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द्वैत : पसुपुलेटि गीता

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दिल्ली में घटी वारदात से स्पंदित होकर लिखी गयी तेलुगु की चर्चित कवयित्री पसुपुलेटि गीता की कविता। इसका हिंन्‍दी में अनुवाद शांता सुंदरी ने किया है-

शरीर हो गया एक ऐतिहासिक दोष
दो होंठ, दो गाल
दो स्‍तन, दो जांघें..
युगल सौंदर्य
दो दशकों में ही जैसे जिंदगी हो गई खत्‍म

जिंदगी इतनी तंग हो गई कि
जरा सा हिलो तो उधड़ने लगती है
दीवारों का रहस्‍य खोले बिना ही
ग्राफिती बदरंग होने लगी
कल न जाने किसकी बारी है?
गलत मत समझना,
लगने लगा है
पास खड़ा हर आदमी जैसे
जाँघों के बीच अपने
भाले को लेकर चल रहा हो
समंदर और आसमान को मिलाकर बुनने पर भी
इस अनादि प्रस्‍तर युग के नंगेपन को
ढकने के लिये
हाथ भर कपड़ा नहीं मिलता

आँख खुलने पर ही तो
पता चलेगा ना
कि सुबह हो गई
जिस अंग में आँखें ही नहीं
उसके लिए
बधिरांधकार ही आनंद है
आँतों को ही नहीं
दिल को भी उखाड़ते हुए
बदन में अंधेरा सीधे खंता बन
धँस जाता है
गलत मत समझना,
कीड़ों से कीटनाशन की आशा करते हुए
मृत्‍यु से अमृत माँगते हुए
जानवरों से जानवरों का बहिष्‍कार कौन करता है?
मानवता के युटोपिया में
सिग्‍नलों के बीच मुख्‍य सड़कें
जब बन जाती हैं खामोश आक्रंदन
कान फटनवाले
सवालों के यहाँ गोलियाँ उग रही हैं
तो क्‍या हुआ?
विवेक पर लाठियाँ बरस रही हैं
झूठी सहानुभूति, गंदी गालियाँ
आँसू पोंछ रही हैं
सुरक्षा दलों का फैलाव
आँसू गैस के बादल बन
विश्‍वासों पर छाने लगा है
शहर एक मृत्‍यु का हथियार बन गया
अपना और पड़ोस का घर
हरा घाव बन अकुलाने लगते हैं
हम दोनों का अस्तित्‍व कायम रहना हो
तो तुम्‍हें मुझमें
मुनष्‍यता बन स्‍खलित होना पड़ेगा
मुझे तुम्‍हारे अंदर
मातृत्‍व बन बहना होगा
शरीर के दोषी हो जाने के बाद
प्राणों के स्‍पंदन बुझ जाने के बाद
दरिंदगी में तर्जुमा हो जाने के बाद
मरीचिकाओं के बाँझपन में
प्रवासी होकर प्रवेश करने के बाद…
माँ भी तेरे लिए
एक‍ गलत रिश्‍ता बनकर रह जाएगी…
गलत मत समझना,
अब यहाँ लाशघरों के सिवा
प्रसवघरों की कोई जरूरत नहीं।

‘प्रेमचंद घर में’ का तेलुगु में अनुवाद

सभी मानवीय सम्‍बन्‍धों में पति-पत्नी का सम्‍बन्‍ध अत्‍यंत घनिष्ट है और अत्यधिक समय तक उनका साथ बना रहता  है। पति की मृत्यु के बाद उनके साथ बिताए जीवन के बारे में ईमानदारी से लिखने का चलन भारतीय साहित्य में कम ही देखने को मिलता है। ‘प्रेमचंद घर में’ में शिवरानी देवी ने यह करके दिखाया।वार्तालाप के माध्यम से अधिक और स्वगत-कथन के रूप में कई जगह उन्होंने जो भी लिखा उन बातों से न केवल प्रेमचंद के महान व्यक्‍ति‍त्‍व का, बल्कि लेखिका की विलक्षण प्रतिभा का भी परिचय मिलता है। कभी-कभी आगे रहकर उन्होंने प्रेमचंद का मार्गदर्शन भी किया था, ऐसे कई उदहारण इस पुस्तक में मिल जाते हैं। शिवरानी देवी की सूझ-बूझ और निडर व्यक्तित्व उभर आता है।

प्रेमचंद से अपरिचित तेलुगु साहित्य प्रेमी विरले ही होंगे। प्रेमचंद घर में पति, पिता के रूप में कैसे थे और शिवरानी देवी और प्रेमचंद का सम्बन्ध कितना विशिष्ट था, यह जानने के लिए सबको यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिये।

मूल पुस्तक में दि‍ये गये प्रोफेसर प्रबोध कुमार (प्रेमचंद के नाती) और स्वयं शिवरानी देवी के कुछ शब्दों को भी अनुवाद में लिया गया है।(शिवरानी देवी का पूरा वक्‍तव्‍य और प्रबोध कुमार के, ‘मेरी नानी अम्मा’ से कुछ अंश)।

प्रेमचंद में कहीं भी पुरुष होने का अहंकार नहीं था। वह पत्नी की बहुत इज्ज़त करते थे। उनकी सलाह बात-बात पर लेते थे। अगर किसी विषय में मतभेद रहा भी तो बड़े प्यार से समझाते थे। पत्नी से उन्हें बेहद प्यार था। शि‍वरानी देवी बहुत स्वाभिमानी थीं और प्रेमचंद को प्राणों से भी अधिक मानती थीं। प्रेमचंद की ज़िंदगी और मौत से जूझने वाले समय का उन्होंने ऐसा जीवंत वर्णन किया है कि  पढ़ने वालों  का कलेजा मुँह को आ जाता है। प्रेमचंद के बारे में, उनकी रचनाओं के बारे में, साहित्यिक व्यक्तित्व के बारे में बहुत कुछ लिखा जा चुका है, पर शिवरानी देवी की किताब में इन सब बातों  के साथ-साथ बहुत ही अन्तरंग बातें, जो केवल एक पत्नी को ही मालूम होती हैं, उनका ज़िक्र भी किया गया है। पति-पत्नी के बीच सम्‍बन्‍ध कितने सुन्दर, गहरे और प्यार से भरे हो सकते हैं, यह जानने के लिये भी यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिए।

इस पुस्‍तक का तेलुगु में अनुवाद शांता सुंदरी ने कि‍या है। इसका शीर्षक तेलुगु में ‘इम्ट्लो प्रेमचंद’ (इम्ट्लो मतलब ‘घर में’) है। पुस्तक के रूप में प्रकाशित होने से पहले यह धारावाहिक के रूप में ‘भूमिका’ नामक मासिक पत्रिका में, जनवरी 2009 से जुलाई 2012 तक प्रकाशित हुई। पहली क़िस्त के बाद ही कइयों ने इसे बहुत पसंद किया। प्रेमचंद की केवल रचनाओं से परिचित पाठकों को उनके व्यक्तित्व के अन्दर झाँककर उन्हें अच्छी तरह समझाने का अवसर मिला। प्रसिद्ध कवि‍ वरवर राव ने अनुवादक शांता सुंदरी को दो-तीन बार फोन करके बताया की कुछ अंशों को पढ़कर उनकी आँखें नाम हो गयीं। तेलुगु के अग्रणी लेखकों ने इसे पुस्तक रूप में देखने की इच्छा ज़ाहिर की और इसे सम्‍भव बनाया ,हैदराबाद बुक ट्रस्ट की गीता रामास्वामी ने।

पुस्‍तक: ‘इम्ट्लो प्रेमचंद’
मूल लेखि‍का : शि‍वरानी देवी
अनुवाद : शांता सुंदरी
कुल पन्ने : 274
मूल्य : 120 रुपये
प्रथम संस्करण : सितम्बर, 2012
प्रकाशक : हैदराबाद बुक ट्रस्ट,
प्लाट नंबर 85, बालाजी नगर,
गुडीमलकापुर, हैदराबाद- 500006

मृत्यु का दृश्य : सलीम

तेलुगु के युवा लेखक सैयद सलीम के पाँच उपन्यास, 140 कहानियां और 100 से अधिक कविताएं प्रकाशित हो चुकी हैं। उनकी रचनाओं का कई भाषाओं में अनुवाद हुआ है। मानवतावादी दृष्टिकोण उनके रचनाकर्म की विशेषता है। उनकी इस कहानी का अनुवाद आर.शांता सुंदरी ने किया है-

इतवार का दिन, दोपहर का समय था। हवा जैसे थम गई थी, जैसे उसे लॉकर में बंद करके किसी ने रख दिया हो! बडी उमस थी।
सायन्ना खाना खा रहा था। उसने अपनी बीवी की ओर देखा और कहा, ‘‘ज़रा पंखा तो चला देना!” बीवी ने कनखियों से उसकी ओर देखकर कहा, “पिछले महीने बिजली का बिल चार सौ का आया था, भूल गए?”
“अरे कोई बात नहीं। बडी़ गर्मी है। खाने का मन नहीं कर रहा है। थोडी़ देर के लिए चला दे।” वह बीवी का स्वभाव जानता था। पैसे का बडा मोह है उसे। एक भी पैसा खर्च नहीं करने देती…जैसॆ अपनी जान निकालकर देना पड़ रहा हो, ऐसे बर्ताव करती है। वह कितना भी हाड़तोड़ मेहनत करे तो भी खुश नहीं होती, ऊपर से कहती है, “बस इसी के लिए दिन-रात खटते रहते हो?”
उसने नाक भौंह सिकोडते हुए पंखा चला दिया। पंखे की हवा आने लगी तो सायन्ना को राहत मिली…जैसे बदन में जान वापस आ गई हो।
“ज़रा सा छाछ तो डाल दे।” उसने बीवी से कहा। पनीली छाछ डाल दी बीवी ने।
“यह क्या? इसमे छाछ तो है ही नहीं.पानी ही पानी है!”
“हां हां ! तेरी कमाई में यह नहीं तो क्या दही और मलाई वाली लस्सी मिलेगी?” बस, सायन्ना चुपचाप खाने लगा। इतने में बाहर से किसी की आवाज़ सुनाई दी। उसनॆ थाली उठाकर रही सही छाछ पी और बाहर भागा। वहां अरुणोदया अपार्टमेंट्स का वाचमैन खडा था। बोला, “बिजली गई है! साब ने तुझे फौरन आने को कहा है।”
सायन्ना के घर के आसपास दो-तीन अपार्टमेंट्स हैं। वह पैसा ज़्यादा नहीं मांगता और काम मन लगाकर करता है, इसलिए बिजली का काम हो तो सायन्ना को ही बुलाते हैं लोग। कमीज़ पहनकर, अपना सामान का थैला लेकर घर से निकल पडा वह।

अरुणोदया अपार्टमेंट्स के सेक्रटरी बहुत बेचैन था। तीन साल पहले उसने वालंटरी रिटाइरमेंट ले लिया था। दोनों बच्चे अमेरिका में सेटल हो गए। उसने सोचा रिटायर होने के बाद मिलने वाले पैसों पर जो ब्याज मिलेगा उससे ज़िंदगी आराम से गुज़र जाएगी, पर सरकार ने बैंक के डिपाजिटों पर ब्याज आधा करके रख दिया तो उसके सारे सपने अधूरे रह गए।
इसीलिए वेलफेयर चुनाव में खडे़ होकर जीत हासिल की और सॆक्रटरी बन गया। हाथ में काम भी है और पैसा भी आता है। कुल साठ फ्लेट हैं। मेंटिनेंस के नाम पर हर फ्लैट से हर महीने पांच सौ रुपये वसूल किए जाते हैं। यानी महीने में तीस हज़ार। झूठे खर्च खाते में लिखना, किए गए खर्च कुछ बढा़कर लिखना, ऐसे काम तो वह खूब जानता है।
एक घंटे पहले ट्रान्सफार्मर में से ज़ोर की आवाज़ हुई और लपटें निकलने लगीं। बिजली गुल हो गई। सॆक्रटरी होने के नाते इसे ठीक कराने की ज़िम्मेदारी उसकी थी… सिरदर्द का काम। पर सचमुच बडी उमस थी। शायद बारिश होनेवाली है। पसीने से बदन तरबतर हो रहा था। वैसे भी कांक्रीट जंगल जैसे बडे-बडे फ्लैट। कहीं पेड-पौधों का नाम ही नहीं…पत्थर और सीमेंट के सिवा हरियाली तो है ही नहीं।
सायन्ना का इंतज़ार करते हुए वह और भी खीजने लगा। उसे देखते ही पूछा, “इतनी देर क्यूं कर दी ?”
“खाना खा रहा था साब!” कहकर एक ही पल में वह फटाफट टान्सफार्मर पर चढ़ गया।
“ज़रा जल्दी कर।” कहकर सॆक्रेटरी अपने फ्लैट मे घुस गया। मन ही मन खुश हो रहा था कि सायन्ना को दो सौ देकर खाते में एक हज़ार लिख दूंगा।

श्रीनिवास को बहुत झुंझुलाहट हो रही थी। वह एक टीवी चैनल में कैमरामैन था। वह एक ऐसा डाक्युमेंटरी बनाना चाहता था जो पुरस्कार प्राप्त करने के स्तर की हो। वह सोच रहा था कि ऐसा कौन-सा विषय होगा जो इस स्तर का होगा।
बाल कर्मचारी, कूडे़ में से कागज़ बीनते गरीब, बचपन में ही वेश्यावृत्ति में लगाई गई अभागिन लड़कियां, अरब शेखों के हाथों बिकनेवाली अमीनाओं की कहानियां…ये सब पहले ही बन चुके थे। नया विषय चुनना होगा। बिलकुल नया और अनोखा हो। नेशनल ज्‍योग्रफी चैनल में हाल ही में उसने एक अद्भुत कार्यक्रम देखा था। एक हिरण को बाघ के मारने का दृश्य। बाघ हिरण का पीछा करता है, हिरण जान बचाने के लिए भागता है। बाघ मारना चाहता है और हिरण बचना चाहता है। अंत में बाघ हिरण को पकड़ ही लेता है। तब कैमरामैन ने उस हिरण की आंखों में मौत के खौफ को बहुत ही स्पष्ट रूप से कैमरे में बांधा था। ऐसा ही कोई विलक्षण चीज बनाना चाहता था श्रीनिवास।
सिगरेट पर सिगरेट फूंकते हुए सोच ही रहा था कि इतने में ज़ोर की अवाज़ आई। चौंककर उसने खिड़की से बाहर झांका। फ्लैट के सामने बने ट्रान्सफार्मर से धुआं निकल रहा था। बिजली भी चली गई थी। गर्मी से राहत पाने के लिए खिड़की के पाट पूरी तरह खोल दिए। अब उमस के कारण घबराहट होने लगी तो ठीक से सोच भी नहीं पा रहा था।
कुछ देर चहलकदमी की, लेटने की कोशिश की, लेटा नहीं गया, पता नहीं यह कब तक  ठीक कराया जायेगा। उसने तीसरी मंज़िल में रहनेवाले सेक्रेटरी को फोन लगाया। उधर से झिड़की सुनाई दी, “यह चौबीसवां फोन है…।”
एक घंटा बीत गया।
उसने खिड़की से बाहार एक बार और नज़र घुमाई। सायन्ना बडी़ फुर्ती से ट्रान्सफार्मर पर चढ़ रहा था। वह समझ नहीं सका कि अगर ट्रान्सफार्मर जल गया तो ऊपर चढ़कर सायन्ना क्या करेगा। छोटा-मोटा रिपेयर तो नहीं कि पैसों के लिए जान जोखिम में डाल दे…जीवन संघर्ष…इस शीर्षक से डाक्युमेंटरी बनाई जा सकती है ! यह बात दिमाग में आते ही उसने हेंडीकैम चला दिया और सायन्ना पर ज़ूम कर दिया।

सायन्ना दसवीं फेल था। फिर उसने बिजली का काम सीख लिया। अब उसे दस साल का तजुर्बा है। वह इलेक्ट्रिकल इंजीनियर तो नहीं है फिर भी फौरन गड़बड़ समझकर पल में उसे ठीक कर देता है। कहां छूने से जान को खतरा है, यह वह अच्छी तरह जानता था।
उसके हाथ चुस्ती से चलने लगे। वह जल्द से जल्द नुक्स को पकड़कर उसे ठीक कर देना चाहता था। किसी दूसरी जगह से भी बुलावा आया था। यह काम खत्‍म करके वहां जाएगा तो पैसे ज़्यादा मिलेंगे, यही सोच रहा था। उस समय अचानक उसे अपनी बीवी याद आ गई। उसकी कैंची जैसी चलती ज़बान, पैसों का मोह, घायल कर देनेवाली बातें,  हज़ार वोल्‍ट के झटके की तरह सताने लगे।
ध्यान बंटने से हाथ फिसल गया, ऐसी जगह पर पडा़ जहां पड़ना नहीं चाहिए था। सायन्ना चीखकर उछल पडा। मानो हाथ को किसी ने धारदार चाकू से ज़ोर से कतर दिया हो, ऐसा दर्द उठा। ट्रान्सफार्मर पर बने जंगले पर धडाम से मुंह के बल गिर गया।
चीख सुनते ही श्रीनिवास सतर्क हो गया। इतना ज़ोर का झटका लगा…अब यह बच नहीं पाएगा। यह सोचकर उसने कैमरा सायन्ना पर ज़ूम किया। वह अभी सांस ले रहा था। मृत्यु वेदना से छटपटा रहा था…मौत के मुंह में जा रहा था। रह-रहकर उसका शरीर झटके खा रहा था। इसका शीर्षक-  ‘मौत का दृश्य’ रखा जा सकता है, यह सोच मन में आते ही वह बडे़ ध्यान से दृश्य का चित्रण करने लग गया।
उस अपार्टमेंट में रहने वाले लोग बाहर आकर सायन्ना को देखते खडे़ रहे। सेक्रेटरी भागता हांफता आ गया। कटी पतंग की तरह ट्रान्‍सफार्मर के जंगले पर निढाल पडे़ सायन्ना को देखकर उसकी बी.पी. बढ़ गया। वह परेशान होने लगा कि पैसा बचाने के चक्कर में यह कैसी झंझट सिर पर ले ली ! उसने गौर से देखा। सायन्ना के शरीर में हरकत बिलकुल नहीं हो रही थी। यह कहीं पुलिस केस न बन जाए, यह सोच मन में आते ही वह सिहर गया। इतने में किसी ने कहा, “बिजली विभाग को फोन लगाइए। वे जबतक पवर सप्लाइ बंद नहीं करेंगे इसे नीचे नहीं उतारा जा सकता। बस सेक्रेटरी फोन करने को दौड़ पडा़।

बिजली के दफ्तर में साम्बमूर्ति अखबार के पन्ने पलटता बैठा था। वह भी नाखुश था। नाम के वास्ते बिजली का दफ्तर है, पर ऊपर पंखा न जाने कितने पुराने युग का है । हवा कम और शोर ज़्यादा देता है। कभी भी टूटकर गिर सकता है, यह डर बना रहता है। बडी़ उमस थी।
और दो घंटों की बात है, फिर ड्यूटी खत्‍म हो जाएगी। मुझे रिलीव करने जो आता है वह बदमाश तो शराबी है। पता नहीं समय पर आएगा या नशे में किसी सड़क किनारे पडा़ होगा। वैसे भी आज खास दिन है। बीवी बच्चों को लेकार गांव गई है। शाम को श्यामला को बुलाया है। वह ताला देखकर कहीं लौट न जाए। उसे चमेली के फूल बहुत पसंद हैं। रास्ते में खरीद लूंगा। साथ में क्वार्टर बोतल व्हिस्की और दो चिकेन बिरियानी के पेकेट भी।
फोन बज उठा। उधर से किसी ने कहा, “ट्रान्सफार्मर पर चढ़कर एक लड़का बिजली का झटका लगने से गिर पडा़।’’
यह सुनते ही साम्बमूर्ति तनकर सीधा बैठ गया। पूछा, “कहां?”
जवाब आया, “वहीं ट्रान्सफार्मर पर ही…।”
“मैं पूछ रहा हूं आप कहां से बोल रहे हैं? हादसा कहां हुआ?”
उधर से पता बताया गया।
तुरंत साम्बमूर्ति को तसल्ली हो गई। “प्राइवेट आदमी को ट्रान्सफार्मर पर नहीं चढा़ना चाहिए, क्या अपको मालूम नहीं?” उसने कहा।
“वह सब बाद में देखेंगे। हमें यह भी मालूम नहीं कि लडका ज़िंदा है या मर गया…उसे नीचे उतारना है। आप फौरन इस एरिया का कनेक्‍शन काट दो!”
“मैंने कम्‍प्‍लेंट लिख ली है। आपका नंबर है- छत्तीस। सब कर्मचारी कम्‍प्‍लेंट ठीक करने बाहर गए हैं, आते ही भेज दूंगा।”
“मैं ट्रान्सफार्मर की मरम्मत की बात नहीं कर रहा हूं। इस लाइन की बिजली काट देंगे तो हम उस लड़के को उतार लेंगे।”
“मैं भी यही कह रहा हूं जनाब ! कम्‍प्‍लेंट लिख ली है। जब भी बन पडे़गा भेज दूंगा।”
“अरे! आप हालत की नज़ाकत को समझो भाई ! यहां आदमी मौत से जूझ रहा है और..।” साम्बमूर्ति ने फोन काट दिया।
‘‘सरकारी नौकर जैसे सबका नौकर हो गया। ऐसे चिल्ला रहा है जैसे मेरा बास है। बुलाते ही दौड़कर जाना होगा?’’ वह झुंझला उठा।

वाचमैन ने खबर दी तो सायन्ना की बीवी रोती-कलपती आ गई। सेक्रेटरी को पहले ही डर था कि कहीं यह पुलिस का केस न बन जाए। अब यह औरत इतना शोर मचा रही थी तो उसका दिल ज़ोरों से धडकने लगा।
रोते-रोते उसने सेक्रेटरी को देखा तो कहने लगी, “आपने बुलाया तो चला आया साब! वह नहीं जानता था कि यह मौत का बुलावा है।”
यह सुनते ही सेक्रेटरी का दिल धक से हो गया। और कुछ देर इसी तरह बोलने दिया तो साफ कहेगी कि तुम्हारी वजह से ही मरा है । उसने मन ही मन हिसाब लगाया। पुलिस केस होगा तो हज़ारों रुपये खर्च करनॆ पडेंगे। इससे अच्छा है कि पैसे का लालच देकर इसका मुंह बंद किया जाए। यह सस्ता सौदा होगा। हर एक घर से पांच सौ मिल जाएं तो भी तीस हज़ार रुपये हो जाएंगे। और थाने के चक्कर काटने से भी बच सकते हैं। पति मर गया…अकेली औरत…बेसहार बेवा…ऐसे कहने पर हर कोई पैसा दे देगा।
ऐसा सोचते ही वह उस औरत के पास गया और तसल्ली देते हुए कहा, “तुम दुखी मत हो। सायन्ना बडा़ अच्छा है। हमारे कांप्लेक्स में हर कोई उसे जानता है और मानता भी है। हम सब मिलकर पच्चीस तीस हज़ार तुम्हें देंगे। उससे कुछ काम धंधा करके गुज़ारा कर लेना।”
यह सुनते ही एक पल के लिए उसकी आंखों में आशा की चमक कौंध गई, पर उसे छुपाते हुए फिर ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी, “हाय मैं क्या करूं…मेरा सुहाग छीन लिया तूने हे भगवान…दया नहीं आयी तुझे…!”

“धत् तेरे की…इस एस.आई. साले को मुफ्त के केस ही मिलते क्या ?” थाने से बाहर आते ही पुलिस सिपाही से यह कहकर दूसरी ओर मुंह करके थूक दिया हेड कांस्‍टेबल ने। सिपाही ने सिर हिलाकर हां में हां मिलाई। हेड ने फिर कहा, “वह कोई गधा ट्रान्सफार्मर पर चढ़कर मरा तो हमारी शामत आ गई। उसे नीचे उतारना, लाश का पंचनामा कराना और उसके परिवारवालों के सुपुर्द करना,  ये सारे काम करने तक हमारी ज़िंदगी कुत्ते की ज़िंदगी ही रहेगी।”
“मैंने तो एस.आई. के घर बरतन भी मांजे, मेडम के लिए सब्ज़ी खरीद लाया…इसके बावजूद वह हमसे खुश क्यों नहीं है, समझ में नहीं आता।”
“अरे, समझाकर! उसकी जात और हमारी जात अलग है। यही असली वजह है। मुझे गुस्सा आ गया ना तो इसपर डी.जी.पी. को लिखूंगा…इसके खिलाफ केस कर दूंगा हां! तब देखना इसे नक्सलाइट एरिया में भेज दिया जाएगा।”
बात करते-करते दोनों अरुणोदया अपार्टमेंट्स पहुंच गए। पहलॆ सोचा था कि यह फायदा का सौदा नहीं था, पर सेक्रेटरी के बर्ताव को और उसके डरे-डरे चेहरे को देखते ही वह समझ गया कि कहां ज़ोर देने से पैसे मिलेंगे। उसने सारा मामला सेक्रेटरी से उगलवाया। केस निपटाने के लिए कितना खर्च होगा यह बता दिया। आधे घंटे तक दाम पर बहस करने के बाद कुछ तय हुआ, तब देखा सायन्ना की ओर, जो चमगादड की तरह लटका था।
“अब पांच बज चुका है। यह तो बहुत देर पहले मरा था न ? अबतक लाश को नीचे क्यों नहीं उतारा ? क्या कर रहे थे आप ?” वह गरजा।
“उसे उतारने के लिए ऊपर चढ़ना था। पावर बंद नहीं किया गया तो कैसे चढते ? आप ही कुछ करो ना ?” गुस्से को पीकर सेक्रेटरी ने कहा।
“मुझे क्या पता? क्या मैं कोई इलेक्ट्रीशियन हूं?  फिर एक बार फोन करो। कहो एस.आई. साहब का हुक्‍म है। नहीं मानता तो ऊपर बैठे अफसर को शिकायत करेंगे। ”
छ्ह बजे जीप में बिजली विभाग से एक ए.ई. और दो कर्मचारी आए। सेक्रेटरी से कुछ देर बात करके इंजीनियर ने ऊपर सायन्ना की ओर देखा और कहा, “इतना बडा़ झटका लगने के बाद बचना मुश्किल है। वह तो मर गया होगा।”
“अरे क्या हम नहीं जानते वह मर गया है ? इसके लिए तेरे सर्टिफिकेट की ज़रूरत है क्या ?” मन ही मन सेक्रेटरी बुदबुदाया और कहा, “आप बिजली बंद करवाओ तो हम लाश को उतारें।”
“नहीं पहले मेरे बास को रिपोर्ट करनी पडॆ़गी।” यह कहकर तीनों वापस जीप में बैठकर चले गए।

श्रीनिवास बहुत खुश था, जैसे कोई बहुत बडा़ काम कर रहा हो। रह-रहकर सायन्ना के शरीर में होनेवाली हरकत देख वह फूला नहीं समा रहा था। मृत्यु के पलों को इस तरह क्लोज़प में बांधना ही एक रिकार्ड है, इस बात से उसका उत्साह और बढ़ने लगा।
वाचमैन की बीवी ऐलम्मा, को यह सब बर्दाश्त नहीं हो रहा था। उसकी उम्र चालीस के करीब होगी। छरहरा बदन पर मेहनत करने की वजह से चुस्त बहुत थी। गांव में बिजली के तारों से उलझने से जलकर मरनेवाले कौवों को उसने एक-दो बार देखा था। सायन्ना को देखकर वे कौवे याद आए तो उसका मन भर आया। उसे उतारने की कोई  कोशिश नहीं कर रहा है, इस बात से वह हैरान थी। उसने तय किया कि अब किसी से  उम्मीद न करके खुद कुछ करना चाहिए। वह जाकर सीढी़ ले आई। उसे ट्रान्सफार्मर से लगाया और साडी को दोनों पैरों के बीच से बांधकर चढ़ने को तैयार हो गई।
“ऎ…क्या करती है?…मरेगी तू…बिजली चालू है।” वाचमैन नीचे से चिल्लाया।
“कुछ नहीं होगा…नहीं मरूंगी मैं…तू चुप रह।”
वह ऊपर चढ़ गई और ट्रान्सफार्मर को छूए बिना खडी़ हो गई। एक हाथ की दूरी पर पडा़ था सायन्ना का शरीर।
“छूना मत… झटका लग जाएगा और तू भी मरेगी।” वाचमैन फिर चिल्लाया।
इस बार उसे भी डर लगा।
नीचे उतर आई और घर से लकडी का लंबा टुकडा ले आई। वह दो फुट लंबा था। उसने उससे सायन्ना के शरीर को धकेलने की कोशिश की। धकॆलना आसान था, पर नीचे गिरने से कहीं सर फट गया तो! नीचे देखते हुए कहा, “एक गद्दी डाल दो नीचे।”
“अरे मरे हुए को चोट का डर क्या? नीचे फेंक दो!” वाचमैन ने कहा।
उधर श्रीनिवास बडी चुस्ती से यह सब रिकार्ड कर रहा था।
सेक्रेटरी ने अपने घर से गद्दी मंगवाई। नीचे चटाई डालकर उसपर गद्दी डाली और पुरानी चादर भी बिछाई।
ऐलम्मा ने पूरा ज़ोर लगाकर सायन्ना को नीचे की ओर धकेला। धम्म से वह गद्दी पर गिर पडा।
सब लोग उसकी ओर भागे। सायन्ना की बीवी फिर रोने लगी।
हेड कांस्‍टेबल ने सायन्ना की नाक के पास उंगली रखकर देखा। कुछ समझ नहीं आया तो छाती पर हाथ रखकर देखा और दो मिनट बाद चिल्लाया, “यह अभी ज़िंदा है! एंबुलैन्स को फोन करो।”
आधे घंटॆ बाद एंबुलैन्स आयी। जब सायन्ना को उसमे चढा़या जा रहा था तो उसमे सांस बाकी थी। अस्पताल पहुंचने से पहले, बीच रास्ते में वह मर गया।

श्रीनिवास ने कैमरा बंद किया और अलमारी में रख दिया।
साम्‍बमूर्ति तीन पेग पीने के बाद श्यामला के साथ बिरियानी चखने में लगा था।
इस अचानक आए खर्च को किस तरह भरा जाए इसी सोच में डूबा था सेक्रेटरी।
क्रिया कर्म के खर्च तो दे दिए, पर वह पच्चीस तीस हज़ार दॆगा या नहीं यही चिंता सायन्ना की बीवी को बेचैन कर रही थी। उस समय साथ कोई भी नहीं था जो गवाही दे सके, यह सोचते ही उसका दिल बैठने लगा।
“मैंने यह काम तीन घंटे पहले किया होता तो वह बच जाता।” ऐलम्मा को यही सोच खाए जा रही थी। वह अपराध बोध से ग्रस्त हो गई।

छह दि‍संबर एक तलाश : वरवर राव

क्रांतिकारी कवि वरावर राव  की  यह कविता तेलुगु दैनिक आम्ध्राज्योती में 6 दिसम्बर को प्रकाशित हुई थी। इसका हिंदी अनुवाद आर. शांता सुंदरी ने कि‍या है-
न्‍यायधीश शर्मा जी मोहि‍त हो गए
उन टूटे-फूटे खंडहरों के वि‍ध्‍वंस में
सनातन की गंध महसूस हुई शायद
लेकि‍न
देर से बड़ी ख्‍वाहि‍शों के बाद जन्‍में उस बच्‍चे को
हद से ज्‍यादा लाड-प्‍यार दि‍या था शायद
कि‍ वह लाडला सयाना हुआ ही नहीं
वोट डालने की उम्र से पहले ही
चाव से मुनि‍यों के बुलाने पर चला गया जंगल
स्‍त्री समझकर भी हि‍चकि‍चाया नहीं मारने को
धनुष तोड़ने से लेकर बाण चलाने तक
न जाने कैसी-कैसी वि‍शि‍ष्‍ट वि‍द्याएं सीख ली उसने
दुश्‍मनों को ही नहीं
माता-पि‍ता को भी दु:ख देकर मारने वाला
संदेह को ही प्‍यार का प्रमाण मानकर
जीवन-साथी को जंगल के हवाले कर देने वाला
दंडकारण्‍य में और श्रीलंका में
उस जमाने में भी
आपरेशन ग्रीनहंट और आइपीकेएफ
चलानेवाला आदर्श नरेश
देश को खडाऊं का पालन और दासता प्रदान करनेवाला
पि‍रामि‍ड या फासि‍ल की तरह
दर्शन या प्रदर्शन के लि‍ए ही तो
नमन कि‍या जा सकता है
या उपेक्षा की जा सकती है
जाषुवा* ने कहा था—
सांपों को दूध पि‍लाकार
पत्‍थर के देवता को नैवेद्य समर्पित करनेवाले देश में
सांपों के दांत नि‍कल आते
देवताओं के हाथों के हथि‍यार जिंदा हो जाते
और
बाबरी, गुजरात, कन्‍दमाल
मृत्‍यु-क्षेत्र बनते जाते
स्‍वार्थ का वि‍कृत तीसरा पैर उग आया
ओर धरती के लि‍ए
महाबलि‍ को वि‍स्‍थापि‍त करनेवाले वामन को
’सेज’ जन्‍मभूमि‍ के वासि‍यों के लि‍ए
हल चलाने वालों को
अपनी जमीन से बेदखल करने वाले वामन के वारि‍सों को छोड़
हमारी पुण्‍यभूमि‍ में
क्‍या बुद्ध की तरह कोई सयाना ईश्‍वर
पैदा नहीं होगा?
* जाषुवा तेलुगु के बहुत बड़े कवि थे। लगभग सौ साल पहले ही उन्होंने दलितों के समर्थन में और उनके प्रति भेदभाव रखने के खिलाफ कविताएँ लिखीं। लेखन काल(1915-1965)। मानवतावादी कवि के रूप में प्रसिद्ध हुए।

मैं और मेरा लेखन : बालशौरि रेड्डी

अपने रचनाकर्म के बारे में बता रहे हिंदी और तेलुगु के बीच सेतु का काम करने वाले वरिष्‍ठ लेखक बालशौरि रेड्डी

मैं अपने गत बीस वर्ष की साहित्यिक सर्जनात्मक प्रक्रिया पर विचार करता हूँ, तो मेरे समक्ष कई मर्मस्पर्शी प्रसंगों का स्मरण ताज़ा हो उठता है। वे स्मरण मुझे पुलकित कर देते हैं।

बीस वर्ष का समय किसी भी लेखक के जीवन में कम महत्व का नहीं होता। यौवन के प्रांगण में पग धरते मैंने कुतूहल, जिज्ञासा और आश्‍चर्यजनक प्रकृति का निरीक्षण किया। प्रकृति के अनुपम सौन्दर्य के अवलोकन से मेरा हृदय संभ्रम एवम् हर्षातिरेक से भर उठा और उस वक्‍त मेरे हृदय में जो स्पन्दनशीलता हुई उसके कारण अनुभूतियाँ बहिर्गत होने को मचल उठीं। फलतः सर्जनात्मक प्रक्रिया साकार हो गई।

मैंने 1948 में लिखना शुरू किया। मेरी पहली रचना हिन्दी में प्रकाशित हुई।

प्रारम्भ में मेरी रुचि निबन्ध लिखने की रही। किसी विषय-विशेष से मैं प्रभावित होता अथवा तत्सम्बन्धी सम्यक्-ज्ञान प्राप्त करता, तभी मैं उस विषय के सम्बन्ध में अपने मन्तव्य व्यक्त करने के लिए लेखनी उठाता।

परिचयात्मक और ज्ञानवर्धक लेख मेरे काफी प्रकाशित हुए। प्रायः उन दिनों में जो भी मेरी रचनाएँ पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं, उनका विषय प्रधानतः सामयिक रहा। यद्यपि सामयिक घटनाओं के परिवेश में मैंने स्थायित्व का स्पर्श करने का अवश्य प्रयत्न किया है, इस कार्य में मुझे कहाँ तक सफलता प्राप्त हुई, कह नहीं सकता, परन्तु इससे मुझे आत्म-सन्तोष अवश्य प्राप्त हुआ है। यही मेरे लिए उस समय सबसे बड़ी उपलब्धि थी।

आत्म-प्रकाशन की जो मूल-प्रवृत्ति या सहज-वृत्ति स्वभावगत होती है उसी से मुझे लिखने की प्रेरणा मिली।

वैसे मेरी प्रेरणा के अनेक स्रोत हैं। मैं कह नहीं सकता, अभिव्यक्‍त‍ि की राह में किस स्रोत का प्राधान्य रहा, किन्तु इतना सत्य है कि विन्ध्याचल समीपवर्तिनी प्रकृति ने मेरे हृदय को आवश्यकता से अधिक अभिभूत किया, परिणामस्वरूप निसर्ग की उस अपूर्व सुषमा की अर्चना करते मेरी अनुभूतियाँ अभिव्यक्‍त होने को तड़प उठीं।

प्रकृति और हृदय के बीच में जो सौन्दर्य का सेतु बन गया, वह आदान-प्रदान का, आराधन-अर्चन का मार्ग प्रशस्त कर गया। हृदय का सुमन खिल उठा, अनुभूति रूपी भ्रमर गुंजार करने लगे। इस प्रकार नीरवता में निसर्ग संगीत की लहरी शून्य को ध्वनि प्रकम्पित करने लगी।

हृदयस्थ बालकवि गुनगुना उठा। तुकबन्दी हुई। उस कविता पर उछल पड़ा, उसे बार-बार पढ़ा, गुनगुनाया, उसे हृदय से लगाया।

मुझे लगा-आज नहीं तो कल, सफलता का द्वार अपने आप खुल जाएगा। गतिशील हूँ, लक्ष्य दूर नहीं है, किन्तु जब मैं मूर्धन्य कलाकारों की कृतियों का अध्ययन करता और अपनी अनुभूतियों के साथ मिलान करके देखता तो मुझे प्रतीत होता कि मेरी भावात्मक पूँजी अत्यल्प है और मैं उन महाकवियों के समक्ष निर्धन हूँ।

क्रमशः मुझे विदित हुआ कि मैं जिस रूप में अपने को अभिव्यक्‍त करना चाहता हूँ, कर नहीं पाता हूँ। यद्यपि दो-तीन मित्रों ने जो साहित्यिक हैं, मेरी कविता की प्रशंसा की, उत्साहवर्द्धक वचन कहे, लेकिन मुझे सन्तोष नहीं हुआ। मेरे मन के भीतर-ही-भीतर असन्तोष की आग सुलग रही थी। मैंने सोचा, यदि मैं इस असन्तोष को इसी प्रकार पालता रहूँ, तो एक दिन अवश्य पागल हो जाऊँगा। इसी संशयात्मा को लेकर मैं अपने आचार्य पण्डित गंगाधर जी मिश्र की सेवा में पहुँचा और उनसे अपनी आत्मग्लानि की बात बतायी। पण्डित जी ने बड़ी सहानुभूति, सहृदयता और वात्सल्य-भाव से मुझे समझाया-‘रेड्डी जी, मैं सच्ची बात कहूँगा, तुम निराश न होना। क्योंकि मैं तुम्हारा हित चाहता हूँ और तुम्हारी प्रतिभा से भी परिचित हूँ, इसीलिए मैं तुमको ग़लत राह पर छोड़ना नहीं चाहता। सत्य तो यह है कि जितना अच्छा गद्य लिख सकते हो, उतनी अच्छी कविता नहीं। मेरा अनुभव यह बताता है कि गद्य के प्रति तुम्हारी स्वाभाविक जो अभिरुचि है, जो झुकाव है, जो लगन है, वह कविता के प्रति चाहते हुए भी नहीं हो सकती। तुम जो अभिरुचि दिखाते हो या दिखाने की चेष्टा करते हो अथवा दिखाना चाहते हो वह कृत्रिम है। अतः तुम्हारे हितैषी के नाते मेरी यह सलाह है, तुम समय और सन्दर्भ के अनुरूप गद्य की विभिन्न विधाओं पर कलम चलाओ, अवश्य तुम्हें सफलता मिलेगी।’

पण्डित जी का यह सुझाव मेरी भावी साहित्यिक सर्जनात्मक यात्रा का पाथेय बना और सम्बल बना।

मैंने निबन्ध लिखना शुरू किया- उत्साह और अहम् के प्रकटीकरण के हेतु। मेरे उत्साह को उत्साहित किया श्री काशीनाथ उपाध्याय ‘भ्रमर’ तथा श्री कमलापति त्रिपाठी ने।

मेरी पहली रचना ‘ग्राम संसार’ में छपी। जिस दिन रचना छपी उस दिन मेरे अन्तर में ऐसा ज्वार उठा जिसने मुझे इतना प्रभावित किया कि मेरी रचना का कार्य निरन्तर गतिमान रहा। मैंने अपनी रचना को चार-पाँच बार पढ़ा, जो कोई सामने आया उस को दिखाया, सलाह एवं सुझाव माँगा।

युगाराध्य सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ ने मुझे अच्छे सुझाव दिये। मैं वाराणसी में गाय घट पर जहाँ रहता था, निराला जी भी आचार्य गंगाधर मिश्र जी के साथ वहीं रहते थे। निराला जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व का भी मुझ पर ऐसा प्रभाव पड़ा कि मैं उनसे प्रेरणा ग्रहण कर लिखता गया।

वाराणसी में रहते मैंने लिखा अत्यल्प, परन्तु अध्ययन अधिक किया। विभिन्न प्रकार की शैलियों से परिचित होता गया और अपनी प्रिय विधाओं के सूक्ष्म निरीक्षण में प्रवृत होता गया। उस प्रकार परोक्ष रूप में मेरे भीतर का लेखक बन रहा था।

कोई भी व्यक्‍त‍ि एकाध दिन में लेखक नहीं बन बैठता। यद्यपि सृजानात्मक प्रवृत्ति अभिव्यक्ति की राह ढूंढ़ती रहती है, तथापि अनुभूतियों के परिपक्व होने पर ही वे स्पष्ट रूप से बहिर्गत होती हैं। अध्ययन, सामाजिक अनुभव, चिन्तन-मनन, पर्यटन इत्यादि विचारों में गहनता, व्यापकता और सम्पन्नता लाते हैं।

मद्रास में साहित्य विभाग में कार्य करते विभिन्न विषयों के संकलन तैयार करने, लेख लिखने, भूमिका तथा टिप्पणियाँ लिखने में अच्छा अनुभव प्राप्त हुआ।

प्रारम्भ में कतिपय प्रमुख पत्रों में मैंने अपनी इच्छा से रचनाएँ भेजीं और वे प्रकाशित भी हुईं। तत्पश्‍चात् विविध पत्र-पत्रिकाओं के सम्पादकों ने रचनाएँ माँगते मेरा आह्वान किया, यथायोग्य पारिश्रमिक भी दिया। यहाँ से मेरा लेखन-व्यवसाय कुछ योजनाबद्ध हो गया। प्रतिदिन नियमित रूप से कुछ न कुछ लिखता गया, साथ ही साथ अध्ययन भी चालू रहा।

मैंने विभिन्न विषयों पर समीक्षात्मक लेख लिखे। उनका हिन्दी-जगत में अच्छा स्वागत भी हुआ। सम्पादक और पाठकों ने भी प्रशस्ति के पत्र भेजे। मैं कुछ और सँभल कर लिखने लगा।

रचना की मेरी दूसरी प्रक्रिया अनुवाद की रही है। मैंने कभी अपनी इच्छा से कोई अनुवाद नहीं किया। प्रायः मेरे सभी अनुवाद सम्पादकों की माँग पर ही किये गए हैं।

मेरे लेखन कार्य में अनुवाद की भी अच्छी परम्परा रही है और आज तक मैंने तेलुगु से हिन्दी में ढाई हजार पृष्ठों से अधिक अनुवाद किया है।

मेरी सर्जनात्मक रचनाएँ विविध रूपों में आई हैं। उनमें निबन्ध, उपन्यास, एकांकी, कहानी, जीवनियाँ, साहित्य, इतिहास, रेडिया-वार्ता, भाषण और अनुवाद मुख्य हैं।

पुस्तक रूप में प्रकाशित मेरी पहली कृति ‘पंचामृत’ है। इसके लेखन की प्रेरणा और योजना के सूत्रधार पण्डित श्रीराम शर्मा है। मुझसे सर्वथा अपरिचित होते हुए भी उपर्युक्‍त पुस्तक के लेखन का कार्य मुझे सौंपा और मैंने बड़ी ही निष्ठा और ईमानदारी से यह कार्य तीन महीने के अन्दर पूरा किया।

‘पंचामृत’ में तेलुगु के पाँच युग-प्रवर्तक कवियों के कृतित्व एवम् व्यक्तित्व पर विश्‍लेषणात्मक समीक्षा के साथ उनकी कृतियों के प्रमुख अंशों का हिन्दी रूपान्तर भी प्रस्तुत हुआ है। प्रारम्भ में तेलुगु साहित्य की धारा का संक्षिप्त परिचय तथा छन्द, अलंकार आदि का विवेचन भी हुआ है। अन्त में शब्दार्थ भी परिशिष्ट के रूप में जोड़ दिये गए हैं।

हिन्दी की प्रमुख पत्रिकाओं में इसकी अच्छी समीक्षा हुई। उद्भट विद्वानों की प्रशंसा प्राप्त हुई। यह कृति सन् 1954 में प्रकाशित हुई और 1956 में भारत सरकार के शिक्षा-मंत्रालय ने दो हजार रुपयों का पुरस्कार देकर इसे सम्मानित किया और उसी वर्ष उत्तर प्रदेश सरकार ने भी तीन सौ रुपये का पुरस्कार इसी ग्रन्थ के लिए प्रदान किया।

शासन द्वारा सम्मानित होने पर लेखक का दायित्व बढ़ गया। बड़ी जिम्मेदारी के साथ लिखने की आवश्यकता हुई।

पहली कृति के द्वारा मौलिक लेखन और अनुवाद-दोनों प्रक्रियाओं का सूत्रपात हुआ। ये दो धाराएँ समानान्तर होकर अबाध-गति से प्रवाहित होने लगीं।

उन धाराओं की पुष्टि ‘आन्ध्रभारती’ और ‘अटके आँसू’ कृतियों द्वारा हुई।

‘आन्ध्रभारती’ मेरे द्वारा समय-समय पर हिन्दी के विभिन्न पत्रों में प्रकाशित तेलुगु साहित्य सम्बन्धी विविध विधाओं पर प्रणीत गवेषणात्मक निबन्धों का संग्रह है। इसमें कुल बीस निबन्ध हैं। दो-चार तुलनात्मक भी हैं। यह ग्रन्थ सन् 1959 में कला निकेतन, पटना द्वारा प्रकाशित हुआ और 1960 में उ.प्र. शासन द्वारा पुरस्कृत हुआ। इसकी भूमिका हिन्दी के यशस्वी विद्वान् डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी तथा स्व. डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल ने लिखी। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने उस पर अच्छी सम्मति भेजकर लेखक को प्रोत्साहित किया था।

‘अटके आँसू’ तेलुगु की बारह उत्तम कहानियों का संग्रह है। विभिन्न लेखकों की ये कहानियाँ तेलुगु कहानी की प्रवृत्तियों और शैलियों का परिचय कराती हैं। इसकी भूमिका स्व. आचार्य शिवपूजन सहाय ने लिखी। उन्होंने मेरी पहली कृति ‘पंचामृत’ की समीक्षार्थ आई हुई देख, उसका बड़े प्रेम से अध्ययन ही नहीं किया अपितु उस पर ‘साहित्य’ में (अक्टूबर सन् 1955 के अंक में) सम्पादकीय भी लिखा था।

इन कृतियों के प्रकाशन के बाद लेखक को हिन्दी जगत से पर्याप्त प्रोत्साहन प्राप्त हुआ और साथ ही विभिन्न प्रकाशकों से पुस्तकों की माँग करते हुए कई पत्र भी मिले। उस समय से लेकर आज तक मेरी विविध विषयों पर अठारह पुस्तकें हिन्दी में प्रकाशित हुई हैं।

उनमें मौलिक और अनुवाद की संख्या समान कही जा सकती है।

अनुवादों में कहानी-संग्रहों की संख्या अधिक है। राष्ट्रभाषा-प्रचार समिति, वर्धा ने मेरी सोलह अनूदित कहानियों को ‘तेलुगु की उत्कृष्ट कहानियाँ’ नाम से प्रकाशित किया। ‘हिन्द पॉकेट बुक्स प्राइवेट लिमिटेड’, दिल्ली ने ‘तेलुगु की श्रेष्ठ कहानियाँ’ नाम से बारह कहानियाँ और आन्ध्र प्रदेश साहित्य अकादमी, हैदराबाद ने ‘तेलुगु की बीस कहानियाँ’ प्रकाशित कीं।

भारतीय ज्ञानपीठ, काशी से राष्ट्र-भारती ग्रन्थमाला के अन्तर्गत मेरे द्वारा अनूदित एकांकी संग्रह ‘नयी धरती’, ‘तेलुगु की प्रतिनिधि रचनाएँ’ नाम से प्रथम-पुष्प के रूप में प्रकाशित हैं। वह तेलुगु के विख्यात नाटककार, कवि एवम् निबन्ध लेखक श्री नाल वेंकटेश्‍वर राव, एम.पी. सम्पादक ‘दैनिक आन्ध्रज्योति’ के एकांकियों का अनुवाद ही है।

मद्रास उच्च न्यायालय के भूतपूर्व प्रधान न्यायाधीश श्री पी.वी. राजमन्नार के सुप्रसिद्ध सामाजिक नाटक ‘मनोरमा’ का हिन्दी रूपान्तरण किया जो ‘नेशनल पब्लिशिंग हाउस’ दिल्ली से प्रकाशित है।

तेलुगु के सुप्रसिद्ध कवि व लेखक श्री तोरि नरसिंह शास्त्री के ऐतिहासिक उपन्यास ‘रुद्रमा देवी’ का हिन्दी रूपान्तरण साहित्य अकादमी दिल्ली के लिए किया। अन्य मौलिक रचनाओं में ‘तेलुगु-साहित्य का इतिहास’ अपनी अलग विशिष्टता रखता है। मैंने गत दस-बारह वर्षों में तेलुगु साहित्य का जो अध्ययन एवम् अनुशीलन किया उसका सुन्दर फल यह ग्रन्थ है। साढ़े तीन सौ पृष्ठों में प्रकाशित यह ग्रन्थ हिन्द समिति, सूचना विभाग, उ.प्र. सरकार, लखनऊ द्वारा प्रकाशित है। इस ग्रन्थ के प्रणयन में मैंने जितना श्रम किया उतना शायद अन्य किसी ग्रन्थ के लिए नहीं किया।

ग्रन्थ के प्रारम्भ में मैंने तेलुगु प्रदेश का भौगोलिक स्वरूप प्रस्तुत किया है। तदुपरान्त आन्ध्र का वैदिककाल से लेकर भाषावार-प्रान्त रचना तक व इतिहास संक्षेप में दिया है। इसके बाद क्रमशः तेलुगु भाषा की प्रशस्ति, विकास का परिचय कराया है। इसके अनन्तर तेलुगु के समस्त साहित्य को छः युगों में विभाजित कर प्रत्येक युग की पृष्ठभूमि के साथ उस युगीन परिस्थितियों, कवियों तथा उनकी कृतियों का भी सम्यक् विवेचन किया है।

हिन्दी से भिन्न प्रवृत्तियों पर भी प्रकाश डालते हुए उन परम्पराओं का भी विश्‍लेषण कर गद्य और पद्य की विविध धाराओं का समग्र विकास संक्षिप्त में प्रस्तुत किया। यह ग्रन्थ तेलुगु और हिन्दी विद्वानों के द्वारा भी प्रशंसित है। इसकी भूमिका हिन्दी समिति के तत्कालीन सचिव श्री ठाकुर प्रसाद सिंह ने लिखी है। हिन्दी के महाकवि डॉ. रामधारी सिंह दिनकर ने आमुख लिखा है।

‘सत्य की खोज’ मेरे मौलिक बालकोपयोगी एकांकियों का संग्रह है। ‘आन्ध्र के महापुरुष’ और ‘तेलुगु की लोक-कथाएँ’ भी पर्याप्त लोकप्रिय हुई हैं।

इस समय मेरे लेखन की दिशा कथा-साहित्य की है।

उपन्यास लिखने की न मैंने कभी कल्पना की थी और न योजना ही बनायी थी। मैं इसे संयोग की ही संज्ञा दूँगा कि अचानक एक दिन राजपाल एण्ड सन्स, दिल्ली के अधिपति श्री विश्‍वनाथ मल्होत्रा जी से पत्र मिला कि मैं उन्हें एक उपन्यास लिख कर दूँ। पत्र पाते ही मैं चौकन्ना हो गया। सोचा कि लिख दूँ कि उपन्यास लिखना नहीं जानता हूँ। फिर मन में आया कि जब प्रकाशक यह विश्‍वास करते हैं कि मैं उपन्यास लिख सकता हूँ तो मुझे यह कहने का कोई अधिकार नहीं कि मैं नहीं लिख सकता।

वैसे मैंने हिन्दी के प्रायः सभी प्रमुख उपन्यासों का अध्ययन किया था, उनपर आलोचना पढ़ी थी, उपन्यास की कला की बारीकियों का सैद्धान्तिक ज्ञान भी रखता था। उपन्यास लिखने की रीति-नीतियों से परिचित था। फिर क्या था, मैं कथावस्तु का अन्वेषण करने लगा।

विचार करते-करते मेरे मस्तिष्क में यह बात आई कि शबरी का चरित्र जो रामायण में चित्रित है, उसकी पृष्ठभूमि तथा उस युगीन स्थितियों का उसमें वर्णन नहीं हुआ है। मुझे उन दिनों में तेलुगु के अनेक रामचरित सम्बन्धी काव्य ग्रन्थों का अनुशीलन करना पड़ा था। डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल ने राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त के अभिनन्दन ग्रन्थ के लिए ‘तेलुगु साहित्य में रामचरित’ शीर्षक पर एक निबन्ध लिख भेजने का आदेश दिया था। उस सन्दर्भ में शबरी के चरित्र से बहुत प्रभावित हुआ।

परिणामस्वरूप अध्यात्म रामायण तथा रामायण सम्बन्धी अनेक आलोचनाएँ और रामायणकालीन सांस्कृतिक एवं सामाजिक दशा का भी अध्ययन किया। शबर जाति से सम्बन्धित तेलुगु साहित्य में उपलब्ध ग्रन्थों के अवलोकन से मुझे विदित हुआ कि शबरी के जीवन के पूर्वी तथा परवर्ती सामाजिक परिवेश में एक कल्पनात्मक सुन्दर औपन्यासिक कृति प्रस्तुत की जा सकती है।

मैंने स्थानीय कॉलेज के एक प्राध्यापक को बुलाया। उन्होंने मुझे यह आश्‍वासन दिया कि आप बोलते जाइये, मैं लिखता जाऊँगा। मैंने उपन्यास की परिकल्पना कथावस्तु की रूपरेखा दस पृष्ठों में तैयार की। सुबह और शाम बोलता गया। तेईस दिनों में उपन्यास तैयार हुआ। मैंने पाण्डुलिपि को आद्यन्त एक बार पढ़ा। आवश्यक सुधार, काट-छांट करके टाइप के लिए दिया। टाइप की हुई एक प्रति प्रकाशनार्थ भेज दी।

‘शबरी’ पाठकों के हाथों में पहुँची। हिन्दी जगत् ने अच्छा स्वागत किया। देखते-देखते दो संस्करण निकल गए।

सुप्रसिद्ध कथाकार श्री आरिगपूड़ि ने ‘दक्षिण भारत’ (जनवरी 1960) में ‘शबरी’ की समीक्षा करते लिखा-‘शबरी’-जैसा कि नाम सूचित करता है, रामायण की पृष्ठभूमि में लिखा गया है, पर यह रामायण की एक भिन्न शैली व माध्यम में पुनरावृत्ति नहीं है। यह मौलिक है- कथावस्तु में और कथाशैली में भी। उपन्यासकार ने कल्पना की लम्बी और ऊँची उड़ान ली है, पर यथार्थता का साथ नहीं छोड़ा। शैली विषयोचित हैं। इसमें गम्भीरता है, गति है।

यह श्री रेड्डी का उपन्यास-क्षेत्र में प्रथम प्रयास है, पर इसमें प्रथम प्रयास की कदाचित् कोई त्रुटियाँ हों। विचारों की गम्भीरता है ही, अभिव्यक्ति की कला में भी वे सिद्धहस्त हैं।’

यह उपन्यास इस समय हिन्दी प्रचार सभा, मद्रास की विशारद परीक्षा की पाठ्य पुस्तक है।

राजपाल एण्ड सन्स ने मुझसे एक और उपन्यास माँगा। इस बार मैंने ‘जिन्दगी की राह’ लिखा। इस उपन्यास के कारण ही मुझे विशेष ख्याति मिली। भारत सरकार के शिक्षा-मन्त्रालय ने 1966 में पन्द्रह सौ रुपये का पुरस्कार देकर मेरा उत्साहवर्धन किया। इसके भी तीन-चार संस्करण निकल गए। और इस समय श्री वेंकटेश्‍वर विश्‍वविद्यालय, तिरुपति में बी.ए. की पाठ्य-पुस्तक के रूप में नियत है।

मेरा तीसरा मौलिक उपन्यास-‘यह बस्ती-ये लोग’ है, जो एस. चाँद एण्ड कं., दिल्ली द्वारा प्रकाशित है। यह भी सामाजिक उपन्यास है। नगरीय सभ्यता पर व्यंग्यात्मक चित्रण उपन्यास में हुआ है।

चौथा मौलिक उपन्यास-‘भग्न सीमाएँ’ है जो राजकमल प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित है। इस उपन्यास का भी हिन्दी पाठकों ने बड़ा अच्छा स्वागत किया। इसके दो संस्करण निकल गए हैं और इस वक़्त आन्ध्र विश्‍वविद्यालय, वालटेर में पी.यू.सी. में नियत है।

पाँचवाँ उपन्यास-‘बैरिस्टर’ है जो राजपाल एण्ड सन्स द्वारा इस मास में प्रकाशित होनेवाला है, छप कर तैयार है।

छठा मौलिक उपन्यास-‘एक स्वप्न: एक सत्य’ है। मेरे विचार में यह उपन्यास अपने ढंग का है। इसमें मैंने कुछ नवीनता दर्शाने का अवश्य प्रयास किया है। इस उपन्यास में सहायक पात्रों की संख्या कुछ अधिक है। प्रधान पात्रों के सम्पर्क में आने वाले कतिपय आंगिक पात्र सदा साथ नहीं चलते, अपितु घटना-चक्र के अनुरूप उभरते और लुप्त भी होते जाते हैं।

इस उपन्यास की अधिकांश घटनाएँ यथार्थ होते हुए भी काल्पनिक हैं और काल्पनिक होते हुए भी यथार्थ हैं। कल्पना और यथार्थ की क्रीड़ास्थली यह उपन्यास है। इस उपन्यास में स्वप्न आदर्श है और सत्य यथार्थ है। जीवन में द्वन्द्वात्मक अनुभूतियाँ स्वप्न और सत्य का उद्घाटन करती जाती हैं और उसे सहजता प्रदान करती हैं।

मैं इसे अपना सौभाग्य ही समझूंगा कि मुझे हिन्दी के अच्छे प्रकाशक मिले हैं। मेरी आदत रचना लिखकर रखने की कभी नहीं रही है। जब कभी कोई प्रकाशक रचना माँगता है, तभी मैं लिखकर देता हूँ। किन्तु मैं अब अनुभव करने लगा हूँ कि अवकाश के क्षणों में कुछ-न-कुछ लिखकर रखूँ ताकि उसका उपयोग अनुकूल वातावरण के मिलते ही कर सकूँ।

वैसे इस वक्‍त मेरी प्रवृत्ति उपन्यास लिखने की ओर अधिक है। इन दिनों में मुझे लिखने की प्रेरणा बहुधा समाज से ही प्राप्त होती है। नित्यप्रति होनेवाली घटनाओं, समाचार-पत्रों, कार्टूनों, मित्रों तथा परिचित व्‍यक्तियों की आप-बीती घटनाओं, यदा-कदा चित्रों से भी मुझे प्रेरणा मिलती है। ग्रन्थ तथा पत्रिकाओं के पठन के समय उनसे सम्बन्धित समानान्तर भावनाएँ जो कि मेरे अनुभव में सुनने तथा देखने में आई होती हैं, मेरी संवेदनशीलता द्वारा पुष्ट होकर अभिव्यक्‍त होने को मचलती हैं।

प्राकृतिक दृश्य, मूक-प्राणी, सिनेमा आदि भी मेरी प्रेरणा के स्रोत हैं। जब कभी विभिन्न व्यक्तियों के मुखमण्डलों का सूक्ष्म निरीक्षण करता हूँ तब उन पर प्रकट होने वाले भावों को पढ़ने का प्रयास करता हूँ और उनके अन्तःकरण में प्रविष्ट हो जाता हूँ, तब मेरे मस्तिष्क और हृदय में जो मन्थन होता है तथा उसके कारण मेरे मानस पर जो स्थाई प्रभाव पड़ता है, उससे प्रेरित होकर तटस्थ-बुद्धि से विचार करता हूँ और अपनी अनुभूतियों को परिष्कृत कर लेता हूँ।

मैं जब कभी कुछ लिखता हूँ, अथवा लिखाता हूँ, उस समय मैं इस बात का अवश्य ध्यान रखता हूँ कि मैं जिस भाव का चित्रण करूँ, वह केवल एक हृदय का न हो, असंख्य हृदयों का उसमें प्रतिबिम्ब हो। वह स्वाभाविक हो तथा पाठकों के हृदयों को उद्वेलित कर सके।

मैं अपनी रचनाओं के लिए अधिकांश घटनाओं का चयन अपने अनुभव, अध्ययन, यात्रा, चिन्तन-मनन द्वारा करता हूँ, तार्किक-बुद्धि से उन पर विचार करता हूँ। इस प्रकार श्रवण, दृश्य, मनन व अध्ययन के पश्‍चात कल्पना का सहारा पाकर मेरी अनुभूतियाँ कथा का रूप धारण करती हैं।

मैं अपने अध्ययन-कक्ष में लिखने या लिखाने बैठता हूँ तो बच्चों के कोलाहल, रेडियो की ध्वनि से भी मैं विचलित नहीं होता हूँ।

मेरे लिखने व लिखाने का समय प्रातःकाल साढ़े सात बजे से दस बजे तक, रात को छह से दस बजे तक। विशेष स्थिति में ही रात में बड़ी देर तक जाग कर लेखन-कार्य करता हूँ।

मैं समय पर भोजन व निद्रा के पालन का अधिक ध्यान रखता हूँ। यदि लिखने की रुचि नहीं रही तो कभी-कभी दो-तीन महीनों में केवल अध्ययन, यात्रा इत्यादि में ही समय बिता देता हूँ। कोई रचना शुरू करता हूँ तो उसके पूरा होने तक मैं कभी विराम नहीं लेता।

लिखने या बोलने के पूर्व मैं योजना-सूत्र बना लेता हूँ। संक्षेप में, लेखन के समय मेरा ध्यान इस दिशा में अवश्य रहता है कि उपन्यास का कलेवर इतने पृष्ठों से ज्यादा न हो। अनावश्यक कलेवर न बढ़े। संक्षेप में सारी बातें आ जाएँ। यही कारण है कि मैंने अपने प्रारम्भिक पाँच उपन्यास दो सौ पृष्ठों के लिखे हैं। छठा उपन्यास पाँच सौ पृष्ठों का योजनाबद्ध होकर ही बन सका है।

मेरी धारणा है एक लेखक के लिए साहित्यिक ज्ञान ही पर्याप्त नहीं है, अपितु जीवन से सम्बन्धित सभी क्षेत्रों एवं विषयों का प्राथमिक ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक है।

अनुवाद के सम्बन्ध मे मेरी मान्यता है कि अनुवाद में मूल-भावों के सौन्दर्य की रक्षा हो तथा अनूदित भाषा की प्रकृति का प्रतिबिम्ब हो।

प्रत्येक भाषा में उस प्रदेश की सांस्कृतिक, सामाजिक तथा जीवन शैली का दृष्टिकोण निहित रहता है। यदि अनुवाद करते समय उसका सजीव चित्रण नहीं होता तो दूसरी भाषा में उसका विकृत अथवा कृत्रिम स्वरूप ही उपस्थित नहीं होता, अपितु मूल लेखक के प्रति अन्याय भी होगा।

अनुवाद की शैली में गति हो। पढ़ते समय पाठक को यह प्रतीत न हो कि यह अनुवाद है। यदि अनुवाद में मूल तादात्म्य न हो तो वह उत्तम अनुवाद नहीं कहलाएगा। अनुवाद में शब्दों की ध्वनि तथा ध्यानिगर्भित विचारों को उसी रूप में उतारना आवश्यक है।

(अपने-अपने बालशौरि रेड्डी से साभार)