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काव्योत्सव के बहाने सार्थक पहल

दीवार पत्रिका पर स्लाइड शो प्रस्तुोत करते महेश पुनेठा।

दीवार पत्रिका पर स्लाइड शो प्रस्तुोत करते महेश पुनेठा।

गंगोलीहाट: लोकतांत्रिक साहित्य मंच की ओर से 11 व 12 जून को ब्लाक संसाधन केन्द्र गंगोलीहाट के सभागार में दो दिवसीय ‘ काव्योत्सव’ संपन्न हुआ। इसमें कविता पोस्टर प्रदर्शनी, दीवार पत्रिका पर स्लाइड शो, काव्यगोष्‍ठी, प्रकृति भ्रमण तथा नागार्जुन के कृतित्व पर विचार गोष्‍ठी का आयोजन किया गया।

पहले दिन दीवार पत्रिका पर स्लाइड शो से कार्यक्रम की शुरूआत हुई। दीवार पत्रिका के सम्बन्ध में शि‍क्षक-कवि व आलोचक  महेश चंद्र पुनेठा ने इसके उद्देश्‍यों पर प्रकाश डालते हुए, विभिन्न विद्यालयों से आए हुए बच्चों, अभिभावकों, शि‍क्षकों व उपस्थित जन समूह को उपयोगी व्याख्यान दिया। दीवार पत्रिका के माध्यम से किस प्रकार बच्चों की रचनात्मक क्षमता का विकास होता है तथा वे विषय को आसानी से समझते हुए अपनी सम्पूर्ण भागीदारी का निर्वहन करते हैं, को देशभर में चल रहे दीवार पत्रिका निर्माण व उसके प्राप्त हो रहे सकारात्मक परिणाम के माध्यम से समझाया। उन्होंने स्वयं अपने विद्यालय में इसके माध्यम से प्राप्त परिणामों को साक्ष्य सहित छात्र-छात्राओं तथा अध्यापकों के सम्मुख प्रस्तुत किया तथा शि‍क्षकों से अपील की कि वे बच्चों में रचनात्मक शक्ति का विकास करने तथा उनकी कल्पना शक्ति को पंख देने के लिए व स्थाई ज्ञान को प्राप्त करने में सहज रूप से दीवार पत्रिका का उपयोग करें। इससे जहां एक ओर बच्चे अपने समय का सदुपयोग करेंगे, वहीं दूसरी ओर उनमें सीखने और समझने की जिज्ञासा निरन्तर बढ़ेगी। उन्होंने विभिन्न उदाहरणों के माध्मम से सीखने-सिखाने में इसकी उपयोगिता का सहज चित्रण किया। बीच-बीच में बच्चों के साथ पहेली, चुटकुले, बिंब निर्माण, षीर्शक चयन से संबंधित गतिविधियां करवाई गईं। एक अच्छी दीवार पत्रिका में क्या-क्या स्तम्भ होने चाहिए तथा उन्हें कैसे तैयार किया जा सकता है आदि के संबंध में स्लाइड शो के माध्यम से बताया। बच्चों को कुछ छोटी-छोटी फिल्में भी दिखाईं। इस स्लाइड शो तथा उस पर आधारित आकर्षक प्रस्तुतीकरण के बाद विद्यालयों से आए हुए छात्र-छात्राओं से विविध विधाओं पर मौलिक लेखन करवाया गया। यद्यपि प्रारंभ में बच्चों में कुछ झिझक देखी गई, परन्तु जैसे ही उन्होंने लिखना आरंभ किया, धीरे-धीरे उनका आत्मविश्‍वास बढ़ता गया और वे सहज रूप से लिखने लगे। इस कार्यशाला में बच्चों ने लेखन की बारीकियों को समझते हुए कई विधाओं पर स्वयं अपनी रचनाएं तैयार कीं।

इस अवसर पर कार्यक्रम स्थल में सुप्रसिद्ध चित्रकार कुंवर रवीन्द्र द्वारा बनाए गए देश के प्रतिष्ठित और युवा कवियों की कविताओं की पोस्टर प्रदर्शनी का भी आयोजन किया गया। रेनेसां और कस्तूरबा आवासीय बालिका विद्यालय के विद्यार्थियों सहित स्थानीय शि‍क्षकों, आमंत्रित कवियों और साहित्य व कला प्रेमियों ने दशाईथल में आयोजित इस प्रदर्शनी का अवलोकन किया। इन कविता पोस्टरों का अवलोकन करते हुए भी बच्चों ने कविता की बारीकियों को समझा और शायद इसी का परिणाम था कि शाम को आयोजित कवि गोष्ठी में लगभग बीस छात्र-छात्राओं ने अपनी मौलिक कविताओं का मंच पर पाठ किया। गंगोलीहाट जैसी छोटी जगहों पर इस तरह की प्रदर्शनी का आयोजन होना बड़ी बात है। इससे बच्चों में कला और साहित्य के प्रति रूझान बढ़ता है। बच्चों में चित्रों को पढ़ने की क्षमता का विकास होता है। कविता की समझ पैदा होती है। लगभग चार दर्जन पोस्टरों का प्रदर्शन किया गया, जिनमें हिंदी के प्रतिष्ठित कवियों की कविताएं थीं। जिन कवियों की कविताओं के पोस्टर लगाए गए उनमें प्रमुख थे- शील, रघुवीर सहाय, मानबहादुर सिंह, नागार्जुन, मुक्तिबोध, केदारनाथ सिंह, ओमप्रकाश बाल्मीकि, नरेश सक्सेना, केशव तिवारी, शि‍रीष कुमार मौर्य, अनुज लुगुन, नवनीत पांडे, बुद्धिलाल पाल, महेश चंद्र पुनेठा, अविनाश मिश्र, रेखा चमोली।

उल्लेखनीय है कि कुंवर रवीन्द्र अब तक लगभग अठारह हजार से अधिक चित्र और कविता पोस्टर बना चुके हैं। देश के लगभग दो सौ छोटे-बड़े शहरों में उनके चित्रों की प्रदर्शनी लग चुकी है। गत वर्ष पिथौरागढ़ में आयोजित पहले लोक विमर्श कार्यक्रम में इन चित्र और पोस्टरों की प्रदर्शनी लगी थी, जिसमें देशभर से लगभग दो दर्जन साहित्यकार उपस्थित रहे।

सायं सात बजे से ब्लाक संसाधन केन्द्र के सभागार में कवि गोष्ठी का आयोजन किया गया जिसमें कुमाऊंभर से आए हुए प्रतिष्ठित कवियों ने काव्य पाठ किया। साथ ही बीच-बीच में देश-विदेश के प्रतिष्ठित कवियों का काव्य पाठ उनके स्वयं के स्वर या किसी दूसरे के स्वर में प्रोजेक्टर के माध्यम से किया गया। इन कवियों में मंगलेश डबराल, नरेश सक्सेना, पाश, नाजिम हिकमत, ओमप्रकाश बाल्मीकि, अनामिका, मुक्तिबोध आदि प्रमुख थे। कवि सम्मेलन में कस्तूरबा बालिका आवासीय विद्यालय से आए लगभग दो-दर्जन छात्राओं द्वारा भी स्वरचित कविताओं का वाचन किया, जिसे काफी सराहा गया। कुमाऊंनी कवि जनार्दन उप्रेती की अध्यक्षता में आयोजित इस काव्य संगोष्ठी के मुख्य अतिथि राजकीय इण्टर कालेज दशाईथल के प्रधानाचार्य किशोर कुमार पन्त रहे। काव्‍य संगोष्‍ठी का संयोजक युवा साहित्यकार रमेश जोशी ने कि‍या।

अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में व्याप्त बुराइयों पर कवियों ने अपनी कलम की पैनी धार चलाते हुए समाज को सकारात्मक दिशा की ओर ले जाने का आह्वान किया। सम सामयिक विषयों के साथ-साथ ऐसे विषयों को इन्होंने अपनी कविताओं में स्थान दिया, जहां पर सामान्य व्यक्ति की निगाह नहीं जाती है। सभी प्रतिष्ठित कविगणों द्वारा अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज में मौजूद विसंगतियों-विडंबनाओं पर करारी चोट की गई तथा एक लोकतांत्रिक और शोषणमुक्त समाज बनाने का स्वप्न पेश किया। देर रात्रि तक चले इस कवि सम्मेलन में अल्मोड़ा से आये चर्चित कुमाऊंनी कवि शंकर दत्त जोशी, युवा कवि-आलोचक  महेश पुनेठा, रमेश चन्द्र जोशी, कुमाऊंनी कवि प्रकाश चन्द्र जोशी,  विनोद उप्रेती, राजेश पन्त, डा. मोहन आर्य, आशा सौन, विक्रम नेगी, नवीन विश्‍वकर्मा, ‘बाखली’ के संपादक गिरीश पाण्डे ‘प्रतीक’ दिनेश पाण्डे, कवि-रंगकर्मी जनार्दन उप्रेती, किशोर कुमार पन्त आदि ने अपनी कविताओं का पाठ किया। इस कवि गोष्ठी में विद्या प्रसाद भट्ट, रवि पुनेठा, नवीन चन्द्र पन्त,  कमलेश पन्त,  राजेन्द्र खाती,  सुनील उप्रेती,  संदीप जोशी, हरीश पण्डा, मनोज वर्मा, श्री दिनेश पाण्डे, डा. ज्योति निवास पन्त, कुमारी रेणू साह, दीपक पन्त और पिथौरागढ़ से आए ‘आरम्भ’ समूह के युवा साथी रोहित बि‍ष्‍ट, आयुष जोशी, महेन्द्र रावत, अभि‍षेक पुनेठा सहित दो दर्जन से अधिक साहित्य प्रेमी उपस्थित रहे।

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दूसरे दिन की शुरूआत पाताल भुवनेश्‍वर गुफा के भ्रमण से हुई। देवदार के जंगलों के बीच अवस्थित यह गुफा लगभग डेढ़ सौ मीटर लंबी है। यह पौराणिक गुफा है, जिसका वर्णन स्कंदपुराण के मानसखंड में भी है। वहां से लौटकर  बाबा नागार्जुन के कृतित्व पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन हुआ। वक्ताओं का कहना था कि बाबा नागार्जुन जनता के कवि हैं। उनकी कविताएं सीधे जनता से संवाद करती हैं। उनके जीवन और भाषा दोनों को अपनी कविताओं का अंग बनाते हैं। क्रियाशील जीवन से कथ्य और रूप का चुनाव करते हैं। नागार्जुन जीवनभर उन्हीं के पक्ष में लिखते रहे और जनविरोधी सत्ता का प्रतिपक्ष रचते रहे। यह प्रतिपक्ष केवल कविता तक ही सीमित नहीं था, बल्कि जीवन में भी दिखता था। जनआंदोलनों में भाग लेना और जेल जाना इस बात का उदाहरण है। नागार्जुन न केवल जनता के कष्‍टों और संघर्षों को चित्रित करते हैं, बल्कि उनसे मुक्ति का रास्ता भी बताते हैं। सामूहिकता पर उनका गहरा विश्‍वास रहा। अपने लोक और जनपद से गहरे तक सपृक्त रहे। इस सबके चलते वह जनकवि कहलाए।

‘नागार्जुन का व्यक्तित्व और कृतित्व’ विषयक गोष्‍ठी की अध्यक्षता करते हुए युवा साहित्यकार रमेश जोशी ने कहा कि नागार्जुन एक ऐसे कवि थे, जो आजीवन समाज में बदलाव के लिए लिखते रहे और सत्य के पक्ष में खड़े रहे। उन्होंने अपने जीवन में जो भी कविताएं लिखीं, पहले वे उससे होकर गुजरे। उनकी समदृष्टि ही उन्हें समकालीन साहित्यकारों से पृथक बनाती है। उन्होंने समाज में व्याप्त कुरीतियों, घटित हो रहे अत्याचारों आदि पर अपनी कलम चलाई और इसके लिए जो भी दोषी हो, उसे कटघरे में खड़ा किया। चाहे वो कितना ही प्रभावशाली ही क्यों न हो। जन सामान्य की भलाई के लिए आजीवन सत्ता से उन्होंने संघर्ष किया। उन्हें समाज में वो सब दिखता था, जो कि औरों की नजरों में नहीं होता था। उन्होंने कवियों से अपील करते हुए कहा कि आज साहित्यिक क्षेत्र के लोगों को लिखने के लिए बाबा नागार्जुन को पहले पढ़ना होगा। विशेषतया कवियों को ध्यान देना होगा कि वे जिस प्रकार का साहित्य सृजन कर रहे हैं, उसे जि‍ए भी। कविता को जीना बहुत जरूरी है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में तो इसका और भी महत्व हो जाता है, जबकि महत्वाकांक्षाएं चरम पर हैं। ऐसी स्थिति में कोरे आदर्शों का कोई महत्व नहीं होगा। अतः हम सभी साहित्य बिरादरी के लोगों को चाहिए कि समाज की आवश्‍यकताओं के अनुरूप लिखा जाए और उसे जिया जाना भी जरूरी है। बाबा नागार्जुन चूंकि जनकवि थे, उनके आदर्शों पर चलकर ही हम वास्तविक साहित्य साधना करते हुए समाज हित में कुछ सकते हैं।

बतौर मुख्य अतिथि पशु चिकित्सक व युवा कवि डॉ. मोहन आर्या ने नागार्जुन की चर्चित कविता ‘हरिजन गाथा’ का संदर्भ देते हुए कहा कि भले इस कविता की कुछ सीमाएं हैं, बावजूद इसके यह दलित जीवन और प्रतिरोध की एक बड़ी कविता है। उनके समकालीनों ने कभी इस तरह के वि‍षय नहीं उठाए। उन्होंने आगे कहा कि आज आवश्‍यकता है कि हम बाबा नागार्जुन को समझें। इसके लिए जरूरी है कि पहले हम उनके साहित्य का अध्ययन करें। जिन परिस्थितियों व देशकाल में उनके द्वारा लिखा गया, इसे भी ध्यान में रखना होगा। इससे पूर्व युवा कवि विक्रम नेगी ने नागार्जुन की कविता ‘बाकी बच गया अंडा’ का पाठ किया। शि‍क्षक-कवि राजेश पंत ने नागार्जुन की काव्य-प्रतिभा पर बोलते हुए उनकी ‘अकाल और उसके बाद’ तथा ‘देवदार’ कविताओं को प्रस्तुत किया। उन्होंने भी इस बात पर बल दिया कि कवियों के लिए उनका साहित्य पढ़ना ही नहीं, बल्कि उनकी परम्परा को आगे बढ़ाना भी जरूरी है। ‘आरम्भ’ समूह की ओर से अभिषेक पुनेठा, रोहित बिष्‍ट, महेंद्र रावत, आयुष जोशी ने संयुक्त रूप से नागार्जुन की प्रदीर्घ कविता ‘हरिजन गाथा’ की नाट्य प्रस्तुति दी। युवा कवि-छायाकार विनोद उप्रेती ने नागार्जुन की कविताओं का पाठ करते हुए कहा कि हमें नागार्जुन के जीवन-मूल्यों को अपने में उतारकर कविता लिखनी होगी। तभी सही अर्थों में हम उनकी परम्परा को आगे बढ़ा पाएंगे। अल्मोड़ा से आए कुमाऊंनी कवि शंकर दत्त जोशी ने नागार्जुन को समर्पित अपनी ‘आरक्षण’ कविता सुनाई। महेश चंद्र पुनेठा ने नागार्जुन के जनकवि कहलाने के कारणों पर अपना आलेख पढ़ा। उन्होंने कहा कि नागार्जुन की कविताएं जनता के यथार्थबोध को जाग्रत कर उसकी चेतना का विस्तार करते हुए जनता के मुक्ति संघर्ष को शक्ति और दिशा देती हैं। अपने समय और समाज की जनता की इच्छाओं, भावनाओं, जीवन उद्देश्‍यों और संघर्षों को अभिव्यक्त करने के कारण ही नागार्जुन की कविताएं लोकप्रिय हैं और इन्हें जनकवि होने का सम्मान प्राप्त है। उन्होंने रेखांकित किया कि नागार्जुन की लोकप्रियता का सबसे पहला कारण उनकी सहजता ही है। उनके पास जटिल से जटिल बातों को भी बड़ी सहजता से कविता में व्यक्त करने का कौशल है। दूसरा कारण उन्होंने कविता को पहले अपने जीवन में रचा फिर कागज पर। तीसरा कारण उनकी लोकपरकता रही। वह लोक और जनपद के बहुत नजदीक रहे, वहीं से कथ्य और रूप ग्रहण किया। क्रियाशील जन से ही भाषा सीखी। चौथा कारण- बाबा में सामूहिकता की भावना गहरे तक पैठी हुई थी। समूह में रहना और सामूहिक संघर्ष करना उनकी फितरत में शामिल रहा। उन्होंने जहां भी दमन-शोषण-उत्पीड़न तथा जीवन का अपमान देखा, अपनी रचना से उसका प्रतिरोध किया। पांचवा कारण- प्रकृति से उनकी निकटता है। उनकी कविताओं में प्रकृति के विविध रूप-रंग देखे जा सकते हैं। इनमें जीवन का सौंदर्य और जीवन का संघर्ष दोनों ही व्यक्त होते हैं। वरिष्‍ठ कवि-रंगकर्मी जनार्दन उप्रेती, जनकवि प्रकाश चंद्र जोशी ‘शूल’, युवा कवयित्री आशा सौन आदि ने भी अपने विचार व्यक्त किए। इस अवसर पर ज्योति निवास पंत, दीप पंत, जोगा राम आदि साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे। विचार गोष्‍ठी  का सफल संचालन युवा कवि और ‘बाखली’ के संपादक गिरीश चंद्र पाण्डेय ‘प्रतीक’ ने किया।

प्रस्तुति – रमेश चन्द्र जोशी

धन्नासेठ प्रकाशक और हिन्दी कवि की विपन्नता का आख्यान: अनवर सुहैल

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बाबा नागार्जुन की चर्चित कविता ‘सौदा’ पर युवा कवि अनवर सुहैल की टिप्‍पणी-

बाबा नागार्जुन के सृजन के केन्द्र में था आम-आदमी, खेतिहर किसान, मजदूर, हस्तशिल्पी, विकल्पहीन मतदाता, स्त्रियाँ, हरिजन और हिन्दी का लेखक। बाबा ने बड़ी आसान भाषा में अपनी बात कही ताकि बात का सीधा अर्थ ही लिया जाये। जिस तरह बाबा नागार्जुन अपनी वेशभूषा, रहन-सहन, खान-पान और बोली-बानी में भदेस और सहज थे, उसी तरह उनका समूचा लेखन प्रथम दृष्टया तो सरल-सहज-सम्प्रेषणीय नज़र आता है किन्तु उनकी अलंकारहीन भाषा का जादू देर तक पाठक-श्रोता के मन-मस्तिष्‍कमें उमड़ता-घुमड़ता रहता है। नागार्जुन की यही विशेषता उन्हें क्लासिक कवियों की श्रेणी में खड़ा करती है।

मैं सोचता हूँ कि आधुनिक हिन्दी का काव्य कितना अपूर्ण होता यदि निराला, मुक्तिबोध, अज्ञेय, केदार और नागार्जुन जैसे लेखकों का सृजन-सहयोग हिन्दी-कविता को न मिला होता। आज का कवि जाने क्यों अपनी परम्परा से दूरी बनाना चाहता है। नागार्जुन की कविता इतनी मारक है कि सीधे टारगेट पर प्रहार करती है और बिना किसी दम्भ के मुस्‍कराकर अपनी जीत का ऐलान करती है। शब्द की मारक क्षमता का आँकलन बाबा की विशेषता थी। बाबा जानते थे कि सब कुछ खत्म हो जायेगा लेकिन कविता में फँसे हुए शब्द हमेशा लोगों के दिलों में जिन्दा रहेंगे और ताल ठोंक कर कहेंगे-

‘बाल न बाँका कर सकी, शासन की बंदूक’
शब्द की शक्ति यही है।
बक़ौल ग़ालिब- ‘जो आँख से टपका तो फिर लहू क्या है?’

नागार्जुन के शब्द बड़े पावरफुल हैं। उनमें ग़ज़ब की धार है, पैनापन है और ज़रूरत पड़ने पर खंज़र की तरह दुश्मन के सीने में उतरने की कला है।

अपने परिवेश की मामूली से मामूली डिटेल बाबा की नज़रों से चूकी नहीं है। बाबा सभी जगह देखते हैं और तरकश से तीर निकाल-निकाल कर प्रत्यंचा पर कसते हैं। इसी तारतम्य में लेखक और प्रकाशक के बीच समीकरण की भी उन्होनें दिलचस्प पड़ताल की है।

हिन्दी के लेखक की दरिद्र आर्थिक-स्थिति और प्रकाशकों की सम्पन्नता को विषय बनाकर बाबा नागार्जुन की एक कविता है ‘सौदा’। ‘सौदा’ यानी ‘डील’। लेखक और प्रकाशक के अंतर्संबंधों की पड़ताल करती कविता ‘सौदा’ में बाबा ने बड़ी सहजता से लेखकों की निरीह-दरिद्रता और प्रकाशकों के काइयाँपन को बयान किया है। इस कविता में यूँ कहें कि धूर्त प्रकाशकों को बड़े प्यार से चाँदी का जूता मारा है। प्रकाशक जो कि मूलतः विक्रेता होता है किन्तु कच्चे माल के रूप में उसे पाण्डुलिपियाँ तो खरीदनी ही पड़ती हैं। इस हिसाब से ‘सौदा’ में प्रकाशक एक ऐसे खरीददार के रूप में प्रस्तुत किया गया है जिसे प्रत्यक्षतः रचनाओं की ज़रूरत है लेकिन वह विक्रेता पर अहसान भी जताना चाहता है कि न चाहते हुए, घाटे की सम्भावना होते हुए भी वह कवि का तैयार माल खरीदने को मजबूर है। ऐसा इसलिए है कि दुर्भाग्यवश प्रकाशक इस धंधे में फँसा हुआ है। अच्छे करम होते तो वह कोई और काम न कर लेता। काहे रद्दी छापने के काम में फँसा होता। प्रकाशक का दृष्टिकोण पता नहीं दूसरी भाषाओं में कैसा है, किन्तु हिन्दी में तो जो नागार्जुन का अनुभव है, वैसा ही खट्टा-कसैला अनुभव कमोबेश तमाम लेखकों को होता है। लेखकों को प्रकाशक की चौखट में माथा रगड़ना ही पड़ता है। सिद्ध करना पड़ता है कि ‘हाँ जनाब, आपने अभी तक जो छापा, वाकई कूड़ा था, लेकिन आप मेरी कृति को तो छापिए, देखिएगा हाथों-हाथ बिक जायेंगी प्रतियाँ और धड़ाधड़ संस्करण पे संस्करण निकालने होंगे। ये किताब छपेगी तो जैसे प्रकाशन जगत में क्रान्ति आ जायेगी। आप एक बार हमारे प्रस्ताव पर विचार तो करें।’

जवाब में प्रकाशक यही कहता रहेगा-
‘लेकिन जनाब यह मत भूलिए कि डालमिया नहीं हूँ मैं
अदना-सा बिजनेसमैन हूँ
खुशनसीब होता तो और कुछ करता
छाप-छाप कर कूड़ा भूखों न मरता।’

ये हैं मिस्टर ओसवाल, हिन्दी की प्रगतिशील पुस्तकों के पब्लिशर मिस्टर ओसवाल। जिनकी नामी दुकान है ‘किताब कुंज’। मिस्टर ओसवाल का चरित्र-चित्रण जिस तरह नागार्जुन ने किया है उससे हिन्दी के अधिकांश लेखक परिचित हैं। देखिए मिस्टर ओसवाल नामक प्रकाशक जो कैप्सटन सिगरेट का पैकेट रखता है, जिसकी कलाई पर है ‘स्वर्णिम चेन दामी रिस्टवाच की’,

जिसने
‘अभी अभी ली है ‘हिन्दुस्तान फोर्टीन’
सो उसमें यदा-कदा साथ बिठाते हैं
पान खिलाते हैं, गोल्ड फ़्लेक पिलाते हैं
मंजुघोष प्यारे और क्या चाहिए बेटा तुमको???’
है न प्रकाशकीय पात्र की अद्भुत सम्पन्नता। इसी के बरअक्स आप ज़रा लेखक की विपन्नता का दृश्य देखें-
‘बेटा जकड़ा है बान टीबी की गिरफ़्त में
पचास ठो रुपइया और दीजियेगा
बत्तीस ग्राम स्टप्टोमाईसिन कम नहीं होता है
जैसा मेरा वैसा आपका
लड़का ही तो ठहरा
एं हें हें हें कृपा कीजियेगा
अबकी बचा लीजियेगा…एं हें हें हें
पचास ठो रुपइया लौंडे के नाम पर!’

लेखक प्रकाशक के आगे अपनी व्यथा को किस तरह गिड़गिड़ाकर व्यक्त कर रहा है-
‘जियेगा तो गुन गायेगा लौंडा हिं हिं हिं हिं….हुँ हुँ हुँ हुँ
रोग के रेत में लसका पड़ा है जीवन का जहाज़।’

प्रगतिशील प्रकाशक मिस्टर ओसवाल के सामने लेखक नतमस्तक है। वह नहीं चाहता कि प्रकाशक उसकी पाण्डुलिपि वापस करे।

‘जितना कह गया, उतना ही दूँगा
चार सौ से ज़्यादा धेला भी नहीं
हो गर मंजूर तो देता हूँ चैक
वरना मैनस्कृप्ट वापस लीजिए
जाइए, गरीब पर रहम भी कीजिए।’

बस प्रकाशक का ये जवाब लेखक की कमर तोड़ देता है। अच्छे-अच्छे लेखक की हवा निकल जाती है जब प्रकाशक सिरे से पाण्डुलिपि को नकार दे। किसी भी लेखक के लिये सबसे मुश्किल क्षण वह होता है, जब किसी कारण से उसका लिखा ‘अस्वीकृत’ हो जाये या ‘वापस लौट आये’।

इस कविता में तीसरा पात्र ‘पाण्डुलिपि’ है। पाण्डुलिपि यानी लेखक का उत्पाद। इस उत्पाद के सहारे प्रकाशक युगों-युगों तक कमाता है लेकिन लेखक के रूप में पाण्डुलिपि को लेकर नागार्जुन के मन की व्यथा-कथा का एक बिम्ब-

‘बिदक न जाएं कहीं मिस्टर ओसवाल?
पाण्डुलिपि लेकर मैं क्या करूँगा?
दवाई का दाम कैसे मैं भरूँगा?
चार पैसे कम….चार पैसे ज्यादा….
सौदा पटा लो बेटा मंजुघोष!
ले लो चैक, बैंक की राह लो
उतराए खूब अब दुनिया की थाह लो
एग्रीमेंट पर किया साइन, कापीराइट बेच दी।’

मसीजीवी लेखक के लिये कालजयी सृजन बेहद सरल है लेकिन उस कालजयी सृजन के एवज़ धनार्जन बेहद कठिन है। क्या मिलता है लिखने के बदले? कितना कम मिलता है और वह भी अनिश्चित रहता है मिलना-जुलना। पता नहीं लेखन किसी को पसंद भी आयेगा या नहीं? संशय बना रहता है।

लेखक अक्सर कहते हैं कि सृजन एक तरह से प्रसव पीड़ा वहन करने वाला श्रमसाध्य काम है। इस प्रसव पीड़ा से लेखक हमेशा जूझता है। कितना मुश्किल काम है किसी कृति को सृजित करना। चाहे वह एक कविता हो, कहानी हो, उपन्यास हो या अन्य कोई विधा। क्लासिक तेवर के कवि बाबा नागार्जुन तक जब प्रकाशक के समक्ष अपनी रचना और व्यथा के साथ खड़े होते हैं तो सृजन के दर्द को भूल कर प्रकाशक के साथ बाबा नागार्जुन ने कितनी बारीकी से सृजन की शिद्दत को व्यंग्य से बाँधा है-

‘दस रोज़ सोचा, बीस रोज़ लिखा
महीने की मेहनत तीन सौ लाई!
क्या बुरा सौदा है?
जीते रहें हमारे श्रीमान् करुणानिधि ओसवाल
साहित्यकारों के दीनदयाल
नामी दुकान ‘किताब कुंज’ के कुंजीलाल
इनसे भाग कर जाऊँगा कहाँ मैं
गुन ही गाऊँगा, रहूँगा जहाँ मैं
वक्‍त पर आते हैं काम
कवर पर छपने देते हैं नाम।’

‘सौदा’ कविता का यही मर्म है। प्रकाशक ऐन-केन प्रकारेण, लेखक की पाण्डुलिपि पर क़ब्ज़ा कर लेता है और फिर छापने में मुद्दत लगा देता है। गरजुहा लेखक यानी मसिजीवी लेखक तो लिखने के लिये अभिशप्त होता ही है, दिन-रात आँखें फोड़कर, कमर तोड़कर वह लिखेगा ही।

यही नागार्जुन की शैली है। बाबा अपनी बात इस साफ़गाई से कहते हैं कि सामने वाला चारों खाने चित हो जाये और नाराज़ भी न हो। वाकई, इतिहास गवाह है कि हिन्दी का लेखक ग़रीब से ग़रीब होता गया है और प्रकाशक हिन्दुस्तान के कई शहरों के अलावा विदेशों में भी अपनी शाखाएं खोल रहे हैं। जब भी उनके पास ज़रूरी लेखन लेकर जाओ तो पहला वाक्य यही रहेगा-

‘मार्केट डल है जेनरल बुक्स का
चारों ओर स्लंपिंग हैं…’

और प्रकाशक की गर्जना का एक चित्र देखिए-

‘फुफ् फुफ् फुफकार उठे
प्रगतिशील पुस्तकों के पब्लिशर मिस्टर ओसवाल
नामी दुकान ‘किताब कुंज’ के कुंजीलाल
यहाँ तो ससुर मुश्किल है ऐसी कि….
और आप खाए जा रहे हैं माथा महाशय मंजुघोष!’

ऐसी बात, इतनी सादगी से और इतनी ताक़त से बाबा नागार्जुन ही कह सकते हैं…सिर्फ और सिर्फ नागार्जुन…..

जो नहीं हो सके पूर्ण-काम, उनको प्रणाम : सुधीर सुमन

जनपथ’ के ‘नागार्जुन अंक’ के अति‍थि‍ सम्‍पादक सुधीर सुमन का सम्‍पादकीय-

जन्मशताब्दी के अवसर पर बाबा के रचनाकर्म को कई-कई कोणों से देखा गया। सबने अपनी-अपनी निगाह से उन्हें देखा। जाहिर है हमारी भी एक निगाह है, जो किसी न किसी हद तक उनकी कविता ‘भोजपुर’ की निगाह है। पूरे भारतीय साहित्य में शोषित-उत्पीडि़त गरीब जनता के प्रति ऐसी वर्गीय पक्षधरता और अन्याय-उत्पीड़न-शोषण का ऐसा प्रतिरोध अन्यत्र दुर्लभ है। क्रान्‍ति‍ की आकांक्षा वाले साहित्यकारों की कमी बाबा के दौर में तो नहीं ही थी, आज भी क्रान्‍ति‍ की आकांक्षा वाले कम नहीं हैं। मगर बाबा की खासियत यह है कि वह महज क्रान्‍ति‍ की आकांक्षा के कवि नहीं हैं, बल्कि क्रान्‍ति‍ के कर्म के कवि हैं। और कविता ही नहीं, बल्कि अपने जीवन संघर्ष और राजनीतिक-सामाजिक विचारों की अभिव्यक्ति के क्रम में उन्होंने उपन्यास, कहानी, निबन्‍ध आदि तमाम विधाओं में लेखन किया। वह जो विरासत छोड़ गये हैं, वह साहित्य-संस्कृतिकर्म में लगे परिवर्तनकामी लोगों के साथ-साथ वामपंथी-लोकतांत्रिक आंदोलनों के लिए बड़े काम की है।

संगठनात्मक तौर पर प्रगतिशील आन्‍दोलन की शुरुआत 1936 में हुई। आज जब हम उस आन्‍दोलन की 75वीं वर्षगांठ मना रहे हैं, तो उसी वर्ष बाबा की लिखी एक मशहूर कविता की याद आती है, जिसका शीर्षक है- उनको प्रणाम! बाबा उन्हें याद करते हैं, जो देश की आजादी और समाजवादी व्यवस्था के लिए लड़ते हुए शहीद हो गये हैं, जिनका ट्रैजिक अन्‍त हुआ है, जो कठिन साधना और दुर्दम साहस के प्रतीक थे, जिनकी सेवाएं अतुलनीय थीं और जो किसी किस्म के विज्ञापन से दूर थे। 1931 में भगतसिंह को फाँसी हुई थी और पाँच वर्ष के बाद बाबा स्पष्ट तौर पर यह लिख रहे हैं कि उनकी सेवाएं थीं अतुलनीय। पर उन्हें गहरी बेचैनी इस बात से है कि कुछ ही दिन बीते हैं, फिर भी यह दुनिया उनको गई है भूल। बाबा का साहित्य मानो इस भूल जाने के विरुद्ध भी एक अनवरत संघर्ष है। बाबा औरों की तरह श्रद्धा के साथ उन्हें याद करके, उनका गौरव गान करके उसी दुनिया के धंधे में रम नहीं जाते, जहाँ व्यवहार में शहीदों के सपनों से किनारा कर लिया जाता है और अनवरत समझौतों के बीच उन्हें महज पूजा की वस्तु बना दिया जाता है और उनके साथ बैठकर भी उन्हें याद करने से परहेज नहीं किया जाता, जो आज भी उनके सपनों की हत्या करने में लगे हैं। भगतसिंह की अर्धशती के समय बाबा ने जो कविता लिखी, उसमें यही क्षोभ जाहिर होता है।

बाबा अन्याय पर टिकी व्यवस्था के खिलाफ लगातार मुठभेड़ करते रहे। एक गहरी आलोचनात्मक दृष्टि और एक सचेत वर्गीय नजरिये से उन्होंने अपने वक्त के जनांदोलनों को भी देखा। लेकिन उनकी रचनाएं पाठकों या श्रोताओं को किसी नकारवाद की ओर नहीं ले जातीं, बल्कि और भी राजनीतिक सचेतना और जनता के जीवन एवं उसके संघर्षों के साथ और अधिक एकाकार होने के लिए प्रेरित करती हैं। विचलन, निराशा, विडम्‍बना और तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों के चित्रण के बावजूद बाबा की रचनाओं में उम्मीद का पहलू कभी खत्म नहीं होता। उनकी रचनाएं क्रान्‍ति‍कारियों के अधूरे सपनों को साकार करने का संकल्प पैदा करती हैं। ठीक वैसा ही संकल्प, जैसा 1936 में ‘उनको प्रणाम!’ लिखते वक्त उन्होंने लिया होगा।

बाबा के लिये पूरा देश उनके घर की तरह था। देश के विभिन्न इलाकों के साहित्यकारों, कामरेडों और सामान्य जनता के पास उनसे जुड़ी बेहद आत्मीय और अंतरंग स्मृतियाँ हैं। भोजपुर से उनका खास वैचारिक लगाव था। आपातकाल और 1977 में बेलछी जनसंहार के बाद के वर्षों में लिखी गई अपनी दो कविताओं- ‘हरिजन गाथा’ और ‘भोजपुर’ में उन्होंने भोजपुर के किसान आंदोलन को नई उम्मीद से देखा था। भगतसिंह ने अपने एक बहुचर्चित लेख में जिस दलित समुदाय को असली सर्वहारा कहा था, उसके राजनीतिक उभार की संभावना की ओर नागार्जुन ने ‘हरिजन गाथा’ कविता में स्पष्ट संकेत किया है।

‘हरिजन गाथा’ में भोजपुर के आंदोलन की छाया साफ तौर पर दिखती है। उस दलित सर्वहारा नायक और उसकी राजनीति के बारे में लिखी गईं कुछ पंक्तियाँ देखने लायक हैं-

समझ-बूझकर ही समता का/असली मुद्दा पहचानेगा। यानी महज किसी प्रतिक्रिया में किसी मुद्दे को नहीं उठाएगा, बल्कि समझ-बूझकर ही समता का असली मुद्दा पहचानेगा। बाबा बेशक प्रतिहिंसा को अपना स्थाई भाव बताते हैं, लेकिन वे किसी किस्म की अंधप्रतिहिंसा के प्रवक्ता नहीं है। कुछ दलित चिंतक, जिन्हें लगता है कि बाबा शांति के समर्थक नहीं, बल्कि हिंसक क्रान्‍ति‍ के लिये दलितों को उकसा रहे हैं, उन्हें बालक के हाथों की रेखाओं की जगह हथियारों के चिह्न के निहितार्थ को समझना चाहिये। बाबा अचानक रूढि़वादी भविष्यवक्ता बन गए हों, ऐसा नहीं है। बल्कि वह एक काव्य-प्रयोग है, जिसके जरिये वह उस नियति या विवशता में पैदा होने वाली प्रतिहिंसा की संभावनाओं की ओर संकेत करते हैं। देखना चाहिये इन पंक्तियों को- ऐसे ही नहीं डरेंगे हत्यारे-/अरे देखना इसके डर से/थर-थर काँपेंगे हत्यारे/चोर-उचक्के-गुंडे-डाकू/सभी फिरेंगे मारे-मारे/इसकी अपनी पार्टी होगी/इसका अपना ही दल होगा…./श्याम सलोना यह अछूत शिशु/हम सबका उद्धार करेगा/आज यही संपूर्ण क्रान्‍ति‍ का/बेड़ा सचमुच पार करेगा/ हिंसा और अहिंसा दोनों/बहनें इसको प्यार करेंगी/इसके आगे आपस में वे/कभी नहीं तकरार करेंगी।

सोचने की बात है कि आखिर यह किस तरह की राजनीति का स्वप्न है, जिसे हिंसा और अहिंसा दोनों बहनें प्यार करेंगी और दोनों के बीच कोई तकरार न होगी। दरअसल अंतिम चार पंक्तियाँ इसका स्पष्ट संकेत करती हैं कि बाबा के लिये संघर्ष के रूपों का मामला उतना महत्वपूर्ण नहीं था, बल्कि जनता की राजनीतिक मुक्ति, सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था में बदलाव यानी सचमुच क्रान्‍ति‍ उनका मकसद था, और उसके लिये संघर्ष के सारे रूप उन्हें मंजूर थे। यही मकसद उन्हें भगतसिंह और उनके साथियों से जोड़ता था और भोजपुर ने उन्हें इसलिए भी आकर्षित किया कि यहाँ उन्हें भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद के प्रतिरूप दिखाई पड़े, भूमिपुत्रों का संग्रामी तेवर दिखाई पड़ा, जिसका उन्होंने ‘भोजपुर’ कविता में आह्लाद से स्वागत किया। हालाँकि कुछ आलोचकों को लगता है कि बाबा की चेतना में कहीं यह बात थी कि क्रान्‍ति‍कारी परिवर्तन हथियारबंद संघर्ष से ही होगा। बेशक सत्तर के दशक में भोजपुर के सशस्त्र क्रान्‍ति‍कारियों का बाबा ने खुलकर पक्ष लिया, पर इसका मतलब यह नहीं था कि उनकी चेतना में यही बात धंसी हुई थी कि क्रान्‍ति‍ हथियारबंद संघर्ष से ही होगी। यह जरूर है कि शासकवर्गीय हिंसा के खिलाफ जनता के सशस्त्र प्रतिरोध के वह हमेशा पक्षधर रहे। संघर्ष के सारे रूपों और उनकी जरूरतों को बाबा बखूबी समझते थे। इसी कारण जब एक बहुत बड़े मार्क्‍सवादी आलोचक वर्ग संघर्ष के जाति संघर्ष में तब्दील हो जाने की बात कह रहे थे, उस वक्त बाबा बिहार की सबसे खूंखार निजी सेना के विरोध में बयान दे रहे थे। उन्हें कोई भ्रम नहीं था कि कौन जातिवादी है और कौन वर्गवादी।

यह अंक एक तरह से भोजपुर के साहित्यकार-संस्कृतिकर्मियों की ओर से बाबा के प्रति श्रद्धांजलि है। संपादक अनंत कुमार सिंह ने मुझे पूरी आजादी दी, इसके लिए उनका आभार। अंक की तैयारी में दिल्ली से रामनिवास और श्याम सुशील तथा आरा में सुधाकर उपाध्याय, रामनिहाल गुंजन जैसे साहित्यप्रेमियों, रचनाकारों मित्रों और मेरे कुछ करीबी रिश्तेदारों का भरपूर सहयोग मिला। कवि सुनील श्रीवास्तव लगातार सहयोग में लगे रहे। खासकर वह पीढ़ी जो सोवियत ध्वंस के बाद हिन्‍दी आलोचना के क्षेत्र में सक्रि‍य हुई है और खुद को बाबा की वैचारिक परम्‍परा से जुड़ा हुआ मानती है, उसका रचनात्मक सहयोग हमें मिला है, यह बड़ी बात है।

जनराजनीति और जनांदोलनों के साथ-साथ साहित्य सृजन और संस्कृतिकर्म के जरिये जो लोग परिवर्तनकारी कोशिशों में लगे हैं और जिन्हें परिवर्तन में यकीन है, उन्हें इस अंक से कुछ ऊर्जा मिले, तो यह इसकी सार्थकता होगी।

रेखांकन:  राकेश दिवाकर

नागार्जुन की काव्य-चेतना ही जनचेतना है : आलोकधन्वा

बाबा नागार्जुन के गांव तरौनी से जसम ने पिछले वर्ष उनके जन्‍मशताब्‍दी समारोह की शुरुआत की थी। इस वर्ष 25 जून को आरा में आयोजित समारोह के साथ यह संपन्‍न हो गया। संस्कृतिकर्मी सुधीर सुमन की रिपोर्ट-

आरा : नागार्जुन इसलिए बडे़ कवि हैं कि वे वर्ग-संघर्ष को जानते हैं। वे सबसे प्रत्यक्ष राजनीतिक कवि हैं। आज उन पर जो चर्चाएं हो रही हैं, उनमें उन्हें मार्क्सवाद से प्रायः काटकर देखा जा रहा है। जबकि सच यह है कि  नागार्जुन नहीं होते तो हमलोग नहीं होते। और खुद हमारी परंपरा में कबीर और निराला नहीं होते तो नागार्जुन भी नहीं होते। नागार्जुन की कविता बुर्जुआ से सबसे ज्यादा जिरह करती है। उनकी कविताएं आधुनिक भारतीय समाज के सारे अंतर्विरोधों की शिनाख्त करती हैं। नागार्जुन की काव्य धारा हिंदी कविता की मुख्य-धारा है। उनकी जो काव्य-चेतना है, वही जनचेतना है। यह बात नक्सलबाड़ी विद्रोह की धारा के मशहूर कवि आलोकधन्वा  ने नागरी प्रचारिणी सभागार, आरा में 25 जून, 2011 को नागार्जुन जन्मशताब्दी समापन समारोह का उद्घाटन करते हुए कही।

उन्‍होंने खुद को भोजपुर में चल रहे सामाजिक न्याय की लड़ाई से जोड़ते हुए कहा कि मनुष्य के लिए जितनी उसकी आत्मा अनिवार्य है, राजनीति भी उसके लिए उतनी ही अनिवार्य है। बेशक हमारा आज का दौर बहुत मुश्किलों से भरा है, लेकिन इसी दौर में नागार्जुन के प्रति पूरे देश में जैसी उत्कंठा और सम्मान देखने को मिला है, वह उम्मीद जगाता है। संभव है हम चुनाव में हार गए हैं, लेकिन जो जीते हैं, अभी भी विरोध के मत का प्रतिशत उनसे अधिक है। वैसे भी दुनिया में तानाशाह बहुमत के रास्ते ही आते रहे हैं। लेकिन जो शहीदों के रास्ते पर चलते हैं, वे किसी तानाशाही से नहीं डरते और न ही तात्कालिक पराजयों से विचलित होते हैं। भोजपुर में जो कामरेड शहीद हुए उन्होंने कोई मुआवजा नहीं मांगा। उन्होंने तो एक रास्ता चुना, कि जो समाज लूट पर कायम है उसे बदलना है, और उसमें अपना जीवन लगा दिया।

पिछले साल 25-26 जून को समस्तीपुर और बाबा नागार्जुन के गांव तरौनी से जसम ने उनके जन्मशताब्दी समारोहों की शुरुआत की थी और यह निर्णय किया था कि इस सिलसिले का समापन भोजपुर में किया जाएगा। उसी फैसले के अनुरूप नागरी प्रचारिणी सभागार, आरा में 25 जून को नागार्जुन जन्मशताब्दी समापन समारोह का आयोजन किया गया।  जनता, जनांदोलन, राजनीति, इंकलाब और कविता के साथ गहन रिश्ते की जो नागार्जुन की परंपरा है, उसी के अनुरूप यह समारोह आयोजित हुआ। लगभग एक सप्ताह तक जनकवि नागार्जुन की कविताएं और उनका राजनीतिक-सामाजिक स्वप्न लोगों के बीच चर्चा का विषय बने रहे। अखबारों की भी भूमिका साकारात्मक रही। समारोह की तैयारी के दौरान आरा शहर और गड़हनी व पवना नामक ग्रामीण बाजारों में चार नुक्कड़ कविता पाठ आयोजित किए गए, जिनमें नागार्जुन के महत्व और उनकी प्रासंगिकता के बारे में बताया गया तथा उनकी कविताएं आम लोगों को सुनाई गईं। अपने जीवन के संकटों और शासकवर्गीय राजनीति व संस्कृति के जरिए बने विभ्रमों से घिरे आम मेहनतकश जन इस तरह अपने संघर्षों और अपने जीवन की बेहतरी के पक्ष में आजीवन सक्रिय रहने वाले कवि की कविताओं से मिले। यह महसूस हुआ कि जो जनता के हित में रचा गया साहित्य है उसे जनता तक ले जाने का काम सांस्कृतिक संगठनों को प्रमुखता से करना चाहिए। यह एक तरह से जनता को उसी की मूल्यवान थाती उसे सौंपने की तरह था।

नागार्जुन का भोजपुर से पुराना जुड़ाव था। साठ के दशक में वह पूर्वांचल नाम की संस्था के अध्यक्ष बनाए गए थे। जनांदोलनों में शामिल होने के कारण उन्हें बक्सर जेल में भी रखा गया था। नागार्जुन ने तेलंगाना से लेकर जे.पी. के संपूर्ण क्रांति आंदोलन तक पर लिखा, लेकिन भोजपुर के क्रांतिकारी कम्युनिस्ट आंदोलन में तो जैसे उन्हें अपना जीवन-स्वप्न साकार होता दिखता था। ‘हरिजन गाथा’ और ‘भोजपुर’ जैसी कविताएं इसकी बानगी हैं।

बारिश दस्तक दे चुकी थी, उससे समारोह की तैयारी थोड़ी प्रभावित भी हुई। लेकिन इसके बावजूद 25 जून को नागरी प्रचारिणी सभागार में लोगों की अच्छी-खासी मौजूदगी के बीच समारोह की शुरुआत हुई। सभागार के बाहर और अंदर की दीवारों पर लगाए गए  नागार्जुन, शमशेर, मुक्तिबोध, केदारनाथ अग्रवाल, मुक्तिबोध जैसे कवियों की कविताओं पर आधारित राधिका  और अर्जुन द्वारा निर्मित आदमकद कविता-पोस्टर और बाबा नागार्जुन की कविताओं व चित्रों वाले बैनर समारोह स्थल को भव्य बना रहे थे। कैंपस और सभागार में बाबा की दो बड़ी तस्वीरें लगी हुई थीं। बाबा के चित्रों वाली सैकड़ों झंडियां हवा में लहरा रही थीं।

विचार-विमर्श के सत्र में ‘प्रगतिशील आंदोलन और नागार्जुन की भूमिका’ विषय पर बोलते हुए जसम के राष्ट्रीय महासचिव प्रणय कृष्ण ने कहा कि जिन्हें लगता है कि प्रगतिशीलता कहीं बाहर से आई उन्हें राहुल सांकृत्यायन, डी.डी. कोशांबी, हजारी प्रसाद द्विवेदी  और नागार्जुन की परंपरा को समझना होगा। सारी परंपराओं को आत्मसात करके और उसका निचोड़ निकालकर प्रगतिशील आंदोलन को विकसित किया गया। हिंदी कविता में तो बाबा प्रगतिशीलता की नींव रखने वालों में से हैं। नागार्जुन की काव्य यात्रा के विभिन्न पड़ावों का जिक्र करते हुए प्रणय कृष्ण ने कहा कि वे प्रगतिशीलता के आंदोलन के आत्मसंघर्ष के भी नुमाइंदे हैं। ऊंचे  से ऊंचे दर्शन को भी उन्होंने संशय से देखा। बुद्ध और गांधी पर भी सवाल किए। योगी अरविंद पर भी कटुक्ति की। वे किसी से नहीं डरते थे, इसलिए कि वे अपनी परंपरा में उतने ही गहरे धंसे हुए थे। बाबा शुरू से ही सत्ता के चरित्र को पहचानने वाले कवि रहे। नामवर सिंह 1962 के बाद के दौर को मोहभंग का दौर मानते हैं, लेकिन नागार्जुन, मुक्तिबोध और केदार जैसे कवियों में 1947 की आजादी के प्रति कोई मोह नहीं था, कि मोहभंग होता। स्वाधीनता आंदोलन के कांग्रेसी नेतृत्व में महाजनों-जमींदारों के वर्चस्व को लेकर इन सबको आजादी के प्रति गहरा संशय था। नागार्जुन ने तो कांग्रेसी हुकूमत की लगातार आलोचना की। दरअसल प्रगतिशीलता की प्रामाणिक दृष्टि हमें इन्हीं कवियों से मिलती है। तेलंगाना के बाद साठ के दशक के अंत में नक्सलबाड़ी विद्रोह के जरिए किसानों की खुदमुख्तारी का जो संघर्ष नए सिरे से सामने आया, उसने प्रगतिशीलता और वर्ग संघर्ष को नई जमीन मुहैया की और सत्तर के दशक में जनांदोलनों ने नागार्जुन सरीखे कवियों को नए सिरे से प्रासंगिक बना दिया। बीसवीं सदी के हिंदुस्तान में जितने भी जनांदोलन हुए, नागार्जुन प्रायः उनके साथ रहे और उनकी कमजोरियों और गड़बडि़यों की आलोचना भी की। लेकिन नक्सलबाड़ी के स्वागत के बाद पलटकर कभी उसकी आलोचना नहीं की। जबकि संपूर्ण क्रांति के भ्रांति में बदल जाने की विडंबना पर उन्होंने स्पष्ट तौर पर लिखा। आज जिस तरीके से पूरी की पूरी राजनीति को जनता से काटकर रख दिया गया है और जनता को आंदोलन की शक्ति न बनने देने और बगैर संघर्ष के सत्ता में भागीदारी की राजनीति चल रही है, तब जनता की सत्ता  कायम करने के लिहाज से नागार्जुन पिछले किसी दौर से अधिक प्रांसगिक हो उठे हैं।

आइसा नेता रामायण राम ने नागार्जुन की कविता ‘हरिजन-गाथा’ को एक सचेत वर्ग-दृष्टि का उदाहरण बताते हुए कहा कि इसमें जनसंहार को लेकर कोई भावुक अपील नहीं है, बल्कि एक भविष्य की राजनैतिक शक्ति के उभार की ओर संकेत है। उत्तर भारत में दलित आंदोलन जिस पतन के रास्ते पर आज चला गया है, उससे अलग दिशा है इस कविता में। एक सचेत राजनीतिक वर्ग दृष्टि के मामले में इससे साहित्य और राजनीति दोनों को सही दिशा मिलती है।

समकालीन जनमत के प्रधान संपादक रामजी राय ने ‘भोजपुर’ और नागार्जुन का जीवन-स्वप्न विषय पर बोलते हुए कहा कि नागार्जुन अपने भीतर अपने समय के तूफान को बांधे हुए थे। मार्क्सवाद में उनकी गहन आस्था थी। अपनी एक कविता में उन्होंने कहा था कि बाजारू बीजों की निर्मम छंटाई करूंगा। जाहिर है उनके लिए कविता एक खेती थी, खेती- समाजवाद के सपनों की। भोजपुर उन्हें उन्हीं सपनों के लिए होने वाले जनसंघर्षों के कारण बेहद अपना लगता था और इसी कारण भगतसिंह उन्हें प्यारे थे। वह भारत में इंकलाब चाहते थे। उसे पूरा करना हम सबका कार्यभार है।

विचार-विमर्श सत्र की अध्यक्षता डा. गदाधर सिंह, जलेस के राज्य सचिव कथाकार डा. नीरज सिंह, प्रलेस के राज्य उपाध्यक्ष आलोचक डा. रवींद्रनाथ राय और जसम के राज्य अध्यक्ष आलोचक रामनिहाल गुंजन ने की। संचालन सुधीर सुमन ने किया। डा.रवींद्रनाथ राय ने समारोह की शुरुआत में स्वागत वक्तव्य दिया और जनता के राजनीतिक कवि नागार्जुन के जन्मशताब्दी पर भोजपुर में समारोह होने के महत्व के बारे में चर्चा की। डा. गदाधर  सिंह ने छात्र जीवन की स्मृतियों को साझा करते हुए कहा कि उनके कविता पाठ में छात्रों की भारी उपस्थिति रहती थी। वे एक स्वतंत्रचेत्ता प्रगतिशील कवि थे।  उन्होंने केदारनाथ अग्रवाल, मजाज और गोपाल सिंह गोपाली पर केंद्रित समकालीन चुनौती के विशेषांक का लोकार्पण भी किया। डा. नीरज सिंह ने कहा कि बाबा नागार्जुन सीधे-सीधे किसान आंदोलन में शामिल हुए और किसान-मजदूरों की मानसिकता को जिया। वे चाहते थे कि परिवर्तन जब भी हो, मजदूर-किसानों के लिए हो। बाबा ने अपनी कविताओं के जरिए जनांदोलनों को शक्ति दी। रामनिहाल गुंजन ने कहा कि बाबा हमारे दौर के जनपक्षधर साहित्यकारों और जनता की राजनीति करने वालों के लिए बड़े प्रेरणास्रोत हैं। सही मायने में उन्होंने ही कविता को जनता के संघर्षों का औजार बनाया। कथाकार सुरेश कांटक ने एक संस्मरण सुनाया कि किस तरह बाबा को जब खून की जरूरत पड़ी, तो संयोगवश जिस नौजवान का खून उनसे मिला, वह भोजपुर का निवासी था। इस नाते भी बाबा कहते थे कि उनकी रगों में भोजपुर का खून दौड़ता है।

दूसरे सत्र की शुरुआत युवानीति द्वारा बाबा की चर्चित कविता ‘भोजपुर’ की नाट्य प्रस्तुति से हुई। उसके बाद कवि जितेंद्र कुमार की अध्यक्षता और कवि सुमन कुमार सिंह के संचालन में कविता पाठ हुआ, जिसमें कृष्ण कुमार निर्मोही, श्रीराम तिवारी, रामनिहाल गुंजन, जगतनंदन सहाय, दीपक सिन्हा, कुमार वीरेंद्र, संतोष श्रेयांश, ओमप्रकाश मिश्र, सरदार जंग बहादुर, सुनील चैध्री, रहमत अली रहमत आदि ने अपनी कविताओं का पाठ किया। समारोह स्थल पर एक बुक स्टाल भी लगाया गया था। समारोह में शामिल होने के लिए उत्तर बिहार के जसम के साहित्यकार-संस्कृतिकर्मी सुरेंद्र प्रसाद सुमन के नेतृत्व में भोजपुर पहुंचे थे। 24 जून को इन लोगों ने अपनी सांस्कृतिक यात्रा की शुरुआत बाबा नागार्जुन के ननिहाल सतलखा चंद्रसेनपुर से की थी, जहां एक सभा में उनके ननिहाल के परिजनों ने उनकी मूर्ति स्थापना, पुस्तकालय और उनके नाम पर एक शोध संस्थान बनाने के लिए एक कट्ठा जमीन देने की घोषणा की। उसके बाद साहित्यकार-संस्कृतिकर्मी दरभंगा और समस्तीपुर में सभा करते हुए पटना पहुचे  और फिर 25 को नागार्जुन जन्मशताब्दी समारोह में शामिल हुए। समारोह में जसम राष्ट्रीय पार्षद संतोष सहर, जसम बिहार के सचिव संतोष झा, कवि राजेश कमल, संस्कृतिकर्मी समता राय, प्रो. पशुपतिनाथ सिंह आदि भी मौजूद थे।

समारोह में बाबा नागार्जुन की कविता पाठ का वीडियो प्रदर्शन और कवि मदन कश्यप का काव्य-पाठ भी तय था। लेकिन ट्रेन में विलंब के कारण ये कार्यक्रम अगले दिन स्थानीय बाल हिंदी पुस्तकालय में आयोजित किए गए। कवि-फिल्मकार कुबेर दत्त द्वारा बनाई गई नागार्जुन के काव्य पाठ के वीडियो का संपादन रोहित कौशिक ने किया है और इसके लिए शोध कवि श्याम सुशील ने किया है। करीब 13 मिनट का यह वीडियो नागार्जुन के सरोकार और कविता व भाषा के प्रति उनके विचारों का बखूबी पता देता है। बाबा इसमें मैथिली और बांग्ला में भी अपनी कविताएं सुनाते हैं। एक जगह इसमें नागार्जुन कहते हैं कि कविता में अगर कवि को गुस्सा नहीं आता, अगर वह निडर नहीं है, डरपोक है, तो बेकार है। इस वीडियो में बाबा नागार्जुन को कविता कविता पाठ करते देखना और उनके विचारों को सुनना नई पीढ़ी के लिए एक रोमांचक और उत्प्रेरक अनुभव था।
मदन कश्यप के एकल कविता पाठ की अध्यक्षता नीरज सिंह और रामनिहाल गुंजन ने की तथा संचालन कवि जितेंद्र कुमार ने किया। उन्होंने गनीमत, चाहतें, थोड़ा-सा फाव, सपनों का अंत और चिडि़यों का क्या नामक अपनी कविताओं का पाठ किया। उनकी कुछ काव्य-पंक्तियां गौरतलब हैं-
सपने के किसी अंत का मतलब
स्वप्न देखने की प्रक्रिया का अंत नहीं है।
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गनीमत है
कि पृथ्वी पर अब भी हवा है
और हवा मुफ्त है…
गनीमत है
कि कई पार्कों में आप मुफ्त जा सकते हैं
बिना कुछ दिए समुद्र को छू सकते हैं
सूर्योदय और सूर्यास्त के दृश्य देख सकते हैं
गनीमत है
कि गनीमत है।

इस तरह नागार्जुन जन्मशताब्दी  समारोह तीन दिनों तक चला, जो बाबा के जन्मस्थान सतलखा चंद्रसेनपुर से शुरू होकर भोजपुर में उनके महत्व और प्रासंगिकता पर विचार विमर्श से गुजरते हुए उनपर केंद्रित वीडियो के प्रदर्शन के साथ संपन्न हुआ। यद्यपि भोजपुर के सांस्कृतिक जगत के लिए तो पूरा हफ्ता ही नागार्जुनमय रहा।

आरा में नागार्जुन की कविता जनता के बीच : सुधीर सुमन

तीन दिन से बारिश हो रही है। बादल बड़े प्रिय थे नागार्जुन को। बादल को हम घिरते हुए ही नहीं, बल्कि लगातार घेरा  डाले हुए देख रहे हैं। मौसम बदल गया है। आरा शहर में वार्ड पार्षद नगर निगम के गेट पर लगातार भ्रष्टाचार के सवाल पर धरना दिए हुए हैं, पूरे शहर की सफाई की मांग कर रहे हैं। बारिश होते ही नगर की नालियां सड़कों पर उमड़ पड़ी हैं। मुहल्लों में कीचड़ से होकर पहले भी गुजरना पड़ता था, आज भी गुजरना पड़ रहा है। बिजली तो वैसे भी किसी एहसान जताने वाले दोस्त की तरह आती है, जब तेज हवा के साथ बारिश हो, तब उसकी आंख-मिचैली देखने लायक होती है। मोबाइल भी पूरी तरह चार्ज नहीं हो पा रहा है। लेकिन गरमी से निजात मिली है, हरियाली से मन को सुकून मिल रहा है। बारिश अच्छी लग रही है, पर थोड़ी चिंता भी बढ़ रही है। 25 जून को  यहां के नागरी प्रचारिणी सभागार में बाबा नागार्जुन का जन्मशताब्दी समारोह होना है। पिछले साल 25-26 जून को समस्तीपुर और बाबा के गांव तरौनी से  समारोहों के सफर की जो शुरुआत हुई थी, उसकी मंजिल हमने भोजपुर ही तय की थी। समारोह की तैयारी बाधित हो रही है, क्या करें! कितना अच्छा होता कि बादल रात में बरस के चले जाते और दिन हमारे लिए छोड़ देते, मगर उनकी तो अपनी गति है, अपना चाल है, अपनी मर्जी है।
आज 20 जून है। आज से बाबा की कविताओं का नुक्कड़ों पर पाठ करना है। कल रविवार था। किसी भी आयोजन के लिए रविवार का दिन बड़ा अहम होना होता है। सहयोग जुटाने के लिए लोगों से मिलने जाइए, तो उनसे मुलाकात की संभावना रहती है। लेकिन रविवार की झमाझम बारिश, उसी में एक प्रेस कांफ्रेस। हम चाहते थे कि भोजपुर के  तमाम सांस्कृतिक संगठनों और स्वंतत्र लेखक-बुद्धिजीवी भी जनता को संबोधित करें, लेकिन बारिश में किस पर जोर डालें। हम आयोजक हैं, लिहाजा हमें तो किसी तरह पहुंचना ही था। अब बाबा की कविताओं को लेकर सीधे जनता के बीच जाना है और बारिश है कि होड़ लिए हुए है! दोपहर बाद तीन बजे का समय तय है, आरा रेलवे स्टेशन के परिसर में पहुंचना है।
अरे वाह! बारिश तो थम गई। रेलवे स्टेशन से करीब मैं ही हूं। अभी-अभी वरिष्ठ आलोचक रवींद्रनाथ राय का कॉल आया- ‘मैं घर से निकल रहा हूं।’ तीन तो  बज गए। पता नहीं, कोई आया है या नहीं, आएगा तो कॉल तो करेगा ही, लपककर निकल लूंगा, यही सोचकर मुख्य समारोह के आमंत्रण पत्र को लिफाफे में डालने में व्यस्त हो गया। अरे, साढ़े तीन बज गए, बारिश के कारण शुरुआत ही  गड़बड़ाएगी क्या! चलो चला जाए, शायद लोग थोड़ी देर में आएं। बैनर उठाया और चल दिया। स्टेशन पर भारी भीड है़, लग रहा है, देर से कोई ट्रेन नहीं आई। इतनी भीड़ में कौन कहां है, कैसे पता चले। अचानक किसी का हाथ कंधे पर पड़ता है। अरे, मुझसे भी पहले जसम, बिहार के राज्य अध्यक्ष रामनिहाल गुंजन हाजिर हैं, एकदम हमेशा समय पर पहुंचने के अपने रिकार्ड को बरकरार रखते हुए। बाकी लोग कहां हैं, भाई। मिस्ड कॉल मारता हूं। पांच मिनट हो गए, किसी ने पलटकर कॉल नहीं किया। ‘अरे यार तुम यहां क्या कर रहे हो, तुम्हें तो  नगर निगम के गेट पर होना चाहिए था’- अचानक सत्यदेव दिखाई पडत़े हैं, तो उनकी ओर लपकता हूं। छात्र राजनीति में रहे, हमलोगों के साथ नाटक भी किया। तो हम दो से तीन हो गए। और अब चार भी हो गए, दूर से ही नजर आने वाले हमारे लंबू साथी शमशाद प्रेम अपनी बाइक से उतरकर हमारी ओर आ रहे हैं। सबके पहुंचने के बाद पहुंचने के अपने रिकार्ड को उन्होंने ध्वस्त कर दिया। आखिरकार हमारे उत्साही साथी सुनील चौधरी भी आ गए। रवींद्रनाथ राय भी पहुंच गए। कवि सुमन कुमार सिंह कहां हैं, जल्दी बुलाइए भाई, बारिश थमी है, वर्ना फिर शुरू हो गई तो बड़ी मुश्किल होगी। सुमन तो स्कूल से घर गए होंगे, खाना खाकर चले होंगे। मोबाइल से बात होती है- ‘आ रहे हैं, रास्ते में हैं।’ आखिर वह भी आ गए, लेकिन उनके पीछे-पीछे बारिश की हल्की फुहार भी आई। हम सब प्लेटफार्म की ओर भागे। लेकिन पांच मिनट बाद ही वापस बाहर आ गए। बारिश ने हमें मोहलत दे दी। एक और शख्स का इंतजार है, उनकी नागार्जुन से मुलाकात हुई थी। कॉल करिए भाई, देखिए कहां हैं। सुनील बताते हैं- ‘स्वीच ऑफ है।’ तो चलिए शुरू किया जाए।
रेलवे स्टेशन परिसर में दो पेड़ों से बैनर को बांध दिया जाता है। थोड़ी देर विचार-विमर्श चलता है। नागार्जुन के किसी गीत से शुरुआत की जाए या उनके बारे में कुछ बताते हुए कविता पाठ का सिलसिला शुरू किया जाए। दूसरा तरीका ही अपनाया जाता है। सुनील संचालन शुरू करते हैं- ‘आज जबकि देश के हुक्मरान भ्रष्टाचार और लूट में डूबे हुए हैं और उसे बरकरार रखने के लिए हर किस्म की तिकड़म और दमन पर उतारू हैं, तब नागार्जुन जैसे जनकवि नए सिरे से प्रासंगिक लगने लगते हैं। इसी तिकड़म, भ्रष्टाचार और दमन के खिलाफ तो उन्होंने आजीवन लिखा।’ सुनील बोल रहे हैं, लोग धीरे-धीरे हमारे आस-पास जुट रहे हैं। सत्यदेव जन्मशताब्दी समारोह में लोगों के शामिल होने की अपील वाला पर्चा लोगों के बीच बांटने लगते हैं। इसी बीच वे पहुंच जाते हैं, जिनका हमें इंतजार था। माथे पर लाल पगड़ी बांधे, उघारे बदन, हाथ में एक छोटा डंडा लिए। थैला भी लाल रंग का। ये किसान नेता स्वामी सहजानंद सरस्वती के अनुयायी हैं, हमेशा इसी वेशभूषा में रहते हैं। अपने हर भाषण में वे  नागार्जुन की कविता- ‘किसकी है जनवरी, किसका अगस्त है’ का बड़े प्रभावशाली अंदाज में इस्तेमाल करते हैं। किसान नेता आग्रेनंद चौधरी बोलना शुरू करते हैं, लोगों की तादाद बढ़ने लगती है। आग्रेनंद जी बताते हैं कि 1982 में पहली बार उनकी मुलाकात नागार्जुन जी से हुई थी। वे बताते हैं कि वे किसान-मजदूर के कवि थे और उन्हीं की तरह रहते थे। सचमुच जनता के कवि थे। हमारे इर्द-गिर्द जो जनसमूह मौजूद है, मानो उसके दुख-दर्द, उसके मन की बात, उसके ही अनुभवों को आग्रेनंद जी के भाषण में सामने आ रहा है, यह उनके चेहरे और प्रतिक्रियाओं से जाहिर हो रहा है। आग्रेनंद जी कहते हैं कि जितनी भी सरकारें हैं वे किसान विरोधी हैं। वे अमीरों और गरीबों के बीच भेदभाव को बढ़ा रही हैं। बाबा नागार्जुन ने इसी भेदभाव के खिलाफ लिखा था। जनता के इतने बड़े कवि के जन्म की सौंवी वर्षगांठ की याद सरकारों को नहीं आती। जनता के लिए वे जरूरी हैं, इसलिए वह उनको याद कर रही है। आग्रेनंद जी अपने छोटे-से वक्तव्य में भारत में व्यवस्थाजनित व्यवस्थाओं पर बड़े प्रभावशाली ढंग से सवाल उठाते हैं।
इस सिलसिले को प्रलेस, बिहार के राज्य उपाध्यक्ष रवींद्रनाथ राय आगे बढ़ाते हैं। बाबा को जनता का महान राजनीतिक कवि बताते हुए वे लोगों को याद दिलाते हैं कि नागार्जुन ने हमेशा भारतीय राजनीति के गरीब-विरोधी प्रवृत्तियों, परिवारवाद, मौकापरस्ती, लूट, भ्रष्टाचार और तानाशाही का विरोध किया। अपने वक्तव्य के अनुरूप ही वे बापू के बंदरों के कारनामों को लेकर लिखी गई नागार्जुन की कविता सुनाते हैं। भाषण तो हमने उनका प्रायः सुना है नुक्कड़ों और चौराहों पर, पर इतने प्रभावी ढंग से कविता का पाठ करते हुए पहली बार सुन रहे हैं।

सामने जनता है और रचनाकार जैसे अपने जकड़न को झाड़कर नए आवेग से खड़े हो रहे हैं। सुमन कुमार सिंह पाठ के लिहाज से एक कठिन कविता चुनते हैं- मंत्र और उसी पूरी ताकत से प्रस्तुत करते हैं। वे ध्यान दिलाते हैं कि बाबा हर तरह के पाखंड और छद्म के विरोधी थे। युवा कवि ओमप्रकाश मिश्र मानो नई पीढ़ी के रचनाकारों की तरफ से हिंदी कविता और समाज को आश्वासन देते हैं कि उसने अपनी प्रगतिशील-जनवादी परंपरा से नाता नहीं तोड़ा है, उसके प्रेरणास्रोत नागार्जुन जैसे कवि ही हैं। वे सुनाते हैं- जो नहीं हो सके  पूर्ण काम, मैं उनको करता हूं प्रणाम।
संचालक मुझे भी मौका देते हैं और मैं मेहनतकश जनता के राष्ट्र निर्माण के लिए इंकलाब का सपना देखने वाले इस कवि की मशहूर कविता ‘भोजपुर’ सुनाता हूं।
जसम, बिहार के राज्य अध्यक्ष रामनिहाल गुंजन नागार्जुन पर केंद्रित अपनी कविता सुनाते हैं, जिसमें उनकी कई रचनाओं के पात्रों का नाम भी आता है। गुंजन जी उनको हमारे वर्तमान दौर के लिए बेहद प्रासंगिक कवि बताते हैं।
हम सब लगातार लोगों से अपील करते हैं कि वे 25 जून को बाबा नागार्जुन जन्मशताब्दी समारोह में ज्यादा से ज्यादा संख्या में शामिल हों। कोई माइक और लाउडस्पीकर नहीं है, पूरी ताकत से बोलना पड़ता है। उसी ऊंची पिच पर कविता का पाठ भी किया गया। बीच-बीच में रेलवे की उद्घोषणाएं भी होती रहीं, लेकिन कोई बाधा कविता और जनता के बीच के रिश्ते के आड़े नहीं आ पाई।
कविता पाठ अपनी मंजिल पर पहुंचता है और बादलों द्वारा तय समय सीमा मानो खत्म होती है। मेघ बज नहीं रहे, बरस रहे हैं। ‘अलाव’ पत्रिका में छपे एक सज्जन का लेख की याद हो आती है, जिसमें उन्होंने साबित करने की कोशिश की है कि नागार्जुन जनकवि होने पर बार-बार जोर देते हैं, पर वे जनकवि नहीं हैं। सवाल तो यह भी है कि वे किस तरह के जनकवि हैं। अगर ऐसी परिस्थितियां हैं जो जनता को उसके लिए हितकर कविता से दूर करती हैं, तो मामला तो उन परिस्थितियों को बदलने का और उस कविता को जनता तक ले जाने का भी है। लौटते वक्त एक पढ़े-लिखे परिचित मित्र धीरे से बताते हैं कि इतनी बार ‘किसकी जनवरी है किसका अगस्त है’ सुना है, पर नहीं पता था कि यह नागार्जुन का लिखा हुआ है।
कविता पाठ सफल रहा, पर अभी बहुत कुछ करना है। समारोह के लिए जो धन जुटा है, वह अभी बिल्कुल अपर्याप्त लग रहा है। सारे लोग सोच रहे हैं कि और सहयोग कैसे जुटाया जाए। कल से सीधे लोगों के बीच चंदे का डब्बा लेकर जाना है और हर छोटा-बड़ा सहयोग जुटाना है। जनता के कवि के लिए समारोह तो जनसहयोग से ही होगा। हमारे लिए यह कोई रस्मी आयोजन नहीं है। बेशक मौका बाबा के जन्मशताब्दी वर्ष के समापन का है। मगर हमारा मकसद तो जनता की कविता को जनता तक ले जाना है। इस दिशा में मिली हर सफलता हमारे लिए सार्थकता है। अखबार हमारे इस अभियान को महत्व दे रहे हैं, यह सुखद लग रहा है। पिछले दो तीन दिन से लगातार जन्मशताब्दी समारोह की खबरें अखबारों में आ रही हैं। आखिर बाबा सिर्फ जन संस्कृति मंच के तो हैं नहीं, वे तो सबके हैं, उन सबके जो इस व्यवस्था से असंतुष्ट हैं, जो इस देश और देश की मेहनतकश जनता की जिंदगी को बेहतर बनाना चाहते हैं, जिन्हें इस धरती से सचमुच प्यार है। पहलकदमी जरूर जसम की है, लेकिन भोजपुर में यह आयोजन जनता का अपना आयोजन बन जाए, इसके लिए हम सब प्रयासरत हैं। हम तो चाहते हैं कि अखबार खुद बाबा नागार्जुन के महत्व पर अपनी ओर से कुछ दें, उनके जमाने के लोगों के संस्मरणों को प्रकाशित करें, उनकी प्रासंगिकता पर परिचर्चा करवाएं। हमें तो जो करना है, अपनी क्षमता अनुसार कर ही रहे हैं।

भोजपुर में नागार्जुन जन्मशताब्दी समारोह 25 को

आरा : जनकवि नागार्जुन के गांव तरौनी, दरभंगा से 26 जून 2010 को उनके जन्मशताब्दी समारोहों के आयोजन का जो सिलसिला शुरू हुआ था, उसका समापन 25 जून 2011 को नागरी प्रचारिणी सभागार, आरा, भोजपुर में हो रहा है। यह भोजपुर के साहित्यकार, संस्कृतिकर्मियों और बुद्धिजीवियों के साथ-साथ आम जनता के लिए भी गर्व की बात है। दरअसल बाबा नागार्जुन का भोजपुर के सांस्कृतिक जगत और जनांदोलनों से गहरा संबंध था। साठ के दशक में आलोचक चंद्रभूषण तिवारी और उनके साथियों के सहयोग से बनाए गए पूर्वांचल संस्था के वह अध्यक्ष थे। बिहार में जनांदोलनों के दौरान उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा था। एक बार वे बक्सर जेल में बंद किए गए थे।
बाबा ने मिथिलांचल में जन्म लिया था, पर पूरा देश उनके घर की तरह था। देश के विभिन्न इलाकों के साहित्याकारों और सामान्य जनता के पास उनसे जुड़ी बेहद आत्मीय और अंतरंग स्मृतियां हैं, पर भोजपुर से उनका खास लगाव था। यहां की क्रांतिकारी पंरपरा मानो उनके मिजाज में घुली हुई थी।  जुल्म और गैरबराबरी के रस्मो-रिवाज और शासकवर्ग के दमन-शोषण-उत्पीड़न का मुखर विरोध करने की जो उनकी प्रवृत्ति थी, वह भी उन्हें भोजपुर की माटी से जोड़ती थी। कभी हार न मानने वाली और बार-बार नए सिरे से संघर्ष के लिए उठ खड़े होने वाली जनता को वह बड़ी उम्मीद से देखते थे। इसी उम्मीद में वे संपूर्ण क्रांति आंदोलन में शामिल हुए, जिसमें भोजपुर के नौजवानों की भी अहम भूमिका थी, लेकिन वे जानते थे कि क्रांति सिर्फ सुगबुगाई है। जैसे ही संपूर्ण क्रांति संपूर्ण भ्रांति में तब्दील होती प्रतीत हुई, वे उससे बाहर आ गए। लेकिन किसी प्रयोग के असफल होने या उसकी गड़बडि़यों को लेकर पस्त और निराश होने वाले कवि वे नहीं थे। आपातकाल और 1977 में बेलछी जनसंहार के बाद के वर्षों में लिखी गई अपनी दो कविताओं- ‘हरिजन गाथा’ और ‘भोजपुर’ में उन्होंने भोजपुर के किसान आंदोलन को नई उम्मीद से देखा। भगतसिंह ने अपने बहुचर्चित लेख में जिस दलित समुदाय को असली सर्वहारा कहा था, उनके राजनीतिक उभार की संभावना की ओर नागार्जुन ने ‘हरिजन गाथा’ कविता में स्पष्ट संकेत किया। बेशक इस संघर्ष ने भोजपुर को गैरजनतांत्रिक सामंती मूल्यों के खिलाफ एक नए जनवादी समाज के निर्माण के संघर्ष भूमि के रूप में देश-दुनिया में मशहूर कर दिया। बाबा नागार्जुन ही नहीं, बल्कि दूसरे लेखकों की रचनाओं में भी भोजपुर का संघर्ष मानवीय प्रगति के इतिहास के एक अहम दौर की तरह दर्ज हुआ।
बाबा नागार्जुन की चेतना में 1970 और 1980 का भोजपुर हमेशा के लिए पैवस्त रहा। ‘हरिजन गाथा’ में भोजपुर के आंदोलन की छाया साफ तौर पर दिखती है। उस दलित सर्वहारा नायक और उसकी राजनीति के बारे में लिखी गईं कुछ पंक्तियां देखने लायक है-
समझ-बूझकर ही समता का
असली मुद्दा पहचानेगा
अरे देखना इसके डर से
थर-थर कांपेंगे हत्यारे
चोर-उचक्के-गुंडे-डाकू
सभी फिरेंगे मारे-मारे
इसकी अपनी पार्टी होगी
इसका अपना ही दल होगा….
श्याम सलोना यह अछूत शिशु
हम सबका उद्धार करेगा
आज यही संपूर्ण क्रांति का
बेड़ा सचमुच पार करेगा
हिंसा और अहिंसा दोनों
बहनें इसको प्यार करेंगी
इसके आगे आपस में वे
कभी नहीं तकरार करेंगी।
अंतिम चार पंक्तियां गौर करने लायक है, जो इसका स्पष्ट संकेत करती हैं कि बाबा के लिए संघर्ष के रूपों का मामला उतना महत्वपूर्ण नहीं था, बल्कि जनता की राजनीतिक मुक्ति, सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था में बदलाव यानी संपूर्ण क्रांति उनका मकसद था, और उसके लिए संघर्ष के सारे रूप उन्हें मंजूर थे। यही मकसद उन्हें भगतसिंह और उनके साथियों से जोड़ता था। और भोजपुर ने उन्हें इसलिए भी आकर्षित किया कि यहां उन्हें भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद के प्रतिरूप दिखाई पड़े, भूमिपुत्रों का संग्रामी तेवर दिखाई पड़ा, जिसका उन्होंने ‘भोजपुर’ कविता में आह्लाद से स्वागत किया और खुद अपने जनकवि समेत सबको इससे जुड़ने का आह्वान किया।
बाबा नागार्जुन ने अपनी लेखनी से भोजपुर को अपूर्व गौरव प्रदान किया और साहित्य के इतिहास में हमेशा के लिए उसे गरिमापूर्ण जगह दी, इस नाते भी भोजपुरवासियों द्वारा उन्हें उनकी जन्मशताब्दी पर याद करने का खास अर्थ है। समारोह में ‘भोजपुर’ कविता और नागार्जुन का जीवन-स्वप्न पर समकालीन जनमत के प्रधान संपादक रामजी राय अपना वक्तव्य देंगे।
यह साल भारतीय उपमहाद्वीप में प्रगतिशील सांस्कृतिक आंदोलन के 75 साल पूरा होने का भी साल है। बाबा नागार्जुन शुरू से लेकर जीवनपर्यंत इस प्रगतिशील-जनवादी सांस्कृतिक आंदोलन के साथ थे। वे इस सांस्कृतिक आंदोलन के बहुत बड़े जनकवि हैं। प्रगतिशील आंदोलन में उनकी भूमिका पर जसम के राष्ट्रीय महासचिव प्रणय कृष्ण अपना वक्तव्य देंगे। बाबा ने कई महत्वपूर्ण उपन्यास भी लिखे। उनकी कविता, कहानी और उपन्यास पर चंद्रेश्‍वर, प्रो. नंदकिशोर नंदन, सुरेंद्र प्रसाद सुमन समेत कई विद्वान विचार रखेंगे। बाबा का रचनाकर्म जनांदोलनों के साथ साहित्य के अटूट रिश्ते की बानगी है। इस संबंध में कवि मदन कश्यप, रामायण राम, संतोष सहर आदि वक्तव्य देंगे। समारोह में बाबा की महत्वपूर्ण कविताओं को साहित्यकार पढ़ेंगे। साथ ही मदन कश्यप, चंद्रेश्‍वर समेत स्थानीय कवियों का कविता पाठ भी होगा।
बाबा ने अपनी एक कविता में कहा था-
जनता मुझसे पूछ रही है क्या बतलाऊं
जनकवि हूं साफ कहूगा, क्यों हकलाऊं।
दरअसल ऐसी साफगोई और बेबाकी, ऐसी जनपक्षधरता आज पहले से भी ज्यादा जरूरी है। बाबा नागार्जुन पर आरा में आयोजित समारोह कोई रस्मी आयोजन भर नहीं है, बल्कि इसका मकसद यह है कि बाबा की परंपरा को आगे बढ़ाया जाए, बाबा के रचनात्मक मकसद को समझा जाए और उनके अधूरे स्वप्न को साकार करने के लिए लोगों को प्रेरित किया जाए। इसलिए भी समारोह में ज्यादा से ज्यादा आम लोगों की भागीदारी की कोशिश की जा रही है। बाबा जनता के कवि थे, साहित्य के जनरूपों का उन्होंने इस्तेमाल किया था। इसलिए मुख्य समारोह से पहले कुछ नुक्कड़ों पर उनकी कविताओं का पाठ भी किया जाएगा। सोमवार 20 जून को शाम में रेलवे स्टेशन परिसर, 22 जून को गड़हनी तथा 23 जून को वीर कुंवर सिंह पार्क के सामने बाबा की चुनिंदा कविताओं का जनता के समक्ष पाठ किया जाएगा। इस बीच समारोह से संबंधित बैनर और फेस्टून लगाने का काम शुरू हो चुका है।
भारी बारिश के बावजूद आज (19जून, 2011) जसम की प्रेस कांफ्रेंस ज्ञानपीठ पब्लिक स्कूल में हुई, जिसमें जसम के राज्य अध्यक्ष रामनिहाल गुंजन, जनमत संपादक सुधीर सुमन, राष्ट्रीय पार्षद सुनील चौधरी और कवि सुमन कुमार सिंह मौजूद थे।

समारोह तैयारी समिति की ओर से सुधीर सुमन द्वारा जारी

नागार्जुन सर्वश्रेष्‍ठ जनकवि : नामव‍र सिंह

नई दिल्‍ली : नागार्जुन जैसा प्रयोगधर्मा कवि कम ही देखने को मिलता है, चाहे वे  प्रयोग लय के हों,  छंद के हों, विषयवस्तु के हों। यह बात वरिष्‍ठ आलोचक नामवर सिंह ने 15 जून को त्रिवेणी सभागार में आयोजित नागार्जुन जन्‍मशती उत्‍सव में कही। इसका आयोजन जनवादी लेखक संघ, सहमत, जन नाट्य मंच  और एक्ट वन के संयुक्त रूप से किया। नामवर सिंह ने कहा कि हिंदी , मैथिली, संस्कृत और बांग्ला भाषाओं पर समान अधिकार रखने वाले नागार्जुन ने जब भी लिखा, जो भी लिखा, सहज- सरल भाषा में लिखा और आम आदमी के लिए लिखा। उनकी यही विशेषता उन्हें सर्वश्रेष्ठ जनकवि का दर्जा दिलाती है। वह सच्चे अर्थों में जनकवि थे।

जलेस के महासचिव मुरली मनोहर प्रसाद सिंह  ने कहा कि आज के दौर के भयंकर संकट के क्षणों में जनकवि नागार्जुन का कृतित्व नये रचनाकारों के लिए प्रेरणादायी है, अंधकार में मशाल की तरह है। इसके बाद नागार्जुन की तीन कविताओं, ‘लाल भवानी’, ‘लाजवंती’ व ‘शासन की बंदूक’ को संगीतात्मक समूहगान के रूप में प्रस्तुत किया गया।

इस अवसर पर ‘नया पथ’ के नागार्जुन जन्मशती विशेषांक के लोकार्पण किया गया। परिचर्चा सत्र में शिवकुमार मिश्र ने नागार्जुन के जीवन संघर्षों और उनके बहुआयामी रचनाकर्म को उनकी कविताओं के अर्थ खोलते हुए पेश किया। राजेश जोशी ने कहा कि नागार्जुन की कविताएं 1936 से 1998 तक के इतिहास की विविध करवटों की गवाह हैं। बाबा के मैग्नीफाइंग ग्लास और ट्रांजिस्टर का जिक्र करते हुए उनकी प्रतीकात्मकता को रेखांकित किया।

आयोजन की सबसे आकर्षक विशिष्टता नागार्जुन की कविताओं को दृश्य-श्रव्य कलारूपों के माध्यम से शास्त्रीय संगीत गायिका अंजना पुरी और सूफी संगीत गायक मदनगोपाल सिंह की प्रस्‍तुतियां रहीं। बीच-बीच में  नागार्जुन की कविताओं का पाठ जुबैर रज़वी, मैत्रेयी पुष्पा, लीलाधर मंडलोई, दिनेश कुमार शुक्ल, मंगलेश डबराल और अशोक तिवारी ने किया। एन.एस.डी. के रंगकर्मी केशव के निर्देशन में ‘बिगुल’ नाट्य ग्रुप ने बाबा की कविताओं का एक नाट्य-कोलाज पेश किया जिसकी सात कडि़या थीं और यह एक अनोखा प्रयोग था। अंत में नागार्जुन की कविता ‘मेघ बजे’ को शास्त्रीय संगीत की बंदिश में जन नाट्य मंच(कुरुक्षेत्र) के कलाकारों ने पेश किया। कार्यक्रम का संचालन जलेस के महासचिव, चंचल चौहान ने किया।

 

नागार्जुन जन्मशती उत्सव 15 को

नई दिल्ली: जनवादी लेखक संघ, सहमत, जन नाट्य मंच, एक्ट वन मिल कर नागार्जुन जन्मशती उत्सव का आयोजन कर रहे हैं। कार्यक्रम 15 जून, 2011 को शाम 5.30 बजे त्रिवेणी सभागार, मंडी हाउस, नयी दिल्ली में आयोजित किया जाएगा।

इस अवसर पर ‘नया पथ’ के ‘नागार्जुन जन्मशती विशेषांक’ का लोकार्पण भी होगा। कार्यक्रम में नामवर सिंह, शिव कुमार मिश्र, राजेश जोशी, जुबैर रजवी, मैत्रेयी पुष्पा, मंगलेश डबराल, दिनेश कुमार शुक्ल, लीलाधर मंडलोई, ब्रजेश, काजल घोष, मदनगोपाल सिंह, रेखा राज, विद्या शाह आदि वक्ता होंगे।

नागार्जुन की प्रतिबद्धता : राधेश्याम तिवारी

जनकवि‍ नागार्जुन की जनपक्षरता पर वरि‍ष्ठ कवि‍ राधेश्याम ति‍वारी का आलेख-

अपने यहां एक परम्परा है गणेश वंदना की। किसी भी काम को शुरू करने से पहले लोग गणेश की वंदना करते हैं। ऐसा इसलिए किया जाता है कि विरोधी भी शांत रहें, लेकिन नागार्जुन ने एक साथ इतने विरोधी पैदा कर दिए हैं कि उनपर चर्चा करते हुए यह संभव ही नहीं है कि आप सबको खुश रख सकें। नागार्जुन हिन्दी के एक ऐसे कवि हैं जो परम्परा से निकलकर प्रगतिशीलता की ओर प्रवृत्त हुए। बाबा से ऐसा इसलिए भी संभव हो सका क्योंकि वे संस्कृत के अलावा पाली, बांग्ला आदि भाषाओं से तो परिचित थे ही, मार्क्सवादी विचारधारा के भी करीब आए। नागार्जुन ने भी वंदना की है, लेकिन वह वंदना बुद्ध, मार्क्स्, फ्रायड के अलावा पिशाच और वैताल की। वे गणेश के माध्यम से अपने विरोधियों को खुश नहीं करना चाहते, इसलिए वे पिशाच को पिशाच ही कहते हैं, उसे खुश करने के लिए किसी अलंकार से अलंकृत नहीं करते-
नमस्ते स्तु पिशाचाय
वैतालाय नमो नमः।
नमो, बुद्धाय मार्क्साय
फ्रायडाय च ते नमः।
नागार्जुन की कविताओं को पढ़ते हुए आप आसानी से समझ सकते हैं कि उनकी दृष्‍टि‍ में  पिशाच  और वैताल कौन हैं। एक बार जब मैंने बाबा से इस संबंध में पूछा तो उन्होंने कहा, ‘‘पिशाच कई तरह के होते हैं। जिसके पास जैसे-तैसे बहुत धन इकट्ठा हो गया हो वह धन पिशाच  है, जो अति विनम्र होकर भी पीछे से वार करता हो वह विनम्र पिशाच है और जो ऐसी कविताएं लिखता हो जिसे पाठक तो क्या, स्वयं कवि भी न समझता हो, उसे कवि पिशाच कहेंगे।’’ गनीमत है कि उन्होंने यह नहीं कहा कि जो आलोचक ऐसी कविताओं को महान बनाने पर उतारू हैं उन्हें आलोचक पिशाच कहेंगे।
नागार्जुन मुलतः राजनीतिक चेतना के कवि हैं। जनपक्षधरता ही उनकी राजनीतिक प्रतिबद्धता है। जनता से उनका जुड़ा़व विश्वव्यापी है। उनकी यह विश्‍वदृष्टि ही है कि वे दुनिया के तमाम दबे-कुचले लोगों की समस्याओं पर नजरें गडा़ए रखते हैं।
कोरिया समस्या पर उनकी एक कविता है-
‘‘गली-गली में आग लगी है घर-घर बना मसान
लील रहा कोरिया मुलुक को अमरीकी शैतान
जूझ रहे किस बहादुरी से धरती के वे लाल
मुझे रात भर नींद न आती सुन सिऊल का हाल।’’
यहां याद कीजिए गालिब का वह शेर-
‘‘मौत का एक दिन मुअय्यन है
नींद क्यों रात भर नहीं आती।’’
बाबा ने गालिब की तरह नींद न आने के कारणों को रहस्य नहीं बनाया, बल्कि साफ-साफ बता दिया कि उन्हें रातभर नींद  क्यों नहीं आती। हालांकि उन्हें सांस की भी बीमारी थी। मैंने भी उन्हें रात भर जागते हुए देखा है। जब व्यक्ति को रात में नींद नहीं आये तो वह कुछ सोचता रहता है। यह हो ही नहीं सकता कि रात में जगा व्यक्ति एक क्षण के लिए भी बिना सोचे रह जाए। एक बीमार व्यक्ति अपने स्वास्थ्य के बारे में ही सोचेगा, लेकिन नागार्जुन उस स्थिति में भी अपने सांसों के बारे में न सोचकर उस सिऊल के बारे में सोचते हैं जहां की जनता अमेरिकी आतंकवाद से लोहा ले रही है। यह है बाबा की राजनीतिक प्रतिबद्धता।
वे मनुष्य को सर्वोपरि मानते हैं और राजनीतिक दलों के विचारों को भी उसी परिप्रेक्ष में देखते हैं। एक घोषित कम्युनिस्ट होकर भी जब नागार्जुन यह लिखते हैं-
‘‘आ गए अब दिन ऐश के
मार्क्स, तेरी दाढ़ी में जूं ने दिए होंगे चीनी अंडे
एक नहीं, दो नहीं, तीन नहीं बावन अंडे
लाल पान के गुलाम ढोएंगे हंडे
सर्वहारा क्रान्ति की गैस के !
आ गए अब तो दिन ऐश के!’’ तो इसका यही अर्थ है कि वे सत्ता के चरित्र को अलग कर नहीं देखते। वे किसी भी तरह के शोषण के विरूद्ध थे। वह चाहे धर्म के नाम पर हो या विचारधारा के नाम पर। इसमें एक बात मैं और जोड़ना चाहूंगा कि मार्क्सवाद का जितना अहित गैर मार्क्संवादियों ने किया है उससे कहीं अधिक उन लोगों ने किया है जो मार्क्सवाद के नाम पर अपनी दुकानें चला रहे हैं। ऐसे लोगों के लिए ही बाबा ने लिखा है-
‘‘दिल में चाहे जो हो/गले में अगर मार्क्‍स है अटका!/बताओ मैं कौन हूं भला?’’ शायद ऐसे ही कम्युनिस्टों के लिए मार्क्‍स ने कहा था- ‘‘मुझे मार्क्सवादियों से बचाओ।’’
नागार्जुन जनता के पक्ष में किसी भी तरह का जोखिम उठाने वाले रचनाकार हैं। वे लक्षणा और व्यंजना में बात करते-करते सीधे अभिधा में भी उतर आते हैं। वे यह मानते हैं कि यह व्यवस्था पूरी तरह भोथरा गई है। इसकी चमड़ी इतनी मोटी हो गई है कि यह लक्षणा और व्यंजना की भाषा नहीं समझती। इसीलिए वे सीधे नाम लेकर कविताएं लिखते हैं। अगर इमरजेंसी के खिलाफ लिख रहे हैं तो सीधे-सीधे नाम लेकर-
‘‘इंदिराजी-इंदिराजी क्या हुआ आपको
सत्ता के मद में भूल गई बाप को।’’
मैं ऐसे कई लेखकों को जानता हूं जो इमरजेंसी में लक्षणा और व्यंजना के इतने कायल हो गए थे कि सार्वजनिक स्थलों की बातें तो दूर, बंद कमरे में भी लक्षणा और व्यंजना में ही बातें करते थे। वही लेखक इमरजेंसी के बाद अपनी रचनाओं के भीतर छूपे विद्रोह की आग को इस तरह उजागर करने लगे मानों दुनिया के सारे क्रांतिकारी उनके पट शिष्य हों। ऐसे ही क्रांतिकारियों के लिए बाबा ने लिखा-
क्रांति तुम्हारी तुम्हें मुबारक
भ्रान्ति तुम्हारी तुम्हें मुबारक
कूट-कपट की भीतर घाती
शांति तुम्हारी तुम्हें मुबारक
अर्धशती अभियान मुबारक
अंतरिक्ष अभियान मुबारक
एक आंख का भौतिक बाद
द्वन्द्वात्मक विज्ञान मुबारक।’’
बाबा ऐसे कम्युनिस्ट नहीं थे कि विरोध में मुट्ठी भी तनी रहे और कांख का बाल भी दिखाई न दे। उनके लिए जनता पहले थी। जो जनता के साथ था, बाबा उसके साथ थे। आप याद करें इमरजेंसी का वह समय जब सीपीआई इमरजेंसी के समर्थन में थी और बाबा भी सीपीआई में ही थे, लेकिन वे जेपी के पक्ष में बिहार की सड़कों पर घूम-घूम कर कविताएं सुना रहे थे-
‘‘एक और गांधी की हत्या होगी अब क्या ?
बर्बरता के मांग चढे़गा योगी अब क्या ?
पोल खुल गई शासक दल के महामंत्र की।
जयप्रकाश पर चली लाठियां लोकतंत्र की !
देश में जब जनता दल की सरकार बनी तो बाबा की भी बांछें खिल गईं। उन्होंने उसी उत्साह में यह कविता लिखी-
‘‘शासन बदले, झंडा बदला तीस साल के बाद
नेहरू, शास्त्री और इंदिरा हमें रहेंगे याद
कोटि-कोटि मत पत्र बन गए जादूवाले वाण
मूर्छित भारत मां के तन में वापस आए प्राण
नसबंदी के जोर-जुलुम से मचा बहुत कुहराम
किया सभी ने शासन को अंतिम बार सलाम।’’
लेकिन सत्ता मिलने के बाद जिस तरह जेपी के चेलों का पतन देश ने देखा उससे जनता बुरी तरह मर्माहत हुई। जिस उम्मीद के साथ जनता दल की सरकार बनी वह उम्मीद कुछ ही समय में मटियामेट हो गई। सत्ता के लिए मंडल और कमंडल का जो खेल हुआ सो तो हुआ ही, ऐसे-ऐसे घोटाले भी सामने आये जिसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती थी। सत्ता पर नए-नए काबिज इन समाजवादियों के पेट इतने बड़े हो गए कि उन्होंने पशुओं का चारा तक नहीं छोड़ा। परिवारवाद को गालियां देने वाले ये नेता खुद परिवारवाद के इतने कायल हो गए कि अपनी निरक्षर पत्नी तक को मुख्यमंत्री जैसे जिम्मेवार पद पर बैठाने में तनिक संकोच नहीं किया। बाबा ने जब यह सब देखा तो उन्होंने लिखा-
‘‘पूर्ण हुए तो सभी मनोरथ
बोलो जेपी, बोलो जेपी
सघे हुए चौकस कानों में
आज ढूंसली कैसे ठेपी
जोर जुल्म की मारी जनता
सुन लो कैसी चीख रही है
तुमको क्या अब सारी दुनिया
ठीक-ठाक ही दीख रही है।’’
यानी जो दल या व्यक्ति जनता से दूर होता गया बाबा भी उससे दूर होते गए। उनके लिए प्रथमतः और अन्ततः जनता ही थी। उन्हें जनता में विश्वास था। वे यह मानते थे कि जनशक्ति से बढ़कर कोई शक्ति नहीं है। अभी हाल में मिश्र की घटनाओं को देखा होगा कि किस तरह वहां के राष्ट्रपति होस्नी मुबारक को जनाक्रोश के कारण पद छोड़ने को मजबूर होना पड़ा और उसके बेटे गमाल मुबारक ने आत्महत्या तक की कोशिश की। इसी तरह लीबिया के तानाशाह मुअम्मर गद्दाफी को भी जनाक्रोश का सामना करना पड़ रहा है। नागार्जुन की कविताएं प्रतिपक्ष की कविताएं हैं। ये कविताएं तानाशाही व्यवस्था के विरूद्ध बार-बार हस्तक्षेप करती हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी देश में कोई बुनियादी बदलाव नहीं आया है। कहने को हम आजाद देश के नागरिक हैं और देश की सीमाओं में कहीं भी रहने को स्वतंत्रा हैं, लेकिन क्षेत्रवाद और धर्म के नाम पर महाराष्ट्र, असम और कश्मीर में जो रह-रह कर तांडव होता रहा है उसका कोई निदान आजतक नहीं निकल पाया। बाबा की कविताओं को पढ़ते हुए अक्सर ऐसा लगता है कि उन्होंने एक खोजी पत्रकार की तरह खबरे खोज-खोजकर अपनी कविताओं में दर्ज की हैं।
नागार्जुन की कविताओं को पढ़ते हुए यह भी लगता है कि सूचना के लिए अखबार और दूसरे संचार माध्यमों पर निर्भर रहना सबसे बड़ा भ्रम है। श्री उदय सहाय ने अपने एक लेख में लिखा है कि अपराध की जितनी घटनाएं घटती हैं उनमें मुश्किल से पच्चीस प्रतिशत घटनाओं को ही मीडिया उजागर कर पाता है। नागार्जुन की कविताओं में ऐसी खबरें भी दर्ज हैं जो मीडिया की नजरों से ओझल हैं या उन्हें ओझल कर दिया गया है। आजादी के बाद हमारे नेताओं ने देश में जिस चरित्र का निर्माण किया ये सारी विद्रूपताएं उसी की देन है। यह क्या कम चिन्ता का विषय है कि आज देश में एक भी ऐसा व्यक्तित्व नहीं है जो पूरे राष्ट्र को एक सूत्र में जोड़ सके। हिन्दूवाद के झंडावरदार ठाकरे क्या कर रहे हैं। उनको सिर्फ महाराष्ट्र और वहां के लोग ही अपने लग रहे हैं। बाबा की नजर वहां भी है। वे लिखते हैं-
बाल ठाकरे! बाल ठाकरे!!
कैसे फासिस्टी प्रभुओं की
गला रहा है दाल ठाकरे
या
कैसा शिव?
कैसी शिव सेना?
कैसे शिव के बैल
चौपाटी के सागर तटपर
नाच रहा है भस्मासुर बिगडै़ल।
यही हाल धरती का स्वर्ग कहा जाने वाला कश्मीर का भी है। अब वह स्वर्ग न होकर स्वर्गवासियों की धरती बनकर रह गया है। वहां के आका ही जब विखंडनवादी बयान देते नहीं थकते तब दूसरों को क्या कहा जाए। इन लोगों पर केन्द्र का भी कोई अंकुश नहीं है। सबसे चिन्ताजनक स्थिति तो इस देश के बौद्धिक वर्ग की है। ये अपने बौद्धिकता के नशे में वही कर रहे हैं जो दुश्मन किया करते हैं। अरुंधति‍ राय का मामला आपके सामने है। अपनी तमाम अच्छाइयों के बावजूद लोकतंत्र एक मजाक बन कर गया है। नेताओं ने लोकतंत्र को भी अपनी निजी संपत्ति की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। बाबा अपनी एक कविता में लिखते हैं-
‘‘तानाशाही तामझाम है/सोसलिज्म का नारा/पार्लमेंट पर चमक रहा है मारुति का ध्रुव तारा/तेरी पुलिस मिलिटरी/तेरी गोली गोले/ हिंसा की बहती गंगा में/ मां तू आंचल धो ले!
तरुणों की सौ-सौ कलेजियां/तुम पर करूं निछावर/ बना रहे दरबार रात-दिन/ मंत्र पढ़ूं मैं शाबर।’’
यहां यह ध्यान देने की बात है कि यह शाबर मंत्र क्या है। तुलसीदास ने भी रामचरितमानस में इस मंत्र का उल्लेख किया है। बाबा ने इस मंत्र को नये संदर्भ में देखा है। इसी अर्थ में उनकी ‘मंत्र’ कविता भी है। शाबर मंत्र शिव का मंत्र है, जिसका कोई अर्थ नहीं होता। बिना अर्थ के ही जाप करते जाइए। वैसे तो निकालने को कोई कहीं से कुछ भी अर्थ निकाल सकता है। जिसे आप कविता भी नहीं मानते उसमें से भी बड़े-बड़े आलोचक ऐसे-ऐसे अर्थ निकाल लेते हैं कि आप चकित रह जाएंगे। आजकल जो कुछ भी हो रहा है वह सब शाबर मंत्र की तरह ही है। अधिकांश विश्वभर में पढ़ी जाने वाली हिन्दी की कविताएं भी शाबर मंत्र का ही सहोदर हैं। ऐसे में नागार्जुन की कविताएं शुद्ध देसी लगती हैं। सही अर्थ में नागार्जुन भारतीय कवि हैं, जिनकी कविताओं का सरोकार जनता से है। चूंकि जन शब्द जनतंत्र में ही अर्थवान होता है, इसलिए हम कह सकते हैं कि आजादी के बाद जनता की समस्याओं पर सबसे अधिक लिखने वाले नागार्जुन हैं। इसीलिए सही अर्थों वे जनकवि हैं। जनतंत्र की दुर्दशा पर वे लिखते हैं-
‘‘सामंतों ने कर दिया प्रजातंत्र का होम
लाश बेचने लग गए खादी पहने डोम
खादी पहने डोम लग गए लाश बेचने
माइक गरजे, लगे जादुई ताश बेचने
इंद्रजाल की छतरी ओढ़ी श्रीमंतों ने
प्रजातंत्र का होम कर दिया सामंतों ने।’’ अतः कह सकते हैं कि नागार्जुन की कलम जनता के इशारे पर चलती है, न कि किसी राजनीतिक दल के इशारे पर। इस ईमानदार जनकवि को याद करने का अर्थ है उनके पूरे समय को याद करना।

शमशेर, केदार और नागार्जुन जन्‍मशती पर आयोजन 27 को

नई दि‍ल्‍ली : कवि‍ शमशेर बहादुर सिंह, केदारनाथ अग्रवाल और नागार्जुन की जन्‍मशती के अवसर जन संस्‍कृति‍ मंच, लखनऊ की ओर 27 फरवरी, 2011 को उत्‍तर प्रदेश हिंदी संस्‍थान, हजरतगंज, लखनऊ में कार्यक्रम काल से होड़ करती कवि‍ता का आयोजन कि‍या जा रहा है। कार्यक्रम में मुख्‍य अति‍थि‍ मैनेजर पाण्‍डेय और वि‍शि‍ष्‍ट अति‍थि‍ राजेन्‍द्र कुमार व बलराज पाण्‍डेय होंगे। कार्यक्रम का पहला सत्र दोपहर 3.30 शुरू होगा। इसकी अध्‍यक्षता नरेश सक्‍सेना करेंगे। इसमें शमशेर, केदार और नागार्जुन की कवि‍ताओं का पाठ कि‍या जाएगा। साथ ही चंद्रशेखर के कवि‍ता संग्रह अब भी का लोकार्पण कि‍या जाएगा। इनके अलावा हमारे वक्‍त शमशेर का महत्‍व व प्रासंगि‍कता पर मैनेजर पाण्‍डेय, हमारे अपने व जरूरी नागार्जुन पर राजेन्‍द्र कुमार और समय के महत्‍वसि‍द्ध कवि‍ केदार पर बलराज पाण्‍डेय का व्‍याख्‍यान होगा।

दूसरा सत्र शाम 7.00 बजे शुरू होगा। इसमें हमारे सम्‍मुख शमशेर के तहत उनके कवि‍ता पाठ की वीडि‍यो फि‍ल्‍म का प्रदर्शन कि‍या जाएगा।