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प्रख्यात अम्बेडकरवादी आलोचक तेज सिंह को श्रद्धांजलि

नई दिल्ली : हिंदी के प्रख्यात आलोचक और अंबेडकरवादी साहित्य के मूर्धन्य प्रवक्ता तथा ‘अपेक्षा’ त्रैमासिक पत्रिका के संपादक तेज सिंह का 15 जुलाई 2014 को शाम लगभग 3 बजे हृदय गति रुक जाने के कारण नि‍धन हो गया। तेज सिंह का जन्म दिल्ली के घोंडली में 13 जुलाई 1946 में हुआ था। उन्होने हिन्दी साहित्य को अपनी तमाम आलोचनात्मक कृतियों से समृद्ध किया। उनकी कृतियों में नागार्जुन का कथा-साहित्य (1993,  आलोचना),  राष्ट्रीय आन्दोलन और हिन्दी उपन्यास (2000,  आलोचना),  आज का दलित साहित्य (2000,  आलोचना),  उत्तरशती की हिन्दी कहानी (2006, आलोचना), दलित समाज और संस्कृति (2007), अम्बेडकरवादी साहित्य का समाजशास्त्र(2009, आलोचना), अम्बेडकरवादी साहित्य की अवधारणा (2010,  आलोचना),  अम्बेडकरवादी साहित्य ही क्यों? (2011), डॉ. अम्बेडकर और धम्म-दीक्षा (2011), अम्बेडकरवाद और मार्क्सवाद का द्वंद्वात्मक सम्बन्ध (2011),  प्रतिरोध की बहुजन संस्कृति(2011),  अम्बेडकरवादी विचारधारा : इतिहास और दर्शन (2012) आदि ने अस्मिता विमर्श के पृथकतावादी और शुद्धतावादी भावधारा के विपरीत दलित आंदोलन को एक नया और गतिमान वैज्ञानिक आवेग दिया। कृतियों के शीर्षक ही अपने आप में इस बात की ताईद करते हैं कि उनकी गति समाजशास्त्रीय आलोचना के साथ-साथ साहित्य के विचारधारात्मक और दार्शनिक पक्ष तक अपना विस्तार पाती थी। उन्होंने आज का समय (2002, दलित कवियों की कविताओं का संकलन),  उग्र की ज़ब्तशुदा कहानियाँ (2004), सबद बिबेकी कबीर (2004), अम्बेडकरवादी विचारधारा और समाज (2009),  प्रेमचंद की रंगभूमि : एक विवाद- एक संवाद (2008),  अम्बेडकरवादी कहानी:रचना और सृष्टि (2009), अम्बेडकरवादी स्त्री चिंतन (2010) आदि पुस्तकों का संपादन भी किया। वे दलित लेखक संघ के अध्यक्ष भी रहे।

हिंदी के दलित विमर्श मे चली तमाम बहसों मे सीधे शामिल होकर और उनको गति देकर उन्होंने समाज को एक प्रगतिशील मानवीय दिशा मे सोचने को प्रेरित किया। अस्मितावाद के खतरों को भाँपते हुए ही दलित साहित्य को उन्होंने अंबेडकरवादी साहित्य के बतौर प्रस्तावित किया था। तेज सिंह ऐसे लेखक थे, जिनका संघर्ष भारतीय समाज के तथाकथित उच्च जातियों मे व्याप्त ब्राह्मणवाद से तो था ही, साथ ही दलित जातियों में भी व्याप्त ब्राह्मणवादी विचारों और लैंगिक भेदभाव के खिलाफ भी वे लगातार संघर्ष कर रहे थे। उन्होंने कथा आलोचना को अंबेडकरवादी दृष्टि से समृद्ध कर अपना महत्वपूर्ण योगदान किया।

समाज में व्याप्त जातिवाद, सामंतवाद, ब्राह्मणवाद और लैंगिक पूर्वाग्रह के खिलाफ संघर्ष का हमारा संकल्प ही हमारे प्रिय आलोचक के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि हो सकती है। तेज सिंह को जन संस्कृति मंच की ओर से हार्दिक श्रद्धांजलि।

(जसम की ओर से रामनरेश राम द्वारा जारी)  

दलित साहित्य विमर्श नहीं, चेतना का साहित्य : तेज सिंह

गोरखपुर : प्रसि‍द्ध आलोचक रामविलास शर्मा की स्मृति में हिन्‍दी आलोचना को  केन्द्रित  कर गोरखपुर में  7 और  8 अप्रैल, 2012 को  आयोजित कार्यक्रम में जातीय भाषा, दलित,  स्त्री  एवं छंद  मुक्त कविता  के  मुद्दों  पर  विमर्श  हुआ। इसमें डा. तेज सिंह  एवं  बजरंग बिहारी तिवारी  (दिल्ली), शम्भू  गुप्त ( वर्धा ), नचिकेता (पटना), अमरनाथ ( कोलकाता ), प्रभा दीक्षित( कानपुर ), मूलचंद  सोनकर  (वाराणसी )  अतिथि  वक्ता  थे। दलित  साहित्य  को  लेकर  सहानुभूति  और  समानुभूति  का  मुद्दा उठा । एक विचार स्थापित हो गया है कि दलित साहित्य-दलितों द्वारा, दलित  के  लिए,  दलित  के  विषय  में  है।

शम्भू  गुप्त  ने कहा  कि  ऐसे  विचार  दलित  साहित्य  को  संकीर्णता  के  घेरे  में  ला  देते  हैं। यह  दलितवाद  पैदा  करता  है  जिसकी  परिणति  है दलित   ब्राह्मणवादइस  दुराग्रह  ने  दलित  साहित्य  का  नुकसान  किया  है। बजरंग  बिहारी  तिवारी  ने  दलित  काव्य  की  आलोचना का  व्यवहारिक  पक्ष  रखा। डा.  तेज  सिंह  ने  कहा  कि  दलित  साहित्य –दलित  विमर्श  नहीं,  बल्कि  दलित  चेतना  का  साहित्य  है।

बहस  में  यह  बात  सामने  आयी  कि  कास्ट, क्लास  और  जेंडर  को  एक साथ  देखने  से  ही  स्त्री  साहित्य  पर  समग्रता  से  बातचीत हो  सकेगी। हिंदी  में  स्त्री  विमर्श  अभी  केवल  पुरुष  सन्दर्भ  में  है। स्त्री  का  चित्रण  स्वतंत्र  व्यक्तित्व  में  होना  चाहिए। महसूस किया  जा  रहा है कि आलोचना में अलग-अलग  खाँचे बन  गये  हैं  और  एक  रणनीति  के  तहत  दलित  और  स्त्री  साहित्य  में विभाजन  कर  उन्हें  मुख्य  धारा में  आने  से  वंचित  किया  जा  रहा  है। हिन्‍दी  की  मुख्य  धारा  वर्चस्ववादी  प्रवृत्ति  की  है  जिसे  तोडा़ जाना  चाहिये। मुख्यधारा  में  दलित  और  स्त्री  को  साथ  ले  कर  चलना  होगा।

कविता  में  छंद  विधा  की  उपेक्षा  के  सवाल  पर  प्रोफेसर  रामदेव  शुक्ल  का  कहना  था  कि  विगत  दो  दशकों  में  बड़ी  संख्या  में  दोहे  और ग़ज़लों  की  रचनाएँ  यह  स्पष्ट  करती  हैं  कि  कविता  छंद  मुक्त  नहीं  हुई  है। कविता  में  यदि  भाषा  है , जीवन  की  लय  है  तो  वह  छंद का  बन्ध  तोड़  कर  आयेगी। नचिकेता  ने  कहा  कि  कविता  न  तो  केवल  छंद  है  और  न  केवल  गद्य, बल्कि  कविता  इन  दोनों  कि द्वंदात्मक  समष्टि  है। प्रोफेसर  चितरंजन  मिश्र  का  कहना  था  कि  अच्छी  कविता  को  न  तो  छंद  से  बाहर  किया  जा  सकता  है  और  न  ही भीतर।

देवेन्द्र  आर्य  ने  छंद  कविता  की  उपेक्षा  को  दलितवाद  से  जोड़ते  हुए  दलित  साहित्यकारों  जैसा  ही  संघर्ष  करने  की  जरूरत बताई। जगदीश  नारायण  ने  छंद  काव्य  को  भाषा  की  आँख  बताते  हुये  काव्य  के  स्वरूप  की  रक्षा  और  भीतरी  ढाँचे  की  मजबूती  के लिये  छंद  की  वापसी  की  ज़रूरत  बताई। अनिल  राय  ने  पूछा  कि  क्या  छंद  में  दुर्बोधता  और  सम्प्रेषण की  समस्या  नहीं  होती और  क्या  छंद  मुक्त  कविता  सुगम  एवं सम्प्रेषणीय  नहीं  होतीं ? वास्तव  में  सम्प्रेषण-संशलिष्ट  एवं  द्विपक्षीय  क्रिया-प्रतिक्रिया व्यापार  है।  अतः  छंद  के  सवाल  को केवल  सम्प्रेषणीयता  से  जोड़  कर  नहीं  देखना  चाहिये। प्रभा  दीक्षित ने कहा कि विधा से ही कविता श्रेष्ठ या कमतर नहीं होती- अंतर्वस्तु आवश्यक है।

प्रतिमानीकरण के सवाल पर कपिल देव ने कहा कि आलोचना ने अपना फलक और मूल्य का दायरा विकसित किया है। कविता अभी अपने स्वरुप निर्माण की प्रक्रिया से गुज़र रही है, जब यह स्थिर होगी तो प्रतिमानीकरण का समय आयेगा। प्रमोद कुमार ने कहा कि कविता देश और काल में सदैव परिवर्तनशील है, यह स्थिर हो ही नहीं सकती। अतः इसका स्वरूप निर्धारण नहीं हो सकता। बजरंग बिहारी तिवारी ने उत्पादक कवि की अवधारणा प्रस्तुत की एवं प्रमिला केपी और अनामिका को उल्लिखित करते हुए प्रतिमान प्रस्तुत किये। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे डा. तेज सिंह ने कहा कि आलोचना के दो मुख्य काम हैं- रचना का मूल्याँकन और सिद्धांत निरूपण।  प्रतिमान तो समय और समाज की उपज हैं। यह सही है कि छंद से आज आलोचक विमुख हो रहे हैं।

कार्यक्रम का पहला दिन उत्सवधर्मी रहा। भोजपुरी कवि मोती बीए द्वार का उद्घाटन, उर्दू आलोचना के शिखर विद्वान शम्सुर्रहमान फारूकी एवं हिन्‍दी कथाकार, भाषा चिन्तक प्रोफेसर रामदेव शुक्ल का सम्मान,  काव्य संकलन ‘सर्जना के तीन रंग’- जिसमें रामाधार त्रिपाठी ‘जीवन’,  विद्याधर द्विवेदी ‘विज्ञ’ और देवेन्द्र कुमार ‘बंगाली’ की चुनी हुईं कवितायेँ शामिल हैं और सुधा विन्दु त्रिपाठी रचनावली का विमोचन किया गया। तीन महत्वपूर्ण व्याख्यान हुए- समकालीन काव्यालोचना में हिन्‍दी-उर्दू की परम्‍परा पर शम्सुर्रहमान फारूकी, जातीय भाषा और साहित्य पर रामदेव शुक्ल और हिन्‍दी का जातीय साहित्य एवं रामविलास शर्मा पर अमरनाथ ने वक्तव्य दिये। कार्यक्रम का संयोजन और संचालन देवेन्द्र आर्य और पंकज गौतम ने किया। व्यवस्था रवीन्द्र मोहन त्रिपाठी ने की।

इस अवसर पर गोरखपुर से केसीलाल, रणविजय सिंह, बीआर विप्लवी, सुरेन्द्र दुबे, गणेश पाण्डेय, अरविन्द त्रिपाठी, नागेन्द्र, हर्षवर्धन शाही, रंजना जैसवाल, हर्ष सिन्हा, दीपक त्यागी आदि भी उपस्थित थे