खड़ी बोली के प्रथम महाकाव्य प्रियप्रवास’ के रचियता अयोध्यासिह उपाध्याय ‘हरिऔध’(15 अप्रैल, 1965-16 मार्च, 1947) का सृजनकाल हिन्दी के तीन युगों भारतेन्दु युग, द्विवेदी युग और छायावादी युग तक है। उन्होंने पर्याप्त मात्रा में बाल साहित्य का भी सृजन किया-
Category: बच्चों की करामात
अयोध्यासिह उपाध्याय ‘हरिऔध’ की चार बाल कविताएं
खड़ी बोली के प्रथम महाकाव्य प्रियप्रवास’ के रचियता अयोध्यासिह उपाध्याय ‘हरिऔध’(15 अप्रैल, 1965-16 मार्च, 1947) का सृजनकाल हिन्दी के तीन युगों भारतेन्दु युग, द्विवेदी युग और छायावादी युग तक है। उन्होंने पर्याप्त मात्रा में बाल साहित्य का भी सृजन किया-
दामोदर अग्रवाल की कुछ प्रसिद्ध बाल कविताएँ

प्रसिद्ध कवि दामोदर अग्रवाल (4 जनवरी, 1932, वाराणसी, उत्तर प्रदेश – 1 जनवरी, 2009, बंगलौर) का हिंदी बाल कविता की समृद्धि में महत्ववपूर्ण योगदान है। उनकी बालकोचित भाव-मुद्राओं में लिखीं बाल कविताएं बेहद मनमोहक हैं-
कोई लाके मुझे दे
बस्ते में गुलमोहर
गागरी में क्या है?
जादू की एक गठरी
टीचर जी
एक था तोता
सुपरमैन हैं मेरे पापा : विवेक भटनागर

युवा कवि विवेक भटनागर की बाल कविता-
सुपरमैन हैं मेरे पापा…।
अक्सर चीतों से भिड़ जाते
शेरों से न तनिक घबराते
भालू से कुश्ती में जीते
हाथी तक का दिल दहलाते
मगरमच्छ का जबड़ा नापा…।
सुपरमैन हैं मेरे पापा…।
भूत-प्रेत भी उनसे डरते
सारे उनकी सेवा करते
सभी चुड़ैलें झाड़ू देतीं
सारे राक्षस पानी भरते
उनमें पापा का डर व्यापा…।
सुपरमैन हैं मेरे पापा…।
आसमान तक सीढ़ी रखते
खूब दूर तक चढ़ते जाते
इंद्रलोक में जाकर वह तो
इंद्रदेव से हाथ मिलाते
उनसे डर इंद्रासन कांपा…।
सुपरमैन हैं मेरे पापा…।
रमेश तैलंग के बालगीत

सर्दी की धूप
गुस्सा
धूप
भोलू
मुनिया तू शैतान बड़ी
ऐसा क्यों होता है ?
छुट्टी हों
साल पुराने
हँसा कीजिए
टिन्नीजी !
चाँदनी रात में नाचा भालू : प्रकाश मनु

कथाकार प्रकाश मनु को हिंदी के लिए साहित्य अकादमी के पहले बाल साहित्य पुरस्कार से सम्मानित किया जा रहा है। उन्हें यह पुरस्कार एक था ठुनठुनिया के लिए दिया जा रहा है। उपन्यास का अंश-
एक दिन ठुनठुनिया जंगल में घूम रहा था कि उसे एक अनोखी चीज दिखाई दी। पास जाकर देखा, वह काले रंग का एक मुखौटा था, जिस पर काले-काले डरावने बाल थे।
ठुनठुनिया को हैरानी हुई, जंगल में भला यह मुखौटा कौन छोड़ गया? क्या किसी नाटक-कंपनी के लोग यहाँ से गुजरे थे और गलती से इसे यहाँ छोड़ गए। या फिर जंगल का कोई जानवर इसे शहर से उठा लाया और यहाँ छोड़कर चला गया? जो भी हो, चीज तो बड़ी मजेदार है ! ठुनठुनिया ने उस मुखौटे को उठाया और अपने चेहरे पर पहनकर देखा। मारे खुशी के चिल्ला उठा, ”अरे रे, यह तो मुझे बिल्कुल फिट आ गया!’’
ठुनठुनिया का मन हो रहा था, अभी दौड़कर घर जाए और शीशे के आगे खड़े होकर देखे कि यह अनोखा मुखौटा पहनकर वह कैसा लगता है? पर उसे तो उतावली थी, सो दौड़ा-दौड़ा गया नदी के किनारे। वहाँ पानी के पास सिर झुकाकर देखने लगा और सचमुच खुद अपनी शक्ल देखकर वह डर गया कि ‘अरे, यह भालू कहाँ से आ गया!’ चौंककर वह दो कदम पीछे हट गया। फिर खुद-ब-खुद अपने इस रूप पर ठठाकर हँस पड़ा।
सिर्फ ठुनठुनिया की आँखें ही थीं, जिनसे वह थोड़ा-बहुत पहचान में आता था। वरना तो, एकदम ऐसे बदल गया था, जैसे वह ठुनठुनिया न होकर अभी-अभी जंगल से भागकर आया कोई जंगली भालू हो। कोई एकदम जंगली भालू!
अचानक ठुनठुनिया के मन में एक आयडिया आया और वह खुद अपनी सोच पर खुश होकर उछल पड़ा। उसने सोचा, अभी नहीं, मैं रात में यह मुखौटा पहनकर गाँव वालों के पास जाऊँगा, तब आएगा मजा!
यह सोचकर ठुनठुनिया ने वह मुखौटा जतन से एक पुराने कपड़े में लपेटकर गाँव के पास वाले बरगद की डाल में छिपा दिया।
रात के समय ठुनठुनिया ने पेड़ की डाली से वह मुखौटा उतारा और पहन लिया। वह एक दोस्त से काले रंग के कपड़े भी माँग लाया था। उन्हें पहनकर वह चुपके से चलता हुआ गाँव की चौपाल तक आ गया। और झूमते हुए आगे बढ़ा। वहाँ दो-चार लोग बैठे आपस में कुछ बातचीत कर रहे थे। उन्होंने एक भालू को झूमते-झामते पास आते देखा, तो चिल्लाते हुए सिर पर पैर रखकर भागे।
फिर ठुनठुनिया आगे बढ़ा तो रामदीन चाचा नजर आ गए। वे घर के बाहर चारपाई डालकर सो रहे थे। ठुनठुनिया ने जाते ही हाथ से हिलाकर उन्हें जगाया। नींद खुलते ही काले रंग के विशालकाय भालू पर उनकी नजर पड़ी, तो वे भी चीखते-चिल्लाते हुए भाग खड़े हुए। अब तो पूरे गाँव में जगार हो गई। लोग चिल्लाकर एक-दूसरे से कह रहे थे, ”पकडिय़ो रे, भागियो रे, पकडिय़ो रे, भागियो रे, भालू आ गया, भालू! सब हाथ में एक-एक लाठी पकड़ लो और मिलकर चलो। जरा एक आदमी आग जलाकर जलती मशाल पकड़ ले। आग देखकर भालू भागेगा, तब उसे दबोचना।’’
ठुनठुनिया समझ गया, अब तो वह जरूर पकड़ा जाएगा। इसलिए उसने मुखौटा उतारकर झटपट कहीं छिपा दिया और फिर घूमता-घामता घर आकर सो गया।
सुबह ठुनठुनिया उठा तो गोमती ने कहा, ”अच्छा हुआ बेटा, तू जल्दी आ गया और सो गया, वरना गाँव वालों पर तो कल बहुत बुरी बीती। सब रात-भर जागते रहे। एक बड़ा-सा जंगली भालू न जाने कहाँ से आ गया! गाँव में कितने ही लोगों ने उसे देखा, पर कोई पकड़ नहीं पाया। अच्छा हुआ कि गाँव में जगार हो गई, नहीं तो क्या पता, एक-दो बच्चों को वह पकड़कर ही ले जाता और…!’’
”ठीक है माँ, पर तेरे ठुनठुनिया का तो वह बाल बाँका नहीं कर सकता था।’’ ठुनठुनिया ने मंद-मंद हँसते हुए कहा।
”क्यों, ऐसा क्यों कह रहा है बेटा?’’ गोमती ने चौंककर कहा, ”क्या तू जंगली भालू से भी बढ़कर है?’’
”हाँ-हाँ, क्यों नहीं?’’ ठुनठुनिया हँसा, ”मैं ठुनठुनिया जो हूँ, ठुनठुनिया! माँ का लाड़ला बेटा। ऐसे बहादुर लड़के पर हमला करने की हिम्मत है भला किसी भालू या चीते की! मेरा तो कोई बड़े से बड़ा दुश्मन भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता।… फिर भालू तो बेचारा आलू माँगने लगता! मैं उसे आलू खिलाता और झट से पकड़कर पिंजरे में बंद कर लेता।’’
गोमती ने सुना, तो बलैयाँ लेते हुए बोली, ”अच्छा बेटा, अगर वह भालू आता तो क्या तू उससे लड़ लेता?’’
”क्यों नहीं माँ, क्यों नहीं! मैं तो एक झटके में उसका मुखौटा…!’’ कहते-कहते ठुनठुनिया रुक गया।
”कैसा मुखौटा बेटा?’’ गोमती की कुछ समझ में नहीं आया।
”मुखौटा मतलब…मुँह!’’ ठुनठुनिया ने समझाया, ”माँ, तेरे कहने का मतलब यह था कि जैसे ही वह भालू आता, मैं तो सबसे पहले उसका मुँह रस्सी से बाँध देता। फिर उसे पर ठाट से वो सवारी करता, वो…कि बच्चू याद रखता जिंदगी-भर!’’ फिर हँसता हुआ बोला, ”और हाँ, माँ, मैं उस भालू पर बैठकर तेरी सात परिक्रमा करता, पूरी सात!’’
”चुप…!’’ गोमती हँसकर बोली, ”ज्यादा बढ़-चढ़कर बातें नहीं किया करते।’’
और ठुनठुनिया अंगड़ाई लेता हुआ उठ खड़ा हुआ, ताकि अब चलकर गाँव वालों से रात भालू के आने की गरमागरम खबरें सुनकर पूरा मजा ले सके।
जाने कितने दिनों तक गुलजारपुर में उस जंगली भालू की चर्चा चलती रही, जो लपकते-झपकते हुए गाँव की चौपाल पर आया था और वहाँ से रामदीन चाचा के घर की ओर गया। आखिर में सबकी सिट्टी-पिट्टी गुम करता हुआ, वह गायब हो गया।
”गायब होने से पहले उसने बड़ा जबरदस्त नाच दिखाया था और उसके पैरों में चाँदी के बड़े-बड़े और खूबसूरत छल्ले भी थे, जो बिजली की तरह चम-चम-चम चमक रहे थे! अजीब-सी डरावनी छन-छन-छन और टंकार हो रही थी…!’’ मुखिया ने कसम खाकर यह बात कही थी। यों किसी-किसी का यह भी कहना था कि वह भालू नहीं, कोई राक्षस था जो जादू से भालू की शक्ल धारण करके आया था। किसी को उसमें भगवान् राम और हनुमान के बूढ़े मित्र जाबावान की छाया दिखाई दी। जबकि गंगी ताई का कहना था, ”यह रावण था, रावण जो कलियुग में रूप बदलकर आया है। बड़ा भीषण संकट आ गया गुलजारपुर गाँव पर तो!’’
किसी को लगा कि वह भालू नहीं, सिर्फ भालू की डरावनी छाया थी। जरूर पड़ोसी गाँव के लोगों ने गुलजारपुर गाँव के लोगों को डराने के लिए कोई जादू-मंतर किया है! किसी-किसी को इसके पीछे गाँव के मोटेराम पंडित जी का भी हाथ लगा।
एक-दो ने कहा, ”नहीं भाई, हमें तो लगता है, यह वही भालू है जो कुछ महीने पहले पड़ोसी गाँव के दो बच्चों को उठाकर ले गया। यहाँ भी आया तो इसी इरादे से था, पर अच्छा हुआ कि राम जी की कृपा से जगार हो गई। तो एक बड़ी दुर्घटना होते-होते टल गई, वरना तो गाँव में किसी-न-किसी पर आफत आनी ही थी!’’
ठुनठुनिया गौर से सबकी बातें सुनता और कभी इसकी, कभी उसकी बात पर हाँ-हूँ कर देता। असली बात बताकर क्या उसे लोगों से मार खानी थी!
मगर…आखिर एक दिन उस भालू-कांड की पोल खुल ही गई और उसे किसी और न नहीं, खुद ठुनठुनिया ने ही खोला।

असल में गुलजारपुर में हर साल सर्दियों में चाँदनी रात में गाने-बजाने का प्रोग्राम होता था। उसमें गाँव के जमींदार गजराज बाबू भी आते थे, साथ ही शहर के बड़े-बड़े लोग भी आते थे। इनमें अफसर, वकील, लेखक, कलाकार, प्रोफेसर, पत्रकार, नेता सभी होते थे। अच्छी रौनक लगती थी। तरह-तरह के मजेदार कार्यक्रम होते। कोई गाने-बजाने का कार्यक्रम पेश करता तो कोई अनोखा नाच नाचकर दिखाता। पुराने लोकगीत और राग-रागिनियाँ गाई जातीं। नए-नए गीत भी खुद बनाकर पेश किए जाते। छोटे-छोटे मजेदार नाटक भी होते थे। कोई बाँसुरी, कोई ढोल, कोई तुरही बजाकर अपनी कला पेश करता। सबसे बढिय़ा प्रोग्राम दिखाने वाले को इनाम भी दिया जाता।
ठुनठुनिया बोला, ”माँ-माँ, मैं भी इस बार चाँदनी रात वाले मेले में भाग लूँगा।’’
”ठीक है बेटा।’’ गोमती ने कहा।
पर ठुनठुनिया कुछ ज्यादा ही उत्साह में था। बोला, ”सिर्फ ठीक कहने से काम नहीं चलेगा माँ! आशीर्वाद दे कि इस साल मुझे ही पहला इनाम मिले।’’
इस पर ठुनठुनिया की माँ ने हैरान होकर कहा, ”अरे, चाँदनी मेले का पहला इनाम तुझे कैसे मिल सकता है बेटे? तुझे तो इतना अच्छा नाच-गाना आता नहीं है। वहाँ तो एक से बढ़कर एक नचैया और धुरंधर कलाकार आएँगे। एक-से-एक अच्छे कार्यक्रम होंगे। लोगों के पास बहुत पैसा, बहुत साधन हैं, जबकि तेरे पास तो एक ढंग की पोशाक तक नहीं है, तो फिर…?’’
”चिंता न कर माँ, मैं इस बार ऐसा नाच दिखाऊँगा और ऐसी बढिय़ा पोशाक पहनकर दिखाऊँगा कि तू खुद चकरा जाएगी। हो सकता है, तू मुझे पहचान भी न पाए।’’ ठुनठुनिया ने हँसते हुए कहा।
”अच्छा, चल-चल, ज्यादा बातें न बना। भला ऐसा भी हो सकता है कि माँ अपने बेटे को ही न पहचान पाए!’’ गोमती ने हँसते हुए कहा।
”हो सकता है माँ, हो सकता है!’’ कहकर ठुनठुनिया नाचा। खूब मस्ती में नाचा और देर तक नाचता ही रहा। माँ हैरानी से उसे देख रही थी।
शाम के समय ठुनठुनिया घर से बाहर आकर खुले मैदान में टहलने लगा। फिर टहलते-टहलते उसके कदम गाँव के तालाब की ओर बढ़ गए। अचानक उसका ध्यान बरगद के उस पेड़ की ओर गया जिसमें ऊपर की घनी डालियों के बीच उसने भालू का मुखौटा छिपाकर रखा था।
”देखूँ, कहीं कोई उसे ले तो नहीं गया?’’ कहकर ठुनठुनिया एक मैले कपड़े में लिपटे उस मुखौटे को तलाशने लगा। एक पल, दो पल, तीन…और आश्चर्य कि वह वहाँ था! सचमुच बरगद की ऊँची डाली पर वह ज्यों-का-त्यों लिपटा पड़ा था।
ठुनठुनिया को अचंभा हुआ, ‘क्या गजब है, भला किसी का ध्यान इधर गया ही नहीं! पर चलो, अब यही मेरे काम आएगा। समझो कि मेरा पहला इनाम पक्का!’
ठुनठुनिया ने उसी समय वह मुखौटा बगल में दबाया और अपने दोस्त मीतू के घर की ओर चल पड़ा। मीतू से उसे काली पोशाक और काले जूते लेने थे, वरना उसके बगैर खेल में पूरा मजा कैसे आता! भालू वाला काला मुखौटा ले जाकर भी उसे मीतू के पास रख दिया।
मीतू का बंगलानुमा बड़ा-सा तिमंजिला घर था। खुद मीतू का अपना कमरा भी बहुत बड़ा था। वहाँ से तैयार होकर आसानी से मेले में पहुँचा जा सकता था।
और सचमुच उस रात ठुनठुनिया ने जब भालू का मुखौटा, काले कपड़े और काले जूते पहनकर अपनी कला दिखाई, तो वह कोई छोटा-मोटा नहीं, पूरा विशालकाय जंगली भालू ही लग रहा था।
पहले तो मीतू के कमरे में ही ठुनठुनिया दोस्तों के बीच अपनी नृत्य-कला का प्रदर्शन करता रहा। फिर दोस्तों के साथ ही अजब अंदाज में नाचता-कूदता, उछलता और किलकारियाँ भरता मेले में पहुँचा। सभी यह अनोखा भालू देखकर सहम गए और एक ओर छिटक गए।
इसके बाद ठुनठुनिया ने मंच पर अपना अनोखा नाच दिखाना शुरू किया। वह इतनी मस्ती से नाच रहा था कि सचमुच का भालू ही लगता था। उसका पैर उठाने, मटकने, गरदन हिलाने का अंदाज, सबमें ऐसी प्यारी कला थी कि लगता था, जंगल से अभी-अभी आकर कोई सचमुच का भालू अपना रंग बिखरा रहा है। उसकी हर अदा पर देखने वाले झूम-झूम उठते थे। गजराज बाबू और उनके दोस्त तो बार-बार ‘वाह! वाह!’ कर रहे थे।
इसके बाद ठुनठुनिया ने ठुमके लगा-लगाकर यह अनोखा गाना भी सुनाया :
भालू रे भालू!
अम्माँ, मैं तेरा भालू!
अभी-अभी चलकर जंगल से आया भालू,
ला खिला दे, ला खिला दे, दो-चार आलू!
अम्माँ, मैं नहीं टालू,
अम्माँ, मैं नहीं कालू,
अम्माँ, मैं तेरा भालू…!
जब ठुनठुनिया का नाच बंद हुआ तो देर तक चारों तरफ तालियाँ बजती रहीं। इसके बाद पूरी की पूरी भीड़ ने बिल्कुल ठुनठुनिया के भालू वाले अंदाज में ही नाचना और थिरकना शुरू कर दिया। सब मिलाकर गा रहे थे—
”भालू रे भालू! अम्माँ, मैं तेरा भालू!/अभी-अभी चलकर जंगल से आया भालू,/ला खिला दे, ला खिला दे दो-चार आलू!/अम्माँ, मैं नहीं टालू,/अम्माँ, मैं नहीं कालू,/अम्माँ, मैं तेरा भालू!’’ बड़ी देर तक सभी में यही नाच-रंग चला। आयोजकों की बहुत प्रार्थना के बाद लोग थमे।
इसके बाद और भी कार्यक्रम हुए। कई लोग तरह-तरह के रंग-बिरंगे कपड़े और गहने पहनकर नाच दिखाने आए। अजीबोगरीब मुखौटों वाले नाच हुए। हँसी-मजाक से भरपूर नाटक भी हुए। पर ठुनठुनिया ने भालू बनकर जो मजा बाँध दिया था, उसका मुकाबला कोई और नहीं कर पाया।
और सचमुच भालू बनकर ठुनठुनिया इतना बदल गया था कि और तो और, खुद गोमती भी उसे नहीं पहचान पाई थी। पर बाद में जब ठुनठुनिया का नाम लेकर इनाम की घोषणा हुई और खुद गजराज बाबू ने अपने हाथ से उसे चाँदी की थाली और एक मैडल इनाम में दिया, तो गोमती ने पहचाना—अरे, तो यह ठुनठुनिया ही था जो भालू बना हुआ था!
ठुनठुनिया को जो मैडल दिया गया, वह भी चाँदी का था। उस पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा हुआ था—’गुलजारपुर का रत्न’। उस मैडल को एक सुंदर-से काले धागे में पिरोया गया था। गजराज बाबू के कहने पर ठुनठुनिया ने उस मैडल को गले में हार की तरह पहना, तो खूब जोर से तालियाँ बजी।
फिर ठुनठुनिया से गजराज बाबू ने कहा, ”भई, ठुनठुनिया, तुम भी कुछ कहो!’’
इस पर ठुनठुनिया ने कहा, ”पुरस्कार पाकर मैं खुश हूँ। पर…मुझसे बढ़कर खुशी मेरी माँ को होगी। मैंने कल उससे कहा तो उसे यकीन नहीं हो रहा था। माँ का कहना था—’रे ठुनठुनिया, तेरे पास तो ढंग की पोशाक तक नहीं है! तू भला कैसे इनाम जीतेगा?’पर अब उसने देख लिया होगा कि उसके बेटे की जो पोशाक है, उसका मुकाबला तो बेशकीमती रंग-बिरंगी पोशाकें भी नहीं कर सकतीं।’’
लोग हैरानी से ठुनठुनिया की बातें सुन रहे थे।
इसके बाद ठुनठुनिया ने कहा, ”अगली बार अपनी कला और निखार सकूँ, आप सब इसका आशीर्वाद दीजिए। हाँ, अपने एक अपराध की क्षमा आप सब लोगों से माँगता हूँ। अभी कुछ रोज पहले गाँव की चौपाल पर जो भालू आया था और जिसने गाँव के बहुत से लोगों के साथ-साथ चाचा रामदीन को भी डरा दिया था, वह सचमुच का भालू नहीं, मैं ही था। और मैंने यही पोशाक पहनी थी, जिसे देखकर सभी को भालू नजर आने लगा। मगर यह पोशाक मुझे मिली कहाँ से, इसका भी एक किस्सा है। यह पोशाक मुझे जंगल में एक पेड़ के नीचे मिली थी और मैंने सोचा, जरा देखूँ, इसे पहनकर मैं कैसा लगता हूँ? आप सबको मेरे कारण परेशानी हुई, इसके लिए माफी चाहता हूँ। पर सच तो यह है कि उसी दिन मेरे मन में आया कि अगर इस मुखौटे को पहनकर मैं ‘भालू-नाच’ नाचूँ तो इनाम जीत सकता हूँ। और आज सचमुच मेरा सपना पूरा हो गया…’’
”हाँ, और एक बात गजराज बाबू जी से भी कहनी है। उनके हाथों से इनाम पाकर मुझे अच्छा लगा, पर उनसे पहली दफा मुझे यह इनाम नहीं मिला है। कई बरस पहले होली मेले में उन्होंने मुझे दस रुपये का एक खरखरा नोट इनाम में दिया था, जिससे मैंने में खूब सारी चीजें ली थीं और पहली बार चरखी वाले झूले पर झूला था। वह इनाम मुझे गजराज बाबू ने क्यों दिया, इसकी याद नहीं दिलाऊँगा, क्योंकि आपमें से बहुत से लोग जानते ही हैं। गजराज बाबू को भी अब याद आ गया होगा कि मजाक-मजाक में उनका नाम ‘हाथी बाबू’ कैसे पड़ गया! अगर उन्हें बुरा लगा हो, तो उनसे भी मैं माफी माँगता हूँ।’’
ठुनठुनिया जब बोलकर मंच से उतरा, तो देर तक पंडाल में तालियाँ बजती रहीं। गजराज बाबू ने आगे बढ़कर उसे गले से लगा लिया और खूब जोरों से पीठ थपथपाई। इतने में गोमती भी वहाँ आ गई। ठुनठुनिया ने आगे बढ़कर माँ के पैर छुए तो मारे खुशी के उसकी आँखों में आँसू छलछला आए।
चुन्नू की फौज : उमेश कुमार

तमालपुर गांव बहुत सुंदर था। गांव के चारों तरफ खूब हरियाली थी। यहां सब लोग मिल-जुलकर रहते थे। तुषार के पिता रामप्रसाद खेती करते थे। वह सीधे-साधे इनसान थे। जो कुछ खेती से बचता, उसी से गुजारा कर लेते थे। तुषार पढऩे में होशियार था। पढ़ाई के साथ-साथ वह पिता के काम में जब-तब मदद करता रहता।
तुषार के घर में चूहे बहुत हो गए थे। चूहे थे भी बहुत शरारती। दिनभर इधर-उधर उछल-कूद करते रहते। जो भी सामान मिलता कुतर देते। कोई जा रहा हो तो उसके ऊपर कूद जाते। वह डर के मारे चिल्लाता तो सारे के सारे छिप जाते। घर के सभी लोग चूहों से परेशान थे। उन्होंने तुषार की नई किताब ही काट डाली। इससे तुषार को बहुत गुस्सा आया।
‘चूहों का कुछ न कुछ तो करना होगा।‘ तुषार ने सोचा। अगले दिन से वह चूहों के लिए रोटी के छोटे-छोटे टुकडे़ करके रखने लगा।
आश्चर्य ! अब चूहों ने तुषार के घर में नुकसान करना बंद कर दिया। वह दिनभर भाग-दौड़ करते रहते, लेकिन कोई सामान कुतरते नहीं।
तुषार रोज स्कूल जाने से पहले चूहों के लिए रोटी रख् देता। स्कूल से आकर जब वह देखता तो चूहे रोटी खा चुके होते थे। उसे यह सोचकर खुशी होती कि चूहे उसके मन की बात समझ गए हैं।
एक दिन तुषार आंगन में बैठा होमवर्क कर रहा था। उसे अचानक कुट-कुट की आवाज सुनाई दी। उसने देखा कि एक गोलमटोल चूहा रोटी का टुकड़ा कुतर-कुतर कर खा रहा है। बीच-बीच में वह तुषार की तरफ आंखें मटका कर देखता। थोड़े ही दिन में उस चूहे की तुषार से दोस्ती हो गई।
शुरू-शुरू में तो वह तुषार से थोड़ा डरता भी था। धीरे-धीरे वह उससे अच्छी तरह घुल-मिल गया। चूहा तुषार के साथ खूब खेलता। तुषार पढ़ाई करता तो वह आकर उसकी मेज पर बैठ जाता।
तुषार ने सोचा कि हर किसी का नाम होता है। क्यों ने चूहे का भी एक अच्छा सा नाम रखा जाए। बहुत सोचने के बाद तुषार ने चूहे का नाम रखा- चुन्नू।
शाम को चूहा उसके पास आया। तुषार ने उससे कहा, ”मैंने तुम्हारा नाम रखा है चुन्नू। क्या तुमको पसंद है?’’
चूहे ने अपनी आंखें टिमटिमाईं और नाचने लगा। तुषार समझ गया कि उसे यह नाम पसंद है।
उसने चुन्नू से कहा, ”अब मैं तुम्हें इसी नाम से पुकारा करूँगा।’’
चुन्नू ने मुंह मटकाया और भाग गया। तुषार भी अपना होमवर्क पूरा करने में जुट गया।
अब तो तुषार और चुन्नू की दोस्ती खासी पक्की हो गई थी। तुषार चुन्नू कहकर पुकारता तो वह आकर नाचने लगता। स्कूल से आकर तुषार काफी देर तक चुन्नू के साथ खेलता।
इस बार बरसात न होने के कारण गांव में भयंकर सूखा पड़ा। फसल बरबाद हो गई। लोगों के सामने भूखे मरने की नौबत आ गई। किसानों के पास जो अनाज था, वह थोड़े ही दिन में खत्म हो गया।
ऐसे में धनीराम की मौज आ गई। धनीराम जमींदार था। उसके पास पैसे की कोई कमी नहीं थी। गांव के लोग मुसीबत में उसी से कर्जा लिया करते थे। कर्जा देते समय धनीराम किसान से जमीन गिरवी रखवा लिया करता था। वह शर्त रखता कि अगर एक वर्ष में पैसे वापस नहीं दिए तो जमीन उसकी हो जाएगी। वह एक वर्ष में ही मूल से ज्यादा ब्याज कर देता। इस कारण अधिकतर किसान कर्जा नहीं चुका पाते थे। कर्जा न चुकाने पर वह लोगों की जमीन हड़प लेता। उसने इसी तरह से गांव के कई लोगों की जमीन हड़प ली थी। इस बार रामप्रसाद को भी मजबूरी में उससे कर्जा लेना पड़ा गया। हालात कुछ ऐसे बने कि एक साल बीत जाने पर रामप्रसाद कर्जा नहीं चुका पाए।
धनीराम ने शर्त के मुताबिक उनसे जमीन देने का कहा। रामप्रसाद ने कुछ समय की मोहलत मांगी, लेकिन धनीराम नहीं माना। उसने रामप्रसाद की जमीन पर कब्जा कर लिया। रामप्रसाद बहुत उदास थे। रोहित ने उनसे दुखी होने का कारण पूछा। रामप्रसाद बताना नहीं चाहते थे, लेकिन तुषार के जिद करने पर उसे बता दिया।
तुषार किताब लेकर बैठा तो था, लेकिन पढ़ाई में उसका मन नहीं लग रहा था। चुन्नू थोड़ी देर में उसके पास आ गया। वह तुषार की मेज के चारों तरफ चक्कर लगाने लगा। तुषार कुछ नहीं बोला। वैसे ही उदास बैठा रहा। चुन्नू उसके कंधे पर चढ़ गया और पंजे मारने लगा। तुषार ने उसे प्यार से सहलाया और कहा, ‘‘दोस्त, बड़ी मुश्किल हो गई है। धनीराम ने जमीन के कागज लेकर कब्जा कर लिया है। समझ में नहीं आ रहा कि क्या किया जाए।’’
यह सुनकर चुन्नू भी उदास हो गया। वह थोड़ी देर मुंह लटकाए बैठा रहा। अचानक उसने मेज पर छलांग लगाई और एक कागज को पंजों से उठा लिया। वह उसे लेकर इधर-उधर दौड़ने लगा। तुषार समझ गया कि चुन्नू क्या पूछ रहा है। तुषार ने चुन्नू को कंधे पर बैठाया और धनीराम का घर दिखा दिया।
और तब तमालपुर में वह दृश्य दिखाई दिया, जिसे पहले किसी ने न देखा और न सुना था। इसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। अंधेरा होते ही चुन्नू अपनी फौज के साथ धनीराम के घर जा पहुंचा। धनीराम सो चुका था। चुन्नू उसके मुंह के पास गया और अपनी पूंछ उसकी नाक में डाल दी। धनीराम को जोरदार छींक आई। वह करवट बदलकर सो गया। चुन्नू ने अपनी फौज को इशारा कर दिया। कुछ सिपाही उसके साथ पलंग पर चढ़ गए और बाकी काम पर लग गए। कोई उसकी पेंट में घूस गया तो कोई कमीज के नीचे। धनीराम की नींद खुल गई। उसने देखा कि पलंग पर बहुत सारे चूहे हैं। वह डर के मारे चीख उठा। वह एक चूहे को कमीज से निकालता तो दूसरा पेंट में घूस जाता। वह चूहों से बचने के लिए कुर्सी पर चढ़ तो चुन्नू की फौज वहां भी पहुंच जाती। धनीराम कमरे के इस कोने से उस कोने तक भाग-भाग कर परेशान हो गया। चुन्नू की फौज के बाकी सिपाहियों ने धनीराम के घर में रखे सारे कागजात कुतर दिए। इनमें किसानों की जमीन के कागजात भी थे।
सुबह हो गई थी। धनीराम ने रो-पीटकर गांव वालों की इसकी सूचना दी। सभी यह सुनकर हैरान थे। तुषार भी वहां खड़ा था और धनीराम की हालत देख, मन ही मन मुसकरा रहा था।
चुन्नू को अभी चैन कहा हुआ। वह अपनी फौज के साथ दूसरी रात भी धनीराम के घर पर जा पहुंचा। धनीराम तोंद फुलाकर तेज-तेज खर्राटे ले रहा था। चुन्नू उसकी छाती पर बैठ गया, उसने अपनी पूंछ धनीराम की नाक में फिर घुसा दी। मानो भूचाल आ गया हो। धनीराम को इतनी तेज छींक आई कि चुन्नू जमीन पर जाकर पड़ा। वह जैसे-तैसे संभल पाया। चुन्नू के सिपाही धनीराम की पेंट में घुस गए। धनीराम इधर से उधर उछलता-कूदता फिरता रहा। बहुत देर तक धनीराम को तंग करने के बाद चुन्नू फौज के साथ वापस घर चला गया।
चुन्नू की फौज ने लगातार एक सप्ताह तक धनीराम के घर जाकर धमाल मचाया। धनीराम इतना परेशान हो गया कि उसने गांव छोडऩे का निर्णय कर लिया। एक दिन गांव वाले सुबह सोकर उठे तो देखा धनीराम अपने परिवार के साथ गांव छोड़कर जा चुका था।
तुषार चुन्नू की तरफ देखकर मुसकराया। चुन्नू ने नाच-नाचकर तुषार को खूब हंसाया।



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