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कमल जोशी- एक यायावर का अचानक चले जाना : ज़हूर आलम  

कमल जोशी

हमेशा चलते रहना ही उसने अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया था। उसने कभी विराम नहीं लिया और 3 जुलाई को बिना किसी को बताए वह सबसे लम्बी अनजान और एक अनंत यात्रा पर निकल गया। बचपन में ही लग गई एक्यूट  अस्थमा की भयंकर बीमारी से लड़ते हुए उसने पहाड़ का चप्पा-चप्पा छान मारा था, चाहे वो रूपकुण्ड और नन्दा राजजात की कठिन यात्रा हो या लद्दाख और छोटा कैलाश की अनंत ऊँचाइयों को पार करना। कम आक्सीजन के कारण जहां बड़े‎-बड़े‎ चौड़े सीने वाले महारथियों की भी साँस फूल जाती थी, वहां दृढ निश्चयी जिद्दी दमे का मरीज कमल उन ऊँचाइयों और दुर्गम पहाड़ों को हँसते–हँसते पार कर लेता था,  क्योंकि प्रकृति और पर्वत की ऊँचाइयों से उसे अगाध प्रेम था और इनके साथ हो रहे दुर्व्यवहार के प्रति गहरी चिन्ता थी।

उत्तराखण्ड के पहाड़-गाँव-लोगों की स्थिति को जानने समझने के लिए 1974 , 1984 , 1994 , 2004  व 2014 में डा० शेखर पाठक के नेतृत्व में पहाड़ संस्था की ओर से आयोजित ‘अस्कोट-आराकोट अभियान’ की लम्बी यात्राओं का वह अगुवा साथी रहा। उत्तराखण्ड के सभी राजनीतिक, समाजिक और सांस्कृतिक आन्दोलनों/अभियानों में उसने बढ़-चढ़‎ कर अपनी महत्वपूर्ण‎ हिस्सेदारी निभाई।
कमल जोशी अपनी धुन का पक्का और बहुत जिद्दी इंसान था। बचपन में ही उसे एक्यूट अस्थमा का जानलेवा रोग लग गया था।  दुनिया भर के इलाजों के बावजूद डाक्टरों ने जवाब दे दिया था कि वह बहुत दिन नहीं बचेगा, पर उसने जिद पकड़‎ ली कि वह जियेगा ! …और बिमारी से लड़ते हुए उसने 63 साल की एक भरपूर जिंदगी बिना किसी रोक-टोक के आजादी के साथ बिल्कुल अपनी तरह से जी ! वह कहीं रुका नहीं। बस चलता रहा। वह कहता भी था, “चलना ही मेरी खुराक है और जिन्दगी भी। जिस दिन रुक गया, समझ लो…।’’

वह सबसे बेलौस तरीके से और खुलकर मिलता था। आप-जनाब वाली ‍औपचारि‍कता उसे बिल्कुल पसन्द नहीं थी। इसीलिए नये-अंजान लोगों से भी वह पलभर में ही घुल-मिल जाता था और उनका दोस्त बन जाता था। इसीलिए उस पारदर्शी दोस्त के मित्रों/जानकारों की इतनी लम्बी फेहरिस्त है कि गिनना मुश्किल होगा। बेबाकी का यह आलम था कि वह किसी के दबाव में कभी नही आता था- चाहे वह कोई भी तुर्रमखाँ हो। उसे खुले दिमाग‎ के लोग ही पसंद थे। बकौल हरजीत-
जो तबीयत हरी नही करते
उनसे हम दोस्ती नही करते

केमिस्ट्री में एमएससी करने के बाद रिसर्च करने के लिए वह कुमाऊँ‎ विश्वविद्यालय नैनीताल आया था। तीन साल गहन शोध करने के बाद जब थीसिस लिखी‎ जा रही थी, अन्तिम चेप्टर मे किसी बात पर गाईड से उसके विचार नही मिले और उसने एक झटके में रिसर्च को तिलांजलि दे दी और फोटोग्राफी, पत्रकारिता, कविता, चित्रकला, सामाजिक व सांस्कृतिक कार्यों और यायावरी में अपना जीवन झोंक दिया। फिर कभी पीछे मुड़कर  नहीं देखा।
बेबाक पत्रकारिता, लेखन और फोटोग्राफी में उसकी नजर का और सोच का कोई जवाब नहीं था। कमल एक बहुत ही उच्चकोटि का लाजवाब फोटोग्राफर था। यह उसकी नजर का कमाल था कि उसके अधिकांश फ्रेम और कम्पोजीशन पेंटिंग जैसे लगते थे।  दिल्ली में एक बार वह मुझे मशहूर फोटोग्राफर रघु राय के स्टूडियो में ले गया था। कमल और रघुराय के बड़े‎ बेतकल्लुफ ताल्लुकात थे। कमल और उसकी फोटोग्राफी के प्रति रघु राय का सम्मान देख मैं दंग था।

अस्सी के दशक में नैनीताल आने के बाद युगमंच, पहाड़, नैनीताल समाचार और उत्तरा पत्रिका से उसने अपना गहरा नाता जोड़ लिया था। जसम और युगमंच परिवार का वह स्थायी‎ सदस्य बन गया था। नाटकों, नुक्कड नाटक समारोह, कवि सम्मेलन‎, होली महोत्सव, फिल्म फेस्टिवल आदि में नैनीताल से बाहर चले जाने के बावजूद वह हमेशा अपनी उपस्थिति और भागीदारी निभाता रहा। डा. शेखर पाठक के सम्पादन में ‘ पहाड़’ और डा. उमा भट्ट के सम्पादन में निकलने वाली महत्वपूर्ण पत्रिका ‘ उत्तरा’ में उसका सहयोग अतुलनीय था।

देहरादून से संजय कोठियाल के सम्पादन में निकलने वाली मासिक पत्रिका ‘युगवाणी’ में उसकी भूमि‍का बहुत महत्वपूर्ण थी। मुख्य पन्ने पर उसके द्वारा खींची एक बोलती हुई तस्वीर और उसी पर कमल का आलेख युगवाणी को नई ऊँचाइयां प्रदान कर रहे थे। अब उसके जाने के बाद युगवाणी का मुख्य पन्ना सूना हो जाएगा- जिसका पाठक महीने भर इंतजार करते थे, जिसमें पहाड़ की किसी जुझारू महिला, ढाबे वाले या किसी मासूम पहाड़ी‎ बालक-बालिका की तस्वीर और उसी से जुड़ी पहाड़ के पहाड़ से जीवन, कठोर परिश्रम और जीवन्तता बाल सुलभता पर एक विचारोत्तेजक स्टोरी होती थी। वह अपनी यात्राओं के पड़ा‎वों से उन सच्ची स्टोरियों को उठाकर कागज पर बेहतरीन लेखन शैली में उतार देता था।
वह अपने समाज के लिए प्रेम से सराबोर बहुआयामी प्रतिभा थी। जिन्दगी का अनूठा चितेरा और बेहतरीन इंसान था। उसकी बेबाक हँसीं हमेशा कानों में गूंजती रहेगी।

पिछले साल वह मेरे व मुन्नी के साथ हमारा गाइड बन कर उत्तरकाशी से हरसिल और गंगोत्री तक गया था। इस साल यमनोत्री की यात्रा का प्रोग्राम था, पर कमल वादा तोड़‎कर किसी और यात्रा पर चला गया !

लोकगीतों के बीच जनकवि गिर्दा को अंतिम विदाई

नई दिल्ली : जनकवि गिरीश चंद्र तिवाडी ‘गिर्दा’ को जनवादी तरीके से अंतिम विदाई दी गई। गिर्दा का 22 अगस्त को सुशीला तिवारी चिकित्सालय, हल्द्वानी में देहांत हो गया था। कई दिनों से उनकी तबीयत खराब चल रही थी।
नैनीताल में निवास कर रहे गिर्दा का 23 अगस्त को अंतिम संस्कार पाईन्स श्मशानघाट पर किया गया। हजारों लोगों ने नम आंखों से अपने प्रिय कवि को अंतिम विदाई दी। गिर्दा की इच्छा के मुताबिक उनकी शवयात्रा उनके ही गीत से शुरू हुई। गिर्दा को उनके पुत्र तुहिनांश तिवाड़ी और दत्तक पुत्र प्रेम सिंह ‘पिरम’ ने मुखाग्नि दी।
सुबह करीब 10 बजे उनकी अंतिम यात्रा उनके गीत ‘ततुक नि लगा उदेख, घुनन मुनई न टेक, जैंता एक दिन त आलो…’ से शुरू हुई। शवयात्रा में ‘आज हिमाल तुमूकें धत्यूंछौ’, ‘हम लड़ते रयां भुला…’, ‘उत्तराखंड मेरी मातृभूमी, मातृभूमी मेरी पितृभूमी…’ और ‘हमारी ख्वाहिशों का नाम इंकलाब है…’ जैसे गीत गाए गए। यह सिलसिला श्मशानघाट तक चलता रहा। उनका दाह संस्कार भी उनके गीतों के बीच किया गया।
परम्परा  के विपरीत कई महिलाएं भी गिर्दा की अंतिम यात्रा में शामिल हुर्इं। उन्होंने अर्थी का कंधा भी दिया। अंतिम यात्रा में हर तबके और जाति-धर्म के लोग थे। लेखकों, पत्रकारों, रंगकमिर्यों, प्रशासनिक अधिकारियों और राजनेताओं अलावा मजूदर, नाविक, रिक्शाचालक आदि भी थे। गिर्दा को अंतिम विदाई देने के लिए अल्मोड़ा, देहरादून, लखनऊ आदि विभिन्न जगहों से लोग आए।
इस दौरान राजीव लोचन साह, डा. शेखर पाठक, रंगकर्मी जहूर आलम, वरिष्ठ पत्रकार नवीन जोशी, राजेश जोशी, उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी अध्यक्ष पीसी तिवारी, उलोवा के डा. शमशेर सिंह बिष्ट, बड़े भाई रजनी कुमार तिवारी, आशीष त्रिपाठी, जनकवि बल्ली सिंह चीमा, प्रभात ध्यानी, डा. गिरिजा पांडे, डा. भुवन शर्मा आदि शामिल थे।
सुप्रसिद्ध रंगकर्मी जहूर आलम ने बताया कि वैसे तो नैनीताल में रंगमंच की पुरानी परम्परा है। 1976 में कुमाऊं विश्वविद्यालय के बीडीएस कैंपस की सिल्वर जुबली थी। तब पहली बार किसी आधुनिक नाटक ‘अंधायुग’ का मंचन किया गया। इसके निर्देशन के लिए लेनिन पंत को दिल्ली से बुलवाया गया था। इस आयोजन में गिर्दा की महत्वपूर्ण भूमिका थी। उन्होंने इस नाटक में लोक गीत-संगीत को जोड़ा। इसी वर्ष ‘युगमंच’ की स्थापना हुई। इसमें गिर्दा का अहम रोल रहा। कई नाटक किए। इमरजेंसी के दौरान गिर्दा के निर्देशन में घोर शासन विरोधी नाटक ‘अंधेर नगरी चौपट राजा’ हुआ।
‘पहाड़Ó के संपादक शेखर पाठक ने कहा कि सब गिर्दा को जनकवि के रूप में जानते हैं, लेकिन वह संस्कृतिकमी, संगीतकार, आंदोलनकारी भी थे। जन आंदोलनों में उन्होंने सक्रिय भाग लिया। ब्राह्मïण के रूप में जन्म लिया, लेकिन ब्राह्मïणवादी व्यवस्था और जाति व्यवस्था के विरोधी थे। सबसे बड़कर वह मानवतावादी थे। लोगों को जोडऩे वाले थे। संस्कृति के वाहक थे।