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बच्चों को कहानियाँ क्यों सुनाएँ : संजीव ठाकुर

कि‍स्‍से-कहानि‍यों के माध्‍यम से बच्‍चों को वि‍ज्ञान की बातें बताते देवेंद्र मेवाड़ी।

एक समय ऐसा था, जब सभी व्यावसायिक पत्र-पत्रिकाओं में बच्चों के लिए नियमित पृष्ठ हुआ करते थे और उनमें कविताएं, कहानियां नियमित रूप से छपा करती थीं,  लेकिन जब बाजार के राक्षसी कदम पत्र-पत्रिकाओं की ओर बढ़ने लगे, तब उन कदमों ने सबसे पहले साहित्य के पन्नों को रौंदा और उसके बाद बच्चों के पन्नों को। बाजार के कदमताल के कुछ वर्षों बाद समीक्षा के रूप में साहित्य की थोड़ी-बहुत वापसी हुई भी लेकिन बच्चों के पृष्ठ न जाने किस गुफा में कैद कर दिए गए? कुछ अखबारों में बच्चों के पेज शुरू भी हुए तो उनका हाल यह रहा कि विज्ञापनों से बचे-खुचे किसी कोने में कोई बाल-कविता लग गई या हँसी की फुलझड़ियां छोड़ दी गईं। कुछ पारंपरिक अखबारों ने बच्चों के लिए कोई कोना जारी रखा भी तो वहां दृष्टिविहीन कथा-कविताओं की भरमार दिखाई पड़ती रही। कुछ मंझोले अखबारों ने बच्चों के लिए धूम-धाम से पृष्ठ भी निकाले तो वहां कहानियों के लिए कोई जगह नहीं थी। वहां था- रास्ता ढूंढ़़ो पहेलियां बूझो, गलतियां खोजो, वर्ग-पहली, पर्यावरण, क्विज कम्प्यूटर, खाना-पीना, सुडोकी निन्टेंडो, एस.एम.एस.! बच्चों के मनोरंजन करने और उन्हें सिखाने के अथाह सामान! नहीं थी तो बस कविता, कहानी। क्योंकि आधुनिक ‘बाल-गुरुओं’ को लगता है कि कविताएं एवं कहानियां महज अखबारों के पृष्ठ घेरने का काम करती हैं, बच्चों को तमाम तरह के ज्ञान से वंचित करने वाली होती हैं। दरअसल ऐसे संपादकों, उपसंपादकों को इस बात का पता ही नहीं होता कि कविताओं और कहानियों की बाल-शिक्षण में क्या भूमिका होती है? क्या वे यह भी नहीं जानते कि सीधे-सीधे उपदेश देने की बजाय बच्चों को कहानियां के जरिए कुछ सिखाना ज्यादा आसान होता है? क्या बच्चों का पृष्ठ देखने वाले उप-संपादकों को बच्चों के बारे में कोई जानकारी होती है? क्या उन्होंने बाल-शिक्षण से जुड़े टॉलस्टाय, वसीली सुखोम्लीन्स्की, ए.एस.नील., जॉन होल्ट, महात्मा गांधी, गिजुभाई, रवीन्द्रनाथ आदि के विचार पढ़ रखे हैं? क्या उन्हें इस बात का अनुभव है कि 21वीं सदी की गतिमय जिन्दगी में भी बच्चों को कहानियां सुनना-पढ़ना कितना अच्छा लगता है? राजा, रानी, परी, राक्षस, बौने, पशु-पक्षी आदि के माध्यम से कही गई कहानियां किस तरह बच्चों को कल्पना की दुनिया में ले जाती हैं और उन्हें कल्पनाशील बनाती हैं, इस बात की जानकारी उन्हें है? नहीं, वे तो बच्चों को कल्पना की दुनिया से बाहर लाकर कम्प्यूटर की दुनिया में लाना चाहते हैं। परियों की दुनिया से बाहर लाकर सुडोकी खिलवाना चाहते हैं, पशु-पक्षियों से बातें करने की बजाय मोबाइल से जोड़ना चाहते हैं।

पत्र-पत्रिकाओं के संपादकों ने क्या गिजुभाई की लिखी किताब ‘दिवा स्वप्‍न’ पढ़ रखी है? ‘दिवा स्पप्‍न’ के शिक्षक लक्ष्मीशंकर की शिक्षा से कितने लोग इत्तेफाक रखते हैं? पढ़ाने के बदले कक्षा में कहानियां सुनाने वाले लक्ष्मीशंकर क्या पागल थे? कहानियों के द्वारा ‘भाषा पर काबू’, ‘वार्ता-कथन’ ‘रुचि का विकास’, ‘स्मृति-विकास’, ‘अभिनय’ आदि की शिक्षा देने वाले लक्ष्मीशंकर पागल कैसे हो सकते हैं?

कितनों को पता है कि विश्व प्रसिद्ध साहित्यकार लेव तोलस्तोय किसानों  के  लिए स्कूल चलाते थे और शिक्षा के लिए पारंपरिक तरीके नहीं अपनाते थे? बच्चों के लिए उन्होंने ‘लेव तोलस्तोय का ककहरा’ और ‘काउंट तोलस्तोय का नया ककहरा’ जैसी किताबें लिखी थीं, जिनमें छोटी-छोटी कहानियों के जरिए बड़ी-बड़ी बातें सिखलाने की क्षमता थी। समुद्र से पानी कहां जाता है? हाथी मनुष्य का गुलाम कैसे बना? शेखी बघारना क्यों गलत है? पढ़-लिखकर अपनी मातृभाषा भूल जाना कितना गलत है? सोने वाला चीजों को कैसे खो देता है? इस तरह की अनेक गंभीर बातों को सिखलाने के लिए तोलस्तोय ने जो माध्यम चुना, वह कहानियों का ही माध्यम था।

रूस के ही शिक्षाविद् वसीली सुखोम्लीन्स्की मानते थे कि ‘कथा कहानियां, खेल, कल्पना- यह बाल चिंतन का, उदात्त भावनाओं और आकांक्षाओं का जीवनदायी स्रोत है।’ वसीली का तो यह भी मानना था कि ‘‘कथा कहानियों में भलाई और बुराई, सच्चाई और झूठ, ईमानदारी और बेईमानी के जो नैतिक विचार निहित होते हैं, उन्हें इंसान केवल तभी आत्मसात करता है, जबकि ये कथा-कहानियां बचपन में पढ़ी गई हों।’’

यानी कहानियां सुन-पढ़कर बच्चे जीवन के कई मूल्यों को अनायास सीखते-चलते हैं। ‘सदा सच बोलना चाहिए’, ‘ईमानदारी सर्वोत्तम नीति है’, ‘बड़ों का सदा आदर करना चाहिए’, ‘दूसरों की मदद करनी चाहिए’ आदि मूल्य रटाकर हम बच्चों को सही रास्ते पर नहीं ला सकते, लेकिन जब कोई बच्चा किसी कहानी में सुनता है कि किसी परेशान चींटी की सहायता उसके मित्रों ने किस तरह की तो उसके मन में मदद करने का भाव खुद पैदा हो जाता है।  इसी तरह बच्चा अगर सुनता है कि दुष्ट कौए का अंत कैसे हुआ तो वह खुद सीख जाता है कि दुष्टता बुरी चीज़ है। इस समय के प्रसिद्ध शिक्षाविद् कृष्ण कुमार की सुनें तो, ‘‘बहुत गंभीर विपदाओं के कल्पनाशील और न्यायसंगत हल इन कहानियों की संरचना में गुंथे होते हैं। मनुष्य की सामाजिकता और प्रकृति की चुनौती इन कहानियों की अंतर्धारा होती है।’’

यह ठीक है कि समय बदल गया है और आज के बच्चे कम्प्यूटर, मोबाइल, हवाईजहाज के युग में जी रहे हैं। इस लिहाज से उन्हें नई से नई बातें बताई जानी चाहिए। लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं होना चाहिए कि हम बच्चों को बैलगाड़ी, चापाकल या पोस्टकार्ड के बारे में नहीं बताएं? मॉल या मल्टीप्लेक्स के जमाने में हाट, मेले और मैदान में दिखाए जाने वाले सिनेमा के बारे में न बताएं? उसी तरह क्विज, सुडोकी और एस.एम.एस. के जमाने में कविताओं और कहानियों की बात न करें? कृष्ण कुमार के शब्दों में सच तो यह है कि ‘‘परिवार और समाज की नई परिस्थितियों में बच्चों को कहानी सुनाने की उतनी ही जरूरत है जितनी पहले थी।’’ बल्कि आज कहानियों की कुछ अधिक ही आवश्यकता है। अपने बच्चों को टी.वी. से अलग रखने के लिए भी कहानियों की आवश्यकता है। रंग-बिरंगी कहानियों की किताबें बच्चे को थोड़ी देर के लिए टी.वी. से अलग कर कहानियों की दुनियों में तो ले ही जा सकती हैं?

कुछ विज्ञान संपादक जो कृपापूर्वक बाल कहानी किसी कोने में छाप देते हैं,  नई तरह की कहानियों की मांग करते हैं। यानी ऐसी कहानियां जिनसे बच्चों को कम्प्यूटर, मोबाइल, ई-मेल, नेट आदि की शिक्षा दी जा सके। ‘राजा-रानी’ परियों वाली कहानियां से उन्हें सख्त़ परहेज होता है। उन्हें क्या रूसी शिक्षाविद् और बाल-साहित्यकार कोर्नेइ चुकोव्सकी के बारे में पता है, जो परीकथाओं और लोककथाओं के कटृर समर्थक थे? जिन्होंने कोर्नेइ का नाम नहीं भी सुना है, वे अपने घर में ही एक प्रयोग करके देख लें। अपने बच्चे को कोई परीकथा या लोककथा सुनाएं, फिर कोई आधुनिक कहानी और बच्चे से पूछें कि उन्हें कौन सी कहानी अच्छी लगी? यही नहीं, इस तरह का एक सर्वे ही कर लें तो सच्चाई का पता चल जाएगा।

वैसे दोष चंद संपादकों या उपसंपादकों का ही नहीं है। हमारा समाज जिस रफ्तार में आगे बढ़ रहा है, उस रफ्तार में बच्चों को सिखाने और हर जगह अव्वल बनाने की होड़ सी चल पड़ी है। यही वजह है कि बच्चों को गणित में पारंगत बनाने के लिए उन्हें ‘एबैकस’ की कक्षाओं में भेजा जा रहा है। कहानियों या कविताओं के द्वारा कुछ सिखाने का न तो माता-पिता के पास समय है, न धैर्य। फिर अखबार वालों के पास धैर्य कहां से आएगा? वहाँ तो और भी तेजी से धरती घूम रही है।

समय अभी भी है। अभिनेता-अभिनेत्रियों की रंग-बिरंगी तस्वीरों, उनके रोज-रोज बदलते प्रेमी-प्रेमियों और आने-जाने वाली फिल्मों से अटे रहने वाले अखबारों में थोड़ा ‘स्पेस’ निकाला जा सकता है और बच्चों के लिए नई-पुरानी हर तरह की कहानियों और कविताओं को छापा जा सकता है। अपने लिए ‘स्पेस’ देखकर तब बच्चे भी अखबारों से जुड़ सकते हैं।

और दिलबर नठ गया : चिन्तामणि जोशी

चिंतामणि जोशी

चिंतामणि जोशी

अचानक उसका हाथ पेंट की पिछली जेब में गया। फिर अन्य सभी जेबें देखीं। जैकिट की भीतरी जेब को टटोलते ही दो वर्ष की बेरोजगारी झेलने के बाद सरकारी स्कूल में मास्टर बनने की सारी खुशी एक ही क्षण में फुर्र हो गई। चौबीस साल का युवक दोनों हाथों से सिर पकड़ कर रास्ते के किनारे पड़े पत्थर पर बैठ गया। लतड़-पथड़-पस्त। तीन सौ किलोमीटर बस से एवं बारह और छः, अठारह किलोमीटर पैदल यात्रा की थकान अचानक एकमुश्‍त उसके सिर पर सवार हो गई और उसके पूरे शरीर को शि‍थिल कर दिया। उसने जल्दी-जल्दी अपनी सभी जेबें टटोलीं। जैकिट उतारकर स्वेटर को झटका। पीठ से पिट्ठू उतार कर अंदर देखा। उसका बटुआ कहीं नहीं था। स्मृति को टटोला। कल की रात उसने विद्यालय के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के घर पर गुजारी थी। स्थानीय चतुर्थ श्रेणी कर्मी, लेकिन आतिथ्य में नम्बर एक। आदमी गरीब, लेकिन दिल का अमीर। सुबह चार बजे विदा होते समय उसने चारपाई की बगल में रखे बक्से पर से अपनी घड़ी पहनी थी और बटुआ उठाकर पूरे होशो-हवास में अपनी जैकिट की अंदर की जेब के हवाले किया था। फिर वह दौड़ पड़ा था बारह किलोमीटर का पैदल पथ दो घंटे में तय कर छः बजे की बस पकड़ने के उद्देश्‍य से। आधी दूरी तय भी कर चुका था लेकिन…..

उसने घड़ी देखी। पांच बजने में पांच मिनट बाकी थे। बिना पैसे के दो दिन की तीन सौ किलोमीटर लम्बी यात्रा असम्भव थी। नया इलाका। न जान न पहचान। पौ फटने लगी थी। दूर उत्तर-पूरब की चोटियां रक्ताभ होने लगीं थीं। उतरते पथरीले रास्ते की छाया अब दूर तक दिख रही थी। निर्जन अकेला रास्ता। वापस चलना होगा। उसने पिट्ठू लटकाया। इसी रास्ते के किनारे कहीं पड़ा मिलेगा, उसका बटुआ। न हो तो महिपाल या सती मास्साब ही जाने तक की व्यवस्था उधारी में कर देंगे। वह दो कदम चढ़ा, लेकिन थके पैर उसे चार कदम पीछे खींच लाये। फिर से बैठ गया, सिर पकड़कर।

कल नियुक्ति की औपचारिकता पूरी करने के बाद सती मास्साब ने उसे लम्बा-चौड़ा भाषण पिला दिया था- ‘‘भाई जी! हम तो पांच साल से पड़े हैं, इस बीहड़ में। दूध-पानी, साग-भाजी कुछ नहीं मिलेगा। न बिजली, न सड़क, न अखबार। तीसरी दुनिया है। क्या करोगे, यहां नौकरी करके। वह भी एड-हॉक। इस बार तो लोग मात्र पांच सौ रुपए खर्च करके मनमाफिक जगह पर नियुक्ति पाए हैं। कल सामान लेने जा रहे हो, तो नैनीताल होते हुए चले जाओ। क्या पता अभी भी घर के नजदीक किसी जगह का जुगाड़ हो जाए। वरना इस गलती पर कई बरस पछताओगे।’’

वह पछता ही तो रहा था। काश! मास्साब का भाषण न हुआ होता तो वह सुबह यों हड़बड़ी में न भागता। पहले बीमार मां की तीमारदारी में ध्यान ही नहीं रहा कि नियुक्तियां भी हो रही हैं। नियुक्ति मिली तो घर से तीन सौ किलोमीटर दूर वह भी एट द इलेवन्थ आवर। सोच रहा था, उसके साथ ही यह सब क्यों होता है। तभी उस शांत पथ पर एक किशोर बालक की आवाज गूंजी- ‘‘ ऊपर से पत्थर आ रहे हैं, भागो। ’’

पन्द्रह-सोलह वर्ष का वह किशोर उसका हाथ पकड़ कर खींचे लिये जा रहा था। अगले मोड़ पर जब दोनों रुके, तब तक पत्थरों का एक रेला गड़गड़ाते, धूल उड़ाते हुए ऊपर से आकर पहाड़ी की तलहटी में बहती नंदाकिनी नदी में समा गया था।

‘‘ साब, मैं अभी न आता तो आज आप बचते नहीं। आप इस इलाके के तो नहीं हो। यहां पर तो लगातार पत्थर गिरते रहते हैं। ऊपर देखकर नीचे भागना पड़ता है। आप हैं कि सिर देकर बैठे हैं।’’ उसकी आंखों में भोलापन, घबराहट, संदेह, जिज्ञासा जाने क्या-क्या था।

पत्थरों का अचानक आया रेला तो धड़धड़ाता हुआ नदी में समा गया था, लेकिन वह अब भी अपने अंदर की धड़धड़ को संयत करने का प्रयास ही कर रहा था। बाप रे बाप। बड़ी अनहोनी शायद टल गई थी।

‘‘धन्यवाद बेटे।’’ उसने कहा, ‘‘ तुम तो देवदूत बनकर आए। मैं कल ही ऊपर गांव के हाई स्कूल में आया था। नया मास्टर बनकर। अपने घर वापस जा रहा हूं, सामान लाने…।’’

बच्चे के चेहरे पर आश्चर्य मिश्रित प्रसन्नता के भाव आए। अंदर शायद कहीं सम्मान के किसी टुकड़े ने हिचकोला खाया।

‘‘ प्रणाम गूरजी…मैं दिलबर…गांव के स्कूल में नौ में पढ़ता हूं…मैं भी बाजार जा रहा…चलो… साथ चलते हैं…।’’ बच्चे ने मास्साब का पिट्ठू उठा लिया।

‘‘ मगर मैं तो वापस जा रहा हूं…स्कूल को।’’

‘‘ क्यों? ’’

‘‘ दरअसल, मेरा बटुआ हड़बड़ी में कहीं गिर गया है, रास्ते में। ’’

दिलबर के चेहरे पर कई भाव एक साथ आने-जाने लगे। वह कभी अजनबी मास्टर की तरफ देखता, कभी जमीन को घूरने लगता। फिर उसने जेब से एक काले रंग का बटुआ निकाला और मास्टर की तरफ बढ़ाते हुए पूछा, ‘‘यह है? ’’

‘‘ अरे, हां। तुम्हें कहां मिला?’’ मास्साब ने उसके हाथ से बटुआ झपट लिया और सीने से ऐसे लगाया मानो निकलते हुए प्राण वापस चेप रहे हों।

‘‘ धन्यवाद दिलबर, मैंने तो तुम्हें एक भी पाठ नहीं पढ़ाया अभी,  लेकि‍न तुमने पहले ही मुझे गुरु दक्षिणा दे दी।’’ कहते हुए मास्साब ने बटुआ संभाल कर अपनी जेब के हवाले कर दिया।

‘‘ देख लो साब, ग्यार सौ तीस रुपये हैं। फिर कहोगे…।’’ अजीब से भाव आए थे, दिलबर के चेहरे पर।

‘‘अरे, नहीं यार। ’’ मास्साब ने बटुआ उसके सामने खोलते हुए सौ-पचास के नोटों पर यों ही हाथ फेरते हुए कहा।

‘‘ ठीक है। चलो चलते हैं।’’ बटुआ मिलते ही मास्साब के शि‍थिल शरीर में पुनः ऊर्जा का संचरण हो चुका था। उन्होंने दिलबर के हाथों से अपना पिट्ठू ले लिया।

दिलबर के साथ गपशप में बची हुई छः किलोमीटर की पैदल यात्रा कब पूरी हुई मास्साब को पता ही नहीं चला। उन्होंने दिलबर से इलाके और विद्यालय के बारे में तमाम जानकारी भी प्राप्त की। चहकती और बहकती कई बातों से कई बार मास्साब को लगा कि दिलबर कक्षा नौ में पढ़ने वाला सामान्य बच्चा नहीं है। दिलबर ने बताया था कि उनके स्कूल में कई साल से गणित, विज्ञान और अंग्रेजी के अध्यापक आए ही नहीं। चार गुरुजी में से तीन ही एक बार में स्कूल में रहते हैं। दूर का स्कूल हुआ। एक गुरुजी घर जाते हैं, बारी-बारी से। मास्साब ने वादा किया कि अगले सोमवार से वह उन्हें अंग्रेजी के साथ गणित और विज्ञान भी पढ़ाएंगे। दिलबर की तो हिन्दी और सामान्य अध्ययन में भी मदद करेंगे। मास्साब दिलबर की ईमानदारी से बहुत प्रभावित हुए। अब इस अति पिछड़े इलाके में सेवा करने का भाव उनके मन में मजबूती लेने लगा। स्थान परिवर्तन का प्रयास उन्हें व्यर्थ लगने लगा। उनके मन में कुछ योजनाएं आकार लेने लगीं। स्टेशन पहुंच कर बस में बैठते हुए पचास रुपये का एक नोट बटुए से निकाल कर दिलबर की तरफ बढ़ाते हुए मास्साब ने कहा, ‘‘बेटे! मैं और क्या दे सकता हूं तुम्‍हें, फिर भी…। ’’

‘‘नहीं, गूरजी नहीं।’ ’कहते हुए दिलबर सामने की गली में भागता चला गया।

नौकरी सरकारी थी, लेकिन पक्की नहीं। एक महीने का नोटिस या एक महीने का वेतन देकर कभी भी सेवा समाप्ति की शर्त थी, नियुक्ति पत्र में। लेकिन पहले विद्यार्थी से यह मुलाकात और संवाद कोई सामान्य बात नहीं थी। अंतिम बार जब दिलबर से नजरें मिली थीं, तो मास्साब को उसकी आंखों में अनेक डूबते-उतराते प्रश्‍न दिखे थे। एक उपेक्षा का भाव भी था, जो उन्हें पच नहीं पा रहा था। चालक ने एक लम्बा हॉर्न बजाया और बस छोटे से स्टेशन को छोड़कर घूं…घूं करती हुई पहाड़ी पर चढ़ने लगी। नन्हा दिलबर सहयात्री बनकर बैठ गया था मास्साब के मन-मस्ति‍ष्‍क में। उसकी बातें रास्तेभर उन्हें रह-रहकर याद आती रहीं।

अगले सोमवार को रोजमर्रा की आवश्यकता का हल्का-फुल्का सामान लेकर मास्साब अपने विद्यालय पहुंचे। प्रातःकालीन प्रार्थना सभा में उनकी आंखें दिलबर को ही तलाश रहीं थीं, लेकिन वह नहीं दिखा। मास्साब ने परिचय संबोधन में बच्चों से कहा कि वह बच्चों के साथ बच्चा बनकर ही रहेंगे और उनकी प्रत्येक समस्या का समाधान करने का प्रयास करेंगे। अंग्रेजी के साथ गणित-विज्ञान भी उन्हें पढ़ाएंगे। बच्चों को उनसे डरने की जरूरत नहीं। उन्हें अपना दोस्त समझें। अपने मन की बातें कहें। जितने अधिक चाहें, प्रश्‍न पूछें। किसी तरह की डर या झिझक महसूस न करें। अच्छे बच्चे जिज्ञासु होते हैं और प्रश्‍न पूछते हैं। जो बच्चे पूछते हैं, वही सीखते हैं। सीखने की शुरुआत ही प्रश्‍न से होती है। ऐसा नहीं कि शि‍क्षक के पास हर प्रश्‍न का उत्तर हमेशा उपलब्ध होता है। ऐसे बहुत सारे प्रश्‍न होते हैं, जिनके उत्तर शि‍क्षकों को भी पता नहीं होते हैं। लेकिन आप-हम मिलकर उन प्रश्‍नों के उत्तर तलाश करने की कोशि‍श करेंगे। उत्तरों की तलाश करते हुए ही तो हम बहुत कुछ सीखते जाते हैं और यही ज्ञान है। ज्ञान पहले से तैयार कोई माल नहीं है, बल्कि इसी तरह उसका सृजन होता है। प्रश्‍न ही हैं, जो  ज्ञान सृजन की खिड़की को खोलते हैं। इसलिए प्रश्‍नों का हमेशा स्वागत रहेगा। मास्साब की बातें सुन बच्चों के चेहरों में एक अलग सी चमक छा गई। शि‍क्षकों के बीच खुसर-पुसर शुरू होने लगी थी।

मास्साब को कक्षा नौ की कक्षाध्यापकी सौंपी गई थी। पहले वादन में उन्होंने कक्षा में जाकर उपस्थिति ली।

‘‘ महिधर प्रसाद ’’

‘‘ येस सर ’’

‘‘ खुशाल सिंह ’’

‘‘ येस सर ’’

‘‘ दिलबर सिंह ’’

‘‘ …………………. ’’

‘‘ दिलबर सिंह ’’ मास्साब ने जोर से दोहराया।

‘‘ नठ गया।’’ पीछे के बेंच से दबी-सी आवाज आई।

‘‘ नठ गया मतलब? ’’ मास्साब ने पीछे बैठे बच्चे से पूछा।

महिधर ने खामोशी से सिर झुका लिया। अन्य बच्चे भी खामोश हो गए। मास्साब ने हाजिरी पूरी की और पहले दिन का पहला कक्षा शि‍क्षण प्रारम्भ किया। पहला दिन बच्चों के साथ जान-पहचान में ही बीत गया। यद्यपि दिलबर कई बार मास्साब के मानस पटल पर आता-जाता रहा, लेकिन उन्होंने किसी से कुछ पूछा नहीं।

यह बात लोगों को पता चल चुकी थी कि नये मास्साब हैं तो अंग्रेजी के, लेकिन गणित-विज्ञान भी पढ़ाएंगे। महिधर के पिता गिरधर तिवारी अभिभावक संघ के अध्यक्ष थे और पूर्व सैनिक भी। उन्होंने बेटे की पढ़ाई की गरज से तुरत-फुरत अपने मकान में मास्साब के रहने की व्यवस्था कर दी। बच्चे स्कूल से एक टेबल और दो कुर्सी भी ले आए। आज पहला ही दिन था। तखत पर अपना बिस्तर फैलाकर मास्साब ने महिधर के घर पर ही भोजन किया। इस बीच जान-पहचान की छुटमुट बातें भी होती रहीं। महिधर के पिता ने बताया कि महिधर कक्षा एक से आठ तक लगातार कक्षा में दूसरे स्थान पर रहता आया है। अब मास्साब के साथ रह कर पढ़ाई करेगा तो पहला आया करेगा।

भोजन के बाद मास्साब कुर्सी लेकर आंगन में बैठ गए। पूर्णिमा की रात थी। चांद अपने पूरे शबाब पर था। गांव का स्कूल बसासत के अंतिम छोर पर था और स्कूल से ही लगा महिधर का मकान। ऊपर की ओर बांज का हरा-भरा जंगल और नीचे की ओर नदी घाटी तक फैले हुए छोटे-छोटे तोक। पत्थर की स्लेटों से ढकी घरों की छतें चांदनी में छोट-छोटे शीशे के चौकस टुकड़ों की तरह चमक रही थीं। मास्साब के मानस पटल पर रह-रह कर दिलबर की यादें और बातें टकरा रही थीं। तभी महिधर आकर सामने बैठ गया। सिर झुकाकर। मास्साब बतियाने लगे, ‘‘कहो महिधर! तो तुम दूसरे ही रहते हो कक्षा में। पहला कौन रहता है, भाई? ’’

‘‘ जी दिलबर। गूरजी! दिलबर चोर नहीं था।’’

‘‘ मैंने कब कहा? ’’ मास्साब चौंक पड़े।

‘‘ गुलाब सिंह सेठ ने शि‍कायत की कि दिलबर ने उसकी दुकान से दो सौ रुपये निकाल लिए। ’’

‘‘ अच्छा!’’

‘‘ सती मास्साब ने प्रार्थना में दिलबर की बहुत बेइज्जती की और बहुत मारा उसे। फिर सभी बच्चे भी दिल्वा रचो! दिल्वा रचो! कह कर हर समय उसे चिढ़ाने लगे। गुलाब सिंह सेठ सरपंच भी हैं। पंचायत ने बेचारे दिलबर के पिता पर पांच सौ रुपये का जुर्माना लगा दिया। उन्होंने बकरी बेचकर जुर्माना भरा और उस दिन दिलबर को खूब मारा।’’

‘‘ फिर क्या हुआ?’’ मास्साब के चेहरे में दुःख और आश्‍चर्य के मिश्रित भाव थे।

‘‘ उस दिन फीस डे था। दिलबर सुबह अंधेरे में ही मेरे घर आया। वह मेरा अच्छा दोस्त था। उसने खिड़की के पास आकर मुझे जगाया। एक कापी और पेन मांगकर वह अंधेरे में ही कुछ लिखने लगा। उसने अपने पिताजी के लिए चिट्ठी लिखी और पचास रुपये मुझे पकड़ाए और दिलबर नठ गया। गूरजी! डर के कारण मैंने चिट्ठी और रुपये छुपा दिए। किसी को नहीं बताया।’’

महिधर रुआंसा हो गया और चिट्ठी और रुपये मास्साब के हाथ में पकड़ाकर चला गया। मास्साब चन्द्रमा के मध्यम प्रकाश में चिट्ठी पढ़ने लगे-‘‘पिता जी! मुझे माफ कर देना। घर छोड़कर जाने के लिए मजबूर हुआ हूं। गुलाब सेठ अपने को बहुत बड़ा अंग्रेज समझता है। मैंने उसकी दुकान से एक कापी खरीदी थी। कापी अंदर से फटी निकली। मैं कापी लौटाने गया तो उसने  कहा, ‘‘ यू ब्लडी लेबर्स’ सन।’’ पिता जी यह अंग्रेजी में गाली होती है। मैंने भी उससे कह दिया, ‘‘ यू ब्लडी, युअर फादर ब्लडी।’’ उसने मुझे एक झापड़ मार दिया। मैं चुपचाप चला आया। मुझे दुःख है कि मेरी बात न आपने सुनी, न पंचायत ने। स्कूल में मास्साब ने भी नहीं। ऐसे गांव में रहकर, ऐसे स्कूल में फीस देकर पढ़ने से मैं क्या सीखूंगा। इसलिए फीस के पैसे भी वापस भेज रहा हूं। आपका दो महीने का तमाखू का खर्चा तो होगा। मुझे ढ़ूंढने मत आना। मैं बहुत दूर जा रहा हूं। आपका अभागा बेटा- दिलबर।

मास्साब चिट्ठी पढ़कर सन्न रह गए। लोग अपने-अपने घरों में दुबक चुके थे। गांव में शांति थी। गांव की सीमा से पहाड़ी की चोटी तक पसरा जंगल खामोश था। सीढ़ीदार खेत लमलेट थे। सिर्फ पहाड़ों से उतरकर ढलान पर बहती नंदाकिनी का शोर रात के सन्नाटे में कानों से टकरा रहा था। अचानक आसमान में चमकते चांद को एक काले बादल के टुकड़े ने आकर ढक लिया और पूरी घाटी स्याह हो गई। मास्साब अपने कमरे में जाकर तखत पर पसर गए। ज्यों ही नींद पास आती दिलबर की आवाज कान खींच देती, ‘‘ देख लो साब, ग्यार सौ तीस रुपये थे। फिर कहोगे…।’’

सुबह प्रार्थना स्थल पर खुद के द्वारा कही बातें बार-बार प्रश्‍न के रूप में उनके सामने खड़ी हो जा रही थीं। वह कुछ भी नहीं समझ पा रहे थे।

( चिंतामणि जोशी राजकीय इंटर कालेज टोटानोला, पिथौरागढ़ में अंग्रेजी के प्रवक्‍ता हैं। कविता और कहानी लिखते हैं। एक कविता संग्रह प्रकाशि‍त हो चुका है। वह दीवार पत्रिका अभियान को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।)

मेरे वि‍द्यालय की डायरी : रेखा चमोली

REKHA CHAMOLI

प्राथमिक विद्यालय, उत्‍तरकाशी में कार्यरत संवेदनशील कवियत्री  रेखा चमोली बच्‍चों के साथ नवाचार के लि‍ए जानी जाती हैं। कक्षा-1 से कक्षा-5 तक बच्‍चों के अकेला पढ़ाना और साथ ही स्‍कूल की व्‍यवस्‍था को भी देखना बेहद श्रमसाध्‍य है। यहां उनकी डायरी के संपादि‍त अंश दे रहे है-

4-8-11

शब्दों से कहानी बनाना

हमारे पास कोई इतना बडा़ कमरा नहीं है कि कक्षा 1-5 तक के 53 बच्चे उस में एक साथ बैठ पाएं। कक्षा 3,4,5 वाले बच्चे बालसखा कक्ष में बैठे और कक्षा 1,2 वाले दूसरे कक्ष में। आज मैं घर से आते हुए पुरानें अखबार और बच्चों की आधी भरी हुई पुरानी कापियां साथ ले आयी थी ताकि कक्षा 1 व 2 वालों को थोडी देर व्यस्त रख पाऊॅ और इतने में 3, 4, 5 वालों को उनका काम समझा सकूं। कक्षा 1,2 वालों को बाहर ही एक गोला बनाकर कविताएं गाने को कहा और अपने आप कक्षा 3,4,5 के पास गई। आज हमें शब्दों से कहानी बनाने की गतिविधि करनी थी। मैंने श्यामपट पर कुछ शब्द लिखें- बस,  भीड़, सड़क,  ड्राइवर, तेज शोर, रास्ता, पेड़, लोग।

बच्चों को प्रारम्भिक बातचीत के बाद दिए गए शब्दों से कहानी लिखने को कहा।

मैं कक्षा 1-2 के साथ काम करने लगी। इन कक्षाओं में कुल मिलाकर 23 बच्चे हैं। मैंने श्यामपट पर कुछ शब्द लिखकर उनमें ‘न’ पर गोला बनाने की गतिविधि कुछ बच्चों को बुलाकर की।जैसे- नमक, कान, नाक,  जाना, जानवर आदि। फिर सभी बच्चों को अखबार का 1-1 पेज देकर कहा कि वे इसमें ‘न’ और ‘क’ पर गोला लगाएं व उन्हें गिनें कि वे अक्षर कितनी बार आए है। दरअसल बच्चे हमारी अनुपस्थिति में अपनी कापियों को बहुत खराब कर देते हैं। कक्षा 1 के बच्चे पेज बहुत फाड़ते हैं इसलिए मैंने उन्हें ये काम अखबार में करने को दिया जिससे वे कमरे और बरामदे में दूर-दूर भी बैठें और उन्हें कुछ नया भी करने को मिले। अखबार के अक्षर बहुत बारिक लिखे होते हैं। पर फिर भी मैंने देखा बच्चे अक्षर पर गोला बना रहे थे और जो ऐसा नहीं कर पा रहे थे, वे दूसरों को देख रहे थे। उसमें बने चित्र देख रहे थे।

इतने में ही दूसरे कमरे सें भवानी, जयेन्द्र, साधना आए और कहा कि‍ हमने अपनी कहानी लिख ली है। अच्छा, अब अपनी-अपनी कहानी का शीर्षक लिखो कहने पर उन्‍होंने कहा कि कहानी का शीर्षक भी लिख दिया है।

मैंने उनकी कहानियां पढी़ और कुछ सुझाव देकर एक बार फिर से लिखने को कहा। बच्चे मेरे पास आते रहे अपनी कहानी पर सुझाव लेते रहे और उसे ठीक किया।

करीब सवा नौ बजे हम एक बड़ा सा गोला बनाकर अपनी-2 कहानियां सुनाने को तैयार थे। तीनों कक्षाओं को मिलाकर आज कुल 27 बच्चे उपस्थित थे।

सबसे पहले शुभम् (कक्षा-3) ने अपनी कहानी सुनाई-

1- एक बस थी। जिसे चला रहा था ड्राइवर।अचानक एक आदमी बोला बस रोको आगे सड़क टूटी हुई है। ड्राइवर ने बस रोकी। सड़क पर पत्थर और पेड़ गिरे थे। लोगों ने मिलकर बस के लिए रास्ता बनाया और बस आगे चली । सब लोग अपने गांव पहुंचे ।

2- दीक्षा (कक्षा-3) ने अपनी कहानी में लिखा कि एक पेड़ के गिरने से सड़क बन्द हो गई। जब ड्राइवर पेड़ हटाने लगा तो जंगल से पेड़ काटने वालों की आवाज आई- ये हमारा पेड़ है। अपनी बस वापस ले जाओ। जंगल से पेड़ काटने वाले आए और सबने मिलकर पेड़ को हटाया। फिर लोग वापस अपने गांव गए। दीक्षा ने अपनी बस का नाम रखा ’मुनमुन’ और ड्राइवर का ’राहुल’।

3- साधना (कक्षा-5) – रमेश नौकरी की तलाश में शहर जाता है। वहां उसे ड्राइवर की नौकरी मिलती हैं। वह पहली बार बस चलाता है। रास्ते में बहुत सारे पेड़ थे। बस रुक जाती है। बस खराब हो जाती हैं। लोग डर जाते हैं कि हम कहां फंस गए। बाद में बस ठीक हो जाती है। रमेश सोचता है कि‍ मैं बस ठीक से चलाना सीखूंगा। बाद में वह ठीक से बस चलाना सीखता है। पैसे कमाता है। शादी करता हैं। घर बनाता है। उसके बच्चे होते हैं।

इसी तरह और बच्‍चों ने भी कहानी लि‍खी। ज्यादातर बच्चों की कहानियां मिलती-जुलती थीं, तो क्या हमने शब्दों पर ज्यादा खुलकर बातचीत की? या मेरी अनुपस्थिति में बच्चों ने एक- दूसरे से बातचीत की? मेरे मन में शंका हुई।

मैने नोट किया कि सभी बच्चों ने अपनी कहानी को आत्मविश्वास के साथ सुनाया। वे बीच में कहीं रुके नहीं। न ही किसी शब्द को पढ़ने में अटके । बच्चे अपना लिखा हुआ सुस्पष्ट व धाराप्रवाह पढ़ सकते हैं।

बच्चों ने अपना काम कर लिया था। मैंने उन्हें खाना-खाने जाने को कहा। बच्चों को हाथ धुलवाकर खाने के लिए बिठाया। भोजनमाता भोजन परोसने लगी। छोटे बच्चें अभी इधर-उधर ही घूम रहे थे। उन्हें बुलाया, खाना खाने बिठाया। भोजनमाता अपनी जरा सी भी जिम्मेदारी नहीं समझती है। बस किसी तरह काम निबटाना चाहती है। मध्यान्तर के बाद सारे बच्चों ने एक साथ बड़े गोले में गीत, कविताएं आदि गाईं और अपनी-अपनी कक्षा में बैठे।

कक्षा 3,4,5 को श्यामपट पर कुछ word-meaning पढ़ने व लिखने को दि‍ए। फिर कक्षा 3 को जोड़ के मिलान वाले सवाल हल करने को दिए और कक्षा 4,5 को क्षेत्रफल के सवाल। बच्चों को दो-दो के समूह में काम करने को कहा।

कक्षा 2 के सारे बच्चों ने अखबार में ‘न’ व ‘क’ पर गोले बनाए थे। कक्षा 1 के भी कुछ बच्चों ने अक्षर पहचाने थे। कुछ बच्चों के अखबार का बुरा हाल था। पर कोई बात नहीं अखबार का जितना प्रयोग होना था, हो चुका था। मैंने कक्षा 1 व 2 को उनकी कापी में गिनती व सरल जोड़ के सवाल हल करने को दिए। जैसे- एक पेड़ पर 25 पत्तियाँ बनानी या आसमान में 15 तारे बनाने। छोटे बच्चे हर समय कुछ न कुछ करने को उत्साहित रहते हैं। इसलिए इनमें से कुछ अपने आप बाहर चले गए और बाहर जमा हुए पत्थरों की पक्तियां बनाने लगे। एक-दो बच्चे चाक ले गए और जैसी आकृतियाँ मैं बनाती हूँ, उसी तरह की आकृतियाँ बनाकर उन पर पत्थर जमाने लगे।

जब सारे बच्चे कुछ न कुछ करने लगे तो मैं बच्चों का सुबह वाला काम देखने लगी। बच्चों ने तो अपना काम कर दिया था। अब मुझे अपना काम करना था। पहला काम तो बच्चों की मात्रात्मक गलतियाँ सुधारना था । कक्षा 3 के कुछ बच्चे बहुत गलतियाँ करते हैं। 4 व 5 में भी एक दो बच्चे ऐसे हैं। मैंने बच्चों की कापी में उनकी गलतियाँ ठीक की। फिर काम को fair करने के लिए 1 चार्ट के चार बराबर भाग किए। उनमें पेंसिल से लाइने खींची। इन्हीं चार्ट पेपर से हम अपनी किताबें बनाने वाले हैं। बच्चों को एक-एक चार्ट पेपर दिया, जिसमें वे घर से अपनी-अपनी कहानी लिखकर व बची जगह में कहानी से सम्बन्धित चित्र बनाकर आएँगे।

इस तरह आज के दिन का काम हुआ। मैं बच्चों के काम को देखकर बहुत खुश हूँ।

5-8-11

कविता लिखना

school.REKHA CHAMOLI

आज सुबह 7:15 पर विद्यालय पहुँची। साधना, मिथलेश व कुछ बच्चे आ गए थे। बच्चों ने मिलकर साफ-सफाई की। मैंने और साधना ने मिलकर बालसखा कक्ष की सफाई की। इसी बीच सारे बच्चे आ गए थे। हमने मिलकर प्रार्थना सभा शुरू की। प्रार्थना के बाद रोहित और दिव्या ने अपनी कल लिखी कहानी सबको सुनाई। और बच्चे भी अपनी कहानी सुनाना चाहते थे, पर समयाभाव के कारण ये संभव न था। ये बच्चे अपनी बारी आने पर किसी और दिन कहानी सुनाएँगे। कक्षा 1 से रितिका, सलोनी, राजेश ने आगे आकर कविता सुनाई जिसे सारे बच्चों ने दोहराया। उपस्थिति दर्ज कर बच्चे अपनी-अपनी कक्षा में गए।

जब तक कक्षा 3,4,5 के बच्चे बालसखा कक्ष में गोले में बैठे और अपना कल का काम निकाला, तब तक मैंने कक्षा 1 व 2 को 1-1 पेज देकर उसमें चित्र बनाने व उनका नाम लिखने का काम दिया। मैंने श्यामपट पर कुछ चित्र बनाए व उनके नाम लिखे और बच्चों से कहा वे इन चित्रों को भी बनाएं व अपनी मर्जी से अन्य चित्र भी बनाएं। बच्चों को एक बार बता दो क्या करना है फिर भी वे बार-बार पूछते है। सारे चित्र बनाने हैं जी, सबके नाम लिखने हैं? मुझे इसका नाम लिखना नहीं आता। रंग भी भरना है क्या? वगैरह-वगैरह। इन बच्चों को अपने काम की तैयारी में ही बहुत समय लग जाता है। पेंसिल नहीं है या छिली हुई नहीं है। toilet जाना है, पानी पीने जाना है। इसने मेरा page ले लिया, इसने नाम बिगाड़ कर पुकारा। पर जब काम शुरू होता है तो थोडी देर सिर्फ काम होता है, पर सिर्फ थोडी देर। मैंने बच्चों को उनका काम फिर से बताया और मैं थोड़ी देर में आती हूँ, कहकर बालसखा कक्ष में गई। गेट बन्द कर दिया। जिससे बच्चे बाहर आएँ तो रास्ते में न जाएँ। भोजन माताएँ आ चुकी थीं। खाना बना रही थीं। मैंने उनसे कहा कि‍ देखना बच्चे लड़-झगड़े नहीं। वैसे ये बच्चे कुछ भी करें, बगल के कमरे में साफ आवाज आती है।

जब मैं बालसखा कक्ष में पहुँची तो बच्चे अपना-अपना पेज एक-दूसरे को दिखा रहे थे, पढ़ रहे थे, चित्र देख रहे थे, अपना छूटा हुआ काम करे रहे थे। मैंने उनसे पेज जमाकर लिए। कुछ बच्चों के पेज मुड़-तुड़ गए थे। कुछ ने अच्छा लिखने या जल्दबाजी के कारण काटा-पीटी कर दी थी। मैंने बच्चों से इस बारे में बात की। लिखने का काम इतना अधिक नहीं था कि थकान लग जाए। हमें ये पेज संजो कर रखने हैं। इन्हें बाकि बच्चे भी पढे़गे। इसलिए मैंने सोचा आज से fair करने का काम भी विद्यालय में ही करना होगा।

आज कविता पर काम करना था। मैंने पिछले दिनों कक्षा में कहानी और कविता के स्वरूप को लेकर बच्चों से बात की थी । बच्चे कविता व कहानी में अन्तर पहचानते हैं, पर अभी उनके लिखने में ये ठीक से नहीं आ पाया है। शुरुआती लेखन के लिए मैंने बच्चों का ध्यान लय,  तुकान्त शब्द,  कम शब्दों का उपयोग व बिंबों की ओर दिलाने का प्रयास किया। मैं जानती हूं, कविता एक संवेदनशील हृदय की अभि‍व्‍यक्‍ति‍ है। एक अच्छी कविता हमारे मन को छू लेती है। हमें उर्जा से भर देती है या कुछ कर गुजरने को प्रेरित करती है। और हर व्यक्ति कविता नहीं लिख पाता, पर यहां अपनी कक्षा में मैं कविता को इस तरह देखती हूं कि बच्चे किसी चीज के प्रति अपने भावों को व्यक्त करना सीखें, अपने लिखे को मन से पढ़ पाएं। कक्षा 4 व 5 वाले बच्चे अपनी कक्षा में कुछ विषयों पर कविता लिखने का प्रयास कर चुके हैं। कुछ ने छोटी-छोटी कविताएं लिखी हैं। ये बहुत सी कविताओं को सुन-पढ़ चुके हैं।

मैंने कविता लिखने के लिए विषय चुना- पानी। बच्चों से पानी को लेकर बातचीत की। प्रत्येक बच्चे ने पानी को लेकर कुछ-न-कुछ बात कही।

जैसे- पानी नल से आता है

पानी को हम पीते हैं।

पानी नदी, धारे-पनियारे, बारिश से भी आता है।

पानी कहां से आता है ? उससे क्या-क्या करते हैं ? यदि पानी न हो तो क्या होगा। पानी हमारे किन-किन काम आता है? आदि के आसपास ही बच्चों की ज्यादातर बातें रहीं। कक्षा में बातों का दोहराव होता देख मैंने बच्चों से कहा,  मैं श्यामपट पर पानी शब्द लिखूंगी। तुम्हारे मन में पानी को लेकर जो भी बातें आती हैं, उन्‍हें एक शब्द में बताना है। जो शब्द एक बार आ जाएगा, उसे दुबारा नहीं बोलना है। बच्चे शब्द बोलते गए मैं उन्हें लिखती गई। कुल 50-60 शब्द हो गए।

उदाहरण- पानी-पीना, खाना बनाना,  मुंह धोना, नहाना,  प्यास,  मरना, मीठा, गंदा, गरम, ठंडा, चाय, स्वच्छ निर्मल, बादल, इन्द्रधनुष, पहाड़,  झरने, गौमुख,  नदी,  भागीरथी, गंगा,  गाड़, पनियारा, टंकी, बाल्टी,  कोहरा, बुखार,  भीगना,  सिंचाई,  बिजली,  बांध, जानवर, खेती, रोपाई,  बहना,  भाप निकलना, जीवन, मछली, सांप, मेंढक, आकाश, भरना, होली, सफाई आदि। अब मैंने बच्चों से तुकान्त शब्दों पर बात की। हमने पानी, काम, बादल,  जल,  भीगना,  गीला आदि शब्दों पर तुकान्त शब्द बनाए। फिर मैंने श्यामपट पर एक पंक्ति लिखी-

ठंडा-ठंडा निर्मल पानी।

पानी से मुंह धोती नानी।

इन पंक्तियों को बच्चों को आगे बढाने को कहा। बच्चों ने मिलजुल कर कविता को आगे बढाया-

पानी आता बहुत काम

इसके बिना न आता आराम

हमको जीवन देता पानी

बताती हमको प्यारी नानी।

इसके बाद मैंने बच्चों से एक और कविता पानी पर ही लिखने को दी।

इतने में पेंन्टर और बाकि मजदूर काम करने आ गए। खच्चर वाले भइया ने सुबह ही आंगन में बजरी डाल दी थी। प्रधानजी का बेटा अन्य सामान सीमेंट वगैरह लेकर आए। मैंने बच्चों की मदद से कल छुट्टी के बाद एक कमरा खाली किया था। आज उससे पेंटर को पेंट की शुरुआत करने को कहा। विद्यालय में अन्य लोगों को देख कक्षा 1, 2 के बच्चे बाहर आ गए। इधर-उधर दौड़ने लगे। कुछ बच्चे बजरी में खेलना चाहते थे। जब खच्चर वाले भइया दुबारा बजरी लेकर आए, तो मैंने उन्हें विद्यालय के पिछले हिस्से में बजरी डालने को कहा, पर जगह कम होने के कारण खच्चर ने वहाँ जाने से साफ मना कर दिया और खुद ही अपनी पीठ का भार गिरा दिया। अब एक काम बच्चों को इन पत्थर-बजरी से भी दूर रखना था। और ये भी ध्यान रखना था कि खच्चर हमारे फूलों की क्यारी से दोस्ती न कर पाएं।

अब तक बच्चे अपनी-अपनी कविताएं लिख चुके थे। बच्चों ने अपनी कविताएं सुनानी शुरू कीं। सरस्वती (कक्षा-5)  ने अपनी कविता में मीठा,  पर्वत व कहानी शब्द लिखे थे।

अनिल (कक्षा-5) ने मछली के जीवन व काम का उपयोग बताया था।

दीपक (कक्षा-5)  ने ठंडा, धरती से पानी का निकलना और पानी का कोई रंग ना होना बताया था। पूर्व की बातचीत में पानी के रंग पर कोई बात नहीं आयी थी। अंबिका (5)  ने धारे,  नदी व जीवन की बात कही थी। कुछ बच्चों ने बहुत सुंदर कविता लिखी थी।

जैसे- प्रवीन (5) ने-

इस पानी की सुनो कहानी

इसे सुनाती मेरी नानी

पानी में है तनमन

पानी में है जीवन

कहती थी जो वह बह जाता

कही ठोस से द्रव बन जाता।

मुझे प्रवीन की कविता में पहले पढ़ी किसी कविता का प्रभाव दिखा, जबकि इससे पहले पढ़ी कविताओं में कम सधापन था, पर उनमें मौलिकता अधिक थी। कुछ बच्चों ने पूरे-पूरे वाक्य लिख दिए थे। कुछ की पहली पंक्ति का दूसरी से सामंजस्य नहीं था। शब्दों की पुनरावृति अधिक थी।

मेरी स्वयं भी कविता के विषय में समझ कम है, पर मैं ये चाहती थी कि बच्चे अपनी बात को इस तरह लिखें कि कम शब्दों में ज्यादा बात कह पाएं और अगर उसमे लय भी हो तो मजा ही आ जाए।

बात आगे बढा़ते हुए मैंने श्यामपट्ट पर एक वाक्य लिखा।

पानी के बिना हमारा जीवन अधूरा है।

अब इसी पंक्ति को थोड़ा अलग तरीके से लिखा।

1- पानी बिन जीवन अधूरा

2- बिन पानी अधूरा जीवन

3- पानी बिन अधूरा जीवन

जब इन पंक्तियों में बच्चों से अंतर जानना चाहा, तो उन्होंने बताया कि‍ पहली पंक्ति कहानी या पाठ की है, जबकि बाद की पंक्तियां कविता की हैं। कारण पूछने पर बच्चों में से ही बात आई कि कविता छोटी होती है। शब्द कम होते हैं। उनका ज्यादा अर्थ निकालना पड़़ता है।

अब मैंने मनीषा से अपनी कविता पढ़ने को कहा, तो उसने उसे श्यामपट्ट पर लिख दिया। मनीषा ने लिखा था-

पानी आता है गौमुख से

पानी आता पहाड़ों से

पानी आता है नल से

पानी को हम पेड़ पौधों को देते हैं।

पानी का कोई रंग नहीं होता है।

मैंने बच्चों से पूछा कि‍ क्या इन पंक्तियों को किसी और तरीके से भी लिख सकते हैं?

‘हां जी’ कहने पर शिवानी ने कहा-

पहाडों से निकलता पानी

अरविन्द ने दूसरी पंक्ति जोड़ी-

गौमुख का ठंण्डा स्वच्छ पानी

इसी प्रकार पंक्तियां जुड़ती गईं-

नल से आता है स्वच्छ पानी

पेड़-पौधे भी पीते पानी

बिना रंग का होता पानी।

फिर हमने इस पर बात की कि पहली लिखी पंक्तियों व बाद की पंक्तियों में क्या अंतर है। कौन कविता के ज्यादा नजदीक है?

बच्चों के जबाव आए- दुबारा लिखी पंक्तियां।

क्यों ? क्योंकि कम शब्दों में ज्यादा बात कह रही हैं। अन्त के शब्द मिलते-जुलते हैं। मैंने बच्चों के कहा कि वे अपनी अभी लिखी हुई कविता को एक बार और ठीक करके लिखें।

इस बार बच्चों ने अपनी पंक्तियों को और परिष्कृत करके लिखा।

उदाहरण-  कक्षा 3 के बच्चों ने लिखा- (कुछ पंक्तियां)

प्रियंका- नदिया बहती कल-कल-कल

पानी करता छल-छल-छल

प्रीति- कैसे पानी पीते हम

पानी से जीते हम

शुभम्- जब मछली पानी से बाहर आती

इक पल भी वो जी न पाती।

दिव्या (4)- ठंडा ठंडा निर्मल पानी

कहानी सुनाती मेरी नानी

पानी बहुत दूर से आता

बर्फ से पानी जम जाता

पर्वत से आता पानी

धरती ने निकलता पानी।

इस तरह सभी बच्चों ने अपनी-अपनी कविताएं ठीक कीं। ज्यादातर बच्चों ने 12-15 पंक्तियां लिखीं।

आज मध्यान्तर थोड़ी देर से किया, क्योंकि हमारी बातचीत देर तक चली थी। मध्यान्तर के बाद कक्षा 3,4,5 वालों ने अपना काम fair करना चाहा, क्योंकि सुबह ही यह बात हो गई थी कि हमें स्कूल में ही यह काम करना है। बच्चों ने आज खेला नहीं। वे काम करने के लिए पेज मांगने लगे। मैंने अंजली, सरस्वती, प्रवीन की मदद से फटाफट चार्ट पेपर पर पेंसिल से लाइनें खीचीं ताकि बच्चे सीधा-सीधा लिख पाएं। बच्चे अपना काम करने लगे। मैं 1 व 2 वालों को देखने लगी। जिन बच्चों की मात्रात्मक गलतियाँ ना के बराबर थी, उन्होंने फटाफट अपना पेज तैयार कर लिया। मैंने उन्हें कक्षा 1व 2 के साथ काम करने को कहा। अपने आप बच्चों की कापियाँ चैक करने व पेज में किस तरह काम करना है आदि बातें बच्चों को बताने लगी। आज गणित में कम काम हो पाया। कक्षा 3 को श्यामपट पर घटाने के मिलान वाले सवाल दिए। 4 व 5 वालों को क्षेत्रफल के सवाल अपनी किताब से करने को दिए। आज भी बच्चों ने अपने समूह में काम किया व बीच-बीच में मुझे दिखाते रहे। मैंने कल पेंट करने के लिए जगह बनाई और आज का काम देखा। आज बच्चों को घर के लिए यह काम दिया कि वे अपने मनपसंद विषय पर कविता लिखकर आएं।

बुद्धिमान राजा : फ़ैयाज़ अहमद

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यह कहानी है जंगल के राजा शेर की। शेर और राजाओं की तरह नहीं था। यह राजा था बड़ा चालाक, बड़ा शातिर। हर काम सोच-विचार कर करता। हर निर्णय संभल कर लेता। यही कारण था कि वह वर्षों से राज कर रहा था। कभी-कभार किसी कोने से अगर विरोध की हल्की-सी भी चिंगारी उठती, उस पर फ़ौरन पानी डाल देता। मंत्री से संतरी तक सभी राजा की बुद्धिमानी के क़ायल थे।

एक दिन राजा को अचानक विचार आया कि उसके मंत्रीमंडल में एक भी पक्षी नहीं है। फिर उसने सोचा, ‘क्यों न अपने मंत्रीमंडल में इस बार पक्षियों को भी शामिल कर लिया जाए।’

और राजाओं की तरह यह राजा अपनी राय या अपना विचार किसी पर थोपता नहीं था, क्योंकि उसे थोपने की ज़रुरत ही नहीं पड़ती थी। उसने बड़ी विनम्रता से अपने दिल की बात अपने मंत्रियों से कही। अब राजा का मन था और उसका विचार, कौन मना करता। सारे मंत्रियों ने बिना सोचे-समझे ‘हाँ’ में सिर हिला दिए। महामंत्री गीदड़ की पक्षियों से कभी नहीं बनती थी। गीदड़ राजा की इस सोच से ख़ुश तो नहीं था मगर ‘ना’ कहने की उसमें हिम्मत नहीं थी। ‘जान की अमान पाऊं तो कुछ कहूँ?’ राजा ने अपने शाही अन्दाज़ में मुस्कराते हुए कहा, ‘‘इजाज़त है!’’ महामंत्री गीदड़ बोला, ‘‘महाराज की सोच कभी ग़लत हुई है? महाराज ने कुछ सोचकर ही पक्षियों को मंत्रीमंडल में शामिल करने का निर्णय लिया होगा। बस एक समस्या है……।’’ महाराज ने बात पूरी ही नहीं होने दी और बड़े प्यार से बोले, ‘‘कैसी समस्या?’’

महराज की इसी अदा पर तो पूरा मंत्रीमंडल जान छिड़कता था। वह कभी गुस्सा नहीं होते थे। फिर भी गीदड़ डर गया और उसने कांपते स्वर में अपनी बात पूरी की, ‘‘…पक्षियों का एक विशाल समूह है, इसमें से कौन उनका प्रतिनिधि बनेगा? और कैसे?’’ राजा मुस्कराए, बारी-बारी से सभी को देखा और बोले, ‘‘एक आम सभा में, मैं ख़ुद पक्षियों का नेता नियुक्त करुँगा। मुनादी करवा दी जाए।’’

मुनादी हो गई। पक्षियों के बीच बड़े उत्साह का माहौल बन गया। हर तरफ़ जश्न मनाया जाने लगा। पटाख़े छूटने लगे। गीत-संगीत के कार्यक्रम आयोजित किये जाने लगे। राजा की जय-जयकार हो रही थी, जैसे राजा ने उन्हें मंत्रीमंडल में जगह नहीं, बल्कि पूरा राज-पाट देने का फैसला कर लिया हो। ख़ैर जो भी हो उनके लिये तो बड़ी बात थी। पहली बार उनकी ओर से किसी को राजा के समक्ष उनकी समस्या रखने का मौक़ा मिल रहा था। उनके लिये यही काफ़ी था। अब उनके सामने एक ही समस्या थी। बहुत बड़ी समस्या!! कौन होगा उनका नेता? कौन लड़ेगा उनकी ओर से? यह विचार आते ही रंग में भंग पड़ गया हो, जैसे। सभी सिर जोड़ कर बैठ गए। तय हुआ कि पक्षियों की एक आम सभा बुलाई जाए। आनन-फ़ानन सभा भी बुला ली गई। सभी पहुँचे, यहाँ तक कि उनके समर्थन में कीड़े-मकोड़े भी आ गए, मगर एक ग़ायब था… भटकू कौवा! वह कहीं दिखाई नहीं दे रहा था। उसकी अनुपस्थिति को लेकर सभी बातें करने लगे।

‘‘जब मुनादी हो रही थी, उस समय भटकू ही सब से आगे-आगे था।’’

‘‘कहाँ चला गया?’’

‘‘अपने रिश्तेदार के यहाँ तो नहीं चला गया?’’

‘‘इस स्थिति में कोई ऐसा कैसे कर सकता है?’’

‘‘मगर वह है कहाँ?’’

‘‘उसे तलाश किया जाए।’’

‘‘उसे राजमहल की तरफ़ जाते देखा गया है!’’

‘‘मतलब!’’

‘‘आप ख़ुद समझ लीजिये।’’

‘‘यह कैसे हो सकता है?’’

‘‘इधर कुछ दिनों से भटकू को कई बार राजमहल की ओर जाते देखा गया है।’’

‘‘हो सकता है, वह उधर किसी और काम से गया हो?’’

सभा में इसी तरह की बातें होती रहीं, मगर उनका नेता कौन होगा, यह तय नहीं हो पाया। अब सभी की नज़र थी आम सभा पर।

आम सभा में सभी ने अपने-अपने कमाल दिखाए। बुलबुल ने गाना सुनाया तो मोर ने नाच दिखाया। मगर बात बन नहीं रही थी। नाचने या गाने से मंत्रीमंडल का काम नहीं चल सकता था। ख़बर लाने-ले जाने के लिये तो कबूतर ठीक था… मगर एक मंत्री के रुप में? नहीं, नहीं… राजा को कुछ जँचा नहीं। जँचता भी कैसे? आँखों में तो कोई और बसा था। शाम होने वाली थी। परिणाम की घोषणा भी करनी थी। राजा उठे। प्यार से थोड़ा ग़ुर्र-ग़ुर्र किया, दहाड़ कर गला साफ़ किया, पंजों को हिला-हिला कर अपनी जनता को अपनी तरफ़ आकर्षित किया, फिर मुस्कराते हुए एक ओर देखा और किसी को मंच पर आने का इशारा किया। भटकू कौवे को मंच पर लाया गया। पूरा मजमा स्तब्ध था। कोई सोच भी नहीं सकता था कि भटकू को मंत्री बनाया जाएगा। वैसे भटकू ने यहाँ तक पहुँचने में बड़ी मेहनत की थी। इतने पापड़ बेले थे कि ख़ुद लाग़र हो गए थे। लेकिन क्या फ़र्क़ पड़ता है? मंत्री तो बन ही गए…सभा समाप्त हो गई। एक बार फिर से पूरा जंगल राजा की जय-जयकार से गूंज उठा।

लेकिन बहुतेरों के मन में एक सवाल था,… ‘भटकू राजा का प्रतिनिधि बना या पक्षियों का?’

चि‍त्र : हि‍मानी मि‍श्र, बीएसी-2

सुख : प्रबोध कुमार

प्रबोध कुमार

8 जनवरी, 1935 को जन्‍में सुप्रसि‍द्ध लेखक प्रबोध कुमार ने 1955-56 में लि‍खना-छपना शुरू कि‍या। करीब एक दशक तक उनकी कहानि‍याँ ‘कहानी’, ‘कल्‍पना’, ‘कृति’‍ आदि‍ प्रति‍ष्‍ठि‍त पत्रि‍काओं में प्रकाशि‍त होकर खासी चर्चित हुईं। उन्‍होंने करीब पैंतालीस वर्षों से न लि‍खने के बाद उपन्‍यास लि‍खा- नि‍रीहों की दुनि‍या। उनकी कहानी –

मीरा के दाँत जब भी टूटते, वह उन्हें चूहे के बिल में डाल देती जिससे दोबारा निकलने पर वे चूहे के दाँतों की तरह सुडौल हों। उस दिन जब फिर उसका एक दाँत टूटा तो उसे ले वह फुदकती बिल की तरफ चली। तभी न जाने कहाँ से आ, उसके हाथ से दाँत छीन, विशू भाग गया। वह रोते-राते उसके पीछे दौड़ी लेकिन विशू को पकड़ना आसान नहीं था। हारकर बरामदे में बैठ, वह बीच-बीच में बह आती नाक घुटकने लगी। सबसे बड़ा डर उसे यह था कि विशू ने दाँत यदि खपरैल पर फेंक दिया तो नया दाँत खपरे की तरह होगा। विशू की माँ उसकी माँ के साथ पड़ोस के घर में थीं जहाँ उसी रात घर की सबसे बड़ी लड़की सरला की शादी थी। उसकी शिकायत सुनने वाला दूसरा कोई वहाँ था नहीं। विशू बगीचे में खड़ा उसे मुँह चिढ़ा रहा था। मीरा की बेहद इच्छा हुई कि जा कर उसका मुँह नोंच ले लेकिन वह जानती थी कि विशू मुँह नुचवाने वहाँ खड़ा नहीं रहेगा।

विशू ने इस उम्मीद से कि मीरा उसके पीछे-पीछे भागेगी, कहा, ‘‘अच्छा ले जाओ अपना दाँत, हमें नहीं चाहिए’’, लेकिन उस पर कोई असर न होते देख वह घाट पर चला गया। छुट्टियों में अपनी माँ के साथ जब भी वह मीरा के घर आता तो उन दोनों का अधिकतर समय तालाब पर बीतता था। घने पेड़ों के कारण, पास होने पर भी वह घर से दिखाई नहीं देता था। वहाँ पहुँचने पर उन्हें लगता कि घर से बहुत दूर चले आये हैं। विशू को तालाब बहुत पसंद था। उसके तीन किनारों पर शहर के मकान आकर यदि ठहर न जाते तो पानी में गिर पड़ते। मकानों के बीच काफी संख्या में कलशदार मंदिर फँसे थे। उनकी नुकीली आकृतियाँ दिन भर पानी में डोलती रहतीं। तालाब की चौथी ओर नीली-भूरी पहाडिय़ाँ थीं जिनमें मीरा के अनुसार, चुड़ैल छिपकर रात में उन्हें सताने की योजना बनाती थी। पहले उन्हें, जब तक कोई बड़ा व्यक्ति साथ न हो, तालाब पर बिल्कुल जाने नहीं दिया जाता था। बाद में बड़ों की व्यस्त दिनचर्या में बच्चों को किसी बात के लिए मना करना शायद एक बेमतलब आदत बन गयी थी, क्योंकि वह एक बार मना करने के बाद कोई भी यह देखने का कष्ट नहीं करता कि उन्होंने कहना माना या नहीं। एक कारण शायद यह भी रहा हो कि अब उन्हें तैरना आ गया था, यद्यपि अब भी वे पानी में तभी उतरते जब घाट पर काफी लोग नहाते रहते। पिछली गर्मियों में मीरा के पिता ने उन्हें तैरना सिखाया था। मीरा की देखादेखी वह भी उसके पिता को बाबूजी कहता था। सुबह होते ही दोनों अपनी तूंबियाँ सहेज तैयार हो जाते। उसके बाद उन्हें लगता कि बाबूजी जानबूझ कर चाय पीने में या दाढ़ी बनाने में देर लगा रहे हैं। उतावली में वे, घाट के रास्ते में, बाबूजी से हमेशा दस-बीस कदम आगे रहते। वहाँ पहुँचते ही वे अपने ऊपर के कपड़े उतार, तूंबियाँ बाँधकर बड़े लड़कों की तरह सिर के बल पानी में कूदने का अभिनय करने लगते। बाबूजी आकर देखते कि उनकी तूंबियाँ ठीक से बंधी हैं या नहीं। मीरा की तूंबियाँ उन्हें रोज दोबारा बाँधनी पड़तीं। पानी में जाकर जब वह हाथ फैला खड़े हो जाते, तब दोनों एक के बाद एक पानी में कूद पड़ते। तैरते समय उनके नौसिखिया हाथ-पैरों से बहुत पानी छिटकता जिसका आसपास नहाते लोग बुरा मानते। मीरा पर तो कोई असर न होता लेकिन विशू थोड़ी देर को सहम जाता। पानी से भारी हो बार-बार नीचे खिसकता निकर ठीक करता वह मीरा को देखने लगता। मीरा की सफेद पतली चड्डी में हमेशा हवा भर जाती जिससे कपड़े का एक गुब्‍बारा पानी में हर जगह उसका पीछा करता, एक पिचकता तो दूसरा तैयार हो जाता। नहाकर जब वे निकलते तो उनके होंठों पर पपडिय़ाँ जमी रहतीं। तूंबियाँ खोलने के बाद वे गर्मी के दिन होने पर भी थोड़ी देर तक तौलियों में छिपे रहते। वह जब अपना बदन पोंछता तो पाता की मीरा की अपेक्षा उसकी कमर में रस्सी के लाल निशान कम उभरे हैं।

विशू ने जोर से पत्थर फेंका तो वह चार-पाँच बार पानी पर उचटता काफी दूर जाकर डूब गया। तिजहरिया में कपड़े धोती तीन वयस्क औरतों को छोड़ घाट पर और कोई नहीं था। जब मीरा साथ रहती तो उसका काफी समय इसी तरह पत्थर उचकाने में बीतता। तब यदि कोई घाट पर होता तो उन्हें खेल में बाधा पड़ने का डर लगा रहता। घाट के पास, कुछ दिन हुये, एक मढ़ि‍या बनी थी। वहाँ से वे पानी में फेंकने के लिये पत्थर की चीपों के छोटे-छोटे टुकड़े इकट्ठा करते। मीरा के फेंके पत्थर पानी पर उचटने की जगह हमेशा हवा में अधगोला बनाते डब्ब-से पानी के नीचे चले जाते। उसे आश्चर्य होता कि विशू कैसे पत्थरों को इतनी बार उचटा लेता है। कभी-कभी आसपास के कुछ लड़के आकर उनके खेल में शामिल हो जाते। उनसे जब विशू हारता तो मीरा को बुरा लगता, खेल में उसकी रुचि खत्म हो जाती।

‘‘अब घर चलो विशू, खूब देर हो गयी है।’’

‘‘अभी तो सब लोग सो रहे होंगे।’’

‘‘नहीं, वहाँ चलो, बगीचे में खेलेंगे।’’

‘‘अच्छा, रुको अभी चलते हैं।’’

विशू फिर खेल में व्यस्त हो जाता। मीरा तालाब की संकरी फसील पर चढ़ घूमने लगती। जब उसे तैरना नहीं आता था तो ऐसा करते हमेशा डरती कि कहीं पानी में न गिर पड़े। फसील पर अपनी समझ में काफी देर घूम चुकने के बाद वह अक्सर पेशाब करने बैठ जाती। इतनी बड़ी होकर भी उसे समय या जगह का जरा भी खयाल नहीं रहता था। चाची, एक-दूसरे की माँ को वे चाची कहते, के पास मीरा के पेशाब करने से सम्‍बन्‍धि‍त कि‍स्‍सों का ढेर था। चाची अक्‍सर उससे कहा करतीं कि‍ मीरा के लिए अब फिर से रबर की चादर लानी पड़ेगी। मीरा उनकी इस आदत से बहुत चिढ़ती थी। उसे सबसे बड़ी आपत्ति इस बात से थी कि वह विशू को क्यों सारी बातें बता देती हैं। विशू इतना खराब था कि झगड़ा होने पर उन्हीं बातों से उसे चिढ़ाता।

‘‘विशू, अब चलो।’’ मीरा उन लड़कों के साथ विशू को नया खेल शुरू करते देख उतावली हो उठती। विशू ध्यान नहीं देता तो वह गुस्से में पीछे से उसकी कमीज पकड़ लेती।

‘‘अब चलो विशू, सच्ची खूब देर हो गयी।’’

‘‘बस, थोड़ी देर और रुक जाओ।’’

‘‘नहीं, अब चलो।’’

‘‘तो तुम जाओ, हम अभी आते हैं।’’

‘‘हम चाची से बता देंगे कि विशू तालाब पर खूब शैतानी कर रहा है।’’

कहकर मीरा सचमुच चल पड़ती। कहने को तो विशू कह देता, जाओ बता देना, हमें किसी का डर नहीं पड़ा है, लेकिन जल्द ही उस धमकी का असर उस पर छा जाता। अधरस्ते ही वह मीरा को पकड़ लेता। खुशी में मीरा यह पूछना भूल जाती कि जब उसे किसी का डर नहीं पड़ा है तो फिर चला क्यों आया। रास्ते में हमेशा कोई फूलों का गुच्छा या कोई विचित्र से रंग का पत्ता तोडऩे के लिए विशू से आग्रह करती। कुछ पेड़ों पर तो वह चढ़ जाता, लेकिन कुछ इतने पतले या झाड़ीनुमा होते कि उनके फूल तोडऩे के लिए जमीन पर से ही कोशिश करना पड़ती।

जब वह उचक कर भी वहाँ तक नहीं पहुंच पाता तो मीरा उससे घोड़ा बनने को कहती। विशू दोनों हाथ जमीन पर टेक देता तो वह फूल तोडऩा छोड़ उसका गर्दन पर सवार हो जाती। उसकी चड्डी में से हमेशा पेशाब के साथ, धुले कपड़ों की मिली-जुली बास आती थी, जिसे वह सूँघना न चाहते भी सूँघता था। मीरा एक बार बैठ जाता तो तब तक उसकी गर्दन नहीं छोड़ती जब तक कि विशू खुद उसकी पतली टांगों के बीच से सिर न निकाल लेता। इस प्रयास में अक्सर दोनों ही जमीन पर गिर पड़ते। विशू कहता कि अब वह कभी उसके लिए फूल नहीं तोड़ेगा लेकिन ऐसी बातें या तो वह कहने के साथ ही भूल जाता, या उसे उसमें कुछ भी अजीब नहीं लगता कि वह जब कुछ कहता है तो फिर उसे करता क्यों नहीं।

मीरा के बिना विशू की समझ में नहीं आ रहा था कि घाट पर क्या करे। पत्थर उचटाने के खेल से बहुत जल्द ऊब कर अब वह एक पेड़ के नीचे बैठा था। तालाब के दूसरे किनारे के पास एक आदमी नंगे बदन डोंगे में बैठा, मछली मार रहा था। सारे तालाब पर छोटी-छोटी लहरें उभरी थीं। जिनके ऊपर सूरज गोल टुकड़ों में चिलक रहा था। कभी-कभी कोई चिडिय़ा बहुत तेजी से नीचे आ, पानी की सतह को छूती फिर आसमान में उड़ जाती। मीरा को रुला कर अब विशू को बहुत बुरा लग रहा था। उसे मीरा पर कुछ गुस्सा भी आया कि वह उतनी जल्दी रोने क्यों बैठ गयी। उसे आश्चर्य था कि मीरा इतनी-सी बात भी क्यों नहीं समझ सकी कि वह दाँत खपरैल पर कभी भी नहीं फेंकता। चूहे के बिल को छोड़ टूटे दाँत के लिए और कोई जगह होती ही नहीं।

मीरा ने जब कहा, ‘‘विशू चलो, तुम्हें चाची बुला रही हैं’’ तो वह चौंक गया। उसने मुड़ कर देखा तो वह दूसरी तरफ देखने लगी। पहले तो उसकी समझ में नहीं आया कि अम्मा को उसने कौन-सा काम आ पड़ा, लेकिन मीरा को दूसरी ओर देखता पा, वह काफी डर गया। उसकी इच्छा हुई कि चुगली करने पर मीरा को पकड़कर मार लगाए, लेकिन एक अपराध के बाद दूसरा अपराध करने पर उसमें हिम्मत नहीं थी।

‘‘जाओ, अम्मा से कह दो कि हम थोड़ी देर में आते हैं।’’

‘‘नहीं, उन्होंने कहा है कि उसे लेकर जल्दी आओ। वह बरामदे में खड़ी हैं।’’

‘‘तुमने चुगली क्यों की, हम क्या तुम्हें दाँत दे नहीं देते?’’ विशू ने मीरा को छोटा-सा सफेद दाँत लौटा दिया। मीरा मन में जरूर खुश हुई होगी। लेकिन विशू से बिना कुछ कहे वह उसके पीछे-पीछे चलने लगी।

‘‘हम अम्मा से कह देंगे कि दाँत तो हमने पहले ही मीरा को लौटा दिया था।’’

‘‘वह मानेंगी ही नहीं।’’

‘‘तुम चुप रहो। तुमसे कौन बात कर रहा है?’’

‘‘नहीं रहते, जाओ।’’

‘‘तुम्हें मार तो नहीं खानी, मीरा?’’

‘‘तुम हमें मारोगे तो चाची तुम्हें भूसे वाली कोठरी में बंद कर देंगी?’’

विशू कुछ नहीं बोला। एक बार मीरा को खेल-खेल में मारने पर सचमुच उसे काफी देर उस कोठरी में बन्‍द रहना पड़ा था। यदि मीरा की माँ उसे न निकालती तो उसकी माँ ने तो तय कर लिया था कि उसे रात भर बन्‍द रखेंगी। उसने एक बार मुड़ कर मीरा को देखा कि शायद बचाव का कोई रास्ता निकल आए, लेकिन वह जमीन की तरफ देखती चल रही थी। घर के अहाते में पहुँच विशू की चाल बहुत धीमी पड़ गयी। इधर-उधर देखता, जब वह बरामदे के बिल्कुल करीब पहुँचा तो उसे अम्मा कहीं नहीं दिखीं। इससे पहले कि वह मीरा से कुछ पूछता, उसकी पीठ पर एक घूँसा मार, क्या बुद्धू बनाया-क्या बुद्धू बनाया गाती मीरा चौके की तरफ भाग गयी।

उसे बचाने वालों की वहाँ कमी नहीं होगी, यह सोच विशू अपनी माँ के कमरे में आ, खाट पर लेट गया। इस तरह से बुद्धू बन जाना उसे बहुत अखरा। उस समय घर में हो रहा हल्ला उसे बिल्कुल अच्छा नहीं लगा। पड़ोसी के यहाँ जगह कम होने से उनके कई मेहमान मीरा के यहाँ टिके थे। उनके साथ आये बच्चे तमाम वक्त रोते-चिल्लाते रहते। उनसे, बहुत थोड़ी जान-पहचान होने के कारण, विशू कतराता था। वैसे, उन बच्चों का अपना गिरोह ही इतना बड़ा था कि उन्हें विशू या मीरा को अपने खेलों में शामिल करने की जरूरत महसूस नहीं होती थी। मीरा जरूर कभी-कभी उनमें से कुछ को फोड़ अपना अलग दल बना लेती जिसमें उसके चाहने पर भी विशू नहीं रहता था।

किवाड़ के पास से मीरा ने उसे पुकारा तो उसने आँखें बन्‍द कर लीं।

‘‘विशू, देखो हम कौन-सी किताब लाये हैं,’’  कहती वह उसका खाट के पास आ गयी।

‘‘विशू।’’

‘‘क्या है?’’

‘‘लो, यह किताब लाये हैं हम तुम्हारे लिए।’’

‘‘हमें नहीं चाहिए तुम्हारी किताब।’’

मीरा थोड़ी देर चुप खड़ी रही फिर किताब उसका खाट पर रख, बाहर चली गयी। अच्छी तरह से आश्वस्त होकर कि वह कहीं से देख नहीं रही है, विशू वह जासूसी उपन्यास पढऩे लगा। करीब दस-बारह पन्ने पढऩे के बाद आहट सुनकर वह फिर सोने का बहाना करने लगा। उसकी खाट से थोड़ा हट कर मीरा ने फर्श पर कैरम बोर्ड बिछा दिया। विशू अधमुंदी आँखों से उसे गोट गलत जमाकर खेलते देखने लगा। वह कैरम बोर्ड बहुत पुराना था। उस पर चारों तरफ खिंची समानांतर रेखायें लगभग मिट चुकी थीं। सिर्फ एक छेद को छोड़ बाकी की, मटमैली जालियाँ फट कर नीचे झूलने लगी थीं। उन फटी जालियों वाले छेदों में गोटें गिरतीं तो अक्सर लुढ़कती बहुत दूर तक चली जातीं। मीरा को खेल से अधिक ऐसी गोटों को पकडऩे में मजा आता था। कैरम बोर्ड की रेखायें यदि स्पष्ट  होतीं, तब भी मीरा के निकट कोई अन्‍तर न पड़ता। वह गप्पे को कहीं भी रखकर निशाना साधती थी।

‘‘मीरा, तुम बहुत हल्का कर रही हो।’’

मीरा इतनी जोर से चौंकी कि गप्पे पर उसका उँगली फिसल गयी।

‘‘हम तो खेल रहे हैं।’’

‘‘तुम बाहर जाकर क्यों नहीं खेलती?’’

‘‘तुम भी खेलों न हमारे साथ विशू।’’

‘‘तुमसे गोटें तक तो जमाते नहीं बनतीं।’’

‘‘अच्छा, दिखायें जमाकर?’’

विशू के हाँ कहने पर दोनों कुहनियाँ कैरम बोर्ड पर रख, मीरा बड़ी लगन से गोटें जमाने लगी। बीच-बीच में वह अपनी समझ में कोई गलती करती तो थोड़ी देर गाल में उँगली धँसा कर कुछ सोचने लगती, फिर किसी काली गोट की जगह सफेद या सफेद की जगह काली गोट रख देती। सभी गोटें रख चुकने पर उसने विशू की तरफ देखा तो वह, एकदम गलत, कहकर कैरम बोर्ड के पास जा बैठा।

‘‘ठीक तो है विशू।’’

जवाब न दे, वह उन्हें ठीक से जमाने लगा। मीरा ने नीला गप्पा अपने हाथ में ले लिया। काली गोटें उसे अच्छी नहीं लगती थीं। उसे पता था कि जो शुरू करता है, उसकी सफेद गोटें होती हैं।

वे खेलने लगे। मीरा जब अचरज से उसे एक के बाद एक गोटे लेते देखती तो विशू बहुत खुश होता, लेकिन थोड़ी ही देर में वह ऊब गया। मीरा इतनी जल्दी अपनी बारी खो देती कि उसे लगता वह अकेला ही खेल रहा है।

‘‘हमें तो भूख लगी है।’’

‘‘आज तो सरला दीदी के यहाँ खाने जाना है।’’

‘‘चलो चौके में कुछ खा लेंगे।’’

मीरा ने फिर एतराज नहीं किया। खाना उसके प्रिय कामों में एक था। चौके में उन्हें खाने को कुछ नहीं मिला, लेकिन मीरा को वह जगह मालूम थी जहाँ उनसे छिपाकर मिठाइयाँ या फल रखे जाते थे।

अच्छी तरह खा कर वे अपनी करतूत छिपाने में लगे थे कि तभी बाजों की आवाज सुनाई दी।

‘‘विशू, बारात।’’ मीरा लगभग चिल्ला पड़ी।

दौड़ते-दौड़ते वे पड़ोसी के घर पहुँच गये। मीरा के पिता उस घर के अन्य लोगों के साथ वहाँ खड़े थे। उन सभी के हाथों में मालायें थीं जिन्हें वे बारातियों को पहना रहे थे। वे दोनों भी एक-दूसरे का हाथ थामे, वहाँ जाकर खड़े हो गये। मीरा को कई लोगों ने प्यार से अपनी मालायें पहना दीं। विशू को भी शायद पहनाते, लेकिन वह थोड़ा हट कर खड़ा हो गया था। उसे उन लोगों से काफी शर्म लग रही थी। वैसे भी वह नये लोगों से बहुत झेंपता था। उसकी माँ जब किसी मेहमान से कहतीं, ‘मेरा विशू चौदह का हो गया है’ तब भी उसके कान जलने लगते।

सब लोगों के साथ विशू भी पण्‍डाल में आ गया। मीरा अपनी सरला दीदी को देखने घर में चली गयी। पण्‍डाल में लगी रंगीन कागज की झंडियाँ हवा में फरफरा रही थीं। बाहर का अन्‍धेरा तेज रोशनी में और भी घना हो गया था। वहाँ, रोशनी में चमकती आसपास के पेड़ों की निचली डालों के अतिरिक्त, कुछ भी नहीं दिख पड़ता था। उन लोगों को शरबत पीते देख विशू की भी इच्छा हुई कि पिए। उसने सोचा, यदि कोई खुद लाकर दे देगा तो वह पी लेगा। काफी राह देखने पर भी जब कोई उसके पास नहीं आया तो वह मीरा का इंतजार करता, पण्‍डाल के बाहर, विरल घास पर लेट गया। मीरा उसे ढूँढती जब उस किनारे पहुँची जहाँ वह लेटा था, तो विशू ने उसे बुला लिया।

‘‘विशू, सरला दीदी बहुत खराब है,’’ कहती वह उसके पास जाकर बैठ गयी।

‘‘क्यों?’’

‘‘उन्होंने हमसे बात ही नहीं की।’’

‘‘मीरा, तुमने शरबत पिया?’’

‘‘हाँ, दो गिलास। खूब अच्छा है। तुमने कितने गिलास पिये विशू?’’

विशू चुप रहा। उसने सोचा मीरा से अपने लिए मंगवाए, लेकिन टाल गया।

‘‘विशू, तुमने सरला दीदी की साड़ी देखी?’’

‘‘कैसी है?’’

‘‘इतनी चमक रही है कि क्या बतायें। अम्मा चाची से कह रही थीं कि बनारस से लायी है।’’ कहकर मीरा उसके पास लेट गयी।

‘‘हमें तो नींद आ रही है विशू।’’

‘‘यहाँ मत सोओ, घर चलकर सोना।’’

‘‘विशू, हमारा एक दाँत और हिल रहा है। तुमने चौके वाला बिल देखा है?’’

‘‘नहीं।’’

‘‘खूब बड़ा है, सबेरे तुम्हें दिखायेंगे।’’

उसके बाद जब एक बार विशू कहकर वह काफी देर चुप रही तो विशू ने उसकी तरफ देखा। वह सो चुकी थी। उसका एक हाथ छाती पर पड़ा था। विशू के सिर में छोटे-छोटे कंकड़ गड़ रहे थे। उसने मीरा के पेट पर सिर रख लिया। काफी देर तक उसके पेट से आती गुड़-गुड़ आवाज सुनता इस बात से खुश होता रहा कि कल नहीं तो परसों तक वे पिन्ने बच्चे यहाँ से चले जायेंगे, फिर मीरा को घर ले जाने के लिए जगाने लगा।

गौरैया का पंख: केवल तिवारी

युवा लेखक-पत्रकार केवल तिवारी की कहानी-

गर्मियां शुरू होने पर दो बातें हमेशा कुछ परेशान-सी करती हैं। मुझसे ज्यादा मेरी पत्नी और बच्चे को। एक समस्या को पत्नी अपने हिसाब से कम-ज्यादा मान बैठती है, दूसरी शाश्वत समस्या है। इन समस्याओं में एक तो  कूलर को अपने मन से शुरू न कर पाने का दंश और दूसरा बच्चे के स्कूल से मिला भारी-भरकम होमवर्क। कूलर हम कई बार इसलिए अपने मन से नहीं खोल पाते क्योंकि अक्सर हमारा वह कबूतरों के लिए ‘मैटरनिटी सेंटर’ बन जाता है। कूलर खोलते ही कभी वहां कबूतरनी अंडों को  सेती हुई दिखती है और कभी छोटे-छोटे बच्चों के मुंह में खाने का कुछ सामान ठूंसती हुई सी। कबूतरों का मेरे कूलर के प्रति प्रेम कई वर्षों से है। जब मेरी मां जीवित थी, कहा करती थी घर में चिडि़यों का घोंसला बनाना बहुत शुभ होता है। किराये के एक मकान में एक बार कबूतर ने हमारे घर में घोंसला बनाया, अंडे दिए और उसके बच्चे हमारे सामने उड़े। उसके कुछ माह बाद मेरे घर में पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। घोंसला बनाना और उसमें बच्चे होना शुभ होता है, यह बात मेरी पत्नी के दिमाग में घर कर गई है। लेकिन कबूतरों के प्रति मेरे मन में स्नेह कभी नहीं पनप पाया। उल्टे एक बार चोरी-छिपे मैंने उसके घोंसले को  तोड़ दिया था। असल में उसका घोंसला अभी बन ही रहा था कि गर्मियों ने ऐसा तेवर दिखाना शुरू कर दिया कि कूलर की जरूरत महसूस होने लगी। मेरी पत्नी ने ताकीद की कि कूलर की सफाई करने में मेरी मदद करो। मैंने तुरंत हां कर दी और काम की शुरुआत पहले मैं ही करने के इसलिए राजी हो गया क्योंकि मुझे पूरी आशंका थी कि घोंसला देखते ही वह कूलर वाली खिड़की के किवाड़ बंद कर देगी। और न जाने कितने दिन ये किवाड़ बंद रहेंगे। हो सकता है पूरी गर्मी भर। इस आशंका को भांपते हुए मैंने पत्नी को चाय बनाने भेजा और कूलर वाली खिड़की खोलने लगा,  देखा कबूतरों का एक जोड़ा अपना घर बनाने में मशगूल है। खिड़की खोलते ही जोड़ा तो  उड़ गया, लेकिन आशियाना लगभग तैयार था। मैंने सबसे पहले उसे उठाकर नीचे फेंक दिया। असल में हमारे पूरे मोहल्ले में इतने अधिक कबूतर हैं कि हर समय वही चारों तरफ दिखते हैं। जहां बैठे तुरंत गंदगी कर देते हैं। बालकनी को दिनभर साफ करते रहो। कपड़े तार में डाले नहीं कि तुरंत गंदा कर दिया।

कूलर अंदर खिसकाने की आवाज सुनते ही पत्नी आई और बोली कोई घोंसला तो  नहीं बनाया है न कबूतरों ने। मैंने कहा, नहीं। उसने ‘अच्छा’ इतनी जोर से कहा, जैसे आश्चर्य और खुशी दोनों बातें उसमें मिली हुई हों। खैर वह गर्मी हमारी ठीक कटी। कूलर चलने के बाद जब तक वह रोज खुलता, बंद होता कोई पक्षी वहां अपना आशियाना बसाने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। उन्होंने आसपास अपना ठौर ढूंढ़ लिया। वह वर्ष बच्चे के स्कूल का पहला साल था, इसलिए होमवर्क भी बहुत नहीं मिला था और वह गर्मी हमारे लिए बहुत अच्छी बीती।

इस साल भी गर्मी भयानक पड़ी और गर्मी शुरू होने से पहले से ही कबूतरों का खौफ मेरे मन में था। माताजी वाले कमरे का कूलर हमने अंदर ही निकाल रखा था। क्योंकि मां अब इस दुनिया में रही नहीं, वह कमरा अमूमन खाली भी रहता है। कभी कोई मेहमान आ गया तो ठीक। या फिर टीवी देखना हो या खाना खाना हो  तो  हम उस कमरे का इस्तेमाल करते हैं। उस कमरे के कूलर को पहले से इसलिए अंदर निकालकर रख दिया गया कि कहीं दूसरे कूलर के पास अंडे-बच्चे हो गए तो  इस कूलर का इस्तेमाल किया जा सकेगा। दूसरे कमरे के कूलर के आसपास भी मैं कबूतरों को फटकने नहीं दे रहा था। होते-करते कबूतर मुक्त कूलर की खिड़की हमें मिल गई, लेकिन उनका अड्डा बालकनी और अन्य स्थानों पर होने लगा। उनकी संख्या लगातार इस कदर बढ़ रही थी कि कभी-कबार पत्नी भी झल्ला जाती। खासतौर पर तब, जब उसे धुले कपड़े दोबारा धोने पड़ते।

इस गर्मी में कूलर तो गर्मी शुरू होते ही चल निकला, लेकिन बच्चे को होमवर्क अच्छा-खासा मिल गया। खैर यह होमवर्क तो मिलना ही था, इसलिए यह मान लिया गया कि कोई बात नहीं, किसी तरह से कराएंगे। बच्चा अपनी मां के साथ लखनऊ एक विवाह समारोह में चला गया और योजना बनी कि कुछ दिन वहां मेरे बड़े भाई के घर रहा जाए। बच्चा अपने ताऊ और ताई के साथ रहना और मौज-मस्ती करना बहुत पसंद करता है। इधर छोटे से बच्चे को  भी अपने होमवर्क की बहुत चिंता थी। मैंने भरोसा दिलाया कि कुछ काम लखनऊ में पूरा हो जाएगा। मेरी दीदी का छोटा बेटा कुछ करा देगा और कुछ काम मैं पूरा करा दूंगा। उसके मिले तमाम कामों में एक यह भी शामिल था, जिसमें पांच प्रकार की चिडि़यों के पंखों को एकत्र करना था। मैंने इस काम को  पूरा करने की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली।घर में अकेला था।

एक दिन सुबह देर से उठा, बालकनी का दरवाजा खुला तो देखा वहां गौरैया इधर-उधर घूम रही है। कबूतरों से नफरत करने वाला मैं गौरैया को देखते ही बहुत खुश हो गया। मुझे इस बात का दुख हुआ कि मेरे पास कैमरा नहीं है। एक पुराना कैमरा है भी तो रील वाला, उसमें रील नहीं है। मेरे बालकनी में जाने से वह भाग नहीं जाए, इस आशंका से मैं अंदर आ गया। जिज्ञासावश थोड़ी देर बाद मैं फिर बालकनी मैं गया। मैंने चारों तरफ देखा मुझे गौरैया नहीं दिखी। मुझे तमाम उन खबरों की जानकारी थी, जिसमें कहा जा रहा था कि गौरैया अब कहीं नहीं दिखती। उनकी प्रजाति विलुप्‍त होने की कगार पर है। मुझे लगा हो  न हो मेरा भ्रम रहा होगा। वह पंछी गौरैया तो  नहीं रही होगी। तभी मैंने देखा फुर्र से उड़ती हुई बालकनी की छत से गौरैया सामने की छत की तरफ उड़ गई। मैंने जिज्ञासावश बालकनी की छत की ओर देखा। वहां पंखा लगाने के लिए बने बिजली के बड़े छेदनुमा गोले में कुछ घासफूस लटकती दिखाई दी। गौरैया मेरे घर में घोंसला बना रही है। मैं इतना खुश हो गया मानो मुझे कोई खजाना मिल गया हो। मैंने बालकनी में कुछ चावल के दाने बिखेर दिए और बालकनी बंद कर कमरे में आ गया। अब मैं दरवाजे के छेद से देख रहा था, गौरैया बार-बार उन दानों को उठाती। फिर कहीं से तिनका लाती और बालकनी की छत में अपने आशियाना बनाने में मशगूल हो जाती। मैं मन ही मन बहुत खुश हुआ कि चलो  शायद गौरैया जिसके बारे में कहा जा रहा है कि विलुप्‍त होने वाली है अब कुछ बच्चों को  यहां जनेगी।

अब मेरी जिज्ञासा रोज बढ़ती। सुबह उठकर मेरा पहला काम उस घोंसले की तरफ देखना होता था। नीचे रखे गमले में मैं कुछ पानी भर देता। शायद इसमें से वह पानी पी लेगी। एक दिन तो मेरी खुशी सातवें आसमान पर थी। मैंने देखा गौरैया का छोटा सा बच्चा मुंह खोलकर चूं-चूं कर रहा है और उसकी मां इधर-उधर से कुछ लाकर उसके मुंह में डाल रही है। कई बार टुकड़ा बड़ा होता तो  नीचे गिर जाता। गौरैया फट से नीचे आती उस गिरे टुकड़े को उठाकर ले जाती और अपने बच्चे के मुंह में डाल देती। इस बार आश्चर्यजनक यह था कि मेरे वहां खड़े होने पर भी गौरैया डर के मारे भाग नहीं रही थी। मैं यह देखकर कुछ चावल के दाने और ले आया। मेरे सामने ही गौरैया उन दानों पर टूट पड़ी। मैंने फिर बालकनी का दरवाजा बंद किया और अपने काम में मगन हो गया। मन किया कि लखनऊ फोन करके बताऊं कि गौरैया ने एक घौंसला बनाया है। बालकनी की छत पर। उसका बच्चा भी हो गया है। शायद मेरी पत्नी बहुत प्रसन्न हो।  इसलिए कि अक्सर कबूतरों को  भगाने और उन्हें घोंसला नहीं बनाने देने को  आतुर एक चिडि़या का घोंसला देखकर कितना खुश हो  रहा है। लेकिन एक हफ्ते बाद वे लोग आ ही जाएंगे, फिर उन्हें सारा नजारा दिखाऊंगा, यह सोचकर मैंने फोन नहीं किया। कैमरा नहीं होने का दुख मुझे सालता रहा। मैं बालकनी बंद कर घर में आ गया और नहाने के बाद आफिस के लिए निकल गया। आफिस के रास्ते में अनेक मित्र मिले, मैंने सबसे गौरैया के घोंसले की बात बताई। किसी ने कहा, वाह कितनी अच्छी बात है। ज्यादातर ने यह कहा कि गौरैया का घोंसला बनाना तो बहुत शुभ होता है। इधर बच्चे के होमवर्क के लिए चिडि़यों के पंख एकत्र करने की बात मुझे याद आई। कबूतरों के तो अनगिनत पंख मेरे इर्द-गिर्द रहते हैं, कभी-कभार देसी मैना भी दिख जाती है। मैंने कहा, पंख एकत्र हो  ही जाएंगे। मेरे मन में इन दिनों रोज-रोज बढ़ते गौरैया के बच्चे को लेकर उत्सुकता बनी हुई थी। मैं कल्पना करता काश! यहीं गौरैया अपना स्थायी निवास बना ले। यह बच्चा हो, इसके बच्चे हों। कभी दूसरी गौरैया आए। इस तरह के तमाम खयाल मेरे मन में आते। गौरैया परिवार की चर्चा भी अक्सर अपने मित्रों से करता।

खैर एक दिन गौरैया के बच्चे को अपनी मां के मुंह से रोटी का छोटा-सा टुकड़ा खाता देख मैं आफिस चला गया। अगले दिन मैं किसी मित्र के यहां रात में रुक गया। उसकी अगली दोपहर घर पहुंचा तो  सबसे पहले बालकनी में पहुंचा। बालकनी में बच्चा जो  धीरे-धीरे बड़ा हो रहा था उल्टा लटका हुआ था। वह अक्सर तब भी ऐसे ही लटकता दिखता था, जब उसकी मां उसे खाना खिलाती थी। मैं दो-चार मिनट तक उसे लगातार देखता रहा। मेरा दिल धक कर रहा था। उसमें कोई हरकत नहीं दिख रही थी। उसकी मां भी कहीं नहीं दिख रही थी। एक दिन पहले वहां डाले चावल के दानों में से कुछ किनारे पर पड़े हुए थे। मैं कुछ समझ नहीं पाया। मैंने कुर्सी लगाकर जोरदार तरीके से ताली बजाई। लेकिन बच्चे में कोई हरकत नहीं हुई। वह बस उसी अंदाज में उल्टा लटका हुआ था। मैंने गौर से देखा कि बच्चा मर चुका था। उसकी मां गायब थी। मैं अंदर आकर धम से बैठ गया। मन बहुत खिन्न हो  गया। कभी इधर जाता,  कभी इधर। पानी पीने को  भी मेरा मन नहीं हुआ। फिर बालकनी में गया, मरे हुए बच्चे का एक पंख नीचे गिर गया। मैं समझ नहीं पा रहा था कि इस पंख को अपने बच्चे के होमवर्क के लिए सहेज कर रख लूं या उड़ जाने दूं।

 

हबीब का घर : जवाहर गोयल

प्रसिद्ध लेखक जवाहर गोयल की कहानी-

हम सबको उस दिन भी क्रिकेट खेलना था। क्योंकि वह छुटटी का दिन था। फिर हबीब मियां का फरमान था कि स्कूल टीम को रोज अभ्यास करना जरूरी है। लेकिन कप्तान के कहने के बावजूद हम लोगों ने मैदान देर से पहुचना तय किया था। हबीब को हमने पहले ही बता दिया था कि सुबह हम सभी उनके घर सेवैंया खाने आएंगे। फिर वहीं से खेलने के लिए स्कूल पहुंचेंगे। उस दिन ईद थी।
हबीब का घर जिस इलाके में था,  उसकी सड़कें कच्ची थीं। सड़क की गिट्टियां उखड़ी रहने से साइकिल पंचर होने का भय हमेशा रहता था। तंग गलियों में उन कच्चे-पक्के मकानों के बीच में हबीब का घर था। उस गली के ज्यादातर मकानों के दरवाजे-खिड़कियों में बोरे का फट्टा पुरानी चादर या रंगीन प्लास्टिक, आड़ के लिए पर्दों के बतौर टंगे रहते थे। वहां कौन क्या पेशा करता है,  समझना आसान नहीं था। शहर छोटा था। सभी एक-दूसरे को पहचानते थे। कोई भी एक-दूसरे के लिए पूरा अजनबी नहीं था। उस गली में दूसरे मकानों की बनिस्‍बत हबीब का मकान अपेक्षाय: संपन्न लगता था। एक वही पूरा सीमेंट का बना पक्का मकान था। मय छत और सीमेंट के खप्परों वाले छप्पर के, खिड़कियां काठ की थीँ। बनने के बाद उन पर कभी रंग नहीं हुआ था। इस कारण खिड़कियों का काठ पुराना और काला-सा हो गया था। पर बुरा नहीं लगता था। खिड़कियां शायद कभी खुली ही नहीं या फिर हमने उन्हें कभी खुला नहीं देखा।
इसी तरह दरवाजे के निचले हिस्से का काठ भी काफी कुछ गल चुका था। दरवाजा तब भी मजबूत था। उघारे काठ का ऊपरी हिस्सा, खासकर कब्जों के पास का पूरा भाग, पूरी तरह दुरुस्त था। भले ही धूसर काला-सा लगता था। शहर में ऐसे बहुत ही कम घर थे जिनमें बिजली की घंटी लगी हो। मेरे किसी भी मित्र के घर बिजली की घंटी नहीं लगी थी। दरअसल घरों के दरवाजे दिन में बंद नहीं किए जाते थे। जब सब सोने को हाते तब ही दरवाजों को बंद किया जाता। हम लोग तो सड़क से ही दोस्‍त को आवाज लगाते हुए, घर में सीधा भीतर तक चले जाते। जिससे मिलना चाहते थे, उसे खोजकर या फिर वहां जो भी मिला उससे बतियाकर लौट जाते थे। किंतु हबीब के घर बिजली की घंटी लगी थी। बाहर के दरवाजे की चौखट पर ऊपर की ओर बिजली की घंटी का काले प्लास्टिक का गोल बटन धूप में साफ चमकता था। इसे दबाने पर जोरों से किर्र को आवाज गूजंती..। उस गली के शांत,  मंद मिजाज में वह आवाज चारों ओर ऐसी गूंजती कि हम लोग थोड़ा सहम-सा जाते, कि आवाज सुनकर कोई नाराज न हो जाए। लेकिन जल्दी से कोई उत्तर भी नहीं मिलता था। थोड़ी देर के बाद ऊपर छत की तरफ से या फिर भीतर वाले कमरे से कोई खटका सुनाई देता या किसी हरकत की आवाज होती। ‘कौन’ या ‘आया’ की आवाज नहीं आती। थोड़ी देर के बाद दरवाजा खुलता। कई बार जब दरवाजा खुलता तो उसे खोलनेवाला आड़ में होता और दिखाई नहीं देता। या फिर दरवाजा खोलने के बाद, आड़ से हटकर भीतर चला गया होता, बिन कुछ कहे। दरवाजे के पीछे लोहे की एक सांकल थी। लकड़ी का एक खटका भी था। पहले सांकत खोली जाती। सांकल के झूलने से कड़-कड़ की आवाज होती। जब खटका झटकाया जाता तब लकड़ी के घिसने की आवाज के साथ दरवाजा एक खड़ी दरार में खुल जाता। बाहर धूप होने के बावजूद दरवाजे की खुली दरार के भीतर अंधेरा दिखाई देता। तब हम लोग दरवाजा ठेलकर, सड़क पर पड़े उस बड़े चौकोर पत्थर पर पैर रखकर भीतर घुस जाते, जो सीढ़ी का काम देता था। ये सारी बातें इतनी भिन्न पर सहज थीं कि कभी मन में यह उत्सुकता नहीं हुई कि दरवाजे के गल गए निचले हिस्से से हम भीतर झांककर देखते कि दरवाजा किसने खोला था।
यदि दरवाजा इफ्तिकार भाई या एजाज साब ने खोला होता तो ये दरवाजा खोलने पर अवश्य कहते ‘हबीब चला गया’ या ‘बैठो, आता है।’ इफ्तिकार भाई हबीब से तीन साल बड़े थे। वे ही हबीब के पहले स्कूल की क्रिकेट टीम के कप्तान थे। वे तब स्कूल की टीम में आरंभिक गेंदबाज और आरंभिक बल्लेबाज दोनों ही थे। वे ही स्कूल टीम के एकमात्र ऐसे खिलाड़ी थे जो सफेद पतलून,  सफेद कमीज व सफेद चमड़े के जूते पहनते थे। उनके पास क्रिकेट के बड़े खिलाडिय़ों के समान, क्रिकेट की एक गोल सफेद टोपी भी थी। जो मैंने पहली बार उन्ही को पहने देखी थी। उनकी पतलून में, दायीं जेब के सामने का हिस्सा, गेंद के लगातार घिसे जाने के कारण हमेशा लाल दाग लिए होता था। उन दिनों हम लोग मैदान में जाकर क्रिकेट खेलने की हिम्मत नहीं कर पाते थे। स्‍कूल के लाल बजरीवाले रास्ते पर ही मैंटिंग बिछाकर खेलते थे। दरवाजा खोलने पर इफ्तिकार भाई ओठों को एक ओर तिरछा खींचकर मुस्कुराते कहते, ‘कैसे हो’ या चौंकते ‘अरे आप।’ मुझे सुनकर बहुत अटपटा लगता। उनका लहजा नफासत लिए काफी संतुलित और नपा-तुला होता। तब तक मैंने अपने लिए ‘आप’ का संबोधन किसी और से नहीं सुना था। तुम और तू से ही सारा काम पूरा हो जाता था। तब मेरी उम्र ही क्या थी। मुझे उनका आप, उनके घर में पहले कमरे के उस पर्दे की तरह लगता, जो भीतर जाने  वाले दरवाजे पर लटका,  बाकी घर को अदृश्य करता था। वह नीली छींट का पुराना सूती परदा था। लगभग जमीन को छूता हुआ। परदा लकड़ी के गोल डंडे पर कसकर इस तरह लगा था कि उसे बिल्कुल भी सरकाया नहीं जा सकता था। हबीब के घर का यह पहला कमरा एकदम खाली था।
उसे कमरे में सादे काठ की एक पुराने बेंच के अलावा और कुछ भी नहीं था। यहां घुसने पर हम लोग पैर हिलाते उस बेंच पर बैठ जाते और हबीब के बाहर निकलने की प्रतीक्षा करते। खाली कमरे की दो दीवालों में दो खिड़कियां भी थीं। उनके लोहे के काले सींखचे अपनी खास मौजूदगी बताते लगते। ये दोनों ही खिड़कियां सदा से बंद थीं। इनका सादा काठ पुरानेपन के कारण काली-सी लकीरों से पट गया था। पहले कमरे का दरवाजा खुलते ही खाली कमरे में वह बेंच सामने दिखती। उस बेंच के पीछे की दीवार पर एक आलमारी बनी हुई थी। आलमारी के पल्ले लकड़ी के बने थे। उनमें कांच भी लगा था। आलमारी सदा खाली रहती आई। उसकी ताकों पर अखबार भी नहीं बिछाया गया। वह भी खड़ी दरार में अधखुली-सी रही।
यदि दरवाजा एजाज साब ने खोला होता तो हम अतिरिक्त अदब के साथ उन्हें नमस्‍ते कहा करते। एजाज साब,  इफ्तिकार भाई से काफी बड़े थे। वे सदा ही बहुत गंभीर दिखाई देते। अब सोचाता हूं तो ऐसा लगता है कि वह गंभीरता से अधिक उदासी थी। उस उम्र में तो उदासी शब्द का अर्थ भी पूरी तरह समझ में नहीं आता था। एजाज साब क्या करते हैं,  यह हम लोगों को मालूम नहीं था। ऐसा कम ही हुआ कि दरवाजा उन्हें खोलना पड़ा हो। या तो वे घर के भीतर ही रह आते होंगे या फिर घर या शहर के बाहर। सुना था कि बहुत साल पहले जब वे स्कूल के छात्र थे तब हमारे स्कूल की क्रिकेट टीम के कप्तान थे। बल्ले लाने के लिए एक बार जब हम लोग हबीब के घर गए, तब बल्ला देते हुए उन्होंने बल्ला पकडऩे के हमारे ढंग को जांचा था और समझाया था कि उंगलियों की पकड़ व हथेलियों का फासला कैसा होना चाहिए। शायद उसी वजह से,  उसके बाद मेरा डिफेंस पक्का हो गया और पांच फीट से भी नाटा होने के बावजूद मुझे स्‍कूल की टीम में पक्की जगह मिल गई। तब मेरे लेटकट और लेग ग्लांस पक्के हो गए थे।
हबीब के घर,  उस कमरे का पलस्‍तर पानी से भगकर कई जगह पर फूल गया था जिसे ठक-ठकाने पर पोली आवाज आती थी। पानी जरूर खिड़कियों से भीतर आता होगा। छत काठ की मोटी बल्लियों पर, बिना टूट-फूट के दुरुस्‍त फैली थी। कमरे की दीवार दो-तीन जगह रेत-सीमेंट के गारे से सुधारी गई थी। जिसमें वहां बडे़-बडे़ पुराने गाढ़े रंग के धब्‍बे पड़ गए थे। उन पर कभी पुताई नहीं हुई। घर में भी शायद पुताई कभी नहीं हुई। उस गली के मकानों में पुताई तभी होती जब कोई दीवार तोड़कर नया कुछ बनाया जाता। यहां के कच्ची मिट्टी के बने घरों में छुई या गोबार से लिपाई जरूर हो जाती थी- खासकर तीज-त्‍योहार आने पर। उस गली से गुजरने पर अक्‍सर लहुसन के तेज बघार की महक आती जो उसके मिजाज की हिस्सा थी।
हम जब बाहर के कमरे में बैठे हबीब का इंतजार करते होते, तब भी घर के भीतर किसी के बातचीत करने की आवाज कभी नहीं आती थी। हां, हबीब जब बल्ला लिए बाहर आता, तब उसका चेहरा खिला और मुस्कुराता हुआ होता। लगभग हमेशा ही वह कप्तानी आवाज में ‘चलो’ कहता,  और बाहर निकलकर सड़क पर खड़ा हो जाता। हम उसके बाद ही उसके घर के बाहर निकलते। फिर यह दरवाजा बंद हो जाता और सांकल लगने की आवाज आती।
हबीब इतना ऊंचा और दुबला था कि आश्चर्य होता, उसमें इतना दम खम कहां से आता था। उसे हर तरह की गेंदबाजी में महारत थी। खासकर उसकी स्पिन हवा में उछाल के साथ इतनी अचूक और कारगर होती थी कि हम सभी को विश्वास था कि आने वाले सालों में वह टेस्ट नहीं तो रणजी के मैच में तो जरूर खेलेगा। स्कूल की टीम का प्रमुख बल्लेबाज भी वही था। उसके रहते हमारी टीम दूसरी टीम से हार भी सकती है, सोचा नहीं जा सकता था। हबीब के लिए क्रिकेट से बढ़कर और कुछ भी नहीं था। पढ़ाई के बारे में हम लोगों में बातचीत कम ही होती। कापी-किताबों का लेन-देन भी नहीं करते थे। कभी-कभार साथ में सिनेमा देखने जरूर चले जाते थे। खासकर उस टाकीज में जो नई मस्जिद के पास थी। जहां टाकीज के बगल से कतार में लोहे की जाली बनाने वालों की दुकानें थीं, जिनमें लोहे की वैल्डिंग का काम होता रहता, जिसकी चिंगारियों का उचटना-चटखना देखते मन नहीं थकता था। इन्हीं दुकानों के बीच में कुछ खुली-सी खपरैली चाय की दुकानें भी थीं। जिनमें अक्सर लुंगी-बनियान पहने कुछ लोग बैठे चाय पीते रहते या अखबार पढ़ते होते। रेडियों में उर्दू खबरें सुनते रहते। ये होटल चौड़ी नाली के ऊपर बांस का रपटा बिछाकर, उस पर बेंच रखकर बनाए गए थे। इनके खंभों पर काबा का चित्र या किसी पीर-फकरी वाले कैलेंडर लगे होते थे। हबीब वहां चाय नहीं पीता था।
हबीब में गजब का आत्मविश्वास था। वह बहुत कम बोलता था। अपनी तरफ से बातों की शुरुआत भी कम ही करता था। उसके घर ईद के दिन हमें कांसे के बड़े से साफ कटोरेभर सेवैंया खाने को मिलती। गाढ़ा दूध ऊपर तक भरा होता। हमारे घर सेवैंया बनती नहीं थीं,  क्योंकि बनने पर वह केंचुआनुमा दिखती थी। हम लोग शाकाहारी थे। संस्कार इतने पक्के थे कि फुआ अक्सर झिड़कतीं- ‘मलेच्छ मत हो जाओ’, ‘मांस खाने वालों के घर मत खाया करो।’ चमकता,  दूध सेवैंयाभरा कटोरा कभी खराब नहीं लगा। न ही कोई हिचक हुई। न शाकाहारीपने पर ही कोई खरोंच आई।
उसके घर के बाहर वाले कमरे की उसी अकेली बेंच पर बिठलाकर हम सबको वहां सेवैंया खिलाई जातीं। उसके घर के भीतरी हिस्से में हम कभी नहीं गए, न ही झांका। न कभी हबीब की अम्मीजान को देखा। न ही कभी उनकी आवाज सुनी। हबीब का घर भीतर से एक अनजाने रहस्‍य की तरह हमारे लिए अबूझा रहा। उसके घर के बारे में हम सब कुछ भी नहीं जाते थे,  सिवाय इस बात के कि थोड़ा अलग तरह का होते हुए भी उसका घर,  हम सबके घरों सा एक घर था। कभी ऐसा नहीं लगा कि वे अभाव मे टूटते हैं। न ही कभी उस घर में संपन्नता का ही कोई सबूत दिया। सिवाय इसके कि हबीब मियां जब घर के बाहर निकलकर आते तब उनका चेहरा खिला हुआ व ताजा होता। उनके कपड़े साफ सुथरे रहते जिन्‍हें वे खुद ही धोते और इस्त्री करके पहनते थे। उनकी साइकिल भी साफ-सुथरी और दुरुस्त होती थी। सीट पर रेक्सीन का काला कवर।
स्कूल की पढ़ाई के बाद हबीब से मिलना नहीं हो सका। मैं शहर के बाहर पढऩे चला गया था और उसने उसी शहर के एकमात्र कॉलेज में दाखिला ले लिया। कई सालों बाद की बात है, एक बार जब शहर लौटा तब बस स्‍टैंड में ही कारदार भाई से मुलाकात हो गई। बड़ी अजीब-सी मुलाकात थी वह। जिस बस में मैं अपने शहर लौट रहा था, उसका एक चक्‍का रास्ते में पंचर हो गया था। बस सीधी वर्कशाप के टिन के शेड में जाकर लगी थी। बस से उतरकर टहलने लगा तो देखा कि जो मिस्त्री बस में जैक लगा रहा था, वह कोई और नहीं भाई अब्दुल कारदार ही थे। कारदार भाई हम लोगों से काफी बड़े थे। उम्र में तो इफ्तिकार भाई से भी अधिक के थे। शहर में एक मशहूर खिलाड़ी रह चुके थे। एक जमाने में हाकी टीम के गोलकीपर थे, फुटबाल टीम के फुलबैक थे और क्रिकेट टीम में विकेटकीपर और धुआंधार बल्‍लेबाज थे। राज्‍य की टीम में भी खेल चुके थे। मैंने बचपन में उनके कई मैच देखे थे। एक बार तो हाकी के फाइनल मैच में अपनी हारती टीम को बचाने के लिए उन्होंने एक अजीब काम किया। मैच के आखिरी पांच मिनट बचे थे। उनके टीम को एक गोल से पिछड़ रही थी। वे गोलकीपर थे। उन्होंने पैड उतारकर, लगभग जुनून में तेजी से दौड़कर आगे आकर, सेंटर फारवर्ड की भूमिका निभाई। पांच मिनट में उन्होंने दो गोल दागे। हजारों दर्शक स्तब्ध रह गए। हारती टीम को जिताकर वे लौटे। शहर में उन्हें कंधे पर उठाकर जुलूस निकला। उसके बाद जब कीनिया के साथ भारत के हाकी टेस्ट मैच देखे, तब मुझे लगा कि कारदार भाई, भारत के गोलकीपर शंकर लक्ष्मण से कम नहीं हैं।
वर्कशाप में बस के पंचर को सुधारते हुए  कारदार भाई ने मुझे उस दिन बताया था कि हबीब मियां दो सौ मील दूर, सतपुड़ा के जंगलों के बीच, किसी कागज बनाने वाली फैक्टरी में स्टोरकीपर हैं। शादी कर ली है और बच्‍चे भी हैं। उसके बाद बस स्टैंड से घर जाते हुए जब हबीब के घर के सामने से गुजरा, तब लगा कि वह गली पहले से अधिक संकरी हो गई है। सड़क व मकानात पहले से अधिक कमजोर हो गए थे। हबीब के घर का पलस्तर बुरी तरह झड़ चुका था। दरवाजे और खिड़कियां सदा की तरह बंद थीं। लगता था जैसे अब वहां कोई नहीं रहता हो। उसी यात्रा के दौरान,  अपने एक मित्र से वह बात पता लगी जिससे हबीब के घर का रहस्‍य कुछ-कुछ समझ में आने लगा।
आज इस बैसाखी दुपहरी में जाने क्‍यों हबीब मियां इस कदर यादों में आ रहे हैं? अपने शहर से हजारों मील दूर और अपने बचपने से अनेकों वर्षों बाद, इस कदर हबीब के यादों में उमड़ने का रहस्‍य क्‍या हो सकता है? मैं हबीब के घर के रहस्य को छोड़,  उनकी इस याद के रहस्य को समझने में उलझता चला गया।
दरअसल एक वारदात हुई थी। अखबारों से रोजाना यह ज्ञान तेजी से बढ़ रहा था कि हमारी जात क्या है और दूसरे की जात क्या है। हमारा धर्म क्या है और दूसरों का धर्म क्या है। इसी सब में मेरा मन कुछ उचाट रहने लगा था। इसी दौरान तमाम हादसों के बीच रोज सुबह आफिस जाते हुए, मेरी गाड़ी के हमसफर साथी बहुत उत्तेजित रहने लगे थे। मेरे ये साथी खुले मिजाज और खुली जबान के आदमी थे। सरकारी कंपनी में काम करते थे। उन्हें बराबर यह ध्यान रहता कि वे एक बड़े पद पर हैं। दर्जे के हिसाब से वे देश की चुनिंदा एक प्रतिशत जनसंख्या में गिने जाते। उन दिनों सुर्खियों में दंगों की खबरें थीं। सरकार के कमजोर पैर डगमगा रहे थे। गाड़ी में बैठते ही थोड़े से समय में वे अपने आप ढेर से बयान दे देते। उनकी भाषा बेबाक और बेलाग थी। साफ और आम गालियों से सज्जित थी। स्‍वभाव खरा और हरा था। वे ऐसा समझते थे कि अपनी बात कह देने से निजी कर्तव्‍य पूरे हो जाते हैं। मन में जो आता बेहिचक कह डालते। गाड़ी संकरी गली से गुजरती और सामने अगर उघारा खेलता बच्‍चा बीच सड़क में होता तो बुरी तरह चिड़चिड़ा जाते थे। उन दिनों उनके मन में यह विश्वास पक्का-सा हो गया था कि लोगों को एक बार में ही पूरा सबक सिखा देना चाहिए। उनकी बातें सुनते हुए जल्दी ही मैं ऊंधने लगता। क्योंकि मौन रहकर ही उन्हें नकारा जा सकता था। बातचीत मे उनसे उलझना उनके विलास को बढ़ावा देना था।
इसी ऊंघ के रास्ते से मुझमें हबीब की याद ने प्रवेश किया था। यह उनके चेहरे की याद नहीं थी। याद थी हबीब के घर के उस सूने कमरे की,  जो सीधा मुझे हबीब के हृदय की धड़कने सुना रहा था। हबीब के घर का वह कमरा इस तरह से खाली था। उसमें केवल एक उघारी बेंच पड़ी रहती थी। उसी तरह खाली और उघारी थी खुली आलमारी। पुराने काठ की काली पड़ गई खिड़कियां । लोहे के काले सींखचे। गल गए काठ के दरवाजे। याद आई उस उदासी की जो एजाज साब की गंभीरता में थी। उस सन्नाटे की जो घर के हर चप्‍पे में था, हर आदमी में था। याद आई हबीब की अम्मीजान की जिन्‍हें हम बच्चों ने कभी नहीं देखा। लेकिन जिनकी मौजूदगी दरवाजे की आड़ में, छींट वाले सूती परदे के पीछे और बंद खिड़कियों के मौन में हमेशा देखते रहे,  जानते रहे। क्यों नहीं मिल पाए उनकी अम्मीजान से हम? जब वे इतनी अच्छी सेवैंया बना भर-भर कटोरे खिलाती थीं,  तो अपने हाथों से क्यों नहीं दुलारा इमें उन्होंने ? क्या सिर्फ इसी शर्म से कि हबीब ने कभी अपने पिता को नहीं देखा था। पिता भी ऐसे जो हबीब के जन्म के बाद ही, हरा-भरा परिवार छोड़ कर पाकिस्‍तान चले गए। वहीं बस गए। दूसरा निकाह कर लिया। चार बच्चे कर लिए। वे फिर कभी लौटकर नहीं आए। कुछ सालों तक पैसा जरूर घर भेजा। पर बाद में तो खत आना भी बंद हो गए। याद आई हबीब की सटीक गेंदबाजी की स्पिन और करारे करीनेदार शाट्स, उस सन्नाटे को तोड़ते हुए जो उनके घर की डसे हुए था।
अचानक मेरी ऊंघ में एक ख्याल या सवाल कौंधा। मैं विस्मय से गाड़ी में बैठे साथी का चेहरा ताकने लगा। उस समय वे स्वयं से कहते हुए एक पूरी कौम को बर्खास्त कर रहे थे। ‘क्या हुआ, ऐसे क्यों,  ताक रहे हो?’ उन्‍होंने पूछा। मैं चुप रहा। मन में उठा सवाल उनसे पूछ नहीं पाया। क्‍योंकि मुझे साफ दिख गया था कि वक्‍त आने पर हबीब के पिता की तरह, वे भी कोई काम कर सकते हैं। मैं उन्‍हें ताकता रह गया।

जवाहर गोयल की अन्‍य रचनाएं

-छंटते बादल खि‍लती धूप : जवाहर गोयल

-जवाहर गोयल की कुछ कवि‍ताएं

टोबा टेक सिंह : सआदत हसन मंटो

उर्दू लेखक सआदत हसन मंटो (11 मई, 1912 – 18 जनवरी, 1955) का आज से जन्‍मशताब्‍दी वर्ष शुरू हो रहा है। इस अवसर पर उनकी कालजयी कहानी-

बँटवारे के दो-तीन साल बाद पाकिस्तान और हिन्‍दुस्तान की हुकूमतों को ख्याल आया कि अख्‍लाकी कैदियों की तरह पागलों का भी तबादला होना चाहिए, यानी जो मुसलमान  पागल हिन्‍दुस्तान के पागलख़ानों में हैं, उन्हें पाकिस्तान पहुँचा दिया जाए और जो हिन्‍दू और सिख पाकिस्तान के पागलख़ानों में हैं, उन्हें हिन्‍दुस्तान के हवाले कर दिया जाए।

मालूम नहीं, यह बात माक़ूल थी या  ग़ैर-माक़ूल, बहरहाल दानिशमन्‍दों के फ़ैसले के मुताबिक़ इधर-उधर ऊँची सतह की कान्फ्रेंसें हुईं, और बिलआख़िर एक दिन पागलों के तबादले के लिए एक दिन मुकर्रर हो गया।

अच्छी तरह छानबीन की गई- वे मुसलमान पागल जिनके लवाहक़ीन हिन्‍दुस्तान में ही में थे, वहीं रहने दिए गए,  बाक़ी जो बचे, उनको सरहद पर रवाना कर दिया गया। पाकिस्‍तान से चूँकि क़रीब-क़रीब तमाम हिन्‍दू-सिख जा चुके थे,  इसलिए किसी को रखने-रखाने का सवाल ही न पैदा हुआ, जितने हिन्‍दू-सिख पागल थे, सबके-सब पुलिस की हिफ़ाज़त में बॉर्डर पर पहुंचा दिए गए।

उधर का मालूम नहीं लेकिन इधर लाहौर के पागलख़ाने में जब इस तबादले की ख़बर पहुँची तो बड़ी दिलचस्‍प चेमेगोइयॉं होने लगीं।

एक मुसलमान पागल जो बारह बरस से हर रोज़ बाक़ायदगी के साथ ‘ज़मींदार’ पढ़ता था, उससे जब उसके एक दोस्‍त ने पूछा, ‘‘मोलबी साब, यह पाकिस्‍तान क्‍या होता है…?” तो उसने  बड़े गौरो-फ़िक्र के बाद जवाब दिया, ‘‘हिन्‍दुस्‍तान में एक ऐसी जगह है जहां  उस्तरे बनते हैं !” यह जवाब सुनकर उस का दोस्त मुतमइन हो गया।

इसी तरह एक सिख पागल ने एक दूसरे सिख पागल से पूछा, “सरदार जी हमें हिन्‍दुस्‍तान  क्‍यों भेजा जा रहा है… हमें तो वहॉं की बोली नहीं आती…।” दूसरा मुसकराया, ‘‘मुझे तो हिन्‍दुस्‍तानी बोली आती है, हिन्‍दुस्‍तानी बड़े शैतानी आकड़ आकड़ फिरते हैं…।”

एक दिन नहाते-नहाते एक मुसलमान पागल ने ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ का नारा इस ज़ोर से बुलंद किया कि फर्श पर फिसल कर गिरा और बेहोश हो गया ।

बाज़ पागल ऐसे भी थे जो पागल नहीं थे, उनमें अक्सरीयत ऐसे क़ातिलों की थी जिनके रिश्तेदारों ने अफसरों को दे दिला कर पागलख़ाने भिजवा दिया था  कि वह फाँसी के फंदे से बच जाएँ, यह कुछ-कुछ समझते थे कि हिन्‍दुस्तान क्यों तक्‍सीम हुआ है और यह पाकिस्तान क्या है, लेकिन सही वाक़िआत से यह भी  बेख़बर थे। अख़बारों से उन्‍हें कुछ पता नहीं चलता था और पहरेदार सिपाही अनपढ़ और जाहिल थे, जिनकी गुफ्तुगू से भी वह कोई नतीजा बरामद नहीं कर सकते थे। उनको सिर्फ़ इतना मालूम था कि एक आदमी मोहम्मद अली जिन्नाह है जिसको कायदे-आजम कहते हैं, उसने मुसलमानों के लिए एक अलहदा मुल्क बनाया है जिसका नाम पाकिस्‍तान है। यह कहां हैं,  इसका महले-वकू  क्या है, उसके मुताल्लिक़ वह कुछ नहीं जानते थे- यही वजह है कि वह सब पागल जिनका दिमाग़ पूरी तरह माऊफ़ नहीं हुआ था, इस मखमसे में गिरफ़्तार थे कि वह पाकिस्तान में हैं या हिन्‍दुस्तान में, अगर हिन्‍दुस्तान में हैं तो पाकिस्तान कहां है, अगर पाकिस्तान में हैं तो यह कैसे हो सकता है कि वह  कुछ अर्से पहले यहीं रहते हुए भी हिन्‍दुस्तान में थे।

एक पागल तो हिन्‍दुस्तान और पाकिस्तान, पाकिस्‍तान और हिन्‍दुस्तान के चक्कर में कुछ ऐसा गिरफ़्तार हुआ कि और ज्‍यादा पागल हो गया। झाड़ू देते-देते वह एक दिन दरख़्त पर चढ़ गया और टहने पर बैठ कर दो घंटे मुसलसल तकरीर करता रहा, जो पाकिस्तान और हिन्‍दुस्तान के नाज़ुक मसले पर थी… सिपाहियों ने जब उसे  नीचे उतरने को कहा तो वह और ऊपर चढ़ गया। जब उसे डराया-धमकाया गया तो उसने कहा, ‘‘मैं हिन्‍दुस्तान में रहना चाहता हूँ न पाकिस्तान में… मैं इस दरख्‍त  ही पर रहूँगा।” बड़ी  देर के बाद जब उसका दौरा सर्द पड़ा तो वह नीचे उतरा और अपने हिन्दू-सिख दोस्तों से गले मिल-मिलकर रोने लगा-  इस ख्याल से उसका दिल भर आया था कि वह उसे छोड़कर हिन्‍दुस्तान चले जाएँगे।

एक एम.एस-सी पास रेडियो इन्जीनियर में, जो मुसलमान था और दूसरे पागलों से बिल्कुल अलग-थलग बाग़ की एक ख़ास रविश पर सारा दिन ख़ामोश टहलता रहता था, यह तब्‍दीली नमूदार हुई कि उसने अपने तमाम कपड़े उतार कर  दफेदार के हवाले कर दिए और नंग-धड़ंग सारे बाग़ में चलना-फिरना शुरू` कर दिया।

चिंयौट के एक मोटे मुसलमान पागल ने, जो मुस्लिम लीग का सरगर्म कारकुन रह चुका था और दिन में पन्द्रह-सोलह मर्तबा नहाया करता था, यकलख्‍त यह आदत तर्क कर दी- उसका नाम मोहम्मद अली था, चुनांचे उसने एक दिन अपने जंगले में ऐलान कर दिया कि वह कायदे-आजम मोहम्मद अली जिन्नाह है,  उसकी देखा-देखी एक सिख पागल मास्टर तारा सिंह बन गया- इससे पहले कि ख़ून-ख़राबा हो जाए, दोनों को ख़तरनाक पागल क़रार दे कर अलहदा-अलहदा बंद कर दिया गया।

लाहौर का एक नौजवान हिन्‍दू वकील मुहब्बत में नाकाम होकर पागल हो गया था, जब उसने सुना कि अमृतसर हिन्‍दुस्तान में चला गया है तो उसे बहुत  दुख हुआ। अमृतसर की एक हिन्दू लड़्‌की से उसे मुहब्बत हो गई थी जिसने उसे ठुकरा दिया था मगर दीवानगी की हालत में भी वह उस लड़की को नहीं भूला था- वह उन तमाम हिन्दू और मुस्लिम लीडरों को गालियाँ देता था  जिन्होंने मिल-मिलाकर हिन्‍दुस्तान के दो टुकड़े कर दिए, और उसकी महबूबा हिन्‍दुस्तानी बन गई है और वह पाकिस्तानी।… जब तबादले की बात शुरू` हुई तो उस वकील को कई पागलों ने  समझाया कि वह दिल बुरा न करे… उसे हिन्‍दुस्तान भेज दिया जाएगा, उसी हिन्‍दुस्तान में जहां उस की महबूबा रहती है- मगर वह लाहौर छोड़ना नहीं चाहता था, उसका ख्याल था कि अमृतसर में उसकी प्रेक्टिस नहीं चलेगी।

यूरोपियन वार्ड में दो ऐंग्लो-इन्डियन पागल थे। उनको जब मालूम हुआ कि हिन्‍दुस्तान को आज़ाद करके अंग्रेज चले गए हैं तो उनको बहुत सदमा हुआ, वह छुप-छुपकर घंटों आपस में इस अहम मसले पर गुफ्तुगू करते रहते कि पागलख़ाने में उनकी हैसियत किस क़िस्म की होगी, यूरोपियन वार्ड रहेगा या उड़ा दिया जाएगा, ब्रेक-फ़ास्ट मिला करेगा या नहीं, क्या उन्हें डबल रोटी के बजाए ब्‍लडी इन्डियन चपाटी तो ज़हर माहर नहीं करना पड़ेगी ?

एक सिख था जिस को पागलख़ाने में दाख़िल हुए पन्द्रह बरस हो चुके थे। हर वक़्त उसकी ज़बान से यह अजीबो-ग़रीब अल्फ़ाज़ सुनने में आते थे-  ‘‘औपड़ दि गड़ गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानाँ दि मुंग दि दाल आफ़ दी लालटेन….।” वह दिन को सोता  था न रात को। पहरेदारों का यह कहना था कि पन्द्रह बरस के तवील अर्से  में वह एक लहजे़ के लिए भी नहीं सोया, वह लेटता भी नहीं था, अलबत्ता कभी-कभी किसी दीवार के साथ टेक लगा लेता था- हर वक्‍त खड़े रहने से उसके पांव सूज गए थे और पिंडलियॉं भी फूल गई थीं, मगर जिस्मानी तकलीफ़ के बावजूद वह लेट कर आराम  नहीं करता था।

हिन्‍दुस्तान, पाकिस्तान और पागलों के तबादले के मुताल्लिक जब कभी पागलख़ाने में गुफ्तुगू होती थी तो वह गौर से सुनता था, कोई उससे पूछता कि उसका क्या ख्याल है तो वह बड़ी संजीदगी से जवाब देता, ‘‘औपड़ दि गड़ गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानाँ दि मुंग दि दाल आफ़ दी पाकिस्तान गवर्नमेंट….!” लेकिन बाद में  ‘आफ़ दि पाकिस्तान गवर्नमेंट’ की जगह ‘आफ़ दि टोबा टेक सिंह गवर्नमेंट’ ने ले ली, और उसने दूसरे पागलों से पूछ्ना शुरू किया कि टोबा टेक सिंह कहां है, जहां का वह रहने वाला है। किसी को भी मालूम नहीं था कि टोबा टेक सिंह पाकिस्तान में है या हिन्‍दुस्‍तान में, जो बताने की कोशिश करते थे वह खुद इस उलझाव में गिरफ़्तार हो जाते थे कि सियालकोट पहले हिन्‍दुस्‍तान में होता था, पर अब सुना है कि पाकिस्तान में है… क्या पता है कि लाहौर जो अब पाकिस्तान में है, कल हिन्‍दुस्‍तान में  चला जाए… या सारा हिन्‍दुस्‍तान ही पाकिस्तान बन जाए… और यह भी कौन सीने पर हाथ रख कर कह सकता था कि हिन्‍दुस्‍तान और पाकिस्तान, दोनों किसी दिन सिरे से  गायब ही हो जाएँ…!

इस सिख पागल के केस छिदरे होकर बहुत मुख़्तसर रह गए थे,  चूंकि बहुत कम नहाता था इसलिए दाढ़ी और सर के बाल आपस में जम गए थे जिसके बायस उसकी शक्ल बड़ी भयानक हो गई थी, मगर आदमी बे-ज़रर था- पन्द्रह बरसों में उसने कभी किसी से झगड़ा-फ़साद नहीं किया था। पागलख़ाने के जो पुराने मुलाज़िम थे, वह उसके मुताल्लिक इतना जानते थे कि टोबा टेक सिंह में  उसकी कई ज़मीनें थीं, अच्छा खाता-पीता ज़मींदार था कि अचानक दिमाग़ उलट गया। उसके रिश्तेदार लोहे की मोटी-मोटी जंजीरों में बांधकर लाए और पागलख़ाने में दाख़िल करा गए।

महीने में एक बार मुलाक़ात के लिए यह लोग आते थे और उसकी ख़ैर-ख़ैरियत दरयाफ्त करके चले जाते थे, एक मुद्दत तक यह सिलसिला जारी रहा, पर जब पाकिस्तान, हिन्‍दुस्‍तान की गड़बड़ शुरू हुई तो उनका आना-जाना बन्द हो गया।

उसका नाम बिशन सिंह था मगर सब उसे टोबा टेक सिंह  कहते थे। उसको यह कत्‍अन मालूम नहीं था कि दिन कौन-सा है,  महीना कौन-सा है, या कितने साल बीत चुके हैं, लेकिन हर महीने जब उसके अज़ीज़ो-अक़ारिब उससे मिलने के लिए आने के करीब होते थे तो उसे अपने आप पता चल जाता था, चुनांचे वह दफेदार से कहता कि उसकी मुलाक़ात आ रही है। उस दिन वह अच्छी तरह नहाता, बदन पर ख़ूब साबुन घिसता और बालों में तेल डालकर कंघा करता। अपने वह कपड़े जो वह कभी  इस्‍तेमाल नहीं करता था, निकलवाकर पहनता और यूं सज-बनकर मिलनेवालों के पास  जाता। वह उससे कुछ पूछ्ते तो वह ख़ामोश रहता या कभी-कभार ‘औपड़ दि गड़ गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानाँ दि मुंग दि दाल आफ़ दी लालटेन…’ कह देता।

उसकी एक लड़की थी जो हर महीने एक उंगली बढ़ती-बढ़ती पन्द्रह बरसों में  जवान हो गई थी। बिशन सिंह‍ उसको पहचानता ही नहीं था- वह बच्ची थी जब भी अपने बाप को देखकर रोती थी, जवान हुई तब भी उसकी आंखों से आंसू बहते थे।

पाकिस्तान और हिन्‍दुस्‍तान का क़िस्सा शुरू  हुआ तो उसने  दूसरे पागलों से पूछ्ना शुरू  किया कि टोबा टेक सिंह कहां है,  जब  उसे इत्‍मीनानबख्‍श जवाब न मिला तो उस की कुरेद दिन-ब-दिन बढ़ती गई। अब मुलाक़ात भी नहीं आती थी, पहले तो उसे अपने आप पता चल जाता था कि मिलने  वाले आ रहे हैं,  पर अब जैसे उसके दिल की आवाज़ भी बन्द हो गई थी जो उसे  उनकी आमद की ख़बर दे दिया करती थी- उसकी बड़ी ख़्वाहिश थी कि वह लोग आएँ जो उससे हमदर्दी का इज़हार करते थे और उसके लिए फल, मिठाइयाँ और कपड़े लाते थे। वह आएँ तो वह उनसे पूछे कि टोबा टेक सिंह कहां है… वह उसे यक़ीनन बता देंगे कि  पाकिस्तान में है या हिन्‍दुस्‍तान में- उसका ख्याल था कि वह टोबा  टेक सिंह ही से आते हैं, जहां उसकी ज़मीनें हैं।

पागलख़ाने में एक पागल ऐसा भी था जो खुद को ख़ुदा कहता था। उससे जब एक  रोज़ बिशन सिंह ने पूछा कि टोबा टेक सिंह पाकिस्तान में है या हिन्‍दुस्‍तान  में  तो उसने हस्‍बे-आदत कहक‍हा लगाया और कहा “वह पाकिस्तान में है न  हिन्‍दुस्‍तान में,  इसलिए कि हमने अभी तक हुक्म नहीं दिया…।’’

बिशन सिंह ने इस ख़ुदा से कई मर्तबा बड़ी मिन्नत-समाजत से कहा कि वह हुक्‍म दे दे ताकि झंझट ख़त्म हो, मगर खुदा बहुत मसरूफ़ था, इसलिए कि  उसे और बे-शुमार हुक्म देने थे।

एक दिन तंग आकर बिशन सिंह खुदा पर बरस पड़ा, ‘औपड़ दि गड़ गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानाँ दि मुंग दि दाल आफ़ वाहे गुरु जी दा  ख़ालसा एंड वाहे गुरु जी दि फ़तह…।’ इसका शायद मतलब था कि तुम मुसलमानों के ख़ुदा हो,  सिखों के ख़ुदा होते तो ज़रूर मेरी सुनते।

तबादले से कुछ दिन पहले टोबा टेक सिंह का एक मुसलमान जो बिशन सिंह का दोस्त था, मुलाक़ात के लिए आया। मुसलमान दोस्‍त पहले कभी नहीं आया था। जब बिशन सिं‍ह ने उसे देखा तो एक तरफ़ हट गया, फिर वापस जाने लगा, मगर सिपाहियों  ने उसे रोका, ‘‘यह तुमसे मिलने आया है… तुम्हारा दोस्त फ़ज़लदीन है…।’’

बिशन सिंह ने फ़ज़लदीन को एक नज़र देखा और कुछ बड़बड़ाने लगा। फ़ज़लदीन ने आगे बढ़कर उसके कन्धे पर हाथ रखा, ‘‘मैं बहुत दिनों से सोच रहा था कि तुमसे मिलूं लेकिन फ़ुरसत ही न मिली… तुम्हारे सब आदमी ख़ैरियत से हिन्‍दुस्‍तान चले गए थे… मुझसे जितनी मदद हो सकी, मैंने की…  तुम्‍हारी  बेटी रूपकौर….’’ वह कहते-कहते रुक गया।

बिशन सिंह कुछ याद करने लगा, ‘‘बेटी रूपकौर….” _

फ़ज़लदीन ने रुक-रुककर कहां, ‘‘हां… वह… वह भी ठीक-ठाक है… उनके साथ ही चली गई थी…।’’

बिशन सिंह ख़ामोश रहा।

फ़ज़लदीन ने कहना शुरू  किया,  ‘‘उन्‍होंने मुझसे कहा था कि तुम्हारी ख़ैर-ख़ैरियत पूछ्ता रहूं… अब मैंने सुना है कि तुम  हिन्‍दुस्‍तान जा रहे हो…  भाई बलबीर सिंह और भाई वधावा सिंह से मेरा सलाम कहना और बहन अमृतकौर से भी… भाई बलबीर से कहना कि फ़ज़लदीन  राज़ीखुशी है… दो भूरी भैंसें जो वह छोड़ गए थे,  उनमें से एक ने कट्‌टा दिया है… दूसरी के कट्‌टी हुई थी, पर वह छह दिन की होके मर गई… और… मेरे लायक़ जो ख़िद्‌मत हो,  कहना,  मैं हर वक़्त तैयार हूं…  और यह तुम्‍हारे लिए थोड़े-से मरोंडे लाया हूं…।’’

बिशन सिंह ने मरोंडों की पोटली लेकर पास खड़े सिपाही के हवाले कर दी और फ़ज़लदीन से पूछा, “टोबा टेक सिंह कहां है… ?”

फ़ज़लदीन ने क़दरे हैरत से कहा, ‘‘कहां हैं…? वहीं है, जहां था…।’’

बिशन सिंह ने फिर पूछा, ‘‘पाकिस्तान में या हिन्‍दुस्‍तान में ?’’

‘‘हिन्‍दुस्‍तान में… नहीं, नहीं पाकिस्तान में…!” फ़ज़लदीन बौखला-सा गया।

‘‘बिशन सिंह बड़बड़ाता हुआ चला गया-  ‘‘औपड़ दि गड़ गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानाँ दि मुंग दि दाल आफ़ दी पाकिस्तान एंड  हिन्‍दुस्‍तान आफ़ दी दुर फिटे मुंह…!’’

तबादले की तैयारियां मुकम्मल हो चुकी थीं, इधर से उधर और उधर से इधर आनेवाले पागलों की फ़ेहरिस्तें पहुंच चुकी थीं और तबादले का दिन भी मुक़र्रर हो चुका था।

सख़्त सर्दियां थीं जब लाहौर के पागलख़ाने से हिन्‍दू-सिख पागलों से भरी हुई लारियां पुलिस के मुहाफ़िज़ दस्ते के साथ रवाना हुईं,  मुताल्लिका अफ़सर भी हमराह थे- वागह के बार्डर पर तरफ़ैन के सुपरिंटेंडेंट एक-दूसरे से मिले और इब्तिदाई कारवाई ख़त्म होने के बाद तबादला शुरू` हो गया,  जो रातभर जारी रहा।

पागलों को लारियों से निकालना और दूसरे अफ़सरों के हवाले करना बड़ा कठिन काम था, बाज़ तो बाहर निकलते ही नहीं थे। जो निकलने पर रज़ामन्द होते थे, उनको संभालना मुश्किल हो जाता था, क्योंकि वह इधर-उधर भाग उठते थे। जो नंगे थे, उनको कपडे़ पहनाए जाते तो वह उन्‍हें फाड़कर अपने तन से जुदा कर देते- कोई गालियां बक रहा है… कोई गा रहा है… कुछ आपस में झगड़  रहे हैं… कुछ  रो रहे हैं, बिलख रहे हैं।  कान पड़ी आवाज़ सुनाई नहीं देती थी- पागल औरतों का शोरो-गोग़ा अलग था, और सर्दी इतनी कड़ाके की थी कि दांत से  दांत बज रहे थे ।

पागलों की अक्‍सरीयत इस तबादले के हक़ में नहीं थी। इसलिए कि उनकी समझ में  नहीं आ रहा था कि उन्‍हें अपनी जगह से उखाड़कर कहां फेंका जा रहा है। वह चन्द  जो कुछ सोच-समझ सकते थे, ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’  और ‘पाकिस्तान मुर्दाबाद’  के नारे लगा रहे थे। दो-तीन मर्तबा फ़साद होते होते बचा, क्योंकि बाज़  मुसलमानों ओर सिखों को यह नारे सुन कर तेश आ गया था।

जब बिशन सिंह की बारी आई और वाग‍ह के उस पार का मुताल्लिक अफ़सर उसका नाम रजिस्टर में दर्ज करने लगा तो उसने पूछा, ‘‘टोबा टेक सिंह कहां  है… पाकिस्तान में या हिन्‍दुस्‍तान में ?’’

मुताल्लिक अफ़सर हँसा, ‘‘ पाकिस्तान में…!’’

यह सुनकर बिशन सिंह उछलकर एक तरफ़ हटा और दौड़कर अपने बाक़ीमांदा साथियों के पास पहुंच गया।

पाकिस्तानी सिपाहियों ने उसे पकड़  लिया और दूसरी तरफ़ ले जाने लगे,  मगर उसने चलने से इनकार कर दिया, ‘‘टोबा  टेक सिंह यहां है… !’’ और ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा,  ‘‘औपड़ दि गड़ गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानाँ दि मुंग दि दाल आफ़ दी टोबा टेक सिंह एंड पाकिस्तान…!’’

उसे बहुत समझाया गया कि देखो, अब टोबा टेक सिंह हिन्‍दुस्‍तान में चला गया है, अगर नहीं गया है तो उसे फ़ौरन वहां भेज दिया जाएगा, मगर वह न माना। जब उसको ज़बर्दस्ती दूसरी तरफ़ ले जाने की कोशिश की गई तो वह दरमियान में एक जगह  इस अन्दाज़ में अपनी सूजी हुई टांगों पर खड़ा हो गया, जैसे अब उसे कोई ताक़त  नहीं हिला सकेगी। आदमी चूंकि बे-ज़रर था, इसलिए उससे मज़ीद ज़बर्दस्ती न की गई,  उसको वहीं खड़ा रह्‌ने दिया गया और तबादले का बाक़ी काम होता रहा।

सूरज निकलने से पहले साकित व सामित बिशन सिंह के हलक से एक फ़लक-शिगाफ़ चीख़ निकली।

इधर-उधर से कई अफ़सर दौड़े आए और देखा कि वह आदमी  जो पन्द्रह बरस तक दिन-रात अपनी टांगों पर खड़ा रहा था, औंधे मुंह लेटा है-  उधर ख़ारदार तारों के पीछे हिन्‍दुस्‍तान था, इधर वैसे ही तारों के पीछे  पाकिस्तान, दरमियान में ज़मीन के उस टुकड़े पर जिसका कोई नाम नहीं था, टोबा टेक सिंह पड़ा था।

 

 

बेदखली : शम्‍भू राणा

चर्चित कथाकार शम्‍भू राणा की कहानी-

बडे़ से लॉन में उगायी गयी अमेरिकन घास के बीच-बीच में उग आयी चलमोड़िया घास की जड़ें खोदने में खड़क सिंह इस कदर मशगूल था कि उसे बहुत देर तक झुलसाती हुई धूप का अहसास ही नहीं हुआ। सूरज की किरणें जब खिड़की के शीशे में टकराकर उसकी आँखों में चुभने लगीं तब कहीं उसका ध्यान टूटा। उसने कुदाल जमीन पर रख कर आसमान की ओर देखा। सूरज अखरोट के पेड़ की ओट से निकलकर ऊपर उठ आया था। समय का अहसास हुआ तो भूख-प्यास भी महसूस हुई। वह घुटनों पर हाथ रखकर उठ खड़ा हुआ और पसीना पोंछता मोरपंखी की छाया में जा बैठा।

रोटी का कौर चबाते हुए खड़कसिंह ने खिड़की के शीशे की तरफ देखा पर ठीक से देख नहीं पाया। चमक से आँखें चुंधिया गयीं। पल भर को आँखों में न जाने कितने किस्म के रंग और बेलबूटे भर गये। उसने कस कर आँखें भींच लीं और रोटी-चटनी चबाता रहा़…

अपने हाथ की रोटियाँ निगलते हुए खड़कसिंह को अक्सर एक किस्म की चिढ़, गुस्सा और असन्तोष-सा महसूस होता है। रोटियाँ या तो जल जातीं या अधपकी रह जातीं। कोई बीच में मोटी तो कोई किनारों में। जैसी रोटियाँ वह चाहता या उसकी कल्पना में थीं वैसी तवे पर नहीं उतर पातीं। वह झुंझला कर रह जाता।

ऐसे में अक्सर उसे तुलसी की याद आती है। वैसी गोलगप्पे-सी फूली-पकी और संतुलित रोटियाँ मुँह में रखते ही गल-सी जातीं। कटोरे में सब्जी डालने तक वह एकाध यूँ ही खा जाता। बकौल तुलसी भूख के साथ। खड़कसिंह जवाब देता नहीं, स्वाद के साथ… तुलसी कहती आ़… हा़…हा स्वाद… हो गया हो, तुम भी बस़…! कभी-कभी वह तुलसी से कोई प्यारी-सी शर्त लगा देता कि यह रोटी नहीं फूलेगी, तेरा बाप भी इसे नहीं फुला सकता। अगर नहीं फूली तो याद रखना शर्त क्या है़…. और रोटी गप्प से फूल जाती। वह झुंझला कर गालियां देने लगता और तुलसी हँस पड़ती। कभी-कभी रोटी नहीं फूलती, तुलसी हार जाती…।

आज जब कभी खड़कसिंह ऐसे पलों को याद करता है तो एक टीस-सी कलेजे में उठती है और समझ में आता है कि उसका मान रखने को ही तुलसी कभी-कभार हारती थी। चूल्हे से उठती लपटों और दिये के उजाले में दमकता चेहरा, लजाती आँखें, होठों से रिसती मुस्कान…। वह सब किसी हारे हुए के चेहरे में नहीं हो सकता।

कितने बरस बीत गये तुलसी को गये, खड़कसिंह दिमाग पर जोर डालता है… पाँच साल। एकाएक यकीन-सा नहीं होता उसे। समय कितनी तेजी से गुजरता है…। लौट कर न समय आता है न गुजरा आदमी। बस, एक चीज इंसान के साथ अखिर तक साये की तरह चलती है- लिए हुए फैसलों से उत्पन्न नियति। फैसले में जरा-सी चूक हुई नहीं कि यादों के भूत आखिरी साँस तक मुँह चिढ़ाने का कोई मौका नहीं छोड़ते। तब भीतर कहीं जो नश्तर-सा चुभता है, वह जाने कहाँ चुभता है कि तड़प शब्दातीत हो जाती है। एक कांटा-सा भीतर कहीं और गहरा धँसता जाता है।

इसी जमीन पर जहाँ आज अमेरिकन घास और बिलायती फूल उगे हैं, तब गेहूँ, मक्का, सरसों, मडुवा, मादिरा उगता था। सिर्फ उगता ही था, लहलहाता नहीं था। जैसे खुशहाल गाँव और खेती सरकारी विज्ञापनों में नजर आती है, वही सब होता तो यह सब नहीं होता… कुल जमा बीसेक मवासों का गाँव यूँ उजड़ न गया होता। लोग एक-एक कर कब गाँव छोड़ गये, अंदाजा नहीं आया। गाँव के जो लोग फौज या दूसरी नौकरियों में थे, वे तो नहीं आये कम से कम लौट कर। नीचे मैदानों में न जाने कहाँ-कहाँ जा बसे। जो लोग नौकरी-रोजगार के सिलसिले में शहरों में रहे आये थे, उन्हें गाँव में रहना कुछ वैसा ही लगता, जैसे जूता पहनने के आदी को नंगे पाँव चलने में महसूस होता है। वे लोग शहरी जीवन, आराम, सुविधाओं और कई बुराइयों के ऐसे आदी हो कर वापस लौटते कि जो गाँव में मुमकिन नहीं थीं और कई चीजों का तो गाँव में लोगों ने नाम भी नहीं सुना था। गाँव में न रहने के पीछे उनके तर्क थे। यहाँ गाँव में क्या रखा है। बाल कटवाने तक को आठ किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। बच्चों को कहाँ पढ़ायें ? हर एक किलोमीटर पर स्कूल तो खोल दिया पर उनका स्तर क्या है़… ऐसे स्कूलों में बच्चा न तो ढंग से पढ़ पाता है न उसकी मासूमियत बरकरार रहती है़… अब देखो, तीन महीने से ट्रांसफार्मर फुंका पड़ा है,  है कोई सुनने वाला ? पता नहीं, कहाँ आ बसे हमारे बुजुर्ग़… ठीक ही कहता था रमिया हवलदार शायद। पर यह सब उसी जैसे लोग कह सकते हैं। जिनके पास शहर में बसने लायक पैसा था, फिलहाल अच्छी तनख्वाह और बाद में पेंशन थी। बाकी लोग किस सहारे ऐसा कहते।

कैसी अजीब बात सुनने में आई कि दिल्ली, बम्बई, लखनऊ, नोएडा न जाने कहाँ-कहाँ से आ-आकर साहब लोग यहाँ की लगभग बंजर जमीन को खरीदना चाहते हैं! लगा, कहीं साहब मजाक तो नहीं कर रहे। क्या करेंगे आखिर इस जमीन का ? इसमें होता क्या है, है किस काम की? अपने ठाठ में राजाओं तक को शार्मिन्दा कर देने वालों को क्या जरूरत है इस जमीन की, क्या करेंगे इस उजाड़ में… क्योंकि नीचे काफी भीड़-भाड़ है शोर-गुल है, अशान्ति है, भागमभाग है़… और भी न जाने क्या-क्या है वहाँ जो साहबों को रास नहीं आता। इसलिये सोचते हैं कि यहां एक कुटिया-सी बनवा लें। जब कभी फुर्सत मिले, आकर ताजी हवा में साँस लें, दो पल शान्ति से गुजारें और सामने हिमालय देखें। पैसा काफी कमाया, पूरी दुनिया की खाक छानी़… पैसा कोई चीज नहीं ठाकुर साहब हाथ का मैल है। शांति और प्रेमभाव असल चीज है। देवभूमि में…

रमिया हवलदार पहला आदमी था जिसने अपनी जमीन किन्हीं रिटायर्ड कर्नल खन्ना को बेची। जमीन के एवज में मिली रकम से उसने हल्द्वानी में बड़ा-सा मकान बनवा लिया। बच्चे अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ते हैं। मकान से ढेर सारा किराया आता है। ठाठ ही ठाठ है़… खबरें आती रहतीं… इधर खन्ना साहब ने रमिया की जमीन पर छोटा-सा बंगला बनवा लिया साल भर के अन्दर- जैसा अक्सर कलैंडरों में छपा होता है। कर्नल साहब कभी-कभार यहाँ आकर रहते। कभी अकेले तो कभी सपरिवार। बेगानों की तरह, गाँव वालों से कटे-कटे से। गाँव का ही एक लड़का बंगले में खानसामे, चौकीदार और माली की नौकरी पा गया। कर्नल के पीछे बंगला उसी के जिम्मे रहता।

धीरे-धीरे गाँव में जमीन बिकने लगी। रमिया हवलदार के बाद जिन लोंगों ने अपनी जमीनें बेंची, उनमें अधिकांश परिवार ऐसे थे कि जिनका कोई सदस्य बाहर नौकरी करते हुए शहर की सुविधाओं का आदी हो चुका था। उसका परिवार भी दो-चार बार उसके पास जाकर उन सुविधाओं को देख और एक हद तक भोग चुका था। वे सुविधाएँ और चमक-दमक उन्हें कितनी मुहैया थी, वो बात और है। कुछ चीजों के दर्शन ही काफी होते हैं। ऐसे ही लोगों की देखा-देखी बाकियों के दिमाग में भी एक कीड़ा-सा कुलबुलाने लगा। जमीन की एवज में जो रकम मिल रही थी, उसके गाव, तकिये से सर टिकाकर एक दरिद्र आदमी चाहे जो सपना देख ले। लोग सोचते, अखिर यह जमीन हमें दे क्या रही है? साल भर मेहनत करके पेट भरना मुश्किल होता है। बाकी लोग ऐश कर रहे हैं, हम ही क्यों रेत से तेल निकालने की उम्मीद में मर-मर कर जियें। इतने रुपयों से क्या नहीं हो सकता। दुनिया का कौन-सा सुख और आराम है जो नहीं जुटाया जा सकता?

जिन लोगों ने जमीन बेची थी उनकी एकाएक कायापलट हो गयी थी। हर ऐशोआराम की चीज उनके पास थी। लड़कियों की शादियाँ बड़ी धूम-धाम से अच्छे घरों में हुईं। लड़के नये-नये फैशन के कपड़े पहनते और रात में भी काला चश्मा लगाये घूमते। खा-पीकर पडे़ रहना या समय बीताने को जुआ खेलना और शाम को लड़खड़ाते हुए घर लौटना परिवार के पुरुषों का नियम था। महिलाओं के शगल अलग थे। जिनकी जमीनें नहीं बिक पायी थीं या जिनकी आत्मारूपी कटखनी कुतिया फिलहाल जमीन बेच देने के खयाल को दिलोदिमाग की चौखट नहीं लांघने दे रही थी, ऐसे लोगों को पड़ोसियों के ठाठ-बाठ देखकर एक अजीब-सी कुढ़न होती। रातों को देर तक पुरखों की थात बेच खाने के लिये उनकी बुराइयाँ होतीं। मगर अटक-बिटक मजबूरन हाथ उन्हीं के आगे पसारना पड़ता। पड़ोस से गोश्त पकने की महक आ रही होती और इधर आलू का थेचुआ उबल रहा होता या लहसुन का नमक पिस रहा होता। ऐसे में अक्सर खड़कसिंह जैसों को हीनता बोध आ घेरता और मन उदास हो जाता। जी चाहता कि हमारी बेवकूफी के लिये कोई जूता लेकर हम पर पिल पड़ता तो मन कुछ हल्का हो जाता और एक किस्म का सन्तोष होता।

शुरू-शुरू में जब कभी खड़कसिंह जमीन बेचने की बात करता तो तुलसी बुरी तरह लड़ने लगती। मगर धीरे-धीरे उसकी आवाज में वह बात नहीं रह गयी थी। पैसे ने उसे भी ललचाना शुरू कर दिया था। उसके पास इस बात का कोई ठोस जवाब नहीं था कि इतने रुपयों से हम क्या नहीं कर सकते। उसके विरोध का स्वर अब कुछ-कुछ ऐसा हो चला था जैसे किसी ने मुंह में कपड़ा ठूँस दिया हो- ‘जो भी करोगे ठीक से सोच-समझ कर करना, जग हँसाई ठीक नहीं।’ जमीन बेचने का फैसला खुद खड़कसिंह के लिये भी इतना आसान नहीं था। एक अनजाना-सा डर अंत तक मन के किसी कोने में बना ही रहा। डेढ़-दो साल की कशमकश और उधेड़बुन के बाद आखिर एक दिन उसने फैसला कर ही लिया। सड़क से लगभग सटी हुई अपनी ज्यादातर जमीन उसने नोएडा के किन्हीं शर्मा जी के हाथों बेच दी। शर्मा जी की कई शहरों में न जाने काहे की मिलें थीं।

खड़कसिंह रातों-रात अमीर हो गया था। उसे एकाएक यूँ महसूस हुआ जैसे वह पूरी दुनिया को ऊँची पहाड़ी पर चढ़कर देख रहा हो। खुद को वह मोटे गद्दों पर चलता हुआ-सा महसूस करता। जिन बातों पर वह कल तक लोंगों से झगड़ पड़ता था, उन्हीं बातों पर अब वह यूँ हँस पड़ता जैसे- बडे़ बच्चों की बातों पर हँसते हैं। उस पर हर वक्त कुछ वैसी ही मस्ती और भारहीनता-सी छाई रहती जैसी वह कुछ घण्टों के लिये होली के दिन महसूस करता था। हर चीज नई-नई और खुशगवार, जी चाहता कि पत्थर को भी प्यार से सहला दे…।

शुरू-शुरू में ठाट-बाट में पड़ोसियों को पीछे छोड़ने की कोशिशें की गयीं। हफ्ते के सातों दिन गोश्त पका। दिखा-दिखाकर सोना खरीदा और पहना गया। तमाम देनदारियाँ चुकाई गयीं। बतौर शुक्राना सौ-पचास रुपया या कोई उपहार अलग़…। खड़कसिंह उन दिनों एकाएक मैं से हम हो गया। सपरिवार अक्सर शहर जाना होता और ढेर सारी बेमतलब की खरीददारी की जाती। जो खड़कसिंह पहले बआसानी जीपों की छतों में बैठ कर या लटक कर सफर कर लेता था, अब गाड़ियों में थोड़ी-सी भीड़ देखकर नाक-भौं चढ़ाकर अक्सर टैक्सी किराये पर ले लेता।

परिवार की आदतें बिगड़ने लगीं। जमीन बिक चुकी थी। काम-धाम कुछ था नहीं। हाथों को ही नहीं दिमाग को भी कड़ी मेहनत की पुरानी आदत थी। खाली रहने का खयाल भी दुखदायी होता। करें क्या, बस खुराफातें सूझतीं…। तुलसी को रिश्तेदारों के निमंत्रण मिलने लगे। धीरे-धीरे उसे भी घूमने का चस्का लग गया। वह अक्सर दौरे पर ही रहती। उसकी गैरमौजूदगी में घर न जाने कब शराब और जुए का अखाड़ा बन गया। खड़कसिंह जो पहले ताश का एकाध आधा-अधूरा खेल ही जानता था, अब एक मझा हुआ खिलाड़ी बन चुका था।

इसी धक्कम-पेल और नई-नई अमीरी के हो-हल्ले में एक यह अच्छा काम हुआ कि लड़की की शादी काफी धूम-धाम से ठीक-ठाक घर में हो गयी। लड़का आठवीं के बाद घर बैठ गया। तथाकथित इण्टर कॉलेज काफी दूर था और लड़के को पढ़ाई के प्रति कुछ खास दिलचस्पी भी नहीं थी। यूँ तो खड़क सिंह ने उसे पढ़ाई छोड़ देने पर डांटा, पर मन ही मन सोचा कि पढ़ कर ही कौन-सा राजा हो जायेगा। एक से एक पढे़-लिखे घूम रहे हैं। एक ही तो लड़का है सब इसी का है। पड़ा भी रहेगा तो जिन्दगी भर ठाट से खा लेगा। साढ़े तीन लाख रुपया क्या कम होता है। खड़क सिंह का सोचना ठीक ही था। उसने कभी साढे़ तीन हजार भी शायद एकमुश्त न देखे हों उससे पहले। उसे पैसे की टेढ़ी चाल कौन समझाता कि तू तो अनाप-शनाप फूँक रहा है पैसा तो रखे-रखे भी बिला जाता है। कौन कहे खड़क सिंह जैसों से कि बैंक बैलेंस एक पीकदान की तरह है जिसमें नियमित रूप से अगर न थूका जाये तो उसे सूखते देर नहीं लगती।

करीब तीन-चार साल का जीवन मैदानी नदी की तरह शान्त चलता रहा। घटनाविहीन दुखों और तनावों से दूर। सभी तरह के सुखों और आराम से भरपूर। ख्वाब और नशे की-सी स्थिति। एक तरह से हवा में उड़ने का-सा अहसास… खड़कसिंह को पाँव तले वही खुरदरी जमीन होने का अहसास तब कहीं जाकर हुआ जब तुलसी ने अचानक मुरझा कर बिस्तर पकड़ लिया। पेट में मरोडे़ं उठते और मारे दर्द के वह सर पटकने लगती। करीब महीने भर तक तरह-तरह के टोने-टोटके गंडे-ताबीज और जागर चलता रहा। कोई फायदा नहीं। मर्ज बढ़ता गया। फिर बारी आई अस्पतालों और डॉक्टरों की। खड़कसिंह तुलसी को लिये-लिये न जाने कहाँ-कहाँ फिरता रहा। तकलीफ किसी की समझ में नहीं आयी। इलाज चलता रहा। दो-एक महीने में तुलसी और उसके जेवर दोनों ही निपट गये।

दुनिया में चारों ओर उदासी और उचाटपन था। सब तरफ दुख, अभाव और पीड़ा। अजब बेगानापऩ… सूरज पता नहीं कहाँ था। असमान में काले घने बादल। धरती पर नीम अंधेरा। हर चीज उल्टी और बेतुकी। कोई हँसता तो अपनी ही हालत पर हँसता जान पड़ता। फूलों को पाला मार गया था। तितलियों के पंख टूटे थे। हरी दूब पर न जाने किसने नमक बुरक दिया था। कानों में अनगिनत गैर फहम आवाजें मगर आँखों के आगे स्याही-सा गाढ़ा अंधेरा… हवा में अजीब-सा कसैलापन और चितायें जलने की बू। खड़क सिंह की हालत कंटीली झाड़ियों में अटके तीर बिंधे अधमरे परिन्दे सी थी़… या तो आदमी अपनी जान ले ले या दीवाना हो जाये। इसके सिवाय दुनिया में कहीं पनाह नही़ं…।

खड़कसिंह कहाँ जाये। किससे कहे। किसके गले लगे कर रोये। किस दीवार से अपना सर पटक दे। किसका कत्ल कर दे। पानी में डूबते-उतरते की-सी दशा़… कोई आकर या तो बीच कपाल में गोली मार दे या उबार ले। खड़क सिंह आखिर करे क्या ? थक-हार कर एक दिन उसने शर्मा जी के निर्माणाधीन बंगले में मजदूरी माँग ली। उन्हीं शर्मा जी का बंगला बन रहा था जिन्हें उसने जमीन बेची थी। खेतों को तोड़कर बडे़ से मैदान में बदला जा रहा था। मैदान के बीचों-बीच बंगले की बुनियाद खोदी जा रही थी। चारों ओर पत्थर, रेता और कंक्रीट बिखरा पड़ा था। अपने हाथों जोती, बोयी और सींची हुई जमीन पर पड़ता हर, गैती-फावड़ा उसे अपने ही सीने पर घाव करता-सा जान पड़ता । भीतर कहीं एक हूक-सी उठती। कलेजे को जैसे मसल रहा हो कोई। दिन मानो अपनी ही कब्र खोदने में बीत जाता पर रात काटना अपनी गर्दन काटना हो जाता। अंधेरा होते ही कानों में अजीब-सी खिल्ली उड़ाने वाली हँसी गूँजने लगती और आँखों के आगे न जाने कैसे साये तांडव करने लगते।

खड़कसिंह को यह सब किसी बेतुके ख्वाब-सा लगता है। कभी-कभी लगता है कि नहीं, यह सब हुआ नहीं, बल्कि मैं ऐसा सोच रहा था, बुरा सपना था… वह खुद को हकीकत और ख्वाब के दलदल में धँसता-उबरता महसूस करता- हाथ-पाँव मारता किसी ठोस चीज को थामने के लिए। उसे याद नहीं कि वह कैसे इस दलदल में आ गिरा। खुद गिरा या धकेला गया। सिलसिलेवार कुछ भी याद नहीं आता। सब आपस में गडमड हो जाता है। खड़क सिंह दिमाग पर जोर डालकर भी ठीक से याद नहीं कर पाता कि कब उसका बेटा शर्मा जी के नोएडा वाले बंगले में दरबान बन कर चला गया। कब यह बंगला बना, कब वह वहाँ चौकीदार और माली की हैसियत से नौकरी करने लगा। कब… अपनी बेटी को न देखे उसे कितने बरस हो गये ? कब आई थी चम्पा आखिरी बार माँ के मरने के बाद… क्या कहा था उसने यही लॉन में रोते हुये… हाँ… ना… हाँ… कि बाबू यह कोठी मेरा मायका जो हुआ, तुम यहाँ नौकर ठहरे… मायका तो खण्डहर हो गया… मेरे भाग में कभी-कभार मायके आने का सुख भी नहीं…। तुम्हारी सूरत कैसी डरावनी हो गयी है। मुझे पहचान भी रहे हो कि नहीं बाबू।

चम्पा… चम्पा… हरीश… क्या सचमुच मेरे दो बच्चे हैं… सुना कि चम्पा के भी बच्चे हैं… कुसूरवार हूँ  रे तुम सबका… किससे जाकर अपनी करनी की सजा मांगूँ… किस अंधेरे में जाकर मुँह छिपाऊँ… तुलसी ने बर्तनों को राख से मल कर आंगन की दीवार में औंधे रख दिया है। कांसे की पतीली धूप में कैसी सोने-सी चमक रही है। देखो तो आँखें चुंधिया जाती हैं।

खड़क सिंह की आँखें खुलीं तो सूरज की किरणें खिड़की के शीशे में टकराकर उसके चेहरे पर पड़ रही थीं। मोरपंखी की छाया में न जाने कब उसे नींद आ गयी। सूरज हल्का-सा पश्‍चि‍म की तरफ उतर चुका था। खड़कसिंह आँखें मलता हड़बड़ा कर उठ बैठा। फिर काफी देर हथेलियों में सर थामे बैठा रहा- सर में चोट खाया-सा। कुछ देर बाद उसने मुँह धोकर पानी पिया और घुटनों पर हाथ रखकर उठ खड़ा हुआ। चलमोड़िया घास की जडे खोदने और बिलायती फूलों को सींचने के लिये।

 

 

उसका सच: अरविंद कुमार सिंह

11 जुलाई, 1962 को बरवारीपुर, सुल्‍तानपुर में जन्‍में युवा कथाकार अरविंद‍ कुमार सिंह की कहानी-

धूलभरी सड़क पर हिचकोले खाती हुई बस अपने आखिरी मुकाम पर पहुँच चुकी थी। कंडक्टर की आवाज के साथ ही झपकियाँ लेती आँखें खुल गयीं। हड़बड़ी, उत्सुकता और उत्साह के साथ यात्री अपने-अपने थैले और गठरियाँ सँभालते हुए दरवाजे की तरफ लपके।

बस से बाहर रात ज्यादा गहरी दिखाई दी। आसमान में तारे अभी चमक रहे थे। पर चाँदनी का पसरा हुआ रूप कुछ झीना हो चला था- सफेद बादलों पर जैसे कोई हल्की चादर डालता जा रहा हो। फिर भी,  सब कुछ साफ देखा जा सकता था।

छिटपुट पेड़, ऊँचे-नीचे खेत। टीले-भाटों से घिरा यह सिपाह गाँव- जिले का पिछड़ा और अति उपेक्षित हिस्सा। आगे नदी तक जाने के लिए सड़क नहीं,  सिर्फ पगडंडियाँ थीं। पगडंडियों के किनारे-किनारे सरपतों के झुरमुट तथा भटकइया और मदार के पौधे थे।

तीन मील पैदल चलना होगा- बहुत खराब रास्ता है। लोग आपस में बतियाते दिखे। तीर्थयात्रियों में खुशी और उमंग के साथ चिंता,  बेचैनी और शोर का अद्भुत मेल था। कई एक अपने साथियों का नाम ले पुकारते और उन्हें खोजते फिर रहे थे। किसी के चेहरे पर झुंझलाहट थी। कोई खिलखिला भी रहा होता। इस गुल-गपाड़े में हमीनपुर हरिजन टोले के मनीराम की आवाज सबसे ऊँची थी।

‘सुनयना भौजी…ई’

उसके अलग स्वभाव और व्यवहार के कारण टोले ने मनीराम को एक और नाम दिया था- ‘रसिया’। यह सिर्फ बच्चों,  नौजवान और बूढ़ों के लिए ही नहीं, बल्कि टोले की हर नयी-पुरानी औरत के लिए भी रसिया ही था। बिरहा खूब अच्छा गाता। बगैर फरमाइश के ही शुरू हो जाता। नई युवतियों को भौजी कहकर बुलाता। होली का अबीर माथे के बजाय गाल पर रगड़ता। किसी के एतराज पर फौरन तुलसी की चौपाई बाँच अपनी साफदिली का इजहार करता। टोले की रीत में रसिया सभी के लिए राग-देवता था- दुख में भी, सुख में भी।

इस महीने का यह पहला मंगलवार था जब रसिया ने हरफूल की मौजूदगी में सुनयना की चिंता दूर करने की राह खोजी- ‘सब पूरा होगा भौजी। एक नहीं दर्जन भर किलकारी मारेंगे। लेकिन एक बार चलना होगा?’

‘कहाँ?’ सुनयना ने जिज्ञासा से देखा।

‘दूर नहीं भौजी, बस धोपाप। बड़ा जस है धोपाप घाट का। कहते हैं बाभन रावण को मारने के बाद भगवान राम की कोमल गदोड़ी में लंबे-लंबे बाल उग आए थे। आखिर रावण ज्ञानी ब्राह्मण था- ब्रह्मदोष तो लगना ही था। लेकिन घाट की महिमा! अयोध्या जाते समय जब राम वहाँ नहाए तो सारे बाल साफ- सारे पाप खत्म! तभी से नदी के उस घाट का नाम पड़ा धोपाप घाट।’ रसिया कथावाचक जैसी मुद्रा में था।

‘तो ले जा अपनी भौजी के भी पाप धुला दे।’ हरफूल ने सुनयना की आँखों में झांकते हुए कहा।

‘तो का मैं पापिन हूँ?’ सुनयना ने नाराजगी जाहिर की। रसिया हंस पड़ा, ‘भइया को कहने दे भौजी। तू काहे नाराज होती है। फिर पाप तो हर आदमी से होता है। चलते रास्ते चींटी दब गई- का पाप नहीं है। पर सारी महिमा घाट की ही नहीं, वहाँ की पहाड़ी पर मौजूद पापर देवी की शक्ति की भी है। भगवान ने सवयं भी देवी की पूजा की थी। देवी के मंदिर में साफ मन दुआ माँगों तो सब पूरा होगा। दियरा के राजा को बुढ़ाई बेला में लड़का पैदा हुआ था। दूर की छोड़ो, गाँव के चन्दू बनिया को ही देखो…।’ रसिया की आँखें नाच उठीं।

हरफूल ने व्यंग्य कसा, ‘तू भी देवी से अपने लिए बीवी माँग ले।’

रसिया ने जोर का ठहाका लगाया, ‘बीवी तो हमारे लिए भौजी ला देंगी भइया-एकदम अपनी तरह।… लेकिन अबकी भूलना मत भौजी- दशमी के दिन है नहावन। फिर देखना नौ महीने बाद, ‘किलकारी मरिहें ललना तोरे अँगना’,  भइया को साथ जरूर ले चलना। आते वखत काली बाग का मेला भी घूमना।’ रसिया आगे बढ़ चुका था।

हरफूल, सुनयना की तरफ देखकर मुस्कराया। सुनयना की आँखें झुक गईं। पल्लू सिर तक खींच लिया।

रसिया के जाने के बाद से ही सुनयना टूटे पत्ते सी खामोश बनी खोई-खोई रही। हरफूल को काम से निपटते देख सकुचाते हुए पूछा, ‘तो का अबकी दशमी को चलोगे?’

हरफूल ने झिड़कियाँ दीं, ‘अगर देवी-देवता की दुआ से ही बच्चा पैदा होने लगे तो फिर मरद की क्या जरूरत। तू भी रसिया की बात में…।’

‘लेकिन आदमी का विश्‍वास तो चला आ रहा है।’ सुनयना बात काटते हुए बोली।

‘तो क्या तुझे मुझ पर विश्‍वास नहीं है।’ हरफूल की निगाहें टेढ़ी हुईं मानो गुस्सा किया हो, किंतु दूसरे ही क्षण आँखों में मुस्कराहट थी। फिर भी सुनयना की उदासी कम नहीं हुई।

काम से फारिग हरफूल का ध्यान जब सुनयना की ओर गया तो वह खुद भी चिंतित हो उठा। सुनयना की आँखें भीग आई थीं। पति-पत्नी कुछ क्षण तक एक-दूसरे से आँखें चुराते रहे। उनकी चुप्पी गैरजरूरी कामों में उलझने का बहाना भी दिखीं। लेकिन वह भी कब तक- मन के पीछे एक पराजित द्वंद्व था। वही द्वंद्व हरफूल को सुनयना के नजदीक खींच ले गया, ‘इस घर में किसलिए बच्चा पैदा करेगी। हमारी तरह देह पीसने और दुख ढोने के लिए। कौन सी खतौनी और खाता अपने पास रखा है कि आते ही उसके नाम कर दूँगा- ले बेटा, खानदान का चिराग बन। फिर मजदूरी भी तो ऐसी नहीं कि ढंग से खिला-पिला, पढ़ा सकें। जब अपना ही पेट पालना मुश्किल हो रहा है तो बेटा हो या बेटी, बाप को क्या सहारा देगा।’ अंतिम क्षणों तक हरफूल के तर्क की आवाज महीन होती गयी। उसके शब्दों में सिसकियों का पूर्वाभास होने लगा। उसने अब तक जो कुछ भी कहा था, सुनयना को समझाने और दिलासा देने के लिए।

‘औरत होते तो…।’ सुनयना ने एक लम्बी साँस ली। उसमें शताब्दियों का दर्द था। पति ने उसके दर्द को और बढ़ा दिया। आँखें पोंछते हुए उसने जैसे शाप को पोंछा हो।

‘तू पागल बन रही है।’ हरफूल की परेशानी बढ़ गई। सुनयना के विक्षोभ और विषाद ने उसके अंदर के मर्द को झकझोर दिया।

‘हाँ… मैं पागल हूँ।’ माँ न बन पाने वाली औरत का यह सख्त रूप था।

दरवाजे पर बोझिल सन्नाटा तैरने लगा, जबकि शाम की बेला में टोले की चहल-पहल बढ़ रही थी। हरफूल जिस चिंता पर सवार था, वहाँ सुनयना भी साथ खड़ी थी। वह पीछे मुड़कर देखता- नीम-हकीम, पूजा-पाठ सभी उसके लिए बेकार रहे। वह पति है। एक पति की जिम्मेदारी को वह अच्छी तरह जानता है, लेकिन बहुत कुछ अपने वश में नहीं, जबकि सुनयना की जिद और इच्छा थी। उसकी इच्छा का साथी तो उसे बनना ही चाहिए।

‘तू औरत है। औरत का दुख मैं भी समझता हूँ। वैसे मेरा मन देवी-देवता पर टिकता नहीं, पर तेरा विश्‍वास है तो जहाँ कह, वहीं चलूँ। क्या मेरी इच्छा नहीं होती घर में एक बच्चे की किलकारी गूँजे।’ हरफूल ने अपनी चिंताओं और सपने की बातें खोलकर खुद को हल्का महसूस किया।

‘तो क्या दशमी को चलोगे?’ सुनयना ने उत्सुकता से देखा।

‘जरूर।’

दो दिलों में हुलास की लहरें एक साथ उठीं।

लेकिन हरफूल आज नहीं आ सका। पैर में अरहर की खूँटी धँस जाने से हुआ घाव और बहता मवाद ही सिर्फ कारण नहीं था, बल्कि मजबूरी पैसे की थी। तीन घर से निराश होने के बाद चौथी जगह बीस-रुपया मिला भी तो दो हफ्ते के अंदर लौटाने की शर्त पर।

पैसे की कमी ने उनकी मनोकामना पर हिमपात कर दिया। घर में ऐसी कोई भी चीज दिखाई नहीं दे रही थी जिसे बेचकर वे धोपाप घाट तक जा सकते हों। बच्चे की किलकारी की जगह उनके कानों में खुद की हूक सुनाई देने लगी। सुनयना अकेले जाने को तैयार नहीं थी। हरफूल की जिद थी कि वह जरूर जाए। जब विश्‍वास है तो शायद धोपाप घाट और पापर देवी की कृपा से ही कोख भर जाए।

बच्चे की लालसा ने सुनयना को अकेले जाने के लिए मजबूर कर दिया। हरफूल के न आने की बेबसी रास्ते भर सुनयना को रुलाती रही। बस में कई लोग ऊँघने लगे थे। कुछ को बाहर की चाँदनी में शांत खड़े पेड़, जादुई तिलिस्म की तरह रहस्यमय और खामोश दिखते घरों ने सम्मोहित कर लिया था। नींद और प्रकृति का अनन्य रूप भी सुनयना को अपनी ओर नहीं खींच सके। कभी-कभी आदमी दूर जाकर भी एकदम नजदीक हो जाता है, जितना कि वह साथ होने पर भी नहीं होता। सुनयना-हरफूल से दूर होते हुए भी साथ थी, जबकि बगल में बैठी पड़ोसिन कलपा बुआ सिर नींद में उसके कंधे पर गिरा-गिरा जा रहा था।

‘देवी से तुम्हारा पैर जल्दी ठीक हो जाने की दुआ माँगूँगी फिर लड़का…।’ खुद के बजाय सुनयना ने जैसे हरफूल से कहा हो।

सुनयना भौजी।’ भीड़ और शोर को चीरती रसिया की दुबारा आई आवाज सुनयना को अटपटी लगी।

‘यहीं तो हूँ,  का चिल्ला रहे हो।’ वह जैसे सोते से जागी। लपकते हुए टोले वालों के बीच जा पहुँची।

‘सुनयना का बड़ा ख्याल रखता है।’ कलपा बुआ ने व्यंग्य मारा। बुआ बाल विधवा थीं। नौजवान लोगों के हँसी-मजाक को वह छिनरपन कहतीं।

‘रखना भी चाहिए, देवर हैं…।’ टोले की शोभा काकी बुआ के रूखे व्यवहार से चिढ़ती थीं। अवसर मिलते ही वह बुआ के खिलाफ मोर्चा सँभाल लेती।

‘लेकिन सुनयना भौजी हरफूल भइया की याद में एक रात भी…।’ रिश्ते की एक ननद ने सुनयना से ठिठोली की। वह झेंप उठी। जो रंगे हाथ पकड़ी गयी थी। असहजता को छिपाने के लिए झोले को दूसरे हाथ में बदल लिया। सिर के पल्लू को माथे तक खींचा। रसिया से आँख मिलते ही सकपका उठी। उलाहनाभरी निगाहों से ननद की ओर देखा। एक-दूसरे को मजा चखाने की हँसी दोनों चेहरों पर एक साथ फूट पड़ी।

‘भइया भी तो सुनयना भौजी की याद में आज रात…।’

‘चुप रह।’ बुआ ने रसिया को डांटा। त्योरियों में बल पड़े, श्राप देने वाले ऋषि की तरह बुआ का लहजा सख्त हो आया, ‘कहाँ चल रहा है- धोपाप-देवी-देवता के घाट…।’

पर रसिया कहाँ चुप रहने वाला। ऐसे अवसरों पर ही उसकी हरकतें उसका नाम सार्थक करती। वह आगे बढ़कर सैल्यूट की मुद्रा में बुआ के सामने खड़ा हो गया। उसकी आँखों में शरारती मुस्कराहट थी।

‘हम घाट और भगवान से क्यों डरें। का हमने कोई पाप किया है। धोपाप घाट और देवी मैया के दरवाजे चल रहा हूँ तो हाथ-जोड़ कहूँगा- हमें धन-दौलत कुछ नहीं, बस सुनयना भौजी जैसी बीवी चाहिए,  जिसे दिन भर निहारता रहूँ।… कहो भौजी?’ रसिया ने सुनयना की स्वीकृति चाही। उसने भी साथ दिया। एक साथ फूट पड़ा हँसी का फव्वारा बुआ को छेड़ने के लिए जैसी काफी हो। ‘राम-राम दूर हट… दूर हट…’ बुआ झल्लाते हुए आगे बढ़ गईं। उलाहना देते हुए कहा,  ‘आज के औरत-मरद पर तीरथ-धरम में भी बदमाशी सवार रहती है… घोर कलयुग आ गया है।’

रसिया के हाथ जैसे खिलौना आ गया हो। लपकते हुए आगे आया, बुआ का पैर पकड़ कर बैठ गया,  ‘हे सतयुग की बुआ काहे कलयुगी औलाद पैदा कर दी।’ साथ के सभी लोग कौतुक और मजे लेने की मुद्रा में बुआ को घेरकर खड़े हो गये। रसिया से अलग होने की बुआ ने कोशिश नहीं की। लोगों की हंसी में इस बार खुद को भी शामिल कर लिया। झुककर रसिया का कान पकड़ा, ‘एकदम बच्चा बन जाता है… चल आगे।’

हँसी, शोर और तालियों से जैसे सभी ने बुआ का सम्मान किया हो। रसिया ने फुर्ती दिखाई। उसकी चाल तेज हो गई। उसे अचानक तुलसी याद आ गये। रामचरित मानस की कोई चौपाई गाता हुआ वह वर्तमान से दूर चला गया था। साथ के कई लोग चौपाई दुहराने लगे।

आगे बढ़ते लोगों का मेला था। गीत था। सुनयना थी। रास्ता जाने किस ऊबड़-खाबड़ खोह से गुजर रहा था, जाने कब अन्त होगा? कुछ दिन पहले हुई बरसात से दबी धूल स्नानार्थियों के पैरों से फिर उड़ने लगी। तलवों में कंकड़ चुभने लगे। अच्छा ही हुआ हरफूल नहीं आया, सुनयना के मन को तसल्ली हुई।

भोर होने से पहले रसिया की टोली धोपाप घाट पर पहुँच गयी। नदी तट को जोड़ती घाट की लम्बी-चौड़ी सीढ़ियाँ काली पड़ चुकी थीं। उनकी सीमेंट और ईटें टूटी हुई दिखाई दीं। सीढ़ियों से जुड़ा एक खाली मैदान था… रेत-धूल और दिशा फराख्त से निपटते लोगों की गन्दगी से भरा हुआ। स्नानार्थियों की भीड़ यहाँ भी फैल चुकी थी। इनके बीच चादर झाले कुछ ऊँघते लोग भी दिखाई दिए। घाट की हलचल इनकी नींद और थकान पर कमजोर पड़ रही थी।

कुम्भ जैसी ख्याति धोपाप घाट को नहीं मिली थी। चार-छह जिले तक के लोग ही इस घाट से जुड़ी कथा और यहाँ की देवी की महिमा को सुनते चले आ रहे थे। सरकारी बन्दोबस्त भी साधारण ही था… गिनती के दिखाई देते पुलिस वाले, जनरेटर से की गयी रोशनी, डूबते लोगों को बचाने के लिए नौकाएँ। स्वास्थ्य केन्द्र की तरफ से एक तम्बू, जहाँ डॉक्टर की जगह कंपाउंडर की ही सेवाएँ उपलब्ध थीं। यद्यपि इस वक्त वह भी नदारद था। दवाइयों के नाम पर खाली डिब्बा।

सुनयना के लिए हर दृश्य अपरिचित और मोहक होता। घर-गृहस्थी से दूर यह स्वप्न जैसी दुनिया थी। छिटपुट बल्बों की रोशनी- जैसे जल में तारे उतर आए हों। उसकी चिंताएँ कुछ क्षण के लिए स्थगित हो गईं। विस्मय और जिज्ञासा से हर दृश्य पर नजर दौड़ती रही… जल में डुबकियाँ लगाते लोग। पिंडदान करवाते पंडे और पुजारी। बछियों की पूँछ पकड़ परलोक सुधारने की चिन्ता लिये औरत और मर्द। राम नाम की गूँजते जय-जयकार, ऊँची पहाड़ी पर स्थित पापर देवी के मंदिर की ओर उमड़ती भक्तों की भीड़, चिल्लाते लाउडस्पीकर। सुनयना को एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा करती, कभी एकदम फिरकी की तरह घूमकर तैरती नावों को देखने में मजा आ रहा था। हरफूल होता तो वह भी नाव में बैठती। उसे साथ लेकर नदी में नहाती, उथले पानी में भी डूबने का नाटक करती, और क्या-क्या करती… ‘धत्त’ वह मुस्कराई और खुद को डाँटा भी।

‘खड़ी-खड़ी का सोच रही है, जा तू भी नहा…।’ बुआ ने गुस्सा किया। लोगों के नदी में उतर जाने के बाद अकेली बची बुआ कपड़े और सामान की रखवाली कर रही थीं।

‘तू भी चल।’ सुनयना बुआ की नाराजगी भाँप गई।

‘‘कैसे चलूँ?’ बुआ की आँखों में शिकायत थी, ‘चोर-चांडाल तो हर जगह फिराक में रहते हैं। निगाह टली कि सामान गायब।’

‘धोपाप में पाप…।’ सुनयना मन ही मन हँस पड़ी। बुआ अब करीब बैठे छोकरे पर खफ़ा हो गयीं, यह घाट पर नहाती औरतों की देह को एकटक निहार रहा था। सुनयना ने भी देखा, लड़के की उम्र उन्नीस-बीस के करीब रही होगी। आँखें छोटी, रंग साँवला, बेतरतीब दाढ़ी और मुहासों भरा चेहरा। सूखे पपड़ाए होठों पर व्याकुल प्यास। वह खुद से भी चिढ़ा हुआ दिखाई दिया। उसके पैर में गहरा घाव था। उस पर भिनभिनाती मक्खियों, धूल, रेत के प्रति भी वह लापरवाह था, जैसे पैर खुद का न हो। सुनयना को लड़के के प्रति दया आई, बेचारा… लेकिन बुआ उसे भगाने पर तुली थीं।

‘भौजी।’ रसिया की आवाज बीच धारा से आई। तैरने की कलाबाजी कर रहा था वह।

‘हाय दइया।’ बेचारे की घरवाली होती तो कभी न जाने देती।

रास्ते में ठिठोली करने वाली ननद सुनयना को नदी के जल में खींच ले गई। दोनों ‘छपकोरिया’ खेलने लगीं। रसिया की आवाज फिर आई। वह भौजी को आगे आने के लिए कह रहा था।

‘ना बाबा…’ सुनयना ने कान पकड़े और किनारे ही नहाने लगी। तभी एक बूढ़ा पंडा आ गया। उसके हाथ में एक बछिया की रस्सी थी। बछिया भूखी और थकी सी थी। बूढ़ा गऊदान कराने की जिद कर रहा था। सुनयना की नजर बुआ पर जा टिकी।

‘बीस आना…बीस आना…।’ बुआ कैसेट की तरह बज उठीं।

‘इस महँगाई में बीस आने से क्या होगा मावा…।’

‘इससे ज्यादा नहीं दूँगी।’ सुनयना बाहर आई और झोले से बीस आने निकाले।

पंडित ने उसे बछिया की पूँछ पकड़ायी। उसके होंठ एक लय में कुछ देर तक बुदबुदाते रहे। सुनयना को पंडित पर गुस्सा आ रहा था। बीस आना निकल जाने का अफसोस उसे सता रहा था।

‘बाबा अच्छा आशीर्वाद देना। पर पहुँचते ही पाँव भारी होना चाहिए।’ बुआ के दोनों हाथ जुड़ गये।

सुनयना लजा उठी। ‘बुआ भी गजब हैं…।’ पंडित की आँखें फैल गईं। मानो तपस्या से मुक्त होने के बाद वह संसार पर दृष्टिपात कर रहा हो। मगर बुआ की चौकस निगाहें उसे बेंधती हुई लगीं। जल्दी में चावल और हल्दी का अक्षत जल, अन्य दिशाओं की तरफ फेंकने के बजाय सुनयना पर ही फेंकने लगा। बुआ अंदर से चिढ़ उठीं, ‘बबवा मतिभ्रम हो गया है?’

नहाते हुए सुनयना का ध्यान किनारे आए नवआगंतुकों पर गया। दो औरतें,  दो मर्द- एक नवयुवक, एक अधेड़ उम्र आदमी। औरतें भारी और थुलथुल बदन की। किन्तु उम्र बढ़ने के बाद भी गाल ऐसे लाल कि छू देने से ही खून छलक आए। अधेड़ मर्द के बालों में सफेदी उतर आई थी। काले करने के बाद भी सफेदी छिपाए न छिप रही थी। हालाँकि शरीर का वजन और उम्र का दबाव उसकी फुर्ती पर नहीं था। दूसरे मर्द का हुलिया और व्यवहार नौकरों जैसा था। नौजवानी में भी रूखी आँखें, बुझा चेहरा, शरीर से कमजोर। फिर भी, अपनी जिम्मेदारियों के प्रति वह एकदम सतर्क था।

नौकर के एक हाथ में कपड़ों से भरी हुई प्लास्टिक की डोलची थी। दूसरे हाथ में बड़े बालों वाला विदेशी नस्ल का एक सफेद कुत्ता। कुत्ते का नाम टोनी था। टोनी नौकर से ज्यादा वफादार था। वह जमीन पर उतरने को अमादा था।

दोनों औरतें खिलखिला रही थीं। वे नहीं चाहती थीं कि टोनी नौकर के हाथ से छूट कर जमीन पर आए और धूल-मिट्टी में खुद को गंदा कर ले।

सुनयना के लिए नवआगंतुक किसी अन्य दुनिया के प्राणी लगे। उन्हें देखते हुए वह ठिठकी खड़ी रही। नौकर पर तरस आया, औरतों के लिए ईर्ष्या।

‘जल्दी नहा के आ जा…।’ बुआ ने लगभग चिल्लाते हुए कहा।

मंदिर की ओर बढ़ते श्रद्धालुओं का जयकारा फिर सुनाई दिया। उसने दो-तीन डुबकियां लगातार लगाई और नदी से बाहर निकल पड़ी। किनारे आते ही उसके पैर रुक गए।

टोनी नौकर की गिरफ्त से छूट कर इधर-उधर दौड़ने लगा था। नौकर भी उसके पीछे दौड़ रहा था।

‘टोनी-टोनी…‘ दोनों औरतें नदी के जल में खड़ी-खड़ी आवाज देने लगीं। टोनी की स्वामीभक्ति उन्हें चिढ़ा रही थी। टोनी ने हुक्म न मान कर उन्हें हास्यास्पद बना दिया था। अब आवाज देने के बजाय वे उसे चुपचाप देख रही थीं। टोनी कहीं गुम न हो जाए, यही चिंता उनके चेहरे पर थी। अधेड़ आदमी ने नौकर की लापरवाही पर गाली दी और नहाना छोड़कर नंगे बदन टोनी-टोनी चिल्लाते हुए वह भी दौड़ने लगा।

सभी की निगाहें टोनी पर थीं। वह सुंदर और प्यारा कुत्ता था। भीड़ में किसी के भी हत्थे चढ़ सकता था।

लेकिन सुनयना की आँखों में कुत्ता नहीं,  काला जूता था। बिल्कुल नया। टोनी के पीछे दौड़ने वाले अधेड़ न कुछ ही देर पहले जूता किनारे पर उतारा था। जूते ने सुनयना में उथल-पुथल मचा दी। गर्मी की धूप में हरफूल का जलता पाँव, बारिश और ठंड में सिकुड़ी उंगलियां, खेत-जवार में नंगी खूंटियों-कांटों से घायल हुआ पैर-एक ही क्षण में सामने आ गए। एक दिन जूता खरीदने की बात चली तो हरफूल हंसा। नए की बात क्या, फटा-पुराना भी नसीब में हो तो… सुनयना की आँखें उसे हरफूल के पैरों में देखने लगीं। ‘एकदम नाप का है।’ जैसे किसी ने कानों में कहा हो। वह खिल उठी। लेकिन इसी समय ‘जयकारा’ के स्वर ने उसके इरादे पर पानी फेर दिया। मन में भय समा गया। देवी की चौखट सामने दिखाई दे रही थी। वह क्या करने जा रही है… पाप है यह। भगवान राम के घाट और देवी मैया के दरवाजे पर यह ठीक नहीं। वह कांप उठी। घाट और मंदिर से ही नहीं, उगते सूरज से भी माफी माँगी।

बुआ झोले से सरौता निकाल सुपारी कतरने लगी हैं। लोग पाप धोने के साथ शरीर का मैल भी छुड़ा रहे हैं। कुछ अभी टोनी का पीछा करते नौकर और उसके अधेड़ मालिक को ही देखे जा रहे हैं। जूते पर सिर्फ सुनयना की ही नजर है।

जरूरत ने उसे फिर लोभी बना दिया। मानसिक द्वंद्व पीछे छूट चुका था। वह लपक कर जूते के पास जा पहुँची। भीगी धोती को जूते पर छोड़ते हुए धोती और जूता एक साथ झोले में भर लिये। काम तेजी और फुर्ती से हुआ था, फिर भी मन में खटका तो था ही। बुआ पर नजर पड़ी तो घबरा उठी, किंतु बुआ कनखियों से उस जवान छोकरे को निहार रही थीं जिसकी निगाहें घाट पर नहाती औरतों का जायजा लेते हुए सुनयना पर आकर अटक जाती थीं। उसने मन ही मन छोकरे को गालियाँ दीं और बुआ के बगल में जा बैठी।

टोनी के पकड़ में आते ही जूता गायब हो जाने का पता चला। भद्र महिलाएँ नौकर पर गुस्सा उतारने लगीं। टोनी नाराजगी में नौकर पर भौंकने लगा। अधेड़ मर्द को मलाल था कि लुच्चों-लफंगों और इस दरिद्र गँवारों के बीच वे क्यों आए। उसने धमकी दी कि चोरी करने वाले का हाथ-पैर तोड़ देगा। तभी हाथ में डंडा लिये हुए एक पुलिसवाला दिखाई दिया। वह इस तरफ ही आ रहा था। सुनयना बदहवास हो गई। बुआ को बातों में उलझाना चाहा पर बुआ का ध्यान भीड़ पर था।

‘कोई भागने न पाए। चोर यहीं कहीं होगा। सबके सामान की तलाशी लो।’ किसी ने राय दी।

‘जूताचोर भला यहाँ टिकेगा। पहन कर चम्पत हो गया होगा।’ कोई कह रहा था।

‘एक जूता गायब हो जाने पर लोग इस कदर हल्ला मचा रहे हैं जैसे खजाना लुट गया हो…..।’ सुनयना को घबराहट में रोना आ रहा था।

पुलिसवाले ने पहुँचते ही भीड़ को खदेड़ा। डंडा घुमाते हुए गालियाँ बकी। अधेड़ आदमी और दोनों महिलाओं की शिकायत को गम्भीरता से लिया। टोहती आँखों से अगल-बगल ही नहीं दूर तक निहारा। हर चेहरे को पढ़ने की कोशिश की। जूते की चोरी जैसे मामूली घटना नहीं थी। अगल-बगल के लोगों की गठरियों, झोलों की तलाशी लेता हुआ वह गालियाँ भी बकता जा रहा था।

‘नाहक गाली दे रहा है। राम के घाट पर जिसने भी चोरी की है, उसे सजा मिलेगी ही। ऊपरवाले नाथ अंधें तो नहीं हैं।’ पुलिसवाले को सुनाने के बहाने बुआ ने कहा।

सुनयना की धड़कनें खुद को धिक्कारने लगीं। मौका था नहीं कि जूता निकाल कर फेंक सके। पुलिसवाला करीब आ रहा था।

सुनयना को लगा बहुत से लोग उसे घूर रहें हैं। नजदीक बैठा छोकरा भी।

‘बुआ जा तू भी नहा ले।‘ सुनयना को झुंझलाहट हुई। वह अति शीघ्र यहाँ से निकल जाना चाहती थी, पर बुआ तो पूरा तमाशा देखने पर तुली थीं।

रसिया ने पूछा, ‘भौजी तुमने कितनी डुबकियाँ लगायीं? उसका शरीर ही नहीं मन भी सुन्न हो चुका था। उस समय कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था- न रसिया,  न घाट। उन सभी से उसे कोफ्त हो रही थी जिन्हें यहाँ से निकल चलने में कोई हड़बड़ी नहीं थी।

पुलिसवाला रसिया के थैले की तलाशी ले चुका था। वह सुनयना की तरफ बढ़ा। सुनयना काँप उठी, काटो तो खून नहीं।…..हाय राम किस घड़ी में जूता चुराया, भाड़ में जाए जूता- भाड़ में जाएं देवी-देवता…. हे भगवान, आज बचा लो। वह मन ही मन भगवान से विनती करती जा रही थी। तभी उसे कपड़े बदलने का खयाल आया। ब्लाउज के बटन खोलते हुए घुटनों पर झुकी। सिपाही ने डंडा नचाते हुए घूरा। सुनयना बेफिक्र दिखाई दी। ब्लाउज के सारे बटन खुल गये थे।

पुलिस का सिपाही बुआ की चौकस नजरों से टकरा कर दूसरी तरफ मुड़ गया। उसने करीब बैठे छोकरे की पीठ पर जोर से डंडा मारा, ‘अबे तू यहाँ क्या कर रहा है?’

‘अबे साले- मादर…. चोरी करके कहाँ जाएगा।’ पुलिस का सिपाही अपनी पर उतर आया था। उसने छोकरे को दूर तक दौड़ाया और खुद भी उसके पीछे दौड़ने लगा।

बुआ की खीस फैल गयी। रसिया भी हँसा।

लेकिन सुनयना की चिन्ता बढ़ गयी, कहीं वह छोकरा कुछ बता न दे।

घाट की सीढ़ियों, रास्ते की भीड़-भाड़ और देवी के मन्दिर तक न तो पुलिस का सिपाही मिला और न ही वह छोकरा। फिर भी साथ के लोगों की नजर जूते पर न पड़ जाए, वह झोले को बगल में दबाए रही।

देवी दर्शन से लेकर परिक्रमा तक वह भूली री कि आखिर किसलिए यहीं आई है। उसकी चिंता में बाहर रखा झोला था। सभी लोगों के सामान की रखवाली अब रसिया कर रहा था। स्वभाव से मजाकिया- क्या पता झोला उठाकर देखने ही लगे। सुनयना घबरा उठी। मंदिर से भागी-भागी बाहर आयी, झोला पूर्ववत था। रसिया किसी साधू का भजन सुनने में मशगूल था। सुनयना के दिल को तसल्ली मिली लेकिन मुराद माँगना तो वह भूल ही गयी। इच्छा हुई एक बार फिर लौट चले मंदिर की तरफ। लेकिन रसिया जा चुका था। सामान की रखवाली का जिम्मा अब उस पर था। वहीं बैठे-बैठे उसने देवी से माफी माँगी, फिर माँ बनने की प्रार्थना की।

काली बाग के मेले में पहुँचने तक दिन काफी चढ़ चुका था। उमस बढ़ गयी थी। सभी लोग सुस्ताने के लिए एक पेड़ की छाया में जा बैठे। थोड़ी देर तक वे पेड़ की खामोशी पर भड़ास निकालते रहे। फिर अपनी-अपनी जिंदगी की रामधुन में शामिल हुए। हास-परिहास का दौर भी साथ-साथ चलता रहा।

काकी ने चमकते हुए कहा, ‘हरामी गाली दे रही थी।’

‘कौन?’ सुनयना ने पलट कर देखा।

‘जिसका साबुन गुम हुआ था।’ काकी उसकी गाली पर अब भी खफा थीं।

‘किसी ने चुरा लिया था क्या….?’ सुनयना में उत्सुकता थी।

‘हमने’, काकी ने निर्भीकता से कहा और गठरी से साबुन निकाल कर सामने रख दिया।

‘महकऊआ है।’ रसिया की टकटकी पर काकी हंस पड़ी।

‘तुम पापिन हो?’ रसिया ने मजाक में ही कह दिया।

‘कौन यहाँ पुण्यात्मा बैठा है।’ काकी के चेहरे पर ही नहीं, आँखों में भी गर्मी उतर आई थी।

रसिया भी चुप न रह सका, ‘बुढ़ा गई तेरी अक्ल। देवी-देवता का आँगन मैला कर दिया।’ काकी आग-बबूला हो उठीं। फिर ऐसी लुआठी फेंकी कि पूरा टोला ही जल उठा… ‘किसने नहीं की है चोरी। तीन पुश्त तक का हाल जानती हूँ सबका।’ काकी का मिजाज फड़फड़ाने लगा। इतिहास के पन्ने एक-एक कर खुलने लगे। राह चलते लोग भी ठिठकने लगे तो साथ के लोगों ने चुप्पी साध ली।

इस वार्तालाप से सुनयना को सुकून और संबल मिला। वह मन बना चुकी थी कि अब काकी को कोई नसीहत देगा तो वह भी जूता चुराने का खुलासा कर देगी। किंतु रसिया की चुप्पी और लोगों की बातचीत में वह पूछ बैठी, ‘पाप का होता है?’

रसिया भी संशय में, पाप क्या होता है, कभी सोचा भी नहीं। लेकिन इतना जरूर जानता है कि कोई भी गलत काम पाप है। रसिया की राय पर सभी सहमत थे। ‘गलत काम का है?’ सुनयना ने जिज्ञासा से रसिया को देखा, फिर सबको।

‘भौजी हठखेली मत करो। सबका मूड काकी ने वैसे ही खराब कर दिया है।’ रसिया के खीज उठने पर भी काकी बुत बनी रहीं जैसे सुनयना ही अब उसकी वकील हो।

‘सच्चे… हठखेली नहीं कर रही हूँ। पर तुम्हीं- सब बताओ गलत काम का होता है? काकी ने बाल धोने को साबुन चुरा लिया तो कौन सी गलती कर दी। किसी का खजाना लूट कर अपना घर तो नहीं भरा।’

‘यही तो बात है भौजी, कोई भी चोरी पाप है चाहे वह सुई की ही क्यों न हो।’ काकी को अपनी गलती का एहसास दिलाने के लिए रसिया ने ऊँची आवाज में कहा।

बुआ ने भी फिकरा कसा, ‘उसके साबुन से कितने दिन नहाएँगी।’

काकी को बात लग गई। उंगलियाँ चटखाने और चिल्लाने के बजाय सुनयना के नजदीक खिसक आयीं। अपनी तरफ से वकालत करते देख काकी का दिल सुनयना के करीब हो चुका था। आँखों से ढुरकते आँसुओं को पोछते हुए बोलीं, ‘तुम भी सुन लो दुलहिन- मैं पापिन हूँ। पर यह कोई नहीं पूछता कैसे जी रही हूँ। जब से तेरे काका मरे, तब से आज तक इस सिर को…।’ काकी ने अपनी लटों को आगे कर दिया, ‘तेल और साबुन मयस्सर नहीं हुआ। बेटे-बहू तो रोटी खिलाने में ही अहसान जताते हैं। नहाने कैसे आई हूँ कोई नहीं पूछेगा।’

‘बेटों को ही कौन सा सिंहासन मिला है।’ काकी की बात उचित होते हुए भी दोष सिर्फ लड़कों को ही नहीं दिया जा सकता, रसिया ने सोचा।

सुनयना को काकी के साथ गाँव-जवार की कई और बूढ़ी औरतें याद आ गयीं। सबकी जिन्दगी का अँधेरा उसकी आँखों के सामने था। उसे काकी की तरह रोने की आवाज सब तरफ सुनाई दी। वह कांप उठी, खुद के जीवन का अन्तिम दृश्य जैसे सामने हो। वह सड़क की तरफ देखने लगी। सड़क पर चल रहे धूल सने पाँव, पसीने से भीगी देह,  सिर पर गठरियाँ… उन गठरियों में जाने क्या होगा? काकी का चुराया हुआ साबुन या मेरा यह जूता…। जूते का खयाल फिर आ गया। मन के किसी हिस्से में छिपा हुआ अपराध-बोध जैसे लाग-डाट कर रहा था।… वे अमीर लोग, फिर जूता खरीद लेंगे। मालिक, नौकर, टोनी, थुलथुल औरतें और यह जूता- सभी आँखों के सामने आ खड़े हुए। उसने सिर के साथ अपने किए को झटक दिया और काकी की ओर देखने लगी। काकी की आँखों में युगों से समायी बदहाली थी। उदास चेहरे पर हमेशा से व्याप्त दरिद्रता ने सुनयना के सामने फिर एक प्रश्न खड़ा कर दिया, ‘रसिया भइया, तुम्हीं बताओ अगर कोई भूखा-नंगा किसी की रोटी चुरा कर खा ले तो का वह भी पाप होगा?’

रसिया मुस्कराया। भौजी का प्रश्न बिलकुल अटपटा था। रसिया के पास एक तयशुदा उत्तर था, ‘हाँ’, उसने स्वीकार में सिर हिला दिया। ‘चोरी तो पाप हई है।’

‘कैसे?’ सुनयना ने पूछा।

‘उसे माँगकर ही खाना चाहिए।’ रसिया ने कहा।

‘माँगने पर न मिले तो?’ सुनयना ने रसिया को असमंजस में डाल दिया। साथ के लोग भी सोचने लगे। प्रश्न अबूझ पहेली बन चुका था। कुछ क्षण बाद रसिया ने किसी ज्ञानी-ध्यानी की तरह आकाश की ओर आँखें उठाई, ‘न देने वाले को भगवान दंड देगा। वह सबको देख रहा है।’

सुनयना खीज गई, ‘यहाँ तो भूख से मर जाने वाले की भी किसी को चिन्ता नहीं।’ वह चाह रही थी कोई और भी उसके पक्ष में बोले।

तभी काकी ने उँगलियाँ चटखाईं, ‘अरे, ऊपरवाला का दंड देगा। दुख सहते-सहते बाल पक गये। पीटने वाले को खाट, पिटे को जमीन, यही तो देखती चली आ रही हूँ। हाड़तोड़ मेहनत के बाद भी सूखी-रोटी के लाले पड़े रहते हैं, काहे नहीं फट पड़ते भगवान? जाने किस अँधेरी कोठरी में पाथर बनके बैठ गये हैं… सब हवा है- हवा। फूल माला चढ़ाओ- दुख गाओ पर कोई फायदा नहीं।’ साथ के लोगों ने काकी का विरोध नहीं किया। उनकी चुप्पी में काकी का दर्द शामिल था। फिर भी वे उत्तेजित नही हुए। मन से हारे हुए, कमजोर लोग थे वे।

पेड़ की पत्तियाँ हिलीं। मंद बयार बह चली। पसीने से भीगे लोगों को कुछ राहत मिली। सभी लोग काली बाग का मेला घूमने के लिए उठने लगे। जल्दी घर पहुँचने की फिक्र में काली बाग का मेला भी सुनयना को रास नहीं आ रहा था। झोले को दूसरों की नजरों से बचाकर रखना भी मुश्किल था। कुछ खरीदे बगैर भी झोला पहले से भारी दिखाई दे रहा था। जादूगरी के खेलों, झूले-हिंडोले और सर्कस में सुनयना को अब रुचि नहीं। चाट, टिककी और गोल-गप्पों के खोमचे भी उसे अपनी तरफ नहीं खींच सके। यह झोले को ही छिपाती-लुकाती रही।

बुआ की जिद पर सुनयना ने जलेबी और गट्टे खरीदे। हरफूल के लिए एक चुनौटी। अपने लिए बिंदी, सिंदूर और लाल फीता।

टोले के लोग सड़क के किनारे बनी पुलिया पर बस से उतरे तो रात हो चुकी थी। पुलिया से जुड़ी कच्ची सड़क थीं, फिर आगे जाकर सड़क से फूटती हुई पगडंडियाँ। एक पगडंडी हरिजन टोले की तरफ चली गई थी।

रसिया सबसे आगे था। जेठ में भी कजरी गाता हुआ। मौसम और राग का मेल नहीं, जरूरी है मन में उत्साह और खुशी की कोई भी धुन। काकी का खून खौल रहा था, फिर भी वे उसे चुप होने को नहीं कह सकीं। बड़बड़ाती और कोसती रहीं गर्मी को, अपनी गठिया बतास को। साथ के लोग भी रसिया के गायन से बेगौर थे, उनके थके मुरझाए चेहरों पर घर पहुँचने की चिंताभरी ललक थी। लेकिन सुनयना अपनी सफलता पर खुश थी- पैरों में मानो पंख लग गये हों।

टोले में घुसते ही लोग अपने-अपने घरों की तरफ बढ़ गये। रसिया ने मुड़कर भौजी से सलाम करना चाहा लेकिन सुनयना पहले ही खिसक गई थी। नाराज काकी ने मुस्करा कर देखा, रसिया को हँसते हुए विदा किया।

हरफूल दरवाजे पर खड़ा मिला। सुनयना आगे बढ़ गई, उसे चिढ़ाती और अधीर करती हुई। नीम के पेड़ तले खाट पर जा बैठी। ‘थक गई’ उसने मानो खुद से कहा। लेकिन मन की खुशी चेहरे पर छुपाए नहीं छुप रही थी। वह हरफूल की बेचैनी और कौतूहल की थाह लेने लगी, लेकिन उसके लिए वक्त जाया करना ठीक नहीं था, न ही उतना धीरज था। हरफूल सुनयना की बगल आ बैठा, ‘का हुआ, काम बन गया?’

‘धत्त’, सुनयना तुनक गई। ‘यह नहीं पूछोगे तुम्हारे लिए क्या लाई हूँ?’ उसने इठलाते हुए कहा।

‘का लाई हो?’ हरफूल की निगाहें झोले पर जा टिकीं। झोला अभी भी उसके हाथ में था।

‘पैर कैसा है?’ हरफूल के पैर पर घाव देख सुनयना बोल उठी।

‘मवाद निकल गया, बस ठीक ही समझो।’ हरफूल की लापरवाही पर सुनयना नाराज हुई। पहले मवाद पोंछा, फिर पट्टी की। ‘अब कभी तुम्हें चोट नहीं लगेगी। देखों, तुम्हारे लिए क्या लाई हूँ।’

उसने एक-एक करके झोले से चुनौटी, फीता, गट्टा और जलेबी निकाली, फिर जूता। जूते पर ठहरी हरफूल की उत्सुकता पर सुनयना मेले की रामकहानी सुनाने लगी।

हरफूल ने चुनौटी जेब के हवाले की। गट्टा एक खुद खाया, एक सुनयना के मुँह में ठूंस दिया। फिर लाल फीते का फूल बनाकर पत्नी की चोटी में सजा दिया। अंत में उसने जूतों में पैर डाले- ‘अरे, ये तो मेरे लिए ही बने लगते हैं…

(कहानी संग्रह उसका सच से साभार)।  चि‍त्रांकन : उमेश कुमार