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जिन्हें नाज़ है : संजय ग्रोवर

गजलकार संजय ग्रोवर

चर्चित व्‍यंग्‍यकार और गजलकार संजय ग्रोवर की नज्‍म़-

जिन्हें नाज़ है उनके क्या राज़ खोलूँ
जो तोल के बोलूँ तो कुछ भी न बोलूँ

ये तहज़ीब की बन ज़ुंबाँ बोलते हैं
ये बनके तेरे मेहरबाँ बोलते हैं
ये ईमान पर, बेईमाँ बोलते हैं

जिन्हें नाज़ है उनके ……

ये चाहें तो तुझको तुझीसे लड़ा दें
तेरे घर में घुसकर वो बेघर बना दें
ये साज़िश करें और मुकद्दर बता दें

जिन्हें नाज़ है उनके ……

ये बढ़ते हुए माफ़िया ज़िंदगी के
ये रटते हुए, काफ़िया ज़िंदगी के
ये बन जाते हैं रहनुमाँ ज़िंदगी के

जिन्हें नाज़ है उनके ……

कोई टोपियों से कबूतर निकाले
क़िताबों से कोई है अक्षर निकाले
कोई जादूगर कफ्न से सर निकाले

जिन्हें नाज़ है उनके ……

अदू औरतों के, चले दोस्त बनकर
निशाना ये उनपर लगाएंगे छुपकर
उन्हीं के ये, हमदर्द कंधे पे रखकर

जिन्हें नाज़ है उनके ……

ये माँ बहन बेटी की माला जपे हैं
दिखे है जो औरत, ये सर नोंच ले हैं
ये उसपर हँसे हैं कि ख़ुदपर हँसे हैं

जिन्हें नाज़ है उनके ……

वो औरत भी ख़ुदको अजब ढूँढती है
वो मज़हब ही में अपना सब ढूँढती है
वो तब ढूँढती थी न अब ढूँढती है

जिन्हें नाज़ है उनके…..

इसे जिस धरम ने कहीं का न छोड़ा
उसे इसने अपना सबब मान छोड़ा
इस औरत ने ख़ुदको कहीं का न छोड़ा

जिन्हें नाज़ है उनके…..

बर्फबारी : महेश चंद्र पुनेठा

10 मार्च, 1971 को उत्‍तराखण्‍ड के सीमांत जनपद पि‍थारोगढ़ के सि‍रालीखेत गाँव में जन्‍में युवा कवि‍ महेश चंद्र पुनेठा की कवि‍ता-

बर्फ उतर रही है भू पर
फर…फर…फर…
धीरे…धीरे…धीरे…
कविता उतर रही है जैसे
कागज पर चुपके…चुपके
बर्फ के फाहे गिरते
जैसे सेमल के पेड़ से
झड़ रही हो रूई

बदल रहा है भू दृश्य
बर्फ के पत्थर
बर्फ के टीले
बर्फ के पहाड़
बर्फ के फूल
बर्फ की छतें सफेद
निस्तब्धता फैली चारों ओर
सो गई हो प्रकृति
जैसे बर्फ की रजाई ओढ़

मसूरी/नैनीताल जैसे हिल स्टेशनों में
बर्फवारी की लुत्फ लेने
हफ्तों पहले से
बुक कराये गये होटलों से
निकल पड़े होंगे टूरिस्ट
गर्म कपड़ों में लदे-फदे
चमका रहे होंगे फ्लैश
बना रहे होंगे बर्फ की मूर्तियाँ
फेंक रहे होंगे बर्फ के गोले
एक-दूसरे पर

पर यहाँ
दूध वाला कर रहा है इंतजार
बर्फवारी रुकने का
देख रहा है बार-बार
आसमान की ओर
मौसम के खुलने-घिरने की तरह
बदल रहे हैं भाव
उसके चेहरे पर
शाम की रोटी की चिन्‍ता
साफ-साफ पढ़ी जा सकती है
उसके आँखों की डोरों पर।
बोचड़ उतार रहा है
बकरी की खाल
बर्फबारी में ही
सिर पर बंधे गमछे से
कानों को
ढकने का असफल प्रयास करते हुए
जो बार-बार
हट जा रहा है कानों पर से।
और लछिमा
कर रही है गोठ-पात
निपटा रही है घर-भर के काम
काँपते-सिकुड़ाते
बीच-बीच में
बर्फाये हाथों को
सगड़ को दिखाते हुए

बर्फ उतर रही है भू पर
धीरे…धीरे…धीरे…
फर ..फर…फर…।

सृष्टि बीज का नाश न हो, हर मौसम की तैयारी है : सुधीर सुमन

वरिष्‍ठ लेखक-पत्रकार सुधीर सुमन की डायरी के अंश-

यह सोच के चला था कि पुराने साल में ही परिजनों और साथियों के बीच पहुँच जाऊँगा और अपनी ही जमीन पर नये साल का इंतजार करूँगा। रिजर्वेशन मिला नहीं, पर चूँकि ट्रेन के प्रस्थान स्टेशन से चलना था, इसलिए बैठने की जगह मिल गई। ट्रेन थी एक्सप्रेस, नाम के अनरूप सचमुच विभूति। इलाहाबाद से बनारस के बीच सिंगल लाइन में उसे यूँ भी चार-पाँच क्रासिंग का सामना करना पड़ता है, लेकिन उस रोज तो 35-40 मिनट चलने के बाद इंजन ने ही जवाब दे दिया। ट्रेन हंडिया स्टेशन से पहले ही खड़ी हो गई। दोनों ओर दूर तक गेहूँ के खेत। सामने रेल ट्रैक के बगल में लगाए गए पौधे, जो अभी पेड़ हुए नहीं, पौधे और पेड़ के बीच हैं, उनमें से सूखी लकडियाँ बटोरती कुछ लड़कियाँ, दायीं ओर बहुत लम्‍बा फ्लाईओवर, सूर्य का तेज पहले से ही गायब, अब तो उसके होने का भी कोई मतलब नहीं, धुआँ-धुआँ-सा चारों ओर। इंजन का इंतजार।

वक्त कैसे कटे! अरे हाँ,  ट्रेन लेट है तो क्या, मेरे पास तो जरूरी काम है। मैं भी लेट हूँ। एक पत्रिका का नागार्जुन विशेषांक मुझे निकालना है, कई माह हो गए हैं, अब उसे तैयार ही कर देना है। उसमें आरा में उनकी जन्मशताब्दी के समापन के अवसर पर आयोजित समारोह में दिये गये कुछ वक्तव्यों को भी छापना है। मैंने अपना नन्हा-सा रिकार्डर निकाला और एक वक्तव्य, जो लगभग 36 मिनट का है, उसका ट्रांस्क्रिप्शन शुरू कर दिया। बीच-बीच में घड़ी भी देख रहा हूँ। डेढ़ घंटे गुजर गए। लोग एक-दूसरे को आश्वस्त कर रहे हैं कि सूचना मिली है, इंजन पंद्रह-बीस मिनट में पहुँच जाएगा। कोई कहता है, इंजन की लाइट नजर आ रही है। खैर, एक इंजन आ ही गया। वह ले चला, पर विभूति के नखरे, ब्रेक जाम या इंजन का दम उखड़ रहा, कुछ अजीब सी आवाजें आने लगीं, जैसे पहिये में कुछ फँस गया हो, कुछ घिसट रहा हो साथ। कुछ जलने की तीखी बू। गनिमत है कि ट्रेन फिर रुक गई। पर मेरी कलम की रफ्तार तेज, मानो ट्रेन के रुकने की भरपाई इससे हो जाएगी। एक वजह यह भी है कि रिकार्डर की बैट्री की एक ही डंडी बची हुई है, कहीं वह गायब, तो फिर कलम भी रुक जाए। कहीं एक आशंका कि डब्बे में आग न लग जाए। शंका-समाधान हेतु कुछ लोग गार्ड को बुला लाते हैं। लोग निश्चिंत हैं, यानी घड़बराने की बात नहीं।

सात बज गए, अब तक तो ट्रेन को बनारस से आगे निकल जाना चाहिये था। अरे अब तो मेरा ट्रास्क्रिप्शन भी खत्म होने वाला है। 5 मिनट का बचा हुआ है। 7 : 20 हुआ है। ट्रांस्क्रिप्शन पूरा हुआ और साथ ही बैट्री की इकलौती डंडी भी गायब हो गई, मगर ट्रेन अभी भी रुकी हुई है। सोचता हूँ कि अब भी ट्रेन चल पड़े तो 12 बजे अपने शहर में पहुँचा जाऊँगा। दो वर्षों के संधिकाल का संधिस्थल मेरा शहर बने मेरे लिए, तो क्या बात होगी, पर ये विभूति यहाँ से हिले तो सही! आखिर 8 बजे ट्रेन चल पड़ी, उम्मीद जगी कि ट्रेन जरूर रात 12 बजे मेरे शहर पहुँच जाएगी। ये नेहरू की तरह tryst with destiny का कोई चक्कर नहीं है। वैसे भी इस महान लोकतंत्र की संसद की सर्वोच्चता का चरम पाखंड साल के गुजरते-गुजरते हम देख चुके हैं, अब तो बस यही सोच रहा हूँ कि जरा आने वाले साल में जनता की सर्वोच्चता से और तीखेपन से साक्षात्कार हो हमारे रहनुमाओं, सरकारों और पार्टियों का, तो मजा आ जाए। जरा सर्वोच्चता के सिंहासन पर बैठे उद्दंड, भ्रष्ट और लुटेरे लोगों की अक्ल तो ठिकाने आए। मगर अभी तो सवाल यह है कि यह ट्रेन कब मेरे शहर पहुँचेगी! बीच-बीच में इसका रुकना जारी है।

सर्द स्याह रात में अपनी ही गति से ट्रेन जा रही है। बनारस पहुँचते-पहुँचते चार घण्‍टे विलंबित हो चुकी है। अब मैंने समय का ख्याल छोड़ दिया है। कई तरह के विचार आ-जा रहे हैं, नींद नहीं आ रही है। घड़ी से ध्यान हट चुका है। मालूम नहीं कब और कहाँ एक साल से दूसरे साल में मैं दाखिल हो गया। एक किशोर का कॉल- हैपी न्यू ईयर, कहाँ पहुँचे? मैं- मालूम नहीं, बक्सर भी नहीं पहुँची। आखिरकार 2:30 में ट्रेन आरा प्लेटफार्म पर दाखिल हुई। बाहर आया, रिक्शा लिया, सारी दूकानें बंद हैं, सिर्फ मुर्गे जाग रहे हैं और मुर्गों को बेचने वाले, रौशनी वहीं है। सन्नाटा, शीत और हवा। रिक्शा रुका, कुछ नौजवान आग ताप रहे हैं,  उनके देखते-देखते मैं एक पतली गली में दाखिल हुआ, फिर एक सड़क पार किया, फिर एक लम्‍बी गली और पाँच-सात मिनट पैदल चलने के बाद अपने एक रिश्तेदार के यहाँ पहुँचा। इंतजार करते करते सो गए हैं लोग, पर तुरन्‍त जग गए। खाना मिला, खाया और फिर सो गया। घण्‍टे-डेढ़ घण्‍टे बाद ही एक चित्रकार साथी की शुभकामना नए साल की, उसके बाद फिर एक कॉल एक रिश्तेदार की, फिर नींद, फिर कुछ देर बाद एक कॉल इस बार एक रंगकर्मी साथी हैं- मौसम ठीक नहीं है, इसलिए सफदर हाशमी के शहादत दिवस के अवसर पर आज कार्यालय में ही एक संगोष्ठी रख ली गई है। बाहर नाटक करना सम्‍भव नहीं है।

लीजिए साहब, मौसम भी खराब हो गया। कितना खराब होगा! बाहर निकल के देखता हूँ। अच्छा, यह तो हल्की सी बूँदा-बाँदी है कितने देर तक चलेगी! लेकिन मौसम का मिजाज ठीक नहीं होता। नहाने-वहाने के बाद यार-दोस्तों, साहित्यकारों से मिलने के लिए निकलना है, पर बारिश बढ़ जाती है, और फिर लिहाफ में गुड़ुम। नींद जिसे दूर कर रखा था रात में वह आ दबोचती है, और फिर वक्त गुजरता जाता है, अवचेतन में कई-कई अनदेखे परिचित से प्रसंग चलते रहते हैं, लगता है कि मोबाइल बज रहा है देर से, आँख खुलती है, मोबाइल ही बज रहा है। फिर रंगकर्मी साथी हैं- आइए, थोड़ी देर में सबलोग आ जाएँगे।

अब तो निकलना ही पड़ेगा। हर साल यहां नाट्य संस्था ‘युवानीति’ सफदर की याद में नुक्कड़ नाटक करती है। नये साल की शुरुआत को मौज-मस्ती और जश्न के साथ लोग मनाते हैं, उस पूरे माहौल में यह बिल्कुल अलग किस्म का काम लगता है, पर ‘युवानीति’ के रंगकर्मी हर साल सफदर को याद करते ही हैं, नये साल के एक जरूरी कार्यभार की तरह। सड़कों पर कीचड़ है, हाल में दुबारा पढ़े गए श्रीलाल शुक्ल के उपन्यास ‘रागदरबारी’ की याद आती है, जिसमें गन्‍दगी के प्रसंगों का जिक्र कई बार आया है। काश, ऐसा होता कि घर से निकलता, सड़क और गलियाँ साफ होतीं और बिना किसी मुश्किल के मैं ‘युवानीति’ के कार्यालय पहुँच जाता, लेकिन जो नहीं है, उसका क्या गम! अभी तो हम जो कर सकते हैं, वह कर रहे हैं। गन्‍दगी हो या सफाई पैदल पहुँचने में समय लगभग दस-पंद्रह मिनट ही लगता है। तो इतने समय में मैं पहुँच गया कार्यालय।

मेरे सहपाठी कवि सुमन कुमार सिंह हैं, ‘युवानीति’ के नए संयोजक राजू रंजन हारमोनियम लिए बैठे हैं, कथाकार विजेंद्र अनिल के पुत्र कवि सुनील श्रीवास्तव हैं, रंगकर्मी अरुण प्रसाद है, सत्यदेव हैं, दो नए किशोर हैं। अभी और लोगों का इंतजार है। कवि जितेंद्र कुमार आते हैं, फिर आलोचक रामनिहाल गुंजन और हमारे पुराने रंगकर्मी साथी पत्रकार शमशाद प्रेम हमेशा की तरह लेट-लतीफ, उनके पहले कवि सुनील चौधरी आ चुके हैं। अरुण प्रसाद संगोष्ठी का संचालन शुरू करते हैं। राजू रंजन महेश्वर जी का गीत ‘सृष्टिबीज का नाश न हो, हर मौसम की तैयारी है/कल का गीत लिए होठों पर आज लड़ाई जारी है’ गाकर सफदर हाशमी और उनके साथ शहीद हुए रामबहादुर को श्रद्धांजलि देते हैं, सारे लोग उनकी आवाज में आवाज मिलाते हैं। एक मिनट का मौन के बजाय गीत के जरिये श्रद्धांजलि देना मुझे ज्यादा उचित लगता है।

मुझे बोलना है। मैं याद दिलाता हूँ कि हमारी सफदर हाशमी से नुक्कड़ नाटक और विचारधारा को लेकर बहसें भी थीं, लेकिन वाम सांस्कृतिक आंदोलन की वे ऐसी शख्सियत थे, जिनकी शहादत के बाद नए सिरे से कुछ वर्षों के लिए नुक्कड़ नाट्य आंदोलन में एक उभार आया था। 1992 में ‘युवानीति’ के रंगकर्मियों ने छात्रों की एक टीम बनाई थी, जिसने पहला जो नाटक किया था, वह सफदर का ही लिखा हुआ था- ‘राजा का बाजा’। मैंने भी उसमें एक प्रतिकोरस की भूमिका निभाई थी। यह अजीब विडम्‍बना रही कि जिस कांग्रेस के गुंडों ने उन्हें मारा, उसी  कांग्रेस के साथ आने वाले सालों में सीपीएम का घनिष्ठ रिश्ता बनता गया। यहाँ तक कि उसी के आर्थिक नुस्खे को लागू करने के कारण भारी नुकसान भी उठाना पड़ा। जो हो, आर्थिक उदारीकरण और उपभोक्तावाद के दौर में हमें सफदर को इसलिए भी याद करना जरूरी लगता रहा कि इसके जरिये हम विचारधारा और संस्कृतिकर्म के प्रति अपनी प्रतिबद्धता की परख करते थे, अपने अंदर इस धारणा को और मजबूत बनाते थे कि संस्कृतिकर्म हमारी जिंदगी में दोयम दर्जे का काम नहीं, बल्कि रोजी-रोटी की जद्दोजहद से भी ज्यादा अर्थपूर्ण काम है, जिसे करते हुए जान भी दी जा सकती है। यह सच है कि संकट पहले से अधिक है, एक समय आरा में कई-कई नाट्य संस्थाएं थीं, पर आज जिस रूप में हो, ‘युवानीति’ ही बची हुई है, जो अपनी प्रतिबद्धता पर कायम है। बेशक इसने हाल के वर्षों में कोई यादगार प्रस्तुति नहीं की है, पर निरंतरता बनाए रखने के लिए यह हमेशा प्रयासरत है।

अरुण प्रसाद और राजू रंजन बताते हैं कि अगले दस दिन वे लोग स्कूल-कालेजों में जनकला को मजबूत करने के लिहाज से विचार-विमर्श चलाएँगे और नए सदस्य बनाएँगे। उसके बाद जनवरी में ही एक नाट्य कार्यशाला की जाएगी, जिसमें नाट्य कला के साथ-साथ नाटकों के वैचारिक सरोकार पर विचार-विमर्श भी होगा। इस कार्यशाला के जरिये एक नाटक भी तैयार किया जाएगा, जिसकी प्रस्तुति जसम के प्रथम महासचिव गोरख पांडेय के स्मृति दिवस पर 29 जनवरी को की जाएगी। नाटकों के जरिये संस्कृति, समाज और राजनीति की दुनिया में निरंतर वैचारिक हस्तक्षेप कैसे किया जाए, लोग यह सोच रहे हैं। छात्र राजनीति और संस्कृतिकर्म से जुड़े रहने वाले सत्यदेव कहते हैं कि सैद्धांतिक और वैचारिक प्रतिबद्धता ने ही युवानीति को बचा रखा है। जाहिर है, यह सब सुनना अच्छा लगता है।

जो संस्कृतिकर्मी यह समझते हों कि जो उनके जीवन का संकट है, सिर्फ उनका ही संकट नहीं है, बल्कि बड़ी आबादी उसी संकट को झेल रही है, उनसे सचमुच एक उम्मीद सी बंधती है। कवि सुनील चौधरी ने यही तो कहा कि संकट सिर्फ हमारे लिए नहीं है, हमारी उपयोगिता तो यह है कि हम संकट के लिए जिम्मेदार चेहरे को चिह्नित करें और उससे मुक्ति का रास्ता बताएं। राजनीति से किसी किस्म के जनसंस्कृतिकर्म की दूरी को वह आज के दौर में आत्मघाती मानते हैं। देश-दुनिया में बढ़ रहे जनांदोलनों की खबरों से सुनील उत्साहित हैं और चाहते हैं कि संस्कृतिकर्मी उनके पक्ष में गीत-संगीत का कैसेट बनाएं, उनके बारे में नाटक करें। ‘युवानीति’ का बेहद मशहूर नाटक है- तेरा नहीं, मेरा नहीं सब कुछ हमारा। सुनील खुश हैं कि यही आवाज बदले हुए रूप में वालस्ट्रीट पर कब्जा करने वाले आंदोलनकारियों के नारों में गूँज रही है, भले उन्होंने हमारे नाटक से यह सब न सीखा हो, पर 1 प्रतिशत बनाम 99 प्रतिशत के नारे में ‘तेरा नहीं, मेरा नहीं, सब कुछ हमारा’ की अनुगूँज ही उन्हें सुनाई देती है।

जसम बिहार के अध्यक्ष वरिष्ठ आलोचक रामनिहाल गुंजन मानो अपने लंबे अनुभवों के आधार पर बोलते हैं- ‘‘जो जनपक्षधर रचनाकार होते हैं, उनका व्यवस्था से टकराव लाजिमी है। सफदर की शहादत ने कई प्रश्न खड़े किए। लेकिन शहादत के बावजूद उनकी परंपरा खत्म नहीं हो गई। जिन्हें उनके कार्यों को आगे बढ़ाना है, वही उन्हें याद करते हैं।’’

कवि सुमन कुमार सिंह टीम की निरंतरता में बाधा बनने वाले कारणों की ओर ध्यान खींचते हैं। रोजी-रोटी की जद्दोजहद के बीच से संस्कृतिकर्म के लिए पहलकदमी और ज्यादा समय निकालने की जरूरत पर बल देते हैं। संस्कृति की दुनिया में बढ़ रहे सत्ता और बड़ी पूँजी के खेल पर वह चौकस निगाह डालते हैं। दिल्ली में करोड़ों रुपये के खर्च से हुए ‘अंधायुग’ के मंचन की चर्चा करते हुए कहते हैं कि आज के अंधे युग में कोई ‘अंधायुग’ नाटक पर क्यों इतने पैसे खर्च कर रहा है, इसके बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए। बिहार में भी तरह-तरह के महोत्सव किये जा रहे हैं। वह सवाल उठाते हैं कि आखिर संस्कृति के क्षेत्र में सरकारें इतना पैसा क्यों बहा रही हैं? फिर खुद ही जवाब देते हैं, कि इसके जरिये सरकारें अपनी कमजोरियों को ढँकना चाहती हैं। सुमन ने हिंदी से एम.ए. किया है, बेनीपुरी पर उनकी पीएच.डी. हैं और एक स्कूल में वह दसवीं तक के छात्रों को पढ़ाते हैं। वह सफदर की ‘किताबें कुछ कहना चाहती हैं’ और ‘बारिशें’ कविता का जिक्र करते हैं। उनका मानना है कि एक संवेदनशील व्यक्ति द्वारा सामाजिक जरूरत के तहत ये रचनाएं लिखी गई हैं।

सुनील श्रीवास्तव इस सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं कि बिहार शिक्षा परियोजना की किताबों में बल्ली सिंह चीमा की ‘ले मशालें ले चल पड़े हैं लोग मेरे गाँव के’ तथा अदम गोंडवी की ‘सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद है/दिल पर रख कर हाथ कहिये देश क्या आजाद है?’ नाम की गजलें भी है, पर उनकी जो पँक्तियां क्रांतिकारी राजनीति से संबंधित है, उसे हटा दिया गया है। जनवादी शायरों की रचनाओं का इस्तेमाल इस तरीके से भी किया जा रहा है। इसी संगोष्ठी में लोगों ने अदम गोंडवी पर जसम की ओर से 8 जनवरी को कार्यक्रम तय कर लिया। यह भी तय हुआ कि जो रचनाकार हैं, वे आज की परिस्थितियों पर बिल्कुल नई रचनाएं लिखकर अदम की जनधर्मी रचनाशीलता को आगे बढ़ाने का संकल्प लेंगे। जाहिर है अदम गोंडवी से जुड़े संस्मरण और उनकी गजलें तो सुनाई जाएँगी ही। खासकर ‘सौ में सत्तर आदमी’, ‘हिंदू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेडि़ए’ ये दो गजलें युवानीति के कलाकारों द्वारा खूब गायी गई हैं, इस मौके पर वे उनकी कुछ और गजलों को गाएंगे।

आखिर में संगोष्ठी के अध्यक्ष कवि-आलोचक जितेंद्र कुमार सावधान करते हैं- सत्ता युवाओं को आकर्षित करने के लिए तरह-तरह के जाल फैला रही है, गीत-नाटक वहाँ भी होता है, लेकिन हमारी मुश्किलों का हल वहाँ नहीं मिलता। पूंजीवाद जितने ही संकट में जाएगा, उतने ही उसके हमले हर स्तर पर बढ़ेंगे, ऐसी स्थिति में जनपक्षधर लोगों की आपसी एकजुटता और वैचारिक प्रतिबद्धता बेहद जरूरी है।

हमारे कार्यक्रमों में अनिवार्य रूप से मौजूद रहने वाले ‘जनपथ’ पत्रिका के संपादक अनंत कुमार सिंह नहीं हैं। उनका आपरेशन हुआ है। संगोष्ठी के बाद हम उनसे मिलने निकल जाते हैं। इस तरह नये साल की शुरुआत होती है।

उसके अगले दिन शाम में एक दूसरे रिश्तेदार के यहाँ जब यह डायरी लिख रहा हूँ तो सातवीं में पढ़ने वाली एक लड़की और दो छोटे लड़के मुझे घेरे हुए हैं। मैं अपने मोबाइल से की गई केरल के समुद्र की रिकार्डिंग दिखा रहा हूँ। वे चाहते हैं कि उन्हें कविता पढ़ते हुए रिकार्ड करूँ। मैं रिकार्ड करना शुरू करता हूँ। फिर तो जैसे तीनों में होड़ लग जाती है, मछली जल की रानी है से लेकर झाँसी की रानी और हवा हूँ हवा मैं बसंती हवा तक, धड़ाधड़ वीडियो क्लिपें बनती जाती हैं। आह्लादित हूँ। वाह, कविता अपने तरीके से बची हुई है।

कथाकार मधुकर सिंह से भी मिलने जाना है। अगले दिन उनसे मिलता हूँ। वह अपनी पत्रिका ‘इस बार’ का रजिस्ट्रेशन करवाना चाहते हैं। उसी का फार्म लेकर गया हूँ। उनके पैरों पर पैरालाइसिस का गंभीर असर है। तेज-तेज चल नहीं सकते। घर में ही बैठे रहते हैं। कहते हैं- ‘क्या करूँ, कब तक चुपचाप पड़ा रहूँ। कुछ पढ़ू-लिखूँ न तो समय कैसे गुजरे!’ मधुकर सिंह पिछले ही दिन यानी 2 जनवरी को 77 साल के हुए हैं। शारीरिक लाचारी के बावजूद वह जोश से भरे हैं। बस रजिस्ट्रेशन हो जाये और वे पत्रिका निकालने में जुट जायें। पिछली मुलाकात में ही मुझसे शेयर किया था कि कहाँ-कहाँ से उसके लिए आर्थिक सहयोग मिल जाएगा। बस उन्हें इंतजार है कि पत्रिका का रजिस्ट्रेशन हो जाए, इस उम्र में वह एक और पारी खेलने को तैयार हैं। दिल्ली की पत्रिकाओं और उनके संपादकों के बारे में पूछते हैं। किसने-किसने नये साल की शुभकामनाएं उन्हें दी, यह भी बताते हैं। नई उम्र के नौजवानों के पास उनसे बतियाने की फुर्सत है नहीं, गाँव शहर के बिल्कुल किनारे है, इस कारण साहित्यकार बंधु भी कम ही पहुँचते हैं। ‘जनमत’ का अंक उन्हें अभी डाक से मिला नहीं है। एक प्रति उन्हें अपने झोले से निकालकर देता हूँ। वे उसके पन्ने पलटते हैं। कवि रामकुमार कृषक की पत्रिका ‘अलाव’ का ताजा अंक निकालकर दिखाते हैं। हाल में उन्हें एक पुरस्कार मिला है। उसी पुरस्कार समारोह में ‘लोकायत’ के संपादक कथाकार बलराम से उनकी मुलाकात हुई, इसकी चर्चा वह करते हैं। मेरे साथ भाकपा-माले के साथी गुड्डू उर्फ दिलराज प्रीतम हैं, उनसे पार्टी का हालचाल पूछते हैं। मैं दुबारा उनसे मिलने का वादा करके लौटता हूँ।

रास्ते में पटना से साथी नवीन का कॉल आता है- 5 जनवरी को कुमार मुकुल, अरविंद श्रीवास्तव और कई नए कवियों का कविता पाठ है, आइए। अब बीच में एक दिन बच रहा है- 4 जनवरी, शाम तक उसके लिए भी प्रस्ताव आ जाता है। किसानों ने प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद रिकार्ड उत्पादन किया है, पर सरकार और प्रशासन को उसकी तय कीमत 1080 रुपये प्रति क्विंटल के अनुसार खरीदने में कोई दिलचस्पी नहीं है, जबकि सहकारिता मंत्री का वादा था कि खलिहान से ही सरकार धान खरीद लेगी, बिचैलियों और कालाबाजारियों की बहार है। किसान कालाबाजारियों को 600 रुपये प्रति क्विंटल धान बेचने के लिए मजबूर हैं। ‘युवानीति’ के पुराने साथी सुदामा प्रसाद आजकल अखिल भारतीय किसान सभा में हैं, उनका आग्रह है कि संस्कृतिकर्मी भी जिलाधिकारी के समक्ष किसानों के धरना में कुछ समय के लिए आएं। तो धरना में भी जाया जाएगा और अदम गोंडवी की ही कोई गजल सुनाई जाएगी, साथी सुमन कुमार सिंह की राय है।

9 जनवरी को पटना में नाट्य टीम ‘हिरावल’ गुरशरण सिंह का नाटक ‘जंगीराम की हवेली’ का मंचन कर रही है, उसे भी देखने का मौका निकालना है। नाट्य संस्था ‘प्रेरणा’ वहाँ सफदर हाशमी की स्मृति में दस दिनों का आयोजन कर रही है, जिसमें वह नाटक भी मंचित होगा।

वाह, नया साल तो काफी सक्रियता से भरा हुआ है! अभी ‘जनपथ’ पत्रिका का नागार्जुन विशेषांक भी इसी बीच तैयार करना है। सो अब डायरी बंद।

सलाम नए साल! बहुत बहुत सलाम!!
पाश की उसी मशहूर कविता के साथ-
मैं सलाम करता हूँ
आदमी के मेहनत में लगे रहने को
मैं सलाम करता हूँ
आने वाले खुशगवार मौसमों को
मुसीबतों से पाले गए प्यार जब सफल होंगे
बीते वक्तों का बहा हुआ लहू
जिन्‍दगी की धरती से उठा कर
मस्तकों पर लगाया जायेगा

‘आनंदम’ की काव्य गोष्ठी संपन्न

न्यूयॉर्क : जगदीश रावतानी द्वारा संचालित ‘आनंदम’ संगीत व साहित्य संस्था की काव्य गोष्ठी 4 जुलाई, 2011 को कस्तूरबा गाँधी मार्ग स्थित हिमालय हाऊस के सभागार में संपन्न हुई।  इसकी अध्यक्षता विख्यात कवि बुद्धिनाथ मिश्र ने की तथा मासूम गाज़ियाबादी, लक्ष्मी शंकर बाजपेई, ज़र्फ ‘देहलवी’, बिशन लाल, विशाल ‘बाग’,  भूपेंद्र कुमार, नरेश कुमार, ए.एच ‘साज़’, आसिफ अली’, अजय ‘अक्स’, वीरेंद्र ‘कमर’, पूनम अगरवाल, रवीन्द्र शर्मा ‘रवि’, शांति अगरवाल,  अबुल फैज़ अज़्म, सहरियानवी, दर्द ‘देहलवी’, अहमद अली बर्की ‘आज़मी’, सुरेश यादव,  रंजन अग्रवाल, मुनव्वर ‘सरहदी’, ज़फर आदिल व मोइन अहमद ने भाग लिया।  गोष्ठी का संचालन ममता किरण ने किया।
गोष्ठी में गज़ल, गीत व छंद मुक्त कविता की अच्छी धूम रही.  ज़र्फ देहलवी की एक गज़ल का यह शेर-
दुनिया के लोग खुद पे नज़र फेंकते नहीं
आईना दिखाते हैं मगर देखते नहीं
सभागार मासूम गाज़ियाबादी के शेरों पर वाह-वाह कर के झूम उठा-
कोई पुरखों की ज़मीनें बेच कर भी पुर-सुकूँ
हम गुबारे बेच कर भी सो गए आराम से
लक्ष्मी शंकर वाजपेयी की संक्षिप्त छंद गज़ल-
तू है बादल/ तो बरसा जल
एक शून्य को/ कितनी हलचल.
नाम ही माँ का/ है गंगाजल
‘आनंदम’ संस्थापक जगदीश रावतानी की कविता पर भी खूब वाह वाह की दाद मिली- जल्दी मत कर देर हो जाएगी/ पचास वर्ष की आयु जब होती है पार/ मनुष्य उतावलेपन में डूब करता है विचार/ उतावलेपन में मनुष्य हर कार्य जल्दी जल्दी करने लगता है/ स्वप्न अधूरे ना रह जाएं/ ये सोच कर डरने लगता है…
संचालक ममता किरण ने एक कविता सुनाई ‘शिकायत’-
किताबों के होंठों पर शिकायत है इन दिनों/ की अब उनमें महकता खत रख कर/ नहीं किया जाता/ उनका आदान प्रदान.
गोष्ठी का समापन अध्यक्ष बुद्धिनाथ मिश्र ने अपने रसीले गीतों को तरन्नुम में गा कर किया-
एक बार और जाल फेंक रे मछेरे/ जाने किस मछली में बंधन की चाह हो
अंत में जगदीश रावतानी ने सभी कवियों का धन्यवाद करके गोष्ठी संपन्न की.

प्रस्तुति: प्रेमचंद सहजवाला


पद्मश्री गिरिजा देवी सहित कई को सम्मान

नई दिल्ली : बनारस घराने की मशहूर गायिका पद्मश्री गिरिजा देवी को शुक्रवार को प्रतिष्ठित संगीत नाटक अकादमी रत्न सदस्यता पुरस्कार 2010 से सम्मानित किया गया। संगीत नाटक अकादमी द्वारा आयोजित पुरस्कार समारोह के दौरान उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने  उन्हें पुरस्कार स्वरूप स्मृति  चिन्ह व तीन लाख रुपए का चेक प्रदान किया। गिरिजा देवी के अतिरिक्त टीके मूर्ति, रहीम फहीमुद्दीन डागर व नटराज रामकृष्णा को भी वर्ष 2010 के संगीत नाटक अकादमी रत्न सदस्यता पुरस्कार से सम्मानित किया गया। नटराज रामकृष्णा को यह सम्मान मरणोपरांत प्रदान किया गया। इस दौरान छन्नू लाल मिश्रा, यशपाल, बुधादित्य मुखर्जी, नित्यानंद हल्दीपूर सहित 36 अन्य को अकादमी पुरस्कार 2010 से सम्मानित किया गया।
शुक्रवार को कमानी सभागार में आयोजित संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार 2010 समारोह के दौरान गिरिजा देवी, टीके मूर्ति, रहीम फहीमुद्दीन डागर व नटराज रामकृष्णा को रत्न साहित्य सम्मान से अलंकृत किया गया। इसके अतिरिक्त संगीत, नाटक, नृत्य, पारंपरिक, लोक, जनजातीय नृत्य, संगीत, नाटक एवं पुतुलकला आदि के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदानों को देखते हुए 36 अन्य लोगों को अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इनमें छन्नू लाल मिश्रा (हिंदुस्तानी गायन), यशपाल (हिंदुस्तानी गायन), बुधादित्य मुखर्जी (सितार), नित्यानंद हल्दीपूर (बांसुरी), सुगुणा पुरूषोत्तमन (कर्नाटक गायन), मैसूर नागमणि श्रीनाथ (कर्नाटक गायन), नागई आर मुरलीधरन (वायलिन), श्रीमुशनम वी राजाराव (मृदंगम), एमवी सिंहाचल शास्त्री (हरिकथा) को संगीत के क्षेत्र में किए गए योगदान के लिए सम्मानित किया गया।
नृत्य के क्षेत्र में योगदान  के लिए मालविका मित्र (कथक), कलामंडलम गोविंद नायर (कथकलि), फान्जौबम इबोतोन सिंह (मणिपुरी), रत्ना कुमार (कूचिपूडि़), अरुणा मोहन्ती (ओडिसी), माणिक बड़बायन (सत्रिय), उत्तरा अशा कूर्लावाला (सृजनात्मक नृत्य), कलामंडलम पेनकुलम रामन (कूटियाट्टम) व एस राजेश्वरी (भरतनाट्यम) को अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
नाटक के क्षेत्र में डी विजय भास्कर (नाट्य लेखन, तेलुगु), आत्मजीत (नाट्यलेखन, पंजाबी), वीणापाणि चावला (निर्देशन), उर्मिल कुमार थपलियाल (निर्देशन), दिलीप प्रभावलकर (अभिनय), बनवारी तनेजा (अभिनय), माया कृष्ण राव (अभिनय) व स्वातिलेखा सेनगुप्ता (अभिनय) को उक्त पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
पारंपरिक, लोक, जनजातीय नृत्य, संगीत, नाटक एवं पुतुलकला के क्षेत्र में हरभजन सिंह नामधारी (गुरबाणी कीर्तन), नजीर अहमद खान वारसी व नसीर अहमद खान वारसी (कव्वाली), द्विजेन मुखर्जी (रवींद्र संगीत), टी सोमसुंदरम (लोकनृत्य), कृष्णा कुमारी (लोक संगीत), चंदाताई जगदीश तिवाड़ी (लोक
नाटक), के चिन्न अंजनम्मा (छाया पुतुल), केवी रामकृष्णन व केसी रामकृष्णन (दस्ताना पुतुल) को सम्मानित किया गया। प्रदर्शन कलाओं में समग्र्र योगदान/विद्वता के क्षेत्र में अशोक डी रानाडे (संगीत) व जयदेव तनेजा (नाटक) को सम्मानित किया गया। उपराष्ट्रपति ने इन लोगों को स्मृति चिन्ह व एक लाख का चेक प्रदान किया गया। इस दौरान सांस्कृतिक मंत्री कुमारी शैलजा, संगीत नाटक अकादमी की अध्यक्ष लीला सैमसन आदि उपस्थित रहीं।

 

भोमा और ग्रीन हंट : अशोक भौमिक

वरिष्ठ चित्रकार अशोक भौमिक इन दिनों नयी चित्र  श्रृंखला  ‘भोमा और ग्रीन हंट ’ बना रहे हैं। हमने उनसे इन चित्रों के बारे में लिखने के लिए कहा। इस पर उन्‍होंने जो टिप्‍पणी की वह उनके चार चित्रों के साथ दी जा रही है-

मैं चित्रों के शीर्षक पर दो शब्द जरूर कहना चाहूँगा। ‘भोमा और ग्रीन हंट’ में भोमा बादल सरकार  के प्रसिद्ध

नाटक ‘भोमा’ से लिया हुआ है।

सुंदरबन के आदिवासी इलाकों में रहने वाला भोमा ‘भूखा रहता है ताकि हमें भात मिलता रहे’,  ‘ऐसे  भोमाओं का खून’ रोज़  हमारी थालियों में  सफ़ेद भात बन कर चमेली की तरह खिल उठता है’। बादल सरकार ने ‘भोमा’  नाटक  में एक सवाल पूछा था कि ‘कब ‘मै’,  तुम ‘सब’ से मिल कर एक ‘हम’ बनेंगे।’ ये सवाल मेरी इस चित्र श्रृं खला की मूल प्रेरणा हैं।

पर यह सच है कि  शब्दों के जरिये किसी चित्र की व्याख्या से चित्रों के रंग फीके पड़ जाते है, रेखाएं मिटने लगती हैं और धीरे-धीरे चित्र आपके सामने से गायब हो जाता है। पर जो रह जाता है वह है  व्याख्याकार का पांडित्य !

तो क्या  चित्र और चित्रकार  से चित्र की गलत-सही व्याख्या पेश करने  वाला व्यक्ति ज्यादा महत्वपूर्ण है ? क्या आप  कवियों से  यह उम्मीद  करते  हैं  कि  कविता  के  साथ- साथ  कविता  का  अर्थ  भी  अलग  से लिखकर  दिया  करे, या  फिर  किसी  संगीतकार  या  किसी नर्तक  से हम  ऐसी  मांग  करते  हैं ?

ऐसी स्थिति में हमें  इसमें आश्‍चर्य नहीं होना चाहिये कि मेरे चित्रों में,  हमारे देश के जंगलों मे जीने वालें लोगों से उनकी जमीन और जंगल छीनने के षड्यंत्र के विरोध में लामबंद होते आदिवासियों को किसी विस्तृत व्‍याख्‍या के बगैर हम नहीं पहचान पाते हैं। उस  लाल चिड़िया के सन्देश को समझने के लिये व्याख्या की मांग करते है। या कि हम महानगरों मे रहने वाले लोगों को  उस लाल नगाड़े की आवाज़ नहीं सुनाई दे रही है। आज मुझे उन आदिवासी देशवासियों के शरीर पर धारियां दिख रही हैं। मैं सपने मे एक हरा शेर देखता हूँ जो लाल चिड़िया के कूक से, लाल नगाड़े की आवाज़ से एक नई लड़ाई के लिये तैयार  हो रहा है।

‘ मैं ‘,  उन सबसे मिलकर एक व्यापक  हम बनने की जरुरत को महसूस करता हूँ। मेरे चित्रों का अर्थ समझने से  ज्यादा जरूरी है कि उस लाल नगाड़े के आवाज़ को समझ कर उन हरे शेरों तक पहुंचा जाये।

नोट : भौमिक जी ‘चित्र और उनकी व्याख्या विषय पर लेख लिख रहे हैं। पूरा होते ही उसे ‘लेखक मंच ’ में प्रकाशित किया जाएगा। इन चित्रों पर अपनी बात के लिए आप उनसे bhowmick.ashok@googlemail.com पर संपर्क कर सकते हैं।

एम.एफ. हुसैन को चित्रकार हरिपाल त्यागी की श्रद्धांजलि

एम.एफ. हुसैन को चित्रकार हरिपाल त्यागी द्वारा कूची से दी गई श्रद्धांजलि।

 

मेरा बचपन : नरेंद्र सिंह नेगी

उत्तराखंड के सुप्रसिद्ध लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी के बचपन का संस्‍मरण-

पैतृक गांव पौड़ी (नान्दलस्यूं) में मेरा बचपन भी एक साधारण ग्रामीण परिवार में सुख-दुखों के बीच हंसते-खेलते बीता। पिता स्वर्गीय उमरावसिंह नेगी आजादी से पूर्व के नायब सुबेदार थे, किंतु उनकी पेंशन इतनी कम थी कि बड़े परिवार का भरण-पोषण बड़ी मुश्किल से हो पाता था। मां स्वर्गीय समुद्रा देवी एक  ग्रामीण घरेलू महिला थीं और गाय-भैंस पालकर घर चलाने में पिता का हाथ बंटाती थीं। यूं तो गांव में हमारी खेती भी थी, किंतु पहाड़ की उखड़ खेती में पसीना अधिक और अनाज कम ही उगता था। मां को खेतों और जंगलों में खटते तथा आर्थिक तंगी से जूझते पिता के माथे की लकीरें मैंने अपनी उम्र से पहले ही पहचाननी शुरू कर दी थीं।

इसके बावजूद बचपन में माता-पिता और बहनों का भरपूर लाड़-प्यार मिलता रहा। पिता के पुत्र मोह की इन्तहां यह थी कि कक्षा 1-2 में स्‍कूल से घर आने के बाद वे मुझे बाकी बहनों से छिपकर एक  दुकान से दूध-जलेबी खिलाते थे। इस पक्षपाती लाड़ का याद कर आज भी शर्मिंदा होता हूं।  यह शायद बड़े परिवार के पिता की मजबूरी रही हो। बढ़ते परिवार और आर्थिक तंगी ने बचपन में ही मुझे अंतर्मुखी और गंभीर स्वभाव का बना दिया। मुझसे बड़ी दो बहनों को पिताजी पढ़ा नहीं पाये, इसका हमेशा दुख रहा, बाकी मैंने और मुझसे छोटे सभी भाई-बहनों (एक भाई व पांच बहनों) ने स्नातक तक शिक्षा पाई।

पौड़ी गांव में मेरे बचपन के साथी थे बिल्लू (वीरेन्द्र सिंह), राजू (राजेन्द्र सिंह), ज्ञानू (ज्ञान सिंह),  कालू (धर्म सिंह) और मुझे नरू कहते थे। गांव में पटवारियों का चौक  और पौड़ी बाजार में गांधी मैदान (अंग्रेजों का टैनिस कोर्ट) हमारे खेल के प्रिय मैदान और फुटबाल प्रिय खेल था। हम गांव के लड़के बाजारी लड़कों से किसी-न-किसी बात को लेकर अक्सर झगड़ते रहते थे। यह शायद गांव के शहरीकरण की खुंदक  रही हो। मुझे याद है, बचपन में हम अपने भूम्याल कन्ड़ोलिया देवता के मंदिर से लोगों द्वारा भेंट चढ़ाये गये पैसे उठाया करते थे, तब देवताओं से ज्यादा पैसों की जरूरत हम बच्चों को थी। अभी कुछ वर्ष पूर्व ही मैंने अपने कुछ साथियों के साथ कन्ड़ोलिया देवता पर भजनों की एक कैसेट निकालकर ब्याज चुकाने का प्रयास किया,  मूल तो जीवन भर नहीं चुका पाऊंगा।

मेरे बचपन की एक मजे की बात यह रही कि कक्षा-1 से 4 तक  मैं पौड़ी में लड़कियों के हाई स्‍कूल में पढ़ा,  जहां मेरे तयेरे भाई स्वर्गीय अजीत सिंह नेगी संगीत टीचर थे। इस गर्ल्‍स स्‍कूल में मेरे साथ पौड़ी बाजार के तीन लड़के और थे- ईशमोहन,  अजीत गोयल और सुधीर खण्डूड़ी। इससे पहले कि हम बच्चे लिंगभेद समझ पाते,  कक्षा-चार पास करने के बाद प्रिंसिपल महोदया ने हमारे हाथों में अभिभावकों के नाम पत्र थमा दिये कि अब आपके लड़के बडे़ (जवान) हो गये हैं। इन्हें गर्ल्‍स स्‍कूल से हटाकर लड़कों के स्‍कूल में भर्ती करें। दर्जा-5 में मुझे वार मेमोरियल हाईस्‍कूल, लैन्सड़ौन भर्ती कर दिया गया, जहां मात्र एक साल ही पढ़ पाया। उन दिनों लैन्सडौन में नरभक्षी बाघ के आतंक और मां की जिद्द के कारण पिताजी मुझे वापस पौड़ी ले आये और मेसमोर इंटर कॉलेज, पौड़ी में कक्षा-6 में भर्ती करा दिया। फिर इंटर तक यहीं पढ़ा। पौड़ी की सुप्रसिद्ध रामलीला में संगीतकार भाई अजीतसिंह नेगी एवं मदनसिंह नेगी के प्रोत्साहित करने पर वानर से लेकर अहिल्या, भरत, शत्रुघन के पार्ट खेलना बचपन के यादगार क्षण हैं। एक  बार पिताजी के साथ बैकुंठ चतुर्दशी मेले में श्रीनगर गया और मेले की भीड़ में खो गया, तब श्रीनगर में रातभर मेला चलता था। सारी रात एक  पीपल के पेड़ के नीचे रोता रहा। भीड़ में ढूंढते-ढूंढते आखिर सुबह तक  परेशान पिताजी वहां पहुंच ही गये।

12-13 साल की उम्र में सिनेमा देखने का शौक  ऐसा चढ़ा कि पौड़ी में टिनशीट और तम्बू से बने सिनेमा हाल में हम बिना टिकट लिये चुपके से घुस आते थे और अक्सर पकड़े जाने पर पिट-पिटाकर बाहर कर दिये जाते थे। पौड़ी में उन दिनों टिंचरी शराब का बड़ा जोर था। टिंचरी की खाली बोतलें जमा कर सिनेमा के टिकट का जुगाड़ करते रहे। पिक्चर का नशा इस कदर बढ़ता गया कि एक  दिन गांव के दोस्तों के साथ घर से छिपकर एक  निर्माणाधीन भवन में पत्थर की रोड़ी तोडऩे चल दिया।  उन दिनों एक कनस्तर रोड़ी तोडऩे पर ठेकेदार से आठ आने मिलते थे और सिनेमा का न्यूनतम टिकट छह आने का था। पता नहीं पिताजी को पहले ही दिन हमारी इस खून-पसीने की जायज कमाई का कैसे पता चला कि वहां पहुंचकर उन्होंने मुझे तो कम मारा पर बेचारे ठेकेदार की ऐसी-तैसी कर दी।

हिंदी फिल्मी गीतों के शौक के बावजूद अपने स्वभाव के चलते मैंने कभी स्‍कूल-कॉलेज के मंचों पर गाने नहीं गाये, किंतु बचपन में गांव में माता-पिता के साथ देखे-सुने घडेले, मण्डाण, थडिया चौंफुला गीतों की लोकधुनों का बाल मन-मस्तिष्‍क पर इतना गहरा असर रहा कि आगे चलकर लोकगीत-संगीत की राह पर चल पड़ा और ऐसा चला कि अभी तक  गिरता-पड़ता चल ही रहा हूं।

(डॉ. अतुल शर्मा (देहरादून) द्वारा ‘बचपन’ नाम से संपादित शीघ्र प्रकाश्‍य पुस्‍तक से साभार)

 

जिल्लत से जंग लड़ते दो मासूम : हरीश जोशी/केशव भट्ट

पास्टर के साथ पूजा और राहुल।

मानव समाज की सामाजिक-आर्थिक व्यावस्था , सामजिक भ्रांतियों, विकास और पुनर्वास योजनाओं के सच को उजागर करता पत्रकार हरीश जोशी व केशव भट्ट का आलेख-

उत्तराखंड राज्य में सरकार का कॉलर ऊंचा करने के लिए संचालित कन्याधन, गौरादेवी, बालिका शिक्षा जैसी महत्वपूर्ण योजनाओं का सुविधाओं से वंचित परन्तु प्रतिभावान छात्रा पूजा राना के लिए कोई मायने नहीं है। पूजा की कहानी मानव समाज की सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था, सामाजिक भ्रान्तियों और विकास व पुनर्वास की योजनाओं के सच पर कड़ा प्रहार करती है। एड्स की जानलेवा बीमारी ने पूजा से पहले पिता और फिर मॉं का साया छीन लिया और 12 वर्षीय पूजा अपने 11 वर्षीय भाई राहुल को साथ ले ईसाई मिशनरी के प्रार्थना भवन में पास्टर विक्टर सिंह के व्यक्तिगत संरक्षण में संघर्षों के बीच अपनी पढ़ाई की मंजिल पर पग बढ़ा रही है।
अभावों में जी रही पूजा राना और उसके भाई राहुल राना की त्रासदी की कहानी शुरू होती है 2003 में उनके पिता जीवन सिंह राना की एड्स की बीमारी से मौत के बाद। विकास खंड गरूड़ के मन्यूड़ा, सीर ग्राम के किसान आनन्द सिंह राना का गबरू जवान बेटा जीवन सिंह राना वर्ष 94-95 में रोजगार के लिए मुंबई महानगरी में जा वहां होटल लाइन का रोजगार करता है। इसी दौरान वहां उसका मराठी मूल की अंजलि से प्रेम परवान चढ़ता है और दोनों वर्ष 97 में प्रेम विवाह कर लेते हैं। जीवन-अंजलि दंपति के मुंबई में ही वर्ष 99 में बेटी पूजा और वर्ष 2001 में बेटे राहुल का जन्‍म होता है।
जीवन का हंसता-खेलता परिवार वर्ष 2002 में अपने पैतृक गांव मन्यूड़ा लौटता है। वक्त बीतने के साथ ही जीवन अकसर बीमार रहने लगता है। परीक्षणों से पता लगता है कि उसे जानलेवा बीमारी एड्स है। कई यातनाएं झेलने के बाद वह 2003 में दम तोड़ देता है। जीवन के पिता बेटे की मौत के बाद अपनी बहू अंजलि और उसकी दो संतानों की परवरिश करते हैं। इस बीच अंजलि भी बीमार पड़ने लगी। परीक्षण में पता चला कि अंजलि भी एड्स एच.आई.वी. संक्रमित है। इसके बाद उसके प्रति सभी का नजरिया बदल जाता है और यहीं से छूत की बीमारी मान अंजलि और उसकी संतानें सड़क पर आ जाती हैं।
अंजलि के लिए अपने और बच्चों के पेट के आगे बीमारी और इलाज गौण हो जाते हैं। भरण-पोषण के लिए वह गरूड़ टीट बाजार के एक रेस्टोरेंट में काम शुरू करती है। उसकी बीमारी उसे अंदर ही अंदर घुन की तरह खाए जा रही थी। काम करने के दौरान एक दिन रेस्टोरेंट में ही अंजलि मूर्छित हो जाती है। तभी वहीं बगल में ईसाई मिशनरी का प्रार्थना भवन संचालित कर रहे पास्टर विक्टर सिंह, अंजलि को अपनी बेटी मान उसे व उसके दो बच्चों को प्रार्थना भवन में ही शरण देने के साथ ही यथाशीघ्र उसका इलाज कराते हैं। बकौल पास्टर सिंह कई सम्पर्कों के बाद सरकार से अंजलि के इलाज के लिए मात्र पच्चीस हजार रुपये की नाकाफी इमदाद मिली, और अंततः बीमारी से जूझते 30 मई, 2010 को अंजलि ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। अंजलि की मृत्यु पूर्व सहमति पर उसका अंतिम संस्कार ईसाई धर्म रीति से किया गया। पूजा व राहुल के लिए सुकून रहा कि एड्स की बीमारी में मॉं-बाप खो देने पर भी इनका एचआइवी परीक्षण नकारात्मक है।
पास्टर के अनुसार अंजलि और उसके बच्चों का कोई भी धर्मान्तरण नहीं किया गया है। धर्मान्तरण का दबाव पड़ने पर उन्होंने मिशनरी ही छोड़ दी। वर्तमान में पास्टर मकानों में रंग-पुताई कर स्वयं व बच्चों का भरण पोषण के साथ ही बच्चों की शिक्षा का प्रबन्ध कर रहे हैं। पूजा राना राजकीय बालिका इंटर कालेज, पाये गरूड़ में कक्षा सात की संस्थागत छात्रा है। राहुल राना राजकीय इंटर कालेज, गरूड़ में कक्षा छह का संस्थागत छात्र है। पूजा की उपलब्धि है कि अभावों के ऐसे संघर्ष और झंझावतों के बीच उसने गत् सत्र में कक्षा छह की परीक्षा में 84 व वर्तमान में कक्षा सात में 87 प्रतिशत अंक प्राप्त कर अपने विद्यालय पाये में सर्वोत्तम का स्थान हासिल किया है। पूजा की कहानी व उपलब्धि को व्यापक पहचान के लिए जब राष्ट्रीय स्तर पर नेशनल कोएलिशन फॉर एजूकेशन, नई दिल्ली को भेजा गया तो कोएलिशन द्वारा महिला एवं बालिका शिक्षा पर ग्लोबल एक्‍शन वीक में आयोजित कार्यक्रमों में शामिल होने के लिए पूजा को चुन लिया गया। कोएलिशन के संयोजक रमाकान्त राय एवं एडवोकेसी कोआर्डिनेटर उमेश कुमार गुप्ता ने बताया कि  नई दिल्ली में गांधी शांति प्रतिष्ठारन में 3 व 4 मई को शिक्षा, मानव संसाधन विकास, महिला व बाल शिक्षा, सामाजिक अधिकारिता, बचपन बचाओ क्षेत्र के विषय विषेशज्ञों एवं मंत्रालय से जुड़े अधिकारी व मंत्रियों के बीच पूजा राना अपनी दास्तांम का खुद बखान करेगी। दो दिवसीय इस कार्यक्रम में देश भर से मात्र 10 बच्चों को अवसर मिला है। उत्तराखंड में से पूजा राना का इसमें चयन हुआ है।
इन्हे परवरिश दे रहे 63 वर्षीय पास्टर विक्टर सिंह के अनुसार वह अपने जीते जी न तो इन बच्चों का धर्मान्तरण होने देंगे और न ही वह इन्हें किसी मिशनरी, संस्था और अनाथालय में ही जाने देंगे। परन्तु उम्र के इस पड़ाव में विक्टर सिंह की मेहनत-मजदूरी की भी सीमायें हैं और इस सबके बीच जुड़ा़ है इन होनहार नौनिहालों का सुनहरा किन्तु अनिश्चित भविष्यड। काबिले गौर है कि विपरीत परिस्थितियों में जहां पर इन बच्चों की परवरिश हो रही है वहां से महज पांच किमी की दूरी पर उनके गुजर चुके मॉं-बाप का सुसम्पन्न परिवार है।
पूजा का दुर्भाग्य कहें या शासन-प्रशासन की लापरवाही,  उसकी इस संघर्षपूर्ण उपलब्धि पर उसे ईनाम तो दूर कहीं से दो बोल प्रशंसा के भी नहीं मिले। जबकि वह इस सबके लिए बड़े से बड़े प्रोत्साहन की हकदार है। भविष्य  के प्रति पूजा का रूझान अभी अध्यापक बनना है। अध्यापकों का स्नेह ही इसका कारण है।
अभावों में जूझ रहे इन नौनिहालों की यह दर्द भरी कहानी हमारे तथा कथित सुसभ्य-सुसंस्कृत समाज के आगे कई प्रश्नक खड़े करती है। मसलन इन बच्चों के पैतृक संबन्धी कानूनी अधिकार क्या हैं ? एड्स पीडि़त परिवारों के पुनर्वास की योजनाओं का क्या यही सच है ? महज एक बीमारी के चलते क्या अपने ही कानूनी रूप से बेगाने हो सकते हैं ? बागेश्वेर जनपद और उत्तराखंड राज्य में परियोजनाओं के नाम पर करोड़ों के वारे-न्यारे कर रही स्वैच्छिक संस्थाओं की क्या जिम्मेदारी है ? पूजा के लिए राज्य की उन महत्वकांक्षी योजनाओं के क्या मायने हैं जिन्हें कन्याधन और बालिका शिक्षा जैसे नाम दिए गये हैं ? शिक्षा का अधिकार जैसे राष्ट्रीय विधेयक पूजा-राहुल के साथ क्या इंसाफ कर सकते हैं ? पूजा-राहुल की इस दास्तान में ऐसे ही सवालों की लंबी फेरहिस्त हो सकती है जो समय रहते निश्चित उत्तर और समाधान चाहते हैं।
फिलवक्त पूजा, राहुल व विक्टर सिंह के इस संघर्ष में जरूरत है ऐसे मददगार हाथों की जो आर्थिक रूप से इनका संबल बन सकें। परन्तु ये तीनों बहुत बड़े वोट फैक्टर नहीं हैं इसलिए राजनीति से ऐसी उम्मीद करना व्यर्थ है। इन्हें सहारा देने के लिए समाज की मानवीय संवेदनाओं को ही जागना-जगाना होगा। शायद ऐसा हो सके ! बहरहाल ये दो मासूम जिंदगी के साथ ही जिल्लत से जंग लडने को भी मजबूर हैं।
नोट : पूजा राना के नाम भारतीय स्टेट बैंक शाखा, गरूढ़, कोड- 2544, जिला बागेश्‍वर, उत्तराखंड में बचत खाता संख्यां 31671346296 खोला गया है। कोई भी योगदान इस खाते में सीधे दिया जा सकता है। मोबाइल नंबर 09917628543 पर उनसे संपर्क किया जा सकता है। इसके अलावा हरीश जोशी का मोबाइल नंबर- 09411574220 और केशव भट्ट का मोबाइल नंबर- 09412106119 है।

 

सृजन के सैद्धांतिक नेपथ्‍य को विचार में लेते हैं संजीव : रवीन्‍द्र त्रिपाठी

संजीव कुमार को देवीशंकर पुरस्कार प्रदान करते विश्‍वनाथ त्रिपाठी।

नई दि‍ल्‍ली : युवा आलोचक संजीव कुमार को उनकी आलोचना-पुस्तक ‘जैनेन्द्र और अज्ञेय: सृजन का सैद्धांतिक नेपथ्य’ के लिए पंद्रहवां देवीशंकर अवस्थी पुरस्कार वरिष्‍ठ आलोचक विश्‍वनाथ त्रिपाठी ने प्रदान किया। 05 अप्रैल, 2011 को नई दिल्‍ली स्थित साहित्‍य अकादेमी के रवीन्‍द्र भवन में आयोजित समारोह में विश्‍वनाथ त्रिपाठी ने कहा कि हिंदी समाज अवस्‍थी जी के प्रति बहुत ही आत्‍मीय और अपनापन महसूस करता है। इसलिए युवा आलोचक संजीव कुमार को यह सम्‍मान प्रदान करते हुए मैं स्‍वयं को सम्‍मानित महसूस कर रहा हूं।
समारोह के संचालक रवीन्‍द्र त्रिपाठी ने कहा कि युवा आलोचक संजीव कुमार की आलोचना नितांत समसामयिकता तक महफूज रहने के बजाए आधुनिक परंपरा के उन तत्‍वों की ओर ध्‍यान देती है जोकि या तो पहले गंभीरता से देखे-परखे नहीं गए है या गंभीर कुपाठ का शिकार हुए हैं। वह अध्‍यवसाय और सूक्ष्‍म-द़ृष्टि द्वारा सृजन के सैद्धांतिक नेपथ्‍य को विचार में लेते हैं और उसकी सहायता से कृति को समझने की कोशिश करते हैं। उनकी पुरस्‍कृत पुस्‍तक ऐसी कोशिश का सुफल है।
दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में अवस्‍थी जी के सहकर्मी रहे सत्‍यदेव चौधरी ने संस्‍मरणात्‍मक वक्‍तव्‍य में कहा कि अवस्‍थी जी अपने अध्‍ययन-अध्‍यापन, लेखन व जीवन-शैली में आधुनिक थे। उन्‍होंने हमेशा अख्‍यात और नए लेखकों को लेखन के लिए प्रेरित और प्रोत्‍साहित किया। उनकी प्रतिभा का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि निधन से पूर्व उनकी केवल पांच पुस्‍तकें प्रकाशित हुईं, जबकि उसके बाद से अब तक कई किताबें आ चुकी हैं और लगातार चर्चा में रही हैं।
पुरस्‍कृत आलोचक संजीव कुमार ने कहा कि यह अवसर मुख्‍यत: अवस्‍थी जी का जन्‍मदिन मनाने का है और किसी युवा आलोचक को उसके कार्य के लिए प्रोत्‍साहित करना तो उसका हिस्‍सा भर है। उन्‍होंने इस तथ्‍य की ओर ध्‍यान दिलाया कि छत्‍तीस साल की छोटी-सी उम्र में अवस्‍थी जी ने साहित्यिक हलके में जैसा और जितना हस्‍तक्षेप किया, वह हम जैसों के लिए गहरे आश्‍चर्य का विषय है और अपने समय का कोई ज्‍वलंत प्रश्‍न नहीं रहा होगा जिस पर अवस्‍थी जी ने लिखित मुठभेड़ न की हो। और इस मुठभेड़ के लिए भारतीय काव्‍य और काव्‍यशास्‍त्र की परंपरा से लेकर पश्चिम के साहित्‍य सिद्धांतों के अपने ज्ञान का समुचित उपयोग ने किया हो।
इस अवसर पर आयोजित ‘उपन्‍यास और हमारा समय’ विषयक विचार गोष्‍ठी का प्रारंभ करते हुए पंकज बिष्‍ट (रामजी यादव द्वारा पढ़े गए पर्चे में) ने कहा कि उपन्‍यास की पहली और आखिरी विशेषता उसकी समकालीनता ही है और इस रूप में उपन्‍यास और हमारे समय पर बात करने का दूसरा अर्थ उपन्‍यास और हमारा समाज या फिर समाज और उपन्‍यास के रिश्‍ते को रेखांकित करना है। आजादी के बाद हिंदी उपन्‍यास को हाशिए पर धकेल दिए जाने का परिणाम भी हम देख रहे हैं। कितनी बड़ी विडंबना है कि 40 करोड़ हिंदीभाषियों के पास 40 अच्‍छे उपन्‍यासकार नहीं हैं। रवीन्‍द्र त्रिपाठी ने कहा कि समाज कोई निश्चित या पारिभाषिक शब्‍द नहीं है। इससे गांव-शहर, परंपरा-आधुनिकता के साथ बहुत कुछ समाया है। हिंदी में उपन्‍यास-आलोचना का आत्‍मविश्‍वास कविता-आलोचना की तुलना में काफी संकट में रहा है। आशुतोष कुमार ने समय के साथ उपन्‍यास के रिश्‍ते को विश्‍लेषित करते हुए कहा कि उपन्‍यास समय की सूची अवधारणा के खिलाफ खड़ा है और स्‍मृति, यथार्थ और कल्‍पना के बीच की दूरी उपन्‍यास की औपन्‍यासिकता को तय करती है, औपनिवेशिक इतिहास के शोषण के रूपों का आख्‍यान बनाती है और इस तरह वह खंडित होते मनुष्‍य के मनुष्‍य होने के अहसासों को रेखांकित करता है।
संजीव कुमार ने कहा कि लेखक पाठक को रोना तो रोते हैं, लेकिन खुद उन्‍होंने इस पाठक तक जोड़ने, उसे लोकप्रिय बनाने के लिए क्‍या किया ? अगर किसी ने ऐसा किया तो उसे भाषीय खिलंदड़ापन करता गप्‍पोड़ कहा गया। उपन्‍यासकार को अगर उपन्‍यासकार बने रहना है तो उसे तरह-तरह की आवाजों को स्‍पेस देना ही होगा।
अध्‍यक्षीय वक्‍तव्‍य में अशोक वाजपेयी ने महाकाव्‍य और उपन्‍यास के अंतर को स्‍पष्‍ट करते हुए कहा कि महाकाव्‍य मनुष्‍य को पवित्रता के बोध से मुक्‍त नहीं हो पाता ओर उपन्‍यास मनुष्‍य की अपवित्रता के बोध से। एक लोकतांत्रिक कर्म के रूप में उपन्‍यास ने ही सबसे अधिक चालू नैतिकता को चुनौती दी है, एक तरह की नैतिक प्रश्‍नवाचकता को चिह्नित किया है। इस मायने में वह हमारी स्‍वतंत्रता का विस्‍तार करता है, उसके प्रति हमारी जवाबदेही पुष्‍ट करता है।
अंत में अनुराग अवस्‍थी ने सभी को धन्‍यवाद ज्ञापित किया।