Tag: किताब

अनुप्रि‍या की बाल कवि‍ताएं

चि‍त्र: अनुप्रि‍या

कि‍ताब

काले अक्षर की माला में
गूंथा हुआ जवाब हूँ
मैं तो प्यारी मुनिया की
एकदम नयी किताब हूँ

मेरे भीतर कई कहानी
कितने सारे रंग
उड़ता बादल,चहकी चिड़िया
सब हैं मेरे संग

उड़नखटोला अभी उड़ा है
लेकर सपने साथ
आसमान की सैर करेंगे
दे दो अपना हाथ

प्यासा कौवा ढूँढ़ रहा है
पानी की एक मटकी
शेर आ रहा पास है अब तो
साँस हमारी अटकी

मुन्ना खाए आम रसीला
मुनिया देखे फूल
खेल-खेल में पढ़ते बच्चे
बातें सारी भूल।

चिड़िया रानी

चिड़िया रानी पल भर ठहरो
मुझको तुम एक बात बताओ
कैसे गाती इतना मीठा
आज पहेली यह सुलझाओ

कैसे नन्हे पंखों के बल
आसमान छू पाती हो
तुम्हें पकड़ने हम जो आएं
झट से तुम उड़ जाती हो

कैसे छोटी चोंच तुम्हारी
चुग जाती है दानों को
आज बताना होगा तुमको
हम नन्हे अनजानों को

एक दिन फुरसत में हमको भी
आसमान की सैर कराओ
चूं-चूं-चीं-चीं की भाषा में
नयी कहानी हमें सुनाओ।

सुबह सवेरा

हाथ थाम कर सूरज का
घर से चला सवेरा
चिड़ियों के पंखों ने डाला
आसमान में डेरा

धीमे-धीमे आँख मींचते
उठा है सारा बाग़
लहरों ने रच डाला  है
आज नया फिर राग

ढूंढ़ रहा है बादल कब से
खोयी हुई जुराब
भूल गया है मेज पे रख के
फिर वो नयी किताब

खिल आये हैं चेहरे फिर
फिर से सजे हैं खेल
जिससे कल झगड़ा कर आये
आज किया फिर मेल

मास्‍टर जी के बच्चे : प्रेमपाल शर्मा  

boook.himanshu

मेरे एक संबंधी शिक्षक रहे हैं। एक सफल शिक्षक, क्‍योंकि उनके पास लगातार ट्यूशनों की भीड़ लगी रहती है। इस बुढा़पे में आज भी उन्‍हें दूसरी-तीसरी पीढ़ी अंग्रेजी के ट्यूशन के लिए खोजते-खोजते आ जाती है। उनकी बेटी ‘स्‍टार अप’ पर एक किताब पढ़ रही थी। पहले तो उन्‍होंने उस पुस्‍तक को उल्‍टा–पुलटा फिर सूंघते हुए बोले, ‘तुम इस किताब को क्‍यों पढ़ रही हो।’ बेटी ने उत्‍साह और संकोच दोनों भावों से उनका प्रश्‍न छुआ और बताने लगी। लेकिन पिता ने सरेआम उत्‍तर को एक तरफ झटक दिया, ‘अरे भाई, क्‍या फायदा ऐसी किताबों का। अपना भी दिमाग खराब करो, दूसरों का भी’

बेटी भी तुनक गई और तनकर बोली, तो क्‍या रामायण बांचें? बाबूजी हमें आपने बचपन में रामायण न पकडा़यी होती, तो हम भी कहीं कलक्‍टर बनते। जब देखो, तब रामायण। पढ़ने में ठीक होने का एक और खामियाजा भुगतना पडा़ कि जिस रिश्‍तेदार, पडोसी के घर अखंड रामायण होती, ‘जा बेटी, रामायण पढ़ो जाकर! बस लाउडस्‍पीकर के आगे पढ़े जा रहे हैं, रामायण की चौपाइयां। घास खोदने की रफ्तार से और जब भी स्‍कूल का होमवर्क लेकर बैठो या कुछ पढ़ो तो मम्‍मी का हुक्‍म कि कहीं पढ़कर कलक्‍टर नहीं बनोगी। लो इन भाइयों को पकड़। ऐसी छोटी उम्र में ही दो-दो भाइयों को संभाला, फिर ऐसे घरों में ब्‍याह। बेटी रुआंसी होकर यकायक चुप हो गई, मेरे दसवीं में कितने अच्‍छे नम्‍बर थे।

यह संवाद भारतीय समाज विशेषकर हिन्‍दी भाषी राज्‍यों की कई परतें खोलता है। चलो थोड़ी देर के लिए सदियों से बदस्‍तूर जारी लड़की के साथ भेदभाव को नजरअंदाज कर सिर्फ पढ़ने के आयतन के संदर्भ में विचार करते हैं। उन दिनों पुस्‍तक मेला चल रहा था। मैनें मास्‍टर जी से पूछा, ‘क्‍या कभी पुस्‍तक मेले गए?’ उन्‍होंने लगभग अनसुना करने की कोशिश की। बुजुर्ग भारतीय को ऐसी कई आजा़दी, कई सहूलियतें मिल जाती हैं कि वह कब क्‍या देखे, क्‍या सुने और कौन सी सब्‍जी में उसे स्‍वाद आए। मैनें फिर कुरेदा तो झटककर बोले, ‘नहीं, हम कभी नहीं गए।’ शायद जो नहीं कहा वह यह कि इतने बड़े परिवार, पांच बच्‍चों के बीच हमें पुस्‍तक मेला जैसी बातों के लिए कभी कहां फुरसत थी। आज़ादी के बाद की एक-दो पीढि़यां निरंतर अपने दुखों का ब्‍यान करते–करते स्‍वर्ग सिधार रही हैं। यह हकीकत जरूर है, लेकिन पूरा देश ही गरीब था। ‘लेकिन आप तो बारहवीं तक के बच्‍चों को पढा़ते थ। वे बच्‍चे तो जाते होंग। आप उनको तो पुस्‍तक मेले के बारे में बताते होंगे? मैंने और कुरेदा। ‘नहीं, हमें नहीं पता’। वह उठकर चले गए।

पुस्‍तक, पुस्‍तक मेला, शिक्षा के संदर्भ में एक शि‍क्षक और मां-बाप का यही गड़मड चेहरा है। दिल्‍ली जैसे शहर में पचास वर्ष बिताने के बाद मास्‍टर जी का किताबों, शिक्षा के बारे में आज भी कोई बुनियादी अंतर नहीं आया है। लड़कियों के प्रति चाहे बचपन में उनका रवैया हो या आज। सिर्फ उसे पढो़ जो पाठयक्रम में हो। रटते रहो, घोटते रहो ओर विद्यार्थियों के अच्‍छे नम्‍बर पर साल के अंत में खुशी का भ्रम। ट्यूशन में इसलिए ऐसे शिक्षक ज्‍यादा सफल रहे, जो नाक की सीध में सिर्फ पाठयक्रम के प्रश्‍नों की ही बात करें। ऐसे मां-बापों की भी कमी नहीं जो पाठयक्रम से इतर कोई किताब बच्‍चों को छूने भी नहीं देते। लेकिन बच्‍चों में न पढ़ने को दोष हर समय उनकी जुबान पर रहता है।

मैंने उनकी बेटियों और बेटों से एक साथ पूछा कि क्‍या कभी मास्‍टरजी ने आपको ऐसी किताब का नाम बताया या उसके बारे में बताया जो जरूर पढ़नी चाहिए। पांचों चेहरों पर सपाट चुप्‍पी थी। सभी एक से सांचे में ढले थे या तो उन्‍होंने सिर्फ कोर्स की किताबें पढ़ी थीं या फिर कोई धर्म ग्रंथ। पूरे हिन्‍दी समाज हिन्‍दू, मुस्लिम सहित सभी का सोच इसी से मिलता-जुलता है। मैंने उन पांचों से जो चालीस से पचपन की उम्र के घेरे में तो होंगे ही, अगला प्रश्‍न किय कि ‘आप अपने बच्‍चों को रामायण और कोर्स की किताब छोड़कर कौन सी किताब का नाम सुझाएंगे।’ कहने की जरूरत नहीं फिर उनमें से किसी के पास कोई जवाब नहीं था यानी दो-तीन पीढियां दुनिया भर के ज्ञान-विज्ञान की किताबों से बंचित, बंजर। इस बात की भी पुष्टि कि यदि आप चाहते हैं कि बच्‍चे पढे़ं तो आपका भी कुछ दायित्व है।

पढ़ने-पढाने के संदर्भ में स्‍कूल के साथ मां-बाप, समाज, रिश्‍तेदार सभी की भूमिका पर यहां प्रश्‍न उठता है। न शिक्षक पढ़ने, ज्ञान के संस्‍कार दे रहा है न मां-बाप। जिन्‍हें वे संस्‍कारों का नाम देते हैं, वह हैं मंदिर-मस्जिदों की परिक्रमा। यह वही समाज है जो आजादी के बाद सरेआम कहता रहा है कि लड़के की तनख्‍वाह तो इतनी है, लेकिन ऊपरी आमदनी बहुत है, कि उसके घर तो काम करने वाले अरदली हैं और वह जब चाहे दफ्तर जाए न जाए यानी निक्‍कमेपन, बईमानी, भ्रष्‍टाचार की साक्षात प्रति मूर्ति। वंशवादी राजनीति और नवजात लोकतंत्र के नाम पर यही होना था और इसलिए ऐसी शिक्षा व्‍यवस्‍था गढ़ी गई, जो आज भी यथा स्थितिवादी है।

ग्‍लोबलाइजेशन का इतना तो आभार कि सरकारी नौकरियों का चौखटा ही नहीं तड़क रहा, मोबाइल, मीडिया, सूचना तकनीक की खिड़कियों से ऐसी रोशनी भी आ रही है जो प्रौढ़ महिलाओं को अपने मां-बाप से प्रश्‍न प्रतिप्रश्‍न करने की हिम्‍मत भी दे रही है और नई पीढ़ी को अपने ‘स्‍टार्ट-अप’ से विश्‍व बाजार की खोज भी करवा रही है। नि:संदेह इस चेतना को शिक्षा के माध्‍यम से पूरे देश में जल्‍दी से जल्‍दी फैलाने की जरूरत है –विशेषकर धार्मिक उन्‍मादी वक्‍त में।

बच्चे किताबें नहीं पढ़ते क्योंकि माता-पिता किताबें नहीं पढ़ते: जार्डन सैपाइरो

book.children

यह एक सांस्कृतिक मान्यता है कि आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बच्चों को किताबों से दूर कर रहे हैं। मैं जब दूसरे विश्‍वविद्यालयी प्राध्यापकों से मिलता हूं तो वे अकसर शिकायत करते हैं कि विद्यार्थी अब पढ़ते नहीं हैं क्योंकि उनकी आंखें हर वक्त उनके फोन से चिपकी रहती हैं। टेक्नोफोब (टेक्नोलॉजी से भयभीत रहने वाले) जमात के लोग सोचते हैं कि हम एक ऐसी पीढ़ी को तैयार कर रहे हैं, जो साहित्य की कीमत नहीं समझती। नए और पुराने के बीच ध्रुवीकरण जारी है। संभव है यह धारणा किसी स्क्रीन-विरोधी मानस की बची-खुची भड़ास हो जो टेलीविजन के स्वर्णकाल की परिधि से बाहर नहीं निकल पाता। यह पिटी-पिटाई मनगढ़ंत कहानी भी हो सकती है जो तकनीकी साम्राज्यवाद के खिलाफ संग्राम में  किताबों की हार पर छाती कूट-कूट कर कह रही है- कागज सच्चा नायक और गोरिल्ला ग्लास दुष्ट खलनायक!

‘कॉमन सेन्स मीडिया’ की ताज़ा रिपोर्ट ‘बच्चे, किशोर और पढ़ने की आदत’ अमेरिका में ‘बच्चों के पढ़ने की आदतों के बारे में एक बड़ी तस्वीर’ पेश करती है और पड़ताल करती है कि हाल के दशकों में हुई तकनीकी क्रांति के दरम्यान ये आदतें किस कदर बदली हैं। यह तस्वीर बताती है-

सरकारी अध्ययन के मुताबिक 1984 से अब तक हफ्ते में एक बार पढ़ने वाले 13 वर्ष तक की आयु के बच्चों का प्रतिशत 70% से घटकर 53% हो गया है। सप्ताह में एक बार पढ़ने वाले 17 वर्ष के बच्चों में यह आंकड़ा 64% से लुढ़ककर 40% पर पहुँच गया। वहीं इस दरम्यान 17 वर्ष के बच्चों में, कभी नहीं या मुश्किल से कभी-कभी पढ़ने वालों की तादाद 9% से बढ़कर 27% हो गयी। बेशक ये आंकड़े झकझोर देने वाले हैं, लेकिन मुझे समझे में नहीं आता कि इनका टेक्नोलॉजी से क्या ताल्लुक है। यह आरोप मुझे निहायत बेतुका लगता है।

मुझे तो लगता है कि हम आज ऐसे सांस्कृतिक परिवेश में रह रहे हैं जो इतिहास के किसी भी दौर के मुकाबले कहीं ज्यादा पाठ-संपन्न है। लोग दिन भर पढ़ते रहते हैं। गूगल, ट्विटर और फेसबुक शब्दों का अम्बार लगाते रहते हैं। लोग अपनी आंखों को स्मार्टफोन से अलग नहीं कर पाते- जो मूलतः पाठ और सूचना बांटने वाली मशीन है। सच कहें तो हमारी समस्या हर वक्त पढ़ते ही रहने की है। लोग लगातार अपने ई-मेल या टेक्स्ट मैसेज चैक करते रहते हैं। कभी-कभी तो उन्हें शब्दों के इस जंजाल से बाहर निकालना भी मुश्किल हो जाता है।

फिर भी, लोग क्या पढ़ रहे हैं? ऐसा लगता है कि वे ढेर सारी किताबें नहीं पढ़ते। मैं बच्चों की नहीं, बल्कि बड़ों की बात कर रहा हूं। यहां तक कि टेक्नोफोब भी किताबें नहीं पढ़ते। मैं ऐसे कई पढ़े-लिखे भद्रजनों से मिल चुका हूं जिन्होंने मुझे बताया कि उन्हें किताबें पढ़ने का समय ही नहीं मिलता। वे न्यूयॉर्क टाइम्स में छपने वाली पुस्तक समीक्षाओं को देख लेते हैं ताकि पार्टियों में होने वाली पुस्तक चर्चाओं में अपनी इज्जत बचा सकें। वे विमान में मिलने वाली पत्रिकाओं के पिछले पन्ने पर छपने वाले पुस्तक सारांश से काम चला लेते हैं। मैं हैरान रह जाता हूं जब कई लोग मुझसे मेरी किताबों के ऑडियो संस्करण की उपलब्धता के बाबत पूछते हैं।

यह समस्या क्या बच्चों के किताबें न पढ़ने की है या फिर किसी के भी किताबें न पढ़ने की? क्या हमारी संस्कृति घनघोर रूप से गैर-अकदामिक और बौद्धिकता विरोधी नहीं हो गयी है? हम पत्रिकाओं व ब्लॉग पढ़ने को तरजीह देते हैं। ये मानविकी, लिबरल आर्ट्स एजुकेशन या किताबों पर निर्भर विश्‍वविद्यालयी डिग्री के मूल्यों पर सतत सवाल खड़े करते हुए छुपे तौर पर आत्म-प्रचारात्मक होते हैं। चालू फैशन चीख रहा है कि आज हमें एसटीईएम (साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग, मैथ्स) शिक्षा- यानी ज्यादा इंजीनियरों, ज्यादा व्यवसायियों की दरकार है। परोक्ष रूप से हम एक पुस्तक विरोधी एजेंडे से घिरे हुए हैं और फिर भी हैरान हैं कि बच्चे पढ़ क्यों नहीं रहे हैं।

मैं यह स्वीकार करता हूं कि मैं पक्षपाती हूं। मैं एक अकादमिक हूं। मुझे पढ़ने के ही पैसे मिलते हैं। लेकिन मेरे बच्चे (6 और 8 वर्ष) भी खुद से खूब पढ़ते हैं। इसलिए नहीं कि मैं ऐसा चाहता हूं- वीडिओ गेम खेलना हो तो पहले 30 मिनट पढ़ो। इसलिए भी कि उनके डैड की पढ़ने की आदत उनके लिए मॉडल का काम करती है। डैड हमेशा नई-नई किताबें मंगाते रहते हैं; डैड हमेशा उन्हें पढ़ते हुए दिखाई देते हैं। मेरे घर में वयस्क होने का मतलब किताबों की सोहबत में रहने वाला होता है। परिपक्व होने का मतलब छपे हुए शब्दों के लम्बे रूपों से ज्यादा से ज्यादा अंतरंग होना।

कॉमन सेंस मीडिया की रिपोर्ट स्वीकार करती है कि- ‘माता-पिता पढ़ने की प्रेरणा दे सकते हैं।’ रिपोर्ट कहती है, ‘छपी हुई किताबें घर में रखने से, उन्हें खुद पढ़ने से और अपने बच्चों के लिए रोज पढ़ने का समय तय करने से पढ़ने की प्रेरणा जन्म ले सकती है।’

माता-पिता की गतिविधियों और बच्चों में पढ़ने की ललक के बीच गहरा सम्बन्ध पाया गया है (स्कौलेस्टिक, 2013)। उदाहरण के लिए, नियमित रूप से पढ़ने वाले बच्चों में 57% के माता-पिता ने अपने बच्चों के पढ़ने के लिए रोजाना अलग से समय निर्धारित किया हुआ है। इसके विपरीत अनियमित रूप से पढ़ने वाले बच्चों में सिर्फ 17% के माता-पिता ने ही ऐसी व्यवस्था की है।

जहां तक किताबों का सवाल है, अधिकांश अध्ययन बताते हैं कि पाठ प्रस्तुत करने की विधि की ख़ास प्रासंगिकता नहीं होती। पढ़ने में गहरी रुचि रखने वालों के लिए तकनीक कोई मुद्दा नहीं। ई-रीडर, टेबलेट, लैपटॉप स्क्रीन आदि सभी में लम्बे पाठ पढ़े जा सकते हैं। खरे पाठक के लिए किताब का कागजी रूप में होना बहुत मायने नहीं रखता। सच तो यह है कि इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों ने किताब तक पहुंचना और आसान बना दिया है। जोआन गैंज कूनी सेंटर की इस साल की शुरुआत में जारी एक रिपोर्ट कहती है कि 2 से 10 आयुवर्ग के अधिकतर बच्चों के पास पढ़ने की कोई न कोई इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस है- 55% के पास घर पर बहुउपयोगी टेबलेट है और 29% के पास अपना ई-रीडर (62% की इनमें से किसी एक तक पहुंच) है। घर पर इन उपकरणों में से किसी एक को रखने वाले बच्चों में आधे (49%) इलेक्ट्रॉनिक तरीकों से पढ़ते हैं, या अपने या फिर अपने माता-पिता (30%) के उपकरणों से। किताबें मायने रखती हैं मगर बच्चे उन्हें किस तरह पढ़ते हैं, यह नहीं।

मेरे बच्चे आई-पैड, ई-रीडर और कागज़, सभी तरीकों से किताब पढ़ते हैं। मैं यह सुनिश्चित करता हूं कि वे पढ़ें। मैं हर रात अपने बच्चों के लिए पढ़ता हूं। मैं दिन में भी उनके साथ पढ़ता हूं। मैं यह इसलिए करता हूं क्योंकि मैं इसे उनकी शिक्षा का महत्वपूर्ण अंग समझता हूं। मैं अपने बच्चों की परवरिश को यूं ही किसी विशेषज्ञ को आउटसोर्स नहीं कर सकता। और फिर यह रोना नहीं रो सकता कि ये टीचर नाकामयाब हैं। मेरे लिए यह बात बिलकुल स्पष्ट है कि बच्चों की पढ़ाई में माता-पिता की भूमिका ज़रूरी है। उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके बच्चे किताबें पढ़ लेते हैं।

बेशक किताब बनाम डिजिटल जैसी खबरें गढ़ना बहुत आसान है। इससे हमें अपने बच्चों के साथ जुटने से बचने का बहाना मिल जाता है। हम खुद को दोष देने के बजाय वीडिओ गेम्स या ऐप्स को कोसने लगते हैं। बच्चों को विवेकवान, संवेदनशील और खुले दिमाग वाले वयस्क के रूप में तैयार करने की ज़िम्मेदारी माता-पिता को लेनी होती है। किताबें शिक्षा का अहम् हिस्सा हैं, लेकिन अगर हम अपने जीवन से सारे के सारे डिजिटल उपकरण हटा दें तो भी बच्चे किताबें नहीं पढ़ेंगे, जब तक कि हम उन्हें यह अहसास न करा दें कि वयस्क बनने के लिए किताबें पढ़ना कितना ज़रूरी है।

अपने बच्चों को पढ़ने के लिए शिक्षित करें। और उन्हें शिक्षित करें कि जो कुछ वे पढ़ते हैं उससे फर्क पड़ता है। रेनेसां लर्निंग की वार्षिक रिपोर्ट ‘बच्चे क्या पढ़ रहे हैं’ विस्तार से बताती है कि बच्चे आजकल क्या-क्या पढ़ रहे हैं और उनमें सबकुछ अच्छा नहीं है। यह भारी-भरकम अध्ययन किताबों की बिक्री या लाइब्रेरी के आंकड़े पेश नहीं करता। यह अमेरिका के 98 लाख छात्रों द्वारा  पढ़ी गयी 31.8 करोड़ किताबों के आंकड़ों का अध्ययन है ताकि यह पता लगाया जा सके कि साल में कौन सी किताबें बच्चों के बीच सबसे लोकप्रिय रहीं। यह अमेरिका की सबसे विस्तृत रिपोर्ट है जो कक्षा 12  तक के बच्चों की पढ़ने की आदतों का खुलासा करती है।

तीन दिलचस्प निष्कर्ष-

  1. लैंगिक रुझान की पढ़ाई पहली कक्षा से ही शुरू हो जाती है।बुनियादी कक्षाओं के लड़के कैप्टन अंडरपेंट्स’ के ढेर के ढेर पढ़ जाते हैं लेकिन ये किताबें लड़कियों की पसंद की शीर्ष 20 में भी जगह नहीं बना पातीं। हमें इन आंकड़ों के आधार पर यह समझाया जाता है कि लड़के और लड़कियों की प्राथमिकताएं, रुचियां और रुझान अलग-अलग तरह का होता है। मैं इस बात पर यकीन नहीं करता। इसके विपरीत हम इन आकड़ों को इस बात के सबूत के तौर पर भी ले सकते हैं कि हम लैंगिक आधार पर बांटी गई ऐसी दुनिया बनाते जा रहे हैं जहां भूमिकाएं व बौद्धिक अपेक्षाएं जैविक प्रजनन अंगों के आधार पर विभाजित हैं। अगर आप यही चाहते हैं तो येन केन प्रकारेण इसे जारी रखिये। अगर नहीं, ऐसी किताबों की कमी नहीं जिनमें लैंगिकता नहीं है; अपने बच्चों को जानने दीजिये कि आप इन सब से ऊपर सोच सकते हैं।
  2. मिडिल स्कूल (खासकर कक्षा 6 के बच्चे) सबसे ज्यादा पढ़ते हैं।प्रति छात्र पढ़ी गयी औसत शब्द संख्या मिडिल स्कूल के दौरान बढ़ती है मगर हाईस्कूल आते-आते यह फिर से घटने लगती है। मैं इसे इस बात के प्रमाण के तौर पर समझता हूं कि माता-पिता अपने बच्चों को किताबों के बारे में गलत सन्देश दे रहे हैं। हम साक्षरता को भाव देते हैं और छोटे बच्चों के जल्द से जल्द पढ़ना सीख लेने पर खुश होते हैं। लेकिन यही बच्चे जब किशोर हो जाते हैं तब वे सीधे अपने बड़ों की आदतों का अनुसरण करने लगते हैं। अगर बड़े पढ़ते हुए नहीं दिखाई देते तो वे भी न पढ़ने को बड़े होने का गुण मान बैठते हैं।
  3. ट्वीलाईट और हंगर गेम्सक्लासिकी साहित्य की तुलना में ज्यादा लोकप्रिय हैं। आजकल शिक्षक शेक्सपियर या डॉन क्विक्जोट की जगह इन किताबों को तरजीह देते हैं। ज्यादातर की दलील होती है कि हर तरह पाठ अच्छा होता है और ये किताबें छात्रों को ज्यादा आकर्षित करती हैं। एक ओर से देखने पर यह सही लगता है, लेकिन दूसरी ओर हमें याद रखना चाहिए कि इन लोकप्रिय किताबों के लिए कथ्य के बजाय बिक्री ज्यादा अहमियत रखती है। वे मूलतः पैसा कमाने के लिए लिखी गयी हैं और मानव परिस्थितियों का साहित्यिक अन्वेषण उनकी प्राथमिकताओं में सबसे आखि‍र में है। मेरा यह मतलब नहीं कि लोकप्रिय कहानियां बुरी होती हैं, लेकिन इस बात में भी दम है कि ऐसी किताबें अपने युग की आर्थिक, राजनीतिक और ज्ञानशास्त्रीय प्रवृत्तियों के पार नहीं देख पातीं।

और आखिरकार हमारे बच्चे कैसे पढ़ते हैं और क्या पढ़ते हैं, इस बात से किताबों के बारे में बच्चों के बजाय बड़ों के नज़रिए का ज्यादा पता चलता है। आप अपने बच्चों को जैसा देखना चाहते हैं, पहले व्यवहार और तौर-तरीकों से वैसा आदर्श तो पेश कीजिये।

जार्डन सैपाइरो शिक्षक, लेखक और संपादक हैं.

(हिंदी अनुवाद: आशुतोष उपाध्याय)

कि‍ताबों की दुनि‍या

book fair

आजकल देश की राजधानी दि‍ल्‍ली के प्रगति‍ मैदान में वि‍श्‍व पुस्‍तक मेला चल रहा है। पढ़ि‍ए पुस्‍तकों से संबंधि‍त कुछ कवि‍ताएं-

किताबें कुछ कहना चाह्ती हैं

सफ़दर हाशमी

किताबें करती हैं बातें

बई ज़मानों की

दुनिया की, इन्सानों की

आज की, कल की, एक-एक पल की्।

खुशियों की, गमों की, फ़ूलों की, बमों की

जीत की, हार की, प्यार की, मार की,

क्या तुम नहीं सुनोगे इन किताबों की बातें?

किताबें कुछ कहना चाह्ती हैं

तुम्हारे पास रहना चाह्ती हैं।

किताबों मे चिड़ियां चह्चहाती हैं

किताबों मे खेतियां लहलहाती हैं।

कितबों मे झरने गुनगुनाते हैं

परियों के किस्से सुनाते हैं।

किताबों मे राकेट का राज है

किताबों मे साइंल की आवाज है।

किताबों क कितना बड़ा संसार है

किताबों मे ज्ञान की भरमार है।

क्या तुम इस संसार में

नहीं जाना चाहोगे?

किताबें कुछ कहना चाह्ती हैं

तुम्हारे पास रहना चाह्ती हैं।

 

हम किताब के साथ पढे है

डा. श्रीप्रसाद

हम किताब के साथ पढे है

लेकर इसे पहाड़ चढे हैं

यही नदी है यह सागर है

सभी ज्ञान की यह गागर है

यह तुलसी है यह कबीर है

सच्चा मित्र अचूक तीर है

धोखा झूठ फ़रेब नहीं है

किसी तरह का ऐव नहीं है

यह मन मे सपने बुन्ती है

यह मन की बातें सुनती है

हम इस्को लेकर खुश रहते

खेल-खेल अनचाहा सहते

इससे जब कर्ते हैं बातें

हंसता दिन, हंसती हैम रातें

हम किताब के क्या गुण गाएं

इसको बस हम पढें पढाएं

खुली किताब

दामोदर अग्रवाल

यह जग सारा खुली किताब

चंदा-तारा खुली किताब

फ़ेन फ़ेंकती हुई नदी

जल की धारा खुली किताब

 

जाल फ़ेंक तट पर बैठा

हर मछूआरा खुली किताब

उतर घास पर एक मैना

चुगती चारा टहनियों मे

करे इशारा खुली किताब

पढ़ना अच्छा लगता है

देवेंद्र कुमार

हंसकर मिले किताब तो

पढ़ना अच्छा लगता है।

इसमें कितनी कथा-कहानी

रातों मे कहती हैं नानी

पढ़ने का हो चाव, तो

पढ़ना अच्छा लगता है।

पुस्तक मेरी फ़ूलों जैसी

बातें इसमें कैसी-कैसी

मां बोले शाबास! तो

पढ़ना अच्छा लगत

पुस्तक मेरी फ़ूलों जैसी

बातें इसमें कैसी-कैसी

मां बोले शाबास! तो

पढ़ना अच्छा लगता है।

पढ़ने से उजला होता मन

मिलता ज्ञान किताबों से छन

जागे यह अह्सास तो

पढ़ना अच्छा लगता है।

पुस्तक

दिविक रमेश

मुझको तो पुस्तक तुम सच्ची

अपनी नानी / दादी लगती

ये दोनों तो अलग शहर में

पर तुम तो घर में ही रहती

 

जैसे नानी दुम दुम वाली

लम्बी एक कहानी कहती

जैसे चलती अगले भी दिन

दादी एक कहानी कहती

मेरी पुस्तक भी तो वैसी

ढेरों रोज कहानी कहती

 

पर मेरी पुस्तक तो भैया

पढ़ी-लिखी भी सबसे ज़्यादा

जो भी चाहूँ झट बतलाती

नया पुराना ज़्यादा-ज़्यादा

 

मैं तो कहता हर मौक़े पर

ढेर पुस्तकें हमको मिलती

सच कहता हूँ मेरी ही क्या

हर बच्चे की बाँछे खिलती

किताबें

श्याम सुशील

शब्दों का सुंदर

घर हैं किताबें

चिड़ियों के पंखों-सी

फ़र-फ़र किताबें

 

किताबें हैं दोस्त

करती हैं बातें

किताबों की दुनिया मे

आओ हम झांकें

पुस्तक मेरी सहेली

डा. शकुंतला कालरा

सबसे अच्छी सबसे प्यारी

पुस्तक मेरी सहेली।

मौन रहे, लेकिन बतियाए।

महापुरुषों से मुझे मिलाए।

भरे गुणों को चुपके-चुपके।

ऐसी है अलबेली

पुस्तक मेरी सहेली।

माँ जैसा मुझको दुलराए।

नई भोर मुझको दिखलाए।

ज्ञान गुरु सा देती मुझको

मैं हूँ इसकी चेली।

पुस्तक मेरी सहेली।

यह जीवन की राह दिखाए

सत्य-झूठ का ज्ञान कराए

जो चाहूँ सब कुछ बतलाए

बूझे कठिन पहेली

पुस्तक मेरी सहेली।

किताबों की दुनिया

क्षमा शर्मा

हमारी ये दुनिया, तुम्हारी ये दुनिया

किताबें जो कहती हैं किस्से कहानी

कहानी में नानी और नानी की नानी

न बम का धमाका न गोली न गाली

हवाओं में गूँजे सरगम और ताली

ना कोई रोए और ना ही रुलाए

हँसने की दुनिया, हँसाने की दुनिया

चलो आओ, हम इसको बेह्तर बनाएँ

रोने को भूलें और हँसते ही जाएँ

कहीं कोई मिल जाए रोता जो हमको

आँसू भी पोंछें और उसको हँसाएं

किताबों की दुनिया, ये कविता की दुनिया

ये इनकी, ये उनकी, ये सबकी है दुनिया

हमारी ये दुनिया, तुम्हारी ये दुनिया

नटखट किताबें

रमेश तैलंग

बस्ते के अंदर हैं नटखट किताबें

करती हैं आपस में खटपट किताबें

हिंदी की इंग्लिश से बिल्कुल न बनती

किसी दिन  तो  दोनोन मे बस ऐसी ठनती

हो जाती हैं गुत्थमगुत्था दो पल में

मेल नहीं हो पाता जब इनके दल में

लगती हैं तब जैसे झंझट किताबें

कहो कुछ तो इनकी समझ में न आता

बिना बात ही इनको गुस्सा चढ़ आता

कहाँ तक कहें कोई इनकी कहानी

वही नोच-नोची, वही खींचा-तानी

उड़ती हैं पन्नों मे फ़ट-फ़ट किताबें

अकेली गणित ही है इन सबमें सीधी

न करती किसी से लड़ाई कभी भी

सदा साफ़ रहती नई ज़िल्द पहने

अगर बाकी सब भी लगें ऐसे रहने

सहेली बनें सारी झट-पट किताबें

 

पुस्तक

घमंडीलाल अग्रवाल

पुस्तक मे है असली ग्यान

पुस्तक का करना सम्मान

मत इसके पन्ने फ़ाड़ो

इस पर चढ़ी धूल झाड़ो

पुस्तक बिन जीवन रीता

कहती है पुस्तक “गीता”

पुस्तप पर्वों, मेलों की

पुस्तक ले लो खेलों की

चाहे कैस युग आए

पुस्तक की महिमा गाए

पुस्तक पढ़ विद्वान बनो

भारत की मुस्कान बनो

भारतीय संस्कृति स्कूल (केवल अंग्रेजी माध्यम)

नयी दिल्ली: सोसायटी ऑफ इंडियन पब्लिशर्स, आथर्स एंड आर्टिस्ट्स (सिपा) की ओर ‘पठन रुचि का विकास कैसे हो’ पर इंडिया इंटरनेशनल कौंसिल एनेक्स में 15 नवम्‍बर 2013 को संगोष्‍ठी का आयोजन किया गया। इस अवसर पर प्रख्यात कवि एवं साहित्यकार अशोक चक्रधर ने कहा कि टीवी और मोबाइल संस्कृति ने सभ्य और सुसंस्कृति समाज को प्रभावित किया है। आज हमारे युवा अधिकांश समय मोबाइल पर चैटिंग और सर्फिंग करते रहते हैं। प्राइम टाइम पर घरों में लोग टीवी से चिपके रहते हैं। इससे तात्कालिक मनोरंजन तो जरूर होता है, पर लाभ कुछ नहीं होता। इस कारण लोगों में पढ़ने की रुचि कम हुई है।

कथाकार प्रेमपाल शर्मा ने सौ साल पहले की एक ऐतिहासिक घटना का हवाला देते हुए कहा कि मुंशी प्रेमचंद की पुस्तक ‘सोजे वतन’ जब बाजार में आयी तो अंग्रेज सरकार ने उस पर रोक लगा दी। मामला कोर्ट में पहुँचा और मजिस्ट्रेट ने प्रेमचंद से पूछा, ‘कितनी प्रतियाँ प्रकाशित हुई हैं?’ जवाब में मुंशी प्रेमचंद ने कहा, ‘ज़नाब, 1000 प्रतियाँ छापी हैं, जिनमें से 750 बिक चुकी हैं।’ तब मजिस्ट्रेट ने बाकी बची प्रतियों को कोर्ट में जमा करने का आदेश दिया। शर्मा ने स्पष्ट किया कि सौ साल से भी अधिक समय पहले प्रकाशित होने वाली पुस्‍तक की प्रतियों की संख्या 1000 होती थी। वर्तमान में जनसंख्या को देखते हुए इसकी संख्या लाखों में होनी चाहिए, लेकिन अब इनकी संख्या मुश्किल से 200-300 तक पहुँच गयी है। इसके पीछे सरकार की दोषपूर्ण नीति भी कम जिम्मेदार नहीं है। आज सरकारी कार्यालयों में गार्ड की भरती तक के लिए निकलने वाले विज्ञापनों में भी अंग्रेजी ज्ञान अनिवार्य होता है। पढ़ने-लिखने में रुचि कम होने से महानगरों में रहने वाले किशोरों का हिन्दी में हाथ बहुत तंग होता जा रहा है।

हास्य कवि सुरेन्द्र शर्मा ने अपने चुटीले अंदाज में एक घटना का उल्लेख किया,  ‘मैंने हाल ही में एक स्कूल का बोर्ड पढ़ा, जो इस तरह लिखा गया था- भारतीय संस्कृति स्कूल (केवल अंग्रेजी माध्यम)। अर्थात् ऐसा स्कूल जिसमें हमारे नौनिहालों को हिन्दी से दूर रखा जाएगा। दुर्भाग्य की बात है कि ऐसे स्कूलों का ही बोल-बाला है और लोग ऊँची कीमत अदा करके अपने बच्चों को यहाँ भेजते हैं। उन्‍होंने कहा कि हमारे देश और समाज ने कुछ इसी तरह की सोच अपना ली है, मानो हिन्दी की स्थिति पिछड़ी हुई हो। अगर प्रगति करनी है तो हम सभी को इस सोच से आगे निकलना होगा।

डायमंड पॉकेट बुक्स के नरेंद्र वर्मा ने कहा कि हिन्दी के प्रचार-प्रसार में राज्य सरकारों की भूमिका महत्वपूर्ण है। हिन्दी-भाषी स्कूलों में दसवीं कक्षा तक हिन्दी विषय को अनिवार्य किया जाना जरूरी है। प्रत्येक शहरों और गाँव में पुस्तकालय होने चाहिए, जहाँ बैठकर विद्यार्थी ज्ञान-विज्ञान और साहित्य की पुस्तकें और पत्रिकायें पढ़ सकें। इससे पूर्व हिन्द पॉकेट बुक्स के शेखर मल्होत्रा ने वक्ताओं और आंगतुकों का स्वागत किया।

समारोह का समापन हास्य कवि संगोष्‍ठी के साथ हुआ। इस अवसर पर अशोक चक्रधर, सुरेंद्र शर्मा के साथ महेश गर्ग ‘बेधड़क’  ने अपनी कविताएँ सुनाईं।

खामोशी से खतरा : अनुराग

book fair

एक धारणा बना दी गई है कि किताबें नहीं बिकतीं। लोग खरीदकर पढ़ना नहीं चाहते। खासकर हिंदी के प्रकाशक तो इस बात का सबसे अधिक रोना रोते हैं। हालांकि इसमें उन्‍हें कम से कम दो लाभ हैं। पहला- सरकारी खरीद के लिए नैतिक लाइसेंस के रूप में इस बात का प्रयोग करते हैं। दूसरा- लेखकों को रॉयल्‍टी देने से छुट्टी मिल जाती है। जन संस्‍कृति मंच ने रामशंकर यादव ‘विद्रोही’ के कविता संग्रह ‘नई खेती’ का प्रकाशन किया। इस संग्रह की छह सौ प्रतियां तीन माह में बिक गईं। दूसरी ओर एक नामी प्रकाशक ने वरिष्‍ठ कथाकार शेखर जोशी की दो किताबों की एक साल की रॉयल्‍टी 35 रुपये भेजी। कहीं न कहीं खपला तो जरूर है।

तीन-चार साल पहले की बात है। हमारी कॉलोनी में किसी ने नेशनल बुक ट्रस्‍ट को फोन कर दिया। उन्‍होंने तय दिन को किताबों की गाड़ी भेज दी। मुझे भी भ्रम था कि लोग किताबें नहीं खरीदेंगे। लेकिन कई लोगों ने अपने और बच्‍चों के लिए किताबें खरीदीं।

जन संस्‍कृति मंच की किताबों और फिल्‍मों का वितरण देख रहे   बैजनाथ ने बताया कि जसम के वर्ष में ‘प्रतिरोध के सिनेमा’ के दस आयोजन होते हैं और करीब दस अन्‍य साहि‍त्यिक-सांस्‍कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते है। इनके अलावा समय-समय पर पुस्‍तक प्रदर्शनी का आयोजन किया जाता है। हमारे पास अभी अपने और अन्‍य प्रकाशकों के मिलाकर करीब तीस टॉइल्‍स हैं।‍ फिर भी ‘‘हम हर आयोजन में किताबों और फिल्‍मों की डीवीडी की कुल मिलाकर 10 से 15 हजार तक की बिक्री कर लेते हैं। अगर किताबें अच्‍छी और सस्‍ती हों तो लोग छूट भी नहीं मांगते।’’

नई दिल्‍ली में स्थित हिंदी भवन के सामने लक्ष्‍मण राव चाय बेचने के साथ अपनी लिखी किताबें भी बेचते हैं। पहले वह दिल्‍ली और आसपास के स्‍कूलों-कॉलेजों में साइकिल से जाकर किताबें बेचते थे। अब बंद कर दिया है। उन्‍होंने बताया कि हर महीने ग्‍यारह-बारह हजार की किताबें उनके यहां से बिक जाती हैं। उन्‍हें कहीं जाना नहीं पड़ता है।

श्रीराम सेंटर में वाणी प्रकाशन की किताबों की दुकान में कई बार किताब या पत्रिका खरीदने गया। मुझे याद नहीं आता कि कभी वह दुकान खाली मिली हो। दो-चार लोग किताब खरीदते और पसंद करते मिल जाते थे। अर्बन डिपार्टमेंट ने किताब और पत्रिकाएं बेचना कमर्शियल एक्टिविटी मानकर इसे बंद करवा दिया। लेकिन अधिकांश बडे़ लेखकों और प्रकाशकों के दिल्‍ली में होने के बावजूद उस समय कोई तीव्र विरोध हुआ हो या कोई प्रदर्शन हुआ हो, मुझे याद नहीं पड़ता। कहीं और दुकान खोलने के लिए भी दबाव नहीं बनाया गया। सब ने चुपचाप इसे स्‍वीकार कर लिया। पुस्‍तकों को असली खतारा इस चुप्‍पी से ही है।

दरियागंज में स्थित हिंदी बुक सेंटर को छोड़कर पूरी दिल्‍ली में मेरी जानकारी में इस समय कोई ऐसी दुकान नहीं है, जहां सभी महत्‍वपूर्ण किताबें मिल सकें। इस दुकान के बारे में अधिकांश लोगों को पता नहीं है और यह काफी अलग भी पड़ती है। देश की राजधानी में हिंदी के अधिकांश महत्‍वपूर्ण प्रकाशक हैं। सभी मिलकर कोई एक ऐसी दुकान नहीं खोल पा रहे हैं, जहां सभी की किताबें रखी जा सकें। प्रकाशकों का इसमें रुचि नहीं लेने का एक महत्‍वपूर्ण कारण सरकारी थोक खरीद का होना है। यह एक ऐसा जरिया है, जिसमें हींग लगे न फिटकरी और रंग भी चोखा आता है। यह कोई रहस्‍य नहीं रह गया है कि मोटा कमीशन देकर प्रकाशक सरकारी आर्डर प्राप्‍त करते हैं। एक बार में एक प्रकाशक की किताबों की निश्चित संख्‍या ही खरीदी जाती है। इसलिए एक ही प्रकाशक ने मुख्‍य प्रकाशन के अलावा अन्‍य नामों से प्रकाशन खोल लिए है। प्रिंट लाइन वाला पेज बदला और मिल गया एक और आर्डर। जब ऐसे शार्टकट से अच्‍छी खासी कमाई हो रही हो तो लोगों पर निर्भर क्‍यों रहा जाए। लेखक को कभी पता ही नहीं चलेगा कि उसकी किस किताब को कितना आर्डर मिला। ऐसे में उसकी किताबों की बिक्री का हिसाब रखने का और न ही रॉयल्‍टी देने आदि का कोई झंझट। सरकार को खरीदी गई किताबों की सूची सार्वजनिक करनी चाहिए। सरकारी खरीद के कारण ही प्रकाशक पुस्‍तकों की अनाप-शनाप कीमतें रखते हैं। आर्डर देने वाला खुश और आर्डर पाने वाला भी। हालांकि अब प्रकाशक कम कीमतों में पेपरबैक संस्‍करण उपलब्‍ध कराने लगे हैं। कई नए प्रकाशक भी आए हैं जो अच्‍छी और सस्‍ती किताबें प्रकाशित कर रहे हैं। उनका यह प्रयास लो‍कप्रिय भी रहा है। उन्‍हें लेखकों और पाठकों का पूरा सहयोग मिल रहा है। इससे पाठक की पहुंच पुस्‍तक तक बन रही है। इस संबंध में कीमतें कुछ और कम करने और पेपरबैक्‍स पुस्‍तकों की संख्‍या बढ़ाने की जरूरत है। सरकारी खरीद का मकसद साहित्‍य के प्रचार-प्रचार में सहयोग करना ही रहा होगा, लेकिन जब यह व्‍यवस्‍था पुस्‍तक विरोधी साबित हो रही हो तो इस बंद कर दिया जाए। इसके बदले कुछ ऐसी व्‍यवस्‍था होनी चाहिए कि जो सरकारी मदद मिल रही है, वह प्रकाशक को मिलने की बजाय सीधे पाठक को मिले। सरकार ही विभिन्‍न शहरों में सरकारी स्‍कूल, कॉलेज या संपत्ति में एक दुकान खोले जिसमें प्रकाशक नाममात्र की मासिक राशि खर्च कर अपनी किताबें रख सकें। इससे होने वाली आमदनी से इसका खर्चा चलाया जाए। यहां सवाल उठता है कि क्‍या ऐसी दुकानें चलेंगी। मैं 1989 से 1992 तक उत्‍तरकाशी, उत्तराखंड में रहा। वहां मकान की सीढ़ी के नीचे जो जगह बचती है, उसमें किसी सज्‍जन ने साहित्यिक किताबों की दुकान खोल रखी थी। मैंने ‘भगत सिंह की जेल डायरी’ आदि कुछ किताबें वहां से खरीदी थीं। और लोग भी खरदीते होंगे, तभी तो दुकान चल रही थी। उत्‍तरकाशी देश की सीमा पर स्थित बहुत ही छोटा शहर है। जब वहां किताबें बिक सकती हैं तो बडे़ शहरों और कस्‍बों में क्‍यों नहीं बिक सकतीं। इसके अलावा देश भर में कई लोग पत्रिकाएं और किताबें मंगाकर उन्‍हें पुस्‍तक प्रेमियों को बेचते हैं। हालांकि इसमें उन्‍हें कोई आर्थिक लाभ नहीं होता और न ही उनका यह मकसद है, लेकिन लोगों तक किताबें पहुंच जाती हैं।

अगर आप कभी साप्‍ताहिक बाजार गए हैं तो वहां पटरी पर किताब बेचते एक-दो लोग जरूर मिले होंगे और ठेली में किताब बेचने वाला भी। यह सही है कि उनके पास धार्मिक किताबें और पत्रिकाएं, फिल्‍मी पत्रिकाएं, कुछ चालू किस्‍म की पत्रिकाएं और उपन्‍यास व साप्‍ताहिक पत्र-पत्रिकाएं अधिक होती हैं, लेकिन इन सबके बावजूद उनके पास प्रेमचंद के उपन्‍यास ‘गोदान’ व ‘गबन’ और कोई कहानी संग्रह, शरतचंद्र का ‘देवदास’ और सुभाषचंद्र बोस, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद आदि क्रांतिकारियों की जीवनियां भी मिल जाएंगी। इन किताबों को सजावट के लिए दुकानदार नहीं रखते। निश्चिततौर से इन किताबों की बिक्री होती है। दूसरी बात यह है कि अगर चालू किस्‍म की किताबें- पत्रिकाएं खरीदीं और पढ़ी जा रही हैं तो इसका मतलब भी यह है कि लोगों की पढ़ने में रुचि है। बस हम उनकी रुचि को विकसित कर उन्‍हें अच्‍छी किताबों की ओर नहीं मोड़ पा रहे हैं। इसके लिए सामूहिक रूप से प्रयास किए जाएं। प्रकाशक तो किताबों को लेकर लोगों के बीच में जाएं ही, साथ ही लेखकों को लोगों के बीच आना होगा। चारदीवारी के बीच बडे़ से बडा़ साहित्यिक आयोजन करने की बजाए लोगों के बीच छोटे-छोटे आयोजन करना ज्‍यादा उपयोगी है। अभी तक जो आयोजन हो रहे हैं उनमें लेखक वक्‍ता, लेखक श्रोता, लेखक आयोजक, लेखक व्‍यवस्‍थापक। यानी सब कुछ लेखकों के बीच ही हो रहा है, आम आदमी की उसमें कोई भागेदारी नहीं है। मुझे लगता है कि लेखकों को इसकी चिंता भी नहीं है। नहीं तो वह व्‍यवस्‍थापकों से कहते कि एयरकंडीशनर हॉल में आयोजन करने के बजाए किसी कॉलोनी के पार्क में आयोजन करें। कुछ लोग भी जुटेंगे। हो सकता है कि लोगों को शुरू-शुरू में अजूबा लगे, लेकिन बार-बार इस तरह का आयोजन देखकर उनके मन में स्‍वाभाविक रूप से जिज्ञासा उत्‍पन्‍न होगी कि ये लोग क्‍या करते हैं और क्‍यों करते हैं। यह जिज्ञासा उन्‍हें किताबों के नजदीक ले जाने में सहायक होगी।

कई बार स्‍कूलों में बुक स्‍टॉल लगाए जाते हैं। उनमें साधारण और महंगी किताब होने के बावजूद खरीदी जाती हैं। फिर हिंदी प्रका‍शकों के साथ ही ऐसी क्‍या दिक्‍कत है कि उनकी किताबें पाठक नहीं खरीदता।

देश की राजधानी की ही बात करें तो यहां दिल्‍ली सरकार की ओर से जगह-जगह शराब की दुकानें खोली गईं। इसके लिए लोगों के विरोध को नजरअंदाज किया गया। इसकी मुख्‍य वजह राजस्‍व की प्राप्ति है। लेकिन क्‍या एक लोक कल्‍याणकारी सरकार का दायित्‍व केवल मुनाफा कमाना है। लोगों को सुरुचि संपन्‍न बनाना और उनके बौद्धिक स्‍तर को बढ़ाने की प्रति उसका कोई दायित्‍व नहीं है। क्‍यों नहीं दिल्‍ली सरकार पूरी राजधानी में एक भी किताब की दुकान नहीं खोल सकती।

दिल्‍ली कला-संस्‍कृति की भी राजधानी है। केंद्रीय साहित्‍य अकादमी, हिंदी अकादेमी, विभिन्‍न भाषाओं की अकादमी, संगीत-नाटक अकादमी और कई कला-संस्‍कृति से जुडे़ सेंटरों और संस्‍थानों के बावजूद दिल्‍ली में एक भी ऐसी जगह का न होना, जहां लोग अपनी पसंद की किताब देख और खरीद सकें शर्मनाक है। यह हॉल देश की राजधानी के हैं तो अन्‍य जगहों का अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है। इसमें न तो दोष किताबों का है और नहीं पाठकों का। दोष है तो हमारा, जो कोई व्‍यवस्‍था नहीं कर पा रहे हैं। केंद्रीय साहित्‍य अकादमी और एनएसडी के पास काफी जगह है। क्‍यों नहीं इनके गेट पर एक बड़ी-सी दुकान बनाई जा सकती, जहां लोगों को आसानी से सभी प्रकाशकों की किताब उपलब्‍ध हो सकें।

पाठकों को किताबों से दूर करने में डाक विभाग की भी महत्‍वपूर्ण भूमिका है। जितने की किताब नहीं होती है, उससे ज्‍यादा डाक में खर्च हो जाते हैं। ऐसे में कोई कैसे डाक से किताब मंगाने का साहस कर सकता है। डाक से किताब भेजने में सरकार रियायत दे तो कुछ लाभ होगा।

अगर लोग किताब नहीं खरीदना चाहते हैं तो वे पुस्‍तक मेले में क्‍यों आते हैं। और लोग खरीदते ही नहीं हैं तो मेले में किताब कैसे बिक जाती हैं। कौन खरीदता है उन्‍हें। किताबों की खरीदारी करने वाले दिल्‍ली के ही नहीं, आसपास के राज्‍यों के लोग भी आते हैं। कुल किताबों में जितना कमीशन मिलता है, उससे ज्‍यादा तो आने-जाने में खर्च हो जाता है। इसके बावजूद लोग आते हैं तो इसकी मुख्‍य वजह है, एक ही छत के नीचे सभी प्रकाशकों का मौजूद होना। ऐसे में लोगों को अपनी मनपसंद की किताबें खरीदने में सुविधा होती है। विश्‍व पुस्‍तक मेले-2013 के दौरान पहले दिन तीन लगातार बारिश पड़ने और बहुत ज्‍यादा खराब मौसम होने के बावजूद लोग आए तो अभी भी कहा जाए कि किताबों की खरीदी में किसी की रुचि नहीं है। अगर किसी भी तरीके से देश भर में जगह-जगह किताबें उपलब्‍ध कराई जाएं तो जरूरी बिकेंगी। कम से कम एक बार कोशिश तो करनी ही चाहिए।

(यह लेख संपादित रूप में जनसत्ता में 10 फरवरी 2013 को प्रकाशित हुआ है)

जर्मनी में सहेजी जा रही है भारत की साहित्यिक धरोहर : केवल तिवारी

जो काम भारत सरकार को करना चाहिए था, वह काम जर्मनी में किया जा  रहा है। वहां के ट्यबिनगेन विश्वविद्यालय में हिंदी साहित्यिक लघु पत्रिकाओं का पहला अंतरराष्ट्रीय अभिलेखीय संग्रह तैयार किया जा रहा है। इसमें उत्‍तर भारत के साहित्यिक परिवेश को जीवंत रूप देने के लिए उसका डिजिटाइज, सूचीबद्ध और दस्‍तावेजीकरण करने का प्रयास है। युवा लेखक और पत्रकार केवल तिवारी का आलेख-
एक बहस चल पड़ी थी कि इंटरनेट के इस युग में हस्तलिखित शब्द गुम हो रहे हैं। विभिन्न पुस्तकालयों में भी ऐसे सवाल आ रहे थे कि वे लोग इन शब्दों को बचाने के क्रम में क्या कर रहे हैं या शायद कुछ किया ही नहीं जा रहा है। इस तरह की चर्चाओं में जाहिर है, अन्य चर्चाओं की तरह पक्ष और प्रतिपक्ष में मत बने। इंटरनेट के जमाने में शब्द गुम हो रहे हैं या उन्हें सहेजने का जतन हो रहा है,  यह अनुभव की बात हो सकती है,  पढ़ने-पढ़ाने की आदत की बात हो सकती है,  लेकिन एक अच्छा काम जो हो रहा है वह है लघु पत्रिकाओं को बचाने का और वह भी इंटरनेट यानी ई-युग में ई-तकनीक से। न सिर्फ बचाया जा रहा है, बल्कि भाषाई विविधता में उनकी सर्व सुलभता भी तय की जा रही है। कर्मेंदु शिशिर शोधागार, जर्मनी के जरिए उर्दू, पर्सियाई, हिन्दी और संस्कृत की तमाम नामी और गुमनामी में खोई पत्रिकाओं को सहेजा जा रहा है ताकि इन पत्रिकाओं की कालजयी रचनाओं से लोग रू-ब-रू हो सकें और जिनका इनसे लगाव रहा है वे उसे उस रूप में देखने का सुख प्राप्त कर सकें। फिलाहाल शोधागार में महत्‍वपूर्ण हिंदी पत्रिकाएं (लगभग 4500 अंक), साहित्‍यकारों द्वारा लिखे गए सैंकडों हस्‍‍तलिखित पत्र, लगभग 300 फोटोग्राफ्स, 40 प्रसिद्ध लेखकों की एक एलबम और साथ ही 20 लेखकों के लैमिनेटेड फोटोग्राफ हैं। इस अभियान में लगे लोग आधुनिक परिवेश में भाषा के व्यापक फलक और उसमें हो रहे परिवर्तन के बारे में दुनिया के सामने तस्वीर पेश करेंगे ताकि उस आकाश में विचरण कर नई अनुभूति हो सके। संभवतः रचनाशीलता की कल्पनाशील ताकत के साथ रचना संसार के अतीत को देख पाना नया अनुभव होगा।
शोधागार में हिंदी की सबसे पुरानी पत्रिकाओं में राधाचरण गोस्‍वामी (1883) द्वारा संपादित ‘भारतेन्‍दु’ के अंक, बाबू बद्री नारायण चौधरी द्वारा प्रकाशित ‘आनन्‍द कादम्बिनी’ (1883-84) और ‘साम्‍यवादी’ (1926) हैं। स्‍वतंत्रता (1947) के बाद की लगभग सभी महत्वपूर्ण हिंदी पत्रिकाएं भी यहां हैं। इनमें अणिमा, अभिरुचि, नया साहित्य, पहल, हंस, शेष, कल्‍पना, प्रतीक और कथा जैसी तमाम महत्‍वपूर्ण पत्रिकाएं हैं। इनके अलावा इतिहास, संस्‍कृति, भाषा, साहित्‍य का इतिहास, कला, संगीत, लोक साहित्‍य से संबंधित दुर्लभ कालजयी कृतियां भी हैं। उदाहरण के लिए प्रसिद्ध लेखक राहुल सांकृत्‍यान द्वारा पाली से हिंदी में अनु‍दित ‘मज्झिम निकाय’ का पहला संस्‍करण (1933)। लघु पत्रिकाओं के 4500 से अधिक संस्करणों को डिजीटली सहेजने के इस प्रयास के तमाम किंतु-परंतु हो सकते हैं, लेकिन सात समुंदर पार से एक ऐसे प्रयास का मसिजीवी जगत स्वागत ही करेगा। जर्मनी के ट्यबिनगेन विश्वविद्यालय के सहयोग से विश्वभर की तमाम लघु पत्रिकाओं के शब्दों को बचाने की इस मुहिम में लखनऊ की मुंशी नवल किशोर प्रेस के तमाम प्रकाशनों को लिया गया है और संबंधित प्रेस के सहयोग से ऐसा कर पाना इससे जुड़े लोगों के लिए संभव हो पाया है।
आलोचक और लेखक कर्मेंदु शिशिर और उनकी टीम ने साहित्य प्रेमियों के साथ मिलकर जर्मनी के इस विश्वविद्यालय के साथ इस काम को आगे बढ़ाया है। इस परियोजना में उनके महत्‍वपूर्ण योगदान के लिए इस शोधागार का नाम उन्‍हीं के नाम पर रखा गया है। इस कदम की सार्थकता, उपयोगिता और महत्ता का इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले की डॉक्‍टर वसुधा डालमिया ने इसमें सहयोग किया है।
इस शोधागार का यह कदम तो अभी एक शुरुआत भर है। केएसएस टीम के को-ऑर्डिनेटर दिव्य राज अमिय का कहना है कि डिजीटल सहेजने के इस क्रम में अभी 150 साल पुरानी पत्रिकाओं के कैटलॉग आदि बनाए जाएंगे। इसके लिए टीम दिल्ली, कराची में काम कर रही है। उल्लेखनीय है कि आधुनिक दक्षिण एशियाई देशों के लोगों के लिए हिन्दी और उर्दू की इन लघु पत्रिकाओं का स्वरूप देखने का एक सुखद संयोग बन पड़ेगा।
केएसएस की टीम ने यह कदम ऐसे समय उठाया है जिसे संभवतः इस समाज से जुड़े लोग एकदम सामयिक कहेंगे। आज हिन्दी और उर्दू विश्व की तीसरे नंबर की भाषा के तौर पर उभर रही हैं। दक्षिण एशिया में देवनागरी और अरबी भाषा के छापेखाने लग रहे हैं। जाहिर है, ऐसे में युवा साहित्यप्रमियों के मन में यह बात कौंधती होगी कि आखिर लघु पत्रिका का स्वरूप कैसा रहा होगा। फलां पत्रिका में लेख कैसे होंगे। यहां यह कहना प्रासंगिक होगा कि आज कई पुराने अखबार अपने प्रकाशन के 50 साल पूर्व या 60 साल पूर्व की खबरों की एक झलक पाठकों के सामने रख रहे हैं। ‘दैनिक हिन्दुस्तान’ और ‘नई दुनिया’ अखबार में इस तरह का कॉलम लोकप्रिय है। निश्चित रूप से उस समय की शैली, अंदाज और शब्दों की बुनावट में फर्क रहा होगा। ऐसे में लघु पत्रिकाओं, जिन्हें निकालने के लिए महान हस्तियों ने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया, उनकी रचनाओं और उनके द्वारा चयनित रचनाओं को देखना सुखद संयोग ही होगा।
शोधागार टीम का कहना है कि पत्रिकाओं को सहेजने का काम तो होगा ही साथ ही साथ आज के बदलते स्वरूप और भाषाई जुड़ाव तथा भाषा का विस्तार भी दुनिया के सामने रखना एक महत्वपूर्ण काम होगा। वैश्विक भाषाई जुड़ाव में देसी बोलियों और लिपियों के साथ भी संबंधित पठन सामग्रियों का समायोजन होगा।
कर्मेंदु शिशिर शोधागार यानी केएसस की ओर से दावा किया जा रहा है कि यह पहला अंतरराष्ट्रीय ऐसा डिजीटल संस्करण होगा जिसमें लघु पत्रिकाओं के अलावा विश्वभर की भाषाई रचनाओं का भंडार होगा। इसके पहले ही पन्ने पर लोगों से यह भी पूछा जाएगा कि इसमें और क्या किया जा सकता है। यानी साहित्यमत बनाने का एक मंच। यदि वास्तव में इस दिशा में कुछ ठोस काम हो जाए तो सुखद अनुभूति ही होगी।
इस शोधागार के उर्दू खंड में लखनऊ के मुंशी नवल किशोर प्रेस की धरोहर यानी वर्ष 1870 से 1970 के बीच के संग्रह को शामिल किया गया है। यही नहीं कई उर्दू रचनाओं का हिन्दी में अनुवाद भी इस खंड में शामिल होगा। शोधागार में मशहूर पत्रिकाओं के खास अंकों को भी डिजिटल रूप में देखा जा सकेगा। चित्रकारों,  रचनाकारों और अन्य रचनाओं की सीडी भी शोधागार टीम उपलब्ध कराएगी। शोधागार टीम से जुड़े लोगों का कहना सत्य है कि यह काम अकेले संभव नहीं है। इसलिए उन्होंने अपने साफ्टवेयर इंजीनियर से लेकर उन पत्रिकाओं और संपादकों को भी शामिल किया है जिनसे उन्हें तमाम चीजें उपलब्ध हुई हैं। अगर विषय के जानकारों में जुनून हो, लोगों का सहयोग हो तो ऐसा काम संभव है। देखना यह होगा कि इस युक्ति का कितना लोग लाभ उठा पाते हैं।
सर्च इंजन की मदद से हिंदी जरनलों और पत्रिकाओं तथा मुंशी नवल किशोर प्रेस के उर्दू प्रकाशनों के अन्‍तर्वस्‍तु के बारे में सूचना उपलब्‍ध करवाने के लिए विडियो ग्राफिकल डाटाबेस का सृजन करना, 1947 से 1980 तक की लघु पत्रिकाओं की पहली पीढ़ी के संपादकों और लेखकों के एक आडियो विजुअल डाटाबेस का सृजन, महत्‍वपूर्ण कृतियों के प्रकाशन और पुनर्प्रकाशन के लिए प्रोत्‍साहित करना आदि शोधागार की महत्‍वाकांक्षी योजनाएं हैं। कवि सोमदत्‍त ( 1938-1989) की अप्रकाशित रचनाओं के प्रकाशन, मुंशी नवजादिक लाल श्रीवास्‍तव (1934) की रचना ‘पराधीनों की विजय यात्रा’ का आलोचक मैनेजर पाण्‍डेय के संपादकत्‍व में पुनर्प्रकाशन आदि की तैयारी चल रही है।

पर डगर नहीं आसान

किताबों से दूर होती पीढ़ी,  कुछ सोशल साइट्स तक सीमित रहने वाली पीढ़ी और हिन्दी में फाँट की शास्वत दिक्कतों को झेल रही पीढ़ी की तमाम मुश्किलें कैसे हल होंगी ? डिजिटल रूप से तमाम सुविधाएं उपलब्ध कराने के दावे इस अभियान से जुड़े लोगों की ओर से किए गए हैं, लेकिन असल दिक्कत है कि यूनिकोड जैसी फाँट प्रणाली लागू करने के बाद भी कई दिक्कतें पेश आ रही हैं। कहा यह भी जा रहा है कि कर्मेंदु शिशिर शोधागार वेबसाइट के जरिए न केवल लोगों को पुरानी से पुरानी और बेहतरीन रचनाओं से रू-ब-रू कराया जाएगा, बल्कि अन्य संबंधित मैटर भी उपलब्ध हो जाएगा। परंतु अभी कई सवाल बाकी हैं। लोगों को कैसे उन तक जोड़ा जाए। कैसे यह शोधागार सबके लिए सुलभ होगा। फाँट जैसी दिक्कतें कैसे दूर होंगी। यूनिकोड के बाद भी लोगों को हो रही दिक्कतों को कैसे दूर किया जाएगा। इसी क्रम में यह भी कहा जा रहा है कि पत्रिकाओं के कैटलॉग सहेजे जाएंगे, तमाम पत्रिकाएं सुलभ हो जाएंगी, इस पर भी सवाल है। साहित्य से इतर भी कई बातों का दावा किया जा रहा है। प्रयास और सोच निश्चित रूप से अच्छी है,  लेकिन बातें हवाई साबित न हों। इच्छुक लोगों को निश्चित रूप से फायदा मिले, इसके लिए अभी कुछ ठोस कदम उठाने की जरूरत है।

कैसे पहुंचे के एस एस तक

अगर आपको कर्मेंदु शिशिर शोधागार तक पहुचना है तो सीधे टाइप  करें
http://www.kss.uni-tuebingen.de/about_kss.php और आनंद लें हिंदी और उर्दू की अद्भुत दुनिया का।