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विष्णु जी एक : संस्मरण अनेक

नई दिल्ली: कालजयी जीवनी आवारा मसीहा के रचियता विष्णु प्रभाकर की पहली पुण्यतिथि पर 12 अप्रैल को हिंदी भवन और चित्र-कला-संगम के तत्वावधान में विष्णु जी एक : संस्मरण अनेक गोष्ठी का आयोजन किया गया। स्नेही साहित्यकारों ने श्रद्धापूर्वक उन्हें याद किया। गोष्ठी की शुरुआत मणिकुंतला के कबीर पद गायन से हुई।
वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी ने कहा कि विष्णुजी का व्यक्तित्व अभिभूत करने वाला था। वह बड़े साहित्यकार थे और उनका युग भी बड़ा था। विष्णु जी सिद्धांतप्रिय मसिजीवी साहित्यकार थे। उन्होंने कभी अपनी संतानों तक के लिए सिद्धांतों के साथ समझौता नहीं किया, लेकिन अफसोस है कि सात दशकों तक विष्णुजी कहानी लिखते रहे, लेकिन कहानी के इतिहास में उनका नामोल्लेख तक नहीं है।
उन्होंने कहा कि विष्णुजी के साहित्य के प्रकाशन व प्रचार तथा उनकी जन्मशती मनाने के लिए कुछ उपक्रम होना चाहिए। हिंदी भवन के मंत्री डॉ. गोविंद व्यास ने कहा कि हिंदी भवन जैनेंद्र कुमार, रामकुमार वर्मा, सुभद्राकुमारी चौहान, रामधारी सिंह दिनकर तथा हरिवंश राय बच्चन की जन्मशती राष्ट्रीय स्तर पर मना चुका है। उन्होंने घोषणा की कि विष्णुजी की जन्मशती भी हिंदी भवन राष्ट्रीय स्तर पर धूमधाम से मनाएगा। विष्णुजी के ज्येष्ठ पुत्र अतुल प्रभाकर ने बताया कि विष्णु प्रभाकर की स्मृति-रक्षा के लिए एक न्यास का गठन किया जा चुका है।
कथाकार हिमांशु जोशी ने कहा कि विष्णुजी अपनी पीढ़ी के अंतिम साहित्यकार थे। उनमें जरा भी दिखावा नहीं था। वह अपने पर लगे आपेक्षों का कभी जवाब नहीं देते थे। सुपरिचित आलोचक राजकुमार सैनी ने कहा कि विष्णुजी ने काफी हाउस को एक विश्वविद्यालय बनाया, जिसमें हम जैसे उनके छात्र थे। विष्णु जी लोकतांत्रिक संस्कृति के संवाहक थे।
वरिष्ठ पत्रकार रामशरण जोशी ने कहा कि विष्णुजी से मेरी पहली मुलाकात कोलकाता में तब हुई, जब वह आवारा मसीहा के लिए शरच्चंद्र पर शोध-सामग्री के संकलन के सिलसिले में आए थे। जब विष्णुजी ने 75 वर्ष पूरे किए तो मैंने उनका साक्षात्कार सशर्त लिया था। मैंने शर्त रखी कि मैं साक्षात्कार दो हिस्सों में लूंगा। पहला साक्षात्कार आपके अजमेरी गेट स्थित कुण्डेवालान घर पर और दूसरा कनॉट प्लसे के कॉफी हाउस में। विष्णुजी ने मेरी शर्त को स्वीकार करते हुए लंबा साक्षात्कार दिया। विष्णुजी यथास्थितिवादी नहीं, मानवतावादी थे। उनके चरित्र में कहीं भी दोहरापन नहीं था।
संत साहित्य के मर्मज्ञ डॉ. बलदेव वंशी ने कहा कि विष्णुजी की वैष्णवता उनके साहित्य के माध्यम से हमारी विरासत बन चुकी है। विष्णुजी ने साहित्य कमाया, जीवन कमाया और मृत्यु भी कमाई। उन्होंने संतों का सा जीवन जिया। खुद ठगे गए, लेकिन कभी किसी को नहीं ठगा। युवा कथाकार-पत्रकार महेश दर्पण ने कहा कि विष्णुजी के पास कृत्रिमता का अहसास नहीं होता था। वह दिल्ली के होकर भी दिल्ली के नहीं लगते थे। वह स्वयं को पूर्णत: गांधीवादी नहीं मानते थे।
सुपरिचति व्यंग्यकार प्रदीप पंत ने कहा कि विष्णुजी विरोधाभासों के सामंजस्य थे। हंसराज रहबर, भीष्म साहनी से वैचारिक भिन्नता होते हुए भी विष्णुजी की उनसे खूब पटती थी। विष्णुजी ने गांधीवाद को अपने निजी जीवन में उतारा था।
विष्णुजी की पुत्री अनीता ने कहा कि सबसे बड़ी पुत्री होने के नाते मुझे पिताजी का सबसे अधिक स्नेह मिला। जब मैं कॉलेज जाती थी तो मुझे वह दस रुपये जबखर्ची दिया करते थे और खुद भी अपना जेबखर्च दस रुपये में चलाते थे। उनके साथ दक्षिण भारत की यात्रा अविस्मरणीय है। विष्णुजी अपने चार गुरु मानते थे- मां, मामा, बड़े भाई और पत्नी को।
ेगोष्ठी का संचालन डॉ. हरीश नवल ने किया। उन्होंने कहा कि अस्वस्थ्य होते हुए भी विष्णु जी मेरी बेटी की शादी में आए और बहुत देर तक रहे। जब तक वह रहे, तब तक स्नेहीजनों से घिरे रहे।
गोष्ठी में वीरेंद्र प्रभाकर, महेशचन्द्र शर्मा, हरिनारायण, रामकुमार कृषक, हरि बर्मन, संतोष माटा, सविता चड्ढा, रामकिशोर द्विवेदी, डॉ. धर्मवीर, डॉ. रवि शर्मा, भगवान सिंह, राजेंद्र नटखट आदि उपस्थित रहे।

साहित्य अकादेमी का कारपोरेटाइजेशन

केंद्रीय साहित्य अकादेमी और कोरिया की मल्टीनेशनल कंपनी सैंमसंग इंडिया के बीच हुई जुगलबंदी से लेखकों में आक्रोश है। अकादेमी साहित्य का गठन 12 मार्च, 1954 को भारत सरकार द्वारा किया गया था। इसका उद्देश्य भारतीय भाषाओं और भारत में होनेवाली साहित्यिक गतिविधियों का पोषण और समन्वय करना है। अकादेमी के इतिहास में पहली बार कोई मल्टीनेशनल कंपनी पुरस्कार प्रायोजित कर रही है। सैंमसंग इंडिया ने आठवीं अनुसूची में शामिल सभी भाषाओं को पुरस्कार देने की घोषणा की है। प्रत्येक वर्ष आठ भारतीय भाषाओं को चुना जाएगा। इस तरह से प्रत्येक भाषा का तीन साल बाद नंबर आएगा। इस वर्ष बांग्ला, गुजराती, हिंदी, कन्नड़, कश्मीरी, पंजाबी, तेलुगु और बोडो भाषाओं के लेखकों को सम्मानित किया जा रहा है। पुरस्कार कोरियाकी प्रथम महिला द्वारा पंच सितारा होटल ओबेराय में 25 जनवरी को दिया जाएगा। यह पुरस्कार गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की स्मृति में दिया जा रहा है। आयोजन साहित्य अकादेमी के बैनर के नीचे हो रहा है, यही विवाद की जड़ है। कई लेखकों ने समारोह के बहिष्कार का मन बना लिया है। उन्होंने इसकी घोषणा भी कर दी है। इनमें साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्राप्त लेखक भी हैं। सुप्रसद्धि साहित्यकार नामवर सिंह, कृष्णा सोबती, मैनेजर पांडेय, मुरली मनोहर प्रसाद सिंह और विश्वनाथ त्रिपाठी आदि इस पुरस्कार का विरोध कर चुके हैं। Read more