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बिटिया: नीरज पाल

युवा कवि‍  नीरज पाल की कवि‍ता-

एक गुड़ि‍या के कच्चे रुई के फाहे सी है बिटिया
कभी उछ्लकर कभी बिदककर आटे की चिड़ि‍या है बिटिया
नन्हे पावों की धीमी थाप है बिटिया
सर्दी में गर्म रोटी की भाप है बिटिया
बिटिया पावन गंगाजल है
बिटिया गरीब किसान का हल है
चूड़ि‍यों की खनक, पायलों की झंकार है बिटिया
झरने की मद्दम फुहार है बिटिया
कभी धूप कभी छांव कभी बरसात है बिटिया
गर्मी में पहली बारिश की सौगात है बिटिया
चिड़ि‍यों की चहचाहट कोयल की कूक है बिटिया
हो जिसमे सबका भला वो प्यारा सा झूठ है बिटिया
और किसी मुश्किल खेल में मिलने वाली जीत है बिटिया
दिल को छू जाए वो मधुर गीत है बिटिया
माँ की एक पुकार है बिटिया
मुस्काता एक त्योहार है बिटिया
सच बोलूं तो बिटिया पीड़ा की गहरी घाटी है
क्या किसी ने उसकी पीड़ा रत्ती भर भी बांटी है
अरमानों के काले जंगल उसको रोज जगाते हैं
हम, बिटिया कैसी हो, कह कर चुपचाप सो जाते हैं
हर दुःख को हंसते हंसते बिन बोले सह लेती है
पूरे घर में खुशी बिखेरे बिटिया दुःख में रह लेती है।