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वाम सांस्कृतिक आंदोलन के योद्धा थे जितेंद्र रघुवंशी : जसम

jitender raghuvanshi

आगरा : अभी लोगों के शरीर से होली का रंग छूट भी नहीं पाया था कि देश के तमाम तरक्कीपसंद संस्कृतिप्रेमियों का कॉमरेड जितेंद्र रघुवंशी से  हमेशा के लिए साथ छूट गया। 63 वर्ष की उम्र में 7 मार्च की सुबह ही उनका स्वाइन फ्लू के कारण दिल्ली  स्थित सफदरजंग अस्पताल में निधन हो गया। पिछले साल ही जून माह में आगरा विश्वविद्यालय के के.एम.इन्स्टीट्यूट के विदेशी भाषा विभाग प्रमुख के पद से 30 साल की सेवा के उपरांत उन्होंने अवकाश प्राप्त किया था। अभी वे लिखने-पढ़ने और हिन्दी क्षेत्र में सांस्कृतिक आंदोलन के विकास को लेकर कई योजनाओं पर काम कर रहे थे। उनके निधन की खबर से देश भर के साहित्य-कला प्रेमी लोकतान्त्रिक जमात को जबर्दस्त आघात लगा है। वे अपने पीछे पत्नी, पुत्री और दो बेटों का भरा-पूरा परिवार छोडकर हमेशा के लिए हमसे विदा हो गए।

13 सितंबर 1951 को आगरा में पैदा हुए जितेंद्र रघुवंशी की शिक्षा-दीक्षा आगरा में ही हुई। यहीं के. एम. इंस्टीट्यूट से हिन्दी से परास्नातक की उपाधि हासिल करने के बाद उन्होंने अनुवाद और रूसी भाषा में डिप्लोमा भी किया। बाद में लेनिनग्राद विश्वविद्यालय (सेंट पीटर्सबर्ग) से रूसी भाषा में एम.ए. किया। उन्होंने तुलनात्मक साहित्य में पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त की थी। पिता राजेन्द्र रघुवंशी और माँ अरुणा रघुवंशी के सानिध्य में प्रगतिशील साहित्य संस्कृति के साथ बचपन से ही उनका संपर्क हो गया था। पिता राजेन्द्र रघुवंशी इप्टा आंदोलन के सूत्रधारों में से एक थे। कॉमरेड जितेंद्र रघुवंशी आजीवन भारत की कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य रहे। थियेटर को उन्होंने अपने सांस्कृतिक कर्म के बतौर स्वीकार किया। 1968 से इप्टा के नाटकों में अभिनय, लेखन, निर्देशन आदि के क्षेत्र में वे सक्रिय हुए। एम.एस. सथ्यू द्वारा निर्देशित देश विभाजन पर आधारित बेहद महत्त्वपूर्ण फिल्म ‘गरम हवा’ में उन्होंने अभिनय किया। राजेन्द्र यादव के ‘सारा आकाश’ पर बनी फिल्म के निर्माण में सहयोग दिया। ग्लैमर की दुनिया  में वे  बहुत आसानी से जा सकते थे, पर उसके बजाय उन्होंने अपनी प्रतिबद्धता हिन्दी क्षेत्र में सांस्कृतिक आंदोलन के निर्माण के प्रति जाहिर की। अभी वे भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) के राष्ट्रीय महासचिव और उत्तरप्रदेश के अध्यक्ष थे।

जितेंद्र जी का मुख्य कार्यक्षेत्र भले ही नाटक और थियेटर रहा हो, पर मूलतः वे एक कहानीकार थे। आजादी आंदोलन के प्रमुख कम्युनिस्ट कार्यकर्ता राम सिंह के जीवन पर आधारित उनकी एक कहानी काफी चर्चित हुई थी। इसके अलावा ‘लाल सूरज’, ‘लाल टेलीफोन’ जैसी कहानियों के शीर्षक इस बात के गवाह हैं कि वे लाल रंग को चहुँओर फैलते देखना चाहते थे। उनके द्वारा लिखे कुछ प्रमुख नाटक ‘बिजुके’, ‘जागते रहो’ और ‘टोकियो का बाजार’ है। अभी मृत्यु से कुछ दिन पूर्व आकाशवाणी आगरा से उनकी एक कहानी का प्रसारण किया गया था और आगरा महोत्सव के दौरान 23 फरवरी को प्रेमचंद की कहानियों पर आधारित नाट्यप्रस्तुति ‘रंग सरोवर’ का मंचन हुआ था। इससे यह आसानी से समझा जा सकता है कि मृत्यु के ठीक पहले तक वे किस तरह प्रतिबद्ध और सक्रिय थे। आगरा में किसी भी प्रगतिशील सांस्कृतिक आयोजन की संकल्पना उनको शामिल किए बगैर नामुमकिन थी। वे युवाओं के लिए एक सच्चे रहनुमा थे। 2012 में आगरा में हुए रामविलास शर्मा जन्मशती आयोजन समिति के सलाहकार के रूप में उनके अनुभव का लाभ इस शहर को प्राप्त हुआ। हर साल होने वाले आगरा महोत्सव के सांस्कृतिक समिति के वे स्थाई सदस्य थे। इसके अलावा शहीद भगत सिंह स्मारक समिति,  नागरी प्रचारिणी सभा,  आगरा,  बज़्मे नजीर,  यादगारे आगरा, प्रगतिशील लेखक संघ आदि से भी उनका जुड़ाव रहा। आगरा में वे हर साल वसंत के महीने में नजीर मेले का आयोजन कराते थे और हर गर्मी में बच्चों के लिए करीब एक माह की नाट्यकार्यशाला नियमित तौर पर कराते थे। 1990 के बाद देश के भीतर सांप्रदायिक राजनीति के उभार के दिनों में उनके भीतर का कुशल संगठनकर्ता अपने पूरे तेज के साथ निखर कर सामने आया। इप्टा द्वारा इसी दौर में कबीर यात्रा, वामिक जौनपुरी सांस्कृतिक यात्रा, आगरा से दिल्ली तक नजीर सद्भावना यात्रा, लखनऊ से अयोध्या तक जन-जागरण यात्रा आदि का आयोजन किया गया। उनका वैचारिक निर्देशन और उनकी सांस्कृतिक दृष्टि ही इस पूरी योजना के केंद्र में थी।

वे लेखक संगठनों की स्वायत्तता, विचारधारात्मक प्रतिबद्धता और सांस्कृतिक संगठनों की जरूरत और भूमिका को नया आयाम देने वाले चिंतक भी थे। लेखकों की आपेक्षिक स्वायत्तता के हामी होने के बावजूद वे यह मानते थे कि ‘‘अब यह तो उसे (लेखक को ) ही तय करना है कि वह नितांत व्यक्तिगत स्वतन्त्रता चाहता है या सामाजिक स्वतन्त्रता। सामाजिक स्वतन्त्रता की जंग सामूहिक रूप से ही लड़ी जा सकती है। सामूहिकता के लिए संगठन अनिवार्य है। अब संगठन का न्यूनतम अनुशासन तो मानना ही होगा। ऐसे लेखक तो हैं और रहेंगे, जिन्हें एक समय के बाद लगता है कि उनका आकार संगठन से बड़ा है। वे अपनी ‘स्वतन्त्रता’ का उपयोग करें, लेकिन अपने अतीत को न गरियाएँ।’’ वैचारिक भिन्नता का सम्मान करते हुए भी सांस्कृतिक कार्यवाहियों के लिए एकता का रास्ता तलाश लेने वाले ऐसे कुशल संगठनकर्ता की आकस्मिक मृत्यु से हिन्दी क्षेत्र में वाम सांस्कृतिक आंदोलन को ऐसी क्षति हुई है जिसकी भरपाई निकट भविष्य में संभव नहीं दिखती। वे आखिरी दम तक प्रतिबद्ध मार्क्सवादी सांस्कृतिक योद्धा रहे। विचारधारात्मक दृढ़ता और समाजवादी-धर्मनिरपेक्ष भारत का स्वप्न देखते हुए वामपंथी सांस्कृतिक आंदोलन के लिए जो जमीन छोडकर कॉ. जितेंद्र रघुवंशी चले गए हैं, उस पर नए दौर में नई फसल की तैयारी ही उनके प्रति एक सच्ची श्रद्धांजलि होगी। जन संस्कृति मंच एक सच्चे कम्युनिस्ट, क्रांतिकारी संगठनकर्ता और सांस्कृतिक आंदोलन के मजबूत योद्धा को क्रांतिकारी सलाम पेश करता है।

(जन संस्कृति मंच की ओर से राष्ट्रीय सहसचिव प्रेमशंकर द्वारा जारी)

प्रख्यात अम्बेडकरवादी आलोचक तेज सिंह को श्रद्धांजलि

नई दिल्ली : हिंदी के प्रख्यात आलोचक और अंबेडकरवादी साहित्य के मूर्धन्य प्रवक्ता तथा ‘अपेक्षा’ त्रैमासिक पत्रिका के संपादक तेज सिंह का 15 जुलाई 2014 को शाम लगभग 3 बजे हृदय गति रुक जाने के कारण नि‍धन हो गया। तेज सिंह का जन्म दिल्ली के घोंडली में 13 जुलाई 1946 में हुआ था। उन्होने हिन्दी साहित्य को अपनी तमाम आलोचनात्मक कृतियों से समृद्ध किया। उनकी कृतियों में नागार्जुन का कथा-साहित्य (1993,  आलोचना),  राष्ट्रीय आन्दोलन और हिन्दी उपन्यास (2000,  आलोचना),  आज का दलित साहित्य (2000,  आलोचना),  उत्तरशती की हिन्दी कहानी (2006, आलोचना), दलित समाज और संस्कृति (2007), अम्बेडकरवादी साहित्य का समाजशास्त्र(2009, आलोचना), अम्बेडकरवादी साहित्य की अवधारणा (2010,  आलोचना),  अम्बेडकरवादी साहित्य ही क्यों? (2011), डॉ. अम्बेडकर और धम्म-दीक्षा (2011), अम्बेडकरवाद और मार्क्सवाद का द्वंद्वात्मक सम्बन्ध (2011),  प्रतिरोध की बहुजन संस्कृति(2011),  अम्बेडकरवादी विचारधारा : इतिहास और दर्शन (2012) आदि ने अस्मिता विमर्श के पृथकतावादी और शुद्धतावादी भावधारा के विपरीत दलित आंदोलन को एक नया और गतिमान वैज्ञानिक आवेग दिया। कृतियों के शीर्षक ही अपने आप में इस बात की ताईद करते हैं कि उनकी गति समाजशास्त्रीय आलोचना के साथ-साथ साहित्य के विचारधारात्मक और दार्शनिक पक्ष तक अपना विस्तार पाती थी। उन्होंने आज का समय (2002, दलित कवियों की कविताओं का संकलन),  उग्र की ज़ब्तशुदा कहानियाँ (2004), सबद बिबेकी कबीर (2004), अम्बेडकरवादी विचारधारा और समाज (2009),  प्रेमचंद की रंगभूमि : एक विवाद- एक संवाद (2008),  अम्बेडकरवादी कहानी:रचना और सृष्टि (2009), अम्बेडकरवादी स्त्री चिंतन (2010) आदि पुस्तकों का संपादन भी किया। वे दलित लेखक संघ के अध्यक्ष भी रहे।

हिंदी के दलित विमर्श मे चली तमाम बहसों मे सीधे शामिल होकर और उनको गति देकर उन्होंने समाज को एक प्रगतिशील मानवीय दिशा मे सोचने को प्रेरित किया। अस्मितावाद के खतरों को भाँपते हुए ही दलित साहित्य को उन्होंने अंबेडकरवादी साहित्य के बतौर प्रस्तावित किया था। तेज सिंह ऐसे लेखक थे, जिनका संघर्ष भारतीय समाज के तथाकथित उच्च जातियों मे व्याप्त ब्राह्मणवाद से तो था ही, साथ ही दलित जातियों में भी व्याप्त ब्राह्मणवादी विचारों और लैंगिक भेदभाव के खिलाफ भी वे लगातार संघर्ष कर रहे थे। उन्होंने कथा आलोचना को अंबेडकरवादी दृष्टि से समृद्ध कर अपना महत्वपूर्ण योगदान किया।

समाज में व्याप्त जातिवाद, सामंतवाद, ब्राह्मणवाद और लैंगिक पूर्वाग्रह के खिलाफ संघर्ष का हमारा संकल्प ही हमारे प्रिय आलोचक के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि हो सकती है। तेज सिंह को जन संस्कृति मंच की ओर से हार्दिक श्रद्धांजलि।

(जसम की ओर से रामनरेश राम द्वारा जारी)  

मधुकर सिंह को जसम की श्रद्धांजलि

नई दि‍ल्‍ली : प्रगतिशील जनवादी धारा के मशहूर कथाकार मधुकर सिंह 15 जुलाई को अपराह्न पौने चार बजे हमारे बीच नहीं रहे। आरा जिले के धरहरा गाँव स्थित अपने निवासस्थान पर उन्होंने अंतिम साँसें लीं। विगत पांच-छह वर्षों से मधुकर सिंह अस्वस्थ थे, उन पर पैरालाइसिस का आघात हुआ था। लेकिन अस्वस्थता की स्थिति में भी उन्होंने आखिरी सांस तक लेखन कार्य जारी रखा। सामाजिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक बदलाव के लिए संघर्षरत लोगों के लिए वे हमेशा प्रेरणास्रोत रहेंगे।

मधुकर सिंह फणीश्वरनाथ रेणु के बाद हिंदी के उन गिने-चुने साहित्यकारों में से थे, जिन्होंने आजीवन न केवल ग्रामीण समाज को केंद्र बनाकर लिखा, बल्कि वहां चल रहे राजनीतिक-सामाजिक बदलाव के संघर्षों को भी शिद्दत के साथ दर्ज किया। उन्होंने भोजपुर के क्रांतिकारी किसान आंदोलन को स्वाधीनता आंदोलन की निरंतरता में देखा और अपनी रचनाओं में इसे चिह्नित किया कि जब 1947 के बाद भी सामाजिक विषमता और उत्पीड़न खत्म नहीं हुआ और शासकवर्ग का दमनकारी चरित्र नहीं बदला, तो फिर से आजादी की एक नई लड़ाई भोजपुर में शुरू हुई। नक्सलबाड़ी विद्रोह ने उसे आवेग प्रदान किया। मधुकर सिंह के साहित्य का बहुलांश भोजपुर के मेहनतकश किसानों, खेत मजदूरों, भूमिहीनों, मेहनतकश औरतों और गरीब, दलित-वंचितों के क्रांतिकारी आंदोलन की आंच से रचा गया। सामंती-वर्णवादी-पितृसत्तात्मक व्यवस्था से मुक्ति के लिहाज से मधुकर सिंह की रचनाएं बेहद महत्व रखती हैं। स्त्री की मुक्ति के सवाल को मधुकर सिंह ने दलित मुक्ति से अभिन्न रूप से जोड़कर देखा। दलितों, स्त्रियों, अल्पसंख्यकों की सामाजिक मुक्ति का संघर्ष इनके कथा साहित्य में जमीन के आंदोलन से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ रहा है। सामंती-पूंजीवादी व्यवस्था के सबसे निचले स्तर पर मौजूद मेहनतकशों की सामाजिक-आर्थिक मुक्ति वर्ग-समन्वय के किसी रास्ते से संभव नहीं है, मधुकर सिंह की कहानियां बार-बार इस समझ को सामने लाती हैं।

मधुकर सिंह

मधुकर सिंह

2 जनवरी 1934 को बंगाल प्रांत के मिदनापुर में जन्मे मधुकर सिंह ने जीवन के आठ दशक का ज्यादातर समय बिहार के भोजपुर जिला मुख्यालय आरा से सटे अपने गांव धरहरा में गुजारा। सोनभद्र की राधा, सबसे बड़ा छल, सीताराम नमस्कार, जंगली सुअर, मनबोध बाबू, उत्तरगाथा, बदनाम, बेमतलब जिंदगियां, अग्‍नि‍ देवी, धर्मपुर की बहू, अर्जुन जिंदा है, सहदेव राम का इस्तीफा, मेरे गांव के लोग, कथा कहो कुंती माई, समकाल, बाजत अनहद ढोल, बेनीमाधो तिवारी की पतोह, जगदीश कभी नहीं मरते समेत उन्नीस उपन्यास और पूरा सन्नाटा, भाई का जख्म, अगनु कापड़, पहला पाठ, असाढ़ का पहला दिन, हरिजन सेवक, पहली मुक्ति, माइकल जैक्सन की टोपी, पाठशाला समेत उनके ग्यारह कहानी संग्रह और प्रतिनिधि कहानियों के कुछ संग्रह भी प्रकाशित हैं। लाखो, सुबह के लिए, बाबू जी का पासबुक, कुतुब बाजार आदि उनके चर्चित नाटक हैं। ‘रुक जा बदरा’ नामक उनका एक गीत संग्रह भी प्रकाशित है। उनकी कई कहानियों के नाट्य मंचन भी हुए हैं। वे जन नाट्य संस्था युवानीति के संस्थापकों में से थे। मधुकर सिंह ने कुछ कहानी संकलनों का संपादन भी किया। बच्चों के लिए भी दर्जनों उपन्यास और कहानियां उन्होंने लिखी। उनकी रचनाओं के तमिल, मलयालम, कन्नड़, तेलुगु, मराठी, पंजाबी, उडि़या, बांग्ला, चीनी, जापानी, रूसी और अंग्रेजी में अनुवाद हो चुके हैं। उन्होंने ‘इस बार’ पत्रिका के अतिरिक्त कुछ पत्र-पत्रिकाओं का संपादन भी किया। हमेशा प्रगतिशील-जनवादी साहित्यिक-सांस्कृतिक आंदोलन से जुड़े रहे कथाकार मधुकर सिंह जन संस्कृति मंच की स्थापना के समय से ही इसके साथ थे। उन्होंने जसम के राष्ट्रीय परिषद और कार्यकारिणी के सदस्य बतौर अपनी जिम्मेवारियां निभाईं और लंबे समय तक राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रहे। सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार, फणीश्वरनाथ रेण पुरस्कार, कर्पूरी ठाकुर पुरस्कार समेत उन्हें कई सम्मान और पुरस्कार मिले। पिछले ही साल आरा में उन्हें जन संस्कृति सम्मान से सम्मानित किया गया था और उनके साहित्यिक योगदान का मूल्यांकन किया गया था।

जन संस्कृति मंच जनता के संघर्षों के हमसफर, साथी और अपने अत्यंत प्रिय लेखक मधुकर सिंह को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है.

(जसम के केन्द्रीय कार्यकारिणी की ओर से सुधीर सुमन द्वारा जारी)

बल्ली सिंह चीमा की गिरफ्तारी अनुचित : जसम

बल्ली सिंह चीमा

बल्ली सिंह चीमा

नैनीताल :  ऊधम सिंह नगर लोकसभा क्षेत्र से आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार तथा सुविख्यात शायर बल्ली सिंह चीमा को चुनाव प्रचार के दौरान कथित रूप से धारा 144 तोड़ने के आरोप में प्रशासन द्वारा 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा जाना अलोकतांत्रिक और अनुचित है। यह अत्यंत आश्चर्य की बात है कि भाजपा और अन्‍य पार्टियों के अनेक नेता साम्प्रदायिक और भड़काऊ भाषण देने के संगीन आरोपों के बावजूद या तो चुनाव आयोग की नोटिस के बाद या महज आयोग की चेतावनी के बाद खुले घूम रहे हैं, वहीं बल्ली सिंह चीमा को एक निरर्थक से आरोप की बुनियाद पर आचार संहिता की आड़ में गिरफ्तार कर लिया गया। यह चुनाव लड़ने और प्रचार करने के उनके अधिकार पर हमला है।

एक ऐसे समय जब 2014 के लोकसभा चुनाव में पैसे पानी की तरह बहाए जा रहे हैं, करोड़पति और आपराधिक छवि वाले लोग भारी तादाद में चुनाव में अपने धन-बल और बाहु-बल की आज़माइश कर रहे हैं, तब बल्ली सिंह चीमा की गिरफ्तारी एक गहरी विडम्बना की और इशारा करती है, जहां चुनाव आयोग के तमाम लम्बे-चौड़े दावों के बावजूद भारतीय लोकतंत्र के बड़ी पूंजी और आपराधिक तत्वों द्वारा अपहरण की कोशिशें बेरोक-टोक जारी हैं। एक सामान्य नागरिक के लिए चुनाव लड़ना ही असंभव बना दिया जा रहा है।

जन संस्कृति मंच बल्ली सिंह चीमा और उनके साथियों की अविलम्ब रिहाई की मांग करता है और चुनाव आयोग से मांग करता है कि इस मामले में जो अधिकारी दोषी हैं, उन पर आयोग कार्रवाई करे।

(सुधीर सुमन, राष्ट्रीय सह सचिव, जसम द्वारा जन संस्कृति मंच की ओर से जारी)  

बल्ली सिंह ‘चीमा’ का लिखा हुआ गीत-

मैं अमरीका का पिट्ठू और तू अमरीकी लाला है
आजा मिलकर लूटें खाएं कौन देखने वाला है .
मैं विकास की चाबी हूँ और तू विकास का ताला है
सेज बनाएं, मौज उड़ाएं कौन पूछने वाला है

बरगर-पिज़्ज़ा खाना है और शान से जीना-मरना है
ऐसी-तैसी लस्सी की, अब पेप्सी कोला पीना है
डॉलर सबका बाप है और रुपया सबका साला है
आजा मिलकर लूटें खाएं कौन देखने वाला है .

फारेन कपड़े पहनेंगे हम, फ़ौरन खाना खायेंगे
फारेन धुन पर डांस करेंगे, फारेन गाने गायेंगे
एन.आर.आई. बहनोई है, एन.आर.आई. साला है
आजा मिलकर लूट मचाएं कौन देखने वाला है .

गंदा पानी पी लेते हैं, सचमुच भारतवासी हैं
भूखे रहकर जी लेते हैं, सचमुच के सन्यासी हैं
क्या जानें ये भूखे नंगे, क्या गड़बड़ घोटाला है
आजा मिलकर राज करें, कौन देखने वाला है

रंग बदलते कम्युनिस्टों को अपने रंग में ढालेंगे
बाकी को आतंकी कहकर किस्सा ख़त्म कर डालेंगे
संसद में हर कामरेड जपता पूँजी की माला है
आजा मिलकर राज करें, कौन देखने वाला है

पर्वत, नदियाँ, जंगल, धरती जो मेरा वो तेरा है
भूखा भारत भूखों का है, शाइनिंग इंडिया मेरा है
पूँजी के इस लोकतंत्र में अपना बोलमबाला है
आजा मिलकर राज करें, कौन देखने वाला है

तेरी सेना, मेरी सेना मिलकर ये अभ्यास करें
हक इन्साफ की बात करे जो उसका सत्यानाश करें
एक करार की बात ही क्या सब नाम तेरे कर डाला है
आजा मिलकर राज करें, कौन देखने वाला है .

मैं अमरीका का पिट्ठू और तू अमरीकी लाला है
आजा मिलकर लूटें खाएं कौन देखने वाला है .

हमेशा प्रासंगिक रहेंगे अमरकांत : जसम

अमरकांत

अमरकांत

नई दि‍ल्‍ली : कल 17 फरवरी को सुबह 9:30 बजे हिंदी के महान कथाकार अमरकांत ने जिंदगी की अंतिम सांसें लीं। वे 88 साल के थे। एफ-6, पंचपुष्प अपार्टमेंट, अशोक नगर, इलाहाबाद स्थित उनके आवास पर शोक व्यक्त करने वाले साहित्यकारों और आम नागरिकों का तांता लगा रहा। आज दोपहर बाद उन्हें अंतिम विदाई दी गई।

अमरकांत अपनी सादगी, सहजता और आत्मीय-स्नेहिल व्यवहार के लिए हमेशा याद आएंगे। अभावों, बीमारियों और उपेक्षाओं के बावजूद उनके व्यक्तित्व की सरलता हमेशा बनी रही और उन्होंने अपने आत्मसम्मान से कभी समझौता नहीं किया।

अमरकांत स्वांतत्र्योत्तर भारत के जटिल यथार्थ और बहुविध द्वंद्वों से घिरे समाज के जीवन व्यापार और उसमें निर्मित हो रहे किरदारों को अत्यंत सहजता से पेश करने वाले कथाकार रहे हैं। प्रेमचंद की सामाजिक यथार्थवादी कथा-परंपरा को उन्होंने आगे बढ़ाया और नई कहानी आंदोलन के दौर में भी वे उन्हीं साहित्यिक मूल्यों के साथ रहे। जो लोग प्रेमचंद से छुटकारा पाने को ही हिंदी कहानी की अग्रगति और नएपन की पहचान बता रहे थे, अमरकांत उनके साथ नहीं थे। जीवन जगत से ली गई नवीन उपमाएं, जनपदीय मुहावरे, खरी चलती हुई जुबान, कथन-भंगिमा, गहन सामाजिक संवेदनशीलता और गहरी मनोवैज्ञानिक समझ उनकी रचनाओं की खासियत रही है। उनकी रचनाओं की सीधी सपाट बुनावट के भीतर गहरे अर्थसंदर्भ, समाज और देश की दशा-दिशा और उसके भविष्य के अत्यंत यथार्थपरक मूल्यांकन और संकेत मिलते हैं। इसके साथ-साथ समाज और दुनिया को आगे ले जानेवाली बातों और भाव-संरचनाओं का गहरा विवेक भी उनकी रचनाओं में घुलामिला नजर आता है।

‘जिंदगी और जोंक’, ‘देश के लोग’, ‘मौत का नगर’, ‘मित्र मिलन और अन्य कहानियां’, ‘दुख-सुख कथा’, ‘कुहासा’, ‘एक धनी व्यक्ति का बयान’, ‘कलाप्रेमी’, जांच और बच्चे’ अमरकांत के प्रमुख कहानी संग्रह हैं। अगर उनकी सारी कहानियों को छोड़ भी दिया जाए, तो सिर्फ ‘दोपहर का भोजन’, ‘डिप्टी कलक्टरी’, ‘जिंदगी और जोंक’ और ‘हत्यारे’ जैसी कहानियां ही उन्हें दुनिया के किसी भी महान कथाकार के समकक्ष खडा़ करने में समर्थ हैं। अमरकांत ने ‘सूखा पत्ता’, ‘आकाश पक्षी’, ‘विदा की रात’, ‘लहरें’, ‘कंटीली राह के फूल’, ‘सुन्नर पांडे की पतोहू’, ‘काले उजले दिन’, ‘बीच की दीवार’, ‘ग्राम सेविका’, ‘इन्हीं हथियारों से’ इत्यादि उपन्यासों की भी रचना की।

आलोचक रविभूषण ने ठीक ही लिखा है कि ‘जिंदगी और जोंक’ का रजुआ ‘कफन’ के घीसू-माधो का सगा-संबंधी दिखाई पड़ता है। रजुआ की जिंदगी पशु की है। स्वतंत्र भारत का वह पात्र भारत की स्वतंत्रता पर प्रश्न-चिह्न है।’ रजुआ, मुनरी, मूस, सकलदीप बाबू, ‘इन्हीं हथियारों से’ की बाल-वेश्या ढेला, सुन्नर पांडे की पतोह, बऊरईया कोदो खानेवाला गदहा जैसे अनगिनत अविस्मरणीय और विश्वसनीय किरदारों के जरिए अमरकांत ने हमारे समाज की हजारहा विडंबनाओं को जिस तरह मूर्त किया है, वह हिंदी कथा-साहित्य की बेमिसाल उपलब्धि है। खासकर भारतीय मध्यवर्ग और निम्नमध्यवर्ग की खामियों और खूबियों को उन्होंने बड़े ही विश्वसनीय तरीके से अपनी रचनाओं में दर्ज किया है। यही वह वर्ग है जो प्रशासनतंत्र, नौकरशाही और शासकवर्गीय राजनीति की अगली कतार में रहता रहा है, इसकी संवेदनहीनता, मक्कारी, अवसरवाद और मूल्यहीनता किसी जनविरोधी व्यवस्था के लिए किस कदर मददगार हो सकती है, साठ के दशक में लिखी गई अमरकांत की कहानी ‘हत्यारे’ में इसके बड़े स्पष्ट संकेत देती है। अभी दिसंबर 2013 में ही जनसंस्कृति मंच, कथा समूह के पहले कथामंच आयोजन में इस कहानी पर काफी विस्तार से चर्चा हुई थी। आज जिस तरह एक हत्यारे का देश में भावी प्रधानमंत्री के तौर पर गुणगान चल रहा है और उसे मध्यवर्ग का नायक बनाया जा रहा है, उसके संदर्भ से देखें तो यह कहानी मानो ऐसे हत्यारों के निर्माण की प्रक्रिया की शिनाख्त करती है। गौर करने की बात यह है कि अमरकांत इस चिंतित करने वाले यथार्थ के समक्ष वैचारिक-सैद्धांतिक रूप से समर्पण करने वाले लेखक नहीं हैं। विचार और व्यवहार दोनों स्तरों पर उनका जीवन एक प्रतिबद्ध प्रगतिशील लेखक का जीवन था। 1942 के आंदोलन की पृष्ठभूमि पर लिखे गए उनके उपन्यास ‘इन्हीं हथियारों से’ का एक अदना-सा पात्र कहता है- ‘बड़ी-बड़ी बातें, बड़े-बड़े सिद्धांत सिर्फ व्यवहार से ही सार्थक और सहज हो सकते हैं, जिसके बिना जीवन से ही रस खींचकर गढ़े हुए सिद्धांत जीवन से अलग होकर बौने और नाकाम हो जाते हैं।’ अमरकांत का जीवन और रचनाकर्म खुद इसकी तस्दीक करता है।

मानव मुक्ति के संघर्षों के प्रति अमरकांत की आस्था कभी कम नहीं हुई। ‘इन्ही हथियारों से’ का ही एक पात्र सुरंजन शास्त्री अपने भाषण में कहता है- ‘आप इसे आजादी की आंधी कहिए, गांधी की आंधी कहिए, बुढ़िया आंधी काहिए, महा आंधी काहिए, मनुष्य के इतिहास की यह सुपरिचित आंधी है। हाँ, यह प्राचीनतम आँधी है। मानव इतिहास में यह अक्सर आई है। जहां गुलामी है, जहां जुल्म है, अन्याय है, तानाशाही है, वहां बार-बार  है। मुक्ति की आँधी है यह। यह कभी फ्रांस में आयी, कभी रूस में। अन्य देशों में भी वह आ चुकी है। 1857 में भी हमारे देश में आयी थी…आगे बढिए़, आजादी की महा-आँधी आने का गंगा हुलसकर स्वागत कर रही है, तरंगित हो रही है और चिरैय्या ढोल बजा रही है, क्योंकि यह गुलामी को मिटाकर आजाद, शोषणहीन समाज बनाने का संकल्प लेकर आ रही है।’ उपन्यास में तो ये पंक्तियाँ एक खास सन्दर्भ में हैं, लेकिन अमरकांत के कथाकार ने सारी उत्तरवादी और अन्तवादी घोषणाओं के तुमुल में इतिहास की मुक्ति की आँधियों में यकीन कभी नहीं खोया।

चर्चा, आयोजन, प्रायोजन से दूर रहे अमरकांत को बीमारी, पत्रकार जीवन की अनिश्चितताएं, पैसे की तंगी और उनके रचनाकार की साहित्य-प्रतिष्ठान द्वारा उपेक्षा तोड़ न सकी। 16 की उम्र में पढ़ाई छोड़ 1942 के ‘भारत छोडो आन्दोलन’ में कूद पड़ने वाले अमरकांत ने संघर्ष की राह कभी छोड़ी ही नहीं।

अमरकांत जी का जन्म उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के भगमलपुर नामक गांव में 01 जुलाई 1925 को हुआ था। भारत छोड़ो आंदोलन समाप्त होने के बाद उन्होंने बलिया से इंटर किया और बीए के लिए इलाहाबाद विश्वविद्यालय आ गए। उन्होंने आगरा से लेखन और पत्रकारिता के अपने सफर की शुरुआत की थी। इलाहाबाद से प्रकाशित होने वाली ‘मनोरमा’ के संपादन से वे लंबे समय तक जुड़े रहे। ‘सैनिक’ और ‘माया’ में भी उन्होंने कार्य किया। लगभग चालीस वर्षों तक कई पत्रिकाओं में लेखन-संपादन करने के पश्चात कई वर्षों से स्वतंत्र रूप से लेखन और ‘बहाव’ नामक अपनी पत्रिका का संपादन कर रहे थे। ‘कुछ यादें और बातें’ और ‘दोस्ती’ नाम से उनकी संस्मरणों की भी दो पुस्तके प्रकाशित हैं। अमरकांत हिंदी के उन गिने-चुने कथाकारों में से हैं, जिन्होंने बच्चों के लिए भी साहित्य की रचना की। ऐसी पुस्तकों में ‘दो हिम्मती बच्चे’, ‘बानर सेना’, ‘नेउर भाई’, ‘खूंटा में दाल है’, ‘सुग्गी चाची का गांव’, ‘झगरू लाल का फैसला’, ‘बाबू का फैसला’, ‘एक स्त्री का सफर’ आदि प्रमुख हैं।

‘इन्हीं हथियारों से’ उपन्यास के लिए अमरकांत जी को 2007 में साहित्य अकादमी और समग्र लेखन के लिए 2009 में ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया। व्यास सम्मान, पहल सम्मान, जन संस्कृति सम्मान, यशपाल पुरस्कार, सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार समेत कई पुरस्कार और सम्मान उन्हें मिले। उनके छोटे बेटे अरविंद और बहू रीता की बहुत बड़ी भूमिका रही कि उन्होंने अपनी स्वतंत्र जिंदगी छोड़कर हिंदी समाज के इतने अप्रतिम कथाकार को हमारे बीच लंबे समय तक भौतिक रूप से बनाए और बचाए रखा। अमरकांत जी अपने साहित्य और साहित्य व विचार के प्रति अपनी गहरी प्रतिबद्धता के कारण हमारे लिए हमेशा प्रासंगिक रहेंगे। उन्हें जन संस्कृति मंच की ओर से हार्दिक श्रद्धांजलि।

चि‍त्र : संजय जोशी

(जन संस्कृति मंच की ओर से सुधीर सुमन, राष्ट्रीय सहसचिव द्वारा जारी)

कविता लिखने और पढ़ने-पढ़ाने का माहौल बनाना होगा : विष्णुचंद्र शर्मा

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नई दिल्ली: ‘बिना राजनीति के आप परिवर्तन नहीं कर सकते। जो अपनी राजनीति को जानते हैं, वही खतरे को भी जानते हैं। आज कवियों के भीतर जो मध्यवर्ग है, वह कहाँ ले जा रहा है और उनके भीतर की काव्य चेतना उन्हें कहाँ ले गई है, इस पर विचार करना जरूरी है। पुरस्कारों के लिए नहीं, जनता के लिए कविता लिखने, पढ़ने-पढ़ाने का माहौल बनाना होगा।’ वरिष्ठ कवि-आलोचक विष्णुचंद्र शर्मा ने 31 अगस्त को गांधी शांति प्रतिष्ठान में कविता समूह (जसम) और ‘कवि’ पत्रिका की ओर से ‘आज के समय में कविता की भूमिका’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी में यह कहा। विष्णुचंद्र शर्मा ने बताया कि किस तरह 1957 में जब ‘कवि’ पत्रिका उनके संपादन में निकली, तो तमाम भारतीय भाषाओं और जनभाषाओं के साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों का सहयोग उन्हें मिला। उन्होंने कहा कि आज के समय में कवियों के भीतर जो हताशा और खालीपन है, उससे मुक्ति तभी मिलेगी, जब कवियों का देश के विभिन्न इलाकों में चल रहे संघर्षों से संवेदनात्मक रिश्ता बनेगा। उन्होंने कहा कि काव्यशास्त्र का संघर्ष जनता की जिंदगी के संघर्ष से अलग नहीं हो सकता।

संगोष्ठी के शुरू में कथाकार महेश दर्पण ने ‘कवि’ पत्रिका के इतिहास के बारे में बताया कि उसका पहला अंक जनवरी 1957 में प्रकाशित हुआ था, जिसमें विशिष्ट कवि के रूप में त्रिलोचन की कविताओं को छापा गया था। मुक्तिबोध, नामवर सिंह, भवानी प्रसाद मिश्र, शमशेर, प्रभाकर माचवे, शेखर जोशी, नलिन विलोचन शर्मा, रामदरश मिश्र, दुष्यंत कुमार सरीखे उस दौर के कई रचनाकारों की कविताएं कवि में प्रकाशित हुईं। लोर्का, मायकोवस्की, पुश्किन, वाल्ट ह्विटमैन जैसे विश्वप्रसिद्ध कवियों की कविताएं प्रकाशित करने के साथ ही ‘कवि’ ने पाठकों के काव्यात्मक बोध को उन्नत बनाने वाले कई महत्वपूर्ण आलोचनात्मक लेख भी प्रकाशित किए। उन्होंने कहा कि आज जब विचार के लिए बाजार में जगह नहीं है, तब बाजार से लड़ते हुए ही कविता का विकास संभव है।

वर्षों बाद प्रकाशित ‘कवि’ पत्रिका के नए अंक का लोकार्पण करते हुए वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी ने कहा कि ‘कवि’ पत्रिका में किस तरह एक आदमी जो उसका संपादक, प्रूफ रीडर, हॉकर- सब कुछ था, इसे याद किया जाना चाहिए। लघु पत्रिका की बात करने वाले लोग पता नहीं क्यों, ‘कवि’ का नाम भूल जाते हैं, जबकि आज जिस तरह की व्यस्तताएं, कंसर्न और चिंताएं हम देख रहे हैं, उसकी तुलना में उस काम को देखना चाहिए। उन्होंने कहा कि जिसका इतिहास और अतीत नहीं होता, उसका वर्तमान और भविष्य भी नहीं होता। प्रेरणा लेने की जरूरत उन्हें ही पड़ती है, जो कुछ काम करना चाहते हैं।

इस मौके पर विष्णुचंद्र शर्मा के कविता संग्रह ‘यात्रा में कविताएं’ तथा यात्रा-वृत्तांत ‘मन का देश, सब कुछ हुआ विदेश’ का भी लोकार्पण हुआ।

वरिष्ठ कवि अजीत कुमार ने हिंदी में अच्छे कविता संचयन की जरूरत पर जोर देते हुए कहा कि विभिन्न क्षेत्रों में काम करने वालों की कविताओं का संचयन आना चाहिए तथा हरेक को अपनी रुचि के अनुरूप संचयन निकालना चाहिए।

आलोचक बृजेश ने कहा कि आज की कविता पर निराला, प्रयोगवाद, नक्सलबाड़ी, रघुवीर सहाय और केदारनाथ सिंह का प्रभाव है। आज की कविता पर बात करते हुए हमें ‘विचारधारा’ के लोकेशन पर ध्यान देना होगा, इस पर भी गौर करना होगा कि किस चीज का निगेशन किया जा रहा है और क्यों किया जा रहा है। अपने तीखे आलोचनात्मक वक्तव्य में आज की कविता के बड़े हिस्से की भूमिका के प्रति बृजेश ने अपना असंतोष जाहिर किया।

कवि संजय कुंदन ने कहा कि जब से कविता पर बातचीत ज्यादा होने लगी है, तब अच्छी कविताएं नजर आनी बंद हो गई हैं। हम इतिहास के ऐसे मोड़ पर हैं, जहाँ जनता जितना सत्ता से निराश है, उतना ही विपक्ष से भी निराश है। कविता ही आज का विपक्ष और वैकल्पिक मीडिया है और हाशिए की आवाजों को सामने लाने का माध्यम भी है। बाजार और मीडिया दोनों कविता और आम आदमी के दुश्मन हैं।

कवयित्री सविता सिंह ने कहा कि आज का दौर स्त्रीवादी कविता का दौर है। हमें कविता पर बातचीत करते वक्त देखना होगा कि जो भी कविताएं स्त्रीवाद के नाम पर लिखी जा रही हैं, उन पर पितृसत्तात्मक मूल्यों का प्रभाव कितना है और कितना उससे टकराव है। उन्होंने कहा कि बहुत सारे सत्य विमर्शों के जरिए भी पैदा किए जाते हैं।

जेएनयू में शोधार्थी शेफालिका ने कहा कि निराशा के भीतर से जो प्रतिरोध फूट रहे हैं, उसको सामने लाने वाली ऐसी कविताएं कम हैं, जो लोगों की आवाज बन जाएं। रमाकांत विद्रोही जैसे कवि ही इसके अपवाद हैं।

वरिष्ठ कवि इब्बार रब्बी ने कहा कि जब अराजकता को ही कवियों की नई पीढ़ी क्रांतिकारिता समझती थी, उस दौर में भी वह मुक्तिबोध को ही सबसे बड़ा कवि मानती थी। ‘कवि’ पत्रिका ने जिन कवियों को प्रकाशित किया, उनमें कई कविता आज भी प्रगतिशील-जनवादी कविता धारा के सर्वाधिक पसंद किए जाने वाले कवि हैं। इब्बार रब्बी ने कहा कि कविता एक किस्म की भूमिगत कार्रवाई है।

आयोजन के दूसरे सत्र में चंद्रभूषण ने ‘खुशी का समय’, ‘मायामृग’, ‘मेरा देवता’, ‘पैसे का क्या है’, ‘आय लव आलू-करेला’, ‘स्टेशन पर रात’, ‘शांति प्रस्ताव’ आदि कविताएं सुनाईं। ‘कवि’ के पुनर्प्रकाशित अंक में चंद्रभूषण की कविताएं प्रकाशित की गई हैं, जिनके बारे में ‘कवि’ के इस अंक में कवि-आलोचक आर. चेतनक्रांति ने लिखा है कि ‘वे काव्य प्रचलनों, लोकप्रिय भंगिमाओं और सिद्ध मुहावरों से बाहर एक संकोची जगह पर खड़े होकर कवि होते है; और कविता को बाहर खड़ी दुनिया से ज्यादा अपने भीतर आ बसी दुनिया से संवाद के रूप में करते हैं।”

‘शांति प्रस्ताव’ कविता की ये पंक्तियां आज के काव्य परिदृश्य में उनकी कविता के मायने को इस तरह रखती है-

इस दुनिया में हर कोई अपने ही जैसा

क्यों नहीं रह सकता

इस पर इतना टंटा क्यों है

बस, इतनी सी बात के लिए

लड़ता रहता हूँ।

मेरी कविता की उड़ान भी

इससे ज्यादा नहीं है

मेरी फ़िक्र में क्यों घुलते हो

मुझे तुमसे कोई युद्ध नहीं लड़ना।

गोष्ठी का संचालन  कविता समूह (जसम) के संयोजक आशुतोष कुमार ने किया। इस मौके पर कवि रामकुमार कृषक, विवेकानंद, रंजीत वर्मा, भारतेंदु मिश्र, कुमार मुकुल, संजय जोशी, कृष्ण सिंह, यशवंत, मार्तंड प्रगल्लभ, इरेंद्र, दिनेश, निर्भय, रामनिवास आदि भी मौजूद थे। धन्यवाद ज्ञापन महेश दर्पण ने किया।

(सुधीर सुमन द्वरा जारी) 

मुक्तिबोध लोकतंत्र के अंधेरे की शिनाख्त करने वाले कवि

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नई दि‍ल्‍ली : मुक्तिबोध की मशहूर कविता के प्रकाशन के पचास वर्ष के मौके पर जन संस्कृति मंच के कविता समूह की ओर से 13 मई 2013 को गाँधी शांति प्रतिष्ठान में लोकतंत्र के ‘अंधेरे में’ आधी सदी विषयक विचार-गोष्ठी आयोजित की गई। जसम के पिछले सम्मेलन में कविता, कहानी, जनभाषा, लोककला आदि के क्षेत्र में सृजनात्मकता को आवेग देने के लिए विशेष समूह बनाए गए थे। इस आयोजन से कविता समूह की गतिविधि का सिलसिला शुरू हुआ।
आयोजन की शुरुआत रंगकर्मी राजेश चंद्र द्वारा ‘अंधेरे में’ के पाठ से हुई।

इस मौके पर चित्रकार अशोक भौमिक द्वारा ‘अंधेरे में’ के अंशों पर बनाए गए पोस्टरों को आलोचक अर्चना वर्मा ने तथा मंटो पर केंद्रित ‘समकालीन चुनौती’ के विशेषांक को लेखक प्रेमपाल शर्मा ने लोकार्पित किया।

विचारगोष्ठी की शुरुआत करते हुए प्रोफेसर मैनेजर पांडेय ने कहा कि 57 से 63 तक मुक्तिबोध की यह कविता संभावना की कविता थी, पर 2013 में वास्तविकता की कविता है। यह एक ‘समग्र’ कविता है। मुक्तिबोध की कविताओं में जिस ‘वह’ की तलाश है, दरअसल वह जिंदगी के संघर्षों से अर्जित क्राँति-चेतना है। लेनिन के मुताबिक़ कई बार ‘फैंटेसी’ असहनीय यथार्थ के खिलाफ एक बगावत भी होती है। इस कविता में फैंटेसी पूँजीवादी सभ्यता की समीक्षा करती है। यह  मध्यवर्ग के आत्मालोचन की कविता भी है। अंधेरे से लड़ने के लिए अंधेरे को समझना जरूरी होता है। यह कविता अंधेरे को समझने और समझाने वाली कविता है।

आलोचक अर्चना वर्मा ने कहा कि मौजूदा प्रचलित विमर्शों के आधार पर इस कविता को पढ़ा जाए  तो हादसों की बड़ी आशंकाएं हैं। जब यह कविता लिखी गई थी, उससे भी ज्यादा यह आज के समय की जटिलताओं और तकलीफों को प्रतिबिंबित करने वाली कविता है। ऊपर से दिखने वाली फार्मूलाबद्ध सच्चाइयों के सामने सर  झुकाने वाली ‘आधुनिक’ चेतना के बरक्स मुक्तिबोध तिलस्म और रहस्य के जरिये सतह के नीचे गाड़ दी गयी सच्चाइयों का उत्खनन करते हैं। यह यह एक आधुनिक कवि की अद्वितीय उपलब्धि है।

वरिष्ठ कवि मंगलेश डबराल ने कहा कि सामाजिक बेचैनी की लहरों ने हमें दिल्ली में ला पटका था, हम कैरियर बनाने नहीं आए थे। उस दौर में हमारे लिए ‘अंधेरे में’ कविता बहुत प्रासंगिक हो उठी थी। इस कविता ने हमारी पीढ़ी की संवेदना को बदला और अकविता की खोह में जाने से रोका। हमारे लोकतंत्र का अंधेरा एक जगह कहीं घनीभूत दिखाई पड़ता है तो इस कविता में दिखाई पड़ता है। पिछले पाँच दशक की कविता का भी जैसे केंद्रीय रूपक है ‘अंधेरे में’। यह निजी संताप की नहीं, बल्कि सामूहिक यातना और कष्टों की कविता है।

चित्रकार अशोक भौमिक ने मुक्तिबोध की कविता के चित्रात्मक और बिंबात्मक पहलू पर बोलते हुए कहा कि जिस तरह गुएर्निका को समझने के लिए चित्रकला की परंपरागत कसौटियाँ अक्षम थीं, उसी तरह का मामला ‘अंधेरे में’ कविता के साथ है। उन्होंने कहा कि नक्सलबाड़ी विद्रोह और उसके दमन तथा साम्राज्यवादी हमले के खिलाफ वियतनाम के संघर्ष ने बाद की पीढि़यों को ‘अंधेरे में’ कविता को समझने के सूत्र दिए। ‘अंधेरे में’ ऐसी कविता है, जिसे सामने रखकर राजनीति और कला तथा विभिन्न कलाओं के बीच के अंतर्संबंधों को समझा जा सकता है।

‘समकालीन जनमत’ के प्रधान संपादक और आलोचक रामजी राय ने कहा कि मुक्तिबोध को पढ़ते हुए हम अंधेरे की नींव को समझ सकते हैं। पहले दिए गए शीर्षक  ‘आशंका के द्वीप अंधेरे में’ में से अपने जीवन के अंतिम समय में आशंका के द्वीप को हटाकर मुक्तिबोध ने 1964 में ही स्पष्ट संकेत दिया था कि लोकतंत्र का अंधेरा गहरा गया है। ‘अँधेरे में’ अस्मिता या म‍हज क्रांतिचेतना की जगह नए भारत की खोज और उसके लिए संघर्ष की कविता है। मुक्तिबोध क्रांति के नियतिवाद के कवि नहीं हैं, वह वर्तमान में उसकी स्थिति के आकलन के कवि हैं। वह अपनी कविता में विद्रोह की धधकती हुई ज्वालामुखियों की गड़गडाहट दर्ज करते हैं। इस देश की पुरानी हाय में से कौन आग भड़केगी, जो शोषण और दमन के ढाँचे को बदल देगी, वह इस सोच और स्वप्न के कवि हैं। सही मायने में वह कविता के होलटाइमर थे।

विचार गोष्ठी का संचालन जसम, कविता समूह के संयोजक आशुतोष कुमार ने किया। इस मौके पर कहानीकार अल्पना मिश्र, कवि मदन कश्यप, कथाकार महेश दर्पण, ज्ञानपीठ के पूर्व निदेशक दिनेश मिश्र, कवि रंजीत वर्मा, युवा आलोचक बजरंग बिहारी तिवारी, वरिष्ठ कवयित्री प्रेमलता वर्मा, शीबा असलम फहमी, दिगंबर आशु, यादव शंभु, अंजू शर्मा, सुदीप्ति, स्वाति भौमिक, वंदना शर्मा, विपिन चौधरी, भाषा सिंह, मुकुल सरल, प्रभात रंजन, गिरिराज किराडू, विभास वर्मा, संजय कुंदन, चंद्रभूषण, इरफान, हिम्मत सिंह, प्रेमशंकर, अवधेश, संजय जोशी, रमेश प्रजापति, विनोद वर्णवाल, कपिल शर्मा, सत्यानंद निरुपम, श्याम सुशील, कृष्ण सिंह, बृजेश, रविप्रकाश, उदयशंकर, संदीप सिंह, रोहित कौशिक, अवधेश कुमार सिंह, ललित शर्मा, आलोक शर्मा, मनीष समेत कई जाने-माने साहित्यकार, बुद्धिजीवी, संस्कृतिकर्मी और प्रकाशक मौजूद थे। धन्यवाद ज्ञापन आलोचक गोपाल प्रधान ने किया। इस मौके पर फोनिम, लोकमित्र और द ग्रुप की ओर से किताबों, फिल्मों के सीडी और कविता पोस्टर के स्‍टॉल भी लगाए गए थे।

सुधीर सुमन राष्ट्रीय सहसचिव, जन संस्कृति मंच द्वारा जारी

कवि-कथाकार महाप्रकाश को जसम की श्रद्धांजलि

नई दिल्ली: मैथिली की प्रगतिशील धारा के चर्चित कवि और कथाकार महाप्रकाश 19 जनवरी, 2013 को हमारे बीच नहीं रहे। दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में उनका फेफड़े और किडनी में संक्रमण का इलाज चल रहा था, वहीं उन्होंने आखिरी सांसें ली।

सहरसा (बिहार) के बनगाँव में 14 जुलाई 1949 को महाप्रकाश का जन्म हुआ था। 1968-69 से उन्होंने लेखन की शुरुआत की थी। 1972 में प्रकाशित उनके काव्य संग्रह ‘कविता संभवा’ की काफी चर्चा हुई थी। यात्री और राजकमल चौधरी के बाद वह मैथिली की प्रगतिशील धारा के अत्यंत महत्वपूर्ण कवि थे। हाल में ही अंतिका प्रकाशन से उनका दूसरा कविता संग्रह ‘समय के संग’ प्रकाशित हुआ था। चांद, अंतिम प्रहर में, इश्तिहार, बोध, हिंसा, जूता हमर माथ प सवार अइछ, पंद्रह अगस्त, शांतिक स्वरूप आदि उनकी महत्वपूर्ण कविताएं हैं। उन्‍होंने कहानियाँ भी खूब लिखीं, लेकिन उनका कोई गम्‍भीर मूल्याँकन नहीं हुआ है। ध्वंस, दीवाल, खाली हौसला, अदृश्य त्रिभुज, बिस्कुट, पाखंड पर्व आदि उनकी चर्चित कहानियाँ हैं। ‘पाखंड पर्व’ में उन्होंने कुलीन मैथिली समाज की जनविरोधी प्रवृत्तियों की आलोचना की है। उनकी कविताओं और कहानियों का अनुवाद हिन्‍दी और बांग्ला में भी हुआ। उन्‍होंने अनुवाद का काम भी किया। मैथिली उपन्यासकार ललित के उपन्यास ‘पृथ्वीपुत्र’ का उनके द्वारा किया गया अनुवाद ‘विपक्ष’ पत्रिका के विशेषांक में प्रकाशित हुआ था। उनकी रचनाओं में मिथिला का व्यापक जीवन नजर आता है। पूँजीवाद के खिलाफ अपनी रचनाओं में वह निरंतर मुखर रहे।

युवा पीढ़ी के रचनाकार महाप्रकाश के जबर्दस्त प्रशंसक रहे। उन्होंने कई नये रचनाकारों को गढ़ने में अहम भूमिका निभाई। वह बहुत अच्छे वक्ता थे। गप्पें करना, संगीत सुनना और आत्मकथा पढ़ना उन्हें खासतौर से पसंद था। वह बेहद स्वाभिमानी और सम्‍वेदनशील थे। इस स्वाभिमान ने ही उन्हें जनसामान्य सा जीवन चुनने में मदद की और सम्‍वेदनशीलता ने प्रगतिशील विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध बनाया। युवा कवि राजेश कमल के अनुसार वह अक्सर दुनिया जहान में घट रही घटनाओं को लेकर फोन करते थे और बताते कि क्या गलत है और क्या सही है। फोन पर वह अपनी कविता या कहानी के बारे में बात लगभग नहीं करते थे।
महाप्रकाश के शव को 19 जनवरी को शाम में लोधी रोड, नई दिल्ली के विद्युत शवदाहगृह में अग्नि के हवाले किया गया। इस मौके पर उनके बेटों और करीबी परिजनों के साथ कहानीकार गौरीनाथ, आलोचक श्रीधरम, कवि रमण, युवा कवि खालिद, भाकपा-माले केंद्रीय कमेटी सदस्य प्रभात कुमार, सुधीर सुमन आदि मौजूद थे।

बिहार की राजधानी पटना में 20 जनवरी को जन संस्कृति मंच के राज्य कार्यालय में महाप्रकाश की स्मृति में शोकसभा हुई, जिसमें वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर, कथाकार अशोक कुमार, शायर संजय कुमार कुंदन, कवि राजेश कमल, प्रतिभा, संतोष सहर, रंजीव, रंगकर्मी संतोष झा और समता राय ने उन्हें श्रद्धांजलि दी।

मातृभाषा, साहित्य और प्रगतिशील विचारधारा तथा नई रचनाशीलता के प्रति अपने गहरे समर्पण के लिए वह हमेशा याद आएंगे। जन संस्कृति मंच की ओर से उन्हें हार्दिक श्रद्धांजलि।

(सुधीर सुमन, राष्ट्रीय सहसचिव, जन संस्कृति मंच की ओर से जारी)

मंटो के नाटक को नहीं दिखाया जाना विडम्‍बनापूर्ण : जसम

Saadat Hasan Manto

नई दिल्‍ली : मंटो को समर्पित भारत रंग महोत्सव में मंटो के ही नाटक को न दिखाया जाना विडम्‍बनापूर्ण है। नियंत्रण रेखा पर जो भी विवाद और तनाव है उसका राजनयिक हल तलाश किया जाना चाहिए, उसका इस्तेमाल देश के अंदर अंधराष्ट्रवादी-साम्प्रदायिक उन्माद भड़काने और लोकतान्त्रिक अधिकारों और अभिव्यक्ति की आजादी पर अंकुश लगाने के लिये नहीं किया जाना चाहिए। मंटो भारत-पाकिस्तान विभाजन की मूर्खता और अतार्किकता को दिखाने वाले तथा साम्प्रदायिक उन्माद का विरोध करने वाले लेखक हैं और दोनों देशों की साझी संस्कृति के प्रतिनिधि हैं। मंटो ने आज से कई गुना अधिक तनाव और साम्प्रदायिक कत्लेआम के दौर में भी अपना विवेक नहीं खोया था। हम उस विवेक के साथ हैं। सांस्कृतिक एकता और प्रगतिशील-सेकुलर मूल्यों के जरिए ही भारत-पकिस्तान की जनता का भविष्य बेहतर हो सकता है। इस बेहतरी की जो सांस्कृतिक लड़ाई है उसमें मंटो की रचनाएँ आज भी मददगार हैं। दोनों देशों की सरकारें जिस तरह के साम्प्रदायिक-युद्धोन्माद की राजनीति का खेल खेलती रहती हैं, हम संस्कृतिकर्मी और कलाकार इसके विरोधी हैं। हम इसे बरदाश्‍त नहीं करेंगे कि इसकी आड़ में मंटो के नाटक के मंचन को रोक दिया जाए। आज के वक्त में मंटो की रचनाओं को याद किया जाना और जरूरी है।

भारत रंग महोत्सव में 19 जनवरी, 2013 को अजोका थियेटर के नाटक न दिखाए जाने के निर्णय के बाद पत्रकारों-बुद्धिजीवियों-संस्कृतिकर्मियों ने इस नाटक का मंचन अपनी पहल पर करवाकर जो पहल की है, उसका हम जन संस्कृति मंच की ओर से स्वागत करते हैं।

(जन संस्कृति मंच की ओर से सुधीर सुमन द्वारा जारी)

आजादी, बराबरी और इंसाफ तथा उसके लिए प्रतिरोध महान जीवन मूल्य है : जन संस्कृति मंच

सुधीर सुमन

नई दिल्ली: हम उस बहादुर लड़की के प्रतिरोध का गहरा सम्मान करते हैं,  जिसने 16 दिसंबर की रात अपनी आजादी और आत्मसम्मान के लिये अपनी जान को दाँव पर लगा दिया और बलात्कारियों द्वारा नृशंस तरीके से शरीर के अंदरूनी अंगों के क्षत-विक्षत कर देने के बावजूद न केवल जीवन के लिये लम्‍बा संघर्ष किया, बल्कि  न्याय की अदम्य इच्छा के साथ शहीद हुई। आजादी, बराबरी और इंसाफ तथा उसके लिए प्रतिरोध महान जीवन मूल्य है, जिसकी हमारे दौर में बेहद जरूरत है। जन संस्कृति मंच लड़की के परिजनों और करोड़ों शोकसंतप्त लोगों की प्रति अपनी संवेदनात्मक एकजुटता जाहिर करता है।

यह गहरे राष्ट्रीय और सामाजिक-सांस्कृतिक शोक की घड़ी है। हम सबके दिल गम और क्षोभ से भरे हुए हैं। हमारे लिये इस लड़की का प्रतिरोध इस देश में स्त्रियों को साथ हो रहे तमाम जुल्मो-सितम के प्रतिरोध की केंद्रीय अभिव्यक्ति रहा है। जो राजनीति, समाज और संस्कृति स्त्रियों की आजादी और बराबरी के सवालों को अभी भी तरह-तरह के बहानों से उपेक्षित कर रही है या उनके प्रति असंवेदनशील है या उनका उपहास उड़ा रही है, उनको यह संकेत स्पष्ट तौर पर समझ लेना चाहिए कि जब स्वतंत्रता, सम्मान और समानता के अपने अधिकार के लिये जान तक कुर्बान करने की घटनाएं सामने आने लगें,  तो वे किसी भी तरह वक्त को बदलने से रोक नहीं सकते।

इस देश में स्त्री उत्पीड़न और यौन हिंसा की घटनाएं जहाँ भी हो रही हैं, उसके खिलाफ बौद्धिक समाज, संवेदनशील साहित्यकार-संस्कृतिकर्मियों और आम नागरिकों को वहाँ खड़ा होना होगा और जाति-सम्‍प्रदाय की आड़ में नृशंस स्त्री विरोधी मानसिकता और कार्रवाइयों को संरक्षण देने की प्रवृत्ति की  मुखर मुखालफत करनी होगी, समाज, प्रशासन तंत्र और राजनीति में मौजूद स्त्री विरोधी सामंती प्रवृत्ति और उसकी छवि को मौजमस्ती की वस्तु में तब्दील करने वाली उपभोक्तावादी अर्थनीति और संस्कृति का भी सचेत प्रतिवाद विकसित करना होगा, यही इस शहीद लड़की के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। अनियंत्रित पूँजी की संस्कृति जिस तरह हिंस्र आनंद की प्रवृत्ति को बढ़ावा दे रही और जिस तरह वह पहले से मौजूद विषमताओं को और गहरा बना रही है,  उससे मुकाबला करते हुए हमें एक बेहतर समाज और देश के निर्माण की ओर बढ़ना होगा।

आज इस देश की बहुत बड़ी आबादी आहत है और वह अपने शोक की सार्वजनिक अभिव्यक्ति करना चाहती है, वह इस दुख के प्रति अपनी एकजुटता जाहिर करना चाहती है, लेकिन उसके दुख के इजहार पर भी पाबंदी लगाई जा रही है। इस देश की राजधानी को जिस तरह पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया गया है, जिस तरह मेट्रो स्‍टेशन बंद किए गए हैं, जिस तरह बैरिकेटिंग करके जनता को संसद से दूर रखने की कोशिश की गई है, वह दिखाता है कि इस देश का शासकवर्ग जनता के शौक से भी किस तरह खौफजदा है। अगर जनता के दुख-दर्द से इस देश की सरकारों और प्रशासन की इसी तरह की दूरी बनी रहेगी और पुलिस-फौज के बल पर इस तरह लोकतंत्र चलाने की कोशिश होगी, तो वह दिन दूर नहीं जब जनता की वेदना की नदी ऐसी हुकूमतों और ऐसे तंत्र को उखाड़ देने की दिशा में आगे बढ़ चलेगी।

सुधीर सुमन, जसम राष्ट्रीय सहसचिव द्वारा जारी