Tag: प्रबोध कुमार

सुख : प्रबोध कुमार

प्रबोध कुमार

8 जनवरी, 1935 को जन्‍में सुप्रसि‍द्ध लेखक प्रबोध कुमार ने 1955-56 में लि‍खना-छपना शुरू कि‍या। करीब एक दशक तक उनकी कहानि‍याँ ‘कहानी’, ‘कल्‍पना’, ‘कृति’‍ आदि‍ प्रति‍ष्‍ठि‍त पत्रि‍काओं में प्रकाशि‍त होकर खासी चर्चित हुईं। उन्‍होंने करीब पैंतालीस वर्षों से न लि‍खने के बाद उपन्‍यास लि‍खा- नि‍रीहों की दुनि‍या। उनकी कहानी –

मीरा के दाँत जब भी टूटते, वह उन्हें चूहे के बिल में डाल देती जिससे दोबारा निकलने पर वे चूहे के दाँतों की तरह सुडौल हों। उस दिन जब फिर उसका एक दाँत टूटा तो उसे ले वह फुदकती बिल की तरफ चली। तभी न जाने कहाँ से आ, उसके हाथ से दाँत छीन, विशू भाग गया। वह रोते-राते उसके पीछे दौड़ी लेकिन विशू को पकड़ना आसान नहीं था। हारकर बरामदे में बैठ, वह बीच-बीच में बह आती नाक घुटकने लगी। सबसे बड़ा डर उसे यह था कि विशू ने दाँत यदि खपरैल पर फेंक दिया तो नया दाँत खपरे की तरह होगा। विशू की माँ उसकी माँ के साथ पड़ोस के घर में थीं जहाँ उसी रात घर की सबसे बड़ी लड़की सरला की शादी थी। उसकी शिकायत सुनने वाला दूसरा कोई वहाँ था नहीं। विशू बगीचे में खड़ा उसे मुँह चिढ़ा रहा था। मीरा की बेहद इच्छा हुई कि जा कर उसका मुँह नोंच ले लेकिन वह जानती थी कि विशू मुँह नुचवाने वहाँ खड़ा नहीं रहेगा।

विशू ने इस उम्मीद से कि मीरा उसके पीछे-पीछे भागेगी, कहा, ‘‘अच्छा ले जाओ अपना दाँत, हमें नहीं चाहिए’’, लेकिन उस पर कोई असर न होते देख वह घाट पर चला गया। छुट्टियों में अपनी माँ के साथ जब भी वह मीरा के घर आता तो उन दोनों का अधिकतर समय तालाब पर बीतता था। घने पेड़ों के कारण, पास होने पर भी वह घर से दिखाई नहीं देता था। वहाँ पहुँचने पर उन्हें लगता कि घर से बहुत दूर चले आये हैं। विशू को तालाब बहुत पसंद था। उसके तीन किनारों पर शहर के मकान आकर यदि ठहर न जाते तो पानी में गिर पड़ते। मकानों के बीच काफी संख्या में कलशदार मंदिर फँसे थे। उनकी नुकीली आकृतियाँ दिन भर पानी में डोलती रहतीं। तालाब की चौथी ओर नीली-भूरी पहाडिय़ाँ थीं जिनमें मीरा के अनुसार, चुड़ैल छिपकर रात में उन्हें सताने की योजना बनाती थी। पहले उन्हें, जब तक कोई बड़ा व्यक्ति साथ न हो, तालाब पर बिल्कुल जाने नहीं दिया जाता था। बाद में बड़ों की व्यस्त दिनचर्या में बच्चों को किसी बात के लिए मना करना शायद एक बेमतलब आदत बन गयी थी, क्योंकि वह एक बार मना करने के बाद कोई भी यह देखने का कष्ट नहीं करता कि उन्होंने कहना माना या नहीं। एक कारण शायद यह भी रहा हो कि अब उन्हें तैरना आ गया था, यद्यपि अब भी वे पानी में तभी उतरते जब घाट पर काफी लोग नहाते रहते। पिछली गर्मियों में मीरा के पिता ने उन्हें तैरना सिखाया था। मीरा की देखादेखी वह भी उसके पिता को बाबूजी कहता था। सुबह होते ही दोनों अपनी तूंबियाँ सहेज तैयार हो जाते। उसके बाद उन्हें लगता कि बाबूजी जानबूझ कर चाय पीने में या दाढ़ी बनाने में देर लगा रहे हैं। उतावली में वे, घाट के रास्ते में, बाबूजी से हमेशा दस-बीस कदम आगे रहते। वहाँ पहुँचते ही वे अपने ऊपर के कपड़े उतार, तूंबियाँ बाँधकर बड़े लड़कों की तरह सिर के बल पानी में कूदने का अभिनय करने लगते। बाबूजी आकर देखते कि उनकी तूंबियाँ ठीक से बंधी हैं या नहीं। मीरा की तूंबियाँ उन्हें रोज दोबारा बाँधनी पड़तीं। पानी में जाकर जब वह हाथ फैला खड़े हो जाते, तब दोनों एक के बाद एक पानी में कूद पड़ते। तैरते समय उनके नौसिखिया हाथ-पैरों से बहुत पानी छिटकता जिसका आसपास नहाते लोग बुरा मानते। मीरा पर तो कोई असर न होता लेकिन विशू थोड़ी देर को सहम जाता। पानी से भारी हो बार-बार नीचे खिसकता निकर ठीक करता वह मीरा को देखने लगता। मीरा की सफेद पतली चड्डी में हमेशा हवा भर जाती जिससे कपड़े का एक गुब्‍बारा पानी में हर जगह उसका पीछा करता, एक पिचकता तो दूसरा तैयार हो जाता। नहाकर जब वे निकलते तो उनके होंठों पर पपडिय़ाँ जमी रहतीं। तूंबियाँ खोलने के बाद वे गर्मी के दिन होने पर भी थोड़ी देर तक तौलियों में छिपे रहते। वह जब अपना बदन पोंछता तो पाता की मीरा की अपेक्षा उसकी कमर में रस्सी के लाल निशान कम उभरे हैं।

विशू ने जोर से पत्थर फेंका तो वह चार-पाँच बार पानी पर उचटता काफी दूर जाकर डूब गया। तिजहरिया में कपड़े धोती तीन वयस्क औरतों को छोड़ घाट पर और कोई नहीं था। जब मीरा साथ रहती तो उसका काफी समय इसी तरह पत्थर उचकाने में बीतता। तब यदि कोई घाट पर होता तो उन्हें खेल में बाधा पड़ने का डर लगा रहता। घाट के पास, कुछ दिन हुये, एक मढ़ि‍या बनी थी। वहाँ से वे पानी में फेंकने के लिये पत्थर की चीपों के छोटे-छोटे टुकड़े इकट्ठा करते। मीरा के फेंके पत्थर पानी पर उचटने की जगह हमेशा हवा में अधगोला बनाते डब्ब-से पानी के नीचे चले जाते। उसे आश्चर्य होता कि विशू कैसे पत्थरों को इतनी बार उचटा लेता है। कभी-कभी आसपास के कुछ लड़के आकर उनके खेल में शामिल हो जाते। उनसे जब विशू हारता तो मीरा को बुरा लगता, खेल में उसकी रुचि खत्म हो जाती।

‘‘अब घर चलो विशू, खूब देर हो गयी है।’’

‘‘अभी तो सब लोग सो रहे होंगे।’’

‘‘नहीं, वहाँ चलो, बगीचे में खेलेंगे।’’

‘‘अच्छा, रुको अभी चलते हैं।’’

विशू फिर खेल में व्यस्त हो जाता। मीरा तालाब की संकरी फसील पर चढ़ घूमने लगती। जब उसे तैरना नहीं आता था तो ऐसा करते हमेशा डरती कि कहीं पानी में न गिर पड़े। फसील पर अपनी समझ में काफी देर घूम चुकने के बाद वह अक्सर पेशाब करने बैठ जाती। इतनी बड़ी होकर भी उसे समय या जगह का जरा भी खयाल नहीं रहता था। चाची, एक-दूसरे की माँ को वे चाची कहते, के पास मीरा के पेशाब करने से सम्‍बन्‍धि‍त कि‍स्‍सों का ढेर था। चाची अक्‍सर उससे कहा करतीं कि‍ मीरा के लिए अब फिर से रबर की चादर लानी पड़ेगी। मीरा उनकी इस आदत से बहुत चिढ़ती थी। उसे सबसे बड़ी आपत्ति इस बात से थी कि वह विशू को क्यों सारी बातें बता देती हैं। विशू इतना खराब था कि झगड़ा होने पर उन्हीं बातों से उसे चिढ़ाता।

‘‘विशू, अब चलो।’’ मीरा उन लड़कों के साथ विशू को नया खेल शुरू करते देख उतावली हो उठती। विशू ध्यान नहीं देता तो वह गुस्से में पीछे से उसकी कमीज पकड़ लेती।

‘‘अब चलो विशू, सच्ची खूब देर हो गयी।’’

‘‘बस, थोड़ी देर और रुक जाओ।’’

‘‘नहीं, अब चलो।’’

‘‘तो तुम जाओ, हम अभी आते हैं।’’

‘‘हम चाची से बता देंगे कि विशू तालाब पर खूब शैतानी कर रहा है।’’

कहकर मीरा सचमुच चल पड़ती। कहने को तो विशू कह देता, जाओ बता देना, हमें किसी का डर नहीं पड़ा है, लेकिन जल्द ही उस धमकी का असर उस पर छा जाता। अधरस्ते ही वह मीरा को पकड़ लेता। खुशी में मीरा यह पूछना भूल जाती कि जब उसे किसी का डर नहीं पड़ा है तो फिर चला क्यों आया। रास्ते में हमेशा कोई फूलों का गुच्छा या कोई विचित्र से रंग का पत्ता तोडऩे के लिए विशू से आग्रह करती। कुछ पेड़ों पर तो वह चढ़ जाता, लेकिन कुछ इतने पतले या झाड़ीनुमा होते कि उनके फूल तोडऩे के लिए जमीन पर से ही कोशिश करना पड़ती।

जब वह उचक कर भी वहाँ तक नहीं पहुंच पाता तो मीरा उससे घोड़ा बनने को कहती। विशू दोनों हाथ जमीन पर टेक देता तो वह फूल तोडऩा छोड़ उसका गर्दन पर सवार हो जाती। उसकी चड्डी में से हमेशा पेशाब के साथ, धुले कपड़ों की मिली-जुली बास आती थी, जिसे वह सूँघना न चाहते भी सूँघता था। मीरा एक बार बैठ जाता तो तब तक उसकी गर्दन नहीं छोड़ती जब तक कि विशू खुद उसकी पतली टांगों के बीच से सिर न निकाल लेता। इस प्रयास में अक्सर दोनों ही जमीन पर गिर पड़ते। विशू कहता कि अब वह कभी उसके लिए फूल नहीं तोड़ेगा लेकिन ऐसी बातें या तो वह कहने के साथ ही भूल जाता, या उसे उसमें कुछ भी अजीब नहीं लगता कि वह जब कुछ कहता है तो फिर उसे करता क्यों नहीं।

मीरा के बिना विशू की समझ में नहीं आ रहा था कि घाट पर क्या करे। पत्थर उचटाने के खेल से बहुत जल्द ऊब कर अब वह एक पेड़ के नीचे बैठा था। तालाब के दूसरे किनारे के पास एक आदमी नंगे बदन डोंगे में बैठा, मछली मार रहा था। सारे तालाब पर छोटी-छोटी लहरें उभरी थीं। जिनके ऊपर सूरज गोल टुकड़ों में चिलक रहा था। कभी-कभी कोई चिडिय़ा बहुत तेजी से नीचे आ, पानी की सतह को छूती फिर आसमान में उड़ जाती। मीरा को रुला कर अब विशू को बहुत बुरा लग रहा था। उसे मीरा पर कुछ गुस्सा भी आया कि वह उतनी जल्दी रोने क्यों बैठ गयी। उसे आश्चर्य था कि मीरा इतनी-सी बात भी क्यों नहीं समझ सकी कि वह दाँत खपरैल पर कभी भी नहीं फेंकता। चूहे के बिल को छोड़ टूटे दाँत के लिए और कोई जगह होती ही नहीं।

मीरा ने जब कहा, ‘‘विशू चलो, तुम्हें चाची बुला रही हैं’’ तो वह चौंक गया। उसने मुड़ कर देखा तो वह दूसरी तरफ देखने लगी। पहले तो उसकी समझ में नहीं आया कि अम्मा को उसने कौन-सा काम आ पड़ा, लेकिन मीरा को दूसरी ओर देखता पा, वह काफी डर गया। उसकी इच्छा हुई कि चुगली करने पर मीरा को पकड़कर मार लगाए, लेकिन एक अपराध के बाद दूसरा अपराध करने पर उसमें हिम्मत नहीं थी।

‘‘जाओ, अम्मा से कह दो कि हम थोड़ी देर में आते हैं।’’

‘‘नहीं, उन्होंने कहा है कि उसे लेकर जल्दी आओ। वह बरामदे में खड़ी हैं।’’

‘‘तुमने चुगली क्यों की, हम क्या तुम्हें दाँत दे नहीं देते?’’ विशू ने मीरा को छोटा-सा सफेद दाँत लौटा दिया। मीरा मन में जरूर खुश हुई होगी। लेकिन विशू से बिना कुछ कहे वह उसके पीछे-पीछे चलने लगी।

‘‘हम अम्मा से कह देंगे कि दाँत तो हमने पहले ही मीरा को लौटा दिया था।’’

‘‘वह मानेंगी ही नहीं।’’

‘‘तुम चुप रहो। तुमसे कौन बात कर रहा है?’’

‘‘नहीं रहते, जाओ।’’

‘‘तुम्हें मार तो नहीं खानी, मीरा?’’

‘‘तुम हमें मारोगे तो चाची तुम्हें भूसे वाली कोठरी में बंद कर देंगी?’’

विशू कुछ नहीं बोला। एक बार मीरा को खेल-खेल में मारने पर सचमुच उसे काफी देर उस कोठरी में बन्‍द रहना पड़ा था। यदि मीरा की माँ उसे न निकालती तो उसकी माँ ने तो तय कर लिया था कि उसे रात भर बन्‍द रखेंगी। उसने एक बार मुड़ कर मीरा को देखा कि शायद बचाव का कोई रास्ता निकल आए, लेकिन वह जमीन की तरफ देखती चल रही थी। घर के अहाते में पहुँच विशू की चाल बहुत धीमी पड़ गयी। इधर-उधर देखता, जब वह बरामदे के बिल्कुल करीब पहुँचा तो उसे अम्मा कहीं नहीं दिखीं। इससे पहले कि वह मीरा से कुछ पूछता, उसकी पीठ पर एक घूँसा मार, क्या बुद्धू बनाया-क्या बुद्धू बनाया गाती मीरा चौके की तरफ भाग गयी।

उसे बचाने वालों की वहाँ कमी नहीं होगी, यह सोच विशू अपनी माँ के कमरे में आ, खाट पर लेट गया। इस तरह से बुद्धू बन जाना उसे बहुत अखरा। उस समय घर में हो रहा हल्ला उसे बिल्कुल अच्छा नहीं लगा। पड़ोसी के यहाँ जगह कम होने से उनके कई मेहमान मीरा के यहाँ टिके थे। उनके साथ आये बच्चे तमाम वक्त रोते-चिल्लाते रहते। उनसे, बहुत थोड़ी जान-पहचान होने के कारण, विशू कतराता था। वैसे, उन बच्चों का अपना गिरोह ही इतना बड़ा था कि उन्हें विशू या मीरा को अपने खेलों में शामिल करने की जरूरत महसूस नहीं होती थी। मीरा जरूर कभी-कभी उनमें से कुछ को फोड़ अपना अलग दल बना लेती जिसमें उसके चाहने पर भी विशू नहीं रहता था।

किवाड़ के पास से मीरा ने उसे पुकारा तो उसने आँखें बन्‍द कर लीं।

‘‘विशू, देखो हम कौन-सी किताब लाये हैं,’’  कहती वह उसका खाट के पास आ गयी।

‘‘विशू।’’

‘‘क्या है?’’

‘‘लो, यह किताब लाये हैं हम तुम्हारे लिए।’’

‘‘हमें नहीं चाहिए तुम्हारी किताब।’’

मीरा थोड़ी देर चुप खड़ी रही फिर किताब उसका खाट पर रख, बाहर चली गयी। अच्छी तरह से आश्वस्त होकर कि वह कहीं से देख नहीं रही है, विशू वह जासूसी उपन्यास पढऩे लगा। करीब दस-बारह पन्ने पढऩे के बाद आहट सुनकर वह फिर सोने का बहाना करने लगा। उसकी खाट से थोड़ा हट कर मीरा ने फर्श पर कैरम बोर्ड बिछा दिया। विशू अधमुंदी आँखों से उसे गोट गलत जमाकर खेलते देखने लगा। वह कैरम बोर्ड बहुत पुराना था। उस पर चारों तरफ खिंची समानांतर रेखायें लगभग मिट चुकी थीं। सिर्फ एक छेद को छोड़ बाकी की, मटमैली जालियाँ फट कर नीचे झूलने लगी थीं। उन फटी जालियों वाले छेदों में गोटें गिरतीं तो अक्सर लुढ़कती बहुत दूर तक चली जातीं। मीरा को खेल से अधिक ऐसी गोटों को पकडऩे में मजा आता था। कैरम बोर्ड की रेखायें यदि स्पष्ट  होतीं, तब भी मीरा के निकट कोई अन्‍तर न पड़ता। वह गप्पे को कहीं भी रखकर निशाना साधती थी।

‘‘मीरा, तुम बहुत हल्का कर रही हो।’’

मीरा इतनी जोर से चौंकी कि गप्पे पर उसका उँगली फिसल गयी।

‘‘हम तो खेल रहे हैं।’’

‘‘तुम बाहर जाकर क्यों नहीं खेलती?’’

‘‘तुम भी खेलों न हमारे साथ विशू।’’

‘‘तुमसे गोटें तक तो जमाते नहीं बनतीं।’’

‘‘अच्छा, दिखायें जमाकर?’’

विशू के हाँ कहने पर दोनों कुहनियाँ कैरम बोर्ड पर रख, मीरा बड़ी लगन से गोटें जमाने लगी। बीच-बीच में वह अपनी समझ में कोई गलती करती तो थोड़ी देर गाल में उँगली धँसा कर कुछ सोचने लगती, फिर किसी काली गोट की जगह सफेद या सफेद की जगह काली गोट रख देती। सभी गोटें रख चुकने पर उसने विशू की तरफ देखा तो वह, एकदम गलत, कहकर कैरम बोर्ड के पास जा बैठा।

‘‘ठीक तो है विशू।’’

जवाब न दे, वह उन्हें ठीक से जमाने लगा। मीरा ने नीला गप्पा अपने हाथ में ले लिया। काली गोटें उसे अच्छी नहीं लगती थीं। उसे पता था कि जो शुरू करता है, उसकी सफेद गोटें होती हैं।

वे खेलने लगे। मीरा जब अचरज से उसे एक के बाद एक गोटे लेते देखती तो विशू बहुत खुश होता, लेकिन थोड़ी ही देर में वह ऊब गया। मीरा इतनी जल्दी अपनी बारी खो देती कि उसे लगता वह अकेला ही खेल रहा है।

‘‘हमें तो भूख लगी है।’’

‘‘आज तो सरला दीदी के यहाँ खाने जाना है।’’

‘‘चलो चौके में कुछ खा लेंगे।’’

मीरा ने फिर एतराज नहीं किया। खाना उसके प्रिय कामों में एक था। चौके में उन्हें खाने को कुछ नहीं मिला, लेकिन मीरा को वह जगह मालूम थी जहाँ उनसे छिपाकर मिठाइयाँ या फल रखे जाते थे।

अच्छी तरह खा कर वे अपनी करतूत छिपाने में लगे थे कि तभी बाजों की आवाज सुनाई दी।

‘‘विशू, बारात।’’ मीरा लगभग चिल्ला पड़ी।

दौड़ते-दौड़ते वे पड़ोसी के घर पहुँच गये। मीरा के पिता उस घर के अन्य लोगों के साथ वहाँ खड़े थे। उन सभी के हाथों में मालायें थीं जिन्हें वे बारातियों को पहना रहे थे। वे दोनों भी एक-दूसरे का हाथ थामे, वहाँ जाकर खड़े हो गये। मीरा को कई लोगों ने प्यार से अपनी मालायें पहना दीं। विशू को भी शायद पहनाते, लेकिन वह थोड़ा हट कर खड़ा हो गया था। उसे उन लोगों से काफी शर्म लग रही थी। वैसे भी वह नये लोगों से बहुत झेंपता था। उसकी माँ जब किसी मेहमान से कहतीं, ‘मेरा विशू चौदह का हो गया है’ तब भी उसके कान जलने लगते।

सब लोगों के साथ विशू भी पण्‍डाल में आ गया। मीरा अपनी सरला दीदी को देखने घर में चली गयी। पण्‍डाल में लगी रंगीन कागज की झंडियाँ हवा में फरफरा रही थीं। बाहर का अन्‍धेरा तेज रोशनी में और भी घना हो गया था। वहाँ, रोशनी में चमकती आसपास के पेड़ों की निचली डालों के अतिरिक्त, कुछ भी नहीं दिख पड़ता था। उन लोगों को शरबत पीते देख विशू की भी इच्छा हुई कि पिए। उसने सोचा, यदि कोई खुद लाकर दे देगा तो वह पी लेगा। काफी राह देखने पर भी जब कोई उसके पास नहीं आया तो वह मीरा का इंतजार करता, पण्‍डाल के बाहर, विरल घास पर लेट गया। मीरा उसे ढूँढती जब उस किनारे पहुँची जहाँ वह लेटा था, तो विशू ने उसे बुला लिया।

‘‘विशू, सरला दीदी बहुत खराब है,’’ कहती वह उसके पास जाकर बैठ गयी।

‘‘क्यों?’’

‘‘उन्होंने हमसे बात ही नहीं की।’’

‘‘मीरा, तुमने शरबत पिया?’’

‘‘हाँ, दो गिलास। खूब अच्छा है। तुमने कितने गिलास पिये विशू?’’

विशू चुप रहा। उसने सोचा मीरा से अपने लिए मंगवाए, लेकिन टाल गया।

‘‘विशू, तुमने सरला दीदी की साड़ी देखी?’’

‘‘कैसी है?’’

‘‘इतनी चमक रही है कि क्या बतायें। अम्मा चाची से कह रही थीं कि बनारस से लायी है।’’ कहकर मीरा उसके पास लेट गयी।

‘‘हमें तो नींद आ रही है विशू।’’

‘‘यहाँ मत सोओ, घर चलकर सोना।’’

‘‘विशू, हमारा एक दाँत और हिल रहा है। तुमने चौके वाला बिल देखा है?’’

‘‘नहीं।’’

‘‘खूब बड़ा है, सबेरे तुम्हें दिखायेंगे।’’

उसके बाद जब एक बार विशू कहकर वह काफी देर चुप रही तो विशू ने उसकी तरफ देखा। वह सो चुकी थी। उसका एक हाथ छाती पर पड़ा था। विशू के सिर में छोटे-छोटे कंकड़ गड़ रहे थे। उसने मीरा के पेट पर सिर रख लिया। काफी देर तक उसके पेट से आती गुड़-गुड़ आवाज सुनता इस बात से खुश होता रहा कि कल नहीं तो परसों तक वे पिन्ने बच्चे यहाँ से चले जायेंगे, फिर मीरा को घर ले जाने के लिए जगाने लगा।

चालाक चिडिय़ा और दो गप्पी

ये दो बाल कहानियां मुंशी प्रेमचंद के नाती और वरिष्‍ठ लेखक प्रबोध कुमार से प्राप्‍त हुई हैं। उनका कहना है कि उनकी मां कमला देवी (प्रेमचंद जी की पहली संतान) ये कहानियां बचपन में हम भाई-बहन को सुनाती थीं-

चालाक चिडिय़ा

एक पेड़ पर एक घोंसला था जिसमें चिड़ा और चिडिय़ा की एक जोड़ी रहती थी। एक दिन चिडिय़ा ने चिड़ा से कहा, ‘‘आज मेरा मन खीर खाने को कर रहा है, जाओ जाकर कहीं से चावल, दूध और चीनी ले आओ।’’ चिड़ा ने चिडिय़ा को समझाया, ‘‘आजकल बहुत महंगाई है। लोग चावल खाते नहीं है या कम खाते हैं। चावल लाने में बड़ी मुसीबत है, लोग झट भगा देते हैं। और दूध ? उसका भी मिलना बड़ा कठिन है और मिला भी तो दूध के नाम सफेद पानी ! कहीं ऐसा भी दूध होता है भला- न गाढ़ापन और न चिकनाई ! और चीनी ? अरे बाप रे ! बिल्कुल नदारद, लोग तरस रहे हैं चीने के लिए ! ऐसे में कैसे बनेगी तुम्हारी खीर ?  हाँ, खिचड़ी-विचड़ी बनाना चाहो तो बना लो हालांकि वह भी सरल नहीं है।’’
पर स्त्री की जिद बुरी होती है। चिडिय़ा बोली,  ‘‘नहीं,  खीर ही बनेगी। जाओ इंतजाम करो और नहीं तो दूसरी चिडिय़ा तलाश लो, मैं बाज आई ऐसे कामचोर चिड़ा से। अरे ये झंझट तो रोज की है और इन्हीं के लिए बैठे रहो तो हो गई जिंदगी। मैं रोज तो किसी बड़ी चीज की फरमाइश करती नहीं हूँ। कभी कुछ अच्छा खाने का मन हुआ भी तो तुम ऐसे निखट्टू हो कि वह साध भी पूरी करने में इधर-उधर करते हो। मैं खीर खाऊँगी और आज ही खाऊँगी। अब जाओ जल्दी से और करो सारा इंतजाम। खीर क्या मैं अकेली खाऊँगी, तुम्हे भी तो मिलेगी।’’ अब चिड़ा करे तो क्या करे ! निकला खीर की सामग्री जुटाने। जैसे-तैसे चावल लाया,  दूध लाया और चीनी नहीं मिली तो कहीं से गुड़ ले आया।
चिडिय़ा तो बस खुशी से निहाल हो उठी और लगी चिड़ा को प्यार करने। खैर, खीर पकाई गई। दूध के उबाल की सोंधी महक चिडिय़ा की तो नस-नस में नशा छा गई। खीर तैयार हो जाने पर चिड़ा से कहा, ‘‘थोड़ी ठंडी हो जाए तब हम खीर खाएँगे। तब तक मैं थोड़ा सो लेती हूँ और तुम भी नहा-धोकर आ जाओ। चिड़ा नहाने चला गया तो चिडिय़ा ने सारी खीर चट कर डाली। और फिर झूठ-मूठ में सो गई। नहा-धोकर चिड़ा लौटा तो देखा चिडिय़ा सो रही है। उसने चिडिय़ा को जगाया और कहा, ‘‘मुझे बहुत भूख लगी है, चलो खीर खाई जाए। चिडिय़ा बोली, ‘‘तुम खुद निकालकर खा लो और जो बचे उसे मेरे लिए हांडी में ही रहने दो,  मैं तो अभी थोड़ा और सोऊँगी। आज इतनी थक गई हूँ खीर बनाते-बनाते कि कुछ मत पूछो !’’
चिड़ा ने छोटी-सी खीर की हाँड़ी में चोंच डाली तो खीर की जगह उसकी चोंच में चिडिय़ा की बीट आ गई। सारी खीर खाकर चिडिय़ा ने छोड़ी हाड़ी में बीट जो कर दी थी। चिड़ा गुस्से से चिल्ला पड़ा, ‘‘सारी खीर खाकर और हांड़ी में बीट कर अब नींद का बहाना कर रही हो !’’ चिडिय़ा ने अचरज दिखाते हुए कहा, ‘‘यह तुम क्या कह रहे हो ? मैं तो थकावट के मारे उठ तक नहीं पा रही हूँ और तुम मुझ पर झूठा इलजाम लगा रहे हो ? मैंने खीर नहीं खाई । मुझे क्या पता कौन खा गया। मैं तो खुद अब भूखी हूँ।’’ चिड़ा फिर चिल्लाया,  ‘‘अच्छा, खाओ कसम कि तुमने खीर नहीं खाई।’’ चिडिय़ा बोली,  ‘‘मैं तैयार हूँ। बोलो कैसे कसम खाऊँ।’’ चिड़ा ने कहा, ‘‘चलो, मेरे साथ कुएँ पर चलो तो बताता हूँ।’’ दोनों कुएँ पर गए। चिड़ा ने एक कच्चा, सूत का धाग कुएँ के एक किनारे से दूसरे किनारे तक बाँधा और चिडिय़ा से कहा,  ‘‘इस धागे को पकड़कर इस ओर से उस ओर तक जाओ। यदि तुमने खीर खाई होगी तो धागा टूट जाएगा और तुम पानी में गिर जाओगी। और जो नहीं खाई होगी तो मजे से इस ओर से उस ओर पहुंच जाओगी।’’ चिडिय़ा धागे पर चली। खीर से उसका पेट भरा था। उसने तो सचमुच खीर खाई थी। चिड़ा से वह झूठ बोली थी सो बीच रास्ते में धागा टूट गया और वह धम्म से पानी में जा गिरी। चिड़ा गुस्से में उसे  झूठी,  बेईमान  कहता वहां से उड़ गया और चिडिय़ा पानी में फडफ़ड़ाने लगी।
तभी शिकार की खोज में एक बिल्ली कुएँ पर पहुँची। उसकी नजर चिडिय़ा पर पड़ी वह सावधानी से कुएँ में उतरी और चिडिय़ा को मुँह में दबाकर निकाल लाई। बिल्ली ने अब चिडिय़ा को खाना चाहा। चिडिय़ा तो चालाक थी ही,  झट बोली, ‘‘बिल्ली रानी, अभी मुझे खाओगी तो मजा नहीं आएगा। थोड़ा ठहर जाओ। मुझे धूप में सूखने रख दो,  मेरे पंख सूख जाएँ तब खा लेना। और हाँ, न हो तो तुम भी मेरे पास बैठ जाना। तुम भी गीली हो गई हो। धूप में सूख भी जाओगी और मेरे ऊपर नजर भी रख सकोगी।’’
बिल्ली को चिडिय़ा की बात जँच गई। उसने चिडिय़ा को धूप में सूखने के लिए रख दिया और खुद भी वहीं पास में बैठ धूप का मजा लेने लगी। चिडिय़ा के पंख धीरे-धीरे सूखने लगे। गीले पंख लेकर वह ठीक से उड़ नहीं सकती थी। इसलिए उसने बिल्ली को यह सलाह दी थी। उसने सोचा था, जैसे ही मेरे पंख सूखें और मुझ में उडऩे की शक्ति आई फिर देखूँगी बिल्ली रानी मेरा क्या बिगाड़ सकती है ! इधर बिल्ली सावधान थी। इसकी पूरी नजर चिडिय़ा पर थी, पर वह धूप की गरमाहाट का मजा भी ले रही थी। चिडिय़ा के पंख जब काफी कुछ सूख गए और उसे लगा कि अब वह ठीक से उड़ सकती है तब उसने बिल्ली की ओर नजर फेरी। बिल्ली उसे पूरी तरह सावधान दिखी। उसने बिल्ली से कहा, ‘‘बिल्ली रानी,  मेरे पंख बस सूखने ही वाले हैं। वे सूख जाएँ तो तुम्हें अपनी पसंद का गरम-गरम गोश्त खाने को मिल जाएगा पर हाँ, बिल्ली रानी,  उसके पहले आँखे बंद कर तुम थोड़ी देर भगवान का ध्यान कर लो तो कितना अच्छा रहे ! भगवान का स्मरण कर मुझे खाओगी तो मेरा अगला जीवन सुधर जाएगा और मेरा कल्याण करने से भगवान भी तुमसे बहुत प्रसन्न होंगे।’’ चिडिय़ा की सलाह बिल्ली को अच्छी लगी। उसने आँखें बंद कर लीं और भगवान का स्मरण करने लगी। चालाक चिडिय़ा तो इसी मौके का इंतजार कर रही थी। जैसे ही बिल्ली की आँखें बंद हुईं वह फुर्र से उड़ कर एक पेड़ पर जा बैठी और बोली, ‘‘ बिल्ली रानी, आँखें खोलकर देखा तो सही मेरे पंख कैसे सूख गए ! ’’ बिल्ली ने आँखें खोली तो चिडिय़ा को पेड़ पर बैठी देख उसके गुस्से का ठिकाना न रहा। वह चिल्ला पड़ी,  ‘‘बेईमान, धोखेबाज चिडिय़ा….।’’ लेकिन बिल्ली की गालियाँ सुनने वाला पेड़ पर अब कौन था। चिडिय़ा तो आसमान में चहचहाती इधर-उधर चक्कर लगा रही थी। बिल्ली अपनी मूर्खता पर खिसिया कर रह गई और चिडिय़ा के गोश्त का स्वाद याद करते-करते अपनी जीभ अपने ही मुँह पर फेरने लगी।

दो गप्पी

एक छोटे से शहर में दो गप्पी रहते थे। दूर की हाँकने वाले। अपने को सबसे बड़ा बताने वाले। एक दिन दोनों में ठन गई। देखें कौन बड़ा गप्पी है। शर्त लग गई। जो जीते दो सौ रुपये पाए और जो हारे वह दो सौ रुपये दे।
बात शुरू हुई। गप्पें लगने लगीं। पहला बोला, ‘‘ मेरे बाप के पास इतना बड़ा, इतना बड़ा मकान था कि कुछ पूछो मत। बरसों घूमों,  दिन-रात घूमों पर उसके
ओर-छोर का पता न चले।’’ दूसरे ने कहा, ‘‘सच है भाई, वह मकान सचमुच इतना बड़ा रहा होगा।’’ उसे मालूम था कि पहला गप्पी बिल्कुल झूठ बोल रहा है, लेकिन इस होड़ में यह शर्त थी कि कोई किसी को झूठा नहीं कहेगा, नहीं तो शर्त हार जाएगा। इसीलिए उसे, ‘सच है भाई’, कहना पड़ा।
पहला गप्पी फिर बोला,  ‘‘उस बड़े मकान में घूमना बहादुरों का काम था, कायरों का नहीं। मेरे बाप ने उस मकान को ऐसे बनवाया था- ऐसा, जैसे चीन की दीवार हो। बाप भी मेरे बस दूसरे भीमसेन ही थे- इतने तगड़े, इतने तगड़े कि बस हाँ।
दूसरा गप्पी बोला, ‘‘भाई,  मेरे बाप के पास इतना लम्बा बाँस था कि कुछ पूछो मत- इतना लम्बा कि तुम्हारे बाप के मकान के इस सिरे से डालो तो उस सिरे से निकल जाए और फिर भी बचा रहे। उस बाँस से यदि आसमान को छू दो तो बस छेद हो जाए आसमान में और झर-झर-झर वर्षा होने लगे, पानी की धार लग जाए।’’
पहले गप्पी ने कहा,  ‘‘ठीक है भाई ठीक है, और अब मेरी सुनो- मेरे बाप उस मकान से निकले तो उन्हें मिल गई एक घोड़ी। घोड़ी क्या थी, हिरण बछेड़ा थी। हवा से बातें करती थी- उड़ी सो उड़ी, कहो दुनिया का चक्कर मार आए। हाँ,  तो बाप थे मेरे घोड़ी पर सवार और तभी किसी कौए ने बीट कर दी घोड़ी पर और उग आया उस पर एक पीपल का पेड़। मेरे बाप तो आखिर मेरे बाप ही थे न। अकल में भला कोई उनकी बराबरी कर सकता था। उन्होंने झट पीपल के पेड़ पर मिट्टी डाली और खेत तैयार कर उसमें ज्वार बो दी। अब बिना पानी के ज्वार बढ़े तो कैसे बढ़े ! पानी बरस नहीं रहा था। लोग परेशान थे। फसलें बर्बाद हो रही थीं। बस समझो कि अकाल पड़ गया था, अकाल ! तभी मेरे बाप को वह लम्बा बाँस याद आया जिससे तुम्हारे बाप आसमान में छेदकर पानी बरसाते थे। बस घोड़ी पर सवार मेरे बाप तुम्हारे बाप के घर पहुँच गये और उन्हें पानी बरसाने के लिए मना लिया। फिर क्या कहना था ! जहां-जहां तुम्हारे बाप आसमान में छेद कर पानी बरसाते, वहां-वहां मेरे बाप घोड़ी को ले जाते और जहां-जहां घोड़ी जाती, वहां-वहां पीपल और जहां-जहां पीपल, वहां-वहां ज्वार का खेत। भाई मेरे, कुछ पूछो न ! ऐसी ज्वार हुई, ऐसी ज्वार हुई जैसे मोती- सफेद झक्क और मोटे दाने। ज्वार क्या थी भाई, अमृत था ! अब जो तुम्हारे बाप ने देखी वैसी अजूबा ज्वार तो मचल गए और पांच सौ रुपये की ज्वार लेकर ही रहे। मेरे बाप ने पैसे माँगे तो बोले, ‘अभी मेरे पास नहीं हैं, उधार दे दो।’ मेरे बाप बड़े दरियादिली तो थे ही, उन्होंने उधार दे दी ज्वार। और भाई क्या कहें, तुम्हारे बाप भी बड़े ईमानदार थे। उन्होंने कहा, ‘अगर मैं यह कर्ज न उतार सकूँ तो मेरे बेटे से पूरे पैसे ले लेना। मेरा बेटा बहुत अच्छा है और अच्छे बेटे अपने बाप का कर्ज जरूर अदा करते हैं।’’
दूसरे गप्पी ने यह सूना तो उसकी तो बोलती बंद ! न तो वह,  सच है भाई,  कह सकता था न,  झूठ है,  ही कह सकता था। सच कहता तो पाँच सौ रुपये का कर्ज चुकाना पडे़गा और झूठ कहता तो शर्त हारने के दो सौ रुपये देने पड़ेंगे। मतलब यह कि इधर कुँआ तो उधर खाई। उसने सोचा कुँए से तो खाई ही भली। वह झट बोला, ‘‘झूठ-झूठ-झूठ मेरे बाप ने कभी तुम्हारे बाप से पाँच सौ रुपये की ज्वार नहीं ली।’’ उसका इतना कहना था कि पहला गप्पी बोला, ‘‘मैं जीत गया, लाओ दो सौ रुपये दो।’’ दूसरे गप्पी ने दो सौ रुपये देकर अपनी जान छुड़ाई।

चित्रांकन : प्रगति त्‍यागी, कक्षा-11

समर्थों को जीने का सलीका सिखाती निरीहों की दुनिया : रामदेव शुक्ल

वरि‍ष्‍ठ लेखक और एंथ्रोपॉलोजि‍स्‍ट प्रबोध कुमार ने करीब पैंतालीस वर्षों से न लि‍खने के बाद उपन्‍यास लि‍खा- नि‍रीहों की दुनि‍या। बेहतर दुनि‍या की तलाश करने वाले इस उपन्‍यास पर डॉ. रामदेव शुक्‍ल का आलोचनात्‍मक आलेख-

लोकतंत्र अबतक आजमाई गयी सर्वश्रेष्ठ शासन प्रणाली है, किन्तु बीसवीं सदी में यह प्रणाली जितनी विकृत हुई है, उसकी कल्पना भी पहले कभी नहीं की गई। लोकतंत्र को भ्रष्ट करने वाले कौन हैं और कौन लोग सबसे ज्यादा लोकतंत्र के शत्रुओं के हाथों छले जाते है? इससे भी आगे बढ़कर वे उपाय कौन से हैं जो लोकतंत्र की बहाली कर सकते हैं? इन सवालों और इन जैसे अनेक सवालों के जवाब के लिए पंचतंत्र के शिल्प में एक उपन्यास प्रकाशित हुआ है- ‘निरीहों की दुनिया’, जिसके लेखक प्रबोध कुमार छठे-सातवें दशक में मानव-मन की अतल गहराइयों में झाँकने वाली कहानियाँ लिखने के लिए पहचाने जाते थे। इस कथा में प्रबोध कुमार कछुआ, कछुई, खरगोश और चिड़ियों के मन की गहराइयों में प्रवेश करके उनके अनुरूप भाव का अनुभव करते हैं। आधार सूत्र है किसी समय कछुआ और खरगोश की दौड़ में अप्रत्याशित रूप से खरगोश की हार और कछुए की जीत की कहानी। उन दोनों की दौड़ में आदमी का हस्तक्षेप लेखक ने इब्ने इंशा के माध्यम से दिखाया है, जिसने हार-जीत के निर्णय को एक शर्त के साथ जोड़ दिया कि जो जीतेगा, वह हारने वाले के कान काट लेगा। इस दौड़ में गंतव्य स्थल तक खरगोश पहले पहुँच गया और जब लम्बी प्रतीक्षा के बाद हारने वाला कछुआ नहीं आया तो मरने से पहले खरगोश वसीयत कर गया कि कछुआ जब भी वहाँ पहुँचे, उसके कान काट लिए जाएँ। उपन्यास में तीसरी दौड़ का सस्पेंस परी कथा में व्याप्त है। खरगोश नीम के टीले पर पहुँच गया है, कछुआ अपने ऊपर हुए पत्थरों के आक्रमण के बीच अपनी जान बचाकर कछुई के पास लौट आया है। आगे की बात सोची जा रही है। यहीं से चलकर कथा चक्राकार-भारतीय अवधारणा में काल-गति के अनुरूप सम्पन्न हो जाती है और पाठक कथा-रस के साथ अपनी शक्ति और सीमा के अनुसार लोकतंत्र के प्रति अपनी भूमिका को लेकर बेचैन हो उठता है।

कथाकार की अनेक बड़ी उपलब्धियों में एक है बच्चों को अपनी पकड़ में लेकर उनके दिलदिमाग पर छा जाने वाली सरल, तरल भाषा। हिन्दी में मुहावरा है- ‘यह बात उसने एक साँस में कह दी।’ इस उपन्यास की भाषा अर्द्धविराम आदि से लगभग मुक्त है। लगातार अनेक वाक्यों तक बातें ऐसी सरपट दौड़ती हैं कि जब पूर्ण विराम आता है, तभी पाठक को साँस लेने की सुधि आती है। ‘निरीहों की दुनिया’ की बोलती-बतियाती भाषा भावावेग के दबाव में उमड़ती-घुमड़ती बच्चों की भाषा है, जो पाठक की चेतना पर छा जाती है। ऐसी भाषा में प्रौढ़ों की गम्भीर समस्याओं को कदम-कदम पर इस कदर बिम्बित कर दिया गया है कि उनकी अर्थ व्यंजना बेचैन करती है और इस दारुण समय की विडम्बनाओं का रेशा-रेशा उधेड़ कर रख देती है।

उपन्यास शुरू होता है, रास्ते में सड़क पर अपने ऊपर की गई पत्थरों की बौछार से बचकर अपने अड्डे लौट रहे कछुए को देखकर कछुई के गुस्से से। ‘कछुई के फूले मुँह को देख कछुआ बोला कुछ नहीं, बस एक ठंडी साँस ले उसके पास जा लेटा और आसपास में इधर-उधर भागने की कोशिश में बादलों की हर पल बनती-बिगड़ती शक्लें देखने लगा। कछुई का गुस्सा चिंता में बदल गया। दौड़ बीच में छोड़कर पहले वह जब भी अड्डे पर लौटा था तो सफाई देने के नाम पर किसी मजेदार घटना का वर्णन कर उसने खुश कर दिया था उसे और फिर दौड़ जारी करने तक का समय उन्होंने बच्चे पैदा करने में लगाया था। जरूर कोई गम्भीर बात है नहीं तो भला बच्चे पैदा करने का ऐसा अवसर कछुआ छोड़ता, यह सोच उसने कछुए की पीठ सहलाते जानना चाहा कि वह लौट कैसे आया ? कोई स्नेह से पीठ सहलाए तो सभी प्राणियों को अच्छा लगता है, उनका मनमरापन गायब हो जाता है और मन में छिपा रखा सब कुछ उड़ेल देने की इच्छा होने लगती है। कछुए के साथ भी यही हुआ।’

कछुए कछुई का यह शारीरिक मानसिक सहचार दाम्पत्य-रस का आस्वादन कराने वाला है, जो अन्य प्राणियों में तो अभी तक सुरक्षित है, किन्तु ‘सभ्य वैज्ञानिक’ होते जा रहे मनुष्य-समाज में दुर्लभ होता जा रहा है। कोई गम्भीर बात न होती तो इस अवसर को वे दोनों बच्चे पैदा करने के अवसर में बदल देते। इसी का नतीजा है कि ‘उसका कुटुम्ब इतना बड़ा हो गया है कि अब पोखरे में मुश्किल से समा रहा है।’ पृथ्वीरूपी पोखरे में यही हाल मानुष बच्चों के कारण भी हो रहा है, जिनके माता-पिता उस वर्ग के हैं जिनके जीवन में सुख के नाम पर केवल ‘रति सुख’ बचा है। इसका कारण यह है कि दुनिया की सत्तर फीसदी दौलत उनके कब्जे में है, जिनका श्रम केवल ‘रति श्रम’ है। श्रम और सुख की यह विषमता ही धरती को रसातल की ओर लिए जा रही है। कछुए ने दौड़ से लौटने का जो कारण बताया, वह सभ्य मनुष्य के असभ्य आचरण का नमूना है जो आज के समाज में निरंतर बढ़ता जा रहा है। ‘यही कारण है कि अपने स्वाभाविक आवास से कटा हुआ हर प्राणी मनुष्य की छाया से भी दूर रहने में अपना कल्याण समझता है।’ यह उपन्यास कथाप्रवाह में यह भी बता देता है कि सृष्टि के अन्य प्राणियों के दारुण भय का कारण मनुष्य क्यों और कैसे बनता जा रहा है। कछुए-खरगोश की मस्ती भरी दुनिया में ‘आदमी’ के हस्तक्षेप से उपजी समस्या पर सोचने के लिए कछुई पोखरे में जाती है तो अनगिनत बच्चों में से एक उसकी पीठ पर सवार होकर वह सवाल पूछता है जो उसने पतंग उड़ाने वाले बच्चे के बाप से सुना है- ‘दुनिया में एक भी पेंच ऐसा नहीं है, जिसकी काट न हो।’ बच्चा जानना चाहता है कि यह बात वह जानती है या नहीं। प्रबोध कुमार यहाँ बालपन में उगने वाले प्रश्‍नों, उनके अचेतन मन में चले जाने और जीवन भर प्रभावित करते रहने को लाक्षणिक रूपक में रचते हैं। ‘बात मामूली थी लेकिन बचपन में ऐसी बातों को अद्भुत मान बच्चे हर किसी को इतनी बार सुनाते हैं कि बात बेचारी घबरा कर उनके मन की पिटारी में ऐसे छिपकर बैठ जाती है कि लाख ढूँढ़ने पर भी नही मिलती।’ कछुई के बहाने कथाकार भारतीय समाज की स्त्रियों की मनोदशा की एक तस्वीर बनाता है- ‘कछुई को औरतों की तरह पतंगबाजी से चिढ़ थी, जिसकी एक वजह यह भी थी कि पतंग की तरह वह आसमान में उड़ नहीं सकती थी।’ व्यथा भारी है कछुई की या औरतों की?

चतुर कछुई की सुरक्षा का पुख्ता प्रबन्ध करने के लिए कछुए को मुखिया तथा अपने को मुखिनी घोषित कर देती है। पूरे कछुआ समाज में इसे प्रसारित करा देती है। सत्ता का खेल शुरू होते ही ‘सत्ता के दलाल’ का प्रवेश होता है। ‘कछुई की चौथी बेटी के सातवें बेटे के भेष में स्कूल के बच्चों से सुन-सुनकर वह अंग्रेजी बोलने लगा है पर देसी बोली कामचलाऊ जानता है, क्योंकि वे बच्चे उसमें ज्यादा बात नहीं करते।’ भारत की शिक्षा ओर सारे ज्ञान पर एकाधिकार जताने वाले विलैती ज्ञानियों की एक झलक है यह। अंग्रेजीभाषी कछुआ मुखिनी से कछुआ समाज में अपने लिए नम्बर तीन का पद पक्का कर लेता है और अपना नाम डबल ओ सेवन (007)  चुन लेता है। आदमियों ने अपने लिए नम्बर से पहचाना जाना स्वीकार कर लिया है, इसलिए कछुआ समाज में भी नाम के लिए नम्बर का चलन होगा। मनचाहे नम्बर देने के लिए कछुओं से घूस लेने का काम अंग्रेजीभाषी कछुआ खुद ही शुरू कर देता है। अंग्रेजीभाषी कछुआ पूर्णतः निरीह कछुआ समाज को आधुनिक अंग्रेजी (विलायती) सभ्यता के सारे दुर्गुण सिखा देना चाहता है। इसके लिए जासूसी ऐय्यारी हथकण्डों से लेकर हथियार जमा करने और भ्रष्टाचार को सबकी चाहत बना देने की कोशिश करता है। उसका आखिरी लक्ष्य है प्रगाढ़ मित्र कछुआ और खरगोश में मित्रभेद उपजा कर कछुआ समाज का मुखिया बन जाना। खरगोश और कछुआ मित्र हैं, एक दूसरे के लिए त्याग करने को तत्पर रहते हैं। उनके लिए खेल मनोरंजन और त्याग भाव से युक्त है। अंग्रेजीभाषी कछुआ (007) खेल में किलर इंस्टिंक्ट (प्रतिस्पर्धी के प्रति घृणा और उसको मार कर जीतने की हिंसक भावना) की सीख देना चाहता है। आधुनिक सभ्य आदमियों की सारी बुराइयों से कछुआ समाज को भर देने की इच्छा से परिचालित डबल ओ सेवन किसी तरह शान्त, सुखी, सहज कछुआ-खरगोश, चिड़ियों की दुनिया मे जहर घोलना चाहता है। अंत में वे निरीह कैसे अपना बचाव करते हैं और अंग्रजीभाषी सत्ताकामी की परिणति क्या होती है, इसे जानने के लिए पाठक को उपन्यास का आखिरी शब्द तक पढ़ना पड़ेगा। चमत्कार यह कि उपन्यास पढ़ने के लि‍ए पाठक को अपनी ओर से प्रयत्‍न नहीं करना पडे़गा। एकबार पढ़ना शुरू करने पर उसकी पकड़ से छूटना गैरमुमकिन है।

मुक्तिबोध ने रचना को सभ्यता-समीक्षा कह दिया। हिन्दी आलोचक इस पर इतना लुब्ध हुआ कि आज लगभग हर किताब ‘सभ्यता-समीक्षा’ बताई जाती है। ‘निरीहों की दुनिया’ किस अर्थ में ‘सभ्यता-समीक्षा’ है ? यह उपन्यास बार-बार बताता है कि सभ्य आदमी कितना बर्बर हो गया है ओर सभ्यता की छाया से भी दूर निरीह पशुपक्षी परस्पर व्यवहार में कितने शिष्ट, भावनाप्रवण, सहनशील, त्यागी, सहज बचे हुए हैं। आदि काल से अब तक संतों ने जिस ‘रहनी’ की बात की है, वह अब पशुपक्षियों में ही सुरक्षित रह गयी है। आदमी तो इतना ‘सभ्य’ हो गया है कि लगभग ‘भस्मासुर’। इसीलिए पशुपक्षी आपस में तय करने जा रहे हैं कि जहां वे जन्मे और पले बढ़े हैं, उस जगह को छोड़ने की जरूरत न पड़े। इसके अलावा भी क्या कोई उपाय अपनाया जा सकता है जिससे आदमियों के बीच सुरक्षित रहा जा सके।’ मुखिया कछुआ सोचता है- ‘डबल ओ सेवन को उसके अपराधों के लिए कड़ी से कड़ी सजा देना जरूरी है नहीं तो कछुआ समाज को आदमि‍यों में दिन पर दिन बढ़ती उन बुराइयों से बचाना मुश्किल हो जाएगा जिन्हें फैलाने की वह कोशिश कर रहा है।’ सभ्य मनुष्यों के समाजों ने अपनी-अपनी भाषाओं में इस प्रकार के मुहावरे गढ़ लिए हैं जिससे किसी ‘कदाचारी’ आदमी को ‘जानवर’ कह दिया जाता है। यह उपन्यास ऐसे मुहावरों को उलट कर ‘आदमियत’ की रक्षा करने की जुगत बताता है। इस समय सुविधा सम्पन्न नागरजन अपने बच्चों पर कितना अमानवीय अत्याचार कर रहें हैं, उन्हें ‘बड़ा’ बनाने की कोशिश में, इसे वे जानते भी नहीं। ‘‘कछुआ और खरगोश समाज में बच्चों को बच्चों की ही तरह पलने बढ़ने दिया जाता है, माने बच्चों की आदतों पर कोई लगाम नहीं लगाई जाती और इसीलिए इन समाजों में बच्चे बिल्कुल बच्चों की तरह प्यारे, नटखट, शैतान होते हैं और जैसा कि होना भी चाहिए। झगड़ते, मचलते ओर रूठते भी हैं।’’ बच्चों से आज उनका बचपन क्रूरतापूर्वक छीना जा रहा है, इसका रोना सभी रोते हैं। कछुआ और खरगोश अपने बच्चों को कैसे बढ़ने देते हैं आदमी उनसे सीख सके तो मनुष्यता नष्ट होने से बच सकती है। आदमियों को कछुआ सलाह देना चाहता है कि ‘‘टी.वी., कम्प्यूटर, मोबाइल के ऊपर भरोसा न कर वे अपना अधिक से अधिक समय अपने बच्चों के साथ बिताएं। इससे दोनों को फायदा होगा। बड़ों की बातें बच्चे अपनी यादों की पिटारी में सहेज कर रख लेंगे और जब बड़ा बनने का मन हुआा तो पिटारी में से उन्हें निकाल लेंगे। बड़े भी बच्चों के साथ मिलते-जुलते रहने से अपने मन में कहीं गहरे दबी बचपन की यादों को ढूँढ़ निकालेंगे और अपनी ढलती उम्र की ऊब से राहत पाने के लिए उन यादों की मदद से कभी-कभी बच्चे बन जा सकेंगे।’’

‘शिक्षित’ और ‘समझदार’ बनाने के नाम पर आदमी अपने बच्चों को क्या बना देता है, मुखिनी कछुई का एक बयान यह बताने के लिए काफी है। ‘‘वह अभी तक यह समझती थी कि आदमी जन्म से ही बदमाश होते हैं, लेकिन जिस प्यार से पतंग उड़ाते एक लड़के ने उसके एक छोटे बच्चे को अपनी जेब में रखा और जिस प्यार से स्कूली लड़के-लड़कियां उसे खिलाते-पिलाते हैं और नई-नई बातें सिखाते हैं उससे अब वह इस नतीजे पर पहुंच रही है कि बालिग आदमियों से उनके लड़के-लड़कियों की जात अलग होती है।’’

निरीहों की दुनिया की आचार संहिता वही है, जिसका सपना मानव समाज के सच्चे पथप्रदर्शक सदा से देखते रहे हैं। कछुआ, खरगोश और चिड़ियों के समाज में किसी के ऊपर हंसना बुरा माना जाता है। अभिव्‍यक्‍ति‍ की स्वतंत्रता का कछुआ समाज में यह आलम है कि ‘किसी को भी बोलने से नहीं रोकना चाहिए।’ कछुआ समाज में कोई अपने को और कछुओं से ऊंचा समझे, इसे अच्छी बात नहीं माना जाता। डबल ओ सेवन आदमियों की नकल करके कछुआ समाज को बांटना चाहता है तो उसे दंड मिलना ही चाहिए। कछुआ समाज नंबर वाली बात को नकार देता है क्योंकि कछुआ समाज में तो नामों की जरूरत भी नहीं है। उनके लिए इतना जानना काफी है कि वे नर हैं या मादा, बच्चे हैं या बूढ़े। कछुआ समाज में बच्चों को भी दंडित नहीं किया जा सकता। खरगोश यहां तक सोचता है कि किसी का बच्चा कभी नहीं मरे। चिड़िया भी नहीं चाहती कि कोई मरे या घायल हो। आदमियों के समाज में बड़ी आसानी से उन्हें भी मुखिया बना दिया जाता है, जो कोई सजा काट चुके होते हैं, कछुआ समाज में ऐसा नहीं होता। कथाकार वर्तमान राजनीति के धुरंधरों की ‘राजनीति’ की एक झलक देते हैं- ‘‘कछुआ समाज में सबको पता रहता है कि अगला मुखिया कौन बनेगा’’ जबकि आदमियों के समाज में अपने लिए जेल जाने का अवसर आने पर मुख्यमंत्री अपनी निरक्षर पत्नी को मुख्यमंत्री बना देता है। आदमियों के समाज में मानवीय भावनाओं के नाम पर अमानवीय कृत्य के अनेक उदाहरण मिलते हैं। एक है ‘भावनाओं का आहत होना’। एक फिल्म को और एक कला प्रदर्शनी के चित्रों को दर्शकों सहित जला दिया गया। कारण बताया गया कि फिल्म और चित्रों से जलाने वालों की भावनाएँ आहत हुई हैं। खरगोश एक खास बात यह बताया है कि दोनों जगहों की आक्रामक भीड़ के सभी सदस्यों के हाथों में कोई न कोई हथियार था, जबकि दर्शक पूरी तरह निहत्थे थे। वास्तव में जिनकी भावनाएँ आहत हुईं, फिल्म बनाने वाले, चित्रकार और दर्शक- उनकी ओर से कौन बोले? चिड़ियों का बसेरा उजड़ते देखकर खरगोश काटे गए पेड़ के शेष साथियों के पास जाकर कहता है- ‘‘एक निरीह अन्य निरीहों को सांत्वना छोड़कर और दे ही क्या सकता है?’’

यह उपन्यास ऐसे ही मर्मभेदी घटना-विन्यास के माध्यम से आत्मघाती दौड़ में शामिल सभ्य नागरिकों को आचरण की सभ्यता सिखाता चलता है।

पाठक की चेतना में अपनी बात बिठा देने के लिए कथाकार किस प्रकार के बिंब रचता है। एक उदाहरण- खरगोश अपने दोस्त कछुवे को बताना चाहता है, ‘‘बातों के भूखे को जबतक कोई सुनने वाला नहीं मिलता, तब तक वह उस मछली की तरह तड़पता है जिसे तपती बालू पर छोड़कर कोई कछुआ अपनी बीड़ी सुलगाने लगा हो।’’ ‘रेत की मछली’ हिन्दी भाषा का समर्थ मुहावरा है। इसी नाम का एक उपन्यास भी है। प्रबोध कुमार ने तपती रेत पर तड़पती मछली और बगल में अपनी बीड़ी सुलगाते कछुवे को साथ रखकर जीवन्त बिंब निर्मित कर दिया है। इस उपन्यास की भाषा एक शब्द में भी बिंब रचती है। मनमरापन, गुत्थमगुत्था, खोजीपने की आदत, लादीपोटी जैसे देशी शब्द पूरे दृश्य को मूर्त कर देते हैं।

वकील और पत्रकार बुद्धि व्यवसाय और लेखन कौशल के बल पर स्याह को सफेद करने को अपनी उपलब्धि मानते हैं। डबल ओ सेवन वकील की सलाह मुखिया कछुआ को सुनाता है- ‘‘मुखिया यदि हारी बाजी जीतना चाहता है तो उसे अपने में किलर इंस्टिंक्ट पैदा करना होगा और उसके लिए यह जरूरी है कि मुखिया खरगोश से इतनी नफरत करने लगे कि उसे मार डालने के लिए तैयार हो जाए।’’ वह आगे कहता है कि ‘‘वकील बहुत लालची होते हैं और उनसे भी बढ़कर लालची होते हैं पत्रकार, जिनकी जरूरत असली खरगोश को नकली साबित करने के लिए पड़ेगी।’’ जघन्य अपराधों का वर्णन करते समय ‘‘पत्रकार मसालेदार, दिलचस्प और रोचक जैसे शब्दों का इस्तेमाल धड़ल्ले से करते हैं।’’ दूसरी ओर खरगोश को बेहोश करके उसके पेट से सभी अंग काटकर निकाले जाने के बाद भी खरगोश की नींद न टूटने को ‘मजेदार बात’ कह देने के लिए खरगोश माफी माँगता है।

हिंसा, आतंक, प्रदूषण, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के अमानवीय शोषण जैसी ज्वलंत समस्याएँ इस कथा में पशुपक्षियों की जबानी बच्चों की समझ में आने वाली झरने की तरह प्रवाहित प्रसन्न भाषा में मूर्त कर दी गई है। इस अद्भुत कथा को पढ़कर 1909 ई. में लिखी महात्मा गाँधी की किताब ‘हिन्द स्वराज’ याद आती है। उसमें वकील, जज, डॉक्टर आदि को आदमी के स्वास्थ्य और सहज न्याय का वध करने वालों के रूप में देखा गया है। विश्‍वविख्यात शिकारी और कथा लेखक जिम कारबेट ने अपने संस्मरणों के संग्रह ‘माई इण्डिया’ में आदिवासियों के चित्त में बसी न्याय-भावना के उत्कृष्ट उदाहरण देकर बताया है कि अंग्रेजों के आने से पहले भारतीय समाज में सहज न्याय भावना थी। उसे अंग्रेजों ने अपने कानून और उसके व्यवहार से नष्ट कर दिया। पशुपक्षियों के रूपक में लिखी विश्‍वविख्यात व्यंग्य कथा ‘एनीमल फार्म’ को भी स्मरण किया जा सकता है। जार्ज आरवेल ने कम्युनिस्ट व्यवस्था के मॉडल की परिणति बताई है। एक फार्म हाउस के दो युवा सूअर नेपोलियन और स्नोबाल दो पैर वालों के विरुद्ध वि‍द्रोह करके सभी जानवरों के नेता बन जाते हैं। अंतिम दृश्य में वे दोनों मोटे गद्दों पर लेटकर सेब का रस पीते हुए दिखाई पड़ते हैं और श्रमिक बैल, घोड़े सूखी घास चबाने की नियति झेल रहे हैं। ‘निरीहों की दुनिया’ अत्याचारियों के प्रति न घृणा का पोषण करती है, न व्यंग्य का। इस दुनिया में दुश्मन के प्रति भी करुणा और मैत्री की अंतःसलिला प्रवाहित है। हथियार को सबकुछ मानने और उसी की तिजारत के बल पर पूरी पृथ्वी को विनाश की कगार पर ला खड़ा करने वालों को अभ्यासवश मनुष्य भले कह दिया जाय, उनकी असलियत क्या है, यह बात ‘निरीहों की दुनिया’ इस तरह बयान करती है- ‘‘आदमियों का कोई भरोसा नहीं। खरगोशों और कछुओं को तो वे मारते ही हैं पर उनसे भी बहुत बहुत ज्यादा वे उन आदमियों को मार डालते हैं जो बिल्कुल उन्हीं जैसे होते हैं। सच तो यह है कि आदमी ने पता लगा लिया है कि हथियार से बढ़कर कोई ताकत दुनिया में नहीं है और जिसके पास हथियार है वह जो मन चाहे कर सकता है।’’ पाठक की चेतना में कुवैत, ईराक, अफगानिस्तान जैसे दृश्य अपने आप उभर आते हैं। खरगोश आगे कहता है- ‘‘हथियार हाथ में होने से वह खरगोशों, कछुओं की कौन कहे बड़े-बड़े जानवरों और अच्छे बुरे सभी तरह के लोगों की हत्या कर सकता है। ऐसे में खरगोश और कछुए जैसे निरीह प्राणी उससे अपनी रक्षा कैसे कर सकते हैं ?’’

कथा के आखिरी पृष्ठ पर मुखिनी कहती है- ‘‘आदमी से बचने का सबसे सरल उपाय उसके हथियार से दूर रहना है, क्योंकि बिना हथियार के वह उन्हीं जैसे निरीह होता है।’’ कछुआ उस दुनिया के बारे में सोचने लगता है जो सिर्फ निरीह प्राणियों की होगी। विश्‍व से सारे हथियारों के मिट जाने के बाद आदमी भी निरीह प्राणियों में शुमार हो जाएगा। तब उसके पास प्रेम, सहजीवन और त्याग की अपराजेय शक्ति होगी। खरगोश कछुए की तीसरी दौड़ खारिज कर दी जाती है। कथाकार बच्चों की कथालिप्सा का पोषण करते हुए मुखिनी से कहलवाते हैं- ‘‘यह खारिज दौड़ जब भी हो तो निरीहों की दुनिया की पहली खरगोश और कछुए की दौड़ होगी।’’

यह पंचतंत्र-परम्परा की वह कथा है जो कूटनीति को भी हथियार की तरह ही त्याज्य समझकर खारिज कर देती है। अपने समय की जटिलता से सहमे हुए, बेहतर दुनिया की तलाश करने वाले प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति को यह उपन्यास बेहद आत्मीय लगेगा। लेखक के प्रति कृतज्ञता और प्रकाशक को बधाई।

पुस्तक : नि‍रीहों की दुनि‍या, पृष्ठ  : 136, मूल्य  : 70 रुपये
प्रकाशक- रोशनाई प्रकाशन, 212 सी.एल./ए., अशोक मि‍त्र रोड,
कांचरापाड़ा, उत्तर 24 परगना, पश्‍चि‍म बंगाल

बेबी हालदार : अंधेरे में रोशनी की किरण

घरों में काम करने वाली मामूली-सी नौकरानी बेबी हालदार कैसे लेखिका बन गई, इसकी बेहद प्रेरणादायक और संघर्षपूर्ण दास्तान है। वह जिस घर में चौका-बरतन करती थी, उसके एक कमरे की तीन अलमारियां किताबों से भरी थीं। उनमें बांग्ला की भी बहुत सी किताबें थीं। उन्हें देखकर बेबी के मन में यह बात उठती कि इन्हें कौन पढ़ता होगा? कभी-कभी वह एक-दो किताब खोलकर देख भी लेती। एक दिन डस्टिंग करते समय वह कोई किताब उलट-पलट रही थी, तभी गृहस्वामी प्रबोध कुमार आ गए। उन्होंने उसे किताबें उलटते-पलटते देखा, लेकिन कहा कुछ नहीं।
अगले दिन वह चाय लेकर आई तो प्रबोध कुमार ने पूछा, ”तुम कुछ लिखना-पढऩा जानती हो?”
बेबी ऊपरी हंसी हंसकर जाने लगी तो उन्होंने फिर पूछा, ”बिलकुल भी नहीं जानतीं?”
बेबी ने सोचा- झूठ क्यों कहूं कि एकदम नहीं जानती। वह बोली, ”छठी तक।”
अगले दिन बेबी आई तो प्रबोध कुमार ने पूछा, ”बेबी, तुमने स्कूल में जो किताबें पढ़ीं, उनमें किन लेखकों व कवियों को पढ़ा? कुछ याद है?”
बेबी ने झट से कहा, ”हां, कई तो हैं। जैसे- रवींद्रनाथ ठाकुर, काजी नजरुल इस्लाम, शरतचंद्र, सत्येंद्रनाथ दत्त, सुकुमार राय।”
प्रबोध कुमार प्रेमचंद के नाती हैं और खुद एक जाने-माने लेखक हैं। नजरुल उनके प्रिय कवि हैं। नजरुल का नाम सुनकर उनके चेहरे पर चमक आ गई।
उन्होंने पूछा, ”नजरुल का कोई गीत याद है?”
”हां।”
”तो सुनाओ।”
बेबी ने सहजता से नजरुल के एक-दो गीत सुना दिए।
प्रबोध कुमार सोचने लगे- चौबीस घंटे पेट के लिए व्यस्त रहने के बावजूद इसे गीत याद है। इसमें कुछ तो है। किताबें उलटना-पलटना इस बात का संकेत है कि इसमें सोचने-समझने की क्षमता है। फिर क्यों न इसे लिखने-पढऩे के लिए प्रेरित किया जाए?
उन्होंने बेबी के सिर पर हाथ रखा और कुछ क्षण बाद कहा, ”तुम्हें पढऩे-लिखने का शौक है?”
बेबी निराशा से बोली, ”शौक होने से भी क्या? पढऩा-लिखना तो अब होने से रहा?”
प्रबोध कुमार उत्साहित करते हुए बोले, ”होगा क्यों नहीं? मुझी को देखो- अभी तक पढ़ता हूं। मैं पढ़ सकता हूं तो तुम क्यों नहीं पढ़ सकती?”
वह बेबी को ऊपर के कमरे में ले गए। उन्होंने अलमारी में से एक किताब निकाली और पूछा, ”बताओ तो यह क्या लिखा है?”
बेबी संशय में पड़ गयी- पढ़ तो ठीक ही लूंगी। फिर सोचा- लेकिन गलती हो गयी तो।
प्रबोध कुमार बेबी के संशय को समझ गए। उन्होंने कहा, ”पढ़ो, कुछ तो पढ़ो।”
बेबी ने पढ़ा, ”आमार मेये बेला, तसलीमा नसरीन।”
प्रबोध कुमार बोले, ”तुम यही सोच रही थी कि कहीं गलती तो नहीं हो जाएगी। यह किताब तुम ले जाओ। घर पर समय मिले तो पढऩा।”
बेबी किताब लेकर घर चली गई। वह उसमें से रोज एक-दो पेज पढऩे लगी। किताब पढऩे में पहले उसे थोड़ी बहुत दिक्कत हुई, लेकिन धीरे-धीरे दिक्कत दूर हो गयी। किताब पढऩा उसे अच्छा लगने लगा।
कुछ दिन बाद प्रबोध कुमार ने बेबी से पूछा, ”तुम जो किताब ले गई थी, उसे ठीक से पढ़ तो रही हो?”
बेबी ने ‘हां’ कहा तो वह बोले, ”मैं तुम्हें एक चीज दे रहा हूं। तुम इसका इस्तेमाल करना। समझना कि मेरा ही एक काम है।”
बेबी ने उत्सुकता से पूछा, ”कौन-सी चीज?”
प्रबोध कुमार ने अपने लिखने की टेबिल के ड्राअर से पेन-कापी निकाली और बोले, ”इस कापी में तुम लिखना। लिखने को तुम अपनी जीवन कहानी भी लिख सकती हो। होश संभालने के बाद से अब तक जितनी भी बातें तुम्हें याद आएं, सब इस कॉपी में रोज थोड़ा-थोड़ा लिखना।”
बेबी पेन और कॉपी घर ले आई। उस दिन से रोज एक-दो पेज लिखने लगी। और इस तरह शुरू हुई मामूली-सी नौकरानी बेबी हालदार की लेखिका बनने की प्रक्रिया।
बेबी तस्लीमा नसरीन की किताब ‘आमार मेये बेला’ पढ़ चुकी थी। इसलिए उसे अपने साथ घटी किसी भी घटना को लिखने में संकोच या झिझक नहीं हुई और वह बेबाकी से लिखती चली गई।
बेबी के जीवन की शुरुआत पृथ्वी का स्वर्ग कहे जाने वाले जम्मू-कश्मीर से हुई। वहां उसके बाबा (पिता) नरेंद्रनाथ नौकरी करते थे। इसके बाद वे लोग मुर्शिदाबाद, डलहौजी व पुन: मुर्शिदाबाद रहे। नरेंद्रनाथ उन्हें वहां छोड़कर नौकरी पर चले गए। वह हर महीने खर्च के लिए पैसे भेजते। कुछ महीने तो पैसे नियम से आते रहे, लेकिन फिर कई-कई महीने नागा होने लगी। परिवार को आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता। लेकिन सारे कष्टो के बाद भी बेबी की मां ने बच्चों का पढऩा-लिखना जारी रखा।
एक दिन नरेंद्रनाथ रिटायर होकर घर आ गए। उन्होंने घर के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं निभाई। बेबी की मां आर्थिक परेशानियों व पति के दुव्र्यवहार से तंग आकर घर छोड़कर चली गई।
तमाम कठिनाइयों के बावजूद बेबी ने स्कूल जाना नहीं छोड़ा। कभी-कभी तो बिना कुछ खाए स्कूल जाना पड़ता। एक दिन सहेली के सामने उसके मुंह से निकल गया कि खाने के लिए कुछ नहीं है। नरेंद्रनाथ ने यह बात सुन ली। बेबी जब स्कूल से लौटी तो उन्होंने उसे इतना मारा कि तीन दिन वह उठ नहीं सकी और कई दिन स्कूल नहीं जा सकी।
नरेंद्रनाथ ने दूसरा विवाह कर लिया। दूसरी मां उनकी कोई बात नहीं सुनती, समय पर खाना नहीं देती, बिना कारण बच्चों को पिटवाती।
नरेंद्रनाथ को दुर्गापुर में एक फैक्टरी में नौकरी मिल गई। वहां उन्होंने तीसरी शादी कर ली। वह दूसरी बीवी से झूठ बोलकर बच्चों को साथ ले गए। दुर्गापुर जाने के बाद नरेंद्रनाथ ने बच्चों की पढ़ाई शुरू नहीं करवाई। लेकिन बेबी में पढऩे की इच्छा देखकर उन्होंने कुछ दिन बाद उसे पढऩे के  लिए जेठा (ताऊ) के पास भेज दिया।
बेबी के जेठा के पास रहने से तीसरी मां को घर के काम-काज में असुविधा होने लगी, इसलिए उसे वहां से बुलवा लिया। बेबी की पढ़ाई फिर बंद हो गई। पढ़ाई बंद होने का बेबी को मानसिक आघात लगा। वह सोते-जागते, उठते-बैठते, खाते-पीते अपनी पढ़ाई की चिंता करती। इसके कारण वह बीमार पड़ गई। बाबा ने उसे अस्पताल में भर्ती करवा दिया।
स्वस्थ होने के बाद बेबी अस्पताल में ही थी। एक दिन वह सवेरे सोकर उठी तो उसने देखा कि उसका बिस्तर रक्त से लाल हो गया है। वह भय से रोने लगी। उसका रोना सुनकर नर्स आ गई। नर्स ने तकलीफ के बारे में पूछा, तो बेबी कुछ बोल नहीं सकी। अचानक नर्स की नजर रक्त से सने बिस्तर पर पड़ी। वह समझ गई कि बेबी रक्त देखकर ही रो रही है। वहां और दो-चार लोग जमा हो गए। वे दबी हंसी-हंसने लगे। बेबी के आसपास के रोगियों ने उसे समझाया कि रोओ मत। जब लड़कियां बड़ी हो जाती हैं तो ऐसा ही होता है।
इस घटना के बाद नरेंद्रनाथ का व्यवहार बेबी के प्रति बदल गया। वह उसे डांटते नहीं। किसी काम में भूल होने पर सिर्फ इतना कहते कि तुम अब बड़ी हो गई हो, तुमसे भूल नहीं होनी चाहिए। यह बात बार-बार सुनकर बेबी भी सोचने लगी कि क्या वह सचमुच बड़ी हो गई है।
एक रात बेबी बाहर बने बाथरूम से निकली तो बाबा सामने खड़े थे। उन्होंने उसे प्यार से अपने पास खींच लिया। उनकी आंखों में आंसू थे। बेबी की विमाता दरवाजे की दरार में से झांककर देख रही थी। उस रात के बाद बाबा और विमाता में बेबी को लेकर झगड़ा होने लगा। इससे सारा घर अशांत हो उठा। अशांति के डर से उन्होंने बेबी के पास आना बंद कर दिया और वह भी वहां खड़ी नहीं होती, जहां बाबा होते।
उन्हीं दिनों खेलने-कूदने की उम्र में उसकी शादी कर दी गई। वह भी दोगुनी उम्र के पुरुष से।
चौदह वर्ष से भी कम उम्र में बेबी गर्भवती हो गई। बेबी के पेट में दर्द उठना शुरू हो गया। छह दिन पूरे होने के बाद भी जब कुछ नहीं हुआ तो उसे अस्पताल में भर्ती करा दिया गया। सभी लोग उसे अकेला छोड़कर वापस आ गए।
बेबी अकेली पड़ी-पड़ी दर्द से रोने-चिल्लाने लगी। इससे आसपास के रोगियों को असुविधा होने लगी तो उसे दूसरे कमरे में ले जाकर एक टेबिल पर लिटा दिया गया और उसके हाथ-पैर बांध दिए गए। अचानक उसके पेट में इतने जोर से दर्द उठा कि पागल सी हो गई। नर्स दौड़कर डॉक्टर को बुला लायी। डॉक्टर ने बेबी के पेट को बेल्ट से बांध दिया और फिर पेट में कुछ टटोलने के बाद बताया कि बच्चा उलट गया है। नर्स एक और डॉक्टर को बुला लायी। दर्द के मारे बेबी इतनी जोर से हाथ-पैर झटक रही थी कि सब बंधन खुल गए। चारों लोगों ने मिलकर उसे फिर बांध दिया। डॉक्टर ने बच्चे को सर से पकड़कर बाहर निकाल दिया। बेबी का रोना-चिल्लाना बंद हो गया और वह बिलकुल शांत हो गई। अगले दिन उसका पति उसे घर ले आया।
एक दिन बेबी को पता चला कि उसकी दीदी नहीं रही। दीदी को जीजा ने गला घोंट कर मार डाला था। वह अपनी दीदी को देखने जाना चाहती थी। लेकिन पति ने उसे नहीं जाने दिया। उसे लगा- वह एक आदमी की बंदिनी है इसलिए नहीं जा पायी। वह जो कहे वही उसे सुनना होगा, जो कहे वही करना होगा, लेकिन क्यों? जीवन तो उसका है, न कि पति का। फिर उसे पति के कहे अनुसार सिर्फ इसलिए चलना होगा कि वह पति के पास है? कि वह मुट्ठी भर भात देता है। पति उसे जिस तरह रखता है, उस तरह तो कुत्ते-बिल्ली को रखा जाता है। जब वहां उसे सुख-शांति नहीं मिलती तो क्या जरूरी है कि वह पति के पास रहे?
बेबी का बच्चा जब तीन माह का हो गया तो वह पहली बार अपने ससुर के साथ ससुराल गई। वहां उसके बच्चे को खूब लाड़-प्यार मिला। सास बच्चे को मिट्टी में खेलने नहीं देती। लड़का होने के कारण उसे भी कुछ अधिक आदर मिला। वह करीब एक माह वहां रही।
बेबी के पाड़े में षष्टि नाम की एक लड़की थी। बेबी की सबसे ज्यादा उसी से पटती थी। लेकिन उसका वहां आना-जाना उसके पति को पसंद नहीं था। एक दिन बेबी षष्टि के घर गई थी कि उसका पति आ गया। बच्चे को लेकर डरते-डरते वह घर आई तो पति ने बिना कुछ कहे-सुने उसके बाल पकड़ कर लात-घूंसों से मारना शुरू कर दिया। वह जोर-जोर से गाली भी दे रहा था। सड़क पर बहुत से लोग आ-जा रहे थे, लेकिन किसी ने भी उसके पति को नहीं रोका। उसे रोकने के बजाए कुछ लोग वहां खड़े होकर बेबी की पिटाई का मजा लेने लगे।
षष्टि के बारे में पाड़े में लोगऊटपटांग बात करते थे। बेबी उसे खराब नहीं समझती थी। वह सोचती- एक लड़की होकर दूसरी लड़की को खराब क्यों समझूं? पाड़े की किसी कमेटी का लीडर प्रदीप षष्टि के घर जाता था, लेकिन सब लोग उसका आदर करते। बेबी की पाड़े के लोगों से पूछने की इच्छा होती कि यदि यह लड़की खराब है तो तुम्हारा यह लीडर कैसे अच्छा हो गया, जो उसके पास आता है! पाड़े के लोग एक-दूसरे की आलोचना करते रहते थे कि किसकी स्त्री किससे बात करती है, कौन किससे प्रेम कर रहा है, किसकी लड़की किसके साथ भाग गई। उनके  घर में क्या हो रहा है, इस पर उनकी नजर नहीं जाती। किसी का अच्छा खाना-पहनना उन्हें सहन नहीं होता और वे उसके प्रति ईष्यालु हो उठते। बेबी को ये सब बातें खराब लगतीं।
उनके पाड़े में एक लड़का रहता था अजित। वह बेबी को बऊदी (भाभी) कहता। वह उन लोगों से खूब अच्छी तरह मिलता-जुलता और हंसी-मजाक भी करता। बच्चे को ले जाकर छोटी-मोटी चीज दिला देता। धीरे-धीरे यह सब कुछ ज्यादा ही होने लगा। बेबी ने मना भी किया, लेकिन वह नहीं माना।
इससे लोग बेबी को बदचलन समझने लगे, उसका पति उसे मारने-पीटने लगा। तंग आकर वह अपने पति की बातों का जवाब देने लगी।
अजित की हरकतें कम होने की बजाए बढऩे लगीं। पाड़े के लोगों ने उसे मारना-पीटना चालू कर दिया। इस कांड को लेकर लोग तरह-तरह की बातें करते। कुछ लोग अजित को दोषी ठहराते तो कुछ बेबी का भी इसमें दोष मानते।
षष्टि की मां के बुलाने पर एक दिन बेबी उनके घर गई तो पीछे-पीछे उसका पति भी वहां पहुंच गया। उसने बिना किसी से कुछ बोले, पत्थर उठाकर बेबी के माथे पर दे मारा। उसका माथा फूट गया और खून बहने लगा। वह बच्चे को गोद में उठाकर घर आ गई। उसने पूछा कि उसकी क्या गलती थी, जो उसे इस तरह मारा? इतना सुनते ही उसके पति ने एक मोटा बांस उठाया और उसके पीछे दे मारा। इसके कुछ देर बाद ही बेबी के पेट में भयंकर दर्द होने लगा। दर्द असहनीय हो गया। दर्द के मारे वह न उठ सकती थी, न कुछ खा सकती थी और न ही सो सकती थी। रात को भी वह चीखती-चिल्लाती रही और उसका पति आराम से सोता रहा।
तब बेबी अपने बच्चे को साथ ले, अपना पेट पकड़े, मां-रे, बाबा-रे चिल्लाती हुई सामने रहने वाले महादेव के पास गई। बेबी ने महादेव को भेजकर अपने घर से भाई को बुलवाया। बेबी का बड़ा भाई उसे ठेले में लादकर अपने साथ ले गया। उस समय रात के करीब दो बज रहे थे। पति की मार से पेट का बच्चा गिर गया।

एक बार बेबी अपनी पिसिमा (बुआ) के घर गई। वह अपने दु:खमय जीवन के बार में बता रही थी। एक अधेड़ उम्र की औरत वहां खड़ी ये सब बातें सुन रही थी। उस औरत ने कहा कि कपाल में जो लिखा था, वही हुआ। इतनी कम उम्र में इतने बड़े बच्चे की मां बन गई। घर से लड़की को निकालने का बहाना चाहिए था, सो ब्याह कर दिया और नहीं तो क्या? उस औरत को पिसिमा ने जवाब दिया कि जब सब कुछ के लिए कपाल दोषी है तो भगवान ने हाथ, पैर, आंखें क्यों दे रखी हैं, इनकी भी क्या जरूरत थी!
बेबी फिर मां बनने जा रही थी। उसकी तकलीफ और बढ़ गई तो उसके बाबा नरेंद्रनाथ ने उसे कंपनी के अस्पताल में भर्ती करा दिया। लोगों के चले जाने के बाद बेबी को डिलीवरी रूम मे ले जाया गया। वहां चीर-फाड़ के औजार देखकर उसे डर लगने लगा। उसने डाक्टर से कहा कि वह उसे काटे नहीं। उसकी बात सुनकर डाक्टर हंस दिया। रात के दस बजे बच्चा पैदा हुआ। उसके लड़का हुआ था, जबकि वह सोचती थी कि इस बार लड़की हो तो अच्छा रहे।
दो बच्चे होने से घर का खर्च बढ़ गया। बेबी ने सोचा कि कुछ न कुछ करना चाहिए, नहीं तो कैसे काम चलेगा? उसने पाड़े के बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया। उसके पास काफी बच्चे पढऩे के लिए आने लगे। इस तरह बेबी के पास दो-तीन सौ रुपये हो जाते।
कई वर्ष इसी तरह बीत गए। बेबी का लड़का पांचवीं में पहुंच गया था। ट्यूशन से पहले जितनी कमाई अब नहीं होती थी। इसी दौरान बेबी ने एक लड़की को जन्म दिया।
षष्टि के घर दशहरे पर मां मनसा की पूजा थी। पूजा रात को होने वाली थी। शाम को ढाक बजाने वालों के पीछे-पीछे पूजा के लिए जल लाने के लिए पोखरे की तरफ कलसियां लेकर बेबी भी चल दी। उसका पति रास्ते से ही गुस्से में गालियां बकता हुआ, उसे वापस घर ले गया। घर पहुंचकर वह मारने लपका तो बेबी घर से निकल भागी। वह पाड़े में लुकती-छिपती रही और पति उसका पीछा करता रहा। अगले दिन सवेरे-सवेरे बेबी मंदिर में मंत्र पढ़ रही थी कि तभी किसी ने पीछे से उसके बाल खींचते हुए कहा, ”चल साली, घर चल। अभी तुझे मजा चखाता हूं। ”
बेबी सोचने लगी कि इस तरह कितने दिन काटेगी। बच्चे बड़े हो रहे हैं। छोटा लड़का भी स्कूल जाने लगा है। बच्चों की पढ़ाई-लिखाई पर काफी पैसा खर्च हो जाता है, लेकिन पति का इस सबसे कोई मतलब नहीं है। उसने तय कर लिया कि कितने ही कष्ट क्यों न उठाने पड़ें, बच्चों को पढ़ाएगी जरूर, उनके  बाप की तरह निरक्षर नहीं रखेगी। इसी बीच उसका पति बड़े बेटे को ठेले में धक्का लगाने के  लिए ले जाने लगा।
आखिर बेबी ने घरों में काम करने का निश्चय कर लिया। उसे एक घर में काम मिल गया। यह उसकी पहली नौकरी थी। एक-एक कर उसके पास चार-पांच घरों का काम हो गया।
वह बाहर काम करने निकलती और कोई जान-पहचान वाला मिल जाता तो काम-धाम की या इधर-उधर की बातचीत हो जाती। यह उसके पति को बर्दाश्त नहीं होता। किसी के पास उसे खड़ा देख लेता तो घर पहुंचने पर गालियां देता। वह उसे समझाने की कोशिश करती तो पत्थर उठाकर मारने पर उतारू हो जाता। वह सोचती कि काम न करने से भी अशांति और काम करने से भी।
दु:खी मन से वह सोचने लगी कि वह मनुष्य है या जानवर, जो उसका पति उसके साथ ऐसा व्यवहार करता है?
बेबी यह सोचकर कि अब पति के साथ नहीं रहेगी अपने बाबा के पास आ गई। उन्होंने सोचा कि कुछ दिनों में गुस्सा शांत होने पर वह अपने पति के पास चली जाएगी। लेकिन उसने साफ-साफ इनकार कर दिया। इससे वह मुसीबत में पड़ गए। बेबी को लेकर मां बाबा से रोज झगडऩे लगी।
इसी बीच बेबी को अस्पताल में नौकरी मिल गयी। उसे रात की ड्यूटी मिली। अस्पताल में कुछ दिन काम करके उसे लगा कि बच्चों को रात में अकेला छोड़कर ड्यूटी जाना उससे नहीं होगा। इसलिए उसने नौकरी छोड़ दी और अपने बड़े भाई के पास फरीदाबाद जाने का निश्चय कर लिया।

फरीदाबाद में बेबी सवेरे ही खाना बनाकर काम की खोज में निकल जाती। हर जगह उससे यही पूछा जाता कि उसका पति कहां है? जैसे ही वह बताती कि उसका पति साथ नहीं रहता तो फिर कोई बात आगे नहीं चलाता। वह बहुत घूमी-फिरी लेकिन किसी ने उसे काम पर नहीं रखा। भाई और भाभी ने तो जैसे रट ही लगा ली कि पति का घर छोड़ आने से तो उसका मर जाना अच्छा है।
किसी तरह उसे एक कोठी में काम मिल गया। बड़े भाई ने उसके बड़े लड़के को किसी कोठी में लगवा दिया। जहां बेबी को काम मिला, उनका व्यवहार अच्छा नहीं था।
बेबी को दूसरे घर में काम मिल गया। यह प्रबोध कुमार का घर था।
एक दिन अचानक प्रबोध कुमार ने उसकी दिनचर्या के बारे में पूछा और कहा, ”देखो बेबी, तुम समझो, मैं तुम्हारा बाप, भाई, मां, बंधु, सब कुछ हूं। तुम अपनी सारी बात मुझे साफ-साफ बता सकती हो, मुझे बिल्कुल बुरा नहीं लगेगा। ” थोड़ा रुककर उन्होंने फिर कहा, ”देखो, मेरे बच्चे मुझे तातुश कहते हैं, तुम भी मुझे यही कह कर बुला सकती हो। ” उस दिन से बेबी प्रबोध कुमार को तातुश कहने लगी। ‘तातुश ‘ पोलिश भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है तात यानी प्रिय।
बेबी सोचने लगी कि कहीं और भी काम करना चाहिए क्योंकि इतने पैसे में क्या बच्चों को पालेगी और क्या घर का किराया देगी।
प्रबोध कुमार ने समझाया, ”तुम्हें मैंने लिखने-पढऩे का जो काम दिया है, तुम वही करती रहो। तुम देखोगी कि एक दिन यही तुम्हारे काम आएगा। ”
बेबी सवेरे काम पर आती तो प्रबोध कुमार पूछते- कुछ लिखा या नहीं? बेबी ‘हां ‘ कहती तो प्रबोध कुमार बहुत खुश होते। बेबी ने अपना लिखा उन्हें दिखाया। प्रबोध कुमार ने देखा कि बेबी की लिखावट अस्पष्ट है। उसे पढऩा बड़ा मुश्किल है। वर्तनी की अशुद्धि बहुत अधिक हैं। प्रबोध कुमार बेबी का लिखा इसलिए पढ़ व समझ सके, क्योंकि वह सागर विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रहे हैं। वहां अधिकांश बंगाली छात्र थे। वह उनकी लिखावट के अभ्यस्त थे। इसके अलावा वह संघ लोक सेवा आयोग में परीक्षक भी रहे। वहां बांग्ला की स्क्रिप्ट आती थी। इसलिए बांग्ला की खराब से खराब लिखावट को वह पढ़ और समझ सकते हैं। उन्होंने बेबी को लिखावट सुधारने की सलाह दी। कभी-कभी बेबी को लगता कि लिखने में गलती होगी। यह सोचकर वह नर्वस हो जाती। ऐसे में प्रबोध कुमार उत्साह बढ़ाते। वह कहते कि यह सोचेंगे कि गलती होगी तो कोई नहीं लिख पाएगा। जैसा हो, लिखो। बेबी ने भी गलती व भूल के बारे में सोचना छोड़ दिया।
बेबी को जो घटनाएं याद आईं, लिखती चली गई। प्रबोध कुमार ने उन्हें कालक्रम के अनुसार लगाया और बहुत-सी संदर्भहीन घटनाओं को छोड़ भी दिया।
एक दिन वह काम से वापस आई तो देखा कि घर टूटा हुआ है और सारा सामान बिखरा पड़ा है। वह सोचने लगी कि बच्चों को लेकर अब कहां जाऊं? इतनी जल्दी दूसरा घर भी कहां मिलेगा? केवल बेबी के घर को ही नहीं, बल्कि आसपास के और घरों को भी तोड़ा गया था। बच्चों को अपने पास बैठाकर बेबी रोने लगीं। मां को रोता देख बच्चे भी रोने लगे। उस हालत में किसी को कैसे नींद आती? उस खुली जगह में उन लोगों ने ओस में वह रात किसी तरह काटी। अगले दिन सवेरे बेबी ने तातुश को सारी बात बताई। उन्होंने छत का एक कमरा उसके लिए खाली कर दिया।
अपने जीवन की कुछ घटनाओं को भुलाते रहने की कोशिश में बेबी को कभी-कभी ऐसा लगने लगता जैसे वे घटनाएं उसके नहीं बल्कि किसी और के साथ घटी थीं। ऐसे में बेबी प्रमुख पात्र को अपना नाम दे देती। तब ऐसा लगता मानो, बेबी अपनी नहीं किसी और की दास्तां लिख रही है।
अब तक बेबी जितना लिख चुकी थी, उसे प्रबोध कुमार ने फोटोकापी करके अपने एक बंधु व हिंदी के प्रसिद्ध लेखक अशोक सेक्सरिया के पास कोलकाता भेज दिया। उनका उत्साहवर्धक पत्र आया। उन्होंने लिखा कि प्रिय बेबी, मैं बता नहीं सकता कि तुम्हारी डायरी पढ़कर मुझे कितना अच्छा लगा? मैं जानना चाहता हूं कि इतना अच्छा लिखना तुमने कैसे सीखा? तुम्हारा लेखन उत्कृष्ट है। तुम्हारे तातुश ने सचमुच हीरा खोज निकाला है। यहां मेरे जिन-जिन बंधु-बांधवों ने तुम्हारी डायरी पढ़ी है, वे सभी इसे चमत्कार लेखन मानते हैं। मेरे एक बंधु ने कहा है कि वह तुम्हारी रचना को किसी पत्रिका में छपवाने की व्यवस्था करेंगे, लेकिन उसके पहले तुम्हें अपनी कहानी को किसी मोड़ पर पहुंचाना है। आशा करता हूं- तुम कभी लिखना नहीं छोड़ोगी। इसे पढ़कर बेबी का उत्साह और भी बढ़ गया। उसने सोचा- जब सबको अच्छा लग रहा है तो मैं क्यों न लिखूं?
अब बेबी को लिखने की धुन लग चुकी थी। खाने की मेज पर, रसोई में काम करते हुए और घर में काम करते जहां भी समय मिलता, वह लिखने बैठ जाती। बेबी को सहजता से लिखते हुए देखते प्रबोध कुमार सोचते- हम जब लिखते हैं तो मेज-कुर्सी लगाकर, सिगरेट पीकर मूड बनाना पड़ता है। यह कितनी सहजता से लिखे जा रही है। जिसके अंदर कुछ कहने को है, वह तो कहेगा ही, उसे इन सब चीजों की जरूरत नहीं रहती है।
जेठू के यहां उनके बंगाली बंधु आनंद ने ‘आलो-आंधारि ‘ का पहला खंड पढ़कर लिखा- आपकी रचना अच्छी लगी। स्वयं के जीवन की विभिन्न स्मरणीय घटनाओं को सहज भाव से लेखन के माध्यम से सामने रखना बहुतों के लिए शायद संभव नहीं। अपनी इस सुंदर कोशिश को कभी बंद मत करना। अभ्यास और कोशिश से संभव है कि आप हमें कुछ असाधारण दे सकें। नारी अत्याचार, दुर्दशा और उनके आर्थिक कष्ट के बारे में आप सोचें और लिखने की चेष्टा करें।
बेबी जितना लिखती प्रबोध कुमार रोज दिल्ली में अपने एक बंधु रमेश गोस्वामी को फोन पर सुनाते। फोन पर बात करने के बाद प्रबोध कुमार बेबी से बोले, ”तुमने यह जो लिखा है, मेरे बंधु को बहुत अच्छा लगा, ऐनि फै्रंक की डायरी की तरह। ”
बेबी ने पूछा, ”यह ऐनि फै्रंक कौन है? ”
प्रबोध कुमार ने बेबी को ऐनि फै्रंक के बारे में बताया और एक पत्रिका में से डायरी के कुछ अंश पढ़कर सुनाए।
अशोक सेक्सरिया लगातार उत्साहित करते रहते। उनका पत्र आया- बार-बार जिज्ञासा करना बुरी बात नहीं, जिज्ञासा होने से ही हम लिख पाते हैं। भूलों की चिंता करने लगें तो एक लाइन भी लिखी नहीं जा सकती, इसलिए उनकी चिंता किए बिना लिखना होगा। बाद में अपना लिखा खुद ही सुधार लेना होगा। इसके बाद जिन लोगों का काम ही है लिखना-पढऩा, उनसे इसे कुछ और सुधरवाने की बारी आएगी। लिखने-बैठने से ही लिखा जा सकता है, यह अभिज्ञता तुम्हें निश्चित हो ही गई है। तुम्हारे तातुश ठीक कहते हैं कि भूल होती है तो हो, फिर भी लिखो।
इसी बीच एक दिन बेबी से नरेंद्रनाथ मिलने आए। उन्हें कहीं से पता चल गया कि बेबी कुछ लिख-विख रही है। वह बहुत खुश हुए। जहां पहले बेबी की खोज-खबर नहीं लेते थे, वहीं अब जब-तब फोन कर उसका हाल पूछने लगे। वह बार-बार यह भी जानना चाहते कि उसका लिखना कहां तक बढ़ा, खत्म हुआ या नहीं?
बेबी का उत्साह बढ़ाने वाली शर्मिला भी थीं। वह कोलकाता में पढ़ाती थीं। वह बेबी को बहुत स्नेह करतीं।
उनकी चिट्ठियां आतीं- बेबी एक बार सोचकर देखो कि अपने बाबा को तुम जैसा समझती हो, वैसा वह क्यों हैं? इसका कारण क्या है? थोड़ा उनकी तरह से भी सोचो, जिन्हें तुम माफ भले ही न कर सको। बेबी जो हमें अच्छे नहीं लगते, उन्हें भी माफ किया जा सकता है और वैसा करना ही भला है। ये चिट्ठियां बेबी को खुशी से भर देतीं और उसे सोचने-समझने की नई दिशा प्रदान करतीं।
‘आलो आंधारि ‘ का पहला खंड पूरा हो गया तो  ‘साक्षात्कार ‘ में प्रकाशित हुआ।
उस दिन सवेरे बेबी चाय बनाने किचेन की तरफ जा रही थी कि तभी एक लड़का एक पैकेट दे गया। उसने पैकेट खोला। पैकेट में पत्रिका थी। वह उसे पलटने लगी तो उसमें एक जगह अपना नाम देखा। आश्चर्य से उसने फिर देखा। सचमुच ही उसमें लिखा था, ‘आलो आंधारि ‘- बेबी हालदार। वह खुशी से उछल गई। ”देखो, देखो, एक चीज। ” बोलती हुई ऊपर अपने बच्चों के पास भागी। दोनों बच्चे उसके पास आ गए। बेबी ने पूछा, ”देखो, तो क्या लिखा है? ” बेटी ने एक-एक अक्षर पढ़ा और बोली, ”बेबी हालदार। मां तुम्हारा नाम है।” उसने प्यार से बच्चों को अपने पास खींच लिया। अचानक उसे कुछ याद आ गया। बच्चों से ‘छोड़ो-छोड़ो अभी आती हूं ‘ कहकर खड़ी हो गई। नीचे आते-आते सोचने लगी- मैं भी कितनी बुद्धू हूं। पत्रिका में अपना नाम देख लिया तो सब कुछ भूल गई। वह जल्दी-जल्दी सीढिय़ों से उतरकर तातुश के पास गई और पैर छूकर प्रणाम किया। उन्होंने उसके सिर पर हाथ रख आशीर्वाद दिया।
लेखिका बनने की बात बेबी के मन में नहीं थी। यह जरूर सोचती थी कि जीवन में जो घटा, यदि उसकी किताब बन जाती तो अच्छा था। सहेलियों से बात करते हुए, वह अकसर यह बात कहती। आज उसकी यह अभिलाषा पूरी हो गई।
‘आलो-आंधारि ‘ बांग्ला में लिखी गई। इसका हिंदी अनुवाद प्रबोध कुमार ने किया। अनुवाद ही पहले प्रकाशित हुआ। ‘आलो-आंधारि ‘ का पहला संस्करण (हिंदी अनुवाद) दिसंबर 2002 में प्रकाशित हुआ। इसका पाठकों ने दिल खोलकर स्वागत किया। इसका दूसरा संस्करण 2003 में प्रकाशित हो गया। मूल बांग्ला में पुस्तक 2004 में प्रकाशित हुई। ‘आलो-आंधारि ‘ का हिंदी के अलावा मलयालम, तमिल, उडिया, असमिया, मराठी, तेलुगु, अंग्रेजी, इतावली, कोरियाई, चीनी, फ्रांसिसी, जर्मन, नार्वेजियन, डच, स्वीडिश में अनुवाद हो चुका है। एनसीईआरटी की ग्यारहवीं कक्षा की हिंदी की पाठ्य-पुस्तक ‘वितान’ में ‘आलो-आंधारि’ के लगभग पैंतीन पन्नों को पाठ के रूप में शामिल किया गया है।
आज बेबी हालदार एक चर्चित नाम है। लेकिन उसकी दिनचर्या में कोई परिवर्तन नहीं आया है। उसने काम करना नहीं छोड़ा है। 
‘आंलो-आंधारि ‘ छपने के बाद बेबी की दृष्टि में व्यापकता आई है। जहां पहले वह अपने सुख-दु:ख तक सीमित थी, अब उनकी चिंता का विषय समाज है। समाज के गरीब, शोषित तबके के दु:ख-दर्द के बारे में सोचती हैं। उनके आलेख ‘भारतीय लेखक ‘, ‘अक्षर पर्व ‘ आदि पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए। ‘आलो-आंधारि ‘ के बाद के अनुभवों पर आधारित पुस्तक  ‘ईषत् रूपांतर’ भी प्रकाषित हो चुकी है।