Category: व्यंग्य

बी.ए. आनर्स इन बाबागिरी /मातागिरी : बीनू भटनागर

Binu Bhatnagar

आजकल बाबाओं और गुरुमाताओं का बोल-बाला है। धन-सम्‍पदा के साथ अंधभक्‍त। ऐेसे में बाबाओं और गुरुमाता बनने की शि‍क्षा देने के लि‍ए कोर्स शुरू करने पर बल दे रही हैं बीनू भटनागर-  

शिक्षा का सबसे बड़ा उद्देश्य व्यक्ति को किसी रोज़गार के लिए तैयार करना होता है। पहले विज्ञान, वाणिज्य, कला, इंजीनियरिंग,  चिकित्सा और वकालत के अलावा स्नातक स्तर पर अधिक विषय नहीं पढ़ाये जाते थे। समय के साथ  पत्रकारिता, फैशन, अभिनय जैसे क्षेत्र में हर स्तर के 4-6 महीने से लेकर तीन साल के डिग्री कोर्स होने लगे। कम्प्यूटर  के आते ही हर गली-नुक्कड़ पर कम्प्यूटर कोर्स की दुकानें खुल गईं।  विश्‍वविद्यालयों में कम्प्यूटर  इंजीनियरिंग, बीसीए और एमसीए काफी लोकप्रिय हुए।

आजकल देश-विदेश में बाबाओं और गुरुमाताओं के लिए रोज़गार के बहुत अवसर हैं। अभी तक ये लोग अपनी योग्यता और बुद्धि के बल पर ही अपना कारोबार चला रहे हैं क्योकि इस विषय में शिक्षा संस्थान कहीं उपलब्‍ध नहीं हैं। शिक्षा के बिना भी यह व्यवसाय ख़ूब फलफूल रहा है। उचित शिक्षा मिलने से इसमें और निखार आएगा। वैसे तो  चोरी, डकैती, धोख़ाधड़ी, लूटपाट, तस्करी और भ्रष्टाचार भी व्यवसाय हैं, पर इन्हें गैर कानूनी माना जाता है इसलिए  इनसे संबंधित कोर्स नहीं खोले जा सकते,  लेकि‍न बाबागिरी /मातागिरि को तो बड़ा आदर-सत्कार मिलता है। अतः ये कोर्स खोलने में कोई दिक्कत नहीं होगी,  बहुतों को लाभ होगा।

इस पाठ्यक्रम में सबसे पहले छात्रों को बाबा या माता के ‘लुक’ के बारे में,  उसके महत्व के बारे में पढ़ाया जाएगा । इस व्यवसाय में ‘लुक’ का महत्व अभिनेताओं से अधिक है। फिल्मी अभिनेता हर फिल्म के लिए एक नहीं, कभी-कभी दो ‘लुक’ में आते हैं। हीरोइन भी एक फिल्म में कई ‘लुक’ दिखा सकती है। टी.वी. धारावाहिक में ‘लीप’ पर  हल्का सा ‘लुक’ बदलने की गुंजाइश होती है, परन्तु बाबा और गुरुमाताओं को आजीवन एक ही ‘लुक’ में रहना पड़ता है जिससे उनके भक्तों  (clients) का ध्यान न भटके।

‘लुक’ के अंतर्गत कई उप विभाग होंगे जैसे- ‘स्टाइलिंग’, ‘हेयर स्टाइलिंग’,   ‘फैशन डिज़ाइनिंग’,   ‘फुटवेयर  (खड़ाऊँ) डिज़ाइन’,  ‘मेकअप आर्टिस्ट, ‘कम्प्यूटर ग्राफिक विशेषज्ञ’ और ‘फोटोग्राफर’। इन विभागों में छात्रों से ज़्यादा फैकल्टी को काम करना पड़ेगा। छात्रों को सिर्फ  स्टाइलिस्ट द्वारा चलने,   उठने-बैठने के तरीके, उपयुक्त वेशभूषा के साथ सिखाये जाएंगे। फोटोग्राफर विभिन्न ‘लुक्स’ में समय-समय पर इनके चित्र लेते रहेंगे जिन्हें ग्राफिक डिज़ाइनर अपने तरीकों से उलट-पलट कर, सजाकर अच्छे से अच्छा ‘लुक’ देंगे।  सभी छात्रों के लिए कम से कम 100 ‘लुक’ तैयार करने ज़रूरी  होंगे,  जिनका एक पोर्टफोलियो बनेगा।

‘लुक’ के बाद इनको भाषा विभाग से भी दूसरे सैमेस्टर में गुज़रना होगा। भाषा विभाग से गुज़रने के बाद इनके   ओडियो और विडियो बनेंगे। भाषा विभाग मे इन्हे कहाँ से काम की शुरुआत करनी है, उस भाषा का एक मुख्य पेपर पास करना होगा। हिन्दी -इंगलिश बोलने का तरीका भी सिखाया जाएगा जो भले ही सही न हो पर लोगों को आकर्षित करे, शाँत भाव से बोलते-बोलते कहीं कोई चुटकी ले लेना, कभी कोई शेर जड़ देना आदि। अच्छा वक्ता बनना ज़रूरी है, बात में क्या  कुछ तथ्य है ये भक्त ख़ुद ढूँढ लेंगे। थोड़ी बहुत गीता पढ़ा  दी जाएगी। रामायण की कहानी या कबीर, रहीम, रैदास के दोहे चुनकर, कम से कम पाँच प्रवचन तैयार करने होंगे। इनके अलग-अलग ‘लुक’ में छात्रों के ओडियो-विडियो बनेंगे। ये पहले साल का कोर्स होगा। इसी बीच चुने हुए ओडियो-विडियो धार्मिक चैनलों पर भेजने का भी प्रावधान फैकल्टी करेगा।

पहले वर्ष की परीक्षा को पास करके तीसरे सैमेस्टर में इन्हें मनोवैज्ञानिक तथ्यों को बिना समझाये उनका इस्तेमाल  अपने फ़ायदे के लिए करना सिखाया जाएगा।  सामाजिक मनोविज्ञान से भीड़ का मनोविज्ञान, भीड़ में अफ़वाहें  कैसे फैलती हैं,  इन्हें अपने पक्ष में कैसे कर सकते हैं, सिखाया जाएगा। एक पेपर ‘ब्रेनवाश’ का होगा जिसमें भक्तों (clients) के दिमाग़ की ऐसी धुलाई करना सिखाया जाएगा कि भावी बाबा या गुरु माँ पर भक्तों के मन मे कोई शंका न  हो,  भक्तों का विवेक और तर्क  धीरे-धीरे मर जाए, वे पूरी तरह अंधभक्त बनकर बाबा या माता का अनुसरण करें और अपनी जेबे ख़ाली करें। हिप्नोटिज़म की भी शिक्षा दी जाएगी। जो छात्र हिप्नोटिज़म न पढ़ना चाहें उनको जादू सीखना होगा। वही हवा मे हाथ घुमाकर कुछ निकालना वगैरह।

छात्रों को अपना व्यवसाय पूरी ईमानदारी से करने के लिए कारोबारी सदाचार (business ethics ) चौथे सैमेस्टर में पढ़ाया जाएगा। सबसे पहले उन्हें समझाया जाएगा कि वह चाहे जितना कमायें पर आय कर समय पर दें चाहे थोड़ा कम दें।  हर काम कानून के दायरे में रहकर करें। दूसरों के धर्मों या अपने व्यवसाय के अन्य लोगों से रिश्ते न बिगाडे़ं। आतंकवाद न फैलायें।   महिलाओं पर कुदृष्टि न डालें। अपने व्यवसाय की गरिमा बनाये रखें।

तीसरे साल यानि पाँचवा सैमेस्टर छात्रों को किसी वरिष्ठ बाबा या माता के पास प्रशिक्षण के लिये भेजा जाएगा। इन आश्रमों के प्रतिनिधि आकर छात्रों को चुनकर अपने आश्रम (कम्पनी)  में इंटर्न रखेंगे। वहाँ किए कामकाज की  रिपोर्ट तैयार करके फैक्ल्टी को देनी होगी, इस पर एक समूह वार्ता भी होगी।

अंतिम सैमेस्टर में छात्रों को कुछ भक्त ढूँढने का प्रोजेक्ट दिया जाएगा। भक्तों को पहली बार ढूँढ़ने के लिए संस्थान संभावित भक्तों को आर्थिक प्रलोभन देने की आज़ादी देगा। 50 भक्त पैसे देकर और 50 भक्त वाक्चातुर्य के बल पर इकठ्ठे करने होंगे, उनका ब्रेनवाश करना होगा।  इस प्रोजेक्ट के द्वारा छात्रों को अपनी योग्यता सिद्ध करनी होगी। पूरी प्रोजेक्ट रिपोर्ट अंतिम प्लेसमैंट में बहुत काम आएगी।

बड़े-बड़े आश्रमों के प्रतिनिधि प्लेसमैंट के लिए देश-विदेश से बुलाये जाएंगे, जो बहुत आकर्षक पैकेज योग्य छात्रों  को देंगे। सभी छात्र आर्थिक रूप से इतने सशक्त नहीं हो पाएंगे कि फौरन अपना आश्रम खोल लें। कुछ वर्ष का अनुभव लेने के बाद सभी छात्र अपना आश्रम खोल पायें, इस डिग्री का पाठ्यक्रम इसी बात को ध्यान में रखकर बहुत शोध के बाद तैयार किया गया है।

इस रिपोर्ट की एक एक प्रति भारत सरकार और राज्य सरकारों के शिक्षा विभाग तथा यूजीसी को भेजी जा रही है। इस रिपोर्ट को शिक्षा विभाग पता नहीं कहाँ-कहाँ घुमाएगा, कितनी कमेटी पास करेंगी, इसलिये इसकी एक प्रति मीडिया को भी भेज रही हूँ। मीडिया को कम से कम 24 घंटे बहस करने का मसाला मिल जाएगा, वो तो कृतज्ञ हो जाएगा। फिर जब प्राइवेट विश्‍वविद्यालय मीडिया पर यह रिपोर्ट देखेंगे तो इसके फायदे गिनते-गिनते इन संस्थानों के खुलने की होड़ लगते देर नहीं लगेगी।

शौचालय या मंदिर- राग दरबारी की फिर आती याद : सुधीर सुमन

मंदि‍र और शौचालय को लेकर केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश के वक्‍तव्‍य और उस पर मचे बबाल पर युवा लेखक-पत्रकार सुधीर सुमन की व्‍यंग्‍यात्‍मक  टि‍प्‍पणी-

जिस सरकार का एक आदमी लाखों का शौचालय बनाता है, उसका एक मंत्री शौचालय को मंदि‍‍र से पवित्र बताता है। अब मंदि‍‍र जरूरी है या शौचालय, यह तो हाजत के वक्त ही पता चलता है। इस पर बीजेपी ने बयानबाजी शुरू कर दी है। बीजेपी मंदिर को पवित्र बताएगी और जयराम रमेश शौचालय बनाने के दावे करके जनता के उद्धारक साबित करेंगे खुद को। लेकिन सच तो यह है कि शौचालय और मंदिर दोनों की बात करने वालों का असली धंधा कुछ और है। ये दोनों पार्टियां महंगाई बढ़ाने के लिए जिम्मेवार हैं। दोनों को अनाज के उत्पादन करने वाले मजदूर किसानों की कोई चिंता नहीं है। और न ही समाज और अर्थव्यवस्था को बुनियादी तौर पर बदलने में कोई दिलचस्पी है। दोनों ने ग्रामीण समाज की तो उपेक्षा ही की है। जब खेती चौपट हो चुकी है, लोग अपने आजीविका के परम्‍परागत साधनों से वंचित किये जा रहे हैं, भोजन का संकट बढ़ रहा है, तब ये शौचालय और मंदिर के हिमायती बन रहे हैं।

जयराम रमेश देश के दो लाख 40 हजार ग्राम पंचायतों को दस साल के भीतर स्वच्छ बनाने के लिए निर्मल भारत अभियान चलवा रहे हैं। विडम्बना देखिए कि कुपोषण से प्रभावित देश के 200 जिलों में इस अभियान को विशेष रूप से केन्द्रित किया जायेगा। कुपोषण और शौचालय के बीच क्या रिश्ता है, कोई आमिर खान बताएगा क्या?

आज मुझे अचानक राग दरबारी की याद आ गई। धुंधलके में सड़क के किनारे गठरियों-सी रखी हुईं शौच के लिए कतार बांधकर बैठी हुईं औरतों, घूरे से उठती बदबू और कुत्तों के भौंकने की आवाज की पृष्ठभूमि में ही तो रंगनाथ शिवपालगंज में दाखिल होता है। शौच के लिए बैठी हुईं औरतों पर जो दो पंक्तियां उपन्यास में हैं वे पाठकों को चुभती भी हैं। हर बार इस प्रसंग से गुजरते हुए उपन्यासकार पर गुस्सा आता है कि क्या वह इन औरतों को बख्स नहीं सकता था, पर अक्सर अचानक पलट के जैसे वह सवाल दागता है कि किस पर नाराज हो रहे हो, मुझ पर या इस व्यवस्था पर जो आजादी के बीस वर्षों बाद तक सबके लिए शौचालय तक की व्यवस्था नहीं कर सकी है?

उपन्यास के आखिरी हिस्से में जहां गंदगी का पर्याय बन चुके बस अड्डों पर टिप्पणी है, वहाँ फिर से शौचालय प्रसंग आता है। उपन्यासकार व्यंग्य करता है- ‘‘गाँव सुधार के धुरंधर विद्वान उधर शहर में बैठकर ‘गाँव में शौचालयों की समस्या’ पर गहन विचार कर रहे थे और वास्तव में 1937 से अब तक विचार-ही-विचार कर रहे थे।’’

आज शौचालयों के धंधे में सरकारी-गैरसरकारी स्तर पर करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं, जिनसे कितने नेता, अधिकारी, अभिनेता, बुद्धिजीवी, सरकारी-गैरसरकारी समाजसेवी अपने जीवन की सुविधाएं जुटा रहे हैं, मगर यथार्थ यही है कि इस उपन्यास के प्रकाशित होने के पैंतालीस वर्षों के बाद भी देश के बहुसंख्य गाँवों और कस्बों में शाम में गठरियों की तरह औरतों का सड़क के किनारे शौच के लिए बैठने की नियति खत्म नहीं हुई है। जयराम रमेश ने यह भी कहा कि ‘इतने समय बीत जाने के बाद भी हमारे समाज पर एक बहुत बड़ा कलंक यह है कि आज भी 60 फीसदी महिलाएं खुले में शौच करती हैं। इस पर हरेक भारतवासी को शरम महसूस होना चाहिए। आज भी हम नहीं कह सकते हैं कि हरेक महिला को देश में शौचालय उपलब्ध है।’ जैसे उन्हें अचानक ज्ञान मिला हो, उन्होंने बताया कि ’64 फीसदी भारतीय खुले में शौच करते हैं। अब यह साबित हो चुका है कि खुले में शौच भारत में कुपोषण की बड़ी वजह है।’ यानी शौचालय कुपोषण की बड़ी वजह है, भुखमरी के कारण होने वाली मौतें, जिन पर प्रशासन तंत्र लगातार पर्दा डालता है। वे जरूर मंत्री महोदय की नजर में कोई वजह ही नहीं होंगी। आइए उम्मीद जगाइए, ‘यूपीए सरकार ने ग्रामीण इलाकों में शौचालय के निर्माण पर 45 हजार करोड़ रुपये खर्च किया है और इस मद में आने वाले पाँच सालों में 1.08 लाख करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे।’

क्या इसमें रागदरबारी की ऊपर वर्णित पंक्तियों कि अनुगूँज नहीं सुनाई पड़ रही है। काश! जयराम रमेश की बयानबाजी और करोड़ों रुपयों के खर्चे से शौचालय की ‘पवित्रता’ सबको हासिल हो जाती! और काश शौचालय से कुपोषण दूर हो जाता! काश, औरतों के गठरी की तरह सड़क किनारे बैठने की मजबूरी खत्म हो जाती! क्या किसी नए राग दरबारी से गुजर रहे हैं हम? कहाँ हो रंगनाथ, कहीं तुम दरबार में शामिल तो नहीं हो चुके?

जनवादी सरकार के समाजवादी फैसले : अनुराग

मनमोहन सरकार से पहले इस तरह की समाजवादी और वैज्ञानिक सोच वाली सरकार स्‍वंतत्र भारत के इतिहास में कभी नहीं आई। भविष्‍य के बारे में दावे के साथ कुछ नहीं कह सकता। वैसे हमारे राजनेताओं में जिस तरह की सोच विकसित हो गई है, उससे तो उम्‍मीद है कि आने वाली सरकारें मनमोहना से भी बढ़कर समाजवादी और वैज्ञानिक सोच की होंगी। वह भारत कितना खूबसूरत होगा, जिसमें एक भी गरीब नहीं बचेगा। बस अमीर ही अमीर होंगे।

करीब चालीस साल पहले श्रीमती इंदिरा गांधी ने नारा दिया था- गरीबी हटाओ। उसके बाद जनता पार्टी, कांग्रेस, जनता दल, समाजवादी जनता पार्टी, भारतीय जनता पार्टी आदि कई पार्टियों की सरकारें आईं और गईं, लेकिन कोई भी गरीबी नहीं हटा सका। इसलिए मनमोहन सरकार ने दिल पर पत्‍थर रखकर गरीबों को ही हटाने का निर्णय ले लिया। एक समझदार शल्‍य चिकित्‍सक बीमारी को जड़ से ही खत्‍म करता है। भले ही इसके लिए रोगी को बीमारी से भी गहरा जख्‍म क्‍यों न देना पडे़। निसंदेह इससे रोगी को तात्‍कालिक तकलीफ होती होगी, लेकिन यह उसी के हित में होता है। देश में सभी समस्‍याओं की जड़ गरीब हैं। इन्‍हें रोटी चाहिए, मकान चाहिए, शि‍क्षा चाहि‍ए, दवा चाहिए और भी न जाने क्‍या-क्‍या। इनकी जरूरतें कभी पूरी ही नहीं होतीं। देश अंतरिक्ष में पहुंच गया, इससे इन्‍हें खुशी नहीं मिलेगी। देश में आलीशान मॉल खुल रहे हैं, बडे़-बडे़ हाईवे बन रहे हैं, लेकिन ये बात केवल रोटी की करेंगे। इतना भी नहीं समझते कि रोटी नहीं मिल रही है तो बोटी खा लो और देश के वि‍कास के बढ़ते ग्राफ को देखकर खुश रहो। कुल मिलाकर गरीब देश के विकास और तरक्‍की में धब्‍बा हैं। सरकार कुछ कठोर निर्णय लेकर देश की बीमारियों की जड़ को ही समाप्‍त कर देना चाहती है तो इसमें किसी को ऐतराज नहीं होना चाहिए।

महान वैज्ञानिक डार्विन का सिद्धांत है कि पृथ्‍वी पर अस्तित्‍व बचाने के लिए निरंतर संघर्ष चलता रहता है। इसमें दुर्बल नष्‍ट हो जाते हैं और सक्षम बच जाते हैं। इतिहास गवाह है कई जीवों की प्रजातियां संघर्ष न कर पाने के कारण नष्‍ट हो गईं। गरीब नामक प्रजाति भी संघर्ष न कर पाने या खुद को परिस्थिति के अनुकूल नहीं ढाल पाने के कारण नष्‍ट हो जाती है तो इसमें किसी का क्‍या कसूर।

समय-समय पर पेट्रोल, डीजल के दाम बढ़ने से खाद्य पदार्थों के दाम भी बढ़े हैं। गरीब खाद्य पदार्थ खरीद नहीं पा रहे हैं और जले में नमक यह कि वे जितने चाहे सबसिडी वाले गैस सिलेंडर खरीद सकते हैं। इसलिए सरकार ने ऐसे सिलेंडर की संख्‍या भी सीमित कर दी है। जब खाना खरीदने की ही औकात नहीं है तो सबसिडी पर सिलेंडर देने का क्‍या फायदा। और जो खरीद सकते हैं, उन्‍हें स‍बसिडी की जरूरत नहीं है।

मनुष्‍य में अधिकांश बीमारियों की जड़ मोटापा यानी अधिक खाना है। महंगाई बढ़ने से लोगों का अनाप-शनाप खाना कम हो जाएगा। वे जैसे-तैसे करके जीने लायक ही खा पाएंगे। इससे वे मोटापा का शिकार नहीं होंगे। और उनका स्‍वास्‍थ्‍य भी ठीक रहेगा। इसके बावजूद यदि कोई नासमझ मोटापा बढ़ा ले तो उसे दुरूस्‍त करने के लिए डीजल, पेट्रोल के दाम फिर बढ़ाए जाएंगे। इससे वह अधिक से अधिक पैदल चलेगा और स्‍वस्‍थ रहेगा। फिर भला उससे धनी कौन होगा। कहा भी गया है- हेल्‍थ इज वेल्‍थ।

आओ लंदन घूम आयें : चंद्रशेखर करगेती

पेशे से अधि‍वक्‍ता चंद्रशेखर करगेती का व्‍यंग्‍यात्‍मक आलेख-

9 नवम्बर 2000 को उत्तराखण्ड राज्य बना।अलग राज्य होने पर यहाँ के सभी विभाग व ऑफिसों की स्थापना नये सिरे से हुयी। भले ही आज उत्तराखण्ड उत्तरप्रदेश से अलग होकर एक पर्वतीय राज्य बन चुका है, लेकिन शुरू से लेकर आजतक अधिकांश योजनायें व कार्यप्रणाली उत्तरप्रदेश की तरह हैं । बुरा हाल तो सबसे ज्यादा राजनीतिज्ञों का है। आज अधिकतर वे लोग इस प्रदेश के भाग्यविधाता बने हुए हैं जो इस राज्य की मूलभाषा को ही नहीं जानते, जब राजनेताओं के हाल ये है तो अधिकारियों के तो माशाल्लाह। किसी को कर्नाटक से उठाकर कर लाया गया तो किसी को हैदराबाद से तो किसी को मुम्बई से। कुछ को तो अपना नया घर इतना रास आया कि अपने घर का रास्ता ही भूल गये । उत्तराखण्ड संभवत: देश का पहला ऐसा राज्य होगा जहाँ घर की मुर्गी दाल बराबर है, इस राज्य के मुखिया (राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों) ऐसे हैं जिन्हें यहाँ की बोली तक नहीं आती।

इन बारह सालों के दौरान हमारे प्रदेश में राज्य के बाहर से आयात किये गये उत्कृष्ट अधिकारियों ने मंत्रियों के साथ मिलकर कई स्कीमें ऐसी निकालीं जिन्हें पूरे देश में सराहा गया । इन नीतियों को लागू करने के लिये हमारे प्रदेश के मंत्री व अधिकारीगण बहुत बार विदेश यात्रा के लिये गये । इनमें कुछ यात्रा किसी सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिये हुई हैं, तो बहुत सी यात्राएं विदेश में नयी चीजें समझने, सीखने व स्टडी करने के लिये की गईं । इन यात्राओं का उद्देश्य बाहरी दुनिया से कुछ सीख कर उस तकनीक का उपयोग प्रदेश की बेहतरी के लिये किया जाना था।

हर एक यात्रा में प्रदेश सरकार के लाखों रुपये खर्च होते हैं । हर एक यात्रा की जरूरत का पहले आंकलन किया जाता है कि इसकी आवश्यकता क्यों हैं ? इससे प्रदेश को तत्काल और दूरगामी, क्या लाभ होंगे ? इन यात्राओं में यह भी देखने की आवश्यकता होती है कि जो लोग प्रदेश सरकार की तरफ से जा रहे हैं, उनका ओबजर्वेशन कैसा है, तकनीकी ज्ञान कैसा है और आवश्यक बातों को समझने की और फिर यहाँ वापस आकर प्रदेश के लाभ के लिये उपयोग करने के लिये क्षमता कितनी है ?

प्रदेश हित के लिए शायद यात्रा से पहले उससे होने वाले फायदें की रिपोर्ट व उसकी जरूरत की रिपोर्ट व प्रतिनिधिमण्डल के सदस्यों की सक्षमता की रिपोर्ट बनायी गई होगी । वापसी के बाद उत्तराखण्ड  में कैसे नयी स्कीम लागू की जाये, इसकी रिपोर्ट भी दी गई होगी । शायद उन रिपोर्टों के अनुसार प्रदेश के बहुमुखी विकास के लिए कार्य भी किये होंगे और शायद बहुत विकास भी हो गया होगा !

बस यह दिखाई नही देता, अदृश्य है !

वैसे इस बारे में न तो कोई उच्च पदस्थ पूछता है और न ही कोई बताता है। हो  सकता है प्रदेश को अदृश्य लाभ कराने के लिए उन्हें भी विदेश यात्रा का मौका हाथ लगे ?

आजकल चर्चा है कि राज्य में ओलम्पिक स्तर के खिलाड़ी पैदा करने के लिये फिर राजनेताओं और अधिकारीयों का एक दल एक माह के लिये लंदन ओलम्पिक का टिकट कटवाने वाला है। अब इन अधिकारियों और मंत्रियों ने बचपन में भले ही गिल्ली-डंडा भी न खेला हो, पर इनसे पूछे कौन कि कौन से खेल में महारत हासिल है ? कितने ठो मेडल जीते हो भाई राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय खेलों में ? पर आज समझ में आ रहा है कि खिलाड़ी पैदा करने के लिये खुद का खिलाड़ी नहीं, राजनेता होना जरूरी है क्योंकि भारत भर में उससे बड़ा खिलाड़ी कौन ?

शौचालय का अर्थशास्त्र : दिनेश चन्द्र भट्ट ‘गिरीश’

मोंटेक सिंह आहलूवालि‍या के 35 लाख रुपये खर्च करके दो शौचालय बनाने के कारणों, इसकी आवश्‍यकता और इसके दूरगामी लाभ बता रहे हैं शि‍क्षक और लेखक दिनेश चन्द्र भट्ट ‘गिरीश’-

‘शौचालय’ दो शब्दों के योग से बना है- ‘शौच’ और ‘आलय’। शौच शब्द ‘शुचि’ से बना है जिसका अर्थ है- पवित्र। ऐसा ‘आलय‘ (भवन) जहाँ से व्यक्ति पवित्र होकर निकलता है। जिसका शौचालय जितना बडा़ वह उतना ही अधिक पवित्र- वर्तमान परिपेक्ष्य में यही अभिप्राय ज्यादा समीचीन है। ऐसे शौचालय का प्रयोग न कर पाने वालों को क्या कहा जाय- म्लेच्छ यही न।

शुचिता या पवित्रता के पायदान पर हमारे देश में आज अगर कोई विराजमान हैं तो वे हैं- योजना आयोग के उपाध्यक्ष माननीय मोंटेक सिंह आहलूवालिया । 35 लाख रुपये खर्च करके दो भव्य शौचालय निर्मित करवाने वाले की शुचिता पर कैसे सन्देह किया जा सकता है। समग्र राष्ट्र के हितार्थ आर्थिक नियोजन करने का कार्य कितना मष्तिष्क को थकाने वाला होगा, जिस कारण उन्हें कब्ज की शिकायत रहती होगी। उनके शुभचिन्तकों ने उन्हें भव्य शौचालय निर्मित कराने की सलाह दी होगी। यह ऐसा शौचालय होगा जो संगमरमर से निर्मित, उसकी दीवारें स्वर्णरचित और उसकी सामग्री रत्‍नखचित ही होगी। ऐसा अनुमान मैं लगा रहा हूँ। शुचिता हेतु जब वह बैठते होंगे, मंद-मंद संगीत की सुरलहरियाँ बज उठती होंगी। वहाँ त्रिविध बयारि (शीतल, मंद, सुगन्धि से परिपूर्ण वायु) बहती होगी ताकि वह शुचिता परिपूर्ण होकर उस आलय से बाहर आयें।

मल-मूत्र विसर्जन के लिये एक और शब्द प्रयुक्त होता है- लघुशंका और दीर्घशंका। जब कोई व्यक्ति फ्रेश होने के लिये जाता है तो वह कहता है- दीर्घशंका हेतु जा रहा हूँ। निश्‍चय ही वह निम्नमध्य या मध्यम आर्थिक स्थिति वाला ही व्यक्ति है जिसे शंका है (लघु या दीर्घ) कि शारीरिक श्रम न करने, अव्यवस्थित दिनचर्या, तनावग्रस्तता के कारण उसकी आँतो में पल रहे या सड़ रहे मलमूत्र का परित्याग वह यथोचित ढंग से कर पाता है या नही! उसकी शंका समाधान को प्राप्त ही होगी, निश्‍चयपूर्वक कहा नहीं जा सकता। अपच, अम्लीयता, गैस, बवासीर जैसी बीमारियाँ इसीलिये अस्तित्वमान हैं।

निम्न आर्थिक स्थिति वर्ग का तो कहना ही क्या ‘मलत्याग‘ शब्द की अश्‍लील मानते हुए वह कहता है- दिशा मैदान जाना। आज के सन्दर्भ में उसमें ऐसा करने के लिये न तो कोई दिशा बची है और न मैदान ही। हाँ रेल लाइन या सड़क के किनारे समूह बनाकर मजबूरी में शर्म का परित्याग किये हुए बैठने को मजबूर हैं। रेल के ए.सी. क्लास में सफर करने वाले भद्रपुरुष के लिये ऐसे दृश्य कितनी जुगुप्सा पैदा करते होंगे। देश की अधिसंख्य आबादी ऐसा करती है। इसे सहन भी तो करना ही पड़ता है कि एक चुनाव से दूसरे चुनाव तक वोट बैंक के रूप में इनका जीवित रहना कितना जरूरी है। अन्यथा अभावग्रस्तता में ये जियें या मरें किसे परवाह है।

शौचालय के लिए यदाकदा ‘बाथरूम’ का प्रयोग किया जाता है। कहीं-कहीं विद्यालयों में बच्चे मलमूत्र त्याग के लिये ‘बाथरूम’ शब्द का प्रयोग करते हैं। जरूरतमंद व्यक्ति अगर किसी मंत्री या बड़े नेता के यहाँ पहुँच जाय तो वह नेताजी को घण्टों बाथरूम के आश्रय में पाता है। आज समझ में आ रहा है कि आलीशान शौचालय का उपयोग करने वाला बाथरूम की भव्यता से मोहित होकर ही घण्टों सुखभोग करता हुआ परितृप्त होकर वहाँ से निकलता होगा।

तो बात निकली थी मोंटेक सिंह का शौचालय भव्य और आकर्षक है। आर.टी.आई. के तहत हमारे देश की सभी उच्च-आर्थिक स्थिति वालों के शौचालयों की स्थिति का ब्यौरा मंगाया जाना चाहिए। साथ ही विदेशों की ऊँची हस्तियों के शौचालयों से सम्बन्धित अभिलेख माँगे जाने चाहिए। सबसे महंगे शौचालय वाले का नाम ‘गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड’ में दर्ज होना चाहिए। हो सकता है मोंटेक सिंह का नाम इस रिकार्ड में दर्ज हो जाय। अमेरिका के राष्ट्रपति इस हेतु उन्हें गले लगा लें जैसा कि पिछले माह एक अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर उन्होंने हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को गले लगा लिया था। इससे बड़ा सम्मान हमारे देश के लिये और क्या हो सकता है।

शौचालय दीर्घशंका और दिशा मैदान का सम्बन्ध जीवन स्तर से ही है। जो व्यक्ति 35 लाख रुपये के शौचालयों का इस्तेमाल कर रहा है वह निश्‍चय ही छप्पन भोग का आनन्द तो लेता ही होगा। वह करोड़ालय (करुणालय नहीं) में तो अवश्य निवास करता होगा। उसके मातहत पलने वाले लोगों का जीवन स्तर भी उन्नत होता होगा। पत्रकारों को चाहिए कि वे उन सभी का साक्षात्कार लें (मोंटेक सिंह और उनके मातहतों से) और पूछें आपको कैसा लगता है इतने भव्य शौचालयों का उपयोग करते हुए? क्या-क्या विशिष्टताएँ हैं इन शौचालयों में? कितना आनन्द आता है शुचिता की प्रक्रिया में? आदि-आदि। हमारी नई पीढ़ी को यह जानकारी अवश्य ही होनी चाहिए ताकि उनका लक्ष्य बने- मोंटेक सिंह जैसा बनना और भव्य शौचालयों का सदुपयोग कर एक काबिल भारतवासी बनना। माता-पिता अपने बच्चों को एक सीख दें कि बनो तो मोंटेक सिंह जैसा अन्यथा मानुष देह धारण करने का क्या औचित्य? ‘बड़े भाग मानुस तन पावा, सुर नर मुनि सदग्रंथन गावा‘, हमारा बचपन क्यों ऐसा आदर्श ग्रहण कर पा रहा है बड़ा चिन्तनीय विषय है।

बच्चे का महंगा स्कूल, हमारा आवास, हमारी कार, गहने आदि स्टेटस सिम्बल हुआ करते हैं। स्टेटस मेन्‍टेन करने के लिए आज व्यक्ति क्या नहीं करता! गुणवत्ता से अधिक प्रचलन का ध्यान रखा जाता है। हमारे  लिये सौभाग्य का विषय है कि आज शौचालय स्टेटस सिम्बल बनने जा रहा है। सम्पन्नता की अभिव्यक्ति या व्यक्ति की पहचान इसलिये नही होगी कि वह किस कार में सवारी करता है। या उसके बच्चे कितने महंगे स्कूल में पढ़ते है। या वह कितना महंगा भोजन करता है। बस महत्वपूर्ण यह होगा कि उसका शौचालय कितना महंगा है। और उसके भीतर किन-किन सुख सुविधाओं की ध्यान में रखा जाता है। अब शौचालय से सम्बन्धित टायलेट सीट, उसमें लगने वाले मार्बल आादि का विज्ञापन अधिकाधिक देखने को मिलेगा। अगर कोई फिल्मी हस्ती तत्सम्बन्धी आइटम का विज्ञापन करे तो कहना ही क्या! क्रिकेट स्टार घड़ी बेच रहा है। फिल्म अभिनेत्री कुरकरे खाकर और खिलाकर अपने परिवार को सम्पन्न और खुशहाल बता रही है। इसी प्रकार का बहुत कुछ। लेकिन अब फिल्मतारिका और फिल्म स्टार टायलेट में बैठा यह बताने का प्रयास कर रहा होगा कि फलाँ कम्पनी की टायलेट सीट या शौचालय में प्रयुक्त होने वाला मार्बल या इसी तरह के अन्य आयटम आपको कैसे सुख प्रदान करते हैं। अगर आप बताए गए आयटम का प्रयोग करते हैं तो आपका जीवन धन्य हो जायेगा और यह भी कि आपका शौचालय आपके लिए गर्व और पड़ोसी की ईर्ष्या का कारण भी होगा। उस विज्ञापन का मूलमंत्र होगा- उसका शौचालय आपके शौचालय से आकर्षक कैसे! उपभोक्ता के लिये अंग्रेजी का शब्द है-कष्टमर। अगर उपभोक्ता को आर्थिक तंगी से जीवन यापन करते हुए विज्ञापित वस्तुओं का प्रयोग स्टेटस के दबाब में करना पड़े तो वह कष्टमर ही है यानी आर्थिक तंगी के कारण कष्ट से मरने वाला। शौचालय आज बाजार के मायावी संसार का प्रिय विषय बनने जा रहा है। यही प्रेरणा काम करने वाली है कि आप अपने जीवन में भवन बनाएँ या न बनाएँ एक अदद आलीशान शौचालय अवश्य बनवा लें। ‘एक बंगला बने  न्यारा’  नहीं, ‘एक शौचालय बने उजियारा’।

मुझे लगता है कि मोंटेक सिंह का सम्बन्ध मण्टो की एक कहानी के एक चरित्र टोबाटेक सिंह से है। कहें तो मोंटेक सिंह और टोबाटेक सिंह भाई-भाई। टोबाटेक सिंह ने अपनी आखिरी श्‍वास तक भारत विभाजन को स्वीकार नहीं किया। भारत और पाकिस्तान के पूरे क्षेत्र को वह हिन्दुस्तान ही मानता आया। दुर्भाग्य से पाकिस्तान में रहना पड़ा। हर समस्या की शिकायत वह पण्डित नेहरू से करने की बात कहा करता था। इसी प्रकार मोंटेक सिंह आर्थिक विभाजन को स्वीकार नही करना चाहते। सभी भारतवासियों को वह खाते-पीते और उभरती आर्थिक महाशक्ति वाले देश का नागरिक समझते हैं। अगर किसी व्यक्ति को भुखमरी, किसानों की आत्महत्या, भ्रष्टाचार, संशाधनों का असमान वितरण आदि समस्याएँ या विसंगतिया दिखाई देती है तो उसकी दृष्टि का दोष है। उसकी भावना का दोष है- ‘जाकी रही भावना जैसी’। हमें बलिहारी होना चाहिये उस शौचालय का जिसके उपयोग के उपरान्त ऐसी कोई भी अनुभूति नहीं होती जो देश के लिये चिन्तनीय हो। वहाँ ऐसा अनुभव अवश्य होता होगा कि भारत 2020 तक विश्‍व की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरने वाला है। ऐसा अनुभव प्रदान कराने वाला शौचालय अगर महिमामण्डित करने के योग्य नहीं तो और क्या है?

काले धन पर इस वर्ष और विगत वर्ष अत्यधिक चर्चाएं हुईं कि कालाधन विदेशों मे जमा है। कई लोगों ने बि‍स्तर के अंदर, दीवार की चिनाई में, छत के भीतर आदि कई जगहों पर धन संचित किया हुआ था। हमारे देश के मनीषी इसे कालाधन बता रहे थे। अगर मेरे पास इतना धन होता तो मैं इसे काला नहीं रहने देता, पीला बना लेता। शौचालय की दीवारों को स्वर्णनिर्मित बनाकर भव्य शौचालय की निर्मिति के बाद भी अगर देश की तीन चौथाई आबादी बेधडक यत्र-तत्र दिशा मैदान वाला कार्य भी करती या 28 रुपये रोजाना कमाकर अमीर भी बन जाती तो मुझ पर क्या असर होता। शायद कुछ भी नहीं क्योंकि मैं तो उस भव्य शौचालय का उपभोग करने वाला होता जहां से गरीबी, बेकारी, भुखमरी, कुपोषणा, बदहाल व्यवस्थाऐं आदि तो कुछ भी महसूस नही होता। बचपन मे याद की हुई एक कविता का स्मरण मुझे इस सन्‍दर्भ में हो रहा है-

यदि होता किन्नर नरेश मैं, राजमहल में रहता।
सोने का सिंहासन होता, सिर पर मुकुट चमकता।।
-आमीन

अफसर मेहरबान तो कीडे़ पहलवान : वीरेन्‍द्र नारायण झा

वीरेन्‍द्र नारायण झा

चर्चित लेखक वीरेन्‍द्र नारायण झा का व्‍यंग्‍य-

बेगूसराय में गरीबी का दाना बना कीड़ों का निवाला। यह समाचार भले ही विपक्षियों के लिये घर बैठे मुद्दा बन गया हो लेकिन इसमें सरकारी अफसर की उदारता साफ झलकती है। आज तक जितनी भी सरकारें बनीं सभी गरीबों की भलाई के लिये प्रतिबद्ध रहीं। गरीबी ना हो तो मानो सरकार के पास हटाने के लिये कुछ बचता ही नहीं। चाहे राज्य सरकार हो या केन्द्र सरकार। गरीबी दूर करने के लिये लोक लुभावन योजनायें चलायी जा रही हैं। इनके नाम भी लुभाते हैं, काम तो खैर सुहाते ही हैं। लेकिन कोई सरकार ऐसी नहीं कि गरीब-लाचार कीड़े-मकोडे़, पशु-पक्षी, साँप-बिच्छू की खातिर सोचे। योजनाओं में अगर पशु-पक्षी शामिल भी हैं तो कीड़े-मकोडे़ के लि‍ये अलग से न कोई योजना है और न ही सपना।

हाँ, यह बात दीगर है कि पहले के साधु-सन्‍त उनके लिए भी दया का भाव रखते थे जैसे मानव प्राणी के लिये। उनके कष्ट से वे दुखी होते थे। इसलिये खुद कष्ट उठाकर उन्हें किसी प्रकार दुख नहीं देते थे। यह उनकी उदारता थी और सभी जीव-जन्‍तुओं के प्रति अगाध प्रेम। बिलकुल वही सहृदयता दिखाई है बिहार राज्य खाद्य निगम के गोदाम वालों ने।  बेगूसराय से सटे तिलरथ में एससीआई के गोदाम में गरीबो के लिये रखा गया 25 क्विटंल गेहूँ सड़ गया। सडा़ इसलिये कि गोदाम पिछले आठ महीने से खोला नहीं गया। खोला इसलिये नहीं गया कि उस पर ताला लटक रहा था और उसे खोला नहीं गया। ताला नहीं खुला क्योंकि गोदाम में तक़रीबन 50 हज़ार बोरे गेहूँ को सड़ना था। सड़ना इसलिये था कि उसे सड़ना था। सो हुआ। अब कितना सडा़ और कितना नहीं, यह जाँच के बाद पता चलेगा। सरकारी जाँच कि अपनी प्रक्रिया होती है। अपनी रफ़्तार होती है। तब तक सड़ने कि प्रक्रिया जारी रहेगी और कीड़े अंत्योदय, अन्नपूर्णा, बीपीएल व एपील सहित अन्य योजनाओं के लाभुको के हिस्से चट करने का सुअवसर प्राप्त करते रहेंगे। योजनाकारों के लिये यह आँखें खोलने वाली बात तो नहीं, वाक्या जरूर है। सरकारी भाषा में इसे सबक भी कहा जा सकता है। उम्मीद की जानी चाहिये कि योजनाकार अब सिर्फ गरीब-गुरबों के कल्याणार्थ योजनाओं पर ही विचार नहीं करेंगे, अपितु कीड़ों को भी सुध लेंगे।

सौ टके का सवाल यह है कि देश के कीड़ों के लिये कौन सोचेगा? कीडे़ की जिन्‍दगी जीनेवालों, जूठे पतल चाटकर भूख मिटानेवालों, कचरा बिन कर गुजर-बसर करने वालों के लिये अगर यह राज्य/देश सोच सकता है तो सही में कीट योनि मे जन्मे-पले-बढे़ कीड़ों के लिये कौन अपना वक्त बर्बाद करेगा?

लेकिन समय बडा़ बलवान होता है। जिसका कोई नहीं उसका खुदा होता है। खुदा दिखता नहीं, लेकिन माध्यम बनकर आता है। आज वह एफसीआई के हाकिमों के हवाले कीड़ों पर मेहरबान हुआ है। और ऊपरवाला मेहरबान तो कीडे़ भी पहलवान। एक-दो क्विंटल कौन कहे, हजारों क्विंटल अनाज से मालोमाल कर देता है। खाते रहो बदें सुशासन की शुक्रिया अदा करते रहो। जितना जी चाहे उतना खाओ। कौन रोकेगा, सारा गोदाम ही दे दिया। वो भी बंद गोदाम। कोई देखने वाला नहीं। कोई खोलने वाला नहीं। तनख्वाह मिलती रहे, तुम्हें भोजन नसीब होता रहे। भला हो अन्य उपजाने वालों का, भण्डारा करने वालों का और ताला जड़ने वालों का।

मगर सब दिन रहत ना एक समाना। आठ महीने के भोजन से कीड़ों की सारी जिन्दगी नहीं कटने वाली। उन्हें भी खाद्य सुरक्षा की गारण्टी चाहिये। लेकिन मजदूरों के पेट के कीडे़ जब भूख से बिलखिलाने लगे तो गोदाम मे बंद कीड़ों पर आफत आन पडी़। उन्हें अपने मुँह के निवाले छिनने के आसार नजर आने लगे जैसे गरीबों के हिस्से आने के पहले छिन जाते हैं। या छिन्‍न-भिन्‍न हो जाते हैं। और भूख के मारे ये कीडे़ न तो भ्रष्टाचार जानते हैं, न मंहगाई और न कालाधन। ये तो सिर्फ मुट्ठी भर अनाज जानते हैं। सो भी अब उनसे दूर होने वाला है।

जाँच के दौरान मजदूरों ने खुलासा किया कि उन्हें अपनी मजदूरी में से गोदाम के अधिकारियों को कमीशन देना पड़ता था। कमीशन देने से अगर मजदूरी मिलती रहे तो क्या बुरा है भाई। कमीशन देकर तो बडे़-बडे़ ठेके मिलते है़, लाइसेंस मिलते हैं, सदन में जगह मिलती है, रोजगार मिलते हैं। क्या नहीं मिलता है। मजदूरी के लिये अगर कमीशन देनी पडी़ तो कौन सा भ्रष्टाचार का पहाड टूट गया। हर कमीशन लेने वाला कई मकानों का मालिक तो नहीं होता कि उसके मकान में सरकारी स्कूल या गोदाम खोल दिया जाये और गोदाम मे बंद पडे़ कीडे़ तो कमीशन देने से रहे। तो ऐसे में मजदूरों को ही कमीशन देना पडे़गा न। लेकिन मजदूरों में जब दूसरा खुलासा किया तो बडे़-बडे़ के दिमाग के कीडे़ उ-लाला उ-लाला गाने लगे। रोज शाम को गोदाम बंद करते समय बोरों पर पानी का छिड़काव किया जाता था ताकि सुबह उठाव के वक्त वजन बढ़ जाये। इसे कहते हैं लल्लन टॉप तरीका। हींग लगे न फिटकिरी रंग चोखा।

इस पर पटना बिहारी का कहना था कि बोरों पर पानी फेंकना इसलिये भी जरूरी हो गया कि कीड़ों को भोजन के पश्चात जल की आवश्यकता थी। आखिर अन्न और जल दोनों चाहिये न। बिना पानी का भोजन थोडे़ न सम्पन्न होता है।

इस रहस्य को अफसर के सिवा भला और कौन जान सकता है?

बीमारी के बहाने : अनुराग

देश के कर्णधार और जनता के भाग्‍यविधाता जेल की सलाखें देखते ही बीमार पड़ रहे हैं। कुछ लोग इसकी आलोचना कर रहे हैं। लेकिन बीमारी पर किसी का क्‍या वश-

अब यों तो कहने वाले कहते हैं कि बीमारी दुश्‍मन को भी न हो, परन्‍तु अब स्थिति बदल गई है। हर कोई अपने अन्‍दर बड़ी खतरनाक सी बीमारी होने का दावा कर रहा है।

वैसे देखा जाए तो बीमारी हमारी एक ऐसी दोस्‍त है जो ऐन मौके पर काम आकर मुसीबत से बचा लेती है। जब भी कोई झमेला हो और दुनिया जहान साथ छोड़ दे तब बीमारी ही मात्र सहारा है।

जबसे मैंने स्‍कूल जाना शुरू किया तब से लेकर अब तक खुद भी कितनी ही बार इसकी शरण में जा चुका हूँ। स्‍कूल के दिनों में होमवर्क पूरा न होने पर मार से बचने के लिये कह देता कि तबीयत ठीक नहीं है। मम्‍मी स्‍कूल नहीं भेजती। स्‍कूल में अध्‍यापक पूछते कि होमवर्क क्‍यों पूरा नहीं किया तो जवाब होता कि बीमार था। आज कर लूँगा। कॉलेज के दिनों में अपनी प्रिया को घुमाने के लिए घंटा गोल कर देता। यहाँ भी बीमारी ही साथ देती।

जैसे-तैसे पढ़ाई पूरी की। एक आफिस में नौकरी लग गई। प्रिया के साथ रोमांस चलता रहा। फिल्‍म देखने या घूमने का कार्यक्रम बनता तो मैं बीमार पड़ जाता, ‘‘सर, मेरे पेट में बहुत तेज दर्द हो रहा है। मुझे छुट्टी चाहिए।’’ मेरे लटके हुए चेहरे को देखकर बॉस के पास एप्लिकेशन पर हस्‍ताक्षर करने के सिवाय कोई और चारा नहीं रहता।

धीरे-धीरे घर वालों को हमारे प्रेम प्रसंग का पता चल गया। हमें अटूट बंधन में बांधने की तैयारी शुरू हो गई। मैंने पन्‍द्रह दिन की छुट्टी की अर्जी दी, परंतु मंजूर हुई दस दिन की। यहाँ भी मुझे बीमारी की शरण में जाना पड़ा। पन्‍द्रह दिन क्‍या, मैं पाँच दिन और छुट्टी काटकर आया। हम दोनों खूब घूमे। खूब मौज-मस्‍ती की। मैंने आते ही बीमारी का डॉक्‍टर का प्रमाण पत्र लाकर बॉस की मेज पर पटक दिया।

बीमारी के कारण ही जगह-जगह बडे़-बडे़ अस्‍पताल खुल रहे हैं। जिन्‍हें बनाने में लाखों मजदूर कार्य कर रहे हैं। अस्‍पताल में लाखों डॉक्‍टर, नर्स और अन्‍य कर्मचारी कार्यरत हैं। हजारों वैज्ञानिक शोध कर रहे हैं। बीमारी नहीं रहेगी तो करोड़ों लोग बर्बाद हो जाएंगे। नए-नए उपकरणों के अविष्‍कार एवं शोध कार्य के रूप में जो तकनीकी विकास हो रहा है, रुक जाएगा।

अरे, तुम सोच रहे हो कि बीमारी केवल गरीबों को सताती है। भई, बीमारी तो सबको समानता से देखती है। बीमारी के लिए न कोई नेता है न कोई जनता, न कोई ऊँच है न कोई नीच, जाति, धर्म का भी यहाँ जरा भी भेदभाव नहीं है। बीमारी समान रूप से सबका संकट मोचन करने के लिए तैयार है।

अब यदि देश के कर्णधार भी बीमारी का कवच पहन रहे हैं तो किसी को ऐतराज क्‍यों ! वे न्‍यायपालिका की पकड़ से या जेल जाने से बचने के लिए खुद को बीमार बता रहे हैं तो क्‍या बुरा कर रहे हैं ? और फिर बीमारी कब, किसको और कहाँ हो जाए, क्‍या कहा जा सकता है। इसलिए किन्‍तु–परन्‍तु के मायाजाल में मत फंसों, तुरन्‍त देश के कर्णधारों और जनता के भाग्‍यविधाताओं की सेवा में लग जाओ।

बस इतना ही। मेरा सिर दर्द हो रहा है…

 

नव वर्ष के संकल्‍प : अनुराग

मैंने नव वर्ष पर कुछ संकल्‍प लि‍ए हैं। मेरा दावा है कि‍ यदि‍ हर भारतीय इन संकल्‍पों को ले और इन पर अमल करे तो देश का वि‍कास होगा। फि‍‍र हर रात दि‍वाली और हर दि‍न होली होगी। हर भारतीय 27 मंजि‍ले घर में रहेगा और अपनी पत्‍नी को जेट वि‍मान खरीद कर दे सकेगा।

पहला संकल्‍प- इस साल कम से दो सौ लाख करोड़ का घोटाला करूंगा। लक्ष्‍मी जी तो आएंगी ही, साथ ही चर्चा में भी बना रहूंगा।

दूसरा संकल्‍प- मुझे जि‍स भी आयोजन की जि‍म्‍मेदारी सौंपी जाएगी, उसके लि‍ए एक का सामान सौ में खरीदूंगा। उसका कोई काम ऐसा नहीं होगा, जि‍समें पैसे नहीं बनाऊं। उन्‍हीं कम्‍पनि‍यों को काम के ठेके दूंगा, जो मेरे परि‍जनों को बोर्ड ऑफ डायरेक्‍टर में रखेंगी।

तीसरा संकल्‍प- अपने और अपने परिचि‍तों के हि‍त में लॉबिंग करूंगा। मंत्रीमंडल में उन्‍हीं मंत्रि‍यों को जगह दि‍लवाने का प्रयास करूंगा, जो मेरे और मेरे अपनों के हि‍त में नि‍र्णय लेंगे।

चौथा संकल्‍प- कि‍सी पर वि‍श्‍वास नहीं करूंगा और जो मुझ पर वि‍श्‍वास करेंगे, उन्‍हें हर हाल में धोखा दूंगा।

पांचवां संकल्‍प- महंगाई आसमान छू ले, परेशान कि‍सान आत्‍महत्‍या कर लें, अपराध कि‍तने भी बढ़ जाए, कुछ नहीं बोलूंगा। और अगर कुछ बोला तो बस मैडम-मैडम बोलूंगा।

छठा संकल्‍प- शासन-प्रशासन की तरह गांधीजी के तीन बंदरों से प्ररेणा लेकर न बुरा देखूंगा, न कहूंगा और न सुनूंगा।

सातवां संकल्‍प- जैसे गणेशजी ने अपने माता-पि‍ता शि‍व-पार्वती की परि‍क्रमा कर दुनि‍या का चक्‍कर लगा लि‍या था, वैसे ही मैं अपने घर-परि‍वार को सारा जहां मानूंगा और उसके हि‍त में हर तरह के काम करूंगा।

आठवां संकल्‍प- खेल से ज्‍याद कैटवॉक और वि‍ज्ञापनों पर ध्‍यान दूंगा। लगातार तीन टैस्‍ट मैचों में जीरो पर आउट होकर वि‍श्‍व रि‍कोर्ड बनाऊंगा।

नौंवा संकल्‍प- मैं प्रयोजि‍त खबरें लि‍खूंगा और फोन के अनुसार ही लेख लि‍खूंगा।

दसवां संकल्‍प- सरकार के दमन, शोषण, अन्‍याय, अत्‍याचार का गुणगान करूंगा। मैं आजाद रहना चाहता हूं।

नया साल मुबारक : भीमसेन त्‍यागी

वरि‍ष्‍ठ कथाकार भीमसेन त्‍यागी का यह व्‍यंग्‍य नूतन सवेरा के जनवरी, 1997 अंक में प्रकाशि‍त हुआ था।  उस समय त्‍यागीजी ने जो शंकाएं प्रकट की थीं, दुर्भाग्‍यवश वे और भी भीषण रूप में सामने है-

नया साल करीब आ रहा है और मेरी डाक में रंग-बिरंगे, खुशबूदार बधाई कार्डों की संख्या बढ़ती जा रही है। इन कार्डों में फूल हैं, पत्ते हैं, चिडिय़ा हैं, सुख-समृद्घि की शुभकामनाएँ हैं। मैं इन पत्रों को पढ़ता हूँ और दु:खी हो जाता हूँ। आश्‍चर्य है- इस प्रदूषित राजनैतिक माहौल में लोग खुशियों को मन के किस कोने में छिपाकर रखते हैं!
नये साल के शुभ अवसर पर आप मेरी बधाई स्वीकार करें। यह वर्ष निरंतर आपत्तियों और आशंकाओं से भरा रहे। केन्द्र और राज्यों में फिर चुनाव हों। लेकिन सरकार कहीं भी न बन सके। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री पदों के लिए बराबर खींचतान चलती रहे। हम लोकतंत्र का असली मजा चखते रहें।
भूतपूर्व प्रधानमंत्रियों और मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप में मुकदमें चलते रहें। जिन नेताओं का नकाब अभी तक नहीं उठा है, उनका भी उठ जाए। सब सुखी हो जाएं। तिहाड़ जेल संसद भवन बन जाए। जय ललिता के घर से एक टन सोना और एक लाख जूते बरामद हों, ताकि देश अपनी समृद्घि पर गर्व कर सके! जो नेता भ्रष्ट सिद्घ हो जाएं उनका सार्वजनिक अभिनंदन हो और जो अभी तक भ्रष्ट नहीं हुए हों, उन पर राष्ट्रद्रोह के मुकदमे चलाए जाएं।
राजनैतिक भ्रष्टाचार के साथ-साथ सांस्कृतिक भ्रष्टाचार का भी विकास हो। सभी संस्कृतिकर्मी राजनेताओं के पिछलग्गू बन जाएं। भ्रष्टाचार की बहती गंगा में गोते लगाएं और मानद पदों के ऊँचे सिंहासन प्राप्त करें। जो इनाम पाकर भी सरकार को गाली देने का दु:साहस करें, उन्हें उनकी औकात बता दी जाए।
केन्द्र और राज्यों में कहीं सरकार हो तो उनका संचालन पार्टी प्रमुखों के रिमोट कंट्रोल से हो। राजनैतिक पार्टियों की अपनी-अपनी सेनाएं हों। तमाम गुण्डे उन सेनाओं के नायक हों। शांति तथा व्यवस्था बनाए रखने और सामाजिक न्याय दिलाने का काम उनके जिम्मे हो।
कोई किसी भले आदमी के मकान में लम्बे अर्से से रह रहा हो और सिर्फ किराया देकर मकान में जमें रहना चाहता हो तो नायक धमकी के बल पर मकान खाली करवा कर बेचारे मकान मालिक को सामाजिक न्याय दिलवायें। किरायेदार नायकों को धमकी में न आए तो वे प्रेमपूर्वक हत्या करके उसे तमाम दु:खों से मुक्त कर दें। पत्रकार ऐसे कल्याणकारी कामों का विरोध करें तो उनकी जम कर ठुकायी हो और समाचार पत्रों के खिलाफ धर्मयुद्घ घोषित कर उनके दफ्तरों पर हमले किए जाएं।
नये साल में राजनेताओं और धर्मगुरूओं क संबंध प्रगाढ़ हों। वे मिलजुल कर घोटाला उद्योग का विकास करें। कोई सिरफिरा लक्खूभाई उन्हे मुकदमें में फंसाकर तिहाड़ भिजवा दे तो वे एक दूसरे के आंसू पोंछ कर आध्यात्मिक सुख प्राप्त करें।
देश में भीषण बाढ़ आए और अकाल पड़ें। नेता हेलिकॉप्टरों में बैठ कर त्रस्त इलाकों का दौरा करें और उनकी मदद के लिए मोटी-मोटी रकम मंजूर कराएं !
पुलिस के उच्च अधिकारी सुदंर महिलाओं की लिस्ट बनाएं और निर्भीक होकर एक-एक के साथ छेडख़ानी करें।
अति-अति महत्वपूर्ण दो प्रतिशत लोगों की भाषा हिं‍गलीश को देखकर देश की राष्ट्रभाषा घोषित की जाय। हिन्दी तथा अन्य प्रादेशिक भाषाओं में काम करने और बोलने को अपराध माना जाय!
नये साल में फिल्मी तारों और तारिकाओं के यहां बड़े-बड़े छापे पड़ें, ताकि उनके स्टेटस और काम करने के पारिश्रमिक की दरों में बृद्घि हो।
माइकेल जैक्सन बार-बार हमारे देश में आएं और फूहड़ भांड संस्कृति को स्थापित करें। वह ज्यादा से ज्यादा भारतीय लड़कियों के साथ नाचें, ताकि वे नहाना-धोना बंद कर दें और इस तरह जो पानी बचे, उससे कुछ प्यासों की प्यास बुझायी जा सके!
हमारे तमाम बेहतरीन खिलाड़ी खूबसूरत माडलों और एक्ट्रेसों से शादी कर लें और खेल के मैदान में दूसरों को जीतने का मौका देकर अपनी उदारता का परिचय दें!
देश में अंतर्राष्टरीय सौंदर्य प्रतियोगिता का आयोजन हो और फिर मुहल्ले-मुहल्ले में वैसी प्रतियोगिताएं होती रहें! तमाम खूबसूरत लड़कियां कपड़ों में से निकल कर फ्लोर पर आ जाएं और दर्शकों की आंखों की सिकाई करती रहें।
भूमंडलीकरण और नयी आर्थिक नीति का खुल कर विस्तार हो। देश में बहुराष्टरीय कंपनियों की बाढ़ आ जाए। बाजार बिदेशी माल से पटे रहें। विज्ञापन का जादम लोगों में अंतराष्ट्रीय स्तर की विदेशी चीजें इस्तेमाल करने का उन्माद जगाए। देशी कारखाने एक-एक कर बंद होते रहें। मुल्क में बेरोजगारी बढ़े। नौजवानों को भरपूर आराम और मनोरंजन के अवसर मिलें।
देश में विदेशी टी.वी. चैनलों की भरमार हो! वे टी.वी. चैनल देशी भगवान को बेच कर खाते रहें। ज्यादा से ज्यादा सैक्स और अपराध परोसें! बेडरूम सिमटकर टी.वी. के स्क्रीन पर आ जाए। अवैध संबंधों और बलात्कारों में उफान आए। फैशन की मारी अधनंगी समाजसेविकाएं बलात्कार के विरूद्घ प्रदर्शन करती रहें !
गली-गली में बीयर बार खुले। घी-दूध की तमाम नदियां सूख जाएं और उनमें शराब उफन-उफन कर बहे। सुदंर बार-बालाएं अपने ग्राहकों का हर तरह से मनोरंजन करती रहें।
हम गरीबी, बेरोजगारी और भूखमरी का ताज पहन कर शान के साथ इक्कीसवीं सदी में प्रवेश करें।
नया साल आपके लिए छोटी-छोटी खुशियां और बड़े-बड़े गम लेकर आए।

अश्‍लील: हरिशंकर परसाई

चैनलों पर अश्‍लील और फूहड़ कार्यक्रमों का प्रसारण धड़ल्‍ले से हो रहा है। कॉमेडी के नाम पर द्व‍िअर्थी डॉयलॉग बोलकर जबरदस्‍ती दांत दिखाए जा रहे हैं। स्थिति इतनी खराब हो गई है कि समाचारों में भी इन कार्यक्रमों की बेहूदगियों सुर्खियां बनाई जा रही हैं। हालांकि सड़क से लेकर संसद हर कोई इनका विरोध कर रहा है, लेकिन फिर भी इनका प्रचार-प्रसार बढ़ता जा रहा है। नया कार्यक्रम शुरू होता है तो वह पहले से ज्‍यादा फूड़ह भी होता है और हिट भी। ऐसा क्‍यों हो रहा है। इसका जवाब देता वरिष्‍ठ व्‍यंग्‍यकार हरिशंकर परसाई का व्‍यंग्‍य-

शहर में ऐसा शोर था कि अश्‍लील साहित्‍य का बहुत प्रचार हो रहा है। अखबारों में समाचार और नागरिकों के पत्र छपते कि सड़कों के किनारे खुलेआम अश्‍लील पुस्‍तकें बिक रही हैं।

दस-बारह उत्‍साही समाज-सुधारक युवकों ने टोली बनाई और तय किया कि जहां भी मिलेगा हम ऐसे साहित्‍य को छीन लेंगे और उसकी सार्वजनिक होली जलाएंगे।

उन्‍होंने एक दुकान पर छापा मारकर बीच-पच्‍चीस अश्‍लील पुस्‍तकें हाथों में कीं। हरके के पास दो या तीन किताबें थीं। मुखिया ने कहा- आज तो देर हो गई। कल शाम को अखबार में सूचना देकर परसों किसी सार्वजनिक स्‍थान में इन्‍हें जलाएंगे। प्रचार करने से दूसरे लोगों पर भी असर पडे़गा। कल शाम को सब मेरे घर पर मिलो। पुस्‍तकें में इकट्ठी अभी घर नहीं ले जा सकता। बीस-पच्‍चीस हैं। पिताजी और चाचाजी हैं। देख्‍ लेंगे तो आफत हो जाएगी। ये दो-तीन किताबें तुम लोग छिपाकर घर ले जाओ। कल शाम को ले आना।

दूसरे दिन शाम को सब मिले पर किताबें कोई नहीं लाया था। मुखिया ने कहा- किताबें दो तो मैं इस बोरे में छिपाकर रख दूं। फिर कल जलाने की जगह बोरा ले चलेंगे।

किताब कोई लाया नहीं था।

एक ने कहा- कल नहीं, परसों जलाना। पढ़ तो लें।

दूसरे ने कहा- अभी हम पढ़ रहे हैं। किताबों को दो-तीन बाद जला देना। अब तो किताबें जब्‍त ही कर लीं।

उस दिन जलाने का कार्यक्रम नहीं बन सका। तीसरे दिन फिर किताबें लेकर मिलने का तय हुआ।

तीसरे दिन भी कोई किताबें नहीं लाया।

एक ने कहा- अरे यार, फादर के हाथ किताबें पड़ गईं। वे पढ़ रहे हैं।

दसरे ने कहा- अंकिल पढ़ लें, तब ले आऊंगा।

तीसरे ने कहा- भाभी उठाकर ले गई। बोली की दो-तीन दिनों में पढ़कर वापस कर दूंगी।

चौथे ने कहा- अरे, पड़ोस की चाची मेरी गैरहाजिर में उठा ले गईं। पढ़ लें तो दो-तीन दिन में जला देंगे।

अश्‍लील पुस्‍तकें कभी नहीं जलाई गईं। वे अब अधिक व्‍यवस्थित ढंग से पढ़ी जा रही हैं।

(विकलांग श्रद्घा का दौर से साभार)