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विवेक भटनागर की चार ग़ज़लें

विवेक भटनागर

विवेक भटनागर

एक

उसके दिल में इस क़दर तनहाइयां रक्खी मिलीं
उसकी आंखों में वही परछाइयां रक्खी मिलीं

कुछ जगह रक्खी मिली दीवार अपने दरमियां
कुछ जगह पर गहरी-चौड़ी खाइयां रक्खी मिलीं

टूटता दम दफ़्तरों में मां की ममता का मिला
परवरिश करने को घर में बाइयां रक्खी मिलीं

कुछ किताबों में दबी थीं बेतरह दिलचस्पियां
टेक्स्ट बुक में तो फ़क़त जम्हाइयां रक्खी मिलीं

नाज़ था हमको जवानी पर मगर कुछ दिन हुए
रुख़ पे अपने झुर्रियां और झाइयां रक्खी मिलीं

ज़र्दियां मजदूर-मेहनतकश के थीं चेहरों पे जो
मेरी ग़ज़लों में वही रानाइयां रक्खी मिलीं

दो

शबे ग़म इस क़दर ठहरी हुई है
क़रीब आकर सहर ठहरी हुई है

जहां से हम चले मंज़िल की जानिब
वहीं पर रहगुज़र ठहरी हुई है

छलक कर आंख से पाकीज़गी की
चमक रुख़सार पर ठहरी हुई है

बताती है सही दो बार टाइम
घड़ी चारों पहर ठहरी हुई है

टहल कर रेत में लौटा समंदर
किनारे पर लहर ठहरी हुई है

करे किससे शिकायत पत्थरों की
ये डाली बेसमर ठहरी हुई है

किसी दिन भी बदल सकता है मंज़र
बहुत दिन से नज़र ठहरी हुई है

तीन

हां, तो मैं कह रहा था कि आते रहा करो
रिश्ता वही है, जिसको निभाते रहा करो

अपनी मुहब्बतों को लुटाते रहा करो
बदले में दुगना प्यार कमाते रहा करो

उठता है कोई, उसको गिराने को हैं बहुत
गिरते हुओं को यार उठाते रहा करो

या तो बढ़ाओ ज्ञान सुनो सबकी गुफ़्तगू
या कितना ज्ञान है ये बताते रहा करो

होकर बड़े वो नींद की गोली न खाएंगे
बच्चों को लोरी गा के सुलाते रहा करो

नन्हे दियो! तुम्हीं से उजालों की रौनकें
जल-जल के तीरगी को बुझाते रहा करो

तुमको तो मोक्ष चाहिए, दुनिया की क्या पड़ी
गंगा में सारे पाप बहाते रहा करो

हैं ये क़लम उठाने की शर्तें विवेक जी
जागे रहो, सभी को जगाते रहा करो

चार

कुछ लोग दिखावे की फ़क़त शान रखे हैं
तलवार रखें या न रखें, म्यान रखे हैं

गीता ये रखे हैं, तो वो कुरआन रखे हैं
हम घर में मगर मीर का दीवान रखे हैं

बाज़ार है ये, नींद के मारे हैं खरीदार
व्यापारी यहां ख़्वाब की दूकान रखे हैं

जब ज़िंदगी नुकसानो नफ़े पे नहीं चलती
सुख-दुख के लिए लोग क्यों मीज़ान रखे हैं

ग़ुरबत को धरम मान के कुछ लोग तो अक्सर
नवरात्र के व्रत, रोज़ए रमज़ान रखे हैं

जो हक़ हैं ग़रीबों के उन्हें भीख समझकर
देते हैं अगर, उनपे वो एहसान रखे हैं

पत्थर वो चलाते हुए टुक सोच तो लेता
पुरखों ने इन्हीं संग में भगवान रखे हैं

रंजन जै़दी की दो गज़लें

रंजन ज़ैदी

सीतापुर, उत्तर प्रदेश में जन्में  रंजन जैदी के पाँच कहानी संग्रह, तीन उपन्यास और एक काव्य  संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। इनके अलावा असंख्य लेख, साक्षात्कार, टिप्पणियाँ रेडियो आद‍ि विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। रंजन जैदी की दो गज़लें-

फिर कोई ख्वाब

खेल गुड़ियों का हकीकत में बदल जायेगा,
फिर कोई ख्वाब ग़मे-ज़ीस्त में ढल जायेगा।
बन्दन मुट्ठी से निकल आये जो सूरज बाहर,
मोम का शह्र है, हर सिम्त पिघल जायेगा।
देखते-देखते सब उड़ गईं चिड़िया यां  से,
अब मेरा घर भी कड़ी धूप में जल जायेगा।
एक मिट्टी के प्याले की तरह उम्र कटी,
धूप  की  तरह  रहा  वक़्त निकल जायेगा।
घर  की  दीवारें भी बोसीदः कफ़न ओढ़े हैं,
अबकी तूफाँ मेरे ख़्वाबों को निगल जायेगा।
हमने मायूस कमंदों से न जोड़े रिश्ते,
हिज्र की रात का ये चाँद है, ढल जायेगा।

बुलंदी

तुमको गर चाहिए बुलंदी तो,
सायबां को तलाश मत करना/
जिस सितारे को ढूँढते हैं लोग,
उस सितारे की तरह तुम बनना/
इन खलाओं में और सूरज हैं,
और सूरज में भी समंदर हैं/
तुम परिंदे हो आसमां में उड़ो,
बादलों पर यकीन मत करना/
धूप जिस्म को जलाती है,
रूह को जिलाती है/
धूप इक सियासत है,
इससे बेहतर है फासले रखना।
हमारी बेरुखी, उसकी मुहब्बत का ये आलम था,
नशेमन फूँक कर उसने मुझे कंगन दिखाए थे।
मेरे बिस्तर की हर सिलवट में लहरें थीं समंदर की,
कई तूफाँ थे पोशीदाः मगर तकिये छुपाये थे।
ये सच है इक ज़माने से मैं उसके साथ रहता था,
मगर ये भी हकीकत है के हम दोनों पराये थे।
दिए हैं ज़ख्म कुछ इतने के भरपाई नहीं मुमकिन,
मेरे ज़ख्मों ने मेरी सोच के मंज़र बदल डाले।