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अनुप्रिया की बाल कवि‍ताएं

anupriya-picबचपन

बचपन कच्ची पगडण्डी
मानो उड़ती धूल
घने अँधेरे जंगल में
ये उजास के फूल

बादल काला दौड़  लगाये
आसमान के पार
ताक -झाँक के  देख रहा है
धरती  का संसार

नए परिंदे ढूँढ़ रहे  हैं
असमानी वो रंग
छोड़ कहाँ  आये वो सपने
जाने किसके संग

नन्हे-मुन्ने बना रहे हैं
एक नयी पहचान
फ़ैल रही है हर  होठों पर
मीठी सी  मुस्कान।

एक कहानी प्यारी

सोच रहा हूँ लिख ही  डालूं
एक कहानी प्यारी
होंगे  उसमे भालू ,बन्दर
और गोरैया न्यारी

एक छोटा बागीचा होगा
होंगे उसमें फूल
मीठे फल और सुन्दर तितली
अरे! गया मैं भूल

एक नदी बहती होगी
और होगा उसमें  पानी
नन्हें बन्दर करते होंगे
फिर कोई शैतानी

भालू और गोरैया की
होगी पक्की यारी
भेदभाव ये नहीं जानते
ना ही दुनियादारी

गर्मी के दिन

ऊँघ रहा है सूरज ओढ़े
नीला आसमान
तितली के होठों पर आयी
मीठी सी मुस्कान

करे  ठिठोली  बादल प्यारा
हवा झूमकर गाए
कानाफूसी करे परिन्दे
गर्मी के दिन आये

घर की हर मुंडेर पर
लगी धूप सुस्ताने
धमाचौकड़ी करने बच्चे
ढूँढे़ नए ठिकाने

अरे  गिलहरी भागी देखो
कौवे करते शोर
जाग गए हैं सपने सारे
गर्मी की एक भोर।

हो गयी अब तो भोर

ब से बन्दर चढ़ा डाल पर
क से कोयल गाए
भ से भालू रहा देखता
म से मछली खाए

च से चमचा लेकर भागी
ग से गुड़िया रानी
घ से घोड़ा रहा हाँफता
दे दो  प से पानी

फ से सुन्दर फूल खिले
त से तितली मुस्काये
छ से छतरी पीली लेकर
ल से लड़की जाए

ख से खरहा झट से दौड़ा
ज से जंगल की ओर
न से नींद से जागो तुम सब
हो गयी अब तो भोर।

बरखा रानी

बरखा रानी अब तो आओ
गर्मी बहुत सताए
सबका अब है हाल बुरा
ये पल -पल बढती जाए

आकर अपनी रिमझिम बूंदें
हम पर तुम बरसाओ
काले बादल के कंधे पर
चढ़कर बस आ जाओ

झुलस रहे हैं पंछी ,पेड़
है उदास जग सारा
अपने हाथों से इनमे
भर दो जीवन दोबारा …..

बचपन

ढूँढा बहुत सलोना बचपन
लगता खेल खिलौना बचपन
सख्त हुई इस दुनिया में है
नरम -नरम बिछौना बचपन
उम्मीदों की पगडंडी पर
पीछे -पीछे छौना बचपन
घर की दीवारों के भीतर
प्यारा सा हर कोना  बचपन
मेरे -तेरे सबके भीतर
थोड़ा सा तो हो ना बन
कंप्यूटर की इस नगरी में
है पत्ते का  दोना  बचपन

बादल प्यारे

बादल प्यारे आसमान के
क्या तुम भी सुस्ताते हो
पंख नहीं है लेकिन फिर भी
कैसे तुम उड़ जाते हो

कोई परिंदा आकर तुमसे
करता भी है बात
या फिर यूँ ही अकेले ही
कट जाती है रात

काले बादल कहो जरा
है भीतर कितना पानी
तुम भी नटखट मेरे जैसे
करते हो शैतानी

डाँट  तुम्हें भी पड़ती क्या
अपनी अम्मा से बोलो
हम तो हैं अब दोस्त बने
मुझसे तो राज ये खोलो

सच कहता हूँ अम्मा

जब भी देखूं मुझको यह

संसार नया लगता है
सच कहता हूँ अम्मा ये
हर बार नया लगता है

रोज नया लगता है सूरज
और रात भी नयी-नयी
रोज चमकते तारों का
अंबार नया लगता है
सच कहता हूँ अम्मा ये
संसार नया लगता है

लगती नयी किताबें अपनी
जूते  और जुराबें अपनी
लगता है स्कूल नया
हर यार नया लगता है
सच कहता हूँ अम्मा ये
संसार नया लगता है

पापा की मुस्कान नयी
और दीदी का झुंझलाना
दादा -दादी का मीठा
दुलार नया लगता है
सच कहता हूँ अम्मा ये
संसार नया लगता है

अनुप्रि‍या की बाल कवि‍तायें

अनुप्रि‍या

अनुप्रि‍या

सुपौल, बिहार में जन्‍मीं अनुप्रि‍या की बाल कवि‍तायें नंदन, स्नेह, बाल भारती, जनसत्ता, नन्हे सम्राट, जनसंदेह टाइम्स, नेशनल दुनिया, बाल भास्कर, साहित्य अमृत, बाल वाटिका, द्वीप लहरी, बाल बिगुल आदि‍ पत्र-पत्रि‍काओं में प्रकाशि‍त हो चुकी हैं। उनकी चार बाल कवि‍तायें-

मुस्कान पुरानी

होठों पर आ जाये फिर से
वो मुस्कान पुरानी
भीगा मन बहता जाए
वो बचपन की  शैतानी

पगडंडी की दौड़ हो
या छुक-छुक वो रेल
झगड़ा छोटी बात पर
मीठी-मीठी   मेल

झूला आम की डाल का
नीम की ठंडी छाँव
नटखट सी  नादानियाँ
अपनेपन सा गाँव

कच्चे-पक्के  बेर की
खट्टी -मीठी चाह
थाम के वो परछाईयाँ
चल दूँ फिर उस राह।

नींद

चँदा बादल संग खेलता
शोर मचाते तारे
तू भी सो जा कहती मम्मा
सो गए अब तो सारे

आसमान ने ओढ़ लिया है
काला सा क्यूँ रंग
नींद बाँटती सबको देखो
सपने रंग-बिरंग

ऊँघ रहे हैं परदे-खिड़की
तकिया और रजाई
सोने चला मैं भी अब तो
नींद मुझे भी आई।

जन्मदिन

आजा चंदा तू  संग मेरे
खा ले हलवा पूरी
करनी है तुमसे मुझको
बातें बहुत जरूरी

पापा लाए कई किताबें
मम्मी गुड़िया प्यारी
और भैया ने जन्मदिन की
कर ली हर तैयारी

आकर देखो जरा यहाँ
है कितना हंगामा
अब न देर करो तुम बस
आ जाओ न मामा।

किस्सा

मुनिया सुना रही है किस्सा
मुन्ना सुनता ध्यान से
एक कबूतर उड़कर आया
बनिए की दुकान से

उसके पंजे में था थैला
और थैले में दाने
रखकर थैला भूल गया वो
किसके घर में जाने

चल मम्मी से लेकर चावल
उसको दे दें थोड़े
हाथ पकड़ कर एक दूजे का
मुनिया मुन्ना  दौड़े।