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अनवर सुहैल की कवि‍तायें

वरि‍ष्‍ठ कवि‍ और ‘संकेत’ के सम्‍पादक अनवर सुहैल की कवि‍तायें-

वनडे क्रिकेट और बच्चे

पदयात्रियों, मोटर-गाड़ियों से बेपरवाह
बीच सड़क पर
क्रिकेट खेलते बच्चे
डरा नहीं करते
पिता-चाचा या दादा की घुड़कियों से

भुनभुनाएं बुजुर्ग
चिड़चिड़ाएं अध्यापक
तो क्या करें बच्चे
पाकिस्तान के विरुद्ध
खेली गई पारियों को
देखते हैं वे ही लोग
सारा काम छोड़
आँखें फोड़
उत्तेजना के साथ
जैसे सीमा पर चल रहा हो युद्ध…

नहीं सोचते बच्चे
सिगरेट, ठंडा और मदिरा के निर्माता
क्यों बना करते
भारत-पाक क्रिकेट श्रृंखला के प्रायोजक
क्रिकेट सितारों की जादुई प्रसिद्धि से अभिभूत
बच्चों को तो सीखना है
सचिन जैसे ‘स्ट्रोक्स’
या कपिल जैसी आक्रामकता!

क्रिकेट खेलते बच्चे
नहीं बनना चाहते
अध्यापक, गणितज्ञ, वैज्ञानिक, संगीतज्ञ
इंजीनियर, डॉक्टर
और साहित्यकार तो एकदम नहीं
वे रातों-रात
होना चाहते मशहूर
मात्र एक अदद शतकीय पारी
दिला सकती
प्रतिष्ठा, पद, पैसा असीमित

क्रिकेट खेलते बच्चे
जल्द ही सीख जाते
व्यक्तिगत स्कोर का महत्व
जीतने के लिए
चालाकियों की अनिवार्यता
प्रायोजकों, सटोरियों के इच्छानुसार
खेल का प्रदर्शन….

अब्बा

कौन कहता है
वह टूट गए हैं
ज़रा देखिए ध्यान से
बढ़ती उम्र के कारण
वह कुछ झुके ज़रूर हैं
झुकता है जैसे कोई फलदार पेड़
झुकती जैसे फूलों भरी डालियाँ

अब्बा पर्याय हैं
आँगन के उस पीपल का
जो जाने कब से
खड़ा है अकेला
निहारता
सिद्धबाबा पहाड़ी पर बने मन्‍दि‍र को
बदलते मौसम
धूप-छाँह के खेल
दिन-रात की कारीगरी में लिप्त प्रकृति
डिगा नहीं पाई
अब्बा का मन

अवकाश प्राप्ति के बाद भी
अब्बा हैं वही अध्यापक
जिसे समाज को शि‍क्षित करने का
महती-उत्तरदायित्व मिला है
इसीलिए शायद अब भी
वह चाहते सिखाना
अनुभवों के सिलेबस से
व्यवहारिक ज्ञान की वर्णमाला

जने क्यों अक्सर अब्बा
दाहिने हाथ की तर्जनी
हिलाते रहते आजकल
लगता है किसी
पेचीदा सवाल को
मन ही मन करते हैं हल

अक्सर याद करते आजकल अब्बा
वे दिन
जब उनकी बेंत की डर से
पाठशाला नहीं आना चाहते थे छात्र
और मार खाकर जो पढ़ गये
वे सब आगे बढ़ गये।
मिल जाते आज भी
ऐसे विद्यार्थी
झुककर करते प्रणाम
गुरु-दक्षिणा स्वरूप
सादर प्रस्तुत करते पान
चौ़ड़ा हो जाता
अब्बा का सीना
कहते, एक शि‍क्षक
जीवन में यही तो कमाता है।

वो भी एक ज़माना था
जब अब्बा की परछाईं से भी
डरते थे हम
भागते थे कोसों दूर
उनके थप्पड़ खाकर
कई बार मूत दिया करते थे
पेंट में हम
शायद अम्मी भी डरती थीं उनसे
आज हमारे बच्चे
हमारे कपार पे चढ़कर
पूरी करवा लेते अपनी
जायज़-नाजायज़ मांग
तब हम कहाँ सीधे
अब्बा से मांग पाते थे
कुछ भी
अम्मी के ज़रिए पहुँचती थीं बातें तब
अब्बा के पास

मुझे अपने अब्बा पर है गर्व
क्योंकि दोस्तों के बूढ़े बाप
मिलने पर
खा जाते दिमाग
अपने युवा बेटे-बहू की शि‍कायतों का
कच्चा चिट्ठा खोल, कर देते हलकान
बताते कि उनके बच्चे
निकले सब बेईमान…

जबकि नहीं करते अब्बा
किसी राहगीर को परेशान
नहीं सुनाते किसी को
बेटे-बहू की नाफ़रमानियों की
कचड़ा दास्तान

जबकि वे चाहें तो
क्या उनके पास
नहीं हैं उपलब्ध
कई आख्यान…???

शकीला की छठवीं बेटी

‘लेबर-रूम’ के बाहर
खिन्न हैं आयाएं
नर्सें ख़ामोश
आज की ‘बोहनी’ बेकार हुई
‘ओ गॉड, ये ठीक नहीं हुआ!’
शकीला इस बार भी
पुत्र की आस में
नौ माह तक
ढोती रही एक ‘कन्या-भ्रूण’
उसके शौहर ने क्या समझ रखा है
शकीला की कोख को एक प्रयोगशाला
जिसमें प्रतिवर्ष किया जाता प्रयोग
एक ‘चांस’
कि शायद इस बार
कुलदीपक हो उत्पन्न
कि शायद इस बार
मिल जाये ज़िल्लत से छुटकारा
सच ही तो है
कि बेटियों की माँ होना
दुर्भाग्य का पर्याय है

‘जल्दी सफाई का काम पूरा करा!’
सिस्टर थॉमस इसी तरह है चिड़चिड़ाती
जिस दिन कोई ‘कन्या’ संसार में आती
कुछ पूछने पर बिगड़ जाती
‘क्या ज़रूरत है किसी टीका-वीका की
जी जायेगा बच्चा
लड़की जात जो ठहरी।’

शकीला की मनोदशा देख
आयाएं हैं उदास
लगता है
रक्ताल्पता की शि‍कार
पतली-दुबली शकीला
पागल हो जायेगी
लगातार छठवीं बार
प्रसव-पीड़ा सहकर
पुत्र-रत्न से वंचित माँ का दुख
क्या समझ पायेगा कोई कवि!

बगल मे पड़ी
नवजात कन्या रोने लगी
शकीला के ममता नहीं उमड़ती
शकीला उसे दूध नहीं पिलाती
बूढ़ी सास माथे पर हाथ धरे
टिकी बिस्तर के पैताने
हर बार की तरह इस बार भी
जिसकी भविष्यवाणी ग़लत साबित हुई
जबकि तमाम लक्षणों के मुताबिक
बहू ने जनना था पोता
वह नाराज़ है ख़्वाज़ा ग़रीब नवाज़ से भी
जिन्होंने पूरी न की मनौती
शकीला आँखें बंद किये
लेटी चुपचाप मुर्दा सी

तभी आ गई नज़मा
शकीला की बड़ी बेटी
उसने झट उठा लिया गोद में
नवजात कन्या-शि‍शु
लगी पुचकारने उसे
रोती बच्ची उसकी गोद में आकर
लाड़-दुलार पाकर
चुप हुई
जैसे उसने पा लिया हो ‘मुहाफ़िज़’ कोई।

मुसलमान

उससे फिर
नहीं पूछता कोई
तुम किस प्रदेश या जिले के निवासी
जब जान जाते बहुसंख्यक
कि उसका नाम है सुलेमान
वह है एक मुसलमान
इसके अलावा
उसकी नहीं हो सकती
और कोई पहचान
समझ गये श्रीमान!

दुख की उम्र

रसूल हमज़ातो न कहा
दुख की उम्र
होती एक बरस
फिर आदमी भूल जाता
बेहद अपनों को
बीते सपनों को
मुझे लगता
अन्य तमाम चीज़ों के साथ
दुख की औसत आयु भी
हुई है कम
बिछड़ों की याद में
मनाते नहीं अब लोग ग़म
बमुश्‍कि‍ल तमाम
किया जाता याद
ज्यादा से ज्यादा
एक सप्ताह!

ग्रंथालयों में महाकवि

कवि बतियाता है
सिर्फ मित्र-कवि से
चंद कूट संकेतों के ज़रिए
जिस तरह
एक किसान, दूसरे किसान से
एक महिला, दूसरी महिला से
एक चिड़िया, दूसरी चिड़िया से

कवि
किसान के पास नहीं जाता
जबकि किसान चाहता गुनगुनाना
उसके गीत
हल-बैलों की लय-ताल-चाल में।

कवि
जाता नहीं श्रमिक के पास
जबकि श्रमिक चाहता उच्चारना
मशीनों की खटर-पटर में
शब्द-लय पेवस्त करना।

कवि
बैठता आजकल
धन्ना-सेठ प्रकाशकों के संग
आलोचकों-सम्पादकों के चूमता क़दम
सत्ता के गलियारे
बांधे हाथ
खीसें निपोरे
खेलता इक खेल
स्वाभिमान, प्रतिभा और अस्तित्व को
लगा दाँव पर

कवि
जीवित रहना चाहता
ग्रंथालयों की सीलन भरी उबासियों में
इतिहास पुरुष बनने का स्वप्न
हर लेता उसकी उम्र भर का चैनो-सुकून

कवि
अपने भोथरे शब्दों को
तिकड़म से
कराता सिद्ध-प्राणवान
जोड़-तोड़ से
बन जाता
इस सदी का महाकवि!

कहा आपने

कहा आपने
बरखा होगी, फसल उगेगी
भर-भर जायेगा खलिहान

कहा आपने
शासन यह जनता ही का
हँसी-खुशी किया मतदान

कहा आपने
स्वप्न हुये साकार
भूखा-नंगा कोई नहीं
ऊँचा-नीचा कोई नहीं
अगड़ा-पिछड़ा कोई नहीं
सब होठों पर खिला करेगी
मंद-मंद मुस्कान

कहा आपने
माना हमने
आता नहीं समझ में लेकिन
आप हमेशा भरमाते क्यों
मान हमेशा हम जाते क्यों?

क्रिकेट के जन्म की लोककथा : कांतिकुमार जैन

सभी का मानना है कि‍ क्रि‍केट का जन्‍म इंग्‍लैंड में हुआ, लेकि‍न यह सच नहीं है। इस खेल का जन्‍म छत्तीसगढ़, भारत में हुआ और वह भी त्रेता युग में। इसके जन्‍मदाता हैं राम जी और लखनजी। यकीन नहीं हो रहा है तो पढ़ि‍ए चर्चित संस्‍मरणकार कान्‍ति‍कुमार जैन का संस्‍मरण-

उस समय मुझे यह पता नहीं था कि जिसे सारी दुनिया क्रिकेट के नाम से जानती है, वह हम बैकुंठपुर के लड़कों का पसंदीदा खेल रामरस है। ओडगी जैसे पास के गांवों में रामरस को गढ़ागोंद भी कहते थे, पर सिविल लाइंस में रहने वाले हम लोगों को रामरस नाम ही पसंद था। रामरस यानी वह खेल, जिसे खेलने में राम को रस आता था। अब आप यह मत पूछिएगा कि राम कौन ? अरे राम- राजा राम, अयोध्या के युवराज, त्रेता युग के मर्यादा पुरुषोत्तम दशरथनंदन राम। मुझे राम और राम रस के संबंधों का पता नहीं था। वह तो अचानक ही खरबत की झील के किनारे मुझे जगह-जगह पर पत्थर के रंगबिरंगे गोल टुकड़े मिले- टुकड़े क्या-बिल्कुल क्रिकेट की गेंद जैसे आकार वाले ललछौंहे रंग के पत्थर। खरबत झील से लगा हुआ पहाड़ है। बैकुंठपुर से कोई सात मील यानी लगभग चार कोस दूर। इतवार की सुबह हमने तय किया कि आज खरबत चला जाए, वहीं नहांएगे, तैरंगे और झरबेरी खाएंगे। हम लोगों ने यानी मैंने और जीतू ने, जीतू मेरा बालसखा था। मेरे हरवाहे का लड़का- हम उम्र, हम रुचि। साइकिल थी नहीं तो हम लोग पैदल ही खरबत नहाने निकले। रास्ता सीधा था। छायादार। पास के गांव यानी नगर के तिगड्डे से बिना मुड़े सीधे सामने चले चलो। खरबत की झील आ जाएगी। सामने पहाड़, हराभरा जंगल। खरबत की झील का जल इतना पारदर्शी और निर्मल था कि चेहरा देख लो। हम लोगों ने निर्मल जल में सिर डुबोया ही था कि टकटकी बंध गई। जल में यह किसका प्रतिबिंब है ? आईने में अपने चेहरे का प्रतिबिंब तो रोज ही देखते थे, पर वह चेहरा इतना सुंदर और मनोहारी होग, यह कभी लगा ही नहीं। वह तो अच्छा हुआ कि उस समय तक मैंने नारसीसस की कथा नहीं पढ़ी थी अन्यथा मैं अपना प्रतिबिंब छूने के लिए नीचे झुकता और कुमुदिनी बनकर खरबत झील में अब तक डूबा होता। झील में कुमुदिनी के फूलों की कमी नहीं थी- कुमुदिनी को वहां के लोग कुईं कहते अर्थात् मुझसे पहले भी मेरी वय के लड़के वहां पहुंचे थे, उन्होंने जल में अपना प्रतिबिंब निहारा था और इस प्रतिबिंब को छूने या चूमने के लिए नीचे झुके थे और गुड़प- उनकी वहां जल समाधि हो गई होगी और कालांतर में वहां कुईं का फूल उग आया होगा।

कभी-कभी अज्ञान भी कितना लाभदायी होता है। असल में कुईं के फूलों की तुलना में खरबत की झील और खरबत पहाड़ के बीच के मैदान में ललछौहें रंग के जो गोल-गोल पत्थर पड़े थे, उनमें हम लोगों का मन ज्यादा अटका हुआ था। समझ में नहीं आया कि इतने सारे पत्थर, वह भी एक ही रंग के सारे मैदान में क्यों बिखरे हैं। एक पत्थर उठाया, देखा वह मृदशैल का था- रंध्रिल, हल्का, स्पर्श-मधुर। इतनें में वहां से एक बुड्ढा गुजरा। मैंने उसे बुड्ढा नहीं कहा। कहा- सयान, एक गोठ ला तो बता। सयान कहने से वह बुड्ढा खुश हो गया, उसे लगा कि हम उसे सम्मान प्रदान कर रहे हैं। वह रुका- बोला, नगर के छौंड़ा हौं का?

हम लोग बैकुंठपुर के लड़के थे, बैकुंठपुर रियासत की राजधानी थी, उसे सभी कोरियावासी नगर ही कहते थे। उसने- सयाने, अनुभवी पुरुष ने हमें बताया कि खरबत पहाड़ पर गेरू की खदाने हैं। जोर की हवा चलती है तो वहां के पत्थर लुढ़कते हुए नीचे आते हैं गेरू से लिपटे हुए। इतने जोर की आंधी और शिखर से तल तक आने में इतनी रगड़ होती है कि पत्थरों के सारे कोने घिस जाते हैं और पत्‍थर बिल्कुल गोल बटिया बन जाते हैं। वह बैठकर वहीं चोंगी सुलगाने लगा। सरई के पत्ते की चोंगी में उसने माखुर भरी, टेंट से चकमक पत्थर निकाला, बीच में सेमल की रुई अटकाई और पत्थरों को रगड़ा ही थी कि भक्क से आग जल गई- दो चार सुट्टे लिए ही होंगे कि उसकी कुंडलिनी जाग्रत हो गई। अब उसके लिए न काल की बाधा थी, न स्थान की। काहे का कलयुग, काहे का द्वापर। मैंने जीतू से कहा कि यार, नहाएंगे बाद में, पहले इन गोल-गोल गेदों को बीनो और झोले में भर लो- जितनी आ जाएं। कान्ति भैया, अपन इन टुकड़ों का करेंगे क्या? मैं बोला- करेंगे क्या, इन पर साड़ी की किनारी लपेटेंगे, चकमकी मिट्टी का पोता फेरेंगे और रामरस खेलेंगे। रामरस सुनना था कि छत्तीसगढ़ का वह सयाना चैतन्य हुआ, उसने अपनी चोंगी से इतने जोर का सुट्टा लिया कि लौ तीन बीता ऊपर उठ गई। शायद वह त्रेता युग में पहुंच गया था। वह राम-लक्ष्मण को रामरस खेलते देख रहा था। इतने में एक सारस आया, वह हम लोगों से थोड़ी दूर पर एक टांग के बल खड़ा हो गया, उद्ग्रीव। बैठक वैसे ही जैसे कोई दर्शक क्रिकेट मैच में खिलाड़ी को बैटिंग करते देख रहा हो। ध्यानावस्थित, तदगतेन मनसा।

हम लोग लोग उस सयाने के पास बैठ गए। वह सयाना सचमुच सयाना था, सज्ञान, सुजान। हमें लगा कि वह सदैव से सयान था,  न कभी वह बालक रहा था, न तरुण,  जैसा वह त्रेता में था, वैसे ही आज भी है। वह चोंगी का एक कश लेता, सरई के पत्ते की मोटी बीड़ी से लौ उठता और एक युग पार कर लेता। तीसरे कश में तो वह जैसे राम के युग में ही पहुंच गया। कहने लगा कि राम, सीता और लखन भैया वनवास मिलने पर चित्रकूट से सीधे खरबत आए। सीधे अर्थात् चांगभखार के रास्ते से, जनकपुर, भरतपुर होते हुए। खरबत की झील देखकर सीता दे ने जिद पकड़ ली- बस, कुछ दिन यहीं रहूंगी। कहा रहोगी, न यहां कंदरा, न गुफा। न मठ, न मढ़ी। लखन भैया ने कोई बहस नहीं की। अपनी धनुही उठाई, कांधे पर तूणीर टांगा और खरबत पहाड़ी की टोह लेने निकल गए। जिन खोजा तिन पाइयां। बड़के भैया और भाभी वहां झील तीरे चुपचाप बैठे थे। राम कह रहे थे- थोड़ा आगे चलो, सरगुजा में एक बोंगरा है। लंबी खुली गुफा। वह स्थल भी बड़ा सुरम्य है। वहां के निवासी भी बड़े अतिथिवत्सल हैं, पर सीताजी रट लगाए बैठी थीं- खरबत, खरबत। लक्ष्मण ने लौटकर अग्रज को बताया कि यहां से कोसेक की दूरी पर तीन गुफाएं प्रशस्त हैं, स्वच्छ हैं, जलादि की सारी सुविधाएं हैं। हम लोग चातुर्मास यहीं बिता सकते हैं। तो ठीक है, भाभी को ले जाओ, दिखाओ, उन्हें पसंद आती है तो हम लोग चार महीने यहीं रहेंगे। गुफाओं को देखकर सीताजी प्रसन्न हो गईं। उन्हें अपने मायके मिथिला की याद आई।

ऐसी ही हरतिमा, ऐसा ही प्रकाश, ऐसा ही मलय समीर। लखन भैया, तुम इस गुफा में रहना, यहां मेरा रंधाघर होगा। सीताजी वहां की रसोई को रसोई न कहकर स्त्रियों की तरह रंधागृह कहतीं- रंधनगृह। यह गुफा थोड़ी बड़ी है- इसमें हम दोनों रहेंगे। राम ने भी गुफाओं को देखकर सीताजी के मत की पुष्टि की। चतुर पतियों की तरह। चलो, यहां सीता का मन लगा रहेगा। खरबत में राम परिवार के चार माह बड़े आराम से कटे। विहान स्नान-ध्यान में कटता, प्रात: जनसंपर्क के लिए नियत था। स्त्रियां भी आतीं, पुरुष भी। मध्याह्न में दोनों भाई आखेट के लिए निकल जाते। यही समय फल-फूल, कंदमूल के संचय का होता। आखेट से लौटने के बाद वे क्या करें ? एक सांझ लखनलाल ने दादा से कहा- दादा, शाम को हम लोग कोई खेल खेलें। क्या खेल खेलें ? लक्ष्मण बड़े चपल, बड़े कौतुक प्रिय, बड़े उत्साही। बोले- खरबत पहाड़ के नीचे जगह-जगह गोल-गोल पत्थर पड़े हुए हैं- ललछौंहे रंग के, बिलकुल कंदुक इव। मैं कल भाभी से उनकी सब्जी काटने का पहसुल मांग लूंगा और उससे महुआ की छाल छील लाऊंगा। महुआ की छाल यों ही लसदार होती है। खूब कसकर पाषाण कंदुक पर लपेटेंगे तो एक आवेष्टन बन जाएगा। उससे चोट नहीं लगेगी।

दूसरे दिन लखन सचमुच मधूक वृक्ष का वल्कल ले आए। ललछौंहे पाषाण खंड पर मधूक वल्कल का वह एक आवेष्टन ऐसे चिपका कि गेंद पर परिधान का अंतर ही मिट गया। राम को एक उपाय सूझा। उन्हें याद आई कि सीता के पास एक पुरानी साड़ी है। उसकी किनारी बड़ी सुंदर है- चमकीली। गोटेदार। यदि उस किनारी को मधूक आवेष्टन पर लपेट दिया जाए तो गेंद के आघात का कोई दुष्प्रभाव नहीं होगा। लखनलाल को अब कंदुक क्रीड़ा की कल्पना साकार होती हुई लगी। लखन पास के ही एक गर्त से चकमिकी मिट्टी उठा लाए। चकमिकी यानी चकमक वाली। बैकुंठपुर में नदी-नालों की सतह पर जो चकमिकी मिट्टी दिखाई पड़ती है, वह और कुछ नहीं, अभ्रक है।

लखन की लाई हुई अभ्रक में गेंद को लिथड़ाया जा रहा है। सीता देखकर हँस रही हैं- अरे, ये काम तुम लोगों के नहीं हैं, तुम लेोग तो तीर-धनुष चलाओ। वह सरई के पत्तों की चुरकी में झील से थोड़ा-सा जल भर लाई हैं। अभ्रक पर उन्होंने जल सिंचन किया है। थोड़ा-सा जल अपनी हथेलियों में लेकर गोंद को भी आर्द्र किया है। अरे, गेंद तो अब चमकने लगी है। अब अंधेरा भी होए तो गेंद गुमेगी नहीं, दिखती रहेगी। खेल के नियम तय किए जा रहे हैं। राम ने सीता खपडिय़ों को लेकर तरी ऊपर जमा लिया है- खपड़ी यानी खपरे के टुकड़े, तरी ऊपर यानी नीचे-ऊपर। राम ने उन सात खपडिय़ों की सुरक्षा का भार स्वत: स्वीकार किया है यानी बल्लेबाजी। लखनजी को गेंद ऐसे फेंकनी थी कि सात खपडिय़ों वाला स्तूप ढह जाए। राम जी सावधान-सतखपड़ी के सामने ऐसी वीर मुद्रा में खड़े होते कि लखनजी को लक्ष्य पर आघात का मौका ही नहीं मिलता। इधर लखनजी ने गेंद फेंकी, उधर रामजी ने उस गेंद को ऐसे ठोका कि कभी सामने खड़े आंवले के तने से टकराती, कभी दाएं फैली खरबत पहाड़ी की तलहटी से। कभी-कभी तो रामजी अपना बल्ला ऐसे घुमाते कि गेंद खरबत झील का विस्तार पारकर उस पार। अब लखनजी गेंद के संधान में लगे हैं। दिन डूब जाता, सूर्यदेव अस्त हो जाते। दोनों भाई गुफा में वापस लौटते। क्लांत भाभी देवर से मजाक करती- आज फिर दिनबुडिय़ा। दिनबुडिय़ा यानी दिन डूब गया है और तुम दांव दिए जा रहे हो। लखन कहते- भाभी, भैया ने बहुत दौड़ाया। बल्ला ऐसे घुमते हैं कि जैसे उनके बल्ले में चुंबक लगा हो, गेंद कैसे भी फेंको, भैया, उसे धुन ही देते हैं। दो-एक दिन तो ऐसे ही चला, फिर सीताजी ने मध्यस्थता की। उन्हें देवर पर दया आई- कल से तुम दोनों बारी-बारी से कंदुक बाजी और बल्लेबाजी करोगे। मैं तुम दोनों भाइयों का खेल देखूंगी। कोई नियम विरुद्ध नहीं होना चाहिए।

रामजी को मर्यादा का बड़ा ध्यान रहता है। ये मर्यादा पुरुषोत्तम यों ही तो नहीं कहलाते। फिर सीताजी जैसे निर्णायक। खेल में वे कोई पक्षपात नहीं करतीं। गोरे देवर, श्याम उन्हें के ज्येष्ठ हैं। फिर दर्शक दीर्घा में सारस भी तो हैं- एक टांग पर खड़े क्रीड़ा का आनंद उठाते हुए। निर्णय देने में जरा-सी चूक हुई कि सारस वृंद क्रीं-क्रीं करने लगता है। रामरस की ऐसी धूम मची कि खरबत के आदिवासी युवा तो वहां समेकित होने ही लगे, बैकुंठपुर, नगर, ओडग़ी के तरुण भी खेल देखने के लिए एकत्र हो रहे हैं। चतुर्दिक रामरस का उन्माद छाया हुआ है। राम के परिवार में आनंद ही आनंद है। लोक से जुडऩे का संयोग अलग से। रामजी ने देखा कि आसपास के गांवों के युवा भी इस खेल में सम्मिलित होना चाहते हैं। उन्होंने सीताजी से परामर्श किया, लखनभाई से भी पूछा। सब खेल को व्यापक आधार देने के पक्ष में हैं। अगले दिन से अभ्यास पर्व मनाए जाने की घोषणा हुई। बल्ले सब अपने-अपने लाएंगे। शाखाएं चुनी जा रही हैं, टंगिया से डगालें काटी जा रही हैं, हंसिया से उन्हें छीला जा रहा है। ऊपर का भाग पतला-मूठवाला। हाथ से पकडऩे में आसानी हो। नीचे का भाग चौड़ा, समतल। बल्ला तैयार हो गया तो उसे मंदी आंच पर तपाया जा रहा है। सामने से कितनी भी तेज गेंद आए, बल्लेबाज का बल्ला उसे ऐसे ठोके कि सीमा के पार। राम नवमी के दिन राम और लखन के दल में विशेष प्रतिस्पर्धा होगी। गांव के सयाने आमंत्रित हैं- खरबत के ही नहीं, आसपास के गांवों के भी। नगर के, ओड़गी के। निर्णय निष्पक्ष होना चाहिए। एक चत्वर बनाया गया। धर्माधिकारी उस चत्वर पर बैठेंगे, वाद-विवाद होने पर पंचाट का निर्णय सर्वमान्य होगा। रामरस मर्यादा का खेल है, भद्रजनों का। रामरस से मर्यादा के जो नियम निर्धारित हुए थे, वे आज भी न्यूनाधिक परिर्वतन के साथ अक्षुण्ण रूप से प्रचलित हैं। अब लोग उसे रामरस नहीं कहते, क्रिकेट कहते हैं, पर नाम में क्या धरा है- आज जब कोई कहता है ‘ये तो क्रिकेट नहीं है’ तो भैया, हमारी तो छाती चौड़ी हो जाती है। बैकुंठपुर में क्रिकेट के पूर्वज रामरस का बचपन बीती। छत्तीसगढ़ में क्रि‍केट का पहला मैच खेला गया।

वह सयाना त्रेता युग की पूर्व स्मृतियों में खो गया। उसकी चोंगी की लौ धीरे-धीरे मंदी पड़ रही थी। उसने उस ओर देखा जिस ओर सारस खड़े थे। वह जनता था कि सारस रामरस के ऐसे दर्शक हैं, जिन्हें न भूख प्यास व्यापती है, न प्यास। वे रात-दि‍न रामरस में ऐसे डूबे रहते हैं कि खेलनेवाले थक जाएं, पर उन्हें कोई क्लांति नहीं होती। सीताजी की रसोई तैयार थी- आईं। दोनों भाइयों को ब्यालू की सूचना दी। सभी सयानमन से कहा दादाजी- आप भी ब्यालू हमारे साथ ही करें। धर्मरक्षक लोगों से भी आग्रह किया कि ब्यालू के बाद ही जाइएगा। हम लोगों को लगा कि हम भी तेता युग में हैं। सीताजी ने, लखनलाल ने दादा राम ने भी रोका, पर हम लोग रुके नहीं। घर में बोलकर नहीं आए थे, कौन विश्‍वास करेगा। पिताजी को पता चलेगा तो सौ सवालों का जवाब देना पड़ेगा। हम लोगों ने कहा- दीदी, हम लोग बराबर आते रहेंगे। हम लोगों को भी रामरस में रस आने लगा है। रामरस में कौन अभागा है, जिसे आनंद न आए?

(सामयि‍क बुक्‍स से प्रकाशि‍त पुस्‍तक बैकुंठपुर में बचपन से साभार)

क्रिकेट दस सुख

क्रिकेट खेलिए। खूब खेलिए। बल्ला उठाइए। न उठाइए। सब चलेगा। निंदा रस बेकार। सब सुख सागर।
पहला सुख : दूसरे टेंशन में, आप फ्री। कई रिकॉर्ड बना तो चुके हैं। विश्व के महान खिलाडिय़ों में शुमार हैं। फिर किस बात की चिंता? बाहर का रास्ता दिखाने की किसकी हिम्मत? लोग करें चिंता, सचिन कितना स्कोर खड़ा करेगा? हरभजन कितने विकेट चटगाएगा? नहीं किया स्कोर खड़ा। दूसरे को नहीं भेजा पैवेलियन। आप चले आए। तो क्या हुआ? दुनिया आनी-जानी। यह कोई कुंभ का मेला है, जो बारह साल बाद आएगा। जल्द होगा दूसरा टूर्नामेंट। फिर देखा जाएगा।