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फिर क्या हुआ: अनवर सुहैल

अनवर सुहैल

लोग मुझसे अक्सर पूछते हैं कि फिर सनूबर का क्या हुआ…

आपने उपन्यास लिखा और उसमें यूनुस को तो भरपूर जीवन दिया। यूनुस के अलावा सारे पात्रों के साथ भी कमोबेश न्याय किया। उनके जीवन संघर्ष को बखूबी दिखाया, लेकिन उस खूबसूरत प्यारी सी किशोरी सनूबर के किस्से को अधबीच ही छोड़ दिया।

क्या समाज में स्त्री पात्रों का बस इतना ही योगदान है कि कहानी को ट्विस्ट देने के लिए उन्हें प्रकाश में लाया गया और फिर जब नायक को आधार मिल गया तो भाग गए नायक के किस्से के साथ। जैसा कि अक्सर फिल्मों में होता है कि अभिनेत्रियों को सजावटी रोल दिया जाता है।

अन्य लोगों की जिज्ञासा का तो जवाब मैं दे ही देता, लेकिन मेरे एक पचहत्तर वर्षीय प्रशंसक पाठक का जब मुझे एक पोस्ट कार्ड मिला कि बरखुरदार, उपन्यास में आपने जो परोसना चाहा बखूबी जतन से परोसा…लेकिन नायक की उस खिलंदड़ी सी किशोरी प्रेमिका ‘सनूबर’ को आपने आधे उपन्यास के बाद बिसरा ही दिया। क्या सनूबर फिर नायक के जीवन में नहीं आई  और यदि नहीं आई तो फिर इस भरे-पूरे संसार में कहाँ गुम हो गई सनूबर….
मेरी कालेज की मित्र सुरेखा ने भी एक दिन फोन पर याद किया और बताया कि कालेज की लाइब्रेरी में तुम्हारा उपन्यास भी है। मैंने उसे पढ़ा है और क्या खूब लिखा है तुमने। लेकिन यार, उस लड़की ‘सनूबर’ के बारे में और जानने की जिज्ञासा है।
वह मासूम सी लड़की ‘सनूबर’…तुम तो कथाकार हो, उसके बारे में भी क्यों नहीं लिखते। तुम्हारे अल्पसंख्यक-विमर्श वाले कथानक तो खूब नाम कमाते हैं,  लेकिन क्या तुम उस लड़की के जीवन को सजावटी बनाकर रखे हुए थे या उसका इस ब्रह्माण्ड में और भी कोई रोल था…क्या नायिकाएं नायकों की सहायक भूमिका ही निभाती रहेंगी..?
मैं इन तमाम सवालों से तंग आ गया हूँ और अब प्रण करता हूँ कि सनूबर की कथा को ज़रूर लिखूंगा…वाकई कथानक में सनूबर की इसके अतिरिक्त कोई भूमिका मैंने क्यों नहीं सोची थी कि वो हाड-मांस की संरचना है…मैंने उसे एक डमी पात्र ही तो बना छोड़ा था। क्या मैं भी हिंदी मसाला फिल्मों वाली पुरुष मानसिकता से ग्रसित नहीं हूँ, जिसने बड़ी खूबसूरती से एक अल्हड पात्र को आकार दिया और फिर अचानक उसे छोड़ कर पुरुष पात्र को गढने, संवारने के श्रम लगा दिया।
मुझे उस सनूबर को खोजना होगा…वो अब कहाँ है, किस हाल में है…क्या अब भी वो एक पूरक इकाई ही है या उसने कोई स्वतंत्र इमेज बनाई है ?

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तब पंद्रह वर्षीय सनूबर कहाँ जानती थी कि उसके माँ-बाप उसे जमाल साहब के सामने एक उत्पाद की तरह प्रस्तुत कर रहे हैं। हाँ, उत्पाद ही तो थी सनूबर…विवाह-बाज़ार की एक आवश्यक उत्पाद…एक ऐसा उत्पाद जिसका मूल्य कमसिनी में ही अधिकतम रहता है…जैसे-जैसे लडकी की उम्र बढ़ती जाती है, उसकी कीमत घटती जाती है। सनूबर की अम्मी के सामने अपने कई बच्चों की ज़िन्दगी का सवाल था। सनूबर उनकी बड़ी संतान है…गरीबी में पढा़ई-लिखाई कराना भी एक जोखिम का काम है। कौन रिस्क लेगा। जमाना ख़राब है कितना..ज्यादा पढ़ लेने के बाद बिरादरी में वैसे पढ़े-लिखे लड़के भी तो नहीं मिलेंगे?

चील-गिद्धों के संसार में नन्ही सी मासूम सनूबर को कहीं कुछ हो-हुआ गया तो कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे। फिर उसके बाद और भी तो बच्चे हैं। एक-एक करके पीछा छुडा़ना चाह रही थीं सनूबर की अम्मी।

सनूबर की अम्मी अक्सर कहा करतीं–“ जैसे भिन्डी-तुरई..चरेर होने के बाद किसी काम की नहीं होती, दुकानदार के लिए या किसी ग्राहक के लिए..कोई मुफ्त में भी न ले..ऐसे ही लड़कियों को चरेर होने से पहले बियाह देना चाहिए…कम उमिर में ही नमक रहता है उसके बाद कितना स्नो-पाउडर लगाओ, हकीकत नहीं छुपती…!”

सनूबर की अम्मी जमाल साहब के सामने सनूबर को अकारण डांटती और जमाल साहब का चेहरा निहारती। इस डांटने-डपटने से जमाल साहब का चेहरा मुरझा जाता। जैसे- यह डांट सनूबर को न पड़ी हो, बल्कि जमाल साहब को पड़ी हो। यानी जमाल साहब उसे मन ही मन चाहने लगे हैं।
जमाल साहब का चेहरा पढ़ अम्मी खुश होतीं और सनूबर से चाय बनाने को कहती या शरबत लाने का हुक्म देतीं।
कुल मिलाकर जमाल साहब अम्मी की गिरफ्त में आ गये थे।
बस एक ही अड़चन थी कि उन दोनों की उम्र में आठ-दस बरस का अंतर था।
सनूबर की अम्मी तो आसपास के कई घरों का उदाहरण देतीं, जहां पति-पत्नी की उम्र में काफी अंतर है। फिर भी जो राजी-ख़ुशी जीवन गुज़ार रहे हैं।
ऐसा नहीं है कि सनूबर यूनुस की दीवानी है….या उसे शादी-बियाह नहीं करवाना है।
यूनुस जब तक था, तब तक था….वो गया और फिर लौट के न आया…
सुनने में आता कि कोरबा की खुली खदानों में वह काम करता है। बहुत पैसे कमाने लगा है और अपने घरवालों की मदद भी करने लगा है।
यूनुस ने अपने खाला-खालू को जैसे भुला ही दिया था। यह तो ठीक था, लेकिन सनूबर को भूल जाना उसे कैसे गवारा हुआ होगा। वही जाने…
सनूबर तो एक लड़की है…लडकी यानी पानी…जिस बर्तन में ढालो वैसा आकार ग्रहण कर लेगी।
सनूबर तो एक लड़की है। लड़की यानी पराया धन, जिसे अमानत के तौर पर मायके में रखा जाता है और एक दिन असली मालिक ढोल-बाजे-आतिशबाजी के साथ आकर उस अमानत को अपने साथ ले जाते हैं।
सनूबर इसीलिए ज्यादा मूंड नही खपाती- जो हो रहा है ठीक हो रहा है, जो होगा ठीक ही होगा।
आखिर अपनी माँ की तरह उसका भी कोई घर होगा, कोई पति होगा, कोई नया जीवन होगा।

हर लडकी के जीवन में दोराहे आते हैं। ऐसे ही किसी दोराहे पर ज्यादा दिन टिकना उसे भी पसंद नहीं था। क्या मतलब पढा़ई-लिखाई का, घर में माहौल नहीं है। स्कूल भी कोई ऐसा प्रतिस्पर्धा वाला नहीं कि जो बच्चों को बाहरी दुनिया से जोड़े और आगे की राह दिखलाए। सरकारी स्कूल से ज्यादा उम्मीद क्या रखना। अम्मी-अब्बू वैसे भी लड़की जात को ज्यादा पढा़ने के पक्षधर नहीं हैं। लोक-लाज का डर और पुराने खयालात- लड़कियों को गुलाबी उम्र में सलटाने वाली नीति पर अमल करते हैं।बस जैसे ही कोई ठीक-ठाक रिश्ता जमा नहीं कि लड़की को विदा कर दो। काहे घर में टेंशन बना रहे। हाँ, लड़कों को अच्छे स्कूल में पढा़ओ और उन पर शिक्षा में जो भी खर्च करना हो करो।
अब वो जमाल साहब के रूप में हो तो क्या कहने। साहब-सुह्बा ठहरे।अफसर कालोनी में मकान है उनका। कितने सारे कमरे हैं ।दो लेट्रिन-बाथरूम हैं। बड़ा सा हाल और किचन कितना सुविधाजनक है।
सनूबर का क्वार्टर तो दो कमरे का दडबा है। उसी में सात-आठ लोग ठुंसे पड़े रहते हैं। आँगन में बाथरूम के नाम पर एक चार बाई तीन का डब्बा, जिसमे कायदे से हाथ-पैर भी डुलाना मुश्किल।
यदि ये शादी हो जाती है तो कम से कम उसे एक बड़ा सा घर मिल जाएगा।
घूमने-फिरने के लिए कार और इत्मीनान की ज़िन्दगी।
इसलिए सनूबर भी अपनी अम्मी के इस षड्यंत्र में शामिल हो गई कि उसकी शादी जमाल साहब से हो ही जाये।

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ये अलग बात है कि उसे यूनुस पसंद है।
सनूबर का कजिन यूनुस…
सनूबर अपनी अम्मी की इसीलिए कद्र नही करती कि उनकी सोच का हर कोण सनूबर की शादी की दिशा में जाता है। अम्मी हमेशा बच्चियों की शादी के लिए अब्बू को कोसती रहती हैं कि वे काहे नहीं इतना कमाते कि बच्चियों के लिए गहने-जेवर ख़रीदे जाएँ, जोड़े जाएँ…फिक्स्ड डिपोजिट में रकम जमा की जाए और नाते-रिश्तेदारों में उठे-बैठें ताकि बच्चियों के लिए अच्छे रिश्ते आनन-फानन मिल जाएँ।
लड़कियों के बदन का नमक ख़त्म हो जाए तो रिश्ता खोजना कितना मुश्किल होता है, ये वाक्य सनूबर अम्मी के मुख से इतना सुन चुकी है कि उसने अपने बदन को चखा भी एक बार और स्वाद में बदन नमकीन ही मिला।
इसका मतलब कि‍ उम्र बढ़ने के साथ लड़कियों के बदन में नमक कम हो जाता होगा।
इस बात की तस्दीक के लिए उसने खाला की लड़की के बदन को चाट कर देखा था। उसके तो तीन बच्चे भी है और उम्र यही कोई पच्चीस होगी, लेकिन उसका बदन का स्वाद नमकीन था।
एक बार सनूबर ने अम्मी के बदन को चाट कर देखा। वह भी नमकीन था। फिर अम्मी ऐसा क्यों कहती हैं कि उम्र बढ़ने के साथ बदन में नमक कम हो जाता है।
ये सब देहाती बातें हैं और तेरी अम्मी निरी देहातन है।
ऐसा अब्बू ने हंसते हुए कहा था, जब सनूबर ने बताया कि सबके बदन में नमक होता है, क्योंकि इंसान का पसीना नमकीन होता है और इस नमक का उम्र के साथ कोई ताल्लुक नहीं होता है।
अम्मी को सोचना चाहिए कि स्कूल में पढ़़ने वाली लड़की ये तो कतई नहीं सोचती होगी कि उसकी शादी हो जाए और वो लड़की अपने आस-पास के लड़कों या मर्दों में पति तलाशती नहीं फिरती है।
फिर लड़कियों की बढ़ती उम्र या बदन की रानाइयां माँ-बाप और समाज को क्यों परेशान किये रहते हैं। उठते-बैठते, सोते-जागते, घुमते-फिरते बस यही बात कि मेरी सनूबर की शादी होगी या नहीं।
सनूबर कभी खिसिया जाती तो कहती, “मूरख अम्मी…शादी तो भिखारन की, कामवाली की, चाट-वाले की बिटिया की भी हो जाती है। और तो और तुम्हारी पड़ोसन पगली तिवारिन आंटी की क्या शादी नहीं हुई, जो बात-बेबात तिवारी अंकल से लड़ती रहती है और दिन में पांच बार नहाती है कि कहीं किसी कारण अशुद्ध तो नहीं हो गई हो।दुनिया में काली-गोरी, टेढ़ी-मेढ़ी, लम्बी-ठिगनी सब प्रकार की लडकियाँ तो ब्याही जाती हैं अम्मी। और तुम्हारी सनूबर तो कित्ती खूबसूरत है।जानती हो मैथ के सर मुझे नेचुरल ब्यूटी कहते हैं।तो क्या मेरी शादी वक्त आने पर नहीं होगी?”
सनूबर के तर्क अपनी जगह और अम्मी का लड़का खोज अभियान अपनी जगह।
उन्हें तो जमाल साहब के रूप में एक दामाद दिखलाई दे रहा था।

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निकिता स्कूल में आज संजीदा दिखी।
सनूबर ने कारण जानने की कोशिश नही की। यह सनूबर की स्टाइल है। वह ज़बरदस्ती किसी के राज उगलवाने में यकीन नहीं करती। उसे मालूम है कि जिसे सुख या दुःख की बात शेयर करनी होगी, वो खुद करेगी। यदि बात एकदम व्यक्तिगत होगी तो फिर काहे किसी के फटे में टांग अड़ाना।
टिफिन ब्रेक में जब दोनों ने नाश्ते की मिक्सिंग की तो निकिता आहिस्ता से फूट पड़ी- “जानती है सनूबर, कल गज़ब हो गया रे !”
सनूबर के कान खड़े हुए लेकिन उसने रुचि का प्रदर्शन नहीं किया।
निकिता फुसफुसाई- “कल शाम मुझे देखने लड़के वाले आने वाले हैं!”
जैसे कोई बम फटा हो, निकिता का मुंह उतरा हुआ था। सनूबर भी जैसे सकते में आ गई। यह क्या हुआ, अभी तो मिडिल स्कूल में नवमी ही तो पहुँची हैं सखियाँ। उम्र पंद्रह या कि सोलह साल ही तो हुई है। इतनी जल्दी शादी!
-“तेरी मम्मी ने ऐतराज़ नहीं किया पगली।”
-“काहे, मम्मी की ही तो कारस्तानी है यह। उन्होंने मेरी दीदी की शादी भी तो जब वह सत्रह साल की थीं, तभी करा दी थी। कहती हैं कि उम्र बढ़ जाने के बाद लड़के वाले रिजेक्ट करने लगते हैं और हमें पढ़ा-लिखा कर नौकरी तो करानी नहीं बेटियों से।चार बहनों के बाद एक भाई है। एक-एक कर लड़कियाँ निपटती जाएँ, तभी सुकून मिलेगा उन्हें !”
सनूबर क्या कहती..कितने बेबस हैं सखियाँ इस मामले में।
उन्हें घर का सदस्य कब समझा जाता है।हमेशा पराई अमानत ही तो कहते हैं लोग।उनका जन्म लेना ही दोख और असगुन की निशानी है।
लड़कियों के सतीत्व की रक्षा और दहेज़ ऐसे मसले हैं, जिनसे उनके परिवार जूझते रहते हैं।

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निकिता की चिंता, “मुझे आगे पढा़ई करना है रे।अभी शादी नहीं करनी।क्या मेरी कोई सुनेगा?”
सनूबर क्या जवाब देती।
लड़कियों की कहाँ सुनी जाती है। उन्हें तो हुकुम सुनने और तामील करने की ट्रेनिंग मिली होती है।
अजब समाज है, जहां लड़कियों को एक बीमारी की तरह ट्रीट किया जाता है। बीमारी हुई नहीं कि जो भी कीमत लगे लोग, उस बीमारी से निजात पाना चाहते हैं।
और जब बिटिया बियाह कर फुर्सत पाते हैं लोग तब दोस्त-अहबाबों में यही कहते फिरते हैं- “गंगा नहा आये भाई…अच्छे से अच्छा इंतज़ाम किया। लेन-देन में कोई कसर नहीं रक्खी।”
सनूबर की भी तो अपने घर में यही समस्या थी।
आये दिन अम्मी अब्बू को ताने देती हैं- “कान में रुई डाले रहते हैं और बिटिया है कि ताड़ की तरह बढ़ी जा रही है। सोना दिनों-दिन महंगा होता जा रहा है। न जेवर बनाने की चिंता न कहीं रिश्तेदारी में उठाना-बैठना। क्या घर-बैठे रिश्ता आएगा? जूते घिस जाते हैं, तब कहीं जाकर ढंग का रिश्ता मिलता है ?”
अब्बू मजाक करते, “तुम्हारे माँ-बाप के कितने जूते घिसे थे।कुछ याद है, जो मैं मिला।ऐसे ही अल्लाह हमारी बिटिया सनूबर का कोई अच्छा सा रिश्ता करा ही देगा।”
अम्मी गुस्सा जातीं, “अल्लाह भी उसी की मदद करता है, जो खुद कोई कोशिश करे। हाथ पे हाथ रखकर बैठे आदमी के मुंह में अल्लाह निवाला नहीं डालता।आप मज़ाक में बात न टालिए और दुनियादार बनिए। अभी से जोड़ेंगे, तभी आगे जाकर बोझा नहीं लगेगा।”
सनूबर ने अपनी व्यथा निकिता को सुनाई।
दोनों सहेलियाँ उदास हो गईं.।
तभी टिफिन खत्म होने की घंटी बजी और वे क्लास-रूम की तरफ भागीं।

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सनूबर को स्कूल जाना बहुत पसंद है। इस बहाने उसे घर-परिवार की बेढंगी वयस्तता से मुक्ति मिलती है। अम्मी चिल्लाती रहती है कि इतनी जल्दी क्यों स्कूल भागने की फिराक में रहती है सनूबर। टाइम होने से पांच मिनट पहले घर छोड़ना चाहिए। कितना नजदीक है स्कूल।
-“का करती है माटीमिली इत्ता पहले जाकर, झाडू लगाती है का वहां?”
सनूबर का स्कूल में बहुत मन लगता है। वहाँ तमाम सहेलियाँ मिल जाती हैं। उनके सुख-दुःख सुनना, बेहिसाब गप्पें मारना। एक-दूसरे की ज़िन्दगी में समानता-असमानता की विवेचना करना। टीवी पर देखी फिल्म या सीरियल पर बहस करना।
और भी इधर-उधर की लटर-पटर…लंतरानियाँ….
घर में क्या हो सकता है। बस अम्मी के आदेश सुनते रहो। काम हैं कि ख़तम ही नहीं होते हैं। जब कुछ काम न हो तो कपड़ों का ढेर लेकर प्रेस करने बैठो। ये भी कोई ज़िन्दगी है।
सनूबर के घर में तो और भी मुसीबतें हैं।कोई न कोई मेहमान आता रहता है। उनकी खातिरदारी करना कितना बोरिंग होता है। उस पर अम्मी-अब्बू के नए दोस्त जमाल साहेब। वह आये नहीं कि जुट जाओ खिदमत में। प्याज काटो, बेसन के पकौड़े बनाओ। बार-बार चाय पेश करो। अम्मी भी उनके सामने जमीन्दारिन बन कर हुकुम चलाती हैं-“कहाँ मर गई रे सनूबर, देखती नहीं..कित्ती देर हो गई साहब को आये। तेरी चाय न हुई मुई बीरबल की खिचड़ी हो गई।जल्दी ला!”
सनूबर न हुई नौकरानी हो गई।
-“कहाँ मर गई रे।देख, तेरे अब्बू का मोजा नहीं मिल रहा है।जल्दी खोज कर ला!”
-“मेरा पेटीकोट कहाँ रख दि‍या तूने।पेटी के ऊपर रखा था, नहीं मिल रहा है…जल्दी खोज कर ला!”
-“जा जल्दी से चावल चुन दे।फिर स्कूल भागना। बस सबेरे से स्कूल की तैयारी करती रहती है, पढ़-लिख कर नौकरी करेगी क्या। तेरी उम्र में मेरी शादी हो गई थी और तू जाने कब तक छोकरी बनी रहेगी।”
ऐसे ही जाने-कितने आदेश उठते-बैठते, सोते-जागते सनूबर का जीना हराम करते रहते।
सनूबर स्कूल के होमवर्क हर दिन निपटा लेती थी।
उसके टीचर इस बात के लिए उसकी मिसाल देते।
उससे गणित न बनती थी इसलिए उसने गणित की कुंजी अब्बू से खरीदवा ली थी।
बाकी विषय को किसी तरह वह समझ लेती।
वैसे भी बहुत आगे पढ़ने-पढ़ाने के कोई आसार उसे नज़र नहीं आते थे, यही लगता कि दसवीं के बाद अगर किस्मत ने साथ दिया तो बारहवीं तक ही पढ़ पाएगी वर्ना उसके पहले ही बैंड बज सकता है। अम्मी बिटिया को घर में बिठा कर नहीं रखेंगी- “जमाना खराब है।जवान लड़की घर में रखना बड़ा जोखिम भरा काम है। कुछ ऊंच-नीच हो गई तो फिर माथा पीटने के अलावा क्या बचेगा। इसलिए समय रहते लड़कियों को ससुराल पहुंचा दो। एक बार विदा कर दो। बाद में सब ठीक हो जाता है। घर-परिवार के बंधन और जिम्मेदारियां उलटी-सीधी उड़ान को ज़मीन पर ला पटकती हैं।”
अम्मी कहती भी हैं- “अपने घर जाकर जो करना हो करियो।यह घर तुम्हारा नहीं सनूबर!”
तो क्या लड़की अपने माँ-बाप के घर में किरायेदार की हैसियत से रहती है?
यही तो निकिता ने भी थक-हार कर कहा- “मुझे उन लोगों ने पसंद कर लिया है सनूबर। इस साल गर्मियों में मेरी शादी हो जायेगी रे!”
सनूबर का दिल धड़क उठा।
-“गज़ब हो गया। पिछले साल यास्मीन ने इस चक्कर में पढाई छोड़ दी और ससुराल चली गई। कितनी बढ़िया तिकड़ी थी अपनी। जानती है- मार्केट में यास्मीन की अम्मी मिलीं थीं। उन्होंने बताया कि यास्मीन बड़ी बीमार रहती है। उसका ससुराल गाँव में है, जहां आसपास कोई अस्पताल नहीं है। उसकी पहली डिलवरी होने वाली थी और कमजोरी के कारण बच्चा पेट ही में मर गया। बड़ी मुश्किल से यास्मीन की जान बची। ईद में यास्मीन आएगी, तो उससे मिलने चलेंगे न। पता नहीं तुम्हारा साथ कब तक का है!”
निकिता की आँखों में आंसू थे।
उसने स्कूल के मैदान में बिंदास क्रिकेट खेलते लडकों को देखा।
सनूबर की निगाह भी उधर गई।
लडकों की ज़िन्दगी में किसी तरह की आह-कराह क्यों नहीं होती।
सारे दुःख, सारी दुश्वारियां लड़कियों के हिस्से क्यों दी मेरे मौला…मेरे भगवान।
और तभी निकिता ने घोषणा की- “हम लड़कियों का कोई भगवान या अल्लाह नहीं सनूबर!”
सनूबर ने भी कुछ ऐसा ही सोचा था, कहा नहीं कि कहीं ईमान न चला जाए।अल्लाह की पाक ज़ात पर ईमान और यकीन तो इस्लाम की पहली शर्त है।
लेकिन निकिता ठीक ही तो कह रही है।
कितनी तनहा, कितनी पराश्रित, कितनी समझौता-परस्त होती हैं लड़कियाँ।

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लड़कियाँ ज़िन्दगी के तल्ख़ हकीकतों से कितनी जल्दी वाकिफ होती जाती हैं।
लड़के जो लड़कियों को सिर्फ एक ‘माल’ या ‘कमोडिटी’ के रूप में देखते हैं, वे कहाँ जान पाते हैं कभी कि इन शोख चुलबुली लड़कियों को प्रतिदिन ज़िन्दगी की कई नई सच्चाइयों से दो-चार होना पड़ता है।
ऐसे ही एक दिन सनूबर और निकिता यास्मीन से मिलने उसके घर गई।
मस्जिद-पारा में घर है यास्मीन का।
बड़ी मस्जिद के पीछे वाली गली में रहती है वह।
निकिता ने जींस-टॉप पहना था, जबकि सनूबर सलवार-सूट में थी। सनूबर मस्जिद-पारा आती है, तो बाकायदा सर पर दुपट्टा डाले रहती है।
यास्मीन ने घर का दरवाज़ा खोला था।
आह, कितना बेरौनक चेहरा हो गया है…गाल पिचके हुए और आँखों के इर्द-गिर्द काले घेरे। जैसे लम्बी बीमारी से उठी हो। तभी पीछे से यास्मीन की अम्मी भी आ गईं और उन्हें अन्दर आकर बैठने को कहा।
निकिता और सनूबर चुपचाप यास्मीन का चेहरा निहारे जा रही थीं। कितनी खूबसूरत हुआ करती थी यास्मीन, शादी ने उससे ख़्वाब और हंसी छीन ली थी।
यास्मीन स्कूल भर के तमाम बच्चों और टीचरों की मिमिक्री किया करती और खुद न हंसती, जब सब उसके मजाक को समझ कर हंसते तब ठहाका मार कर हंसती थ। उसकी हंसी को ग्रहण लग गया था।
निकिता और सनूबर उसकी दशा देख खौफज़दा हो चुकी थीं। क्या ऐसा ही कोई भविष्य उनकी बाट जोह रहा है। कम उम्र में शादी का यही हश्र होता है।फिर उनकी मांए ये क्यों कहती हैं कि उनकी शादियाँ तब हुई थीं, जब वे तेरह या चौदह साल की थीं। लेकिन वे लोग तो मस्त हैं, अपनी ज़िन्दगी में। फिर ये स्कूल पढ़ने वाली लड़कियाँ क्यों कम उम्र में ब्याहे जाने पर खल्लास हो जाती हैं?
ऐसे ही कई सवालात उनके ज़ेहन में उमड़-घुमड़ रहे थे।
यास्मीन शादी का एल्बम लेकर आ गई और उन लोगों ने देखा कि यास्मीन का शौहर नाटे कद का एक मजबूत सा युवक है। दिखने में तो ठीक-ठाक है, फिर उन लोगों ने क्यों कम उम्र में बच्चों की ज़िम्मेदारी का निर्णय लिया। मान लिया शादी हो ही गई है, फिर इतनी हड़बडी़ क्यों की? बच्चे दो-चार साल बाद भी हो जाते तो क्या संसार का काम रुका रह जाता?
यास्मीन बताने लगी- “उनका मोटर-साइकिल रिपेयर की गैरेज है। सुबह दस बजे जाते हैं तो रात नौ-दस के बाद ही लौटते हैं। गैरेज अच्छी चलती है, लेकिन काम तो मेहनत वाला है। मेरी जिठानी मेरी ही उम्र की है और उसके दो बच्चे हैं। इस हिसाब से तो उस परिवार में मैं बच्चे जनने के काबिल तो थी ही। मुझे वैसे भी कहानियों की किताब पढ़ने का शौक है। वहां पढाई-लिखाई से किसी का कोई नाता नहीं। बस कमाओ और डेली बिस्सर खाना खाओ- मटन न हो तो मछली और नहीं तो अंडा।इसके बिना उनका निवाला मुंह के अन्दर नहीं जाता। ये लोग औरत को चारदीवारी में बंद नौकरानी और बच्चा जनने की मशीन मानते हैं!”
तो ये सब होता है शादी के बाद और अपनी निकिता भी इस घनचक्कर में फंसने वाली है।
सनूबर ने गौर किया कि निकिता के चेहरे पर डर के भाव हैं।आशंकाओं के बादल तैर रहे हैं, उसके चेहरे पर।
लड़के वालों ने उसे पसंद कर लिया है।
निकिता को जो मालूम हुआ है, उसके मुताबिक बीस एकड़ की खेती है उनकी, एक खाद-रसायन की दूकान है। दो लड़के और दो लड़कियाँ हैं वहां। निकिता का होने वाला पति बड़ा भाई है, बीए करने के बाद खेती संभालता है और छोटा भाई इंजीनियरिंग कर रहा है। दोनों लड़कियों की शादी हो चुकी है। इसका मतलब निकिता घर की बड़ी बहू होने जा रही है।
ससुराल झारखण्ड के गढ़वा में है।नगर से सटा गाँव है उनका। वैसे तो कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन निकिता की इच्छा किसी ने जाननी चाही। क्या निकिता अभी विवाह की जिम्मेदारियों में बंधने के लिए मानसिक और शारीरिक रूप से तैयार है? कहाँ बच्चियों की इच्छा पूछी जाती है। माँ-बाप पर एक अघोषित बोझ जो होती हैं लड़कियाँ।
यास्मीन का इलाज चल रहा है, डॉक्टर खान मेडम उसका इलाज कर रही हैं। उसे रक्ताल्पता है और ससुराली दिक्कतों ने मानसिक रूप से उसे कन्फ्यूज़ का कर दिया है।
-“अल्ला जाने कब उसका आत्म-विश्वास लौटेगा।कितनी बिंदास हुआ करती थी अपनी यास्मीन !” घर लौटते हुए सनूबर ने गहरी सांस लेकर यही तो कहा था, और निकिता भी भर रास्ता खामोश बनी रही।

(उपन्यास अंश)

अनवर सुहैल की कविताएं

 अनवर सुहैल

अनवर सुहैल

1-

बताया जा रहा हमें
समझाया जा रहा हमें
कि हम हैं कितने महत्वपूर्ण

लोकतंत्र के इस महा-पर्व में
कितनी महती भूमिका है हमारी

ईवीएम के पटल पर
हमारी एक ऊँगली के
ज़रा से दबाव से
बदल सकती है उनकी किस्मत

कि हमें ही लिखनी है
किस्मत उनकी
इसका मतलब
हम भगवान हो गए…

वे बड़ी उम्मीदें लेकर
आते हमारे दरवाज़े
उनके चेहरे पर
तैरती रहती है एक याचक-सी
क्षुद्र दीनता…
वो झिझकते हैं
सकुचाते हैं
गिड़गिडाते हैं
रिरियाते हैं
एकदम मासूम और मजबूर दिखने का
सफल अभिनय करते हैं

हम उनके फरेब को समझते हैं
और एक दिन उनकी झोली में
डाल आते हैं…
एक अदद वोट…

फिर उसके बाद वे कृतघ्न भक्त
अपने भाग्य-निर्माताओं को
अपने भगवानों को
भूल जाते हैं….

2-

उनकी न सुनो तो
पिनक जाते हैं वो

उनको न पढो तो
रहता है खतरा
अनपढ़-गंवार कहलाने का

नज़र-अंदाज़ करो
तो चिढ़ जाते हैं वो

बार-बार तोड़ते हैं नाते
बार-बार जोड़ते हैं रिश्ते

और उनकी इस अदा से
झुंझला गए जब लोग
तो एक दिन
वो छितरा कर
पड़ गए अलग-थलग
रहने को अभिशप्त
उनकी अपनी चिडचिड़ी दुनिया में…

3-

उन अधखुली
ख्वाबीदा आँखों ने
बेशुमार सपने बुने

सूखी भुरभरी रेत के
घरौंदे बनाए

चांदनी के रेशों से
परदे टाँगे

सूरज की सेंक से
पकाई रोटियाँ

आँखें खोल उसने
कभी देखना न चाहा
उसकी लोलुपता
उसकी ऐठन
उसकी भूख

शायद
वो चाहती नहीं थी
ख्वाब में मिलावट
उसे तसल्ली है
कि उसने ख्वाब तो पूरी
ईमानदारी से देखा

बेशक
वो ख्वाब में डूबने के दिन थे
उसे ख़ुशी है
कि उन ख़्वाबों के सहारे
काट लेगी वो
ज़िन्दगी के चार दिन…

4-

वो मुझे याद करता है
वो मेरी सलामती की
दिन-रात दुआएँ करता है
बिना कुछ पाने की लालसा पाले
वो सिर्फ सिर्फ देना ही जानता है
उसे खोने में सुकून मिलता है
और हद ये कि वो कोई फ़रिश्ता नही
बल्कि एक इंसान है
हसरतों, चाहतों, उम्मीदों से भरपूर…

उसे मालूम है मैंने
बसा ली है एक अलग दुनिया
उसके बगैर जीने की मैंने
सीख ली है कला…

वो मुझमें घुला-मिला है इतना
कि उसका उजला रंग और मेरा
धुंधला मटियाला स्वरूप एकरस है

मैं उसे भूलना चाहता हूँ
जबकि उसकी यादें मेरी ताकत हैं
ये एक कडवी हकीकत है
यदि वो न होता तो
मेरी आँखें तरस जातीं
खुशनुमा ख्वाब देखने के लिए

और ख्वाब के बिना कैसा जीवन…
इंसान और मशीन में यही तो फर्क है……

5-

जिनके पास पद-प्रतिष्ठा
धन-दौलत, रुआब-रुतबा
है कलम-कलाम का हुनर
अदब-आदाब उनके चूमे कदम
और उन्हें मिलती ढेरों शोहरत…

लिखना-पढ़ना कबीराई करना
फकीरी के लक्षण हुआ करते थे
शबो-रोज़ की उलझनों से निपटना
बेजुबानों की जुबान बनना
धन्यवाद-हीन जाने कितने ही ऐसे
जाने-अनजाने काम कर जाना

तभी कोई खुद को कहला सकता था
कि जिम्मेदारियों के बोझ से दबा
वह एक लेखक है हिंदी का
कि देश-काल की सीमाओं से परे
वह एक विश्‍व-नागरिक है
लिंग-नस्ल भेद वो मानता नहीं है
जात-पात-धर्म वो जानता नहीं ही

बिना किसी लालच के
नोन-तेल-कपडे का जुगाड़ करते-करते
असुविधाओं को झेलकर हंसते-हंसते
लिख रहा लगातार पन्ने-दर-पन्ने
प्रकाशक के पास अपने स्टार लेखक हैं
सम्पादक के पास पूर्व स्वीकृत रचनायें अटी पड़ी हैं

लिख-लिख के पन्ने सहेजे-सहेजे
वो लिखे जा रहा है…
लिखता चला जा रहां है…

अनवर सुहैल की कविताएं

anwar suhail

एक बार फिर

एक बार फिर
इकट्ठा हो रहीं वही ताकतें

एक बार फिर
सज रहे वैसे ही मंच

एक बार फिर
जुट रही भीड़
कुछ पा जाने की आस में
भूखे-नंगों की

एक बार फिर
सुनाई दे रहीं,
वही ध्वंसात्मक धुनें

एक बार फिर
गूँज रही फ़ौजी जूतों की थाप

एक बार फिर
थिरक रहे दंगाइयों, आतंकियों के पाँव

एक बार फिर
उठ रही लपटें
धुए से काला हो गया आकाश

एक बार फिर
गुम हुए जा रहे
शब्दकोष से अच्छे प्यारे शब्द

एक बार फिर
कवि निराश है, उदास है, हताश है…

तालिबान

जिसने जाना नही इस्लाम
वो है दरिंदा
वो है तालिबान…

सदियों से खड़े थे चुपचाप
बामियान में बुद्ध
उसे क्यों ध्वंस किया तालिबान

इस्लाम भी नहीं बदल पाया तुम्हें
ओ तालिबान
ले ली तुम्हारे विचारों ने
सुष्मिता बैनर्जी की जान….

कैसा है तुम्हारी व्यवस्था
ओ तालिबान!
जिसमे तनिक भी गुंजाइश नहीं
आलोचना की
तर्क की
असहमति की
विरोध की…

कैसी चाहते हो तुम दुनिया
कि जिसमें बम और बंदूकें हों
कि जिसमें गुस्सा और नफ़रत हो
कि जिसमें जहालत और गुलामी हो
कि जिसमें तुम रहो
और रह पायें तुम्हे मानने वाले…

मुझे बताओ
क्या यही सबक है इस्लाम का…?

अनवर सुहैल की कवि‍ताएं

अनवर सुहैल

09 अक्टूबर 1964 को जन्‍में अनवर सुहैल के दो उपन्यास, तीन कथा संग्रह और दो कविता संग्रह प्रकाशि‍त हो चुके हैं। वह ‘संकेत’ का संपादन कर रहे हैं। अनवर सुहैल की कवि‍ताएं-

सबूत

कर रहा हूँ इकट्ठा
वो सारे सबूत
वो सारे आँकडे

जो सरासर झूठे हैं
और
जिन्‍हें बडी खूबसूरती से
तुमने सच का जामा पहनाया है
कितना बडा़ छलावा है
मेरे भोलेभाले मासूम जन
आसानी जाते हैं झाँसे में

जादूगरों
हाथ की सफाई के माहिर लोगों
तुम्हारा तिलस्म है ऐसा
कि सम्मोहित से लोग
कर लेते यकीन
अपने मौजूदा हालात के लिए
खुद को मान लेते कुसूरवार
खुद को भाग्यहीन……”

 उसने अपनी बात कही तो

उसने अपनी बात कही तो
भड़क उठे शोले
गरज उठी बंदूकें
चमचमाने लगीं तलवारें
निकलने लगी गालियाँ…

चारों तरफ उठने लगा शोर
पहचानो…पहचानो
कौन हैं ये
क्या उसे नही मालूम
हमारी दया पर टिका है उसका वजूद
बता दो संभल जाए वरना
च्यूंटी की तरह मसल दिया जायेगा उसे…

वो सहम गया
वो संभल गया
वो बदल गया
जान गया कि
उसका पाला सांगठनिक अपराधियों से है….

प्रेम कविता

उसने मुझसे कहा
ये क्या लिखते रहते हो
गरीबी के बारे में
अभावों, असुविधाओं,
तन और मन पर लगे घावों के बारे में
रईसों, सुविधा-भोगियों के खिलाफ
उगलते रहते हो ज़हर
निश-दिन, चारों पहर
तुम्हे अपने आस-पास
क्या सिर्फ दिखलाई देता है
अन्याय, अत्याचार
आतंक, भ्रष्टाचार!!
और कभी विषय बदलते भी हो
तो अपनी भूमिगत कोयला खदान के दर्द का
उड़ेल देते हो
कविताओं में
कहानियों में
क्या तुम मेरे लिए
सिर्फ मेरे लिए
नहीं लिख सकते प्रेम-कवितायें…

मैं तुम्हे कैसे बताऊँ प्रिये
कि  बेशक मैं लिख सकता हूँ
कवितायें सावन के फुहारों की
रिमझिम बौछारों की
उत्सव-त्योहारों की कवितायें
कोमल, सांगीतिक छंद-बद्ध कवितायें
लेकिन तुम मेरी कविताओं को
गौर से देखो तो सही
उसमे तुम कितनी ख़ूबसूरती से छिपी हुई हो
जिन पंक्तियों में
विपरीत परिस्थितियों में भी
जीने की चाह लिए खडा़ दि‍खता हूँ
उसमें  तुम्ही तो मेरी प्रेरणा हो…
तुम्ही तो मेरा संबल हो…..

सिर झुकाना नहीं आता

क्या करें,
इतनी मुश्किलें हैं फिर भी
उसकी महफ़िल में जाकर मुझको
गिडगिडाना नहीं भाता…..
वो जो चापलूसों से घिरे रहता है
वो जो नित नए रंग-रूप धरता है
वो जो सिर्फ हुक्म दिया करता है
वो जो यातनाएँ दे के हँसता है
मैंने चुन ली हैं सजा की राहें
क्योंकि मुझको हर इक चौखट पे
सर झुकाना नहीं आता…
उसके दरबार में रौनक रहती
उसके चारों तरफ सिपाही हैं
हर कोई उसकी इक नज़र का मुरीद
उसके नज़दीक पहुँचने के लिए
हर तरफ होड मची रहती है
और हम दूर दूर रहते हैं
लोगों को आगाह किया करते हैं
क्या करें,
इतनी ठोकरें खाकर भी मुझको
दुनियादारी निभाना नहीं आता……

दुःख सहने के आदी

उनके जीवन में है दुःख ही दुःख
और हम बड़ी आसानी से कह देते
उनको दुःख सहने की आदत है
वे सुनते अभाव का महा-आख्यान
वे गाते अपूरित आकांक्षाओं के गान
चुपचाप सहते जाते जुल्मो-सितम

और हम बड़ी आसानी से कह देते
अपने जीवन से ये कितने संतुष्ट हैं
वे नही जानते कि उनकी बेहतरी लिए
उनकी शिक्षा, स्वास्थ और उन्नति के लिए
कितने चिंतित हैं हम और
सरकारी,  गैर-सरकारी संगठन
दुनिया भर में हो रहा है अध्ययन
की जा रही हैं पार-देशीय यात्राएं
हो रहे हैं सेमीनार, संगोष्ठिया…

वे नही जान पायेंगे कि उन्हें
मुख्यधारा में लाने के लिए
तथाकथित तौर पर सभ्य बनाने के लिए
कर चुके हजम हम
कितने बिलियन डालर
और एक डालर की कीमत
आज साठ  रुपये  है!

इत्ते सारे

इत्ते सारे लोग यहाँ हैं
इत्ती सारी बातें हैं
इत्ते सारे हँसी-ठहाके
इत्ती सारी घातें हैं

बहुतों के दिल चोर छुपे हैं
साँप कई हैं अस्तीनों में
दाँत कई है तेज-नुकीले
बड़े-बड़े नाखून हैं इनके
अक्सर ऐसे लोग अकारण
आपस में ही, इक-दूजे को
गरियाते हैं..लतियाते हैं

इनके बीच हमें रहना है
इनकी बात हमें सुनना है
और इन्हीं से बच रहना है

जो थोड़ें हैं सीधे-सादे
गुप-चुप, गम-सुम
तन्हा-तन्हा से जीते हैं
दुनियादारी से बचते हैं
औ’ अक्सर ये ही पिटते हैं
कायरता को, दुर्बलता को
किस्मत का चक्कर कहते हैं
ऐसे लोगों का रहना क्या
ऐसे लोगों का जीना क्या

धन्नासेठ प्रकाशक और हिन्दी कवि की विपन्नता का आख्यान: अनवर सुहैल

nagarjun

बाबा नागार्जुन की चर्चित कविता ‘सौदा’ पर युवा कवि अनवर सुहैल की टिप्‍पणी-

बाबा नागार्जुन के सृजन के केन्द्र में था आम-आदमी, खेतिहर किसान, मजदूर, हस्तशिल्पी, विकल्पहीन मतदाता, स्त्रियाँ, हरिजन और हिन्दी का लेखक। बाबा ने बड़ी आसान भाषा में अपनी बात कही ताकि बात का सीधा अर्थ ही लिया जाये। जिस तरह बाबा नागार्जुन अपनी वेशभूषा, रहन-सहन, खान-पान और बोली-बानी में भदेस और सहज थे, उसी तरह उनका समूचा लेखन प्रथम दृष्टया तो सरल-सहज-सम्प्रेषणीय नज़र आता है किन्तु उनकी अलंकारहीन भाषा का जादू देर तक पाठक-श्रोता के मन-मस्तिष्‍कमें उमड़ता-घुमड़ता रहता है। नागार्जुन की यही विशेषता उन्हें क्लासिक कवियों की श्रेणी में खड़ा करती है।

मैं सोचता हूँ कि आधुनिक हिन्दी का काव्य कितना अपूर्ण होता यदि निराला, मुक्तिबोध, अज्ञेय, केदार और नागार्जुन जैसे लेखकों का सृजन-सहयोग हिन्दी-कविता को न मिला होता। आज का कवि जाने क्यों अपनी परम्परा से दूरी बनाना चाहता है। नागार्जुन की कविता इतनी मारक है कि सीधे टारगेट पर प्रहार करती है और बिना किसी दम्भ के मुस्‍कराकर अपनी जीत का ऐलान करती है। शब्द की मारक क्षमता का आँकलन बाबा की विशेषता थी। बाबा जानते थे कि सब कुछ खत्म हो जायेगा लेकिन कविता में फँसे हुए शब्द हमेशा लोगों के दिलों में जिन्दा रहेंगे और ताल ठोंक कर कहेंगे-

‘बाल न बाँका कर सकी, शासन की बंदूक’
शब्द की शक्ति यही है।
बक़ौल ग़ालिब- ‘जो आँख से टपका तो फिर लहू क्या है?’

नागार्जुन के शब्द बड़े पावरफुल हैं। उनमें ग़ज़ब की धार है, पैनापन है और ज़रूरत पड़ने पर खंज़र की तरह दुश्मन के सीने में उतरने की कला है।

अपने परिवेश की मामूली से मामूली डिटेल बाबा की नज़रों से चूकी नहीं है। बाबा सभी जगह देखते हैं और तरकश से तीर निकाल-निकाल कर प्रत्यंचा पर कसते हैं। इसी तारतम्य में लेखक और प्रकाशक के बीच समीकरण की भी उन्होनें दिलचस्प पड़ताल की है।

हिन्दी के लेखक की दरिद्र आर्थिक-स्थिति और प्रकाशकों की सम्पन्नता को विषय बनाकर बाबा नागार्जुन की एक कविता है ‘सौदा’। ‘सौदा’ यानी ‘डील’। लेखक और प्रकाशक के अंतर्संबंधों की पड़ताल करती कविता ‘सौदा’ में बाबा ने बड़ी सहजता से लेखकों की निरीह-दरिद्रता और प्रकाशकों के काइयाँपन को बयान किया है। इस कविता में यूँ कहें कि धूर्त प्रकाशकों को बड़े प्यार से चाँदी का जूता मारा है। प्रकाशक जो कि मूलतः विक्रेता होता है किन्तु कच्चे माल के रूप में उसे पाण्डुलिपियाँ तो खरीदनी ही पड़ती हैं। इस हिसाब से ‘सौदा’ में प्रकाशक एक ऐसे खरीददार के रूप में प्रस्तुत किया गया है जिसे प्रत्यक्षतः रचनाओं की ज़रूरत है लेकिन वह विक्रेता पर अहसान भी जताना चाहता है कि न चाहते हुए, घाटे की सम्भावना होते हुए भी वह कवि का तैयार माल खरीदने को मजबूर है। ऐसा इसलिए है कि दुर्भाग्यवश प्रकाशक इस धंधे में फँसा हुआ है। अच्छे करम होते तो वह कोई और काम न कर लेता। काहे रद्दी छापने के काम में फँसा होता। प्रकाशक का दृष्टिकोण पता नहीं दूसरी भाषाओं में कैसा है, किन्तु हिन्दी में तो जो नागार्जुन का अनुभव है, वैसा ही खट्टा-कसैला अनुभव कमोबेश तमाम लेखकों को होता है। लेखकों को प्रकाशक की चौखट में माथा रगड़ना ही पड़ता है। सिद्ध करना पड़ता है कि ‘हाँ जनाब, आपने अभी तक जो छापा, वाकई कूड़ा था, लेकिन आप मेरी कृति को तो छापिए, देखिएगा हाथों-हाथ बिक जायेंगी प्रतियाँ और धड़ाधड़ संस्करण पे संस्करण निकालने होंगे। ये किताब छपेगी तो जैसे प्रकाशन जगत में क्रान्ति आ जायेगी। आप एक बार हमारे प्रस्ताव पर विचार तो करें।’

जवाब में प्रकाशक यही कहता रहेगा-
‘लेकिन जनाब यह मत भूलिए कि डालमिया नहीं हूँ मैं
अदना-सा बिजनेसमैन हूँ
खुशनसीब होता तो और कुछ करता
छाप-छाप कर कूड़ा भूखों न मरता।’

ये हैं मिस्टर ओसवाल, हिन्दी की प्रगतिशील पुस्तकों के पब्लिशर मिस्टर ओसवाल। जिनकी नामी दुकान है ‘किताब कुंज’। मिस्टर ओसवाल का चरित्र-चित्रण जिस तरह नागार्जुन ने किया है उससे हिन्दी के अधिकांश लेखक परिचित हैं। देखिए मिस्टर ओसवाल नामक प्रकाशक जो कैप्सटन सिगरेट का पैकेट रखता है, जिसकी कलाई पर है ‘स्वर्णिम चेन दामी रिस्टवाच की’,

जिसने
‘अभी अभी ली है ‘हिन्दुस्तान फोर्टीन’
सो उसमें यदा-कदा साथ बिठाते हैं
पान खिलाते हैं, गोल्ड फ़्लेक पिलाते हैं
मंजुघोष प्यारे और क्या चाहिए बेटा तुमको???’
है न प्रकाशकीय पात्र की अद्भुत सम्पन्नता। इसी के बरअक्स आप ज़रा लेखक की विपन्नता का दृश्य देखें-
‘बेटा जकड़ा है बान टीबी की गिरफ़्त में
पचास ठो रुपइया और दीजियेगा
बत्तीस ग्राम स्टप्टोमाईसिन कम नहीं होता है
जैसा मेरा वैसा आपका
लड़का ही तो ठहरा
एं हें हें हें कृपा कीजियेगा
अबकी बचा लीजियेगा…एं हें हें हें
पचास ठो रुपइया लौंडे के नाम पर!’

लेखक प्रकाशक के आगे अपनी व्यथा को किस तरह गिड़गिड़ाकर व्यक्त कर रहा है-
‘जियेगा तो गुन गायेगा लौंडा हिं हिं हिं हिं….हुँ हुँ हुँ हुँ
रोग के रेत में लसका पड़ा है जीवन का जहाज़।’

प्रगतिशील प्रकाशक मिस्टर ओसवाल के सामने लेखक नतमस्तक है। वह नहीं चाहता कि प्रकाशक उसकी पाण्डुलिपि वापस करे।

‘जितना कह गया, उतना ही दूँगा
चार सौ से ज़्यादा धेला भी नहीं
हो गर मंजूर तो देता हूँ चैक
वरना मैनस्कृप्ट वापस लीजिए
जाइए, गरीब पर रहम भी कीजिए।’

बस प्रकाशक का ये जवाब लेखक की कमर तोड़ देता है। अच्छे-अच्छे लेखक की हवा निकल जाती है जब प्रकाशक सिरे से पाण्डुलिपि को नकार दे। किसी भी लेखक के लिये सबसे मुश्किल क्षण वह होता है, जब किसी कारण से उसका लिखा ‘अस्वीकृत’ हो जाये या ‘वापस लौट आये’।

इस कविता में तीसरा पात्र ‘पाण्डुलिपि’ है। पाण्डुलिपि यानी लेखक का उत्पाद। इस उत्पाद के सहारे प्रकाशक युगों-युगों तक कमाता है लेकिन लेखक के रूप में पाण्डुलिपि को लेकर नागार्जुन के मन की व्यथा-कथा का एक बिम्ब-

‘बिदक न जाएं कहीं मिस्टर ओसवाल?
पाण्डुलिपि लेकर मैं क्या करूँगा?
दवाई का दाम कैसे मैं भरूँगा?
चार पैसे कम….चार पैसे ज्यादा….
सौदा पटा लो बेटा मंजुघोष!
ले लो चैक, बैंक की राह लो
उतराए खूब अब दुनिया की थाह लो
एग्रीमेंट पर किया साइन, कापीराइट बेच दी।’

मसीजीवी लेखक के लिये कालजयी सृजन बेहद सरल है लेकिन उस कालजयी सृजन के एवज़ धनार्जन बेहद कठिन है। क्या मिलता है लिखने के बदले? कितना कम मिलता है और वह भी अनिश्चित रहता है मिलना-जुलना। पता नहीं लेखन किसी को पसंद भी आयेगा या नहीं? संशय बना रहता है।

लेखक अक्सर कहते हैं कि सृजन एक तरह से प्रसव पीड़ा वहन करने वाला श्रमसाध्य काम है। इस प्रसव पीड़ा से लेखक हमेशा जूझता है। कितना मुश्किल काम है किसी कृति को सृजित करना। चाहे वह एक कविता हो, कहानी हो, उपन्यास हो या अन्य कोई विधा। क्लासिक तेवर के कवि बाबा नागार्जुन तक जब प्रकाशक के समक्ष अपनी रचना और व्यथा के साथ खड़े होते हैं तो सृजन के दर्द को भूल कर प्रकाशक के साथ बाबा नागार्जुन ने कितनी बारीकी से सृजन की शिद्दत को व्यंग्य से बाँधा है-

‘दस रोज़ सोचा, बीस रोज़ लिखा
महीने की मेहनत तीन सौ लाई!
क्या बुरा सौदा है?
जीते रहें हमारे श्रीमान् करुणानिधि ओसवाल
साहित्यकारों के दीनदयाल
नामी दुकान ‘किताब कुंज’ के कुंजीलाल
इनसे भाग कर जाऊँगा कहाँ मैं
गुन ही गाऊँगा, रहूँगा जहाँ मैं
वक्‍त पर आते हैं काम
कवर पर छपने देते हैं नाम।’

‘सौदा’ कविता का यही मर्म है। प्रकाशक ऐन-केन प्रकारेण, लेखक की पाण्डुलिपि पर क़ब्ज़ा कर लेता है और फिर छापने में मुद्दत लगा देता है। गरजुहा लेखक यानी मसिजीवी लेखक तो लिखने के लिये अभिशप्त होता ही है, दिन-रात आँखें फोड़कर, कमर तोड़कर वह लिखेगा ही।

यही नागार्जुन की शैली है। बाबा अपनी बात इस साफ़गाई से कहते हैं कि सामने वाला चारों खाने चित हो जाये और नाराज़ भी न हो। वाकई, इतिहास गवाह है कि हिन्दी का लेखक ग़रीब से ग़रीब होता गया है और प्रकाशक हिन्दुस्तान के कई शहरों के अलावा विदेशों में भी अपनी शाखाएं खोल रहे हैं। जब भी उनके पास ज़रूरी लेखन लेकर जाओ तो पहला वाक्य यही रहेगा-

‘मार्केट डल है जेनरल बुक्स का
चारों ओर स्लंपिंग हैं…’

और प्रकाशक की गर्जना का एक चित्र देखिए-

‘फुफ् फुफ् फुफकार उठे
प्रगतिशील पुस्तकों के पब्लिशर मिस्टर ओसवाल
नामी दुकान ‘किताब कुंज’ के कुंजीलाल
यहाँ तो ससुर मुश्किल है ऐसी कि….
और आप खाए जा रहे हैं माथा महाशय मंजुघोष!’

ऐसी बात, इतनी सादगी से और इतनी ताक़त से बाबा नागार्जुन ही कह सकते हैं…सिर्फ और सिर्फ नागार्जुन…..

अनवर सुहैल की कवि‍तायें

वरि‍ष्‍ठ कवि‍ और ‘संकेत’ के सम्‍पादक अनवर सुहैल की कवि‍तायें-

वनडे क्रिकेट और बच्चे

पदयात्रियों, मोटर-गाड़ियों से बेपरवाह
बीच सड़क पर
क्रिकेट खेलते बच्चे
डरा नहीं करते
पिता-चाचा या दादा की घुड़कियों से

भुनभुनाएं बुजुर्ग
चिड़चिड़ाएं अध्यापक
तो क्या करें बच्चे
पाकिस्तान के विरुद्ध
खेली गई पारियों को
देखते हैं वे ही लोग
सारा काम छोड़
आँखें फोड़
उत्तेजना के साथ
जैसे सीमा पर चल रहा हो युद्ध…

नहीं सोचते बच्चे
सिगरेट, ठंडा और मदिरा के निर्माता
क्यों बना करते
भारत-पाक क्रिकेट श्रृंखला के प्रायोजक
क्रिकेट सितारों की जादुई प्रसिद्धि से अभिभूत
बच्चों को तो सीखना है
सचिन जैसे ‘स्ट्रोक्स’
या कपिल जैसी आक्रामकता!

क्रिकेट खेलते बच्चे
नहीं बनना चाहते
अध्यापक, गणितज्ञ, वैज्ञानिक, संगीतज्ञ
इंजीनियर, डॉक्टर
और साहित्यकार तो एकदम नहीं
वे रातों-रात
होना चाहते मशहूर
मात्र एक अदद शतकीय पारी
दिला सकती
प्रतिष्ठा, पद, पैसा असीमित

क्रिकेट खेलते बच्चे
जल्द ही सीख जाते
व्यक्तिगत स्कोर का महत्व
जीतने के लिए
चालाकियों की अनिवार्यता
प्रायोजकों, सटोरियों के इच्छानुसार
खेल का प्रदर्शन….

अब्बा

कौन कहता है
वह टूट गए हैं
ज़रा देखिए ध्यान से
बढ़ती उम्र के कारण
वह कुछ झुके ज़रूर हैं
झुकता है जैसे कोई फलदार पेड़
झुकती जैसे फूलों भरी डालियाँ

अब्बा पर्याय हैं
आँगन के उस पीपल का
जो जाने कब से
खड़ा है अकेला
निहारता
सिद्धबाबा पहाड़ी पर बने मन्‍दि‍र को
बदलते मौसम
धूप-छाँह के खेल
दिन-रात की कारीगरी में लिप्त प्रकृति
डिगा नहीं पाई
अब्बा का मन

अवकाश प्राप्ति के बाद भी
अब्बा हैं वही अध्यापक
जिसे समाज को शि‍क्षित करने का
महती-उत्तरदायित्व मिला है
इसीलिए शायद अब भी
वह चाहते सिखाना
अनुभवों के सिलेबस से
व्यवहारिक ज्ञान की वर्णमाला

जने क्यों अक्सर अब्बा
दाहिने हाथ की तर्जनी
हिलाते रहते आजकल
लगता है किसी
पेचीदा सवाल को
मन ही मन करते हैं हल

अक्सर याद करते आजकल अब्बा
वे दिन
जब उनकी बेंत की डर से
पाठशाला नहीं आना चाहते थे छात्र
और मार खाकर जो पढ़ गये
वे सब आगे बढ़ गये।
मिल जाते आज भी
ऐसे विद्यार्थी
झुककर करते प्रणाम
गुरु-दक्षिणा स्वरूप
सादर प्रस्तुत करते पान
चौ़ड़ा हो जाता
अब्बा का सीना
कहते, एक शि‍क्षक
जीवन में यही तो कमाता है।

वो भी एक ज़माना था
जब अब्बा की परछाईं से भी
डरते थे हम
भागते थे कोसों दूर
उनके थप्पड़ खाकर
कई बार मूत दिया करते थे
पेंट में हम
शायद अम्मी भी डरती थीं उनसे
आज हमारे बच्चे
हमारे कपार पे चढ़कर
पूरी करवा लेते अपनी
जायज़-नाजायज़ मांग
तब हम कहाँ सीधे
अब्बा से मांग पाते थे
कुछ भी
अम्मी के ज़रिए पहुँचती थीं बातें तब
अब्बा के पास

मुझे अपने अब्बा पर है गर्व
क्योंकि दोस्तों के बूढ़े बाप
मिलने पर
खा जाते दिमाग
अपने युवा बेटे-बहू की शि‍कायतों का
कच्चा चिट्ठा खोल, कर देते हलकान
बताते कि उनके बच्चे
निकले सब बेईमान…

जबकि नहीं करते अब्बा
किसी राहगीर को परेशान
नहीं सुनाते किसी को
बेटे-बहू की नाफ़रमानियों की
कचड़ा दास्तान

जबकि वे चाहें तो
क्या उनके पास
नहीं हैं उपलब्ध
कई आख्यान…???

शकीला की छठवीं बेटी

‘लेबर-रूम’ के बाहर
खिन्न हैं आयाएं
नर्सें ख़ामोश
आज की ‘बोहनी’ बेकार हुई
‘ओ गॉड, ये ठीक नहीं हुआ!’
शकीला इस बार भी
पुत्र की आस में
नौ माह तक
ढोती रही एक ‘कन्या-भ्रूण’
उसके शौहर ने क्या समझ रखा है
शकीला की कोख को एक प्रयोगशाला
जिसमें प्रतिवर्ष किया जाता प्रयोग
एक ‘चांस’
कि शायद इस बार
कुलदीपक हो उत्पन्न
कि शायद इस बार
मिल जाये ज़िल्लत से छुटकारा
सच ही तो है
कि बेटियों की माँ होना
दुर्भाग्य का पर्याय है

‘जल्दी सफाई का काम पूरा करा!’
सिस्टर थॉमस इसी तरह है चिड़चिड़ाती
जिस दिन कोई ‘कन्या’ संसार में आती
कुछ पूछने पर बिगड़ जाती
‘क्या ज़रूरत है किसी टीका-वीका की
जी जायेगा बच्चा
लड़की जात जो ठहरी।’

शकीला की मनोदशा देख
आयाएं हैं उदास
लगता है
रक्ताल्पता की शि‍कार
पतली-दुबली शकीला
पागल हो जायेगी
लगातार छठवीं बार
प्रसव-पीड़ा सहकर
पुत्र-रत्न से वंचित माँ का दुख
क्या समझ पायेगा कोई कवि!

बगल मे पड़ी
नवजात कन्या रोने लगी
शकीला के ममता नहीं उमड़ती
शकीला उसे दूध नहीं पिलाती
बूढ़ी सास माथे पर हाथ धरे
टिकी बिस्तर के पैताने
हर बार की तरह इस बार भी
जिसकी भविष्यवाणी ग़लत साबित हुई
जबकि तमाम लक्षणों के मुताबिक
बहू ने जनना था पोता
वह नाराज़ है ख़्वाज़ा ग़रीब नवाज़ से भी
जिन्होंने पूरी न की मनौती
शकीला आँखें बंद किये
लेटी चुपचाप मुर्दा सी

तभी आ गई नज़मा
शकीला की बड़ी बेटी
उसने झट उठा लिया गोद में
नवजात कन्या-शि‍शु
लगी पुचकारने उसे
रोती बच्ची उसकी गोद में आकर
लाड़-दुलार पाकर
चुप हुई
जैसे उसने पा लिया हो ‘मुहाफ़िज़’ कोई।

मुसलमान

उससे फिर
नहीं पूछता कोई
तुम किस प्रदेश या जिले के निवासी
जब जान जाते बहुसंख्यक
कि उसका नाम है सुलेमान
वह है एक मुसलमान
इसके अलावा
उसकी नहीं हो सकती
और कोई पहचान
समझ गये श्रीमान!

दुख की उम्र

रसूल हमज़ातो न कहा
दुख की उम्र
होती एक बरस
फिर आदमी भूल जाता
बेहद अपनों को
बीते सपनों को
मुझे लगता
अन्य तमाम चीज़ों के साथ
दुख की औसत आयु भी
हुई है कम
बिछड़ों की याद में
मनाते नहीं अब लोग ग़म
बमुश्‍कि‍ल तमाम
किया जाता याद
ज्यादा से ज्यादा
एक सप्ताह!

ग्रंथालयों में महाकवि

कवि बतियाता है
सिर्फ मित्र-कवि से
चंद कूट संकेतों के ज़रिए
जिस तरह
एक किसान, दूसरे किसान से
एक महिला, दूसरी महिला से
एक चिड़िया, दूसरी चिड़िया से

कवि
किसान के पास नहीं जाता
जबकि किसान चाहता गुनगुनाना
उसके गीत
हल-बैलों की लय-ताल-चाल में।

कवि
जाता नहीं श्रमिक के पास
जबकि श्रमिक चाहता उच्चारना
मशीनों की खटर-पटर में
शब्द-लय पेवस्त करना।

कवि
बैठता आजकल
धन्ना-सेठ प्रकाशकों के संग
आलोचकों-सम्पादकों के चूमता क़दम
सत्ता के गलियारे
बांधे हाथ
खीसें निपोरे
खेलता इक खेल
स्वाभिमान, प्रतिभा और अस्तित्व को
लगा दाँव पर

कवि
जीवित रहना चाहता
ग्रंथालयों की सीलन भरी उबासियों में
इतिहास पुरुष बनने का स्वप्न
हर लेता उसकी उम्र भर का चैनो-सुकून

कवि
अपने भोथरे शब्दों को
तिकड़म से
कराता सिद्ध-प्राणवान
जोड़-तोड़ से
बन जाता
इस सदी का महाकवि!

कहा आपने

कहा आपने
बरखा होगी, फसल उगेगी
भर-भर जायेगा खलिहान

कहा आपने
शासन यह जनता ही का
हँसी-खुशी किया मतदान

कहा आपने
स्वप्न हुये साकार
भूखा-नंगा कोई नहीं
ऊँचा-नीचा कोई नहीं
अगड़ा-पिछड़ा कोई नहीं
सब होठों पर खिला करेगी
मंद-मंद मुस्कान

कहा आपने
माना हमने
आता नहीं समझ में लेकिन
आप हमेशा भरमाते क्यों
मान हमेशा हम जाते क्यों?

ग्यारह सि‍तम्बर के बाद : अनवर सुहैल

अनवर सुहैल

वरि‍ष्‍ठ लेखक और ‘संकेत’ के संपादक अनवर सुहैल की कहानी-

ग्यारह सितम्बर के बाद करीमपुरा में एक ही दिन, एक साथ दो बातें ऐसी हुईं, जिससे चिपकू तिवारी जैसे लोगों को बतकही का मसाला मिल गया।

अव्वल तो ये कि हनीफ़ ने अपनी खास मियाँकट दाढ़ी कटवा ली । दूजा स्कूप अहमद ने जुटा दिया…जाने उसे क्या हुआ कि वह दँतनिपोरी छोड़ पक्का नमाज़ी बन गया और उसने चिकने चेहरे पर बेतरतीब दाढ़ी बढ़ानी शुरू कर दी।

दोनों ही मुकामी पोस्ट-आफिस के मुलाजिम।

अहमद, एक प्रगतिशील युवक अनायास ही घनघोर नमाजी कैसे बना?

हनीफ ने दाढ़ी क्यों कटवाई?

सन्’चौरासी के दंगों के बाद सिक्खों ने अपने केश क्यों कुतरवाए…

अहमद आज इन सवालों से जूझ रहा है।

अहमद की चिन्ताओं को कुमार समझ न पा रहा था। कल तक तो सब ठीक-ठाक था ।

आज अचानक अहमद को क्या हो गया?

वे दोनों ढाबे पर बैठे चाय की प्रतीक्षा कर रहे थे।

कुमार उसे समझाना चाह रहा था, ‘‘छोड़ यार अहमद दुनियादारी को…बस ‘वेट एण्ड वाच’… जो होगा ठीक ही होगा।’’

‘‘वो बात नहीं है यार…कुछ समझ में नहीं आता कि क्या किया जाए?’’, अहमद उसी तरह तनाव में था, ‘‘जाने कब तक हम लोगों को वतनपरस्ती का सबूत देने के लिए मजबूर किया जाता रहेगा।’’

कुमार खामोश ही रहा ।

वे दोनों चौंतीस-पैंतीस साल के युवक थे ।

करीमपुरा से दोनों एक साथ पोस्टआफिस काम पर आते ।

आफिस में अक्सर लोग उन्हें एक साथ देख मजाक करते- ‘अखण्ड भारत की एकता के नमूने…’

अहमद का दिमागी संतुलन गड़बड़ाने लगा।

‘‘अब मुझे लगने लगा है कि मैं इस मुल्क में एक किरायेदार की हैसियत से रह रहा हूँ, समझे कुमार…एक किरायेदार की तरह…!’’

यही तो बात हुई थी उन दोनों के बीच… फिर जाने क्यों अहमद के जीवन में अचानक बदलाव आ गया?

हनीफ़ के बारे में अहमद सोचने लगा।

पोस्टआफिस की डाक थैलियों को बसस्‍टैड तथा रेलवे स्टेशन पहुँचाने वाले रिक्‍शा चालक हनीफ। बा-वक्‍त पंचगाना नमाज़ अदा करना और लोगों में बेहद खुलूस के साथ पेश आना उसकी पहचान है । पीर बाबा की मज़ार पर हर जुमेरात वह फातिहा-दरूद पढ़ने जाता है । अहमद को अक्सर धार्मिक मामलात में वही सलाह-मशविरा किया करता ।

यकीन मानिए कि हनीफ एक सीधा-सादा, नेक-बख्‍त़, दीनदार या यूँ कहें कि धर्म-भीरू किस्म का इंसान है। वह खामखाँ किसी से मसले-मसायल या कि राजनीतिक उथल-पुथल पर छिड़ी बहस में कभी हिस्सा नहीं लेता। हाँ, अपने विवेक के मुताबिक आड़े वक्त बचाव में एक मशहूर शेर की पहला मिसरा वह अक्सर बुदबुदाया करता- ‘उनका जो काम है वह अहले सियासत जाने…’

हुआ ये कि ग्यारह सितम्बर के बाद दुनिया के समीकरण ऐसे बदले कि कोई भी अपने को निरपेक्ष साबित नहीं कर पा रहा था । सिर्फ दो ही विकल्प ! अमेरिका के आतंक-वि‍रोधी कार्यक्रम का समर्थन या विरोध… बीच का कोई रास्ता नहीं । यह तो एक बात हुई । ठीक इसी के साथ दो बातें गूँजी कि दुनिया में आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले लोग इस्लामी धर्मावलंबी हैं, दूसरा यह कि इस्लाम आतंकवादी धर्म नहीं। वही मिसाल कि ठण्डा और गर्म एक साथ… तर्क  की कोई गुंजाइश नहीं।

बहुत जल्दबाजी में ये बात स्थापित कर दी गई कि सारी दुनिया में आतंकवाद के बीज बोने वाले और संसार को चौदहवीं सदी में ले जाने वाले लोग मुसलमान ही हैं।

अरबियों-अफगानियों की तरह दाढ़ी के कारण धोखे में सिखों पर भी अमरीका में अत्याचार हुये। बड़े मासूम होते हैं अमरीकी !

वे मुसलमानों और सिखों में भेद नहीं कर पाते। बड़े अमन-पसंद हैं वे । आज उन्हें किसी ने ललकारा है। अमरीकियों को संसार में कोई भी ललकार नहीं सकता। वे बहुत गुस्से में हैं। इसीलिए उनसे ‘मिष्टेक’ हो सकती है । ‘मिष्टेक’ पर याद आया…

उर्दू में मंटो नाम का एक सिरफिरा कथाकार हुआ है। जिसने दंगाइयों की मानसिकता पर एक नायाब कहानी लिखी थी। ‘मिष्टेक हो गया’… जिसमें दंगाई धोखे में अपनी ही बिरादरी के एक व्यक्ति का क़त्ल कर देते हैं। असलियत जानने पर उनमें यही संवेदना फूटी- ‘‘कि साला मिष्टेक हो गया…’’

हनीफ ने शायद इसीलिए अपनी दाढ़ी कटवा ली हो, कि कहीं वह किसी ‘मिष्टेक’ का शिकार न हो जाए ।

और इस तरह चिपकू तिवारी जैसे लोगों को बतकही का मसाला मिल गया…

चिपकू तिवारी है भी गुरु-चीज़…‘गप्पोलोजी’ का प्रोफेसर…खूब चुटकी लेते हैं पोस्ट-मास्टर श्रीवास्तव साहब भी। हैं भी रोम के नीरो। अपनी ही धुन में मगन… चमचों की एक बड़ी फौज के मालिक। करीमपुरा इस क्षेत्र का ऐसा पोस्टआफिस, जिसमें सालाना एक-डेढ़ करोड़ की एन.एस.सी. बेची जाती है । बचत-खाता योगदान में जिले की यह सबसे बड़ी यूनिट है । इस औद्यौगिक नगर में पिछले कई सालों से जमे हैं श्रीवास्तव साहब। यदि कभी उनका कहीं तबादला हुआ भी तो एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाकर आदेश रुकवा लिये। श्रीवास्तव साहब अक्सर कहा करते- ‘करीमपुरा बड़ी कामधेनु जगह है…।’

सुबह-सुबह पोस्टआफिस में चिपकू तिवारी और श्रीवास्तव साहब की मण्डली ने अहमद का मूड ऑफ किया।

चिपकू तिवारी पहले बी.बी.सी. चैनल कहलाया करता था। लेकिन ग्यारह सितम्बर के बाद वह ‘अल-जज़ीरा’ के नाम से पुकारा जाने लगा।

हुआ यह कि सुबह जैसे ही अहमद पोस्टआफिस में घुसा, उसे चिपकू तिवारी की आवाज़ सुनाई दी । वह भांज रहा था, ‘‘अमेरिका में सिखों के साथ ग़लत हो रहा है । अमेरिकन ससुरे कटुवा और सिख में फर्क नहीं कर पाते ।’’

फिर किसी षड्यंत्र भनक से अहमद के क़दम ठिठक गए!

वह थोड़ी देर ठहर गया, और रुक कर उनकी बातें सुनने लगा।

श्रीवास्तव साहब ने फिकरा कसा, ‘‘चलो जो हुआ ठीक हुआ…अब जाकर इन मियाँ लोगों को अपनी टक्कर का आदमी भंटाया है ।’’

‘‘ हाँ साहब, अब लड़ें ये साले मियाँ और ईसाई… उधर इजराइल में यहूदी भी इन मियाँओं को चाँपे हुये हैं।’’

‘‘ वो हनीफवा वाली बात जो तुम बता रहे थे ?’’ श्रीवास्तव साहब का प्रश्‍न।

अहमद के कान खड़े हुए। तो हनीफ भाई वाली बात यहाँ भी आ पहुँची ।

‘‘ अरे वो हनीफवा… इधर अमेरिका ने जैसे डिक्लेयर किया कि लादेन ही उसका असल दुश्‍मन है, हनीफवा ने तत्काल अपनी दाढ़ी बनवा ली । आज वो मुझे सफाचट मिला तो मैंने उसे खूब रगड़ा। उससे पूछा कि ‘का हनीफ भाई, अभी तो पटाखा फूटना चालू हुआ है…बस इतने में घबरा गए? हनीफवा कुच्छो जवाब नहीं दे पाया।’’

भगवान दास तार बाबू की गुट-निरपेक्ष आवाज सुनाई दी, ‘‘सन चैरासी के दंगों के बाद सिखों ने भी तो अपने केश कतरवा लिए थे। जब भारी उथल-पुथल हो तब यही तो होता है ।’’

अपने पीछे कुछ आवाजें सुन अहमद दफ्तर में दाखिल हुआ।

उसे देख बतकही बंद हुई।

अहमद इसी बात से बड़ा परेशान रहता है। जाने क्यों अपनी खुली बहसों में लोग उसे शामिल नहीं करते। इसी बात से उसे बड़ी कोफ्त होती। इसका सीधा मतलब यही है कि लोग उसे गैर समझते हैं।

तभी तो उसे देखकर या तो बात का टॉपिक बदल दिया जाएगा या कि गप बंद हो जाएगी। अक्सर उसे देख चिपकू तिवारी इस्लामी-तहज़ीब या धर्मशास्त्रों के बारे में उल्टे-सीधे सवालात पूछने लगता है।

आजकल की ज्वलंत समस्या से उपजे कुछ शब्द, जिसे मीडिया बार-बार उछालता है, उनमें अमरीका,  अल-कायदा, ओसामा बिन लादेन, अफगान, पाकिस्तान,जिहाद तथा इस्लामी फंडामेंटालिज़्म से जुडे़ अन्य अल्फ़ाज़ हैं। इन्हीं शब्दों की दिन-रात जुगाली करता है मीडिया।

अहमद से चिपकू तिवारी अपनी तमाम जिज्ञासाएं शान्त किया करता। अहमद जानता है कि उसका इरादा अपनी जिज्ञासा शान्त करना नहीं बल्कि अहमद को परेशान करना है।

कल ही उसने पूछा था, ‘‘अहमद भाई ये जि‍हाद क्या होता है ?’’

अहमद उसके सवालों से परेशान हो गया।

चिपकू तिवारी प्रश्‍न उस समय पूछता जब श्रीवास्तव साहब फुर्सत में रहते ।

श्रीवास्तव साहब उसके प्रश्‍नों से खूब खुश हुआ करते ।

इधर अहमद इन सवालों से झुँझला जाता ।

वह कहता भी कि उसने इस्लामी धर्मशास्‍त्रों का गहन अध्ययन नहीं किया है। कहाँ पढ़ाया था मम्मी-पापा ने उसे मदरसे में । अंग्रेजी और हिन्दी माध्यम से शि‍क्षा ग्रहण की उसने । वह तो पापा की चलती तो उसका खतना भी न हुआ होता।

बड़े अजीबोगरीब थे पापा।

मम्मी और मामुओं की पहल पर उसका खतना हुआ।

पापा कितने नाराज हुए थे । वह नहीं चाहते थे कि उनका बेटा परम्परागत मजहबी बने। वह चाहते थे कि उनका बेटा इस्लाम के बारे में स्वयं जाने और फिर विवेकानुसार फैसले करे।

मुस्लिम परिवेश से अहमद बहुत कम वाकिफ था। पापा सरकारी महकमे में ‘ए’ क्लास आफीसर थे… उनका उठना बैठना सभी कुछ गैरों के बीच था। धार्मिक रूप से वह ईद-बकरीद भर में सक्रिय रहते थे । कारण कि विभागीय आला अफसरान और चहेते मातहतों के लिए दावत आदि की व्यवस्था करनी पड़ती थी। ‘फ्रेण्ड्स’ भी ऐसे कि ईद-बकरीद आदि के साथ वे अनजाने में मुहर्रम की भी मुबारकबाद दे दिया करते। उन्हें ये भी पता न होता कि मुहर्रम एक ग़म का मौका होता है।

मम्मी को पापा की ये आजाद-ख्याली फूटी आँख न भाती । मम्मी उन्हें समझाया करतीं। पापा हँस देते, ‘‘आखिरी वक्त में क्या ख़ाक मुसलमाँ होंगे ।’’

वाकई वह मरने को मर गए किन्तु ईद-बकरीद के अलावा किसी तीसरी नमाज़ के लिए उन्हें समय मिलना था, न मिला। उस हिसाब से अहमद कुछ ठीक था। वह जुमा की नमाज़ अवश्‍य अदा किया करता । मम्मी की टोका-टाकी के बाद धीरे-धीरे उसने अपनी जिन्दगी में यह आदत डाली। निकाह के बाद कुलसूम की खुशि‍यों के लिए अव्वल-आखिर रोज़ा भी अब वह रखने लगा था।

अहमद के पापा एक आजाद ख्याल मुसलमान थे । वह अक्सर अल्लामा इकबाल का एक मशहूर शेर दुहराया करते-

‘‘ क़ौम क्या है क़ौमों की इमामत क्या है

इसे क्या जाने ये दो रकअ़त के इमाम !’’

चूँकि मम्मी एक पक्के मजहबी घराने से ताल्लुक रखती थीं,  इसलिए पापा की  दाल न  गल पाती । कहते हैं कि दादा-जान को पापा के  बारे में इल्म था कि उनका यह बेटा मजहबी नहीं है। इसलिए बहुत सोच विचार कर वह एक मजहबी घराने से बहू लाए थे, ताकि खानदान में इस्लामी परम्परायें जीवित बची रहें । अहमद के पापा वकील थे । वह एक कामयाब वकील थे । काफी धन कमाया उन्होंने। कहते भी थे कि अगर कहीं जन्नत है तो वह झूठों के लिए नहीं। इसलिए वहाँ की ऐशो-इशरत की क्या लालच पालें। सारे वकील संगी-साथी तो वहाँ जहन्नुम में मिल ही जायेंगे। अच्छी कम्पनी रहेगी।

इस दलील के साथ वह एक ज़ोरदार ठहाका लगाया करते।

एक सड़क हादसे में उनका इंतेकाल हुआ था। तब अहमद स्नातक स्तर की पढ़ाई कर रहा था । छिन्न-भिन्न  हो गई थी जि‍न्‍दगी…। उस बुरे वक्त में मामुओं ने मम्मी और अहमद को सम्भाल लिया था ।

ऐसे स्वतंत्र विचारों वाले पिता का पुत्र था अहमद और उसे चिपकू तिवारी वगैरा एक कठमुल्ला मुसलमान मान कर सताना चाहते ।

इसीलिए अक्सर अहमद का दिमाग खराब रहा करता।

वह कुमार से कहा भी करता, ‘‘ कुमार भाई, मैं क्या करूँ? तुमने देखा ही है कि मेरी कोई भी अदा ऐसी नहीं कि लोग मुझे एक मुसलमान समझें। तुममें और मुझमें कोई अन्तर कर सकता है ? मैं न तो दाढ़ी ही रखता हूँ और न ही दिन-रात नमाज़ें ही पढ़ा करता हूँ। तुमने देखा होगा कि मैंने कभी सरकार अथवा हिन्दुओं को कोसा नहीं कि इस मुल्क में मुसलमानों के साथ अन्याय किया जा रहा है। जबकि उल्टे मैंने यही पाया कि मुसलमानों की बदहाली का कारण उनकी अशि‍क्षा और दकियानूसी-पन है। चार पैसे पास आये नहीं कि ख़ुद को नवाबों-शहंशाहों का वंशज समझने लगेंगे। बच्चों के पास कपड़े हों या न हों। स्कूल से उन्हें निकाल दिए जाने की नोटिसें मिली हों, इसकी कोई चिन्ता नहीं। सब प्राथमिकतायें दरकिनार…घर में बिरयानी बननी ही चाहिए, वरना इस कमाई का क्या मतलब ! तालीम के नाम पर वही मदरसे और काम के नाम पर तमाम हुनर वाले काम ! कम उम्र में विवाह और फिर वही जि‍न्दगी के मसले। फिर भी लोग मुझे अपनी तरह का क्यों नहीं मानते।’’

कुमार अहमद के प्रश्‍नों को सुन चुप लगा गया। वह क्या जवाब देता?

ठीक इसी तरह अहमद चिपकू तिवारी के प्रश्‍नों का क्या जवाब देता ?

वह हिन्दू मिथकों, पुराण कथाओं और धर्म-शास्त्रों के बारे में तो आत्मविश्‍वास के साथ बातें कर सकता था, किन्तु इस्लामी दुनिया के बारे में उसकी जानकारी लगभग सिफ़र थी।

‘‘मुझे एक मुसलमान क्यों समझा जाता है, जबकि मैंने कभी भी तुमको  हिन्दू वगैरा नहीं माना । मुझे एक सामान्य भारतीय शहरी कब समझा जाएगा?’’

अहमद की आवाज़ में दर्द था ।

 

कल की तो बात है ।

वे दोनों आदतन बस-स्टैंड के ढाबे में बैठे चाय की प्रतीक्षा में थे। दफ्तर से चुराए चंद फुर्सत के पल… यही तो वह जगह है जहाँ वे दोनों अपने दिल की बात किया करते।

चाय वाला चाय लेकर आ गया ।

अहमद की तंद्रा भंग हुई ।

अम्बिकापुर से सुपर आ गई थी । बस स्‍टैंड में चहल-पहल बढ़ गई । सुपर से काफी सवारियाँ उतरती हैं।

करीमपुर चूँकि इलाके का व्यापारिक केन्द्र है अतः यहाँ सदा चहल-पहल रहती है।

चाय का घूँट भरते कुमार ने अहमद को टोका।

‘‘तुम इतनी जल्दी मायूस क्यों हो जाते हो ? क्या यही अल्पसंख्यक ग्रन्थि है, जिससे मुल्क के तमाम अल्पसंख्यक प्रभावित हैं ?’’

‘‘कैसे बताऊँ कि बचपन से मैं कितना प्रताडि़त होता रहा हूँ।’’ अहमद सोच के सागर में गोते मारने लगा।

‘‘जब मैं छोटा था तब सहपाठियों ने जल्द ही मुझे अहसास करा दिया कि मैं उनकी तरह एक सामान्य बच्चा नहीं, बल्कि एक ‘कटुआ’ हूँ ! वे अक्सर मेरी निकर खींचते और कहते कि ‘अबे साले, अपना कटा दिखा न! पूरा उड़ा देते हैं कि कुछ बचता भी है ?’ स्कूल के पास की मस्जिद से ज़ुहर के अज़ान की आवाज़ गूँजती तो पूरी क्लास मेरी तरफ़ देखकर हँसती। जितनी देर अज़ान की आवाज़ आती रहती मैं असामान्य बना रहता। इतिहास का पीरियड उपाध्याय सर लिया करते। जाने क्यों उन्हें मुसलमानों से चिढ़ थी कि वह मुगल-सम्राटों का जि़क्र करते आक्रामक हो जाते। उनकी आवाज़ में घृणा कूट-कूट कर भरी होती। उनके व्याख्यान का यह प्रभाव पड़ता कि अंत में पूरी क्लास के बच्चे मुझे उस काल के काले कारनामों का मुज़रिम मान बैठते।’’

कुमार ने गहरी साँस ली, ‘‘ छोड़ो यार… दुनिया में जो फेरबदल चल रहा है उससे लगता है कि इंसानों के बीच खाई अब बढ़ती ही जाएगी। आज देखो न,  अफ़गानियों के पास रोटी कोई समस्या नहीं। नई सदी में धर्मांधता, एक बड़ी समस्या बन कर उभरी है।’’

अहमद बेहद दुखी हो रहा था।

कुमार ने माहौल नरम बनाने के लिए चुटकी ली, ‘‘अहमद, सुपर से आज पूँछ-वाली मैडम नहीं उतरीं। लगता है उन्हें महीने के कष्ट भरे तीन दिनों का चक्कर तो नहीं ?’’

पूँछ-वाली यानी की पोनी-टेल वाली आधुनिका…

कुमार की इस बात पर अन्य दिन कितनी ज़ोर का ठहाका उठता था।

अहमद की खिन्नता के लिए क्या जतन करे कुमार !

चाय कब खत्‍म हो गई पता ही न चला ।

ढाबे के बाहर पान गुमटी के पास वे कुछ देर रुके । अहमद ने सिगरेट पी। कुमार ने पान खाया । अहमद जब तनाव में रहता, तब वह सिगरेट पीना पसंद करता। उसके सिगरेट पीने का अंदाज़ भी बड़ा आक्रामक हुआ करता ।

वह मुट्ठी बाँधकर उँगलियों के बीच सिगरेट फँसा कर, मुट्ठी को हाँठों के बीच टाइट सटा लेता। पूरी ताकत से मुँह से भरपूर धुआँ खींचता । कुछ पल साँस अंदर रख कर धुआँ अंदर के तमाम गली-कूचों में घूमने-भटकने देता। फिर बड़ी निर्दयता से होंठों को बिचकाकर जो धुआँ फेफड़े सोख न पाए हों, उसे बाहर निकाल फेंकता ।

कुमार ने उसके सिगरेट पीने के अंदाज से जान लिया कि आज अहमद बहुत ‘टेंशन’ में है।

वे दोनों चुपचाप पोस्टआफिस में आकर अपने-अपने जॉब में व्यस्त हो गए।

 

अहमद को कहाँ पता था कि उसके जीवन में इतनी बड़ी तब्दीली आएगी।

वह तेरह सितम्बर की शाम थी।

अहमद घर पहुँचा…देखा कि कुलसूम टीवी से चिपकी हुई है।

कुलसूम समाचार सुन रही है।

आश्‍चर्य! घनघोर आश्‍चर्य !! ऐसा कैसे हो गया…

अहमद ने सोचा, कुलसूम को समाचार चैनलों से कितनी नफ़रत है। वह अक्सर अहमद को टोका करती, ‘‘जब आप अखबार पढ़ते ही हैं, तब आपको समाचार सुनने की क्या जरूरत…। इससे अच्छा कि आप कोई धारावाहिक ही देख लिया करें। पूरा दिन एक ही खबर को घसीटते हैं ये समाचार चैनल…जिस तरह एक बार खाने के बाद भैंस जुगाली करती है।  जाने कहाँ से इनको भी आजकल इतने ढेर सारे प्रायोजक मिल जा रहे हैं।’’

अहमद क्या बताता। उसे मालूम है कि खाते-पीते लोगों के लिए आजकल समाचारों की क्या अहमियत है । अहमद जानता है कि समकालीन घटनाओं और उथल-पुथल से कटकर नहीं रहा जा सकता । यह सूचना-क्रान्ति का दौर है। करीमपुरा के अन्य मुसलमानों तरह उसे अपना जीवन नहीं गुजारना। वह नये जमाने का एक सजग, चेतना-सम्पन्न युवक है। उसे मूढ़ बने नहीं रहना है। इसीलिए वह हिन्दी अखबार पढ़ता है। हिन्दी में थोड़ी बहुत साहित्यिक अभिव्यक्तियाँ भी कर लेता।

अहमद जानता है कि मीडिया आजकल नयी से नयी खबरें जुटाने में कैसी भी ‘एक्सरसाइज’ कर सकता है । चाहे वह डायना की मृत्यु से जुड़ा प्रसंग हो, नेपाल के राज परिवार के जघन्य हत्याकाण्ड का मामला हो, तहलका-ताबूत हो या कि मौजूदा अमरीकी संकट…अचार, तेल, साबुन, जूता-चप्पल,  गहना-जेवर, काम-शक्तिवर्धक औषधियों और गर्भ-निरोध आदि के उत्पादकों एवम् वितरकों से भरपूर विज्ञापन मिलता है समाचार चैनलों को। यही कारण है कि समाचार चैनल आजकल अन्य चैनलों से अधिक मुनाफा कमा रहे हैं।

कुलसूम न्यूज सुनने में इतनी मगन थी कि उसे पता ही न चला कि अहमद काम से वापस आ गया है।

कुलसूम बीबीसी के समाचार बुलेटिन सुन रही थी। स्क्रीन पर ओसामा बिन लादेन की तस्वीर उठाए पाकिस्तानी नौजवानों के जुलूस पर पुलिस ताबड़-तोड़ लाठी चला रही है। अमरीकी प्रेसीडेंट बुश और लादेन के चेहरे का मिला जुला कोलाज इस तरह बनाया गया था कि ये जो लड़ाई अफगान की धरती पर लड़ी जानी है वह दो आदमियों के बीच की लड़ाई हो।

सनसनीखेज समाचारों से भरपूर वह एक बड़ा ही खतरनाक दिन था।

अहमद कुलसूम की बगल में जा बैठा ।

कुलसूम घबराई हुई थी।

ऐसे ही बाबरी-मस्जिद विध्वंस के समय कुलसूम घबरा गई थी।

आज भी उसका चेहरा स्याह था। कुलसूम किसी गहन चिंता में डूबी हुई थी।

अहमद ने टीवी के स्क्रीन पर नज़रें गड़ाईं। वहाँ उसे बुश-लादेन की तस्वीरों के साथ चिपकू तिवारी और श्रीवास्तव साहब के खिल्लियाँ उड़ाते चेहरे नज़र आने लगे। उसे महसूस हुआ कि चारों तरफ़ चिपकू तिवारी की सरगोशि‍यों और कहकहे गूँज रहे हैं।

अहमद का दिमाग चकराने लगा ।

जब कुलसूम ने अहमद की देखा तो वह घबराकर उठ खड़ी हुई ।

उसने तत्काल अहमद को बाहों का सहारा देकर कुर्सी पर बिठाया। फिर वह पानी लेने किचन चली गयी। पानी पीकर अहमद को कुछ राहत मिली ।

उसने  कुलसूम से कहा, ‘‘जानती हो …सन्  चैरासी के दंगों के बाद अपने पुराने मकान के सामने रहने वाले सिख परिवार के तमाम मर्दों ने अपने केश कुतरवा लिए थे।’’

कुलसूम की समझ में कुछ न आया। फिर भी उसने पति की हाँ में हाँ मिलाई, ‘‘हाँ, हाँ, परमजीते के भाई और बाप दाढ़ी-बाल बन जाने के बाद पहचान ही में न आते थे ?’’

‘‘बड़ी थू-थू मची है कुलसूम चारों तरफ…हर आदमी हमें लादेन का हिमायती समझता है। हम उसकी लाख मज़म्मत करें कोई फर्क नहीं पड़ता।’’ अहमद की आवाज़ हताशा से लबरेज़ थी।

अचानक अहमद ने कुलसूम  से कहा, ‘‘मग़रिब की नमाज़ का वक्त हो रहा है। मेरा पैजामा-कुर्ता और टोपी तो निकाल दो।’’

कुलसूम चौंक पड़ी।

आज उसे अपना अहमद डरा-सहमा और कमज़ोर सा नजर आ रहा था।