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आंतरिक हलचलों के कहानीकार हैं दिनेश कर्नाटक : डॉ शुक्ला

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हल्द्वानी:19 फ़रवरी 2017 को सत्यनारायण धर्मशाला में शैक्षिक दखल समिति के तत्वाधान में युवा कहानीकार दिनेश कर्नाटक के तीसरे कहानी संग्रह ‘मैकाले का जिन्न तथा अन्य कहानियां’ का लोकार्पण हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार लक्ष्मण सिंह बिष्ट ‘बटरोही’ ने की तथा इसमें विशिष्ट अथिति डा. तारा चन्द्र त्रिपाठी तथा डा.प्रयाग जोशी रहे।

आधार वक्तव्य देते हुए उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर डा. शशांक शुक्ला ने कहा कि वर्तमान दौर में ग्लोबलाइजेशन के प्रभाव से साहित्य को बचाना बड़ी चुनौती है और दिनेश कर्नाटक के साहित्य में जो स्थानीयता है, वह सांस्कृतिक हमले को झेलती है। लेखक यदि अपने अनुभव क्षेत्र से बाहर चला जाये तो उसकी साहित्यिक यात्रा ज्यादा लम्बी नहीं चल सकती, पर दिनेश जी के साथ ऐसा नहीं है। उनके इस कहानी संग्रह में ही पांच कहानियाँ उनके अनुभव क्षेत्र, माध्यमिक शिक्षा के तंत्र और उसकी समस्याओं पर चर्चा करती हैं।

उन्होंने कहा कि‍ दिनेश कर्नाटक भीष्म साहनी की तरह ही कहानी की शुरुआत में कोई वातावरण नहीं बनाते, बस बिना कोई औपचारिकता के कहानी कहना शुरू कर देते हैं। कहानी के परिवेश के स्थानीय होने के कारण पाठक आसानी से कहानी से जुड़ भी जाता है। वह व्यवस्था पर चोट करने के स्थान पर अपनी कहानियों में सांस्कृतिक चर्चा करते हैं। दिनेश जी आंतरिक हलचलों के कहानीकार हैं।

डा. शुक्ला ने कहा कि‍ दिनेश कर्नाटक की कहानियां प्रश्नों से भरी हुई होती हैं और इनमे पहाड़ का दर्द शामिल होता है। कम से कम तीन जगह मुझे ऐसा लगा कि कि वह पात्रों की अंतर्द्वन्दता का कोई मनोवैज्ञानिक उपचार नहीं करते, यह काम वह पाठक पर छोड़ देतें हैं। इनकी कहानियाँ सच से आँख मिलाने की कहानियाँ हैं जो पुरानी मान्यताओं पर चोट करती हैं और इनकी कहानियों का स्वर प्रतिरोध है।

इसके बाद दिनेश कर्नाटक ने अपनी एक कहानी ‘अच्छे दिनों की वापसी’ का वाचन किया। इसमें एक शिक्षक के अवसाद में जाने और फिर उससे लड़कर वापस आने का बड़ा मार्मिक चित्रण है। इस कहानी के माध्यम से कहानीकार ने यह बात उभारने का सफल प्रयास किया कि कैसे हमारे समाज में अवसाद को कोई रोग नहीं समझा जाता और यह भी कि इससे ग्रस्त व्यक्ति के प्रति समाज की प्रतिक्रिया कैसी रहती है। इस कहानी के वाचन से पूर्व दिनेश कर्नाटक ने कहा कि साहित्य की सबसे बड़ी खूबी है कि यह आपको जीवन के हर कोने में ले जाता है।”

युवा कथाकार खेमकरण सोमन ने कहा कि मेरा दिनेश कर्नाटक से सर्वप्रथम परिचय तब हुआ, जब मैंने उनकी कहानी ‘झाडियाँ’ को कथाक्रम नामक पत्रिका में पढ़ा था, जो सुअर के इंसान बन जाने की कहानी है। उन्‍होंने कहा कि‍ दिनेश कर्नाटक की सबसे अच्छी बात यह है कि वह सहजता और सरलता से कहानी कहते हैं। उनकी कहानियों में सामजिक जीवन, पर्यावरण, संस्कृति का विकृत रूप तथा उसका सही रूप भी दिखता है। उन्‍होंने कहा कि‍ ‘एक मूँछ प्रेमी का कुबुलनामा’ में परंपरा और आधुनिकता का गज़ब का संयोग है। इनके साहित्य को देखकर यह बात सही सिद्ध होती है कि साहित्यकार समाज के बारे में जितना चिंता करता है, उतना ही लिखता है।

कुमायूनी के ख्याति प्राप्त कवि और लेखक जगदीश जोशी ने कहानी संग्रह पर चर्चा करते हुए कहा कि‍ ये कहानियां मानवीय मूल्यों की स्थापना करती हैं और मैकाले के ज़माने से लेकर आज तक जारी शिक्षा प्रणाली का ‘मुआइना तदंतो’ मतलब पोस्टमॉर्टम करती हैं। उन्‍होंने कहा कि‍ यथार्थ दो प्रकार का होता है- एक देखा हुआ और दूसरा भोगा हुआ। दिनेश कर्नाटक की कहानियों में भोगा हुआ यथार्थ है।

शम्भूदत्त पाण्डेय, शैलेय ने कहा कि‍ दिनेश कर्नाटक व्यक्ति मन के कथाकार हैं। दिनेश को सलाह है कि जब भी वे अपनी रचनाओं में सांस्कृतिक पक्ष को उठायें तो उनकी मूल स्थितियों तक अवश्य पहुंचना चाहिए।

युवा कथाकार अनिल कार्की ने कहा कि‍ ‘मैकाले का जिन्न’ कहानी को पढ़ते हुए मुझे तब कि याद आती है, जब मैं गाँव से कक्षा ग्यारह में प्रवेश लेने मिशन स्कूल पिथौरागढ़ गया, तो अंग्रेजी के मासाब ने मेरी कमीज़ के पैन्ट से बाहर निकली होने के कारण मुझे एक झापड़ लगाया जिस कारण मैं आज तक अंग्रेजी नहीं सीख पाया। इसके बाद संस्कृत की कक्षा में भी जाति और वर्ण के आधार पर भेदभाव किया जाता था। उन्‍होंने ‘पीताम्बर मास्साब’ की चर्चा करते हुए कहा कि‍ इस कहानी को पढ़ते हुए मुझे अपने प्राइमरी के मासाब पान सिंह याद आते हैं कि कैसे वो स्कूल शराब पी कर पहुँचते थे और हम सब बच्चे उनके आने तक धारे से पानी भर के लाते थे। उन्‍होंने कहा कि‍ मेरी समझ में कहानी की सफलता इसमें है कि मैं उसे पढ़ते हुए कितना कहानी के साथ खुद को जोड़ पाता हूँ। दिनेश कर्नाटक की कहानियां मेरी इस कसौटी पर पास होती हैं। इनकी कहानियां समाज द्वारा खड़े किये गए फ्रेमों से टकराती हैं और अभिव्यक्ति को बंद करने के इस दौर में भी टिकी रहती हैं।

प्रयाग जोशी ने कहा कि दिनेश की कहानियाँ बहुत रसीली तथा सहज होती हैं जिन्हें पढ़कर मैं तनावमुक्त महसूस करता हूँ।

लोकार्पण कार्यक्रम के अध्यक्ष लक्ष्मण सिंह बिष्ट ‘बटरोही’ ने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि मुझे बड़ी ख़ुशी हुई कि दिनेश के इस कहानी संग्रह के बहाने मुझे उत्तराखंड के साहित्य का पुनरावलोकन करने का अवसर मिला है। बटरोही ने कहा कि‍ लेखक के सामने एक चुनौती यह होती है कि वो अपने परिवेश को अपनी कथा भाषा में लाये, दिनेश इस कसौटी पर खरे उतरते हैं। इन्होंने एक नई कथा भाषा शैली को जन्म दिया है।

कार्यक्रम में प्रभात उप्रेती, कस्तूरी लाल, तारा चन्द्र त्रिपाठी ने भी कहानी संग्रह पर वि‍चार व्‍यक्‍त कि‍ए।

कार्यक्रम की शुरुआत ‘शैक्षिक दखल‘ समिति के कोषाध्यक्ष डा. दिनेश जोशी ने समिति के बारे में जानकारी देकर की। उन्‍होंने दिनेश कर्नाटक के इस कहानी संग्रह के संदर्भ में कहा कि‍ लेखक अपने लिए नहीं,  समाज के लिए लिखता है।

अंत में शैक्षिक दखल समिति की ओर से डा. विवेक ने लोकार्पण कार्यक्रम में उपस्थित सभी लोगों को धन्यवाद ज्ञापित किया।

कार्यक्रम के संचालक डा. महेश बवाड़ी ने दिनेश कर्नाटक के इतनी कम उम्र में तीसरे कहानी संग्रह का छपने को पूरे हल्द्वानी के लिए गौरव की बात बताया।

कार्यक्रम में शशांक पाण्डेय, गिरीश पाण्डेय, बसंत कर्नाटक, गणेश खाती, नवेन्दु मठपाल, सुरेन्द्र सूरी, राजेंद्र पाण्डेय, कन्नू जोशी, हेम त्रिपाठी, हिमांशु पाण्डेय सहित शहर के कई साहि‍त्‍यप्रेमी उपस्थित रहे।

प्रस्तुति‍ : गिरीश पांडे 

‘मैकाले का जिन्न तथा अन्य कहानियां’ का लोकार्पण 19 को

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हल्द्वानी : कथाकार दि‍नेश कर्नाटक की लेखक मंच प्रकाशन से प्रकाशि‍त कहानी संग्रह ‘मैकाले का जिन्न तथा अन्य कहानियां’ का लोकार्पण 19 फरवरी को हल्द्वानी में सत्यनारायण धर्मशाला के हॉल में अपराह्न 03 बजे से होगा। कार्यक्रम की अध्यक्षता लक्ष्मण सिंह बि‍ष्ट ‘बटरोही’ जी करेंगे। मुख्य अति‍थि‍ इति‍हासवि‍द शेखर पाठक और वि‍शि‍ष्ट अति‍थि‍ डॉ तारा चन्द्र त्रि‍पाठी व डॉ प्रयाग जोशी होंगे। बीज वक्ता डॉ शशांक शुक्ला होंगे। इनके अलावा कहानी संग्रह पर डॉ प्रभात उप्रेती, जगदीश जोशी, शैलेय, जगमोहन रौतेला, डॉ महेश बवाड़ी, भास्कर उप्रेती, भूपेन सिंह, अनि‍ल कार्की, खेमकरण सोमन और सुधीर कुमार वि‍चार व्यक्त करेंगे।

दिनेश कर्नाटक 21वीं सदी के पहले दशक में हिन्दी कहानी के क्षेत्र में सामने आई पीढ़ी के महत्वपूर्ण कहानीकार हैं। हिन्दी की लगभग सभी महत्वपूर्ण पत्रिकाओं के युवा पीढ़ी विशेषांकों में इनकी कहानियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं। दिनेश कर्नाटक की कहानियों का फलक काफी विविधतापूर्ण तथा विस्तृत है। ‘पहाड़ में सन्नाटा’ तथा ‘आते रहना’ के बाद यह इनका तीसरा कहानी संग्रह है। वह बिना किसी शोरशराबे के कहानियाँ लिखने में लगे हैं। उनकी कहानियों को पढ़ते हुए लगता है कि वह लोगों को चौंकाने या आश्चर्यचकित करने के लिए नहीं लिखते। जीवन उनकी कहानियों में अपने वास्तविक रंगों के साथ सामने आता है। जीवन की विडम्बनाओं तथा अन्तर्विरोधों पर उनकी तीखी नजर रहती है। कहानी उनके लिए बेहतर दुनिया के निर्माण का औजार है। वह चाहते हैं कि कहानी पढक़र मनुष्य और अधिक मानवीय तथा सम्वेदनशील हो!

अपनी रचना यात्रा में यहाँ पर पहुँचकर वह अपनी कथाभूमि पर पूरे आत्मविश्वास के साथ खड़े नजर आते हैं। संग्रह की हर कहानी पाठक को एक नये अनुभव क्षेत्र की यात्रा पर ले जाती है। ये कहानियाँ भाषा, कथ्य तथा शिल्प की दृष्टि से लेखक के विकास के एक और सोपान की खबर देती हैं।

मानसरोवर यात्रा : दि‍नेश कर्नाटक

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वह इस घर में आज से पहले कभी नहीं आया था। छह साल पहले अनायास इस घर से उसका सामना हुआ था। तब से इस घर से जुड़ी हुई बातें हर क्षण उसके मन-मस्तिष्क में घूम-घूमकर उसे परेशान करती रही थीं। उसे लगता रहा था कि वह दूसरे रास्तों से इस घर से पिण्ड छुड़ा सकता है, लेकिन यह घर और यहाँ के लोग साए के साथ उसके साथ लगे रहते। इस घर से मुक्‍ति‍ पाने के लिए उसने क्या-क्या नहीं किया, कैसे-कैसे रास्तों पर नहीं चला, लेकिन सारी कोशिशें बेकार गई थीं।

पहले उसे लगा था- दूर जाकर वह इस घर और यहाँ के लोगों को भूला सकेगा, लेकिन वह जितना दूर जाता था, यह घर उतना ही उसके करीब आ जाता था। इसी शहर में उसका अपना घर है। पहले वह कहीं से भी आता था, तो सबसे पहले वहीं जाता था। सभी की तरह वह भी अपने घर में जाकर ही चैन से सो पाता था। तब वह सोचता था- कितनी अजीब बात है कि आदमी कितनी तरक्की क्यों न कर ले, दुनिया के किसी भी छोर पर क्यों न पहुँच जाए, लौटकर अपने ही घर आना चाहता है।

लेकिन अब उसी तीव्रता से यह घर उसे अपनी ओर बुला रहा था। अन्तत: उसकी समझ में आया कि उसे इस घर और उसमें रहने वाले लोगों से मिलकर ही सुकून मिल सकता है।

वह बरामदे में पड़ी हुई पुरानी खाट के सिरहाने पर ऐसे बैठ गया, मानो लम्बी जद्दोजहद के बाद अपने गंतव्य में पहुँच गया हो और अब उसे कहीं और न जाना हो। खाट उसके वजन के पड़ते ही कराहने लगी और तब तक कराहती रही, जब तक उसने उसके वजन को अपने में जज्ब नहीं कर लिया।

घर की हालत देखकर लग रहा था या तो वहाँ कोई रहता नहीं है और अगर रहता भी है तो अभी मौजूद नहीं है। जल्दी किसी के आने की सम्भावना को न देखते हुए वह और भी फैलकर बैठ गया। उसे लग रहा था- अब उसे किसी चीज की जल्दी नहीं है। अब उसे और कहीं नहीं जाना है। उसे नए रास्तों के बारे में नहीं सोचना है। उसे तो अब खुद को प्रस्तुतभर कर देना था। कितना आसान था यह, लेकिन अब तक वह इस आसान से काम को कर नहीं सका था। शायद आदमी के जीवन की यही विडम्बना है कि सवालों के जवाब काफी नजदीक होते हुए भी उनकी तलाश में वह जाने कहाँ-कहाँ भटकते रहता है।

उसे याद आ रहा था- इस मकान के करीब से वह कॉलेज के दिनों में भी कई बार गुजर चुका था। तब कभी इसकी ओर ध्यान नहीं गया था। तब क्या पता था कि कभी इस तरह इस घर से वास्ता पड़ेगा। वैसे भी इस मकान में ऐसा कुछ खास नहीं था कि कभी इसकी ओर नजरें घूमतीं। फिर उन दिनों एक अलग ही सुरूर होता था। अलग ही मस्ती छायी रहती थी। वह दोस्तों की दुनिया में ऐसे खो जाया करता था कि साधारण से लेकर असाधारण चीजों तक की ओर ध्यान नहीं जाता था।

अब सोचता है, तो पाता है कि भाग्य ने उसे वह सब दिया था, जिसको पाने की लोग कल्पना किया करते हैं। बड़ा घर, समाज में रुतबा और खर्चने को धन। शरीर भी उसने अपने परिवार वालों जैसा पाया था– ऊँचा कद, ऊँची छाती और चौड़े कंधे। उन दिनों गाँव-कस्बों के छोटे-बड़े मैदानों में शाम के समय बॉलीबाल खेलने के लिए लड़के इकट्ठा हो जाया करते थे। कई टूर्नामैंट होते थे। बॉलीबाल का उसका जैसा खिलाड़ी दूर-दूर तक दूसरा नहीं था। टूर्नामैंटों में उसका खेल देखने के लिए दूर-दूर से लोग आया करते थे। खासतौर से उसके ‘स्मैश’ जिनका विरोधी टीमों के पास कोई तोड़ नहीं होता था। नेट के पास बॉल मिलते ही वह चीते की फुर्ती से उछलकर प्रहार करता था। कभी अचूक ‘प्लेसिंगÓ तो कभी इतना जोरदार प्रहार कि सामने के किसी की बॉल की लाइन में आने की हिम्मत नहीं होती थी।

व्यक्तित्व ऐसा की जहाँ से गुजरता लोग पलटकर उसकी ओर देखने लगते थे। हमेशा तीन-चार यार-दोस्त उसके साथ लगे रहते थे। बाकी उससे बात करने या उसका साथ पाने को तरसते थे। शायद इसीलिए लोगों की प्रशांसाभरी आँखें देखने की उसे आदत सी पड़ गई थी। तीखी और तटस्थ नजरों से उसे चिढ़ होने लगी थी। अपने सामने किसी के ऊँचे कद को वह बर्दाश्त नहीं कर पाता था। हार उससे सहन नहीं होती थी। हमेशा विजेता की तरह दिखते रहना उसकी फितरत बन चुकी थी।

पिता का चलता हुआ कारोबार था। पैसों की कमी नहीं थी। जो चाहता, वह मिल जाया करता था। उन दिनों जब लड़कों की जेब में आने-जाने तक के लिए पैसों का टोटा होता था, वह ‘भट्…..भट्’ करती हुई बुलेट में कॉलेज आया करता था।

किसी मैच के दौरान मामूली-सी बातचीत पर गोविन्दपुरी के लड़कों ने उसके खास दोस्त देवा को देख लेने की धमकी दे दी थी। देवा छाया की तरह हर वक्त उसके साथ रहा करता था। वह उसका इस कदर मुरीद था कि उसके लिए कुछ भी कर सकता था। देवा को दी गई धमकी, उसे खुद को दी गई लगी थी।

इस चुनौती से वह तिलमिला कर रह गया था और बदले की आग में सुलगने लगा था।

आखिर इस इलाके में किसमें इतनी हिम्मत है, जो उसके दोस्त को देखेगा।

इसके बाद उसने रोज शाम को अपने दोस्तों के साथ गोविन्दपुरी की ओर जाना शुरू कर दिया था। इरादा साफ था- हो जाए टक्कर और उनकी भी समझ में आ जाए कि उन्होंने किस को ललकारा है!

उधर, उनकी बढ़ती हुई सरगर्मी को देखते हुए गोविन्दपुरी के लड़के भी उनको सबक सिखाने की तैयारी करने लगे थे। उनकी तैयारी पूरी होती, उससे पहले ही एक दिन वह घटना घटी थी।

मौहल्ले में घूमते हुए एक लड़के का घूरना उससे बर्दाश्त नहीं हुआ था। उसको पास बुलाकर उसने उसके दो-तीन थप्पड़ रसीद कर दिए थे। वह तो वहाँ से खिसक लिया, लेकिन वहाँ पर मौजूद एक युवक उससे उलझ गया।

”उसको काहे को मारा?’’ उसने सीधे उसके पास आकर सवाल किया था।

”चल…चल रास्ता नाप। तू हमको जानता नहीं है।’’

”मैं तो यहाँ सभी को जानता हूँ। बताना अपने बारे में…मैं भी जान लूँ।’’ उसने मुस्कराते हुए कहा था।

”तेरी तो।’’ देवा अपने पर काबू नहीं रख पाया था।

वह फुर्ती से एक ओर हटा और उसने देवा के चेहरे पर इतना जोरदार घूँसा मारा कि उसे सारी दुनिया घूमती हुई नजर आने लगी। पहले तो वह एक ओर बैठ गया और फिर अपनी दोनों टाँगें फैलाकर लेट गया।

इसके साथ ही उसके साथ के सभी लड़के उस पर झपट पड़े थे। वह उन सबसे अकेले ही इतनी आसानी से साथ लड़ रहा था, जैसे बच्चों के साथ खेल, खेल रहा हो। उनके गुस्से और हड़बड़ाहट का वह खूब फायदा उठा रहा था। उसके जोरदार पंचों से कुछ ही देर में उसके साथियों के पैर उखडऩे लगे थे।

तब दोस्तों को पीछे धकेलकर वह सामने चला आया था। वह भी कुछ ही देर तक उसका सामना कर पाया था। उसके सधे हुए पंच इसे भी परेशान करने लगे थे। ऐसा उसके साथ अब तक नहीं हुआ था। वह गुस्से से उफनने लगा था, तभी देवा चिल्लाया था, ”मार साले को।’’ और उसने उसके हाथ में लम्बो-सा चाकू थमा दिया था। और देखते-ही-देखते उसके हाथों से वह हुआ, जिसके बारे में उसने भी कभी नहीं सोचा था।

उसको दोनों हाथों से अपना पेट पकड़कर खून के फव्वारे को रोकने की कोशिश करते हुए देखकर वह भीतर-ही-भीतर दहल उठा था। दोस्तों की भागने की ‘हाँक’ के साथ वह भी दौड़ पड़ा था, लेकिन दौड़ते हुए उसे लगा था, जैसे- उसके पैरों में लोहे की बेड़ी बांध दी गई हो। उसकी आँखों के आगे कभी युवक का चेहरा तो कभी खून की धार आ-जा रही थी।

उस दिन के बाद से उसके भीतर का पुराना इंसान उससे दूर होने लगा था और एक बिल्कुल नया इंसान जन्म लेने लगा था।

उन दिनों शहर में इस तरह की घटनाएँ काफी कम होती थीं। लोग उबल पड़े थे। जुलूस-धरने होने लगे थे। उसे अखबार से पता चला था कि उसके हाथों मारा गया युवक फौजी था और फौज की ओर से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बॉक्सिंग मुकाबलों में भाग लेकर काफी नाम कमा चुका था। बूढ़े माँ-बाप और भाई-बहन उसी पर आश्रित थे। अखबारों में उसके द्वारा अर्जित किए गए कीर्तिमानों और उसके घर की खबरें आने लगी थीं।

तब बाहरी तौर पर सहज दिखने की कोशिश करने के बावजूद उसको एहसास हो गया था कि उससे बड़ा अनर्थ हो गया है। जितना वह यह सब सोचता था, उतना ही उसके भीतर की चट्टान दरक कर चूर-चूर होती जाती थी।

उसके अन्दर सवालों के तूफान उठते और उसे अपने साथ उड़ाकर किसी अनजान जगह पर लाकर पटक देते थे- क्या तू किसी को जीवन दे सकता है? नहीं दे सकता, तो तुझे किसी को मारने का हक किसने दिया?

यह सब मेरे अन्दर इकट्ठा हो चुके अहंकार की वजह से हुआ। मैं होश में नहीं था। लेकिन इतना गुस्सा मेरे भीतर आया कहाँ से? गोविन्दपुरी बार-बार जाने की जरूरत क्या थी? किसी का कहा मुझे इतना बुरा क्यों लगा था। उसे नजरअंदाज भी तो किया जा सकता था। और फिर क्या सिर्फ मुझे ही कहने का हक है, कोई और कुछ क्यों नहीं कह सकता है?

मैं दूसरों से अलग कैसे हो गया?

फिर हथौड़े के प्रहार की तरह लगातार यह स्वीकारोक्ति उसके दिमाग में चोट करने लगी थी कि मैं उसकी हत्या का दोषी हूँ। मैं अपराधी हूँ। मैं अपने किए की जिम्मेदारी से किसी तरह बच नहीं सकता।

तब उसके पास हँसने की कोई वजह नहीं रह गई थी और उसके चेहरे पर हमेशा छाए रहने वाली, दूसरों की मजाक उड़ाती मुस्कान गायब होने लगी थी। देवा की बातें अब उसे खुशी नहीं देती थीं, बल्कि कई बार तो उसे उसकी बातों पर गुस्सा आ जाता था। वह सोचता– क्या उसके पास दिल और दिमाग नहीं है? उधर देवा भी उसमें हो रहे बदलावों को समझ नहीं पा रहा था। दोस्तों की बातों पर वह झल्ला उठता था और उसकी समझ में आ रहा था कि उसने अपने साथ दोस्त नहीं, चमचे जोड़े थे। धीरे-धीरे उसकी अजीबो-गरीब बातों और हरकतों के कारण दोस्तों ने उसके पास आना छोड़ दिया। अब वह अकेला रह गया था। अकेलेपन ने उसे पीछे मुड़कर अब तक जिए जीवन की ओर झाँकने का मौका दिया।

थानेदार के साथ पिता का रोज का बैठना था। उसने दोस्ती निभाने का वादा कर दिया था। पिता ने भी उसी वक्त बैंक से निकाली हुई नई गड्डियाँ उसके सामने बिखेर दीं, जो उसने ‘ये तो बाद में भी हो जाता’ कहकर समेट ली थीं। चश्मदीद गवाह कोई था नहीं। तारीखें लगती रहीं। मुकदमा द्रौपदी के चीर की तरह बढ़ता रहा।

उन दिनों उसके एक ओर सम्भावनाओं और उम्मीदों से भरी हुई जिन्दगी थी और दूसरी ओर निरंतर कचोटती हुई उसकी अन्तरात्मा। जीत रंगों से भरी हुई जिन्दगी की हुई थी। वकील उससे जो-जो कहने को कहता, वह जज के सामने दोहरा देता था, लेकिन हर झूठ के बाद भीतर से कोई उसे दुत्कारता था और हर रोज वह अपनी ही नजरों में गिरता जाता था।

और एक दिन गवाहों के बयानात के आधार पर उसे और उसके साथियों को बाइज्जत बरी कर दिया गया।

वह बाहर के मुकदमे से तो बरी हो गया, लेकिन अपने अन्दर के मुकदमे में और भी बुरी तरह उलझकर रह गया।

सोते-जागते उसकी आँखों के आगे कभी बॉक्सर, तो कभी उसके बूढ़े माँ-बाप आ जाते, कभी उसके उदास भाई-बहन उससे सवाल करते, ‘हमने तेरा क्या बिगाड़ा, जो तूने हमको दर-दर की ठोकर खाने को मजबूर कर दिया।’

उन्हीं दिनों उसका गुरुजी के आश्रम में जाना बढऩे लगा था।

वह आश्रम में जाता और संन्यासियों की मंडली के बीच में जाकर बैठ जाता। कुछ ही देर में एक हाथ से दूसरे हाथ में होते हुए चिलम उस तक पहुँच जाती। दो-तीन लम्बे कश खींचने के बाद वह सब कुछ भूलकर उनकी बातों में शामिल हो जाता था।

”क्या बात है, बेटा। तुम वैरागी से होते जा रहे हो।’’ एक दिन स्वामीजी ने उससे पूछा था।

वह एकाएक पूछे गए उनके प्रश्न का जवाब नहीं दे पाया था।

घरवालों से भी उसकी हालत छिप नहीं पाई थी। उन्होंने कई तरीकों से उसको समझाने की कोशिश की थी। शादी को लेकर दबाव डाला, पर वे उसे सहमत नहीं कर पाए।

अन्तत: उस घर के लोगों की जिम्मेदारी पिता द्वारा लेने के वादे के साथ वह विवाह के लिए राजी हुआ था। घरवालों को किसी भी कीमत पर अपना वारिस चाहिए था। उन्हें लगा था कि खूबसूरत बीवी और बच्चों को देखकर वह सब कुछ भूल जाएगा। शादी से पहले ही उसने लड़की को सब कुछ सच-सच बता दिया था, जिसका लड़की के निर्णय पर कोई असर नहीं पड़ा था।

स्त्री के प्रति उसके मन में युवाओं जैसी जिज्ञासा और आकर्षण नहीं रह गया था।

सुबह वह जैसे ही बाहर के उजाले की ओर जाता, उसकी आँखों के आगे वही दृश्य घूमने लगते।

तब उसे स्वामीजी का ब्रह्मज्ञान राह दिखाता था- ‘जगत मिथ्या है। रिश्ते-नाते धन-दौलत सब झूठ है। जो आया है, एक दिन चला जाएगा। यहाँ का सब कुछ यहीं रह जाएगा। ज्ञान ही मुक्ति का उपाय है।’

ऐसी बातें उसने पहले कभी नहीं सुनी थीं। सुनी भी होंगी, तो कभी उन पर गौर नहीं किया था। इस तरह की बातें पहले उसे फिजूल लगती थीं। लोगों को मरते हुए देखा था। यह भी देखा था कि जब मौत आती है, तो वह किसी के साथ भेदभाव नहीं करती। न किसी की दौलत उसे बचा पाती है और न ही कोई यहाँ से कुछ लेकर जाता है। आदमी खाली हाथ आता है और खाली हाथ चला जाता है। ‘फिर काहे की हाय तौबा!Ó स्वामीजी कहते थे। तब उसे कभी भी इस बारे में सोचने की फुर्सत नहीं मिली थी। अब उसके भीतर भी सवाल उठता था- ‘काहे की हाय तौबा!’

फिर एक दिन वह हमेशा के लिए स्वामीजी की शरण में चला गया और उसने चोला धारण कर लिया।

पिता को पता चला तो दनदनाते हुए स्वामीजी के पास पहुँचे। स्वामीजी ध्यान में थे।

मगर सेठ को उन्होंने अपने दिव्य चक्षुओं से देख लिया था।

‘ओऽम्…शंति…ओऽम्…शांति…।’ कहकर जब उन्होंने अपनी सांसारिक आँखें खोलीं, तो सामने चिंतामग्न सेठ को देखा। वह सब समझ गए। उन्होंने इशारे से बाकी लोगों को वहाँ से जाने के लिए कहा।

”तुमको कुछ कहने की जरूरत नहीं है। तुम्हारे आने का प्रयोजन मैं समझ गया हूँ। तुमको पता नहीं है, तुम्हारा बेटा किस हालत से गुजर रहा है। इस हालत में वह कैसे पहुँचा, मुझे सब बता चुका है। तुमको कोई चिन्ता करने की जरूरत नहीं है। वह मेरी शरण में है। बल्कि तुमको तो खुश होना चाहिए कि वह कहीं और नहीं गया, उसने कोई अनिष्टकारी कदम नहीं उठाया। चिन्ता मत करो। मैं धीरे-धीरे उसे ठीक करके तुमको लौटा दूँगा।’’ कहकर स्वामीजी सहज आँखों से उसकी ओर देखने लगे।

उसके पिता ने जवाब में कुछ कहने की चेष्टा की, जिसे ‘बस’ कहकर स्वामीजी ने रोक दिया।

फिर दीक्षा लेने के लिए स्वामीजी ने उसे हरिद्वार भिजवाया था। एक बड़े और भव्य आश्रम में वह तीन महीने तक रहा था। सुबह भक्तों के साथ गंगा में स्नान करने जाता था। दिनभर का समय आश्रम के रखरखाव और सत्संग में बीतता था। शाम को गंगा आरती में भाग लेता था। भोजन आहार-विहार हर चीज का समय तय था। ये तीन महीने उसे अपने जीवन का स्वर्णिम समय लगा था।

वहाँ से लौटने के बाद जब वह स्वामीजी के आश्रम में पहुँचा, तो उससे मिलने के लिए माता-पिता के साथ उसकी पत्नी भी मौजूद थी। उस दिन उसने सोचा था- उसके एक ओर मोह-माया से भरी हुई आकर्षक जिंदगी है और दूसरी ओर उसे हर समय परेशान करता, उसका अपराध। अब उसे तय करना है कि वह अपराधबोध के साथ जिए या उसका प्रायश्चित करे।

स्वामीजी के मठ में लौटकर उसने एक बात और महसूस की थी। भक्तों के सामने शांत और प्रफुल्लित दिखने वाले स्वामीजी मठ के लोगों के सामने अलग ही रूप में नजर आते थे। वहाँ के सभी लोग उनसे डरे हुए रहते थे। कब किस पर बिगड़ जाएँ, इसका भय बना रहता था। लगता था, जैसे- वे मठ के मालिक हैं और बाकि सब नौकर। उसे लगता था- धर्म तो बहाना है। दरअसल, यह सब उसके नाम पर जीवन जीने का एक तरीका है। फर्क सिर्फ इतना है कि गम-ए-रोजगार के लिए कोई गीत गाता है, तो कोई अभिनय करता है। यहाँ यह सब लोगों के जीवन के उद्धार के नाम पर हो रहा था, जबकि इस सारे उद्यम से उद्धार अकेले स्वामीजी का हो रहा था।

स्वामीजी दैवीय भोजन ग्रहण करते। दिव्य बिस्तर में सोते। उनका कक्ष दैवीय छटा से भरपूर था। वे स्कार्पियो से सफर करते थे। हालाँकि उनके बेड़े में दो गाडिय़ाँ और भी थीं। वह बड़े लोगों से मिलते थे। छोटे लोगों को उन तक पहुँचने की सुविधा नहीं थी।

बहुत जल्दी ऊब गया था, वह इस सब से।

और ऊब से निजात पाने के लिए पहाड़ों की ओर निकल गया था।

काफी भटकने के बाद जब भीतर कुछ भी बदलता हुआ नहीं लगा था, तो किसी पहुँचे हुए सिद्ध ने मानसरोवर की यात्रा पर जाने का सुझाव दिया था। उसने कहा था- ‘उस पवित्र मानसस्थली पर जाकर तुमको अपने सारे सवालों के जवाब मिल जाएँगे। वहाँ की हवा, मिट्टी और पानी इतना शुद्ध है कि उस धरती पर कदम रखते ही आदमी वह नहीं रह जाता, जो वह वहाँ पहुँचने से पहले होता है। पवित्र झील के जल की तरह वहाँ अपने भी आर-पार देखा जा सकता है।’

उसी क्षण बड़ी तीव्रता के साथ यह एहसास हुआ था कि वह यात्रा यहाँ क्यों नहीं की जा सकती। अपने आर-पार यहाँ क्यों नहीं देखा जा सकता?

तभी तय किया था कि खुद से मोह की रही-सही डोर भी टूट जाए, तो अच्छा। शरीर से लगा, आखिरी वस्त्र भी गिर जाए तो अच्छा।

इस तरह इधर-उधर भटकते रहने से कुछ प्राप्त नहीं होगा। सबसे बड़ी बात है– अपने भीतर की यात्रा की जाए। खुद का सामना किया जाए बाकि सब भटकाव है। सारी यात्राएँ व्यर्थ हैं।

यही है सच्चा ज्ञान, इसी में छुपा है मुक्ति का रहस्य।

उस दिन से एक अलग ही तरह की मौज, अलग ही तरह के आत्मविश्वास से भर गया था, वह।

दो जोड़ी आँखें देर तक उसे देखते रही थीं। जब वह नहीं टला तो हाथ में पानी लेकर एक बुढिय़ा प्रकट हुई,  ”पानी पियो बाबाजी, और कुछ सेवा करने की इस घर की कुव्वत नहीं है।’’

पानी का लोटा हाथ में पकड़कर वह गौर से बुढिय़ा की ओर देखने लगा।

”जानता हूँ माता, तेरे ऊपर वज्रपात हुआ है।’’ उसने उससे कहा था।

बुढिय़ा इस तरह अचानक कही गई उसकी बात का अर्थ समझ नहीं पाई। जब अर्थ उसकी समझ में आया, तो उसने हाथ जोड़ दिए, ”सच कह रहो हो महाराज! सब समय-समय की बात है। इस घर में कभी बहुत ज्यादा नहीं था, तो इतना तो होता ही था कि दरवाजे में आया हुआ खाली हाथ नहंी जाता था। अब तो आप देख ही रहे हो।ÓÓ कहकर उसने उसको घर की ओर दिखाते हुए खुद भी घर के चारों ओर नजर दौड़ाई, ”पहले होनहार बेटा गया। उसके पीछे उसके पिता भी चले गए। बेटा मेरा लाखों में एक था। लोगों के दु:ख-सुख में काम आने वाला। सभी कहते थे- ऐसा बेटा बड़े भाग से मिलता है। लोगों की नजर लग गई उसे…मारा गया एक दिन।’’

”तू परेशान न हो माँ, मुझे तुझसे कुछ नहीं चाहिए। जो चाहिए था, वह मिल गया। प्यासा था, तेरे हाथ का पानी मिल गया, जैसे– मुझे सब मिल गया। किसका आसरा है, गुजर कैसे होती है?’’

”महाराज, अब इस घर में कोई नहीं आता। यहाँ आकर किसी को क्या मिलेगा? हम अब किसी के क्या काम आ सकते हैं? हम तो किसी का दिया हुआ भी लौटा नहीं सकते। छोटा बेटा है, कहीं लग-लुग जाए, तो इस घर का कुछ भला हो।’’

”थोड़ा पानी और मिलेगा माँजी?’’ उसने गिलास बुढिय़ा की ओर बढ़ा दिया।

”जा बेटा, बाबाजी के लिए पानी और ले आ।’’ उसने परदे की ओट में खड़ी लड़की से कहा था।

”तूने बताया नहीं माँ, घर का खर्च कैसे चलता है?’’

”कुछ तो पैंशन मिल जाती है। एक संस्था वाले आए थे। पूछताछ करने के बाद कहने लगे- हम आप जैसे भाग्य के मारे लोगों की सहायता करते हैं। बैंक में खाता खुलवाया। अब हर महीने उसमें कुछ रुपये आ जाते हैं। पिछले दिनों कह रहे थे- लड़की के लिए कोई योग्य लड़का मिले, तो हमें खबर कर देना। शादी का सारा खर्चा हमीं उठा लेंगे। अपना पता दे गए हैं। बेटी के लिए कोई ठीक-ठाक लड़का मिल जाता, तो गंगा नहा आती।’’

”चिन्ता मत कर माँ, सब ठीक हो जाएगा। लड़का भी मिल जाएगा। ब्याह भी हो जाएगा।’’

‘बाबाजी, पता नहीं क्यों तुम्हारे कहने पर आस-सी जग रही है।’’ बुढिय़ा देर तक उसकी ओर देखती रही, ”भूख लगी होगी। सुबह की बासी रोटी पड़ी होगी। सब्जी भी नहीं होगी। चीनी के साथ खाओगे।’’

”खाऊँगा माँ, जरूर खाऊँगा।’’

उसने खूब चाव से रोटियाँ खाईं और मुँह-हाथ धोकर बुढिय़ा से हाथ जोड़कर कहा, ”अब जाऊँगा, माँ।’’

”फिर कभी आना, बेटा। तेरी बातों से बड़ा आसरा मिला।’’

”मौका मिलेगा, तो जरूर आऊँगा, माँ।’’

उसके जाते ही बेटी माँ पर बिगड़ गई थी, ”किसी को भी घर में बैठाकर अपनी राम कहानी सुनाने लगती है। तुझे पता है न, कैसा समय है? किसी का क्या भरोसा।’’

”जानती हूँ, बेटा। अब किससे डरें…किस बात के लिए डरें…हमारे पास अब क्या बचा है, जिसकी फिक्र में मरे जाएँ।’’

वहाँ से निकलकर वह बगैर किसी को अपने आने की खबर दिए हुए घर और उन सभी जगहों का चक्कर लगा आया, जहाँ से उसके बचपन और जवानी की यादें जुड़ी हुई थीं। फिर वह सीधे पुलिस स्टेशन की ओर को चला गया था। थानेदार को सारी बातें सच बताकर उसे लगा– अब उसकी मानसरोवर परिक्रमा पूरी हो चुकी है।

(लेखक मंच प्रकाशन से प्रकाशि‍त दि‍नेश कर्नाटक के कहानी संग्रह ‘मैकाले का जि‍न्न तथ अन्य कहानि‍याँ’ से साभार)

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कहानी संग्रह- मैकाले का जि‍न्न तथा अन्य कहानि‍याँ
लेखक- दि‍नेश कर्नाटक
मूल्य– अजि‍ल्द- 170 रुपये
सजि‍ल्द– 350 रुपये
प्रकाशक- लेखक मंच प्रकाशन
433 नीति‍खंड- 3
इंदि‍रापुरम- 201014, गाजि‍याबाद
ईमेल- anuraglekhak@gmail.coom

नोट- 168 पेज की इस पुस्तक में ‘मानसरोवर यात्रा’ सहि‍त 15 कहानि‍याँ हैं।

बच्चे प्रश्न करने से क्यों डरते हैं : दिनेश कर्नाटक

shekshik dakhal

इस बार मई माह में देहरादून में प्राथमिक शि‍क्षकों के मॉड्यूल निर्माण हेतु आयोजित एक कार्यशाला में प्रतिभाग किया। वहां एस. सी. आर. टी., उत्तराखंड की प्रवक्ता हेमलता तिवारी हमारे समूह की संयोजक थीं। हेमलता दीदी उत्साही शि‍क्षक प्रशि‍क्षिका हैं। उनकी शि‍क्षण प्रक्रिया तथा बाल मनोविज्ञान को लेकर समझ साफ है। जब समझ साफ होती है तो आत्मविश्वास होना स्वाभाविक है। हेमलता दीदी समूह के समक्ष हंसते-मुस्कराते हुए आतीं। खुलकर बातें करती। इसका असर यह होता कि प्रतिभागी जबरदस्ती ओढ़ी जाने वाली गंभीरता से मुक्त होकर सहज हो जाते और अपनी बात खुलकर कहने लगते। अपने इस अंदाज से हेमलता दीदी कटे-कटे रहने वाले प्रतिभागियों को भी बगैर कुछ कहे कार्य करने के लिए प्रेरित करतीं। एक ओर जहां वे माहौल को बिलकुल सहज बना देती थीं, वहीं अपनी कार्ययोजना पर दृढ़ता तथा गंभीरता से काम करतीं। इस प्रकार वे अपने शैक्षणिक उद्देश्‍य की ओर तेजी से बढ़ती जातीं।

इस उदाहरण से एक बात स्पष्‍ट है कि सीखना-सिखाना भयमुक्त, प्रसन्न तथा उत्साहजनक माहौल में ही अच्छा हो सकता है। भयभीत तथा तनावग्रस्त शि‍क्षक-शि‍क्षिकाएं अपने विद्यार्थियों को प्रेरित नहीं कर सकते। वे उन्हें भय और तनाव ही दे सकते हैं। परिवार तथा शि‍क्षा से जुड़े लोगों का यह दायित्व है कि वे अपने आस-पास सहज, प्रसन्न तथा उत्साहजनक माहौल की रचना करें। अच्छा शि‍क्षण; अच्छी कहानी, अच्छी कविता तथा अच्छे गीत की तरह विद्यार्थी में आत्मविश्‍वास पैदा करता है। उसे बोलने, भागीदारी तथा प्रश्‍न करने के लिए प्रेरित करता है। बच्चों के मूल्यांकन की एक बड़ी कसौटी उनका मौलिक प्रश्‍न करना है। पढ़े हुए को उगल देना उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना कि पढ़े हुए से प्रश्‍नों का जन्म लेना। अगर एक शि‍क्षक के पढ़ाने के बाद बच्चे सवाल करने लगते हैं तो यह शि‍क्षक की सफलता है।

बच्चे जन्म के साथ अपार ऊर्जा, उत्साह तथा जिज्ञासा लेकर जन्म लेते हैं। यह गुण हर बच्चे में जन्मजात होता है। अगर इन गुणों को सही दिशा मिल जाती है तो ये बच्चे अपने घर-परिवार, समाज-देश को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। लेकिन ज्यों-ज्यों बच्चे बड़े होते जाते हैं, उनकी ऊर्जा, उत्साह और जिज्ञासा क्षीण पड़ने लगती है। इसके कारण हमारे परिवार तथा समाज में विद्यमान हैं। कम बच्चे ही होते हैं, जो अपने शि‍क्षकों, अभिभावकों की सहायता से अपने रास्ते को पहचानकर पूरी तन्मयता से उस दिशा की ओर बढ़ चलते हैं। शेष बच्चों को उनकी राह खोजने में सहायता करने वाला न तो घर में होता है, न स्कूल में और न समाज में। ऐसे दिशाविहीन नागरिकों से घर, समाज तथा देश भी दिशाहीनता का शि‍कार हो जाता है।

बच्चों के साथ कैसा बर्ताव किया जाए ? इस बारे में हमारे वहां न तो घर-परिवार और न ही देश-समाज की कोई स्पष्‍ट समझ है। अधिकांश लोग मौका मिलने पर स्त्रियों और बच्चों से अच्छा व्यवहार नहीं करते। हमारे वहां विवाह लोगों के लिए स्त्री-पुरुष मिलन की स्वीकृत संस्था भर होती है। लोग इसके साथ जुड़ी हुई जिम्मेदारियों से परिचित नहीं होते। उनके पास अपने घर तथा बच्चों के लिए कोई योजना नहीं होती। जैसे ही जिम्मेदारियों का बोझ पड़ना शुरू होता है, वे मैदान छोड़कर भागने लगते हैं। ऐसे लोगों के जीवन में बच्चों का आगमन अनामंत्रित अतिथि की तरह होता है। वे उनके आगमन को स्वीकार नहीं कर पाते और बच्चों को मां-बाप का सहज प्रेम तथा प्रोत्साहन नहीं मिल पाता। वे जन्म के बाद से ही बच्चों का उत्पीड़न करने लगते हैं। उत्पीड़ित बच्चे उत्पीड़ित समाज की रचना करते हैं। वे जहां भी जाते हैं, आधे-अधूरे मन के साथ जाते हैं। न वे स्कूल में रम पाते हैं और न समाज में। आत्मकेन्द्रित समाज के लिए बच्चों की जिज्ञासा, उनके सवालों का कोई अर्थ नहीं होता। उनके सवालों को वे परेशान करने की चीज समझते हैं। अतः डांटकर या मारकर चुप करा देते हैं।

घर के बाद बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण की दूसरी महत्वपूर्ण संस्था स्कूल है। स्कूल तथा वहां के शि‍क्षक-शि‍क्षिकाएं बच्चों के प्रति सकारात्मक होंगे तो बच्चे खुलकर उनसे सवाल कर सकेंगे। उनकी जिज्ञासा को पंख लगेंगे। लेकिन ऐसा होता नहीं है। बहुत दिन हुए सोशल मीडिया में किसी प्रतिष्‍ठि‍त स्कूल के हॉस्टल में रह रहे बच्चों के साथ वहां के वार्डन द्वारा की जा रही मारपीट का एक वीडियो देखा था। वार्डन सामने खड़े प्राइमरी स्तर के बच्चों को एक-एक कर सामने लाता, उन्हें बेंत से पीटता, फिर उठाकर फैंक देता। बच्चों के साथ मारपीट का वह वीडियो दिल दहला देने वाला था। लोगों ने अपने बच्चों को अच्छी शि‍क्षा के लिए उस तथाकथित नामीगिरामी स्कूल में भेजा होगा और वहां उनके साथ इस तरह का अमानवीय बर्ताव हो रहा है। वह वार्डन बच्चों को भयभीत करके नियंत्रण में रखना चाहता है। वही नहीं हम सब भी यही करते हैं। हम सब को यही तरीका सबसे आसान लगता है। बच्चे से बात करने, उसकी समस्या को ध्यान से सुनकर समाधान निकालने के लिए न तो हमारे पास, न हमारी शि‍क्षा व्यवस्था में और न ही हमारे पाठ्यक्रम में समय है, न ही धैर्य है और न ही इस पद्धति पर हमें यकीन है। परिणाम यह है कि हम अपने निजी तथा सार्वजनिक जीवन में भय के दुष्चक्र से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं।

बच्चे के जीवन में शि‍क्षक-शि‍क्षिकाओं का महत्व माता-पिता के बराबर है। जितना समय वे घर में रहते हैं, लगभग उतना ही समय वे स्कूल में शि‍क्षक-शि‍क्षिकाओं तथा अपने साथियों के साथ बिताते हैं। स्कूल न सिर्फ बच्चों के शैक्षिक, सांस्कृतिक, शारीरिक, मानसिक तथा कलात्मक उन्नयन के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह उनके सामाजीकरण के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। सवाल यह है कि बच्चों के प्रति इतनी तरह से जिम्मेदार स्कूल इन भूमिकाओं को निभाने के लिए तैयार है ? क्या स्कूल को अपनी इन जिम्मेदारियों का एहसास है ? जवाब में यही कहा जा सकता है कि अपने देश में स्कूल की अवधारणा कई तरह के उद्देश्‍यों में उलझकर रह गई है। कहीं इसका उद्देश्‍य पैसा कमाना है। कहीं अपने धर्म या मत का प्रचार करना। कहीं किसी खास उद्देश्‍य के लिए दीक्षित करना, जैसे सैनिक स्कूल, धार्मिक शि‍क्षा आदि-आदि। कहीं शि‍क्षा दिए जाने का दिखावा भर किया जाता है।

शि‍क्षा से जुड़े लोग;  मुख्यतः शि‍क्षक या प्रशासक भी क्या शि‍क्षा की अवधारणा को समझते हुए इस क्षेत्र में हैं या केवल नौकरी या आजीविका के लिए ? सच तो यह है कि हमारे समाज का मूल ध्येय किसी भी तरह पैसा कमाना हो चुका है। उसमें भी शार्टकट से कमाने का प्रचलन अधिक होता जा रहा है। यानी मेहनत,  उद्यमशीलता तथा रचनात्मकता का कोई महत्व नहीं है। हमारे समाज में अभी भी लोग केवल इंजीनियर, डॉक्टर, व्यापारी, क्रिकेट का खिलाड़ी, अभिनेता, आईएएस, पीसीएस, मैनेजर ही बनना चाहते हैं। बहुत कम लोग हैं जो शि‍क्षा, कृषि‍, उद्यमीता आदि क्षेत्रों में जाना चाहते हैं। शि‍क्षा में ऐसे लोगों की संख्या बहुत ज्यादा है जो जाना तो कहीं और चाहते थे, लेकिन वहां नहीं पहुंच पाने के कारण यहां आ गए। यहां आने में कोई बुराई नहीं है। जब आ ही गए हैं तो यहीं का हो जाना चाहिए। लेकिन अधिकांश लोग यहां के नहीं हो पाते। वे इस पेशे को आजीविका के रूप में निभाते चले जाते हैं।

नौकरी करना और किसी पेशे को जीना दो अलग बातें हैं। नौकरी करने वाला किसी काम से आत्मिक रूप से नहीं जुड़ता। वह निर्लिप्त भाव से दिया गया काम कर देता है। शि‍क्षा का कार्य केवल शरीर ही नहीं आत्मा की भी संलिप्तता की मांग करता है। जब शि‍क्षक अपनी कक्षा के बच्चों से जुड़ने की कोशि‍श करता है तो बच्चे भी उससे जुड़ने लगते हैं। तब सीखना-सीखाना मिला-जुला कार्य हो जाता है। जब अपने विद्यार्थियों से जुड़ने की इच्छा न हो तो शि‍क्षण की प्रक्रिया नीरस हो जाती है। एक शि‍क्षक को अपने आप से हमेशा पूछना चाहिए कि क्या वह अपने विद्यार्थियों से अपने बच्चों की तरह पेश आता है ? क्या वह जब अपने विद्यार्थियों के पास जाता है तो उसी तरह से आह्लादित होता है, जैसे वह अपने बच्चों से मिलने के समय होता है ? अगर वह अपने शि‍क्षण को इस तरह करता है तो वह शि‍क्षण का आनंद उठाता है। जब शि‍क्षक आनंद में होता है तो उसके विद्यार्थियों को भी पढ़ने-लिखने में आनंद आता है। तब बच्चे सीखने लगते हैं और प्रश्‍न करने लगते हैं। दोनों के बीच आत्मीयता उत्पन्न होती है।

हिन्दी से एम.ए. करने के दौरान प्रोफेसर ओमप्रकाश गंगोला से मेरा कुछ ऐसा आत्मीय संबंध बना, जो आज 22-23 साल बाद भी कायम है। बात इतनी थी कि वे अपने विषय भारतीय तथा पश्‍चि‍मी काव्यशास्त्र से प्रेम करते थे और मुझे उस विषय को जानने-समझने की ललक थी। उनके लैक्चर के दौरान मैं उनसे तमाम सवाल करता और वे बड़े उत्साह से मेरी जिज्ञासाओं को शांत करते। मैं उनके जैसा गुरु पाकर आनंदित था और वे शायद एक जिज्ञासु छात्र को पाकर प्रसन्न थे। कई बार तो पूरी क्लास हम दोनों के प्रश्‍नोत्तर को सुनते रहती थी। प्राध्यापक और भी थे, मगर उनसे वह आत्मीयता नहीं बनी। कारण साफ है, उनमें से अधिकांश लोग सिर्फ नौकरी करते थे। वे क्लास में आते और अपना लैक्चर देकर चलते बनते। उन्हें किसी तरह की चुनौती पसंद नहीं थी। उनकी पाठ योजना पहले से तय होती थी। वे संवाद से बचना चाहते थे। उनका सारा ध्यान कोर्स को पूरा करने में होता था। ऐसे में स्वाभाविक है कि वे प्रश्‍न और संवाद को पसंद नहीं करते। शायद तभी उनमें से अधिकांश को मैं भूल चुका हूं।

बच्चे प्रश्‍न नहीं करते क्योंकि हम उनसे संवाद स्थापित नहीं करना चाहते। क्योंकि हम उनके साथ आगे नहीं बढ़ना चाहते। क्योंकि हम अपने रोजमर्रा के सुविधाजनक ढर्रे को तोड़ना नहीं चाहते। क्योंकि हम परिश्रम नहीं करना चाहते। बच्चे प्रश्न नहीं करते क्योंकि हम भी प्रश्‍न नहीं करते। हम प्रश्‍न करते तो बच्चे भी प्रश्‍न करते।

(शैक्षि‍क दखल, जुलाई 2016 से साभार)  

अतीत से लेकर वर्तमान तक की एक सैर : महेश चंद्र पुनेठा

Daxin bharat Me Solah Dinयात्राएं हमारे जीवनानुभव को समृद्ध करती हैं। नई ताजगी और स्फूर्ति से भरती हैं। आदमी का नजरिया विस्तृत करती हैं। अनेक पूर्वाग्रहों और धारणाओं को तोड़ती हैं। यांत्रिकता और एकरसता को भंग करती हैं। युवा कथाकार दिनेश कर्नाटक के शब्दों में कहें, तो- ‘यात्रा हमारी जानकारी का ही विस्तार नहीं करती है, बल्कि हमारे भीतर की ग्रहण करने की शक्ति के बारे में हमें बताती है। इसमें हमें वर्तमान की ही खबर नहीं होती, वरन अतीत से भी रू-ब-रू होते हैं। शायद इसलिए यात्रा हमें न सिर्फ वर्तमान से अतीत की ओर ले जाती है, बल्कि अतीत से वर्तमान की ओर आने की तमीज भी सिखाती है।’ इसलिए यात्राओं के लिए हमें समय निकालना ही चाहिए, लेकिन जहां जीवन की तमाम आपाधापी के बीच यात्रा हर आदमी के लिए संभव नहीं होती है, वहीं मुझ जैसे यात्राभीरू चाहकर भी यात्रा में नहीं जा सकते हैं। ऐसे में यात्रा वृत्तांत यात्रा न कर पाने की कमी को कुछ हद तक पूरी करते हैं। हमें उन जगहों से परिचित कराते हैं, जहां हम सशरीर नहीं पहुंच पाते हैं। हिंदी साहित्य में यात्रा वृत्तांतों की एक लंबी परम्परा रही है। सद्य प्रकाशित ‘दक्षिण भारत में सोलह दिन’ नामक यात्रा वृत्तांत इस परम्परा का विकास है, जिसके लेखक हैं हिंदी के युवा कथाकार दिनेश कर्नाटक।

सोलह दिनों की यह यात्रा दक्षिण भारत के कुछ चुनिंदा शहरों में की गई। ये शहर हैं- चेन्नई, काँचीपुरम, महाबलीपुरम, पाँडिचेरी, चिदम्बरम, तंजौर, तिरुच्ची, कन्याकुमारी, शुचीन्द्रम, नेडुमगाड, तिरूअनंतपुरम, कोच्चि, मैसूर तथा बैंगलूर। इन स्थानों पर लेखक अधिकतर मंदिरों के दर्शन करने गया, पर इसका मतलब यह नहीं कि वह किसी धार्मिक आस्था से प्रेरित होकर इस यात्रा में गया था। जैसा कि वह स्वयं कहते हैं- ‘हमारे लिए यह यात्रा पुण्य कमाने से ज्यादा दक्षिण के इतिहास, जीवन तथा संस्कृति से रू-ब-रू होने का माध्यम थी। तीनों चीजों को जानने के लिए मंदिरों से बढिय़ा कौन-सी जगह हो सकती है?’ इसलिए यह यात्रा वृत्तांत इन स्थानों के ऐतिहासिक और दर्शनीय स्थलों का वर्णन ही नहीं करता है, बल्कि वहां की भाषा, संस्कृति और सामाजिक व्यवहार से भी हमें परिचित करता है। लेखक ने जो देखा और जैसा देखा उस पर अपनी बेवाक प्रतिक्रिया तो व्यक्त की है, साथ ही विभिन्न स्थानों की ऐतिहासिक-राजनीतिक पृष्ठभूमि से भी संक्षेप में अवगत कराने की सफल कोशिश की गई है। इस पुस्तक को पढ़ते हुए लगता है कि हम भी लेखक के साथ-साथ उन स्थानों की यात्रा कर रहे हैं। बहुत सहज-सरल शैली में गहरी रसात्मकता के साथ यह वर्णन किया गया है। यह किताब कथा का सा आनंद देती है। लेखक छोटे-छोटे प्रसंगों को किस्सागोई के अंदाज में बहुत रोचकता के साथ पाठकों के सामने प्रस्तुत करता जाता है। लेखक के भीतर और बाहर दोनों के दर्शन इस वृत्तांत में होते हैं। लेखक का पूरा व्यक्तित्व और सोच सामने उभर आती है। जैसे एक स्थान पर वह दक्षिण भारतीयों के संस्कृति एवं आधुनिकता के समन्वय के बारे में बात करते हुए आधुनिकता के बारे में कहते हैं-‘आधुनिकता का संबंध पहनावे, भाषा तथा फैशन से नहीं होता है, उसका असर हमारी सोच तथा व्यवहार में भी पडऩा चाहिए। अगर व्यक्ति सहृदय, मानवीय तथा बड़ी सोच वाला नहीं है, तो वह कितना ही समृद्ध क्यों न हो जाए, उसके द्वारा लपेटे हुए बाहरी तामझाम का कोई अर्थ नहीं रह जाता।’ इसी तरह वह ‘अरविंद की भावभूमि में’ अरविंद दर्शन को याद करते हुए आध्यामिता के बारे में कहते हैं कि ‘आध्यामिकता व्यक्ति के अन्तर्जगत, जीवन की अनिश्चिंता, विडंबना तथा अंतर्विरोधों से जुड़े सवालों के उत्तर तलाशने की कोशिश करती है। आध्यामिकता तेजी से लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है। देखते ही देखते आध्यात्मिक गुरुओं के अनुयायिओं और उनके साम्राज्य में आशातीत वृद्धि हो जाती है। लेकिन एक सवाल मुझे लगातार सोचने को मजबूर करता है कि बहुत जल्दी हर नई आध्यात्मिक धारा एक सम्प्रदाय में बदल जाती है। उस सम्प्रदाय के लोग अपने सोचने के तरीके को सब से श्रेष्ठ घोषित करने में लग जाते हैं। समाज को उसके बारे में पता नहीं चल पाता। जिस प्रकार साहित्य, सिनेमा, संगीत तथा कला किसी भी व्यक्ति के पास बेरोक-टोक पहुंचकर उसे अपना बना लेते हैं, वैसा आध्यात्मिकता के साथ नहीं होता। उस धारा के प्रतिनिधि दावा करते हैं कि इसे समझने के लिए तुम्हें हमारी शरण में आना होगा, हमारा शिष्य बनना होगा। शायद यही आध्यात्मिकता की सीमा भी है। वरना इतने गुरुओं तथा शिष्यों के होने के बावजूद, वे अपने समय को प्रभावित क्यों नहीं कर पाते हैं?’ वहां के मंदिरों में उमडऩे वाली भीड़ को देखकर लेखक के मन में बड़ा महत्वपूर्ण सवाल पैदा होता है जो तमाम धार्मिक प्रवृत्ति के लोगों के लिए विचारणीय है- ‘मंदिर-तीर्थस्थानों में तिल रखने की जगह नहीं मिलती, लेकिन शायद ही धर्म इनके व्यवहार को प्रभावित करता हो? यह सबसे बड़ी विडंबना है। यही लोग ऑफिस में जाकर घूस लेते हैं, घर में जाकर मानसिक तथा शारीरिक हिंसा करते हैं। थोड़ी-सी बात में आपा खोकर लडऩे-मरने को तैयार हो जाते हैं। यह सवाल किसी एक धर्म का नहीं, सभी धर्मों को माननेवालों के जीवन में यह फांक दिखाई देती है।’

यह वृत्तांत दक्षिण की पुरानी यादों से शुरू किया गया है, जब पहली बार लेखक ऑटोमोबाइल कंपनी टीवीएस में नौकरी के दौरान एक प्रशिक्षण कार्यक्रम में भाग लेने एक माह के लिए मदुरै गया था। इस यात्रा वृत्तांत की खासियत है कि दक्षिण भारत का वर्णन करते हुए लेखक को बार-बार अपना उत्तराखंड याद हो आता है। विशेषकर वहां के लोगों के आचार-व्यवहार के संदर्भ में। दिनेश कर्नाटक मानते हैं कि भाषा तथा संस्कृति के मामले में कुछ स्थूल भेद होने के बावजूद संस्कृति की आधारभूमि एक ही है, जो हमारी राष्ट्रीय एकता को बनाए रखती है।

कोई उत्तर भारतीय दक्षिण भारत की यात्रा करे और भाषा का सवाल उसके मन में पैदा न हो, ऐसा नहीं हो सकता। दिनेश कर्नाटक भी उसके अपवाद नहीं हैं, बल्कि एक संवेदनशील शिक्षक व लेखक होने के नाते यह सवाल उनके मन में बार-बार और बड़ी शिद्दत से उठता है और भाषा को लेकर उनकी एक स्पष्ट राय उभर कर सामने आती है। भाषा विमर्श को अच्छा खास स्थान इस पुस्तक में मिला है। दिनेश कर्नाटक तमिलनाडु में हिंदी विरोध के पीछे के राजनीतिक कारणों तथा दक्षिण भारतीयों के मन में हिंदी के भय के कारणों को रेखांकित करते हैं और यह मानते हैं कि ‘उस समय के नेतृत्व द्वारा भाषा के मसले को बड़े दृष्टिकोण के साथ नहीं निपटा गया। कुछ लोगों द्वारा राष्ट्रीय एकता के लिए ‘हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तानी’ को अनिवार्य माने जाने की भूल की जा रही थी। यह माना जा रहा था कि स्थानीयताएं देश की एकता के मार्ग में बाधा हैं।’ वास्तव में यही दृष्टिकोण भारतीय भाषाओं को हाशिए में धकेलने और अंग्रेजी को इतना अधिक प्रभावशाली बनाने का कारण बना। इसी के चलते आज भाषा की यह पूरी लड़ाई अंग्रेजी बनाम हिंदी की लड़ाई बनकर रह गई है, जबकि हिंदी की तरह अन्य भारतीय भाषाएं भी अंग्रेजी के चलते आज उपेक्षित होती जा रही हैं। दिनेश कर्नाटक का यह तर्क बिल्कुल सही है कि ‘अंग्रेजी के सामने भारतीय भाषाओं की दुर्गत होती जा रही है। अंग्रेजी वर्चस्व, सत्ता तथा सफलता की भाषा बनी हुई है। मजे की बात यह है कि अंग्रेजी के इस वर्चस्व से सभी भारतीय भाषाओं के लोग उबरना चाहते हैं, लेकिन वे इस गलतफहमी से आज तक मुक्त नहीं हो पाए हैं कि हिंदी के बजाय उन्हें अंग्रेजी से कम खतरा है।’ दिनेश कर्नाटक त्रिभाषा फार्मूले को भाषा के सवाल का सबसे अच्छा समाधान मानते हैं। एक भाषा के रूप में अंग्रेजी से उन्हें कोई दिक्कत नहीं है। वह इस बात से सहमत हैं कि हमें भारत की एक भाषा के रूप में अंग्रेजी को स्वीकार कर लेना चाहिए, लेकिन बराबरी के तौर पर। अंग्रेजी सहित सभी भारतीय भाषाओं का कद एक समान होना चाहिए। उनका स्पष्ट मानना है कि ‘हर राज्य की राजभाषा को वहां के हर स्कूल की पढ़ाई का माध्यम होना चाहिए। अंग्रेजी को एक विषय के रूप में पढ़ाया जाना चाहिए, न कि पढ़ाई के माध्यम के रूप में।’ इस यात्रा वृत्तांत में हिंदी के प्रचार-प्रसार में हिंदी फिल्मों के योगदान को भी रेखांकित किया गया है।

इसके अलावा यह पुस्तक बाजार और पूंजीवाद के चलते हमारे आचार-व्यवहार में आ रहे परिवर्तनों की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करती है। बाजारवाद के बढ़ते प्रभाव ने दक्षिण हो या उत्तर, गांव हों या शहर, सभी जगह आदमी के आचरण और सोच को बदला है। शिक्षा तक को इसने अपनी जरूरत के अनुसार बदल दिया है।

कुल मिलाकर समीक्ष्य पुस्तक यात्रा के बहाने जीवन के विविध आयामों को छूती है और खट्टी-मीठी अनेक वास्तविकताओं से पाठक का परिचय कराती है। अतीत से वर्तमान तक की सैर कराती है। सबसे बड़ी बात मुझ जैसे यात्राभीरू व्यक्ति को भी यात्रा के लिए प्रेरित करती है। प्रस्तुत पुस्तक की ये पंक्तियां झकझारे जाती हैं- ‘दूरी का ख्याल एक तरह की मानसिक बाधा है। देखा जाए, तो न कुछ दूर होता है और न कुछ पास। कई बार हम पास की जगह से दूर हो सकते हैं, जबकि दूर की जगह से नजदीक।’

पुस्तक : दक्षिण भारत के सोलह दिन(यात्रा वृत्तांत)
लेखक : दिनेश कर्नाटक

प्रकाशक : लेखक मंच प्रकाशन

433 नीतिखंड-3, इंदिरापुरम

गाजियाबाद-201014

ईमेल : anuraglekhak@gmail.com

पुस्तक का मूल्य (अजि‍ल्द ) : 120 रुपये
(सजि‍ल्द) : 300 रुपये

यह किताब निम्न जगहों पर उपलब्ध है-

1:पीपीएच बुक शॉप
जी-18, आउटर सर्किल
मेरि‍ना आर्कड, कनाट सर्कस, नई दि‍ल्ली -1
2: पाण्डेय बुक शॉप
एच-169, शॉप नंबर-12, नजदीक पानी की टंकी
सेक्टेर-12, नोएडा-201301
3: कि‍ताबघर
जीआईजी रोड, पाण्डे गांव
पि‍थौरागढ़- 262501
मोबाइल नं- 9411707450
4: बुक वर्ल्ड
10-ए, एस्ले हॉल (परेड ग्राउंड के पास)
देहरादून, उत्तराखंड5: Thougths
मुखानी चौराहे के निकट, हल्द्वानी

शि‍क्षा व्‍यवस्‍था में ‘शैक्षिक दखल’ : रमेश जोशी

 

हाल में प्रकाशि‍त पत्रि‍का ‘शैक्षि‍क दखल’ के प्रवेशांक पर कवि‍ और शि‍क्षक रमेश जोशी की टि‍प्‍पणी-

शिक्षा के गिरते स्तर तथा शैक्षिक गुणवत्ता पर उच्च स्तर से लेकर चाय-समोसे की दुकान तक नियमित रूप से चर्चा होते रहती है। यह अलग बात है कि यह चर्चा/बहस अधिकांश समय निकालने के लिए ही होती है या व्यक्तिगत रूप से किसी व्यक्ति अथवा समुदाय विशेष की छवि धूमिल करने हेतु होती है। परन्तु महत्वपूर्ण बात यह है कि शिक्षा के स्तर/गुणवत्ता में कमी होती जा रही है तथा दोहरी शिक्षा प्रणाली से समाज में उत्तरोतर खायी बढ़ती जा रही है। इस पूरे शिक्षा तंत्र को संचालित करने में शिक्षक की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, अस्तु यदि गुणवत्ता में कमी आ रही है तो शिक्षक भी इसके लिये निश्‍चि‍त रूप से दोषी है। यह बात दीगर है कि व्यवस्थागत खामियों के चलते शिक्षक का चरित्र धूमिल हो रहा है। परन्तु इन व्यवस्थागत खामियों को दूर करने में शिक्षकों को भी महत्वपूर्ण भागीदारी करनी होगी, अपने विद्यालय स्तर के क्रियाकलापों में(जहाँ वे उस भूमिका में पहले से हैं) तथा सामाजिक चेतना के क्षेत्र में (अनेक शिक्षक इस दिशा में प्रयासरत हैं) समाज का दृष्टिकोण शिक्षक के प्रति नकारात्मक क्यों है, इसकी तह में जाना पड़ेगा तथा समाज को जागरूक करने के लिये अतिरिक्त प्रयास की आवश्यकता है। यह अतिरिक्त प्रयास रचनात्मक शिक्षक मण्डल द्वारा किया जा रहा है जो कि स्वागत योग्य है।

‘शैक्षिक दखल’ पत्रिका के रूप में शिक्षकों का यह प्रयास सभी शिक्षकों की सहभागिता पर निर्भर होगा। चर्चित कवि एवं आलोचक महेश पुनेठा जो कि एक समर्पित शिक्षक भी हैं तथा दिनेश कर्नाटक कहानीकार एवं शिक्षक द्वारा सम्पादित यह पत्रिका अपने प्रथम प्रयास में ही काफी हद तक सफल कही जा सकती है। ‘प्रारम्‍भ शीर्षक’ में महेश पुनेठा ने शिक्षा, शिक्षक तथा समाज के स्वरुप को बारीकी से निरुपित किया है तथा शिक्षण मूल्यों की महत्ता को रेखांकित किया है, शिक्षक समाज को इसकी आवश्यकता है। प्रेमपाल शर्मा द्वारा लिखित ‘सामाजिक न्याय तथा भाषा’ भी वर्तमान परिप्रेक्ष्य में महत्वपूर्ण आलेख है। अंग्रेजी तथा अंग्रेजियत किस प्रकार हमारे ऊपर हावी है, इसका जिक्र किया है। साथ ही हिन्‍दी भाषा की अनिवार्यता तथा इस हेतु सरकारी प्रयासों की आवश्यकता पर उन्होंने जोर दिया है ताकि अधिकाधिक जनता को इसका लाभ मिल सके।

शिरीष खरे द्वारा सारगर्भित आलेख ‘अगर शिक्षा की एक परत हो’ में भी सरकारी नीतियों की खामियों को उजागर किया है। किस प्रकार स्वतंत्रता से लेकर आज शिक्षा में समानता का अभाव है, इसका चित्रण किया गया है। इसके परिणामस्वरूप आज भी समाज का एक वर्ग विशेष सब पर हावी है। दिनेश कर्नाटक की कहानी ‘मैकाले का जिन्न’ हमारी शिक्षा व्यवस्था का एक मॉडल प्रस्तुत करता है। किस प्रकार शिक्षक की कार्यप्रणाली बाधित हो रही है, इसका सजीव चित्रण उन्होंने किया है। दरअसल शिक्षण कार्य एकमात्र पेशा ही नहीं वरन पेशे से कहीं ऊपर का कार्य है, यह एक जूनून है इसलिये शिक्षक को विभागीय दिशा-निर्देशों के साथ-साथ स्वविवेक का भी प्रयोग करना चाहिये और यदि वह ऐसा नहीं करता है तो उसे असफलता ही मिलेगी। कर्नाटक द्वारा रचित शिक्षक पात्र नरेन्द्र इसी सरकारी व्यवस्था से बंधा है और यदि वह अतिरिक्त प्रयास करना भी चाहता है तो परिस्थितियाँ इसके लिये उसे इजाजत नहीं देती हैं। डॉ. विपिन कुमार शर्मा की पुस्तक समीक्षा ‘पढने का आनंद’ भी पठनीय एवं शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वालों के लिये उपयोगी है।

कुल मिलाकर पत्रिका पठनीय है। शिक्षकों का यह प्रथम प्रयास अच्छा है। यद्यपि आवरण एवं साज-सज्जा की दृष्टि से पुस्तक आकर्षक नहीं बन पाई परन्तु इसमे समाहित अधिकांश सामग्री पढ़ने योग्य है। सभी शिक्षक इसे पढ़ें और अपने अनुभवों को पत्रिका तक पहुँचाएं तभी यह प्रयास वास्तविक रूप से सार्थक होगा। पत्रिका से जुड़े शिक्षकों से भी अनुरोध होगा की इसमें समर्पित एवं सफल शिक्षकों के विचार प्रकाशित करें तथा उनके कार्यों को स्थान दें।

सम्‍पादक : महेश चंद्र पुनेठा और दिनेश कर्नाटक
सम्‍पर्क : महेश चंद्र पुनेठा, जोशी भवन, नि‍कट लीड बैंक, पि‍थौरागढ़-262501, मोबाइल नम्‍बर- 0941170470
सहयोग राशि‍ : 15 रुपये(प्रति‍ अंक), 50 रुपये(चार अंकों के लि‍ये), 2000 (आजीवन)