आजकल बाबाओं और गुरुमाताओं का बोल-बाला है। धन-सम्पदा के साथ अंधभक्त। ऐेसे में बाबाओं और गुरुमाता बनने की शिक्षा देने के लिए कोर्स शुरू करने पर बल दे रही हैं बीनू भटनागर-
शिक्षा का सबसे बड़ा उद्देश्य व्यक्ति को किसी रोज़गार के लिए तैयार करना होता है। पहले विज्ञान, वाणिज्य, कला, इंजीनियरिंग, चिकित्सा और वकालत के अलावा स्नातक स्तर पर अधिक विषय नहीं पढ़ाये जाते थे। समय के साथ पत्रकारिता, फैशन, अभिनय जैसे क्षेत्र में हर स्तर के 4-6 महीने से लेकर तीन साल के डिग्री कोर्स होने लगे। कम्प्यूटर के आते ही हर गली-नुक्कड़ पर कम्प्यूटर कोर्स की दुकानें खुल गईं। विश्वविद्यालयों में कम्प्यूटर इंजीनियरिंग, बीसीए और एमसीए काफी लोकप्रिय हुए।
आजकल देश-विदेश में बाबाओं और गुरुमाताओं के लिए रोज़गार के बहुत अवसर हैं। अभी तक ये लोग अपनी योग्यता और बुद्धि के बल पर ही अपना कारोबार चला रहे हैं क्योकि इस विषय में शिक्षा संस्थान कहीं उपलब्ध नहीं हैं। शिक्षा के बिना भी यह व्यवसाय ख़ूब फलफूल रहा है। उचित शिक्षा मिलने से इसमें और निखार आएगा। वैसे तो चोरी, डकैती, धोख़ाधड़ी, लूटपाट, तस्करी और भ्रष्टाचार भी व्यवसाय हैं, पर इन्हें गैर कानूनी माना जाता है इसलिए इनसे संबंधित कोर्स नहीं खोले जा सकते, लेकिन बाबागिरी /मातागिरि को तो बड़ा आदर-सत्कार मिलता है। अतः ये कोर्स खोलने में कोई दिक्कत नहीं होगी, बहुतों को लाभ होगा।
इस पाठ्यक्रम में सबसे पहले छात्रों को बाबा या माता के ‘लुक’ के बारे में, उसके महत्व के बारे में पढ़ाया जाएगा । इस व्यवसाय में ‘लुक’ का महत्व अभिनेताओं से अधिक है। फिल्मी अभिनेता हर फिल्म के लिए एक नहीं, कभी-कभी दो ‘लुक’ में आते हैं। हीरोइन भी एक फिल्म में कई ‘लुक’ दिखा सकती है। टी.वी. धारावाहिक में ‘लीप’ पर हल्का सा ‘लुक’ बदलने की गुंजाइश होती है, परन्तु बाबा और गुरुमाताओं को आजीवन एक ही ‘लुक’ में रहना पड़ता है जिससे उनके भक्तों (clients) का ध्यान न भटके।
‘लुक’ के अंतर्गत कई उप विभाग होंगे जैसे- ‘स्टाइलिंग’, ‘हेयर स्टाइलिंग’, ‘फैशन डिज़ाइनिंग’, ‘फुटवेयर (खड़ाऊँ) डिज़ाइन’, ‘मेकअप आर्टिस्ट, ‘कम्प्यूटर ग्राफिक विशेषज्ञ’ और ‘फोटोग्राफर’। इन विभागों में छात्रों से ज़्यादा फैकल्टी को काम करना पड़ेगा। छात्रों को सिर्फ स्टाइलिस्ट द्वारा चलने, उठने-बैठने के तरीके, उपयुक्त वेशभूषा के साथ सिखाये जाएंगे। फोटोग्राफर विभिन्न ‘लुक्स’ में समय-समय पर इनके चित्र लेते रहेंगे जिन्हें ग्राफिक डिज़ाइनर अपने तरीकों से उलट-पलट कर, सजाकर अच्छे से अच्छा ‘लुक’ देंगे। सभी छात्रों के लिए कम से कम 100 ‘लुक’ तैयार करने ज़रूरी होंगे, जिनका एक पोर्टफोलियो बनेगा।
‘लुक’ के बाद इनको भाषा विभाग से भी दूसरे सैमेस्टर में गुज़रना होगा। भाषा विभाग से गुज़रने के बाद इनके ओडियो और विडियो बनेंगे। भाषा विभाग मे इन्हे कहाँ से काम की शुरुआत करनी है, उस भाषा का एक मुख्य पेपर पास करना होगा। हिन्दी -इंगलिश बोलने का तरीका भी सिखाया जाएगा जो भले ही सही न हो पर लोगों को आकर्षित करे, शाँत भाव से बोलते-बोलते कहीं कोई चुटकी ले लेना, कभी कोई शेर जड़ देना आदि। अच्छा वक्ता बनना ज़रूरी है, बात में क्या कुछ तथ्य है ये भक्त ख़ुद ढूँढ लेंगे। थोड़ी बहुत गीता पढ़ा दी जाएगी। रामायण की कहानी या कबीर, रहीम, रैदास के दोहे चुनकर, कम से कम पाँच प्रवचन तैयार करने होंगे। इनके अलग-अलग ‘लुक’ में छात्रों के ओडियो-विडियो बनेंगे। ये पहले साल का कोर्स होगा। इसी बीच चुने हुए ओडियो-विडियो धार्मिक चैनलों पर भेजने का भी प्रावधान फैकल्टी करेगा।
पहले वर्ष की परीक्षा को पास करके तीसरे सैमेस्टर में इन्हें मनोवैज्ञानिक तथ्यों को बिना समझाये उनका इस्तेमाल अपने फ़ायदे के लिए करना सिखाया जाएगा। सामाजिक मनोविज्ञान से भीड़ का मनोविज्ञान, भीड़ में अफ़वाहें कैसे फैलती हैं, इन्हें अपने पक्ष में कैसे कर सकते हैं, सिखाया जाएगा। एक पेपर ‘ब्रेनवाश’ का होगा जिसमें भक्तों (clients) के दिमाग़ की ऐसी धुलाई करना सिखाया जाएगा कि भावी बाबा या गुरु माँ पर भक्तों के मन मे कोई शंका न हो, भक्तों का विवेक और तर्क धीरे-धीरे मर जाए, वे पूरी तरह अंधभक्त बनकर बाबा या माता का अनुसरण करें और अपनी जेबे ख़ाली करें। हिप्नोटिज़म की भी शिक्षा दी जाएगी। जो छात्र हिप्नोटिज़म न पढ़ना चाहें उनको जादू सीखना होगा। वही हवा मे हाथ घुमाकर कुछ निकालना वगैरह।
छात्रों को अपना व्यवसाय पूरी ईमानदारी से करने के लिए कारोबारी सदाचार (business ethics ) चौथे सैमेस्टर में पढ़ाया जाएगा। सबसे पहले उन्हें समझाया जाएगा कि वह चाहे जितना कमायें पर आय कर समय पर दें चाहे थोड़ा कम दें। हर काम कानून के दायरे में रहकर करें। दूसरों के धर्मों या अपने व्यवसाय के अन्य लोगों से रिश्ते न बिगाडे़ं। आतंकवाद न फैलायें। महिलाओं पर कुदृष्टि न डालें। अपने व्यवसाय की गरिमा बनाये रखें।
तीसरे साल यानि पाँचवा सैमेस्टर छात्रों को किसी वरिष्ठ बाबा या माता के पास प्रशिक्षण के लिये भेजा जाएगा। इन आश्रमों के प्रतिनिधि आकर छात्रों को चुनकर अपने आश्रम (कम्पनी) में इंटर्न रखेंगे। वहाँ किए कामकाज की रिपोर्ट तैयार करके फैक्ल्टी को देनी होगी, इस पर एक समूह वार्ता भी होगी।
अंतिम सैमेस्टर में छात्रों को कुछ भक्त ढूँढने का प्रोजेक्ट दिया जाएगा। भक्तों को पहली बार ढूँढ़ने के लिए संस्थान संभावित भक्तों को आर्थिक प्रलोभन देने की आज़ादी देगा। 50 भक्त पैसे देकर और 50 भक्त वाक्चातुर्य के बल पर इकठ्ठे करने होंगे, उनका ब्रेनवाश करना होगा। इस प्रोजेक्ट के द्वारा छात्रों को अपनी योग्यता सिद्ध करनी होगी। पूरी प्रोजेक्ट रिपोर्ट अंतिम प्लेसमैंट में बहुत काम आएगी।
बड़े-बड़े आश्रमों के प्रतिनिधि प्लेसमैंट के लिए देश-विदेश से बुलाये जाएंगे, जो बहुत आकर्षक पैकेज योग्य छात्रों को देंगे। सभी छात्र आर्थिक रूप से इतने सशक्त नहीं हो पाएंगे कि फौरन अपना आश्रम खोल लें। कुछ वर्ष का अनुभव लेने के बाद सभी छात्र अपना आश्रम खोल पायें, इस डिग्री का पाठ्यक्रम इसी बात को ध्यान में रखकर बहुत शोध के बाद तैयार किया गया है।
इस रिपोर्ट की एक एक प्रति भारत सरकार और राज्य सरकारों के शिक्षा विभाग तथा यूजीसी को भेजी जा रही है। इस रिपोर्ट को शिक्षा विभाग पता नहीं कहाँ-कहाँ घुमाएगा, कितनी कमेटी पास करेंगी, इसलिये इसकी एक प्रति मीडिया को भी भेज रही हूँ। मीडिया को कम से कम 24 घंटे बहस करने का मसाला मिल जाएगा, वो तो कृतज्ञ हो जाएगा। फिर जब प्राइवेट विश्वविद्यालय मीडिया पर यह रिपोर्ट देखेंगे तो इसके फायदे गिनते-गिनते इन संस्थानों के खुलने की होड़ लगते देर नहीं लगेगी।










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