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लम्बी लकीर खींच गया रवांई साहित्य महोत्सव : प्रवीन कुमार भट्ट


रवांई साहित्य महोत्सव में वि‍चार व्‍यक्‍त करते वक्‍ता।

देहरादून : यमुना और टोंस नदियों से लगा प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर रवांई क्षेत्र अपने प्राचीन इतिहास व विशिष्ट संस्कृति के लिए जाना जाता है। क्षेत्र की भवन निर्माण कला व काष्ठशिल्प भी बेजोड़ है। इतिहासकारों का मत है कि हिमांचल व उत्तराखंड की सीमा में बसे रवांई क्षेत्र में पाए गए अनेक प्राचीन मंदिर व अन्य निर्माण 1000 वर्ष से भी अधिक पुराने हैं। इससे ही इस क्षेत्र की प्राचीन संस्कृति का सहज अंदाजा हो जाता है। कृषि और बागवानी के क्षेत्र में भी रवांई का कोई सानी नहीं है। रवांई का लाल चावल अपनी खूबियों के लिए दूर-दूर तक पहचाना जाता है। यमुना-टोंस के अलावा कमल और ऐसी ही अनेक छोटी नदियां रवांई क्षेत्र को सरसब्ज रखने में अपना योगदान देती हैं।

उत्तराखंड के देहरादून और टिहरी जनपद की सीमाओं से लगे उत्तरकाशी जनपद का रवांई क्षेत्र कृषि, बागवानी, पशुपालन व स्वरोजगार के लिए जाना जाता है लेकिन इस क्षेत्र में साहित्यिक गतिविधियां नगण्य रही हैं। रवांई क्षेत्र की साहित्यिक शून्यता को भरने की पहल सामाजिक संस्था अर्श व देहरादून की प्रकाशन संस्था समय साक्ष्य द्वारा प्रारंभ की गई। दोनों संस्थाओं ने मिलकर 29-30 जुलाई 2017 को रवांई क्षेत्र के केन्द्रीय नगर पुरोला में रवांई साहित्य महोत्सव का आयोजन किया। टीएचडीसी सेवा, टोंस वन प्रभाग पुरोला व होटल क्लासिक हिल व्यू के सहयोग व रवांई साहित्य महोत्सव आयोजन समिति के संयोजन में आयोजित दो दिवसीय आयोजन में कुल दस सत्र आयोजित किए गए।

रवांई घाटी में पहली बार आयोजित साहित्य महोत्सव महानगरों में आयोजित हो रहे साहित्य महोत्सवों से उन्नीस नहीं रहा। इस आयोजन के सत्र इस प्रकार रखे गए कि साहित्य महोत्सव में साहित्यकार, राजनीतिज्ञ, सामाजिक कार्यकर्ता, पर्यावरणविद्, व्यवसायी, इतिहासकार व किसान सभी एक साथ मंच पर नजर आए। साहित्य महोत्सव में न सिर्फ हिन्दी साहित्य में पहाड़ जैसे आंचलिकता व स्थानीयता से जुड़े सत्र आयोजित किए गए जिसमें हिन्दी साहित्य के साथ पहाड़ के रिश्ते और उसकी मौजूदगी पर बात हुई, बल्कि यमुना टोंस घाटी के इतिहास, समाज और संस्कृति जैसे सत्र भी हुए। जहां श्रोताओं को यमुना-टोंस घाटी के इतिहास और प्राचीन संस्कृति के विषय में इतिहासकारों से तथ्यपरक जानकारी हासिल हुई। दो दिवसीय रवांई साहित्य महोत्सव 2017 में राज्यसभा सांसद प्रदीप टम्टा, लोकसंस्कृति के पुरोधा प्रो. डी.आर. पुरोहित, जमना लाल बजाज व इन्दिरा गांधी पुरस्कार प्राप्त गांधीवादी विचारक व सामाजिक कार्यकर्ता राधा बहन, उत्तराखंड के पूर्व कैबिनेट मंत्री मोहन सिंह रावत ‘गांववासी’,  राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त किसान युद्धवीर सिंह रावत, बाल मनोविज्ञान विशेषज्ञ खजान सिंह, भारत में सबसे अधिक छह बार माउन्ट एवरेस्ट फतह कर चुके पर्वतारोही लवराज सिंह धर्मशत्तू,  पुस्तकों की दुनिया के जानकार रमाकांत बेंजवाल, बाल प्रहरी के सम्पादक व बाल साहित्यकार उदय किरौला, डॉ राधेश्याम बिजल्वाण, डॉ विजय बहुगुणा जैसे विषय विशेषज्ञ मौजूद रहे।

पुरोला के प्रथम नागरिक नगर पंचायत अध्यक्ष प्यारे लाल हिमानी ने सभी साहित्यकारों व उपस्थित नागरिकों का स्वागत किया। आयोजन के पहले दिन ‘यमुना टोंस घाटी- इतिहास, समाज और संस्कृति, ‘हिमालय और हम’, हिन्दी साहित्य में पहाड़, ‘कवि और कविताएं’ (स्थानीय कवियों का कविता पाठ) जैसे रोचक सत्र आयोजित किए गए। पहले दिन सायं साहित्यकारों को पुरोला से मठगांव व धुनधार होते हुए साहित्यकार महावीर रवांल्टा के गांव महरगांव का भ्रमण कराया गया। महरगांव में महाबीर रवांल्टा की अगुवाई में ग्रामीणों ने साहित्यकारों का जोरदार स्वागत किया। इस अवसर पर ग्रामीणों द्वारा तांदी गीत व नृत्य आयोजन के साथ ही साहित्यकारों को पहाड़ी व्यंजन अरसे, पकौड़ी व लाडू खाने को दिए।

आयोजन के दूसरे दिन का पहला सत्र ‘यमुना टोंस घाटीः स्थानीय आर्थिकी और उसकी चुनौतियाँ’ विषय पर आयोजित किया गया। इसके अतिरिक्त आयोजन का दूसरा सत्र ‘मैं और पहाड़’ विषय पर पर हुआ। इस एकल सत्र को प्रसिद्ध पर्वतारोही लवराज सिंह धर्मशत्तू ने संबोधित किया। दूसरे दिन का तीसरा सत्र ‘पुस्तकें कुछ कहना चाहती हैं’ विषय पर आयोजित किया गया। इस सत्र को राजभवन देहरादून के पुस्तकलाध्यक्ष रमाकांत बेंजवाल ने संबोधित किया। बाल साहित्य और बच्चे सत्र को बालसाहित्य के पारखी उदय किरोला ने संबोधित किया। आयोजन के दूसरे दिन दो पुस्तकों का लोर्कापण भी किया गया। पहली पुस्तक महाबीर रवांल्टा की रवांल्टी कविताओं की पुस्तक ‘गैणी जण आमार सुईन’ तथा दूसरी पुस्तक डॉ. सत्यानन्द बडोनी की ‘बस! इथगि चैन्दू’ रही। आयोजन के दौरान सांस्कृतिक कार्यक्रमों की भी धूम रही। इन कार्यक्रमों में कलाकारों द्वारा रवांई घाटी की लोकसंस्कृति को प्रदर्शित किया गया। जीआईसी पुरोला, शिवालिक पब्लिक स्कूल के छात्रों द्वारा रवांई क्षेत्र के लोकगीतों में नृत्य प्रस्तुत किए गए। आयोजन के दूसरे दिन की शाम रवांई के प्रसिद्ध लोकगायक अनिल बेसारी के नाम रही। बेसारी और उनकी टीम ने स्थानीय लोकगीतों का ऐसा शमा बाँधा कि आयोजन स्थल के आसपास लोग छतों पर चढ़कर कार्यक्रम का आनंद उठाते रहे। इस अवसर पर देहरादून से साहित्यकार शूरवीर सिंह रावत, पत्रकार राजेन्द्र जोशी, मनोज इष्टवाल, दिनेश कंडवाल, सुरेन्द्र पुण्डीर व सुन्दर बिष्ट भी पहुंचे।

रवांई साहित्य महोत्सव में सांस्‍कृति‍क कार्यक्रम पेश करते कलाकार।

‘इतिहास समाज और संस्कृति’सत्र में बोलते हुए राज्यसभा सांसद प्रदीप टम्टा ने कहा कि रवांई का इतिहास समूचे पर्वतीय भूभाग से अलग है। अलग-अलग अवसरों पर हुई पुरातात्विक खुदाई से भी यह संकेत मिल चुके हैं। प्रो. डी.आर. पुरोहित ने बताया कि रवांई क्षेत्र के लोकगीत व लोकनृत्य अपनी अलग ही छाप छोड़ते हैं और यहां संस्कृति अभी अपने मूलरूप में बची हुई है। रवांई क्षेत्र के इतिहास से जुड़े डॉ. राधेश्याम बिजल्वाण ने रवांई की प्राचीन धाड़ा प्रथा के बारे में बताया, जबकि डॉ. प्रहलाद रावत ने रवांई के ऐतिहासिक स्थलों व मंदिरों के बारे में बताया। इसी प्रकार डॉ. बिजय बहुगुणा ने रवांई की बोली की प्राचीनता पर अपनी बात कही। इस सत्र का संचालन इतिहास के प्रवक्ता सुभाष उनियाल ने किया।

‘हिमालय और हम’सत्र में राधा बहन, मोहन सिंह रावत गांववासी व अशोक वर्मा बतौर वक्ता शामिल रहे। राधा बहन ने इशारा किया कि‍ कि‍स प्रकार भारी व अनियोजित निर्माणों के कारण हिमालयी क्षेत्र के पर्यावरण व पारिस्थितिकी को नुकसान पहुंच रहा है। उन्होंने कहा कि विकास और पर्यावरण में संतुलन भविष्य को सुरक्षित रखने की पहली शर्त है। पूर्व मंत्री मोहन सिंह रावत गांववासी ने रवांई क्षेत्र की गई अपनी यात्राओं के साथ ही हिमालय के महत्व और उपयोगिता पर प्रकाश डाला। उत्तराखंड ओबीसी आयोग के पूर्व अध्यक्ष अशोक वर्मा ने कहा कि पर्यावरण और पारिस्थितिकी के साथ संतुलन बनाते हुए विकास भी जरूरी है। उन्होंने हिमालय में संघर्षपूर्ण जीवन जी रहे लोगों के लिए बेहतर नीतियां बनाने की वकालत की। इस सत्र का संयोजन युवा साहित्यकार सुभाष तराण द्वारा किया गया।

‘कवि और कविता’ सत्र में स्थानीय कवियों महावीर रवांल्टा, अर्जुन सिंह नेगी, नीरज उत्तराखंडी, खिलानन्द बिजल्वाण, चन्द्रमोहन नौडियाल, प्रवीन तिवारी, सुभाष तराण, बलदेव सिंह भंडारी, बसंती असवाल व चन्द्रभूषण बिजल्वाण आदि ने कविता पाठ किया।

आयोजन के दूसरे दिन का पहला सत्र ‘यमुना-टोंस घाटीः स्थानीय आर्थिकी और उसकी चुनौतियां’ विषय पर आयोजित किया गया। इस सत्र को कृषि पंडित की उपाधि से नवाजे गए क्षेत्र के प्रगतिशील किसान युद्धवीर सिंह, युवा होटल व्यवसायी हरिमोहन सिंह नेगी, पर्यटन व्यवसायी चैन सिंह रावत, दिनेश भट्ट,  डॉ. आशा राम बिजल्वाण व युवा नेता अमेन्द्र बिष्ट ने संबोधित किया। युद्धवीर सिंह रावत ने बताया कि किस प्रकार यमुना टोंस घाटी में खेती करने के तौर-तरीकों में बदलाव आया और किसान व्यवसायिक खेती की ओर उन्मुख हुए। उन्होंने खेती किसानी के प्रति नई पीढ़ी की उदासीनता और सरकार के रवैये को भी सामने रखा। हरिमोहन सिंह नेगी ने कहा कि यमुना-टोंस घाटी में देश ही नहीं वरन् दुनिया के कुछ खूबसूरत स्थान हैं। यहां वर्ष भर बहने वाली सुंदर नदियां हैं। यहां चांइसील और हर की दून जैसे बुग्याल हैं। फिर भी यहां पर्यटन का वैसा विकास नहीं हो पाया है। इसके लिए उन्होंने मिलकर प्रयास करने पर बल दिया। डॉ. आशा राम बिज्लवाण ने बताया कि यमुना टोंस घाटी की आर्थिकी को मजबूत करने के लिए व्यावसायिक रणनीतियों पर भी फोकस करना होगा, केवल उत्पादन से काम नहीं चलेगा। साहसिक पर्यटन से जुड़े चैन सिंह रावत ने बताया कि यमुना टोंस घाटी से 30 से अधिक ट्रेकिंग रूट हैं।

‘मैं और पहाड़’ सत्र में एकल संबोधन करते हुए पर्वतारोही लवराज सिंह धर्मशत्तू ने युवाओं का आह्वान किया कि वे अधिक से अधिक संख्या में पर्वतारोहण से जुड़ें। उन्होंने बताया कि पर्वतारोहण न सिर्फ आपको हौसला देता है, बल्कि रोजगार भी देता है।

‘पुस्तकें कुछ कहना चाहती हैं’सत्र में रमाकांत बेंजवाल ने उपस्थित श्रोताओं को बताया कि भले ही ऐसा प्रतीत हो रहा है कि पढ़ने की आदत कम हो रही है, लेकिन हकीकत यह है कि प्रकाशित हो रही पुस्तकों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इसी प्रकार ‘बाल साहित्य और बच्चे’ सत्र में उदय किरौला ने बाल साहित्य के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बच्चों में पढ़ने की आदत विकसित करने पर जोर दिया। इस सत्र का संयोजन प्रेम पंचोली द्वारा किया गया। आयोजन से जुड़ी रानू बिष्ट, राजेन्द्र लाल आर्या, सुभाष उनियाल आदि ने भी विभिन्न सत्रों में प्रतिभाग किया। इस अवसर पर पुस्तक प्रदर्शनी व स्थानीय उत्पादों का स्टॉल भी लगाया गया।

कुल मिलाकर दो दिनों का यह आयोजन यमुना-टोंस घाटी में साहित्य को लेकर एक अच्छी शुरुआत कर गया है जिसकी गूंज अगले आयोजन तक सुनाई देती रहेगी।