Tag: कुबेर दत्त स्मृति व्याख्यान

गोरखपुर में बच्चों की मौत ने पूरे सिस्टम की संवेदनहीनता को बेपर्दा कर दिया है : मनोज कुमार सिंह

‘दिमागी बुखार: बच्चों की मौत और विफल स्वास्थ्य तंत्र’ पर व्‍याख्‍यान देते मनोज कुमार सिंह।

नई दि‍ल्‍ली : ‘‘गोरखपुर में आक्सीजन संकट के दौरान चार दिन में 53 बच्चों की मौत ने पूरे सिस्टम की संवेदनहीनता को बेपर्दा कर दिया। मौतों का सिलसिला उसके बाद भी जारी है। पूरे देश जनस्वास्थ्य और स्वास्थ्य सेवाओं की क्या स्थिति है, उसे इसके आईने में देखा जा सका है। कुल मिलाकर बहुत भयावह परिदृश्य है। सिर्फ बीआरडी मेडिकल कालेज में वर्ष 1978 से इस वर्ष तक 9907 बच्चों की मौत हो चुकी है। इस आंकड़े में जिला अस्पतालों, सीएचसी-पीएचसी और प्राइवेट अस्पतालों में हुई मौतें शामिल नहीं हैं। इंसेफेलाइटिस से मौतों के आंकड़े आईसवर्ग की तरह हैं। अब तो इस बीमारी का प्रसार देश के 21 राज्यों के 171 जिलों में हो चुका है। खासकर देश के 60 जिले और उत्तर प्रदेश के 20 जिले इससे बुरी तरह प्रभावित हैं।’’ 7 अक्टूबर 2017 को राजेंद्र भवन, दिल्ली में छठा कुबेर दत्त स्मृति व्याख्यान देते हुए चर्चित पत्रकार और जन संस्कृति मंच के महासचिव मनोज कुमार सिंह ने यह कहा। कवि-चित्रकार और टीवी के मशहूर प्रोड्यूसर कुबेर दत्त की स्मृति में हर साल एक व्याख्यान आयोजित होता है। इस बार व्याख्यान का विषय ‘दिमागी बुखार: बच्चों की मौत और विफल स्वास्थ्य तंत्र’ था।

मनोज कुमार सिंह ने कहा कि 40 वर्ष पुरानी बीमारी को अब भी अफसर, नेता और मीडिया रहस्यमय या ‘नवकी’ बीमारी बताने की कोशिश कर रहे हैं। यह दरअसल एक बड़़ा झूठ है। जिन  डॉक्टरों ने इसके निदान की कोशिश की, उन्हें अफसरों द्वारा अपमानित होना पड़ा। बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. केपी कुशवाहा ने बहुत पहले ही जब इस बीमारी को अज्ञात बताए जाने पर आपत्ति जाहिर की थी, तो उनकी नहीं सुनी गई। उनका स्पष्ट तौर पर मानना था कि यह बीमारी जापानी इंसेफेलाइटिस है।

मनोज ने बताया कि इंसेफेलाइटिस को समझने के लिए हमें जापानी इंसेफेलाइटिस और एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिन्ड्रोम को समझना पड़ेगा। चीन, इंडोनेशिया में भी टीकाकरण, सुअर बाड़ों के बेहतर प्रबन्धन से जापानी इंसेफेलाइटिस पर काबू कर लिया गया, लेकिन भारत में हर वर्ष सैकड़ों बच्चों की मौत के बाद भी सरकार ने न तो टीकाकरण का निर्णय लिया और न ही इसके रोकथाम के लिए जरूरी उपाय किए। जब उत्तर प्रदेश में वर्ष 2005 में जेई और एईएस से 1500 से अधिक मौतें हुई तो पहली बार इस बीमारी को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर हाय तौबा मची। उन्होंने कहा कि दिमागी बुखार किसी भी आयु के व्यक्ति को हो सकता है लेकिन 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में यह ज्यादा है। इस रोग में मृत्यु दर तथा शारीरिक व मानसिक अपंगता बहुत अधिक है।

इंसेफेलाइटिस के रोकथाम के दावे और हकीकत का जिक्र करते हुए मनोज कुमार सिंह ने कहा कि स्वास्थ्य विभाग के जिम्मे इंसेफेलाइटिस के इलाज की व्यवस्था ठीक करने, टीकाकरण और इस बीमारी पर शोध का काम था तो पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय को गांवों में शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के लिए इंडिया मार्का हैण्डपम्पों, नलकूपों की स्थापना तथा व्यक्तिगत शौचालयों का बड़ी संख्या में निर्माण कराना था। इसी तरह सामाजिक न्याय मंत्रालय को इस बीमारी से भीषण तौर पर विकलांग हुए बच्चों के पुनर्वास, शिक्षा व इलाज की व्यवस्था का काम था। इस योजना के पांच वर्ष गुजर गए लेकिन अभी तक इंसेफेलाइटिस से होने वाली मौतों व अपंगता को कम करने में सफलता मिलती नहीं दिख रही है। टीकाकरण में लापरवाही है, शुद्ध पेयजल उपलब्ध नहीं है, पानी का पूरा एक कारोबार विकसित हो गया है, शौचालय निर्माण के दावे निरर्थक हैं।

मनोज कुमार सिंह ने स्थापना के 45 वर्ष और गुजर जाने के बाद भी बीआरडी मेडिकल कालेज में एमबीबीएस की सीट 100 से ज्यादा न बढ़ पाने पर सवाल उठाया, जबकि इंसेफेलाइटिस के सर्वाधिक मरीज आते हैं। यहां हर वर्ष जेई एईएस के 2500 से 3000 मरीज आते हैं, लेकिन इस मेडिकल कालेज को दवाइयों, डाक्टरों, पैरा मेडिकल स्टाफ, वेंटीलेटर, आक्सीजन के लिए भी जूझना पड़ता है। इंसेफेलाइटिस की दवाओं, चिकित्सकों व पैरामेडिकल स्टाफ, उपकरणों की खरीद व मरम्मत आदि के लिए अभी तक अलग से बजट का प्रबंध नहीं किया गया है। इंसेफेलाइटिस मरीजों के इलाज में लगे चिकित्सकों, नर्स, वार्ड ब्वाय व अन्य कर्मचारियों का वेतन, मरीजों की दवाइयां तथा उनके इलाज में उपयोगी उपकरणों की मरम्मत के लिए लगभग एक वर्ष में सिर्फ 40 करोड़ की बजट की जरूरत है, पर केंद्र और राज्य की सरकार इसे देने में कंजूसी कर रही है। ये हालात बताते हैं कि मंत्रियों-अफसरों के दावों और उन्हें अमली जामा पहनाने में कितना फर्क हैं। उन्होंने तंज करते हुए कहा कि जापान ने 1958 में ही इस बीमारी पर काबू पा लिया था। जापान से बुलेट ट्रेन लाने से ज्यादा जरूरी यह था कि उसकी तरह हम इस बीमारी को रोक लगा पाते।

मनोज कुमार सिंह ने कहा कि जेई/एइएस से मरने वाले बच्चे और लोग चूंकि गरीब परिवार के हैं इसलिए इस मामले में चारों तरफ चुप्पी दिखाई देती है। डेंगू या स्वाइन फलू से दिल्ली और पूना में कुछ लोगों की मौत पर जिस तरह हंगामा मचता है, उस तरह की हलचल इंसेफेलाइटिस से हजारों बच्चों की मौत पर कभी नहीं हुई। गरीबी के कारण ये इंसेफेलाइटिस के आसान शिकार होने के साथ-साथ हमारी राजनीति के लिए भी उपेक्षा के शिकार है।

उन्होंने यह भी बताया कि चीन निर्मित वस्तुओं के बहिष्कार करने वाली राजनीति के बजाय सच यह है कि एक दशक से चीन में बना टीका ही देश के लाखों बच्चों को जापानी इंसेफेलाइटिस जैसी घातक बीमारी से बचा रहा है। सस्ता टीका मिलने के बावजूद हमारे देश की सरकार ने टीके लगाने का निर्णय लेने में काफी देर नहीं की होती तो सैकड़ों बच्चों की जान बचायी जा सकती थी। वर्ष 2013 में भारत में जेई का देशी वैक्सीन बना और इसे अक्टूबर 2013 में लांच करने की घोषणा की गई, लेकिन अभी देश की जरूरतों के मुताबिक यह वैक्सीन उत्पादित नहीं हो पा रही है।

मनोज कुमार सिंह ने कहा कि देश की सरकार सकल घेरलू उत्पाद का सिर्फ 1.01 फीसदी स्वास्थ्य पर खर्च कर रही है। बहुत से छोटे देश भी स्वास्थ्य पर भारत से ज्यादा खर्च कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य सेवा की हालत तो और खराब है। ग्रामीण स्वास्थ्य सांख्यिकी 2016 के अनुसार यूपी के सीएचसी में 3092 विशेषज्ञ डॉक्टरों सर्जन, गायनकोलाजिस्ट, फिजिशियन बालरोग विशेषज्ञ की जरूरत है, लेकिन सिर्फ 484 तैनात हैं यानी 2608 की जरूरत है। देश में भी यही हाल है। कुल विशेषज्ञ चिकित्सकों के 17 हजार से अधिक पोस्ट खाली हैं। यूपी के 773 सीएचसी में सिर्फ 112 सर्जन, 154 बाल रोग विशेषज्ञ, 115 स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ, 143 रेडियोग्राफर हैं। इस स्वास्थ्य ढांचे पर इंसेफेलाइटिस जैसी जटिल बीमारी तो क्या साधारण बीमारियों का भी मुकाबला नहीं किया जा सकता है। यही कारण है कि उत्‍तर प्रदेश में बच्चों की मौत सबसे अधिक है। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य को सिर्फ चिकित्सा से जोड़ कर नहीं देखना चाहिए, बल्कि इसका सीधा सम्बन्ध गरीबी और सामाजिक-आर्थिक कारण भी हैं। यदि गरीबी कम नहीं होगी और सभी लोगों को बेहतर रोजगार, स्वच्छ पेयजल, शौचालय उपलब्ध नहीं होगा तो देश को स्वस्थ रखना संभव नहीं हो पाएगा।

व्याख्यान के बाद गीतेश, सौरभ, आशीष मिश्र, नूतन, अखिल रंजन, इरफान और विवेक भारद्वाज के सवालों का जवाब देते हुए मनोज कुमार सिंह ने कहा कि रिसर्च के मामले में सरकारी या प्राइवेट स्तर पर सन्नाटे की स्थिति है, इसलिए कि इस बीमारी पर रिसर्च को लेकर किसी की ओर से कोई फंडिंग नहीं है। फंडिंग थी तो एचआइवी, एडस की बड़ी चर्चा होती थी, पर फंडिंग बंद होते ही लगता है कि वे बीमारी ही गायब हो गर्ईं।

मनोज कुमार सिंह ने दो टूक कहा कि इस बीमारी के निदान में सरकार की कोई रुचि नहीं है, इसलिए कि तब उसे स्वच्छ पानी, ठीक शौचालय और संविधान प्रदत्त अन्य अधिकारों को सुनिश्चित करना पड़ेगा। विडंबना यह है कि राजनीतिक पार्टियों के लोग जब विपक्ष में होते हैं, तो इसे मुद्दा बनाते हैं, पर सरकार में जाते ही इस पर पर्दा डालने लगते हैं। उन्होंने कहा कि बोलना और करना दो भिन्न बातें हैं। जब भाजपा विपक्ष में थी, तो योगी ने इस बीमारी को लेकर मौन जुलूस निकाला था, लेकिन नेशनल हाईवे पर नौ गायें कट जाने के बाद जिस तरह तीन दिन तक उन्होंने बंदी करवाई थी, वैसा बंद उन्होंने इंसेफेलाइटिस के लिए कभी नहीं करवाया। मनोज ने बताया कि अपनी जिम्मेवारी से बचने के लिए ही सरकार ने विगत 11 अगस्त को मरीजों की मदद करने वाले डॉ कफील को खलनायक बनाया। उन्होंने कहा कि बीमारी का दायरा बढ़ रहा है। शुद्ध पेयजल की समस्या बहुत गंभीर है, कम गहराई वाले हैंडपंपों के जरिए इंसेफेलाइटिस के बीमारी के संक्रमण होता है, वहीं ज्यादा गहराई वाले हैंडपंपों में आर्सेनिक और उससे होने वाले कैंसर का खतरा है। बच्चे वोटबैंक नहीं हैं, इसलिए राजनीतिक पार्टियों के लिए यह गंभीर मुद्दा नहीं है। उनके ज्यादातर अभिभावक गरीब और मजदूर हैं, भले ही रोजी-रोटी के लिए वे महानगरों में चले जाएं, पर इस इलाके से उनके पूरे परिवार का विस्थापित होकर कहीं दूसरी जगह चले जाना संभव नहीं है।

मनोज का मानना था कि सरकार पर आंदोलनात्मक दबाव बनाना जरूरी है। तत्काल तो बचाव पर ध्यान देना जरूरी है, प्रति मरीज लगभग 3000 रुपये की जरूरत है, प्राइवेट प्रैक्टिस वाले सुविधा देने को तैयार नहीं है। यह काम तो सरकार को ही करना होगा, पर मुख्यमंत्री की रुचि तो केरल में जाकर वहां के स्वास्थ्य सेवा पर टीका-टिप्पणी करने में ज्यादा है, जहां बच्चों की इस तरह की मौतें बहुत ही कम होती हैं।

मनोज ने बताया कि साहित्य में भी मदन मोहन के उपन्यास ‘जहां एक जंगल था’ और एक-दो कविताओं के अतिरिक्त इंसेफेलाइटिस की बीमारी का कोई प्रगटीकरण नहीं है।

संचालन करते हुए सुधीर सुमन ने इंसेफेलाइटिस से हुई बच्चों की मौतों में सरकार और स्वास्थ्य तंत्र की विफलताओं को ढंकने की कोशिश के विरुद्ध एक जनपक्षीय पत्रकार के बतौर मनोज कुमार सिंह के संघर्ष का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि मनोज लगातार इस बीमारी को लेकर लिखते रहे हैं, पर इस बार जिस लापरवाही और संवेदहीनता की वजह से बड़े पैमाने पर बच्चों की मौतें हुईं, जो कि एक किस्म की हत्या ही थी, उसके पीछे की वजहों और उसके लिए जिम्मेवार लोगों और उनके तंत्र का गोरखपुर न्यूज ऑनलाइन वेब पोर्टल के जरिए मनोज ने बखूबी पर्दाफाश किया। सच पर पर्दा डालने की सत्ता की कोशिशों के बरअक्स निर्भीकता के साथ उन्होंने जो संघर्ष किया, वह वैकल्पिक मीडिया में लगे लोगों के लिए अनुकरणीय है।

सवाल-जवाब के सत्र से पूर्व, चर्चित चित्रकार अशोक भौमिक ने व्याख्यानकर्ता मनोज कुमार सिंह को स्मृति-चिह्न के बतौर कुबेर दत्त द्वारा बनाई गई पेंटिंग दी। गोरखपुर में स्वास्थ्य तंत्र और सरकार की नाकामियों और संवेदनहीनता की वजह से मारे गए बच्चों की याद में जन संस्कृति मंच के कला समूह द्वारा पेंटिंग प्रदर्शनी लगाए जाने तथा उससे होने वाली आय के जरिए इंसेफेलाइटिस के निदान के लिए चलने वाले प्रयासों में मदद देने की घोषणा भी की गई।

व्याख्यान से पूर्व जसम, दिल्ली के संयोजक रामनरेश राम ने लोगों का स्वागत किया। उसके बाद प्रसिद्ध चित्रकार हरिपाल त्यागी ने कुबेर दत्त की कविताओं के नए संग्रह ‘बचा हुआ नमक लेकर’ का लोकार्पण किया। कवि-वैज्ञानिक लाल्टू द्वारा लिखी गई इस संग्रह की भूमिका का पाठ श्याम सुशील ने किया। सुधीर सुमन ने कहा कि इस संग्रह कविताओं में कुबेर दत्त की कविता के सारे रंग और अंदाज मौजूद हैं। उन्होंने कवि के इस संग्रह और अन्य संग्रहों में मौजूद बच्चों से संबंधित कविताओं का पाठ किया। कुबेर दत्त की कविताओं के हवाले से यह बात सामने आई कि नवउदारवादी अर्थव्यवस्था के असर में विकसित राजनीतिक-धार्मिक सत्ता की उन्मत्त तानाशाही बच्चों के लिए यानी मनुष्य के भविष्य के लिए भी खतरनाक है। नब्बे के दशक के शुरुआत में लिखी गई अपनी एक कविता में उन्होंने जिन सांप्रदायिक फासीवादी ताकतों की शिनाख्त की थी, वे आज हूबहू उसी रूप में हमारे सामने हैं। गोरखपुर में भी वहीं उन्मादी, नृशंस और जनता के प्रति संवेदनहीन प्रवृत्ति वाला चेहरा नजर आया।

अध्यक्षता करते हुए बनारस से आए साहित्यकार वाचस्पति ने कहा कि सरकार की जो आपराधिक लापरवाही और नेतृत्व का जो पाखंड है, उसे मनोज कुमार ने अपने व्याख्यान के जरिए स्पष्ट रूप से दिखा दिया। इस बीमारी से बचाव के लिए निरंतर संघर्ष की आवश्यकता है। उन्होंने कुबेर दत्त से जुड़े संस्मरण भी सुनाए।

आयोजन के आरंभ में मशहूर फिल्म निर्देशक कुंदन शाह और उचित इलाज के अभाव में मारे गए बच्चों को एक मिनट का मौन रखकर श्रद्धांजलि दी गई।

इस मौके पर वरिष्ठ कवि राम कुमार कृषक, रमेश आजाद, वरिष्ठ पत्रकार आनंद स्वरूप वर्मा, जसम के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेन्द्र कुमार, रामजी राय, दूरदर्शन आर्काइव्स की पूर्व निदेशक कमलिनी दत्त, कहानीकार महेश दर्पण, दिनेश श्रीनेत, कौशल किशोर, पत्रकार पंकज श्रीवास्तव, अभिषेक श्रीवास्तव, कवि मदन कश्यप, दिगंबर, रंगकर्मी जहूर आलम, कवि शोभा सिंह, कहानीकार योगेंद्र आहूजा, आलोचक प्रणय कृष्ण, आशुतोष कुमार, राधिका मेनन, पत्रकार भाषा सिंह, अशोक चौधरी, डॉ. एसपी सिन्हा, प्रभात कुमार, राजेंद्र प्रथोली, गिरिजा पाठक, अमरनाथ तिवारी, अनुपम सिंह, मनीषा, रविप्रकाश, बृजेश यादव, इरेंद्र, मृत्युंजय, तूलिका, अवधेश, मुकुल सरल, रविदत्त शर्मा, सोमदत्त शर्मा, संजय भारद्वाज, गीतेश, सुनीता, रूचि दीक्षित, अंशुमान, कपिल शर्मा, रामनिवास सिंह, सुनील चौधरी, सुजीत कुमार, कनुप्रिया, असद शेख, नौशाद राणा, शालिनी श्रीनेत, रोहित कौशिक, माला जी, दिवस, अतुल कुमार, उद्देश्य आदि मौजूद थे।

प्रस्‍तुति‍ : सुधीर सुमन

‘दि‍मागी बुखार- बच्‍चों की मौत और वि‍फल स्‍वास्‍थ्‍य तंत्र’ पर व्‍याख्‍यान 7 को  

नई दि‍ल्‍ली : इंसेफेलाइटिस यानी दिमागी बुखार से चार दिनों के भीतर पचास से अधिक बच्चों की मौत ने इस बार पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। जनता के भीतर सबसे ज्यादा गुस्सा उत्तर प्रदेश के मंत्रियों के बयानों से भड़का। यह बीमारी क्या है? इसके कितने प्रकार हैं? देश के कौन से इलाके इससे प्रभावित हैं? विगत 40 वर्षों में इसका समाधान न हो पाने की वजहें क्या हैं? किस तरह महज एक अस्पताल में ही 40 वर्षों में इस बीमारी से 9733 मौतें हुईं? क्यों पूरा तंत्र और सरकार बच्चों की मौतों को सामान्य मौतें बताने के लिए पूरा जोर लगाए रहा? ऐसे तमाम सवालों से संबंधित है इस बार का कुबेर दत्त स्मृति व्याख्यान।

यह बीमारी तो महज एक बानगी है इस देश में जनस्वास्थ्य के प्रति आपराधिक लापरवाही की। ऐसी कई बीमारियों की चपेट में है इस देश की जनता।

इंसेफलाइटिस की बीमारी से हुई बच्चों की मौतों और विफल स्वास्थ्य तंत्र पर छठा कुबेर दत्त स्मृति व्याख्यान देंगे मनोज कुमार सिंह, जो चर्चित युवा पत्रकार रहे हैं, जमीनी रिपोर्टों के लिए मशहूर हैं। गोरखपुर से प्रतिरोध का सिनेमा अभियान शुरू करने वाले मनोज कुमार सिंह वहां की बौद्धिक-सांस्कृतिक जगत की एक महत्वपूर्ण शख्सियत हैं। जन संस्कृति मंच के हालिया राष्ट्रीय सम्मेलन में उन्हें महासचिव की जिम्मेवारी दी गई है। फिलहाल वे गोरखपुर न्यूज लाइन नामक चर्चित वेबपोर्टल चला रहे हैं।

मनोज कुमार सिंह का मानना है कि इंसेफेलाइटिस से मौतों के जो आकंडे सामने आ रहे हैं, वे तो आईसवर्ग की तरह हैं। इन आंकड़ों में जिला अस्पतालों, सीएचसी-पीएचसी और प्राइवेट अस्पतालों में हुई मौतें शामिल नहीं हैं। अब तो यह बीमारी सिर्फ पूर्वांचल तक ही सीमित नहीं रह गई है। इसका प्रसार देश के 21 राज्यों के 171 जिलों में हो चुका है। इस बीमारी के दो प्रकार हैं- जापानी इंसेफलाइटिस और एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिन्ड्रोम। नेशनल वेक्टर बार्न डिजीज कंट्रोल प्रोग्राम के मुताबिक वर्ष 2010 से 2016 तक एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिन्ड्रोम से पूरे देश में 61957 लोग बीमार पड़े, जिसमें 8598 लोगों की मौत हो गई। इसी अवधि में जापानी इंसेफेलाइटिस से 8669 लोग बीमार हुए, जिनमें से 1482 की मौत हो गई। इस वर्ष अगस्त माह तक पूरे देश में एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिन्ड्रोम के 5413 केस और 369 मौतों के आंकड़े आए। जापानी इंसेफेलाइटिस से इसी अवधि में 838 केस और 86 मौत के मामले सामने आए। अभी भी मौतों की सूचनाएं आ ही रही हैं।

इंसेफेलाइटिस के मुद्दे पर मनोज पिछले कई वर्षों से लगातार लिखते रहे हैं।

गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में बच्चों की मौत के सवाल पर जनता के दुख-दर्द और उसके गुस्से के साथ वे अपने वेबपोर्टल के जरिए खड़े रहे, जबकि सरकार और स्वास्थ्य तंत्र के नकारेपन और आपराधिक संवेदनहीनता को ढंकने की हरसंभव कोशिश की जाती रही। आइए जनता के सच के साथ, उसकी व्यथा के साथ निर्भीकता से खड़े पत्रकार के अनुभव को हम सुनें। मौत बांटने वाले संवेदनहीन तंत्र के विरुद्ध जीवन के लिए विभिन्न स्तरों पर जारी संघर्षों में से एक संघर्ष के साझीदार बनें।

कार्यक्रम की रूपरेखा-

तारीख- 7 अक्टूबर 2017, समय- 5 बजे शाम

स्थान- राजेंद्र भवन, दीनदयाल उपाध्याय मार्ग, आईटीओ मेट्रो स्टेशन के पास, दिल्ली

लोकतांत्रिक समाज में प्रतिरोध के स्वर का होना जरूरी है : मंगलेश डबराल

kuber dutt smriti vyakhyan

नई दि‍ल्‍ली :  ‘हमारे देश में जो फासीवादी माहौल बना है, उसके पीछे एक लंबी प्रक्रिया रही है। यह धर्म आधारित फासीवाद है, जो जाति और जेंडर के स्तर पर हिंसा को वैधता प्रदान करता है। घृणा और हिंसा को स्टेट पावर का समर्थन हासिल है। कल तक आपस में एक-दूसरे समुदाय पर जो आक्षेप लोग घरों के भीतर बैठकर लगाते थे, जो गंदगी दबी हुई थी, अब उसे खुल्लममखुल्ला मान्यता मिल गई है।’ 7 नवम्‍बर को गांधी शांति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली में ‘हिंसा की संस्कृति बनाम असहमति, चुनाव और प्रतिरोध’ विषय पर चौथा कुबेर दत्त स्मृति व्याख्यान देते हुए मशहूर नारीवादी और इतिहासकार उमा चक्रवर्ती ने यह कहा।

उमा चक्रवर्ती ने कहा कि डॉ. नरेंद्र दाभोलकर और पानसरे तो तर्कवादी बुद्धिजीवी थे, कलबुर्गी तो उसी समाज के बारे में लिख रहे थे, जिसकी जाति और कर्मकांड विरोधी परंपरा थी, लेकिन  उसे भी बर्दाश्त नहीं किया गया। अब तो हालत यह हो गई है कि हम अपनी ही परंपरा को खोलकर नहीं देख सकते, क्योंकि हमारे ऊपर जो ठेकेदार बैठे हैं, वे हमारा मुंह दबा देंगे। जो हमारी परंपरा है उसके भीतर भी हम उतरेंगे तो हम पर इल्जाम लगेगा कि हम भावनाओं को आहत कर रहे हैं। भावनाएं आहत होने को आज एक तरह से संवैधानिक अधिकार बना दिया गया है। आज के जमाने में ज्योति बा फुले होते, तो उन्हें भी मार दिया जाता।

उमा चक्रवर्ती ने कहा कि आज जो बगावत शुरू हुई है, वह देर से ही सही पर दुरुस्त शुरुआत है। सोचने और चुनने का अधिकार और उसके अनुरूप क्रियाशील होना हमारा बुनियादी अधिकार है। इसका कोई मतलब नहीं है कि पहले क्यों नहीं बोले, अब क्यों बोल रहे हैं? आनंद पट्टवर्धन ने कहा कि वे इमरजेंसी के खिलाफ थे, तो उनसे पूछा जा रहा है कि माओइस्टों के खिलाफ क्यों नहीं बोला? कारपोरेट मीडिया में जो डिबेट हो रहा है, उसके जरिए एक पोलराइज्ड हिस्टिरिया निर्मित की जा रही है। एक ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि कोई किसी चीज के बारे में कुछ बोल नहीं सके।

उमा चक्रवर्ती ने यह भी संकेत किया कि इस उन्माद और हिंसा का जनविरोधी आर्थिक नीतियों को ढंकने के लिए भी इस्तेमाल किया जा रहा है। वे नहीं चाहते कि बजट में जो कटौती हो रही है, उस पर कोई बात हो। अब हमारे सामने सवाल यह है कि हम कैसे अपनी बात कहेंगे, कैसे लिखेंगे, कैसे दूसरों से बातचीत करेंगे? कैसे हम अंततः कोई राजनीतिक गोलबंदी करेंगे?

उमा चक्रवर्ती ने कहा कि सांप्रदायिकता आज की चीज नहीं है, इसका लंबा इतिहास है। उन्होंने कुछ घटनाओं का जिक्र करते हुए बताया कि लिंग और जाति के स्तर पर मौजूद मानवविरोधी व्यवहार भी सांप्रदायिक शक्तियों के लिए मददगार सिद्ध हो रहा है। उन्होंने कहा कि जिस समाज में अंतर्जातीय शादियों पर घिनौनी प्रतिक्रियाएं होती हैं, वहां बाबू बजरंगी पैदा होंगे ही। उसने कहा था कि हर हिंदू घर में एक एटम बम है यानी घर में जो लड़की है, वह एटम बम है, कभी भी फूट सकती है, क्योंकि वह कभी भी किसी के साथ जा सकती है, क्योंकि उस लड़की के हाथ में यह अधिकार है कि वह किसी को चुन लेगी। इसकी गहरी वजह हमारी सामाजिक संरचना में है। यही मानसिकता ‘लव जेहाद’ का प्रचार करती है, जिसे लेकर दंगे हो जाते हैं।

उन्होंने कहा कि राजनीति हर चीज में है। किस तरह का घर होगा, किस तरह की शादी होगी, किस तरह का कौम बनेगा, किस तरह का हमारा देश बनेगा, ये सवाल राजनीति से अलग नहीं हैं। मुझे लगता है कि फासिज्म तो हमारे प्रतिदिन के जीवन में है। उन्होंने कहा कि सहिष्णुता तो हमारी सामाजिक संरचना में है ही नहीं। पहले जो लोग अपनी जीवन शैली थोड़ी –सा बदलते थे तो समाज उन्हें बहिष्कृत कर देता था, आज तो मार ही दिया जा रहा है। मीडिया की छात्रा निरूपमा जो ब्राह्मण थी और कायस्थ लड़के से प्रेम करती थी, उसकी मौत का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि उसके पिता ने उसे चिट्ठी लिखी थी कि तुम जिस संविधान की बात कर रही हो, उसको सिर्फ साठ साल हुए हैं, हमारा संविधान जो है वह 2000 साल का है। उनका जो संविधान है, वह ब्राह्मणवादी मान्यताओं पर आधारित है।

उमा चक्रवर्ती ने कहा कि आज हाशिये के समाजों से चुनौती आएगी ही आएगी। वे लोग अपना हक मांगेंगे, कोई भी चुप नहीं रहने वाला। युवाओं की ओर से भी चुनौती आ रही है। वे बड़े दायरे में चीजों को देख रहे हैं, उनमें प्रश्नात्मकता आई है। आपातकाल के दौरान बुद्धिजीवियों की भूमिका को याद करते हुए उन्होंने कहा कि शासकवर्ग देख रहा है कि विश्वविद्यालयों से भी चुनौती आ रही है, तो वहां भी हिंसा जरूर आएगी, हमें उसका विरोध करना होगा। सार्वजनिक बयानों से कुछ तो फर्क पड़ा है। आगे चलकर हमें देखना होगा कि हम किस तरह का प्रतिरोध और आंदोलन खड़ा कर सकते हैं। प्रतिरोध की संस्कृति को हमें बनाना होगा, उसे फिर से सृजित करना होगा। हमें हर चीज पर बोलना होगा। हक के लिए हो रही हर लड़ाई को आपस में जोड़ना होगा। अगर मैं जिंदा हूं तो बोलूंगी। बकौल फैज़ – बोल कि सच जिंदा है अब तक।

व्याख्यान के बाद श्रोताओं ने उनसे सवाल पूछे, जिसका जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि हम सच्चे देशभक्त हैं। देश के प्रतिनिधि सत्ताधारी नहीं हो सकते। कारपोरेट मीडिया और देश के शासकवर्ग के बीच एक तरह की मैच फिक्सिंग है। वे सोनी सोरी के टार्चर के मुद्दे को नहीं उठाते। टार्चर करने वाले अधिकारी को इस देश में गैलेंट्री एवार्ड मिलता है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब सरकार कह रही है कि लेखकों-कलाकारों का विरोध मैनुफैक्चर्ड है, तो फिर ऐसी सरकार से बात कैसे हो सकती है?

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ कवि और जसम के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मंगलेश डबराल ने कहा कि लेखकों ने किसी राजनीतिक या सामूहिक निर्णय के आधार पर नहीं, बल्कि अपने विवेक और जमीर के आधार पर सम्मान वापसी का निर्णय लिया, जो स्वतःस्फूर्त रूप से एक अभियान बन गया।

उन्होंने सवाल उठाया कि क्या यह महज संयोग है कि भारत के तथाकथित राष्ट्रवादी और पाकिस्तान के उग्रवादी लगभग एक ही तरह की भाषा बोल रहे हैं? भारत में प्रतिरोध का सांस्कृतिक कर्म अगर अधिक मजबूत रहता तो ऐसी भाषा का विकास संभव न हो पाता जो अपनी प्रकृति में हिंसक और अलोकतांत्रिक है, जैसा आज आमतौर पर लोग अपने विरोधियों के लिए करते देखे जा रहे हैं। लोकतांत्रिक समाज में प्रतिरोध के स्वर का होना जरूरी है, उसका बहुमत या अल्पमत होना जरूरी नहीं। उन्होंने कहा कि देश किसी शेर की सवारी करती देवी का नाम नहीं है जिसे हम भारतमाता कहते हैं। देश, उस भूमि पर रहने वाली जनता की बहुत ठोस आकांक्षाओं और जरूरतों का नाम है जिसे जानबूझकर इन दिनों झुठलाया जा रहा है।

जसम के राष्ट्रीय सहसचिव सुधीर सुमन ने संचालन के क्रम में कुबेर दत्त की कुछ कविताओं के अंशों का पाठ करते हुए कहा कि सत्ता के इशारे पर होने वाले दमन और उसके संरक्षण में चलने वाली हिंसा का विरोध किसी भी जेनुईन रचनाकार की पहचान है। आज पहली बार एक साथ साहित्य-कला की सारी विधाओं से जुड़े लोग सामाजिक-राजनीतिक हिंसा की संस्कृति के खिलाफ खड़े हुए हैं। इस लड़ाई को जारी रखना देश और समाज के बेहतर भविष्य लिए जरूरी है।

कार्यक्रम में जमशेदपुर में इस साल जुलाई में हुए सांप्रदायिक दंगे पर फिल्म बनाने वाले युवा फिल्मकार कुमार गौरव को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और विश्व हिंदू परिषद द्वारा जान से मारने की धमकी दिए जाने की भर्त्सना की गई तथा छात्रों के आक्युपाई यूजीसी आंदोलन के समर्थन में प्रस्ताव लिया गया।

इस मौके पर वरिष्ठ कवि रामकुमार कृषक, वरिष्ठ चित्रकार हरिपाल त्यागी, लेखक प्रेमपाल शर्मा, दूरदर्शन आर्काइव की पूर्व निदेशक और नृत्य निर्देशक कमलिनी दत्त, कथाकार विवेकानंद, जसम के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष चित्रकार अशोक भौमिक, चित्रकार सावी सावरकर, आलोचक आशुतोष कुमार, लेखक  बजरंग बिहारी तिवारी, लेखिका अनीता भारती, संजीव कुमार सिंह, विकास नारायण राय, ज्ञानपीठ के पूर्व निदेशक दिनेश मिश्र, जसम उ.प्र. के सचिव युवा आलोचक प्रेमशंकर, प्रतिरोध का सिनेमा के राष्ट्रीय संयोजक संजय जोशी, पत्रकार प्रसून लतांत, अखिल रंजन, भाषा सिंह, उपेंद्र स्वामी, कलकत्ता से आए बुद्धिजीवी आशुतोष सिंह, कवि श्याम सुशील, तृप्ति कौशिक, शिक्षाविद राधिका मेनन, युवा कवि अरुण सौरभ, कल्लोल दास, आशीष मिश्र, वेद राव, रामनिवास, कमला श्रीनिवासन, निशा महाजन, रोहित कौशिक, राम नरेश राम, अनुपम सिंह, रविदत्त शर्मा, सोमदत्त शर्मा, चंद्रिका, असलम, दिनेश, सौरभ, पाखी जोशी आदि मौजूद थे।

सुधीर सुमन द्वारा जसम, दिल्ली के लिए जारी

पहला कुबेर दत्त स्मृति व्याख्यान 20 को

2 अक्टूबर 2011 को दूरदर्शन के चर्चित प्रोड्यूसर, कवि और चित्रकार कुबेर दत्त का अचानक निधन हो गया था। उनकी शोकसभा में जसम ने तय किया था कि उनकी याद में हर साल मीडिया और साहित्य-संस्कृति विषय पर एक स्मृति व्याख्यान आयोजित किया जाएगा। 20 अक्टूबर को शाम 5.30 बजे गाँधी शांति प्रतिष्ठान में हो रहे जन संस्कृति मंच के आयोजन में पहला कुबेर दत्त स्मृति व्याख्यान हिन्‍दी के चर्चित कवि और कुबेर दत्त के मित्र मंगलेश डबराल देंगे। व्याख्यान का विषय- ‘साहित्य और जनमाध्यम’ है।

दरअसल कुबेर दत्त ने दूरदर्शन के माध्यम से आम अवाम को न केवल अपने देश के श्रेष्ठ जनपक्षीय साहित्य और कलात्मक सृजन से अवगत कराया, बल्कि  दुनिया के महान साहित्यकारों और कलाकारों से भी परिचित कराया। उदाहरण के लिये खलील जिब्रान, तोल्सतोय, चेखव, लू-शून, चोमा द कोरोस, हेंकोवस्की, बारान्निकोव, रेरिख, एलिजाबेथ ब्रूनर, एलियास लोन्रोट, क्रिस्तोफ ब्रिस्टी, चेलिशेव, ओदोनेल स्मेकेल, ज्यां पाल सात्र, देरिदा, एडवर्ड सईद, ओलिवियर टोड, नोम चोमस्की, प्रेमचंद, प्रसाद, निराला, महादेवी, पंत, किशोरीदास वाजपेयी, बच्चन, अज्ञेय, नागार्जुन, त्रिलोचन, शमशेर, शिवमंगल सिंह सुमन, केदारनाथ अग्रवाल, भवानी प्रसाद मिश्र, चंद्रकिरण सौनरिक्शा, अमृत राय, गिरिजा कुमार माथुर, विष्णुचंद्र शर्मा, मुज्तबा हुसैन, हंसराज रहबर, कमला देवी चटोपाध्याय, विष्णु प्रभाकर, भीष्म साहनी, पद्मा सचदेव, इस्मत चुगताई, कमलेश्‍वर, राजेंद्र यादव, मोहन राकेश, मार्कंडेय, रामविलास शर्मा, नामवर सिंह, मैनेजर पांडेय, वरवर राव, स्वदेश दीपक, गोपालदास नीरज, कुमारेंद्र पारसनाथ सिंह, कुमार विकल, विष्णु खरे, केदारनाथ सिंह इब्बार रबी, लीलाधर जगूड़ी, गिरधर राठी, रमनाथ अवस्थी, रामकुमार कृषक, तसलीमा नसरीन, त्रिनेत्र जोशी, पंकज सिंह, मंगलेश डबराल, सुरेश सलिल, अनामिका, अजय सिंह, धनंजय सिंह, बल्ली सिंह चीमा, विष्णु नागर, असद जैदी, मदन कश्यप, देवी प्रसाद मिश्र, कात्यायनी जैसे कई साहित्यकार हैं, जिन पर उन्होंने कार्यक्रम बनाए या उनका इंटरव्यू लिया या उनके साथ मिलकर कार्यक्रम तैयार किया। ऋत्विक घटक, नेत्रसिंह रावत, नेमीचंद्र जैन, सफदर हाशमी जैसे फिल्मकार और रंगकर्मियों पर भी उन्होंने कार्यक्रम तैयार किये। इसी तरह रजा, जे. स्वामीनाथन, विवान सुंदरम, गुलाम रसूल संतोष, हरीप्रकाश त्यागी जैसे चित्रकारों, हरि प्रसाद चैरसिया, उस्ताद अली अकबर खां जैसे संगीतकारों पर भी उन्होंने कार्यक्रम बनाए। पिकासो की पेंटिंग पर सत्तर कडि़यों का धारावाहिक उन्होंने बनाया। नेल्शन मंडेला पर बनाया गया उनका कार्यक्रम भी काफी चर्चित रहा। अपने कार्यकाल में उन्होंने हजारों साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों को दूरदर्शन के लिये रिकार्ड किया और उन पर कार्यक्रम बनाए। संत कबीर की छह सौवीं जयंती हो या मई दिवस या सुलेखन का इतिहास- वह मानो अपने समय के हर संदर्भ को दर्ज कर देना चाहते थे। हाल ही में गुजरे रामविलास शर्मा के छोटे भाई रामशरण शर्मा ‘मुंशी’ द्वारा राम की शक्तिपूजा के पाठ की रिकार्डिंग भी दूरदर्शन के पास है, यह उन्हीं के प्रयासों का परिणाम है। उनकी जीवनसंगिनी कमलिनी दत्त बताती हैं कि नई सदी के शुरुआत में एक साल उन्होंने हर दिन के लिये एक प्रोग्राम तैयार किया, जिसमें अगर किसी रोज अल्यूमुनियम दिवस था, तो उस पर भी प्रोग्राम उन्होंने बनाया।

कुबेर दत्त ने 25 वर्षों तक ‘पत्रिका’ कार्यक्रम का निर्देशन किया। 12 वर्षों तक श्रोताओं के पत्रोत्तर का कार्यक्रम ‘आप और हम’ पेश किया। आईना, कला परिक्रमा, पहल, जनवाणी, सरस्वती, फलक, सृजन, किताब की दुनिया आदि कार्यक्रमों के जरिये उन्होंने अपने समय के काफी महत्वपूर्ण प्रसंगों, संदर्भों और बहसों को दर्ज किया। वह दूरदर्शन में एक अधिकारी थे, लेकिन सत्ता की संस्कृति के विरोधी थे और भरसक उन्होंने जनता के पक्ष में खड़े होकर कार्यक्रम बनाये। प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ और जसम के बहुतेरे आयोजनों को उन्होंने कवर किया या कवर करवाया। दूरदर्शन का अधिकारी रहते हुए क्रांतिकारी कवि वरवर राव पर आयोजन करवाने में वह जरा भी नहीं हिचके। इसकी एक बानगी है उनकी रिपोर्ट- दो हज़ार के टिकेट पर एक करोड़ का राम, जिसमें उन्होंने एक करोड़ रुपये खर्च कर रामलीला के नाम पर किये जाने वाले तमाशे का विरोध किया था। आज जब 3-3 करोड़ के खर्चे से ‘अंधा युग’ और ‘तुगलक’ हो रहा है,  और पूरे देश में रंगकर्म की दशा खराब है, तब कुबेर जी की याद आती है  कि वह होते तो इसका जरूर विरोध करते।

कुबेर दत्त जैसा प्रतिबद्ध कार्यक्रम निर्माता दूरदर्शन या प्राइवेट चैनलों में अब शायद ही कोई मिले। अब जबकि दूरदर्शन और प्राइवेट चैनलों ही नहीं, बल्कि अखबारों से भी साहित्य गायब होता जा रहा है, तब साहित्य और जनमाध्यम पर विचार करना,  दरअसल विचार और संवेदना को जनमाध्यमों के केंद्र  में लाने की एक छोटी सी कोशिश है, जो कुबेर जी को याद करते हुए की जा रही  है।

कुबेर स्मृति आयोजन में कमलिनी दत्त उनके कुछ  कार्यक्रमों, उनके फोटोग्राफ्स, उनके मूड्स और उनकी खासियत पर केंद्रित एक वीडियो प्रस्तुत करेंगी। इसके अलावा उनकी बेटी पुरवाधनश्री, भाई सोमदत्त शर्मा के साथ वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी, मुरली मनोहर प्रसाद सिंह, चित्रकार हरिपाल त्यागी, कवि रामकुमार कृषक, पंकज सिंह, कृष्ण कल्पित, मदन कश्यप, श्याम सुशील और चंद्रभूषण कुबेर की दुनिया से गुजरने के अपने अनुभवों को प्रस्तुत करेंगे। जसम के महासचिव प्रणय कृष्ण, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रामजी राय समेत कई महत्वपूर्ण साहित्यकार इस आयोजन में मौजूद रहेंगे।

आयोजन स्थल पर कुबेर दत्त की कविता और पेंटिंग से बनाए गए पोस्टर भी लगाए जाएंगे।