Category: विविध

इक्कीसवीं सदी की हिन्दी युवा कविता : अरुणाभ सौरभ

samvadiya

इस सदी ने अपनी उपलब्धियों और सीमाओं का  एक दशक पार कर लिया है। उल्लेखनीय है कि इसमे एक तरफ ऐसे युवाओं कि फौज है जो बहुराष्ट्रीय कम्‍पनियों मे काम कर उनके उत्पादों के उपभोग, प्रसार को बढ़ावा दे रहे हैं। एक तरफ सिनेमा, विज्ञापन पर बाज़ार का पूरा प्रभाव रेखाँकित किया जा सकता है, दूसरी तरफ अत्यल्प लेकिन गम्‍भीर और लीक से हटकर सोचने वाले युवा भी सक्रिय हैं जि‍न्‍होंने अपनी रचनाशीलता को आधार बनाकर इस सदी की दहलीज़ पर कदम रखा है। ऐसे युवाओं के अंदर एक चिंतनशील सक्रिय युवा मन है जो अल्प संख्या के बावजूद साहित्य-संस्कृति में अपनी सक्रियता बनाए हुए है। इन युवाओं को सराहना के साथ प्रशिक्षित उत्प्रेरित करने की ज़रूरत है, ताकि भविष्योन्मुखी रचनाधर्मिता को संरक्षित किया जा सके।

हिन्दी की पत्र-पत्रिकाओं ने इस दिशा में सराहनीय काम किए हैं। कई पत्रिकाएँ युवा पीढ़ी की रचनाशीलता पर विशेषांक प्रकाशित कर सार्थक विमर्श की संभावनाओं को जन्‍म दिया है। उदाहरण के लिए वागर्थ, नया ज्ञानोदय, हंस, कथादेश, युद्धरत आम आदमी, समसामयिक सृजन, परिकथा, युवा संवाद आदि पत्रिकाओं के विशेषांकों के अलावा लगभग सभी गम्‍भीर पत्रिकाएँ युवाओं की रचनाओं को पर्याप्त जगह देती हैं।

अभी हमारे सामने ‘संवदिया’ का अंक अक्तूबर 2012-मार्च 2013 है, जो कि युवा हिन्दी कविता पर केन्द्रित है। ‘संवदिया’ बिहार के एक छोटे से कस्बाई शहर अररिया से निकलने वाली पत्रिका है- पूरी लघुपत्रिका। अररिया बिहार का एक जिला मुख्यालय है। ज्ञात हो कि अमर कथाशिल्पी फणीश्‍वरनाथ रेणु का औराही हिंगना गाँव इसी जिला में है। कोसी नदी की उद्दंड धाराओं का दंश झेलता हुआ एक जनपद जिसको अपनी साहित्य विरासत को बचाने की एक मुहिम के तौर पे देखा जा सकता है। इसीलिए इस पत्रिका के प्रधान सम्‍पादक भोला पंडित ‘प्रणयी’ और सम्‍पादिका अनीता पंडित और इनकी पूरी टीम निःसन्देह एक मुकम्‍मल अभियान ‘संवदिया’ के जरिये चला रहे हैं। ‘संवदिया’ रेणु की एक कालजयी कहानी है जिसमें रेणुजी ने सम्‍वाद पहुँचाने वाले की मनोदशाओं का लाजवाब चित्रण किया है। अररिया से कोई पत्रिका निकले तो उसका नाम ‘संवदिया’ ही होना चाहिए, इस नाते इस पत्रिका ने अपनी विरासत को बचाने की एक छोटी-सी, मगर गम्‍भीर पहल की है।

बात जब युवा हिन्दी कविता की हो तो ऐसे में कई तरह की सोच, संस्कार, विचारधारा और आग्रहों के बीच पल रही युवा रचनाशीलता को यहाँ पर वाजिब तव्व्जो दी गई है। इस पूरे अंक में प्रकाशित युवाओं की कविताओं को तीन हिस्सों मे रेखाँकित किया जाना स्वाभाविक है। (1) वैसे युवा कवि जिनके एकाधिक संग्रह प्रकाशित हैं और चर्चित हैं, (2) वैसे युवा कवि जो निरंतर पत्र-पत्रिकाओं मे लिख रहे हैं, रेखाँकित किए जा रहे हैं। इंटरनेट पर भी सक्रिय हैं, पर अभी संग्रह जिनके पास नहीं हैं, (3) वैसे युवा कवि जिन्‍होंने अभी-अभी लिखना शुरू किया है। कुछ तो बिलकुल पहली बार यहीं प्रकाशित हो रहे हैं, इन सबमें अपार संभावनाएं लक्षित की जा सकती हैं।

मुझे लगता है कि इस अंक के अतिथि सम्‍पादक देवेन्द्र कुमार देवेश ने कुशल सम्पादन का परिचय दिया है। बकौल देवेश जी, ‘अंक में शामिल 92 युवा कवियों मे से अधिकांश की कवितायें कई वर्षों से विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में स्थान पाती रही हैं, कुछेक कवियों के एकाधिक संकलन भी प्रकाशित हुए हैं। कुछ कवियों की कवितायें सभा-संगोष्ठियों और पत्र-पत्रिकाओं में पढ़ी और प्रकाशित होने वाली समीक्षात्मक रचनाओं में भी रेखाँकित हो रही हैं। लेकिन इनमे से कई कवि सोशल वेबसाइट पर ही सक्रिय हैं, अथवा अभी हाल में ही लिखना शुरू किया है…।’

इस अंक में शामिल 92 युवा कवि भारत के विभिन्‍न हिस्सों से आते हैं, उनका अपना-अपना लोकचित्त और लोकसंस्कार है। कुछ शहर और महानगर की पृष्ठभूमि से भी हैं। पर ज़्यादातर ऐसे हैं जो गाँव-कस्बे से उठकर नगर-महानगर की खाक छानकर वहीं के हो जाने की तैयारी में हैं। पर जो युवा नगर-महानगर में रहकर भी दिल में अपने गाँव-कस्बे को बचाकर रखे हुए हैं, अपनी लोक सम्‍वेदना के सहारे जो दिल्ली में रहकर भी सुपौल जैसा जीवन जीते हैं- जाहिर सी बात है कि उनकी दिल्ली और आलाकमान की दिल्ली में अंतर है। इसीलिए ऐसे युवाओं ने भीतर अपने गाँव और जनपदीय संस्कार की तासीर को बचाए रखा है। तो कई के यहाँ लोक जीवन का अद्भुत समायोजन भी ध्यानाकृष्ट करता है। स्त्री जीवन की भी सार्थक और प्रभावी दखल क़ाबिले तारीफ़ है। कहना न होगा कि विचारधाराओं का इंद्रधनुषी रंग और अभिव्यक्ति का प्रभाव इस अंक में देखते ही बनता है। सर्जना के विविध स्वरूपों की पहचान भी की गयी है। एक तरफ इसमें अच्युतानंद मिश्र, अनुज लुगुन, अमित कल्ला, ज्योति चावला, कुमार अनुपम जैसे बहुचर्चित युवा कवियों की शानदार कवितायें हैं, वहीं दूसरी ओर अनुप्रिया, कुमार सौरभ, आलोक रंजन, सुधांशु फिरदौस, रविशंकर उपाध्याय, मिथिलेश कुमार राय, स्वाति ठाकुर, बृजराज सिंह, श्यामवीर सिंह, बलराम कांवट, नताशा, शंकरानन्द, असमुरारी नन्दन मिश्र, त्रिपुरारी कुमार शर्मा, अमित मनोज, घनश्याम कुमार देवांश, आकाश कुमार जैसे गम्‍भीर किन्तु कम चर्चित युवाओं की बेहतरीन कवितायें भी हैं। साथ ही नित्यानन्द गायेन, कनुप्रिया, दिव्या तोमर, रति अग्निहोत्री जैसी हिन्दी की एकदम टटकी फसल है, जो इंटरनेट के जरिये से कविताओं की दुनिया में आए हैं।

और भी बहुत सारे कवि इस अंक में शामिल हैं जिनकी कवितायें अच्छी बन पड़ी हैं, जिनका नाम मैं नहीं ले रहा हूँ, वे सब भी इस अंक की उपलब्धि ही हैं। कई ऐसी नई पौध भी यहाँ मौजूद हैं जो अपने सृजन कौशल से एक विशेष काव्यात्मक रुझान को मजबूती से यहाँ रखते हैं। इस अंक को देखकर इतना तो अनुमान लगाना लाजिमी है कि युवा रचनाशीलता की ऊर्वर भूमि हिन्दी कविता को दिशा देने का काम करेगी। इक्कीसवीं सदी के एक दशक बाद की हिन्दी युवा कविता की दुनिया बहुरंगी है तो सम्‍वेदना के धरातल पर यहाँ विविधताएँ हैं। इस अंक में एक खास बात ये भी है कि सभी युवा मित्र कवियों के बीच यह रचनात्मक डायरेक्टरी का भी काम करेगा, क्योंकि ‘संवदिया’ के इस अंक में सभी मित्रों के सम्‍पर्क सूत्र भी दिये गए हैं, जिससे संवाद भी बना रहेगा।

इस अंक मे सम्‍पादकीय के बाद ‘वर्तमान समय में हिन्दी कविता के समक्ष चुनौतियाँ’ विषय पर एक गम्‍भीर चर्चा करवाने की कोशिश की गई है। इसमें आज के मूर्धन्य कवियों और साहित्यकारों ने हिस्सा लिया है, जिनमें चन्द्रकान्त देवताले, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, अशोक वाजपेयी, लीलाधार जगूड़ी, नन्द किशोर आचार्य, राजेश जोशी, उदय प्रकाश, अरुण कमल, मदन कश्यप, अनामिका, निरंजन श्रोत्रिय जैसे सीनियर कवियों-आलोचकों ने वर्तमान समय में लिखी जा रही कविता की रचना-प्रक्रिया, इस समय के संकटों और चुनौतियों पर वाजिब बहस को अंज़ाम दिया है। दूसरी तरफ आज की कविता के कथ्य, शिल्प, रूप एवं अंतर्वस्तु पर ठोस जवाब दिये गए हैं। पर आज की युवा कविता पर बहुत कारगर बहस नहीं हो पायी है। इसके अलावा युवाओं के सामने जो सामाजिक-साहित्यिक और सांस्कृतिक स्तर पर चुनौतियाँ हैं, उसको ध्‍यान में रखते हुए युवा कविता की उपलब्धियों और सीमाओं के वाज़िब विश्लेषण की उम्मीद इन महत्वपूर्ण साहित्यकारों से की जा सकती थी, पर उन सब पर सतही बात करके सभी लोग तेज़ी से आगे बढ़ गये हैं। नीलेश रघुवंशी, अरविंद श्रीवास्तव से तो ज्यादा उम्मीदें थीं पर इनकी टिप्पणियाँ भी व्यावहारिक अनुपालन से आगे नहीं बढ़ पायी हैं। रही-सही कसर को जितेंद्र श्रीवास्तव का आलेख भी पूरा नहीं कर पाता है।

मैंने अपनी ओर से किसी कवि मित्रों की रचनाओं को विशेष रेखाँकित न करके थोड़े से  में चीज़ों को समझने-सीखने की कोशिश की है। इस क्रम में मैं बस प्रवृत्तियों पर ही एक हल्की सी बात कहने की कोशिश कर रहा हूँ। यह एक संग्रहणीय अंक है जिसमें प्रस्तुतीकरण को लेकर थोड़ी-बहुत कमियाँ हैं, वैसे कमियाँ किस चीज़ में नहीं होतीं। पर संपूर्णता में यह वाजिब काम है जिसका स्वागत अवश्य होना चाहिए…ऐसे विलक्षण अंक के अतिथि सम्‍पादक देवेन्द्र कुमार देवेश और अंक में शामिल सभी युवा-मित्रों को अशेष बधाई और शुभकामनायें।

संवदिया (त्रैमासिक), युवा हिन्‍दी कविता अंक (अक्‍तू 2012-मार्च 2013)

अतिथि संपादक : डॉ. देवेन्‍द्र कुमार देवेश
प्रधान संपादक : भोला पंडित प्रणयी, संपादक : अनीता पंडित
इस अंक का मूल्‍य : 40 रुपये
संपर्क सूत्र : संवदिया प्रकाशन, जयप्रकाश नगर, वार्ड नं. 7, अरिरया 854311 (बिहार)
मोबाइल : 09931223187

रोमांचक बचपन: प्रेमपाल शर्मा

badho ka bachpan

‘बड़ों का बचपन’ पुस्‍तक एकलव्‍य, भोपाल का एक बेहद रोचक प्रकाशन है। इसमें संजीव ठाकुर ने दुनिया भर के 29 मशहूर हस्तियों के बचपन की यादें, शरारतें, शिक्षा, दीक्षा आदि दी हैं । देसी-विदेशी और राजनीतिज्ञों से लेकर लेखक, फिल्‍मी हस्तियाँ सभी शामिल हैं । महत्‍वपूर्ण लेखकों में गोर्की, शरतचन्‍द्र चटर्जी, फकीर मोहन सेनापति, अमृता प्रीतम, तसलीमा नसरीन, पांडेय बेचैन शर्मा उग्र आदि हैं । बहुत रोमांचक है लेखकों के बचपन को जानना । कितनी गरीबी और संघर्षों में बीता गोर्की का बचपन । बचपन में पिता जल्‍दी गुजर गये तो कभी नानी के घर तो कभी दूसरे पिता के । खाने-पीने तक का ठिकाना नहीं, पढ़ने की बात तो दूर । लेकिन पढ़ने का शौक न जाने कैसे लग गया। इतना कि मॉं के बटुए से पैसे चुराकर परियों की कहानी खरीद लाया । चोरी पकड़े जाने पर खूब पिटाई हुई । गोर्की लिखते हैं कि मुझे पिटने का डर नहीं था, दु:ख हुआ किताब के छिन जाने का । कौन सा काम नहीं किया गोर्की ने बचपन में । रविवार की सुबह बोरी लेकर शहर में निकल जाता और फटे कपड़े, लोहे की कील, पुरानी हड्डियाँ, रद्दी कागज जमा करके कबाड़ी की दुकान में बेच आता । थोड़ा और बड़ा हुआ तो बेकरी में काम करने लगा। इसी बचपन से पैदा हुआ दुनिया का महान कथाकार गोर्की ‘माँ’, ‘मेरा बचपन’ आदि रचनाओं का लेखक।

बंगाल के लेखक शरतचन्‍द्र का बचपन भी ऐसे ही अभावों में बीता लेकिन उतना ही शरारतपूर्ण । हुक्‍के की चिलम में पत्‍थर भर देते तो कभी स्‍कूल की छुट्टी जल्‍दी करने के लिए घड़ी की सूई आगे बढ़ा दी। भूत-प्रेतों को सरेआम चुनौती देने के लिए उन्‍हीं के अड्डे में खेलते । यही व्‍यक्ति आगे चलकर ‘चरित्रहीन’, ‘श्रीकांत’ जैसे महान उपन्‍यासों का लेखक बना । प्रसिद्ध फ्राँसीसी विचारक रूसो ने तो कौन सी शरारत, चोरी और गुंडई नहीं की । न स्‍कूल में टिकता, न किसी काम में । फ्राँस की क्राँति के पीछे रूसो की स्‍वत्रंता की अवधारणा प्रमुख थी । चार्ली चैपलिन की माँ अदाकारा थीं जब उनको गले की बीमारी हुई तो चैपलि‍न को स्‍टेज पर आना पड़ा । आर्थिक परिस्थितियाँ इतनी दयनीय थीं कि चैपलि‍न शाम को नाटकों में काम करते और दिन में अखबार बेचते । खिलौने बनाए, बढ़ई की दुकान पर काम किया । अमृता प्रीतम, तसलीमा नसरीन सभी की ऐसी ही कहानि‍याँ । अंग्रेजी के कहर से प्रसिद्ध बंगला लेखिका तसलीमा भी नहीं बचीं । जहाँ गणित और सभी विषयों में खूब नम्‍बर आए अंग्रेजी में सिर्फ तैंतीस । मुश्किल से पास हुईं । डॉक्‍टर पिता ने रात-दिन अंग्रेजी रटाई तो अगली बार नंबर और कम हो गये । आज तसलीमा के नाम पर बंगाली की तीस मशहूर किताबें हैं और अंग्रेजी भी फर्राटे से बोलती हैं ।

राजनेताओं में गाँधी, अम्‍बेडकर, माओ, इंदिरा गांधी, लाल बहादुर शास्‍त्री, अब्‍दुल कलाम आदि हैं । गाँधी की ईमानदारी को कौन नहीं जानता ? बचपन में चोरी की तो तुरन्‍त गलती भी मान ली पत्र लिखकर । पत्र पढ़कर पिता की आँखों से आँसू बहने लगे । यानी गलती किस से नहीं होती । बड़ी बात है कि उसे स्‍वीकार करना । भूतपूर्व राष्‍ट्रपति अब्‍दुल कलाम का बचपन तमिलनाडु के रामेश्‍वरम में बीता । बचपन में उन्‍होंने भी अखबार बेचे । कौन भूल सकता है अम्‍बेडकर के बचपन को । अछूत माने गये, दुत्‍कारे गये । आज समानता के लिये देश के मसीहा ।

बहुत प्रेरणादायक प्रसंगों से भरी पड़ी है पूरी किताब । बच्‍चे ऐसे किताबें पढ़कर ही पुस्‍तकों की तरफ आते हैं । संजीव ठाकुर का कहना सही है कि मनुष्‍य के जीवन का सबसे सुनहला अध्‍याय बचपन ही होता है । सम्‍भावनाओं का अनंत आकाश लिये ।

एकलव्‍य प्रकाशन को इस सीरिज में और भी पुस्‍तकें अलग-अलग निकालनी चाहिए । जैसे लेखकों का बचपन, वैज्ञानिकों, राजनीतिज्ञों, फिल्‍मी नायक-नायिका आदि । हर बच्‍चे के लिये जरूरी किताब ।

पुस्‍तक : बड़ों का बचपन
लेखक :
संजीव ठाकुर
प्रकाशक :
एकलव्‍य प्रकाशन, ई-10, बी.डी.ए. कॉलोनी, शंकर नगर, शि‍वाजी नगर, भोपाल- 462016
मूल्‍य  :
90 रुपये
पृष्‍ठ  :
175
चित्रांकन :
प्रदीप चिंचालकर

आत्मकथा में कला और इतिहास : प्रेमपाल शर्मा

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प्रसिद्ध  जर्मन लेखक स्‍टीफन स्‍वाइग की आत्‍मकथा ‘वो गुजरा जमाना’ (हिन्‍दी अनुवाद एवं प्रस्‍तुति: ओमा शर्मा) का नया संस्‍करण हाल ही में आधार प्रकाशन से आया है । यों इस आत्‍मकथा के हिन्‍दी अनुवाद और प्रस्‍तुति की पहले भी सर्वत्र सराहना हुई है, नये संस्‍करण में भाषा के एक-एक झोल को सँवारकर और सहज और पारदर्शी बनाया गया है । नयी जानकारियाँ भी यत्रवत पिरो दी गयी हैं । जैसे- पहले संस्‍करण में स्‍टीफन के दो उपन्‍यास ‘द पोस्‍ट ऑफिस गर्ल’ और ‘जर्नी इन टू द पास्‍ट’ का जिक्र नहीं था । ये दोनों उपन्‍यास उनकी मृत्‍यु के बाद प्रकाशित हुए थे । नये रूप में ऐसी जानकारी पाठकों के लिये और उपयोगी होंगी-  

पाठकों की जानकारी के लिये पहले स्टीफन स्वाइग का संक्षिप्त परिचय। बीसवीं सदी के महानतम लेखकों में शुमार किये जाने वाले जर्मनभाषी आस्ट्रियाई लेखक (1881-1942) की इस आत्मकथा का मूलनाम है- ‘द वर्ल्ड ऑफ यशटर्डे’। हिटलर के नृशंस नाजीवाद के चलते लेखक को अपना देश छोड़कर भागना पड़ा और यह आत्मकथा ब्राजील में पूरी की और वहीं जीवन के साठवें वर्ष में पत्नी के साथ आत्महत्या की, अपनी कई कहानियों की परिणिति के समानान्तर। स्टीफन बेमिसाल कथाकार हैं लेकिन बकौल अनुवादक ओमा शर्मा की विलक्षण भूमिका, उसने अपने जीवन के तीन चौथाई हिस्से को उस्ताद कलाकारों की जीवनियाँ लिखने और उनके अवदान को व्याख्यायित करने में लगा दिया। तीन महारथी में शामिल वाल्जाक, डिकन्स और दोस्तोवस्की के अलावा रोमॉ रोला, टालस्टाय, नीत्शे, फ्राइड पर लिखी उनकी जीवनियाँ विश्‍व साहित्य में विशिष्ट महत्व रखती है।

यह आत्मकथा लेखक के उन सार्वकालिक मूल्यों को बार-बार रेखाँकित करती है कि लेखक का न कोई देश होता है न राष्ट्रीयता। भाषा भी नहीं। कलाकार- वह चाहे दोस्तोवस्की हो या डिक्न्स, संगीतज्ञ हो या मूर्तिशिल्पी सभी को सरहदें तोड़नी ही होंगी और यह भी कि लेखक को जन्मजात युद्ध विरोधी ही होना चाहिए। दरअसल यह पूरी किताब ही दोनों विश्‍वयुद्धों की पीड़ा से दबे यूरोप के देशों की दास्तान है।

यह आत्मकथा लिखते समय लेखक पराई भूमि ब्राजील में थे। स्वयं निर्वाचित निर्वासन में। न कोई नोटस है न सामग्री, न पत्र न किताब। सिर्फ स्मृतियाँ है। ये स्मृतियाँ कितनी सान्द्रित आवेश में होंगी यह सब लिखते हुए। मैं इन्हें युद्ध के दौरान, परदेशी जमीन पर, याददाश्त को मदद करने वाली किसी चीज के बिना ही लिख रहा हूँ। जिस होटल में बैठकर लिख रहा हूँ, वहाँ मेरे पास न कोई किताब है, न कोई नोट्स और न कोई न ही दोस्तों की चिट्ठियाँ। मेरे पास सूचना का कोई जरिया नहीं है क्योंकि सैंसरशिप के कारण सभी देशों से आने वाली डाक या तो तितर-बितर है या अवरुद्ध। (पृष्ठ 14)। आश्‍चर्यजनक है कि इस पूरे अतीत की इतनी चीजों को इतनी आत्मीयता से याद रख पाना। विभिन्न शहरों के ऐसे साक्षात विवरण कि शहर न हो कोई हाड़मांस के नायक हो। इसे पढ़कर ही जाना जा सकता है कि आत्मकथा एक सामाजिक इतिहास भी हो सकती है।

स्कूल-विश्‍वविद्यालय की निरर्थकता के प्रसंगों में मौजूदा भारत की तस्वीर झाँकती है। मेरा तो वहाँ एक भी दिन आनन्दमय नहीं गुजरा। जीवन के सर्वोत्तम काल का सत्यानाश। सीखने-सिखाने की ऐसी रवायत जिसका जिदंगी से कोई ताल्लुक नहीं. वही जकड़न विश्‍वविद्यालय में मिली- इन जाहिल, गँवार, कटे-छँटे, निर्भीक और बेचैन करने वालों की शक्लें देखकर ही विश्‍वविद्यालय जाने का मेरा मजा किरकिरा हो जाता। वे सभी विद्यार्थी जो कुछ सीखना-पढ़ना चाहते, जब भी विश्‍वविद्यालय के पुस्तकालय जाते तो मुख्य हॉल की तरफ जाने से कतराते और पिछवाड़े के छोटे रास्ते से ही भाग आते ताकि इन नामुराद शोहदों के सामने पड़ने से बच जायें। मै आज भी यह मानता हूँ कि कोई अच्छा डॉक्टर, दार्शनिक, इतिहासकार, भाषाविद, वकील या कुछ भी बनने के लिये विश्‍वविद्यालय, यहाँ तक कि जिमनेशियम (स्कूल) भी जाने की दरकार नहीं है। अपने रोजमर्रा के जीवन में कितनी दफा मैंने यह साबित होते देखा है कि पुरानी किताबों के किसी फेरीवाले को किताबों के बारे में साहित्य के प्रोफेसरों से कहीं ज्यादा मालूमात होंगे। कला वितरकों की जानकारी कला इतिहासकारों से इक्कीस होती है। सभी क्षेत्रों के महत्वपूर्ण आविष्कार और विचार, क्षेत्र के बाहर के लोगों की बदौलत हुए हैं। किसी औसत प्रतिभा के लिये, अकादमिक कैरियर व्यावहारिक और फायदेमन्द हो सकता है मगर यह उसके किसी काम का नहीं है जो अपनी फितरत के मुताबिक कुछ रचना चाहता है। उसके रास्ते का तो यह रोड़ा भी बन सकता है।

इस आत्मकथा में यदि कोई चीज गायब है तो वह खुद। न पत्नी, न बच्चे, न पिता और न अपनी कहानियों का जिक्र। इसीलिये पुस्तक के अंत में ओमा शर्मा की भूमिका और उसके रचनाकार का परिचय बेहद जरूरी लगता है। स्मृतियाँ चलती जाती हैं। स्कूल से विश्‍वविद्यालय होती हुई अपने शुरू के रचनाकर्म पर। इसराइल राज्य के विचार का जनक थियोडोर हैर्सल, फ्यूलिटन का सम्‍पादक- सभी के प्रति इतना श्रद्धालु, विनम्र, आभारी। हरेक के लिए कृतज्ञ और गदगद। इतनी पाजीटिव ऊर्जा किसी ईश्वरीय देन से ही सम्‍भव है। कोई नुक्स ही न हो मानो किसी में। कम से कम हिन्दी साहित्य के मौजूदा दौर में अपने समकालीनों पर तो मैंने इतनी प्रशंसात्मक टिप्पणियाँ कम ही देखी हैं।

एक प्रसिद्ध लेखक दिहमेल की सलाह पर मैंने बर्लिन विश्‍वविद्यालय के दिनों का इस्तेमाल विदेशी भाषाओं से अनुवाद करने में किया। आज भी मैं किसी ऐसे लेखक को यदि मुझे सलाह देनी हो जो अपने बारे में कुछ तय नहीं कर पा रहे हो तो मैं किसी बड़ी रचना का अनुवाद करने की फुसलाने की कोशिश करूँगा। अपनी भाषा के मिजाज को ज्यादा गहराई और रचनात्मक ढंग से जानने का यह सबसे अच्छा तरीका है। और निष्ठा से उसने यदि कुछ किया है तो वह बेकार नहीं जाता। ओमा शर्मा का यह अनुवाद स्टीफन की किताब पर भी कितना सटीक बैठता है।

सिर्फ व्यक्तियों के लिये ही वह सहृदय और कृतज्ञ नहीं है, यूरोप के उन तमाम शहरों के लिए भी- वियना, बर्लिन, बेलिज्यम, पेरिस, लंदन। पाठक के मन में यह भाव आता ही है कि काश ! मैं भी देख पाता ऐसी भव्यता। उसके वर्णन से पेरिस, पेरिस नहीं रहता, स्वर्ग का उड़नखटोला बन जाता है। यह भी कि यूरोप आज भी यूरो और यूरोटेल की बदौलत और उन विश्‍व युद्धों के पहले और बाद में भी एक विश्‍व नागरिकता का अहसास देता है। पूरे यूरोपीय महाद्वीप में कहीं भी जाओ, कहीं भी पढ़ो, कोई रोक-टोक नहीं। हम अपने देश में बातें तो साझी संस्कृति, साझी विरासत न जाने क्या-क्या की करते हैं लेकिन 50-60 साल की सैकड़ों गोलमेज, शिखर वार्ताओं के बाद भी नागरिक न लाहौर से दिल्ली जा सकते, न कराची से अहमदाबाद। यूरोप के समाज से कुछ अंश ही काश ! सीख पाते। इस आत्मकथा को पढ़ने के बाद ऐसा तो सम्‍भव ही नहीं है कि आप जर्मन, आस्ट्रिया, फ्राँस, हालैंड की चप्पे-चप्पे से परिचित न हो जायें- उनके कलाकारों से भी।

कई बार आश्‍चर्य होता है कि हर कलाकार चोर, मकान मालिक या जीवन के जर्रे-जर्रे से प्यार करने वाला और उम्मीदों से लवालव यह शख्‍स आत्महत्या भी कर सकता है। हो सकता है यह आत्महत्या भी उन स्थितियों में एक नयी उम्मीद के तहत वरण की गयी हो। और अपनी रचनाओं के प्रति भी इतना क्रूर कि साल-दो साल के बाद हिकारत से देखता। यहाँ तक कि एक लगभग पूरे लिखे जा चुके उपन्यास को आग के हवाले ही कर दिया। लेखकों के लिये तो यह मॉडल किताब कही जायेगी कि (1) कैसे स्टीफन दोनों विश्‍वयुद्धों के बीच और वोल्शेविक क्रांति के आर-पार घोर राजनीति के बीच अराजनैतिक बने रहे और लेखनी भी खुट्टल नहीं होने दी। (2) कि आत्मकथा का मतलब अपने समय के समाज, कला की इतनी नम्र मासूमियत जाँच करना है, न कि मैं-मैं के स्वघोषित संघर्षों का राग। (3) कि कैसे समकालीन कलाकारों के प्रति अबाध भक्ति के बावजूद हिटलर की नीतियों पर जब कुछ लेखकों ने चुप्पी साधी तो उन्हें कैसे ललकारा। व्यक्ति स्वातंत्र्य का ऐसा हिमायती कि मौत भी मनमर्जी चुनी।

वैसे ही घुमक्कड़ी की सलाह सारी दुनिया के लेखकों के लिये सबक है-  तुम इंग्लैंड को कभी नहीं समझ सकते हो, अब तक तुम सिर्फ टापू को ही जानते हो.. अपने महाद्वीप को भी नहीं। जब तक तुम कम से कम एक दफा उससे बाहर नहीं निकलोगे। तुम छड़े हो.. उठाओ फायदा अपनी आजादी का। साहित्य बड़ा अद्भुत पेशा है क्योंकि इसमें जल्दबाजी बिल्कुल नहीं चलती। किसी ढंग की किताब के लिये साल भर इधर या उधर कोई मानी नहीं रखता है। तुम भारत या अमरीका क्यों नहीं घूमने चले जाते? उसके यह हस्बेमामूल लफ्ज मुझे जँच गये और मैंने अविलम्ब उन पर अमलीजामा चढ़ाने की ठान ली।

मौजूदा भारत की जातिव्यवस्था पर टिप्पणी- मैं जितना मुमकिन सोच सकता था, भारत का मुझ पर असर उससे कहीं ज्यादा खराब और अवसाद भरा हुआ। मैं सन्न रह गया जब मैंने निचुड़े हुए जिस्मों की दुर्दशा, फीके चेहरों पर आनन्दविहीन संजीदगी, पूरे परिदृश्य पर अक्सर छाई क्रूर नीरसता और सबसे बढ़कर वर्ग और जाति का सख्त विभाजन देखा। इसकी बानगी जाते समय पोत पर ही मुझे मिल गई। हमारे जहाज पर दो बड़ी मनमोहिनी लड़कियाँ थीं.. कजरारी आँखों वाली छरहरी, पढ़ी-लिखी और तहजीबपसंद। समझदार और सुरूचिपूर्ण। मैंने पहले दिन ही गौर किया कि वे बड़ी दूर-दूर रहती हैं या किसी अदृश्य बाड़ ने उन्हें दूर रखा हुआ है। न वे डाँस के वक्त आईं और न उन्होंने किसी से हालचाल पूछा-पूछावाया। अलग-अलग बैठीं। वे अंग्रेजी या फ्राँसीसी किताबें पढ़ती रहतीं। दूसरे-तीसरे दिन जाकर पता चला कि अंग्रेज समाज की संगत से उन्हें परहेज नहीं है, बल्कि दूसरे लोग हैं जो इन वर्ण-संकरों से कन्नी काटे रहते हैं। हालाँकि वे आकर्षक लड़कियाँ एक पारसी बनिया और फ्राँसीसी महिला की बेटियाँ थीं। दो-तीन बरस से वे लौसान के एक बोर्डिंग स्कूल तथा इंग्लैंड के किसी स्कूल के अन्तिम बरस में थीं जहाँ भेदभाव जैसा कुछ था ही नहीं। लेकिन भारत जाते समय जहाज पर चढ़ते ही एक सर्द, अदृश्य मगर फिर भी भीषण किस्म के सामाजिक कफस ने उन्हें दबोच लिया था। नस्ली शुद्धता के फितूरी जन्तु पर पहली बार मेरी नजर पड़ी। आज की दुनिया में तो यह सदियों पहले होने वाले वास्तविक प्लेग से भी ज्यादा घातक हो गया है।

40-50 साल पहले गुजरे वक्त की एक एक कतरन को स्टीफन जैसा कोई लेखक ही इतने सजीव विस्तार से देख और दिखा सकता है। प्रथम विश्‍वयुध्द के पहले के वर्षों में यूरोप में आ रही समृद्धि का वर्णन मानों एक छोटे से बच्चे के बड़ा होने का चित्रण हो। औद्योगिक क्रान्ति से बदल रहे यूरोप की मानों फिल्म किताब में देख रहे हों। एक के बाद एक खोज और आविष्कार हो रहे थे और तुरन्‍त ही दुनिया की भलाई में इस्तेमाल किये जा रहे थे। मुझे उन लोगों पर तरस आता है जो यूरोप के विश्‍वास के उन आखिरी वर्षों में जवान नहीं थे। दुनिया में विश्‍वास के उस दौर को जिसने भी महसूस किया, उसे मालूम है कि उसके बाद तो सिर्फ विषाद और पतन ही बचे। यानी कि प्रथम विश्‍वयुद्ध, फिर आर्थिक मंदी और फिर द्वितीय विश्‍वयुद्ध। शुरू से आखिरी शब्द तक स्मृतियाँ, आवेग से लबालब- जिसमें कविता की सम्‍वेदनशीलता और ताजगी है। बारीकी से देखें तो यादों की बारात लिये यह लेखक अपने समय के कलाकार से बातचीत, उसकी कला और उस पर टिप्पणी से संस्मरणों का ऐसा घोल तैयार करता है कि समाजशास्त्रीय गद्य का अद्भुत नमूना बनकर तैयार हो जाता है। बात रोमॉरोलो से मिलने की हो या बेरहारन की या फ्रायड की, एक कहानी की तरह बात सरकनी शुरू होती है और दो-तीन पृष्ठों में ही बीसवीं सदी के इतिहास की दास्तान आ खड़ी होती है।

पुस्तक के अन्त में स्टीफन स्वाइग: एक परिपेक्ष्य में ओमा शर्मा का निष्कर्ष बहुत महत्वपूर्ण है। ‘वो गुजरा जमाना’ भी बहुत कुछ रिल्के, रोदां, हॉफमंसथाल, गोर्की, राथिनों, रिचर्ड स्ट्रॉस, थिओडर हर्जल, बजालजैत, रोलां और फ्रायड की दूसरे किस्म की जीवनियों का ही एकसूत्रीकरण है। पाठक इस बात की तरफ गौर करें कि इतने सारे लेखक-कलाकारों के हुनर और जीवन का आख्यान करते समय उनका रचियता जीवनीकार महज प्रविक्षार्थी की भूमिका में बना रहता है। वहाँ न उसका अहम फटक सकता है, न उसकी शोहरत।    दोस्तोव्स्की, टॉल्सटॉय और रोमा रोलां जीवनी-चरित्रों के तौर पर स्वाइग के अलग-अलग पहलुओं का ही विस्तार लगते हैं। पीड़ा-यातना यदि दोस्तोव्स्की के चरित्रों का स्थाई भाव है तो लगभग वही स्थिति स्वाइग की है। इसी तर्ज पर कहा जा सकता है कि जिन्दगी के अनुभवों को गल्प के माध्यम से साकार करने की कला में उसके भीतर टॉल्सटॉय जी उठता है, स्थूल घटनाओं के पार्श्‍व में धँसी सूक्ष्म, जटिल मन:स्थितियों-सम्‍वेदनाओं के उत्कीर्णन में फ्रायड के असर को (जिसके प्रभाव के इल्जाम से स्वाइग ने फ्रायड को अपनी जीवनी की भूमिका में झूठलाया था। फ्रायड, स्वाइग की रचनाओं के घोर प्रशंसक थे। अलबत्ता वह उनकी इतर व्याख्याएँ अवश्य करते थे) बहुत कुछ महसूस किया जा सकता है, दुर्गम परिस्थितियों में कुछ चरित्रों द्वारा जाहिर जिजीविषा या मजबूत नैतिक अन्त:शक्ति की अवस्था को रोलां के प्रभाव के रूप में देखा जा सकता है। (पृष्ठ 374-375)

द्वितीय विश्‍वयुद्ध के कुछ पहले स्टीफन स्वाइग फिर से रूस गये थे। फिर से यानी कि 1914 में दोस्तोवस्की पर लिखते समय के बाद। बदलते रूस का वर्णन बताता है कि जो 1991 में हुआ वह उससे पहले कभी भी हो सकता था। क्या 1930 तक यह स्थिति आ गयी थी कि किसी ने बिना दस्तखत किया खत स्टीफन के जेब में चुपके से डाल दिया। खत में लिखा था- ये लोग तुम्हें जो बता रहे हैं उसकी हर चीज पर भरोसा मत करना। मत भूलो कि तुम्हें जो सब दिखाया गया है, उसके साथ-साथ बहुत कुछ ऐसा भी है जो तुम्हें नहीं दिखाया गया है। याद रखना कि तुमसे बात करने वाले ज्यादातर लोग अपने दिल की बात नहीं करते हैं बल्कि वे वही कहते हैं जो उन्हें कहना पड़ता है। हम सब पर निगाह रखी जाती है। तुमको भी कहाँ बख्शा गया है। तुम्हारा दुभाषिया हरेक लफ्ज की खबर करता है। उसमें बहुत सारे वाकये और तफसीलें थीं जिनकी मैं जाँच नहीं कर सकता था। उसकी हिदायत के मुताबिक मैंने खत जला दिया। इसे सिर्फ फाड़कर  मत छोड़ देना क्योंकि वे तुम्हारे कूड़ेदान से निकालकर भी इसे जोड़-जोड़ लेंगे। मैंने चीजों को पहली बार सिरे से सोचना शुरू किया.. क्या यह हकीकत नहीं थी कि इसी दिन गर्मजोशी और लाजवाब बिरादरेपन के दरम्यान किसी से निजी तौर पर रूबरू बोल-बतियाने का एक भी मौका मेरे हाथ नहीं आया था। (पूष्ठ 283) आप इतिहास की पुस्तक पढ़कर तथ्यों को भूल सकते हैं, जीवन की इस किताब से इतिहास का एक-एक पृष्ठ आपके अंदर जज्ब होने लगता है। साहित्य यहीं इतिहास से बाजी मार ले जाता है।

पुस्तक में यत्रगत विखरे कुछ निष्कर्ष अदभुत हैं- सोचने-विचारने वाले आदमी का सबसे ज्यादा नुकसान विरोध के अभाव से होता है। जब मुझे अकेले पड़ने की मजबूरी हुई, जब नौजवानों ने मुझे घेरना बंद किया तभी मैं एक बार फिर जवान होने को मजबूर हुआ। कुछ बरस बाद मुझे समझ में आया कि इम्तहान चुनौती होते हैं। उत्पीड़न शक्ति देता है और एकान्त उदात करता है- बशर्ते वह आपकी कमर ही न तोड दे। जिन्दगी की सभी महत्वपूर्ण चीजों की तरह, यह परिज्ञान दूसरों के अनुभवों से नहीं, अपने खुद के नसीब से ही हासिल होता है।(पृष्ठ 287)

युद्ध की आहटों के बीच कुछ साथी लेखक-कलाकारों के दोगले व्यवहार को लेखक बखूबी पहचानता है। यूरोप के अधिकांश कलाकार-लेखक आधी रात के सपने में एक भाषा बोलते हैं, लिखते वक्त दूसरी और दोस्ती में बतियाते तीसरी। ये वे लोग थे जिनका कोई देश नहीं था या जिनकी एक की बजाय दो या तीन जन्मभूमियाँ थी और वे पेसोपेश में थे कि वे हैं किसके? कभी वे एक के लिये मजबूर किये जाते तो कभी दूसरे के लिए स्वयं मजबूर होते (पृष्ठ – 240)। इसी तबाही के दृश्य स्टीफन की कहानियों में जितने भयावह है, यहाँ भी उतने ही। तीन महीने तो मैंने अमूमन बिस्तर में पड़े रहकर, ठण्‍ड से जमीं नीली उँगलियों से ही लिखा। हर पन्ना पूरा होने के बाद उन्हें कम्बल में घुसाकर गर्माहट देता। मगर रिहाइश की इस मामूलियत को घटिया नहीं कह सकते थे क्योंकि तबाही के इस बरस में खान-पान की चीजों के अलावा, घरों का भी तो अकाल पड़ा हुआ था। चार साल से ऑस्ट्रिया में कोई निर्माण काम नहीं हुआ था।

वास्तव में यह आत्मकथा एक तरह से तमाम छोटे-मोटे युद्धों के खिलाफ है। जिस समय यह लिखी गयी तब द्वितीय विश्‍वयुद्ध अपनी विभीषिका की चरम पर था। हो न हो, आत्महत्या का क्षण व्यक्तिगत कुंठा या संतोष या हताशा से ज्यादा इस युद्ध के दुष्परिणामों और उन्हें किसी भी रूप में रोकने में असमर्थ आत्मा की मुक्ति के रास्ते के रूप में चुनी हो।

स्टीफन स्वाइग, पहले पहल मैंने इस लेखक का नाम जब सुना तो यह शब्द मेरे लिये लगभग काला अक्षर भैंस बराबर था। हो भी क्यों नहीं। अंग्रेज और अंग्रेजी के आतंक के चलते पूरा यूरोपीय साहित्य ही ओट में रह गया। आज इस आत्मकथा को पढ़कर मैं दावे के साथ न केवल यूरोपीयों बल्कि दुनिया के सर्वश्रेष्ठ लेखकों, कलाकारों के बारे में भी कुछ कह, सुन सकता हूँ- वाल्जाक, टालस्टाय, चेखव, दोस्तोवस्की, फ्रायड और सैकड़ों अन्य ज्ञात और अल्पज्ञात।

साहित्य और इतिहास के पाठकों के लिये एक बेहद जरूरी किताब। इक्कीसवीं सदी की पीढ़ी के लिए बीसबीं सदी के साहित्य और इतिहास का अनूठा दस्तावेज। मैंने किसी भी भाषा के साहित्य में इतनी अच्छी जीवनी किसी लेखक की नहीं पढ़ी और इतने अच्छे अनुवाद में। इस अनुवाद को पढ़कर कोई जान ही नहीं पायेगा कि स्टीफन स्वाइग जर्मन लेखक था। लगेगा कि भले ही जर्मन होगा, आत्मकथा तो उसने हिन्दी में ही लिखी है।

पुस्‍तक : वो गुजरा जमाना (आत्मकथा)
लेखक : स्टीफन स्वाइग
अनुवाद एवं प्रस्तुति: ओमा शर्मा
प्रकाशक : आधार प्रकाशन, एस.सी.एफ. 267, सेक्‍टर-16 पंचकूला-134113 (हरियाणा)
पृष्ठ : 400
कीमत: 120/- (पेपर वैक), 500/ हार्डकवर

शैक्षिक सरोकारों को समर्पित ‘शैक्षिक दखल’ : रमेश जोशी

shekshik dakhal

शैक्षिक सरोकारों को लेकर प्रकाशित की जा रही है पत्रिका ‘शैक्षिक दखल’ की लेखक रमेश जोशी की समीक्षा-

शिक्षा मानवीय संसाधनों को विकसित करती है। इस दृष्टिकोण को मद्देनजर रखते हुए यदि शिक्षा की व्यवस्था की जाय तो स्वाभाविक है उत्तम मानवीय संसाधनों का विकास होगा और अपेक्षानुरूप हम अपने समाज को ढालने में समर्थ हो सकेंगे। यदि संसाधनों को लेकर या फिर वित्तीय संकट का रोना रोकर कामचलाऊ व्यवस्था पर निर्भर रहा जाय तो परिणाम बहुत अच्छे नहीं हो सकते हैं। जैसे-जैसे तकनीकी का विकास हो रहा है शिक्षा का दायरा भी विस्तृत होता जा रहा है। वर्तमान में शिक्षा देना बहुत आसान नहीं रह गया है, केवल कक्षा-कक्ष में जाकर पाठ्यक्रम से सम्बन्धित बातें बता देना और परीक्षा पास करवाना ही शिक्षा का लक्ष्य नहीं है, बल्कि छात्रों के अन्दर विद्यमान दक्षताओं को पहचान कर उनमें अपेक्षित परिवर्तन करते हुए उनमें जीवन कौशलों को विकसित करना भी है। शिक्षा को कैसा होना चाहिए और छात्रों को किस प्रकार आवश्यकताओं के अनुरूप गुणवत्तापूर्ण तथा जीवनोपयोगी शिक्षा दी जाय इसको शिक्षक से बेहतर कौन जान सकता है। छात्रों में बहुमुखी प्रतिभा को विकसित करने के लिये शिक्षक को अनेक प्रयोग करने पड़ते हैं। छात्रों की कल्पना शक्ति का विकास करने के लिये शिक्षक को स्वयं भी रचनाशील होना चाहिए। आज भी संसाधनों को दरकिनार करते हुए कई शिक्षक छात्रों के भविष्य को संवारने में लगे हैं और सामाजिक चेतना के माध्यम से अन्य लोगों में भी चेतना का संचार करने में लगे हैं।

रचनात्मकता शिक्षक का प्रमुख गुण है। वह इसके अभाव में वह वर्तमान में विद्यालयों में उचित वातावरण का सृजन नहीं कर सकता है। बच्चों की रचनात्मक प्रवृति को विकसित करने के लिये तथा शिक्षकों में चेतना का संचार करने के लिए शैक्षिक सरोकारों को समर्पित ‘शैक्षिक दखल’ का अंक रचनाधर्मी शिक्षकों के अथक प्रयास से निकल चुका है। इसे लोग पढें विशेषरूप शिक्षकों से निवेदन है कि अवश्य ही इस पत्रिका को पढ़ें तथा अपेक्षित सुधार हेतु अपनी राय दें ताकि इसे और अधिक उपयोगी बनाया जा सके। केवल सम्‍पादक मंडल या इससे जुड़े लोगों के प्रयास से बहुत अधिक सफलता नहीं मिल सकती है। अतः पाठकों की अधिकाधिक संख्या तथा उनकी प्रतिक्रिया सफलता के लिये आवश्यक है।  ‘शैक्षिक दखल’ का यह अंक अपने आपमें काफी सामाग्री समेटे हुए है। पत्रिका का बाह्य आवरण बहुत सुन्दर तथा आकर्षक है। अश्‍वघोष की ‘आजकल’ तथा हरीश चन्द्र पाण्डेय की ‘वहाँ कोई बच्ची नहीं थी’ कविता पत्रिका का निश्चित रूप से वजन बढ़ाती हैं। सम्‍पादकीय में महेश पुनेठा ने ‘ पाठ्य पुस्तकों के बोझ तले सिसकती रचनात्मता’ में विद्यालयों के बोझिल तथा सीमित वातावरण का जिक्र किया है जिससे कि बच्चों की रचनात्मकता बुरी तरह प्रभावित हो रही है। पाठ्य पुस्तकों का बोझ बच्चों को शिक्षा की मौलिक विचारधारा से भटका रहा है तथा उन्हें बोझिल बना रहा है। पुनेठा जी ने लिखा है,‘बच्चा तनाव में है और किसी बोझ से दबा है तो वह नया सोच ही नहीं सकता और जब सोच ही नहीं सकता है तब रचने की बात तो दूर की कौड़ी है।’ वह आगे कहते हैं, ‘बच्चों का मन बहुत करता है कि खुले में विचरण करें, कल्पनाओं की उड़ान भरें, कुछ नया करे पर अध्यापकों-अभिभावकों द्वारा उसे किसी प्रकार से फिर पाठ्यपुस्तक रूपी किले से बाँध दिया जाता है।’ पाठ्य पुस्तकों की निर्भरता पर वह कहते हैं, ‘ एक आम तर्क होता है कि जब पाठ्यपुस्तक ही नहीं हैं तो पढ़ाई कैसे शुरू होगी? यह प्रवृति बच्चे की रचनात्मता को कुंद करती है।’ यहाँ तक कि हमारे शिक्षकों में भी इस बात के लिये नाराजगी होती है कि वे पुस्तकों के अभाव में क्या करें।

हमारे परिवेश से भिन्न होने के कारण अंग्रेजी माध्यम से होने वाले नुकसान के बारे में उनका कहना है कि,‘ अंग्रेजी माध्यम के चलते बच्चे की चिंतन मनन की प्रक्रिया बाधित हुई है। एक ऐसी भाषा जो मातृभाषा से इतर है, बच्चे कि लिये उसमें चिंतन और कल्पना करना स्वाभाविक नहीं है।’

राजीव जोशी के समन्वयन में ‘स्वाधीन हुए बिना रचनात्मकता सम्‍भव नहीं’ विषय पर कई छात्रों, शिक्षकों, लेखकों, पत्रकारों ने प्रतिक्रिया व्यक्त की है तथा लेखन व सृजन के लिए स्वतंत्रता के महत्व को स्वीकारा है। साथ ही स्वतंत्रता के असली मायनों को भी परिलक्षित किया है। स्वतंत्रता के सम्बन्ध में युवा उपन्यासकार राजीव रंजन कहते हैं, ‘स्वतंत्र होकर मिट्टी में जैसे दबाव नहीं डाला जा सकता उसे गढ़ने की स्वतंत्रता तो है पर इस प्रक्रिया में वह निश्चित दबाव, आकार, चाक की गति आदि की अवहेलना नहीं कर सकता।’ बातचीत में प्रोफेसर ए.के. जलालुद्दीन ने कई महत्वपूर्ण जानकारियाँ प्रदान की हैं जो कि शिक्षक के लिये बहुत जरूरी हैं और इनका ध्यान यदि कक्षा-कक्ष में दिया जाय तो हम सफल शिक्षक की जिम्मेदारी का निर्वाहनआसानी से कर सकते हैं। शिक्षक को शिक्षण के इतर दी गयी जिम्मेदारियों पर भी कई लोगों ने ध्यान आकृष्ट किया है और इस पर सोचना वास्तव में बहुत जरूरी हो गया है।

बच्चों की छोटी-छोटी गलतियों पर अभिभावक या शिक्षक उसे कितना बड़ा दण्ड देते हैं इसका वर्णन ‘किस्सा गुलफाम उर्फ टोलम का’ में किया गया है। हमें समस्या की तह में जाने की आवश्यकता है और उसके उपरान्त ही हम कोई निर्णय लें ताकि किसी का भविष्य खराब न हो सके। कविता की सार्थकता पर मोहन श्रोत्रिय ने प्रकाश डाला है। वह कहते हैं, ‘कविता सृजन का एक महत्वपूर्ण सामाजिक-सांस्कृतिक कर्म है तो उसे सामाजिक सरोकार भी होंगे ही। इन सरोकारों की खुली अभिव्यक्ति भी पाठकों से कवि, कविता की निकटता और जुड़ाव को सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है।’ शिक्षक के व्यवहार की महत्ता को परिलक्षित करता खजान सिंह का आलेख बताता है कि विद्यालय में शिक्षक के लिए छात्रों के साथ मधुर व्यवहार कितना उपयोगी होता है। यदि आज भी छात्र विद्यालय के वातावरण को अनाकर्षक मानते हैं तथा पढ़ने से दूर भागते हैं तो निश्चित रूप से शिक्षक को अपने व्यवहार को पुनः सुधारने की आवश्यकता है। इसके अतिरिक्त भी कई महत्वपूर्ण आलेख इस पत्रिका में दिये गये हैं जो कि पठनीय हैं।

‘आते हुए लोग’ के सम्बन्ध में मेरा सुझाव है कि इसमें और अधिक लोगों के विचारों को स्थान दिया जाय। शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वालों के अनुभवों को इसमें शामिल किया जाय साथ ही व्यक्तिगत आक्षेपों से बचा जाय। व्यवस्थागत खामियों को उजागर करना ठीक है परन्तु व्यक्तिगत रूप से अल्प अनुभव को आधार मानकर कोई सार्वजनिक सिद्धान्त स्वतः निकाल लेना तर्क संगत नहीं होता है। मेरा सम्पादक मंडल से अनुरोध है कि इस प्रकार की खामियों से बचा जाय।
कुल मिलाकर पत्रिका में उपलब्ध सामाग्री पठनीय है। शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वालों के लिए कई महत्वपूर्ण सामाग्री इसमें समाहित है। ‘समाचार पत्रों में शिक्षा जगत की मौजूदगी’ डॉ. दिनेश जोशी का संकलन भी बहुत कुछ कहता है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में आप शिक्षक हों चाहे अभिभावक शिक्षा जगत में नित बदलती तस्वीर के लिये तथा अपने नौनिहालों के भविष्य के लिए इस पत्रिका को अवश्य पढ़ें।

पत्रिका का नाम : शैक्षिक दखल
सम्‍पादक : महेश चंद्र पुनेठा और दिनेश कर्नाटक
सम्‍पर्क : महेश चंद्र पुनेठा, जोशी भवन, नि‍कट लीड बैंक, पि‍थौरागढ़-262501, मोबाइल नम्‍बर- 09411707470
सहयोग राशि‍: 20 रुपये(प्रति‍ अंक), 100 रुपये(चार अंकों के लि‍ये), 1000 रुपये(आजीवन)

बोझिल नहीं, रुचिकर है विज्ञान : अनुराग

devendra mewari

प्रसिद्ध विज्ञान लेखक देवेंद्र मेवाड़ी की पुस्‍तक ‘मेरी विज्ञान डायरी’ की समीक्षा-  

दुर्भाग्य की बात है कि पाठ्यपुस्तकों में विज्ञान को बोझिल और तकनीकी रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है। इससे इसे कठिन विषय मान लेने की धारणा को बल मिलता है। जबकि विज्ञान बहुत ही रोचक विषय है, यदि जिज्ञासा उत्पन्न हो जाए। इस विषय को कैसे रोचक ढंग से लिखा जा सकता है, यह सीखा जा सकता है विज्ञान लेखक देवेंद्र मेवाड़ी की हाल ही में प्रकाशित पुस्तक मेरी विज्ञान डायरी से। डायरी शैली में लिखी गई यह पुस्तक 1 जनवरी, 2008 से 31 दिसंबर, 2010 तक की विभिन्न  तिथियों में लिखी गई है। नववर्ष शीर्षक से पहले अध्याय में मेवाड़ी प्रश्न करते हैं कि समय का हिसाब सबसे पहले किसने जोड़ा होगा ? सबसे पहले कब कहा होगा कि आज अमुक दिन-वार है। किसने बनाए होंगे महीने? दिल्‍ली के विश्‍व पुस्‍तक मेले में कवि कुमार अंबुज के साथ हुई बात को याद करते हैं, जिसमें उन्‍होंने पूछा था कि ‘कोई कैसे कह सकता है कि आज ही अमुक वार है? जैसे मंगलवार, शुक्रवार या कोई अन्‍य वार? या जैसे कई लोग वर्त रख लेते हैं। महिलाएं शुक्रवार का उपवास रखती हैं। यह कैसे पता है कि उसी दिन शुक्रवार है? शुरुआत में थोडे़ ही कोई वार रहा होगा?’ जाहिर सी बात है कि जब पृथ्‍वी बनी होगी, तब न वार रहा होगा न दिन। न ही महीने रहेंगे और न ही साल। यहां पर पाठक के मन में स्‍वाभाविक रूप से उत्‍सुकता जाग जाती है कि समय की गणना कैसे हुई होगी और इस कैसे बांधा गया होगा। इस जिज्ञासा को शांत करने के लिए वह कुमार अंबुज से बातचीत से शुरू होकर दिन की शुरुआत कैसे हुई, कलैंडर का प्रचलन कब हुआ, इसका आधार क्‍या बना, कैसे-कैसे उसमें संशोधन हुए, कैसे महीनों के नाम पडे़, कितने तरह के कलैंडर प्रचलित हैं आदि बातों को बडे़ ही रोचक ढंग से समाने रख देते हैं। अगर मेवाड़ी इस सब को बताने के लिए सीधे इससे शुरू करते कि दिन की शुरुआत कैसे हुई और महीनों के नाम कैसे पडे़ तो शायद ही कोई इसमें रुचि लेता और यह एक बोझिल किताब बन जाती। इस किताब की यह ही सबसे बड़ी विशेषता है कि किसी भी विषय पर जब हम पढ़ना शुरू करते हैं तो जिज्ञासा मन में उत्‍पन्‍न हो जाती है और वह तब तक शांत नहीं होती, जब तक की उसके बारे में पूरी जानकारी न मिल जाए यानी की पूरा लेख पढ़ना अनिवार्य हो जाता है। रोचक ढंग से लिखे होने के कारण वह हमें बांधे भी रखती है।

विज्ञान के लिए सबसे जरूरी बात जिज्ञासू होना है। जब किसी विषय के बारे में हमारे मन में जिज्ञासा उत्‍पन हो जाएगी तो उसमें रुचि उत्‍पन्‍न होने लगेगी और वह विषय कभी बोझिल नहीं लगेगा। उसे जाने की उत्‍सुकता बन जाएगी। तब उसकी तह तक जाने का प्रयास करेंगे। यह डायरी हमें चीजों को जाने और समझने के लिए जिज्ञासू बनाती है यानी पाठकों में एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण का भी विकास करती है।

डायरी लिखने के दौरान बीच-बीच में पड़ने वाली वैज्ञानिक घटनाओं वाली तिथियों पर वह उनके बारे में बताते चलते हैं। 19 मार्च, 2008 को  विश्‍व प्रसिद्ध विज्ञान लेखक आर्थर सी क्‍लार्क का निधन हो गया। 20 मार्च को लिखी टीप में वह इस स्‍वप्‍नदृष्‍टा लेखक के बारे में बहुत सी महत्‍वपूर्ण जानकारी देते हैं। तर्क पर आधारित, विज्ञान सम्‍मत अपनी परिकल्‍पनाओं को उन्‍होंने अपने जीवनकाल में ही साकार होते देख लिया था। उपग्रह संचार इसका शानदार उदाहरण है। 1945 में प्रकाशित अपने लेख ‘एक्‍स्‍ट्रा टेरेस्ट्रियल रिलेज : कैन रॉकेट स्‍टेशंस गिव वर्ल्‍डवाइड रेडियो कवरेज?’में उन्‍होंने विचार रखा कि अगर पृथ्‍वी से 36000 किलोमीटर की ऊंचाई पर संदेशों को रिले करने के लिए उपग्रह स्‍थापित किए जाएं तो विश्‍व भर में संचार संभव हो सकता है। संचार उपग्रहों से संबंधित यह पहली परिकल्‍पना थी जो 25 साल बाद साकार हो गई। इसी तरह वर्ष 1940 के दशक में उन्‍होंने कहा था कि वर्ष 2000 तक मानव चांद पर पहुंच जाएगा। तब लोगों ने उनके इस पूर्वानुमान को मखौल मना लिया, लेकिन यह परिकल्‍पना भी साकार हुई।

इस किताब को पढ़ते हुए पता चलता है कि प्रसिद्ध लेखक और सम्‍पादक मनोहर श्‍याम जोशी विज्ञान के प्रति कितने सजक थे। उन्‍होंने अपने दौर के हिंदी विज्ञान लेखकों की पूरी पीढ़ी को पठनीय विज्ञान लेखन के लिए प्रेरित किया। भुट्टे तो हम सभी ने खाए होंगे, लेकिन क्‍या हमें पता है कि हजारों साल पहले दक्षिण अमेरिका की इंका और मध्‍य अमेरिका की मय तथा एजटैक सभ्‍यता कि निवासियों का मुख्‍य भोजन मक्‍का ही था। इंका निवासी फसलों की देवी ‘चिकोमिकॉल’ की पूजा करते थे जिसकी प्रतिमा के बाएं हाथ में सूरजमुखी से सजी ढाल और दाहिने हा‍थ में मक्‍का के दो भुट़्टे दिखाए जाते थे। मक्‍का चोरी पर कड़ी सजा दी जाती थी। राजा के निधन के बाद सात दिन तक सिल पर मक्‍का नहीं पीसी जाती थी। आम को फलों का राजा कहा जाता है। इसका हमारे जीवन में इतना महत्‍व है कि उत्‍सवों और शुभकार्यों में आम के पत्‍ते और लकड़ी इस्‍तेमाल होती है। रामायण और महाभारत में भी आम के उपवनों की वर्णन किया गया है। दशहरी, चौसा, लंगड़ा, नीलम, फजली, सफेदा, बंबइया आदि न जाने कितनी की किस्‍में हैं। क्‍या हमने कभी सोचा कि इन किस्‍मों का नामकरण कैसे हुआ। बनारस में एक लंगडे़ फकीर बाबा के घर के पिछवाडे़ एक खास किस्‍म का पहला पेड़ उगा इसलिए उसका नाम लंगड़ा आम पड़ गया। लखनऊ के पास मलीहाबाद के दशहरी गांव में जन्‍मा दशहरी आम। और फिर मलीहाबाद के हाजी कलीमुद्दीन का एक ही पेड़ पर ढाई हजार किस्‍मों के आमों को पैदा कर दिखाना। ऐसी बहुत सी ज्ञानवर्धक जानकारियों इस किताब में हैं।

जैसे कि लेखक ने पुस्‍तक की भूमिका में लिखा भी है कि इसमें विज्ञान की बातें डायरी शैली में लिखी गई हैं। इन पन्‍नों में विषय की विविधता है। इनमें किस्‍से-कहानियां हैं, यात्रा वृत्‍तांत, जीवनियां, संस्‍मरण, शब्‍द चित्र और समाचार भी हैं। यानी इसमें कई विधाओं का संगम है।  इस डायरी की यह भी विशेषता है कि इसे कहीं से भी पढ़ा जा सकता है। हर पन्ने पर विज्ञान की नई जानकारी मिलती है। इसमें दिए गए वैज्ञानिक तथ्य और जानकारियां सभी की समझ में आसानी से आ जाती हैं।

पुस्‍तक – मेरी विज्ञान डायरी
लेखक- देवेंद्र मेवाड़ी
मूल्‍य- 350 रुपये
प्रकाशक- आधार प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड
एस.सी.एफ. 267, सेक्‍टर-16
पंचकूला-134113

प्रति संसार की रचना : महेश चंद्र पुनेठा

युवा कवियित्री रेखा चमोली को हाल ही में ‘सूत्र सम्‍मान’ से सम्‍मानित किया गया है। कवि महेश चंद्र पुनेठा द्वारा लिखी गई उनके कविता संग्रह ‘पेड़ बनी स्‍त्री’ की भूमिका-

स्त्री मन की उधेड़बुन, बेचैनी, झुँझलाहट, खीज, आशा-आकांशा को जितनी गहराई और प्रमाणिकता से एक स्त्री की रचनाओं में जाना और महसूस किया जा सकता है शायद और कहीं नहीं। रचना में एक स्त्री अपने मन को पूरी तरह से उडे़ल कर रख देती है। स्त्री के विद्रोही मन की ऊँचाई और प्रेमी मन की गहराई का असली भान उसकी रचना में ही होता है। उसके लिये वास्तविक संसार में वह जो सम्‍भव नहीं उसे अपने कविता-संसार में सम्‍भव कर दिखाती है। एक ऐसे प्रति संसार की रचना करती है जो उसे पसंद है। रेखा की प्रस्तुत संग्रह की कविताएं इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। ये कविताएं जितना एक स्त्री जीवन के बाह्य पक्ष के बारे में बताती हैं उससे ज्यादा उसके मन के बारे में। एक स्त्री अपने आसपास को किस तरह देखती है और आसपास की तमाम चीजें और घटनाएं उसके मन पर कैसा प्रभाव डालती हैं, यह इन कविताओं में दृष्टिगोचर होता है। इनके यहाँ प्रेम और विद्रोह दोनों है। वह अंधविश्‍वासों और रूढि़यों से मुठभेड़ करती हैं। चीजों को उसी रूप में नहीं स्वीकारती हैं जैसी पहले से चली आ रही हैं, बल्कि आलोचनात्मक विवेक का इस्तेमाल करते हुए जो उन्हें तर्क संगत लगता है उसे स्वीकार करती हैं। स्त्री के सम्मान और स्वाभिमान के साथ होने वाला कोई भी खिलवाड़ उन्हें बर्दाश्त नहीं है।

रेखा में अपनी बात को बेवाक रूप से कहने का साहस भी है और दृढ़ता भी। उनमें सामंती मूल्यों के प्रति गहरा आक्रोश है। वह उन्हें तोड़ना चाहती हैं। पुरूष प्रधान समाज में स्त्री के साथ होने वाले हर छल-छद्म से वह परिचित हैं। उसको अपनी कविताओं में निर्ममता से उघाड़ती हैं। ‘स्त्री पूजा’ के प्रपंच को वह अच्छी तरह जानती और समझती हैं इसलिए उसकी कोई परवाह नहीं करती हैं। उनकी स्पष्ट मान्यता है कि स्त्री पूजा उसको सम्मान देने के लिए नहीं, बल्कि सम्मान की खुशफहमी पैदा कर उसका मनमाफिक उपयोग करने की चालाक कोशिश है। महिमामंडित कर चुप कराने का षड्यंत्र है ताकि उसके भीतर किसी तरह का विद्रोह पैदा न होने पाए। उसको यह खुशफहमी रहे कि कोई बात नहीं, भले कितने ही दुःख-दर्द सहन करने पड़ें पर उसका सम्मान तो कायम है। लाज, प्रेम, दया,  क्षमा, त्याग, विनयशीलता, आज्ञाकारिता, समर्पण को स्त्री के गहने क्यों बताए गये हैं, इसको भी वह अच्छी तरह समझती हैं। वह मानती हैं कि जब स्त्री समाज के बनाए सामंती नियम-कानूनों और मूल्यों के बोझ से बाहर निकलेगी तभी सही अर्थों में उसकी मुक्ति सम्‍भव है।

रेखा की कविताओं में जगह-जगह स्त्री-मुक्ति की आकांक्षा पंख फड़फड़ाती हुई दिखाई देती है। उनकी स्त्री लकीरों से बाहर निकलकर अपना मनचाहा संसार रचना चाहती है, भले ही व्यवस्था को लकीर से बाहर जाना पसंद नहीं है। उनके यहाँ ‘उड़ान’ बीज शब्द के रूप में आता है जो मुक्ति का प्रतीक है। यह अच्छी बात है कि उनकी स्त्री के भीतर तमाम परेशानियों और जाल-जंजालों के बावजूद भी मुक्ति की आकांक्षा मरती नहीं है। वह उड़ना चाहती है। अपने पंखों को हमेशा तोलती रहती है। परिस्थितियों के सामने झुकती नहीं है बल्कि उससे टकराना चाहती है। उठ खड़ी होती है। निर्भीक होकर अपनी सहमति-असहमति व्यक्त करती है यह जानते हुए भी कि औरत की हर लड़ाई में उसकी देह को ही उसका दुश्मन बना दिया जाता है। फिर भी उनकी इच्छा है कि बेटियाँ खूब नाचें-गाएं, खेलें-कूदें जिससे गूँज उठें दसों-दिशाएं।

प्रकृति के विभिन्न उपादान इन कविताओं में बार-बार आते हैं। प्रकृति का आलंबन लेकर अपने दुःख-दर्द, हर्ष-उल्लास और आशा-आकांशा को व्यक्त करने का औरत का बहुत पुराना तरीका इन कविताओं में भी परिलक्षित होता है। सूरज, पेड़, बादल, बारिश, नदी, पहाड़, धूप, फूल-पत्ती आदि इन कविताओं में बहुत आते हैं। यह कवियित्री की प्रकृति से निकटता को बताती है। यहाँ इन सबका मानवीकरण कर दिया है। कवियित्री इनसे बतियाती है। अपने दुःख-दर्द उनको सुनाती है। स्त्री के दुःख इतने अधिक हैं कि फिर भी खत्म नहीं होते।

रेखा की कविताओं में प्रेम की गहरी एवं विलक्षण अनुभूति के दर्शन होते हैं। एक ऐसी परिस्थिति में जबकि घर-बाहर के काम के बोझ से दबी औरत के पास ‘प्यार-व्यार’ की बातों के लिए समय तक नहीं है उसमें रेखा का प्रेम कविताएं लिखना प्रीतकर लगता है। तमाम व्यस्तता और समस्याओं के बाद भी प्रेम के प्रति सम्मान का भाव है। उनकी कविताओं में आया प्रेम फिल्मी प्रेम नहीं, बल्कि जीवन का सबसे उद्दात भाव है जो मजबूती से थामे रखता है। जिसकी नमी, तरलता, हरापन बचाए रखती है आदमी होने के अहसास को। उनके लिए प्रेम मनुष्य होने का पर्याय है। वह मानती हैं कि प्रेम करना किसी लड़की के लिये  हथेली में गुलाब उगाने जैसा है जिसकी मीठी चुभन को तो छुपाया जा सकता है पर खुशबू को नहीं। प्रेम के सामने सामंती और पूँजीवादी मूल्यों के चलते आने वाले खतरों से भी रेखा वाकिफ हैं। ऑनर किलिंग जैसी घटनाओं पर वह व्यंग्य करती हैं कि ये सब घटनाएं उस देश में होती हैं जिसमें ‘राधा-कृष्ण’ की पूजा की जाती है। वह स्त्रियों को सलाह देती हैं- तुम जरूर करना प्रेम/पर ऐसा नहीं कि/जिससे प्रेम करना उसी में/ढूँढने लगना/आकाश, मिट्टी, हवा, पानी, ताप। अर्थात अपनी अस्मिता को बचाए रखना। वह इसके खिलाफ दिखती हैं कि प्रेम में अपने अस्तित्व को ही मिटा दिया जाय जैसे नदी सागर में मिलकर मिटा डालती है क्योंकि जब स्त्री बचे रहेगी तभी दुनिया का अस्तित्व भी बचा रहेगा। यह स्त्री अस्मिता के प्रति उनकी अतिरिक्त सजगता ही कही जाएगी।

इन कविताओं में ग्वाले, घसियारिनें, स्कूली बच्चे, खेतों में खरपतावार हटा-हटाकर थक गई बहू-बेटियाँ, दूर शहर गए आदमी के इंतजार में बैठी पहाड़ी स्त्री, सड़क किनारे खेलते नंग धड़ंग बच्चे, भीख मांगती मांएं भी दिखाई देते हैं। अपने आसपास की केवल प्रकृति पर ही नहीं बल्कि उसके बीच रह रहे श्रम करते लोगों पर भी रेखा का ध्यान बराबर जाता है। यह उनके अपने लोक और श्रम से संपृक्ति का प्रमाण है।

रेखा की कविताओं की खासियत है कि वह किसी बात को उलझाती नहीं हैं। भाषा के खेल के द्वारा कोई चमत्मकार पैदा करने की कोशिश नहीं करती हैं। बोलचाल के उन्हीं शब्दों का इस्तेमाल करती हैं जो उनके पास सहजता से उपलब्ध हैं। बिम्‍बों में अपनी बात कहती हैं पर उनके लिये भी कहीं दूर नहीं जाती हैं बस अपने आसपास से ही उठाती हैं। अपनी कोमल भावनाओं और रोजमर्रा के अनुभवों को अपनी कल्पनाशीलता से एक नया और मोहक रूप प्रदान कर देती हैं। उनकी बालसुलभ कल्पनाएं बहुत भाती हैं। प्रेम कविताओं में तो मानो उनकी कल्पनाशीलता को नये पंख लग जाते हैं।

रेखा की कविताएं पहाड़ी झरने की तरह हैं जो एक ओर देखने वाले को भीतर-बाहर से भिगोती हैं तो दूसरी ओर कठोर से कठोर चट्टानी भूमि को भी तोड़ केनन में बदल डालती हैं। फिर केनन पानी से लबालब भरकर हर पल तरंगायित होता रहता है। उसके छींटे आसपास फैलकर सभी को नम कर देते हैं। इन कविताओं को पढ़ने के बाद पाठक वह नहीं रह जाता है जो उससे पहले होता है। लगातार एक झरना उसके भीतर प्रवाहित होते रहता है। रेखा अपनी अद्भुत कल्पनाओं से उसे गुदगुदाते हुए एक नए लोक में ले जाती हैं जहाँ पहुँचते-पहुँचते उनके तीखे प्रश्‍न फिर उसे वास्तविक लोक में लौटा ला उससे जिरह करने लगते हैं। पाठक सोचने-विचारने को मजबूर हो जाता है और उन प्रश्‍नों के उत्तर तलाशने लगता है। तब उसे लगता है कि उसकी नजर जहाँ सब कुछ ठीक-ठाक देख रही थी वह वैसी नहीं है। चीजें बहुत गड़बड़ हैं। उनको सही करने की जरूरत है। इस तरह ये कविताएं हमें सचेत करती हैं। इन कविताओं को धैर्य से पढ़ने की आवश्यकता है।

किताब : पेड बनी स्‍त्री (कविता संग्रह)
कवियित्री : रेखा चमोली
मूल्‍य : 100 रुपये
प्रकाशक: बिनसर पब्लिकेशन कंपनी, 8 प्रथम तल 4, डिस्पेंसरी रोड देहरादून-248001

‘पेड़ बनी स्‍त्री’ से रेखा चमोली की कुछ कविताएं

नयन-माथे से लगा लूँ, उन सृष्टा अंगुलियों को चूम लूँ : पुनेठा

वरिष्‍ठ कथाकार शेखर जोशी के हाल ही में प्रकाशित पहले कविता संग्रह ‘न रोको उन्‍हें शुभा’ पर युवा कवि-आलोचक महेश चंद्र पुनेठा की समीक्षा-

शेखर जोशी मूलरूप से कहानीकार के रूप में जाने-जाते हैं पर उनके बारे में वीरेन दा का यह कहना बिल्कुल सही है कि कविता गुठली की तरह उनकी कहानी के बीचों-बीच छिपी है। कविता की यही गुठली है जो अंकुरित हो सद्य प्रकाशित कविता संग्रह ‘न रोको उन्हें शुभा’ नाम से एक कविता-वृक्ष की तरह हमारे सामने खड़ा है। इस वृक्ष में विविध रूप-रंग-गंध के कविता-पुष्प खिले हैं। इन कविताओं में जीवन और प्रकृति के अनेकानेक दृश्य-छवियाँ-छटाएँ बिखरी पड़ी हैं जो कवि के लम्‍बे जीवनानुभव की निष्‍पत्ति हैं। इन कविताओं में मजदूर और किसान चेतना के दर्शन तो होते ही हैं साथ ही एक सम्‍वेदनशील मन की भावसिक्त लहरें पाठक को भिगोती भी हैं। ये पहाड़ी नदी की तरह न होकर झील की तरह हैं जो ऊपर से देखने पर शांत-अविचलित दिखती हैं पर भीतर से हलचल से भरी हुई होती हैं जिनमें ढेरों मूँगे-शंख-सीपियाँ हैं।

पिछले दिनों युवा उपन्यासकार दयानंद पाण्डेय ने अपने रिपोर्ताज में लिखा कि शेखर जोशी किसान चेतना के नहीं, बल्कि मजदूर चेतना के कहानीकार हैं। मुझे उनका यह मूल्याँकन अधूरा लगा। शेखर जोशी के कहानी संग्रह ‘मेरा पहाड़’ में हमें ऐसी अनेक कहानियाँ मिलती हैं जिनमें पहाड़ी किसान जीवन के संघर्ष दिखाई देते हैं। उसी तरह समीक्ष्य संग्रह की कविताओं में भी। ‘धान रोपाई’, ‘प्रवासी का स्वप्न’, ‘आभार, ‘अन्नप्रसवा!’, ‘स्मृति में रहें वे’ जैसी कविताएं केवल किसान चेतना से लैस कवि ही लिख सकता है। उसे ही ‘धान की बालियों का वह पागल नर्तन’, धान की सुवास तथा उसकी विविध किस्मों की पहचान हो सकती है। वही कवि इस तरह से लोकगीत के बोलों को रेखाँकित कर सकता है- धरती माँ है/देगी, पालेगी, पोसेगी उन्हीं को/जो उसकी सेवा में जाँगर धन्य करेंगे। धान रोपाई का ऐसा सूक्ष्म चित्रण वही कर सकता है जिसने किसान जीवन को नजदीक से देखा-भोगा हो- आज हमारे खेतों में रोपाई थी धानों की/घर में/बड़ी सुबह से हलचल मची रही कामकाज की/खेतों में/हुड़के के थापों पर गीतों की बरषा बरसी/मूँगे-मोती की मालाओं से सजी/कामदारिनों ने लहँगों में फेटे मारे/आँचल से कमर कसी। जो कवि धान के लहराते खेतों के बीच खड़ा रहा हो कभी वही कह सकता है- कल ये फिर हरे-भरे झूमेंगे/मंजरित बालियाँ इठलाएँगी, नाचेंगी/सौंधी बयार मह-मह महकेगी। इन दृश्य-श्रव्य बिम्‍बों को पढ़ते हुए थोड़ी देर के लिए पाठक खुद को धान के खेतों के बीच खड़ा पाता है और उसके नासापुटों में धान की विविध किस्मों की खुशबू समा जाती है। शेखर जोशी को किसान मन की गहरी समझ है। वह उसके मन में उतरना जानते हैं। वह उस नब्ज को पहचानते हैं जिसके सहारे सीधे किसान मन में उतरा जा सकता है। उससे सम्‍वाद स्थापित किया जा सकता है। ‘अस्पताल डायरी-3 : आभार, अन्नप्रसवा!’ कविता इसका उदाहरण है। किसानों के प्रति इतना श्रद्धानवत कोई अन्य नहीं हो सकता है- नयन-माथे से लगा लूँ/उन सृष्टा अंगुलियों को चूम लूँ…..जो धरा पर सप्तगंधी अन्न-रंगों अल्पना लिखते। उनकी किसान चेतना का एक प्रमाण यह भी है कि वह अपनी कविता के लिये अधिकांश बिम्‍ब-रूपक भी किसान जीवन से ही चुनते हैं। ‘मिलःनाइट शिफ्ट’ मे ड्यूटी करते हुए थके मजदूर की तुलना वह रस की अंतिम बूँद तक चूस दिए गए ‘गन्ने की सूखी ठठरी’ से करते हैं। उन्हें गबरू जवान जगतार ‘बकरी के छौने सा खिलंदड़ा’ लगता है। अस्पताल में बीमार मास्साब से खेती-बाड़ी की बात करने पर वह उनकी आँखों में ‘रोपाई वाले खेतों की तरलता’ देखते हैं और खेती-बाड़ी की बात करते हुए अपनी हारी-बीमारी और दुःख-चिंताओं को भूल जाते हैं। क्या किसी मध्यवर्गीय बोध के कवि के साथ ऐसा संभव है?

खैर मजदूर चेतना के रचनाकार के रूप में तो शेखर जोशी पहचाने ही जाते हैं। मजदूर जीवन की त्रासदी, शोषण-उत्पीड़न और संघर्ष उनकी नजर से कभी छुपा नहीं रहा। कहानी हो या फिर कविता हर विधा में प्रमाणिक रूप में अभिव्यक्त हुआ। प्रस्तुत संग्रह में ‘मिडनाइट-शिफ्ट’ तथा ‘कारखाना-1 व 2’ इसके उदाहरण हैं। उनके अनुसार मजदूर पुर्जे का प्रतिरूप है जिसका श्रम यंत्रक्रम से चलता है। कारखाना इन पुर्जों का ताना-बाना है जहाँ वह ‘यंत्रवत-यंत्रवेग से’ चलने को विवश है।

किसान-जीवन से प्रेम करने वाला व्यक्ति प्रकृति से प्रेम किए बिना नहीं रह सकता है। शेखर जोशी प्रकृति के प्रति गहरी रागात्मकता के रचनाकार हैं। ‘पहली वर्षा के बाद’, ‘ग्रीष्मावसान’, ‘विदा की बेला’, ‘नदी किनारे’, ‘मुझे अपने में समेटे’, ‘बसंताभास’ आदि कविताओं में प्रकृति के प्रति उनकी यह रागात्मकता देखी जा सकती हैं। उनकी कविताओं में आए लाल गदृगद खिलखिलाते बुरूँश के अरुणमुखी फूल, पार्श्‍व में फैले रजत श्रृंग, उफनती भादो की वेगवती नदी, आकाश ताकते देवदार, पहाड़ी ढलान पर खड़े चीड़ों के झबरीले शावक, भूरी मटमैली चादर ओढ़े बूढ़े पहाड़, कुहरे में ढँकी घाटियाँ, चुप्प सोया ताल, पहाड़ों का गहन विस्तार, घुँघराले बालों वाले खुफिया दोस्त सी लहरदार वसंती हवा, डूबता रवि, घिरती साँझ, झमाझम बरसता पानी, फूटते सोते आदि पहाड़ी अंचल के भू-दृश्य को किसी कुशल चितेरे की तरह चित्रित कर देते हैं। वरिष्ठ साहित्यकार विश्‍वनाथ त्रिपाठी के नंगालताई गाँव से लौटने पर कवि को अपना गाँव याद हो आता है- वे ढलवाँ छतों वाले घर/सीढ़ी-दर-सीढ़ी  लहलहाती फसलें/निरंतर सम्‍वाद करती नदी/सरगोशियाँ करते चीड़ के लम्‍बे दरख्त/तेज हवा में सफेद हथेलियाँ चमकाती बाँज की टहनियाँ/वन से लौटती गोधन की डार/निकट आता वह घंटियों का मन्द्र स्वर। बड़ी बात यह है कि कवि को अपने गाँव की प्रकृति के साथ ही याद आते- वे संगी/वे साथी/वे स्वजन-परिजन/उन्हीं का दिया है यह जीवन-रस/स्मृति में रहें/रहें, वे आमरण।

कवि को वैज्ञानिक सदी पर गर्व है पर उनका यह गर्व गर्ववादियों की तरह अंधा नहीं है जिसमें गर्व करने वाले को उसकी कमियाँ नहीं दिखाई देती हैं। वह गुण-दोषों पर बराबर दृष्टि रखते हैं- धन्य हो हमारी विज्ञान सम्पन्न सदी/तूने कितना भर दिया हममें आत्मविश्वास/कितनी शक्ति/लेकिन, साथ ही बनाया कितना निरीह/ये चर्नोबिल, ये फुकोशिमा और ये अपना भोपाल।

‘अखबार की सुर्खियों में चला गया जगतार’, ‘मुजफ्फर नगर 94’, ‘उत्तराधिकार’, ‘स्वप्नगाथा’ उनकी अलग तेवर की कविताएं हैं जिनमें कवि की पक्षधरता का पता चलता है। साथ ही भारतीय लोकतंत्र के खोखलेपन को उघाड़ती हैं।

जहाँ तक इन कविताओं के भाषा-शिल्प की बात है, यह कहा जा सकता है कि चिर-परिचित जीवन प्रसंगों से जुड़ी होने के कारण तत्सम बहुल शब्दावली के बावजूद कविता की संप्रेषणीयता बाधित नहीं होती है तथा कविता की लय के चलते गद्य होने से भी बच जाती हैं। ताजे बिम्‍बों और रूपकों से भरपूर होने के कारण कुछ कविताओं को छोड़कर इनकी काव्यात्मकता में भी कमी नहीं आने पायी है। कहीं जरूर इस तरह की चूक हो गई हैं जो थोड़ा चौंकाती भी हैं। जैसे- धानों की हरी मखमल के किनारे/पीली गोट सरसों की…..धान के साथ सरसों का प्रयोग असंगत प्रतीत होता है। इसी तरह कवि का यह कहना समझ से परे है-शुभा!/अभिशप्त हैं पीढि़याँ/लिखने को कविताएं/बुनने को सपने/और अंकित करने को सतरंगी दुनिया।

कवि-कहानीकार शेखर जोशी की चिर इच्छा है- कि डूबकर पानी पीऊँ/जब तक जीना है प्रभु/मस्ती में जीऊँ। जीवटता और जिजीविषा से भरा कवि ही इस तरह की इच्छा रख सकता है। कवि की यह इच्छा अवश्य पूरी हो ताकि मस्ती से जीते हुए हिन्‍दी साहित्य को उनसे कुछ और अनमोल रचनाएं मिल सकें। जीवन के 80वें साल में आए उनके इस कविता-संग्रह का स्वागत होना ही चाहिए जिसके प्रकाशन के पीछे कवि की अपने बीते दिनों की स्मृति को दुबारा जीने की इच्छा रही। इस संग्रह को पढ़ने के बाद मेरा तो मन हो रहा है- नयन-माथे से लगा लूँ/उन सृष्टा अंगुलियों को चूम लूँ।

पुस्‍तक : न रोको उन्हें शुभा(कविता संग्रह)
कवि : शेखर जोशी
मूल्य-एक सौ पचास रुपये
प्रकाशक : साहित्य भंडार 50, चाहचंद, इलाहाबाद-211003

कलाकार का कवि या कवि का कलाकार : नित्यानंद गायेन

वरि‍ष्‍ठ चि‍त्रकार और कवि‍ कुँवर रवीन्‍द्र की कला यात्रा पर एकाग्र विजय कुमार देव द्वारा सम्‍पादि‍त पुस्‍तक ‘रवीन्द्र और रेखांकन’ के सन्‍दर्भ में युवा कवि‍ नि‍त्‍यानंद गायेन की टि‍प्‍पणी-

“किसी भी कलाकार से उसकी अवधारणा, शैली और कला–प्रक्रिया की बारीकियाँ सतही तौर पर नहीं जानी जा सकती है, उसके चेतन–अवचेतन में भीतर तक पैंठने की कोशिश करनी होती है उस तल तक जहाँ से वह उदित होता है। उन तरंगों को महसूस करना होता है जिनके संचरण से वह कलाकर्म में प्रवृत्त होता है- विजय कुमार देव, सम्पादक ‘अक्षरा’ द्वारा व्यक्त ये बातें बहुत सटीक हैं।

हमारे समय के वरिष्ठ एवं चर्चित कला सम्‍पादक, कवि–लेखक कुँवर रवीन्द्र जी पर ये सभी बातें लागू होती हैं | कुँवर जी पर सम्पादित पुस्तक ‘रवीन्द्र और रेखाँकन’ में विजय जी ने लिखा है–“वैयक्तिक रूप से रवीन्द्र को समझना बड़ी टेड़ी खीर है। अपने निजी जीवन में वह जितने अक्खड़, अस्त–व्यस्त और लापरवाह है, कला कर्म में उतने ही महीन, पारदर्शी और सम्‍वेदनशील हैं।” रवीन्द्र जी के बारे में बहुत सही लिखी हैं ये बातें।

आज हम सभी देख पा रहे हैं कि के. रवीन्द्र जी अपनी कला के साथ निरंतर प्रयोग करने वाले कलाकार हैं। एक ऐसा कलाकार जो आत्मगान और यशगान के इस स्वार्थवादी समय में भी निजप्रचार से खुद को मीलों दूर रखे हुए हैं, और यही इस कलाकार की महानता की निशानी है। एक ऐसा कलाकार जिसकी कला को आज देश के लगभग सभी चर्चित पत्र–पत्रिकाएँ छापने को आतुर हैं और पहले भी छापते रहे हैं, वह गर्व और घमंड से खुद को बचाकर रखने में सफल है | यही गुण है जो रवीन्द्र को औरों से अलग और महान बनाते हैं।

कुँवर जी अपनी सफलता का श्रेय अपने गुरु प्रताप सिंह, जो एक समय जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट, मुंबई में मानसेवी व्याख्याता रहे हैं और अपने मित्रों को देते हैं | वह कहते हैं– “मेरे मित्रों में खासियत तो रही कि मुझे मैं बनाने में या मेरी अपनी पहचान बनाने में कोई कोर–कसर नहीं छोड़ी।” (पृष्ठ 15, आत्मकथ्य)

रवीन्द्र जी क्या कहना चाहते हैं रेखाओं और रंगों के माध्यम से यह कुछ हद तक हम उनकी कुछ कवितायेँ पढ़ कर शायद जान सकते हैं। उनकी एक कविता का यह अंश देखिये–“ आजकल मैं/एक ही बिम्ब में/सब कुछ देखता हूँ/एक ही बिम्ब में ऊँट और पहाड़ को/समुद्र और तालाब को/मगर आदमी/मेरे बिम्बों से बाहर छिटक जाता है/पता नहीं क्यों/आदमी बिम्ब में समा नही पाता है ?”

इन पंक्तियों से इस महान कलाकार के भीतर मनुष्य के प्रति जो बेचैनी है उसे देख सकते हैं। वहीं एक और कविता में वह लिखते हैं –

“इस शहर में
एक घर, जहाँ
मैं ठहर गया हूँ
रहस्य में लिपटा सा
फिर भी पहचाना सा
और घर में एक छज्जा,
छज्जे पर मैं
सामने एक घर, दो घर, ढेर सारे घर
घर, घर
घर पर घर
पतझड़ में बिखरे पत्तों की तरह”

इस कविता में ‘शहर’ का चित्र उकेर रहे हैं, वहीं एक दूसरी कविता में वह प्रतीकों का चित्र प्रस्तुत करते हैं–

“कितने खूबसूरत लगते हैं हम
एक कलेंडर की तरह
जड़े हुए दीवार से
या फिर कुत्ते की तरह
अपनी दुम खुजलाने के प्रयास में
गोल–गोल
बस एक ही दायरे में घूमते हुए”।

इन रचनाओं से गुजरने के बाद यह तय करना कठिन हो जाता कि रवीन्द्र जी उच्च दर्जे के चित्रकार हैं या कवि ?

इस सन्दर्भ में विनय उपाध्याय ने सही लिखा है– दरअसल अपनी रचना में रवीन्द्र भारतीय जीवन मूल्यों की पुरजोर वकालत करते हैं। वे षड्यंत्रों पर, आक्रमणों पर अभिव्यक्ति भर प्रहार करते हैं। उन प्रवित्तियों पर उनकी रेखाओं का वलय साक्षात होता है जिनके वर्चस्व में ईमानदारी हाशिये पर चला गया है। अपने जीते–जी बदल गई दुनिया के सच को रवीन्द्र के चित्र और कविता बखूबी बयान करते हैं। (रवीन्द्र और रेखांकन, पृष्ठ-48)

पुस्तक : रवीन्द्र और रेखांकन
सम्‍पादक : विजय कुमार देव
प्रकाशक : पड़ाव प्रकाशन
46 एल.आई.जी. नेहरू नगर, भोपाल-462003
मूल्य : 25 रुपये

दफ़्तर के बाहर बनाम बाज़ार में बहार : डॉ. घनश्याम शर्मा

वरि‍ष्‍ठ आलोचक डॉ. घनश्याम शर्मा द्वारा युवा लेखक और आलोचक आनंद पाटील की पुस्‍तक ‘हिन्दी : विविध आयाम’ की समीक्षा-

आनंद पाटील की पहली पुस्तक ‘संस्कृति बनाम अपसंस्कृतीकरण’ सन् 2010 में प्रकाशित हुई। इसकी भूमिका में आनंद जब यह लिख रहे थे, ‘यह बाज़ारवाद भक्तिकालीन ‘मायावाद’ से कुछ ज़्यादा भिन्न है। हाँ, वहाँ नारी को माया माना गया जो कि अनुचित था और है। लेकिन तत्कालीन ‘मायावाद’ में ‘सम्पत्ति असबाब’ भी तो उल्लिखित है। आज यही सम्पत्ति और असबाब ‘उपभोक्तावादी मायावाद’ की पैरवी करते हैं। यह मसला मात्र ‘मानवीयता’ का नहीं, बल्कि भाषा, सभ्यता, संस्कृति और समाज के तमाम अंगों और उपांगों का है– जो आज मरणांतक स्थिति से गुज़र रहे हैं।’ शायद तभी से ‘हिन्दी : विविध आयाम’ (2012) की भूमिका ‘पूर्वोक्ति– बदलाहट की बयार और भाषाई अस्मिता’ की कुछ-कुछ रूपरेखा बनना प्रारम्भ हो गयी होगी।

चूँकि आनंद पाटील पहले नागालैण्ड विश्‍वविद्यालय (लुमामी) और फिर तमिलनाडु केन्द्रीय विश्‍वविद्यालय (तिरुवारूर) में हिन्दी अधिकारी के पद पर नियुक्त होने से पूर्व कुछ महाविद्यालयों में भाषा-साहित्य के अध्ययन-अध्यापन के अतिरिक्त ‘ई-टीवी’ में आलेखक एवं कार्यक्रम सहायक, ‘डेली हिन्दी मिलाप’ और ‘स्वतंत्र वार्ता’ दैनिक समाचार पत्रों में अनुवादक-सह-उप-संपादक, ‘मीडिया मर्चेन्ट्स’ में सहयोगी जनसंपर्क अधिकारी, ग़ैर-सरकारी संगठन ‘कॉज़ एन इफैक्ट’ के वृत्तचित्रों के लिये अनुवाद समन्वयक और ‘गूगल इंडिया’ (बंगलुरु) के लिए हिन्दी भाषाविद् समीक्षक के रूप में कार्य किया था। इसलिये निश्‍चि‍त ही समय-समय पर हिन्दी भाषा के अतीत, वर्तमान और भविष्य से जुड़े कई सवाल एवं संदेह उनके मन-मस्तिष्क में उठते रहे होंगे। भाषा एवं राष्ट्र के प्रति जागरूक प्रत्येक व्यक्ति यह जानता है कि ‘भाषा अस्तित्व है।’ किन्तु अक़्सर तथाकथित साहित्य एवं भाषा चिंतक यह भूल जाते हैं कि अपना अस्तित्व अपनी ही भाषा से और अपनी ही भाषा में स्थापित एवं मूल्यांकित होता है। इसी दृष्टि से मुक्तिबोध ने भाषा को एक जीवन परम्‍परा और सामाजिक निधि (‘एक साहित्यिक की डायरी’, पृ. 25-26) कहा है।

भूमण्डलीकरण, उपभोक्तावाद, बाज़ारीकरण और सूचना प्रौद्योगिकी के विश्‍वव्यापी वेब (विषैला, विध्वंसक वातावरण) में लगभग समुचा देश ऐसा उलझा कि पाश्‍चात्य जीवन-शैली में जीने वालों को ही ‘सभ्य नागरिक’ माना जाने लगा। ऐसे में भारतीय संस्कृति, सभ्यता, परम्‍परा, दर्शन एवं भाषा इत्यादि को इन्हीं तथाकथित सभ्य नागरिकों द्वारा या तो ‘आउटडेटेड’ कहकर नज़रंदाज़ कर दिया जाता है या फिर ‘इनसे’ जुड़े और प्रतिबद्ध लोगों को ‘गँवार’ (गाँव में रहने वाले, जो तथाकथित सभ्य समाज की दृष्टि में पिछड़े) मानकर हीन दृष्टि से देखा जाता है। ऐसे में अपने और भाषा के अतीत को देखने, वर्तमान को समझने और भविष्य को लिखने के लिए हिन्दी (‘हिन्दी हैं हम, वतन है – हिन्दोस्ताँ’ के अर्थ में) की स्मृतियों, वास्तविकताओं और आकांक्षाओं को पूरी शिद्दत के साथ खंगालने की सख़्त आवश्यकता है।

‘हिन्दी : विविध आयाम’ की बारह पृष्ठों की भूमिका ‘पूर्वोक्ति– बदलाहट की बयार और भाषाई अस्मिता’ में हिन्दी की स्थिति एवं गति (दशा एवं दिशा) को रेखांकित करती हुई आनंद पाटील की हिन्दी भाषा को लेकर उनकी गहरी आशा, चिंता और आकांक्षा पूरी संवेदना के साथ अभिव्यक्त हुई है। हिन्दी भाषा की ‘पूछ और पहुँच’ जो अंग्रेज़ी पूँछ से ढकी और लपटी हुई ही नहीं अपितु जकड़ी हुई भी है, का विस्तार जानने और समझने के लिए कई वरिष्ठ विद्वानों की चिंता और चिंतन के साथ-साथ कुछेक नवोदित प्रतिभाओं के विचार भी पुस्तक में संकलित एवं प्रस्तुत किये गये हैं, जो हिन्दी भाषा के अस्तित्व से जुड़े सवालों, संदेहों और संभावनाओं से गुज़रते हुये उसके अस्तित्व पर लगातार जमती हुई धूल को रोकने, झड़काने और पुनः सँवारने की अनिवार्यता को रेखांकित करते हैं।

संकलित पुस्तक में भूमिका के बाद मुक्तिबोध की प्रसिद्ध कविता ‘अंधेरे में’ की कुछ काव्य-पंक्तियाँ उद्धृत की गयी हैं। काव्यांश की अंतिम पंक्ति ‘मर गया देश अरे, जीवित रह गये तुम’ पर ग़ौर फरमाएँ तो यह कहना अत्युक्तिपूर्ण न होगा कि निश्‍चि‍त ही भाषा के दृष्टिकोण से यह देश लगभग मर ही गया है। गणेशशंकर विद्यार्थी ने कहा था– “मुझे देश की आज़ादी और भाषा की आज़ादी में किसी एक को चुनना पड़े, तो मैं निस्संकोच भाषा की आज़ादी चुनूँगा, क्योंकि मैं फायदे में रहूँगा। देश की आज़ादी के बावजूद भाषा की गुलामी रह सकती है, लेकिन अगर भाषा आज़ाद हुई तो देश ग़ुलाम नहीं रह सकता।” अंग्रेज़ चले गये लेकिन अंग्रेज़ी नहीं। विचारों की ग़ुलामी सबसे बड़ी ग़ुलामी होती है। आज हमने तथाकथित ‘सभ्य’ होने के अति उत्साह में ‘स्व’ की चेतना गँवाकर ‘ऑनलाइन’ ग़ुलामी सहर्ष स्वीकार कर ली है।

समीक्ष्य पुस्तक में कुल 45 आलेख हैं। इनके अतिरिक्त कवि शम्भु बादल और घनश्याम की कुछ कविताएँ भी शायद हिन्दी भाषा के एक आयाम के रूप में संकलित की गयी हैं।

आरम्भ सकारात्मक हो तो ‘अंत भला’ होने की अधिक संभावना रहती है। इसी कारण आनंद की संपादन कुशलता ने सुरेश पंडित के लेख ‘समय में असरदार हस्तक्षेप करता हिन्दी लेखन’ को सबसे पहले रखा है। इस लेख की अंतिम पंक्तियों को इसके सार और हिन्दी भाषा के सकारात्मक आयाम के रूप में देख सकते हैं। सुरेश पंडित ने लिखा है– ‘हिन्दी लेखन समाज के सच को लगातार सामने लाने के लिए व्यग्र है, बल्कि कुछ क्षेत्रों में तो इतना ज़ोरदार काम हुआ है कि उनकी प्रशंसा किये बिना नहीं रहा जा सकता।’

प्रोफेसर सुवास कुमार ने अपने लेख ‘उच्च अध्ययन (पाठ्यक्रम) में हिन्दी साहित्य’ में ‘उच्चतर पाठ्यक्रमों के स्वरूप में बदलाव के लिये बहस की अच्छी गुंजाइश है’ कहते हैं। रोज़गार की दृष्टि से हिन्दी साहित्य का पाठ्यक्रम जीवन की वास्तविकताओं से कटा हुआ मानने वालों को वे यह कहना चाहते हैं– ‘चाहे मनुष्य का जीवन कितना ही परिवर्तित क्यों न होता जाये, साहित्य और कला मनुष्य के जीवन से कट नहीं सकते– सदा ही उनकी ज़रूरत बनी रहेगी क्योंकि इनका संबंध मनुष्यता के सारतत्व से है।’ प्रो. सुवास कुमार जैसे विचार कई वरिष्ठ हिन्दी प्राध्यापकों और आचार्यों के भी हैं, जिन सबका लगभग यह मानना है कि डॉक्टरी और इंजीनियरी जैसे कई विशुद्ध उपयोगितावादी विषय भी सबको रोज़गार की गारंटी नहीं दे सकते। प्रोफेसर सुवास कुमार के लेख में उनकी चिंता एवं चिंतन साहित्य एवं कला के अध्ययन की आवश्यकता पर अधिक है न कि भाषा पर। और किसी भी भाषा के प्रति जुड़ाव-लगाव की भावना न हो तो उस भाषा के साहित्य से प्रेम नहीं हो सकता। और बिना प्रेम (जूनून की हद तक) का कर्म पीड़ाजनक ही होता है। यही कारण है कि प्राचीन विद्वान और चिंतकों ने ‘उपयोगी ही सुंदर’ (प्लेटो) माना और कहा है। और अति भावुकता में हम सब अक़्सर यह भूल जाते हैं कि ‘भूखे भजन न होई गोपाला।’ और यह भी एक सच्चाई है कि मुझ जैसे ‘कई भाषा और साहित्य प्रेमियों की संतानें’ भाषा और साहित्य को छोड़ किसी अन्य ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्रों में पढ़ती हैं और बहुतेरे कार्यरत भी हैं। इसके अतिरिक्त एक और सच्चाई यह भी है कि भाषा-साहित्य की सेवा-सृजन, भाषा-साहित्य के वेतनभोगी व्यक्तियों से ज़्यादा औरों ने की और कर रहे हैं। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य और कटु सत्य यह है कि आज ‘रोज़गार’ का उपाधियों से उतना संबंध नहीं रहा, जितना आवेदक की ‘अन्य अर्हताओं’ से है। यह बात प्रो. सुवास कुमार ही नहीं अपितु हम सब जानते हैं और विशेषकर वे सब ज़्यादा अच्छी तरह जानते हैं, जो विश्वविद्यालयों से जुड़े हुए हैं या जुड़ना चाहते हैं। ख़ैर, यहाँ मुझे अनायास ही अपनी निरक्षर किंतु शिक्षित माँ की एक बात याद हो आयी, जो कहा करती थी कि ‘बूढ़ा आदमी अक़्सर धार्मिक हो जाता है।’

प्रो. राजेन्द्र कुमार ने अपने लेख ‘हिन्दी : विविध रूप, विविध समस्याएँ’ में ‘हिन्दी दिवस’ पर व्यंग्य करते हुए लिखा है– “अपना देश शायद दुनिया का अकेला देश है, जहाँ भाषा के नाम पर भी ‘दिवस’ मनाए जाते हैं… सच तो यह है कि हिन्दी के नाम पर होने वाले वार्षिक कर्मकांड हिन्दी के प्रति सम्मान-भाव जगाने के काम कम आते हैं, हिन्दी को मज़ाक का विषय बनाने के ज़्यादा।… हिन्दी तो हमारे यहाँ किसी गाँव की उस स्त्री की तरह है, जिसे ‘भौजी’ कहकर उससे मज़ाक करने का अधिकार कोई भी सहजतया पा जाता है।” आगे वह अंग्रेज़ी और हिन्दी के द्वंद्व की सच्चाई बतलाते हुए लिखते हैं– “अंग्रेज़ी का आत्यंतिक विरोध कई बार हिन्दी-प्रेम कम, अंग्रेज़ी में अपनी गति की सीमाओं को छिपाने का उपक्रम ज़्यादा होता है… पर आज तो संकट यह है कि हमारे बहुत-से हिन्दी प्रेमियों को कायदे से न अंग्रेज़ी आती है, न हिन्दी। तर्क कुछ यह ध्वनित होता है कि अंग्रेज़ी क्या सीखना, वह तो पराई भाषा है, हिन्दी भी क्या सीखना वह तो है ही अपनी भाषा।” हिन्दी के व्यापक प्रचार-प्रसार और प्रयोगधर्मी बनने-बनाने के संदर्भ में वे लेख के अंत में लिखते हैं– “हिन्दी को केवल साहित्य प्रधान भाषा ही नहीं बने रहने देना है, बल्कि विभिन्न ज्ञानात्मक अनुशासनों का माध्यम बनकर वह सामने आये, इस दिशा में हमें सार्थक प्रयास करने हैं।”

जी. पी. मिश्र का लेख ‘औपनिवेशिक शिकंज़े में सिसकती हिन्दी’ कुछ तेज़, तिक्‍त और तिखे तेवर लिये हुये अभिव्यक्त हुआ है। यह निश्‍चि‍त ही उनकी अपनी और मौलिक संवेदनात्मक तड़प भी है। इस लेख में उन्‍होंने प्रेमचंद (‘सोजे वतन’), रामप्रसाद बिस्मिल, भगत सिंह जैसे भाषा प्रेमि‍यों और देशभक्तों का ज़िक्र किया है। वह लिखते हैं– “जब किसी दुश्मन से बैर निभाना हो, तो कुछ और करने की बजाय उसकी अगली पीढ़ी के बच्चों को अपसंस्कृति और अविवेक के गड्डे में झौंक दें। दुश्मन अपने अंदरूनी अंतर्विरोधों से खुद पिट जायेगा।” यहाँ आगे उन्होंने लार्ड मैकाले को भी उद्धृत किया है, जिससे हम सब परिचित हैं। मिश्र जी के भावात्मक अंगारे की अभिव्यक्ति बकौल डॉ. कृष्णदत्त पालीवाल के माध्यम से इस प्रकार अभिव्यक्त हुई है– “यदि हमें बचना है, अपनी भाषा व मनुष्यता को विनाश से बचाना है, तो व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन के लिये जटिल संग्राम में उतरना होगा। केवल बहसों से काम नहीं चलेगा। देश को एक क्रांति की ज़रूरत है, जो हिंसक भी हो सकती है।” एक अन्य स्थान पर वह हिन्दी साहित्य जगत के परिवेश में व्याप्त गुटबाजी और विषाक्त वातावरण के विषय में सटीक लिखते हैं– “विभिन्न संस्थानों के शीर्ष पर बैठे मठाधीशों ने हिन्दी के साहित्यिक मैदान को एक अखाड़ा बना दिया है… वैचारिक मठों और गढ़ों से रूपवाद, संरचनावाद, अभिव्यक्तिवाद और अब ‘लेखक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता’ जैसे ऊपर से अत्यंत आकर्षक लगने वाले नारे की लगातार वक़ालत की जा रही है। इसका उद्देश्य लेखक को सामाजिक, राजनीतिक, विचारधारात्मक प्रतिबद्धता से दूर करना है।” निश्‍चि‍त ही यह लेख ‘वह तोड़ता पत्थर’ है।

डॉ. आत्माराम ने अपने लेख ‘हिन्दी का बाज़ार और बाज़ार की हिन्दी’ में व्यावसायिक दृष्टि से संपन्न होती हुई हिन्दी की चर्चा की है। वह लिखते हैं– “भारत में विज्ञापन का बाज़ार हिन्दीमय हो रहा है, हिन्दी के विज्ञापनों से सजे होर्डिंग अब चेन्नै एवं कोच्ची जैसे सुदूर दक्षिण के शहरों में भी नज़र आ रहे हैं। इंटरनेट पर भी हिन्दी का विस्तार हो रहा है।” किंतु साथ ही साथ उनकी यह चिंता भी व्यक्त हुई है– “हिन्दी का बाज़ार भी बहुत बड़ा है, परंतु बाज़ार की हिन्दी का स्वरूप दिन-ब-दिन अंग्रेज़ीमय होता जा रहा है।” बाज़ार के विशेषज्ञ ही नहीं अपितु आम आदमी भी ‘बाज़ार के समीकरण’ और ‘समीकरणों का बाज़ार’ बहुत हद तक जानता है। बाज़ार के बाज़ीगरों ने वस्तुओं और सेवाओं को ही नहीं अपितु कला, साहित्य और भाषा के माध्यम से सभ्यता, संस्कृति, परम्‍परा, दर्शन और आस्था तक को बेचने-ख़रीदने के क्रम में इन सबको वस्तु में तब्दील करके रख दिया है।

समूची मानव सभ्यता प्राचीन काल से अब तक यह कहती आयी है– कभी काव्योक्‍ति के रूप में– ‘न मानुषात श्रेष्ठतम् हि किञ्चित’ (वेद व्यास), ‘सबार उपरे मानुषेर सत्तो तबार उपरे नाई’ (चण्डीदास) और कभी दार्शनिक सत्य का प्रतिपादन करने के लिए– ‘मनुष्य सारी वस्तुओं का माप है’ (प्रोटेगोरस)। किंतु आज यह सर्वसिद्ध हो चुका है कि बाज़ार से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं, बाज़ार से ऊपर कोई नहीं और बाज़ार सारी वस्तुओं का माप है।

इसी तथ्य और सत्य को डॉ. राजीव कुमार रावत ने अपने लेख ‘वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मक युग में हिन्दी की प्रासंगिकता’ में बहुत स्पष्ट लिखा है– “हिन्दी को वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मक युग में कम्प्यूटर, विज्ञान, चिकित्सा आदि क्षेत्रों की ओर से कोई चुनौती नहीं है। विश्‍व बाज़ार की मजबूरी है हिन्दी। अमरिका, रूस, चीन आदि बड़े-बड़े देशों के बाज़ार भारत में आने को उत्सुक हैं और हिन्दी के महत्व को समझकर अपना रहे हैं।”

राजभाषा और उसके क्रियान्वयन के संदर्भ में हिन्दी सरकारी कार्यालयों में ‘धर्म की भाषा’ के रूप में संविधान की धाराओं के तहत धार्मिक कर्म करती नज़र आ रही है। यहाँ राष्ट्रभाषा और राजभाषा हिन्दी की स्थिति एवं गति पर विष्णु नागर का यह कटाक्ष दृष्टव्य है– “मैं हिन्दी जगत के तमाम धुरंधरों से शत-प्रतिशत सहमत हूँ कि आज़ादी के पिछले साठ सालों में हिन्दी ने वाकई उल्लेखनीय प्रगति की है। इतनी ज़्याद प्रगति की है कि वह राष्ट्रभाषा से राजभाषा बनकर रह गई है और अब हिंग्रेज़ी के नये अवतार में जनता के सामने पेश है। इसलिए उसे अब देश से निकालकर संयुक्त राष्ट्र में प्रतिष्ठित करने की तैयारी हो रही है।” (आउटलुक, स्वाधीनता विशेषांक, 20 अगस्त, 2007)

गौरीनाथ ने अपने लेख ‘जन-समाज बचे तभी तो भाषा बचेगी’ में गाँधीजी की ही तरह मातृभाषाओं के महत्व की वक़ालत करते हुए लिखा है- “राष्ट्रभाषा हिन्दी के लिए जो हमारी चिंताएँ हैं, वैसी चिंताएँ मातृभाषा के लिये क्यों नहीं है? जब मातृभाषा ही नहीं बचेगी, तो हम राष्ट्रभाषा का सम्मान करने के लायक रहेंगे क्या?… मेरे ख़याल से हिन्दी के प्रति हमारी जो यह दृष्टि है, यह सही नहीं है! हम जब तक मातृभाषा और उस भाषा-भाषी जन और समाज के हित में नहीं सोचेंगे, तब तक हम सही अर्थ में हिन्दी के हित में भी नहीं सोच सकते।” उनकी यह चिंता जायज़ है, क्योंकि हिन्दी के नाम पर प्रतिवर्ष लाखों-करोड़ों रुपये लुटाए जा रहे हैं और उसी की चिंता में दिन-रात दुबले हुए जा रहे हैं।

समीक्ष्य पुस्तक के विषय में वरिष्ठ कवि, आलोचक, चिंतक विश्‍वनाथ प्रसाद तिवारी के विचार पिछले फ्लैप (ज़िल्द) पर प्रकाशित हुए हैं। उन्होंने लिखा है– “सृष्टि में हर मनुष्य किसी न किसी भाषा में जन्म लेता है। उसी मातृभाषा में वह एक परम्‍परा और संस्कृति भी प्राप्त करता है, क्योंकि कोई भी परम्‍परा और संस्कृति भाषा में ही सुरक्षित होती है।… भाषा मनुष्य की सबसे मूल्यवान सम्‍पदा है। भारत जैसे बहुभाषी, बहुसंस्कृतियों वाले देश की सभी मातृभाषाएँ मूल्यवान है।… यह विडम्‍बना ही है कि अंग्रेज़ी सारी मातृभाषाओं की छाती पर चढ़ी हुई है।” उन्होंने समीक्ष्य पुस्तक को प्रमाणित करते हुए लिखा है- “एक तटस्थ और संवेदनशील दृष्टि से हिन्दी भाषा की अपरिहार्य स्वीकृति के लिये यह पुस्तक पठनीय और विचारणीय है।”

ब़हरहाल, समीक्ष्य पुस्तक में भूमिका, अनुक्रम, कविताएँ और लेखक सम्‍पर्क छोड़ कुल 341 पृष्ठों में देश के कुछ राज्यों में हिन्दी भाषा और साहित्य के विभिन्न रूप-स्वरूप और आयामों से संबंधित कुल 45 लेख संकलित हैं, जो ‘आधा खाली’ अथवा ‘आधा भरा गिलास’ वाले दृष्टिकोण से अभिव्यक्‍त हुये हैं। किंतु एक दृष्टि ऐसी भी तो हो सकती है, जो गिलास (विषय– हिन्दी : विविध आयाम) की ऊँचाई, चौड़ाई और गहराई को देख और दिखा सके, तो दूसरी ऐसी कि ‘आधा खाली’ (आयाम विशेष लेख) की अच्छाइयाँ (विशेषताएँ/महत्व) और ‘आधा भरा’ (लेख) की कमियाँ (सीमाएँ/समस्याएँ) समझ-समझा सके। ‘आधा खाली’ और ‘आधा भरा’ एक समग्र वाद-विवाद की माँग रखता है, जिसका निश्‍चि‍त पहला, सर्वसम्मत और निष्पक्ष निष्कर्ष यह निकलता ही है कि ‘गिलास’ (विषय) महत्वपूर्ण है। ग़ौरतलब है कि गिलास पारदर्शी अथवा अपारदर्शी भी हो सकता है। शेष सम्‍वाद के लिये आनंद पाटील की यह पुस्तक शोध के नये द्वार ही नहीं खोलती अपितु ऐसे किसी भी शोध के लिये मील का पत्थर सिद्ध हो सकती है। शेष शमशेर के शब्दों में– ‘बात बोलेगी, भेद खोलेगी, बात ही’!

समीक्ष्य पुस्तक
‘हिन्दी : विविध आयाम’ (2012)
सं. आनंद पाटील
तक्षशिला प्रकाशन, नई दिल्ली
मूल्य : 600 रुपये

कविता और जीवन के रिश्ते का गान : सुधीर सुमन

बिहार की चर्चित सांस्कृतिक संस्था ‘हिरावल’ द्वारा बनाई गई  ऑडियो सीडी ‘जाग मछंदर’ पर लेखक-पत्रकार सुधीर सुमन का समीक्षात्‍मक आलेख-

आज हिन्‍दी में इसका बहुत रोना रोया जाता है कि कविताओं के पाठक या श्रोता कम हो गये हैं। कवि-सम्मेलनों और मुशायरों के आयोजन कम हो गये हैं, जो मंच हैं भी, उन पर चुटकुलेबाजों या अराजनीतिक व प्रतिक्रियावादी किस्म के लोगों का कब्जा है। सुनने की क्रिया भी सृजनात्मकता से परे नहीं होती, पर बाजार ने व्यक्ति को एक ऐसे मशीन में तब्दील करने की कोशिश की है, जो सिर्फ अपनी तात्कालिक भावोत्तेजना या क्षणिक सुकून के लिए कलाओं का उपभोग करना चाहता है। इसी प्रक्रिया में गम्‍भीर वैचारिक कविताओं के बारे में कुछ इस तरह की राय बनाने की कोशिश की जाती है, मानो लोगों तक उनका न पहुँच पाना उनकी कोई  बुनियादी कमजोरी हो। हालाँकि कई बार ऐसा भी लगता है कि कुछ कवियों ने कविता के न गाये जाने को ही श्रेष्ठ कविता का पैमाना बना दिया है। उन्हें शायद अपनी श्रेष्ठ कविता के आम हो जाने की कोई जरूरत भी महसूस नहीं होती। लेकिन जो कविताएं जनता के लिए लिखी बताई जाती हैं, उन्हें जनता तक पहुँचाने की जद्दोजहद से कोई जेनुइन कवि कैसे अलग रह सकता है? दरअसल मामला सिर्फ मुक्तछंद की कविता को लोगों तक पहुँचाने का ही नहीं है, बल्कि जो अच्छे गीत हैं और जो जनभाषाओं में रचे गए हैं, उन्हें भी जनता तक ले जाने की कोशिशें  कम हैं। नतीजतन बॉलीवुड के फिल्मी गीतों और जनभाषाओं में उनके ही भद्दे, अश्‍लील, स्त्रीविरोधी संस्करण सुनने को लोग विवश होते हैं।

भोजपुरी भाषी होने के कारण भोजपुरी की जो दशा बाजार ने की है, उसे देखकर मुझे बेहद कोफ्त होती रहती है। भोजपुरी गीत-संगीत बाजार में तो जैसे इसकी होड़ लगी हुई है कि कौन कितना अश्‍लील, विकृत-कामुक रचना लिख सकता है। ऐसे में कथाकार सुभाषचंद्र कुशवाहा द्वारा ‘लोकरंग’ आयोजन में जाना बहुत सुकून प्रदान करता रहा है। हालाँकि वहाँ अभी संरक्षण पर ही ज्यादा जोर है, जनभाषाओं में नई रचनाशीलता के उदाहरण कम सामने आए हैं। लेकिन जिस तरह हर साल होने वाले इस आयोजन में अवधी-भोजपुरी के महान लोकगीतकारों की रचनाओं से लोगों का परिचय कराया गया है, वह भी अगर नये रचनाकारों को प्रेरणा दे, तो यह कम उपलब्धि नहीं होगी। जोगिया जनूबीपट्टी-कुशीनगर में आयोजित होने वाले इस आयोजन में तीन साल पहले जब मैं गोरखपुर से चला, तो बस में एक कैसेट बज रहा था- चांद मारे किरनिया के बान करेजवा में तानि तानि के। बचपन में इस गीत को सुना था और अब भी उसका जादू बदस्तूर था। दिल्ली आने पर अपनी परम्‍परा में गहरी रुचि रखने वाले साथी धर्मेंद्र सुशांत ने बताया कि यह छपरा के मशहूर गीतकार अशांत जी का गीत है और कि उनके कई गीत बेहद मशहूर रहे थे। उस कैसेट में कई ऐसे भी गीत थे, जिनमें बदलता हुआ जमाना अभिव्यक्त हो रहा था। मसलन, खेल के पिरितिया के खेल/दिमाग हमार फेल कइलू चिरई। लेकिन सिर्फ पुरुष के नजरिये से रचे गए गीत ही नहीं थे, बल्कि उसी कैसेट में एक गीत था, जिसमें नशेड़ी पति की जमकर खबर ली गई थी। बाद में मैं पता करता रहा, पर उसे बनाने वाली कम्‍पनी का नाम मालूम नहीं हो सका। असल में लय या संगीत के साथ पेश करने से कविता की हेठी नहीं होती, बल्कि उसकी ताकत बढ़ती है। एक बार गाने का मूड आया तो मैंने कुमार मुकुल की कई कविताओं को गाया, उनमें भोजपुरी का एक गीत भी था। उस गीत और कविताओं के गायन को मित्रों ने काफी सराहा।

‘मधुशाला’ जैसी रचनाओं को तो कई लोगों ने गाया है। गायक मन्ना डे के खाते में ऐसे कई लोकप्रिय गीत हैं। ऐसी रचनाओं को गैरफिल्मी कहा जाता था। लेकिन हिन्‍दी की कविताओं के गायन के कैसेट कम ही मिलते हैं। आज से 13-14 साल पहले मुझे मेरे एक मित्र ने एक ऑडियो कैसेट दिया था, जिसमें अजय राय की आवाज में निराला और प्रसाद समेत कई हिन्‍दी के बड़े कवियों की रचनाओं को गाया गया था। हालाँकि उसमें में भी गीत ही थे।

अभी मुझे बिहार की चर्चित सांस्कृतिक संस्था ‘हिरावल’ द्वारा बनाई गई एक ऑडियो सीडी सुनने का मौका मिला। गोरख पांडेय, विजेंद्र अनिल, रमाकांत द्विवेदी रमता, महेश्‍वर, रामकुमार कृषक, अदम गोंडवी सरीखे सारे महत्वपूर्ण जनगीतकारों की रचनाओं के गायन के लिये हिरावल जानी जाती रही है। हाल के  वर्षों में हिरावल के कलाकारों ने कई ऐसी रचनाओं को संगीतबद्ध करके पेश किया है, जिसने इस धारणा को गलत साबित किया है कि आम लोगों को वैचारिक कविताएं पसंद नहीं आतीं या उसे वे सुनना नहीं चाहते। इन कविताओं का संगीत किसी पापुलर धुन की पैरोडी नहीं है, जिसके अनगिन उदाहरण भक्तिगीतों का नशीला संगीत बाजार रोजाना जबरन हमारे कानों में ठूँसता है। संगीत यहाँ  रचनाओं में व्यक्त परिवर्तनकामी भावों और वैचारिक आशयों का बेहतरीन सहचर लगता है। हिरावल की ओर से ऐसी आठ रचनाओं की एक ऑडियो सीडी बनाई गई हैं, जिनमें से कई विभिन्न आयोजनों में गाई जा चुकी हैं और बेहद मकबूल हैं।

फैज, मुक्तिबोध, शमशेर बहादुर सिंह, जयशंकर प्रसाद, नागार्जुन, निराला, वीरेन डंगवाल और दिनेश कुमार शुक्ल की रचनाओं पर आधारित ऑडियो सीडी ‘जाग मछंदर’ का परिचय देते हुए कहा गया है कि यह उन सबके लिए है जिन्होंने इंसानी जिंदगी को बेमतलब और बेसबब बना देने वाली स्थितियों और ताकतों से दो-दो हाथ करने का हौसला बचाए रखा है। रचनाओं का चुनाव बेहद महत्वपूर्ण है और हर रचना को उसके कथ्य के अनुरूप संगीतबद्ध करने और उसी के अनुरूप गाने की कोशिश की गई है। फैज, नागार्जुन, शमशेर जिनकी अभी जन्मशताब्दी गुजरी है, उन्हें एक तरह से इसके जरिए एक संगीतमय श्रद्धांजलि भी दी गई है।

फैज की नज्म ‘इंतेसाब’ को और लोगों ने भी गाया है, पर ‘आज के नाम और आज के गम के नाम’ को सुनते हुए पुरानी धुन की याद नहीं आती, खासकर नज्म के दूसरे हिस्से में हमारे दौर के गमों का बयान बड़े मार्मिक अंदाज में हुआ है। इस ऑडियो कैसेट के लोकार्पण के मौके पर बिल्कुल पहली बार हिरावल के कलाकारों की आवाज में इसे सुनते हुए एक नौजवान कवि की प्रतिक्रिया थी, कि गमों की दास्तान को सुनते-सुनते उसकी आँखे नम हो आईं। मुक्तिबोध को आमतौर पर जटिल भाव-संवेदन का कवि माना जाता है। बिहार में एक राजनीतिक कार्यकर्ता कभी इसी बात पर बहस कर बैठे थे कि दिनकर और मुक्तिबोध में दिनकर की कविताएं जनता को ज्यादा समझ में आती हैं। जाहिर है मुक्तिबोध की कविताओं में मौजूद लय और उसकी ताकत से वे अनभिज्ञ थे। हिरावल के कलाकारों ने मुक्तिबोध की बहुचर्चित कविता ‘अंधेरे में’ का एक अंश चुनकर गाया और आज इस अंश को सुनाए जाने की श्रोताओं की ओर से बहुत मांग होती है। ये पंक्तियां ‘ओ मेरे आदर्शवादी मन/ओ मेरे सिद्धांतवादी मन/अब तक क्या किया/जीवन क्या जीया…’ आज के दौर में कायम नाउम्मीदी, निष्क्रियता और यथास्थिति से बड़े कारगर तरीके से टकराती हैं। इस कविता में जो उतार-चढ़ाव है और जो छटपटाहट है, इसे संगीत में बखूबी बांधा गया है। जब यह पंक्ति वेग के साथ कानों से गुजरती है कि बताओ तो किस-किसके लिए तुम दौड़ गये, तो जाने कितने स्तर पर आत्मालोचन के भाव पैदा होते हैं। शमशेर के सौंदर्यबोध के इजहार में ये कलाकार पूरी तरह कामयाब रहे हैं। उनकी कविता ‘ य’ शाम है’ में दमन झेलने वाले गरीब मजूरों और उनके प्रति संवेदित कवि दोनों के हृदय का हाहाकार सामूहिक गायन और संगीत के जरिए बखूबी अभिव्यक्त हुआ है।

जयशंकर प्रसाद के गीत ‘तुमुल कोलाहल कलह में मैं हृदय की बात रे मन’ को आशा भोसले ने भी गाया है, संगीत और उनका गायन बेहद परिष्कृत है, पर हिरावल के इस ऑडियो सीडी में हृदय की उस बात को कहने पर ज्यादा जोर है, उसकी जो विकलता है, वह सुनने वाले के मर्मस्थल में तीक्ष्णता से उतरती है। बाबा नागार्जुन के एक छोटे से गीत का चुनाव लाजवाब है और कहा जाए तो इस कैसेट की उपलब्धि है। भादों की अंधेरी रात है और उसमें चमकते जुगनू हैं, जो जान भर रहे हैं जंगल में, लगता है उजाले और अंधेरे के बीच कोई जंग है। कवि की समझदारी है कि यही जीतेंगे शक्ति प्रदर्शन के दंगल में। कवि का आग्रह है- इन्हें तुम बेचारे मत कहना, अजी यही तो ज्योतिकीट हैं। दरअसल जुगनू जनसामान्य के प्रतीक हैं और उनके होने की महत्ता और उनकी ताकत में भरोसे की यह अद्भुत रचना है, जिसका संगीत काफी मेलोडियस है, जो सहज ही जुबान पर चढ़ जाने की क्षमता रखता है।

निराला के गीत ‘गहन है यह अंध कारा’ में सचमुच अंधेरे और घुटन का अहसास होता है। धीमी पिच की आवाज और उसमें बाँसुरी का इस्तेमाल, ऐसा लगता है मानो कोई गहरी बेचैनी हो, मुक्त होने की कोई गहरी तड़प हो। स्वार्थ के जिन अवगुंठनों से निराला जैसे संवेदनशील कवि का मन अपने दौर में परेशान  रहा, उसके बाद के दौर में वह पूरी तरह से सभ्यता का फलसफा ही बन गया, अपनी कविता ‘हमारा समाज’ में वीरेन डंगवाल उसी फलसफे से बहस करते हैं, पहले समझाने के अंदाज में कि यह कौन नहीं चाहेगा कि उसे मिले प्यार, फिर कई सामान्य चाहतों का जिक्र आता है और अचानक कविता चाह से सवाल की ओर बढ़ती है और गीत का तेवर बदल जाता है- हमने ये कैसा समाज रच डाला है, जिसमें वही चमकता है जो शर्तिया काला है। और अंत में यह सवाल भी कि बोलो तो कुछ करना भी है या काला शरबत पीते-पीते मरना है। इस कविता को हिरावल द्वारा ही पहली बार संगीतबद्ध किया गया था और इसे काफी लोकप्रियता भी हासिल हुई। इसी तरह जिस गीत पर ऑडियो कैसेट का नाम रखा गया है, दिनेश कुमार शुक्ल के उस गीत में हारमोनियम का बड़ा प्रभावी इस्तेमाल किया गया है। एक फाइटिंग स्प्रीट और जहाँ सब कुछ बिक रहा है, उससे टकराने की ललकार इस गीत को सुनते हुए लगातार महसूस होती है। अपने वक्त की वस्तुगत समझ है और उस वक्त को बदल देने  की अपील है- सो रहा संसार/पूँजी का विकट जाल/किंतु सर्जना के एक छोटे से नगर में/फिर नए संघर्ष का उन्वान लेकर जाग मेरे मन मछंदर। जहाँ मन और तन, देश और दृष्टि, हर्ष-विषाद, कल्पनाएं-भावनाएं, नाद-निनाद सब कुछ बिक रहा है, जहाँ अपने बिक रहे हैं और सपने बिक रहे हैं, वहाँ पहुँचकर गायन और संगीत पल भर को मानो थमने सा लगता है, पर फिर तेजी से गोरख के नवगीतों को याद करते हुए जोश के साथ पलटता है संगीत भी और गायक की आवाज भी और दोनों कवि के मकसद को और भी अर्थवान बना देते हैं।

ये संगीतबद्ध रचनाएं अपने सुनने वालों से थोड़ा वक्त चाहती हैं, इन्हें चलताऊ अंदाज में नहीं सुनना चाहिए। ये देर तक हमारे जेहन में ठहरने वाली रचनाएं हैं। कविता को लोगों तक उसके अपने मिजाज के अनुरूप ले जाने की यह कोशिश तो है ही, साथ ही साथ यह उर्दू-हिन्‍दी की साझा प्रगतिशील परम्‍परा से परिचित कराने का भी प्रयास है। यह एक समन्वय भी है प्रगतिशील साहित्य के विरासत के साकारात्मक स्वरों का। हम तो यही कामना करेंगे कि हिरावल की ओर से यह सिलसिला जारी रहे। रचनाओं को संतोष झा और विस्मय चिंतन ने संगीतबद्ध किया है। आवाज समता राय, डीपी सोनी, अंकुर राय, सुमन कुमार और संतोष झा की है। इसे बनाने में कपिल शर्मा और इमरान का विशेष सहयोग रहा है। इसकी कीमत 125 रुपये है। इसे हिरावल, मदनधारी भवन, दूसरी मंजिल, एस.पी. वर्मा रोड, पटना, बिहार-800001 के पते पर संपर्क करके हासिल किया जा सकता है। हिरावल का ईमेल- hirawal@gmail.com है। हिरावल के गायक- रंगकर्मी  संतोष झा ने बताया कि हमने किसी बड़े आर्थिक  मुनाफे के लिए यह ऑडियो कैसेट बनाया नहीं है। इसका खर्च निकल आये,  इतना काफी है। अगर इस तरह के आॅडियो कैसेट की मांग ज्यादा बढ़ेगी तो भविष्य में कीमत इससे कम भी हो सकती है। असल चीज यह है कि कविताएं और उनमें मौजूद विचार लोगों तक पहुँचे और उनके जीवन का हिस्सा बनें, उनके जीवन की जरूरत बनें। कविताएं आम लोगों के जीवन में घुलमिल जायें और उनमें अभिव्यक्त सपने साकार हों।