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कक्षा पहली के बच्चे : भास्कर चौधुरी

भास्कर चौधुरी

भास्कर चौधुरी

एक

आपने सुना कभी
किसी हिटलर को कहते
सुंदर है यह धरती
आओ इसे और सुंदर बनाएँ

कक्षा पहली के बच्चे
ऐसा हर रोज़ कहते हैं-
सुंदर है यह धरती
आओ इसे और सुंदर बनाएँ।

दो

कक्षा पहली के बच्चे ने
थाम रखा है सर
हथेलियों के बीच
बच्चे के गाल
महसूस कर रहे हैं
उंगलियों का दबाव
और ठोढ़ी टिकी हुई है
हथेलियों की जड़ों पर
कक्षा पहली के बच्चे ने
थाम रखा है सर
जैसे थामा हो पृथ्वी
हथेलियों के बीच !

तीन

कक्षा पहली के बच्चे
नहीं जानते सौदा
किस चिड़िया का नाम होता है
वे नहीं समझते गिव एंड टेक का अर्थ
कक्षा पहली के बच्चे
हमारे थोड़े से समय के बदले
ढेर सारा प्यार दे देते हैं।

चार

कक्षा पहली के बच्चे
कहीं भी कभी भी
गाने लगते हैं जन गण मन…
जब चाहे
उनका मनकक्षा पहली के बच्चे
सुबह की प्रार्थना सभा में
पैर के अंगूठे से
धरती पर आड़ी-तिरछी लकीरें खींचते हैं
जब और लोग गाते हैं जन गण मन…

पाँच

बहुत दिनों के बाद
अपनी कक्षा से बाहर आए हैं
कक्षा पहली के बच्चे
जैसे अपने नीड़ों से निकलकर मेमनें
चल पड़ते हैं भेड़ों के साथ
उनसे सटकर
कक्षा पहली के बच्चे
अपनी टीचर जी के साथ
तितलियाँ पकड़ने का खेल खेल रहे हैं
बहुत दिनों के बाद
खिली है धूप
तो जैसे शामिल हो गई हो
चुपके से बच्चों की दूधिया खुशी में…
पहली कक्षा के बच्चे जैसे
बादलों के पीछे से
सूरज की तरह निकले
और छा गए
धूप की तरह पूरे मैदान में..

छः

कक्षा पहली के बच्चे
मायूस दिखते हैं जब
टॉयलेट के सामने
निकर आधी ऊपर चढ़ाए
बटन या हूक लगाने का
सफल-असफल प्रयास करते हैं
वे नहीं चाहते
कोई उन्हें देख ले नंगा
पहली कक्षा के बच्चे
अपनी टीचरजी से सटकर खड़े होते हैं
वे टीचरजी के होंठों को देखकर
और छूकर सीखते हैं-
‘आ’ आम का, ‘ए’ से एप्पल
‘औ’ से औरतकक्षा पहली के बच्चे
उनकी टीचरजी के ज़रा देर करते ही
खुद बन जाते हैं टीचर
चॉक पकड़कर श्यामपट पर
बनाते आदमी मकान चिड़िया तितली
छड़ी पकड़कर नन्हें हाथों में
खेलने लगते मैडम-मैडम
कक्षा पहली में
कम अज कम पाँच बच्चे होते
कक्षा के मॉनीटर….कक्षा पहली के बच्चे
केवल अपने टीचर को पहचानते हैं
वे उन्हें ‘टीचरजी’ कहकर पुकारते हैं
टीचरजी के मुंह पर उंगली रखते ही
अपने मुंह पर उंगलियाँ रख लेते हैं
और इशारा होते ही उनका
नाचने लग जाते हैंकक्षा पहली के बच्चे
समझते हैं प्यार की भाषा !!

सात

मेरे सपनों में आते हैं
कक्षा पहली के बच्चे
आते हैं और गुदगुदाने लगते है
पत्नी कहती है
हँसता हूँ मैं नींद में…।

आठ

दौड़ता रहता हूँ मैं
बड़ी कक्षाओं के बच्चों के बीच
कि जैसे एक डर सा लगने लगा है
इन दिनों बड़ी कक्षाओं के बच्चों से
ज़रा सी देर हुई नहीं कि
घटी कोई दुर्घटना
कि जैसे बच्चे बच्चे नहीं रहे
बड़ी कक्षाओं के…

कि जैसे-
बड़ी कक्षाओं के बीच
झूलता रहता हूँ
दोनों हाथों के बल
हवा में लटके होते हैं
दोनों पैर…
कि जैसे-
फुरसत ही नहीं
सांस लेने की भी …

पर मिलते ही
पहली कक्षा के बच्चों को
सांसों को इत्मिनान आ जाता है।

नौ

कक्षा पहली के बच्चे
दौड़ रहे हैं/कूद रहे हैं
मचल रहे हैं
गिर रहे हैं/उठ रहे हैं
उड़ रहे हैं
कक्षा पहली के बच्चे
गा रहे हैं कोई गीत
समूह में नाच रहे हैं
खेल रहे हैं कित-कित
लूट रहे हैं मज़ा
हल्की-हल्की बारिश में भीगने का

कक्षा पहली के बच्चे को भूख लगी है
वे मिड डे मील खा रहे हैं…

कक्षा पहली के बच्चे
तड़प रहे हैं
पेट पकड़-पकड़ कर
उल्टियाँ कर रहे हैं
पास पड़ी हुई
खुली हुई किताबे है
हवा में पन्ने फड़फड़ा रहे हैं…

दस

कक्षा पहली का बच्चा
चलता है सड़क पर ज
सड़क पर नहीं होती उसकी आँखें
वह देखता है
फूल पत्ती तितली आसमान
बादल बिजली बरसात गाय और गोबर
चीटियाँ पिल्ले और कुत्ते और कौवें धूल धुआ
तेज रफ्तार गाड़ियाँ
बाइकों का शोर और
रिक्‍शे की पों पों
भले लगते हैं
कक्षा पहली के बच्चे को
पहली कक्षा का बच्चा
छूता है जब कागज़ की नाव
उंगलियों के पोरों से
तो वह चलने लगती है बेपाँव
पाँव की ठोकर लगते ही
छोटा गोलाकार पत्थर
फुटबाल बन जाता है
क्क्षा पहली का बच्चा नहीं होता

सड़क पर कभी अकेला-उदास!!

ग्यारह

वह बच्चा
कक्षा पहली का
पहुँच नहीं पाया
अपनी कक्षा में
अब तक
दरअसल
खोज रही है
उसकी आँखें
धरती पर कोई नई चीज़
जो काम की हो उसके
मसलन
चकमक पत्थर
लकड़ी का एक
अदद टुकड़ा-
चिकना और बेलनाकार
सुनहली मक पत्ती !!

मेरे वि‍द्यालय की डायरी : रेखा चमोली

REKHA CHAMOLI

प्राथमिक विद्यालय, उत्‍तरकाशी में कार्यरत संवेदनशील कवियत्री  रेखा चमोली बच्‍चों के साथ नवाचार के लि‍ए जानी जाती हैं। कक्षा-1 से कक्षा-5 तक बच्‍चों के अकेला पढ़ाना और साथ ही स्‍कूल की व्‍यवस्‍था को भी देखना बेहद श्रमसाध्‍य है। यहां उनकी डायरी के संपादि‍त अंश दे रहे है-

4-8-11

शब्दों से कहानी बनाना

हमारे पास कोई इतना बडा़ कमरा नहीं है कि कक्षा 1-5 तक के 53 बच्चे उस में एक साथ बैठ पाएं। कक्षा 3,4,5 वाले बच्चे बालसखा कक्ष में बैठे और कक्षा 1,2 वाले दूसरे कक्ष में। आज मैं घर से आते हुए पुरानें अखबार और बच्चों की आधी भरी हुई पुरानी कापियां साथ ले आयी थी ताकि कक्षा 1 व 2 वालों को थोडी देर व्यस्त रख पाऊॅ और इतने में 3, 4, 5 वालों को उनका काम समझा सकूं। कक्षा 1,2 वालों को बाहर ही एक गोला बनाकर कविताएं गाने को कहा और अपने आप कक्षा 3,4,5 के पास गई। आज हमें शब्दों से कहानी बनाने की गतिविधि करनी थी। मैंने श्यामपट पर कुछ शब्द लिखें- बस,  भीड़, सड़क,  ड्राइवर, तेज शोर, रास्ता, पेड़, लोग।

बच्चों को प्रारम्भिक बातचीत के बाद दिए गए शब्दों से कहानी लिखने को कहा।

मैं कक्षा 1-2 के साथ काम करने लगी। इन कक्षाओं में कुल मिलाकर 23 बच्चे हैं। मैंने श्यामपट पर कुछ शब्द लिखकर उनमें ‘न’ पर गोला बनाने की गतिविधि कुछ बच्चों को बुलाकर की।जैसे- नमक, कान, नाक,  जाना, जानवर आदि। फिर सभी बच्चों को अखबार का 1-1 पेज देकर कहा कि वे इसमें ‘न’ और ‘क’ पर गोला लगाएं व उन्हें गिनें कि वे अक्षर कितनी बार आए है। दरअसल बच्चे हमारी अनुपस्थिति में अपनी कापियों को बहुत खराब कर देते हैं। कक्षा 1 के बच्चे पेज बहुत फाड़ते हैं इसलिए मैंने उन्हें ये काम अखबार में करने को दिया जिससे वे कमरे और बरामदे में दूर-दूर भी बैठें और उन्हें कुछ नया भी करने को मिले। अखबार के अक्षर बहुत बारिक लिखे होते हैं। पर फिर भी मैंने देखा बच्चे अक्षर पर गोला बना रहे थे और जो ऐसा नहीं कर पा रहे थे, वे दूसरों को देख रहे थे। उसमें बने चित्र देख रहे थे।

इतने में ही दूसरे कमरे सें भवानी, जयेन्द्र, साधना आए और कहा कि‍ हमने अपनी कहानी लिख ली है। अच्छा, अब अपनी-अपनी कहानी का शीर्षक लिखो कहने पर उन्‍होंने कहा कि कहानी का शीर्षक भी लिख दिया है।

मैंने उनकी कहानियां पढी़ और कुछ सुझाव देकर एक बार फिर से लिखने को कहा। बच्चे मेरे पास आते रहे अपनी कहानी पर सुझाव लेते रहे और उसे ठीक किया।

करीब सवा नौ बजे हम एक बड़ा सा गोला बनाकर अपनी-2 कहानियां सुनाने को तैयार थे। तीनों कक्षाओं को मिलाकर आज कुल 27 बच्चे उपस्थित थे।

सबसे पहले शुभम् (कक्षा-3) ने अपनी कहानी सुनाई-

1- एक बस थी। जिसे चला रहा था ड्राइवर।अचानक एक आदमी बोला बस रोको आगे सड़क टूटी हुई है। ड्राइवर ने बस रोकी। सड़क पर पत्थर और पेड़ गिरे थे। लोगों ने मिलकर बस के लिए रास्ता बनाया और बस आगे चली । सब लोग अपने गांव पहुंचे ।

2- दीक्षा (कक्षा-3) ने अपनी कहानी में लिखा कि एक पेड़ के गिरने से सड़क बन्द हो गई। जब ड्राइवर पेड़ हटाने लगा तो जंगल से पेड़ काटने वालों की आवाज आई- ये हमारा पेड़ है। अपनी बस वापस ले जाओ। जंगल से पेड़ काटने वाले आए और सबने मिलकर पेड़ को हटाया। फिर लोग वापस अपने गांव गए। दीक्षा ने अपनी बस का नाम रखा ’मुनमुन’ और ड्राइवर का ’राहुल’।

3- साधना (कक्षा-5) – रमेश नौकरी की तलाश में शहर जाता है। वहां उसे ड्राइवर की नौकरी मिलती हैं। वह पहली बार बस चलाता है। रास्ते में बहुत सारे पेड़ थे। बस रुक जाती है। बस खराब हो जाती हैं। लोग डर जाते हैं कि हम कहां फंस गए। बाद में बस ठीक हो जाती है। रमेश सोचता है कि‍ मैं बस ठीक से चलाना सीखूंगा। बाद में वह ठीक से बस चलाना सीखता है। पैसे कमाता है। शादी करता हैं। घर बनाता है। उसके बच्चे होते हैं।

इसी तरह और बच्‍चों ने भी कहानी लि‍खी। ज्यादातर बच्चों की कहानियां मिलती-जुलती थीं, तो क्या हमने शब्दों पर ज्यादा खुलकर बातचीत की? या मेरी अनुपस्थिति में बच्चों ने एक- दूसरे से बातचीत की? मेरे मन में शंका हुई।

मैने नोट किया कि सभी बच्चों ने अपनी कहानी को आत्मविश्वास के साथ सुनाया। वे बीच में कहीं रुके नहीं। न ही किसी शब्द को पढ़ने में अटके । बच्चे अपना लिखा हुआ सुस्पष्ट व धाराप्रवाह पढ़ सकते हैं।

बच्चों ने अपना काम कर लिया था। मैंने उन्हें खाना-खाने जाने को कहा। बच्चों को हाथ धुलवाकर खाने के लिए बिठाया। भोजनमाता भोजन परोसने लगी। छोटे बच्चें अभी इधर-उधर ही घूम रहे थे। उन्हें बुलाया, खाना खाने बिठाया। भोजनमाता अपनी जरा सी भी जिम्मेदारी नहीं समझती है। बस किसी तरह काम निबटाना चाहती है। मध्यान्तर के बाद सारे बच्चों ने एक साथ बड़े गोले में गीत, कविताएं आदि गाईं और अपनी-अपनी कक्षा में बैठे।

कक्षा 3,4,5 को श्यामपट पर कुछ word-meaning पढ़ने व लिखने को दि‍ए। फिर कक्षा 3 को जोड़ के मिलान वाले सवाल हल करने को दिए और कक्षा 4,5 को क्षेत्रफल के सवाल। बच्चों को दो-दो के समूह में काम करने को कहा।

कक्षा 2 के सारे बच्चों ने अखबार में ‘न’ व ‘क’ पर गोले बनाए थे। कक्षा 1 के भी कुछ बच्चों ने अक्षर पहचाने थे। कुछ बच्चों के अखबार का बुरा हाल था। पर कोई बात नहीं अखबार का जितना प्रयोग होना था, हो चुका था। मैंने कक्षा 1 व 2 को उनकी कापी में गिनती व सरल जोड़ के सवाल हल करने को दिए। जैसे- एक पेड़ पर 25 पत्तियाँ बनानी या आसमान में 15 तारे बनाने। छोटे बच्चे हर समय कुछ न कुछ करने को उत्साहित रहते हैं। इसलिए इनमें से कुछ अपने आप बाहर चले गए और बाहर जमा हुए पत्थरों की पक्तियां बनाने लगे। एक-दो बच्चे चाक ले गए और जैसी आकृतियाँ मैं बनाती हूँ, उसी तरह की आकृतियाँ बनाकर उन पर पत्थर जमाने लगे।

जब सारे बच्चे कुछ न कुछ करने लगे तो मैं बच्चों का सुबह वाला काम देखने लगी। बच्चों ने तो अपना काम कर दिया था। अब मुझे अपना काम करना था। पहला काम तो बच्चों की मात्रात्मक गलतियाँ सुधारना था । कक्षा 3 के कुछ बच्चे बहुत गलतियाँ करते हैं। 4 व 5 में भी एक दो बच्चे ऐसे हैं। मैंने बच्चों की कापी में उनकी गलतियाँ ठीक की। फिर काम को fair करने के लिए 1 चार्ट के चार बराबर भाग किए। उनमें पेंसिल से लाइने खींची। इन्हीं चार्ट पेपर से हम अपनी किताबें बनाने वाले हैं। बच्चों को एक-एक चार्ट पेपर दिया, जिसमें वे घर से अपनी-अपनी कहानी लिखकर व बची जगह में कहानी से सम्बन्धित चित्र बनाकर आएँगे।

इस तरह आज के दिन का काम हुआ। मैं बच्चों के काम को देखकर बहुत खुश हूँ।

5-8-11

कविता लिखना

school.REKHA CHAMOLI

आज सुबह 7:15 पर विद्यालय पहुँची। साधना, मिथलेश व कुछ बच्चे आ गए थे। बच्चों ने मिलकर साफ-सफाई की। मैंने और साधना ने मिलकर बालसखा कक्ष की सफाई की। इसी बीच सारे बच्चे आ गए थे। हमने मिलकर प्रार्थना सभा शुरू की। प्रार्थना के बाद रोहित और दिव्या ने अपनी कल लिखी कहानी सबको सुनाई। और बच्चे भी अपनी कहानी सुनाना चाहते थे, पर समयाभाव के कारण ये संभव न था। ये बच्चे अपनी बारी आने पर किसी और दिन कहानी सुनाएँगे। कक्षा 1 से रितिका, सलोनी, राजेश ने आगे आकर कविता सुनाई जिसे सारे बच्चों ने दोहराया। उपस्थिति दर्ज कर बच्चे अपनी-अपनी कक्षा में गए।

जब तक कक्षा 3,4,5 के बच्चे बालसखा कक्ष में गोले में बैठे और अपना कल का काम निकाला, तब तक मैंने कक्षा 1 व 2 को 1-1 पेज देकर उसमें चित्र बनाने व उनका नाम लिखने का काम दिया। मैंने श्यामपट पर कुछ चित्र बनाए व उनके नाम लिखे और बच्चों से कहा वे इन चित्रों को भी बनाएं व अपनी मर्जी से अन्य चित्र भी बनाएं। बच्चों को एक बार बता दो क्या करना है फिर भी वे बार-बार पूछते है। सारे चित्र बनाने हैं जी, सबके नाम लिखने हैं? मुझे इसका नाम लिखना नहीं आता। रंग भी भरना है क्या? वगैरह-वगैरह। इन बच्चों को अपने काम की तैयारी में ही बहुत समय लग जाता है। पेंसिल नहीं है या छिली हुई नहीं है। toilet जाना है, पानी पीने जाना है। इसने मेरा page ले लिया, इसने नाम बिगाड़ कर पुकारा। पर जब काम शुरू होता है तो थोडी देर सिर्फ काम होता है, पर सिर्फ थोडी देर। मैंने बच्चों को उनका काम फिर से बताया और मैं थोड़ी देर में आती हूँ, कहकर बालसखा कक्ष में गई। गेट बन्द कर दिया। जिससे बच्चे बाहर आएँ तो रास्ते में न जाएँ। भोजन माताएँ आ चुकी थीं। खाना बना रही थीं। मैंने उनसे कहा कि‍ देखना बच्चे लड़-झगड़े नहीं। वैसे ये बच्चे कुछ भी करें, बगल के कमरे में साफ आवाज आती है।

जब मैं बालसखा कक्ष में पहुँची तो बच्चे अपना-अपना पेज एक-दूसरे को दिखा रहे थे, पढ़ रहे थे, चित्र देख रहे थे, अपना छूटा हुआ काम करे रहे थे। मैंने उनसे पेज जमाकर लिए। कुछ बच्चों के पेज मुड़-तुड़ गए थे। कुछ ने अच्छा लिखने या जल्दबाजी के कारण काटा-पीटी कर दी थी। मैंने बच्चों से इस बारे में बात की। लिखने का काम इतना अधिक नहीं था कि थकान लग जाए। हमें ये पेज संजो कर रखने हैं। इन्हें बाकि बच्चे भी पढे़गे। इसलिए मैंने सोचा आज से fair करने का काम भी विद्यालय में ही करना होगा।

आज कविता पर काम करना था। मैंने पिछले दिनों कक्षा में कहानी और कविता के स्वरूप को लेकर बच्चों से बात की थी । बच्चे कविता व कहानी में अन्तर पहचानते हैं, पर अभी उनके लिखने में ये ठीक से नहीं आ पाया है। शुरुआती लेखन के लिए मैंने बच्चों का ध्यान लय,  तुकान्त शब्द,  कम शब्दों का उपयोग व बिंबों की ओर दिलाने का प्रयास किया। मैं जानती हूं, कविता एक संवेदनशील हृदय की अभि‍व्‍यक्‍ति‍ है। एक अच्छी कविता हमारे मन को छू लेती है। हमें उर्जा से भर देती है या कुछ कर गुजरने को प्रेरित करती है। और हर व्यक्ति कविता नहीं लिख पाता, पर यहां अपनी कक्षा में मैं कविता को इस तरह देखती हूं कि बच्चे किसी चीज के प्रति अपने भावों को व्यक्त करना सीखें, अपने लिखे को मन से पढ़ पाएं। कक्षा 4 व 5 वाले बच्चे अपनी कक्षा में कुछ विषयों पर कविता लिखने का प्रयास कर चुके हैं। कुछ ने छोटी-छोटी कविताएं लिखी हैं। ये बहुत सी कविताओं को सुन-पढ़ चुके हैं।

मैंने कविता लिखने के लिए विषय चुना- पानी। बच्चों से पानी को लेकर बातचीत की। प्रत्येक बच्चे ने पानी को लेकर कुछ-न-कुछ बात कही।

जैसे- पानी नल से आता है

पानी को हम पीते हैं।

पानी नदी, धारे-पनियारे, बारिश से भी आता है।

पानी कहां से आता है ? उससे क्या-क्या करते हैं ? यदि पानी न हो तो क्या होगा। पानी हमारे किन-किन काम आता है? आदि के आसपास ही बच्चों की ज्यादातर बातें रहीं। कक्षा में बातों का दोहराव होता देख मैंने बच्चों से कहा,  मैं श्यामपट पर पानी शब्द लिखूंगी। तुम्हारे मन में पानी को लेकर जो भी बातें आती हैं, उन्‍हें एक शब्द में बताना है। जो शब्द एक बार आ जाएगा, उसे दुबारा नहीं बोलना है। बच्चे शब्द बोलते गए मैं उन्हें लिखती गई। कुल 50-60 शब्द हो गए।

उदाहरण- पानी-पीना, खाना बनाना,  मुंह धोना, नहाना,  प्यास,  मरना, मीठा, गंदा, गरम, ठंडा, चाय, स्वच्छ निर्मल, बादल, इन्द्रधनुष, पहाड़,  झरने, गौमुख,  नदी,  भागीरथी, गंगा,  गाड़, पनियारा, टंकी, बाल्टी,  कोहरा, बुखार,  भीगना,  सिंचाई,  बिजली,  बांध, जानवर, खेती, रोपाई,  बहना,  भाप निकलना, जीवन, मछली, सांप, मेंढक, आकाश, भरना, होली, सफाई आदि। अब मैंने बच्चों से तुकान्त शब्दों पर बात की। हमने पानी, काम, बादल,  जल,  भीगना,  गीला आदि शब्दों पर तुकान्त शब्द बनाए। फिर मैंने श्यामपट पर एक पंक्ति लिखी-

ठंडा-ठंडा निर्मल पानी।

पानी से मुंह धोती नानी।

इन पंक्तियों को बच्चों को आगे बढाने को कहा। बच्चों ने मिलजुल कर कविता को आगे बढाया-

पानी आता बहुत काम

इसके बिना न आता आराम

हमको जीवन देता पानी

बताती हमको प्यारी नानी।

इसके बाद मैंने बच्चों से एक और कविता पानी पर ही लिखने को दी।

इतने में पेंन्टर और बाकि मजदूर काम करने आ गए। खच्चर वाले भइया ने सुबह ही आंगन में बजरी डाल दी थी। प्रधानजी का बेटा अन्य सामान सीमेंट वगैरह लेकर आए। मैंने बच्चों की मदद से कल छुट्टी के बाद एक कमरा खाली किया था। आज उससे पेंटर को पेंट की शुरुआत करने को कहा। विद्यालय में अन्य लोगों को देख कक्षा 1, 2 के बच्चे बाहर आ गए। इधर-उधर दौड़ने लगे। कुछ बच्चे बजरी में खेलना चाहते थे। जब खच्चर वाले भइया दुबारा बजरी लेकर आए, तो मैंने उन्हें विद्यालय के पिछले हिस्से में बजरी डालने को कहा, पर जगह कम होने के कारण खच्चर ने वहाँ जाने से साफ मना कर दिया और खुद ही अपनी पीठ का भार गिरा दिया। अब एक काम बच्चों को इन पत्थर-बजरी से भी दूर रखना था। और ये भी ध्यान रखना था कि खच्चर हमारे फूलों की क्यारी से दोस्ती न कर पाएं।

अब तक बच्चे अपनी-अपनी कविताएं लिख चुके थे। बच्चों ने अपनी कविताएं सुनानी शुरू कीं। सरस्वती (कक्षा-5)  ने अपनी कविता में मीठा,  पर्वत व कहानी शब्द लिखे थे।

अनिल (कक्षा-5) ने मछली के जीवन व काम का उपयोग बताया था।

दीपक (कक्षा-5)  ने ठंडा, धरती से पानी का निकलना और पानी का कोई रंग ना होना बताया था। पूर्व की बातचीत में पानी के रंग पर कोई बात नहीं आयी थी। अंबिका (5)  ने धारे,  नदी व जीवन की बात कही थी। कुछ बच्चों ने बहुत सुंदर कविता लिखी थी।

जैसे- प्रवीन (5) ने-

इस पानी की सुनो कहानी

इसे सुनाती मेरी नानी

पानी में है तनमन

पानी में है जीवन

कहती थी जो वह बह जाता

कही ठोस से द्रव बन जाता।

मुझे प्रवीन की कविता में पहले पढ़ी किसी कविता का प्रभाव दिखा, जबकि इससे पहले पढ़ी कविताओं में कम सधापन था, पर उनमें मौलिकता अधिक थी। कुछ बच्चों ने पूरे-पूरे वाक्य लिख दिए थे। कुछ की पहली पंक्ति का दूसरी से सामंजस्य नहीं था। शब्दों की पुनरावृति अधिक थी।

मेरी स्वयं भी कविता के विषय में समझ कम है, पर मैं ये चाहती थी कि बच्चे अपनी बात को इस तरह लिखें कि कम शब्दों में ज्यादा बात कह पाएं और अगर उसमे लय भी हो तो मजा ही आ जाए।

बात आगे बढा़ते हुए मैंने श्यामपट्ट पर एक वाक्य लिखा।

पानी के बिना हमारा जीवन अधूरा है।

अब इसी पंक्ति को थोड़ा अलग तरीके से लिखा।

1- पानी बिन जीवन अधूरा

2- बिन पानी अधूरा जीवन

3- पानी बिन अधूरा जीवन

जब इन पंक्तियों में बच्चों से अंतर जानना चाहा, तो उन्होंने बताया कि‍ पहली पंक्ति कहानी या पाठ की है, जबकि बाद की पंक्तियां कविता की हैं। कारण पूछने पर बच्चों में से ही बात आई कि कविता छोटी होती है। शब्द कम होते हैं। उनका ज्यादा अर्थ निकालना पड़़ता है।

अब मैंने मनीषा से अपनी कविता पढ़ने को कहा, तो उसने उसे श्यामपट्ट पर लिख दिया। मनीषा ने लिखा था-

पानी आता है गौमुख से

पानी आता पहाड़ों से

पानी आता है नल से

पानी को हम पेड़ पौधों को देते हैं।

पानी का कोई रंग नहीं होता है।

मैंने बच्चों से पूछा कि‍ क्या इन पंक्तियों को किसी और तरीके से भी लिख सकते हैं?

‘हां जी’ कहने पर शिवानी ने कहा-

पहाडों से निकलता पानी

अरविन्द ने दूसरी पंक्ति जोड़ी-

गौमुख का ठंण्डा स्वच्छ पानी

इसी प्रकार पंक्तियां जुड़ती गईं-

नल से आता है स्वच्छ पानी

पेड़-पौधे भी पीते पानी

बिना रंग का होता पानी।

फिर हमने इस पर बात की कि पहली लिखी पंक्तियों व बाद की पंक्तियों में क्या अंतर है। कौन कविता के ज्यादा नजदीक है?

बच्चों के जबाव आए- दुबारा लिखी पंक्तियां।

क्यों ? क्योंकि कम शब्दों में ज्यादा बात कह रही हैं। अन्त के शब्द मिलते-जुलते हैं। मैंने बच्चों के कहा कि वे अपनी अभी लिखी हुई कविता को एक बार और ठीक करके लिखें।

इस बार बच्चों ने अपनी पंक्तियों को और परिष्कृत करके लिखा।

उदाहरण-  कक्षा 3 के बच्चों ने लिखा- (कुछ पंक्तियां)

प्रियंका- नदिया बहती कल-कल-कल

पानी करता छल-छल-छल

प्रीति- कैसे पानी पीते हम

पानी से जीते हम

शुभम्- जब मछली पानी से बाहर आती

इक पल भी वो जी न पाती।

दिव्या (4)- ठंडा ठंडा निर्मल पानी

कहानी सुनाती मेरी नानी

पानी बहुत दूर से आता

बर्फ से पानी जम जाता

पर्वत से आता पानी

धरती ने निकलता पानी।

इस तरह सभी बच्चों ने अपनी-अपनी कविताएं ठीक कीं। ज्यादातर बच्चों ने 12-15 पंक्तियां लिखीं।

आज मध्यान्तर थोड़ी देर से किया, क्योंकि हमारी बातचीत देर तक चली थी। मध्यान्तर के बाद कक्षा 3,4,5 वालों ने अपना काम fair करना चाहा, क्योंकि सुबह ही यह बात हो गई थी कि हमें स्कूल में ही यह काम करना है। बच्चों ने आज खेला नहीं। वे काम करने के लिए पेज मांगने लगे। मैंने अंजली, सरस्वती, प्रवीन की मदद से फटाफट चार्ट पेपर पर पेंसिल से लाइनें खीचीं ताकि बच्चे सीधा-सीधा लिख पाएं। बच्चे अपना काम करने लगे। मैं 1 व 2 वालों को देखने लगी। जिन बच्चों की मात्रात्मक गलतियाँ ना के बराबर थी, उन्होंने फटाफट अपना पेज तैयार कर लिया। मैंने उन्हें कक्षा 1व 2 के साथ काम करने को कहा। अपने आप बच्चों की कापियाँ चैक करने व पेज में किस तरह काम करना है आदि बातें बच्चों को बताने लगी। आज गणित में कम काम हो पाया। कक्षा 3 को श्यामपट पर घटाने के मिलान वाले सवाल दिए। 4 व 5 वालों को क्षेत्रफल के सवाल अपनी किताब से करने को दिए। आज भी बच्चों ने अपने समूह में काम किया व बीच-बीच में मुझे दिखाते रहे। मैंने कल पेंट करने के लिए जगह बनाई और आज का काम देखा। आज बच्चों को घर के लिए यह काम दिया कि वे अपने मनपसंद विषय पर कविता लिखकर आएं।

वसुंधरा पाण्डेय की कवि‍ताएं

वसुंधरा पाण्डेय

वसुंधरा पाण्डेय

वसुंधरा पाण्डेय की कवि‍ताएं-

सिंदूर

बचपन में
माँ को सिंदूर लगाते देख
जिद की थी मैंने भी
माँ
मुझे भी लगाना है सिंदूर
मुझे भी लगा दो न
तब माँ ने समझाया था-

ऐसे नहीं लगाते
बहुत कीमती होता है यह
घोड़ी पे चढ़के एक राजा आएगा
ढेरों गहने लाएगा
तुमको पहनाएगा
फिर सिंदूर तुम्हे ‘वही’ लगाएगा
रानी बनाके तुम्हे डोली में
ले जाएगा
तब उन बातों को, पलकों ने
सपने बना के अपने कोरों पे सजाया

बड़ी हुई
देखा…बाबा को भटकते दर-बदर
बिटिया की माँग सजानी है
मिले जो कोई राजकुमार
सौंप दूँ उसके हाथों में इसका हाथ

राजकुमार मिला भी पर
शर्त-दर-शर्त
‘आह’
किस लिए
चिटुकी भर सिंदूर के लिए

‘उफ्फ’…..माँ
क्या इसे ही राजकुमार कहते हैं ?

काश! बचपन में यह बात भी बताई होती
राजकुमार तुम्हारी राजकुमारी को
ले जाने लिए इतनी शर्तें मनवाएगा

तुम्हारी मेहनत की गाढ़ी कमाई
ले जाएगा
तुम्हारी राजकुमारी पर आजीवन
राजा होने का हुक्म चलाएगा
तो सिंदूर लगाने का सपना
कभी नहीं सजाती.
कभी नहीं माँ !!

वह मथानी है

पीडा में घुले शब्दों को
मथता है मथे जाता है

पता नहीं
कहाँ से पाता है यह ताकत
और निथार लाता है
दिल की कविता

नहीं भाग पाती
बीच में छोड़ कर इसे
कई बार सोचती हूँ
अब नहीं…और नहीं

पर वह तो
पीडाओं के झुण्ड और
शब्दों के रेवड लिए
जैसे कोई
सधा हुआ… प्रशिक्षित !

चमेली के फूल पर

बारिश की वह बूंद
सुवास से महक उठी थी

बूंद ने चमेली से कहा
अपनी बाहों में ले ले मुझे

तभी
हवा का इक झोका आया

बूंद
फूल से फिसल
रेत में जा गिरी

काश!
इस बूंद को
नदी मिल गयी होती !

अँधेरे बंद कमरे में

गोल-गोल घूमती
कोल्हू के बैल सी
खटती
डरती
अपनी ही परछाई से
परछाइयाँ घूरतीं रहीं
मुझे दिन-रात

आँखों पर पट्टी थी
या आँखें ही…

फिर भी टटोलती रही
शायद कहीं
सौगात सा कोई सपना
बचा हो मेरे लिए भी !

बरसात की फुहार से

ख्वाबों में
तेरी बाँहों का दुशाला ओढ़
सोयी रही मैं
सहर अलसायी रही

श्यामल घटाओं में
गुनगुनाते
बिजलियों से
स्पर्श की बौछार में
नहाई मैं
दुपहर भरमाई रही…!

अनवर सुहैल की कवि‍ताएं

अनवर सुहैल

09 अक्टूबर 1964 को जन्‍में अनवर सुहैल के दो उपन्यास, तीन कथा संग्रह और दो कविता संग्रह प्रकाशि‍त हो चुके हैं। वह ‘संकेत’ का संपादन कर रहे हैं। अनवर सुहैल की कवि‍ताएं-

सबूत

कर रहा हूँ इकट्ठा
वो सारे सबूत
वो सारे आँकडे

जो सरासर झूठे हैं
और
जिन्‍हें बडी खूबसूरती से
तुमने सच का जामा पहनाया है
कितना बडा़ छलावा है
मेरे भोलेभाले मासूम जन
आसानी जाते हैं झाँसे में

जादूगरों
हाथ की सफाई के माहिर लोगों
तुम्हारा तिलस्म है ऐसा
कि सम्मोहित से लोग
कर लेते यकीन
अपने मौजूदा हालात के लिए
खुद को मान लेते कुसूरवार
खुद को भाग्यहीन……”

 उसने अपनी बात कही तो

उसने अपनी बात कही तो
भड़क उठे शोले
गरज उठी बंदूकें
चमचमाने लगीं तलवारें
निकलने लगी गालियाँ…

चारों तरफ उठने लगा शोर
पहचानो…पहचानो
कौन हैं ये
क्या उसे नही मालूम
हमारी दया पर टिका है उसका वजूद
बता दो संभल जाए वरना
च्यूंटी की तरह मसल दिया जायेगा उसे…

वो सहम गया
वो संभल गया
वो बदल गया
जान गया कि
उसका पाला सांगठनिक अपराधियों से है….

प्रेम कविता

उसने मुझसे कहा
ये क्या लिखते रहते हो
गरीबी के बारे में
अभावों, असुविधाओं,
तन और मन पर लगे घावों के बारे में
रईसों, सुविधा-भोगियों के खिलाफ
उगलते रहते हो ज़हर
निश-दिन, चारों पहर
तुम्हे अपने आस-पास
क्या सिर्फ दिखलाई देता है
अन्याय, अत्याचार
आतंक, भ्रष्टाचार!!
और कभी विषय बदलते भी हो
तो अपनी भूमिगत कोयला खदान के दर्द का
उड़ेल देते हो
कविताओं में
कहानियों में
क्या तुम मेरे लिए
सिर्फ मेरे लिए
नहीं लिख सकते प्रेम-कवितायें…

मैं तुम्हे कैसे बताऊँ प्रिये
कि  बेशक मैं लिख सकता हूँ
कवितायें सावन के फुहारों की
रिमझिम बौछारों की
उत्सव-त्योहारों की कवितायें
कोमल, सांगीतिक छंद-बद्ध कवितायें
लेकिन तुम मेरी कविताओं को
गौर से देखो तो सही
उसमे तुम कितनी ख़ूबसूरती से छिपी हुई हो
जिन पंक्तियों में
विपरीत परिस्थितियों में भी
जीने की चाह लिए खडा़ दि‍खता हूँ
उसमें  तुम्ही तो मेरी प्रेरणा हो…
तुम्ही तो मेरा संबल हो…..

सिर झुकाना नहीं आता

क्या करें,
इतनी मुश्किलें हैं फिर भी
उसकी महफ़िल में जाकर मुझको
गिडगिडाना नहीं भाता…..
वो जो चापलूसों से घिरे रहता है
वो जो नित नए रंग-रूप धरता है
वो जो सिर्फ हुक्म दिया करता है
वो जो यातनाएँ दे के हँसता है
मैंने चुन ली हैं सजा की राहें
क्योंकि मुझको हर इक चौखट पे
सर झुकाना नहीं आता…
उसके दरबार में रौनक रहती
उसके चारों तरफ सिपाही हैं
हर कोई उसकी इक नज़र का मुरीद
उसके नज़दीक पहुँचने के लिए
हर तरफ होड मची रहती है
और हम दूर दूर रहते हैं
लोगों को आगाह किया करते हैं
क्या करें,
इतनी ठोकरें खाकर भी मुझको
दुनियादारी निभाना नहीं आता……

दुःख सहने के आदी

उनके जीवन में है दुःख ही दुःख
और हम बड़ी आसानी से कह देते
उनको दुःख सहने की आदत है
वे सुनते अभाव का महा-आख्यान
वे गाते अपूरित आकांक्षाओं के गान
चुपचाप सहते जाते जुल्मो-सितम

और हम बड़ी आसानी से कह देते
अपने जीवन से ये कितने संतुष्ट हैं
वे नही जानते कि उनकी बेहतरी लिए
उनकी शिक्षा, स्वास्थ और उन्नति के लिए
कितने चिंतित हैं हम और
सरकारी,  गैर-सरकारी संगठन
दुनिया भर में हो रहा है अध्ययन
की जा रही हैं पार-देशीय यात्राएं
हो रहे हैं सेमीनार, संगोष्ठिया…

वे नही जान पायेंगे कि उन्हें
मुख्यधारा में लाने के लिए
तथाकथित तौर पर सभ्य बनाने के लिए
कर चुके हजम हम
कितने बिलियन डालर
और एक डालर की कीमत
आज साठ  रुपये  है!

इत्ते सारे

इत्ते सारे लोग यहाँ हैं
इत्ती सारी बातें हैं
इत्ते सारे हँसी-ठहाके
इत्ती सारी घातें हैं

बहुतों के दिल चोर छुपे हैं
साँप कई हैं अस्तीनों में
दाँत कई है तेज-नुकीले
बड़े-बड़े नाखून हैं इनके
अक्सर ऐसे लोग अकारण
आपस में ही, इक-दूजे को
गरियाते हैं..लतियाते हैं

इनके बीच हमें रहना है
इनकी बात हमें सुनना है
और इन्हीं से बच रहना है

जो थोड़ें हैं सीधे-सादे
गुप-चुप, गम-सुम
तन्हा-तन्हा से जीते हैं
दुनियादारी से बचते हैं
औ’ अक्सर ये ही पिटते हैं
कायरता को, दुर्बलता को
किस्मत का चक्कर कहते हैं
ऐसे लोगों का रहना क्या
ऐसे लोगों का जीना क्या

रेखा चमोली की कवि‍तायें

8 नवम्‍बर, 1979 को कर्णप्रयाग, उत्‍तराखंड में जन्‍मी रेखा चमोली को हाल ही में ‘सूत्र सम्मान-2012’ दि‍ये जाने की घोषणा हुई है। उनकी कुछ कवि‍तायें-

अस्‍तित्‍व

दुनिया भर की स्‍त्रि‍यों
तुम जरूर करना प्रेम
पर ऐसा नहीं कि
जिससे प्रेम करना उसी में
ढूंढ़ने लगना
आकाश, मिट्टी, हवा, पानी, ताप

तुम अपनी जमीन पर रोपना
मनचाहे पौधे
अपने आकाश में भर लेना
क्षमता भर उड़ान
मन के सारे ओने-कोने
भर लेना ताजी हवा से
भीगना जी भर के
अहसासों की बारिश में
आवश्यकता भर ऊर्जा को
समेट लेना अपनी बाहों में

अपने मनुष्य होने की संभावनाओं को
बनाए रखना
बचाए रखना खुद को
दुनिया के सौन्दर्य व शक्‍ति‍ में
वृद्धि‍ के लिये
दुनिया के अस्‍ति‍त्‍व को
बचाए रखने के लिये।

उडा़न

एक स्त्री कभी नहीं बनाती बारूद बंदूक
कभी नहीं रंगना चाहती
अपनी हथेलियाँ खून से
एक स्त्री जो उपजती है जातिविहीन
अपनी हथेली पर दहकता सूरज लिये
रोशनी से जगमगा देती है कण-कण
जिसकी हर लडा़ई में
सबसे बडी़ दुश्मन बना दी जाती है
उसकी अपनी ही देह

एक स्त्री जो करना जानती है तो प्रेम
देना जानती है तो अपनापन
बोना जानती है तो जीवन
भरना जानती है तो सूनापन
बिछ-बिछ जाने में महसूस करती है बड़प्पन
और बदले में चाहती है थोडी़ सी उडा़न

एक स्त्री सहती है
बहती है
लड़ती है
बस उड़ नहीं पाती
फिर भी नहीं छोड़ती पंख फड़फडा़ना
अपनी सारी शक्‍ति‍ पंखों पर केन्‍द्रि‍त कर
एक स्त्री तैयार हो रही है उडा़न के लिये।

नदी उदास है

आजकल वह
एक उदास नदी बनी हुई है
वैसे ही जैसे कभी
ककड़ी बनी
अपने पिता के खेत में लगी थी
जिसे देखकर हर राह चलते के मुँह में
पानी आ जाता था

अपनी ही उमंग में
नाचती कूदती फिरती यहाँ वहाँ
अचानक वह बांध बन गयी

कभी पेड़ बनकर
उन बादलों का इन्तजार करती रह गयी
जो पिछली बार बरसने से पहले
फिर-फिर आने का वादा कर गये थे

ऐसे समय में जबकि
सबकुछ मिल जाता है डिब्बाबन्द
एक नदी का उदास होना
बहुत बड़ी बात नहीं समझी जाती ।

छुट्टी

सुबह से देख रहा हूँ उसे
बिना किसी हड़बडी़ के
जुट गयी है रोजमर्रा के कामों में
मैं तो तभी समझ गया था
जब सुबह चाय देते समय
जल्दी-जल्दी कंधा हिलाने की जगह
उसने
बडे़ प्यार से कंबल हटाया था
बच्चों को भी सुनने को मिला
एक प्यारा गीत
नाश्ता भी था
सबकी पसंद का
नौ बजते-बजते नहीं सुनार्इ दी
उसकी स्कूटी की आवाज

देख रहा हूँ
उसने ढूंढ़ निकाले हैं
घर भर के गन्दे कपडे़ धोने को
बिस्तरे सुखाने डाले हैं छत पर
दालों, मसालों को धूप दिखाने बाहर रखा है

जानता हूँ
आज शाम
घर लौटने पर
घर दिखेगा ज्यादा साफ, सजा-सँवरा
बिस्तर नर्म-गर्म धुली चादर के साथ
बच्चे नहाए हुए
परदे बदले हुए
चाय के साथ मिलेगा कुछ खास खाने को
बस नहीं बदली होगी तो
उसके मुस्कराते चेहरे पर
छिपी थकान
जिसने उसे अपना स्थाई साथी बना लिया है

जानता हूँ
सोने से पहले
बेहद धीमी आवाज में कहेगी वह
अपनी पीठ पर
मूव लगाने को
आज वह छुट्टी पर जो थी।

मैं कभी गंगा नहीं बनूँगी

तुम चाहते हो
मैं बनूँ
गंगा की तरह पवित्र
तुम जब चाहे तब
डाल जाओ उसमें
कूडा़-करकट मल अवशिष्ट
धो डालो
अपने
कथित-अकथित पाप
जहाँ चाहे बना बांध
रोक लो
मेरे प्रवाह को
पर मैं
कभी गंगा नहीं बनूँगी
मैं बहती रहूँगी
किसी अनाम नदी की तरह
नहीं करने दूँगी तुम्हें
अपने जीवन में
अनावश्यक हस्तक्षेप
तुम्हारे कथित-अकथित पापों की
नहीं बनूँगी भागीदार
नहीं बनाने दूँगी तुम्हें बांध
अपनी धाराप्रवाह हँसी पर
मैं कभी गंगा नहीं बनूँगी
चाहे कोई मुझे कभी न पूजे।

नींद चोर

बहुत थक जाने के बाद
गहरी नींद में सोया है
एक आदमी
अपनी सारी कुंठाएं
शंकाएं
अपनी कमजोरियों पर
कोई बात न सुनने की जिद के साथ
अपने को संतुष्ट कर लेने की तमाम कोशिशों के बाद
थक कर चूर
सो गया है एक आदमी
अपने बिल्कुल बगल में सोर्इ
औरत की नींद को चुराता हुआ।

प्रेम

चट्टानों पर उग आती है घास
किसी टहनी का
पेड़ से कटकर
दूर मिट्टी में फिर से
फलना फूलना
प्रेम ही तो है
प्रेम में पलटती हैं ऋतुएं।

धनिया के फूल

मेरे सामने की क्यारी में
खिल रहे हैं
धनिया के फूल
सफेद, हल्का नीला,मिला जुला सा रंग
नाजुक पंखुडि़यां, कोमल खुशबूदार पत्‍ति‍याँ
चाहो तो पत्‍ति‍यों को डाल सकते हो
दाल, सब्जी में
या बना सकते हो लजीज चटनी
ये छोटे-छोटे धनिया के फूल
नहीं करते कुछ खास आकर्षित
गुलाब या गेंदे की तरह
नहीं चढ़ते किसी देवी-देवता के
चरणों में
किसी नवयुवती ने नहीं किया
कभी इनका श्रृंगार
पर ये नन्हे-नन्हें फूल
जब बदल जाएंगे
छोट-छोटी हरी दानियों में
तो खुद ही बता देंगे
अपना महत्व
कि इनके बिना संभव नहीं है
जायकेदार, स्वादिष्ट भोजन।

प्रबन्धन

पुराने किस्से कहानियों में सुना था
ठगों के गाँव के बारे में
ठगी बहुत बुरा काम होता था
धीरे-धीरे अन्य चीजों की तरह
ठगी का भी विकास हुआ
अब ये काम लुकछिप कर नहीं बल्‍कि‍
खुलेआम प्रचार प्रसार करके
सिखाया जाने लगा
ठगों के गाँव अब किस्से कहानियों में नहीं
शानों शौकत से
भव्य भवनों में आ बसे हैं
जहाँ से निकलते हैं
लबालब आत्मविश्‍वास से भरे
छोटे-बडे ठग
जो जितने ज्यादा लोगों को ठग लेता है
उतना ही बडा प्रबन्धक कहलाता है।

पढे़-लिखे समझदार लोग

सीधे सीधे न नहीं कहते
न ही उंगली दिखाकर दरवाजे की ओर इशारा करते हैं
वे तो बस चुप्पी साध लेते हैं
आपके आते ही व्यस्त होने का दिखावा करने लग जाते हैं
आपके लायक कोई काम नहीं होता उनके पास
चुप्पी समझदारी है हमेशा
आप पर कोई आरोप नहीं लगा सकता ऐसा वैसा कहने का
ज्यादा पूछने पर आप कह सकते हैं
मैंने क्या कहा?
ये चुप्पी की संस्कृति जानलेवा है।

बीनू भटनागर की कवि‍तायें

14 सि‍तम्‍बर 1947 को बुलन्दशहर ( उत्‍तर प्रदेश) में जन्‍मी बीनू भटनागर के लेख, व्‍यंग्‍य, कवि‍तायें आदि‍ रचनाएं वि‍भि‍न्‍न पत्र-पत्रि‍काओं में प्रकाशि‍त हो चुकी हैं। उनकी तीन कवि‍तायें-

पचास के उस पार

माना कि यौवन के वो क्षण,
खो गये कुछ उलझनों में,
मैं वही हूँ तुम वही हो,
फिर न क्यों,
जी लें वही उन्माद के क्षण।

तुम मेरे हो शांत सागर,
लक्ष्य मेरा,
मैं नदी बहती हुई तुमसे मिली हूँ,
बाँहें फैला दो ज़रा मैं तो वही हूँ।
महसूस मुझको करा दो मैं नहीं हूँ।

तुम हो इक चट्टान हो संबल मेरा,
फिर नहीं क्यों बढ़के थामा हाथ मेरा।
भूल जाओ बालों मे चाँदी के जो तार हैं
भूल जाओ कि हम पचास के उस पार हैं।
फिर से जी लो कुछ पल,
जो हथेली से फिसलकर,
रेत के ढेर में,
ओंस की बूँदों से खो गये हैं।
आज भी मेरे वो पल,
तुम पर उधार हैं।

ना वो मेरा ना वो तु्म्हारा

दूर गगन पर एक सितारा,
ना वो मेरा ना वो तुम्हारा,
फिर भी लगता कितना प्यारा।

नीड़ पेड़ का रैन बसेरा,
पक्षी का आकाश है सारा,
ना वो मेरा ना वो तुम्हारा।

नदिया का बहता जलधारा,
प्यास बुझाता हरता पीड़ा,
ना वो मेरा ना वो तुम्हारा।

फूलों का मुस्काता चेहरा,
उनपर मंडरता एक भँवरा,
ना वो मेरा ना वो तुम्हारा।

सुर लय पर संगीत की धारा,
तन मन सबे प्रभु पर वारा,
वो तेरा भी है, और है मेरा।

ये मेरा है वह है तेरा,
कितना अर्थहीन ये नारा,
ना वो मेरा ना वो तु्म्हारा।

नदिया

हिम से जन्मी,
पर्वत ने पाली,
इक नदिया।
घाटी घाटी करती वो,
अठखेलियाँ।
अपने साथ लिये चलती वो,
बचपन की सहलियाँ।
फूल खिलाती,
कल कल करती,
खेले आँख मिचौलियाँ।
बचपन छूटा यौवन आया,
जीवन बना पहेलियाँ,
मैदानों मे आकर,
बढ़ गईं ज़िम्मेदारियाँ,
फ़सल सींचती हुई प्रदूषित,
रह गईं बस कहानियाँ।
सबका सुख दुख बाँटते
बीत गईं जवानियाँ।
जीवन संध्या मे अब,
पँहुच गईं तरुणाइयाँ।
मंद मंद होने लगीं,
मोहक अंगड़ाइयाँ।
सागर से जा मिली,
बढ़ गईं गहराइयाँ,
मानव जीवन की भी तो
ये ही हैं कहानियाँ।

सुनीता की कवि‍तायें

12 जुलाई 1982 को चंदौली जिले के छोटे से कस्‍बे चकियाँ में जन्मीं डॉक्‍टर सुनीता ने ‘स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी पत्रकारिता : स्वरूप एवं प्रतिमान’ विषय पर बी.एच.यू. से पी-एच.डी. की  है। इनके  लेख–कवितायेँ कई पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। इनकी कुछ कवि‍तायें-

अस्थायी

अख़बारों के चंद पन्नों में सिमटी जिंदगियों में
ताजेपन सा कुछ भी नहीं
रात के पड़े खाने सुबह की तरह
रोते-बिलखते मासूम चेहरे पल के मेहमाँ
गाते-गुनगुनाते मुखड़े होंठो की चुभन
एक क्षण के पश्‍चात ढल जाते हैं रात्रि सरीखे
चंद चर्चाओं के बाज़ार क्षणिक गरम, तवे से
छपाक-छपाक की भड़ास क्षण में गायब
रेत पर गिरे बूंदों के अस्तित्व के मानिंद
बरखा-बहार और मधुवन की मधुर ध्वनि
धड़कनों में शोर मचाते खलबली अभी-अभी
करवट के साथ पन्ने पलटते दृश्य और दृष्टि बदले सभी
परिवर्तित परिवेश की पुकार सुनाई देती कभी-कभी
सुमधुर योजनाओं की ललकार दिखाई देती चहुओर
न रुकने वाली वक्त की सुइयाँ टीम-टीम कर लुप्त होतीं
एक चेहरा उभरता है प्रेयसी के जुल्फों में कैद
चितवन की चंचलता चहक उठती
नयेपन का अंदाज़ पलक झपकने के साथ
बुलबुले से अस्तित्ववि‍हीन हो जाता
खबरों की दुनिया में निरंतर गहमागहमी बनी रहती
निरुउत्तर प्रजा पल्लवित पुण्य बनी हुई
लेकिन भू धरा थमने के जगह डोलती रहती
थिरकती साँसों के लय पर वायु नृत्य करते
नटते, रिझते और रिझाते रम्भाने लगते
पात्र में रखे पानी सा मटमैला और फीका बन जाते
दिखने में धवल और स्वच्छ लगते
भागते, दौड़ते कल्पना के सागर में छलांग लगाते
छलकते आँसू रंगीन चित्रों के गुजरते ही सूख जाते
चिथड़े-चिथड़े सुख की तलाश में निकल पड़ते एक और लम्‍बी यात्रा पर
नंगे, खुले और खुरदरे पैरों के निशान जह-तह बिखरे पड़े
उनकी आवाज़ाही का कोई स्थायी प्रमाण नहीं
नर-शरीर की तरह अस्थायी, क्षणभंगुर और जुगनू की तरह
यहाँ सब कुछ सिमटा हुआ है बिखरे तौर पर
ढेर में तब्दील होते मलबा सा नहीं
बल्कि सपनों के कलेजे पर बिछे फूलों के कतारों की तरह
एक-एक कतरन से तैयार वस्त्र सा सुसज्जित, आकर्षक किन्तु अस्थायी

इस जिंदगी के बदले

इस जिंदगी के बदले
दो जून की रोटी नहीं मिली
सौदों के अम्बार मिले जिनकी वजह से नर्क के द्वार खुले
हँसते-खिलते गुलशन में
पतझड़ सदियों से बने हुए हैं

पगडंडियों से झुरमुट की तरह रौंद दिये गये
एक-एक करके चुने गए उम्मीद के दाने
भेड़-बकरियों में बाँट दिये गये
गर्दन जबह करके जबरदस्ती जुराबे बाँधी गई
कपड़े तार-तार कर दिये गये…!

इस जिंदगी के बदले
खपचालियाँ घोंप-घोंप कर मुरब्बे बना दिये गये
चीनी की जगह नमक रगड़ा गया
स्वाद लेकर चखने के स्थान पर
कसैले पान की तरह थूक दिये गये

खाने के लिये जूठन परोसे गये जैसे ज़ायकेदार छप्पन भोग
छटपटाहट होती रही लेकिन कोलाहल न बन सके
हवन कुण्ड में डाले गये घी की भाँति
धीरे-धीरे जलते हुए बदबू फैलाने लगे
गीली लकड़ी की तरह सुलग-सुलग कर

इस जिंदगी के बदले
मुझे बना दिया गया
आस्मा से गिरती हुई ओसें की बूंदें
पशुओं के आगे पड़े चारे के तिनके की भाँति
बिछा दिये गये अरमान के सारे उपागम

ठहरे हुए पानी के चारों-ओर
फैली हुई बजबजाती काई
जिसके चौमुहाने पर जैसे भिनभिनाती मख्खियाँ
मछली की सी तड़फाड़ाहट
उथल-पुथल करती नसें

इस जिंदगी के बदले
हमें दिये गये
बदलते विस्तर की तरह रोज़ एक नई सेज
उठाये-बिछाए जाते रहे
एक दिन से कई रातों तक
फैले बदबू से गहन घृणा के पात्र बनने तक

बेमज़ा भोजन की तरह
पटक दी जाती थाली सी
वदन माज दिए जाते
पेस्ट से घिसते दाँतों से
मशीन में काट दिये जाते चारे की तरह

इस जिंदगी के बदले
धब्बे लगी दीवार में तब्दील कर दिये जाते
एक नामुराद मुलाजिम की तरह
धकिया दिये जाते
घुटन के मकान में कैद किये जाते

परिंदे के पर काटकर उसे उड़ने पर मजबूर से किये जाते
हथेलियों पर अंगारे रख दिये जाते
बर्फ के टुकड़े मुख में घुसेड़ कर
आँखों में फूलों के सेज सजाये जाते
सिसकी अन्तःपुर में सुरक्षित रह जाती

इस जिंदगी के बदले
खुरपी पकड़ाकर बिराने में ठेल दिये जाते
उड़ती रेतों को पकड़ने की फरमाईश की जाती
घुमड़ते बादलों के झुर्रियों को गिनवाए जाते
एक बैल की तरह बलुहट में जोत दिये जाते

ताबूत में कैद लाश से जुगाली कराई जाती
पर्वत शिखरों पर जमें बर्फ के रेम्बों दिखाये जाते
अनसुनी कहानियों के किस्से दोहराते हुए
गरम तवे पर रोटी सेंकती उसे ठंडा लोहे में परिवर्तित कर दिये जाते
फिर घन पर घन बरसाए जाते
उसके सपाट होने तक

इस जिंदगी के बदले
नेत्रों पर चिलमन चढ़ा दिये गये
झूठे वादों के साथ दगा ही मिले
कुत्तों की तरह बोटी-बोटी नोचकर खाए
भूखे पेट पर रोलर चलाकर
जश्न मनाने की मन्नत मानी गई

धमकियों के दम पर धमनियाँ जब्त कर लिये गये
तपते रेत पर छोड़ दिये गये
महल की नींव रखने के लिये
इमारत के चारों पाए कूल्हों पर टिका दिये
भावी रिश्तों के नाम पर सब कुछ होता रहा

इस जिंदगी के बदले
खच्चर सरीखे लादी ढोते रहे
लगन कभी भी कम न हुई
चाहत के दिये जलते रहे
एक-एक दिन गुजरते गये उम्मीद बंधी रही

सुबह की किरण फूटते ही
हिम्मत की ताकत दुगुने दम से लग जाती
लेकिन बेड़ियों में कैद जिंदगी
अपने अंत की ओर बढ़ रही थी
उसे रोकना मुमकिन न था
हथौड़े की मार से जिस्‍म बेजान हो गये

इस जिंदगी के बदले
यातना के सागर में डुबो दिये गये
खारे पानी से गल गये
हड्डियों का ढ़ाँचा बरकारार रहा
युगों-युगों तक सिला की तरह

लहराते ख़्वाब खो गये
यादों के पट पलकों में खुल रहे हैं
चीनी-जल की तरह घुल गये
जीवन से इस कदर मोह बढ़ता रहा लेकिन उड़ान भरने की मनाही थी
वह आज भी बरौनियों में मसखारे से चिपके हैं

सूरज कुछ कहता

सूरज कुछ कहता है
सदा चुप-चुप रहता है
बंधनमुक्त विचरता है
स्नेहमग्न उलहना देता है।

धूप की तपिस तड़प रही है
अनजाने जख्म से जूझ रही है
कब मुक्त होंगें कर्तव्य से
पीड़ा की वेदना व्यथा सुना रही है।

नीरव में पड़े तन्हा खड़े हैं
दयार्द्र की उम्मीद से भरे हैं
मदांध मानव से गिला है
हम भी प्रेमातुर हेतु बने हैं।

यावज्जीवन के आमरण हैं
प्रतिक्षण के विवरण हैं
कष्टापन्न को सहते हैं
देशार्पण में लगे रहते हैं।

मार्गव्यय का लोभ नहीं है
सदाचार में तल्लीन हैं
व्यभिचार से रिश्ता नहीं है
भयमुक्त संचित नरोत्तम हैं।

नीलाम्बर के वासी हैं
पृथ्वीजन के पोषक हैं
शरणागत के दास हैं
कलाप्रवीण विद्यार्थी हैं।

धर्मविमुख नहीं करते हैं
पथभ्रष्ट के भी हमराही हैं
अँधेरे के दुश्मन हैं
उजाले के देवालय हैं।

पनचक्की से घुमरते हैं
देहलता से लिपटते हैं
नीलकमल से सुसज्जित हैं
पीताम्बर से चमकते हैं।

कनकलता से मिताई है
यहाँ न कोई महाजन है
नगरवास में रहता हूँ
शिलालेख सा अमिट हूँ।

सुनता न कोई आपबीती है
आनंदमग्न लोग स्नेहमग्न हैं
दर्द के रेखांकित से अंजान हैं
बीचोंबीच उभरे, जवाब खामोश हैं।

शोकाकुल करुणा से देखते हैं
मुँहमाँगा वरदान सहश्र पाते हैं
व्याकुल मन बेमतलब भटकते हैं
कर्मभूमि को मालगाड़ी सा ठेलते हैं।

गगन में हरफनमौला से फिरते हैं
पदच्युत का कोई भय नहीं है
देशनिकाला कभी नहीं हो सकता है
हम सृष्टि संचालन के पथगामी हैं।

कमलनयन में उम्मीद बन सजते हैं
पंचतत्व के उत्कृष्टतम स्वामी हैं
पर्णकुटी से महलों तक में रहते हैं
आशाओं के दीपक बन जलते हैं।

छटपटाहट

कहीं दूर से रौशनी आ रही थी
आसमान में बादलों के बीच तारें
मिट्टी के जर्रे-जर्रे में कसक थी
कमरे में बल्ब खमोशी के गीत गा रहे थे
वह दूर खड़ी कुकृत्य को देख रही थी
लब खामोश थे पलाश के पेड़ रो रहे थे
पत्तों की सरसराहट भय चित्र खींच रहे थे
बगल कमरे में लेटी माँ खाँस रही
पीड़ा, दर्द, कसक की आहटें हल्की-हल्की आ रही थीं
पेड़ों पर अपने घोसले में पंक्षी गहरी निद्रा में निमग्न थे
दरवाजे के कोने खड़ी शीतल छाया
अंदर के जलन से लपलपा रहे थे
अपनी गरज बाबली जबरदस्ती घसीटती रही
अफ़यूनी जुनूनी निर्णय से तन-वदन टूट रहा था
अफ़सोस, दिल गड्ढे में धँसता जा रहा था
स्त्री के समक्ष स्त्री का लूट लिया संसार
दम तोड़ दिए आह, सिसकी और लज्जता ने
नोटों की गड्डियाँ आँखों में लहरा रही थीं
नसों में दौड़ते खून पानी के शक्ल अख्तियार करते जा रहे थे
अय तेरी कुरबत, मनमाने सो कर ले
चक्कर काटती धरती घूम कर आ जायेगी दुबारा अपनी जगह
इस काया को छोड़ते ही एक नए छाया में अवतरित होते हुए
आस्मा में टिमटिमायेंगे
उड़ता गप्पा का उपहार देते हुए
कुछ गाँठे खोलते हुए चिंता की लकीरे घिर आईं
बादलों के आँचल न ढक सके
समाज के ताने में गूंथे व्यंगवाणों को।
(एक सच्ची घटना पर आधारित है।)

नागार्जुन की प्रतिबद्धता : राधेश्याम तिवारी

जनकवि‍ नागार्जुन की जनपक्षरता पर वरि‍ष्ठ कवि‍ राधेश्याम ति‍वारी का आलेख-

अपने यहां एक परम्परा है गणेश वंदना की। किसी भी काम को शुरू करने से पहले लोग गणेश की वंदना करते हैं। ऐसा इसलिए किया जाता है कि विरोधी भी शांत रहें, लेकिन नागार्जुन ने एक साथ इतने विरोधी पैदा कर दिए हैं कि उनपर चर्चा करते हुए यह संभव ही नहीं है कि आप सबको खुश रख सकें। नागार्जुन हिन्दी के एक ऐसे कवि हैं जो परम्परा से निकलकर प्रगतिशीलता की ओर प्रवृत्त हुए। बाबा से ऐसा इसलिए भी संभव हो सका क्योंकि वे संस्कृत के अलावा पाली, बांग्ला आदि भाषाओं से तो परिचित थे ही, मार्क्सवादी विचारधारा के भी करीब आए। नागार्जुन ने भी वंदना की है, लेकिन वह वंदना बुद्ध, मार्क्स्, फ्रायड के अलावा पिशाच और वैताल की। वे गणेश के माध्यम से अपने विरोधियों को खुश नहीं करना चाहते, इसलिए वे पिशाच को पिशाच ही कहते हैं, उसे खुश करने के लिए किसी अलंकार से अलंकृत नहीं करते-
नमस्ते स्तु पिशाचाय
वैतालाय नमो नमः।
नमो, बुद्धाय मार्क्साय
फ्रायडाय च ते नमः।
नागार्जुन की कविताओं को पढ़ते हुए आप आसानी से समझ सकते हैं कि उनकी दृष्‍टि‍ में  पिशाच  और वैताल कौन हैं। एक बार जब मैंने बाबा से इस संबंध में पूछा तो उन्होंने कहा, ‘‘पिशाच कई तरह के होते हैं। जिसके पास जैसे-तैसे बहुत धन इकट्ठा हो गया हो वह धन पिशाच  है, जो अति विनम्र होकर भी पीछे से वार करता हो वह विनम्र पिशाच है और जो ऐसी कविताएं लिखता हो जिसे पाठक तो क्या, स्वयं कवि भी न समझता हो, उसे कवि पिशाच कहेंगे।’’ गनीमत है कि उन्होंने यह नहीं कहा कि जो आलोचक ऐसी कविताओं को महान बनाने पर उतारू हैं उन्हें आलोचक पिशाच कहेंगे।
नागार्जुन मुलतः राजनीतिक चेतना के कवि हैं। जनपक्षधरता ही उनकी राजनीतिक प्रतिबद्धता है। जनता से उनका जुड़ा़व विश्वव्यापी है। उनकी यह विश्‍वदृष्टि ही है कि वे दुनिया के तमाम दबे-कुचले लोगों की समस्याओं पर नजरें गडा़ए रखते हैं।
कोरिया समस्या पर उनकी एक कविता है-
‘‘गली-गली में आग लगी है घर-घर बना मसान
लील रहा कोरिया मुलुक को अमरीकी शैतान
जूझ रहे किस बहादुरी से धरती के वे लाल
मुझे रात भर नींद न आती सुन सिऊल का हाल।’’
यहां याद कीजिए गालिब का वह शेर-
‘‘मौत का एक दिन मुअय्यन है
नींद क्यों रात भर नहीं आती।’’
बाबा ने गालिब की तरह नींद न आने के कारणों को रहस्य नहीं बनाया, बल्कि साफ-साफ बता दिया कि उन्हें रातभर नींद  क्यों नहीं आती। हालांकि उन्हें सांस की भी बीमारी थी। मैंने भी उन्हें रात भर जागते हुए देखा है। जब व्यक्ति को रात में नींद नहीं आये तो वह कुछ सोचता रहता है। यह हो ही नहीं सकता कि रात में जगा व्यक्ति एक क्षण के लिए भी बिना सोचे रह जाए। एक बीमार व्यक्ति अपने स्वास्थ्य के बारे में ही सोचेगा, लेकिन नागार्जुन उस स्थिति में भी अपने सांसों के बारे में न सोचकर उस सिऊल के बारे में सोचते हैं जहां की जनता अमेरिकी आतंकवाद से लोहा ले रही है। यह है बाबा की राजनीतिक प्रतिबद्धता।
वे मनुष्य को सर्वोपरि मानते हैं और राजनीतिक दलों के विचारों को भी उसी परिप्रेक्ष में देखते हैं। एक घोषित कम्युनिस्ट होकर भी जब नागार्जुन यह लिखते हैं-
‘‘आ गए अब दिन ऐश के
मार्क्स, तेरी दाढ़ी में जूं ने दिए होंगे चीनी अंडे
एक नहीं, दो नहीं, तीन नहीं बावन अंडे
लाल पान के गुलाम ढोएंगे हंडे
सर्वहारा क्रान्ति की गैस के !
आ गए अब तो दिन ऐश के!’’ तो इसका यही अर्थ है कि वे सत्ता के चरित्र को अलग कर नहीं देखते। वे किसी भी तरह के शोषण के विरूद्ध थे। वह चाहे धर्म के नाम पर हो या विचारधारा के नाम पर। इसमें एक बात मैं और जोड़ना चाहूंगा कि मार्क्सवाद का जितना अहित गैर मार्क्संवादियों ने किया है उससे कहीं अधिक उन लोगों ने किया है जो मार्क्सवाद के नाम पर अपनी दुकानें चला रहे हैं। ऐसे लोगों के लिए ही बाबा ने लिखा है-
‘‘दिल में चाहे जो हो/गले में अगर मार्क्‍स है अटका!/बताओ मैं कौन हूं भला?’’ शायद ऐसे ही कम्युनिस्टों के लिए मार्क्‍स ने कहा था- ‘‘मुझे मार्क्सवादियों से बचाओ।’’
नागार्जुन जनता के पक्ष में किसी भी तरह का जोखिम उठाने वाले रचनाकार हैं। वे लक्षणा और व्यंजना में बात करते-करते सीधे अभिधा में भी उतर आते हैं। वे यह मानते हैं कि यह व्यवस्था पूरी तरह भोथरा गई है। इसकी चमड़ी इतनी मोटी हो गई है कि यह लक्षणा और व्यंजना की भाषा नहीं समझती। इसीलिए वे सीधे नाम लेकर कविताएं लिखते हैं। अगर इमरजेंसी के खिलाफ लिख रहे हैं तो सीधे-सीधे नाम लेकर-
‘‘इंदिराजी-इंदिराजी क्या हुआ आपको
सत्ता के मद में भूल गई बाप को।’’
मैं ऐसे कई लेखकों को जानता हूं जो इमरजेंसी में लक्षणा और व्यंजना के इतने कायल हो गए थे कि सार्वजनिक स्थलों की बातें तो दूर, बंद कमरे में भी लक्षणा और व्यंजना में ही बातें करते थे। वही लेखक इमरजेंसी के बाद अपनी रचनाओं के भीतर छूपे विद्रोह की आग को इस तरह उजागर करने लगे मानों दुनिया के सारे क्रांतिकारी उनके पट शिष्य हों। ऐसे ही क्रांतिकारियों के लिए बाबा ने लिखा-
क्रांति तुम्हारी तुम्हें मुबारक
भ्रान्ति तुम्हारी तुम्हें मुबारक
कूट-कपट की भीतर घाती
शांति तुम्हारी तुम्हें मुबारक
अर्धशती अभियान मुबारक
अंतरिक्ष अभियान मुबारक
एक आंख का भौतिक बाद
द्वन्द्वात्मक विज्ञान मुबारक।’’
बाबा ऐसे कम्युनिस्ट नहीं थे कि विरोध में मुट्ठी भी तनी रहे और कांख का बाल भी दिखाई न दे। उनके लिए जनता पहले थी। जो जनता के साथ था, बाबा उसके साथ थे। आप याद करें इमरजेंसी का वह समय जब सीपीआई इमरजेंसी के समर्थन में थी और बाबा भी सीपीआई में ही थे, लेकिन वे जेपी के पक्ष में बिहार की सड़कों पर घूम-घूम कर कविताएं सुना रहे थे-
‘‘एक और गांधी की हत्या होगी अब क्या ?
बर्बरता के मांग चढे़गा योगी अब क्या ?
पोल खुल गई शासक दल के महामंत्र की।
जयप्रकाश पर चली लाठियां लोकतंत्र की !
देश में जब जनता दल की सरकार बनी तो बाबा की भी बांछें खिल गईं। उन्होंने उसी उत्साह में यह कविता लिखी-
‘‘शासन बदले, झंडा बदला तीस साल के बाद
नेहरू, शास्त्री और इंदिरा हमें रहेंगे याद
कोटि-कोटि मत पत्र बन गए जादूवाले वाण
मूर्छित भारत मां के तन में वापस आए प्राण
नसबंदी के जोर-जुलुम से मचा बहुत कुहराम
किया सभी ने शासन को अंतिम बार सलाम।’’
लेकिन सत्ता मिलने के बाद जिस तरह जेपी के चेलों का पतन देश ने देखा उससे जनता बुरी तरह मर्माहत हुई। जिस उम्मीद के साथ जनता दल की सरकार बनी वह उम्मीद कुछ ही समय में मटियामेट हो गई। सत्ता के लिए मंडल और कमंडल का जो खेल हुआ सो तो हुआ ही, ऐसे-ऐसे घोटाले भी सामने आये जिसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती थी। सत्ता पर नए-नए काबिज इन समाजवादियों के पेट इतने बड़े हो गए कि उन्होंने पशुओं का चारा तक नहीं छोड़ा। परिवारवाद को गालियां देने वाले ये नेता खुद परिवारवाद के इतने कायल हो गए कि अपनी निरक्षर पत्नी तक को मुख्यमंत्री जैसे जिम्मेवार पद पर बैठाने में तनिक संकोच नहीं किया। बाबा ने जब यह सब देखा तो उन्होंने लिखा-
‘‘पूर्ण हुए तो सभी मनोरथ
बोलो जेपी, बोलो जेपी
सघे हुए चौकस कानों में
आज ढूंसली कैसे ठेपी
जोर जुल्म की मारी जनता
सुन लो कैसी चीख रही है
तुमको क्या अब सारी दुनिया
ठीक-ठाक ही दीख रही है।’’
यानी जो दल या व्यक्ति जनता से दूर होता गया बाबा भी उससे दूर होते गए। उनके लिए प्रथमतः और अन्ततः जनता ही थी। उन्हें जनता में विश्वास था। वे यह मानते थे कि जनशक्ति से बढ़कर कोई शक्ति नहीं है। अभी हाल में मिश्र की घटनाओं को देखा होगा कि किस तरह वहां के राष्ट्रपति होस्नी मुबारक को जनाक्रोश के कारण पद छोड़ने को मजबूर होना पड़ा और उसके बेटे गमाल मुबारक ने आत्महत्या तक की कोशिश की। इसी तरह लीबिया के तानाशाह मुअम्मर गद्दाफी को भी जनाक्रोश का सामना करना पड़ रहा है। नागार्जुन की कविताएं प्रतिपक्ष की कविताएं हैं। ये कविताएं तानाशाही व्यवस्था के विरूद्ध बार-बार हस्तक्षेप करती हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी देश में कोई बुनियादी बदलाव नहीं आया है। कहने को हम आजाद देश के नागरिक हैं और देश की सीमाओं में कहीं भी रहने को स्वतंत्रा हैं, लेकिन क्षेत्रवाद और धर्म के नाम पर महाराष्ट्र, असम और कश्मीर में जो रह-रह कर तांडव होता रहा है उसका कोई निदान आजतक नहीं निकल पाया। बाबा की कविताओं को पढ़ते हुए अक्सर ऐसा लगता है कि उन्होंने एक खोजी पत्रकार की तरह खबरे खोज-खोजकर अपनी कविताओं में दर्ज की हैं।
नागार्जुन की कविताओं को पढ़ते हुए यह भी लगता है कि सूचना के लिए अखबार और दूसरे संचार माध्यमों पर निर्भर रहना सबसे बड़ा भ्रम है। श्री उदय सहाय ने अपने एक लेख में लिखा है कि अपराध की जितनी घटनाएं घटती हैं उनमें मुश्किल से पच्चीस प्रतिशत घटनाओं को ही मीडिया उजागर कर पाता है। नागार्जुन की कविताओं में ऐसी खबरें भी दर्ज हैं जो मीडिया की नजरों से ओझल हैं या उन्हें ओझल कर दिया गया है। आजादी के बाद हमारे नेताओं ने देश में जिस चरित्र का निर्माण किया ये सारी विद्रूपताएं उसी की देन है। यह क्या कम चिन्ता का विषय है कि आज देश में एक भी ऐसा व्यक्तित्व नहीं है जो पूरे राष्ट्र को एक सूत्र में जोड़ सके। हिन्दूवाद के झंडावरदार ठाकरे क्या कर रहे हैं। उनको सिर्फ महाराष्ट्र और वहां के लोग ही अपने लग रहे हैं। बाबा की नजर वहां भी है। वे लिखते हैं-
बाल ठाकरे! बाल ठाकरे!!
कैसे फासिस्टी प्रभुओं की
गला रहा है दाल ठाकरे
या
कैसा शिव?
कैसी शिव सेना?
कैसे शिव के बैल
चौपाटी के सागर तटपर
नाच रहा है भस्मासुर बिगडै़ल।
यही हाल धरती का स्वर्ग कहा जाने वाला कश्मीर का भी है। अब वह स्वर्ग न होकर स्वर्गवासियों की धरती बनकर रह गया है। वहां के आका ही जब विखंडनवादी बयान देते नहीं थकते तब दूसरों को क्या कहा जाए। इन लोगों पर केन्द्र का भी कोई अंकुश नहीं है। सबसे चिन्ताजनक स्थिति तो इस देश के बौद्धिक वर्ग की है। ये अपने बौद्धिकता के नशे में वही कर रहे हैं जो दुश्मन किया करते हैं। अरुंधति‍ राय का मामला आपके सामने है। अपनी तमाम अच्छाइयों के बावजूद लोकतंत्र एक मजाक बन कर गया है। नेताओं ने लोकतंत्र को भी अपनी निजी संपत्ति की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। बाबा अपनी एक कविता में लिखते हैं-
‘‘तानाशाही तामझाम है/सोसलिज्म का नारा/पार्लमेंट पर चमक रहा है मारुति का ध्रुव तारा/तेरी पुलिस मिलिटरी/तेरी गोली गोले/ हिंसा की बहती गंगा में/ मां तू आंचल धो ले!
तरुणों की सौ-सौ कलेजियां/तुम पर करूं निछावर/ बना रहे दरबार रात-दिन/ मंत्र पढ़ूं मैं शाबर।’’
यहां यह ध्यान देने की बात है कि यह शाबर मंत्र क्या है। तुलसीदास ने भी रामचरितमानस में इस मंत्र का उल्लेख किया है। बाबा ने इस मंत्र को नये संदर्भ में देखा है। इसी अर्थ में उनकी ‘मंत्र’ कविता भी है। शाबर मंत्र शिव का मंत्र है, जिसका कोई अर्थ नहीं होता। बिना अर्थ के ही जाप करते जाइए। वैसे तो निकालने को कोई कहीं से कुछ भी अर्थ निकाल सकता है। जिसे आप कविता भी नहीं मानते उसमें से भी बड़े-बड़े आलोचक ऐसे-ऐसे अर्थ निकाल लेते हैं कि आप चकित रह जाएंगे। आजकल जो कुछ भी हो रहा है वह सब शाबर मंत्र की तरह ही है। अधिकांश विश्वभर में पढ़ी जाने वाली हिन्दी की कविताएं भी शाबर मंत्र का ही सहोदर हैं। ऐसे में नागार्जुन की कविताएं शुद्ध देसी लगती हैं। सही अर्थ में नागार्जुन भारतीय कवि हैं, जिनकी कविताओं का सरोकार जनता से है। चूंकि जन शब्द जनतंत्र में ही अर्थवान होता है, इसलिए हम कह सकते हैं कि आजादी के बाद जनता की समस्याओं पर सबसे अधिक लिखने वाले नागार्जुन हैं। इसीलिए सही अर्थों वे जनकवि हैं। जनतंत्र की दुर्दशा पर वे लिखते हैं-
‘‘सामंतों ने कर दिया प्रजातंत्र का होम
लाश बेचने लग गए खादी पहने डोम
खादी पहने डोम लग गए लाश बेचने
माइक गरजे, लगे जादुई ताश बेचने
इंद्रजाल की छतरी ओढ़ी श्रीमंतों ने
प्रजातंत्र का होम कर दिया सामंतों ने।’’ अतः कह सकते हैं कि नागार्जुन की कलम जनता के इशारे पर चलती है, न कि किसी राजनीतिक दल के इशारे पर। इस ईमानदार जनकवि को याद करने का अर्थ है उनके पूरे समय को याद करना।

बिटिया: नीरज पाल

युवा कवि‍  नीरज पाल की कवि‍ता-

एक गुड़ि‍या के कच्चे रुई के फाहे सी है बिटिया
कभी उछ्लकर कभी बिदककर आटे की चिड़ि‍या है बिटिया
नन्हे पावों की धीमी थाप है बिटिया
सर्दी में गर्म रोटी की भाप है बिटिया
बिटिया पावन गंगाजल है
बिटिया गरीब किसान का हल है
चूड़ि‍यों की खनक, पायलों की झंकार है बिटिया
झरने की मद्दम फुहार है बिटिया
कभी धूप कभी छांव कभी बरसात है बिटिया
गर्मी में पहली बारिश की सौगात है बिटिया
चिड़ि‍यों की चहचाहट कोयल की कूक है बिटिया
हो जिसमे सबका भला वो प्यारा सा झूठ है बिटिया
और किसी मुश्किल खेल में मिलने वाली जीत है बिटिया
दिल को छू जाए वो मधुर गीत है बिटिया
माँ की एक पुकार है बिटिया
मुस्काता एक त्योहार है बिटिया
सच बोलूं तो बिटिया पीड़ा की गहरी घाटी है
क्या किसी ने उसकी पीड़ा रत्ती भर भी बांटी है
अरमानों के काले जंगल उसको रोज जगाते हैं
हम, बिटिया कैसी हो, कह कर चुपचाप सो जाते हैं
हर दुःख को हंसते हंसते बिन बोले सह लेती है
पूरे घर में खुशी बिखेरे बिटिया दुःख में रह लेती है।

नि‍राला जयंती पर कवि‍तायें

हिंदी साहि‍त्य के प्रमुख स्तंभों में से एक सूर्यकांत त्रि‍पाठी नि‍राला की जयंती वसंत पंचमी को मनायी जाती है। इस अवसर पर उन पर लि‍खी लेखक/कवि‍ शमशेर, राजेंद्र कुमार, भवानीप्रसाद मि‍श्र, नागार्जुन, शेखर जोशी और रामवि‍लास शर्मा की कवि‍ताएं-

निराला के प्रति : शमशेर

भूलकर जब राह- जब-जब राह भटका मैं
तुम्हीं झलके, हे महाकवि,
सघन तम को आँख बन मेरे लिए,
अकल क्रोधित प्रकृति का विश्वा स बन मेरे लिए-
जगत के उन्माद का
परिचय लिए-
और आगत-प्राण का संचय लिए, झलके प्रमन तुम,
हे महाकवि ! सहजतम लघु एक जीवन में
अखिल का परिणय लिए-
प्राणमय संचार करते ‘शक्ति औ’ कवि के मिलन का हास मंगलमय,
मधुर आठों याम
विसुध खुलते
कठस्वर में तुम्हारे कवि,
एक ऋतुओं के विहँसते सूर्य !
काल में (तम घोर)-
बरसाते प्रवाहित रस अथोर अथाह !
छू, किया करते
आधुनिकतम दाह मानव का
सधना स्वर से
शांत-शीतलतम।
हाँ, तुम्हीं हो, एक मेरे कवि:
जानता क्या मैं-
हृदय में भरकर तुम्हारी साँस-
किस तरह गाता,
(और विभूति परंपरा की!)
समझ भी पाता तुम्हें यदि मैं कि जितना चाहता हूँ,
महाकवि मेरे !

दृष्टि-दान : राजेंद्र कुमार

जहां-जहां हम देख सके
आपनी आँखें
तुमको,
देखा, तुम हो
दिखलाते वहाँ-वहाँ, दुख की
दिपती आँखें,
ऐंठीले सुख की –
जिन्हें देख-छिपती आँखें;
यह दृष्टि तुम्हारी ही है दुख को मिली
दिख गई खुद की ताकत
उसे, अनेक मोर्चों पर-
हार-हार
जिन पर हम सबको
बार-बार डटना ही है
छंटना ही है, वह कोहरा-घना-
दृष्टि को छेंक रहा है जो
यों दृष्टि तुम्हारी मिली
हमारी मिली
वह दृष्टि तुम्हारी
मिली
दिख सकी हमें जुही की कली
‘विजन बन वल्लारी पर … सुहाग-भरी
स्नेह-स्पप्न-मग्न… अमल-
कोमल तनु तरुणी…’
नहीं तो रह जाती वह
किसी नायिका के जूडे़ में खुँसी,
किसी नायक के गले-पड़ी
माला में गुँथी…
कहाँ वह होती यों सप्राण
कि होती उसकी खुद भी
कोई अपनी प्रेम-कथा उन्मुक्त!
वह दृष्टि तुम्हारी मिली
दिख सकी हमें- तोड़ती पत्थर
वह- ‘जो मार खा रोई नहीं’
रह जाती जो अनदिखी
अन्यथा
इलाहाबाद के पथ पर
वह दृष्टि तुम्हारी मिली
राम पा गये जिं‍दगी में आने की राह
नहीं तो
भटक रहे होते पुराण के पन्नों पर प्रेतात्म…,
आ रमे हमारे बीच
ठीक हम जैसों
की फि‍क्रों में हुए शरीक
‘अन्याय जिधर हैं, उधर शक्ति’-
यह प्रश्न
विकटता में अपनी
पहले से भी कुछ और विकट है आज,
वह आवाज़-
‘शक्ति की करो मौलिक कल्पना’ कहां
गुम हुई,
खोजते हमें निकलना है,
नहीं हम दृष्टि-हीन
फिर हमें प्रमाण पात्रता का देना होगा
फिर शक्ति करेगी हमें
और, हम ही होंगे-
हाँ,  हम ही-पुरुषोत्तम नवीन
(‘आदर्श’, कलकत्ता, 1965 में प्रकाशि‍त)

लफ्फा़ज़ मैं बनाम निराला : भवानी प्रसाद मिश्र

लाख शब्दों के बराबर है
एक तस्वीर !
मेरे मन में है एक ऐसी झांकी
जो मेरे शब्दों ने कभी नहीं आँकी
शायद इसीलिए
कि, हो नही पाता मेरे किए
लाख शब्दों का कुछ-
न उपन्यास
न महाकाव्य !
तो क्या कूँची उठा लूँ
रंग दूँ रंगों में निराला को ?
आदमियों में उस सबसे आला को?
किन्तु हाय,
उसे मैंने सिवा तस्वीरों के
देखा भी तो नहीं है ?
कैसे खीचूँ, कैसे बनाऊँ उसे
मेरे पास मौलिक कोई
रेखा भी तो नहीं है ?
उधार रेखाएँ कैसे लूँ
इसके-उसके मन की !
मेरे मन पर तो छाप
उसकी शब्दों वाली है
जो अतीव शक्तिशाली है-
‘राम की शक्ति पूजा’
‘सरोज-स्मृति’
यहाँ तक कि ‘जूही की कली’
अपने भीतर की हर गली
इन्हीं से देखी है प्रकाशित मैंने,
और जहाँ रवि न पहुँचे
उसे वहाँ पहुँचने वाला कवि माना है,
फिर भी कह सकता हूँ क्या
कि मैंने निराला को जाना है ?
सच कहो तो बिना जाने ही
किसी वजह से अभिभूत होकर
मैंने उसे
इतना बड़ा मान लिया है-
कि अपनी अक्ल की धरती पर
उस आसमान का
चंदोबा तान लिया है
और अब तारे गिन रहा हूँ
उस व्यक्ति से मिलने की प्रतीक्षा में
न लिखूंगा हरफ, न बनाऊंगा तस्वी्र !
क्यों कि‍ हरफ असम्भव है,  तस्वीर उधार
और मैं हूँ आदत से लाचार-
श्रम नहीं करूँगा
यहाँ तक
कि निराला को ठीक-ठीक जानने में
डरूँगा, बगलें झाँकूँगा,
कान में कहता हूँ तुमसे
मुझ से अब मत कहना
मैं क्या खाकर
उसकी तस्वीर आँकूँगा !

निराला के नाम पर : नागार्जुन

बाल झबरे, दृष्टि पैनी, फटी लुंगी नग्न  तन
किन्तु अन्तर्दीप्‍त था आकाश-सा उन्मुक्त मन
उसे मरने दिया हमने, रह गया घुटकर पवन
अब भले ही याद में करते रहें सौ-सौ हवन।
क्षीणबल गजराज अवहेलि‍त रहा जग-भार बन
छाँह तक से सहमते थे श्रृंगालों के प्राण-मन
नहीं अंगीकार था तप-तेज को नकली नमन
कर दिया है रोग ने क्या खूब भव-बाधा शमन !
राख को दूषित करेंगे ढोंगियों के अश्रुकण
अस्थि-शेष-जुलूस का होगा उधर फिल्मीकरण
शादा के वक्ष पर खुर-से पड़े लक्ष्मी-चरण
शंखध्वनि में स्मारकों के द्रव्य का है अपहरण !
रहे तन्द्रा में निमीलित इन्द्र के सौ-सौ नयन
करें शासन के महाप्रभु क्षीरसागर में शयन
राजनीतिक अकड़ में जड़ ही रहा संसद-भवन
नेहरू को क्या हुआ,  मुख से न फूटा वचन ?
क्षेपकों की बाढ़ आयी, रो रहे हैं रत्न कण
देह बाकी नहीं है तो प्राण में होंगे न व्रण ?
तिमिर में रवि खो गया, दिन लुप्त है, वेसुध गगन
भारती सिर पीटती है, लुट गया है प्राणधन !

संगम स्मृति : शेखर जोशी

शेष हुआ वह शंखनाद अब
पूजा बीती।
इन्दीवर की कथा रही:
तुम तो अर्पित हुए स्वयं ही।
ओ महाप्राण !
इस कालरात्रि की गहन तमिस्रा
किन्तु न रीती !
किन्तु न रीती !

कवि : रामविलास शर्मा

वह सहज विलम्बित मंथर गति जिसको निहार
गजराज लाज से राह छोड़ दे एक बार,
काले लहराते बाल देव-सा तन विशाल,
आर्यों का गर्वोन्नत प्रशस्त, अविनीत भाल,
झंकृत करती थी जिसकी वीणा में अमोल,
शारदा सरस वीणा के सार्थक सधे बोल,-
कुछ काम न आया वह कवित्व, आर्यत्व आज,
संध्या की वेला शिथिल हो गए सभी साज।
पथ में अब वन्य जन्तुओं का रोदन कराल।
एकाकीपन के साथी हैं केवल श्रृगाल।
अब कहां यक्ष से कवि-कुल-गुरु का ठाटवाट ?
अर्पित है कवि चरणों में किसका राजपाट ?
उन स्वर्ण-खचित प्रासादों में किसका विलास ?
कवि के अन्त:पुर में किस श्यामा का निवास?
पैरों में कठिन बि‍वाई कटती नहीं डगर,
आँखों में आँसू, दुख से खुलते नहीं अधर !
खो गया कहीं सूने नभ में वह अरुण राग,
घूसर संध्या में कवि उदास है बीतराग !
अब वन्य जन्तुओं का पथ में रोदन कराल।
एकाकीपन के साथी हैं केवल श्रृगाल।
अज्ञान-निशा का बीत चुका है अंधकार,
खिल उठा गगन में अरुण,- ज्योति का सहस्नार।
किरणों ने नभ में जीवन के लिख दिये लेख,
गाते हैं वन के विहग ज्योति का गीत एक।
फिर क्यों पथ में संध्या की छाया उदास ?
क्यों सहस्नार का मुरझाया नभ में प्रकाश ?
किरणों ने पहनाया था जिसको मुकुट एक,
माथे पर वहीं लिखे हैं दुख के अमिट लेख।
अब वन्य जन्तुओं का पथ में रोदन कराल।
एकाकीपन के साथी हैं, केवल श्रृगाल।
इन वन्य जन्तुओं से मनुष्य फिर भी महान्,
तू क्षुद्र मरण से जीवन को ही श्रेष्ठ मान।
‘रावण-महिमा-श्यामा-विभावरी-अन्धकार’-
छंट गया तीक्ष्‍ण बाणों से वह भी तम अपार।
अब बीती बहुत रही थोड़ी, मत हो निराश
छाया-सी संध्या का यद्यपि घूसर प्रकाश।
उस वज्र हृदय से फिर भी तू साहस बटोर,
कर दिये विफल जिसने प्रहार विधि के कठोर।
क्या कर लेगा मानव का यह रोदन कराल ?
रोने दे यदि रोते हैं वन-पथ में श्रृगाल।
कट गई डगर जीवन की, थोड़ी रही और,
इन वन में कुश-कंटक, सोने को नहीं ठौर।
क्षत चरण न विचलित हों, मुँह से निकले न आह,
थक  कर मत गिर पडऩा, ओ साथी बीच राह।
यह कहे न कोई-जीर्ण हो गया जब शरीर,
विचलित हो गया हृदय भी पीड़ा अधीर।
पथ में उन अमिट रक्त-चिह्नों की रहे शान,
मर मिटने को आते हैं पीछे नौजवान।
इन सब में जहाँ अशुभ ये रोते हैं श्रृगाल।
नि‍र्मित होगी जन-सत्ता की नगरी वि‍शाल।