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कभी धूमिल नहीं होगी कुँवर नारायण की स्मृति 

कुँवर नारायण

नई दि‍ल्‍ली : मुक्तिबोध ने उन्हें पसंद किया और उनके दूसरे कविता-संग्रह ‘परिवेश : हम-तुम’ की समीक्षा करते हुए लिखा था कि वह ‘अंतरात्मा की पीड़ित विवेक-चेतना और जीवन की आलोचना’ के कवि हैं।

इससे पहले मुक्तिबोध मस्तिष्काघात के चलते अपने अंतिम समय में दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में लगभग एक महीने तक कोमा में रहे थे।

उसके बाद आसन्न साहित्यिक इतिहास में शायद दूसरी बार उतनी दुखद और भयावह घटना घटी है कि उस समय के मुक्तिबोध के प्रिय युवा कवि और इन दिनों हिंदी के शीर्ष कवियों में अग्रगण्य श्री कुँवर नारायण का 15 नवम्‍बर 2017 को  दिल्ली के एक अस्पताल में मस्तिष्काघात के चलते लम्बे समय तक कोमा में रहने के बाद देहावसान हो गया।

स्तब्ध कर देनेवाली इस मुश्किल घड़ी में हम उनके उत्कृष्ट रचनात्मक और वैचारिक अवदान को समकालीन सन्दर्भों में बेहद प्रासंगिक और मूल्यवान् मानते हुए उनके प्रति हार्दिक श्रद्धांजलि व्यक्त करते हैं और यह संकल्प कि शोक की इस वेला में हम उनकी जीवन-संगिनी श्रीमती भारती नारायण और उनके बेटे अपूर्व नारायण जी के साथ हैं।

हमारा समय बेशक कठिन है, जो कुँवर नारायण की विदाई से और कठिन ही हुआ है। लेकिन जब तक मनुष्यता रहेगी, कविता भी रहेगी और उसमें कुँवर जी के समुज्ज्वल हस्ताक्षर से हमें उसी तरह रौशनी मिलती रहेगी, जैसे कि उन्होंने स्वयं मनुष्यता में यह अविचलित आस्था व्यक्त की थी-

”कहीं कुछ भूल हो
कहीं कुछ चूक हो कुल लेनी देनी में
तो कभी भी इस तरफ़ आते जाते
अपना हिसाब कर लेना साफ़
ग़लती को कर देना मुआफ़
विश्वास बनाये रखना
कभी बंद नहीं होंगे दुनिया में
ईमान के ख़ाते।”

( ‘जन संस्कृति मंच’ की राष्ट्रीय परिषद की ओर से पंकज चतुर्वेदी द्वारा जारी)

वीरेनियत-2 : एक बहुविध कविता गोष्ठी

वीरेन डंगवाल की स्मृति में आयोजि‍त सालाना काव्य-जलसे का संचालन करते आशुतोष कुमार।

नई दि‍ल्‍ली : हरदिलअजीज कवि वीरेन डंगवाल की स्मृति में होने वाले जन संस्कृति मंच के सालाना काव्य-जलसे का यह दूसरा आयोजन था। 29 नवम्बर की शाम 6 बजे से ही श्रोता और कवि हैबिटेट सेंटर, दिल्ली के गुलमोहर सभागार पर जुटाने लगे थे। मनमोहन, शुभा, उज्जवल भट्टाचार्य और दिगंबर जैसे वरिष्ठों के साथ अनुपम, निखिल, सुनीता, कुंदन, आशीष जैसे युवा भी कविता-पूर्व की गहमागहमी भरी बहस में सभागार के बाहर घास के मैदान पर बतकही में मशगूल थे। ठीक 6:30 पर वीरेन डंगवाल पर बने दस्तावेजी सिनेमा का एक अंश दिखाया जाना शुरू हुआ। वीरेन डंगवाल की कवितायें उनकी जुबान से सुनना रससिक्त कर देनेवाला अनुभव तो था ही, इस वीडियो-पाठ ने होने वाले कवि सम्मलेन का एक गहरा पर्यावरण रच दिया।

वीरेन डंगवाल की कविता  के बहुतेरे रंग हैं, उनमें से कई रंग कवि-सम्मलेन में उभरे, चमके, दिपे। उनके समकालीन कवियों की काव्य-भूमि तो उनकी साझे की थी ही, युवा कवियों ने भी अपनी कविताओं की मार्फ़त इस काव्य-भूमि को आपेक्षिक विस्तार दिया।

संयोजक-संचालक आशुतोष कुमार के बुलावे पर सबसे पहले अनुज लुगुन कविता पढने आये। अनुज की कविताओं की अलहदा दुनिया हम श्रोताओं को उन इलाकों तक ले गयी जहां सचमुच रवि की पहुँच नहीं है। एक अलग आँख से दुनिया को भांपती अनुज की कविता हमारे पारंपरिक आस्वाद-बोध को चुनौती देती है।अनुज द्वारा पढी गयी ‘हमारा दुःख, उनका दुःख’ कविता एक रूपक बनकर उभरी, जो दो दुनियाओं के बीच की जगह को ठीक-ठीक पहचानती है।

रुचि भल्ला हिन्दी कविता की दुनिया में अपेक्षाकृत नया नाम हैं, वे गोष्ठी की दूसरी कवि थीं। लगभग बतकही के शिल्प में रची रुचि की कविताओं ने दिखाया कि  रोजमर्रा की जिन्दगी की नगण्य चीजें-बातें कैसे कविता बन जाती हैं। एक कविता में स्वर्णाबाई की नज़र से देखी गयी दिल्ली का रंग यों उभरा- ‘दिल्ली वही है जहां शिंदे साहब टूर पर जाता है’। शरीफे पर लिखी उनकी कविता ने वीरेन डंगवाल की ‘पपीता’ जैसी कविताओं की याद ताजा कर दी। चर्च हिन्दी कविता में कम ही आया है, रुचि ने इलाहाबाद और गोवा के चर्चों की। चर्चा के जरिये श्रोताओं को ‘चर्च के पीछे के उस पेड़’ की याद दिलाई जो कभी किसी चर्च के पीछे था ही नहीं।

तीसरे कवि थे संजीव कौशल जिनकी कविताओं में राजनीतिक रंग साफ़ दिखे। ‘सत्ता की सोहबत बिजूकों को भी नरभक्षी बना देती है’ जैसी पंक्ति इस कठिन-कठोर समय में सत्ता के चरित्र और असर का जायजा लेती है। ‘चूल्हे’ और ‘कठपुतलियाँ’ जैसी कविताओं के सहारे संजीव हमारे वक्त का विद्रूप चेहरा दिखाते हैं, पर तरीका उनका बेहद संवेदनशील था।

अगले कवि महेश वर्मा अपने गहरे संवेदना बिंबों और अपनी अनूठी दार्शनिक नज़र के कारण  सराहे गए। डिस्टोपिक यथार्थ की बारीक समझ वाले संवेदन-बिम्ब मसलन ‘तालाब में उतराती अपनी ही लाश’ श्रोताओं को गहरे परेशान कर गए।

बिहार से आए वरिष्ठ कवि अमिताभ बच्चन की कवितायें जीवन प्रसंगों से कविता बुनने की विलक्षणता से भरी हुई थीं। व्यंग्य, जिसे आचार्यों ने कविता की जान कहा है, से भरी-पूरी अमिताभ जी की कवितायें आख़िर में एक गहरी उदासी छोड़ गयीं। हमारे वक़्त की शिनाख्त करती ये कवितायें एक हल्का कथा ढाँचा रखती हैं जिससे  तादात्मीकरण में बेहद आसानी हुई।

वीरेन डंगवाल के चिर-सखा और हिंदी के अप्रतिम कवि मंगलेश डबराल की कवितायें एक दूसरी, ज़्यादा इंसानी दुनिया की तलाश की कवितायें हैं, ऐसा उन्हें सुनते हुए फिर महसूस हुआ। ‘हमारे देवता’ जैसी कविता देव-लोक को मानुष-लोक में बदलकर समाज के सांस्कृतिक द्वंद्वों को रेखांकित कर गयी। मंगलेश जी के कलम में ही वह ख़ूबी है जो ‘बेटी पलटकर पूछती है/पापा आपने कुछ कहा’ जैसी पंक्ति पूरे काव्य-वैभव के साथ श्रोताओं के  दिलों में चुभ गयी।  अपनी एक गद्य कविता के माध्यम से उन्होंने राज की मुश्किलों व उसके भविष्य की ओर  इशारा किया।

गोष्ठी के आख़िरी कवि बल्ली सिंह चीमा की गजलें हिंदी कविता के छांदस रंग को उकेरने वाली थीं। उर्दू से हिंदी में आकर गजल का  न सिर्फ़ स्वर, बल्कि सँवार भी बदल जाता है,यह महसूस किया गया। जनता से संवाद करने की भाषा और लबों-लहजा इन गजलों की ख़ासियत थी। जैसे –

“कुछ तो किरदार नए मंच पर लाए जाएं
और नाटक को सलीके से निभाया जाए।”

एक और शेर था-” मेन दुश्मन को हारने के लिए लाज़िम है/हर विरोधी को ही दुश्मन न बनाया जाए।”

तीन घंटों तक चली इस बहुविध कविता गोष्ठी में ठसाठस भरे सभागार में मौजूद श्रोताओं की सक्रिय भीगीदारी इसे और समृद्ध बना गयी।

प्रस्‍तुति‍ : मृत्युंजय
संयोजक, कविता समूह, जन संस्कृति मंच

‘दि‍मागी बुखार- बच्‍चों की मौत और वि‍फल स्‍वास्‍थ्‍य तंत्र’ पर व्‍याख्‍यान 7 को  

नई दि‍ल्‍ली : इंसेफेलाइटिस यानी दिमागी बुखार से चार दिनों के भीतर पचास से अधिक बच्चों की मौत ने इस बार पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। जनता के भीतर सबसे ज्यादा गुस्सा उत्तर प्रदेश के मंत्रियों के बयानों से भड़का। यह बीमारी क्या है? इसके कितने प्रकार हैं? देश के कौन से इलाके इससे प्रभावित हैं? विगत 40 वर्षों में इसका समाधान न हो पाने की वजहें क्या हैं? किस तरह महज एक अस्पताल में ही 40 वर्षों में इस बीमारी से 9733 मौतें हुईं? क्यों पूरा तंत्र और सरकार बच्चों की मौतों को सामान्य मौतें बताने के लिए पूरा जोर लगाए रहा? ऐसे तमाम सवालों से संबंधित है इस बार का कुबेर दत्त स्मृति व्याख्यान।

यह बीमारी तो महज एक बानगी है इस देश में जनस्वास्थ्य के प्रति आपराधिक लापरवाही की। ऐसी कई बीमारियों की चपेट में है इस देश की जनता।

इंसेफलाइटिस की बीमारी से हुई बच्चों की मौतों और विफल स्वास्थ्य तंत्र पर छठा कुबेर दत्त स्मृति व्याख्यान देंगे मनोज कुमार सिंह, जो चर्चित युवा पत्रकार रहे हैं, जमीनी रिपोर्टों के लिए मशहूर हैं। गोरखपुर से प्रतिरोध का सिनेमा अभियान शुरू करने वाले मनोज कुमार सिंह वहां की बौद्धिक-सांस्कृतिक जगत की एक महत्वपूर्ण शख्सियत हैं। जन संस्कृति मंच के हालिया राष्ट्रीय सम्मेलन में उन्हें महासचिव की जिम्मेवारी दी गई है। फिलहाल वे गोरखपुर न्यूज लाइन नामक चर्चित वेबपोर्टल चला रहे हैं।

मनोज कुमार सिंह का मानना है कि इंसेफेलाइटिस से मौतों के जो आकंडे सामने आ रहे हैं, वे तो आईसवर्ग की तरह हैं। इन आंकड़ों में जिला अस्पतालों, सीएचसी-पीएचसी और प्राइवेट अस्पतालों में हुई मौतें शामिल नहीं हैं। अब तो यह बीमारी सिर्फ पूर्वांचल तक ही सीमित नहीं रह गई है। इसका प्रसार देश के 21 राज्यों के 171 जिलों में हो चुका है। इस बीमारी के दो प्रकार हैं- जापानी इंसेफलाइटिस और एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिन्ड्रोम। नेशनल वेक्टर बार्न डिजीज कंट्रोल प्रोग्राम के मुताबिक वर्ष 2010 से 2016 तक एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिन्ड्रोम से पूरे देश में 61957 लोग बीमार पड़े, जिसमें 8598 लोगों की मौत हो गई। इसी अवधि में जापानी इंसेफेलाइटिस से 8669 लोग बीमार हुए, जिनमें से 1482 की मौत हो गई। इस वर्ष अगस्त माह तक पूरे देश में एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिन्ड्रोम के 5413 केस और 369 मौतों के आंकड़े आए। जापानी इंसेफेलाइटिस से इसी अवधि में 838 केस और 86 मौत के मामले सामने आए। अभी भी मौतों की सूचनाएं आ ही रही हैं।

इंसेफेलाइटिस के मुद्दे पर मनोज पिछले कई वर्षों से लगातार लिखते रहे हैं।

गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में बच्चों की मौत के सवाल पर जनता के दुख-दर्द और उसके गुस्से के साथ वे अपने वेबपोर्टल के जरिए खड़े रहे, जबकि सरकार और स्वास्थ्य तंत्र के नकारेपन और आपराधिक संवेदनहीनता को ढंकने की हरसंभव कोशिश की जाती रही। आइए जनता के सच के साथ, उसकी व्यथा के साथ निर्भीकता से खड़े पत्रकार के अनुभव को हम सुनें। मौत बांटने वाले संवेदनहीन तंत्र के विरुद्ध जीवन के लिए विभिन्न स्तरों पर जारी संघर्षों में से एक संघर्ष के साझीदार बनें।

कार्यक्रम की रूपरेखा-

तारीख- 7 अक्टूबर 2017, समय- 5 बजे शाम

स्थान- राजेंद्र भवन, दीनदयाल उपाध्याय मार्ग, आईटीओ मेट्रो स्टेशन के पास, दिल्ली

प्रेमचंद और बच्चे

प्रेमचंद की कहानि‍यों पर आधारि‍त बच्चों के बनाए चित्र

प्रेमचंद की कहानि‍यों पर आधारि‍त बच्चों के बनाए चित्र

प्रेमचंद जयंती के अवसर पर जगह-जगह कार्यक्रम हुए और उनमें आम लोगों खासकर बच्‍चों की जो भागेदारी रही, वह सुखद संकेत है। जरूरत इसी बात की है कि‍ हम अपने लेखकों, कलाकारों, वैज्ञानि‍कों, चिंतकों और अन्‍य महापुरुषों के माध्‍यम से लोगों से जुड़ें। अगर हम ऐसा कर पाए, तो तब का समाज, आज से बेहतर ही होगा।

प्रेमचंद जयंती के अवसर पर आयोजि‍त दो कार्यक्रमों में भाग लेने का अवसर लेखक मंच प्रकाशन को भी मि‍ला। 31 जुलाई को वसुंधरा, गाजि‍याबाद स्थि‍त जनसत्ता अपार्टमेंट में जन संस्कृति मंच की ओर से मशाल-ए-प्रेमचंद का आयोजन किया गया। इसमें प्रेमचंद के साहि‍त्‍य और जीवन पर वि‍शेष प्रस्‍तुति‍ हुई। इसके साथ ही प्रेमचंद के सपनों का भारत विषय पर परिचर्चा हुई, प्रेमचंद की कथा पर एक नाट्य प्रस्तुति, मशहूर रंगमंडली ‘संगवारी’  ने जनगीत गाए, सत्यजित राय की फ़िल्म ‘सद्गति’ का प्रदर्शन हुआ और एक छोटा-सा पुस्तक मेला भी लगा। इसमें लेखक मंच प्रकाशन की ओर से भी स्‍टाल लगाया गया। कि‍ताबें देखने और खरीदने में बच्‍चों और बड़ों ने रुचि‍ दि‍खाई।

बुक स्टाेल पर कि‍ताब पढ़ती परी

बुक स्टाेल पर कि‍ताब पढ़ती परी

कि‍ताबों को उलटते-पलटते करीब पांच वर्ष की परी ने चहकते हुए कहा कि‍ आपकी कि‍ताबें तो बहुत अच्‍छी हैं। कुछ क्षण बाद फि‍र बोली- क्‍या में क्या कि‍ताब पढ़ सकती हूं। हमने उसे कुर्सी दे दी। वह कुर्सी पर बैठकर कि‍ताबों के पन्‍ने पलटने लगी। उसकी सहेली तरु ने भी कहा- अंकल, मैं भी कि‍ताब पढ़ सकती हूं। फि‍र दोनों सहेलि‍यां कि‍ताबों के पन्‍ने पलटते रहीं।

इस अवसर पर प्रेमचंद की कहानि‍यों पर आधारि‍त बच्चों के बनाए चित्रों‍ की प्रदर्शनी तो इस आयोजन की एक खास उपलब्‍धि‍ रही। इससे बच्‍चों की कलात्मकता तो सामने आई ही, इस बहाने उनका प्रेमचंद साहि‍त्‍य से भी परि‍चय हुआ।

शाइनिंग स्टार में कार्यक्रम का आनंद लेते बच्चे

शाइनिंग स्टा्र स्कूल में कार्यक्रम का आनंद लेते बच्चे

2 अगस्त को शाइनिंग स्टार स्कूल, रामनगर में प्रेमचंद जयंती के अवसर पर कार्यक्रम का आयोजन कि‍या गया। वहां भी बच्‍चों के बीच जाने के अवसर मि‍ला। बच्‍चों ने प्रेमचंद की कहानी कफन का मंचन कि‍या। बहुत से बच्‍चों ने प्रेमंचद की कहानि‍यां सुनाईं और उनके जीवन और साहि‍त्‍य के बारे में अपने वि‍चार व्‍यक्‍त कि‍ए। दो छात्रों  ने तो प्रेमचंद की दो कहानि‍यों को गढ़वाली और कुमांउनी में रूपांतरि‍त कर सुनाया। स्‍कूल के नि‍देशक डीएस नेगी जी ने बताया कि‍ बच्‍चों ने यह सारी तैयारी तीन-चार दि‍न में ही की है। जि‍न छात्रों  ने गढ़वाली और कुमाउनी में रूपांतरण कि‍या है, उन्‍हें आधे घंटे पहले ही कहानि‍यां दी गई थीं। उन्‍होंने एक बार कहानी को पढ़ा और फि‍र बि‍ना देखे, बि‍ना कि‍सी रूकावट या घबराहट के पूरी कहानी सुना दी।

यहां लगाए गए बुक स्टाल में भी बच्चों ने अपने लि‍ए कि‍ताबें पसंद कीं।

डॉ डीडी पन्त स्मारक बाल विज्ञान खोजशाला, बेरीनाग, उत्तराखंड में 31 जुलाई को प्रेमचंद जयंती समारोह हुआ। यहां हम तो नहीं जा पाए, लेकि‍न यहां की रि‍पोर्ट भी उत्‍साहजनक है।

डॉ डीडी पन्त स्मारक बाल विज्ञान खोजशाला में कार्यक्रम प्रस्तुत करते बच्चे

डॉ डीडी पन्त स्मारक बाल विज्ञान खोजशाला में कार्यक्रम प्रस्तुत करते बच्चे

प्रेमचंद जयंती के अवसर पर 10 से ज्यादा विद्यालयों के करीब 125 बच्चों ने पूरे जोशोखरोश से विभिन्न कार्यक्रमों में हिस्सा लिया। 68 बच्चों द्वारा प्रेमचंद की कहानियों पर बनाए गए चित्रों की प्रदर्शनी लगाई गई। दो कहानियों- ‘दो बहनें’ और ‘राष्ट्र का सेवक’ का मंचन किया गया। छह बच्चों ने कहानियों का पाठ किया। मगर सबसे प्रभावशाली था रा.बा.इ.का. बेरीनाग की कक्षा 6 की छात्रा भावना द्वारा ‘ठाकुर का कुआं’ कहानी का स्वअनूदित कुमांउनी पाठ। इन सब के अलावा कई शिक्षकों ने भी बच्चों का उत्साहवर्धन किया।समारोह का समापन कहानी ‘सद्गति’ पर सत्यजित रे निर्देशित फिल्म से किया गया।

साथि‍यो, जन संस्कृति मंच की ओर से प्रेमचंद  जयंती पर जनसत्ता अपार्टमेंट, वसुंधरा में आयोजित कार्यक्रम के बारे में गौरव सक्सेनाजी ने सुखद जानकारी भेजी है—

prem chand

31 जुलाई को प्रेमचंद जयंती पर जनसत्ता अपार्टमेंट, वसुंधरा में आयोजित ‘मशाल-ए-प्रेमचन्द’ कार्यक्रम में कोठारी इंटरनेशनल स्कूल, नॉएडा ने भी भागीदारी की। इस कार्यक्रम के तहत विद्यालय में बच्चों को प्रेमचंद की कहानियां सुनाई गईं। बच्चों को कहानी के आधार पर पोस्टर बनाने के लिए प्रेरित किया गया। इस कार्यक्रम में हिंदी विभाग की अध्यापिकाओं (श्रीमती गीता शर्मा, श्रीमती रश्मि सिन्हा,  श्रीमती पंकजा जोशी) ने पूरे उत्साह से साथ भागीदारी की। हफ्तेभर चले इस कार्यक्रम के अंत में मन को हर लेने वाले तीस पोस्टर मिले। सबसे ज्यादा पोस्टर ईदगाह और नन्हा दोस्त पर बनाए गए। पंच परमेश्वर पर भी  बेहद सुन्दर पोस्टर बनाए गए। बच्चों को प्रेमचन्द तक और प्रेमचन्द को बच्चों तक लाने की इस अनूठी पहल का हिस्सा बनना बच्चों और विद्यालय के लि‍ए सुखद अनुभव रहा।

विद्यालय प्रबंधन द्वारा इस पहल को सराहा गया और भविष्य में इस तरह के आयोजन करते रहने व भागीदारी के लिए प्रेरित किया गया। विद्यालय की ओर से गौरव सक्सेना इस कार्यक्रम का हिस्सा बने। अगले वर्ष प्रेमचन्द जयंती को विद्यालय में हर्षोउल्लास के साथ मानाने का प्रण किया गया।

मार्केज को जन संस्कृति मंच की श्रद्धांजलि

ESPAÑA GARCÍA MÁRQUEZ

नई दि‍ल्‍ली : 18 अप्रैल 2014 को लातिन अमरीका के अद्भुत किस्सागो गैब्रियल गार्सिया मार्केज ने 87 साल की उम्र में हमसे विदा ली। उनका कथा संसार लातिन अमरीका के देशों के पिछड़े माने जाने वाले समाजों की जिंदगी की समझ के साथ ही इस समाज के दुख-दर्द, हिंसा, असमानता, आवेग और गतिशीलता से पूरी दुनिया को बावस्ता कराता है।

6 मार्च 1927 को कोलम्बिया के छोटे से शहर आर्काटका में जन्मे गैब्रियल खोसे द ला कन्कर्डिया गार्सिया मार्केज का यह शहर 20वीं सदी की शुरुआत में दुनिया के नक्शे पर भीषण औपनिवेशिक लूट के नाते दिखा। यही शहर और उसके अनुभव बाद में मार्केज के रचना संसार के बीज बने। ‘क्रानिकल्स ऑफ ए डेथ फोरटोल्ड’, ‘लव इन द टाइम ऑफ कॉलरा’, ‘ऑटम ऑफ द पैट्रियार्क’, ‘वन हंड्रेड इयर्स ऑफ सॉलीट्यूड’ आदि मार्केज के नामी गिरामी उपन्यास हैं। वास्तविक घटनाओं को मिथकों के साथ जबर्दस्त ढंग से गूँथ देने की उनकी क्षमता ने उन्हें विश्वस्तर पर ऐसा उपन्यासकार बना दिया जिसके विरोधियों को भी उसका सम्मान करना पड़ता था।

1982 में उनको साहित्य के नोबल सम्मान से नवाजा गया। सम्मान समारोह के मौके को उन्होंने साम्राज्यवाद-विरोध के मंच के रूप में बदल दिया। इस मौके पर बोलते हुए उन्होने न सिर्फ लातिन अमेरिकी जमीन पर अंग्रेजी उपनिवेशवाद की क्रूरताओं का जिक्र किया, बल्कि अमरीका और यूरोप के कॉर्पोरेट घरानों द्वारा इस इलाके में की जा रही लूट और भयानक दमन को भी बेनकाब किया। उन्होने साफ-साफ कहा कि उनकी कहानियाँ गायब हुए लोगों, मौतों और राज्य प्रायोजित नरसंहारों के बारे में हैं जो कॉर्पोरेट हितों के लिए रचे जाते हैं।

मार्केज को याद करते हुए श्रद्धांजलियों में पीली तितलियों, लाल चींटियों, चार साल ग्यारह हफ्ते दो दिन चली बारिश आदि मिथकीय कथातत्त्वों का जिक्र तो काफी हो रहा है, पर उनकी इस शैली के पीछे की असलियत पर निगाह अपेक्षाकृत कम ही टिकती है। मार्केज के सामने एक पूरी ढहा दी गई सभ्यता थी, जिसे उन्होंने भोगा और महसूस किया था। मार्केज के नाना गृहयुद्धों में भाग ले चुके थे और नानी जीवन की ‘असंभव’ किस्म की कहानियाँ सुनाया करती थीं। शायद इतिहास की अकादमिक व्याख्या की जड़ता से अलग पूरी हकीकत बताने की छटपटाहट ही मार्केज को उस शिल्प तक ले गई जिसे पश्चिमी अकादमिक जन ‘जादुई यथार्थवाद’ कहते हैं। इतिहास की वर्तमान धारणा से पहले अन्य किस्म की अवधारणाएं विभिन्न समाजों में रही आई हैं। मार्केज ने इन धारणाओं को भी अपने बयान के लिए चुना।

लातिन अमरीका की जमीन 20वीं सदी में समाजवाद के नए प्रयोगों के लिए जानी गई। फिदेल कास्त्रो इस आंदोलन के प्रतीक पुरुष बने। ठीक ऐसे ही लातिन अमरीकी देशों की जमीन से पुराने यथार्थवाद को बदलने-विकसित करने वाले ढेरों रचनाकार पैदा हुए, जिनकी अगुवाई मार्केज ने की। संयोग से ज्यादा ही है कि फिदेल, मार्केज के उपन्यासों के पहले कुछ पाठकों में शुमार हैं। दोनों ही वामपंथ की लड़ाइयों को अलग-अलग मोर्चों पर विकसित करने वाले योद्धा हैं। मार्केज की प्रतिबद्धताएं हमेशा ही वामपंथ के साथ रहीं। वेनेजुएला, निकारागुआ और क्यूबा के वाम आंदोलनों के साथ उनके गहन रिश्ते थे। अनायास नहीं कि उनकी रचनाशीलता के अमरीकी प्रसंशक उनके वामपंथी होने को कभी पचा नहीं पाये।

हम तीसरी दुनिया के लोग औपनिवेशिक विरासत के चक्के तले पिसने को बखूबी समझते हैं, पश्चिमी आधुनिकता के साथ ही अलग तरह का देशज इतिहास-बोध हमें भी हासिल है, ऐसे में मार्केज अपनों से ज्यादा अपने लगते हैं। एक पूरी सभ्यता का बनना और उसका नष्ट होना हमारे अपने देश-काल में भी धीरे-धीरे घटित होता जा रहा है। हम भी मिथकों के औजार से यथार्थ को और बेहतर तरीके से और संपूर्णता में देख सकते हैं।

आज जब हमारे देश में अमरीकी तर्ज पर ही स्मृतिहीनता और फर्जी इतिहासबोध लादा जा रहा है, तब मार्केज के उपन्यास ‘वन हंड्रेड इयर्स ऑफ सॉलीट्यूड’ के आखिर हिस्से के एक वर्णन की याद बेहद प्रासंगिक है। भारी वर्षा के बाद कत्ल कर दिये गए 3000 हड़ताली मजदूरों की स्मृति लोगों के दिमाग से धुल-पुंछ जाती है। अकेले खोसे आर्कादियों सेगुंदो इस बात को याद है और वह लोगों से इस बावत बात करता है पर लोग भूल चुके हैं।

ऐसी स्मृतिहीनता को दर्ज करना और स्मृतिहीन बनाने वाली ताकतों, व्यवस्थाओं, कॉर्पोरेटों के खिलाफ प्रतिरोध रचना ही मार्केज को सही श्रद्धांजलि होगी !

जन संस्कृति मंच दुनिया की जनता के इस दुलारे कथाकार को सलाम करता है।

किताब और बच्‍चे : अनुराग

children book fair

बाल पुस्तंक मेले में किताबें पसंद करते बच्चे ।

अकसर यह बात कही जाती है कि बच्चे पाठ्यपुस्तकों के अलावा और कोई किताब पढऩा नहीं चाहते हैं, और अमूमन अभिभावक भी बच्चों को पाठ्यपुस्तकों से इतर साहित्य, विज्ञान, कला, रंगमंच आदि विभिन्न विषयों से संबंधित किताबें खरीदकर नहीं देते। नीतिखंड-तीन, इंदिरापुरम, गाजियाबाद के सेंट्रल पार्क में रेजिस्टेंस कैफे, जन संस्कृति मंच और जेसी बोस विज्ञान संस्थान की ओर से 18 नवंबर, 2013 को एक ‘बाल पुस्तक मेले’ का आयोजन किया गया। इसमें बच्चों ने उत्साह के साथ भाग लिया और अपनी रुचि की किताबें खरीदीं।

मेला केवल पांच-छह घंटे के लिए लगाया गया था। इसके बावजूद करीब डेढ़ सौ बच्चे और उनके अभिवाभक आए। कुछ बच्चों ने किताबें खरीदने के अलावा वहां बैठकर पढ़ीं भी। बच्चों के उत्साह को देखकर कहीं से भी नहीं लगा कि उन्हें किताबें पसंद नहीं और वे किताबों से नफरत करते हैं, बल्कि इससे इस धारण को बल मिला कि बच्चों और किताबों के बीच की दूरी मिटाने के लिए बड़ी संख्या में इस तरह के आयोजन करने की जरूरत है।

पुस्तक मेले में एक करीब छह साल का बच्चा किताब को पकड़े जोर-जोर से हंस रहा था। पन्ने पलटते जाता और हंसता जाता। उसकी हंसी और व्यवहार से सभी का ध्यान उसकी ओर आकर्षित हो गया। पास खड़े एक व्यक्ति ने पूछा कि कौन-सी क्लास में पढ़ते हो। उसने जवाब दिया कि फस्र्ट में। उससे पूछा गया कि पढ़ना आता है। उसने ‘न’ में सिर हिला दिया और फिर से पन्ने पलटते हुए हंसने लगा।

गौर किया कि वह पन्ने पलटते हुए उनमें बने चित्रों को देखकर कहानी बना रहा है। पन्ना पलटते जाता और कहानी आगे बढ़ती जाती। किताब में क्या लिखा है, उससे उसे कोई मतलब नहीं था। पंद्रह-बीस पेज की उस किताब को पूरी करने के साथ ही उसने अपनी कहानी भी पूरी कर ली। क्या इस घटना को देखकर अब भी यही कहा जाए कि बच्चों की पढऩे में कोई रुचि नहीं है। वास्तविकता यह है कि किताबें बच्चों को कल्पना के अनोखे संसार में ले जाती हैं। वे जहां जाना चाहते हैं, बिना किसी प्रतिबंध के जाते हैं। वे जो करना चाहते हैं, बिना किसी रोक-टोक के करते हैं। कहने का मतलब यह है कि किताबें बच्चे को कल्पनाशील बनाती हैं, और कोई भी मौलिक काम करने के लिए कल्पनाशीलता पहली शर्त है। शिक्षा और अन्यबातें बाद कीं।

किताबें शिक्षक की भूमिका भी निभाती हैं। वे बच्चे को घर बैठे साहित्य और ज्ञान-विज्ञान से परिचित कराती हैं। उन्हें हिमालय पर लेकर जाती है और अमरीका व फ्रांस भी। अंतरिक्ष की सैर कराती हैं, तो समुद्र की गहराई में गोता भी लगवाती हैं। किताबें तो इतनी अच्छी दोस्त हैं कि कभी लड़ती-झगड़ती भी नहीं।

मेले का एक और उदाहरण। एक बच्चा आया और उसने एक किताब उठाकर पूछा कि यह कितने की है? बताया कि दस रुपये की। इससे सस्ती नहीं है? उसने अगला सवाल किया। हां है, चार रुपये की। इससे सस्ती भी है क्या? इससे कम कीमत की कोई किताब थी नहीं। वह मायूस हो गया। उससे कहा कि वह अपनी मम्मी-पापा से किताब दिलाने के लिए कहे। वह बोला कि पापा मना कर देंगे। उसे समझाया कि आप और भी बहुत-सी चीजें दिलाने के लिए पापा से जिद करते होंगे। जब आपको किताब पढऩा अच्छा लगता है, तो इसके लिए भी पापा से कहो। बात उसकी समझ में आ गई और वह पापा को बुलाने चला गया।

अपनी पसंद-नापसंद बच्चों पर थोपनी नहीं चाहिए, और न ही पहले से ही कोई धारणा बनाने की जरूरत है। बच्चों को किताबों से दोस्ती करने दें। निश्चित तौर से इससे बच्चों की बौद्धक क्षमता तो बढ़ेगी ही, साथ ही एक बेहतर और संवेदनशील नागरिक बनने में भी मदद मिलेगी।

बड़ों ने भी ली पुस्त‍क खरीदने में रुचि।

बड़ों ने भी ली पुस्त‍क खरीदने में रुचि।

 फोटो : विनोद उप्रेती

परमानंद श्रीवास्तव को जन संस्कृति मंच की श्रद्धांजलि

परमानंद श्रीवास्तव

परमानंद श्रीवास्तव

नई दि‍ल्‍ली : सुप्रसिद्ध आलोचक परमानंद श्रीवास्तव ( 1935-2013) का 5 नवम्बर 2013 को गोरखपुर में 78 वर्ष की आयु में निधन हो गया। आधी सदी से भी ज़्यादा के अपने रचनात्मक जीवन में उन्होंने आलोचना की एक दर्जन पुस्तकें लिखीं। ‘नयी कविता का परिप्रेक्ष्य’(1965), ‘हिन्दी कहानी की रचना प्रक्रिया’ (1965), ‘कवि-कर्म और काव्य-भाषा’ (1975), ‘उपन्यास का यथार्थ और रचनात्मक भाषा’ (1976), ‘जैनेन्द्र के उपन्यास’ (1976), ‘समकालीन कविता का व्याकरण’ (1980), ’समकालीन कविता का यथार्थ’ (1988). ‘शब्द और मनुष्य’ (1988), ‘उपन्यास का पुनर्जन्म’(1995), ‘कविता का यथार्थ’(1999), ‘कविता का उत्तर जीवन’ (2005), ‘दूसरा सौंदर्यशास्त्र क्यों?’(2005) उनकी आलोचना संबंधी पुस्तकें हैं। उनके छः कविता संग्रह हैं- ‘उजली हँसी के छोर पर’( 1960), ‘अगली शताब्दी के बारे में’ (1981), ‘चौथा शब्द’ (1993),‘एक अनायक का वृत्तांत’ (2004), ‘प्रतिनिधि कवितायें’(2008) और  ‘इस बार सपने में ‘(2008)। ‘मेरे साक्षात्कार’ शीर्षक से उनके साक्षात्कारों की पुस्तक 2005 में प्रकाशित हुई। उनके दो निबंध संग्रह ‘अँधेरे कुँए से आवाज़’ और ‘सन्नाटे में बारिश’ क्रमशः 2005 और 2008 में प्रकाशित हुए। उन्होंने पाब्लो नेरुदा की 70 कविताओं का अनुवाद किया और साहित्य अकादमी से निराला और जायसी पर उनके दो मोनोग्राफ प्रकाशित हुए। साहित्य अकादमी से ही ‘समकालीन हिन्दी कविता’ और ‘समकालीन हिन्दी आलोचना’ के संचयन उनके सम्पादन में क्रमशः 1990 और 1998 में निकले। काफी समय तक वे ‘आलोचना’ पत्रिका से जुड़े रहे, पहले नामवर सिंह के सम्पादक रहते हुए- उनके साथ सह-सम्पादक के रूप में, फिर सम्पादक के बतौर और इस दरम्यान दोनों आलोचकों ने इस पत्रिका को रचना और विचार की एक समर्थ और अग्रणी पत्रिका के रूप में निखार दिया।

परमानंदजी कविता के मर्मज्ञ आलोचक ही नहीं थे, बल्कि कहना चाहिए कि उन्होंने कविता के जीवन को आखिरी हद तक जा कर देखने का मिजाज़ विकसित किया था, कविता के जीवन को ही नहीं उसके उत्तर-जीवन को, उसके पुनर्जन्म को भी। वे कविता ही नहीं, बल्कि समूचे सृजन की उत्तर-जीविता को एक ऐसे समय में रेखांकित कर रहे थे, जब इतिहास, कर्ता, कला, साहित्य और सृजन सबके अंत की घोषणाएँ हो रही थीं। भारतीय परिप्रेक्ष्य में इस परिघटना के कुछ अन्य आयाम भी थे। ‘कविता का उत्तर-जीवन’ शीर्षक पुस्तक के पूर्वकथन में वे लिखते हैं- ‘देखते-देखते कविता को सस्तेपन की ओर,  भद्दी तुकबंदियों की ओर और अश्लील मनोरंजन तक सीमित रखने का जो दुश्चक्र साम्प्रदायिक ताकतों के एजेंडे पर है,  उसे देखते हुए भी कहा जा सकता है कि कविता की जीवनी शक्ति असंदिग्ध है। यही समय है कि ग़ालिब, मीर, दादू, कबीर भी हमारे समकालीन हो सकते हैं।’

कविता के श्रेष्ठ आलोचक और भी रहे और हैं, लेकिन कविता को एक असमाप्त जीवंत-प्रक्रिया के रूप में देखना समझना और उससे डूब कर प्यार करना परमानंद जी का अपना निराला रास्ता था। उन्‍होंने कविता के अर्थ, कविता में बहते समय, कविता और समाज के रिश्ते, कविता और पाठक के बीच संवाद पर लगातार विचार किया और उसे जीवनानुभूति और जीवन-ज्ञान के एक समानांतर संसार की तरह समझा। काव्यभाषा पर उनकी गहरी पकड़ थी, लेकिन नयी कविता के संस्कार में दीक्षित आलोचकों की तरह उन्होंने उसे एकमात्र या सर्वोपरि निकष नहीं बनाया। भक्ति-काल से लेकर बिलकुल अभी तक की कविता पर उन्होंने लिखा। हिन्दी कविता में जितने कवियों पर उन्होंने लिखा, शायद अन्य किसी आलोचक ने नहीं और जिन पर उन्होंने लिखा उनमें समकालीन कविता के नव्यतम हस्ताक्षर तक शामिल हैं। उपन्यास और कहानी पर लिखते हुए भी वे बराबर नव्यतम पीढी़ के रचना संसार से रिश्ता जोड़े रहे। स्त्री जीवन पर केन्द्रित और खुद स्त्रियों द्वारा लिखे साहित्य को उन्होंने ख़ास तौर पर रेखांकित किया और स्त्री रचनाशीलता की अपनी अलग शख्सियत को महत्त्व दिया। अनामिका, गगन गिल, सविता सिंह, नीलेश रघुवंशी, अनीता वर्मा, कात्यायनी या तेजी ग्रोवर, इन कवयित्रियों के काव्यस्वर में समवेत क्या है और इनकी विशिष्टताएं क्या हैं, उन्हें लक्षित करना उन्होंने ज़रूरी समझा। परमानंद जी ने आधुनिक भारतीय कविता के बुनियादी सेक्युलर चरित्र का बारम्बार रेखांकन करते हुए मराठी, बांग्ला, मलयालम, उडिया, असमिया, पंजाबी, कन्नड़ आदि भाषाओं की समकालीन रचनाशीलता को भी सामने रखा।

उनके जीवन में सादगी और खुलापन तो था ही, साम्प्रदायिकता और जन-विरोधी शासकीय नीतियों के खिलाफ एक नागरिक के बतौर वे लगातार मुखर रहे। पूर्वी उत्तर-प्रदेश के नाभि-केंद्र गोरखपुर में रहते हुए सेक्युलर और प्रगतिशील बौद्धिक दायरे के निर्माण में कई दशकों से उनकी एक प्रमुख भूमिका रही और यह कार्य आसान कतई न था। वाद- विवाद, सहमति-असहमति को उन्होंने कभी भी व्यक्तिगत नहीं माना और हरदम उसे वैचारिक दायरे की ही चीज़ समझा। उन्होंने लिखा है, ‘कविता शब्दों में या शब्दों से लिखी ज़रूर जाती है पर साथ ही अपने बाहर या आसपास वह जगह भी छोड़ती चलती है जिसे पाठक अपनी कल्पना और समय के अनुरूप भर सकता है।’ परमानंद श्रीवास्तव की आलोचना के बारे में भी बहुत हद तक यही बात कही जा सकती है।

परमानंद जी का जाना साहित्य की दुनिया में एक बड़े खालीपन की तरह लगता है। नयी रचनाशीलता को इस खालीपन को भरने की चुनौती और दायित्व को उठाना होगा।

(सुधीर सुमन, राष्ट्रीय सह-सचिव, जन संस्कृति मंच की ओर से जारी)   

युवा रंग निर्देशक प्रवीण कुमार गुंजन पर पुलिसिया हमले की निंदा

नई दिल्ली: जन संस्कृति मंच देश के प्रतिभावान युवा रंग निर्देशक प्रवीण कुमार गुंजन की बिहार के बेगुसराय में नगर थाना प्रभारी द्वारा बर्बर पिटाई की कठोरतम शब्दों में निंदा करता है और दोषी पुलिस अधिकारी की बर्खास्तगी की माँग करता है तथा इस बर्बर पुलिसिया हमले के खिलाफ आंदोलनरत बेगूसराय के संस्कृतिकर्मियों के प्रति अपनी एकजुटता का इजहार करता है। एनएसडी से पासआउट प्रवीण कुमार गुंजन ने निर्देशन की शुरुआत ‘अंधा युग’ से की थी। उसके बाद उन्होंने मुक्तिबोध की कहानी ‘समझौता’ पर आधारित नाटक का निर्देशन किया, जो बेहद चर्चित रहा। उन्होंने शेक्सपियर के मशहूर नाटक ‘मैकबेथ’ का भी निर्देशन किया। प्रवीण द्वारा नाटकों का चुनाव और बेगुसराय जैसी जगह को अपनी गतिविधियों का केंद्र बनाना भी अपने आप में महत्वपूर्ण है। भारत के राष्ट्रपति द्वारा अनुमोदित संगीत नाटक कला अकादमी का बिस्मिल्ला खाँ युवा पुरस्कार और बिहार सरकार का भिखारी ठाकुर युवा रंग सम्मान पा चुके इस युवा रंग निर्देशक के ऊपर पुलिस अगर बेवजह इस तरह बर्बर कार्रवाई का दुस्साहस कर सकती है, तो कल्पना की जा सकती है कि इस देश की आम जनता और आम संस्कृतिकर्मियों के साथ उसका किस तरह का रवैया रहता होगा।

बेगूसराय से मिली सूचना के अनुसार प्रवीण कुमार गुंजन सोमवार की रात रिहर्सल के बाद रेलवे स्टेशन के पास स्थित चाय की दुकान के पास अपनी बाइक लगाकर साथी रंगकर्मियों के साथ चाय पी रहे थे। चाय पीने के बाद वे लौटने ही वाले थे, तभी थाना प्रभारी अपने गश्ती दल के साथ पहुँचे और उनकी बाइक पर तीन सवारी होने का इल्जाम लगाया। उन्होंने कहा कि बाइक जब चल ही नहीं रही है, तो तीन सवारी कैसे हो गई? गुंजन की खूबसूरत दाढ़ी, उनकी कैजुअल ड्रेस और उनके साथ कुछ रंगकर्मी युवकों का होना और पुलिसिया आतंक के आगे उनका न दबना, इतना काफी था बिहार पुलिस के लिए। थाना प्रभारी ने उन पर अपराधी होने का आरोप लगाया और उन्हें पीटना शुरू कर दिया। गुंजन ने उससे यह भी कहा कि वह अपने एसपी और जिलाधिकारी से फोन करके बात कर ले, लेकिन उसने एक नहीं सुनी और उनकी पिटाई जारी रखी।

मंगलवार 8 अक्टूबर को जब  फैक्ट्स, जसम, आशीर्वाद रंगमंडल, नवतरंग से जुड़े रंगकर्मियों समेत बेगूसराय के तमाम साहित्यकार-संस्कृतिकर्मियों ने इसका प्रतिवाद किया, तो जिला प्रशासन ने थाना प्रभारी को लाइन हाजिर किया। हालाँकि यह भी सूचना मिल रही है कि पुलिस अपने बचाव में प्रवीण और उनके साथियों पर फर्जी मुकदमा दर्ज करने की तैयारी कर रही है। हम इस तरह की संभावित साजिश का पुरजोर वि‍रोध करते हैं और बिहार सरकार से यह माँग करते है कि वह तत्काल थाना प्रभारी की बर्खास्तगी की कार्रवाई करे, ताकि पुलिसकर्मियों को यह सबक मिले कि अगर वे बेगुनाहों पर जुल्म करेंगे, तो उनके खिलाफ भी सख्त कार्रवाई हो सकती है।

प्रवीण कुमार गुंजन की बर्बर पिटाई ने एक बार फिर से पुलिस राज के खिलाफ मजबूत जन प्रतिवाद की जरूरत को सामने लाया है। उन पर किए गए हमले का सही जवाब यही होगा कि देश और बिहार के संस्कृतिकर्मी सख्त पुलिस राज की वकालत करने वाली और पुलिसिया बर्बरता को शह देने वाली राजनीतिक शक्तियों, सरकारों और विचारों का भी हरसंभव और हर मौके पर अपनी कलाओं के जरिए विरोध करें। देश में बढ़ते निरंकुश पुलिसिया राज के खिलाफ सांस्कृतिक प्रतिवाद वक्त की जरूरत है।

(सुधीर सुमन, राष्ट्रीय सहसचिव, जन संस्कृति मंच द्वारा जारी)

जीवन का रीटेक हैं शेखर जोशी की कविताएं : प्रो. राजेन्द्र कुमार

संगोष्ठी‍ में आशुतोष कुमार, शेखर जोशी और राजेन्द्र कुमार।

संगोष्ठी‍ में आशुतोष कुमार, शेखर जोशी और राजेन्द्र कुमार।


इलाहाबाद : इलाहाबाद के साहित्यिक बिरादरी के सबसे खास पुरनिये शेखर जोशी पर जन संस्कृति मंच (कविता समूह) और परिवेश द्वारा बहुत दिन बाद इलाहाबाद वापस आने पर 20 जुलाई 2013 को संगोष्ठी का आयोजन किया गया। पर ‘नई कहानी के चर्चित कहानीकार शेखर जोशी के बजाय चर्चा के केन्द्र में था शेखर जोशी का कवि रूप जो उनके कहानीकार रूप में विकास का एक हद तक साक्षी भी था’। यह बात उनके प्रथम कविता संग्रह ‘न रोको उन्हे शुभा’ की चर्चा पर प्रायः सभी वक्ताओं द्वारा संज्ञान में ली गई। संग्रह की भूमिका कवि वीरेन डंगवाल द्वारा लिखी गई है और लेखक द्वारा उसका समर्पण कवि हरीशचन्द्र पांडेय के लिए किया गया है। अस्सी पार शेखर जी को अपने बीच पाकर जहाँ शहर का साहित्यिक समाज गदद था वहीं इलाहाबाद के छूटने का दर्द कई बार शेखर जी की आँखों से बाहर आने को आतुर दिखा।

संगोष्ठी में प्रथम वक्ता के रूप में शहर इलाहाबाद के मशहूर कवि हरीशचन्द्र पांडेय को सुनना बेहद महत्त्वपूर्ण रहा। अपने सधे हुए वक्तव्य में उन्होंडने रेखाँकित किया कि शेखर जोशी की कविता में सिर्फ पहाड़ का सौन्दर्य ही नहीं, श्रम का सौन्दर्य भी शामिल है। यथार्थ की जटिलताओं से टकराती उनकी कविताओं में कलात्मक सन्धान के साथ कथ्य भी है। वस्तुतः वह जिस यथार्थ के अनुभव से रूबरू होते हैं, उसकी जटिलताएं कविता में संकेत के रूप में सामने आती हैं और कहानियों में इन्हें विस्तार मिलता है। वह अगर कविता भी लिखते तो उतने ही बड़े कवि होते है जितने बड़े कहानीकार हैं। दिल्ली से आए जन संस्कृति मंच, कविता समूह के राष्ट्रीय संयोजक डॉ. आशुतोष कुमार ने शेखर जोशी को श्रम के सौन्दर्य के साथ-साथ श्रम की विडंबना के कवि के रूप में याद किया और कहा कि उनकी कविताओं में कई ऐसे सूत्र मिलाते हैं जिनसे नई कहानी के संघर्ष को भी समझा जा सकता है।

इस अवसर पर बोलते हुए शेखर जोशी ने कविता के सौन्दर्य के बजाए इनकी रचना प्रक्रिया को खोलना महत्त्वपूर्ण समझा। कई कविताओं के पाठ और इनके लिखे जाने की स्थितियों पर प्रकाश डाला। उनका कहना था कि विचलित करने वाली स्थितियों में बनने वाले रचनात्मक दबाव से ही यह कविताएं लिखी जा सकी है। इनका समय करीब 55 से 60 साल के लम्बे अंतराल में फैला हुआ है। मैं नही जानता कि इन कविताओं के पसन्द किए जाने के पीछे इनकी गुणवत्ता है या मेरे प्रति प्यार, लेकिन इनके सृजन के लिए मेरा परिवेश ही मुझे जब-तब प्रेरित करता रहा है। इस अवसर पर उन्होंने सिख विरोधी दंगों के समय लिखी गई लम्बी कविता ‘अखबार की सुर्खियों में चला गया करतार’ के साथ- साथ ‘पाखी के लिए’, ‘अस्पतल डायरी’, आदि कई कविताएं सुनाकर श्रोताओं को अभिभूत कर दिया।

अध्यक्षीय संबोधन में वरिष्ठ आलोचक राजेन्द्र कुमार ने कहा कि शेखर जी की कविता में परिवेश और उसकी स्मृति-विस्मृति को फिर से जी लेने की इच्छा व्यक्त हुई है। उनकी कविता जीवन का रीटेक है। गोष्ठी के आखिर में दोनो वक्ताओं ने अपनी पसन्द की दो- दो कविताएं सुनाई। शुरुआत में वरिष्ठ कवि शिवकुटी लाल वर्मा, शायर ख्वाज़ा जावेद अख्तर और महान स्त्रीवादी चिंतक शर्मिला रेगे को श्रद्धांजलि दी गई। संयोजन दुर्गाप्रसाद सिंह ने किया जबकि संचालन रामायण राम ने किया। कार्यक्रम में जसम के महासचिव प्रणय कृष्ण, रामजी राय, जी.पी. मिश्र, कहानीकार अनिता गोपेश, नीलम शंकर, कवि संतोष चतुर्वेदी, विवेक निराला, अरुण आदित्य, प्रगतिशील लेखक संघ के सचिव अविनाश मिश्र सहित बड़ी संख्या में छात्र नौजवान शामिल थे।

प्रस्तुति‍ : प्रेम शंकर, राष्ट्रीय सचिव, जन संस्कृति मंच

सत्ता के दबाए सच को सामने ला रही हैं डाक्यूमेंटरी फि‍ल्में :बीजू टोप्पो

सलेमपुर में आयोजि‍त फिल्म फेस्टिवल को संबोधि‍त करते फिल्मकार बीजू टोप्पो।

सलेमपुर में आयोजि‍त फिल्म फेस्टिवल को संबोधि‍त करते फिल्मकार बीजू टोप्पो।

सलेमपुर (देवरिया) : बरहजिया ट्रेन की याद दिलाने वाली डाक्यूमेंटरी ‘गाडी़ लोहरदगा मेल’ के प्रदर्शन के साथ जून 23, 2013  को पहला सलेमपुर फिल्म फेस्टिवल शुरू हुआ। बापू महाविद्यालय के नवनिर्मित सभागार में आयोजित दो दिवसीय इस फिल्म फेस्टिवल का उद्घाटन राँची से आए फिल्मकार बीजू टोप्पो ने किया। जन संस्कृति मंच की देवरिया इकाई और लोकतरंग फाउंडेशन ट्रस्ट के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित फिल्म फेस्टिवल के पहले दिन दो डाक्यूमेंटरी, एक वीडियो म्यूजिक और एक फीचर फिल्म का प्रदर्शन किया गया। सबसे पहले वीडियो म्यूजिक ‘गाँव छोड़ब नाहीं’ दिखाई गई। यह वीडियो म्यूजिक विकास के नाम पर किए जा रहे जबरन विस्थापन के खिलाफ आदिवासियों, मजदूरों के संघर्ष को सलाम करती है। इसमें आदिवासी, मजदूर और किसान संकल्प लेते हैं कि वे जल, जंगल, जमीन से बेदखल किए जाने के खिलाफ अपने संघर्ष को जारी रखेंगे और किसी भी कीमत पर अपने गाँव, नदी, जंगल, जमीन को कार्पोरेट लूट का हिस्सा नहीं बनने देंगे। इसके बाद राँची से लोहरदगा के बीच मीटर गेज पर चलने वाली पैसेन्जर ट्रेन पर बनी डाक्यूमेंटरी ‘गाड़ी लोहरदगा मेल’ दिखाई गई। नौ दशक से अधिक समय तक राँची और लोहरदगा के बीच गाँवों के ग्रामीणों के लिए लाइफ लाइन यह ट्रेन 2003 में बंद हो गई थी। इस ट्रेन में फिल्मकार मेघनाथ, बीजू टोप्पो के साथ संस्कृति कर्मियों ने यात्रा की। ट्रेन में यात्रा कर रहे संस्कृति कर्मी इस ट्रेन के महत्व और ग्रामीणों से रिश्ते को अपने गीतों में व्यक्त करते हैं। फिल्म के निर्माण के बारे में बीजू टोप्पो ने बताया कि इस डाक्यूमेंटरी को तीन दिन की शूटिंग में बनाया था। डाक्यमेंटरी ‘प्रतिरोध’ में झारखंड के राँची के निकट नगड़ी गाँव में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट और विधि विश्वविद्यालय के लिए 277 एकड़ उपजाऊ कृषि जमीन हड़पने की कोशिश के खिलाफ किसानों, आदिवासियों के संघर्ष के दास्तान को बयाँ किया गया है। इस जमीन को वर्ष 1957 में अधिग्रहीत करने की कोशिश हुई थी जिसे किसानों ने अपने संघर्ष से विफल कर दिया था। इस फिल्म का भी निर्माण बीजू टोप्पो और मेघनाथ ने किया है। इस डाक्यूमेंटरी के बाद दर्शकों ने फिल्मकार बीजू टोप्पो से बातचीत भी की।

पहले दिन की आखिरी फिल्म के रूप में वर्ष 1990 में बनी तपन सिन्हा की फीचर फिल्म ‘एक डॉक्टर की मौत’ दिखाई गई। यह फिल्म कुष्ठ रोग के इलाज की दवा विकसित कर रहे एक डॉक्टर की कहानी है जिसे साथी डॉक्टरों और नौकरशाही के उत्पीड़न का शिकार होना पड़ता है। उसकी खोज को दबा दिया जाता है और इसी रोग की दवा के अविष्कार का श्रेय दो अमरीकी वैज्ञानिकों को मिल जाता है। इस सदमे से डॉक्टर उबर नहीं पाता और वह अंत में विदेश जाकर काम करने के अनुरोध को स्वीकार कर लेता है। सरकारी तंत्र की पोल खोलती यह फिल्म पंकज कपूर के यादगार अभिनय के लिए आज भी याद की जाती है।

फेस्टिवल का उद्घाटन करते हुए राँची से आए फिल्मकार बीजू टोप्पो ने कहा कि आज झारखंड,  उड़ीसा, छत्तीसगढ सहित कई राज्यों में जल, जंगल, जमीन की कार्पोरेट लूट हो रही है। सरकार इस लूट में बराबर की साझीदार है। इसके खिलाफ आदिवासियों, किसानों के संघर्ष को मुख्य धारा का मीडिया, सिनेमा जगह देने को तैयार नहीं है। इस स्थिति में डाक्यूमेंटरी फिल्मकार सीमित साधनों में उत्पीडि़तों की आवाज और जमीनी सच को डाक्यूमेंटरी सिनेमा के जरिए देने की कोशिश कर रहे हैं। इस तरह के फिल्म फेस्टिवल सत्ता और कार्पोरेट द्वारा दबा दिए गए सच को दिखाने का महत्वपूर्ण मंच बन रहे हैं।
जन संस्कृति मंच के फिल्म समूह द ग्रुप के राष्ट्रीय संयोजक संजय जोशी ने कहा कि प्रतिरोध का सिनेमा की सबसे बडी ताकत जन सहयोग से इसका आयोजित होना है। जनता का सिनेमा, जनता के ही सहयोग से बन सकता है और उसको दिखाया जा सकता है। जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय पार्षद अशोक चौधरी ने कहा कि‍ जिस देश ने ब्रिटिश साम्राज्यवादियों को बेमिसाल संघर्ष के जरिए खदेड़ दिया था, उस देश की जनता को बताया जा रहा है कि अमरीकी संस्कृति ही हमारी उद्धारक है। प्रतिरोध का सिनेमा लूट की संस्कृति, रंगीन चमकती हुई दुनिया और इसके कारोबारियों के खिलाफ संघर्षशील जनता का मंच है। डाक्यूमेंटरी सिनेमा के निर्माण, उसको दिखाने के प्रयासों व दर्शकों के रिस्पांस पर रिसर्च कर रहीं मोनाश यूनिवर्सिटी आस्टेलिया की  श्‍वेता किशोर ने कहा कि डाक्यूमेंटरी सिनेमा का छोटे कस्बों में दिखाने का काम बहुत महत्वपूर्ण है और मेरे लिए सलेमपुर जैसे स्थान पर फिल्म फेस्टिवल का आयोजन देखना एक विशिष्ट अनुभव है। उन्होंने कहा कि जब हम सिनेमा हाल मे फिल्म देखने जाते हैं तो ग्राहक होते हैं लेकिन इस तरह के आयोजनों में दर्शक एक साझीदार के रूप में आते हैं।

जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय सचिव मनोज कुमार सिंह ने प्रतिरोध के सिनेमा की यात्रा का विस्तार से जिक्र करते हुए कहा कि सलेमपुर फिल्म फेस्टिवल से हम प्रतिरोध के सिनेमा के तीसरे चरण में प्रवेश कर रहे हैं। इसके बाद सलेमपुर जैसे छोटे-छोटे कस्बों में इस तरह के आयोजनों का सिलसिला शुरू होगा। धन्यवाद ज्ञापन उद्भव मिश्र ने किया। उद्घाटन सत्र का संचलान लोक तरंग फाउंडेशन ट्रस्ट के अध्यक्ष मिनहाज सोहग्रवी ने किया। उद्घाटन सत्र में उत्तराखंड मे बाढ, भूस्लखन से हुई त्रासदी में मारे गए लोगों को एक मिनट मौन रखकर श्रद्धाजंलि दी गई।

दूसरा दिन
सलेमपुर फिल्म फेस्टिवल के दूसरे दिन पूर्वांचल के त्रासदी इंसेफेलाइटिस पर गोरखुपर फिल्म सोसाइटी द्वारा बनायी गई डाक्यूमेंटरी ‘खामोशी’ तथा चर्चित शायर तश्ना आलमी द्वारा लखनऊ फिल्म सोसाइटी द्वारा बनायी गई डाक्यूमेंटरी ‘अतश’ का प्रदर्शन किया गया। इसके अलावा विश्व सिनेमा से सलेमपुर के लोगों से परिचय कराने के उद्देश्य से मशहूर इरानी फिल्मकार माजिद मजीदी की ‘चिल्ड्रेन आफ हैवेन’ तथा कई लघु फिल्में दिखाई गईं। फेस्टिवल के समापन के मौके पर जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष शिवकुमार मिश्र के निधन पर एक मिनट मौन रखकर श्रद्धाजंलि दी गई। फेस्टिवल को चार सत्रों में बांटा गया था। पहले सत्र में लघु और एनिमेशन फिल्मों के तहत नार्मन मैक्लारेन की ‘नेबर’ और ‘चेयरी टेल’ दिखाई गई। ‘नेबर’ युद्ध विरोधी फिल्म है और यह हमें पड़ोसियों से प्रेम करने का संदेश देती है। इसमें एक खिले फूल को पाने के लिए दो पड़ोसियों के बीच लड़ते हुए मर जाने के रूपक का इस्तेमाल करते हुए बताया गया है कि कैसे झूठे दंभ और ईर्ष्‍या में हम अपने अंदर के मानवीय संवेदनाओं को मार देते हैं और एक हिंसक मनुष्य में तब्दील हो जाते हैं। ‘चेयरी टेल’ किताब पढ़ते एक व्यक्ति के कुर्सी पर बैठने की कोशिशों के जरिए सत्ता सम्बन्धों की बेहद खूबसूरत तरीके से दिखाती है। फ्राँस के फिल्मकार अलबर्ट लेमोरेसी की शार्ट फिल्म ‘रेड बैलून’ दर्शकों को खूब पंसद आई। यह फिल्म एक छोटे बच्चे की लाल गुब्बारे से दोस्ती की कहानी है। स्कूल जाते वक्त बच्चे को एक लाल गुब्बारा मिल जाता है जिसे वह हमेशा अपने पास रखता है। घर और स्कूल के लोग इस लाल गुब्बारे को बच्चे से दूर करने की कोशिश करते हैं लेकिन वह हमेशा वापस आ जाता है। लाल गुब्बारे से ईर्ष्‍या रखने वाले बच्चे एक दिन लाल गुब्बारे को पकड़कर फोड़ देते हैं। इससे दुखी बच्चे को हजारों की संख्या में आए गुब्बारे अपने साथ उड़ाते हुए पेरिस की सैर कराते हैं। दूसरे सत्र में इरान  के प्रसिद्ध फिल्मकार माजिद मजीदी की ‘चिल्डेन आफ हैवेन’ को दर्शकों ने उमस भरी गर्मी के बीच बड़ी तल्लीनता से देखा। यह फिल्म एक गरीब परिवार के दो बच्चों अली व जेहरा की कहानी है जो एक जोड़ी जूते को ही बारी-बारी पहन कर स्कूल जाते हैं। अली अपनी बहन के लिए एक जोड़ी जूते पाने के इरादे से दौड़ प्रति‍योगि‍ता में भाग लेता है। वह इतनी तेज दौड़ता है उसके प्रथम स्थान मिलता है। उसे बड़ी-सी ट्राफी दी जाती है और लोग उसे कंधों पर बिठकार खुशी मनाते  हैं, लेकिन अली रो रहा है क्योंकि वह प्रति‍योगि‍ता में तीसरे स्थान के बजाय फर्स्‍ट आ गया। वह तीसरे स्थान पर आता तो उसे इनाम में एक जोड़ी जूते मिलते जो वह अपनी बहन को देता।

सलेमपुर में आयोजि‍त फिल्म फेस्टिवल के दौरान पत्र-पत्रि‍का खरीदते लोग।

सलेमपुर में आयोजि‍त फिल्म फेस्टिवल के दौरान पत्र-पत्रि‍का खरीदते लोग।

फेस्टिवल का तीसरा सत्र पूर्वांचल की फिल्मों के नाम रहा। इस सत्र में चार फिल्मों का प्रदर्शन किया गया। फेस्टिवल के आयोजन से जुड़े सलेमपुर के आशीष सिंह और बलदाउ विश्वकर्मा की भोजपुरी फिल्म ‘तोहरी खातिर’ शराब से बर्बाद होते परिवारों की कहानी है तो ‘सावधान’ एचआईवी/एड्स के प्रति जागरूक करने वाली म्यूजिक वीडियो है। शायर तश्ना आलमी पर बनी डाक्यूमेंटरी ‘अतश’ का प्रदर्शन खास आकर्षण था। लखनऊ के बशीरतपुर के तंग गली में रहने वाला यह शायर अपनी रचनाओं से गरीबी, जातीय भेदभाव, बेरोजगारी और समाज की विद्रूपताओं पर करारा प्रहार करता है। उनकी शायरी गाँवों से शहर की ओर भागते ग्रामीणों के दर्द को आवाज देती है। तश्ना आलमी सलेमपुर के एक गाँव शामपुर के मूल निवासी हैं। अपने जवार के शायर को सिनेमा के पर्दे पर देख दर्शक रोमांचित थे। इस डाक्यूमेंटरी का निर्माण लखनऊ फिल्म सोसाइटी की ओर से युवा फिल्मकार अवनीश सिंह ने किया है। इस मौके पर शायर तश्ना आलमी मौजूद थे। इसके बाद इंसेफेलाइटिस की त्रासदी पर बनी डाक्यूमेंटरी ‘खामोशी’ दिखाई गई। गोरखपुर और कुशीनगर जिले में इंसेफेलाइटिस से मरे और विकलांग हुए बच्चों के जरिए रोग की भयावहता, स्वास्थ्य तंत्र की नाकामी को हमारे सामने रखती हुई यह फिल्म सवाल उठाती है कि इस त्रासदी पर हमारा राजनीतिक तंत्र इसलिए खामोश है क्योंकि इस बीमारी के शिकार बच्चे गरीबों के लाल हैं। इस डाक्यूमेंटरी के प्रदर्शन के बाद दर्शकों ने इसके निदेशक संजय जोशी और मनोज कुमार सिंह से बात भी की। सभी सत्रों का संचालन करते हुए फिल्मों का परिचय संजय जोशी ने दिया। जन संस्कृति मंच की देवरिया इकाई और लोक तरंग फाउंडेशन ट्रस्ट के संयुक्त तत्वावधान में बापू महाविद्यालय के सभागार में आयोजित इस फेस्टिवल का समपान सांस्कृतिक कार्यक्रमों और कवि सम्मेलन के साथ हुआ। सांस्कृतिक कार्यक्रम में लघु नाटक के मंचन के साथ-साथ लोक नृत्य और लोक गीत भी प्रस्तुत किए गइ। जसम की देवरिया इकाई के संयोजक उदभव मिश्र और लोकतरंग फाउंडेशन ट्रस्ट के अध्यक्ष मिनहाज सोहाग्रवी ने फेस्टिवल को सफल बनाने के लिए सलेमपुर के लोगों को बधाई दी।

प्रस्‍तुति‍- मनोज सिंह, चि‍त्र- श्‍वेता कि‍शोर