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बुद्धिमत्ता आखि‍र है क्‍या : आइजैक एसिमोव

आइजैक एसिमोव ( 2 जनवरी 1920- 6 अप्रैल 1992)

जब मैं फौज में था, मैंने एक एप्टीट्यूड टेस्ट में हिस्सा लिया था। अमूमन सभी सैनिक इस टेस्ट को देते हैं। आम तौर पर मिलने वाले 100 अंकों की जगह मुझे 160 अंक मिले। उस छावनी के इतिहास में किसी ने भी अब तक यह कारनामा अंजाम नहीं दिया था। पूर दो घंटे तक मेरी इस उपलब्धि पर तमाशा होता रहा।

(इस बात का कोई ख़ास मतलब तो था नहीं। अगले दिन मैं फिर से उसी पुरानी और शानदार फौजी ड्यूटी पर तैनात कर दिया गया- यानी लंगर की चौकीदारी!)

जीवन भर मैं इसी तरह शानदार अंक लाता रहा हूं। और एक तरह से खुद को तसल्ली देता रहा हूं कि बड़ा बुद्धिमान हूं और उम्मीद करता हूं कि दूसरे लोग भी मेरे बारे में यही राय रखें।

वास्तव में ऐसे अंकों का लब्बो-लुआब यही है कि मैं इस तरह के अकादमिक प्रश्नों का जवाब देने में खासा अच्छा हूं, जो इस तरह की बुद्धिमत्ता परीक्षाएं लेने वाले लोगों द्वारा पसंद किए जाते हैं। यानी मेरी ही तरह के बौद्धिक रुझान के लोग।

उदाहरण के लिए, मैं एक मोटर मैकेनिक को जानता था जो इन बुद्धिमत्ता परीक्षाओं में किसी भी हाल मेरे हिसाब से 80 से ज्यादा स्कोर नहीं कर सकता था। मैं मानकर चलता था कि मैं मैकेनिक से ज्यादा बुद्धिमान हूं।

लेकिन जब भी मेरी कार में कोई गड़बड़ी होती तो मैं भागकर उसके पास पहुंच जाता। बेचैनी से उसे गाड़ी की जांच करते हुए देखता और उसके निर्देशों को ऐसे सुनता जैसे कोई देववाणी हो और वह हमेशा मेरी गाड़ी दुरुस्त कर देता।

सोचिए अगर मोटर मैकेनिक को बुद्धिमत्ता परीक्षा का प्रश्नपत्र तैयार करने को कहा जाता।

या किसी अकादमिक को छोड़कर कोई बढ़ई, या कोई किसान इस प्रश्नपत्र को तैयार करते। ऐसी किसी भी परीक्षा में मैं पक्के तौर पर खुद को बेवकूफ साबित करता और मैं बेवकूफ होता भी।

एक ऐसी दुनिया में, जहां मुझे अपनी अकादमिक ट्रेनिंग और मेरी जुबानी प्रतिभा का इस्तेमाल करने की छूट न हो, बल्कि उसकी जगह कुछ जटिल-श्रमसाध्य करना हो और वह भी अपने हाथों से, मैं फिसड्डी साबित होऊंगा।  

इस तरह मेरी बुद्धिमत्ता, निरपेक्ष नहीं, बल्कि उस समाज का एक फलन है जिसमें मैं रहता हूं। और यह उस सच्चाई का भी नतीजा है जिसे समाज के एक छोटे से हिस्से ने खुद को ऐसे मामलों का विशेषज्ञ बनाकर थोप दिया है।

आइए, एक बार फिर अपने मोटर मैकेनिक की चर्चा करें।

उसकी एक आदत थी- जब भी वह मुझसे मिलता तो मुझे चुटकुले सुनाता।

एक बार उसने गाड़ी के नीचे से अपना सर बाहर निकाल कर कहा: “डॉक्टर! एक बार एक गूंगा-बहरा आदमी कुछ कीलें खरीदने को हार्डवेयर की दुकान में गया। उसने काउंटर पर दो अंगुलियां खड़ी कीं और दूसरे हाथ से उन पर हथौड़ा चलाने का अभिनय किया।

“दुकानदार भीतर से हथौड़ा ले आया। उसने अपना सर हिलाया और उन दो अंगुलियों की ओर इशारा किया जिस पर वह हथौड़ा चलाने का उपक्रम कर रहा था। दुकानदार ने उसे कीलें लाकर दीं। उसने अपनी ज़रूरत की कीलें चुनीं और चला आया। इसी तरह डॉक्टर, अगला बंदा जो दुकान में आया, वह अंधा था। उसे कैंची की ज़रूरत थी। तुम्हारे हिसाब से उसने दुकानदार को कैसे समझाया होगा?”

उसकी बातों में खोए-खोए मैंने अपना दायां हाथ उठाया और अपनी पहली दो अंगुलियों से कैंची की मुद्रा बनाकर दिखाई।

इस पर मोटर मैकेनिक जोर-जोर से हंसते हुए बोला, “हे महामूर्ख, उसने अपनी आवाज़ इस्तेमाल की और बताया कि उसे कैंची चाहिए।”

फिर उसने बड़ी आत्मतुष्टि से कहा, “आज मैंने दिनभर अपने ग्राहकों से यही सवाल पूछा।”

“क्या तुमने काफी लोगों को इसी तरह बेवकूफ साबित किया?” मैंने पूछा।

“बहुत थोड़े”, वह बोला, “लेकिन तुम्हें तो मैंने बेवकूफ साबित कर ही दिया।”

“ऐसा क्यों हुआ?” मैंने पूछा.

“क्योंकि तुम बुड़बक पढ़े-लिखे हो डॉक्टर. मैं जानता हूं कि तुम ज्यादा स्मार्ट हो भी नहीं सकते।”

 मुझे कुछ बेचैनी महसूस हुई कि वह मेरे बारे में थोड़ा-बहुत जानता है। 

(रूस में जन्‍में प्रसि‍द्ध वि‍ज्ञान लेखक की आत्‍मकथा का एक अंश। इसका अनुवाद आशुतोष उपाध्‍याय ने कि‍या है।)

क्या सचमुच टीवी सीखने में बाधा डालता है : ग्वेन डेवार

television

टीवी के प्रभाव से मुठभेड़

शोधों से टेलीविजन और शिशुओं में भाषा के विकास के बीच संबंध का पता चलता है। बच्चे जितना ज्यादा समय टीवी के सामने बिताते हैं, बोलना सीखने की उनकी रफ़्तार उतनी ही धीमी हो जाती है। क्या यह सच है?

कुछ लोगों का निष्कर्ष है कि बच्चों में टेलीविजन का सीधा और नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इस नज़रिए के मुताबिक़ टेलीविजन सिगरेट की तरह नशीला होता है। लेकिन सिगरेट जहां फेफड़ों को नुकसान पहुंचाती है, वहीं टेलीविजन दिमाग का कबाड़ा कर डालता है। टीवी देखने से आप (सचमुच) बेवकूफ हो जाते हैं।

लेकिन इस प्रकार तालमेल बिठाने को सीधे-सीधे कार्यकारण संबध नहीं कहा जा सकता और इस मसले की और गहरी जांच-पड़ताल कुछ और बात कहती है-

टीवी को भाषा ग्रहण करने की घीमी रफ़्तार से जोड़ा जा सकता है क्योंकि यह शिशुओं और बड़ों के बीच होने वाली बातचीत के ज़रूरी समय को चुरा लेता है।

आंकड़े वास्तव में क्या कहते हैं

टेलीविजन सूचना प्रसारित करने का एक माध्यम भर है। निश्चय ही सूचना ज्यादा महत्वपूर्ण है, माध्यम नहीं। बेशक शोध बताते हैं कि जो बच्चे ब्लूज क्लूज जैसे आयु-संगत शैक्षिक कार्यक्रम देखते हैं, उनमें शो में दिखाई गयी सूचनाओं को बताने या समस्याओं को हल करने की क्षमता में तात्कालिक सुधार दिखाई देता है।

संभवतः, टेलीविजन के कुछ पहलू- जैसे तेज गति या दृश्यों का जल्दी-जल्दी पटाक्षेप- अल्पकालिक ध्यानाकर्षण काल के विकास में मदद करते होंगे। इस चिंताजनक विचार को कई अध्ययनों से बल मिलता है। हाल के एक प्रयोग में ‘तीव्र-सम्पादित’ और ‘धीमे सम्पादित’ टेलीविजन के 4 से 7 वर्ष के स्कूली बच्चों पर पड़ने वाले प्रभाव का तुलनात्मक अध्ययन किया।

तथापि यह इस दावे का प्रमाण नहीं कि टीवी आपको बेवकूफ बनाता है।

वास्तव में ऐसा प्रतीत होता है कि टीवी प्रोग्रामों को देखते या सुनते रहने से छोटे बच्चों को बातचीत करना सीखने में मुश्किल आती है।बोलना सीखने की क्रिया में बच्चों को वास्तविक सामाजिक संवाद से बहुत लाभ होता है

बोलना सीखने के मामले में जीवंत बातचीत का कोई विकल्प नहीं

भाषा उपार्जन के क्षेत्र की प्रमुख वैज्ञानिक पैट्रिशिया कुल ने बच्चों पर किये कुछ दिलचस्प प्रयोगों में इस तथ्य की पुष्टि की है।

कुल और उनके सहयोगियों ने 9 महीने के अमेरिकी बच्चों को उनके लिए अनजान भाषा- मेंडेरिन चाइनीज से रू-ब-रू कराया। प्रयोग के दौरान बच्चे मेंडेरिन बोलने वाले एक जीते-जागते इंसान के संपर्क में आते थे। 12 सत्रों के बाद इन बच्चों ने मेंडेरिन भाषा की कतिपय सामान्य ध्वनियों में फर्क करने की क्षमता में बढ़ोतरी का स्पष्ट संकेत दिया।

लेकिन जब यही प्रयोग कुछ अन्य बच्चों पर टीवी ट्यूटर के साथ दोहराया गया तो परिणाम बिलकुल अलग आये। टीवी के जरिये मेंडेरिन के संपर्क में आने वाले बच्चे इस भाषा की सामान्य ध्वनियों में फर्क करने वाले लेकिन प्रयोग में शामिल नहीं किये गए (कंट्रोल) बच्चों की बराबरी भी नहीं कर पाए।

दोनों प्रयोगों में मेंडेरिन बोलने वाले सीधे बच्चों की आंखों में आंखें डालते थे, खिलौनों के बारे में बोलते थे और शिशुओं के अनुकूल ख़ास तरह की स्टाइल (शिशु निर्देशित भाषा) में बोलते थे। प्रयोगों के बीच सामाजिक कारक का अंतर था। जैसा कि कुल ने नोट किया- “शिशु प्रकटतः कम्युटेशनल ऑटोमेटन नहीं होते, बल्कि प्राकृतिक भाषा सीखने के लिए उन्हें एक सामाजिक शिक्षक की ज़रूरत पड़ती है।

शोधकर्ता कहते हैं कि कहानियां सुनने या टीवी देखने के बजाय बातचीत करने से भाषा के विकास में जबरदस्त सकारात्मक प्रभाव पड़ता है

इस विचार की हाल में हुए एक शोध से पुष्टि हुई है, जिसमें 0 से 4 वर्ष के बच्चों पर एक रिकॉर्डिंग उपकरण फिट किया गया था. इस उपकरण की मदद से शोधकर्ता वस्तुगत रूप से यह माप सकते थे कि प्रत्येक बच्चे ने बड़ों के साथ बातचीत करते हुए और टेलीविजन देखते हुए कितना वक्त बिताया। शोध के बड़े दिलचस्प परिणाम निकले।

शोधकर्ताओं में पाया कि सामजिक वार्तालाप- यानी आमने-सामने की बातचीत, बड़ों और बच्चों के बीच आगे-पीछे बातचीत का बेहतर भाषाई विकास से सीधा रिश्ता है। शिशु और छोटे बच्चे बड़ों के साथ जितना ज्यादा बातें करेंगे, उनके भाषाई कौशल उतनी ही जल्दी बेहतर होंगे।

इसके विपरीत, बड़ों के एकालाप सुनने का- जिसमें कहानियां सुनना भी शामिल है- बच्चों के भाषाई विकास पर मामूली असर पड़ता है। दोनों ओर की बातचीत का प्रभावव सिर्फ बड़ों को बोलते सुनते रहने की बनिस्बत छः गुना ज्यादा होता है।

और टीवी? शोधकर्ताओं ने जब बच्चों द्वारा बातचीत में बिताए जाने वाले समय को निश्चित रखा तो टीवी का बच्चों पर न तो सकारात्मक असर दिखाई दिया और न ही नकारात्मक।

हाल के कुछ अन्य अध्ययनों के भी ऐसे ही परिणाम आये। जब  शोधकर्ताओं ने इस सन्दर्भ में छोटे बच्चों के विकास पर ध्यान दिया तो उन्होंने पाया कि जो बच्चे बड़ों के साथ बातचीत करने में ज्यादा समय बिताते हैं, उनकी शब्द सामर्थ्य बहुत ज्यादा होती है। आसान सी बात है कि दूसरों को बोलते सुनने भर से कोई फायदा नहीं होता।

और एक प्रयोग जिसमें वीडिओ चैट टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया गया, वास्तव में सब कुछ स्पष्ट कर देती है। सराह रोजबेरी व उनके सहकर्मियों ने शिशुओं के एक समूह पर किये गए प्रयोग में दो तरह के वयस्क वार्तालाप का उपयोग किया- एक में एक वयस्क स्काइप के जरिये सीधे बातचीत कर रहा था। दूसरे में वयस्क स्काइप में बोलता तो दिखाई दे रहा था, मगर वास्तव में यह बातचीत पहले से रिकॉर्ड की हुई थी।

दोनों ही स्थितियों में बच्चों ने वयस्क के साथ बोलने का प्रयास किया, लेकिन सिर्फ लाइव वयस्क ही बच्चों की बातचीत, सवालों व चेहरे के हाव-भावों का सही ढंग से प्रत्युत्तर दे पा रहा था। पहले से रिकॉर्ड की गई बातचीत वाला वयस्क टेलीविजन के होस्ट की तरह बात कर रहा था- जो दर्शकों को बांधे रखने का प्रयास तो करता है, लेकिन बच्चे के आकस्मिक सवालों या भावाभिव्यक्ति पर प्रतिक्रिया नहीं दे सकता।

इन सत्रों के बाद बच्चों का यह देखने के लिए परीक्षण किया गया कि क्या वे ऐसे अपरिचित नए शब्दों को सीख पाए, जिन्हें वयस्क ने इस्तेमाल किया था। सिर्फ उन्हीं बच्चों ने नए शब्दों को पकड़ा था जो वास्तविक बातचीत शामिल थे।

कुल मिलाकर निष्कर्ष क्या हैं? हमें ऐसे बच्चों पर टीवी के प्रभावों की चिंता करनी चाहिए, जो भाषा सीख रहे हैं। लेकिन भाषा ग्रहण करने की क्षमता  पर किये गए शोध का यह निष्कर्ष नहीं है कि सीखने में हो रही देरी के लिए सीधे तौर पर टेलीविजन का हाथ है, बल्कि ज्यादा उपयोगी सन्देश यह है कि बच्चों को आमने-सामने की सच्ची पारस्परिक बातचीत से ज्यादा फायदा होता है। शायद माता-पिता ने बच्चों के टीवी से चिपके रहने की चिंता करने के बजाय उनके साथ अर्थपूर्ण बातचीत का समय निकालना चाहिए।

(प्रो. ग्वेन डेवार पेरेंटिंग साइंस (http://www.parentingscience.com) की संस्थापक हैं )

(अनुवाद: आशुतोष उपाध्याय)

बिनबुलाया मेहमान : एंड्रयू हिंटन

बच्चों के साथ बलोबसेंग फुन्स्तोक।

बच्चों के साथ बलोबसेंग फुन्स्तोक।

लोबसेंग फुन्स्तोक एक पूर्व तिब्बती साधु हैं। उन्होंने पवित्र दलाई लामा के साथ प्रशिक्षण लिया और वर्षों तक पश्चिमी देशों में बौद्ध धर्म और ध्यान की शिक्षा दी। 2006 में वह साधु का चोला उतारकर भारत में अपने जन्म स्थान अरुणाचल प्रदेश लौट आये। यहां आकर उन्होंने हिमालय की तलहटी में अनाथ और गरीब बच्चों का एक समुदाय खड़ा कर दिया- झाम्त्से गत्सल बाल समाज– तिब्बती शब्द ‘झाम्त्से गत्सल’ का अर्थ है ‘प्रेम और दया का उपवन’। इस बाल समाज पर 2014 में एक फिल्म बनी- ‘ताशी एंड द मोंक’। झाम्त्से गत्सल की शुरुआत मात्र 34 बच्चों के साथ हुई। पिछले करीब एक दशक में यहां के बच्चों की संख्या बढ़कर 85 हो गयी है। 5 आश्रममाताएं और 13 शिक्षक इन बच्चों की देखरेख करते हैं। झाम्त्से गत्सल को उम्मीद है कि वह इतना विस्तार करे कि 200 बच्चे यहां रह सकें। इस साक्षात्कार में फिल्म के निर्देशक एंड्रयू हिंटन लोबसेंग फुन्स्तोक से उनके तकलीफ़देह बचपन और उस प्रेरणा के बारे में बातचीत कर रहे हैं, जिनकी बदौलत वह गरीब बच्चों के लिए एक बेहतर ज़िन्दगी की राह बना पाए हैं।

क्या आप इस सवाल के जवाब से अपनी बात शुरू कर सकते हैं कि आप कौन हैं और इस दुनिया में कैसे आये?

मेरा नाम लोबसेंग फुन्स्तोक है। मैं भारतीय हिमालय के सुदूरवर्ती अरुणाचल प्रदेश में पैदा हुआ। जब मेरी मां गर्भवती हुए तो वह अविवाहित और बहुत छोटी थी। जाहिर है, गांव में यह भारी बदनामी की बात थी। उन्होंने छुप-छुपा के हमारे घर के शौचालय में मुझे जन्म दिया। उन्होंने मुझे सूखी पत्तियों से ढककर उसी तरह छोड़ दिया जैसे- लोग अपने मल को छोड़ते थे। मेरी बुआ और दादा-दादी ने किसी के रोने की आवाज़ सुनी। उन्हें लगा कि‍ शायद कोई बकरी उनके खेत में आ गयी है और उनकी फसल को खा रही है। मेरी बुआ देखने के लिए बाहर आईं और उन्होंने सूखी हुई पत्तियों की नीचे कुछ हिलता हुआ नज़र आया। देखा तो वहां एक शिशु था और वह मैं था। मैं एक तरह से नीला-बैगनी पड़ चुका था- मौत के बिलकुल करीब।

आम तौर पर जब घर में कोई नया बच्चा आता है, परिवार वाले, दोस्त और पड़ोसी खुशियां मनाते हैं। लेकिन मेरा जन्म ऐसी घटना नहीं थी, जिसकी ख़ुशियां मनाई जा सकें। मैं अपने घरवालों के लिए कितना दुःख और बदनामी लेकर आया था। यही वजह थी कि छोटेपन में मुझे हमेशा कहा जाता था- ‘इस दुनिया में बिनबुलाया मेहमान’।

आपका बचपन कैसा था?

लोग सचमुच मुझे पसंद नहीं करते थे। मैं लोगों की खिड़कियां तोड़ता और प्रार्थना पताकाएं फाड़कर आये दिन मुसीबतें खड़ी कर देता था। मुझे अच्छी तरह याद है, किसी ने मुझसे कहा था, “तुम कभी नहीं बदलोगे। तुम सुधरने वाले नहीं हो।” पता नहीं कैसे यह बात मेरे दिमाग में घर कर गयी थी। आज भी मैं उस जगह हो देखता हूं और उन लम्हों को महसूस करता हूं। जाने कितनी बार मुझे लगता था इससे तो मर जाना अच्छा। सौभाग्य से मेरे दादा-दादी थे जो तब भी मुझे बहुत प्यार करते थे, जब मैं प्यार के जरा भी लायक नहीं था। मैं इसे महसूस कर सकता हूं क्योंकि उनकी दयालुता के कारण ही आज मैं जिंदा हूं। किसी तरह उन्होंने मेरे भीतर कुछ महसूस किया, लेकिन कुछ समय बाद उन्होंने तय किया कि मुझे बदलने का एक ही रास्ता है- मुझे मठ में भेज दिया जाये।

मेरे दादा बड़े कठोर इंसान लगते थे, लेकिन उनका हृदय बड़ा कोमल था। वह जताते नहीं थे, लेकिन उनके प्यार को आप महसूस कर सकते थे। मेरे दादा-दादी के पास ज्यादा कुछ था नहीं, लेकिन दक्षिण भारत स्थित मठ के लिए प्रस्थान करने से ठीक एक दिन पहले दादा जी ने अपने पैजामों को काट-पीटकर एक थैला बनाया और इसमें खूब सारा पैसा डालकर बाहर मेरा नाम लिख दिया। उन्होंने कहा, “इसे हमेशा अपने पास रखना और जब तक सचमुच बहुत ज़रूरत न पड़े इन्हें इस्तेमाल मत करना।” बहुत बाद में मैं इस बात को समझ पाया कि उन्हें मुझ से कितना प्यार था और किनता भरोसा मुझे पर करते थे।

इस तरह 7 वर्ष की आयु में आप घर छोड़कर मठवासी हो गए. वहां क्या हुआ?

मठ की दिनचर्या बहुत सख्त थी और अनुशासन बहुत कठोर। एक बच्चे के रूप में मेरे लिए यह कठिन था, लेकिन एक युवा साधु के रूप में मेरा दिमाग हर वक्त व्यस्त रहता था और मेरे पास कुछ और सोचने के लिए समय नहीं था। मुझे वहां की दिनचर्या, नीति, अनुशासन, गतिविधियां और मठ में किये जाने वाले तमाम कार्यों का पालन करना होता था। अच्छा बनाने में थोड़ा वक्त लगा। हर चीज़ के बारे में मेरा नजरिया नकारात्मक था, लेकिन एक बिंदु पर आकर मैंने सकारात्मक ढंग से सोचना शुरू किया। मेरा आत्मविश्वास बढ़ने लगा और मुझे भरोसा होने लगा कि मैं भी एक अच्छा इंसान बन सकता हूं।

मेरे शिक्षक से मिली शिक्षाओं में एक थी- तुम इस ब्रहमांड में एक बहुत विशाल परिवार के बहुत-बहुत छोटे हिस्से हो। खरबों मनुष्यों और अनगिनत जीवधारियों- जीव-जंतुओं, कीड़े-मकोड़ों व पंछियों के बीच एक अदने से इंसान.। इस बात ने मुझे अपनी चुनौतियों व कठिनाइयों के बीच दूसरे जीवों से जुड़ने में बड़ी मदद की। और जब ऐसा होता है तो हमारा फोकस बदल जाता है। शिकायत करने के बजाय आप खुद से सवाल करने लगते हैं, “अपने परिवार, अपने बड़े परिवार को उनकी कठिनाइयों से बाहर निकलने में मैं कैसे मदद करूं।”

आज मैं अपनी कठिनाइयों को छोटे बच्चों के साथ साझा करता हूं, क्योंकि उनमें से अधिकतर उन्हीं चुनौतियों का सामना कर रहे हैं जिनसे कभी मेरा वास्ता पड़ा था। मैं उन्हें यह भरोसा करने के लिए प्रोत्साहित करता हूं कि नकारात्मक होने की कतई ज़रूरत नहीं है। आज मैं जानता हूं कि मेरा जैसा तकलीफदेह बचपन भी एक तरह का आशीर्वाद है।

और कब आपको महसूस हुआ कि आप अपने अनुभवों को किसी सकारात्मक अंजाम में बदलना चाहते हैं?

मेरा ख़याल है कि बच्चों के समाज की स्थापना के बीज मेरे भीतर बहुत छोटी उम्र से थे।

जब मठ में मेरी परवरिश हो रही थी मेरे शिक्षक हमेशा इस बात की शिक्षा देते थे कि अपनी ज़िन्दगी में कुछ-न-कुछ अर्थपूर्ण ज़रूर करो। वह हमें प्रार्थना करने के लिए प्रेरित करते थे और उसके बाद अपने और दूसरों के लिए कुछ-न-कुछ उपयोगी काम करने का ज़ज्बा पैदा करते थे।

उन दिनों जब भी मैं घर आता था, देखता था कि यहां सारे बच्चे उसी तरह की समस्या से जूझ रहे हैं- कुछ करने के लिए यह सीधा सन्देश था। तब इस तरह के काम का मुझे कोई तजुर्बा नहीं था, आज जो मैं करता हूं, उसे कर पाने के लिए मेरे पास पर्याप्त शिक्षा नहीं थी। लेकिन अपने अनुभव के आधार पर मैं कठिन परिस्थितियों में भी आगे बढ़ने के बारे में बोलता था।

आज मेरे पास जो कुछ भी है वह औरों की दयालुता की वजह से है। और अब मेरे सबसे बड़ी जिम्मेदारी है कि उस दयालुता की कीमत चुकाऊँ। मैं खुद को याद दिलाता हूं कि मेरा बचपन भले ही कठिन रहा हो, मैं उनमें आस्था और भरोसा कभी नहीं खोऊंगा।

आपके बाल समाज के नाम का क्या महत्व है?

झाम्त्से गत्सल का मतलब है- ‘प्रेम और दयालुता का उपवन’। यहां हम जो कुछ कर रहे हैं, उसे यह नाम पूरी सच्चाई से अभिव्यक्त करता है। इन बच्चों को परिवार, प्रेम और अपनेपन के अहसास की ज़रूरत है।

यही कारण है कि मैंने इसे बाल समाज कहने का निर्णय लिया- यह उनका परिवार है, उनका समाज है और उनकी ज़िन्दगी है। झाम्त्से गत्सल में बच्चे अनाथ नहीं हैं। यहां उनके माता-पिता हैं, उनकी कई मांएं हैं, कई पिता हैं और कई-कई भाई-बहन हैं, जो उनका ख़याल रखते हैं। यहां उन्हें वह सब ख़याल, प्यार और मदद मिलती है, जिसके वे हकदार हैं।

और आपने यह समाज यहां क्यों शुरू किया?

यह इलाका (अरुणाचल प्रदेश का तवांग जिला) आज भी शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक और आर्थिक दृष्टिकोण से सर्वाधिक पिछड़े इलाकों में एक है। जब 2006 में हमने शुरुआत की, तब यह जगह इतनी दूर थी कि हम आपसी बातचीत में इसे जुरासिक पार्क का रास्ता कहते थे। एक छोटे से कस्बे से 6-7 किलोमीटर के मोटर के सफ़र के बावजूद ऐसे घने जंगल से गुजरना पड़ता था, जहां दिन के समय भी आप अकेले जाने में घबराएंगे।

इसलिए एक तरह से मैं महसूस करता हूं कि हमारा बाल समाज भी शुरुआत भी एक अनाथ की तरह हुई। यह वास्तव में कोई शानदार जगह नहीं थी, जहां लोग अच्छा काम करना पसंद करते।

यहां के बच्चे कौन है और वे कहां से आते हैं?

हमारे बच्चों में ज्यादातर पहले पीढ़ी के शिक्षार्थी हैं। जब हम गावों में जाते हैं तो परिवार के सबसे तेज-तर्रार बच्चे को नहीं चुनते, बल्कि हम पूछते हैं- कौन सबसे चुनौतीपूर्ण बच्चा है? ऐसा कौन सा बच्चा है जिसे कोई नहीं चाहता?

हमारा काम उस बच्चे को स्वीकार करना है जिसकी कोई और देखभाल नहीं कर सकता और कोई करना भी नहीं चाहता। और उस बच्चे को सबसे शानदार इंसान में बदलने में मदद करना।

और यह आप सिर्फ प्यार और दयालुता के सहारे करते हैं?

हमारे बच्चों में लगभग सभी ने अपने-अपने गांव में बड़ा कठिन बचपन गुज़ारा है। लोग कहते हैं, “हे भगवान्, तुम्हें डॉक्टर की ज़रूरत पड़ेगी, तुम्हें मनोवैज्ञानिक बुलाना पड़ेगा, मनोचिकित्सक ही इन बच्चों को ठीक कर सकता है।” लेकिन अपने आठ साल के इतिहास में हमने अपने बच्चों को किसी तरह की दवा नहीं खिलाई।

सबसे पहले मैं समझता हूं यह सब झाम्त्से गत्सल के सादगी भरे जीवन का असर है। हम बच्चे को अपनाते हैं- बिना किसी निर्णय के उसे गले लगाते हैं, अच्छा, बुरा, कैसा भी। इसके बाद हम वास्तव में उसके लिए जगह बनाने की कोशिश करते हैं और उसके साथ सहयोगपूर्ण बर्ताव करते हैं।

इसके बाद सब प्रेम की ताकत है। ख़याल रखने की ताकत या दयालुता की ताकत जो हम हर बच्चे को देते हैं. और यह प्रत्येक बच्चे के लिए मरहम का काम करता है। और मुझे पक्का भरोसा है कि यह उपाय काम करता है। बेशक इसमें समय लगता है, लेकिन अंततः बच्चे बदल जाते हैं।

हमारे बाल समाज में बच्चे जो कुछ भी करते हैं, उसके लिए बराबर के भागीदार होते हैं। इससे उनमें जिम्मेदारी का अहसास पैदा होता है और वे समझ जाते हैं कि कैसे सक्रिय भागीदार बना जाता है।

मेरी समझ से यह स्वाभाविक है कि हमारे बच्चे निष्क्रिय लाभार्थी नहीं हैं- हमारे बच्चे उस बदलाव के सक्रिय एजेंट हैं, जो हम अपने समाज में लाना चाहते हैं। वे एक-दूसरे की मदद करते हैं, एक-दूसरे को सहारा देते हैं और काम को अंजाम तक पहुंचाते हैं- खाना पकाने, सफाई, छोटे बच्चों की देख-रेख, धोना, नहाना- हमारे समाज में होने वाले हर काम में बच्चे सक्रिय रूप से शामिल होते हैं। इस तरह देखें तो समाज होने का अहसास और जरूरत पड़ने पर एक-दूसरे की मदद निश्चित रूप से झाम्त्से गत्सल की ख़ास बात है।

क्या आपका समाज अब भी बढ़ रहा है?

मेरे सबसे मुश्किल कामों में एक है कब और कैसे नए बच्चों को स्वीकार किया जाये। अभी हमारे पास 85 बच्चे हैं और 1000 से ज्यादा बच्चों के आवेदन पड़े हुए हैं।

रोज लोग मेरे पास आते हैं और ज्यादा बच्चों को लेने का आग्रह करते हैं। यह बहुत कठिन है, अगर मैं एक परिवार को हां कहता हूँ तो 10 अन्य को ना कहना पड़ता है। फिलहाल हमारे पास किसी भी नए बच्चे को लेने के लिए जगह और संसाधन नहीं हैं।

अंत में, आप किस चीज़ का अभ्यास करते हैं?

मेरा प्रमुख अभ्यास करुणा, स्थिरता, एकाग्रता को ज्यादा-से-ज्यादा बढ़ाने तथा धैर्य व दृढ़ता के मेरे प्रशिक्षण पर आधारित है।

अमीर या गरीब, पूर्व या पश्चिम, शिक्षित या अनपढ़, स्त्री या पुरुष- सभी मनुष्यों में एक बात सामान है- सब अपने जीवन में आनंद और खुशियों की कामना करते हैं।

मैं अपने आप को सौभाग्यशाली समझता हूं कि मुझे अपने जीवन में एक ऐसी चीज़ मिली जिसे करते हुए इतनी ख़ुशी और आनंद की प्राप्ति होती है। यही मैं महसूस करता हूँ। मैं कितना किस्मत वाला हूं। मैं प्रार्थना करता हूं कि मैं इसी तरह के कामों को करने और आगे बढ़ाने के लिए कई जन्म लूं। इस काम को करने में मुझे अपार ख़ुशी और आनंद मिलता है।

अनुवाद : आशुतोष उपाध्याय

माँ : हरि‍श्चंद पाण्डे

चर्चित कवि‍ हरि‍श्चंद्र पाण्डे की कवि‍ता ‘माँ’ पर कवि‍ता पोस्टर। इसकी परि‍कल्पना और संरचना आशुतोष उपाध्यायजी ने की है-

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बच्चे किताबें नहीं पढ़ते क्योंकि माता-पिता किताबें नहीं पढ़ते: जार्डन सैपाइरो

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यह एक सांस्कृतिक मान्यता है कि आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बच्चों को किताबों से दूर कर रहे हैं। मैं जब दूसरे विश्‍वविद्यालयी प्राध्यापकों से मिलता हूं तो वे अकसर शिकायत करते हैं कि विद्यार्थी अब पढ़ते नहीं हैं क्योंकि उनकी आंखें हर वक्त उनके फोन से चिपकी रहती हैं। टेक्नोफोब (टेक्नोलॉजी से भयभीत रहने वाले) जमात के लोग सोचते हैं कि हम एक ऐसी पीढ़ी को तैयार कर रहे हैं, जो साहित्य की कीमत नहीं समझती। नए और पुराने के बीच ध्रुवीकरण जारी है। संभव है यह धारणा किसी स्क्रीन-विरोधी मानस की बची-खुची भड़ास हो जो टेलीविजन के स्वर्णकाल की परिधि से बाहर नहीं निकल पाता। यह पिटी-पिटाई मनगढ़ंत कहानी भी हो सकती है जो तकनीकी साम्राज्यवाद के खिलाफ संग्राम में  किताबों की हार पर छाती कूट-कूट कर कह रही है- कागज सच्चा नायक और गोरिल्ला ग्लास दुष्ट खलनायक!

‘कॉमन सेन्स मीडिया’ की ताज़ा रिपोर्ट ‘बच्चे, किशोर और पढ़ने की आदत’ अमेरिका में ‘बच्चों के पढ़ने की आदतों के बारे में एक बड़ी तस्वीर’ पेश करती है और पड़ताल करती है कि हाल के दशकों में हुई तकनीकी क्रांति के दरम्यान ये आदतें किस कदर बदली हैं। यह तस्वीर बताती है-

सरकारी अध्ययन के मुताबिक 1984 से अब तक हफ्ते में एक बार पढ़ने वाले 13 वर्ष तक की आयु के बच्चों का प्रतिशत 70% से घटकर 53% हो गया है। सप्ताह में एक बार पढ़ने वाले 17 वर्ष के बच्चों में यह आंकड़ा 64% से लुढ़ककर 40% पर पहुँच गया। वहीं इस दरम्यान 17 वर्ष के बच्चों में, कभी नहीं या मुश्किल से कभी-कभी पढ़ने वालों की तादाद 9% से बढ़कर 27% हो गयी। बेशक ये आंकड़े झकझोर देने वाले हैं, लेकिन मुझे समझे में नहीं आता कि इनका टेक्नोलॉजी से क्या ताल्लुक है। यह आरोप मुझे निहायत बेतुका लगता है।

मुझे तो लगता है कि हम आज ऐसे सांस्कृतिक परिवेश में रह रहे हैं जो इतिहास के किसी भी दौर के मुकाबले कहीं ज्यादा पाठ-संपन्न है। लोग दिन भर पढ़ते रहते हैं। गूगल, ट्विटर और फेसबुक शब्दों का अम्बार लगाते रहते हैं। लोग अपनी आंखों को स्मार्टफोन से अलग नहीं कर पाते- जो मूलतः पाठ और सूचना बांटने वाली मशीन है। सच कहें तो हमारी समस्या हर वक्त पढ़ते ही रहने की है। लोग लगातार अपने ई-मेल या टेक्स्ट मैसेज चैक करते रहते हैं। कभी-कभी तो उन्हें शब्दों के इस जंजाल से बाहर निकालना भी मुश्किल हो जाता है।

फिर भी, लोग क्या पढ़ रहे हैं? ऐसा लगता है कि वे ढेर सारी किताबें नहीं पढ़ते। मैं बच्चों की नहीं, बल्कि बड़ों की बात कर रहा हूं। यहां तक कि टेक्नोफोब भी किताबें नहीं पढ़ते। मैं ऐसे कई पढ़े-लिखे भद्रजनों से मिल चुका हूं जिन्होंने मुझे बताया कि उन्हें किताबें पढ़ने का समय ही नहीं मिलता। वे न्यूयॉर्क टाइम्स में छपने वाली पुस्तक समीक्षाओं को देख लेते हैं ताकि पार्टियों में होने वाली पुस्तक चर्चाओं में अपनी इज्जत बचा सकें। वे विमान में मिलने वाली पत्रिकाओं के पिछले पन्ने पर छपने वाले पुस्तक सारांश से काम चला लेते हैं। मैं हैरान रह जाता हूं जब कई लोग मुझसे मेरी किताबों के ऑडियो संस्करण की उपलब्धता के बाबत पूछते हैं।

यह समस्या क्या बच्चों के किताबें न पढ़ने की है या फिर किसी के भी किताबें न पढ़ने की? क्या हमारी संस्कृति घनघोर रूप से गैर-अकदामिक और बौद्धिकता विरोधी नहीं हो गयी है? हम पत्रिकाओं व ब्लॉग पढ़ने को तरजीह देते हैं। ये मानविकी, लिबरल आर्ट्स एजुकेशन या किताबों पर निर्भर विश्‍वविद्यालयी डिग्री के मूल्यों पर सतत सवाल खड़े करते हुए छुपे तौर पर आत्म-प्रचारात्मक होते हैं। चालू फैशन चीख रहा है कि आज हमें एसटीईएम (साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग, मैथ्स) शिक्षा- यानी ज्यादा इंजीनियरों, ज्यादा व्यवसायियों की दरकार है। परोक्ष रूप से हम एक पुस्तक विरोधी एजेंडे से घिरे हुए हैं और फिर भी हैरान हैं कि बच्चे पढ़ क्यों नहीं रहे हैं।

मैं यह स्वीकार करता हूं कि मैं पक्षपाती हूं। मैं एक अकादमिक हूं। मुझे पढ़ने के ही पैसे मिलते हैं। लेकिन मेरे बच्चे (6 और 8 वर्ष) भी खुद से खूब पढ़ते हैं। इसलिए नहीं कि मैं ऐसा चाहता हूं- वीडिओ गेम खेलना हो तो पहले 30 मिनट पढ़ो। इसलिए भी कि उनके डैड की पढ़ने की आदत उनके लिए मॉडल का काम करती है। डैड हमेशा नई-नई किताबें मंगाते रहते हैं; डैड हमेशा उन्हें पढ़ते हुए दिखाई देते हैं। मेरे घर में वयस्क होने का मतलब किताबों की सोहबत में रहने वाला होता है। परिपक्व होने का मतलब छपे हुए शब्दों के लम्बे रूपों से ज्यादा से ज्यादा अंतरंग होना।

कॉमन सेंस मीडिया की रिपोर्ट स्वीकार करती है कि- ‘माता-पिता पढ़ने की प्रेरणा दे सकते हैं।’ रिपोर्ट कहती है, ‘छपी हुई किताबें घर में रखने से, उन्हें खुद पढ़ने से और अपने बच्चों के लिए रोज पढ़ने का समय तय करने से पढ़ने की प्रेरणा जन्म ले सकती है।’

माता-पिता की गतिविधियों और बच्चों में पढ़ने की ललक के बीच गहरा सम्बन्ध पाया गया है (स्कौलेस्टिक, 2013)। उदाहरण के लिए, नियमित रूप से पढ़ने वाले बच्चों में 57% के माता-पिता ने अपने बच्चों के पढ़ने के लिए रोजाना अलग से समय निर्धारित किया हुआ है। इसके विपरीत अनियमित रूप से पढ़ने वाले बच्चों में सिर्फ 17% के माता-पिता ने ही ऐसी व्यवस्था की है।

जहां तक किताबों का सवाल है, अधिकांश अध्ययन बताते हैं कि पाठ प्रस्तुत करने की विधि की ख़ास प्रासंगिकता नहीं होती। पढ़ने में गहरी रुचि रखने वालों के लिए तकनीक कोई मुद्दा नहीं। ई-रीडर, टेबलेट, लैपटॉप स्क्रीन आदि सभी में लम्बे पाठ पढ़े जा सकते हैं। खरे पाठक के लिए किताब का कागजी रूप में होना बहुत मायने नहीं रखता। सच तो यह है कि इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों ने किताब तक पहुंचना और आसान बना दिया है। जोआन गैंज कूनी सेंटर की इस साल की शुरुआत में जारी एक रिपोर्ट कहती है कि 2 से 10 आयुवर्ग के अधिकतर बच्चों के पास पढ़ने की कोई न कोई इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस है- 55% के पास घर पर बहुउपयोगी टेबलेट है और 29% के पास अपना ई-रीडर (62% की इनमें से किसी एक तक पहुंच) है। घर पर इन उपकरणों में से किसी एक को रखने वाले बच्चों में आधे (49%) इलेक्ट्रॉनिक तरीकों से पढ़ते हैं, या अपने या फिर अपने माता-पिता (30%) के उपकरणों से। किताबें मायने रखती हैं मगर बच्चे उन्हें किस तरह पढ़ते हैं, यह नहीं।

मेरे बच्चे आई-पैड, ई-रीडर और कागज़, सभी तरीकों से किताब पढ़ते हैं। मैं यह सुनिश्चित करता हूं कि वे पढ़ें। मैं हर रात अपने बच्चों के लिए पढ़ता हूं। मैं दिन में भी उनके साथ पढ़ता हूं। मैं यह इसलिए करता हूं क्योंकि मैं इसे उनकी शिक्षा का महत्वपूर्ण अंग समझता हूं। मैं अपने बच्चों की परवरिश को यूं ही किसी विशेषज्ञ को आउटसोर्स नहीं कर सकता। और फिर यह रोना नहीं रो सकता कि ये टीचर नाकामयाब हैं। मेरे लिए यह बात बिलकुल स्पष्ट है कि बच्चों की पढ़ाई में माता-पिता की भूमिका ज़रूरी है। उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके बच्चे किताबें पढ़ लेते हैं।

बेशक किताब बनाम डिजिटल जैसी खबरें गढ़ना बहुत आसान है। इससे हमें अपने बच्चों के साथ जुटने से बचने का बहाना मिल जाता है। हम खुद को दोष देने के बजाय वीडिओ गेम्स या ऐप्स को कोसने लगते हैं। बच्चों को विवेकवान, संवेदनशील और खुले दिमाग वाले वयस्क के रूप में तैयार करने की ज़िम्मेदारी माता-पिता को लेनी होती है। किताबें शिक्षा का अहम् हिस्सा हैं, लेकिन अगर हम अपने जीवन से सारे के सारे डिजिटल उपकरण हटा दें तो भी बच्चे किताबें नहीं पढ़ेंगे, जब तक कि हम उन्हें यह अहसास न करा दें कि वयस्क बनने के लिए किताबें पढ़ना कितना ज़रूरी है।

अपने बच्चों को पढ़ने के लिए शिक्षित करें। और उन्हें शिक्षित करें कि जो कुछ वे पढ़ते हैं उससे फर्क पड़ता है। रेनेसां लर्निंग की वार्षिक रिपोर्ट ‘बच्चे क्या पढ़ रहे हैं’ विस्तार से बताती है कि बच्चे आजकल क्या-क्या पढ़ रहे हैं और उनमें सबकुछ अच्छा नहीं है। यह भारी-भरकम अध्ययन किताबों की बिक्री या लाइब्रेरी के आंकड़े पेश नहीं करता। यह अमेरिका के 98 लाख छात्रों द्वारा  पढ़ी गयी 31.8 करोड़ किताबों के आंकड़ों का अध्ययन है ताकि यह पता लगाया जा सके कि साल में कौन सी किताबें बच्चों के बीच सबसे लोकप्रिय रहीं। यह अमेरिका की सबसे विस्तृत रिपोर्ट है जो कक्षा 12  तक के बच्चों की पढ़ने की आदतों का खुलासा करती है।

तीन दिलचस्प निष्कर्ष-

  1. लैंगिक रुझान की पढ़ाई पहली कक्षा से ही शुरू हो जाती है।बुनियादी कक्षाओं के लड़के कैप्टन अंडरपेंट्स’ के ढेर के ढेर पढ़ जाते हैं लेकिन ये किताबें लड़कियों की पसंद की शीर्ष 20 में भी जगह नहीं बना पातीं। हमें इन आंकड़ों के आधार पर यह समझाया जाता है कि लड़के और लड़कियों की प्राथमिकताएं, रुचियां और रुझान अलग-अलग तरह का होता है। मैं इस बात पर यकीन नहीं करता। इसके विपरीत हम इन आकड़ों को इस बात के सबूत के तौर पर भी ले सकते हैं कि हम लैंगिक आधार पर बांटी गई ऐसी दुनिया बनाते जा रहे हैं जहां भूमिकाएं व बौद्धिक अपेक्षाएं जैविक प्रजनन अंगों के आधार पर विभाजित हैं। अगर आप यही चाहते हैं तो येन केन प्रकारेण इसे जारी रखिये। अगर नहीं, ऐसी किताबों की कमी नहीं जिनमें लैंगिकता नहीं है; अपने बच्चों को जानने दीजिये कि आप इन सब से ऊपर सोच सकते हैं।
  2. मिडिल स्कूल (खासकर कक्षा 6 के बच्चे) सबसे ज्यादा पढ़ते हैं।प्रति छात्र पढ़ी गयी औसत शब्द संख्या मिडिल स्कूल के दौरान बढ़ती है मगर हाईस्कूल आते-आते यह फिर से घटने लगती है। मैं इसे इस बात के प्रमाण के तौर पर समझता हूं कि माता-पिता अपने बच्चों को किताबों के बारे में गलत सन्देश दे रहे हैं। हम साक्षरता को भाव देते हैं और छोटे बच्चों के जल्द से जल्द पढ़ना सीख लेने पर खुश होते हैं। लेकिन यही बच्चे जब किशोर हो जाते हैं तब वे सीधे अपने बड़ों की आदतों का अनुसरण करने लगते हैं। अगर बड़े पढ़ते हुए नहीं दिखाई देते तो वे भी न पढ़ने को बड़े होने का गुण मान बैठते हैं।
  3. ट्वीलाईट और हंगर गेम्सक्लासिकी साहित्य की तुलना में ज्यादा लोकप्रिय हैं। आजकल शिक्षक शेक्सपियर या डॉन क्विक्जोट की जगह इन किताबों को तरजीह देते हैं। ज्यादातर की दलील होती है कि हर तरह पाठ अच्छा होता है और ये किताबें छात्रों को ज्यादा आकर्षित करती हैं। एक ओर से देखने पर यह सही लगता है, लेकिन दूसरी ओर हमें याद रखना चाहिए कि इन लोकप्रिय किताबों के लिए कथ्य के बजाय बिक्री ज्यादा अहमियत रखती है। वे मूलतः पैसा कमाने के लिए लिखी गयी हैं और मानव परिस्थितियों का साहित्यिक अन्वेषण उनकी प्राथमिकताओं में सबसे आखि‍र में है। मेरा यह मतलब नहीं कि लोकप्रिय कहानियां बुरी होती हैं, लेकिन इस बात में भी दम है कि ऐसी किताबें अपने युग की आर्थिक, राजनीतिक और ज्ञानशास्त्रीय प्रवृत्तियों के पार नहीं देख पातीं।

और आखिरकार हमारे बच्चे कैसे पढ़ते हैं और क्या पढ़ते हैं, इस बात से किताबों के बारे में बच्चों के बजाय बड़ों के नज़रिए का ज्यादा पता चलता है। आप अपने बच्चों को जैसा देखना चाहते हैं, पहले व्यवहार और तौर-तरीकों से वैसा आदर्श तो पेश कीजिये।

जार्डन सैपाइरो शिक्षक, लेखक और संपादक हैं.

(हिंदी अनुवाद: आशुतोष उपाध्याय)

इसे हमें स्कूल कहना पड़ता है : अरविंद गुप्ता

अरवि‍ंद गुप्‍ता

अरवि‍ंद गुप्‍ता

यह एक गज़ब के निराले स्कूल की कहानी है, जो सत्तर दशक की शुरुआत में कई साल तक मौज़ूद था। अमेरिका के सबसे चर्चित शिक्षाविद जॉन होल्ट ने अपनी एक किताब में इस स्कूल का बड़ा ही सजीव वर्णन किया है। एमआईटी के एलन फल्बेल इस वर्णन से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने इस स्कूल में एक साल बिताकर इसके ऊपर पीएच.डी. थीसिस लिख डाली। फिल्मकार पेगी हग्स यहां दो साल रहे और उन्होंने स्कूल पर ‘वी हैव टू कॉल इट अ स्कूल’ नाम से फिल्म बनाई।

फिल्म की शुरुआत में यहां का एक शिक्षक कहता है, ‘चूंकि बच्चों को स्कूल जाना ही पड़ता है और इसलिए हम अगर इसे स्कूल नहीं कहेंगे तो शायद वे यहां नहीं आएंगे।’ लेकिन सिवाय इस बात के कि स्कूल टाइम में बच्चे यहां रहते हैं, यह किसी भी कोण से स्कूल जैसा नहीं है। यहां कुछ भी ‘पढ़ाया’ नहीं जाता। यह एक ऐसी जगह है जहां कोई 85 बच्चे और कुछ बड़े अपने-अपने फितूर में मशगूल रहते हैं। बड़े लोग पारंपरिक अर्थों में शिक्षक नहीं है। न ही किसी के भी पास बी.एड. या इसी तरह की अन्य शिक्षण डिग्री है। लेकिन इस चौड़ी-चकली दुनिया में सालों तक काम करने के बाद उनके पास तरह-तरह के हुनरों का ऐसा खजाना है, जिन्हें बच्चे बेइंतहा पसंद करते हैं।

लिटिल न्यू स्कूल नाम का यह स्कूल डेनमार्क के कोपेनहेगन शहर में 1970 दशक के शुरूआती वर्षों में खुला था। डेनिश सरकार अभिभावकों द्वारा चलाये जाने वाले स्कूलों के 85 फ़ीसदी खर्चों को उठाने के लिए जानी जाती है। स्कूल चलाने वाले अभिभावकों को मात्र 15% खर्चा इकट्ठा करना पड़ता है। इस रियायत से यहां कई प्रयोगात्मक स्कूलों को फलने-फूलने का मौका मिलता है। इस स्कूल को शुरू करने वालों ने इससे पहले इसी तरह के कुछ अन्य स्कूलों में पढ़ाया था। इन स्कूलों में से कई बाद में बच्चों के ‘परिणामों’ को लेकर इतने संजीदा हो गए कि सामान्य स्कूलों की राह पर चल निकले। इस बदलाव से निराश चन्द लोगों ने बच्चों के लिए फिर से एक नई जगह बनाने का फैसला लिया।

यह स्कूल एक औद्योगिक इलाके में है और इसके पास कुल मिलाकर एक बड़ा हॉल व दो छोटे कमरे हैं। स्कूल में कोई पाठ्यपुस्तक या पाठ्यक्रम नहीं पढ़ाया जाता। यहां न कोई घंटी बजती है, न पीरियड लगते हैं। न होमवर्क होता है न ही क्लास वर्क। जाहिर है यहां इम्तहान, टेस्ट, जांच या ग्रेड जैसे चीज़ें भी नहीं हैं। बेशक कई दिलचस्प किताबें यहां हैं और एक वर्कशॉप व जिम्नेजियम भी हैं, जहां बच्चे अपने हाथों से कई तरह की चीज़ें बना सकते हैं।

स्कूल के पास किसी भी तरह का विज्ञान सम्बन्धी कोई भारी-भरकम उपकरण नहीं है और न ही यह इस तरह की चीज़ें खरीदना चाहता है। तो यहां बच्चे दिन-भर करते क्या हैं? वे संगीत से शुरुआत करते हैं। कुछ शिक्षक पेशेवर संगीतकार हैं और वे संगीत के प्रति उनके प्रेम को बच्चों के साथ बांटते हैं। सुबह-सुबह करीब घंटे भर तक बच्चे संगीत की स्वर-लहरियों में डूबते-उतराते हैं। उनकी गतिविधियां अत्यंत सहज और लयदार होती हैं।

स्कूल में किताबों का छोटा सा किन्तु शानदार संग्रह है। वर्कशॉप में बढईगीरी के साधारण औज़ार तथा गर्म करने व धातुकर्म के कुछ उपकरण मौज़ूद हैं। इनके पास धातुओं को काटने और जोड़ने के लिए ऑक्सीएसीटिलीन सिलिंडर और एक टॉर्च भी है। साइंस और गणित की कई गुत्थियां यहां हैं, लेकिन गणित की प्रयोगशाला नहीं है। इसी तरह अमेरिका और ब्रिटेन के स्कूलों में ज़रूरी समझा जाने वाला नफील्ड जैसा जाना-माना गतिविधि आधारित साइंस प्रोग्राम भी ये नहीं चलाते। चित्रकारी के लिए अलग से कोई कमरा इनके पास नहीं है, लेकिन चित्रकारी में बच्चों की महारत के प्रमाण यहां-वहां देखे जा सकते हैं। यहां दो हथकरघे और एक सिलाई मशीन भी है। यहां एक मछलियों का तालाब है, जिसमें कोई बच्चा चाहे तो पूरा दिन सुनहरी मछलियों को निहारते हुए बिता सकता है। संगीत कक्षा में एक पियानो, कुछ गिटार और एक शिक्षक का बनाया हुआ बेस फिडल व कुछ ड्रम हैं।

स्कूल बहुत साधन संपन्न नहीं है। किसी भी परम्‍परागत स्कूल में पाए जाने वाले सामान की तुलना में यहां आपको कुछ कम भी चीज़ें दिखाई देंगी। लेकिन जो कुछ भी है, वह बच्चों के इस्तेमाल के लिए है। किताब या किसी सामान को हासिल करने के लिए उन्हें किसी कर्मकांड से होकर नहीं गुज़रना पड़ता है।

स्कूल में सामान की कमी का एकमात्र कारण यही है कि स्कूल की सामर्थ्य खरीद पाने की नहीं है। मगर बच्चे दूसरी संस्थाओं से ज़रूरी सामान उधार लेने के माममें में पूरी तरह समर्थ हैं।

(अनुवाद: आशुतोष उपाध्याय)​

कछुए के कान : आशुतोष उपाध्‍याय

Ashutosh Upadhyayहमारे मोहल्ले में इस बार स्वतंत्रता दिवस के मौके पर मंचन के लिए बच्चों ने मुझसे नाटक की मांग की। कुछ मिला नहीं तो मैंने उर्दू के मशहूर व्यंग्यकार इब्ने इंशा द्वारा किये गए पंचतंत्र की कहानियों के पाठांतर पर हाथ आजमाने का प्रयास किया। खरगोश और कछुए की दौड़ की जानी-पहचानी कहानी का विरूपित संस्करण ‘कछुए के कान’ नाम से नाटक के रूप में पेश है। इस बच्चों के साथ किया जा सकता है। अगर आप इसका मंचन अपने साइंस सेंटर या किसी स्कूल में करते हैं तो अनुभव साझा करना न भूलें।– लेखक

दृश्य 1

मंच पर दो सूत्रधार प्रवेश करते हैंएक के हाथ में डफली है और दूसरा बाजा बजा रहा है

सूत्रधार-1 :    (डफली बजाते हुए) सुनो-सुनो-सुनो… बच्चा लोग सुनो और बड़ा लोग सुनो… आधे लोग सुनो और पूरे लोग सुनो… इधर से सुना अब उधर से सुनो…

सूत्रधार-2     : (शत्रुध्न सिन्हा की तरह) खामोश..! आपको सुनाते हैं एक कहानी! जिसे सुनाती थी हमारी नानी!!

लेकिन माफ करना भाइयो और बहनो, हमने की है थोड़ी मनमानी!!

सूत्रधार-1 :    ये है कछुए और खरगोश की कहानी… बड़ी पुरानी.. मगर जानी-पहचानी!

लेकिन आपने जो सुनी वो नकली थी… हम जो सुनाएंगे वो असली है.. 100% देसी घी जितनी!!

सूत्रधार-2 :    बड़ी पुरानी बात है। बहुत-बहुत पुरानी…. जब धरती में इंसान का राज नहीं था।

सूत्रधार-1 :    इंसान भी बाकी जानवरों के साथ जंगल में रहता था।

सूत्रधार-2 :    यह कहानी हमारे परदादा के परदादा के परदादा परदादा…

सूत्रधार-1 :    इतने परदादा कि बोलते-बोलते सुबह हो जाय… तो उस परदादा ने अपने परदादा से सुनी थी।

सूत्रधार-2 :    और उसके पहले जाने कितने परदादाओं ने सुनी और सुनाई थी।

दर्शक    : अबे कहानी सुनाओगे या परदादाओं का हिसाब-किताब करते रहोगे?

दोनों सूत्रधार :  खामोश….! (मुस्कराकर) सुनाते हैं भाई, सुनाते हैं।

सूत्रधार-1 :    एक जंगल में दो दोस्त रहते थे। पहला खरगोश और दूसरा कछुआ। आपको तो पता ही है?

सूत्रधार-2 :    दोनों में एक बार रेस हुई। दौड़ाक खरगोश काफी आगे निकल गया। कछुए की चाल देख उसने सोचा क्यों न थोड़ा सुस्ता लूं। और जब वह रास्ते में बैठा तो उसे नींद आ गई। वैसे आप इस किस्से को जानते ही हैं!

सूत्रधार-1 :    कछुआ धीरे-धीरे लगातार चलता रहा। रास्ते में उसने खरगोश को सोते हुए देखा। मगर उसे उठाया नहीं, बस चुपचाप चलता रहा और आखिर में रेस जीत गया। आप कहोगे ये कहानी तो सुनी-सुनाई है। नहीं जनाब हमारी कहानी तो अब शुरू होती है।

सूत्रधार-2 :    दौड़ में हार जाने से खरगोशों की इज्ज़त पर दाग़ लग गया। उनके बच्चे इस दाग़ को धोने के सपने देखते थे। फिर बच्चों के बच्चों ने यह सपना देखा। आखिर वह दिन आया, जब खरगोशों को इस दाग़ से छुटकारा मिल गया।

दृश्य 2

मंच में एक खरगोश और एक कछुआ अलसाए से बैठे हुए हैं उनके चेहरे पर बोरियत छाई हुई है

खरगोश : कच्छप दादा, कुछ मजा नहीं आ रहा। अजी बोर हो रहे हैं। चल कोई गेम खेलते हैं।

कुछ टैम कटे, कुछ बोझ घटे। कड़वी यादों से कुछ ध्यान हटे।

कछुआ   :    देखो हमको फिर से दौड़ने को मत बोलना। भूल तो नहीं गए? हमारे दादाजी, तुम्हारे दादाजी को हराए थे! बोलो हराए कि नहीं? तुम खरगोश दौड़ते तेज हो मगर हम कछुओं की खोपड़ी ज्यादा तेज दौड़ती है।

खरगोश : ठीक है ठीक है। ज्यादा स्याणा मत बन। बड़ा आया टोकड़िया में खोपड़िया देने वाला! एक बार फिर क्यों नहीं दौड़ लेता? मिल्क का मिल्क और वाटर का वाटर हो जाएगा।

कछुआ  : लगता है अपनी बेजती खराब किए बिना मानोगे नहीं। चलो दौड़ लेते हैं.. मगर इस बार शरत लगानी पड़ेगी।

खरगोश :    कैसी शर्त?

कछुआ   :    जो जीतेगा, वो हारने वाले के कान काट लेगा। (अपने आप सेइस बार हम इसके लंबेलंबे कान अपनी बैठक में सजाएंगे बेटा ऐसी सुस्ती फैलाएंगे कि जन्नत में बैठे तुम्हारे दादाजी भी खर्राटे लेने लगेंगे)

खरगोश : मंज़ूर है। (अपने आप सेकछुए के बच्चे! तेरे कान तो गए इस बार मैं नींद उड़ाने वाली बूटी खाकर दौडूंगा!).

दृश्य 3

खरगोश और कछुआ दौड़ की लाइन पर खड़े हैं एक आदमी उन्हें दौड़ाने की तैयारी कर रहा है

आदमी के हाथ में एक बड़ा सा चाकू है

आदमी   :    भाइयो और बहनो! आपको यह जानकार खुशी होगी, आपके जंगल में, खरगोश और कछुए की मशहूर दौड़, फिर से होने जा रही है। वही दौड़ जिसके किस्से आपने बचपन में सुने थे। लेकिन अबकी बार, इस दौड़ में एक शर्त जोड़ दी गई है। जो जीतेगा, वो हारने वाले के कान काट कर अपने घर ले जाएगा।

तो श्रीमान खरगोश और कछुआ… अपनी-अपनी जगह पर पहुंचो। और दौड़ने के लिए तैयार हो जाओ.. ओके?

रेडी… वन… टू… थ्री… गो…!

दोनों दौड़ते हैं लेकिन इस बार खरगोश बिना पीछे देखे दौड़ता रहता है और जल्दी ही मंज़िल पर पहुंच जाता है

मंज़िल पर आदमी दोनों का इंतज़ार कर रहा है

खरगोश : हुर्रे! इंसान चाचा, मैं जीत गया। मैंने खरगोशों का इतिहास बदल दिया। आप अपना चाकू तेज कर लो, कछुआ आता ही होगा। उसके कान लक्कड़ में टांगकर अपनी बैठक में सजाऊंगा।

आदमी और खरगोश कछुए की राह देखते हैं लेकिन उसका दूरदूर तक पता नहीं है दोनों थककर सो जाते हैं

दृश्य 4

मंज़िल पर एक नया आदमी और खरगोश बैठे हैं तभी दूर से कछुआ आता दिखाई पड़ता है

दोनों चौकन्ने हो जाते हैं

कछुआ   :    (बूढ़ों की आवाज में) अरे बच्चो, सुनो तो… तुमने एक आदमी या खरगोश को यहां देखा था?

दोनों     : अंधे हो क्या? क्या हम आदमी और खरगोश नहीं लगते?

कछुआ   :    माफ करना! हम आप दोनों की बात नहीं कर रहे। वे दोनों हमारे पुराने दोस्त हैं।

आदमी  : कछुआ अंकल, वो तो हमारे दादाजी थे। आपका इन्तजार करते-करते दोनों मर गए।

खरगोश :    उनके मरने की बाद हमारे डैडी यहां बैठे-बैठे बुढ़ा गए।

आदमी : मरते वक्त उन्होंने हम दोनों को यहां बिठाया और कहा कि कछुआ आए तो उसके कान काट लेना।

खरगोश : हम यहां तुम्हारे कान काटने के लिए बैठे हैं। लाओ अपने कान बाहर निकालो।

कछुआ   :    अरे नहीं! हम अपने कान नहीं कटवाएंगे…!

आदमी आगे बढ़कर कछुए के कान काटने की कोशिश करता है

कछुआ अपने कान छुपाता है और अपने कवच में जा छुपता है

आदमी   :    अरे ये तो अपने कवच में छुप गया। (कछुए की पीठ ठोकता है) सुनो कच्छप महाराज! बाहर निकलो। हम तीन पीढ़ियों से तुम्हारे कानों की राह देख रहे हैं।

खरगोश : जाने दो चाचा, वर्ना इसके इन्तजार में हमारी ज़िंदगी भी यहीं बीत जाएगी।

आदमी सहमति में सर हिलाता है मंच पर सारे पात्र आते हैं कछुआ कवच में छुपा वहीं पड़ा रहता है

सारे पात्र :    अब पता चला कछुए अपने कान क्यों नहीं दिखाते! क्या आपने देखे हैं कछुए के कान?

बच्‍चों का विज्ञान-बोध : विवेक भटनागर

apne bachche ko den vigyan drishti

आमतौर पर विज्ञान के बारे में धारणा है कि यह बड़ा ही कठिन विषय होता है। यह सिर्फ एक भ्रामक धारणा है। जो ज्ञान हमारी जिंदगी से जुड़ा हो, वह कठिन कैसे हो सकता है? उठते-बैठते, खाते-पीते, सोते-जागते यानी हर वक्‍त, हर गतिविधि में हम विज्ञान को ही जीते हैं। विज्ञान के कठिन होने की धारणा बनने के पीछे हमारी शिक्षा पद्धति की भूमिका हो सकती है, जो बच्चों का मनोविज्ञान समझे बिना उसे विज्ञान पढ़ाने की कोशिश करती है। बच्चा शुरू से ही कुछ-न-कुछ सीखना शुरू कर देता है। वह जो कुछ भी देखता है, उसे जानने की कोशिश करता है। उसकी उत्सुकता ही उसका वह ज्ञान-बोध है, जो उसमें प्राकृतिक रूप से मौजूद होता है। बच्चा जैसे-जैसे बढ़ता जाता है, उसके सवाल भी बढ़ते जाते हैं। कुछ का मतलब वह स्वयं समझता है, लेकिन कुछ बातों में जब उसे संशय होता है, तो वह सवाल करता है। इसी में उसके विज्ञान को समझने की दृष्टि छिपी होती है। ऐसे में बच्चे को, उसके सवालों को सुलझाने में अभिभावकों को बड़ी समझदारी से काम लेना होगा, तभी बच्चे की विज्ञान-दृष्टि बन पाएगी। हाल ही में नैन्सी पाउलू और मोर्गेरी मार्टिन की पुस्तक हिंदी में अनूदित होकर आई है- अपने बच्चे को दें विज्ञान दृष्टि। आशुतोष उपाध्याय ने इस पुस्तक का बड़ा ही सरल और सुबोध अनुवाद किया है।

आज के बच्चे अलग हैं। हम कह सकते हैं कि उनमें विज्ञान एवं तकनीक का सहज-ज्ञान इन्बिल्ट होता है। लेकिन हम गलती यह करते हैं कि उन्हें अपने बचपन की तरह ट्रीट करते हैं। पुस्तक में लिखा है- ‘माता-पिता के रूप में हमें अपने बच्चों को एक ऐसी दुनिया के लिए तैयार करना है, जो हमारे अपने बचपन से बिल्कुल अलग है। इकीसवीं सदी में इस देश को ऐसे नागरिकों की जरूरत पड़ेगी, जिन्हें प्राथमिक कक्षाओं में विज्ञान एवं टेक्नोलॉजी का हमसे ज्यादा प्रशिक्षण मिला होगा।’

पुस्तक कहती है कि विज्ञान महज तथ्यों का अंबार नहीं है। तथ्य महज उसका एक हिस्सा हैं। विज्ञान में चार चीजें शामिल हैं। पहली, जो कुछ घट रहा है, उसे गौर से देखना। दूसरा- घटना की वजह का अंदाजा लगाना। तीसरा, अपने अंदाजे को सही या गलत सिद्ध करने के लिए जांच करना। चौथा, जांच में आए परिणाम का मतलब निकालना। पुस्तक में बच्चों के लिए छोटे-छोटे कई प्रयोग दिए गए हैं, जो घर में ही किए जा सकते हैं और जिनसे विज्ञान के बड़े-बड़े सिद्धांतों को समझा जा सकता है। इन प्रयोगों में अभिभावकों को क्‍या करना चाहिए और बच्चों को क्‍या करना चाहिए, विस्तार से बताया गया है। कुल मिलाकर यह पुस्तक बच्चों में विज्ञान-दृष्टि और विज्ञान-बोध को बढ़ाने का बेहद सरल प्रयास है, जिसका स्वागत होना चाहिए।

पुस्‍तक : अपने बच्‍चे को दें विज्ञान दृष्टि
लेखक : नैन्‍सी पाउलू और मार्गेरी मार्टिन
अनुवाद: आशुतोष उपाध्‍याय

मूल्‍य (अजिल्‍द) : 40 रुपये
(सजिल्‍द) : 75 रुपये

प्रकाशक – लेखक मंच प्रकाशन
433 नीतिखंड-3, इंदिरापुरम-201014
गाजियाबाद

ईमेल : anuraglekhak@gmail.com

(दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण, 11 जनवरी 2014 से साभार)

अपने बच्चे को दें विज्ञान दृष्टि : नैन्सी पाउलू

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‘लेखक मंच’ प्रकाशन की चौथी पुस्‍तक ‘अपने बच्चे को दें विज्ञान दृष्टि’ अंग्रेजी पुस्‍तक का अनुवाद है। इसके लेखक नैन्सी पाउलू और मार्गेरी मार्टिन हैं। इसका अनुवाद आशुतोष उपाध्याय ने किया है। बच्‍चों को विज्ञान को लेकर जिज्ञासू बनाने की दिशा में यह महत्‍वपूर्ण पुस्‍तक है। इस पुस्‍तक की भूमिका यहां दी जा रही है-

‘क्यों?’

एक ऐसा सवाल, जिसका जवाब देने का प्रयास हम माता-पिता हमेशा से करते आए हैं। यह अच्छी बात है कि बच्चे सवाल पूछते हैं– सीखने का इससे बढिय़ा कोई और तरीका नहीं हो सकता। सभी बच्चों के पास सीखने के दो आश्चर्यजनक स्रोत होते हैं– कल्पनाशीलता और उत्सुकता। माता-पिता के रूप में आप अपने बच्चे की कल्पनाशीलता व उत्सुकता को बढ़ावा देकर उसे सीखने के आनन्द से सराबोर कर सकते हैं।

‘अपने बच्चे को दें वैज्ञानिक दृष्टि’ विभिन्न शैक्षिक विषयों पर अभिभावकों के लिए लिखी गई पुस्तक शृंखला की एक कड़ी है, ताकि वे बच्चों की सहज उत्सुकता का जवाब दे सकें। शिक्षण और सीखना महज स्कूल की चारदीवारी के भीतर सम्पन्न होने वाली रहस्यमय गतिविधियाँ नहीं हैं। वे तब भी होती हैं, जब माता-पिता और बच्चे बेहद आसान चीजों को साथ-साथ करते हैं।

उदाहरण के लिए–आप और आपका बच्चा सीखने के लिए किस तरह की गतिविधियाँ कर सकते हैं– धुलने वाले कपड़ों के ढेर से मोजों को उनके जोड़ों के हिसाब से छाँटकर गणित और विज्ञान की गुत्थियाँ सुलझा सकते हैं। साथ मिलकर खाना बना सकते हैं, क्योंकि खाना बनाने से गणित और विज्ञान के अलावा अच्छी सेहत की भी सीख मिलती है। एक-दूसरे को कहानियाँ सुना सकते हैं। कहानी सुनाना पढऩे और लिखने का आधार है (इसके अलावा बीते दिनों की कहानियों को ही तो इतिहास कहते हैं)। आप अपने बच्चे के साथ स्टापू खेल सकते हैं। उछल-कूद वाले इन खेलों से बच्चे गिनती सीखते हैं और जीवनपर्यंत अच्छी सेहत का पाठ भी पढ़ते हैं।

बच्चों के साथ मिलकर कुछ करने से आप समझ जाएँगे कि सीखना मनोरंजक और बेहद महत्वपूर्ण क्रियाकलाप है। ऐसा करके आप अपने बच्चे को पढऩे, सीखने और स्कूल में रहने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।

 

पुस्‍तक : अपने बच्‍चे को दें विज्ञान दृष्टि

लेखक : नैन्‍सी पाउलू और मार्गेरी मार्टिन

अनुवाद : आशुतोष उपाध्‍याय

प्रकाशक : लेखक मंच प्रकाशन

433 नीतिखंड-3, इंदिरापुरम

गाजियाबाद-201014

ईमेल : anuraglekhak@gmail.com

मूल्‍य(अजिल्‍द) : 40 रुपये

(सजिल्‍द) : 75  रुपये

गंभीर खतरे में स्कूल : रोहित धनकर

rohit dhankar

राजस्थान सरकार ने हाल ही में 17,000 से ज्यादा स्कूलों को बंद करने का फैसला किया। इसी तरह महाराष्ट्र ने 14,000 और उड़ीसा ने 195 स्कूलों को बच्चों के बेहद कम नामांकन की बिना पर बंद करने का फरमान जारी किया। ये कोई इक्का-दुक्का उदाहरण नहीं हैं, बल्कि सार्वजनिक (सरकारी) शिक्षा व्यवस्था के पतन के स्पष्ट संकेत हैं।

उधर, प्राइवेट स्कूल व्यवस्था के दुर्गुणों को समझने के लिए एक ही उदाहरण काफी होगा। हाल ही में, एक अभिभावक ने अपने बेटे के स्कूल के अध्यापकों के उस रुख के बाबत बताया जो उसकी कमजोरी को लेकर था। विज्ञान, समाज विज्ञान और अंग्रेजी के अध्यापकों ने पिता से बच्चे की कमजोरियों को दुरुस्त करने की मांग की! हैरान-परेशान पिता के सवाल थे, “बच्चे के कक्षाकार्य पूरा न करने या स्कूल में दुर्व्यवहार करने आदि से निपटने की जिम्मेदारी क्या अध्यापक की नहीं है? अगर मेरा बच्चा घर में शैतानी करता है या हमारे कहने पर पढ़ता-लिखता नहीं है तो अभिभावक के बतौर उसे समझाना-बुझाना हमारी जिम्मेदारी है। इसके लिए हम अध्यापक से शिकायत करने नहीं जाते। मगर आजकल अध्यापक हर बात पर माता-पिता से क्यों शिकायत करते हैं?” पिता के मुताबिक, “बच्चे की पढ़ाई-लिखाई के लिए अध्यापक को जिम्मेदार होना चाहिए, जिस प्रकार उसकी कापी-किताब, पेन-पेन्सिल आदि की व्यवस्था के लिए माता-पिता जिम्मेदार हैं।”

यह प्रवृत्ति जो अब तक मझोले और आला दर्जे के प्राइवेट स्कूलों में दिखा करती थी, अब सस्ते निजी स्कूलों में भी जगह बना रही है।

 सरकारी स्कूलों का पतन

सरकारी स्कूल मर रहे हैं, क्योंकि वे काम नहीं करते। इस समस्या की शुरुआत 1950 के दशक के अंतिम वर्षों और 60 के दशक में तब हुई, जब स्कूलों की संख्या में इजाफे के साथ-साथ बुनियादी ढांचे और प्रशिक्षित शिक्षकों की उपलब्धता पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। अधिकतर राज्यों में, शिक्षक बहुत कम पगार पाते थे और स्कूल प्रशासन अक्षम था। राजस्थान जैसे राज्य में बड़ी संख्या में अप्रशिक्षित अध्यापक नियुक्त किये गए। इस सब बातों ने शिक्षा की गुणवत्ता को बुरी तरह प्रभावित किया। शिक्षकों का उत्साह जाता रहा और वे असंतुष्ट हो गए।

कुछ राज्य सरकारों ने 1950 के दशक के बीतते-बीतते स्कूल प्रशासन की जिम्मेदारी पंचायती राज पर डालनी शुरू की। इस कदम से स्कूल में स्थानीय राजनेताओं का दखल बढ़ गया और वे शिक्षकों के तबादलों में हस्तक्षेप करने लगे। इसके अलावा कम सुविधाओं, कम पगार, समय पर पगार देने में कोताही जैसे अनेक कारणों से शिक्षक स्कूलों से गैर-हाजिर रहने लगे। परिणामस्वरूप नए-नए उभर रहे शिक्षक संघों में आत्म-केन्द्रीयता की प्रवृत्ति पैदा होने लगी। स्कूल के कामकाज और शिक्षा की गुणवत्ता पर ध्यान देने की जगह वे अपनी सुविधाओं व फायदों को तरजीह देने लगे। उनके इस रुख के लिए उन्हें शायद ही कोई जिम्मेदार ठहराए।

समस्याओं को गंभीरतापूर्वक सुलझाने के बजाय शिक्षा योजनाकारों व प्रशासकों ने शिक्षा की बढ़ती ज़रूरतों के मद्देनजर फौरी व चालू उपायों को प्राथमिकता दी। कई ऐसे महत्वपूर्ण कारक थे, जिन्होंने इस मानसिकता को तैयार करने में भूमिका निभाई, जैसे- ज्यादा स्कूलों की मांग, धन व अन्य संसाधनों की कमी, वोट की राजनीति का दबाव और सरोकार का अभाव। यह मानसिकता 60 के दशक के बाद लागू किए गए सभी शैक्षिक कार्यक्रमों में देखी जा सकती है- अनौपचारिक शिक्षा, शिक्षा कर्मी, डीपीईपी और सर्व शिक्षा अभियान। प्रत्येक स्तर पर इन कार्यक्रमों की आलोचना हुई और अनेक शिक्षाविदों ने इनकी अवधारणा और नियोजन में मौजूद समस्याओं के बारे में स्पष्ट रूप से आगाह किया। लेकिन इन कार्यक्रमों को कई स्वाभाविक समर्थक भी मिले जिन्होंने इनके पक्ष में तरह-तरह के कुतर्क गढ़ डाले और उन्हें शैक्षिक बदलाव के उदाहरणों के बतौर आगे बढ़ाया।

 स्कूल का विचार

इन कार्यक्रमों के साथ बुनियादी समस्या यह रही कि इन्होंने स्कूल की अवधारणा को कमजोर किया। स्कूल का स्पष्ट उद्देश्य है- सीखना। और सीखने की प्रक्रिया शिक्षक और छात्र, दोनों से तल्लीनता की अपेक्षा करती है। विचारों के सतत एवं सुसंगत अन्वेषण के लिए तथा बौद्धिक श्रम व मानसिक अनुशासन के लिए निर्धारित समय व स्थान चाहिए। यह सब संभव नहीं अगर क्या सीखना है और कैसे सिखाना है, जैसे सवालों के समुचित उत्तर न तलाशे जाएं। इसलिए एक व्यवस्थित स्थान के रूप में स्कूल अपेक्षा करता है कि शिक्षक में बच्चों की बौद्धिक व भावनात्मक ज़रूरतों की पेशेवर समझ और उनके प्रति गहरी संवेदनशीलता तथा शिक्षणशास्त्रीय निर्णय की क्षमता हो। जब इन सब ज़रूरतों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा किया जाता है तो स्कूल का विचार ही विद्रूप हो जाता है। पिछले पांच दशक से शिक्षा व्यवस्था दरअसल यही कुछ कर रही है।

उदाहरण के रूप में, अनौपचारिक शिक्षा परियोजना में करोड़ों रुपये खर्च किये गए और यह योजना पूरे देश में 1960 दशक के अंतिम वर्षों से 1990 दशक की शुरुआत तक चली। इस परियोजना में शिक्षण, शिक्षक प्रशिक्षण और शैक्षिक योजना के पेशेवर ज्ञान के विचार की पूरी तरह उपेक्षा की गयी। इस प्रकार पूरे देश में एक सन्देश फैलाया गया कि कोई भी पढ़ा सकता है। इसने स्कूलों के लिए अलग से समुचित जगह के विचार को दरकिनार कर यह साबित करने की कोशिश की कि शिक्षा के लिए किसी तरह के बुनियादी ढांचे की खास ज़रूरत नहीं है। इसने शिक्षक व छात्र दोनों की बौद्धिक ज़रूरतों की उपेक्षा की। कुल मिलाकर इसने शिक्षा, शिक्षक और स्कूल के विचार का अवमूल्यन किया।

जब तक इस गड़बड़झाले की असफलता का पता चलता, कई अन्वेषक राजस्थान में शिक्षा कर्मी जैसी अन्य पहलकदमियों के साथ हाज़िर हो गए। डीपीईपी कार्यक्रम भी लागू किये जाने के लिए लगभग तैयार था। सर्व शिक्षा अभियान समेत ऐसे तमाम कार्यक्रमों में पेशेवर ज्ञान, बौद्धिक श्रम, बच्चों के प्रति संवेदनशीलता और बुनियादी ढांचे की ज़रूरत जैसी बातों के बीच संतुलन बैठाने की कतई कोशिश नहीं हुई। कभी संवेदनशीलता को शैक्षिक ज्ञान के बरक्स खड़ा किया और कभी शिक्षक की स्कूल में लगातार मदद को उसके शैक्षिक ज्ञान के बरक्स। अच्छी शिक्षा की जरूरतों की स्पष्ट समझ के अभाव तथा पिछली खराब नीतियों का सीधा परिणाम आज स्कूलों के खात्मे के रूप में दिखाई पड़ रहा है।

 बाजार का प्रवेश

इस बीच, शिक्षा की स्थिति से चिंतित अभिभावकों की बेचैनी को भुनाने के लिए निजी क्षेत्र आगे आ गया। आज प्राइवेट स्कूल दिन दूनी-रात चौगुनी रफ़्तार से बढ़ रहे हैं। कुछ विश्लेषक कहते हैं कि जहां सरकारी स्कूल व्यवस्था पतन की ओर अग्रसर है, वहीं प्राइवेट व्यवस्था बेहतर से बेहतरीन होती जा रही है।

यह झूठी धारणा संभवतः जान-बूझकर फैलाई जा रही है। प्राइवेट स्कूल मुनाफे के लिए काम करते हैं; यह तथ्य ही अपने आप में बच्चों के विकास की परवाह करने वाले अच्छे स्कूल की अवधारणा के विपरीत है। एक अच्छा स्कूल वह होता है जहां ज्ञान संजोया जाता है, जहां बुद्धि का विकास होता है, जहां बच्चे के प्रति संवेदनशीलता होती है और जहां आवश्यक संसाधनों की कमी नहीं होती। ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने के लालच में स्कूल मालिक अवधारणाओं की समझ की जगह प्रतियोगिता पर जोर देते हैं। प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों पर जानकारियों को रटने का दबाव होता है- और यह बात समझ का घोर अवमूल्यन करती है। वास्तविक समझ अवधारणात्मक स्पष्टता की मांग करती है। यह एक कठिन प्रक्रिया है और इसमें समय लगता है। प्राइवेट स्कूल स्वभावतः रट्टा आधारित पहली विधि को प्रोत्साहित करते हैं। दूसरे शब्दों में, वे एक अच्छे स्कूल की अपेक्षाओं का अवमूल्यन कर सीखने के मूल विचार को ही दरिद्र बना देते हैं।

इन सब के आगे, प्राइवेट शिक्षा व्यवस्था का सबसे हानिकारक पहलू कुछ और है- प्राइवेट स्कूल बच्चे के नैतिक विकास, समझ के विकास और व्यवहार की जिम्मेदारी नहीं लेना चाहते। उनका आदर्श एक कंसल्टेंट एजेंसी की तरह काम करने का होता है। अगर किसी बच्चे में कोई नैतिक या व्यवहारगत समस्या है तो ये स्कूल अभिभावक से उसे ठीक करवाने को कहेंगे। बच्चे की शैक्षिक कमजोरी के लिए ये प्राइवेट ट्यूशन करवाने की सलाह देंगे। किसी भी स्थिति में ये अपनी बुनियादी शैक्षिक जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं। इस तरह उनकी भूमिका बेहद सीमित हो जाती है, जो ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने के अनुकूल है। ये स्कूल की अवधारणा का ही दिवाला निकाल देते हैं।

सरकारी स्कूलों में बच्चों के न पहुंचने और प्राइवेट स्कूलों में स्कूल की अवधारणा के ही सीमित हो जाने की इस दोहरी बीमारी के कारण स्कूल आज गंभीर खतरे में हैं। एक समाज के बतौर ऐसा प्रतीत होता है हम इस अहसास से बहुत दूर हैं कि सभ्यताएं शिक्षा पर निर्भर होती हैं और शिक्षा की प्राथमिक जगह स्कूल है। अगर स्कूल मरते हैं तो सभ्यताओं का भी पतन होता है। जब तक हम शिक्षा की समझ, नियोजन और कार्यान्वयन में श्रम की जरूरत को मान्यता नहीं देंगे, इस अधोगति को रोक नहीं सकेंगे और हमारे स्कूल या तो बंद हो जायेंगे या कंसल्टेंसी सेवाओं में बदल जायेंगे। उनकी जगह ट्यूशन की दुकानें खुल जायेंगी। बेशक इन स्थितियों को उलटने के लिए सही राजनीतिक और आर्थिक फैसलों की दरकार होगी, पर ये फैसले अगर गहरी शैक्षिक समझ के बिना लिए जाएंगे तो सफल नहीं होंगे।

 (28 अक्टूबर, 2014 को ‘द हिंदू’ में प्रकाशित आलेख, अनुवाद: आशुतोष उपाध्याय)