
प्रसिद्ध जर्मन लेखक स्टीफन स्वाइग की आत्मकथा ‘वो गुजरा जमाना’ (हिन्दी अनुवाद एवं प्रस्तुति: ओमा शर्मा) का नया संस्करण हाल ही में आधार प्रकाशन से आया है । यों इस आत्मकथा के हिन्दी अनुवाद और प्रस्तुति की पहले भी सर्वत्र सराहना हुई है, नये संस्करण में भाषा के एक-एक झोल को सँवारकर और सहज और पारदर्शी बनाया गया है । नयी जानकारियाँ भी यत्रवत पिरो दी गयी हैं । जैसे- पहले संस्करण में स्टीफन के दो उपन्यास ‘द पोस्ट ऑफिस गर्ल’ और ‘जर्नी इन टू द पास्ट’ का जिक्र नहीं था । ये दोनों उपन्यास उनकी मृत्यु के बाद प्रकाशित हुए थे । नये रूप में ऐसी जानकारी पाठकों के लिये और उपयोगी होंगी-
पाठकों की जानकारी के लिये पहले स्टीफन स्वाइग का संक्षिप्त परिचय। बीसवीं सदी के महानतम लेखकों में शुमार किये जाने वाले जर्मनभाषी आस्ट्रियाई लेखक (1881-1942) की इस आत्मकथा का मूलनाम है- ‘द वर्ल्ड ऑफ यशटर्डे’। हिटलर के नृशंस नाजीवाद के चलते लेखक को अपना देश छोड़कर भागना पड़ा और यह आत्मकथा ब्राजील में पूरी की और वहीं जीवन के साठवें वर्ष में पत्नी के साथ आत्महत्या की, अपनी कई कहानियों की परिणिति के समानान्तर। स्टीफन बेमिसाल कथाकार हैं लेकिन बकौल अनुवादक ओमा शर्मा की विलक्षण भूमिका, उसने अपने जीवन के तीन चौथाई हिस्से को उस्ताद कलाकारों की जीवनियाँ लिखने और उनके अवदान को व्याख्यायित करने में लगा दिया। तीन महारथी में शामिल वाल्जाक, डिकन्स और दोस्तोवस्की के अलावा रोमॉ रोला, टालस्टाय, नीत्शे, फ्राइड पर लिखी उनकी जीवनियाँ विश्व साहित्य में विशिष्ट महत्व रखती है।
यह आत्मकथा लेखक के उन सार्वकालिक मूल्यों को बार-बार रेखाँकित करती है कि लेखक का न कोई देश होता है न राष्ट्रीयता। भाषा भी नहीं। कलाकार- वह चाहे दोस्तोवस्की हो या डिक्न्स, संगीतज्ञ हो या मूर्तिशिल्पी सभी को सरहदें तोड़नी ही होंगी और यह भी कि लेखक को जन्मजात युद्ध विरोधी ही होना चाहिए। दरअसल यह पूरी किताब ही दोनों विश्वयुद्धों की पीड़ा से दबे यूरोप के देशों की दास्तान है।
यह आत्मकथा लिखते समय लेखक पराई भूमि ब्राजील में थे। स्वयं निर्वाचित निर्वासन में। न कोई नोटस है न सामग्री, न पत्र न किताब। सिर्फ स्मृतियाँ है। ये स्मृतियाँ कितनी सान्द्रित आवेश में होंगी यह सब लिखते हुए। मैं इन्हें युद्ध के दौरान, परदेशी जमीन पर, याददाश्त को मदद करने वाली किसी चीज के बिना ही लिख रहा हूँ। जिस होटल में बैठकर लिख रहा हूँ, वहाँ मेरे पास न कोई किताब है, न कोई नोट्स और न कोई न ही दोस्तों की चिट्ठियाँ। मेरे पास सूचना का कोई जरिया नहीं है क्योंकि सैंसरशिप के कारण सभी देशों से आने वाली डाक या तो तितर-बितर है या अवरुद्ध। (पृष्ठ 14)। आश्चर्यजनक है कि इस पूरे अतीत की इतनी चीजों को इतनी आत्मीयता से याद रख पाना। विभिन्न शहरों के ऐसे साक्षात विवरण कि शहर न हो कोई हाड़मांस के नायक हो। इसे पढ़कर ही जाना जा सकता है कि आत्मकथा एक सामाजिक इतिहास भी हो सकती है।
स्कूल-विश्वविद्यालय की निरर्थकता के प्रसंगों में मौजूदा भारत की तस्वीर झाँकती है। मेरा तो वहाँ एक भी दिन आनन्दमय नहीं गुजरा। जीवन के सर्वोत्तम काल का सत्यानाश। सीखने-सिखाने की ऐसी रवायत जिसका जिदंगी से कोई ताल्लुक नहीं. वही जकड़न विश्वविद्यालय में मिली- इन जाहिल, गँवार, कटे-छँटे, निर्भीक और बेचैन करने वालों की शक्लें देखकर ही विश्वविद्यालय जाने का मेरा मजा किरकिरा हो जाता। वे सभी विद्यार्थी जो कुछ सीखना-पढ़ना चाहते, जब भी विश्वविद्यालय के पुस्तकालय जाते तो मुख्य हॉल की तरफ जाने से कतराते और पिछवाड़े के छोटे रास्ते से ही भाग आते ताकि इन नामुराद शोहदों के सामने पड़ने से बच जायें। मै आज भी यह मानता हूँ कि कोई अच्छा डॉक्टर, दार्शनिक, इतिहासकार, भाषाविद, वकील या कुछ भी बनने के लिये विश्वविद्यालय, यहाँ तक कि जिमनेशियम (स्कूल) भी जाने की दरकार नहीं है। अपने रोजमर्रा के जीवन में कितनी दफा मैंने यह साबित होते देखा है कि पुरानी किताबों के किसी फेरीवाले को किताबों के बारे में साहित्य के प्रोफेसरों से कहीं ज्यादा मालूमात होंगे। कला वितरकों की जानकारी कला इतिहासकारों से इक्कीस होती है। सभी क्षेत्रों के महत्वपूर्ण आविष्कार और विचार, क्षेत्र के बाहर के लोगों की बदौलत हुए हैं। किसी औसत प्रतिभा के लिये, अकादमिक कैरियर व्यावहारिक और फायदेमन्द हो सकता है मगर यह उसके किसी काम का नहीं है जो अपनी फितरत के मुताबिक कुछ रचना चाहता है। उसके रास्ते का तो यह रोड़ा भी बन सकता है।
इस आत्मकथा में यदि कोई चीज गायब है तो वह खुद। न पत्नी, न बच्चे, न पिता और न अपनी कहानियों का जिक्र। इसीलिये पुस्तक के अंत में ओमा शर्मा की भूमिका और उसके रचनाकार का परिचय बेहद जरूरी लगता है। स्मृतियाँ चलती जाती हैं। स्कूल से विश्वविद्यालय होती हुई अपने शुरू के रचनाकर्म पर। इसराइल राज्य के विचार का जनक थियोडोर हैर्सल, फ्यूलिटन का सम्पादक- सभी के प्रति इतना श्रद्धालु, विनम्र, आभारी। हरेक के लिए कृतज्ञ और गदगद। इतनी पाजीटिव ऊर्जा किसी ईश्वरीय देन से ही सम्भव है। कोई नुक्स ही न हो मानो किसी में। कम से कम हिन्दी साहित्य के मौजूदा दौर में अपने समकालीनों पर तो मैंने इतनी प्रशंसात्मक टिप्पणियाँ कम ही देखी हैं।
एक प्रसिद्ध लेखक दिहमेल की सलाह पर मैंने बर्लिन विश्वविद्यालय के दिनों का इस्तेमाल विदेशी भाषाओं से अनुवाद करने में किया। आज भी मैं किसी ऐसे लेखक को यदि मुझे सलाह देनी हो जो अपने बारे में कुछ तय नहीं कर पा रहे हो तो मैं किसी बड़ी रचना का अनुवाद करने की फुसलाने की कोशिश करूँगा। अपनी भाषा के मिजाज को ज्यादा गहराई और रचनात्मक ढंग से जानने का यह सबसे अच्छा तरीका है। और निष्ठा से उसने यदि कुछ किया है तो वह बेकार नहीं जाता। ओमा शर्मा का यह अनुवाद स्टीफन की किताब पर भी कितना सटीक बैठता है।
सिर्फ व्यक्तियों के लिये ही वह सहृदय और कृतज्ञ नहीं है, यूरोप के उन तमाम शहरों के लिए भी- वियना, बर्लिन, बेलिज्यम, पेरिस, लंदन। पाठक के मन में यह भाव आता ही है कि काश ! मैं भी देख पाता ऐसी भव्यता। उसके वर्णन से पेरिस, पेरिस नहीं रहता, स्वर्ग का उड़नखटोला बन जाता है। यह भी कि यूरोप आज भी यूरो और यूरोटेल की बदौलत और उन विश्व युद्धों के पहले और बाद में भी एक विश्व नागरिकता का अहसास देता है। पूरे यूरोपीय महाद्वीप में कहीं भी जाओ, कहीं भी पढ़ो, कोई रोक-टोक नहीं। हम अपने देश में बातें तो साझी संस्कृति, साझी विरासत न जाने क्या-क्या की करते हैं लेकिन 50-60 साल की सैकड़ों गोलमेज, शिखर वार्ताओं के बाद भी नागरिक न लाहौर से दिल्ली जा सकते, न कराची से अहमदाबाद। यूरोप के समाज से कुछ अंश ही काश ! सीख पाते। इस आत्मकथा को पढ़ने के बाद ऐसा तो सम्भव ही नहीं है कि आप जर्मन, आस्ट्रिया, फ्राँस, हालैंड की चप्पे-चप्पे से परिचित न हो जायें- उनके कलाकारों से भी।
कई बार आश्चर्य होता है कि हर कलाकार चोर, मकान मालिक या जीवन के जर्रे-जर्रे से प्यार करने वाला और उम्मीदों से लवालव यह शख्स आत्महत्या भी कर सकता है। हो सकता है यह आत्महत्या भी उन स्थितियों में एक नयी उम्मीद के तहत वरण की गयी हो। और अपनी रचनाओं के प्रति भी इतना क्रूर कि साल-दो साल के बाद हिकारत से देखता। यहाँ तक कि एक लगभग पूरे लिखे जा चुके उपन्यास को आग के हवाले ही कर दिया। लेखकों के लिये तो यह मॉडल किताब कही जायेगी कि (1) कैसे स्टीफन दोनों विश्वयुद्धों के बीच और वोल्शेविक क्रांति के आर-पार घोर राजनीति के बीच अराजनैतिक बने रहे और लेखनी भी खुट्टल नहीं होने दी। (2) कि आत्मकथा का मतलब अपने समय के समाज, कला की इतनी नम्र मासूमियत जाँच करना है, न कि मैं-मैं के स्वघोषित संघर्षों का राग। (3) कि कैसे समकालीन कलाकारों के प्रति अबाध भक्ति के बावजूद हिटलर की नीतियों पर जब कुछ लेखकों ने चुप्पी साधी तो उन्हें कैसे ललकारा। व्यक्ति स्वातंत्र्य का ऐसा हिमायती कि मौत भी मनमर्जी चुनी।
वैसे ही घुमक्कड़ी की सलाह सारी दुनिया के लेखकों के लिये सबक है- तुम इंग्लैंड को कभी नहीं समझ सकते हो, अब तक तुम सिर्फ टापू को ही जानते हो.. अपने महाद्वीप को भी नहीं। जब तक तुम कम से कम एक दफा उससे बाहर नहीं निकलोगे। तुम छड़े हो.. उठाओ फायदा अपनी आजादी का। साहित्य बड़ा अद्भुत पेशा है क्योंकि इसमें जल्दबाजी बिल्कुल नहीं चलती। किसी ढंग की किताब के लिये साल भर इधर या उधर कोई मानी नहीं रखता है। तुम भारत या अमरीका क्यों नहीं घूमने चले जाते? उसके यह हस्बेमामूल लफ्ज मुझे जँच गये और मैंने अविलम्ब उन पर अमलीजामा चढ़ाने की ठान ली।
मौजूदा भारत की जातिव्यवस्था पर टिप्पणी- मैं जितना मुमकिन सोच सकता था, भारत का मुझ पर असर उससे कहीं ज्यादा खराब और अवसाद भरा हुआ। मैं सन्न रह गया जब मैंने निचुड़े हुए जिस्मों की दुर्दशा, फीके चेहरों पर आनन्दविहीन संजीदगी, पूरे परिदृश्य पर अक्सर छाई क्रूर नीरसता और सबसे बढ़कर वर्ग और जाति का सख्त विभाजन देखा। इसकी बानगी जाते समय पोत पर ही मुझे मिल गई। हमारे जहाज पर दो बड़ी मनमोहिनी लड़कियाँ थीं.. कजरारी आँखों वाली छरहरी, पढ़ी-लिखी और तहजीबपसंद। समझदार और सुरूचिपूर्ण। मैंने पहले दिन ही गौर किया कि वे बड़ी दूर-दूर रहती हैं या किसी अदृश्य बाड़ ने उन्हें दूर रखा हुआ है। न वे डाँस के वक्त आईं और न उन्होंने किसी से हालचाल पूछा-पूछावाया। अलग-अलग बैठीं। वे अंग्रेजी या फ्राँसीसी किताबें पढ़ती रहतीं। दूसरे-तीसरे दिन जाकर पता चला कि अंग्रेज समाज की संगत से उन्हें परहेज नहीं है, बल्कि दूसरे लोग हैं जो इन वर्ण-संकरों से कन्नी काटे रहते हैं। हालाँकि वे आकर्षक लड़कियाँ एक पारसी बनिया और फ्राँसीसी महिला की बेटियाँ थीं। दो-तीन बरस से वे लौसान के एक बोर्डिंग स्कूल तथा इंग्लैंड के किसी स्कूल के अन्तिम बरस में थीं जहाँ भेदभाव जैसा कुछ था ही नहीं। लेकिन भारत जाते समय जहाज पर चढ़ते ही एक सर्द, अदृश्य मगर फिर भी भीषण किस्म के सामाजिक कफस ने उन्हें दबोच लिया था। नस्ली शुद्धता के फितूरी जन्तु पर पहली बार मेरी नजर पड़ी। आज की दुनिया में तो यह सदियों पहले होने वाले वास्तविक प्लेग से भी ज्यादा घातक हो गया है।
40-50 साल पहले गुजरे वक्त की एक एक कतरन को स्टीफन जैसा कोई लेखक ही इतने सजीव विस्तार से देख और दिखा सकता है। प्रथम विश्वयुध्द के पहले के वर्षों में यूरोप में आ रही समृद्धि का वर्णन मानों एक छोटे से बच्चे के बड़ा होने का चित्रण हो। औद्योगिक क्रान्ति से बदल रहे यूरोप की मानों फिल्म किताब में देख रहे हों। एक के बाद एक खोज और आविष्कार हो रहे थे और तुरन्त ही दुनिया की भलाई में इस्तेमाल किये जा रहे थे। मुझे उन लोगों पर तरस आता है जो यूरोप के विश्वास के उन आखिरी वर्षों में जवान नहीं थे। दुनिया में विश्वास के उस दौर को जिसने भी महसूस किया, उसे मालूम है कि उसके बाद तो सिर्फ विषाद और पतन ही बचे। यानी कि प्रथम विश्वयुद्ध, फिर आर्थिक मंदी और फिर द्वितीय विश्वयुद्ध। शुरू से आखिरी शब्द तक स्मृतियाँ, आवेग से लबालब- जिसमें कविता की सम्वेदनशीलता और ताजगी है। बारीकी से देखें तो यादों की बारात लिये यह लेखक अपने समय के कलाकार से बातचीत, उसकी कला और उस पर टिप्पणी से संस्मरणों का ऐसा घोल तैयार करता है कि समाजशास्त्रीय गद्य का अद्भुत नमूना बनकर तैयार हो जाता है। बात रोमॉरोलो से मिलने की हो या बेरहारन की या फ्रायड की, एक कहानी की तरह बात सरकनी शुरू होती है और दो-तीन पृष्ठों में ही बीसवीं सदी के इतिहास की दास्तान आ खड़ी होती है।
पुस्तक के अन्त में स्टीफन स्वाइग: एक परिपेक्ष्य में ओमा शर्मा का निष्कर्ष बहुत महत्वपूर्ण है। ‘वो गुजरा जमाना’ भी बहुत कुछ रिल्के, रोदां, हॉफमंसथाल, गोर्की, राथिनों, रिचर्ड स्ट्रॉस, थिओडर हर्जल, बजालजैत, रोलां और फ्रायड की दूसरे किस्म की जीवनियों का ही एकसूत्रीकरण है। पाठक इस बात की तरफ गौर करें कि इतने सारे लेखक-कलाकारों के हुनर और जीवन का आख्यान करते समय उनका रचियता जीवनीकार महज प्रविक्षार्थी की भूमिका में बना रहता है। वहाँ न उसका अहम फटक सकता है, न उसकी शोहरत। दोस्तोव्स्की, टॉल्सटॉय और रोमा रोलां जीवनी-चरित्रों के तौर पर स्वाइग के अलग-अलग पहलुओं का ही विस्तार लगते हैं। पीड़ा-यातना यदि दोस्तोव्स्की के चरित्रों का स्थाई भाव है तो लगभग वही स्थिति स्वाइग की है। इसी तर्ज पर कहा जा सकता है कि जिन्दगी के अनुभवों को गल्प के माध्यम से साकार करने की कला में उसके भीतर टॉल्सटॉय जी उठता है, स्थूल घटनाओं के पार्श्व में धँसी सूक्ष्म, जटिल मन:स्थितियों-सम्वेदनाओं के उत्कीर्णन में फ्रायड के असर को (जिसके प्रभाव के इल्जाम से स्वाइग ने फ्रायड को अपनी जीवनी की भूमिका में झूठलाया था। फ्रायड, स्वाइग की रचनाओं के घोर प्रशंसक थे। अलबत्ता वह उनकी इतर व्याख्याएँ अवश्य करते थे) बहुत कुछ महसूस किया जा सकता है, दुर्गम परिस्थितियों में कुछ चरित्रों द्वारा जाहिर जिजीविषा या मजबूत नैतिक अन्त:शक्ति की अवस्था को रोलां के प्रभाव के रूप में देखा जा सकता है। (पृष्ठ 374-375)
द्वितीय विश्वयुद्ध के कुछ पहले स्टीफन स्वाइग फिर से रूस गये थे। फिर से यानी कि 1914 में दोस्तोवस्की पर लिखते समय के बाद। बदलते रूस का वर्णन बताता है कि जो 1991 में हुआ वह उससे पहले कभी भी हो सकता था। क्या 1930 तक यह स्थिति आ गयी थी कि किसी ने बिना दस्तखत किया खत स्टीफन के जेब में चुपके से डाल दिया। खत में लिखा था- ये लोग तुम्हें जो बता रहे हैं उसकी हर चीज पर भरोसा मत करना। मत भूलो कि तुम्हें जो सब दिखाया गया है, उसके साथ-साथ बहुत कुछ ऐसा भी है जो तुम्हें नहीं दिखाया गया है। याद रखना कि तुमसे बात करने वाले ज्यादातर लोग अपने दिल की बात नहीं करते हैं बल्कि वे वही कहते हैं जो उन्हें कहना पड़ता है। हम सब पर निगाह रखी जाती है। तुमको भी कहाँ बख्शा गया है। तुम्हारा दुभाषिया हरेक लफ्ज की खबर करता है। उसमें बहुत सारे वाकये और तफसीलें थीं जिनकी मैं जाँच नहीं कर सकता था। उसकी हिदायत के मुताबिक मैंने खत जला दिया। इसे सिर्फ फाड़कर मत छोड़ देना क्योंकि वे तुम्हारे कूड़ेदान से निकालकर भी इसे जोड़-जोड़ लेंगे। मैंने चीजों को पहली बार सिरे से सोचना शुरू किया.. क्या यह हकीकत नहीं थी कि इसी दिन गर्मजोशी और लाजवाब बिरादरेपन के दरम्यान किसी से निजी तौर पर रूबरू बोल-बतियाने का एक भी मौका मेरे हाथ नहीं आया था। (पूष्ठ 283) आप इतिहास की पुस्तक पढ़कर तथ्यों को भूल सकते हैं, जीवन की इस किताब से इतिहास का एक-एक पृष्ठ आपके अंदर जज्ब होने लगता है। साहित्य यहीं इतिहास से बाजी मार ले जाता है।
पुस्तक में यत्रगत विखरे कुछ निष्कर्ष अदभुत हैं- सोचने-विचारने वाले आदमी का सबसे ज्यादा नुकसान विरोध के अभाव से होता है। जब मुझे अकेले पड़ने की मजबूरी हुई, जब नौजवानों ने मुझे घेरना बंद किया तभी मैं एक बार फिर जवान होने को मजबूर हुआ। कुछ बरस बाद मुझे समझ में आया कि इम्तहान चुनौती होते हैं। उत्पीड़न शक्ति देता है और एकान्त उदात करता है- बशर्ते वह आपकी कमर ही न तोड दे। जिन्दगी की सभी महत्वपूर्ण चीजों की तरह, यह परिज्ञान दूसरों के अनुभवों से नहीं, अपने खुद के नसीब से ही हासिल होता है।(पृष्ठ 287)
युद्ध की आहटों के बीच कुछ साथी लेखक-कलाकारों के दोगले व्यवहार को लेखक बखूबी पहचानता है। यूरोप के अधिकांश कलाकार-लेखक आधी रात के सपने में एक भाषा बोलते हैं, लिखते वक्त दूसरी और दोस्ती में बतियाते तीसरी। ये वे लोग थे जिनका कोई देश नहीं था या जिनकी एक की बजाय दो या तीन जन्मभूमियाँ थी और वे पेसोपेश में थे कि वे हैं किसके? कभी वे एक के लिये मजबूर किये जाते तो कभी दूसरे के लिए स्वयं मजबूर होते (पृष्ठ – 240)। इसी तबाही के दृश्य स्टीफन की कहानियों में जितने भयावह है, यहाँ भी उतने ही। तीन महीने तो मैंने अमूमन बिस्तर में पड़े रहकर, ठण्ड से जमीं नीली उँगलियों से ही लिखा। हर पन्ना पूरा होने के बाद उन्हें कम्बल में घुसाकर गर्माहट देता। मगर रिहाइश की इस मामूलियत को घटिया नहीं कह सकते थे क्योंकि तबाही के इस बरस में खान-पान की चीजों के अलावा, घरों का भी तो अकाल पड़ा हुआ था। चार साल से ऑस्ट्रिया में कोई निर्माण काम नहीं हुआ था।
वास्तव में यह आत्मकथा एक तरह से तमाम छोटे-मोटे युद्धों के खिलाफ है। जिस समय यह लिखी गयी तब द्वितीय विश्वयुद्ध अपनी विभीषिका की चरम पर था। हो न हो, आत्महत्या का क्षण व्यक्तिगत कुंठा या संतोष या हताशा से ज्यादा इस युद्ध के दुष्परिणामों और उन्हें किसी भी रूप में रोकने में असमर्थ आत्मा की मुक्ति के रास्ते के रूप में चुनी हो।
स्टीफन स्वाइग, पहले पहल मैंने इस लेखक का नाम जब सुना तो यह शब्द मेरे लिये लगभग काला अक्षर भैंस बराबर था। हो भी क्यों नहीं। अंग्रेज और अंग्रेजी के आतंक के चलते पूरा यूरोपीय साहित्य ही ओट में रह गया। आज इस आत्मकथा को पढ़कर मैं दावे के साथ न केवल यूरोपीयों बल्कि दुनिया के सर्वश्रेष्ठ लेखकों, कलाकारों के बारे में भी कुछ कह, सुन सकता हूँ- वाल्जाक, टालस्टाय, चेखव, दोस्तोवस्की, फ्रायड और सैकड़ों अन्य ज्ञात और अल्पज्ञात।
साहित्य और इतिहास के पाठकों के लिये एक बेहद जरूरी किताब। इक्कीसवीं सदी की पीढ़ी के लिए बीसबीं सदी के साहित्य और इतिहास का अनूठा दस्तावेज। मैंने किसी भी भाषा के साहित्य में इतनी अच्छी जीवनी किसी लेखक की नहीं पढ़ी और इतने अच्छे अनुवाद में। इस अनुवाद को पढ़कर कोई जान ही नहीं पायेगा कि स्टीफन स्वाइग जर्मन लेखक था। लगेगा कि भले ही जर्मन होगा, आत्मकथा तो उसने हिन्दी में ही लिखी है।
पुस्तक : वो गुजरा जमाना (आत्मकथा)
लेखक : स्टीफन स्वाइग
अनुवाद एवं प्रस्तुति: ओमा शर्मा
प्रकाशक : आधार प्रकाशन, एस.सी.एफ. 267, सेक्टर-16 पंचकूला-134113 (हरियाणा)
पृष्ठ : 400
कीमत: 120/- (पेपर वैक), 500/ हार्डकवर
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