं के माध्‍यम की छूट देना भी भारतीय भाषाओं के स्‍वर्ण काल की तरफ बढ़ता पहला कदम था, लेकिन पता नहीं फिर क्या दुरभि संधियां हुई कि केवल अंग्रजी सबको पीछे छोड़ती हुई आगे आ रही है।

कुछ उदाहरण पर्याप्‍त होंगे। हाल ही में घर पर एक कामगार का अनुभव। शाम को उसने कुछ जल्‍दी जाना चाहा। क्‍यों? मुझे लौटने पर अपने बच्‍चे को लेना है, दिल्‍ली के एक टयूशन केन्‍द्र से। उसने खुश होकर बताया कि पूर्वी दिल्‍ली के एक नामी स्‍कूल में उसके बच्‍चे का आर्थिक कमजोर बच्‍चे (EWS) के आरक्षण में दाखिला हो गया है। लेकिन उसकी शिक्षिका कहती है कि इसकी अंग्रेजी कमजोर है। अत: इसको अंग्रेजी का टयूशन दिलाओ। पहली कक्षा से ही अंग्रेजी का यह आतंक धीरे-धीरे पूरे देश को ही अपनी गिरफ्त में ले रहा है। दिल्‍ली का मुखर्जीनगर इलाका गवाह है कि कर्मचारी चयन आयोग, संघ लोक सेवा आयोग से लेकर बैंक, लॉ, यूनिवर्सिटी में सफलता के लिए अंग्रेजी कितनी महत्‍वपूर्ण है। अपनी भाषा आये या न आये यदि अंग्रेजी आती है तो नौकरी पक्‍की। फिर हिन्‍दी की किताब क्‍यों पढ़ें?

भला हो मोदी सरकार का कि पुरानी कांग्रेस सरकार के निर्णय को उलटते हुए सिविल सेवा परीक्षा के जिस प्रथम चरण (सीसैट) में वर्ष 2011 में अंग्रेजी घुसा दी गई थी, उसे निकाल दिया गया है। यहां यह उल्‍लेख करना जरूरी है कि जनता सरकार के दौरान वर्ष 1979 से लेकर 2010 तक कोठारी समिति की सिफारिशों के अनुपालन में सीसैट की प्रारंभिक परीक्षा में अंग्रेजी नहीं थी, लेकिन यूपीए की अंग्रेजीदां सरकार ने बिना संसद को विश्‍वास में लिए बिना किसी महत्‍वपूर्ण विमर्श के अंग्रेजी को सीसैट की आड़ में लाद दिया था। इसका नतीजा यह हुआ कि हिन्‍दी भाषी राज्‍यों समेत समस्‍त भारतीय भाषाओं के जिन सफल उम्‍मीदवारों की संख्‍या 15 से 20 प्रतिशत होती थी, घटकर पांच प्रतिशत से भी कम हो गई। प्रधानमंत्री के हस्‍तक्षेप, न्‍यायालय की सक्रियता और बिहार, उत्‍तर प्रदेश के उम्‍मीदवारों के आंदोलन से भारतीय भाषाओं की जीत हुई और फिर से सफल उम्‍मीदवारों का प्रतिशत बढ़ रहा है।

लेकिन विश्‍व दिवस को सामने रखते हुए क्‍या इसे जीत माना जा सकता है? हरगिज नहीं। इतनी चौकियां तो हमारे पास सत्‍तर के दशक यानी 1979 तक ही आ गयी थीं। कोठारी समिति ने तो यह भी कहा था कि सभी सिविल सेवाओं में भारतीय भाषाओं को माध्‍यम बनाया जाए। फिर क्‍या हुआ? क्‍या भारतीय वन सेवा, इंजीनियरिंग सेवा, आर्थिक सेवा, सम्मिलित चिकित्‍सा सेवा आदि दर्जनों केन्‍द्रीय सेवाओं में हिन्‍दी आज तक प्रवेश कर पायी? क्‍यों हमारे हिन्‍दी के दिग्‍गज, लेखक, प्राध्‍यापक, पत्रकार, राजनेता केवल विश्‍व हिन्‍दी सम्‍मेलन की ही वाट जोहते हैं? वक्‍त आ गया है कि हम नौकरि‍यों और शिक्षा में स्‍कूलों से लेकर विश्‍वविद्यालय तक अपनी भाषा के प्रवेश के लिए पूरे जोर से संघर्ष छेड़ दें। उम्‍मीद भरा आकाश मौजूदा सरकार है, जिसका प्रधानमंत्री केरल से कश्‍मीर तक केवल हिन्‍दी में ही अपनी बात सहजता से कहता है- बिल्‍कुल गांधी, लोहिया कि परंपरा में कि भाषा के बिना लोकतंत्र गूंगा है। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू जी का मानस हिन्‍दी या अपनी भारतीय भाषाओं से बहुत दूर था। इसका प्रमाण हाल ही में शिक्षाविद कृष्‍ण कुमार के आलोचना में छपे उस लेख से भी मिलता है, जब नेहरूजी निराला, महादेवी वर्मा के लेखन साहित्‍य को जानने से भी इंकार करते हैं। यहां विस्‍तार में जाने की आवश्‍यकता नहीं है न छिद्रान्वेशन और अतीत राग  की, लेकिन भारतीय भाषाओं के डूबने की पीठिका देश पर हावी उस सत्‍ता और उसके परजीवी लेखकों, बुद्धिजीवियों के उस दौर में मौजूद है, जिसके चलते हिन्‍दी पट्टी का अंतिम जन खस्‍ता हाल जिंदगी जीने को मजबूर है। न उसकी लिखी किताबें कोई पढ़ता, खरीदता न उसे समाज में उसकी कोई हैसियत। विचारणीय प्रश्‍न है कि पहले हिन्‍दी को राष्‍ट्र में स्‍थापित करें, फिर विश्‍व में। पुराना जुमला याद आता है- लोकल इज़ ग्‍लोबल यानी जो स्‍थानीय है वही वैश्विक है। विश्‍व से पहली देश में हिंदी को लाना होगा।

हिंदी  नहीं, हिंदी  दिवस : प्रेमपाल शर्मा

प्रेमपाल शर्मा

प्रेमपाल शर्मा

बाकी भाषाओं का तो वे जाने, हिन्‍दी के लेखकों के साथ तो मुझे लगता है कि‍ ऐसी स्थिति आ ही गई होगी, जो मेरे साथ है। कहानियों की कोई कमी नहीं है। जल में तैरती, भागती मछलियों की तरह। अनगिनत।

लिखने का इरादा करता हूं। संतोष से भर उठता हूं। कलम फड़फडा़ती  है, लेकिन फिर वही ख्‍याल। किसके लिए?  कौन पढ़ेगा?  कोई पढ़ भी रहा है? महानगर  के किसी भी बच्‍चे,  नौजवान से पूछ लीजिए। ‘बस पढ़ लेता हूं। पांचवी तक एक विषय था। अब तो लिख भी नहीं सकता। सच कह रहा हूं, अंकल! कई साल से नहीं लिखा हिन्‍दी में। स्‍कूल में तो मैम फाइन कर देती थी। कान उमेठ देती थी, बोलने पर। घर पर मम्‍मी-पापा भी नहीं चाहते थे कि‍ मैं हिंदी में लि‍खूं। मैंने एक बार हिन्‍दी में कविता लिखी। पापा ने बहुत डांटा। वैसे मेरे बाबाजी ने भी कविताएं लिखी हैं, पर अब वे मेरे साथ अंग्रेजी सीखते हैं। पीटी की मीटिंग में बाबाजी जाते हैं, न  कभी-कभी। मुझ से भी अंग्रेजी पूछ लेते थे। मुझे बहुत अच्‍छा लगता था। जब मैंने अंग्रेजी में कविता लिखी तो मुझे सबने प्‍यार किया। नानाजी तो इतनी दूर से गिफ्ट लेकर आए थे। हां बोल लेता हूं। डांस भी करता हूं, हिन्‍दी गानों पर।’

सोचते-सोचते कलम एक तरफ लुढ़क गई है। कितने ही चेहरे घूम रहे हैं हिन्‍दी साहित्‍यकारों के। अब तो दिल्‍ली में हर पखवाड़े निगमबोध जाना पड़ता हैं। फिर उनकी शोक सभाएं। बस हो गई, साहित्‍य सेवा। कथाकार क्षितिज शर्मा उपन्‍यास छपने के इंतजार में ही चल बसे। कितनी मेहनत लगती है, ऐसी रचना में? पर कौन मानता है। प्रकाशकों के आगे लंबी लाइनें लगी हैं, छपवाने वालों की। कथाकार-कलाकार प्रभु जोशी कह रहे थे कि‍ प्रकाशक फोन ही नहीं उठाते। बोले न बोले सौ में निन्‍यानवे का यही रोना। पढ़ने वाले कम, लिखने वाले ज्‍यादा। रॉयल्टी शब्‍द तो  हिंदी से  गायब ही  हो  जाएगा। पंजाबी भाषा के  सन्दर्भ  में तीन दशक पहले  खुशवंत सिंह ने  कहा  था  कि वहां किसी को  रॉयल्टी नहीं मिली।

अभी  साहित्‍य अकादमी में पता चला कि अमृतलाल नागर की जन्‍मशती मनाई जाएगी। बड़ा अच्‍छा लगा। आखिर सौ वर्ष में तो कोई नाम लेगा एक बार। इतना भी हो जाए, तो कम नहीं। अभी 9 अगस्‍त को मनोहर श्‍याम जोशी को उनकी पत्‍नी ने अपने बेटों के पैसों से याद किया। सचमुच!  चाय-पकोड़े पर  कुछ लोग तो अभी जुट ही जाते हैं। भविष्य  में  शायद यह  भी  मुश्‍कि‍ल  होगा। हज़ार आमंत्रण  पर पचास श्रोताओं  का औसत  है और वे भी  बड़े–बूढ़े। औसत  आयु 70  साल,  जिनमे  पिचानवे प्रतिशत  शुगर  के मरीज़। पकोड़े  खाएं तो  मुश्किन, न खाएं तो भी। वे उन दिनों को  याद  करते हैं, जब सूखी  चाय  पर भी नौजवानों  की  भीड़  जुटी  रहती थी। लगता है कि‍ हिंदी  को भी शुगर की बीमारी लग गई।  बहुत बड़ी-बड़ी बातें  हुईं, लेकिन हिंदी  लेखन पर  नहीं।  कैसा कृतघ्‍न है हिन्‍दी समाज?  जिस साप्‍ताहिक हिन्‍दुस्‍तान. धर्मयुग की नाव में सवार हिन्‍दी घर-घर तक पहुंची, उन साहित्‍यकारों, संपादकों को नई पीढ़ी जानती तक नहीं।

ऐसा नहीं कि सारा दोष राजसत्‍ता का ही है। राजसत्‍ता, राजनीतिक पार्टियों के साये में पले-बढ़े संघठनों ने भी कम नुकसान नहीं किया। कौन रोकता है, इन्हें कि ये संगठन, विश्‍वविद्यालय, स्‍कूल में धर्मवीर भारती, दिनकर, अमृतलाल नागर, जगदीश चन्द्र, पाश…. को याद नहीं कर सकते। हिन्‍दी भाषा की ताकत इन लेखकों में है। जनता इसे जानती है। लेकिन ये केवल उसी लेखक को याद करेंगे, जो इनके पार्टी  में रहा हो। परसाई जी ने इन्‍हीं लेखकों के लिए कहा था- “हैं तो ये शेर, लेकिन राजनीति के  सियारों की बारात में बेंड बजाते हैं।“

पार्टी का लेखक जनता का लेखक कभी नहीं बन सकता। इसलिए हिन्‍दी लेखक जनता से दूर होता गया।

दिमाग में दौड़ती कहानी फिर गायब हो गई है- पानी में तेजी से दौड़ती मछलियों की तरह। जब इतने बड़े-बड़े साहित्‍यकार गायब हो गए, उनकी किताबें गायब हो गईं, तो तुम्‍हें कहानी गायब हो जाने का अफसोस क्‍यों? चश्‍मे का नम्‍बर तो नहीं बढ़ा? कमर तो नहीं झुकी? वक्‍त से पहले बुढ़ा तो नहीं गए? पांडुलिपि तो दर-दर की ठोकर नहीं खा रही?  प्राण तो आराम से निकलेंगे।  वरना कहानी,  उपन्‍यास पूरा करने के चक्‍कर में इसी हिन्‍दी प्रदेश में घूमते रहते और यमराज का भैंसा भी इंतजार में भूखा मर जाता। लिखना है, तो किसी और भाषा में लिखें- जहां बच्‍चे इन किताबों को पढ़े। पुरस्‍कारों से कोई भाषा नहीं बचती। लेखक और समाज भी नहीं।

पता नहीं कभी किस गफलत में वे रोज कागज काले करते थे। रात में सोने न सोने के बीच सिरहाने कागज पर अंधेरे में ही कुछ-कुछ नोट करते। लगता था, छपते ही दुनिया बदल जाएगी। दशकों तक इस भ्रम में जीते रहे। बदलता था तो बस घंटे दो घंटे या दिनभर का मूड।  लेकिन सूरज छिपने के साथ ही छूमंतरवाकई कितना खोखला था, सब कुछ। लेकिन जीने के लिए कुछ भ्रम भी तो चाहिए। सोशल मीडिया उसी भ्रम की अगली कड़ी साबित हुआ। किताबों, अखबारों से मोहभंग हुआ तो उसी सोशल मीडिया की तरफ उम्‍मीद से देखने लगे जिसकी सूरत से भी चिढ़ लगती थी। लेकिन यह क्‍या? लाइक तो करते हैं, पढ़ता एकाध ही है। अपने बच्‍चे तक नहीं देखते- कहने के बावजूद। ‘आप अंग्रेजी में लिखा करो पापा ! हिन्‍दी अब नहीं चलेगी।’ दीवारों पर चप्‍पे -चप्‍पे पर जब ऐसे इश्तिहार चिपके हों, तो कोई क्‍यों हिन्‍दी में लिखे।

लेकिन सितंबर में तो हम चलाएंगे ही। सितम्बर बुलावा देता फिर  रहा  है- हिंदी दिवस पर  आने और  गाने बजने  के लिए। जय हिंदी ! जय  हिन्दी दिवस!

सुविधा के द्वीप  :   प्रेमपाल शर्मा

kamal joshi,school

दो बजते ही स्कूल से छूटे बच्चों की चहचहाहट से मन ऐसे प्रसन्न हो उठता है, जैसे- शाम को घर लौटती चिड़ि‍यों का चहकते हुए, शोर करते झुंड को देखना। दोनों ही खुद भी खिलखिलाते हैं और दुनिया को भी। मैं बात कर रहा हूं, सोसाइटी के एकदम बगल में बने सरकारी स्कूल की। चिल्लागांव का स्कूल। लगभग तीन हजार बच्चे पॉश कॉलोनियों के बीचों बीच। लेकिन इसमें इन सोसाइटियों का एक भी बच्चा पढ़ने नहीं जाता। बीस वर्ष के इतिहास को भी टटोलें तो भी नहीं। प्राचार्य ने खुद बताया था- ‘बीस-तीस हजार की आबादी वाली सोसाइटियों का एक भी बच्चा, कभी भी इस सरकारी स्कूल में नहीं पढ़ा।‘ असमानता के ऐेसे द्वीप हर शहर में बढ़ रहे हैं। उनके लिए अलग और आभिजात्य बेहद महंगे स्कूल हैं। इनमें कई स्कूल किसी कंस्ट्रक्शन कंपनी या बिल्डर के हैं। दरअसल, ऐसे सभी निजी स्कूल ऐसे ही मालिकों के हैं। पुराने धंधों की बदौलत एक नया धंधा स्कूल का, जो अब पुराने सारे धंधों से ज्यादा चमकार लिए है।

खैर, मेरे अंदर सरकारी स्कूल से छूटे बच्चों की खिलखिलाहट हिलोरे ले रही है। पूरी सड़क भरी हुई। बच्चे-बच्चियों दोनों। पैदल चलता अद्भुत रेला। कुछ बस स्टैंड की तरफ बढ़ रहे हैं, तो कुछ चिल्लागांव की तरफ। जब से मेट्रो ट्रेन आई है, पास के अशोक नगर, नोएडा तक के बच्चे इस सरकारी स्कूल में लगातार बढ़ रहे हैं। जमुना के खादर में बसे यू.पी, बिहार के मजदूरों का एक मात्र सहारा भी है, यह सरकारी स्कूल। जिस स्कूल को यहां आसपास की संभ्रांत कॉलोनियों के बाशिंदे गंदा और बेकार मानते हैं, चिल्ला गांव, खादर के बच्चों के लिए इस स्कूल का प्रांगण बहुत महत्त्व रखता है। केवल स्कूल ही तो है, जहां वे खेल पाते हैं। चीजों की कीमत वे जानते हैं, जिन्हें मिली न हो। भूख हो या नींद या जीवन की दूसरी सुविधाएं। अभाव ही सौन्दर्य भरता है।

कभी-कभी इन हजारों बच्चों की खिलखिलाहट को नजदीक से सुनने का मन करता है। सरकारी स्कूल के न गेट पर एक भी कार, न स्कूटर। न स्कूली बस। और तो और नन्हें-मुन्ने बच्चों तक को लेने आने वाले भी नहीं। कौन आएगा? मां किसी अमीर के घर काम कर रही होगी और पिता कहीं मजदूरी कर रहे होगा। इन्हें उम्मीद भी नहीं। इन के पैरों ने चलना खुद सीखा है। इसके बरक्स तीन सौ मीटर के फासले पर ही एक निजी स्कूल है। उसे उसके अंग्रेजी नाम ए.एस.एन. से ही सभी जानते हैं, आदर्श शिक्षा निकेतन के नाम से नहीं। स्कूल प्रबंधन भी नहीं चाहता कि‍ हिन्दी नाम से पहचाने जाना। हिन्दी नाम से स्कूल का शेयर भाव नीचे आ जाएगा। फिर धंधा कैसे चमकेगा? बड़ी-बड़ी फीस, किताबों, ड्रेस, स्कूल बस के अलग पैसे और फिर रुतबा। इसी रुतबे का खामियाजा पड़ोस की सार्वजनिक सड़क को भुगतना पड़ता है। सुबह स्कल खुलते और बंद होते दोनों वक्त ए.एस.एन. की विशाल पीली-पीली बसें आड़ी-तिरछी प्रवेश करती, लौटती, गुर्राती, कंडक्‍टर के हाथों से पिटती-थपती, जो कोहराम मचाती हैं, उससे वहां के पॉश बाशिंदे अपने-अपने ड्राइंगरूम में बैठे कुढ़ते हैं, लेकिन चुप रहते हैं। कारण या तो उनके बच्‍चों पर इस स्‍कूल ने उपकार किया है अथवा निकट भविष्य में उन्हें दाखिले के लिए भीख मांगनी पड़ सकती है। इन अपार्टमेंटों में प्रसिद्ध पत्रकार, बुद्धिजीवी, लेखक और फिल्मकार भी हैं, जो अपने स्वार्थ और सुविधा के लिए किसी की भी र्इंट से र्इंट बजा देंगे। लेकिन इन स्कूलों की इतनी ऊंची फीस, शोर और शोषण के खिलाफ कभी मुंह नहीं खोल सकते। पड़ोस की सड़कें और फुटपाथ इन स्कूलों से त्रस्त हैं। किनारे बैठे सब्जी-ठेले वालों को भी स्कूल में होने वाले सत्संग के दिन भगा दिया जाता है! कोई है पूछने वाला कि स्‍कूल-मदरसों में सत्‍संग, कीर्तन का क्या काम?

जहां सरकारी स्कूल के गेट पर एक भी कार, स्कूटर नहीं था, इन निजी स्कूलों के गेट पर सैकडों कारें लगी होती हैं। यहां बच्चे कम, कारें ज्यादा दिख रही हैं। इसीलिए बच्चों की चहचहाट के बजाये कार के हार्न की आवाजें। दो बजे से पहले ही इनके अभिभावक अपनी बड़ी-बड़ी कारें ए.सी. चालू कर के ऐसे सटा कर लगाते हैं कि उनके चुन्नू मुन्नू और वयस्क बच्चे भी स्‍कूल के दरवाजे से निकलते ही उसमें आ कूदें। इन कार और बसों ने थोड़ी देर के लिए पूरी सड़क रोक दी है। केवल यहां नहीं पूरे शहर में। एक-एक बच्चे को कभी-कभी लेने वाले दो-दो। बावजूद इसके इन मोटे-मोटे बच्चों के चेहरों पर उदासी, थकान क्यों पसरी हुई है? सरकारी स्कूल के बच्चे इन्हीं कारों के बीच बचबचाकर रास्ता तलाशते गुजर रहे हैं और मुस्करा भी रहे हैं।  वाकई सड़क अमीरों की, स्कूल और देश भी। गरीबों का तो बस संविधान है, जिसकी प्रस्तावना में समाजवाद, समानता जैसे कुछ शब्द लिखे हुए हैं। पता नहीं यह सपना कब पूरा होगा!

फोटो : कमल जोशी

टीना डाबी: सफलता के निहितार्थ : प्रेमपाल शर्मा

टीना डाबी

टीना डाबी

टीना डाबी- सिविल सेवा परीक्षा 2015 की टॉपर। पूरे देश ने खुशी मनाई। पिछले कुछ वर्षों के परिणामों को याद करें, तो इस बार कुछ अतिरिक्‍त कवरेज मिली। टीना डाबी को भी और दूसरे स्‍थान पर रहे कश्‍मीर के अनंतनाग के अतहर अमिर को भी। दोनों को अलग-अलग कारणों से। पिछले वर्ष प्रथम आई इरा सिंघल पर भी देश को फख्र हुआ था, क्‍योंकि वह विकलांग थीं। पिछले वर्ष पहले पांच स्‍थानों में चार लड़कियों को मिले थे. 10, 12वीं से लेकर देश की ज्‍यादातर परीक्षाओं में लड़कियों का बेहतर प्रदर्शन यह बताता है कि भारतीय समाज इस जकड़न पूर्वाग्रह के बावजूद कुछ-कुछ बदल रहा है।

टीना की सफलता के तो यही निहितार्थ है। प्रथम प्रयास, मात्र ग्रेजुएट, उम्र केवल 22 वर्ष। जैसे ही सिविल सेवा परीक्षा में बैठने लाइक हुई, फर्राटे से पहले स्‍थान पर। संघ लोक सेवा आयोग से प्राप्‍त मार्कशीट के अनुसार दूसरे स्‍थान से काफी ऊपर है टीना। और यह सब कुछ इतना सहज लगा- टीना और उनकी मां दोनों की ही भाव भंगि‍मा से। सिर्फ इरादा था, सिविल सेवा में बैठने का ग्‍यारहवीं कक्षा से ही। शेष नियमित पढ़ाई। बाकी जिंदगी भी उतनी ही सहज-खेलना, नॉवेल पढ़ना, शॉपिंग यानी बड़े लक्ष्‍य पाने के लिए बहुत सहज-साधारण जीवन भी पर्याप्‍त है।

लेकिन टीना की सफलता पूरे देश को कई दिशा दिखा सकती है। सबसे पहले एक लड़की वह सब कुछ कर सकती है, ब ] ccबबल्कि लड़कों से बेहतर। इसलिए जो लोग, विशेषकर हिन्‍दी पट्टी में पुत्र रत्‍न की दौड़ में लड़कियों के जन्‍म को अभिशाप मानते हैं, उनका सिर शर्म से झुक जाना चाहिए। सोने में सुगंध टीना के इस चयन से भी आई कि उन्‍होंने हरियाणा को अपना कैडर (क्षेत्र) चुना है और वह इसलिए कि हरियाणा जैसे राज्‍यों में लड़के-लड़की में भेदभाव, पूर्वाग्रह सबसे ज्‍यादा है। क्रूरता की हद तक। पैदा होने तक की आज़ादी नहीं। फिर उनके कपड़े, पढ़ने और सामाजिक हिस्‍सेदारी पर भी उतने ही प्रतिबंध। नतीजा समृद्धि के बावजूद लिंग अनुपात सबसे खराब। ऊपर से पुरुष दंभ, भारतीय संस्‍कृति, जातीय पूर्वग्रहों में फली-फूली खाप पंचायतें। पड़ोस के राज्‍य पंजाब, उत्‍तर प्रदेश, दिल्‍ली और राजस्‍थान की भी मोटा-मोटी यही स्थिति है। उम्‍मीद है कि‍ ये सभी राज्‍य और इनके नागरिक टीना की सफलता से कुछ सबक लेंगे। टीना जैसे नौजवान अफसरों के लिए भी यह चुनौती है कि सेवा में आने के बाद वे कैसे अपने इरादों को पूरा कर पाते हैं।

महात्‍मा गांधी ने कहा था कि स्‍त्री शिक्षा का और भी महत्‍व है क्‍योंकि उसका असर कई परिवारों और पीडि़यों पर होता है। टीना के उदाहरण से भी यह स्‍पष्‍ट है। मां पढ़ी-लिखी इंजीनियर हैं और मराठी हैं। बेटियों की बेहतर देखभाल और पढ़ाई के लिए उन्‍होंने स्‍वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली थी। इसीलिए बेटी ने बार-बार अपनी सफलता का श्रेय मां को दिया। कितने महत्वपूर्ण हैं मां के संस्‍कार, वरना हिन्‍दी पट्टी की सामान्‍य मां पहले तो बेटियां होने का ही उम्रभर जब-तव शोक मनाती रहती और क्‍या वे ऐेसा सपना अपनी बेटी को दे पाती कि तुम्‍हें आईएएस परीक्षा देनी है। यहां मां-बाप के दबाव और दिशा में अंतर समझने की जरूरत है। ग्‍यारहवीं में टीना ने विज्ञान में पढा़ई शुरू की। मां और बेटी को लगा कि वह सामाजिक विज्ञान, राजनीति शास्‍त्र, इतिहास में बेहतर कर सकती है तो दो महीने बाद ही विज्ञान छोड़कर हयूमैनिटीस विषय ले लिए। दुनियाभर विशेषकर यूरोप, अमेरिका की शिक्षा व्‍यवस्‍था में बिना किसी प्रतिबंध, नियम के मनमर्जी विषय पढ़ने, बदलने की आजादी है। इसी से पूरी सफलता मिली और फिर दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय के लेडी श्रीराम कॉलेज में भी राजनीति विज्ञान में टॉप किया। इंजीनियर मां की दिशा और प्रगतिशीलता की दाद देनी पड़ेगी वरना न जाने कितने अभिभावक अपने बच्‍चों को जबरदस्‍ती इंजीनियर, डॉक्‍टर बनाने पर आमादा हैं और इस दबाव में बच्‍चों की आत्‍महत्‍या की खबरें रोज सुनने को मिलती हैं। पूरा देश और अभिभावक टीना के उदाहरण से सीख सकते हैं कि रुचि के विषयों को पढ़ना कितना आनंददायक है और राष्‍ट्रीय सफलता दिला सकता है। टीना की सफलता इंजीनियरिंग कॉलेज के धंधे पर भी प्रश्‍न खडा़ करती है। पिछले दो दशक के संघ लोक सेवा आयोग के आंकड़े भी बताते हैं कि अधिकांश सफल अभ्‍यार्थियों की शिक्षा जरूर इंजीनियर या विज्ञान विषयों में हुई, लेकिन सिविल सेवा परीक्षा में उन्‍होंने अपने मन के विषय सामाजिक विज्ञान, इतिहास, साहित्‍य, मनोविज्ञान, समाज शास्‍त्र जैसे ही चुने। सिविल सेवा की गुणवत्‍ता के लिए यह अच्‍छा संकेत है।

कश्‍मीर के अतहर आमिर की सफलता का भी देश ने मन से स्‍वागत किया है और इससे कश्‍मीर के नौजवान प्रेरणा ले सकते हैं। तीन वर्ष पहले तो कश्‍मीर के एक छात्र ने सिविल सेवा में टॉप किया था। अतहर फिलहाल रेलवे की सेवा में है और उनकी शिक्षा हिमाचल के मंडी जिले में हुई है। ऐसे उदाहरण ही कश्‍मीर के नागरिकों को राष्‍ट्रीय धारा में शामिल होने और एक भारतीय के रूप में आत्‍मसात करने में मदद करेंगे। टीना, अतहर, अर्तिका, जसमीत संधू, अमीर अहमद जैसे सैकड़ों वि‍भि‍न्‍न पृष्‍ठभूमि के छात्रों की सफलता संघ लोक सेवा आयोग की पूर्ण निष्‍पक्षता, चयन प्रक्रिया के प्रति भी आश्‍वस्‍त करती है कि धर्म, जाति क्षेत्र के पूर्वग्रहों से ऊपर उठकर हमारी संस्थाओं को काम करने की जरूरत है। पहले देश, संस्‍थान ऐसी पीढियां बनाते हैं और फिर ऐसी पीढि़यां देश का निर्माण करती हैं।

लेकिन परिणाम घोषित होते ही इस बार एक अवांच्छित बहस ने भी जन्‍म ले लि‍या। परिणाम घोषित होते ही एक माननीय संसद सदस्‍य ने टीना की सफलता पर इंडियन एक्‍सप्रेस को बताया कि ‘एक दलित लड़की ने टॉप किया है। 40-50 वर्ष पहले ऐसा संभव नहीं था। ऐसा आरक्षण की नीतियों के चलते हुआ है’ आदि-आदि‍। बात सही है, लेकिन ऐसी अद्धितीय सफलता पर जाति के आधार पर टिप्‍पणी बताती है कि जातीय पूर्वाग्रह सवर्ण और दलित दोनों में ही कितने गहरी जड़े जमाए हुए हैं। स्‍वयं टीना और उसके मां-बाप भी कभी इस रूप में इस सफलता को देखना नहीं चाहेंगे। टीना ने कुल 1078 सफल उम्‍मीदवारों में सर्वोच्‍च अंक प्राप्‍त किए हैं, केवल दलितों में ही नहीं और इसलिए पूरे देश की लड़कियां, उम्‍मीदवारों के लिए एक मिसाल हैं। टीना ने जाति के प्रश्‍न पर हिकारत से जबाब ठीक ही दिया कि ‘मैं सभी नागरिकों के लिए बिना भेदभाव काम करूंगी।’ अच्‍छा हुआ टीना ने इस पहचान को झटक कर तुरंत दूर कर दिया और जातिवादी बाजों के चुंगल से बाहर आ गईं।

लेकिन क्‍या जातिवाद स्‍वार्थ, गिरोह, राजनीति टीना की पहचान को जाति से मुक्‍त रहने देगी? हरियाणा जैसे राज्‍यों में तो यह क्रूरता की हद तक है। आए दिन झज्‍जर, गोहाना या हाल ही में जाट आरक्षण की हिंसा मध्‍ययुगीन समाज की याद दिलाती है। अफसोस और दुर्भाग्‍यपूर्ण बस यही है कि माननीय संसद सदस्‍य ने दलित होते हुए भी न जाने किस शेखीबघारने में जाति की शिनाखत पहले की, सफलता की बाद में। क्‍या सवर्णों के ऐसे उल्‍लेख कि ‘इनके पिता, दादा संस्‍कृत के प्रंकाड पंडित थे और ऊंची चोटी के विद्वान ब्राह्मणों में गिनती की जाती थी’ में कोई अंतर है। लोकतंत्र यहीं सबसे आधुनिक विचार है, जो बाप-दादों के कंधों के भरोसे नहीं टिका रहता। लोकतंत्र में व्‍यक्ति की अपनी अस्मिता है, उसके काम गुणों के आधार पर। उसे न वंश की वैशाखी की जरूरत, न जाति, कुल, क्षेत्र की। दुर्भाग्‍य से पिछले साठ सत्‍तर सालों के सांचे ने हमारे संसद सदस्‍य, बुद्धिजीवियों, लेखकों को ऐसा बना दिया है कि वे जाति के सांचे के बिना मनुष्‍य की पहचान कर ही नहीं सकते। उस पर दावा और दंभ यह कि हम जाति, समुदाय, धर्म से ऊपर उठना चाहते हैं। यदि ऊपर उठना चाहते हो तो प्रत्‍यक्ष और परोक्ष ऐसी मानसिकता से बचना होगा।

इस बात में जरूर दम है कि चालीस-पचास वर्ष पहले ऐसा शायद संभव नहीं था। लेकिन यहां भी आरक्षण से ज्‍यादा भारतीय समाज में लड़की की उपलब्धि का होना चाहिए। कितनी कम लड़कियां स्‍कूल जा पाती थीं पचास वर्ष पहले? कॉलेज तो और भी कम। वैज्ञानिक तो आज भी दुर्लभ हैं। इसे पूरे लोकतंत्र की उपलब्धि के रूप में देखना चाहिए कि लड़कियां ऐसी सर्वोच्‍च परीक्षा में बार-बार अव्‍वल आ रहीं हैं। इस बार पहले बीस में पांच और सौ में 22 लड़कियां हैं। परीक्षा देने वाली संख्‍या के अनुपात से कहीं ज्‍यादा। पिछले वर्ष 2014 की सिविल सेवा परीक्षा के प्रथम पांच स्‍थानों में पहले चार लड़कियों को ही मिले थे। उपलब्धि का यशोगान ये परिणाम हैं। निश्चित रूप से समाज के दलित, वंचित, गरीब तबके को चालीस वर्ष पहले पढ़ने-लिखने की ऐसी सुविधाएं नहीं थीं। आरक्षण और दूसरी कल्‍याणकारी योजनाओं ने समाज के इस तबके को आगे बढ़ाने में मदद की है। संभव है कि‍ टीना के माता-पिता को भी उसका कुछ लाभ मिला हो। लेकिन इस मंजिल तक पहुंचना तो बेशक निजी प्रतिभा, श्रम का ही उदाहरण माना जाएगा।

अगर जातिवादी जिद्द यही है कि आरक्षण से ही यह संभव हुआ है, तो बहस के कुछ नए दरवाजे खुलते हैं और वक्‍त आ गया है, जब उन पर बात होनी चाहिए। कितने दलितों के मां-पिता उच्‍च सरकारी सेवाओं में हैं और दिल्‍ली जैसे महानगरों में पोस्‍टिड हैं? क्‍या कोई गरीब मां सरकारी नौकरी छोड़कर बच्‍चों की शिक्षा में जुट पाएगी? कितने दलित लेडी श्रीराम जैसे संस्‍थानों में पंहुचते हैं? बहुत कम। इसीलिए देशभर से सामने आ रहे उन सुझावों पर विचार किया जाना चाहिए कि जो दलित, आदिवासी वैसी ही सुविधाओं में पढ़ रहे हैं, उन्‍हें आरक्षण के लाभ से दूर रखा जाए, जिससे कि वह उन्‍हीं के समुदाय के नीचे के तबकों तक पहुंच सके। संघ  लोक सेवा आयोग के ताजा परिणामों को यदि तीस साल पहले से तुलना की जाए तो यह बात और ज्‍यादा जरूरी लगती है। 2015 के परिणाम और कटऑफ पर एक नजर:-

अनारक्षित(UR) अ.पि.वर्ग(OBC) अनु.जाति(SC) अनु.ज.जाति(ST)
सी सैट 107 106 94 91
मुख्‍य परीक्षा 676 630 622 617
अंतिम परिणाम 877 814 810 801
कुल चुने गए 499 314 176 89

(कुल सफल 1078)

पिछले कुछ वर्षों में सीसैट और मुख्‍य परीक्षा में किए गए नित नए बदलावों के मद्देनजर इन आंकड़ों को भले ही प्रतिनिधि नहीं माना जाए, लेकिन एक बात तो साफ है कि पिछले कुछ वर्षों में सामान्‍य उम्‍मीदवार और आरक्षित वर्ग के कटऑफ में बहुत कम अंतर बचा है। अस्‍सी के दशक में जो अंतर दो सौ नम्‍बरों के आसपास होता था, अब घटकर पचास से लगभग अस्‍सी तक आ गया है यानी 15-20 प्रतिशत से घटकर 3-4 प्रतिशत तक। यह दलित वर्ग में पढ़ने-लिखने के प्रति आई चेतना और उप‍लब्धि का स्‍पष्‍ट परिणाम है यानी अब उन्‍हें बहुत थोड़ी सी रियायत चाहिए। तथाकथित सवर्ण नम्‍बरों के आधार पर उन्‍हें ज्‍याद दिन तक निम्‍न स्‍तर का भी नहीं मान सकते।

लेकिन यह निष्‍कर्ष इतने भोले नहीं हैं। इसे पूरी समग्रता में जांचने की जरूरत है। चार दशक पहले जब ये आरक्षित वर्ग में चुने जाते थे, तो ये पहली पीढ़ी के पढ़े-लिखे थे। 50-60 प्रतिशत के सफल अथ्‍यर्थियों के मां-बाप किसान, मजदूर, मोची। गांवों के स्‍कूलों में मातृभाषा में पढ़े हुए। सिविल सेवा में दरवाजे कोठारी समिति की अनुशंसाओं के तहत वर्ष 1979 (जनता सरकार) में खुले तो सही मायनों में इन सेवाओं का जनतंत्रीकरण हुआ। हर वर्ग, जाति क्षेत्र की पूरे देश से हिस्‍सेदारी बढी़। वर्ष 1979 में पिछले वर्षों की तुलना में दस गुना उम्‍मीदवार सिविल सेवा परीक्षा में शामिल हुए थे। वर्ष 1988 में और 2000 में क्रमश: प्रो. सतीश चन्‍द्र और प्रो. अलघ  कमेटी ने भी अपनी समीक्षा रपट में इस पक्ष की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। लेकिन दुर्भाग्‍य से देश की अन्‍य उच्‍च सेवाओं इंजीनियरिंग, मेडिकल, वन आदि में मातृभाषाओं में लिखने की छूट आज तक नहीं मिली। वर्ष 2011 में तत्‍कालीन सरकार ने तो अंग्रेजी और लाद दी थी, जिसे नई सरकार ने हटाया है। अंग्रेजी सीसैट से हटाते ही पिछले वर्ष भारतीय भाषाओं के माध्‍यम से सफल उम्‍मीदवार की संख्‍या वर्ष 2012 और 2013 की पांच प्रतिशत से बढ़कर दस प्रतिशत को पार कर गई। इस वर्ष के आंकड़ों का अभी इंतजार है।

आइए लौटते हैं इस मुद्दे पर कि कटऑफ के बीच फासला कम होने के मायने क्‍या हैं? एक निष्‍कर्ष तो सीधा यह कि दलित और अन्‍य वर्ग के उम्‍मीदवारों की अकादमिक योग्‍यता, प्रतिभा लगातार प्रगति पर है। टीना डाबी के उदाहरण से तो यह बात जगजाहिर हो गई है। लेकिन न भूलने की बात यह है कि इन वर्गों के कुछ लोगों को भी अब वे सब सुविधाएं मिल रही हैं जिनसे ये सैकड़ों वर्षों से वंचि‍त थे और इसलिए आरक्षण प्रदान किया गया था।

आयोग की वार्षिक रिपोर्ट बताती है कि अब ये भी अधिकांश अंग्रेजी निजी स्‍कूलों में पढ़े हैं, परीक्षा का माध्‍यम अंग्रेजी है, पिछले कई दशकों से नगर, महानगरों में रहते हैं और अभिभावकों की आय भी सवर्णों के लगभग बराबर है। अपृश्‍यता, सामाजिक भेदभाव गांवों में जरूर जारी है, लेकिन इनमें से अधिकांश को वैसा तीखा अनुभव नहीं है। यूं भारतीय मानस, काले-गोरे का भेद तो अफ्रीका और अंग्रेजों से भी ज्‍यादा अपने भाई-बहनों तक से करता है। याद कीजिए आजतक टीवी चैनल की ऐंकर जब टॉपर से हिन्‍दी में प्रश्‍न कर रही थी तो उनका जबाव अंग्रेजी में था। हारकर ऐंकर को हिन्‍दी में कहने के लिए कहना पड़ा। फिर भी जबाव इंगलिश में आए। जबकि दूसरे स्‍थान पर रहे अतहर आमिर हिन्‍दुस्‍तानी में बहुत सहज थे। यह नुक्‍स निकालने की जगह नहीं है। सिर्फ इतना कहना है कि जिन्‍हें पर्याप्‍त समान सुविधाएं मिली हुई हैं, उन्‍हें आरक्षण से बाहर रखने की कोई युक्ति खोजी जानी चाहिए, जिससे सही मायनों में गरीब, वंचित इन सेवाओं में आ सकें। गरीब वंचितों की भागीदारी तंत्र को ज्‍यादा मानवीय बनाती है।

काश, कभी कोई भारतीय भाषाओँ का उम्‍मीदवार भी सिविल सेवा में टॉप कर पता! माननीय संसद सदस्य जाति की बातें करने की बजाय इन पक्षों पर बात करते तो ज्यादा अच्छा रहता।

एक और विचारणीय पक्ष। किसी की भी प्रतिभा का पैमाना सिर्फ इकहरी परीक्षा से संभव नहीं है। इस कसौटी पर कसें तो महात्‍मा गांधी से लेकर आइंसटाइन, डार्विन, मंटो रामचंद्र शुक्‍ल कोई भी खरा नहीं उतरता। सिविल सेवा परीक्षा भी इसका अपवाद नहीं है। पिछले दो वर्ष के उदाहरण। वर्ष 2014 की परीक्षा की टॉपर इरा सिंघल के सीसैट (प्रथम चरण) में केवल 206 नम्‍बर थे। और कटऑफ जनरल श्रेणी की थी 205। महज दो नम्‍बर कम होने से इरा मुख्‍य परीक्षा में नहीं बैठ सकती थी। सब जानते हैं कि विकलांगता के बावजूद वह 2014 की परीक्षा के अंतिम चयन में टॉपर थी। टीना डाबी का मामला भी इससे मिलता-जुलता है। प्रथम चरण(सीसैट) में टीना को मिले 96.66 और एससी कैटीगरी में कटऑफ थी 94, जबकि सामान्‍य श्रेणी में 107.23। भले ही पहले चरण में टीना को कुछ रियायत मिली है, लेकिन मुख्य परीक्षा में टीना डाबी ने सभी को पछाड़ कर पहला स्‍थान पाया। लब्‍बोलुआब यह है कि महत्‍वपूर्ण प्रथम आना या निन्‍यानवे प्रतिशत लेना या पास, फेल होना नहीं है, अंतिम रूप से आप समाज को क्‍या देते हैं, आपका आंकलन इस बात से किया जाएगा और समाज को भी करना चाहिए। पूरी परीक्षा प्रणाली में इस पक्ष पर सुधार की जरूरत है। इसलिए सफल होने पर न इतने अहंकार में फूले-फूले फिरें, न असफल होने पर अपने को इतना हीन मानें।

अंतिम प्रश्‍न पूरी सिविल सेवा परीक्षा के मकसद और चरित्र का है। पिछले पांच वर्ष से आज़ादी के बाद से सबसे ज्‍यादा भर्ती हो रही है। हर विभाग को नए युवा अधिकारियों की जरूरत है। आई.ए.एस से लेकर आई.पी.एस, तक और रेलवे से आयकर तक। जहां नीचे के पदों पर कटौती जारी है, ऊपर का पिरामिड लगातार भारी होता जा रहा है। अब दर्जनों की जगह सैकडों सचिव स्‍तर के पद हैं और हजारों संयुक्‍त सचिव स्‍तर के। नौकरशाही पर खर्च भी इसलिए बढ़ रहा है। हर वेतन आयोग पिछले के मुकाबले वेतन और भत्‍ते और बढ़ा देता है, इस तर्क पर कि निजी क्षेत्र में ज्‍यादा बेहतर तनख्‍वाहें हैं। सर्वश्रेष्‍ठ प्रतिभाओं को सरकार में लाने का तर्क भी इसमें शामिल है। लेकिन सर्वे बताते हैं कि सर्वश्रेष्‍ठ प्रतिभाएं अब सिविल सेवा की तरफ नहीं देख रहीं। ज्‍यादातर अब वे आ रहे हैं जिन्‍हे शक्ति, सुविधाएं पूरी चाहिए और कम से कम मेहनत करनी  पडे। साक्षात्‍कार और दिखावे के लिए कुछ भी कहें, पब्लिक हित की बजाय वे निजी हितों को प्राथमिकता दे रहे हैं। बढ़ती लाल फीताशाही और भ्रष्‍टाचार बढ़ने के पीछे नौकरशाही की यही मानसिकता है। अगर कुछ कर गुजरने का ऐसा ही जज्‍बा होता तो हजारों की भर्ती के बावजूद सरकारी संस्‍थान, शिक्षा, स्‍वास्‍थ्‍य, कानून व्‍यवस्‍था समेत पूरा प्रशासन इतना लचर नहीं होता और न भारतीय नौकरशाही को दुनिया की भ्रष्‍टतम होने का तमगा मिलता। कारण जो भी हों सरकारी तंत्र की अक्षमता ही दिनोंदिन निजीकरण को बढ़ावा देने के लिए जिम्‍मेदार है। लेकिन इनसे बड़ा दोष तो उस राजनीति का है, जिसके डंडे के बल ये बंदरी की तरह नाचते हैं।

हमारे देश को एक सक्षम नौकरशाही की जरूरत है और यूपीएससी जैसी संस्‍था ये काम बखूबी कर रही हैं। चुनौती यह है कि टीना डाबी, अतहर आमिर, अर्तिका, संधू के सपनों और आदर्शों को हासिल करने में हमारा लोकतंत्र कितनी मदद करता है। 1981 बच के टॉपर प्रदीप शुक्‍ला, उत्‍तर प्रदेश कैडर के जेल में हैं और ऐसी ही अन्‍य दर्जनों अफसर। वरना सिविल सेवा के परिणामों पर जनता यही कहेगी कि ’चार दिन की चांदनी, फिर अंधेरी रात।

(समयांतर, जून 2016 से साभार)

भारतीय शि‍क्षा सेवा-सुब्रमण्यम समि‍ति‍ की सिफारि‍शें : प्रेमपाल शर्मा

प्रेमपाल शर्मा

प्रेमपाल शर्मा

शि‍क्षा में सुधार के लि‍ए सुब्रमण्यम समि‍ति‍ की दो सि‍फारि‍शें गौर करने लायक हैं। पहली- विश्वविद्यालयी शिक्षकों के लिए एक अखिल भारतीय शिक्षा सेवा का गठन, जिसकी नियुक्तियां संघ लोक सेवा आयोग करे। दूसरी- आठवीं तक फेल न करने की नीति‍ को बदला जाए। सुब्रमण्यम समि‍ति‍ की सि‍फारि‍शों और उनके दूरगामी परि‍णामों पर प्रेमपाल शर्मा का आलेख-

मोदी सरकार द्वारा गठित पांच सदस्‍यीय सुब्रमण्‍यम समिति ने अपनी लगभग दौ सौ पृष्‍ठों की रिपोर्ट मानव संसाधन विकास मंत्रालय को सोंप दी है। कुल मोटा-मोटी तैंतीस विषयों पर समिति को विचार करना था और इस समिति के अध्‍यक्ष थे- पूर्व कैबिनेट सचिव टी.एस.आर.सुब्रमण्‍यम, जो प्रशासनिक दक्षता के साथ-साथ अपने प्रखर विचारों, लेखों और सामाजिक सक्रियता के लिए भी जाने जाते हैं। उम्मीद के मुताबिक समिति ने कुछ महत्वपूर्ण सिफारिशें की हैं, जिनमें एक सिफारिश अभूतपूर्व ही कही जाएगी। यह है-विश्वविद्यालयी शिक्षकों के लिए एक अखिल भारतीय शिक्षा सेवा का गठन, जिसकी नियुक्तियां भी संघ लोक सेवा आयोग द्वारा सिविल सेवा परीक्षा की तर्ज पर हों। विश्‍वविद्यालयी शिक्षा सुधार के लिए यह बहुत जरूरी और दूरगामी कदम होगा। यों शिक्षा समवर्ती सूची में है, लेकिन विश्‍वविद्यालयों के निरंतर गिरते स्‍तर को रोकने के लिए यह तुरंत किया जाना चाहिए। विश्‍वविद्यालयों में शिक्षकों की भर्ती में राजनीति, भाई-भतीजावाद, जातिवाद और पिछले दिनों अन्‍य भ्रष्‍टाचार का ऐसा बोलबाला हुआ है कि पंसारी कि दुकान कि नौकरी और विश्‍ववि‍द्यालय कि नौकरी मे अंतर नहीं बचा। रोज-रोज बदलती नेट परीक्षा, पी.एच.डी में उम्र के मापदंडों ने पूरी पीढ़ी का विश्‍वास खो दिया है। फल-फूल रहें हैं, तो राजनीतिक शोधपत्र लाइनों पर खड़े शिक्षक संगठन और उनके नेता। नतीजन बावजूद इसके कि इनके वेतनमान, पदोन्‍नति और अन्‍य सुविधाएं अखिल भारतीय केन्‍द्रीय सेवाओं के समकक्ष है, न इनकी रूचि पढ़ाने में है न शोध में। सिफारिश, भ्रष्‍टाचार के जिस पिछले दरवाजों से इनकी भर्ती हुई है, पूरी उम्र ये शिक्षक और इनके संगठन उन्‍हीं के इशारों पर नाचते रहते हैं। इसीलिए न शोध का स्‍तर बचा है न अकादमिक माहौल का। यही कारण है कि प्रतिवर्ष अमेरिका, आस्‍ट्रेलिया से लेकर पूरे यूरोप में पढ़ने के लि‍ए भारतीयों की संख्‍या लगातार बढ़ रही है। एक तरफ विदेशी मुद्रा का नुकसान, देश से प्रतिभा पलायन और दूसरा अपने संसाधनों का बेकार होते जाना- बेरोजगारी का बढ़़ना। क्‍या हमारे विश्‍वविद्यालयों  को उस पैमाने पर विश्‍वविद्यालय कहा जा सकता है, जहां कुछ संख्‍या विदेशी छात्रों की हो या मेधावी विदेशी विश्‍वविद्यालय के प्रोफेसरों, शिक्षकों की? उत्‍तर भारत में तो स्थिति यह है कि दक्षिण भारत का भी शायद ही कोई छात्र मिले। केन्‍द्रीय विश्‍वविद्यालयों में जरूर उम्‍मीद बची है, लेकिन पतन वहां भी तेजी से जारी है। अखिल भारतीय सेवा का गठन भर्ती की बुनियादी कमजोरी को दूर करेगा। कम-से-कम यू.पी.एस.सी. जैसी संस्‍था की वस्‍तुस्थिकता, ईमानदारी, प्रगतिशील रूख पर पूरे देश को फख्र है। उम्‍मीद की जानी चाहिए कि मोदी सरकार ऐसी ही भर्ती प्रणाली न्‍यायिक सेवा में भी लाएगी। यही कदम सिद्द करेंगे कि क्‍यों यह पूववर्ती सरकारों से भिन्‍न है।

दूसरी महत्‍वपूर्ण मगर उतनी ही विवादास्‍पद सिफारिश आठवीं तक बच्‍चों को फेल-पास न करने की नीति को उलटना और बदलना है। शिक्षा अधिकार अधिनियम में यह व्‍यवस्‍था की गई कि किसी भी बच्‍चे को आठवीं तक फेल नहीं किया जाएगा। उदेश्‍य यह था कि‍ जो बच्‍चे जल्दी स्‍कूल छोड़ देते हैं, उनको एक स्‍तर तक पढा़ई के लिए स्‍कूल में रोका जा सके। मगर कार्यान्‍वयन की खामियों की वजह से स्‍कूली शिक्षा की गुणवत्‍ता में भयंकर गिरावट आई है और इसलिए देश के अधिकांश राज्‍य इसके खिलाफ हैं। अठारह राज्‍यों में इसे हटाने का अनुरोध केन्‍द्र सरकार से किया है, जिनमें कर्नाटक, केरल, हरियाणा से लेकर दिल्‍ली जैसे राज्‍य भी शामिल हैं। शिक्षा का अधिकार कानून केन्‍द्र सरकार का बनाया हुआ है। अत: वही इसमें राज्‍यों के सुझावों और अब सुब्रमण्‍यम समीति‍ की सिफारिशों के मद्देनज़र परिवर्तन कर सकती है। किसी भी तर्क से केवल स्‍कूल में रोकना ही शिक्षा का मकसद नहीं हो सकता। बच्‍चे को कुछ ज्ञान, जानकारी, लिखना-पढ़ना भी आना चाहिए।

एन.सी.ई.आर.टी. और दूसरी संस्‍थाओं द्वारा समय-समय पर किए सर्वेक्षणों, अध्‍ययनों में यह सामने आया है कि अकेली इस नीति ने शिक्षा का नुकसान ज्‍यादा किया है। हाल के परिणाम भी इसके गवाह हैं। दिल्‍ली के दो स्‍कूलों में कक्षा नौ में लगभग नब्‍बे प्रतिशत बच्‍चे फेल हो गए। कारण आठवीं तक कोई परीक्षा न होने की वजह से उन्‍होंने कुछ सीखने की जहमत ही नहीं उठाई। अधिकांश मामलों में तो वे स्‍कूल भी नहीं आते। सुब्रमण्‍यम समिति ने पांचवी कक्षा के बाद परीक्षा की अनुशंसा की है और यह भी कि फेल होने वाले छात्र को तीन मौके दिए जाएं और स्‍कूल ऐसे कमजोर बच्‍चों को पढ़ाने के लिए अतिरिक्‍त व्‍यवस्‍था, सुविधाएं जुटाएं। केवल स्‍कूल प्रशासन ने ही नहीं अभिभावकों ने भी इन सिफारिशों का स्‍वागत किया है। पुरानी नीति में थोड़ा सा बदलाव भी तस्‍वीर बदल देगा।

समिति की कुछ और सिफारिशें पुरानी बातों की पुनरावृत्ति माना जा सकता है। जैसे- विश्‍वविद्यालय अनुदान आयोग, ए.आई.सी.टी.ई का पुनर्गठन जिससे ये संस्‍थाएं और प्रभावी बनाई जा सकें। देश में विदेशी विश्‍वविद्यालयों  को अनुमति भी पुरानी सरकार देना चाहती रही है। देखना यह है कि इन मसलों पर जमीन पर राष्‍ट्रीय हित में परिवर्तन संभव होगा। तीन भाषा फार्मूले पर भी समिति उसी पुरानी नीति पर चलने के लिए कह रही है, जो वर्ष 1968 और वर्ष 1986 की शिक्षा नीति में शामिल था।

भाषा के मसले पर इस समिति से पूरे देश को ज्‍यादा उम्‍मीदें थी और नई मोदी सरकार ने सिविल सेवा परीक्षा में भारतीय भाषाओं के पक्ष के संदर्भ में इसे लागू भी किया था। वर्ष 2011 में यूपीए सरकार ने मनमाने ढंग से सिविल सेवा परीक्षा के प्रथम चरण में अंग्रेजी लाद दी थी, जिससे भारतीय भाषा में सफल उम्‍मीदवारों की संख्‍या पन्‍द्रह प्रतिशत से घटकर पांच प्रतिशत से भी कम हो गयी थी। मोदी सरकार ने वर्ष 2014 में इसे उलट दिया था। यों एक और समिति वी.एस. पासवान पूर्व सचिव की अध्‍यक्षता में संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं का जायजा ले रही है और उम्‍मीद है कि यह समिति दूसरी अखिल भारतीय सेवाओं जैसे- वन सेवा, चिकित्‍सा, इंजीनियरिंग आदि में भी भारतीय भाषाओं की शुरुआत करेगी। लेकिन सुब्रमण्‍यम समिति जैसी सर्वोच्‍च स्‍कूली और विश्‍वविद्यालयी दोनों स्‍तरों पर शिक्षा अपनी भाषाओं में देने की सिफारिश करती तो अच्‍छा रहता। सुब्रमण्‍यम उत्‍तर प्रदेश कैडर के अधिकारी रहे हैं, तमिलभाषी हैं और अपनी ताजा किताब ‘टर्निंग पांइट’ में अपने बचपन को याद करते हुए उन्‍होंने भारतीय भाषाओं में शिक्षा देने की तारीफ और वकालत की है। विद्वानों की इतनी बडी़ समिति से ऐसे राष्‍ट्रीय मुद्दे पर तो देश को उम्‍मीद रहती ही है। इलाहाबाद हाई कोर्ट के सरकारी स्‍कूलों में सुधार (अगस्‍त, 2015) कर्मचारियों को पढ़ाने की अनिवार्यता पर भी समिति और सरकार को दखल देना चाहिए।

समिति की सिफारिशें मानव संसाधन मंत्रालय के पास हैं। उम्‍मीद है समिति की सिफारिशों और जनाकाक्षाओं को मूर्तरूप देने में मंत्रालय विलंब नहीं करेगा। न बार-बार ऐसी समितियां ऐसे क्रांतिकारी सुझाव देती न तुरंत कार्यान्‍वयन करने वाली सरकारें ही सत्‍ता में आतीं। यथास्थितिवाद को ऐसे ही कदम तोड़ेगे।

आरक्षण : खत्म नहीं, समीक्षा हो : प्रेमपाल शर्मा

prempal sharma

कथाकार और शि‍क्षावि‍द प्रेमपाल शर्मा ने आरक्षण की समीक्षा की आवश्‍यकता पर जोर दि‍या हुआ लेख इसी वर्ष फरवरी में लि‍खा था। इसमें उठाए गए सभी मुद्दे गौरतलब हैं-

आरक्षण की आग में वर्ष 2015 के अंतिम दिनों में गुजरात (पटेल समुदाय) सुलग रहा था, जनवरी 2016 में आंध्रप्रदेश (कपू समुदाय) और फ़रवरी में हरि‍याणा-राजस्थान में गुर्जरों की मांग और हिंसा से हम सब वाकिफ हैं। पटेल, जाट जैसे  सवर्ण ओबीसी दर्जा चाहते हैं, तो गुर्जर मीणाओं की तर्ज पर अनुसूचित का। मंडल आयोग के बाद यह होड़ और तेज हुई है। आर्थिक, सामाजिक कारण हैं, तो राजनीतिक और भी ज्यादा। ये सभी समुदाय किसानी के पेशे से हैं, जो निरंतर घाटे का सौदा साबित हो रहा है, इसलिए युवा मरने–मारने पर उतारू हैं। सैंकडों जाने अभी तक जा चुकी हैं। जाहिर है कि‍ नेता तो ऐसे मसलों पर सिर्फ रोटियां सेकना चाहते हैं, लेकिन प्रगतिशीलता, संवेदना, जनपक्षधरता का दावा करने वाले पत्रकार, लेखक, बुद्धिजीवी चुप क्यों हैं? क्या ऐसी चुप्पी अपराध नहीं है? एक बार मुकम्मिल समीक्षा कर समाधान क्यों नहीं खोजा जाता?

प्रस्तावना –     आरक्षण खत्‍म नहीं होना चाहिए, इसकी पूरी प्रक्रिया, पद्धति, कार्यान्‍वयन की समीक्षा हो। यदि जरूरत हो तो बढ़ाएं और समयबद्ध कार्यक्रम के तहत पूरा करें। इसकी सियासत पर तुरंत रोक लगे।

  1. जब तक कोई समाज असमानता की इतनी परतों– जातिगत, क्षेत्र, धर्म, नस्‍ल, नियम, विश्‍वास, अंधविश्‍वास, लैंगिक आदि में जकड़ा हो, इनसे मुक्ति की तलाश और प्रयास में कुछ कदम सत्‍ता या शासन को उठाने ही होंगे । उसे चाहे आरक्षण का नाम दें या सकारात्‍मक (Affirmative) कदम का। यह पूरे समाज, राष्‍ट्र की सुख, शांति और विकास के लिए जरूरी है। मिड डे खाना, आंगनबाड़ी स्कूल, अस्पताल से लेकर हर सार्वजनिक स्थलों पर रोज दलितों के साथ भेदभाव और अत्याचार की ख़बरें आती हैं। आरक्षण का विरोध करने वालों का फर्ज है कि पहले इन बुराइयों, भेदभावों के खिलाफ सामने आएं। आरक्षण की जड़ यह असमानता और भेदभाव है।
  2. लेकिन कोई भी कदम, उपचार, नीति उसी रूप में सदा के लिए कारगर नहीं हो सकती। बिल्‍कुल दवा की तरह। उसे बराबर जॉंचने की जरूरत है कि क्‍या उपचार ठीक भी हो रहा है। कहीं उल्‍टा असर तो नहीं हो रहा है। यहां तक कि अच्‍छे प्रगतिशील धर्मों के लिए भी यही सिद्धांत लागू होता है। हिन्‍दी के विद्धान, मनीषी हजारी प्रसाद द्विवेदी का कथन यहां महत्‍वपूर्ण है– ‘जो धर्म परम्‍पराएं वक्‍त के साथ नहीं बदलतीं, जिन पर पुनर्विचार नहीं किया जाता, वे उस धर्म को भी नष्‍ट कर देती हैं।’ विज्ञान का नाम ही बार-बार अपने को जांचने, परखने, परीक्षण और प्रश्‍न करने का है। इसीलिए जिस वैज्ञानिक युग में हम जी रहे हैं या भारत आगे बढ़ रहा है, वहां हर कार्य के लिए यही वैज्ञानिक विधि अपनाने की जरूरत है। अत: पिछली सदी में शुरू किए आरक्षण के कदम, कसौटियों को नए सिरे से इन्‍हीं समाजशास्‍त्रीय वैज्ञानिक पद्धतियों पर कसा, परखा जाना चाहिए, बल्कि यह मांग की जानी चाहिए कि जब अन्‍य संस्‍थाओं की समीक्षा की गई है तो इस मुद्दे पर सरकारें क्‍यों बचती रही हैं? समीक्षा शब्‍द से ही बेचैनी क्‍यों ?
  1. सामाजिक समानता के रास्‍ते आर्थिक और फिर राजनीतिक बराबरी के लिए लगभग सौ वर्ष पहले आरक्षण की जो शुरुआत मुख्‍यत: दक्षिण और महाराष्‍ट्र में फूले, साहूजी महाराज आदि ने की और सामाजिक बराबरी के मसीहा बाबा साहेब अम्‍बेडकर ने जिसके लिए अपना पूरा जीवन लगा दिया, उसमें इसे उम्‍मीद के मुताबिक सफलता क्‍यों नहीं मिली? समाज के दबे-कुचले, पिछड़े, साधनहीन वर्गों के लिए गांधी, नेहरू, पटेल की सद्इच्‍छाओं के के बावजूद क्‍यों इन्‍हीं कार्यों में से काशीराम, मायावती या दूसरे राजनेताओं को आगे आना पड़ा है ? आधी शताब्‍दी कम नहीं होती। और इस दौर में शासन भी मोटा-मोटी एक ही पार्टी का रहा। क्‍या नीतियों में कमी रही या शासन की नीयत में? या समाज में गैर बराबरी की संरक्षक सामंती, धार्मिक शक्तियों इतनी मजबूत रहीं कि बराबरी का स्‍वप्‍न अभी भी उतना ही दूर है। या यह गैर बराबरी अब धर्म जाति की अपनी-अपनी सत्‍ता, अस्मिता को कायम रखते हुए जाति विशेष के अंदर भी एक कैंसर की तरह चारों ओर फैल रही है?
  1. क्‍या इन कट्टर बहसों के धुरंदरों में आरक्षण शब्‍द भी एक ऐसे धर्म का यर्थाथ नहीं होता जा रहा कि अपने-अपने भगवानों, पैगम्‍बरों ने जो कह दिया, कर दिया उस पर बहस करना गुनाह होगा, जो बोले उसे फांसी पर लटका दो। क्‍या हर महत्‍वपूर्ण मुद्दे को ‘होली काऊ’ बनाना या घोषित करने से किसी का भी भला होने वाला है? क्‍या संविधान की आस्‍था इसकी इजाजत देती है? क्‍यों यह मूल अधिकार, नीति निर्देशक तत्‍व और संविधान के संशोधन, समीक्षा और प्रगतिशील चेतना के खिलाफ नहीं है?
  1. समीक्षा, संशोधन के चंद उदाहरण– संघ लोक सेवा आयोग द्वारा भारतीय नौकरीशाही के उच्‍च पदों के लिए की जाने वाली भर्ती प्रक्रिया की कई बार समीक्षा की गई है। इसमें सबसे प्रमुख है वर्ष 1974 में गठित कोठारी समिति, जिसने वर्ष 1976 में अपनी रिपोर्ट दी और संसद में बहस के बाद वर्ष 1979 की सिविल सेवा परीक्षा से उसे लागू किया गया। इसकी क्रांतिकारी सिफारिश थी, अपनी मातृभाषाओं में उत्‍तर लिखने की छूट। अंग्रेजी का एकाधिकार समाप्‍त। वाकई करिश्‍माई था यह कदम। परीक्षा में बैठने वाले उम्‍मीदवारों की संख्‍या एक साथ दस गुना बढ़ गई और अपनी भाषा में पढ़े नौजवान पहली बार अंग्रेजी के दुर्ग में प्रवेश कर सके।

क्‍या इस समीक्षा से फायदा पूरे देश को नहीं हुआ ?

क्‍या यह लोकतंत्र के हित में नहीं हुआ ?

ठीक दस बरस बाद वर्ष 1989 में फिर प्रोफेसर सतीश चंद की अध्‍यक्षता में एक समिति बनी, यह जांचने के लिए कि क्‍या कोठारी समिति की सिफारिशें ठीक हैं? उनका कार्यान्‍वयन ठीक है ? ठीक दस बरस बाद 1999 में प्रोफेसर योगेन्‍द्र कुमार अलघ की अध्‍यक्षता में समि‍ति‍, फिर समीक्षा की गई। नई सरकार ने हाल ही में सीसैट विवाद आदि के चलते फिर एक समिति गठित की है।

क्‍या ऐसी समीक्षा लोकतंत्र के खिलाफ है? नहीं। बल्कि उस कहावत को सार्थक करती है– ‘चलता पानी निर्मला’ यानी जिस नदी का पानी चलता रहता है, वह निर्मल, शुद्ध बना रहता है, ठहरा हुआ पानी सड़ जाता है।

आरक्षण को इसलिए राष्‍ट्रहित में ऐसे तालाब में बदलने से बचाने की जरूरत है, जिसमें राजनेता और समाज के स्‍वार्थी तत्‍व सिर्फ सत्‍ता की मछलियों की खातिर बदबू  फैला रहे  हैं। शिक्षा के मसले पर भी बार-बार समीक्षा हुई है । 1948 में राधाकृष्‍णन आयोग, 1964 में कोठारी आयोग आदि‍। इसके अलावा, डाक्‍टर जाकिर हुसैन, प्रोफेसर यशपाल समिति ने भी बहुमूल्‍य सुझाव दिए हैं। एनसीईआरटी के पाठ्यक्रम में बदलाव बार-बार के विवाद के बावजूद एक जीवित लोकतंत्र का उदाहरण हैं।

राज्‍यों के पुनगर्ठन, भाषा आदि के पक्षों पर भी समीक्षा की गई है। प्रशासनिक आयोग का गठन, ज्ञान आयोग भी इसी वैज्ञानिक दृष्टि की कड़ी है।

आजादी के बाद का सबसे चमकीला उदाहरण है, सूचना का अधिकार। क्‍या अंग्रेजों के जमाने में लागू सरकारी गोपनीय नियम (Official secret Act 1923)  से देश चल सकता है ? लाल फीताशाही, भ्रष्‍ट्राचार से लड़ने के खिलाफ सूचना का अधिकार सबसे प्रभावी हथियार शामिल हुआ है। कुछ विद्धानों के अनुसार संसद से भी बेहतर।

क्‍या ‘आरक्षण की बहस’ को भी संसद से मुक्‍त नहीं किया जाना चाहिए ? क्‍या देश में बुद्धिजीवी, पत्रकार, संपादक, समाज विज्ञानी, शिक्षाविद, वैज्ञानिकों की टीम  ऐसी समीक्षा, बहस नहीं कर सकती?

  1. समाज में जातिवाद विशेषकर ग्रामीण भारत में मद्देनजर आरक्षण की जरूरत अभी भी बनी हुई है। सही शिक्षा का अभाव, धार्मिक अंधविश्‍वास और वर्ण, धर्म की जकड़बंदी अभी अपनी अमानवीयता को नहीं छोड़ सकी। मनुष्‍य-मनुष्‍य के बीच भेद का ऐसा कलंक दुनिया कि किसी भी सभ्‍यता में न है, न सोचा जा सकता। दुर्भाग्‍य यह कि ऐसा भयानक कलंक शताब्दियों तक न केवल टिका रहा, बल्कि और क्रूर होता गया। आजादी के बाद या कहें ब्रिटिश काल के अच्‍छे मानवीय पक्षों के सम्‍पर्क में ‘जाति प्रथा’ पर जोरदार हमला हुआ है, लेकिन यह राक्षस अभी मरा नहीं है। लेकिन क्‍यों ? यदि एक दवा कारगर नहीं हो तो दूसरी आजमायी जाए और यहीं इसे जारी रखने और समीक्षा की जरूरत है। क्‍यों निर्धारित कोटा पूरा नहीं हो पाया ? क्‍यों समान शिक्षा या अंतिम आदमी तक शिक्षा, स्‍वास्‍थ्‍य पहुंचाने की बजाय पूरी नीतियों ‘क्रीमीलेयर’ बनाने में तब्‍दील हो गई? मुकम्मिल समीक्षा हो, देशव्‍यापी बहस हो और फिर कदम उठाए जाएं।
  1.  समीक्षा के लिए कुछ और जीवंत उदाहरण–

(क): दो वर्ष पहले भारतीय विदेश सेवा की अमेरिका में तैनात एक महिला खाबरगड़े चर्चा में आई थीं । कारण उनकी नौकरानी ने उन पर अत्‍याचार के आरोप लगाए थे । मामला गंभीर था, अमेरिका के कानूनों के अनुसार। लेकिन भारत में महिला अधिकारी के पक्ष में जो आवाजें उठीं, वे उनकी जाति समर्थक ज्‍यादा थीं। तभी पता चला कि अत्‍याचारी दलित है और नौकरानी ईसाई। खैर यह पक्ष अलग बहस की मांग करता है, लेकिन आरक्षण की समीक्षा के संदर्भ महत्‍वपूर्ण बात यह है कि श्रीमती खाबरगड़े के पिता भी आई.एस.एस. सेवा में थे और दलित आरक्षण ले चुके हैं। उनकी बेटी भी उसी का फायदा लेकर विदेश सेवा में है। इनके बच्‍चे जो अमेरिका में पढ़ रहे है, वे भी मौजूदा कानून के अनुसार दलित आरक्षण के हकदार हैं।

क्‍या वाकई इनके बच्‍चों को आरक्षण मिलना चाहिए?

अमेरिका, इंग्‍लैंड में रहते, पढ़ते ये कौन सी अस्‍पृश्‍यता, सामाजिक भेदभाव के शिकार हुए ?

आजादी के बाद दलितों की वो तीसरी-चौथी पीढ़ी, जिसके पिता, दादा उच्‍च सरकारी सेवाओं, विश्‍वविद्यालयों में रहे हैं, महानगरों में जिनका जीवन सबसे पॉश कालोनियों में बीता है, क्‍या वे इस सामाजिक रियायत के हकदार हैं ? मौजूदा वक्‍त में ऐसे हजारों सरकारी अधिकारी हैं, जिनके बच्‍चों ने गॉंव देखा तक नहीं है, वे पढ़ने के लिये इंग्‍लैंड, अमेरिका में रहे हैं, लेकिन भारत में कदम रखते ही उन्‍हें आरक्षण का सहारा चाहिए।

क्‍या यह समता, बराबरी के सिद्धान्‍त के वैसे ही खिलाफ नहीं है, जैसे सवर्णों को मिली जन्मजात विशेषाधिकार ?

क्‍या खुर्जा के किसी गॉंव में मजदूर, मोची का लड़का दलितों में ऐसे सवर्णों के रहते कभी आरक्षण का फायदा उठा पाएगा ?

यदि जरूरत हो तो आरक्षण का प्रतिशत और बढ़ाया जाए, लेकिन समृद्ध (क्रीमी लेयर) को इससे तुरंत बाहर करने की जरूरत है। इन्‍द्रा साहनी के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने क्रीमीलेयर के सिद्धान्‍त को एससीएसटी कोटा पर भी लागू करने का सुझाव दि‍या था। ओ.बी.सी. के लिए यह सिद्धांत कुछ कर्मियों के बावजूद लागू हो गया, राजनीतिक दबाव, लोकतंत्र की दुहाई देते हुए इस जरूरी समानता के खिलाफ दलितों का एक वर्ग आज तक डटे हुए है। आरक्षण के नाम पर सामाजिक असंतोष की जड़ें यही हैं। चार बरस पहले राजस्‍थान के गुर्जरों का भी यही दर्द था। पूरा देश जानता है कि राजस्‍थान के मीणाओं ने आदिवासियों के लिए आरक्षित कोटा कैसे हड़प लिया है। जो कोटा बस्‍तर, नागालैंड, लद्दाख, भील, झारखंड के सचमुच आदिवासियों और उनकी संस्‍कृति, पिछड़ेपन को ध्‍यान में रखकर नियत किया गया था, पचास के दशक में दबाव की राजनीति के तहत मीणा एस.टी. समूह में शामिल हो गए, क्‍योंकि वे अपेक्षाकृत समृद्ध हैं, तीन-चार पीढ़ी से प्रशासन में हैं अत: दौड़ में आगे भी। उसी क्षेत्र में रहने वाले गुर्जर इसी से आहत हैं कि वे भी दबाव बनाकर क्‍यों नहीं  आदिवासी के फायदे के हकदार बनें? नतीजा- हिंसा, आंदोलन, रेल रोको, सड़क तोड़ो। फिर जाट भी इसी दौड़ में शामिल हुए। और ताजा मामला गुजरात के पटेलों का है, जिसे बिहार के नीतिश, लालू ने भी तुरंत समर्थन दिया है। कभी पटेलों की मांग के खिलाफ बोलने वाली कांग्रेस पीछे से पटेलों की मांग को हवा दे रही है। भारतीय जनता पार्टी का रवैय्या भी मंडल आयोग से लेकर जाट आरक्षण तक ऐसा ही रहा है।

इस राजनीतिक, सामाजिक विकृति को एक बड़े समीक्षा आयोग से ही हल किया जा सकता है।

  1. यू.पी.एस.सी. के ताजा परिणाम– भारत की उच्‍च नौकरशाही के लिए आयोजित सिविल सेवा परीक्षा के परिणाम भी आरक्षण समीक्षा की तुरंत मांग करते हैं। पिछले दो दशकों में गॉंव, देहात पिछड़े क्षेत्रों से आने वाले उम्‍मीदवार लगातार कम हो रहे हैं। वे चाहे दलित हों या सवर्ण । वर्ष 1979 में जब कोठारी समिति ने अपनी भाषा में परीक्षा देने की इजाजत दी थी, तो पहली पीढ़ी के पढ़े, लिखे, गॉंवों में रहने वाले मोची, बढ़ई, कुम्‍हार, जाटव, मजदूरों के बच्‍चे सफल हुए थे। अब वे पूरी तरह गायब हैं । उनका कोटा वे हड़प रहे हैं, जो शहरों में है, जिनके पिता अफसर हैं जो दिल्‍ली के चाणक्‍यपुरी और शाहजहां रोड में रहते हैं और जिनका माध्‍यम अंग्रेजी है। मौजूदा स्थिति के क्रीमीलेयर अपने ही दलित भाइयों का हक मार रहा है। भाषा, आर्थिक स्थिति के सभी आंकड़े इस बात के गवाह हैं कि ओ.बी.सी. की तरह क्रीमीलेयर एस.सी.एस.टी. कोटा में भी लागू होनी चाहिए और सख्‍ती से।
  2. कुछ बातें क्रीमीलेयर के बारे में– मंडल कमीशन के निर्णय में क्रीमी लेयर शामिल हुआ था और बहुत अच्‍छी मंशाओं के साथ। लेकिन यहां भी राजनीति हु। समानता के सिद्धान्‍त पर इसे भी एस.सी.एस.टी. पर लागू किया जाना चाहिए था। ओ.बी.सी. पर लागू भी हुआ है, तो हास्‍यास्पद ढंग से। जिस देश की सरकारें और योजना आयोग वी.पी.एल के मामले में प्रतिदिन प्रति व्‍यक्ति छब्‍बीस रूपये की आय जीने के लिए पर्याप्‍त मानती हों, वहीं क्रीमीलेयर को तब मानती है, जब प्रतिदिन दो-तीन हजार से ज्‍यादा आय हो। क्‍या प्रति व्‍यक्ति आय और क्रीमीलेयर निर्धारण में कोई वैज्ञानिक दृष्टि अपनायी जाती है या जैसे सवर्ण अपने लिए कोई न कोई जुगाड़ ढूंढ लेते हैं, वैसे ही लोग इन वर्गों में आरक्षण के नाम पर पैदा हो गए हैं। वाकई अमीरों से गरीब नहीं जीत सकते। वे चाहे किसी भी जाति, धर्म के हों– भारतीय परिवेश में ।
  1. जे.एन.यू. का अनुभव इस समीक्षा में मदद कर सकता है और यह है भी उतना है वैज्ञानिक। इसमें जाति का महत्‍व तो है, लेकिन उतना ही वंचित सुविधाओं (Deprivations) का है। जैसे इसके मुख्‍य घटक हैं– जहॉं पैदा हुए, बचपन बीता, आरंभिक शिक्षा हुई ? शिक्षा का माध्‍यम, आर्थिक स्थिति, लड़का या लड़की, पिता का व्‍यवसाय, कॉलेज शिक्षा, जाति आदि। इस फामूले में एक दलित जो बांदा या उड़ीसा, केरल के गॉंव में पला बड़ा है, उसे दिल्‍ली में चाणक्‍यपुरी में पले-बढ़े से पहले रखा जाएगा। सिर्फ जाति के प्रमाण-पत्र से काम नहीं चलेगा।
  1. पिछड़ा आयोग के सदस्‍य रहे और जाने-माने समाजशास्‍त्री धीरूभाई सेठ की टिप्‍पणी भी यहॉं विचारणीय है– ‘आयोग का मेरा अनुभव मुझे बताता है कि जाति प्रथा का असर मंद करने के लिए जो ताकतें और प्रक्रियाऍं खड़ी हुई थीं, वे अब खुद जाति प्रथा की अनुकृति बनती जा रही हैं। प्रगति के कई सोपान चढ़ चुकी पिछड़ी जातियों का एक बड़ा और मजबूत निहित स्‍वार्थ बन चुका है। वे अपने से नीची जातियों के साथ वही सुलूक कर रहे हैं, जो कभी द्विजों ने उनके साथ किया था। मैं आयोग की पहली टीम का सदस्‍य था। कुल मिला कर स्थिति यह बनी है कि आयोग के सदस्‍य, उससे जुड़ी नौकरशाही और पूरा का पूरा क्षेत्र ही इसी जबरदस्‍त निहित स्‍वार्थ की नुमाइंदगी करता नजर आता है। ये लोग मिलकर पूरी कोशिश में रहते हैं कि किसी भी तरह से पिछड़ी जातियों को अत्‍यधिक पिछड़े और कम पिछड़े में वर्गीकृत न होने दिया जाए। जब मैं आयोग में था, उस समय भी प्रभुत्‍वशाली पिछड़ी जातियों द्वारा ऐसे किसी भी कदम के खिलाफ प्रतिरोध होता था।

आयोग की पहली टीम का ज्‍यादातर वक्‍त तो मंडल आयोग द्वारा बनाई सूची को तर्कसंगत बनाने में खर्च हो गया, क्‍योंकि‍ सूची में बड़ी खामियॉं थीं। अब स्थिति यह है कि मजबूत पिछड़ी जातियों के हितसाधक आरक्षण के फायदे निचली ओ.बी.सी. जातियों तक नहीं पहुंचने दे रहे हैं। खासतौर से दक्षिण के ओ.बी.सी. जिन्‍हें सबसे पहले आरक्षण मिल गया था। इन तगड़ी ओ.बी.सी. जातियों को सत्‍ता भी मिल गई है। वे आरक्षण के फायदे अपने हाथ से नहीं निकलने देना चाहते। जो समुदाय पिछड़े नहीं रह गए हैं, उनकी शिनाख्‍त नहीं की जा रही है, और न की जाएगी ।

इंद्रा साहनी वाले फैसले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए निर्देशों के विरोध में जाता है यह रवैया । लोकतांत्रिक संस्‍थाओं की एक समस्‍या होती है कि एक सीमा के बाद नौकरशाही और राजनीतिक हित मिल कर उन्‍हें आपस में तोड़कर हितों के औजार में बदल देते हैं । यह हमारे लोकतांत्रिक निज़ाम के पिछड़ेपन का चिह्न है । (‍पृष्‍ठ, 102, 103 और 105) (‍पुस्‍तक : सत्‍ता और समाज- संपादन- अभय कुमार दुबे)

पिछड़ों के लिए आरक्षण की पूरी बहस पर इससे बेहतर टिप्‍पणी नहीं हो सकती। पुस्‍तक में ‘आरक्षण के पचास साल’ खंड के अंतर्गत चार उप शीर्षकों में इस मुद्दे पर विचार किया है । ये अध्‍याय हैं- धर्म, जाति निरपेक्ष नीति के विविध आयाम; आरक्षण विरोधियों के तर्कों की असलियत; आरक्षण नीति; एक पुन: संस्‍कार की आवश्‍यकता थी अति पिछड़ों और निजी क्षेत्र में आरक्षण का सवाल । धीरूभाई के शब्‍दों में- आरक्षण के जरिए प्रगति के अवसरों को हड़पने की इस होड़ ने हमारी लोकतांत्रिक चुनावी राजनीति को अलोकतांत्रिक रुझानों से ग्रस्‍त कर दिया है। इसके कारण झूठे-सच्‍चे आश्‍वासन दिए जाते हैं, और अंतत: समाज को तनावग्रस्‍त होना पड़ता है। बिरादरियों के बीच का भाई-चारा खत्‍म होता है। गुर्जरों को दिया गया आश्‍वासन तो एक उदाहरण है, मुसलमानों को धर्म आधारित आरक्षण देने के अध्‍यादेश तक जारी किए जा चुके हैं। हिंदू समाज की संरचना की जानकारी रखने वाला कोई भी प्रेक्षक जानता है कि प्रजापतियों (कुम्‍हारों) को समाज में अछूत या दलित नहीं माना जाता। लेकिन, पिछले दिनों उन्‍हें भी (उत्‍तर प्रदेश में प्रजापतियों को) अनुसूचित जाति का दर्जा देने का प्रयास किया जा चुका है। (पृष्‍ठ 244)’

संक्षेप में (आरक्षण नीति : एक पुन: संस्‍कार की आवश्‍यकता) धीरू भाई के निष्‍कर्ष हैं:-  इन्दिरा साहनी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि आरक्षण का अनुचित लाभ उठा रहे समुदायों की शिनाख्‍त की जाए और उन्‍हें इस लाभ से बाहर किया जाए। आरक्षण नीति का पुन: संस्‍कार करने के लिए आरक्षित समुदायों के बीच पूरे देश में न केवल राज्‍य स्‍तर पर, बल्कि राष्‍ट्रीय स्‍तर पर अनिवार्य तौर से श्रेणियां बनाना उचित होगा। मसलन, अनुसूचित जनजातियों में मीणा और जाटव जैसे समुदाय हैं, जो वाल्‍मीकियों और पासियों के मुकाबले बहुत आगे बढ़ चुके हैं। उपश्रेणियॉं बनाने से यह भी पता लग सकेगा कि आरक्षण का लाभ उठाने से वंचित रह गई जातियां कौन-कौन सी हैं और अत्‍यधिक कमजोर जातियों को आरक्षण का लाभ उठाने के काबिल बनाने के कौन-कौन से कार्यक्रम चलाए जा सकते हैं । अगर इन पहलुओं पर जोर नहीं दिया जाएगा तो पूरी बहस आरक्षण के प्रतिशत के आस-पास ही सिमट कर रह जाएगी। पिछड़े वर्गों में घुस आए अगड़े समुदायों और उनके बीच बन चुके जातिगत कोटिक्रम का स्‍वार्थ यही है। (पृष्‍ठ 246 और 247)

  1. एम्‍स, अलीगढ़ मुस्लिम विश्‍वविद्यालय सरीखे अल्‍पसंख्‍यक विश्‍वविद्यालय, शिक्षण संस्‍थान, विदेशी विश्‍वविद्यालयों में आरक्षण का सवाल जैसे सैंकड़ों ज्‍वलनशील बहसें हवा में जिन्‍दा हैं और कभी भी 1990 के मंडल आयोग की याद ताजा करा सकती हैं । कुछ वर्ष पहले एम्‍स में यह दोहराया जा चुका है। गुजरात में पटेल लामबंद हो रहे हैं । जाट और गुर्जर पहले से ही सड़कों पर हैं। वक्‍त का तकाजा है कि‍ धीरूभाई सेठ जैसे समाजशास्‍त्री, चिंतक, गैर पार्टी कार्यकर्ता की बातों पर ध्‍यान देकर सरकार ‘क्रीमीलेयर’ को बाहर करते हुए आरक्षण को और प्रभावी बनाए। देश हित के लिए भी और समाज के हित के लिए भी ।
  2. हाल ही में हुए एक महत्‍वपूर्ण अध्‍ययन कास्‍ट इन ए डिफरेंट माउल्‍ड (caste in a different mould; understanding the discrimination) लेखक : राजेश शुक्‍ला, सुनील जैन, प्रीति कक्‍कर बिजनेस स्‍टैंडर्ड का प्रकाशन 2010) में दिए गए तथ्‍य आंखें खोलने वाले हैं। संक्षेप में जहां उत्‍तर प्रदेश में एक दलित की औसत आय उनचालीस हजार रुपये प्रतिवर्ष है, वहीं पंजाब में तिरेसठ हजार है। बिहार में ओबीसी की औसत आय चालीस हजार है, जबकि महाराष्‍ट्र में चौहत्‍तर हजार। कर्नाटक में एक आदिवासी की औसत आय प्रतिवर्ष बासठ हजार रुपये हैं तो बिहार में सवर्ण जाति की भी सिर्फ इक्‍यावन हजार। इतना ही अंतर आदिवासी जनता के बीच है। एक अनपढ़ आदिवासी परिवार की औसत आय केवल साढ़े बाइस हजार प्रतिवर्ष है, जबकि आदिवासी ग्रेजुएट की पिचासी हजार। गांव के आदिवासी की औसत आय सैंतीस हजार रुपये है, तो शहरी का एक लाख से ज्‍यादा। यानी देश के अलग-अलग हिस्‍सों में सामाजिक, आर्थिक पिछड़ेपन की तस्‍वीर इतनी भिन्‍न है कि उसे सिर्फ जाति के नाम पर इकहरे मानदंड से व्‍याख्‍यायित नहीं किया जा सकता। इस पुस्‍तक के सभी आंकड़े धीरूभाई की स्‍थापनाओं को प्रमाणित करते हैं ।

दिल्‍ली के चाणक्‍यपुरी में रहने वाले दलित, आदिवासी किसी भी पैमाने से आरक्षण के हकदार नहीं हैं, बल्कि अपनी ही जाति के वंचितों की बाधा बन रहे हैं। आज यदि आरक्षण और अपनी भाषा के अप्रतिम योद्धा लोहिया होते तो धीरूभाई सेठ, राजेंद्र सच्‍चर, वीजी वर्गीज और दूसरे विद्वानों की तर्ज पर खुद अपने नारे और उसके सिद्धांत को बदल देते। वे पांच साल इंतजार के हक में भी नहीं थे ! 75 वर्ष के बाद तो आरक्षण की समीक्षा होनी ही चाहिए। ख़त्म करने का तो सवाल ही नहीं है।