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अब वे वासर बीत गये : कांतिकुमार जैन

कांतिकुमार जैन

कांतिकुमार जैन

साठ के बाद जीवन आम आदमी ही नहीं, रचनाकारों के लि‍ये भी चिंता का वि‍षय है। लेकि‍न क्‍या इस जीवन में कोई आनंद नहीं रह जाता या रचनात्‍मकता नहीं रह जाती। क्‍या आदर्श स्‍थि‍ति‍ होनी चाहि‍ए। चर्चित संस्‍मरणकार कांति‍कुमार जैन का आलेख-

साठ  पार का जीवन हिन्‍दी साहित्य के प्रारम्‍भ से ही कवियों की चिंता और चिन्‍तन का एक प्रमुख विषय रहा है। उद्दाम वासना के सिद्ध वाक् कवि विद्यापति को साठ पार के जीवन को स्वीकार करने में बड़ी कठिनाई हुई थी- ‘माधव, हम परिनाम’। इस निराशा का कारण था कि अब उन्हें ‘सुत मित रमनि समाज’ सब ‘तापत सैकत वारिबिन्दु सम’ लगने लगे थे। जैसे तप्त बालुका राशि पर पानी की बूंद गिरे और छन्न हो जाये,  वैसे ही बुढ़ापे में न सुत काम आते हैं, न मित्र। रमणियाँ बाबा कहने लगती हैं- मैं क्या करूँ राम, मुझे बुढ्ढा मिल गया जैसा मनोभाव। कबीर जैसा कवि को भी साठ के पार पहुँचकर यह अनुभूति हुई थी कि इस संसार में रहने का अब कोई अर्थ नहीं है। यह बिराना देश है और इस काँटे की बाड़ी में रहने का जो भी उद्यम करेगा, उसे उलछ प्रलछ कर ही रहना होगा। पर साठ के पार जीवन को लेकर सबसे मार्मिक बातें सूफी कवि मलिक मुहम्मद जायसी ने कही हैं। ‘पद्मावत’ के उपसंहार कांड में उसने बड़ी वेदना से लिखा- अब बूढ़ी आयु हो गई है। दृष्टि  मंद हो गई है और नेत्रों में पानी ढलने लगा है। दाँतों के गिरने से गाल पिचक गये हैं, अब मेरे बोल किसी को नहीं सुहाते। विचारने की शक्ति चली गई, गर्व चला जाता है, शीश धुनी हुई रुई के समान हो गया है। कानों से ऊँचा सुनाई पडऩे लगा है। केशों में रहने वाले भौरों की श्यामता चली गई है। शरीर जीते जी मरे के समान हो गया है। जब तक यौवन है तभी तक जीवन है। फिर पराये वश हो जाना- यही मृत्यु है। साठ पार के जीवन को जायसी स्वीकार नहीं कर पाते-

विधि जो सीस डुलावे, सीसे धुनै तेहि रीस
बूढ़े-आढ़े होहु तुम, केहि यहि कीन्ह असीस।

‘बूढ़े आढ़े’ अर्थात् वृद्ध और प्रतिष्ठित वरिष्ठ नागरिकों को शासन की ओर से सुविधाएँ तो अब दी जाने लगी हैं, उन्हें सम्मानीय भी माना जाने लगा है पर ‘निराला’ तो बुढ़ापे में नितांत अकेलेपन का अनुभव करते थे-

मैं अकेला
देखता हूँ आ रही मेरे दिवस की सांध्य बेला।

मैथिलीशरण गुप्त जी ने बड़े दु:ख से लिखा :

अब वे वासर बीत गये
मन तो भरा भरा है लेकिन तन के सब रस रीत गये
चमक छोड़ चौमासे बीते, कंवल छोड़कर शीत गये
लेकर मधु की ऊष्मा सारी, मेरे मन के पीत गये
अब तो केवल गूँज बची है जीवन के सब गीत गये
इस राम जाने जीवन में, हम हारे या जीत गये

चलाचली की बेला के यही दु:ख हैं। अब आप न मुंगौड़े खा सकते हैं, न इमरिती। दही बड़े खाने से कफ भड़क उठता है और खाँसते-खाँसते पसलियाँ दु:खने लगती हैं। बुखार चढ़ा रहता है सो अलग। मृत्यु भय के कारण रात भर नींद नहीं आती। गालिब के मन पर मौत छाई रहती थी। उसके शेरों में मौत का जिक्र बारबार आता है। शायद जीवन भर के अभाव, तंगदस्ती। दु:ख ही शायद गालिब के जीवन की कथा रही हो-

कैदे हयात बंद गम असल में दोनों एक हैं
मौत से पहले आदमी गम से निजात पायें क्यों?

बुंदेली कवि ईसुरी को मृत्यु से भय नहीं लगता था उन्होंने कहा-

आ गये मरबे के दिन मोरे
चल जात जे जी रे
अब तो देह अगन वा रई ना, हात पाँव सब सीरे
डारन लगे रात हैं नइया, पात होत जब पीरे

पर ये सारे कवि इस बात से दु:खी है कि ‘आछे दिन पाछे गये, हरि सो किया न हेत। अब पछताये होत का जब चिडिय़ा चुग गई खेत।’ जीवन की व्यर्थता का बोध। दूसरा दु:ख इस बात का है कि अब पुलिस का प्रियतमा नहीं आती।

‘अज्ञेय’ ने अपने एक हाइकू में लम्‍बे जीवन की अनुभूतियों का सार-संक्षेप प्रस्तुत करते हुए लिखा है-

झरना
झरता पत्ता हरी डाल पर
अटक गया।

विद्वानों ने इसका जो भी अर्थ किया हो, मेरी दृष्टि  में साठ पार के जीवन का अर्थ है झरना अवश्यभावी है। ‘धरा को प्रमान यहै तुलसी जो फरासो झरा, जो जरा सो बुताना’। हरसिंगार झरते हैं झर-झर- जो जीवित है वह झरेगा ही पर झरते हुए व्यक्ति को नाना मोह घेरे रहते हैं : बैंक बैलेंस कितना है, मेरे बाद मेरी चल अचल संपत्ति का क्या होगा, मेरी पुस्तकों की रायल्टी किसे मिलेगी, वह मिलेगी भी या नहीं? फिर मेरी जो तमाम अप्रकाशित रचनाएं पड़ी हुई हैं वे क्या यों ही नष्ट हो जायेंगी। साहित्यकार की सबसे बड़ी पीड़ा होती है उसकी कृतियों का अप्रकाशित रह जाना। मेरे मित्र प्रमोद वर्मा का ‘समग्र’ उनकी मृत्यु के बाद प्रकाशित हुआ है। मुक्तिबोध जी का पहिला संग्रह तब छपा जब वे दिवंगत हो चुके थे। अशोक वाजपेयी ने अपने स्तंभ ‘कभी कभार’ में अपने बाल सखा रमेश दत्त दुबे की रचनाओं के महत्व का आकलन करते हुए लिखा था कि‍ किसी अच्छे प्रकाशक को रमेश दत्त दुबे की कृतियाँ प्राप्त कर उन्हें प्रकाशित करने में रुचि लेना चाहिए ताकि आंचलिक आधुनिकता का विरल रूप सामने आ सके। हिन्‍दी में एक नहीं, अनेक ऐसे साहित्यकार हैं जिनकी रचनाएं उनके जीवन काल में प्रकाशित नहीं हो पातीं। हमें ऐसा कोई तंत्र विकसित करना चाहिए कि लेखक की महत्वपूर्ण रचनाएं पाठकों के सामने उसके जीवन काल में ही सामने आ सकें और लेखक को अपने लिखे हुए को प्रकाशित देखने और उससे सार्थकता की अनुभूति हो सके।

हिन्‍दी कवियों ने साठ पार के जीवन के आध्यात्मिक, मनोवैज्ञानिक और शारीरिक पक्षों का उल्लेख तो किया है पर आर्थिक पक्ष की ओर किसी का ध्यान नहीं गया। कारण- प्रारम्‍भ से ही हमारे कवियों ने दैन्य को/विपन्नता को महिमा मंडित किया है और माँग के खाने और मसीत में सोने को बुरा नहीं माना है। कुछ ऐसे भी हैं जो सत्ता में भागीदारी करते रहे हैं। मीर, चंदबरदाई की तरह, खुसरो की तरह, केशवदास की तरह या अब्दुर रहीम खान की तरह, ये सब जीवन की सुविधाओं का सुख भोगते रहे हैं। साहित्य का इतिहास हमें बताता है कि सत्ता के सुख के लिये हमारे कवियों का दरबार से जुडऩा आम रहा है। सत्ता की सत्ता, साहित्य का माने जाने का सुख अलग। केशव और तुलसी केवल मध्यकाल के सत्य नहीं हैं, हमारे आधुनिक काल के भी सत्य हैं। अज्ञेय और मुक्तिबोध, अशोक वाजपेयी और राजकमल चौधरी जैसे युग्म हमारी परम्‍परा का अनिवार्य हिस्सा हैं। हिन्‍दी में निराला जैसा होल टाइम साहित्यकार बिरला ही होगा। आधुनिक काल के अधिकांश हिन्‍दी साहित्यकारों के लिये साहित्य पार्टटाइम धंधा है। साठ पार के जीवन की कोई योजना उनके पास नहीं होती है। इधर नौकरीपेशा साहित्यकारों को पेंशन, भविष्य निधि आदि के कारण वृद्धावस्था के लिये सुरक्षा प्राप्त है। अन्यथा आज से बीस-पच्चीस वर्ष पहिले आपको मुक्तिबोध, परसाई या शरद जोशी जैसा साठोत्तरी जीवन जीना पड़ता। अब तो अकादमियों की पीठों की अध्यक्षता, प्रकाशन गृह का परामर्श जैसे दायित्व साहित्यकारों को चिंतामुक्त रखते हैं पर अधिकांश तो इतने सौभाग्यशाली नहीं होते। हिन्‍दी का साहित्यकार जब दुर्घटनाग्रस्त होता है या अस्वस्थ तो सरकार से वित्तिीय सहायता माँगने का रिवाज है। उन साहित्यकारों के प्रकाशक, उन साहित्यकारों के संरक्षक संघ या मंच कभी-कभी ही उनकी सुध लेते देखे जाते हैं। अब सरकार साहित्यकार की वित्तीय सहायता करेगी तो वह साहित्यकार के विचारों का रंग भी देखेगी और आपातकाल में उसका स्टैंड भी। हिन्‍दी के हमारे साहित्यकार इसी में गदगद हो जाते हैं कि शीला जी, त्रिलोचन जी के निवास पर पहुँचकर उनकी खोजखबर ले आती हैं या मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री किसी दुर्घटनाग्रस्त कवि की कोई कविता पाठ्यक्रम में सम्मिलित किये जाने की घोषणा कर देते हैं। साहित्यकारों को उचित रायल्टी मिले, पुरस्कारों में पक्षपात न हो, पीठों पर नियुक्तियों में भाई भतीजावाद या रंगदारी न चले, इसकी ओर किसी का ध्यान नहीं है। विज्ञान और तकनीक की प्रगति के कारण साठ पार के जीवन की समस्याओं का समाधान अब उतना कठिन नहीं रहा बशर्ते वित्त का अभाव न हो। यह तभी सम्‍भव है जब साहित्यकार के लिए समाज में सम्मान ही नहीं, उसकी चिंता भी हो उसके वार्धक्य की निश्चिंतता के लिये हमारे समाज और हमारे सत्ताशीर्षों में चिंता का अभी कोई सुनिश्चित संकेत नहीं है।

यहाँ अपने प्राध्यापकीय जीवन के एक अनुभव का उल्लेख करना मुझे वाँछनीय लगता है। सूरदास का पद ‘मधुवन तुम कत रहत हरे’ की व्याख्या करते हुए मैं कवि के अंधत्व के विभिन्न पक्षों की चर्चा करता। कहता कि सूर जन्मान्ध नहीं हो सकते, यदि होते तो उन्हें हरे रंग का ज्ञान नहीं होता। जिसने जीवन में कभी रंगों का वैविध्य देखा ही नहीं, उसे क्या पता कि मधुवन हरा है या पीला। उसे तो यह भी संज्ञान नहीं हो सकता कि नीले और काले में क्या भेद होता है। बिहारी यदि जन्मान्ध होते तो वे ‘सोहत ओढ़े पीतपट स्याम सलोने गात’ जैसी पंक्ति नहीं लिख सकते थे। ‘नीलांबर परिधान हरित पट पर सुंदर है’ जैसा कुछ लिखने के लिये मैथिलीशरण गुप्त की आँखें सजग होनी ही चाहिए। जन्मान्ध के लिये इन्द्रधनुष की कल्पना करना सम्‍भव नहीं है। मैं अपने छात्रों से यह भी पूछता कि उन्हें,  भगवान न करे, यदि कभी अपनी पाँच ज्ञानेन्द्रियों में से किसी एक को अक्षुण्ण रखने का चुनाव करना हो तो वे किसे सुरक्षित रखना चाहेंगे? घ्राणेन्द्रिय की रक्षा किसी की भी प्राथमिकता नहीं थी। घ्राण न भी तो उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा। घ्राण विलासिता की इन्द्रिय है, जीवन के लिए घ्राण का उपयोग बहुत ही सीमित है। साहित्य में घ्राणेन्द्रिय के संवेदन का उल्लेख सबसे कम है। स्वाद जिह्वा का एक मात्र कार्य नहीं है। मनुष्य ने विकास क्रम में जिह्वा को स्वाद लेने की तुलना में ध्वनियों का उच्चारण करने जैसा अधिक सामाजिक और उपयोगी कार्य सौंप दिया है। जिह्वा के अभाव में हम गूंगे हो जायेंगे और हमारी सामाजिकता का बहुलांश समाप्त हो जायेगा। उस समय तक साहित्य में वाचिक परम्‍परा का महत्व स्थापित नहीं हुआ था। अन्यथा मैं कहता कि जिह्वा के बिना न रजनीश संभव हैं, न नामवर। विद्यार्थी सहमत होते कि विवशता में वे अपनी घ्राणेन्द्रिय का और फिर स्वादेन्द्रिय को परित्याग करने का प्रस्तुत हो जायेंगे। स्पर्श का क्या किया जाये? स्पर्श के लिये हमें दूसरे के निकट आना पड़ता है। रिमोट में हम स्पर्श से संवेदित नहीं हो सकते। श्रृंगार का अधिकांश संबंध स्पर्श से ही है। यदि व्यक्ति के पास स्पर्शेंद्रिय न होती तो रीति काल की कविता भी नहीं होती। रीतिकाल काव्य ही क्यों, नई कविता भी स्पर्श संवेदन के अभाव में असंभव होती। साहित्यकार का काम घ्राण, स्वाद और स्पर्श के बिना चल जायेगा पर श्रवण और दृष्टि  के बिना? इन दोनों में से किसी एक का चुनाव करने के लिये साहित्यकार को बहुत सोचना पड़ेगा। विद्यार्थियों को भी इनमें से किसी एक के पक्ष में मत देने में कठिनाई होती। साठ के पार पहुँचे साहित्यकार को कालदेवता श्रवण और दृष्टि  की पुर्जियों में से किसी एक को उठाने का अवसर दे तो साहित्यकार मन ही मन मनायेगा कि हे भगवान आँखों को बचा लो। पर दूसरे ही क्षण वह कानों को बचाने की गुहार लगाने लगेगा। बधिरता मुझे असामाजिक बना देगी, कवि सम्मेलनों, मुशायरों, संगीत गोष्ठियों से मुझे वंचित होना पड़ेगा। मैं चलचित्र या टी.वी. देखूँगा तो न मैं वार्तालाप समझूँगा, न संगीत का आनंद उठा पाऊँगा। मेरा दूरभाष पर बात करना भी असम्‍भव हो जायेगा। बगल में बैठा हुआ मित्र चिल्ला रहा है और आप कान में श्रवण यंत्र लगाये उसका मुँह ताक रहे हैं। लोकगीत, लोकवाद्य सभी निरर्थक। न के.एल. सहगल, न रफी, न लता, न आशा कोई आपको आनंदित कर पाने में समर्थ नहीं होगा। पक्षियों की टीट्विट भी निरर्थक। सो कान तो रहने ही चाहिए। तो क्या आप आँखों की तुलना में कानों का पक्ष लेंगे? मैं आँखें बंद कर लेता- सब कुछ पुंछ जात, कक्षा अस्तित्व हीन हो जाती। फिर आँखें खोल, कान बंद करता, कक्षा है, छात्रों के चेहरे हैं, छात्राओं की रंगबिरंगी साडिय़ाँ हैं, श्याम पट है। है, विश्‍व है। नहीं, मैं अपनी आँखें नहीं दूँगा। आँखों के बिना विश्‍व की अधिकांश श्री, सुषमा निरर्थक हो जायेगी। छात्र मेरे निष्कर्षों से सहमत होते, उनकी आँखें बड़ी हो जातीं जैसे वे अपनी दृष्टि बचाने के लिए कटिबद्ध हो कोई भी मूल्य चुकाने को तैयार हैं। पर मुझे लगा कि इतने गम्‍भीर निर्णय के लिये विद्वानों की पंचायत बुलानी चाहिए। मैंने एक संगोष्ठी का आयोजन किया। मनोविज्ञानवेत्ता, कवि, चित्रकार, संगीताचार्य, चिकित्सक, स्त्री, पुरुष आमंत्रित थे। सबका निष्कर्ष था कि साठ के पार की वय में सब कुछ चला जाये, आँखें भर न जायें। ‘कागा सब तन खाइयो, चुन चुन खाइयो माँस, दुई नैना मत खाइयो, पीऊ मिलन की आस’ का मर्म समझ में आया। यह भी समझ में आया कि देवदास यदि अंधा हो गया होता तो वह पारो को देख नहीं पाता, इससे बड़ा संताप और क्या होता। इस संगोष्ठी में एक इतिहासवेत्ता भी उपस्थित थे। बोले कि महाभारत का मूल कारण धृतराष्ट्र का अंधत्व था। यदि राजा अंधा न होता, गूंगा या बहरा होता तो भारत का इतिहास कुछ और ही होता। करेले पर नीम चढ़ा यह कि,  गाँधारी ने भी स्वेच्छा से अंधत्व का वरण किया, कम से कम दोनों में से एक के पास तो दृष्टि  होनी ही चाहिए थी। राजा यदि अंधा हो तो देश चौपट हो ही जायेगा। गूंगा, बहरा व्यक्ति नहीं। एक अंधे राजा ने पूरे देश को, उसके पूरे इतिहास को विकृत कर दिया। मैंने बहुत पहिले जैनेन्द्र कुमार की एक कहानी पढ़ी थी- ‘जान्हवी’। जान्हवी एक वियोगिनी का नाम है जो अपने प्रियतम से मिलने की आशा अंत तक नहीं छोड़ती। जब देखा तब वह गुनगुनाया करती है:

कागा, सब तन खाइयो, चुन चुन खइयो माँस
दो नैना मत खाइयो, पिया मिलन की आस।

साठ के पार पहुँचकर मैं जान्हवी की तरह इस दोहे को ज्यों का त्यों दुहराऊँगा तो नहीं, उसमें थोड़ा सा परिवर्तन करके यह जरूर कहूँगा-

कागा, सब तन खाइयो, चुन चुन खइयो माँस
दो नैना मत खाइयो, पुस्तक पढऩ की आस

पढऩा मुझसे अभी भी अच्छा लगता है- क्लासिकी साहित्य भी और नया लिखा जाने वाला भी। मैंने कुछ दिनों पहिले ही अपने बेसंभाल होते जो रहे पुस्तकालय की छंटनी की है। जो पुस्तकें मैं पढ़ चुका हूँ और जिन्हें दुबारा पढऩे की न तो रुचि है, न ही समय, उन्हें अलग करो। उन्हें भी अलग करो जिन्हें पढऩे का समय अब नहीं निकाला जा सकेगा। समय की सीमा है, आँखों की ज्योति की भी। पर पढऩा तो है ही। समय काटने के लिये भी और समाज तथा मानव स्वभाव को समझने के लिये भी। समय के साथ रहने के लिये भी। इतनी सारी पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं, उन्हें भी देखना जरूरी है। सबको भले न पढ़ पाऊँ, उन्हें उलटना-पुलटना तो चाहिए ही। फिर हिन्‍दी में इतनी सारी पत्रिकाएं प्रकाशित हो रही हैं और आपको पास आ भी रही हैं। सभी तो कूड़ा नहीं हैं। उनमें काफी कुछ नया, विचारोत्तेजक, मौलिक होता है कि आउट ऑफ डेट न होने के लिये उन्हें पढऩा चाहिए। अपने समय, समाज और प्रगति को जानने-समझने के लिये उनसे दूर रहना किसी भी प्रकार उचित नहीं। इसके लिये समय भी चाहिए और आँखें भी। समय का नियोजन आप कर सकते हैं, आँखों की ज्योति का भी। डॉक्‍टर भले ही कहें कि‍ ज्‍यादा पढ़ना आपके लि‍ये उचि‍त नहीं है, पर कितना पढऩा उचित है यह तो आपको तय करना होगा। हर तीस-पैंतीस दिन बाद ढेर पत्रिकाएं आपके पास आती हैं, डाकिया आपको जानने लगा है। इन पत्रिकाओं को मैं तीन कोटियों में बाँटता हूँ। पहिली वे जिनका नाम देखा और रद्दी के ढेर में पटक दिया। इन्हें पढऩे क्या, उलटने-पुलटने का समय भी अब मेरे पास नहीं है। अध्यात्म की, धर्म की, पत्रिकाएं मुझे व्यर्थ लगती हैं। कोई नई बात नहीं, कोई नहीं बहस नहीं। दूसरी कोटि उन पत्रिकाओं की है जिन्हें उलट कर एक सरसरी निगाह डालने से यह पता चल जाता है कि हिन्‍दी में इन दिनों क्या लिखा जा रहा है, नई पीढ़ी क्या सोचती है, उनकी प्राथमिकताएं क्या हैं, वे हम बूढ़े लोगों से कितनी भिन्न है। यदि कोई रचना प्रथम दृष्टया अच्छी लगी तो प्रथम बैठक में ही उसे पढ़ भी लिया। हिन्‍दी में इन दिनों कोई विश्वसनीय पाक्षिक मुझे नहीं दिखता। सब अपने-अपने मित्रों, गुट के, क्षेत्र के, संघ के, मंच के लेखकों का जैकारा करने में व्यस्त हैं। समीक्षकों की बात का भरोसा कर लेखकों को पढ़ो तो लगता है कि आप जिसे गाय का बछड़ा समझ रहे थे वह कुत्ते का पिल्ला निकला। कुछ लोगों को तो नामावली गिनाना ही अपने समीक्षक होने के कर्तव्य की इतिश्री लगती है। इसलिए हिन्‍दी में इन दिनों स्वर्ग देखने के लिये स्वयं ही मरना पड़ता है। अधिकांश समीक्षक पेड़ तो गिना देते हैं पर वन की श्री सुषमा देखनी हो तो धंसो उनमें डर नहीं है। चिड्डों की तरह यहाँ-वहाँ फुदकने वाले समीक्षकों ने हिन्‍दी समीक्षा को बेहद अविश्वसनीय और अप्रमाणिक बना दिया है। इस तरह का साहित्य छापने वाले पत्रिकाओं को मैं भी अलग डाल देता हूँ। जो आठ-दस पत्रिकाएं बचती हैं,  वहीं पढ़ी जाती हैं। कभी किसी पुस्तक की चर्चा हुई तो उसे भी पढऩा होता है समीक्षार्थ न आये, भेंट स्वरूप न आये, मानार्थ न आये तो खरीद कर यदि समीक्षार्थ कोई पुस्तक मेरे पास आई है और लगा है कि उस पर लिखना चाहिए तो उसे पढ़ता हूँ तब लिखता हूँ। यदि लिखने का मन नहीं हुआ तो पुस्तक सधन्यवाद वापिस। कुछ लेखक इसका बुरा भी मानते हैं और संबंध खराब कर लेते हैं। अब साठ के पार पहुँचकर मैं आपकी दिलजोई करूँ या अपनी शक्ति, समय और आँखों की ज्योति देखूँ। साठ के पार पहुँचकर नये साहित्यिक मित्र भी बनते हैं और कुछ पुराने परिचितों से संबंध बिगड़ जाते हैं। साठ के पार पहुँचे समीक्षक को अपने दायित्व का निर्वाह विवेक पूर्वक ही करना चाहिए, अचूक अवसरवादिता आपको धीरे-धीरे अविश्वसनीय और गैर भरोसेमंद बना देती है।

सो 60 क्या 78 पार के बाद भी साहित्य मेरी प्राथमिकताओं में है- अपनी समस्त शारीरिक, मानसिक और भौमिक सीमाओं के बावजूद। गालिब ने कहा था कि ‘छुटती नहीं है काफिर मुँह से लगी हुई’ पढऩे की आदत मुझसे भी नहीं छूट पा रही है। मुझे अपने स्वास्थ्य सामर्थ्‍य और समय सीमा के प्रबंधन के बिना साहित्य से सानिध्य बनाये रखने की बात सोचना विवेकहीनता लगती है। ‘साठ के पार जीवन और साहित्य के बीच जो नियंत्रण रेखा खींच दी गई है, उसका उल्लंघन कई प्रकार की समस्याओं को जन्म दे सकता है और यह उम्र समस्याओं से बचने की है, उन्हें भड़काने की नहीं।

वास्तविकता यह है साठ पार का जीवन रोमानी वास्तविकता नहीं है यह ठोस आलावकारी और काफी हद तक कटु वास्तविकता है। जरा जर्जर शरीर, आधियों व्याधियों से शक्तिहीन जीवन, वित्तीय संकट, पारिवारिक विषमताएं, समसामयिक साहित्यकारों की ईर्ष्‍या- साठोत्तरी साहित्यकार इनमें से किसी को संभालने की जुगत नहीं कर पाता। वह डॉक्टरों के चक्कर लगाये कि साहित्य रचना करे, अपने मोतियाबिन्‍द का ऑपरेशन कराये कि साहित्य के पढऩे का साहस संचित करे, बहू-बेटियों और उनके परिवारों के लोभ-लालच से स्वयं को सुरक्षित रखने के उपाय खोजे कि अपना लिखना-पढऩा जारी रखे। हर साहित्यकार चतुर सुजान हो और अपने वृद्धावस्था का यह आकस्मिक दुर्घटना का पूर्व प्रबंधन कर ही सके, यह कम ही देखा जाता है। कभी-कभी साहित्यकार के साठ पार के जीवन की विषमताओं के लिये स्वयं वही उत्तरदायी होता है। जो साहित्यकार जीवन भर नियमित रूप से पाव भर छालिये से अपनी आँतों को नष्ट  करेगा, जिसका दिन रसरंजन से भी प्रारम्‍भ होगा और उसी से समाप्त, जो भूख को शांत करने के लिए कड़क चाय पीने को बाध्य होगा, उसका साठोत्तर जीवन कैसा होगा- इसके अनेक उदाहरण हमारे सामने हैं। साहित्यकार सम्‍वेदनशील प्राणी होता है इसमें संदेह नहीं पर वह शरीरधारी होता है- शरीर विज्ञान के सभी नियम उस पर लागू होते हैं- यह भी उतना ही सच है जितना उसका रचियता होना। हमारे देश में साहित्यकार को लेकर जो मिथ प्रचलित हैं, उनसे भी मुक्त होने की आवश्यकता है। साहित्यकार सदैव असंतुलित, असंयमित स्वैराचारी जीवन ही जिये, यह आवश्यक नहीं है।

रचनात्मकता का संबंध हार्मोंस से है। जब शरीर के हार्मोंस क्षीण होने लगें तब रचनात्मकता में कमी आने लगती है। कल्पना अब कुलाँचे नहीं भरती, शब्दों में गूँज नहीं बचती। एक अभ्यास, पुनरावृत्ति, निष्प्राण दुहराव। इसीलिये कुछ विचारक मानते हैं कि साठ पार के व्यक्ति की रचनात्मकता को तिलांजलि दे देनी चाहिए। कई साहित्यकार ऐसा करते भी हैं। महादेवी जी ने वार्धक्य में गीत लिखने छोड़ दिये थे, वे ऋचाओं का अनुवाद करने लगी थीं। हमारे अपने दौर में राजेन्द्र यादव ने वयोवृद्धि में कहानी या उपन्यास छोड़कर विमर्श के खेत में बीज बोने शुरू किये, वास्तव में विधा बदल देने से कला की थकान मिटती है पर यह विधान्तरण स्वस्फूर्त होना चाहिए। रचनाकार को जब लगे कि वह न कोई नया प्रयोग कर पा रहा है, न ही उसमें नई संवेदना के अंकुर फूट रहे हैं तो उसे कलम कूची छोड़कर श्रोताओं या दर्शक दीर्घा में आकर बैठने लगना चाहिए, पर कुछ तालिबान किस्म के विचारक फतवा करने के उत्साह में लता मंगेशकर या मकबूल फिदा हुसैन के गायन या चित्रण पर ही पाबंदी लगा देना चाहते हैं। वे भूल जाते हैं कि विश्व के महान साहित्य में साठ पार के साहित्यकारों का योग कुछ कम नहीं है। यही बात रचना के अन्य क्षेत्रों की भी है। इसके विपरीत प्रसिद्ध कथाकार दूधनाथ सिंह साठोत्तर कलाकारों के प्रति ज्यादा संवेदनशील एवं उदार हैं। वे मानते हैं कि जब हमारा माध्यम हमसे सध गया है, हम अनुभव पक्व हो गये हैं, भावी पढिय़ों के लिये हमारे पास देने के लिए मूल्यवान सम्‍पदा है तब उठ जाना कला के लिये बड़ी दुर्घटना है- अपूरणीय क्षति। वे कहते हैं कि मूत्यु को ऐसे कलाकारों से ग्रेस में कुछ वर्षों का जीवन-दान देना ही चाहिए। निश्चिंत होकर, एकाग्रभाव से अपना सर्वोत्तम दिये बिना हम तुम्हें लेने नहीं आयेंगे। मुझे दूधनाथ सिंह की बात मूल्यवान और सार्थक लगती है। कल्पना कीजिए,  रवीन्द्रनाथ ठाकुर दस वर्ष और जीते, गालिब को मृत्यु ने पंद्रह वर्षों का अवकाश और दिया होता या तुलसी को ‘विनय पत्रिका’ लिखने के बाद कुछ समय और मिला होता। कुछ लोग साठ पार होने पर सठिया जाते हैं किंतु कुछ लोगों पर उम्र का प्रभाव नहीं पड़ता। क्या साठ, क्या सत्तर जो लोग साठ के होने के पहिले ही सठिया जाते हैं, उनका आप क्या करेंगे? साहित्यकार के लिये उम्र का बंधन नहीं होता है। हाँ, कोई बंधन होता है रचनात्मकता का। कविता यौवन की विधा है। प्रौढ़ावस्था में उपन्यास या कहानी लिखनी चाहिए और वार्धक्य में आत्मकथा सिंहावलोकन। विश्व साहित्य में ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है जहाँ यौवन में कवियों ने अपना सर्वोत्तम प्रदान किया है। पर ऐसे उदाहरण विरल ही हैं जहाँ 25-30 वर्ष का साहित्यकार ‘गोदान’ लिखे या ‘मैला आंचल’। संस्मरण या आत्मकथा जैसी विधाएं एक तटस्थता, एक वैराग्यभाव की अपेक्षा रखती हैं, वैसे बेईमानी की हिसाब किताब की, आत्मश्लाधा की कोई उम्र नहीं होती। रचनात्मकता, नवनवोन्मेषशीलता किसी उम्र का मुँह नहीं देखती। साहित्यकार को तब तक वृद्ध नहीं माना जाना चाहिए जब तक उसकी रचनाओं में नवीनता का, ताजगी का ताप शेष है।

हिन्‍दी में पुरस्कारों के लिये जो मारामारी है वह प्रतिष्ठा और मान्यता के लिये तो है ही, वित्तीय सुरक्षा कवच प्राप्त करने के लिये भी है। लखटिया पुरस्कार मिल गया तो हारी बीमारी में काम आयेगा, बेटियों की शादी आसानी से हो जायेगी, बेटे-बहू को लगेगा कि गैया अभी भी दूध दे सकती है। पुरस्कार प्राप्त साहित्यकार फेड आउट नहीं होता। पुरस्कार किस संस्था का है, उसके निर्णायक कौन हैं, उनकी विचारधारा क्या है, महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण है कागज का वह टुकड़ा जिसे चैक या ड्राफ्ट कहते हैं। हमारी मनीषा हर काम को वित्तीय साधनों के दोहन में परिवर्तित करने में इतनी कुशल है कि बिना भ्रष्टाचार के हम किसी भी चीज की कल्पना ही नहीं कर पाते। झूठा मेडिकल सर्टिफिकेट लेना हो, रेलवे में आरक्षण करवाना हो, पी.एच.डी. प्राप्त करनी हो, संगोष्ठी करनी हो, मकान खरीदना हो- सब में जितना लेनदेन मेज के ऊपर होता है, उससे कम मेज के नीचे नहीं। साहित्यकार इससे मुक्त होगा, यह सोचना खामख्याली है। जो साहित्यकार यह सब मैनेज नहीं कर सकता वह ‘निराला’ जैसा, मुक्तिबोध जैसा जीवन जीने के लिए बाध्य है। मैं हिन्‍दी के अनेक साहित्यकारों को जानता हूँ जो मंच से गुलशन नंदा को गालियाँ देते हैं पर मन ही मन मनाते हैं हाय;  हम गुलशन नंदा क्यों न हुए? लेखक जिंदगी भर लिखने, छपने और बिकने के बाद भी अपना बुढ़ापा अपने घर में निश्चित होकर नहीं काट सकता। साठ पार के साहित्यकार को हमारा समाज और हमारी सरकारें निश्चिंत होकर लिखने की सुविधा नहीं देती। मध्यप्रदेश शासन ने विभिन्न विश्वविद्यालयों में मुक्तिबोध पीठ, निराला पीठ, प्रेमचंद पीठ जैसी बहुत सम्मानीय और उपयोगी शुरुआत की थी पर उनका जो हश्र हुआ, वह किसी से छिपा नहीं है। राजनीति हमारे साहित्यिक और सांस्कृतिक जीवन पर इस कदर हावी है कि हम किसी भी पद-पुरस्कार-मंच को निष्कलुष रहने ही नहीं देते। आप कितना भी अच्छा कुआँ खरीदिये, उसमें भाँग डालने के सौ-सौ जतन हमें आते हैं। सारा दोष सरकारों का, समाज का ही हो, ऐसा नहीं है। हमारे साहित्यकार भी साठ पार की अपनी दुर्व्‍यवस्‍था के लिये कम जिम्मेदार नहीं हैं। साहित्य रचना को लेकर हमारे मन में कुछ ऐसी रोमानी कल्पनाएं बनी हुई हैं कि साहित्यकार संतुलित जीवन जी ही नहीं पाता। प्रतिभा प्राय: असंतुलित होती है पर वृद्धावस्था का ब्लू प्रिंट तैयार करने का रिवाज हमारे यहाँ नहीं है। साहित्यकार की संपन्नता, उसकी निश्चिंतता सम्माननीय होनी चाहिए। उसे उपेक्षणीय एकाकी, रुग्ण बनाने से बचाने के जितने उपाय हम कर सकें, हमें करने चाहिए। लता मंगेशकर, खुशवंत सिंह यदि साठ पार के बाद भी सक्रिय और ऊर्जा संपन्न हैं तो इसीलिए कि वे स्वस्थ भी हैं और आर्थिक रूप से सुरक्षित भी। हिन्‍दी के विष्णु प्रभाकर भी हमें याद आते हैं। एक प्रकार से विगत को अभ्यागत करने की विधा है। यह विधा मुझसे सध गई, संस्मरण मेरे लिये सुविधा की विधा है। दूसरों के लिये है या नहीं, मैं नहीं कह सकता। कुछ लोगों का आरोप है कि अपने संस्मरणों में क्रुयेल हो गया हूँ। मैं इससे इंकार नहीं करूँगा। शल्य चिकित्सक यदि दया, माया, ममता दिखाने लगे तो वह शल्यक्रिया नहीं कर सकता। हमारे समाज में कथनी और करनी में इतना अंतराल है कि दोनों को अलग-अलग करने के लिये निर्ममता आवश्यक है। फिर मेरे कुछ समीक्षकों ने मुझ पर अपने संस्मरणों में ‘छौंक’ लगाने का आरोप भी लगाया है। जिन संस्मृतों को जो श्रद्धेय, पूज्य प्रात: स्मरणीय मानते हैं उन पर अंगुली उठाया जाना वे सहन नहीं कर पाते। फिर रचनात्मकता थोड़े बहुत छौंक की अपेक्षा करती ही है। छौंक यानी लंतरानी मैंने किसी बदनीयती से समाविष्ट की हो, ऐसा नहीं है। किसी व्यक्ति की जो छवि लोक में प्रचलित है, वह भी मेरी दृष्टि में रही है इसलिए रसाल अथवा रजनीश, सुमन अथवा अंचल जैसे व्यक्तियों के सत्य प्रसंग भी उनके श्रद्धालुओं को छौंक जैसे लगते हैं। मैं छौंक से बच सकता था फलत: विवादों से भी पर विवादों से बचने के लिये हर किसी की प्रशंसा करना, उसके केवल उज्ज्वल पक्षों की ही निशानदेही करना मुझे गलत लगता है। निर्ब्‍याज सत्य, संपूर्ण निष्पक्षता संभव नहीं है। प्रारंभ में मैंने भी कामना की कि कोई पुरस्कार, कोई सम्मान मुझे मिले पर हिन्‍दी में पुरस्कारों की, सम्मानों की जो हालत है वह प्राय: सम्मानित हो, पुरस्कृत को उठापटक, जोड़तोड़ के घेरे में खींच लेती है। मैंने अब सम्मान या पुरस्‍कार की कामना से मुक्ति पा ली है। इन दिनों टी.वी. चैनलों पर एक विज्ञापन आ रहा है- रूपा फ्रंटलाइन पहिनी है तो सामने आ जाओ। यानी महत्व फ्रंटलाइन अंडरवियर का है, उसके पहिनने वाले का नहीं। इन दिनों सभी समीक्षक, पुरस्कार समितियों के सभी सम्मानित सदस्य, चयन समितियों के सभी विशेषज्ञ प्रत्याशी की योग्यता या क्षमता का मूल्याँकन नहीं करते, नहीं करना चाहते, वे विचारधारा, संगठनबद्धता या संघ की सदस्यता के आधार पर निर्णय करते हैं। राजनीति में यह होता है, साहित्य में भी यही होने लगा है। जिस दौर में कृति की तुलना में कृतिकार का अंतर्वस्त्र महत्वपूर्ण हो, उस दौर में साहित्य की गुणवत्ता नहीं, साहित्यकार की जोड़-तोड़ की क्षमता ज्यादा प्रभावशाली हो हाती है।

एक पहाड़ी मैना की मौत : कांतिकुमार जैन

विलुप्ति के कगार पर पहुंच गई पहाड़ी मैना को लेकर प्रसिद्ध लेखक कांतिकुमार जैन का संस्‍मरणात्‍मक आलेख-

पहाड़ी मैना की पूरी प्रजाति के ही विलुप्ति का शिकार होने की आशंका है। पहाड़ी मैना जितना निरीह, सुकुमार और विलक्षण प्रतिभासंपन्न प्राणी विश्व में शायद ही कोई दूसरा हो। आधी बित्ते से भी छोटा परिंदा जिसे आप अपनी हथेली पर बैठा लें, में और सब कुछ तो सामान्य मैना जैसा है पर इस नन्ही-सी जान में प्रकृति से पता नहीं कैसी अनुकरण की क्षमता मिली है कि वह मानव द्वारा उच्चरित ध्वनि की हूबहू नकल कर सकती है, बिना किसी अभ्यास या प्रशिक्षण के। आप बोलिए और पहाड़ी मैना उसकी नकल करती चली जाएगी, जैसे किसी ने उसके गले में कोई टेप-रिकॉर्डर फिट कर दिया हो। यह मैना केवल छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग के पहाड़ों में ही पाई जाती है, इसलिए इसे बस्तरिहा मैना भी कहते हैं। छत्तीसगढ़ सरकार ने इसकी अनन्यता को स्वीकृति प्रदान करने के लिए इसे राज्य के पक्षी वर्ग का प्रतीक घोषित किया है। राज्य के अन्य प्रतीक चिह्न  हैं, पेड़ों में साल और पशुओं में अरना भैंसा। अरना अर्थात जंगली भैंसा। पक्षियों में तोता ही एक ऐसा जीव माना जाता है, जिसके मनुष्य की बोली की नकल करने के सैकड़ों किस्से हमारी लोक-कथाओं और महाकाव्यों में भरे पड़े हैं। जायसी के पद्मावत के हीरामन को कौन नहीं जानता ? शुक-सारिका अपने प्रेमालाप के लिए प्रसिद्ध हैं, पर शुक को सिखाना पड़ता है, पहाड़ी मैना को मनुष्य की बोली का अनुकरण करना सिखाना नहीं पड़ता है। पहले के कलारसिक अपने घरों में शुक भी पालते थे और सारिका भी।
बस्तर के जंगलों में जो सारिका या मैना पाई जाती है उसकी नकल सुनकर बड़े-बड़े ध्वनि विशेषज्ञ चकरा जाएं। भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जब बस्तर के दौरे पर आईं थीं, तब वे ओरछा और नारायणपुर भी गई थीं। यह वही क्षेत्र है जो इन दिनों नक्सलवादी उथल-पुथल के लिए समाचारों में छाया रहता है। किंवदंती है कि इंदिराजी ने नारायणपुर के विश्रामगृह में जब अपनी ही आवाज सुनी तो वे कौतूहल से भर गईं। यहां मेरी आवाज में बोलने वाला कौन है? उनके सामने पिंजरबद्ध बस्तरिका मैना प्रस्तुत की गई। इंदिराजी को विश्वास नहीं हुआ। वहां के वन अधिकारियों ने पहाड़ी मैना की मानव ध्वनि अनुकरण विलक्षणता के बारे में बतलाया। पर उन्हें विश्वास नहीं हुआ। उन्होंने मैना से स्वयं बातचीत की… यह क्या? मैना उनके संवादों को ज्यों का त्यों, उसी आरोह-अवरोह और बलाघात में दुहरा रही है। इंदिराजी ने जानना चाहा कि इसे पहाड़ी मैना क्यों कहते हैं ? क्योंकि ये पहाड़ों में रहती हैं, केवल बस्तर के पहाड़ों में। क्या कोई मैदानी मैना भी होती है?
हां, होती है पर उसे कौंदी मैना कहते हैं। कौंदी अर्थात् गूंगी। जब मैं बस्तर के मुख्यालय जगदलपुर के महाविद्यालय में हिंदी का प्राध्यापक होकर पहुंचा तब तक पूरे बस्तर में इंदिराजी और पहाड़ी मैना के किस्से किंवदंती बन चुके थे। यहां विद्यालय का मेरा एक विद्यार्थी था प्रफुल्ल कुमार सामंतराय। प्रफुल्ल का गला बेहद मीठा था, उसकी अंग्रेजी बहुत अच्छी थी, उसे गालिब के सैकड़ों शेर कंठस्थ थे। वह विख्यात अंग्रेजी साप्ताहिक ब्लिट्ज का क्षेत्रीय संवाददाता था। वह बैलाडिला की अयस्क खदानों की रिपोर्टिंग के लिए वन्यांचल के सुदूर क्षेत्रों में जा रहा था। तब वह मुझसे मिलने आया। सर, मैं बैलाडिला से आपके लिए क्या लाऊं?
पत्नी के मुंह से बेसाख्ता निकला- माड़ी मैना।
माड़ी बस्तर की बोली में पहाड़ी को कहते हैं। बस्तर का दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र इसीलिए अबूझमाड़ कहलाता है। हफ्तेभर बाद जब प्रफुल्ल अबूझमाड़ का दौरा कर लौटा तो बांस की तीलियों से बना एक सुंदर-सा पिंजरा उसके साथ था। उस पिंजरे में एक सुकुमार पक्षी था- पहाड़ी मैना। पक्षी बड़ा निरीह-सा लगा, पर जब प्रफुल्ल ने हल्बी में उससे बात की तब उस सुकुमारी मैना ने उसको ज्यों-का-त्यों दुहरा दिया। यदि हमारी पीठ प्रफुल्ल की ओर होती तो हम समझते कि यह मैना नहीं, प्रफुल्ल ही बोल रहा है।
हमने प्रफुल्ल की बताई हुई सारी सावधानियां बरतीं, खाने के लिए चावल की कनकी, कोदों के दाने, घास के बीज। देखो, यहां शोर मत करो, यहां बस्तर की जादूकंठी मैना सो रही है। हम लोगों ने उस विलक्षण मैना का नाम भी रखा- अरण्यप्रिया, दंडकारण्य की उस अनन्य मैना का दूसरा नाम होता भी क्या ? पर उसे देखने के लिए पूरा महाविद्यालय हमारे यहां जुट आया। पर उसे देखने
के लिए पूरा महाविद्यालय हमारे यहां जुट आया। जो आता वह बरांडे में टंगे पिंजरे में झांकता, कोई सीटी बजाता, कोई हंसता। चौथे दिन मैना कुछ लस्त-सी दिखी। पांचवें दिन सबेरे हमने जब दरवाजा खोला तो पिंजरा यथावत था, मैना भी सो रही थी, पर उसकी देह निस्पंद थी- रात बड़ा कोहरा था, सर्द हवा चली थी। मैना के गले में कांटे उग आए थे और ठंड से वह प्रकृति प्रिया अकड़ गई थी। लेकिन मुझे लगा न तो वह ठंड से अकड़ी थी, न ही कोहरे से निस्पंद हुई थी। पिंजरे का बंधन उसे रास नहीं आया था। नगर का कृत्रिम जीवन उसे भारी पड़ गया था, वह वन की स्वच्छंद विहारी थी, शहर में रहना उसे रास नहीं आया, मनुष्यों के संपर्क ने उसके जीवन में जैसे विष घोल दिया हो। दंडकवन की सुरम्य प्रकृति की बाल विहारिनी की मानव निर्मित कारा में मृत्यु हमारे बस्तर प्रवास की सबसे मर्मांतक घटना थी। हम लोग उस मैना को जीवनभर नहीं भूल पाए, उसके बाद हमने किसी भी पक्षी को बंदी नहीं बनाया।
पहाड़ी मैना की प्रजाति अब विलुप्ति के कगार पर है। उसकी मानव ध्वनि की असाधारण अनुकरण क्षमता ही उसकी सबसे बड़ी शत्रु सिद्ध हुई। मुंबई, दिल्ली, पुणे, हैदराबाद जैसे महानगरों के कला रसिकों की वह इतनी बड़ी पसंद सिद्ध हुई कि दूर-दूर के व्यापारी उसे खरीदने के लिए बस्तर आने लगे और विदेशों में भी उसका निर्यात होने लगा। अबूझमाड़, बैलाडिला, ओरछा, छोटे डोंगर, बारसूर, कुटमसरे की पहाडिय़ां पहाड़ी मैना का प्राकृतिक रहवास हैं। नागर जलवायु और असंयमित आहार उसे रास नहीं आया। ध्वनि प्रदूषण उसके लिए महारोग से कम नहीं। उसके गले में कांटे उगे नहीं कि उसकी स्वर तंत्रिका नष्ट हो जाती है। पहाड़ी मैना को संरक्षण की सख्त जरूरत है।

क्रिकेट के जन्म की लोककथा : कांतिकुमार जैन

सभी का मानना है कि‍ क्रि‍केट का जन्‍म इंग्‍लैंड में हुआ, लेकि‍न यह सच नहीं है। इस खेल का जन्‍म छत्तीसगढ़, भारत में हुआ और वह भी त्रेता युग में। इसके जन्‍मदाता हैं राम जी और लखनजी। यकीन नहीं हो रहा है तो पढ़ि‍ए चर्चित संस्‍मरणकार कान्‍ति‍कुमार जैन का संस्‍मरण-

उस समय मुझे यह पता नहीं था कि जिसे सारी दुनिया क्रिकेट के नाम से जानती है, वह हम बैकुंठपुर के लड़कों का पसंदीदा खेल रामरस है। ओडगी जैसे पास के गांवों में रामरस को गढ़ागोंद भी कहते थे, पर सिविल लाइंस में रहने वाले हम लोगों को रामरस नाम ही पसंद था। रामरस यानी वह खेल, जिसे खेलने में राम को रस आता था। अब आप यह मत पूछिएगा कि राम कौन ? अरे राम- राजा राम, अयोध्या के युवराज, त्रेता युग के मर्यादा पुरुषोत्तम दशरथनंदन राम। मुझे राम और राम रस के संबंधों का पता नहीं था। वह तो अचानक ही खरबत की झील के किनारे मुझे जगह-जगह पर पत्थर के रंगबिरंगे गोल टुकड़े मिले- टुकड़े क्या-बिल्कुल क्रिकेट की गेंद जैसे आकार वाले ललछौंहे रंग के पत्थर। खरबत झील से लगा हुआ पहाड़ है। बैकुंठपुर से कोई सात मील यानी लगभग चार कोस दूर। इतवार की सुबह हमने तय किया कि आज खरबत चला जाए, वहीं नहांएगे, तैरंगे और झरबेरी खाएंगे। हम लोगों ने यानी मैंने और जीतू ने, जीतू मेरा बालसखा था। मेरे हरवाहे का लड़का- हम उम्र, हम रुचि। साइकिल थी नहीं तो हम लोग पैदल ही खरबत नहाने निकले। रास्ता सीधा था। छायादार। पास के गांव यानी नगर के तिगड्डे से बिना मुड़े सीधे सामने चले चलो। खरबत की झील आ जाएगी। सामने पहाड़, हराभरा जंगल। खरबत की झील का जल इतना पारदर्शी और निर्मल था कि चेहरा देख लो। हम लोगों ने निर्मल जल में सिर डुबोया ही था कि टकटकी बंध गई। जल में यह किसका प्रतिबिंब है ? आईने में अपने चेहरे का प्रतिबिंब तो रोज ही देखते थे, पर वह चेहरा इतना सुंदर और मनोहारी होग, यह कभी लगा ही नहीं। वह तो अच्छा हुआ कि उस समय तक मैंने नारसीसस की कथा नहीं पढ़ी थी अन्यथा मैं अपना प्रतिबिंब छूने के लिए नीचे झुकता और कुमुदिनी बनकर खरबत झील में अब तक डूबा होता। झील में कुमुदिनी के फूलों की कमी नहीं थी- कुमुदिनी को वहां के लोग कुईं कहते अर्थात् मुझसे पहले भी मेरी वय के लड़के वहां पहुंचे थे, उन्होंने जल में अपना प्रतिबिंब निहारा था और इस प्रतिबिंब को छूने या चूमने के लिए नीचे झुके थे और गुड़प- उनकी वहां जल समाधि हो गई होगी और कालांतर में वहां कुईं का फूल उग आया होगा।

कभी-कभी अज्ञान भी कितना लाभदायी होता है। असल में कुईं के फूलों की तुलना में खरबत की झील और खरबत पहाड़ के बीच के मैदान में ललछौहें रंग के जो गोल-गोल पत्थर पड़े थे, उनमें हम लोगों का मन ज्यादा अटका हुआ था। समझ में नहीं आया कि इतने सारे पत्थर, वह भी एक ही रंग के सारे मैदान में क्यों बिखरे हैं। एक पत्थर उठाया, देखा वह मृदशैल का था- रंध्रिल, हल्का, स्पर्श-मधुर। इतनें में वहां से एक बुड्ढा गुजरा। मैंने उसे बुड्ढा नहीं कहा। कहा- सयान, एक गोठ ला तो बता। सयान कहने से वह बुड्ढा खुश हो गया, उसे लगा कि हम उसे सम्मान प्रदान कर रहे हैं। वह रुका- बोला, नगर के छौंड़ा हौं का?

हम लोग बैकुंठपुर के लड़के थे, बैकुंठपुर रियासत की राजधानी थी, उसे सभी कोरियावासी नगर ही कहते थे। उसने- सयाने, अनुभवी पुरुष ने हमें बताया कि खरबत पहाड़ पर गेरू की खदाने हैं। जोर की हवा चलती है तो वहां के पत्थर लुढ़कते हुए नीचे आते हैं गेरू से लिपटे हुए। इतने जोर की आंधी और शिखर से तल तक आने में इतनी रगड़ होती है कि पत्थरों के सारे कोने घिस जाते हैं और पत्‍थर बिल्कुल गोल बटिया बन जाते हैं। वह बैठकर वहीं चोंगी सुलगाने लगा। सरई के पत्ते की चोंगी में उसने माखुर भरी, टेंट से चकमक पत्थर निकाला, बीच में सेमल की रुई अटकाई और पत्थरों को रगड़ा ही थी कि भक्क से आग जल गई- दो चार सुट्टे लिए ही होंगे कि उसकी कुंडलिनी जाग्रत हो गई। अब उसके लिए न काल की बाधा थी, न स्थान की। काहे का कलयुग, काहे का द्वापर। मैंने जीतू से कहा कि यार, नहाएंगे बाद में, पहले इन गोल-गोल गेदों को बीनो और झोले में भर लो- जितनी आ जाएं। कान्ति भैया, अपन इन टुकड़ों का करेंगे क्या? मैं बोला- करेंगे क्या, इन पर साड़ी की किनारी लपेटेंगे, चकमकी मिट्टी का पोता फेरेंगे और रामरस खेलेंगे। रामरस सुनना था कि छत्तीसगढ़ का वह सयाना चैतन्य हुआ, उसने अपनी चोंगी से इतने जोर का सुट्टा लिया कि लौ तीन बीता ऊपर उठ गई। शायद वह त्रेता युग में पहुंच गया था। वह राम-लक्ष्मण को रामरस खेलते देख रहा था। इतने में एक सारस आया, वह हम लोगों से थोड़ी दूर पर एक टांग के बल खड़ा हो गया, उद्ग्रीव। बैठक वैसे ही जैसे कोई दर्शक क्रिकेट मैच में खिलाड़ी को बैटिंग करते देख रहा हो। ध्यानावस्थित, तदगतेन मनसा।

हम लोग लोग उस सयाने के पास बैठ गए। वह सयाना सचमुच सयाना था, सज्ञान, सुजान। हमें लगा कि वह सदैव से सयान था,  न कभी वह बालक रहा था, न तरुण,  जैसा वह त्रेता में था, वैसे ही आज भी है। वह चोंगी का एक कश लेता, सरई के पत्ते की मोटी बीड़ी से लौ उठता और एक युग पार कर लेता। तीसरे कश में तो वह जैसे राम के युग में ही पहुंच गया। कहने लगा कि राम, सीता और लखन भैया वनवास मिलने पर चित्रकूट से सीधे खरबत आए। सीधे अर्थात् चांगभखार के रास्ते से, जनकपुर, भरतपुर होते हुए। खरबत की झील देखकर सीता दे ने जिद पकड़ ली- बस, कुछ दिन यहीं रहूंगी। कहा रहोगी, न यहां कंदरा, न गुफा। न मठ, न मढ़ी। लखन भैया ने कोई बहस नहीं की। अपनी धनुही उठाई, कांधे पर तूणीर टांगा और खरबत पहाड़ी की टोह लेने निकल गए। जिन खोजा तिन पाइयां। बड़के भैया और भाभी वहां झील तीरे चुपचाप बैठे थे। राम कह रहे थे- थोड़ा आगे चलो, सरगुजा में एक बोंगरा है। लंबी खुली गुफा। वह स्थल भी बड़ा सुरम्य है। वहां के निवासी भी बड़े अतिथिवत्सल हैं, पर सीताजी रट लगाए बैठी थीं- खरबत, खरबत। लक्ष्मण ने लौटकर अग्रज को बताया कि यहां से कोसेक की दूरी पर तीन गुफाएं प्रशस्त हैं, स्वच्छ हैं, जलादि की सारी सुविधाएं हैं। हम लोग चातुर्मास यहीं बिता सकते हैं। तो ठीक है, भाभी को ले जाओ, दिखाओ, उन्हें पसंद आती है तो हम लोग चार महीने यहीं रहेंगे। गुफाओं को देखकर सीताजी प्रसन्न हो गईं। उन्हें अपने मायके मिथिला की याद आई।

ऐसी ही हरतिमा, ऐसा ही प्रकाश, ऐसा ही मलय समीर। लखन भैया, तुम इस गुफा में रहना, यहां मेरा रंधाघर होगा। सीताजी वहां की रसोई को रसोई न कहकर स्त्रियों की तरह रंधागृह कहतीं- रंधनगृह। यह गुफा थोड़ी बड़ी है- इसमें हम दोनों रहेंगे। राम ने भी गुफाओं को देखकर सीताजी के मत की पुष्टि की। चतुर पतियों की तरह। चलो, यहां सीता का मन लगा रहेगा। खरबत में राम परिवार के चार माह बड़े आराम से कटे। विहान स्नान-ध्यान में कटता, प्रात: जनसंपर्क के लिए नियत था। स्त्रियां भी आतीं, पुरुष भी। मध्याह्न में दोनों भाई आखेट के लिए निकल जाते। यही समय फल-फूल, कंदमूल के संचय का होता। आखेट से लौटने के बाद वे क्या करें ? एक सांझ लखनलाल ने दादा से कहा- दादा, शाम को हम लोग कोई खेल खेलें। क्या खेल खेलें ? लक्ष्मण बड़े चपल, बड़े कौतुक प्रिय, बड़े उत्साही। बोले- खरबत पहाड़ के नीचे जगह-जगह गोल-गोल पत्थर पड़े हुए हैं- ललछौंहे रंग के, बिलकुल कंदुक इव। मैं कल भाभी से उनकी सब्जी काटने का पहसुल मांग लूंगा और उससे महुआ की छाल छील लाऊंगा। महुआ की छाल यों ही लसदार होती है। खूब कसकर पाषाण कंदुक पर लपेटेंगे तो एक आवेष्टन बन जाएगा। उससे चोट नहीं लगेगी।

दूसरे दिन लखन सचमुच मधूक वृक्ष का वल्कल ले आए। ललछौंहे पाषाण खंड पर मधूक वल्कल का वह एक आवेष्टन ऐसे चिपका कि गेंद पर परिधान का अंतर ही मिट गया। राम को एक उपाय सूझा। उन्हें याद आई कि सीता के पास एक पुरानी साड़ी है। उसकी किनारी बड़ी सुंदर है- चमकीली। गोटेदार। यदि उस किनारी को मधूक आवेष्टन पर लपेट दिया जाए तो गेंद के आघात का कोई दुष्प्रभाव नहीं होगा। लखनलाल को अब कंदुक क्रीड़ा की कल्पना साकार होती हुई लगी। लखन पास के ही एक गर्त से चकमिकी मिट्टी उठा लाए। चकमिकी यानी चकमक वाली। बैकुंठपुर में नदी-नालों की सतह पर जो चकमिकी मिट्टी दिखाई पड़ती है, वह और कुछ नहीं, अभ्रक है।

लखन की लाई हुई अभ्रक में गेंद को लिथड़ाया जा रहा है। सीता देखकर हँस रही हैं- अरे, ये काम तुम लोगों के नहीं हैं, तुम लेोग तो तीर-धनुष चलाओ। वह सरई के पत्तों की चुरकी में झील से थोड़ा-सा जल भर लाई हैं। अभ्रक पर उन्होंने जल सिंचन किया है। थोड़ा-सा जल अपनी हथेलियों में लेकर गोंद को भी आर्द्र किया है। अरे, गेंद तो अब चमकने लगी है। अब अंधेरा भी होए तो गेंद गुमेगी नहीं, दिखती रहेगी। खेल के नियम तय किए जा रहे हैं। राम ने सीता खपडिय़ों को लेकर तरी ऊपर जमा लिया है- खपड़ी यानी खपरे के टुकड़े, तरी ऊपर यानी नीचे-ऊपर। राम ने उन सात खपडिय़ों की सुरक्षा का भार स्वत: स्वीकार किया है यानी बल्लेबाजी। लखनजी को गेंद ऐसे फेंकनी थी कि सात खपडिय़ों वाला स्तूप ढह जाए। राम जी सावधान-सतखपड़ी के सामने ऐसी वीर मुद्रा में खड़े होते कि लखनजी को लक्ष्य पर आघात का मौका ही नहीं मिलता। इधर लखनजी ने गेंद फेंकी, उधर रामजी ने उस गेंद को ऐसे ठोका कि कभी सामने खड़े आंवले के तने से टकराती, कभी दाएं फैली खरबत पहाड़ी की तलहटी से। कभी-कभी तो रामजी अपना बल्ला ऐसे घुमाते कि गेंद खरबत झील का विस्तार पारकर उस पार। अब लखनजी गेंद के संधान में लगे हैं। दिन डूब जाता, सूर्यदेव अस्त हो जाते। दोनों भाई गुफा में वापस लौटते। क्लांत भाभी देवर से मजाक करती- आज फिर दिनबुडिय़ा। दिनबुडिय़ा यानी दिन डूब गया है और तुम दांव दिए जा रहे हो। लखन कहते- भाभी, भैया ने बहुत दौड़ाया। बल्ला ऐसे घुमते हैं कि जैसे उनके बल्ले में चुंबक लगा हो, गेंद कैसे भी फेंको, भैया, उसे धुन ही देते हैं। दो-एक दिन तो ऐसे ही चला, फिर सीताजी ने मध्यस्थता की। उन्हें देवर पर दया आई- कल से तुम दोनों बारी-बारी से कंदुक बाजी और बल्लेबाजी करोगे। मैं तुम दोनों भाइयों का खेल देखूंगी। कोई नियम विरुद्ध नहीं होना चाहिए।

रामजी को मर्यादा का बड़ा ध्यान रहता है। ये मर्यादा पुरुषोत्तम यों ही तो नहीं कहलाते। फिर सीताजी जैसे निर्णायक। खेल में वे कोई पक्षपात नहीं करतीं। गोरे देवर, श्याम उन्हें के ज्येष्ठ हैं। फिर दर्शक दीर्घा में सारस भी तो हैं- एक टांग पर खड़े क्रीड़ा का आनंद उठाते हुए। निर्णय देने में जरा-सी चूक हुई कि सारस वृंद क्रीं-क्रीं करने लगता है। रामरस की ऐसी धूम मची कि खरबत के आदिवासी युवा तो वहां समेकित होने ही लगे, बैकुंठपुर, नगर, ओडग़ी के तरुण भी खेल देखने के लिए एकत्र हो रहे हैं। चतुर्दिक रामरस का उन्माद छाया हुआ है। राम के परिवार में आनंद ही आनंद है। लोक से जुडऩे का संयोग अलग से। रामजी ने देखा कि आसपास के गांवों के युवा भी इस खेल में सम्मिलित होना चाहते हैं। उन्होंने सीताजी से परामर्श किया, लखनभाई से भी पूछा। सब खेल को व्यापक आधार देने के पक्ष में हैं। अगले दिन से अभ्यास पर्व मनाए जाने की घोषणा हुई। बल्ले सब अपने-अपने लाएंगे। शाखाएं चुनी जा रही हैं, टंगिया से डगालें काटी जा रही हैं, हंसिया से उन्हें छीला जा रहा है। ऊपर का भाग पतला-मूठवाला। हाथ से पकडऩे में आसानी हो। नीचे का भाग चौड़ा, समतल। बल्ला तैयार हो गया तो उसे मंदी आंच पर तपाया जा रहा है। सामने से कितनी भी तेज गेंद आए, बल्लेबाज का बल्ला उसे ऐसे ठोके कि सीमा के पार। राम नवमी के दिन राम और लखन के दल में विशेष प्रतिस्पर्धा होगी। गांव के सयाने आमंत्रित हैं- खरबत के ही नहीं, आसपास के गांवों के भी। नगर के, ओड़गी के। निर्णय निष्पक्ष होना चाहिए। एक चत्वर बनाया गया। धर्माधिकारी उस चत्वर पर बैठेंगे, वाद-विवाद होने पर पंचाट का निर्णय सर्वमान्य होगा। रामरस मर्यादा का खेल है, भद्रजनों का। रामरस से मर्यादा के जो नियम निर्धारित हुए थे, वे आज भी न्यूनाधिक परिर्वतन के साथ अक्षुण्ण रूप से प्रचलित हैं। अब लोग उसे रामरस नहीं कहते, क्रिकेट कहते हैं, पर नाम में क्या धरा है- आज जब कोई कहता है ‘ये तो क्रिकेट नहीं है’ तो भैया, हमारी तो छाती चौड़ी हो जाती है। बैकुंठपुर में क्रिकेट के पूर्वज रामरस का बचपन बीती। छत्तीसगढ़ में क्रि‍केट का पहला मैच खेला गया।

वह सयाना त्रेता युग की पूर्व स्मृतियों में खो गया। उसकी चोंगी की लौ धीरे-धीरे मंदी पड़ रही थी। उसने उस ओर देखा जिस ओर सारस खड़े थे। वह जनता था कि सारस रामरस के ऐसे दर्शक हैं, जिन्हें न भूख प्यास व्यापती है, न प्यास। वे रात-दि‍न रामरस में ऐसे डूबे रहते हैं कि खेलनेवाले थक जाएं, पर उन्हें कोई क्लांति नहीं होती। सीताजी की रसोई तैयार थी- आईं। दोनों भाइयों को ब्यालू की सूचना दी। सभी सयानमन से कहा दादाजी- आप भी ब्यालू हमारे साथ ही करें। धर्मरक्षक लोगों से भी आग्रह किया कि ब्यालू के बाद ही जाइएगा। हम लोगों को लगा कि हम भी तेता युग में हैं। सीताजी ने, लखनलाल ने दादा राम ने भी रोका, पर हम लोग रुके नहीं। घर में बोलकर नहीं आए थे, कौन विश्‍वास करेगा। पिताजी को पता चलेगा तो सौ सवालों का जवाब देना पड़ेगा। हम लोगों ने कहा- दीदी, हम लोग बराबर आते रहेंगे। हम लोगों को भी रामरस में रस आने लगा है। रामरस में कौन अभागा है, जिसे आनंद न आए?

(सामयि‍क बुक्‍स से प्रकाशि‍त पुस्‍तक बैकुंठपुर में बचपन से साभार)

इधर हिंदी नई चाल में ढल रही है : कांति कुमार जैन

हर कोई हिंदी को लेकर चिंतित है। हिंदी क्षेत्र में कई विश्वविद्यालय और संस्‍थाएं हैं। इन सबके बाद भी हिंदी का समुचित विकास नहीं हो पा रहा है। इन कारणों और समाधान पर चर्चित संस्‍मरणकार कांतिकुमार जैन का आलेख-

जब मैं पिछले दिनों की प्रसिद्ध फिल्म लगे रहो मुन्ना भाई देखकर लौट रहा था तो मेरे 20 वर्ष नाती ने अचानक मुझसे पूछा- नाना जी, मैंने कक्षा में गांधीवाद के बारे में तो पढ़ा था, पर यह गांधीगिरी, लगता है, कोई नई बात है। मुझे कहना पड़ा कि गांधीगिरी बिल्कुल नई बात है और देश में बढ़ती हुई मर्यादाहीनता, धृष्टता, सैद्धांतिक घपलेबाजी और वास्तविक प्रतिरोध न कर प्रतिरोध का स्वांग करने वालों को संवेदित करने जैसी चीज है। जिन शब्दों में गिरी लग जाता है, वे कुछ हीनता व्यंजक अर्थ देने लगते हैं। जैसे- बाबूगिरी, चमचागिरी, गुंडागिरी। मुझे भारतेंदु हरिश्‍़चंद के उस कथन की भी याद आई, जिसमें आज से लगभग 150 वर्ष पूर्व उन्होंने घोषित किया था कि हिन्दी नई चाल में ढली। अंग्रेज भारत में धर्म, ध्वजा और धुरी के साथ आये थे। इन तीनों का प्रभाव हिन्दी के स्वरूप पर भी पड़ा था। धर्म के प्रचार के लिए उन्होंने बाइबिल का अनुवाद किया और उसे मुद्रण यंत्रों से छपवाकर जनता के बीच वितरित किया, ध्वजा के लिए उन्होंने प्रशासन तंत्र तैयार किया और धुरी अर्थात् तराजू के लिए भारत में अंग्रेजी माल का नया बाजार विकसित किया। इन तीनों के साथ हिन्दी क्षेत्र में ढेरों अंग्रेजी शब्द आये जो आज तक प्रचलित हैं।

1947 में स्वतंत्रता के साथ ही हिन्दी पुन: नई चाल में ढली- लोकतंत्र, संविधान, विकास कार्य, शिक्षा का प्रचार-प्रसार, तकनीकी जैसे कारणों से हिन्दी व्यापक हुई, उसका शब्दकोश समृद्ध हुआ। नये-नये स्रोतों से आने वाले शब्द हिन्दी भाषी जनता की जुबान पर चढ़ गये। इन शब्दों में विदेशी शब्द थे, बोलियों के शब्द थे, गढ़े हुए शब्द थे। जनता अपनी बात कहने के लिए जिन शब्दों का प्रयोग करती है, उनकी कुंडली नहीं पूछती। बस काम चलना चाहिए। वह तो भाषा के पंडित हैं, जो शब्दों का कुलगोत्र आदि जानना चाहते हैं। जनता भाषा की संप्रेषणीयता को महत्वपूर्ण मानती है, जबकि पंडित लोग भाषा की शुद्धता को महत्व देते हैं। हिन्दी के स्वाभिमान का हल्ला मचाने वालों को आड़े हाथों लेते हुए निराला जी ने एक बड़े पते की बात कही थी- हम हिन्दी के जितने दीवाने हैं, उतने जानकार नहीं। हिन्दी के शुद्धतावादी पंडितों ने कुकुरमुत्ता नामक कविता मे प्रयुक्त नवाब, गुलाब, हरामी, खानदानी जैसे शब्दों पर एतराज जताया था। कहा था, इन शब्दों से हमारी हिन्दी भ्रष्ट होती है। इन शुद्धतावादी विचारकों का कहना है कि हिन्दी के साहित्यकारों को विदेशी शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। अब सामंत, पाटल, वर्गशंकर, कुलीन कहने से हिन्दी के स्वाभिमान की रक्षा भले ही हो जाये, किन्तु व्यंग्य की धार मौंथरी होती है और संप्रेषणीयता भी बाधित होती है। हिन्दी के ये शुद्धतावादी पोषक शहीद भगतसिंह को बलिदानी भगतसिंह कहना चाहते हैं। उनका बस चले तो वे भगतसिंह को भक्तसिंह बना दें। वे फीसदी को गलत मानते हैं, उन्हें प्रतिशत ही मान्य है। वे राशन कार्ड, कचहरी, कार, ड्राइवर, फिल्म, मेटिनी, कंप्यूटर, बैंक, टिकट जैसे शब्दों के भी विरोधी हैं। वही हिन्दी का सवाभिमान। यह झूठा स्वाभिमान हिन्दी के विकास में सबसे बड़ी बाधा है। ऐसे लोग हिन्दी को आगे नहीं बढऩे देना चाहते। वे वस्तुत: जीवन की प्रगति के ही विरोधी हैं।

एक बार पंडित शान्तिप्रिय द्विवेदी जबलपुर आये थे। पंडित भवानी प्रसाद तिवारी उन दिनों वहां के मेयर थे, स्वयं कवि, ‘गीतांजलि के अनुगायक। उन्होंने शान्तिप्रिय जी के सम्मान में एक कवि गोष्ठी का आयोजन किया। अपनी कविताएं भी सुनाईं। उनकी एक काव्य पंक्ति है- ”कैसी मुश्किल कर दी, तुमने कितनी रूप माधुरी प्राणों में भर दी।‘’ शान्तिप्रिय जी का हिन्दी प्रेम जागा, उन्होंने शिकायत की- बाकी सब तो ठीक है, यह मुश्किल शब्द विदेशी है। इसे यहां नहीं होना चाहिए। भवानी प्रसाद जी तो अतिथिवत्सल और शालीन थे, वे कुछ नहीं बोले, पर जीवन लाल वर्मा ‘विद्रोही’ जो स्वयं बहुत अच्छे कवि और व्यंग्यकार थे बिफर गये। बोले- ‘मुश्किल’ से आसान शब्द आप हिन्दी में बता दें तो मैं अपना नाम बदल दूं।‘ पंडित शान्तिप्रिय द्विवेदी जैसे विद्वान जीवन की प्रगति से ज्यादा भाषा की शुद्धता के हिमायती हैं।

जीवन जब आगे बढ़ता है तो वह अपनी आवश्यकता के अनुरूप  नये शब्द दूसरी भाषाओं से उधार लेता है,  नये शब्द गढ्ता है,  लोक की शब्द संपदा को खंगालता है और अपने को संप्रेषणीय बनाता है। मेरे एक मित्र हैं, मोबाइल रखते हैं पर मोबाइल शब्द का प्रयोग उन्हें पसंद नहीं है। मोबाइल को वे चलित वार्ता कहते हैं। जब वे आपसे आपकी चलित वार्ता का क्रमांक पूछते हैं तो आप भौंचक्के रह जाने के अलावा कुछ नहीं कर सकते। ऐसे शुद्धतावादी हर युग में हुए हैं और हास्यास्पद माने जाते रहे हैं। मध्यकाल के उस फारसीदां का किस्सा आज भी लोगों द्वारा दुहराया जाता है, जब वे अपने नौकरों से आब-आब की मांग करते रहे थे। पानी उनके सिरहाने ही रखा था। सो जब कोई दीवाना मोबाइल को अछूत समझता है या पानी से परहेज करता है तो न वह भाषा की मित्र है,  न ही अपने जीवन का। ऐसे विद्वानों को मेरे मित्र अनिल वाजपेयी ‘अनसुधरे बल’ कहते हैं। हिन्दी तो बराबर स्वयं को सुधारती चलती है, पर ये विद्वान लकीर पीटने में ही मगन रहते हैं।

हिन्दी के एक विख्यात समीक्षक को दबिश जैसे शब्दों से परहेज है। वे समझते हैं कि दबिश अंग्रेजी के फुलिश या रबिश का कोई भाईबंद है। यदि उन्होंने हिन्दी के ही दबना,  दबाना,  दाब,  दबैल जैसे शब्दों को याद कर लिया होता तो वे दबिश के प्रयोग पर आपत्ति नहीं करते। कचहरी, पुलिस, कानून व्यवस्था, थाना आदि से संपर्क में आने वाले दबिश से अपरिचित नहीं है। वस्तुत: हिन्दी के दीवाने जीवन से अपने शब्दों का चयन नहीं करते, हिन्दी के शब्द कोशों से करते हैं। हिन्दी के शब्द कोशों के सहारे हम आज के लोकतांत्रिक भारत के जीवन-राजनीतिक कर्थताओं,  सामाजिक विसंगतियों, आर्थिक उलझनों और सांस्कृतिक प्रदूषण को पूरी तरह और सही-सही समझ ही नहीं सकते। हिन्दी के शब्दकोशों में न तो सुपारी जैसा शब्द है, न अगवा, हफ्ता, फिरौती, बिंदास, ढिसुंम, घोटाला, कालगर्ल, ब्रेक जैसे शब्द। आप हर दिन समाचार पत्रों, पुस्तकों, जन संप्रेषण माध्यमों, बोलचाल में ये शब्द सुनते हैं और समझते हैं, पर इन्हें अभी तक हमारे कोशकारों ने पांक्तेय मानकर शब्दकोशों में स्थान नहीं दिया। हमारे शब्दकोश जीवन से कम से कम पचास साल पीछे हैं।

हिन्दी में समस्या नये विदेशी शब्दों को स्वीकृत करने की तो है ही, उन शब्दों को भी अंगीकार करने की है जो हिन्दी की बोलियों में प्रचलित हैं। हिन्दी के साहित्यकार विभिन्न बोली क्षेत्रों से आते हैं। वे जब हिन्दी में अपने क्षेत्रों के अनुभवों और परिवेश की कथा लिखेंगे तो वहाँ के शब्दों के बिना उनका काम नहीं चलेगा। हिन्दी सदैव से एक उदार और ग्रहणशील भाषा रही है। जब रामचन्द्र शुक्ल ने कबीर की भाषा को सधुक्कड़ी कहा तो वे हिन्दी की इसी व्यापक ग्रहणशीलता को रेखांकित कर रहे थे। साधु किसी एक स्थान पर जमकर नहीं रहता, घूमता-फिरना, नये-नये क्षेत्रों में जाना उसकी सहजवृत्ति है। इसी कारण हमारे मध्यकालीन संत कवियों में नाना बोली क्षेत्रों के शब्द मिल जाएंगे। हिन्दी कविता का अधिकांश तो हिन्दी की बोलियों में ही है। तुलसी, जायसी जैसे कवियों ने अपनी बोली के शब्दों से अपने काव्य को समृद्ध किया है। जायसी जब सैनिक के लिए पाजी, तुलसी जब सुपात्र के लिए लायक,  कबीर जब समीप के लिए नाल का प्रयोग करते हैं तो वे हिन्दी की विशाल रिक्थ सम्‍पदा का दोहन करते हैं। नये युग में भी गुलेरी ने उसने कहा था में ‘कुंड़माई’ जैसे शब्द का प्रयोग कर उसे हिन्दी पाठकों का परिचित बना दिया। कृष्ण सोबती डार से बिछुड़ी लिखकर पंजाबी ‘डार’ को जो समूह वाली है, हिन्दी का शब्द बनाने में संकोच नहीं करतीं। मैला आंचल, जिन्दगीनामा, कसप, डूब, चाक जैसे उपन्यासों की रोचकता केवल कथा को लेकर ही नहीं, उसकी भाषा की अभिव्यक्ति क्षमता को लेकर भी है।

कुछ दिनों पहिले हिन्दी के एक समीक्षक ने मैला आंचल की हिन्दी को अपभ्रष्ट कहकर उसका परिनिष्ठित हिन्दी में अनुवाद करने का सुझाव दिया था। इधर हिन्दी की बोलियों को स्वतंत्र भाषा के रूप में स्वीकृत किये जाने की मांग बढ़ रही है। यदि अवधी को हिन्दी से पृथक भाषा मान लिया जायेगा, तब क्या रामचरित मानस का हिन्दी अनुवाद करना पड़ेगा, हजारी प्रसाद द्विवेदी के उपन्यासों को भोजपुरी में रूपान्तरित करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी? नामवर सिंह तब हिन्दी के नहीं, भोजपुरी के साहित्यकार माने जाएंगे। इधर मेरे पास बुंदेली प्रेमियों के बहुत से पत्र आ रहे हैं जिनमें आग्रह किया जा रहा है कि मैं अपनी मातृभाषा के रूप में हिन्दी को नहीं,  बुंदेली को जनगणना पत्रक में दर्ज करवाऊँ। यह एक संकीर्ण विचार है। इससे हिन्दी बिखर जाएगी और हिन्दी का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। एक ओर तो विभिन्न दूरदर्शन चैनलों में दिखाए जाने वाले धारावाहिकों में बींद और बींदड़ी जैसे ठेठ क्षेत्रीय शब्द लोकप्रिय हो रहे हैं,  दूसरी ओर हिन्दी की लो.ओ.सी. को और संकीर्ण बनाया जा रहा है।

राजनीति में छोटी-छोटी पार्टियां बनाकर सत्ता में भागीदारी के अवसर निकालना जबसे संभव हुआ है, तबसे हिन्दी की बोलियों के पृथक अस्तित्व की मांग करना भी लाभप्रद और सुविधाजनक हो गया है। छोटी राजनीतिक पाटियों ने हमारे लोकतंत्र को अस्थिर और सिद्धान्तविहीन बना दिया है, छोटी-छोटी बोलियों की पृथक पहिचान का आग्रह करने वाले हिन्दी के गढ़ में सेंध लगा रहे हैं। हमें उनका विरोध करना चाहिए, उनसे सावधान रहना चाहिए।

हमें हिन्दी को अद्यतन बनाने के लिए जिन बातों की ओर ध्यान देना चाहिए, उन बातों की ओर किसी का ध्यान नहीं है। हमारे विश्वविद्यालयों, हिन्दी सेवी संस्थाओं, हिन्दी के प्रतिष्ठानों के पास ऐसी कोई योजना नहीं है कि हिन्दी में आने वाले नये शब्दों का संरक्षण, अर्थ विवेचन और प्रयोग का नियमन किया जा सके। पिछड़ी का विरोधी शब्द अगड़ी हिन्दी में इन दिनों आम है, पर अगड़ी का शब्दकोशीय अर्थ अर्गला या अडंगा है। अंग्रेजी की एक अभिव्यक्ति है एफ.आर.आई. अर्थात् फर्स्ट इनफार्मेशन रिपोर्ट। हिन्दी में इसे प्रथम दृष्टया प्रतिवेदन कहते हैं या प्राथमिकी। हिन्दी शब्दकोशों में ये दोनों नहीं हैं। यह शब्द विधि व्यवस्था का, अपराध जगत का, जनसंचार माध्यमों का बहुप्रयुक्त शब्द है। दादा, धौंस, घपला, घोटाला, कबूतरबाजी, हिट जैसे लोक प्रचलित शब्द भी हमारे शब्दकोशों में नहीं हैं। दूरदर्शन देखनेवालों को घंटे-आधघंटे में ब्रेक शब्द का सामना करना पड़ता है। पर ब्रेक को अभी शब्द कोशों में ब्रेक नहीं मिला है। और तो और बाहुबली का नया अर्थ भी हमारे शब्द कोशों में दर्ज नहीं है।

अंग्रेजी में हर दस साल बाद शब्द कोशों के नये संस्करण प्रकाशित करने की परंपरा है। वैयाकरणों, समाजशास्त्रियों, मीडिया विशेषज्ञों, पत्रकारों, मनोवैज्ञानिकों का एक दल निरंतर अंग्रेजी में प्रयुक्त होने वाले नये शब्दों की टोह लेता रहता है। यही कारण है कि पंडित, आत्मा, कच्चा, झुग्गी, समोसा, दोसा, योग जैसे शब्द अंग्रेजी के शब्द कोशों की शोभा बढ़ा रहे हैं। अंग्रेजी में कोई शुद्ध अंग्रेजी की बात नहीं करता। संप्रेषणीय अंग्रेजी की, अच्छी अंग्रेजी की बात करता है। अंग्रेजी भाषा की विश्व व्यापी ग्राह्यता का यही कारण है कि वह निरंतर नये शब्दों का स्वागत करने में संकोच नहीं करती। हाल ही में आक्सफोड एडवांस्ड लर्न्स डिक्शनरी का नया संस्करण जारी हुआ है। इसमें विश्व की विभिन्न भाषाओं के करीब तीन हजार शब्द शामिल किये गये हैं। बंदोबस्त, बनिया, जंगली, गोदाम जैसे ठेठ भारतीय भाषाओं के शब्द हैं, पर वे अंग्रेजी के शब्दकोश में हैं क्योंकि अंग्रेजी भाषी उनका प्रयोग करते हैं। इन नये शब्दों में एक बड़ा रोचक शब्द है चाऊ या चाव जिसका अर्थ दिया गया है- चोर, बदमाश, अविवाहित मां। इस चाव शब्द का एक रूप चाहें भी है। सूरदास ने चाव शब्द के चबाऊ रूपान्तर का प्रयोग अपनी कविता में किया है- सूरदास बलभद्र चबाऊ जनमत ही को धूत। हिन्दी का चाव या चाईं शब्द सात समंदर पार तो संग्रहणीय माना जाता है, पर अपने घर के शब्द कोशों में नहीं।

हिन्दी क्षेत्र में इतने विश्वविद्यालय हैं, हिन्दी का प्रचार-प्रसार करने वाली इतनी संस्थाएँ हैं, क्या कोई ऐसी योजना नहीं बन सकती कि हिन्दी में प्रयुक्त होने वाले नये शब्दों को रिकार्ड किया जा सके। हम प्रत्येक दस वर्ष में जनगणना पर करोड़ों रुपये खर्च करते हैं, क्या हिन्दी की शब्द गणना पर कुछ खर्च नहीं किया जा सकता? कोई हिन्दी समाचार पत्र अपने रविवासरीय संस्करण में पाठकों से आमंत्रित कर प्रत्येक सप्ताह उसके क्षेत्र में प्रचलित हिन्दी के सौ नये शब्द भी प्रकाशित करे तो वर्ष भर में 5000 से भी अधिक शब्द समेटे जा सकते हैं। वैश्विकीकरण के साथ, नई उपभोक्ता वस्तुओं के साथ, नये मनोरंजनों के साथ, लोकतंत्र की नई-नई व्यवस्थाओं के साथ जो सैकड़ों शब्द हिन्दी में आ रहे हैं, उन्हें काल की आंधी में उड़ जाने देना गैर जिम्मेदारी भी है और लापरवाही भी है। वह हिन्दी के प्रति हमारी संवेदनविहीनता का द्योतक तो है ही। हमें आज हिन्दी के शुद्धतावादी दीवाने नहीं, हिन्दी के संवेदनशील जानकार चाहिए।

साहित्य-कला के साथ दिल्ली सरकार का खेल

कला और साहित्य के करोड़ों के बजट को राष्ट्रमंडल खेलों की भट्ठी में झोंक देने के निर्णय ने एक बार फिर दिल्ली सरकार की मनमानी और साहित्य व कला के प्रति उसके नजरिये की पोल खोल दी है। सरकार ने छह अकादमियों और कला परिषद के बजट में 15 करोड़ से ज्यादा की कटौती कर दी है।
दिल्ली सरकार को यहीं तसल्ली नहीं हुई। उसने हिंदी, पंजाबी, उर्दू, संस्कृत, सिंधी और मैथिली-भोजपुरी अकादमियों तथा कला परिषद को पत्र भेजकर तमाम कार्यक्रम स्थगित करने का निर्देश दिया है। अकादमियों को केवल 20-20 लाख दिए जाएंगे, वे भी इस शर्त के साथ कि इन्हें राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान आयोजित कार्यक्रमों में ही खर्च किया जाएगा। कार्यक्रम और आयोजन स्थल भी सरकार तय करेगी।
दिल्ली सरकार ऐसा कारनामा पहली बार नहीं कर रही है। वरिष्ठ लेखक कृष्ण बलदेव वैद को लेकर हुआ विवाद जगजाहिर है। एक कांग्रेसी नेता के कहने पर उन्हें शलाका सम्मान नहीं दिया गया। इसके विरोध में वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह ने भी शलाका सम्मान ठुकरा दिया। उनके अलावा छह और रचनाकारों ने हिंदी अकादमी पुरस्कार लेने से इनकार कर दिया। लेखकों के विरोध के बावजूद पुरस्कार समारोह आयोजित किया गया। इसका आयोजन किसी सभागार में न कर दिल्ली सरकार के सचिवालय में किया गया। हिटलरी रुख अपनाते हुए पत्रकारों तक को एंट्री नहीं दी गई। किसी सम्मानित लेखक को एक मिनट भी बोलने का भी मौका नहीं दिया गया। इस तरह का अभूतपूर्व साहित्यिक समारोह संभवत: पहली बार हुआ। यह भी शायद पहली बार हुआ कि किसी अकादमी के मुख्य पुरस्कार सहित कई और पुरस्कार ठुकरा दिए जाने के बाद भी समारोह आयोजित किया गया हो।
दिल्ली की मुख्यमंत्री छह अकादमियों की अध्यक्ष हैं। मुख्यमंत्री होने के नाते उन्हें राजनीतिक-प्रशासनिक कार्य करने पड़ते हैं। वे सभाओं, बैठकों, उद्घाटन आदि महत्वपूर्ण कार्यों में व्यस्त रहती हैं। साहित्य-कला जैसे तुच्छ विषयों के लिए उनके पास समय कहां! ऐसी कोई जानकारी नहीं है कि उन्होंने साहित्य सृजन किया हो या वह भाषाविद् हों या कला-साहित्य के क्षेत्र में उनका किसी भी रूप में कोई योगदान रहा हो। ऐसे में वह अकादमियों में सक्रिय भूमिका कैसे निभा सकती हैं? क्या एक व्यक्ति का छह अकादमियों का अध्यक्ष बनना व्यवहारिक है? यह तो एक नजीर है। कमोवेश यह स्थिति सभी राज्यों की है। फिर क्यों न अकादमियां राज्य सरकार के शिकंजे से मुक्त की जाएं। उसमें पदाधिकारी रचनाकारों हों और उन्हीं के द्वारा चुने जाएं।
डॉक्टरों की संस्था डॉक्टर चलाते हैं, उद्योगपतियों की संस्था उद्योगपति चलाते हैं। यानी संस्था जिसकी होती है, उसी से जुड़े लोग उसे संचालित करते हैं। फिर रचनाकारों और कलाकारों की संस्थाएं राजनेता क्यों चलाएंगे?
असल में सरकारें साहित्य व कला अकादमियों को अपना भोंपू बनाकर रखना चाहती हैं। उनकी मंशा रहती है कि ऐसे लेखकों-कलाकारों को सम्मानित किया जाए, जो उनकी गलत-शलत नीतियों का समर्थन करें और विरोध में एक शब्द न बोलें? चुनाव में प्रचार भी करें तो सोने-पे-सुहागा। यह तभी संभव है जब अकादमियों पर उनकी पकड़ हो।
एक वजह यह भी है कि राजनेताओं की सोच सामंती है। वह कुर्सी मिलने पर खुद को जनसेवक नहीं, राजा समझते हैं। उसी की तर्ज पर पुरस्कार व सम्मान बांटने का अधिकार अपने हाथ में रखना चाहते हैं। इससे उनके दंभ की तुष्टि होती है।
आजकल की जोड़तोड़ की सिद्धांतहीन राजनीति की उपज अधिकतर नेता रीढ़विहीन हैं। ये अंदर से खोखले, वैचारिक रूप से दिवालिया और मूल्यहीन हैं। ये इतने कमजोर हैं कि वैचारिक आलोचना भी इन्हें भयभीत कर देती है। इन्हें स्तुति गान ही अच्छा लगता है। यह तभी संभव है, जब इनके हाथ में प्रलोभन देने की ताकत हो। इसलिए राज्य सरकारों से यह अपेक्षा करना बेकार है कि वे स्वेच्छा से अकादमियों को अपने चुंगल से मुक्त कर देंगी।
रचनाकार और कलाकार निजी स्वार्थों और प्रलोभनों से ऊपर उठकर उन अकादमियों और कला परिषदों में कोई पद ग्रहण नहीं करें, जो राज्य सरकारों के अधीन हैं। इनसे मिलने वाले पुरस्कारों और सम्मानों को भी ठुकरा दें। तभी राज्य सरकारों पर दबाव बनेगा और वे इस दिशा में कदम उठाएंगी।
संस्मरणकार कांतिकुमार जैन का कहना है कि सरकारों का साहित्य व कला का एजेंडा केवल मुखौटा है ताकि कोई यह न कह सके कि सरकार कला विरोधी है। इनके लिए कला-साहित्य का प्रोत्साहन केवल रस्म अदायगी है। सरकार का मकसद केवल राजनीति करना, वोट बैंक बढ़ाना ओर यह देखना है कि पैसा कहां से कमाया जा सकता है।
आज तक प्रेमचंद का स्मारक नहीं बनाया जा सका है। सरकारी पत्रिकाओं की हालत खराब है। वे स्तरहीन हैं और उनमें पठनीय सामग्री नहीं होती।
हमारी सरकारों की प्राथमिकता में कला, साहित्य, संस्कृति नहीं है। वे खुद को कला प्रेमी, साहित्य प्रेमी साबित करने के लए आयोजन करती हैं, लेकिन भयभीत भी रहती हैं कि कोई सरकार के खिलाफ न बोल दे। इसलिए सम्मानित साहित्यकारों को बोलने का मौका भी नहीं दिया जाता। उनका सम्मान केवल विज्ञापन के लिए करती हैं।
अकादमियों को सरकारों के चुगंल से मुक्ति मिलनी चाहिए।

आसाराम बापू और कमला बुआ : कांतिकुमार जैन

पिछले दिनों किन्नरों को कोसते हुए आसाराम बापू ने बयान दिया था। उनका लक्ष्य सागर की मेयर कमला बुआ थीं। संतजी के बयान को लेकर असली और नकली किन्नरों की पहचान करता चर्चित संस्मरणकार का आलेख-

कुछ दिनों पहले उज्जैन में आसाराम बापू ने किन्नर विषयक बयान क्या दिया कि राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में भूचाल आ गया, जिन लोगों ने संत श्रेष्ठ को टी.वी. पर किन्नरों की खास अदा में ताली बजा-बजाकर, अंगुलियां नचा-नचाकर, दीदे मटका-मटाकर किन्नरों को सराहते हुए देखा, उनके तो मानो जीते-जी ही स्वर्ग मिल गया। श्वेत, हिम धवल दाढ़ी, भौंहों तक के बाल सफेद, परदनिया और कुर्ता भी झकाझक सफेद। जब वे नाच-नाचकर, लहरिया लेते हुए किन्नरों को कोस रहे थे तो संयोग से टी.वी. पर यह नयन महोत्सव देखने का सौभाग्य मुझे भी मिला। टीवी पर संत आसाराम किसी भी किन्नर से ज्यादा किन्नर लग रह थे। किन्नरों के प्रति उनकी घृणा छिपाये नहीं छिप रही थी। लगता था कि इस धराधाम पर सबसे गर्हित प्राणी कोई है तो वह किन्नर ही है। इतनी घृणा संतों को शोभा नहीं देती, पर घृणा का मूल कारण मुझे दूसरे दिन समाचार पत्रों में पढऩे को मिला।
  अहमदाबाद हो या भोपाल, सागर हो या उज्जैन, सबने संतजी की किन्नर विरोधी टिप्पणी की शल्य चिकित्सा की। बापूजी का लक्ष्य सागर की कमला बुआ थी। सागर के बुआ समर्थकों ने कहा कि यह सारा मामला व्यापार का है। आसाराम बापू को लगा कि अभी तक उन्हें देखने और सुनने के लिए जो भीड़ उमड़ती थी, वह अब कमला बुआ को देखने और सुनने के लिए उमड़ेगी। कमला बुआ सागर की मेयर चुनी गई थीं। उन्होंने कांग्रेस और भाजपा प्रत्याशियों को गहरी शिकस्त दी थी।
भारतीय जनता मौका पडऩे पर असली और नकली का ऐसा भेद करती है कि बड़े-बड़े व्याख्याकार गच्चा खा जाएं। जनता मानती है कि जब हमें किन्नरों में से किसी एक का चुनाव करना है तो असली का ही चुनाव क्यों न किया जाए, सो उसने असली का चुनाव किया। बापू को लगा कि बुआ प्रतिष्ठा और लोकप्रियता में उनसे आगे निकल गईं। इसलिए बुआ को लंगड़ी मारना उन्हें जरूरी लगा। उन्होंने उज्जैन में अपने बयान द्वारा कमला बुआ को लंगड़ी मारी थी, पर यह दांव उल्टा पड़ा। अपनी लंगड़ी से वे स्वयं धराशाही हो गए।
मुझे उस नेता के इस विश्लेषण पर कि सारा मामला व्यापार का है, गंभीरता से विचार करने की जरूरत लगी। मैंने मंथन किया और मंथन का परिणाम निकला- ध्त। इस ध्त को प्राप्त करने में मेरे भाषा विज्ञानी मन ने बड़ा काम किया।
हमारे देश में पिता को बापू कहते हैं। पिता की बहन को बुआ या फुआ कहा जाता है। कई लोग बुआ को फूफी या फूफू भी कहते हैं। ये सारे शब्द संस्कृत के पितृ स्वषा के तद्भव रूप हैं। बुआ यानी बापू की बहन। बापू का बुआ की खिल्ली उड़ाना भारतीय पारिवारिक संबंधों में कोई नई बात नहीं है। अब सागर में बुआ सत्ता में आ गई, सागर की मेयर हो गईं तो बापू को अखरना ही था। सागर में बापू का बड़ा भारी आश्रम है। बात संबंधों की नहीं, सत्ता की है। सत्तासीन बुआ बापू को आंख की किरकिरी लगीं। उन्होंने किरकिरी दूर करने के लिए हथेली का सहारा लिया, अंगुलियों को मटकाया, आगे घूमे, पीछे मुड़े। बुआ जैसी करती थीं, वह सब किया।
ताली बजाना किन्नरों की खास अदा है। ताली बजाता किन्नर समाज में उपहास का पात्र माना जाता है। बापू को लगा कि सागर की जनता ने कमला बुआ को जिताकर यथास्थिति को बदलने की जुर्रत की है। बापू यथास्थितिवादी हंै। समाज बदल गया तो उन जैसे बापुओं को कोई नहीं पूछेगा, इसलिए कमला बुआ जैसे व्यक्तियों पर प्रहार करो।
ताली बजा-बजाकर किन्नर समाज संतति जन्म पर, विवाह के मौके पर, दस्टौन पर, मुंडन पर घर-घर जाकर अपनी जीविका वसूलता है। लोग खुशी-खुशी देते भी हैं। वे जानते हैं कि किन्नरों को यदि उन्होंने इनक नेग नहीं दिया तो ये किसी भी सीमा तक जा सकते हैं और गृहस्थ की थुड़ी-थुड़ी कर सकते हैं।
सागर में ही कोई चार-पांच साल पहले एक किन्नर ने विद्यापुरम के एक शुचितावादी प्रोफेसर की बड़ी थुड़ी-थुड़ीकर दी थी। प्रोफेसर साहब स्थानीय थे, किन्नरों को स्थानीय नामों से पुकारना उन्हें अच्छा लगता। किन्नरों को वे शापग्रस्त मानते थे और स्वयं को पुल्लिंग होने के कारण विश्व का सर्वश्रेष्ठ प्राणी। वे किन्नरों को किन्नर नहीं कहते थे। ठेठ बुंदेली में कभी हीजड़ा कहते, कभी खसुआ। हीज़ फारसी शब्द है, इसी को और अवज्ञामूलक बनाना हो तो उसमें एड़ा प्रत्यय लगाकर हीजड़ा बनाया जाता है। दुखड़ा, मुखड़ा, टुकड़ा के वजन पर।
अकबर इलाहाबादी ने हीज़ शब्द का प्रयोग बड़े ही शायराना अंदाज में किया है। न हीयों में, न शीयों में। उनका संकेत अंग्रेजी के ‘हीÓ और ‘शीÓ से है। बोलचाल में ऐसे लोगों का परिचय देते हुए कहते हैं उठ बैठ, खड़ी हो जा। पशुओं को खस्सी बनाकर उन्हें अधिक कार्यक्षम बनया जाता है और वे प्रजनन के अयोग्य हो जाते हैं। प्रोफेसर साहब ने घर आए किन्नर को खस्सू कह दिया। कह ही नहीं दिया, उसे गाली भी दी और धक्का भी दिया।
आचार्यजी को पौत्र रत्न की प्राप्ति हुई थी। किन्नर टोली ने जनाना अस्पताल से यह सूचना प्राप्त की थी और अपने कुल की परंपरा के अनुसार अपना कर वसूलने विद्यापुरम आए थे। यहां कर तो मिला नहीं, मिला अपमान, मिले अपशब्द। किन्नर ने कहीं सुना था- सबसे कठिन जाति अपमान सो अपनी बिरादरी का ऐसा अपमान देखकर उसने गिरते-गिरते पुल्लिंग को अपनी जद में लिया और वे निरावृत्त हो धरणी पर धड़ाम से गिरे। यह लीला यहां संपन्न नहीं हुई। पंडितानी चिल्लाई- देखियो-देखियो, पंडितजी को का तो हो गऔ। पंडितजी को कुछ नहीं हुआ था। वे केवल बेपर्द हो गए थे। किन्नर राज ने इस दृश्य का व्यापारिक लाभ उठाने का विचार किया और उन्होंने भी अपनी धोती कमर से ऊपर कर ली। आंधी में उलटी हुई छतरी की तरह। पंंडितानी चिल्ला रही है, पुत्रजी किंकर्तव्यविमूढ़ खड़े हैं, पुत्रवधू सौरी से बाहर आ गई हैं और सोच रही हैं- हे धरती माता, तू फट जा, मैंन उसमें समा जाऊं। पंडितानी किन्नर बुआ से हाहा खा रही है। माई हूने अब सान्त, अपनी लीला समेटिये। यह गृहस्थों का घर है। समधियाने तक बात पहुंचेगी, हम तो कहीं मुंह दिखाने के लायक नहीं रहेंगे।
घर के सामने भीड़ लग गई थी। सब्जी वालों, कबड़ी वालों, ठेले वालों को इस बायस्कोप में बड़ा आनंद आ रहा था। ज्यों-ज्यों पंडितानी की हाहा बढ़ रही थी, न हीजी, न शीजी का रेट भी बढ़ रहा था। सौ रुपए से शुरू हुआ सेंसेक्स बढ़कर अब पांच सौ हो गया था। पंडितानी को अब न पंडितजी की सुध रह गई थी, न बेटे जी की। उन्हें कुल की कान बचाने भर की सुध थी। हम पेंशनदार लोग, बुआ तुम्हें पांच सौ रुपया दे हैं तो हमाओं को बजट बिगड़ जाते। बुआ गुस्सा थूकौ, धुतिया नीची करौ, ये लो सौ रुपैया और मौड़ा को आशीर्वाद दो। वे सौरी में गई। नवजात को उन्होंने बुआ की बढ़ी हुई हथेलियों में डाल दिया। बुआ ने बड़प्पन का परिचय दिया। जुग-जुग जिऔ राजा दशरथ के मौड़ा।
सारे मुहल्ले में यह खबर बिजली की तरह दौड़ गई। जब किन्नर टोली मेरे दरवाजे पर आई तो मैंने उन्हें दस का नोट दिया। कहा- बुआ हमरो रिटायरमेंट हो गयौ है, पंशेन अभी आई नहीं है, इतनेई में सात रखौ। सो हम लुटेरे थोड़ेई हैं। हम भी तुमाऔ दुख-सुख समझत हैं। भगवान ने तो हमारे साथ बड़ों अन्याय करौई है, अब हम अपनी रोजी रोटी कमा रयै, ऐसे में कोई हमें गाली दे हे तो हमें गुस्सा आहे कि नई। बुआ ठीक कह रही थीं। वह चलने को हुईं तो मैंने उन्हें रोका, बुआ हमारी एक बात सुने जाऔ। अगली बेर तुम चुनाव लड़ो, बीना से, कटनी से, शबनम मौसी और फलानी बुआ चुनाव जीत के भोपाल तक पहुंच गई हैं। तुमाऔ जीत बौ पक्को। हमाये वोट के लाने तुम निसाखातिर हो जाओ। बुआ के पैर थम गए। उन्होंने ताली बजाई, सपना मौसी, जूही बुआ और राधा रानी को बुलाया। कहा- देखियौ जे जैन साहब का कै रयै।
मैं नहीं कहता कि कमला बुआ के सागर के मेयर पद का चुनाव जीतने में मेरी उस दिन की प्रेरणा ही थी, पर वे चुनाव लड़ीं और जीतीं। जनता ने उन पर विश्वास प्रकट किया। सामान्य मतदाता नकली किन्नरों से इस प्रकार आजिज आ चुका है कि उसने सोचा चलो इस बार असली किन्नर को मौका देकर देखा जाए, जो सकता है असली किन्नर नकली मर्दों से बेहतर साबित हो।
ऐसे में संत आसाराम बापू का कमला बुआ का मजाक उड़ाना जनता का मजाक उड़ाना है, संविधान का अपमान करना है और लोकतंत्र की जड़ें कमजोर करना है। बापू अपना घर संभालें, दूसरों के फटे में टांग न डालें तो ही अच्छा। उज्जैन में संत आसाराम बापू ने कमला बुआ का मखौल उड़ाकर अच्छा नहीं किया। उनका यह आचरण संतों जैसा नहीं है। कमला बुआ हमारी प्रतिनिधि हैं, वे चुनाव लड़कर और जीतकर सागर की मेयर बनी हैं। उन्हें यह गौरव हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था ने दिया है। संत को जनता के विवेक का उपहास करना शत-प्रतिशत गलत है। हमारी परंपरा में किन्नर को अबध्य माना गया है। शिखंडी का उदाहरण हमारे सामने है। फिर संत प्रवर का कमला बुआ का माखौल उड़ाना किसी भी प्रकार से संतोचित नही है।
यहां भी कमला बुआ आसाराम बापू से बाजी मार ले गईं। संत शिरोमणी ने उज्जैन में अपने हाव-भाव से, बोली बानी से कमला बुआ की जिस भद्दे ढंग से हंसी उड़ाई, उसके उत्तर में कमला बुआ अपनी पर उतर आती तो बापू को भागते रास्ता नहीं मिलता, पर कमला बुआ ने बहुत शलीन ढंंग से, अत्यंत शिष्टतापूर्वक उत्तर में कहा कि मुझे उनका आशीर्वाद चाहिए। वे हमारे वंदनीय संत हंै। संतों के मार्गदर्शन के बिना मैं सफल हो ही नहीं सकती। कमला बुआ ने जिस गरिमा और मर्यादा का परिचय दिया है, उससे उनका कद सभी की दृष्टिï में बहुत ऊंचा हो गया है।
संत आसाराम बापू ताली बजाते हुए बहुत अच्छे लगते हैं, असली किन्नर मय अपनी मूछों और दाढ़ी के। वास्तव में दैहिक किन्नरत्व उतना मालौखस्पद नहीं है, जितना मानसिक किन्नरतत्व। कमला बुआ ने थोड़े ही समय में सागर में अपनी कार्य कुशलता और निर्णय क्षमता से जो छवि अर्जित की है, वह हमें बहुत आशान्वित करती है। वे आसाराम बापू से ज्यादा संत और उनकी तुलना में ज्यादा पुरुष लगती हैं। लोकतंत्र ने उन्हें जो अवसर दिया है, उसका वे भरपूर लाभ उठाएं, अपने कार्यों से जनता की कसौटी पर खरी उतरें। वे यशस्वी हों, सफल हों, जनता को उनसे बहुत उम्मीदें हैं, वे भारतीय लोकतंत्र में तीसरा विकल्प सिद्ध हो सकती हैं।
चलते-चलते एक प्रसंग याद आया। ईरान में किसी मुल्ला ने किसी किन्नर को धक्का दे दिया। किन्नर गिर पड़ा। पर वह करे तो क्या करे। उसने लपककर मुल्लाजी की दाढ़ी का एक बाल नोंच लिया। अरे, अर,े यह क्या करते हो। कुछ नहीं, मुझे मालूम है कि जिसके पास भी आपकी दाढ़ी का मुदद्दस बाल होगा, उसे सीधे जन्नत मिलेगी। यह सुनना था कि वह मौजूद भीड़ मुल्लाजी के बाल नोंचने लगी। मुल्लाजी सारी हेकड़ी भूल गए, पर तब तक काफी देर हो गई थी।
कमला बुआ चाहतीं तो अपने प्रशंसकों, अपने भक्तों, अपनी टोली के सदस्यों को कह देतीं कि संत आसाराम बाप की मूछों और दाढ़ी के बाल जन्नत का पासपोर्ट हैं तो संतजी अपना सारा संतत्व भूल जाते, पर कमला बुआ शरीफ हैं, बेहद शालीन हैं। उन्होंने बडप्पन का परिचय दिया और संत शिरोमणी की माफ कर दिया। बुआ बड़ी साबित हुईं, बापू बौने हो गए!

एक व्यक्ति को कितना धन चाहिए : कांतिकुमार जैन

 

आए दिन भ्रष्टाचार की खबरें आ रही है। मंत्री से लेकर संतरी तक सब इसमें लिप्त हैं। पैसा सर्वोपरि हो गया है। धन कमाने की अंधी दौड़ में नैतिकता-अनैतिकता का कोई मायने नहीं रह गया है। धनलिप्सा की प्रवृत्ति पर सवाल उठा रहे हैं चर्चित संस्मरणकार।

इधर भारत के विभिन्न क्षेत्रों में व्याप्त भ्रष्टाचार की इतनी खबरें देखने-सुनने और पढऩे को मिल रही हैं कि यह समझना मुश्किल हो गया है कि एक व्यक्ति को आखिर कितना धन चाहिए। व्यक्ति नेता हो, अधिकारी हो, ठेकेदार हो, कर्मचारी हो या कोई भी हो, रिश्वत, घूसखोरी या बिना श्रम से कमाए हुए धन की फिराक में है। फलां नेता के नहान घरों में नोटों की इतनी गड्डियां मिलीं, ढिकां अफसर के लाकरों में इतने डालर मिले, अमुक ठेकेदार के यहां तहखानों में इतने सोने के बिस्किट मिले कि उन्हें गिनना या उनका मूल्यांकन करना छापा मारने वाले अमले के लिए कठिन हो गया। समझ में नहीं आता कि इतने धन का ये लोग आखिर करेंगे क्या? सुख-सुविधापूर्ण जीवन जीने के लिए, स्तरीय जीवनयापन के लिए धन चाहिए, लेकिन एक सीमा के बाद इस संचित धन का क्या होगा? इस अकूत धन संचय के समाचार पढ़-पढ़कर मुझे पोखम की याद आती है। पोखम विश्वविख्यात कथाकार लियो टाल्सटाय की एक कहानी ‘एक व्यक्ति को कितनी जमीन चाहिए’ का मुख्य पात्र है। कहानी मूलत: रूसी में है। बीए के हमारे पाठ्यक्रम में इस कहानी का अंग्रेजी अनुवाद था। कहानी पोखम नामक एक किसान की है, जो अपनी पत्नी के ताने से त्रस्त होकर संपन्न होने के नाना उपाय करता है। पत्नी की देवरानी संपन्न थी। पत्नी पोखम की अनुजवधू का वैभव देखकर दिन-रात कुढ़ती है और अपने पतिदेव की कंगाली को लेकर उसे बराबर खरी खोटी सुनाती है। पोखम ने बड़ी मेहनत की, रात-दिन अपने खेतों को उर्वर बनाने में जुटा रहा, पर उसकी गरीबी नही गई तो नहीं गई।
अचानक एक रात उसने सपना देखा- राज्य में मुनादी हो रही है कि जो भी बिना श्रम किए धनी होना चाहता है, वह कल सबेरे मैदान में आयोजित प्रतियोगिता में भाग लेकर अपनी किस्मत आजमा सकता है। दो तीन शर्ते हैं- वे भी आसान। प्रतियोगी सूर्योदय के पहले प्रतियोगिता स्थल पर पहुंच जाए। सूर्य का बिंब क्षितिज पर प्रकट होते ही उसे दौडऩा प्रारंभ करना होगा। दिनभर दौड़कर वह जितनी जमीन को घेर लेगा, वह उसकी अपनी हो जाएगी, बशर्ते सूर्यास्त के समय बिंब के डूबने पर उसे ठीक उसी स्थल तक पहुंचना होगा, जहां से उसने दौड़ प्रारंभ की थी।
पोखम ने इस प्रतियोगिता में भाग लेकर अपनी किस्मत आजमाने का फैसला किया। दूसरे दिन वह आयोजन स्थल पर पहुंच गया और पूरब में सूर्य के बिंब के उदित होते ही उसने दौड़ प्रारंभ कर दी। ज्यों-ज्यों उसकी परिक्रमा बढ़ती गई, उसकी महत्वाकांक्षा और उसका लोभ भी बढ़ता गया। आहा, नाले के किनारे की यह जमीन कपास के लिए कितनी उपजाऊ है, इसे जरूर अपने कब्जे में कर लेना चाहिए। उसने नाले के किनारे की वह लंबी-चौड़ी जमीन घेर ली। हाय-हाय! कपास तो मेरा अपना हो गया, गन्ने के लिए तो सामने की जमीन कमाल की लगती है। उसने एक मील का चक्कर लगाकर गन्ने की खेती के लिए वह जमीन भी घेर ली। अब तक सूरज सिर पर आ गया था। वह आगे बढ़ा, उसने अपनी गति तेज की। पहाड़ी की तलहटी की जो जमीन थी, वह आलू की खेती के लिए बेहद उर्वर होगी। चलूं, इसे भी घेर लूं। फिर उसने मूंगफली के लिए, धान के लिए, गेहूं के लिए भी अच्छी खासी जमीन घेर ली। सूर्य देवता पश्चिम की ओर ढुलक रहे थे, पर उसे अपने कौशल पर, अपने पैरों पर विश्वास था। अपनी दौड़ खत्म करने के पहले वह जो टीला-सा दिख रहा है, वह भी अपने कब्जे में आ जाए तो मजा आ जाए। उसने सुन रखा था कि वह टीला लोहे का बना हुआ है। यदि उसने वह टीला कब्जे में कर लिया तो उसे विश्व का लौह किंग बनने से कौन रोक सकता है। उसने चाल और तेज की, लोहे का टीला अब उसके साम्राज्य में था। बस बहुत हुआ, अब उसका और उसकी सात पीढ़ी का जीवन बिना कुछ किए हुए चैन से गुजर जाएगा। अब उसे अपनी कलह प्रिय पत्नी के ताने नहीं सुनने पड़ेंगे। सबसे पहले तो वह अपनी पत्नी के लिए दो घोड़ों वाली एक बग्घी खरीदेगा और एक कोचवान भी रखेगा। उसने सिर उठाया, आकाश की ओर देखा, अब उसे अपनी दौड़ खत्म करनी चाहिए, उसे सूर्यास्त के समय वहां पहुंचना भी है। जहां से उसने यात्रा प्रारंभ की थी। यात्रारंभ के स्थल की पहचान के लिए उसने एक खूंटा गाड़ रखा था। उसने अपने कदम खूंटे की दिशा में बढ़ाए भी, पर यह क्या, यह जमीन तो बिल्कुल नहीं छोड़ी जा सकती। इस पर वह एक भव्य कोठी बनवाएगा, आसपास बगीचा, बिल्कुल नंदनकानन। कोठी में एक तरणताल होगा। उसने कल्पना में तरणताल में तैरना प्रारंभ किया। उसने नजरें उठाईं, देखा, सूर्य देवता पश्चिम के क्षितिज को छूने ही वाले थे। पोखम ने जान हथेली पर रखकर पैरों की गति तेज की। वाह प_े, बस चार कदम और। खूंटा सामने था। पोखम ने आंखें बंद की, लक्ष्य को ध्यान में रखकर सरपट भागा। गहरी सांस ली, नजरें घुमाकर उसने घेरी हुई जमीन का जायजा लिया। इतना बड़ा साम्राज्य, इतना वैभव। भगवान, सूर्यास्त के पूर्व मैं खूंटा छूने में सफल हो जाऊं। खूंटा सामने था, सूर्य का बिंब बस डूबने को था। उसने दौडऩा बंद कर दिया, अपने दोनों हाथ फैलाए, पृथ्वी पर दंडवत लंबायमान हो गया। उसके दाहिने हाथ की अंगुलियों ने खूंटे का स्पर्श किया ही था कि सूर्य का बिंब डूब गया। अपनी सफलता पर वह गदगद था। उसे लगा कि उसे अपनी पीठ थपथपानी चाहिए। दर्शक सांस रोके पोखम की सफलता पर बधाई देने के लिए आगे बढ़े, शाबाश पोखम, तुमने कमाल कर दिया। पर पोखम उठ क्यों नहीं रहा। पोखम, आंखें खोलो। पर पोखरा न कुछ सुन पा रहा था, न कुछ देख पा रहा था। उसके प्राण पखेरू उड़ चुके थे। पोखम ने पचास-साठ मील का रकबा तो अपने कब्जे में कर लिया था, पर वह सब अब उसके लिए बेकार था। पोखम के भाई-बंदों और पड़ोसियों ने उसे दफनाने के लिए वहीं एक गड्ढा खोदा- साढ़े तीन हाथ लंबा और दो हाथ चौड़ा। पोखम को कितनी जमीन चाहिए थी- बस, महज साढ़े तीन हाथ।
इन दिनों जब मैं मीडिया में अपने आसपास नेताओं, अधिकारियों, ठेकेदारों, दलालों, उद्योगपतियों, खिलाडिय़ों द्वारा अकूत संपत्ति के संग्रहण के समाचार देखता, सुनता, पढ़ता हूं तो मुझे अमर कथा शिल्पी लियो टाल्सटाय की यह कहानी बराबर याद आती है, अपने नैतिक से ज्यादा, व्यावहारिक आसंगों के लिए। लगता है, हमारी तृष्णा का कोई अंत नहीं है। न तृष्णा का और न हमारी विवेकहीनता का। इस तृष्णा ने, इस विवेकहीनता ने हमारा सारा सुख-चैन छीन लिया है। हमें धन चाहिए, पर कितना? बेटों की शिक्षा पूरी हो जाए, बेटियों के विवाह हो जाएं, आलीशान कोठी हो जाए, कोठी में ऐशोआराम के सब साधन उपलब्ध हों, हर साल नई से नई कार पोर्च में खड़ी रहे। हमारे जहाज चलें। इतना पैसा, जिसे हम गिन भी न सकें, हमारे किस काम का?
मैंने बचपन में एक मिडास की कथा पढ़ी थी। उसे सोने से बहुत प्यार था। उसने ईश्वर से वरदान मांगा कि वह जिस वस्तु को छुए, सोने की हो जाए। भगवान तथास्तु कहा। उसने कुर्सी छुई, वह सोने की हो गई। उसने पत्नी को आलिंगनबद्ध किया, वह भी सोने की हो गई। वह खाना खाने बैठा, कौरा तोड़ा, वह भी सोने का हो गया। ऐसा वरदान किस काम कि आदमी खा भी नहीं सके।
हमारे युग में अरविंद जोशी, टीनू जोशी, बाबू लाल अग्रवाल जैसों को कितना धन चाहिए। अब तो हालत यह हो गई है कि आयकर विभाग की जो टीम अनुपात से अधिक संपत्ति रखने वालों पर छापे डालती है, उसका अधिकारी, वह भी संयुक्त आयुक्त के स्तर का, घूस लेते हुए रंगे हाथ पकड़ा जाता है। भ्रष्टाचार द्वारा उपार्जित धन का आकलन करना अब मनुष्य के बस की बात नहीं रह गई है। उसके आकलन के लिए अब मशीनें चाहिए। भ्रष्टाचार करने वाले छोटे लोग होते तो उनकी धनलिप्सा समझ में आती, पर ये धनपिपासु अच्छे खासे संपन्न वर्ग के लोग हैं। सरकार से इन्हें मोटा वेतन मिलता है, सुख सुविधा के लिए इनके पास तमाम साधन हैं तो आखिर ये अकूत धन किसके लिए और क्यों एकत्र कर रहे हैं!
दिल्ली से चलने वाला रुपया गरीब तक पहुंचते-पहुंचते महज बीस पैसे कैसे रह जाता है? बच्चों के दोपहर भोजन का पैसा सचिवों का बैंक बैलेंस बढ़ाता है, नरेगा के पैसों से अधिकारियों की कोठियां तन जाती हैं और आईपीएल का पैसा खिलाडिय़ों को न मिलकर संगठनकर्ताओं की जेबें गरम करता है। हमारे लोकतंत्र में खोखों, सूटकेसों का अर्थ बदल गया है। ये खोखे, ये सूटकेस लेने वालों का वर्तमान तो बिगाड़ ही रहे हैं, उनकी भावी पीढिय़ों को भी अपराधी, शराबखोर, बलात्कारी और हत्यारे बना रहे हैं। क्या ये नेता, ये अधिकारी, ये ठेकेदार अपने दाहकर्म के लिए चंदन की चिता से संतुष्ट नही हैं। क्या इन्हें लगता है कि जब तक ये गांधी छाप नोटों से सुसज्जित चिता पर नहीं लिटाए जाएंगे, इन्हें मोक्ष की प्राप्ति नहीं होगी?
अभी-अभी एक मंत्री ने कहा कि भ्रष्टाचार वैश्विक रोग है, भारत को उसके लिए लानत-मलामत करना बेकार है। मुझे लगता है, एक अंधी दौड़ है, जहां हर आदमी दूसरे को धकियाता, लंगड़ी मारता आगे निकल जाना चाहता है। वह सोचता है, फलां रिश्वत ले रहा है, मैं क्यों न लूं, ढिकां बेनामी संपत्ति इकट्ठी कर रहा है, मैं क्यों न करूं! विकास की गंगा बह रही है, मैं भी इसमें हाथ धो ही डालूं। ईमानदारी इन दिनों बेवकूफी का पर्याय हो गई है। बहुत दिन नहीं हुए, जब एक केंद्रीय मंत्री के शौचालयों और स्नानागारों से नोटों की गड्डियां बरामद हुई थीं। उन मंत्री महोदय को पता नहीं था कि उनके घर के पाखानों और नहानघरों में कितना रुपया भरा पड़ा है। कल तक यह सब अपवाद स्वरूप था, इन दिनों आम है। अब बड़े, ऊंचे स्तर के अधिकारी और नेता ही नहीं, छोटे-सा छोटा नेता, अधिकारी भी बिना रिश्वत लिए कोई काम नहीं करता। भ्रष्टाचार इन दिनों शिष्टाचार का पर्याय बन गया है, पर यह चाहे जैसा भी आचार हो, हमारे लिए, हमारी भावी पीढ़ी के लिए, हमारे लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं है।
मुझे लगता है कि हमारी सरकारों को लियो टाल्सटाय की कहानी ‘एक व्यक्ति को कितनी जमीन चाहिए’ की लाखों-करोड़ों की संख्या में छपवाकर हर आदमी तक पहुंचा देनी चाहिए। भले आदमी रिश्वत लेने से पहले एक बार सोच तो लो, तुम्हें कितना धन चाहिए। धन के लालच में कहीं तुम्हारी गति लियो टाल्सटाय की कहानी के नायक पोखम जैसी न हो जाए।

साहित्य पर अश्लील तोहमत

पिछले कुछ समय से हिंदी साहित्य में कोई वैचारिक और रचनात्मक हलचल तो नहीं हो रही है, लेकिन विवाद नए-नए उठ रहे हैं। हिंदी अकादमी, दिल्ली में उपाध्यक्ष पद पर अशोक चक्रधर की नियुक्ति, सैमसंग पुरस्कार, उपन्यास द्रोपदी को लेकर हंगामा और अब केदारनाथ सिंह द्वारा शलाका सम्मान ठुकराना। उनके अलावा पुरुषोत्तम अग्रवाल, प्रियदर्शन, रेखा जैन, पंकज सिंह, गगन गिल और विमल कुमार ने भी पुरस्कार नहीं लेने की घोषणा की है। इसके पीछे वरिष्ठ साहित्यकार कृष्ण बलदेव वैद को शलाका सम्मान नहीं दिया जाना है। दरअसल, हिंदी अकादमी की पिछली कार्यकारिणी ने वैद को वर्ष 2008-2009 के शलाका सम्मान के लिए नामित किया था। बाद में इसे रोक दिया गया। असल में साहित्य से कुछ लोगों ने वैद पर अश्लील साहित्य लिखने का आरोप लगाया था। वैसे तौर से उनके उपन्यास नासरीन और बिमल उर्फ जाएं तो जाएं कहां को लेकर आपत्ति जताई थी। हालांकि हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष अशोक चक्रधर ने यह कहा कि अकादमी ने कभी आधिकारिक तौर पर कृष्ण बलदेव वैद को शलाका सम्मान देने या नहीं देने की बात नहीं कही।
वैद का लेकर हो रहे विवाद ने एक बार फिर साहित्य में अश्लीलता के सवाल को जीवित कर दिया है। यह सवाल सदियों पुराना है। साहित्य के जन्म के साथ ही इस तरह के विवाद उठने लगे। समय-समय पर इसे लेकर खूब हो-हल्ला मचा। प्रसिद्ध कथाकार पांडेय बेचन शर्मा उग्र के साहित्य को पंडित बनारसीदास चतुर्वेदी घासलेटी साहित्य मानते थे। उन्होंने इसके विरोध में व्यापक अभियान भी चलाया था और गांधीजी से भी इसकी शिकायत की थी। हालांकि गांधीजी को उग्र की रचनाएं अश्लील नहीं लगीं और उन्होंने क्लीन चिट दे दी। अश्लीलता का संबंध हमारी मानसिकता और परिवेश से है। हम जिस समाज में रह रहे हैं, जो इसके लिए अश्लील है, वह दूसरे समाज के लिए सहज हो सकता है। स्थिति इसकी उल्टी भी संभव है।
अगर लेखक की मानसिकता स्वस्थ और समाजपरक है तो उसमें अश्लीलता आ ही नहीं सकती है। ऐसा वर्णन पढ़कर पाठक उत्तेजित और यौनकांक्षी नहीं होगा, बल्कि उसके मन में घृणा और आक्त्रोश ही उत्पन्न होगा। अस्वस्थ मानसिकता का रचनाकार सेक्स और नग्न चित्रण केवल क्षणिक उत्तेजना के लिए करेगा। दूसरी ओर कुछ रचनाकार सस्ती लोकप्रियता और सनसनी फैलाने के लिए भी इस तरह का चित्रण करते हैं, लेकिन उनके लेखन को कोई स्थाई महत्व नहीं मिलता। इसके अलावा अश्लीलता समय सापेक्ष है। समय के अनुसार इसकी परिभाषा भी बदलती रही है। आज से चालीस-पचास पहले फिल्मों में जिन दृश्यों को अश्लील माना जाता है, आज उन्हें सहज मान लिया गया है।
चर्चित कथाकार भीमसेन त्यागी ने एक साक्षात्कार में कहा था कि अश्लीलता का प्रश्न उतना ही पुराना है, जितना साहित्य। वास्तव में अश्लीलता साहित्य में नहीं, बल्कि साहित्यकार की मानसिकता में होती है। अगर रचनाकार की मानसिकता स्वस्थ व समाजपरक है तो नग्न चित्रण भी अश्लील न होकर सार्थक और सही मायनों में साहित्य का उद्देश्य पूरा करने वाला हो जाता है। एलेक्जेंडर कुप्रिन का यामा-द-पिट इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। स्त्री-पुरुष का जैसा नग्न चित्रण इस उपन्यास में हुआ है, वैसा साहित्य में बहुत कम हुआ है। लेकिन इस नग्न चित्रण के बावजूद जो मानवीय संवदेना यामा-द-पिट में है, वह उसे विश्व की श्रेष्ठतम उपन्यासों की कतार में ला खड़ा करती है।
गोर्की की कहानी एक इंसान का जन्म में नग्न चित्रण है, लेकिन पाठक क्षणभर के लिए कहीं अश्लीलता अनुभव नहीं करता।
जगदम्बा प्रसाद दीक्षित की कहानी जिदंगी और गंदगी में भरपूर नग्नता होने के बाद भी लेशमात्र अश्लीलता नहीं है। निर्णायक बिंदू नग्नता नहीं, लेखक की मानसिकता है।

लेखक बडे़ मूल्यों के लामबंद हों : सेरा यात्री

स्त्री-पुरुष संबंधों के बारे में हर कोई जानता है। अब तो बच्चे भी इस बारे में जानने लगे हैं। यदि लेखक सेक्स का वर्णन रसलोलुप होकर करता है तो वह अश्लील है। यदि मर्यादा में रहकर वर्णन किया जाता है तो वह अश्लील नहीं है।
अश्लीलता का सबसे अधिक आरोप मंटो पर लगा है। वेश्याओं का वर्णन उनकी रचनाओं में बहुत हुआ है। लेकिन उन्होंने ऐसा वर्णन नहीं किया कि जो पाठक के मन में यौन इच्छा या यौन उन्मुक्तता पैदा करता है।
अश्लीलता अगर लेखक का उद्देश्य ही बन जाए तो गलत है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण तस्लीमा नसरीन है। उन्होंने कैसे विभिन्न पुरुषों के साथ संभोग किया, कैसे इंज्वाय किया, इसका उल्लेख उनकी रचनाओं में है। इसे वह मुक्त सेक्स कहती हैं। उन्होंने लेखन से धर्म, भ्रष्टाचार, कुपोषण आदि के विरुद्ध जो संघर्ष किया है, वह इसके नीचे दब जाता है।
लेखक जब बडे़ मूल्यों से हटकर शरीर पर अटक जाता है तो उसकी रचना में अश्लीलता आ जाती है।
मान लिया कि कृष्ण बलदेव वैद की रचनाओं में अश्लीलता है। जब उनका नाम घोषित कर दिया और उनसे स्वीकृति ले ली तो हिंदी अकादमी का नैतिक दायित्व है कि उन्हें पुरस्कार दे। हाल ही में तेलुगु के लेखक के उपन्यास द्रोपदी को लेकर साहित्य अकादमी पुरस्कार समारोह में हंगामा हुआ। उनका नाम घोषित कर किया जा चुका था इसलिए विवाद के बाद भी उन्हें पुरस्कार दिया गया।
आज समाज में बडे़ मूल्यों के लिए संघर्ष खत्म हो गया है। लेखकों को इसके लिए लिए लामबंद होना चाहिए। जन साधारण की समस्याओं के लिए लेखक एकजूट हों। किसे पुरस्कार दिया गया, किसे नहीं, ये बहुत छोटी चीजें हैं। बड़ी बात समाज में हो रहे अनाचार के विरुद्ध एकजूट होकर संघर्ष करना है।

अश्लीलता का संबंध सोच से : कांतिकुमार जैन

अश्लीलता का संबंध हमारी मानसिकता, हमारे संस्कारों से है। हम सब अभी भी विक्टोरिया युगनी प्रूडरी से बाहर नहीं निकाल पाए हैं। कहते हैं कि विक्टोरिया के समकालीन कुलीन लोग अपने ड्ाइंग रूम की मेजों को मेजपोश से ढककर रखते थे ताकि तेज की नंगी टांगें आगंतुकों की आंखों से ओझल रही जाएं। हम अभी तक इसी मानसिकता से ग्रस्त हैं। डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी ने निराला के प्रसिद्ध गीत दूर देश की वामा, आए मंद चरण अभिरामा, उतरे जल में अवसन श्यामा, अंकित उरछवि सुंदरतर हो की प्रशंसा करते हुए लिखा कि निरालाजी इस गीत में अवसन के स्थान पर नंगी कर देते तो न छंदोभंग होता, न यति टूटती पर गीत अश्लील हो जाता। अर्थात् अश्लील अवसन शब्द नहीं है। अश्लील नंगा शब्द है। अभिजनोचित, सुरुचिपूर्ण सभ्य होने का दर्प। हमें देखो, हम कितने संस्कृत हैं, तुम कितने असंस्कृत। तुम्हारें पांव पांव, हमारे पांव चरण वाली मानसिकता।
कालिदास ने मेघदूत में तन्वीश्यामा शिखरिदशना वाले प्रसिद्ध छंद में स्तन भर शब्द का इस्तेमाल किया है। इसका छत्तीसगढ़ अनुवार क्या हो? छत्तीसगढ़ में स्त्री के बडे़-बडे़ स्तनों को थन कहना आम है। दाई रे, ओकर कतेक बडे़-बडे़ थन हवै। छायावाद के वरिष्ठ कवि मुकुटधर पांडेय ने मेघदूत के अपने छत्तीसगढ़ अनुवाद में लिखा-
झुके थोरकुन थनभारा ले, कूला हर गरुवावै
तेकर कारन आलस मा वे जल्दी चले न पावै
कालिदास के स्तन भार को किसी ने अश्लील नहीं कहा था, किंतु छत्तीसगढ़ में इस अनुवाद के कारण मुकुटधर जी पर भारी आरोप लगे। देववाणी में जो अश्लील नहीं है, हिंदी में या उसकी बोलियों में अनुदित होते ही वह अपनी श्लीलता खो देता है। पाण्डेय जीने इस आरोप पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए बडे़ दुख से मुझे लिखा था, मेघदूत के छत्तीसगढ़ अनुवाद को लेकर मुझ पर छींटाकशी शुरू हो गई है। निस्संदेह मेघदूत में एकाध स्थान पर नग्नताई पाई जाती है, अभी हम नेकेड और न्यूड का अंतर नहीं समझ पाएं हैं। खैर, आलोचना महाकवि की समझी जाएगी, मैं तो मात्र आलोचक हूं।
लेखक के चर्चित लेख- अश्लीलता का हिंदी चेहरा का अंश

बहुरूपिया किताबें

विश्व पुस्तक मेला

किताबों के बीच में मुझे सदा ही सुकून मिलता है। यदि किताबें नहीं होतीं तो हमारी क्या स्थिति होती, यह सोचकर ही झुरझुरी-सी होती है। दुनिया का जितना विकास हुआ और ज्ञान-विज्ञान का प्रचार-प्रचार हुआ है, वह कभी नहीं हो पाता।
जब मैं किसी के व्यवहार से व्यथित होता हूं तो किताबें मुझे समझाती हैं कि मैं व्यक्ति के व्यवहार पर नहीं, मनोवृत्ति पर ध्यान दूं। मैं सोचूं कि यह मनोवृत्ति आई कहां से। इसे बदलने के लिए क्या कर सकता हूं? जब मुझे असफलता मिलती है तो किताबें सबल देती हैं। दुनिया के छल-प्रपंच देखता हूं तो किताबें सच्चे दोस्त सी लगती हैं, जो कुछ भी नहीं छिपातीं। मन उदास होता है तो कोई किताब पढ़ता हूं और उदासी दूर छिटक जाती है। दुनिया में राजनीतिक या सामाजिक परिवर्तन हुए हैं, उनके पीछे किताबें रही है। किताबों को क्या कहूं, मैं यह समझ नहीं पाता। कभी एक अच्छे मित्र की तरह लगती हैं तो कभी दादी-नानी की तरह। कभी ज्ञान के खजाने का आभास देती हैं तो कभी इनसे शक्ति मिलती हैं। मुझे तो किताबें बहुरूपिया लगती है।
इन बहुरूपियों से मिलने जा प्रगति मैदान में चल रहे विश्व पुस्तक मेले में गया। यह ठीक है कि वहां पर ट्रेड फेयर और ऑटो एक्सपो की तरह मारा-मारी नहीं है। इस हिसाब से चहल-पहल कम है। फिर भी, दिल्ली और आसपास के नोएडा, गाजियाबाद, फरीदाबाद, गुडग़ांव से ही नहीं बिहार, मध्य प्रदेश आदि राज्यों से भी बड़ी संख्या में लोग आ रहे है। छोटे बच्चों से लेकर बड़े-बूढ़े तक किताबों की दुनिया में खोए हुए हैं। मनपसंद किताब की चाह में विकलांग भी स्टालों को छान रहे हैं। यह किताबों का आकर्षण नहीं है तो क्या है?
प्रकाशक सामान्यत: किताबों की बिक्री के लिए लाइब्रेरियन को कमीशन और सरकारी अधिकारियों को घूस के रूप में हाईबाउंड पर 45 और पेपरबैक्स पर 33 फीसदी तक दे रहे हैं। इसलिए भी किताबों की कीमतों में अनाप-शनाप वृद्धि की जा रही है। पुस्तक मेले में केवल 10 प्रतिशत कमीशन दिया जा रहा है। यहां न किसी को कमीशन देना है और न ही घूस। प्रकाशक हार्डबाउंड पर 35 और पेपरबैक्स पर 25 फीसदी तक कमीशन दें तो बिक्री बढ़ेगी।
बड़ी कंपनियां अपने प्रोडेक्ट के दाम बेतहाशा बढ़ाती हैं तो उन पर 80 प्रतिशत तक का कमीशन भी दे देती हैं। जब प्रकाशकों ने किताबों के दाम मनमर्जी बढ़ाए हुए हैं तो वे क्यों नहीं इस तरह की नीति अपनाते। वे क्यों सरकारी खरीद और लाइब्रेरी में पुस्तकों को खपाने पर निर्भर रहना चाहते हैं। पेंगुइन के स्टाल पर कुछ किताबों पर एक के साथ एक फ्री का ऑफर है। इस तरह के प्रयोग स्वागत योग्य है।
वरिष्ठ साहित्यकार और संपादक पंकज बिष्ट का मानना है कि सरकार किताब के लिए जो मदद करती है, वह सीधे पाठक को जाए, न कि प्रकाशक को। जैसे- खादी पर सरकार छूट देती है। ग्राहक परचेच करता है तो उसे मिलती है। इसी प्रकार किताबों पर छूट मिले।
सरकार प्रकाशकों को सीधे छूट देने की बजाए यह नीति अपना ले कि देश में लगने वाले पुस्तक मेलों में बिकने वाली हर पुस्तक पर छूट दी जाएगी तो निश्चित तौर से बिक्री बढ़ेगी। मेले के आयोजनों की संख्या भी बढ़ाई जाए और आयोजन भी केवल एक ही जगह ने हों। देश के कोने-कोने को कवर किया जाए। किताबों को जनसुलभ बनाने का हर स्तर पर प्रयास जरूरी है। जितनी ज्यादा किताबें बिकेंगी, लेखक और पाठक का तो भला होगा ही प्रकाशक भी लाभ में रहेंगे। किताबों की चाहत कम नहीं हुई है। जरूरत पाठकों तक सही मूल्य पर पहुंचाने की है।
मैं मेले से निकल रहा हूं। चाहकर भी बहुत-सी किताबें नहीं खरीद पाया हूं क्योंकि अभी तक तनख्वाह नहीं मिली है। यह टीस अधिकांश लोगों की है। कुछ विभागों को छोड़कर अधिकांश कर्मचारियों को सात तारीख या इसके बाद ही तनख्वाह मिलती है। इसलिए कई पुस्तक प्रेमियों को उधार लेना पड़ा।
पुस्तक मेले का आयोजन आम आदमी के लिए होता है। इन दिनों उसका सबसे अधिक हाथ तंग रहता है। आयोजकों ने इसका जरा भी ख्याल नहीं रखा। इससे भी किताबों को बिक्री पर असर पड़ रहा है। जब मेला खत्म हो रहा है, यदि तब शुरू हुआ हो तो स्थिति बेहतर होती। 

किताब बिन कैसा जीवन

वरिष्ठ लेखक शेखर जोशी– किताबें आदमी को दिशा देती हैं। एक तरह से अनुपस्थित गुरु की तरह हैं। वे हमें ज्यादा संवेदनशील और विवेकशील बनाती हैं। किताबों के माध्यम से दूसरों के अनुभव और ज्ञान हम तक पहुंचता है। हम उससे सीखते हैं। जैसे- रुसी लेखक मक्सिम गोर्की की आत्मकथा पढ़कर जीवन में आत्मविश्वास पैदा होता है। गांधीजी की आत्मकथा पढ़कर साफ बात कहने की सीख मिलती है।
सुप्रसिद्ध आलोचक मधुरेश– किताबों के बिना अपने जीवन की कल्पना करते हुए डर लगता है। लंबे थकाने वाले सफर के बीच अच्छी किताब ठंडे पानी के गिलास या ताजा हवा के झौंके की तरह लगती हैं।
चर्चित संस्मरणकार कांति कुमार जैन– पुस्तकें इतिहास को हमारा अंतरंग बनाती हैं और भूगोल को हमारा पड़ोसी। पुस्तकें हमें समझदार और संवदेनशील बनाती हैं। जो पुस्तकों से हाथ मिलाते हैं, वे कभी अकेले और अवसादग्रस्त नहीं होते। जो पुस्तकों को दोस्त बनाते हैं और उनके साथ रहते हैं, वे खुशकिस्मत होते हैं।
प्रसिद्ध कवि चंद्रकांत देवताले– भाषा मुनष्य की प्रकृति की सबसे बड़ी देन है। इस भाषा का सार किताबों में संग्रहित है। हमारे अनुभव और विकास की दिशा की तमाम मंत्रणा किताबों में छिपी है। किताबों के कारण हम आदमी हैं। जैसे मां से प्रेम करते हैं, वैसे ही किताबों से करें तो कभी गरीब और कमजोर नहीं समझेंगे अपने को। भाषा के कारण ही समाज में रहते हैं, वरना जंगल में बसेरा होता। 

पुस्तक

मुझको तो पुस्तक तुम सच्ची
अपनी नानी/दादी लगती
ये दोनों तो अलग शहर में
पर तुम तो घर में ही रहती

जैसे नानी दुम दुम वाली
लम्बी एक कहानी कहती
जैसे चलती अगले भी दिन
दादी एक कहानी कहती
मेरी पुस्तक भी तो वैसी
ढेरो रोज कहानी कहती

पर मेरी पुस्तक तो भैया
पढ़ी लिखी भी सबसे ज्यादा
जो भी चाहूँ झट बतलाती
नया पुराना ज्यादा ज्यादा
एक पते की बात बताऊँ
पुस्तक पूरा साथ निभाती
छूटे अगर अकेले तो यह
झटपट उसको मार भगाती

मैं तो कहता हर मौके पर
ढेर पुस्तकें हमको मिलती
सच कहता हूँ मेरी ही क्या
हर बच्चे की बाँछे खिलती

नदिया के जल सी ये कोमल
पर्वत के पत्थर सी कडय़ल
चिकने फर्श से ज्यादा चिकनी
खूब खुरदरी जैसे दाढ़ी

 (चर्चित कवि दिविक रमेश की कविता)

साहित्य अकादेमी का कारपोरेटाइजेशन

केंद्रीय साहित्य अकादेमी और कोरिया की मल्टीनेशनल कंपनी सैंमसंग इंडिया के बीच हुई जुगलबंदी से लेखकों में आक्रोश है। अकादेमी साहित्य का गठन 12 मार्च, 1954 को भारत सरकार द्वारा किया गया था। इसका उद्देश्य भारतीय भाषाओं और भारत में होनेवाली साहित्यिक गतिविधियों का पोषण और समन्वय करना है। अकादेमी के इतिहास में पहली बार कोई मल्टीनेशनल कंपनी पुरस्कार प्रायोजित कर रही है। सैंमसंग इंडिया ने आठवीं अनुसूची में शामिल सभी भाषाओं को पुरस्कार देने की घोषणा की है। प्रत्येक वर्ष आठ भारतीय भाषाओं को चुना जाएगा। इस तरह से प्रत्येक भाषा का तीन साल बाद नंबर आएगा। इस वर्ष बांग्ला, गुजराती, हिंदी, कन्नड़, कश्मीरी, पंजाबी, तेलुगु और बोडो भाषाओं के लेखकों को सम्मानित किया जा रहा है। पुरस्कार कोरियाकी प्रथम महिला द्वारा पंच सितारा होटल ओबेराय में 25 जनवरी को दिया जाएगा। यह पुरस्कार गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की स्मृति में दिया जा रहा है। आयोजन साहित्य अकादेमी के बैनर के नीचे हो रहा है, यही विवाद की जड़ है। कई लेखकों ने समारोह के बहिष्कार का मन बना लिया है। उन्होंने इसकी घोषणा भी कर दी है। इनमें साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्राप्त लेखक भी हैं। सुप्रसद्धि साहित्यकार नामवर सिंह, कृष्णा सोबती, मैनेजर पांडेय, मुरली मनोहर प्रसाद सिंह और विश्वनाथ त्रिपाठी आदि इस पुरस्कार का विरोध कर चुके हैं। Read more