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मेरा जैसा मैं : गौरव सक्सेना

वैसे तो दुनि‍या का हर बच्चा बहुत खास है, लेकि‍न जि‍न बच्चों के  साथ मैं काम करता हूं, शायद वे इन सबमें भी सबसे कोमल-नि‍र्दोष-प्यारे हैं। हां, वि‍शेष अध्यापक होना सचमुच बहुत वि‍शेष है, कम से कम मेरे लि‍ए तो। ये बच्चे जि‍नके पास सीमि‍त शब्द हैं, कि‍तना कुछ बोलते हैं, जब वे मुस्कराते हैं, अचानक गले लग जाते हैं, रो देते हैं या जी खोल के हंसते हैं।

स्वलीनता (ऑटिज्म)  से ग्रसि‍त बच्चे ज्‍यादातर अपने परि‍वेश से सचेत संबंध स्‍थापि‍त नहीं कर पाते। अपनी बनाई दुनि‍या में वे जीते हैं और उस दुनि‍या में होने वाली गति‍वि‍धि‍यों में यदि‍ बदलाव हो या उनके क्रम को बदला जाए तो यह उनके लि‍ए एक भयावह समस्‍या हो जाती है।

मैं एक बात स्‍पष्‍ट कर दूं कि‍ स्‍वलीनता का संबंध बच्‍चे की बौद्धि‍क शक्‍ति‍ के साथ या उसके रचनात्‍मक कौशल से नहीं होता। ये बच्‍चे बडे़ ही हुनरमंद गायक, चि‍त्रकार, खि‍लाड़ी हो सकते है, यदि‍ इनकी संभावनाओं को सही तरह से आंका जाए।

बच्‍चों का व्‍यवहार कई अर्थों में अन्‍य बच्‍चों से अलग होता है। सबसे पहली समस्‍या होती है संवाद की- सब कुछ महसूस करने के बाद भी बच्‍चे खुद को ठीक से प्रस्‍तुत नहीं कर पाते। जो चीजें इनको अलग बनाती हैं वे हैं, समाज के नि‍यमों, परम्‍पराओं, संबंधों की जानकारी ने होना। इसके चलते कई बार ऐसा व्‍यवहार देखने को भी मि‍लता है, जो सामाजि‍क रूप से स्‍वीकार्य नहीं।

इन तमाम सारी सीमाओं के बावजूद ये बच्‍चे अपरि‍मि‍त कौशल के धनी होते हैं। आवश्‍यक नहीं है कि‍ प्रत्‍येक कौशल में ये अपनी उम्र के बच्‍चों जैसा प्रदर्शन करें, लेकि‍न जि‍स कौशल में रुझान होगा शायद उसमें बेहतर कोई दूसरा नहीं कर सकता।

जो एक बड़ी समस्‍या जिसका सामना ये बच्‍चे करते हैं, वह है- हमारे अंदर धैर्य और जानकारी का अभाव। यदि‍ बच्‍चों की आवश्‍यकताओं और वि‍शेषताओं को समझ, उसके आसपास की चीजों को परि‍वर्तित कर दि‍या जाए, तो ये बच्‍चे समाज के लि‍ए उतने की उपयोगी होंगे, जि‍तने अन्‍य बच्‍चे। इन बच्‍चों पर मैंने एक कवि‍ता लि‍खी है, जो आपके साथ साझा कर रहा हूं–

plane-by-amin-naqvi

जैसा मैंने देखा तुमको कभी कभी
कुछ उल्झा-सुलझा
कभी कभी कुछ कहते सुनते
कभी कभी चुप रहते सहते
कभी कभी कुछ सपने बुनते

जैसा मैंने देखा तुमको
कभी कभी पानी सा बहते
कभी कभी कुछ जड़ भी होते
कभी कभी मुस्काते हँसते
कभी कभी दुनिया से डरते
जैसा मैंने देखा तुमको
कभी कभी तुम कह न पाये
कभी कभी तुम सुन न पाये
कभी कभी क्या, ज़्यादातर ही
हम सब धीरज धर न पाये

कभी कभी तुम खुद बोले हो
कभी कभी ख़ामोशी बोली

जैसा मैंने तुमको देखा
कभी कभी रिश्ते जीते हो
कभी कभी खुद में जीते हो
कभी कभी जो आ जाती है
चेहरे पर मुस्कान तुम्हारे
कभी कभी जब बाँहों में भर
दिल आंखें सब भर देते हो

जैसा मैंने तुमको देखा

कभी कभी तुम काग़ज़ के कुछ

पंख लगा के उड़ जाते हो

कभी कभी तुम रंग सा घुल कर

सबके मन में बस जाते हो
कभी कभी जब दिल की बातें
टुकड़ों टुकड़ों बतलाते हो
कभी कभी तुम मीठी सरगम बनकर
उर में छिप जाते हो
जैसा मैंने तुमको देखा