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दो बाल कवि‍ताएं : कंचन पाठक

कंचन पाठक

कानून, प्राणिविज्ञान और हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत से स्नातकोत्तर कंचन पाठक की रचनाएं सभी प्रमुख पत्र-पत्रि‍काओं में प्रकाशि‍त हो चुकी हैं।

प्‍यारा भोलाभाला बचपन

उम्र यही है जब हम सबको
देखरेख और प्यार चाहिए,
निश्छल निर्मल भोले मन को
सबका स्नेह दुलार चाहिए,
दुनिया की विकृति से अछूता
प्यारा भोला-भाला बचपन।
निपट अबोध पुष्प सा पावन
होता बड़ा निराला बचपन।।
बचपन तो कच्ची मिट्टी है
हर साँचे में ढल सकता है
तपकर जब कुंदन होगा तब
काँटों पर भी चल सकता है
शुभ मंगलमय संस्कार भी,
इन्हें चाहिए नेह प्यार भी
कल उन्नति पथ पर गतिमय हो
ऐसे दर्शन सद्विचार भी
मिल जाए यह सब तब बन जाए
अमृतमधु प्याला बचपन।
निपट अबोध पुष्प-सा पावन
होता बड़ा निराला बचपन।।

नन्हें नव-पादप को जैसे
उचित खाद-पानी मिल जाए,
बने सुपुष्ट तरु तब उस पर
कितने विहग ठिकाने पाए,
पर्ण सघन छाया में रुक कर
कितने पथिक सुकूँ हैं पाते,
फल फूलों से लदकर तरुवर
पर उपकार की कथा सुनाते,
कल का कीर्ति स्तंभ बनेगा
राष्ट्र भविष्य उजाला बचपन।
निपट अबोध पुष्प-सा पावन
होता बड़ा निराला बचपन।।

शुभ चैतन्‍य सि‍तारे बच्‍चे

बड़े खिलंदड़ बड़े साहसी होते हैं ये प्यारे बच्चे
छल बल से अनजान अपरिचित दुनियाभर के सारे बच्चे

नहीं कभी थकते ऊर्जा की बहती इनमें ऐसी धारा
घर संसार इन्हीं से रोशन, रोशन इनसे ही जग सारा
इनकी नन्हीं बदमाशी में होती कितनी मासूमी है
गीली मिट्टी का सा दिल है संस्कारों की नम भूमि है
हर बच्चे के अन्दर होती है कोई न कोई क्षमता
वैमनश्य से दूर रहें बस चाहें थोड़ी माँ की ममता
ख़ुशी-ख़ुशी हर बात मानते शुभ चैतन्य सितारे बच्चे
छल बल से अनजान अपरिचित दुनियाभर के सारे बच्चे।।

इनके मन में प्रश्न हजारों दिवा रैन चलते रहते हैं
एक साथ पलकों में सौ-सौ मधुर स्वप्न पलते रहते हैं
क्यों कोयल कु-कु करती है बुलबुल दिन भर किसे बुलाती
रात-रात भर चाँद की बूढी़ माई किसको लिखती पाती
अपनी उजली हँसी से भर देते मन में उजियारे बच्चे
छल बल से अनजान अपरिचित दुनियाभर के सारे बच्चे।।