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रमेश तैलंग की गजलें

रमेश तैलंग

02 जून 1946 को टीकमगढ़, मध्‍य प्रदेश में जन्‍में रमेश तैलंग ने प्रचूर मात्रा में बाल साहि‍त्‍य लि‍खने के अलावा कई महत्‍वपूर्ण गजलें भी हिंदी साहि‍त्‍य को दी हैं। उनकी कुछ गजलें-

 1.

जब कुछ नहीं बना तो हमने इतना कर दिया..

खाली हथेली पर दुआ का सिक्का धर दिया।

 

कब तक निभाते दुश्मनी हम वक्त से हर दिन

इस बार जब मिला वो तो बाँहों में भर लिया।

 

उस गाँव के बाशिंदों में अजीब रस्म है,

बच्ची के जन्म लेते ही गाते हैं मर्सिया।

 

बदली हुकूमतें मगर न किस्मतें बदलीं,

मुश्किलजदा लोगों को सबने दर बदर किया।

 

मुद्दा कोई हो, उसपे बोलना तो बहुत दूर,

संजीदा हो के सोचना भी बंद कर दिया।

 

2.

दुःख दर्द की मिठास को खारा नहीं बना.

खामोशी को ज़ुबान दे, नारा नहीं बना।

 

जिसने जमीन से लिया है खाद औ’ पानी

उस ख्वाब को फ़लक का सितारा नहीं बना।

 

वो बेज़ुबाँ है पर तेरी जागीर तो नहीं,

उसको, शिकार के लिए, चारा नहीं बना।

 

घुटने ही टेक दे जो सियासत के सामने,

अपने अदब को इतना बिचारा नहीं बना।

 

जज़्बात कोई खेल दिखाने का फ़न नहीं

जज़्बात को जादू का पिटारा नहीं बना।

 

इंसान की फितरत तो है शबनम की तरह ही,

अब उसको, जुल्म कर के, अंगारा नहीं बना।

 

3.

एक किताब पड़ी थी अलमारी में कई महीने से

मुद्दत बाद मिली तो रोई लिपट-लिपट कर सीने से।

 

कहा सुबकते हुए- ‘निर्दयी अब आए हो मिलने को

जब गाढ़े संबंधों के आवरण हो गए झीने से

 

और जरा देखो, कैसे बेनूर हो गए ये अक्षर

कभी चमकते थे जो अंगूठी में जड़े नगीने से

 

और याद है? जब आँखें भारी होते ही यहाँ-वहाँ

सो जाते तुम मुझे सिरहाने रखकर बडे करीने से

 

किस मुँह से अब अपना ये सर्वस्व सौंप दूँ फिर तुमको

धूल धूसरित देह पड़ी है लथपथ आज पसीने से।

 

4.

हो सके तो ज़िन्दगी को शायरी कर दे खुदा!

शायरी में ज़िन्दगी के रंग सब भर दे खुदा!

 

और कुछ चाहे भले ही दे, न दे, मर्ज़ी  तेरी

ज़िन्दगी  को जीने लायक तो मुकद्दर दे खुदा!

 

क्या करेंगे सिर्फ़ दीवारें, या छत लेकर यहाँ,

देना है तो एक मुकम्मल छोटा-सा घर दे खुदा!

 

दिल के हिस्से में छलकता एक दरिया डाल दे,

फिर समूचे जिस्म को चाहे तो संग कर दे खुदा!

 

चैन दिन का, रात की नींदें उड़ा कर ले गया,

खौफ की आँखों में भी थोड़ा-सा डर भर दे खुदा!

 

सर कलम करने को बैठे हैं यहाँ आमादा जो,

उनका बस एक बार ही सजदे में सर कर दे खुदा!

 

5.

उड़ने का हुनर आया जब हमें गुमां न था

हिस्से में परिंदों के कोई आसमां न था।

 

ऐसा नहीं कि ख्वाहिशें नहीं थी हमारी,

पर उनका सरपरस्त कोई मेहरबां न था।

 

एक ख्वाब क़त्ल करके, एक ख्वाब बचाते,

अपने जिगर में ऐसा बड़ा सूरमा न था।

 

तन्हा सफर में इसलिए तन्हा ही रह गए

थे रास्ते बहुत से, मगर कारवाँ न था।

 

परदेस गए बच्चे तो वहीं के हो गए

इस देस में हुनर तो था पर कद्रदाँ न था।

 

6.

यादों के खज़ाने में कितने लोग भरे हैं

बिछुड़े हैं जब से हर घड़ी बेचैन करे हैं।

 

तस्वीरों के अंदर भी वे जिंदा-से लगे हैं

और हम हैं कि उनके बिना जिंदा भी मरे हैं।

 

इस झूठे भरम में कि वे कल लौट आएं फिर

सीने पे कब से सब्र का एक बोझ धरे हैं।

 

एक ओर सियाही है तो एक ओर रोशनी,

अपने ही साये से ज्यों हर वक्त डरे हैं।

 

थमता नहीं सैलाब, आँधियों में मोह की

तर आस्तीं है, आँसुओं के मोती झरे हैं।

दो ग़ज़लें : प्राण शर्मा

ब्रिटेन में बसे भारतीय मूल के हिन्‍दी लेखक प्राण शर्मा की दो गजलें-

1.

रहके अकेला इस दुनिया में करना सब कुछ हासिल प्यारे
मैं  ही जानू  कितना ज़्यादा  होता  है ये  मुश्किल प्यारे

प्यारे-प्यारे,  न्यारे-न्यारे  खेल-तमाशे सब के सब हैं
आ कि ज़रा तुझको दिखलाऊँ दिल वालों की महफ़िल प्यारे

मोह नहीं जीवन का तुझको, मान लिया है मैंने लेकिन
दरिया में हर डूबने वाला चिल्लाता है साहिल प्यारे

कुछ तो चलो तुझको अनजानी राहों की पहचान हुई है
कैसा रंज, निराशा कैसी पा न सका जो मंजिल प्यारे

सबकी बातें सुनने वाले अपने दिल की बात कभी सुन
तेरी खैर मनाने वाला तेरा अपना है दिल  प्यारे

कुछ तो कर महसूस खुशी को कुछ तो कर महसूस तसल्ली
कुछ तो आये मुँह पर रौनक कुछ तो हो दिल झिलमिल प्यारे

तेरे-मेरे रिश्ते-नाते ‘प्राण’  भला क्यों सारे टूटें
माना, तू मेरे नाकाबिल,  मैं तेरे नाकाबिल प्यारे

2.

दोस्ती  यूँ  भी तेरी  हम  तो निभायेंगे
मानोगे जब तक नहीं तुझको मनायेंगे

सुनते हैं,  बह जाती है सब मैल नफ़रत की
प्यार की गंगा में हम खुल कर नहायेंगे

कुछ भलाई जागी है हम में भी ए यारो
पंछियों को हम भी अब दाने खिलायेंगे

क्या हुआ जो बारिशों में ढह गयी यारो
राम  ने  चाहा  कुटी  फिर  से  बनायेंगे

हम फ़क़ीरों का ठिकाना हर जगह ही है
शहर से निकले तो जंगल ही बसायेंगे

आप  जीवन  में  हमारे  आके  तो देखें
आपको दिल में कभी सर पर बिठायेंगे

एक से रहते नहीं दिन ‘प्राण’  जीवन के
आज रोते हैं अगर कल मुस्करायेंगे

विवेक भटनागर की तीन गजलें

एक

यह नहीं देखा कि कंधों पर खड़ा है
लोग यह समझे कि वो सबसे बड़ा है

पुण्य के आकाश की सीमा नहीं है
पाप जल्दी भरने वाला इक घड़ा है

भूख क्यों हर रोज लगती है, न जाने
इस गरीबी का ये मुश्किल आँकड़ा है

देवता को हम भला क्यों पूजते हैं
पूजिए, मजदूर का ये फावड़ा है

साँप मिलते हैं विषैले उस जगह पर
जिस जगह पर भी किसी का धन गड़ा है

यह वही है जो कि कंधों पर खड़ा था
भीड़ के पैरों तले कुचला पड़ा है।

दो

अपना खुद से सामना है
इसलिए मन अनमना है

सब तनावों की यही जड़
खुद का खुद से भागना है

इसको भी तुम जीत मानो
खुद से कैसा हारना है

अपनी नजरों में गिरा जो
उसको फिर क्या मारना है

डूब जाने को सतह तक
लोग कहते साधना है।

तीन

वो आशियानों में घर रखेंगे
कि आसमानों के पर रखेंगे?

तुम्हारे कदमों के नीचे काँटे
तुम्हारे कदमों पे सर रखेंगे

तुम्हारा साया दगा करेगा
जो रास्ते में शजर रखेंगे

कि तुम भी शायद मुकर ही जाओ
हम आँखें अश्कों से तर रखेंगे

इधर है सोफा उधर है टीवी
ईमानदारी किधर रखेंगे?

तुम अपने पैरों को बाँध रक्खो
तुम्हारे आगे सफर रखेंगे

जो खुद ही खबरों की सुर्खियां हैं
वो क्या हमारी खबर रखेंगे।

दो ग़ज़लें : प्राण शर्मा

ग़ज़लकार, कहानीकार और समीक्षक प्राण शर्मा का जन्म वजीराबाद (पाकिस्तान)  में 13 जून 1937 को हुआ। प्राथमिक शिक्षा दिल्ली में हुई और पंजाब विश्‍वविद्यालय से एम. ए., बी.एड. किया। वह 1965 से यू.के. में प्रवास कर रहे हैं। उनकी दो पुस्‍तकें ‘ग़ज़ल कहता हूँ’ व ‘सुराही’ (मुक्तक-संग्रह) प्रकाशित हो चुकी हैं। इसके अलावा ‘अभिव्यक्ति’ में प्रकाशित ‘उर्दू ग़ज़ल बनाम हिन्‍दी ग़ज़ल’ और ‘साहित्य शिल्पी’ पर ‘ग़ज़ल: शिल्प और संरचना’ के 10 महत्‍वपूर्ण लेख हैं। उनकी दो गज़लें-

1.

कर नहीं सकते अगरचे प्यार की बातें
कुछ तो करना सीखो तुम उपकार की बातें

हाँ में हाँ प्यारे कभी सबकी मिलाया कर
दिल दुखाती हैं सदा इनकार की बातें

एक ये भी नुस्खा है तीमारदारी का
ठण्डे मन से सुनियेगा बीमार की बातें

करते हो हर बात मतलब की हमेशा तुम
जैसे व्यापारी करे व्यापार की बातें

औरों की सुनिए भले ही शौक़ से लेकिन
पहले सुनिए  अपने ही परिवार की बातें

काम की कुछ बातें हों आपस में ए यारो
सर दुखाने लगती हैं बेकार की बातें

‘प्राण’ अपनों से कोई हक़ क्या कोई मांगे
लगती हैं सब को  बुरी हक़दार की बातें

2.

जिसकी सुखी है हर समय संतान दोस्तो
वो शख्स है जहान  में धनवान दोस्तो

हक़दार हों भले ही कई उसके वास्ते
मिलता है कब हरेक को सम्मान दोस्तो

जीवन में भी तो होती है हलचल अजीब सी
जीवन  में भी तो आता है तूफ़ान दोस्तो

संसार  दानवीरों  से  वंचित  नहीं  हुआ
करते हैं अब भी लोग कई दान दोस्तो

रहते हैं साधुओं से, फ़क़ीरों से उम्र भर
मिल जाते हैं कुछ ऐसे भी धनवान दोस्तो

दुनिया का  कोई माज़रा उससे नहीं छिपा
जिस शख्स को है थोड़ी भी पहचान दोस्तो

जाने कहां गया : मीना पाण्‍डे

युवा लेखि‍का और सृजन से की संपादक मीना पाण्डे की गजल-
दूर तक ये शुष्क मरूस्थल दहक रहा,
कलरव वो कोकिलों का जाने कहां चला गया!
मजहब से तौलते हैं इंसानियत सभी,
हम एक हैं विश्वास जाने कहां गया!
मुर्दा है खौफ़ से मासूम निगाहें,
हंसता हुआ जहां वो जाने कहां गया!
खुलेआम कत्ल हो रही इंसानियत यहां,
सारे जहां से अच्छा दंगों में खो गया!
हम हिन्दु-मुसलमान में बंटते चले गये,
अनेकता में एकता नारा ही रह गया!
संभले ना ’गर’ हम अभी तो कल ये कहेंगे,
भारत मेरा महान वो जाने कहां गया!

संजय ग्रोवर की चार गजलें

युवा गजलकार संजय ग्रोवर की चार गजलें-

1

पद सुरक्षा धन प्रतिष्‍ठा हर तरह गढ़ते रहे
और फिर बोले कि हम तो उम्र भर लड़ते रहे
काग़ज़ों की कोठरी में कैद कर डाला वजूद
फिर किसी अखबार में तारीफे-खुद पढ़ते रहे
मंच पर जिन रास्तों के थे मुखालिफ उम्र भर
मंच के पीछे से वो ही सीढ़ियां चढ़ते रहे
नाम पर बदलाव के इतना इज़ाफा कर दिया
रोज़ तस्वीरें बदल कर चौखटे जड़ते रहे
इन अंधेरों में भी होगी प्यार की नन्हीं सी लौ
बस इसी उम्मीद में मेरे क़दम बढ़ते रहे

2.

कोई भी तयशुदा क़िस्सा नहीं हूं
किस्सी साजिश का मैं हिस्सा नहीं हूं
किसी की छाप अब मुझपर नहीं है
मैं ज़्यादा दिन कहीं रुकता नहीं हूं
तुम्हारी और मेरी दोस्ती क्या
मुसीबत में, मैं ख़ुद अपना नहीं हूं
मुझे मत ढूंढना बाज़ार में तुम
किसी दुकान पर बिकता नहीं हूं
मैं ज़िन्दा हूं मुसलसल यूं न देखो
किसी दीवार पर लटका नहीं हूं
मुझे देकर न कुछ तुम पा सकोगे
मैं खोटा हूं मगर सिक्का नहीं हूं
तुम्हे क्यूं अपने जैसा मैं बनाऊँ
यक़ीनन जब मैं ख़ुद तुमसा नहीं हूं
लतीफ़ा भी चलेगा गर नया हो
मैं हर इक बात पर हंसता नहीं हूं
ज़मीं मुझको भी अपना मानती है
कि मैं आकाश से टपका नहीं हूं

3.

जब तलक अनकही, अनसुनी धूप है
दिल को ऐसा लगे गुनगुनी धूप है
बेटियों ने सहारा दिया बाप को
देखो सूरज के सर पे तनी धूप है
‘जन्मदाता ही बेटी से बेज़ार है !’
लेके सूरज को, यूं, अनमनी धूप है
दादियों नानियों सबको समझा रही
देखो ज़ेहन की कितनी ग़नी धूप है
बेईमानी के बादल हैं चारों तरफ
खबरे-ईमान सी सनसनी धूप है
जानलेवा है गरमी औ’ फुटपाथ पर-
मुफलिसों के लिए कटखनी धूप है
सर पे सूरज है और चाँद खिड़की में है
यानि जां पे मेरी आ बनी धूप है

4.

जहाज़ कागज़ी ताउम्र नहीं चलने का
संभल भी जा कि अभी वक्त है संभलने का
अगर तू भेड़चाल में ही इसकी शामिल है
ज़माना तुझसे कोई चाल नहीं चलने का
वो जो बदलाव के विरोधियों के मुखिया थे
कि ले उड़े हैं वही श्रेय युग बदलने का
वो सियासत में साफगोई के समर्थक हैं
सो उनको हक़ है सरे-आम सबको छलने का
जो उनसे हाथ मिलाते हैं जानते ही नहीं
कि वक्त आ रहा है जल्द हाथ मलने का

संजय ग्रोवर की तीन गजलें

लेखन के साथ-साथ चित्रांकन में दखल रखने वाले संजय ग्रोवर की दो पुस्तकें गजल संग्रह ‘खुदाओं के शहर में आदमी’ तथा व्यंग्य संग्रह ‘मरा हुआ लेखक सवा लाख का’ प्रकाशित हो चुकी हैं। उनकी तीन गजलें-

1

पागलों की इस कदर कुछ बदगु़मानी बढ़ गयी
उनके हिस्से की दवा भी हमको खानी पड़ गयी
 
उनको कांधा देने वाली भीड़ थी, भगवान था
हमको अपनी लाश आखिर खुद उठानी पड़ गयी
 
भीड़ का उनको नशा था, बोतलें करती भी क्या
तिसपे रसमों-रीतियों की सरगिरानी बढ़ गयी
 
छोटे शहरों, छोटे लोगों को मदद मिलनी तो थी
हाकिमों के रास्ते में राजधानी पड़ गयी
 
कुछ अलग लिक्खोगी तो तुम खुद अलग पड़ जाओगी
यूं ग़ज़ल को झांसा दे, आगे कहानी बढ़ गयी
 
‘वार्ड नं. छ’ को ‘टोबा टेक सिंह’ ने जब छुआ
किस कदर छोटी मिसाले-आसमानी पड़ गयी
 
दिल में फ़िर उट्ठे ख्याल ज़हन में ताज़ा सवाल
आए दिन कुछ इस तरह मुझपर जवानी चढ़ गयी
 

2

उसको मैं अच्छा लगता था
मैं इसमें क्या कर सकता था
 
एक ग़ज़ब की सिफ़त थी मुझमें
रोते-रोते हंस सकता था
 
नज़र थी उसपे जिसके लिए मैं
फ़कत गली का इक लड़का था
 
जाने क्यूं सब दाँव पे रक्खा
चाहता तो मैं बच सकता था
 
मेरा ख़ुदको सच्चा कहना
उसे बुरा भी लग सकता था
 
मेरा उसको अच्छा कहना
उसे बुरा भी लग सकता था
 
बेहद ऊँचा उड़ा वो क्यूंकि
किसी भी हद तक गिर सकता था
 
ख़ानदान और वंश के झगड़े !
मै तो केवल हंस सकता था
 

3

मोहरा, अफवाहें फैला कर            
बात करे क्या आँख मिला कर
 
औरत को माँ-बहिन कहेगा
लेकिन, थोड़ा आँख दबाकर
 
पर्वत को राई कर देगा
अपने तिल का ताड़ बना कर
 
वक़्त है उसका, यारी कर ले
यार मेरे कुछ तो समझा कर
 
ख़ुदको ही कुछ समझ न आया
जब बाहर निकला समझा कर

विवेक भटनागर की दो गजलें

युवा लेखक और पत्रकार विवेक भटनागर की दो गजल-

गांव में कठपुतलियों के

क्यों भयानक हैं इरादे उंगलियों के
खलबली है गांव में कठपुतलियों के
 
और रंगों के लिए रंगींतबीयत
गिरगिटों ने पर तराशे तितलियों के
 
देखिये पक्षी तड़ित चालक हुए तो
हल नहीं होंगे मसाइल बिजलियों के
 
चांद की आंखों में डोरे सुर्ख तो थे
कम न थे तेवर सुहानी बदलियों के
 
आज गांवों ने किए सौदे शहर से
नथनियों के, पायलों के, हंसलियों के
 

बेहतर होगा जुबां फेंक दो

खिड़की-रोशनदान फेंक दो
ऐसा सब सामान फेंक दो
 
किसी बंद कमरे के अंदर
हवादार दालान फेंक दो
 
अच्छे से जीने की खातिर
बचा-खुचा सम्मान फेंक दो
 
बेहतर होगा जुबां फेंक दो
या फिर अपने कान फेंक दो
 
महरूम सभी चीजों से होकर
खालीपन का भान फेंक दो