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बटरोही के उपन्यास ‘गर्भगृह में नैनीताल’ पर चर्चा

Garbh Griha Mein Nainital.Batrohi

देहरादून : दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र की ओर से 20 अप्रैल 2013 को हिन्दी के वरिष्ठ कथाकार बटरोही के सद्यः प्रकाशित उपन्यास ‘गर्भगृह में नैनीताल‘ पर चर्चा का आयोजन किया गया। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (विज्ञान शाखा) के सभागार में आयोजित इस कार्यक्रम की अध्‍यक्षता वरिष्ठ साहित्‍यकार सुभाष पंत ने की। वरिष्ठ कथाकार व ‘समयान्तर’ के सम्पादक पंकज बि‍ष्‍ट व उत्तराखण्ड शासन के पूर्व मुख्य सचिव डॉक्‍टर रघुनंदन सिंह टोलिया कार्यक्रम में वि‍शि‍ष्ट अतिथि थे। कार्यक्रम में दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र के निदेशक प्रोफेसर बी.के. जोशी सहित दिल्ली से कुछ साहित्यकार व देहरादून के तमाम लेखक, साहित्यकार व पत्रकार उपस्थित थे।

इस अवसर पर देवेन्‍द्र मेवाड़ी ने कहा कि‍ मेरे लिए यह उपन्यास एक एब्स्ट्रैक्ट पेंटिंग की तरह है जिसमें विविध रंग हैं जिन्हें कहीं कूँची से, कहीं चाकू से और कहीं रेखाँकनों के रूप में भरा गया हे। मेरे लिए उन रंगों के बीच से घटनाओं का देशकाल और चरित्र जीवंत हो उठते हैं और मैं उनसे बातें कर सका। उन्‍होंने बताया कि‍ वह और बटरोही सहपाठी हैं और उस देशकाल तथा उन चरित्रों के बीच रहे हैं। इसलिए उपन्यास को पढ़ते-पढते उनके लिए यह नैनीताल की एक पुनर्यात्रा थी। अन्य सभी पाठकों की तुलना में मेरे लिए यह एक नितांत अलग अनुभव था।

उपन्यास पर नवीन नैथानी, डॉ हरिसुमन बिष्ट, क्षितिज शर्मा, चंदन डांगी, विजय गौड़, ‘कर्मभूमि सम्‍वाद’ के कार्यकारी सम्पादक चारु तिवारी, भास्कर उप्रेती, गीता गैरोला, त्रेपन चौहान और रश्मि राव आदि‍ ने भी वि‍चार रखे।

वक्‍ताओं ने इससे प्रयोगात्मक उपन्यास करार दिया जिसमें इतिहास, व्यक्तिगत डायरी, लोक किंवदंतियाँ, लोक कथाओं के साथ आत्मकथा और संस्मरण का कोलाज है। मूलरूप में इस उपन्यास में उत्तराखण्ड के एक ऐसे पहाड़ी लड़के की व्यथा उभर कर आयी है जिसकी जड़ें अपने गाँव-इलाके से जुड़ी हैं और उसका मन बार-बार वहाँ की यादों की तलाश में लौटता-फिरता रहता है। इस उपन्यास में एक साधन सम्पन्न पहाड़ी राज्य का सपना पाले एक आम पहाड़ी व्यक्ति के आक्रोश को साफतौर पर देखा जा सकता है जो उसे अभी तक नसीब नहीं हो पाया। कार्यक्रम में नवीन नैथानी, अतुल शर्मा, गुरुदीप खुराना, मुकेश नौटियाल प्रोफसर धीरेन्द्र शर्मा, भानुप्रताप सिंह सहित कई साहित्यकार, लेखक और पत्रकार उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र के रिसर्च एसोसियेट चन्द्रशेखर तिवारी ने किया।

Garbh Griha Mein Nainital

 

 

 

 

 

 

 

चि‍त्र : चंदन डांगी

कविता खुद में झाँकने को मजबूर करती है : रेखा चमोली

रेखा चमोली

मैं जिस जगह रहती हूँ वह एक छोटा सा सीमांत पहाड़ी जिला (उत्तरकाशी, उत्तराखण्ड) है जो चीन की सीमा से लगा है। गंगा यहीं से निकलती है। एक तीर्थस्थल के रूप में इसका बहुत अधिक महत्व है। यहाँ का जनजीवन बहुत कठिन है। सर्दियों में जहां अत्यधिक ठंड पड़ने से पूरा क्षेत्र प्रभावित रहता है, वहीं बरसात में चार महीने की घनघोर बारिश से सारे रास्ते, सड़कें टूट जाने से यातायात अस्त-व्यस्त हो जाता है। इसी साल जुलाई में बादल फटने से आई बाढ़ में पूरा शहर लगभग दो माह तक बुरी तरह प्रभावित रहा। बहुत अधिक जनहानि हुई और आगे भी जाने कितने वर्ष इसको ठीक होने में लगेंगे। पहाड़ों से पलायन निरन्तर जारी है। घर-गाँव में बचे हैं तो सिर्फ बूढ़े,  महिलायें और बच्चे। वे ही पुरुष गाँव में हैं जो रोजगार की तलाश में बाहर नहीं जा पाये। खेती-किसानी मौसम की मेहरबानी पर ही टिकी हुई है।

नदियों पर बाँध बनाने की होड़ ने पहाड़ को जगह-जगह से छलनी कर दिया है। पिछले कुछ वर्षों से लगता है कभी न खत्म होने वाले निर्माण कार्यों के बीच ये अस्त-व्यस्त जनजीवन कभी पटरी पर आ भी पायेगा या नहीं।

महिलायें पहाड़ की रीढ़ हैं। घर, खेत, जंगल, जानवर सब इनके भरोसे हैं। अलसुबह से शुरू हुई इनकी दिनचर्या देर रात तक बेहद व्यस्त रहती है। बच्चे भी माँओ की यथासम्‍भव मदद करते रहते हैं। जंगल लगातार कम होने से पशुओं का चारा और लकड़ी लेने के लिए बहुत दूर जाना पड़ता है।

साहित्यिक दृष्टि से यह एक अनजाना-अनपहचाना स्थान है। इस छोटे से स्थान में आज भी पत्र-पत्रिकाओं की मात्र दो दुकाने हैं जहाँ साहित्यिक पत्रिकाएं मुश्किल से ही मिल पाती हैं। ऐसे में, अगर मैं वर्षों तक जिला पुस्तकालय की मोटी-मोटी किताबें बिना किसी दिशा या प्रयोजन के मात्र स्वांतः सुखाय पढ़ती रही तो कोई आश्चर्य नहीं। पर इन किताबों ने मुझे बहुत कुछ दिया। शायद इन्हीं किताबों का असर रहा होगा जिसने मुझे विद्रोही और सम्‍वेदनशील बनाया।

स्वाध्याय का यह संस्कार मुझे अपनी माँ से मिला जो आज भी अमिट हैं। समय के साथ उसकी छाप गहरी होती गई। मेरी माँ बहुत मेहनती व साहसी महिला हैं। वह नौकरी करतीं, घर परिवार सम्‍भालतीं और जब तमाम तरह की जिम्मेदारियों से निपट कर सोने जातीं तो कोई न कोई किताब उनके पास होती। वह बहुत सारे पूर्वाग्रहों से मुक्त हैं। शायद इसीलिए मैं भी ऐसी बन पाई।

स्वाध्याय के साथ ही साहित्यक पत्र-पत्रिकाओं ने मेरे सोचने,  लिखने को काफी प्रभावित किया है। ‘कृति ओर’, ‘कथन’, ‘वागर्थ’, ‘सूत्र’, ‘नया ज्ञानोदय’, ‘उत्तरा’, ‘सर्वनाम’, ‘लोकगंगा’ जैसी पत्र-पत्रिकाएं पढ़कर लगा मेरे जैसे सोचने वाले बहुत से लोग इस दुनिया में हैं, जो चुपचाप अपना काम कर रहे हैं।

‘अपने-अपने राम’, ‘कोई तो’, ‘माँ’, ‘असली इंसान’, ‘तरूणाई का तराना’, ‘पहला अध्यापक’, ‘स्त्री उपेक्षिता’, ‘अन्या से अनन्या’, जैसी अनगिनत किताबों ने दुनिया को समझने के आयाम दिये। इन किताबों को पढ़ने के बाद मेरा खुद पर विश्वास बढ़ा, चीजों को जैसे हैं वैसे देखने के बजाय उनको नये अवलोकनों, तर्कों, संदर्भों के साथ जोड़कर देखना सीखा। नार्गाजुन, केदारनाथ अग्रवाल, विजेन्द्र, महाश्वेता देवी, चन्द्रकांत देवताले जैसे जमीन से जुड़े रचनाकारों ने मुझे हमेशा प्रेरित किया।

हमारे समाज में महिलायें आज भी एक अलग प्रजाति मानी जाती हैं। शिक्षा-संस्कृति और समाज में तमाम परिवर्तनों के बावजूद उनकी स्थिति में बहुत अधिक परिवर्तन नहीं आया। वे घर की चार दीवारी से बाहर तो अवश्य आ गई हैं, पर सामाजिक-वर्जनाओं की दीवार से अभी तक बाहर नहीं निकल पाई हैं । आज भी उनके पास अपने जीवन के बारे में जरूरी निर्णय लेने की आजादी नहीं है। वे महिलायें जो पहले से चली आ रही व्यवस्थाओं, परम्पराओं पर सवाल खड़े करती हैं, आलोचनाओं के निशाने पर आ जाती हैं। उनके अस्तित्व और स्वाभिमान पर चोट कर उनको दीन-हीन बनाने का प्रयास आज भी जारी है। घर-परिवार और समाज में अपने लिये उन्होंने जो थोड़ी सी टिकाऊ जमीन बनाई है वो उनके अदम्य जीवन शक्ति का परिणाम है। साहित्य ने हमेशा उनकी इस जीवन शक्ति को बढ़ाने और उसके बारे में समझ बनाने का काम किया है। मेरे जीवन में भी साहित्य की यही भूमिका रही।

जहाँ तक अपनी कविता की बात है- मेरी कविता उनकी कविता है जो सदा से हाशिये पर धकेले गये हैं। जिनके साथ हुए अमानवीय व्यवहार को ईश्वर की मर्जी, कर्मों का फल या ऐसा ही होता आया है मानकर सहज स्वीकार किया जाता है। भले ही वे कभी इन कविताओं को न पढ़ पायें, उनको पता भी न चले कि वे मेरी कविताओं के विषय हैं, फिर किसी कविता का विषय हो जाने से उन्हें क्या मिल जायेगा। बावजूद इसके मेरा विश्वास है कि इन टूटी-फूटी कविताओं की आवाजें अपना कुछ न कुछ असर तो दिखायेंगी। ये मानकर ही लिखती आई हूँ कवितायें। मेरा मानना है कि जीवन के अनुभवों और यथार्थ से उपजी जीवन जैसी कवितायें ही सच्ची कवितायें हैं। मेरी कविताओं में दुख, निराशा, अपमान,  हिंसा और असमानता की बाते हैं क्योंकि इन सब चीजों का अस्तित्व दुनिया में है। तब और ज्यादा है जब महिलायें या वंचित वर्ग परम्पराओं और व्यवस्थाओं पर सवाल खड़े करके हल निकालने का प्रयास करते हैं। अच्छा सुंदर तो सबकुछ यथास्थिति स्वीकार करने में ही है। परिवर्तन की आहटों में, निर्माण की प्रक्रिया में उथलपुथल तो होगी ही। पीड़ा बिना कब नवनिर्माण होता है। मेरे लिए कविता ऑक्सीजन की तरह है। तो आत्मसम्मान और आत्मसंतोष के साथ अपने अस्तित्व की पहचान, अपनी आत्मा के प्रति जवाबदेही भी है। अगर मेरी कविता समानता, प्रेम, बराबरी, शांति और सम्मान से भरी दुनिया के निर्माण में रत्तीभर भी सहयोग कर पाती है तो मैं मानूँगी मेरा कविता कर्म सार्थक है। मात्र यश प्राप्ति के लिए कवि बनना मुझे मंजूर नहीं है।

कविता मेरी ताकत है। मुझे खुद में झाँकने को मजबूर करती है। मुझे खुद में सुधार लाने को उकसाती है। मुझे और अधिक मानवीय तथा संवेदनशील बनाती है। पर साथ ही मैं यह भी कहना चाहूँगी कि कवि भी आखिर एक मनुष्य है। इसी दुनिया में रहने वाला। दुनियादारी निभाता। अपने बाल-बच्चों के अस्तित्व की रक्षा करता। स्वाभाविक है कई बार परिस्थितियों के आगे बेबस भी हो जाता है। ऐसा मेरे साथ भी होता है पर मैं उससे टूटने के बजाय दुबारा डटकर खड़ी होने का पूरा प्रयास करती हूँ। दुबारा खड़े होने की यह ताकत मुझे कविता से ही मिलती है।

(युवा कवियित्री रेखा चमोली द्वारा ‘सूत्र सम्‍मान’ के दौरान दिया गया वक्‍तव्‍य)

सामान्य जनजीवन ही लेखकीय स्रोत : काशीनाथ सिंह

काशीनाथ सिंह को स्मृति चिन्ह प्रदान करते शिवमूर्ति।

आसनसोल : ‘प्रयास’ आसनसोल द्वारा हिन्‍दी अकादमी, आसनसोल नगर निगम के सहयोग से  आयोजित कथाकार काशीनाथ सिंह के रचनाकर्म पर केन्द्रित राष्ट्रीय संगोष्ठी 2 दिसम्‍बर, 2012 को आसनसोल नगर निगम सभागार में सम्पन्न हुई। इसमें काशीनाथ को ‘सृजन सम्मान-2012’ से सम्मानित किया गया। साथ ही साहित्यिक पत्रिका  ‘संबोधन’ के ‘काशीनाथ सिंह विशेषांक’ का विमोचन हुआ। संगोष्ठी तीन सत्रों में संपन्न हुई।

प्रथम सत्र में ‘प्रयास’ के साथी  राजीव लोचन सिन्हा ने प्रसाद के गीत ‘बीती बिभावारी जाग री’ की  संगीतमाय प्रस्तुति दी। अतिथियों का स्वागत संयोजन समिति की सदस्य डॉ. कुसुम राय  ने किया। ‘प्रयास’ के सचिव  डॉ. कृष्ण कुमार श्रीवास्तव ने कहा कि संस्था का मूल उद्देश्य हिन्‍दी साहित्य को पठनीयता के संकट से उबारने में योगदान देना है। इसी क्रम में ‘प्रयास’ द्वारा रचना केन्द्रित त्रैमासिक गोष्ठियाँ की जाती रही हैं। साथ ही रचनाकार की उपस्थिति  में  उसके सम्‍पूर्ण लेखन पर केंद्रित वार्षिक अयोजन ‘सृजन संवाद’ अयोजित किया जाता है। इसके पूर्व यह आयोजन कथाकार संजीव के सम्‍पू्र्ण लेखन पर(2010) तथा कथाकार शिवमूर्ति के सम्‍पूर्ण लेखन पर (2011) केंद्रित  रहा है। संस्था के संरक्षक डॉ. संतराम ने शाल ओढा़कर तथा सत्र की अध्यक्षता कर रहे कथाकार शिवमूर्ति ने स्मृति चिन्ह प्रदान कर काशीनाथ को ‘सृजन सम्मान-2012’ से सम्मानित किया।

काशी हिन्दू विश्‍वविद्यालय से आए डॉ. आशीष त्रिपाठी  ने कहा कि  काशीनाथ के रचना कर्म के मूलतः तीन आयाम हैं- कहानी, उपन्यास और संस्मरण। किन्तु मैं उन्हें मूलतः कहानीकार मानता हूँ। काशीनाथ की प्रतिबद्धता तो प्रेमचंद की परम्परा के तहत है, किन्तु कथा ढाँचा, शिल्प के स्तर पर नई राह बनाते हैं। उनकी कहानी कला चेखव के निकट है। प्रतिपल जीवन की नई भंगिमा ही उनका विषय है। काशीनाथ सिंह ने अपनी रचना प्रक्रिया पर बोलते हुए कहा कि सिर्फ होने से कुछ नही होता, अपने होने का हक़ अदा कीजै।  उन्होंने कहा कि भद्रलोक से जुड़ कर लेखक नहीं बना जा सकता। सामान्य जनजीवन ही लेखकीय स्रोत है। उन्होंने स्वीकार किया कि अहिन्दी भाषी क्षेत्र में यह सम्मान मुझे एक परिघटना की तरह लगता है। अध्यक्षीय वक्तव्य में  कथाकार शिवमूर्ति  ने कहा कि प्रेमचंद को पढ़ते हुए यह लगा की यह तो हमारे गाँव जंवार की, अपने आस-पास की कहानियाँ हैं। इस तरह तो मैं भी लिख सकता हूँ। काशीनाथ सिंह को  पढ़ कर  यह लगा  कि सामान्य से समान्य विषय, सन्दर्भों को भी रचना का विषय बनाया जा  सकता है। कहानी ‘अपना रास्ता लो बाबा’ का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि जिस चाचा ने कंधे पर बैठा कर घुमाया, पढा़या, कथानायक उसे ही नहीं पहचानना चाहता है। इस सत्र  का धन्यवाद ज्ञापन हिन्‍दी अकादमी नगर निगम, आसनसोल के सचिव जितेन्द्र तिवारी ने किया और संचालन डॉ. दामोदर मिश्र ने किया।

द्वितीय सत्र ‘भूमण्डलीकरण और कथाकार काशीनाथ सिंह’ के वक्ता अभिजीत सिंह एवं प्रसिद्ध पत्रकार कृपाशंकर चौबे थे। अध्यक्षता आलोचक गौतम सान्याल ने की। सत्र का संचालन अजय साव ने किया। अभिजीत सिंह ने कहा कि जिस तरह तुलसी के बिना राम कथा पर और रेणु के विना ग्राम कथा पर चर्चा नहीं की जा सकती, उसी तरह हिन्‍दी कथा साहित्य में काशीनाथ सिंह के बिना भूमण्डलीकरण पर चर्चा नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा कि आत्मालोचन की प्रक्रिया उनके यहाँ बहुत गहरे तक समायी है। कृपाशंकर चौबे ने कहा कि  ‘काशी का अस्सी’ की पाँच कहानियों में वैश्‍वीकरण की आँच को महसूस किया जा सकता है। यह सिर्फ बनारस की नहीं सम्पूर्ण हिंदुस्तान  की  कहानी है। ‘रेहन पर रग्घू’ उदारीकरण के कारण गाँव में हो रहे परिवर्तन को रेखाँकित करता है। काशीनाथ की सबसे बड़ी पहचान उनकी भाषा है। सत्र के अध्यक्ष गौतम सान्याल  ने कहा कि जब मैं साठोत्तरी कहानीकारों की टीम बनाता हूँ तो हर बार उसमे काशीनाथ सिंह का नाम आ जाता है। मैं कई बार अपने प्रिय कथाकार  संजीव को भी उसमे स्थान नहीं दे पाता, उन्हें बारहवें खिलाडी़ के रूप में ही स्थान दे पाता हूँ। उन्होंने कहा कि हिन्‍दी आलोचना को अभी  यह पता ही नहीं है कि संरचना के क्षेत्र में  काशीनाथ ने कितना महत्वपूर्ण कार्य किया है। सात-आठ साल बाद बाद जब कैम्पस नावेल की चर्चा होगी तो हिन्‍दी के पहले कैम्पस नावेल ‘अपना मोर्चा’ का महत्व समझ में आएगा।

तृतीय सत्र ‘समकालीन कथा साहित्य और कथाकार काशीनाथ सिंह’  के वक्ता आलोचक पल्लव और कामेश्‍वर प्रसाद सिंह थे। अध्यक्षता कथाकार नारायण सिंह ने की। सत्र का संचालन कथाकार सृंजय ने किया। पल्लव  ने  कहा कि काशीनाथ सिंह का लेखन भूमंडलीकरण के राक्षस को पहचानने में मदद करता है। उन्होंने कहानी ‘सरायमोहन’ की रचना उस समय की जब विमर्शवादी दौर आरम्भ हो चुका था और वह उन रुझानों के चक्कर  में पड़े बगैर प्रगतिशील नजरिये से अपनी बात कह रहे थे। वह अपने लेखन को रुढियों में फँसने से बचाते हैं। ‘रेहन पर रग्घू’ के अंत में बहु रघुनाथ से कहती है- ‘तुम कहाँ जाते हो, मेरा पति चला गया लेकिन तुम कहाँ जाते हो ?’ यह नया स्त्री चरित्र है जिसकी उद्भावना काशीनाथ सिंह के यहाँ की गयी है। कामेश्‍वर प्रसाद सिंह  ने कहा कि साहित्य के तिकड़म मैं नहीं जानता हूँ। मेरा मानना है कि बड़ा मनुष्य ही बड़ा रचनाकार हो सकता है। उन्होंने काशीनाथ सिंह के समकालीनों यथा ज्ञानरंजन, रविन्द्र कालिया आदि से उनकी तुलना की। साथ ही काशीनाथ की रचनाओं के कुछ अंशों का पाठ किया। अध्यक्षीय वक्तव्य में कथाकार नारायण सिंह ने कहा कि साहित्य कोई समाधान नहीं देता। वह आपको बीच रास्ते पर लाकर छोड़ देता है जिससे आप खुद विकल्प खोज सकें। प्रेमचंद ने कभी कहा था कि श्रेष्ठ रचनाएँ वे होती हैं जो आप को बेचैन करती हैं। काशीनाथ की रचनाएँ इस सन्दर्भ में खरी उतरती हैं। अंत में रचनाकार से सम्‍वाद हुआ। उनसे प्रश्‍न पूछे गये। सम्‍वाद में  विजय भारती, विजय नारायण, प्रमोद प्रसाद, महेंद्र प्रसाद कुशवाहा, दिलीप कुमार, रविशंकर सिंह, कथाकार महावीर राजी, कथाकार सृंजय आदि ने भाग लिया। धन्यवाद ज्ञापन ‘प्रयास’ के संरक्षक डॉ. संत राम  ने दिया।

गोष्ठी के दूसरे दिन अग्निगर्भी  बांग्ला कवि काजी नजरुल इस्लाम की जन्म स्थली चुरुलिया भ्रमण  का कार्यक्रम बना। उबड़ खाबड़ रास्ता काशीनाथ सिंह तथा शिवमूर्ति द्वारा गाये गये लोकगीतों की तानो के कारण अत्यंत सुगम लग रहा था। कवि तीर्थ में उनकी विरासत को संजोने के लिए किये गये वैयक्तिक प्रयासों की सबने भूरि-भूरि प्रशंसा की।

प्रस्‍तुति :  डॉ. कृष्ण  कुमार श्रीवास्तव (सचिव), प्रयास आसनसोल

प्रसून पाण्‍डेय की कवितायें

प्रसून पाण्डेय

युवा कवि प्रसून पाण्डेय की रचनाओं में समाज के सर्वहारा वर्ग के प्रति हो रहे अन्याय के विरोध में विद्रोह है, एक निराशा भी है। कवि खुद को असहाय महसूस करता है क्योंकि व्यवस्था निरंकुश हो चुकी है। किन्तु तमाम निराशा और हताशा के बाद भी कवि की सम्‍वेदनाएं जीवित है। जन की वेदना ही कवि की वेदना है, वह तोड़ना चाहता है ख़ामोशी पर खुद अकेला पाकर खेद प्रकट करता है…बावजूद इसके वह हिम्मत नहीं हारता।
-नित्यानंद गायेन

कश्मकश की कहकशा

दिन-ब- दिन
रोज हर रोज
बद से बदतर होते वो
जो दरबदर कर जतन
अथक परिश्रम लहूलुहान-लथपथ
सींचते सीना धरा का
बीहड़, बंजर, उबड़- खाबड़
फिर  भी उगाते सोना-खरा
जैसे ली हो जन्मोजन्मांतर शपथ
लहलाती चहचहाती
चंचल चितवन- सी वसुंधरा
आँख फाड़ देखती दुर्दशा
और कुछ दम भरते, गाल बजाते बहुतेरे
साँझ- सबेरे
चीरते सीना धरा का
पग-पग, डग भरते
कर पतन
टिमटिमाते लुपलुपाते जैसे कश्मकश की कहकशा।

फफूंद-सी-कपास

आज फिर वह उदास हैं
भीतर- बाहर उठते कयास हैं
निहारते आसमाँ की तरफ
पर वहाँ नहीं पिघलती जमी बरफ
कौतूहल-कोलाहल
शोर-शराबा गली-चौबारा
विवश कुछ पीने को हलाहल
और कुछ घूमते खानाबदोश-आवारा
घटती- बढ़ती
आगे चलती एक साथ कई आस हैं
और कुछ की तो हलक में अटकी साँस है
आवाज उठी स्वर भी हुए बुलंद
चाहे-अनचाहे
अनगिनत प्रदर्शन बंद
कुछ बढ़ाते भीड़ भाड़ अनायास हैं
कुछ निराश फिर भी जारी प्रयास हैं
पर कैसे और कब ?
ऊपर बैठे हैं कुछ धृतराष्ट्र जब
और कानों में उनके ठसी ‘फफूंद-सी-कपास’ है।

खेद

सफ़ेद-काले
मिले-जुले चमचमाते
लिबास में
चिकने चुपड़े- मुखड़े..
पेंच डाले
हिले-डुले-डगमगाते
आभास में
चढ़ने चोंटी पर अकड़े..
भेद पाले
जल-जले दनदनाते
झगड़े, अगड़े- पिछड़े..
भोले- भाले
गले-ग्वाले निहारते
सुनाने सुर दीन-दुखड़े..
‘खेद’, चले
सिलसिले शरमाते
लिहाज़ में
सहमे सिकुड़े-जकड़े..

तकनीक से मनुष्य परास्त नहीं होगा : प्रभु जोशी

कार्यक्रम के दौरान कन्तिमोहन, प्रभु जोशी, ओमा शर्मा और हरिनारायण।

कथाकार ओमा शर्मा को रमाकांत स्मृति कहानी पुरस्कार प्रदान करने के लिये आयोजित कार्यक्रम की रिपोर्ट-

नई दिल्‍ली : नई  तकनीक के बीच नया मनुष्य बन रहा है। ओमा शर्मा ने उसके बारे में सोचा है। हिन्‍दी लेखक को तकनीक के नये आयाम  के बारे में सोचना चाहिये। सोचा जाना चाहिये कि तकनीक सम्‍वेदना से किस गहराई तक जुड़ सकती है। तकनीक से मनुष्य परास्त नहीं होगा। ये बातें कथाकार ओमा शर्मा को उनकी कहानी ‘दुश्मन मेमना’ के लिए पंद्रहवा रमाकांत स्मृति कहानी पुरस्कार प्रदान करने के लिये आयोजित समारोह के दौरान कार्यक्रम की अध्‍यक्षता कर रहे वरिष्ठ कथाकार-कलाकार प्रभु जोशी ने कही। कार्यक्रम का आयोजन गाँधी शांति प्रतिष्ठान, नई दिल्‍ली में 1 दिसम्‍बर 2012 को किया गया था।

प्रभु जोशी ने कहा कि कथा के विदा हुए वंशज को इस तरह याद किया जाता है, यह देख कर अच्छा लगा। जो पुरस्कृत हुए हैं, वे रमाकांत जी के वंशज हैं। मनुष्य वह है जो तकनीक की सम्‍भावनाओं को पहचानता है। क्या अब तकनीक नये रूप में नहीं आने वाली है? हम  उससे भिड़ना क्यों नहीं चाहते? उन्होंने नयी सूचना तकनीक पर आई कहानियों के आस्वाद की चर्चा की। उन्‍होंने कहा कि प्रश्‍न खड़े होते रहेंगे और साहित्य लिखा जाता रहेगा। मार्क्सवाद विचार की तरह आज भी है। एस्थेटिक सेंस को बचाये रखना ज़रूरी है।

पुरस्कृत कथाकार ओमा शर्मा ने अपने वक्तव्य में कहा कि  कहानी मुझे लेखन कला की सबसे सघन और कलात्मक विधा लगती है। स्मारिका ‘कथा-पर्व’ का लोकार्पण भी हुआ।

रमाकांत जी के मित्र और कार्यक्रम में मुख्य  अतिथि कवि-कथाकार कन्तिमोहन ने कहा कि रमाकांत से मेरी पहली मुलाक़ात  करोलबाग  में हुई थी, लेकिन उनके दिल्ली आने से पहले ही विष्णु चंद  शर्मा ने मुझे उनके बारे में काफी-कुछ बता दिया था। उनकी जासूसी उपन्यासों में गहरी दिलचस्पी ने मुझे उनके काफी करीब ला दिया था। राजनीति  पर उनसे काफी विचरोत्तेजक चर्चा होती थी। हर उम्र के लोगों के साथ उनका व्यवहार मित्रवत होता था। पढने-लिखने वाले अनेक लोगों को वह सादतपुर ले गये। यही वजह है कि अब भी, जा पाएं या न जा पाएं, सादतपुर जाने को जी करता है। रमाकांत दिल्ली के कॉफी हाउस (मोहन सिंह प्लेस) में विष्णु प्रभाकर के बाद सबसे सम्मानित व्यक्ति थे। पूर्वी दिल्ली की सम्‍भावनाओं को उन्होंने ‘क्रासाद’ जैसे अखबार के ज़रिये पहचाना था। जब वह ‘सोवियत दर्पण’ के सम्‍पादक थे, तब उनसे खूब मिलना होता था। उनसे पत्रिकाएँ और पुस्तकें लेकर पढ़ता  था। आज, आमतौर पर लेखक को अपने अलावा  कहीं कुछ नज़र नहीं आता, लेकिन रमाकांत इसके उलट  इनसान थे। विश्‍व साहित्य के बारे में उनकी जानकारी अद्भुत थी। उनका विश्‍लेषण बड़ा अच्छा  होता था। उनके अंतिम दिनों में कही एक बात मुझे याद है- ‘पत्नी के न रहने को बहुत मिस करता हूँ। जब तक वह जीवित रहीं, मैंने उनके महत्व को नहीं समझा।’

इसके बाद समारोह की स्मारिका ‘कथा – पर्व’ का लोकार्पण व वितरण हुआ जिसमे पुरस्कृत लेखक का परिचय, आत्मकथ्य और पुरस्कृत कहानी के साथ ही निर्णायक का वक्तव्य भी प्रकाशित है।

इस बार के निर्णायक दिनेश खन्ना ने कहा कि कहानी के चयन की प्रक्रिया में मैं अकेला ही था। कई कहानियाँ अच्छी लगीं, लेकिन फिर मेरी सोच ओमा शर्मा की ‘दुश्मन मेमना’ के साथ ठहरी रही। यह मुझे एकदम आज की कहानी लगी। हमारे आज के शहर, महानगर में रहते-बसते मध्य-वर्गीय परिवार में  घटित होता यथार्थ। आज के युवाओं, और अपने बच्चे के भविष्य को लेकर थोडा़ ज्यादा चिंतित और सचेत रहने वाले माता-पिता, ख़ासतौर पर माँ-बाप और उनकी एकलौती संतान। पेरेंट्स की चिंताएं और लड़की की हर तरह की जिद्द…. कहानी इन तमाम चीज़ों के साथ मनोवैज्ञानिक जटिलता के बीच आ खड़ी  होती है। बेटी का लगभग ब्लैकमेलिंग जैसा व्यवहार और उनके बीच मनोचिकित्सकों के लम्बे सवाल-जवाब का सिलसिला कहानी को आकर देता है।  कहानी दिलचस्प और गंभीर विषय के साथ कई ढंकी-छिपी मनोवैज्ञानिक परतें खोलती है। शिल्प, कलात्मकता की दृष्टि से भी कहानी अनोखी बन पड़ी है। पढ़ने के बाद यह कहानी बराबर याद रहती है। अंत में कहीं एक अनसुलझा प्रश्‍न छोड़ जाती है। कथारस और ताजगी भरी भाषा के लिये भी मुझे इस पुरस्कार के लिये यह कहानी सर्वथा उपयुक्त लगी।

‘दुश्मन मेमना’ का प्रकाशन सितम्बर, 2011 में हरिनारायण द्वारा सम्पादित ‘कथादेश’ में हुआ था। हरिनारायण ने सर्वप्रथम इस कहानी के कुछ अंश सुनाये और फिर इसे एक बेचैन करने वाली रचना बताया। आत्मस्वीकृति की शैली में इस रचना को उन्होंने ज्वलंत समस्याएं सामने रखने वाली बताया। उनका कहना था कि  यह कहानी जितनी बहार है, उतनी ही भीतर भी है। उन्होंने कहानी को समझने के सूत्र भी दिये।

विमल कुमार ने कहा कि यह देखना ज़रूरी है कि सौ सालों में कहानी में क्या परिवर्तन आये हैं। कहानी अपने समय से किस तरह से टकरा रही है। समाज में भी बदलाव आ रहे हैं। आज उदय प्रकाश और अखिलेश के बाद की कथा-पीढ़ी सामने है। ये कथाकार ‘हंस’ , ‘कथादेश’ , ‘पाखी’ , ‘वागर्थ’ , ‘नया ज्ञानोदय’ आदि अनेक पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं। दरअसल, ये नयी आर्थिक नीति   के बाद के रचनाकार हैं। लेकिन इनमे से कुछ के पास अच्छा  शिल्प और भाषा है, पर जीवन दृष्टि नहीं है। दूसरी तरफ कुछ के पास गहरी जीवन दृष्टि है, पर भाषा और शिल्प नहीं। इसके बीच तालमेल रखना ज़रूरी है। संजय कुंदन की ‘गाँधी जयंती’ , उमाशंकर चौधरी की ‘अयोध्या बाबू सनक गए हैं’, शशांक की ‘घंटी’ और प्रेम भरद्वाज की रचनाओं के बहाने  उन्होंने अपनी कहानी से जुडी़  चिंताएं व आकंशाएं सामने रखीं। कहानीकारों के वर्गीय चरित्र पर ही नहीं, कहानी में चरित्र-चित्रण पर भी उन्होंने बात की और आग्रह किया कि हम कहानी पर गम्‍भीरता से विचार करें।

वरिष्ठ कथाकार व चित्रकार हरिपाल त्यागी ने ‘बारहखड़ी’ पुस्तक की प्रति और महेश भरद्वाज ने ‘रमाकांत की चर्चित कहानियां’ संग्रह की प्रति पुरस्कृत कथाकार को भेंट कीं। ‘बारहखड़ी’ में 12 ऐसे रचनाकारों की कहानियाँ संकलित हैं जिन्हें रमाकांत कहानी पुरस्कार मिल चुका  है। हरिपाल त्‍यागी ने प्रत्येक कहानी के लिए एक विशेष चित्र बनाया है। ‘चर्चित कहानियाँ’ में स्वर्गीय रमाकांत की ‘कार्लो हब्शी का संदूक’ सहित 14 कहानियाँ संकलित है।

कथाकार योगेन्द्र आहूजा ने अपने मित्र और साथी रचनाकार ओमा शर्मा पर चर्चा करते हुए उन्हें एक ऐसा मित्र बताया जो वक्त पर साथ तो दे ही, जीवन में यह एहसास भी दिलाता रहे की हम अकेले नहीं हैं। उन्होंने कहा की बड़ी रचनाओं को कैसे पढ़ना चाहिए, यह तो मैंने उनसे सीखा ही है, उनकी अनेक रचनाओं का मैं पहला पाठक भी रहा हूँ। ‘दुश्मन मेमना’ भी मैंने प्रकाशन पूर्व पढ़ी थी। हिन्‍दी में ओमा ने स्टीफेन सवाईग की आत्मकथा का अनुवाद प्रस्तुत करके एक बड़ा काम किया है। उनकी रचात्मक मैत्री के लिए योगेन्द्र आहूजा ने उन्हें अपनी शैली में शुक्रिया कहा और कहा की पैशन समेत अनेक चीज़ों के अर्थ मैंने ओमा से सीखे हैं।

कथाकार ओमा शर्मा

पुरस्कृत कथाकार ओमा शर्मा ने कहा की हिन्‍दी कहानी के लिये दिये जाने वाले इस एकलौते और विशिष्ट पुरस्कार की पिछले बरसों में जो प्रतिष्ठा बनी है, उस  कड़ी में स्वयं को शामिल होता देख मुझे बहुत  प्रसन्नता हो रही है। कोई भी पुरस्कार किसी भी रचना का निहित नहीं होता, लेकिन उस रचना विशेष को रेखाँकित करने में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। अपने प्रारम्भिक किसानी जीवन के बारे में बताने के साथ ही लेखक ने बताया  कि कैसे दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में अर्थशास्त्र  के अध्ययन ने उन्हें मेहनत  करने और चीज़ों को  समग्रता में जांचने-परखने का प्रशिक्षण दिया। तंत्र में आर्थिक शक्तियों की केंद्रियता को समझने का संस्कार दिया। उसने मुझे स्वतन्त्र होकर सोचना-समझना सिखाया। उन्होंने अपनी रचना प्रक्रिया की शुरुआत में बड़े भाई प्रेमपाल शर्मा के महत्वपूर्ण योगदान का उल्लेख किया। अपने प्रिय रचनाकारों के उल्लेख के साथ ही ओमा शर्मा ने ‘दुश्मन मेमना’ की रचना प्रक्रिया और उसकी चिंगारी खुद तक पहुचने की बात को बड़े तरीके से सामने रखा।

इसे पहले कार्यक्रम के शुरुआत में रमाकांत स्मृति कहानी पुरस्कार समिति के संयोजक महेश दर्पण ने बताया की इससे पूर्व जो चौदह कथाकार पुरस्कृत हो चुके हैं, वे हैं- नीलिमा सिन्हा, कृपाशंकर, अजय प्रकाश, मुकेश वर्मा, नीलाक्षी सिंह, सूरजपाल चौहान, पूरन हार्डी, अरविन्द कुमार सिंह, नवीन नैथानी, योगेन्द्र आहूजा, उमाशंकर चौधरी, मुरारी शर्मा, दीपक श्रीवास्तव और आकांक्षा पारे काशिव। इस बार निर्णायक मंडल के सदस्य रंगकर्मी दिनेश खन्ना ने कहानी का चयन किया है। कुल 443 कहानियों की संतुस्तियाँ प्राप्त हुई थीं। हमारी कोशिश है कि हम रमाकांत जी की समग्र कहानियाँ पाठकों के लिये उपलब्ध कराएं। जो लोग रमाकांत जी के लेखन पर आलोचनात्मक या संस्मरणात्मक लेख लिख रहे हों, वे उन्हें हमारे पास अवश्य भिजवाएं। युवा पाठकों में रमाकांत जी के लेखन के प्रति एक आत्मीय भाव है और वे उनके अंतिम उपन्यास ‘जुलूस वाला आदमी’ को उल्लेखनीय मानते हैं।

कार्यक्रम के अंत में संयोजक ने आभार ज्ञापित करते हुए कहा कि आगामी रमाकांत स्मृति कहानी पुरस्कार के लिए वर्ष 2012 में प्रकाशित कहानियों पर विचार किया जायेगा। निर्णायक होंगे वरिष्ठ आलोचक और गद्यकार विश्‍वनाथ त्रिपाठी। इसके लिये कहानी की फोटोकॉपी सहित संस्तुतियाँ 15 मई, 2013 तक अवश्य मिल जानी चाहिये।

इस अवसर पर राजेंद्र यादव, विश्‍वनाथ त्रिपाठी, जापानी विद्वान इशिदा, संजीव, पंकज बिष्ट, प्रेमपाल शर्मा, इब्बार रब्बी, वीरेंद्र कुमार बरनवाल, श्योराज सिंह बेचैन, सुरेश उनियाल, हरिपाल त्यागी, सुरेश सलिल, शरद सिंह,श्याम सुशील, रामकिशोर द्विवेदी, संज्ञा उपाध्याय, हीरालाल नगर, आकांशा पारे, सहित अनेक पीढ़ियों के लेखक व साहित्य प्रेमी उपस्थित थे। रमाकांत स्मृति पर आधारित प्रदर्शनी को साहित्य प्रेमियों ने चाव से देखा।

प्रस्‍तुति : अनुराग श्रीवास्तव

स्वाति तिवारी को हिन्दी सेवी सम्मान

उदयपुर : हिन्दी की विख्यात कथाकार स्वाति तिवारी को साहित्यिक पत्रिका ‘संबोधन’ की ओर से 25 नवंबर 2012 को आयोजित समारोह में 8वाँ हिन्दी सेवी सम्मान प्रदान किया गया।

राजस्थान साहित्य अकादमी के सभागार में आयोजित समारोह में मधुसूदन पंडया ने शाल एवं श्रीफल, साहित्य अकादमी के अध्यक्ष वेद व्यास ने प्रशस्ति पत्र एवं ‘संबोधन’ के सम्पादक क़मर मेवाड़ी ने 11000/- रुपये का चेक प्रदान कर अभिनन्दन किया।

समारोह में सुखाडिया विश्‍वविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. माधव हाड़ा,  जगदीश तिवारी,  एम.डी. कनेरिया, नारायण सिंह राव, माधव नागदा,  डॉक्‍टर कुंदन माली (कपडगंज ), राधेश्याम सरावगी, ईश्‍वर शर्मा आदि कई साहित्यकारों की भागीदारी रही। कार्यक्रम का संचालन अफ़जल खाँ अफ़जल ने किया और अंत में अकादमी सचिव डॉक्‍टर प्रमोद भट्ट ने आभार ज्ञापित किया।

जिसका काम उसी को साजे : वि‍वेक भटनागर

युवा कवि‍-पत्रकार वि‍वेक भटनागर की बाल कवि‍ता-

एक गधा था चंपक वन में
ढेंचू जिसका नाम
सीधा-सादा, भोला-भाला
करता था सब काम।

एक बार वह लगा सोचने
मैं भी गाना गाऊँ
जंगल के सब जानवरों पर
अपनी धाक जमाऊँ
लेकिन गधा अकेले कैसे
अपना राग अलापे
यही सोचकर गधा बेचारा
मन ही मन में झेंपे
कालू कौए को जब उसने
मन की बात बताई
कालू बोला- ढेंचू भाई
इसमें कौन बुराई
हम दोनों मिलकर गाएँगे
अपना नाम करेंगे
कोयल-मैना के गाने की
हम छुट्टी कर देंगे
मैं काँव-काँव का राग गढ़ूँ
तुम ढेंचू राग बनाना
डूब मरेगा चुल्लू भर में
तानसेन का नाना।

इतने में आ गई लोमड़ी
फिर उनको बहकाने
बोली- तुम तो गा सकते हो
अच्छे-अच्छे गाने
शेर सिंह राजा को जाकर
अपना राग सुनाओ
उनको खुश कर राजसभा में
मंत्रीपद पा जाओ।

अगले दिन था राजसभा में
उन दोनों का गाना
ढेंचू-ढेंचू-काँव-काँव का
बजने लगा तराना
वहाँ उपस्थित सब लोगों ने
कान में उंगली डाली
गाना खत्म हो गया लेकिन
बजी न एक भी ताली
निर्णय दिया शेरसिंह ने तब
कर्कश है यह गान
इससे हो सकता है प्रदूषित
हरा-भरा उद्यान
जाकर इस जंगल के बाहर
तुमको गाना होगा
वरना इस गाने पर तुमको
टैक्स चुकाना होगा।

सुनकर शेरसिंह का निर्णय
हो गये दोनों दंग
जैसे भरी सभा में दोनों
हो गये नंग-धड़ंग।
शेर सिंह की बातें सुनकर
सपने से वे जागे
जिसका काम उसी को साजे
और करे तो डंडा बाजे।

चि‍त्र: अंजलि‍ कुमारी

अलसाई दुपहरी में दबे पाँव : शशांक दुबे

चर्चित संस्‍मरणकार कान्‍ति‍कुमार जैन की पुस्‍तक ‘बैकुंठपुर का बचपन’ पर लेखक-पत्रकार शशांक दुबे की समीक्षा-

लिखने-पढ़ने के शौकीन किसी सम्‍वेदनशील पाठक के सिर पर यदि एक पिस्तौल तानकर उससे यह सवाल किया जाये कि साठ के दशक में हिन्‍दी साहित्य का जो शामियाना किसी अमीर की शादी में लगने वाले टैंट की तरह सुदूर फैला हुआ दिखाई देता था, सतर के दशक में उसके घटकर आधे हो जाने, आठवें दशक में एक चौथाई रह जाने और नब्बे के दशक में उसकी हैसियत ‘जंगल की सैर’ में लगाये जानेवाले ‘दस बाय दस’ के टैंट की तरह रह जाने और कहानी, कविता, उपन्यास, आलोचना की परखचियाँ उड़ जाने के बाद भी जिन लोगों ने छपे हुये अक्षरों की ताकत को छोटा नहीं होने दिया उनमे से कोई तीन नाम तत्काल बताओ तो दूसरा और तीसरा नाम लेते वक़्त भले ही उसे पल भर सोचना पड़े, लेकिन ‘कान्‍ति‍ कुमार’ के रूप में पहला नाम लेने में वह कतई देर नहीं लगायेगा। दरअसल ‘काव्यम् शास्त्रम् रसिकम्’ की तथाकथित चौथे दशक की अवधारणाओं के हैंग-ओवर में लिप्त आलोचक भले ही संस्मरण, यात्रा-वर्त्‍तांत, व्यंग्‍य और सिनेमा को साहित्य के हाशिए पर खड़ी विधा मानकर नाक-भौं सिकोड़ते रहे हों, हिन्‍दी साहित्य का गोवर्धन इन्हीं विधाओं के लेखकों ने ही थामा है और लघु-पत्रिकाओं के संसार में अपनी सक्रिय उपस्थिति से पाठकों को सदैव खुशदम करते रहे हैं। आज हर पाठक अपने हाथ आई लघु पत्रि‍का की अनुक्रमणिका पर निगाह मारते वक़्त बाईं और कहीं संस्मरण और दाईं और कहीं कान्‍ति‍ कुमार का नाम देखना चाहता है।

‘लौट कर आना नहीं होगा’, ‘जो कहूँगा सच कहूँगा’, और ‘अब तो बात फ़ैल गयी’ के रूप में रोचक, चित्‍ताकर्षक और ज़र्रा-ज़र्रा पठनीय संस्मरणों की त्रयी लिखने वाले ‘संस्मरण किंग’ कान्‍ति‍ कुमार एक बार फिर अपनी उसी धार और उसी तेवर के साथ ‘बैकुंठपुर में बचपन’ के जरिये उपस्थित हुए हैं। फर्क है तो बस इतना कि जहाँ अब तक वह हमें रामेश्‍वर शुक्ल अंचल, आचार्य रजनीश, शिव मंगल सिंह सुमन, हरिशंकर परसाई, शरद जोशी जैसे नामवरों के बहुविध आयामों से परिचित कराते रहे हैं, इस बार उन्होंने अपने संस्मरणों के केन्‍द्र में समाज के उस तबके को रखा है, जिसकी समाज में उपस्थिति तो है, लेकिन पूरी खामोशी के साथ। यह वह वर्ग है जहाँ केवल हारी-बिमारी में ही फल खाये जाते हैं, जहाँ केवल त्योहार के दिन ही जुआ खेला जाता हैं, जहाँ शादी-ब्याह में कपडे़ खराब होने की परवाह किये बगैर पीठ पर हल्दी के छापे मारे जाते हैं और जहाँ मेहमान के लिये घर में लाई गई मिठाई का पैकेट मेहमान के रवाना होने से पहले कूडे़दान के हवाले कर दिया जाता है। ये वे  लोग हैं, जिनमें न तो किसी बडी़ आकांक्षा की घोडी़ कुलाँचे मार रही है, न किसी बडे़ आक्रोश की चिंगारी खदबदा रही है। चालीस और पचास के दशक के भारतीय कस्बाई मध्यवर्ग और निम्न मध्यवर्ग के जीवन की छोटी-छोटी घटनाओं को सूक्ष्मता से बयाँ करते इन संस्‍मरणों में तत्कालीन समय और समाज पूरी सघनता से मौजूद है। इन्हें रचते हुए कान्‍ति‍जी ने कभी तालाब के किनारे खडे़ होकर ढेला मारा है तो कभी कमीज उतार कर खुद तालाब में उतरे हैं। इन्हें पढ़ते हुए आम आदमी के जीवन की स्वाभाविक उठापठक को देख कभी पाठक के मुँह से ‘अरे, ये तो अपने जैसे ही हैं’ निकलता है तो कभी किसी का पतन देख यह बात निकलती है-

ऐसे तो न देखो के बहक जाएं कहीं हम,
आखिर तो इक इंसान हैं फरिश्ता तो नहीं हम।

कान्‍ति‍ कुमार के संस्मरणों में जिस प्रकार बचपन की शैतानियाँ हैं, मस्तियाँ हैं, अलसाई दुपहरी में किये जाने वाले प्रयोग और रात के सन्नाटे के रोमांच हैं, साँप को सीता की लट मानकर उनसे छेड़छाड़ की हिम्मत है और चूहों को बिल से खेंच निकालने की निरपेक्षता है, उन्हें वही किशोर हासिल कर सकता है, जो ‘राजा बेटा’ की तरह नहा-धोकर स्कूल पहुँचकर फिर वहाँ से सीधे घर वापस न आए और घर पहुँचकर तुरन्त पट्टेदार पायजामा पहनकर पहले ‘होम वर्क’ और फिर ‘होम के वर्क’ (मसलन बडे़ भाई साहब के कपड़ों की इस्त्री करना या पिताजी के हुक्के में तम्‍बाकू भरना या माँ के चूल्हे के लिये लकडियों की दो फाँक करना जैसे काम) में न जुट जाये। जीवन के तिलस्मी खजाने को कोई ‘रामपुर का लक्ष्मण’ नहीं खोज सकता। इसके लिये तो एक घुमंतू, मनमौजी, अपने परिवेश के प्रति कुछ ज्यादा ही उत्सुक किशोर का जिगर चाहिये।

गाँव के संस्मरण पढ़ते वक्‍त पाठकों को सबसे बडा़ खतरा इस बात का रहता है कि कहीं लेखक के शरीर में यकायक फणीश्‍वरनाथ रेणु की आत्मा न समा जाये। दरअसल होता यूँ है कि लोकप्रिय भाषा में बिल्कुल न समझे जाने वाले या कोई दूसरा ही अर्थ बतानेवाले इन शब्दों से हमारे लेखक कई बार इतने प्रभावित हो जाते हैं कि कई-कई शब्द या वाक्य या मौका लगा तो पूरे के पूरे पैरे पेल देते हैं। ऐसा करते वक्‍त उनका हाथ आँचलिक शब्दकोश पर, सिर आलोचक के कदमों पर और निगाह अकादमी के पुरस्कार पर होती है। लेकिन कान्‍ति‍ कुमार जी का इस प्रकार के अबूझमाड़ में कतई विश्‍वास नहीं है। अव्वल तो वे आँचलिक शब्दों का प्रयोग बहुत विवक से करते हैं, बिल्कुल खीर में चावल की तरह, चावल में कंकर की तरह नहीं। दूसरे, हर ऐसे शब्द को आम बोलचाल की भाषा में व्याख्यातीत भी करते चलते हैं। मसलन किताब में एक अध्याय है- ‘चरकट्टा’, जिसे पढ़कर प्रभाष जोशी का ‘दारूकुट्टा’ याद आ जाता है (हालाँकि प्रभाषजी ने अपने लेखों में ‘घुन्ना’, ‘भेरू’, ‘लड्डूगुरु’, ‘ढेके दिखाना’ जैसे कई मालवी शब्दों का सटीक प्रयोग किया है, लेकिन दिल्ली के भाई लोगों को यह शब्द मन-कर्म और वचन से अपनेवाला लगा। इसलिये न सिर्फ यह शब्द पॉपुलर हुआ, बल्कि प्रभाषजी ‘दारूकुट्टाफेम’ भी हो गये। बावजूद इसके कि उन्होंने कभी दारू छुई तक नहीं।)। बहरहाल वह इस शब्द को खोलकर बताते हैं कि चरकट्टा यानी चारा काटने वाला। इसी चरकट्टे के बारे में वह आगे लिखते हैं, ‘वह घोडे़ को खरहरा करता। खरहरा यानी लोहे की कंघी’। इस किस्म के बारीक विश्‍लेषणों का लाभ यह होता है कि पाठक स्मृतियों के रोचक संसार में डुबकी लगाकर निकलते-निकलते कच्ची माटी से सने देसज शब्दों की पोटली भी उठाए लिये चलता है, जो आगे चलकर उसे भाषाई दृष्टि से समृद्ध करते हैं। बरसों पहले राज कपूर की फिल्म ‘श्री चार सौ बीस’ में ‘प्यार हुआ इकरार हुआ है, प्यार से फिर क्यूँ डरता है दिल’ गीत लिखते हुए गीतकार शैलेन्‍द्र ने ‘रातें दसों दिशाओं से कहेगी अपनी कहानियाँ’ पंक्‍ति‍ लिखी थी। तो संगीतकार शंकर (जयकिशन) ने कहा था कि दिशायें तो चार होती हैं, दस कहाँ से आ गईं। तब शैलेन्द्र ने चार लोकप्रिय, चार पैंतालीस डिग्री पर स्थित, एक आकाश और एक पाताल मिलाकर दस दिशायें बताई थीं। शंकर सहमत तो हो गये, लेकिन उन्होंने टिप्पणी की कि मैं तो समझ गया मगर श्रोता कैसे समझेंगे ? शैलेन्द्र का जवाब था, ‘हमारा काम सिर्फ श्रोताओं का मनोरंजन करना नहीं है, उनकी रुचियों का परिष्कार करना भी है।’ कान्‍ति‍जी भी पाठक को आह्लादित करने के साथ-साथ उनके ज्ञान का संवर्धन करते चलते हैं।

कुछ परिवारों में अब भी ऐसी परम्‍परा है जिसके अंतर्गत घर का मुखिया या ऊँची आवाज वाला सदस्य कोई अच्‍छा साहित्‍य पढ़कर सुनाता है और पूरा परिवार उसका लुत्फ लेता है। बेशक प्रतिशत के लिहाज से ऐसे घरों की संख्या काफी छोटी या यूँ कहें कि लगभग नगण्य होगी, लेकिन फिर भी हर शहर मे ऐसे कुछ घर तो होंगे ही। आमतौर पर ऐसे घरों में संस्‍मरण सुनाते वक्‍त वाचक को इस बात का खुटका (भय) समानांतर रूप से सताता रहता है कि अभी कहीं कोई औरत बेपर्दा होगी, अभी कहीं कोई दुःखी आत्मा ेेे के सफिक्स या प्रिफिक्स के साथ आधे अपशब्द कहेगी, अभी कहीं ढक्कन खुलेगा, अभी कहीं गिलास ढुलेगा, यह डर वैसा ही है जैसा मुश्किल दौरों में भारतीय टीम को बैटिंग करते देख लगता है, अब गये-तब गये-सब गये। ‘बैकुंठपुर में बचपन’ पढ़ते वक्‍त ऐसा कोई भय नहीं सताता। सस्वर रचना पाठ करते समय कहीं भी आवाज मंद करने की, कुछ शब्द या पंक्‍ति‍याँ काटने की जेहमत उठाने की कोई जरूरत नहीं। हो भी कैसे ? आखिर आम आदमी के ये संस्मरण आम आदमी की भाषा में आम आदमी के लिये ही तो लिखे गये हैं। इसलिये इन्हें खुलकर पढा़ जा सकता है। सिर्फ पढा़ ही नहीं, गुना भी जा सकता है और आने वाले कल के लिये सहेज कर भी रखा जा सकता है, क्योंकि ये संस्मरण हमें समाज के अमिताभ बच्चन या सचिन तेंदुलकर जैसे ‘सुपर हीरोज’ की स्थूलताओं से नहीं, बल्कि बैंडमास्टर और मुश्किल खाँ जैसे ‘अनसंग हीरोज’ की सूक्ष्मताओं से परिचित कराते हैं।

पुस्‍तक : बैकुंठपुर में बचपन, पृष्‍ठ : 224
प्रकाशक: सामयि‍क बुक्‍स, 3320-21, जटवाड़ा दरि‍यागंज,
एन.एस. मार्ग, नई दि‍ल्‍ली- 110002

सार्थक हस्तक्षेप करता ‘वांग्‍मय’ का शानी अंक : रमाकान्‍त राय

‘वांग्‍मय’ के शानी अंक पर आलोचक रमाकान्‍त राय की टिप्‍पणी-

लघु पत्रिकायें निकालना बेहद चुनौती पूर्ण काम है और उनकी निरन्‍तराता बनाये रखना और भी कठिन। ऐसे में अलीगढ़ से निकलने वाली लघु पत्रिका ‘वांग्‍मय’ का निरन्‍तर प्रकाशित होना न सिर्फ हिन्दी के उज्जवल भविष्य की ओर संकेत करता है अपितु सम्पादक डॉक्‍टर एम. फीरोज अहमद के जीवट व्यक्तित्व का परिचायक भी है। ‘वांग्‍मय’ समय-समय पर विशेषांकों का आयोजन सफलतापूर्वक करता रहा है जिनमें ‘राही मासूम रजा़ विशेषांक’, ‘नासिरा शर्मा पर केन्द्रित अंक’, ‘कुसुम अंसल पर विशेषांक’ और ‘कबीर अंक’ ने विशेष ध्यान आकृष्ट किया था। ‘वांग्‍मय’ का अद्यतन अंक ‘गुलशेर खान शानी’ पर केन्द्रित है। शानी हिन्दी साहित्य का जाना-पहचाना नाम है और ‘काला जल’ उनकी अप्रतिम कृति। शानी का नाम हिन्दी में ‘मुस्लिम विमर्शकार’ के रूप में भी जाना जाता है।

अपने सुचिन्तित सम्पादकीय में डॉक्‍टर एम. फीरोज अहमद ने शानी के अब तक हुए मूल्यांकन को असंतोषजनक बताया है और उनके पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता पर बल दिया है। उन्होंने पूर्ववर्ती आलोचकों द्वारा शानी की उपेक्षा किये जाने की ओर ध्यान आकृष्ट कि‍या है और उन पर एकाग्र निकालने के दौरान उत्पन्न संकट का भी उल्लेख किया है।

‘वांग्‍मय’ का शानी अंक दो खण्डों में एकाग्र हुआ है। प्रथम खण्ड में एक पूर्वप्रकाशित आलेख धनंजय वर्मा का है जिन्होंने भावपरक तरीके से शानी के जीवन-वृत्त को समेटने की कोशिश की है। नासिरा शर्मा ने शानी से हुई विविध मुलाकातों का वर्णन किया है जिससे शानी के व्यक्तित्व के कई पहलू उभरे हैं। मधुरेश, रोहिताश्‍व, डॉक्‍टर शिवचन्द प्रसाद, डॉक्‍टर तारिक असलम, डॉक्‍टर नीरू, डॉक्‍टर नगमा जावेद, मूलचंद सोनकर, खान अहमद फारुख, डॉक्‍टर एम. फीरोज अहमद, सगीर अशरफ, डॉक्‍टर रमाकान्त राय और डॉक्‍टर अवध बिहारी पाठक ने ‘काला जल’ को विविध पहुलओं में मूल्यांकित करने का प्रयास किया है। इन आलेखों में खान अहमद फारुख का आलेख ‘शानी के काला जल का काले पानी से निकलने का अधूरा वृत्‍तांत’ विशेष ध्यान आकृष्ट करता है जिसमें इस प्रश्‍न को मजबूती से उठाया गया है कि हिन्दी उपन्यासों में मुस्लिम उपन्यासकारों के अलावा मुसलमान पात्र क्यों गायब होते जा रहे हैं।

शानी के उपन्‍यास ‘एक लड़की की डायरी’ पर इकरार अहमद ने लि‍खा है और रेहाना परवीन ने ‘नदी और सीपि‍याँ’ उपन्‍यास का अध्‍ययन कि‍या है। डॉक्‍टर अरुण कुमार ति‍वारी ने ‘साँप और सीढ़ी’ उपन्‍यास पर अपना शोध आलेख दि‍या है।

द्वि‍तीय भाग में शानी की कहानि‍यों पर मेराज अहमद ने परि‍चयात्‍मक वि‍वरण प्रस्‍तुत कि‍या है। अमि‍त भारती, अहमद अदील और डॉक्‍टर परमेश्‍वरी शर्मा ने भी कहानि‍यों पर लि‍खा है तो आदि‍त्‍य प्रचण्‍डि‍या और मोहम्‍मद आसि‍फ खान ने उनके वि‍वि‍ध साहि‍त्‍य पर लेखनी चलाई है। इसी भाग में सूफि‍या शानी जो शानी की सुपुत्री हैं, से बातचीत की गई है। इस बातचीत में सूफि‍या शानी ने शानी के व्‍यक्‍ति‍व के वि‍वि‍ध-पहलुओं पर प्रकाश डाला है। इसी भाग में एक परि‍चर्चा ‘हि‍न्‍दी साहि‍त्‍य ने मुसलमानों को अनदेखा क्‍यों कि‍या’ भी छपी है जि‍समें शानी, नामवर सिंह, काशीनाथ सिंह, केदरानाथ सिंह के बीच गम्‍भीर बातचीत है। इन आलेखों की मौजूदगी में शानी पर केन्‍द्रि‍त यह अंक अत्‍यन्‍त संग्रहणीय बन गया है और उम्‍मीद जगाता है कि‍ हि‍न्‍दी जगत इसका स्‍वागत करेगा और डॉक्‍टर एम. फीरोज अहमद को इस प्रशंसनीय कार्य के लि‍ये साधुवाद देगा।

सम्‍पादकीय पता- डॉक्‍टर एम. फीरोज अहमद, सम्‍पादक, 205, ओहद रेजीडेंसी, नि‍यर पान वाली कोठी, दोदपुर रोड, अलीगढ़-202002

इस अंक का मूल्‍य- 100 रुपये

विश्व पुस्तक मेला शुरू

नई दिल्ली : प्रगति मैदान में 20वां विश्व पुस्तक मेला शुरू हो गया है। इसका उद्घाटन केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने किया। मेला चार मार्च तक चलेगा। भारतीय सिनेमा के सौ वर्ष इस मेले की थीम है। हॉल नंबर सात को थीम पैवेलियन बनाया गया है। जहां भारतीय सिनेमा से जुड़ी तमाम सामग्री व पुस्तकें उपलब्ध होंगी। साहित्य आधारित फिल्में भी दिखाई जाएंगी और कार्यशाला और विचार गोष्ठी का भी आयोजन होगा।

नई दिल्ली के राजधानी बनने के सौ वर्ष पूरे होने पर हॉल नंबर सात में विशेष प्रदर्शनी लगाई गई है। यहां दिल्ली के इतिहास की विभिन्न पुस्तकें भी उपलब्ध होंगी। इसके अलावा टैगोर की 150वीं जयंती के मौके पर हॉल नंबर छह में विशेष प्रदर्शनी लगाई गई है। पुस्तक मेले में बच्चों के लिए हॉल नंबर 14 में बाल मंडप बनाया गया है। जहां बच्चों के अनुकुल सामग्रियों का भंडार होगा और उनके लिए ज्ञानवर्धक कार्यक्रम भी होंगे।

इस मेले में साहित्यिक व सांस्कृतिक गतिविधियां प्रतिदिन हॉल नंबर 6, 8, व 14 में साहित्य पर आधारित संगोष्ठी, कार्यशाला व पुस्तक चर्चाएं और पुस्तक लोकार्पण के कार्यक्रम होंगे। साहित्य कला परिषद, दिल्ली सरकार द्वारा लाल चौक पर नियमित रूप से सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होंगे।

इस मेले में सऊदी अरब हांगकांग, मलेशिया, जापान, पाकिस्तान, नेपाल, बंगलादेश, श्रीलंका, जर्मनी, संयुक्त अरब, अमीरात, चीन, तुर्की, दक्षिण कोरिया, स्पेन बेलारूस, फ्रांस, ईरान थाईलैंड, इजरायल और ब्रिटेन जैसे देशों के प्रदर्शकों के अलावा विश्व स्वास्थ्य संगठन यूनेस्को और विश्व बैंक जैसे अंतर्राष्ट्रीय संगठन भी हिस्सा ले रहे हैं।