
वरिष्ठ लेखक-पत्रकार सुधीर सुमन की डायरी के अंश-
यह सोच के चला था कि पुराने साल में ही परिजनों और साथियों के बीच पहुँच जाऊँगा और अपनी ही जमीन पर नये साल का इंतजार करूँगा। रिजर्वेशन मिला नहीं, पर चूँकि ट्रेन के प्रस्थान स्टेशन से चलना था, इसलिए बैठने की जगह मिल गई। ट्रेन थी एक्सप्रेस, नाम के अनरूप सचमुच विभूति। इलाहाबाद से बनारस के बीच सिंगल लाइन में उसे यूँ भी चार-पाँच क्रासिंग का सामना करना पड़ता है, लेकिन उस रोज तो 35-40 मिनट चलने के बाद इंजन ने ही जवाब दे दिया। ट्रेन हंडिया स्टेशन से पहले ही खड़ी हो गई। दोनों ओर दूर तक गेहूँ के खेत। सामने रेल ट्रैक के बगल में लगाए गए पौधे, जो अभी पेड़ हुए नहीं, पौधे और पेड़ के बीच हैं, उनमें से सूखी लकडियाँ बटोरती कुछ लड़कियाँ, दायीं ओर बहुत लम्बा फ्लाईओवर, सूर्य का तेज पहले से ही गायब, अब तो उसके होने का भी कोई मतलब नहीं, धुआँ-धुआँ-सा चारों ओर। इंजन का इंतजार।
वक्त कैसे कटे! अरे हाँ, ट्रेन लेट है तो क्या, मेरे पास तो जरूरी काम है। मैं भी लेट हूँ। एक पत्रिका का नागार्जुन विशेषांक मुझे निकालना है, कई माह हो गए हैं, अब उसे तैयार ही कर देना है। उसमें आरा में उनकी जन्मशताब्दी के समापन के अवसर पर आयोजित समारोह में दिये गये कुछ वक्तव्यों को भी छापना है। मैंने अपना नन्हा-सा रिकार्डर निकाला और एक वक्तव्य, जो लगभग 36 मिनट का है, उसका ट्रांस्क्रिप्शन शुरू कर दिया। बीच-बीच में घड़ी भी देख रहा हूँ। डेढ़ घंटे गुजर गए। लोग एक-दूसरे को आश्वस्त कर रहे हैं कि सूचना मिली है, इंजन पंद्रह-बीस मिनट में पहुँच जाएगा। कोई कहता है, इंजन की लाइट नजर आ रही है। खैर, एक इंजन आ ही गया। वह ले चला, पर विभूति के नखरे, ब्रेक जाम या इंजन का दम उखड़ रहा, कुछ अजीब सी आवाजें आने लगीं, जैसे पहिये में कुछ फँस गया हो, कुछ घिसट रहा हो साथ। कुछ जलने की तीखी बू। गनिमत है कि ट्रेन फिर रुक गई। पर मेरी कलम की रफ्तार तेज, मानो ट्रेन के रुकने की भरपाई इससे हो जाएगी। एक वजह यह भी है कि रिकार्डर की बैट्री की एक ही डंडी बची हुई है, कहीं वह गायब, तो फिर कलम भी रुक जाए। कहीं एक आशंका कि डब्बे में आग न लग जाए। शंका-समाधान हेतु कुछ लोग गार्ड को बुला लाते हैं। लोग निश्चिंत हैं, यानी घड़बराने की बात नहीं।
सात बज गए, अब तक तो ट्रेन को बनारस से आगे निकल जाना चाहिये था। अरे अब तो मेरा ट्रास्क्रिप्शन भी खत्म होने वाला है। 5 मिनट का बचा हुआ है। 7 : 20 हुआ है। ट्रांस्क्रिप्शन पूरा हुआ और साथ ही बैट्री की इकलौती डंडी भी गायब हो गई, मगर ट्रेन अभी भी रुकी हुई है। सोचता हूँ कि अब भी ट्रेन चल पड़े तो 12 बजे अपने शहर में पहुँचा जाऊँगा। दो वर्षों के संधिकाल का संधिस्थल मेरा शहर बने मेरे लिए, तो क्या बात होगी, पर ये विभूति यहाँ से हिले तो सही! आखिर 8 बजे ट्रेन चल पड़ी, उम्मीद जगी कि ट्रेन जरूर रात 12 बजे मेरे शहर पहुँच जाएगी। ये नेहरू की तरह tryst with destiny का कोई चक्कर नहीं है। वैसे भी इस महान लोकतंत्र की संसद की सर्वोच्चता का चरम पाखंड साल के गुजरते-गुजरते हम देख चुके हैं, अब तो बस यही सोच रहा हूँ कि जरा आने वाले साल में जनता की सर्वोच्चता से और तीखेपन से साक्षात्कार हो हमारे रहनुमाओं, सरकारों और पार्टियों का, तो मजा आ जाए। जरा सर्वोच्चता के सिंहासन पर बैठे उद्दंड, भ्रष्ट और लुटेरे लोगों की अक्ल तो ठिकाने आए। मगर अभी तो सवाल यह है कि यह ट्रेन कब मेरे शहर पहुँचेगी! बीच-बीच में इसका रुकना जारी है।
सर्द स्याह रात में अपनी ही गति से ट्रेन जा रही है। बनारस पहुँचते-पहुँचते चार घण्टे विलंबित हो चुकी है। अब मैंने समय का ख्याल छोड़ दिया है। कई तरह के विचार आ-जा रहे हैं, नींद नहीं आ रही है। घड़ी से ध्यान हट चुका है। मालूम नहीं कब और कहाँ एक साल से दूसरे साल में मैं दाखिल हो गया। एक किशोर का कॉल- हैपी न्यू ईयर, कहाँ पहुँचे? मैं- मालूम नहीं, बक्सर भी नहीं पहुँची। आखिरकार 2:30 में ट्रेन आरा प्लेटफार्म पर दाखिल हुई। बाहर आया, रिक्शा लिया, सारी दूकानें बंद हैं, सिर्फ मुर्गे जाग रहे हैं और मुर्गों को बेचने वाले, रौशनी वहीं है। सन्नाटा, शीत और हवा। रिक्शा रुका, कुछ नौजवान आग ताप रहे हैं, उनके देखते-देखते मैं एक पतली गली में दाखिल हुआ, फिर एक सड़क पार किया, फिर एक लम्बी गली और पाँच-सात मिनट पैदल चलने के बाद अपने एक रिश्तेदार के यहाँ पहुँचा। इंतजार करते करते सो गए हैं लोग, पर तुरन्त जग गए। खाना मिला, खाया और फिर सो गया। घण्टे-डेढ़ घण्टे बाद ही एक चित्रकार साथी की शुभकामना नए साल की, उसके बाद फिर एक कॉल एक रिश्तेदार की, फिर नींद, फिर कुछ देर बाद एक कॉल इस बार एक रंगकर्मी साथी हैं- मौसम ठीक नहीं है, इसलिए सफदर हाशमी के शहादत दिवस के अवसर पर आज कार्यालय में ही एक संगोष्ठी रख ली गई है। बाहर नाटक करना सम्भव नहीं है।
लीजिए साहब, मौसम भी खराब हो गया। कितना खराब होगा! बाहर निकल के देखता हूँ। अच्छा, यह तो हल्की सी बूँदा-बाँदी है कितने देर तक चलेगी! लेकिन मौसम का मिजाज ठीक नहीं होता। नहाने-वहाने के बाद यार-दोस्तों, साहित्यकारों से मिलने के लिए निकलना है, पर बारिश बढ़ जाती है, और फिर लिहाफ में गुड़ुम। नींद जिसे दूर कर रखा था रात में वह आ दबोचती है, और फिर वक्त गुजरता जाता है, अवचेतन में कई-कई अनदेखे परिचित से प्रसंग चलते रहते हैं, लगता है कि मोबाइल बज रहा है देर से, आँख खुलती है, मोबाइल ही बज रहा है। फिर रंगकर्मी साथी हैं- आइए, थोड़ी देर में सबलोग आ जाएँगे।
अब तो निकलना ही पड़ेगा। हर साल यहां नाट्य संस्था ‘युवानीति’ सफदर की याद में नुक्कड़ नाटक करती है। नये साल की शुरुआत को मौज-मस्ती और जश्न के साथ लोग मनाते हैं, उस पूरे माहौल में यह बिल्कुल अलग किस्म का काम लगता है, पर ‘युवानीति’ के रंगकर्मी हर साल सफदर को याद करते ही हैं, नये साल के एक जरूरी कार्यभार की तरह। सड़कों पर कीचड़ है, हाल में दुबारा पढ़े गए श्रीलाल शुक्ल के उपन्यास ‘रागदरबारी’ की याद आती है, जिसमें गन्दगी के प्रसंगों का जिक्र कई बार आया है। काश, ऐसा होता कि घर से निकलता, सड़क और गलियाँ साफ होतीं और बिना किसी मुश्किल के मैं ‘युवानीति’ के कार्यालय पहुँच जाता, लेकिन जो नहीं है, उसका क्या गम! अभी तो हम जो कर सकते हैं, वह कर रहे हैं। गन्दगी हो या सफाई पैदल पहुँचने में समय लगभग दस-पंद्रह मिनट ही लगता है। तो इतने समय में मैं पहुँच गया कार्यालय।
मेरे सहपाठी कवि सुमन कुमार सिंह हैं, ‘युवानीति’ के नए संयोजक राजू रंजन हारमोनियम लिए बैठे हैं, कथाकार विजेंद्र अनिल के पुत्र कवि सुनील श्रीवास्तव हैं, रंगकर्मी अरुण प्रसाद है, सत्यदेव हैं, दो नए किशोर हैं। अभी और लोगों का इंतजार है। कवि जितेंद्र कुमार आते हैं, फिर आलोचक रामनिहाल गुंजन और हमारे पुराने रंगकर्मी साथी पत्रकार शमशाद प्रेम हमेशा की तरह लेट-लतीफ, उनके पहले कवि सुनील चौधरी आ चुके हैं। अरुण प्रसाद संगोष्ठी का संचालन शुरू करते हैं। राजू रंजन महेश्वर जी का गीत ‘सृष्टिबीज का नाश न हो, हर मौसम की तैयारी है/कल का गीत लिए होठों पर आज लड़ाई जारी है’ गाकर सफदर हाशमी और उनके साथ शहीद हुए रामबहादुर को श्रद्धांजलि देते हैं, सारे लोग उनकी आवाज में आवाज मिलाते हैं। एक मिनट का मौन के बजाय गीत के जरिये श्रद्धांजलि देना मुझे ज्यादा उचित लगता है।
मुझे बोलना है। मैं याद दिलाता हूँ कि हमारी सफदर हाशमी से नुक्कड़ नाटक और विचारधारा को लेकर बहसें भी थीं, लेकिन वाम सांस्कृतिक आंदोलन की वे ऐसी शख्सियत थे, जिनकी शहादत के बाद नए सिरे से कुछ वर्षों के लिए नुक्कड़ नाट्य आंदोलन में एक उभार आया था। 1992 में ‘युवानीति’ के रंगकर्मियों ने छात्रों की एक टीम बनाई थी, जिसने पहला जो नाटक किया था, वह सफदर का ही लिखा हुआ था- ‘राजा का बाजा’। मैंने भी उसमें एक प्रतिकोरस की भूमिका निभाई थी। यह अजीब विडम्बना रही कि जिस कांग्रेस के गुंडों ने उन्हें मारा, उसी कांग्रेस के साथ आने वाले सालों में सीपीएम का घनिष्ठ रिश्ता बनता गया। यहाँ तक कि उसी के आर्थिक नुस्खे को लागू करने के कारण भारी नुकसान भी उठाना पड़ा। जो हो, आर्थिक उदारीकरण और उपभोक्तावाद के दौर में हमें सफदर को इसलिए भी याद करना जरूरी लगता रहा कि इसके जरिये हम विचारधारा और संस्कृतिकर्म के प्रति अपनी प्रतिबद्धता की परख करते थे, अपने अंदर इस धारणा को और मजबूत बनाते थे कि संस्कृतिकर्म हमारी जिंदगी में दोयम दर्जे का काम नहीं, बल्कि रोजी-रोटी की जद्दोजहद से भी ज्यादा अर्थपूर्ण काम है, जिसे करते हुए जान भी दी जा सकती है। यह सच है कि संकट पहले से अधिक है, एक समय आरा में कई-कई नाट्य संस्थाएं थीं, पर आज जिस रूप में हो, ‘युवानीति’ ही बची हुई है, जो अपनी प्रतिबद्धता पर कायम है। बेशक इसने हाल के वर्षों में कोई यादगार प्रस्तुति नहीं की है, पर निरंतरता बनाए रखने के लिए यह हमेशा प्रयासरत है।
अरुण प्रसाद और राजू रंजन बताते हैं कि अगले दस दिन वे लोग स्कूल-कालेजों में जनकला को मजबूत करने के लिहाज से विचार-विमर्श चलाएँगे और नए सदस्य बनाएँगे। उसके बाद जनवरी में ही एक नाट्य कार्यशाला की जाएगी, जिसमें नाट्य कला के साथ-साथ नाटकों के वैचारिक सरोकार पर विचार-विमर्श भी होगा। इस कार्यशाला के जरिये एक नाटक भी तैयार किया जाएगा, जिसकी प्रस्तुति जसम के प्रथम महासचिव गोरख पांडेय के स्मृति दिवस पर 29 जनवरी को की जाएगी। नाटकों के जरिये संस्कृति, समाज और राजनीति की दुनिया में निरंतर वैचारिक हस्तक्षेप कैसे किया जाए, लोग यह सोच रहे हैं। छात्र राजनीति और संस्कृतिकर्म से जुड़े रहने वाले सत्यदेव कहते हैं कि सैद्धांतिक और वैचारिक प्रतिबद्धता ने ही युवानीति को बचा रखा है। जाहिर है, यह सब सुनना अच्छा लगता है।
जो संस्कृतिकर्मी यह समझते हों कि जो उनके जीवन का संकट है, सिर्फ उनका ही संकट नहीं है, बल्कि बड़ी आबादी उसी संकट को झेल रही है, उनसे सचमुच एक उम्मीद सी बंधती है। कवि सुनील चौधरी ने यही तो कहा कि संकट सिर्फ हमारे लिए नहीं है, हमारी उपयोगिता तो यह है कि हम संकट के लिए जिम्मेदार चेहरे को चिह्नित करें और उससे मुक्ति का रास्ता बताएं। राजनीति से किसी किस्म के जनसंस्कृतिकर्म की दूरी को वह आज के दौर में आत्मघाती मानते हैं। देश-दुनिया में बढ़ रहे जनांदोलनों की खबरों से सुनील उत्साहित हैं और चाहते हैं कि संस्कृतिकर्मी उनके पक्ष में गीत-संगीत का कैसेट बनाएं, उनके बारे में नाटक करें। ‘युवानीति’ का बेहद मशहूर नाटक है- तेरा नहीं, मेरा नहीं सब कुछ हमारा। सुनील खुश हैं कि यही आवाज बदले हुए रूप में वालस्ट्रीट पर कब्जा करने वाले आंदोलनकारियों के नारों में गूँज रही है, भले उन्होंने हमारे नाटक से यह सब न सीखा हो, पर 1 प्रतिशत बनाम 99 प्रतिशत के नारे में ‘तेरा नहीं, मेरा नहीं, सब कुछ हमारा’ की अनुगूँज ही उन्हें सुनाई देती है।
जसम बिहार के अध्यक्ष वरिष्ठ आलोचक रामनिहाल गुंजन मानो अपने लंबे अनुभवों के आधार पर बोलते हैं- ‘‘जो जनपक्षधर रचनाकार होते हैं, उनका व्यवस्था से टकराव लाजिमी है। सफदर की शहादत ने कई प्रश्न खड़े किए। लेकिन शहादत के बावजूद उनकी परंपरा खत्म नहीं हो गई। जिन्हें उनके कार्यों को आगे बढ़ाना है, वही उन्हें याद करते हैं।’’
कवि सुमन कुमार सिंह टीम की निरंतरता में बाधा बनने वाले कारणों की ओर ध्यान खींचते हैं। रोजी-रोटी की जद्दोजहद के बीच से संस्कृतिकर्म के लिए पहलकदमी और ज्यादा समय निकालने की जरूरत पर बल देते हैं। संस्कृति की दुनिया में बढ़ रहे सत्ता और बड़ी पूँजी के खेल पर वह चौकस निगाह डालते हैं। दिल्ली में करोड़ों रुपये के खर्च से हुए ‘अंधायुग’ के मंचन की चर्चा करते हुए कहते हैं कि आज के अंधे युग में कोई ‘अंधायुग’ नाटक पर क्यों इतने पैसे खर्च कर रहा है, इसके बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए। बिहार में भी तरह-तरह के महोत्सव किये जा रहे हैं। वह सवाल उठाते हैं कि आखिर संस्कृति के क्षेत्र में सरकारें इतना पैसा क्यों बहा रही हैं? फिर खुद ही जवाब देते हैं, कि इसके जरिये सरकारें अपनी कमजोरियों को ढँकना चाहती हैं। सुमन ने हिंदी से एम.ए. किया है, बेनीपुरी पर उनकी पीएच.डी. हैं और एक स्कूल में वह दसवीं तक के छात्रों को पढ़ाते हैं। वह सफदर की ‘किताबें कुछ कहना चाहती हैं’ और ‘बारिशें’ कविता का जिक्र करते हैं। उनका मानना है कि एक संवेदनशील व्यक्ति द्वारा सामाजिक जरूरत के तहत ये रचनाएं लिखी गई हैं।
सुनील श्रीवास्तव इस सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं कि बिहार शिक्षा परियोजना की किताबों में बल्ली सिंह चीमा की ‘ले मशालें ले चल पड़े हैं लोग मेरे गाँव के’ तथा अदम गोंडवी की ‘सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद है/दिल पर रख कर हाथ कहिये देश क्या आजाद है?’ नाम की गजलें भी है, पर उनकी जो पँक्तियां क्रांतिकारी राजनीति से संबंधित है, उसे हटा दिया गया है। जनवादी शायरों की रचनाओं का इस्तेमाल इस तरीके से भी किया जा रहा है। इसी संगोष्ठी में लोगों ने अदम गोंडवी पर जसम की ओर से 8 जनवरी को कार्यक्रम तय कर लिया। यह भी तय हुआ कि जो रचनाकार हैं, वे आज की परिस्थितियों पर बिल्कुल नई रचनाएं लिखकर अदम की जनधर्मी रचनाशीलता को आगे बढ़ाने का संकल्प लेंगे। जाहिर है अदम गोंडवी से जुड़े संस्मरण और उनकी गजलें तो सुनाई जाएँगी ही। खासकर ‘सौ में सत्तर आदमी’, ‘हिंदू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेडि़ए’ ये दो गजलें युवानीति के कलाकारों द्वारा खूब गायी गई हैं, इस मौके पर वे उनकी कुछ और गजलों को गाएंगे।
आखिर में संगोष्ठी के अध्यक्ष कवि-आलोचक जितेंद्र कुमार सावधान करते हैं- सत्ता युवाओं को आकर्षित करने के लिए तरह-तरह के जाल फैला रही है, गीत-नाटक वहाँ भी होता है, लेकिन हमारी मुश्किलों का हल वहाँ नहीं मिलता। पूंजीवाद जितने ही संकट में जाएगा, उतने ही उसके हमले हर स्तर पर बढ़ेंगे, ऐसी स्थिति में जनपक्षधर लोगों की आपसी एकजुटता और वैचारिक प्रतिबद्धता बेहद जरूरी है।
हमारे कार्यक्रमों में अनिवार्य रूप से मौजूद रहने वाले ‘जनपथ’ पत्रिका के संपादक अनंत कुमार सिंह नहीं हैं। उनका आपरेशन हुआ है। संगोष्ठी के बाद हम उनसे मिलने निकल जाते हैं। इस तरह नये साल की शुरुआत होती है।
उसके अगले दिन शाम में एक दूसरे रिश्तेदार के यहाँ जब यह डायरी लिख रहा हूँ तो सातवीं में पढ़ने वाली एक लड़की और दो छोटे लड़के मुझे घेरे हुए हैं। मैं अपने मोबाइल से की गई केरल के समुद्र की रिकार्डिंग दिखा रहा हूँ। वे चाहते हैं कि उन्हें कविता पढ़ते हुए रिकार्ड करूँ। मैं रिकार्ड करना शुरू करता हूँ। फिर तो जैसे तीनों में होड़ लग जाती है, मछली जल की रानी है से लेकर झाँसी की रानी और हवा हूँ हवा मैं बसंती हवा तक, धड़ाधड़ वीडियो क्लिपें बनती जाती हैं। आह्लादित हूँ। वाह, कविता अपने तरीके से बची हुई है।
कथाकार मधुकर सिंह से भी मिलने जाना है। अगले दिन उनसे मिलता हूँ। वह अपनी पत्रिका ‘इस बार’ का रजिस्ट्रेशन करवाना चाहते हैं। उसी का फार्म लेकर गया हूँ। उनके पैरों पर पैरालाइसिस का गंभीर असर है। तेज-तेज चल नहीं सकते। घर में ही बैठे रहते हैं। कहते हैं- ‘क्या करूँ, कब तक चुपचाप पड़ा रहूँ। कुछ पढ़ू-लिखूँ न तो समय कैसे गुजरे!’ मधुकर सिंह पिछले ही दिन यानी 2 जनवरी को 77 साल के हुए हैं। शारीरिक लाचारी के बावजूद वह जोश से भरे हैं। बस रजिस्ट्रेशन हो जाये और वे पत्रिका निकालने में जुट जायें। पिछली मुलाकात में ही मुझसे शेयर किया था कि कहाँ-कहाँ से उसके लिए आर्थिक सहयोग मिल जाएगा। बस उन्हें इंतजार है कि पत्रिका का रजिस्ट्रेशन हो जाए, इस उम्र में वह एक और पारी खेलने को तैयार हैं। दिल्ली की पत्रिकाओं और उनके संपादकों के बारे में पूछते हैं। किसने-किसने नये साल की शुभकामनाएं उन्हें दी, यह भी बताते हैं। नई उम्र के नौजवानों के पास उनसे बतियाने की फुर्सत है नहीं, गाँव शहर के बिल्कुल किनारे है, इस कारण साहित्यकार बंधु भी कम ही पहुँचते हैं। ‘जनमत’ का अंक उन्हें अभी डाक से मिला नहीं है। एक प्रति उन्हें अपने झोले से निकालकर देता हूँ। वे उसके पन्ने पलटते हैं। कवि रामकुमार कृषक की पत्रिका ‘अलाव’ का ताजा अंक निकालकर दिखाते हैं। हाल में उन्हें एक पुरस्कार मिला है। उसी पुरस्कार समारोह में ‘लोकायत’ के संपादक कथाकार बलराम से उनकी मुलाकात हुई, इसकी चर्चा वह करते हैं। मेरे साथ भाकपा-माले के साथी गुड्डू उर्फ दिलराज प्रीतम हैं, उनसे पार्टी का हालचाल पूछते हैं। मैं दुबारा उनसे मिलने का वादा करके लौटता हूँ।
रास्ते में पटना से साथी नवीन का कॉल आता है- 5 जनवरी को कुमार मुकुल, अरविंद श्रीवास्तव और कई नए कवियों का कविता पाठ है, आइए। अब बीच में एक दिन बच रहा है- 4 जनवरी, शाम तक उसके लिए भी प्रस्ताव आ जाता है। किसानों ने प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद रिकार्ड उत्पादन किया है, पर सरकार और प्रशासन को उसकी तय कीमत 1080 रुपये प्रति क्विंटल के अनुसार खरीदने में कोई दिलचस्पी नहीं है, जबकि सहकारिता मंत्री का वादा था कि खलिहान से ही सरकार धान खरीद लेगी, बिचैलियों और कालाबाजारियों की बहार है। किसान कालाबाजारियों को 600 रुपये प्रति क्विंटल धान बेचने के लिए मजबूर हैं। ‘युवानीति’ के पुराने साथी सुदामा प्रसाद आजकल अखिल भारतीय किसान सभा में हैं, उनका आग्रह है कि संस्कृतिकर्मी भी जिलाधिकारी के समक्ष किसानों के धरना में कुछ समय के लिए आएं। तो धरना में भी जाया जाएगा और अदम गोंडवी की ही कोई गजल सुनाई जाएगी, साथी सुमन कुमार सिंह की राय है।
9 जनवरी को पटना में नाट्य टीम ‘हिरावल’ गुरशरण सिंह का नाटक ‘जंगीराम की हवेली’ का मंचन कर रही है, उसे भी देखने का मौका निकालना है। नाट्य संस्था ‘प्रेरणा’ वहाँ सफदर हाशमी की स्मृति में दस दिनों का आयोजन कर रही है, जिसमें वह नाटक भी मंचित होगा।
वाह, नया साल तो काफी सक्रियता से भरा हुआ है! अभी ‘जनपथ’ पत्रिका का नागार्जुन विशेषांक भी इसी बीच तैयार करना है। सो अब डायरी बंद।
सलाम नए साल! बहुत बहुत सलाम!!
पाश की उसी मशहूर कविता के साथ-
मैं सलाम करता हूँ
आदमी के मेहनत में लगे रहने को
मैं सलाम करता हूँ
आने वाले खुशगवार मौसमों को
मुसीबतों से पाले गए प्यार जब सफल होंगे
बीते वक्तों का बहा हुआ लहू
जिन्दगी की धरती से उठा कर
मस्तकों पर लगाया जायेगा
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