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पुरानी किताबों का नया दौर: रवि‍ बुले

नई दिल्ली : किताबों की दुनिया चाहे डिजिटल हो रही हो, लेकिन छपी हुई किताबों का जुनून कम नहीं हो रहा। यही कारण है कि हिन्‍दी के प्रकाशकों ने बीते एक वर्ष में उन किताबों को पुन: प्रकाशित किया है, जो पिछले पचास से पच्चीस वर्षों में बाजार से बाहर थीं, मगर पाठकों को उनकी तलाश थी। इनमें कहानी, उपन्यास और कविता से लेकर इतिहास की किताबें शामिल हैं। हाल ही में हिन्‍दी के विख्यात लेखक रांगेय राघव का उपन्यास ‘कल्पना’ वाणी प्रकाशन से आया है। इसका पहला संस्करण पचास वर्ष पूर्व 1961 में आया था और उसके बाद अब यह स्वतंत्र पुस्तक के रूप में मौजूद है। इसी प्रकार भारतीय ज्ञानपीठ जल्द ही पचास साल पुरानी किताब ‘रूपांबरा’ प्रकाशित करने जा रहा है। 1960 में ‘रूपांबरा’ प्रकाशित हुई थी और उसके बाद से अनुपलब्ध है। पुरानी किताबों को नये कलेवर में पेश करने वालों में साहित्य अकादमी भी पीछे नहीं है। पिछले वर्ष उसने प्रेमचंद कहानी रचनावली का प्रकाशन किया है। खास बात यह कि यहाँ प्रत्येक कहानी के साथ यह दर्ज है कि वह किस साल किस पत्रिका में पहली बार हिन्‍दी या उर्दू में प्रकाशित हुई। प्रेमचंद साहित्य के विशेषज्ञ कमल किशोर गोयनका ने रचनावली का संपादन किया है।

राजकमल प्रकाशन समूह कन्नड़ भाषा के महत्वपूर्ण लेखक और ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता यूआर अनंतमूर्ति के तीन उपन्यासों ‘संस्कार’, ‘अवस्था’ और ‘भारतीपुर’ को करीब बीस वर्ष बाद पुन: प्रकाशित कर रहा है। गम्‍भीर ही नहीं, पुराना लोकप्रिय कथा साहित्य भी नये रंग-रूप में लौट रहा है। अंतरराष्ट्रीय प्रकाशक हार्पर कॉलिंस, इंडिया ने उर्दू के सबसे लोकप्रिय जासूसी कथाकार इब्ने सफी की दो उपन्यास सीरीज हिंदी में प्रकाशित की है। इनमें एक है जासूसी की दुनिया और दूसरी इमरान सीरीज। 1928 में इलाहाबाद की सिराथु तहसील के नारा गाँव में पैदा हुए सफी का पहला उपन्यास 1952 में छपा था और उनके प्रशंसकों में पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री तक शामिल थे। हिन्‍द पॉकेट बुक्स ने भी देश की आजादी के पूर्व के महाराजाओं और महारानियों की जिंदगियों में झांकती दो अनुपलब्ध किताबें ‘महाराजा’ और ‘महारानी’ प्रकाशित की हैं। इन किताबों को दीवान जरमनी दास ने लिखा है, जो कई राजघरानों के नजदीक रहे। इसी प्रकाशन गृह से रामकुमार भ्रमर के महाभारत और कृष्ण जीवन पर लिखे वृहद उपन्यास क्रमश: चार और पांच खंडों में करीब 25 वर्ष बाद पुन: प्रकाशित हुए हैं।

हिंदी की कुछ पुरानी किताबें हमेशा बेस्ट सेलर के रूप में मौजूद रही हैं। वे प्रकाशन के बाद से ही लगातार बाजार में बनी रहीं। टॉप 10 पर एक नजर* :
-गोदान (उपन्यास), प्रेमचंद, 70 संस्करण
-गुनाहों का देवता (उपन्यास), धर्मवीर भारती, 60 संस्करण
-सूरज का सातवां घोड़ा (उपन्यास), धर्मवीर भारती, 60 संस्करण
-रंगभूमि (उपन्यास), प्रेमचंद, 50 संस्करण
-मधुशाला (कविता), हरिवंश राय बच्चन, 50 संस्करण
-भारत भारती (खंडकाव्य), मैथिलीशरण गुप्त, 47 संस्करण
-साकेत (महाकाव्य), मैथिलीशरण गुप्त, 40 संस्करण
-त्यागपत्र (उपन्यास), जैनेंद्र, 40 संस्करण
-चित्रलेखा (उपन्यास), भगवती चरण वर्मा, 40 संस्करण
-सारा आकाश (उपन्यास), राजेंद्र यादव, 40 संस्करण
*दैनिक जागरण की साहित्यिक पत्रिका ‘पुनर्नवा’ 2011 के अनुसार

(दैनि‍क जागरण में 25 सि‍तम्‍बर को प्रकाशि‍त, से साभार)

इनसाइक्लोपीडिया की तर्ज पर हिंदी कोश

कानपुर: हिंदी वैश्‍वि‍क भाषा का रूप ले चुकी है। केंद्रीय हिंदी संस्थान इसे दुनिया भर में जन-जन से जोड़ने के लिए इनसाइक्लोपीडिया की तर्ज पर लघु विश्‍व हिंदी कोश बना रहा है।

संस्थान के उपाध्यक्ष और कवि अशोक चक्रधर ने 7 दि‍संबर को नगर प्रवास के दौरान कहा कि हिंदी की समृद्धि दुनिया भर में साबित हो चुकी है। हिंदी संस्थान ने डॉ. इंद्रनाथ चौधरी के संपादकत्व में लघु विश्‍व हिंदी कोश बनाने की पहल की है। यह ऑनलाइन भी उपलब्ध होगा। इसके साथ ही हिंदी कॉर्पस का सृजन भी किया जा रहा है, जिसमें भारतीय बोलियों को भी जोड़ा जाएगा।

चक्रधर ने कहा कि हिंदी कतई मरती हुई भाषा नहीं है। यह प्रतिदिन फैल रही है। दुनिया भर में हिंदी ने सिक्का जमाया है और इसी का परिणाम है कि ऑक्सफोर्ड ने दस लाखवें शब्द के रूप में जय हो को मान्यता दी है। भारत में भी हमें संकीर्णतावाद से मुक्ति पाकर बदलते हुए समाज के साथ सोच बदलनी होगी। भारतीय युवा सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, उन्हें हम वह परोसें जो उन्हें हजम हो। इसमें यह भी ध्यान रखना होगा कि अति न हो और अवांछित रूप से अंग्रेजी का प्रयोग न होने लगे। कुल मिलाकर हमें शुद्धतावाद व क्रुद्धतावाद की जगह प्रबुद्धतावाद अपनाकर समझदारी से अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग करना चाहिए।

उन्होंने बताया कि अब हर राज्य में संस्थान के केंद्र बनाने की तैयारी है। इनके माध्यम से हम हिंदी को रोजगार की भाषा बनाएंगे और समाज को ज्ञानोत्पादन का साहित्य सुलभ करायेंगे। चक्रधर बोले कि अच्छा साहित्य जीवित रखना चुनौती बन गया है। साहित्यिक पत्रिकाएं मर रही हैं। लेखन से आजीविका चलाना अब संभव नहीं है। इस अंधकारपूर्ण माहौल में रोशनी की किरण इंटरनेट से आ रही है, जहां नवलेखन स्थान पा रहा है। लेखन पर बाजार का असर बढ़ा है। पहले मकसद को लेकर लिखा जाता था और लेखक अंदर के आवेग को महसूस करते थे। साहित्य की प्रासंगिकता सरोकारों से न जुड़ने के कारण अब विमर्श अलग हो गये हैं। नए हिंदी अध्यापकों में ज्ञान तो है, पर संवेदना नहीं।

(संजीव मि‍श्र की रि‍पोर्ट, दैनि‍क जागरण से साभार )