Category: बच्चों की करामात

आइसक्रीम की कहानी : प्रकाश मनु

आइसक्रीम का नाम सुनते ही बच्‍चों ही नहीं, बड़ों के मुँह में भी पानी आ जाता है। आइसक्रीम की दि‍लचस्‍प कहानी बयां कर रहे हैं कथाकार प्रकाश मनु-

अगर आज बच्चों से उनकी सबसे प्रिय खाने की चीज के बारे में पूछा जाये, तो ज्यादातर बच्चों का जवाब होगा—आइसक्रीम! खाने-पीने की कोई शानदार पार्टी हो, या फिर कोई मेला या उत्सव, बच्चों की उत्सुक निगाहें सबसे पहले आइसक्रीम को ढूँढ़ती हैं। खाने-पीने को कुछ और मिले या न मिले, मगर आइसक्रीम जरूर चाहिए। और जी भरकर आइसक्रीम खाने के बाद भी उनकी तबीयत होती है—काश, थोड़ी-सी फलाँ आइसक्रीम या सॉफ्टी या चॉकबार और मिल जाती, तो मजा आ जाता! यों भी किसी को वैनिला और स्ट्राबरी पसंद है, तो किसी को कसारा, चॉकबार और केसर पिस्ता! और ऐसे बच्चे भी कम नहीं जो वैनिला या स्ट्राबरी खाते हुए मन-ही-मन खयालों में उड़ रहे होते हैं कि काश, इसके बाद कसारा या केसर पिस्ता और मिल जाती तो क्या कहने!

यों आइसक्रीम अब कोई दुर्लभ चीज नहीं रही। शायद ही कोई छोटा या बड़ा शहर या कसबा हो, जहाँ रोशनी में जगमगाता आइसक्रीम पार्लर या फिर लुभावने पोस्टरों से सजे, किस्म-किस्म की स्वादिष्ट आइसक्रीम बेचने वाले ठेले न हों! हालाँकि बच्चे अपनी इस पसंदीदा चीज को मजे से खाते हुए शायद ही कभी सोचते हों, कि यह आइसक्रीम जो आज इतनी असानी से मिल जाती है, कभी इतनी दुर्लभ थी कि बड़े-बड़े राजाओं के दरबारों या फिर धनी लोगों की पार्टियों में ही नजर आती थी। ज्यादातर लोग इस ‘ठंडी स्वादिष्ट मिठाई’ के लिये तरसते थे! और सच तो यह है कि आइसक्रीम की कहानी कोई सौ-दो सौ साल पहले की नहीं, बल्कि तकरीबन ढाई हजार साल पुरानी है और इतिहास में अनेक महान हस्तियों के साथ, अनेक प्रसंगों में उसका जिक्र मिलता है।

शुरू में बगैर दूध के आइसक्रीम बनाने का चलन था। यह आइसक्रीम कभी ठोस रूप में होती तो कभी आधी जमी हुई। इसमें फलों का रस, चीनी और पानी का इस्तेमाल होता था। सदियों पहले चीन, तुर्की, भारत और एशिया के कई देशों में आइसक्रीम का प्रचलन था। उसके बाद यूरोपीय देशों में भी आइसक्रीम का प्रचलन हुआ और निरन्‍तर बढ़ता गया।

आइसक्रीम की कहानी का एक छोर ढाई हजार बरस पहले, विश्‍वविजयी सिकंदर से जुड़ता है। सिकंदर ने जब मिस्र को जीता, तो उसने जीत का जश्‍न मनाने के लिये ढेर सारी आइसक्रीम तैयार करने का आदेश दिया। हालाँकि यह आज की आइसक्रीम से अलग थी। सिकंदर के आदेश पर पंद्रह बड़े-बड़े गड्ढे खोदे गये। फिर उन्हें पहाड़ के ऊँचे शिखरों से लाई गई मुलायम, दूधिया बर्फ से भरने के लिये कहा गया, ताकि महान सिकंदर इस ठंडी मिठाई का भरपूर आनंद ले सके।

यों आइसक्रीम की कहानी आज से कोई ढाई हजार बरस पहले से शुरू होती है। कहा जा सकता है कि किसी न किसी रूप में तब आइसक्रीम या ऐसी ही कोई चीज एक स्वादिष्ट मिठाई के रूप में मौजूद थी। इसके बाद तो आइसक्रीम के होने के काफी पक्के प्रमाण मिलने लगते हैं। ईसा की पहली शताब्दी में रोम के शासक नीरो ने अपने सेवकों को आदेश दिया था कि पहाड़ों से बर्फ लाई जाये और उसे फलों के रस और शहद में मिलाकर यह ठंडी मिठाई तैयार की जाए!

इसके बाद सातवीं शताब्दी में चीन के राजा तांग ने बर्फ और दूध को मिलाकर आइसक्रीम बनाने का तरीका खोज निकाला। सारी दुनिया में स्वादिष्ट आइसक्रीम बनाने की कला को लेकर चीन का दूर-दूर तक नाम हो गया। तब चीन से आइसक्रीम यूरोप में पहुँची और तरह-तरह के रूपों में इटली और फ्रांस के राज दरबारों में पेश की जाने लगी।

कहा जाता है कि प्रसिद्ध विश्व-यात्री मार्को पोलो जब लंबे समय तक चीन में रहने के बाद इटली लौटा, तो अपने साथ-साथ आइसक्रीम तैयार करने की कला लेकर गया था। और इस तरह आइसक्रीम देखते ही देखते दुनिया के दूसरे देशों में जा पहुँची। कैथेरीन मेडिसी फ्रांस की रानी बनीं, तो उनके साथ आइसक्रीम बनाने की कला फ्रांस भी जा पहुँची। और फिर देखते ही देखते फ्रांस के राज दरबार और रईसों की पार्टियों में भी आइसक्रीम नई सज-धज के साथ सामने आने लगी।

आधुनिक काल में आइसक्रीम को लोकप्रियता दिलाने में अमेरिका का बड़ा हाथ है। अमेरिका में न सिर्फ आइसक्रीम बनाने की नई-नई विधियाँ खोजी गईं, बल्कि दावतों और पार्टियों में आइसक्रीम परोसने और मेलों में आइसक्रीम बेचने के नये-नये अंदाज सामने आने लगे। सन् 1750 में मैटीलैंड के गवर्नर ब्लैडन ने अपने मेहमानों को आइसक्रीम की दावत दी थी। अठारहवीं शताब्दी के आखिर में फिलिप लेजी नाम के लंदन के एक मिठाई बेचने वाले व्यापारी ने ‘न्यूयार्क’ अखबार में घोषणा की कि वह आइसक्रीम समेत किस्म-किस्म की मिठाइयाँ बेचने जा रहा है। उसकी इस घोषणा ने सभी का ध्यान आकर्षित किया। अमेरिका में पहला आइसक्रीम पार्लर भी अठारहवीं शताब्दी में ही खुला और उसके बाद तो सचमुच आइसक्रीम की कहानी को पंख लग गये। सब ओर उसकी धूम मच गई। कहा जाता है कि अमेरिका की बड़ी हस्तियाँ, जिनमें जॉर्ज वाशिंगटन भी थे, आइसक्रीम के खासे शौकीन थे।

आइसक्रीम को यह नाम कैसे मिला? इसका श्रेय भी अमेरिका को ही जाता है। पहले इसे ‘आइस्ड क्रीम’ यानी ‘ठंडी की गई क्रीम’ कहा जाता था। पर बाद में धीरे-धीरे संक्षिप्त होकर इसका कहीं अधिक सुंदर और आकर्षक नाम ‘आइसक्रीम’ हो गया, जो अब पूरी दुनिया में फैल चुका है।

अब तक आइसक्रीम बनाने की नई से नई विधियाँ खोज ली गई थीं। जब पैडल से चलने वाला लकड़ी का फ्रीजर बना, तो इसके निर्माण में एकाएक तेजी आ गई। सन् 1832 में फिलेडेल्फिया के एक मिष्ठान्न निर्माता ऑगस्टस ने आइसक्रीम बनाने का एक नया तरीका खोजा। किन-किन चीजों को, किस अनुपात में मिलाने से स्वादिष्ट आइसक्रीम तैयार होती है, उसने यह खोज की। यह आइसक्रीम बहुत कुछ आज मिलने वाली आइसक्रीम जैसी थी।

नैन्सी जॉनसन नाम की इंग्लैंड की एक महिला ने सन् 1846 में हाथ से चलने वाले फ्रीजर की खोज की। इससे आइसक्रीम बनाने का सही, वैज्ञानिक तरीका खोज लिया गया, जो कमोबेश आज भी इस्तेमाल होता है। नैन्सी जॉनसन ने तो अपने आविष्कार को पेटेंट नहीं करवाया, पर आगे चलकर विलियम जी. चंच ने सन् 1848 में जॉनसन द्वारा निर्मित आइसक्रीम फ्रीजर को उसी के नाम के साथ पेटेंट करवाया।

इसके बाद आइसक्रीम के निर्माण में एक बड़ी छलाँग सन् 1851 में दिखाई दी। कारण यह था कि इसी वर्ष बाल्टीमोर के जेकब फसेल ने बड़ी मात्रा में आइसक्रीम तैयार करने का व्यापारिक संयंत्र कायम किया। जाहिर है, इसके साथ ही आइसक्रीम के निर्माण और प्रचार में आश्‍चर्यजनक तेजी आई। दूसरे व्यापारियों में भी इसी तरह के संयंत्र लगाकर आइसक्रीम बनाने की होड़ नजर आने लगी। इसे आइसक्रीम की विश्‍व-यात्रा का एक बड़ा और महत्त्वपूर्ण पड़ाव कह सकते हैं।

अब सभी का ध्यान आइसक्रीम को खूबसरत ढंग से सर्व करने की ओर गया और उसे परोसने के लिये आकर्षक, डिजायनदार कप तैयार करने की कोशिशे हुईं। आखिर उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में अल्फ्रेड एल. क्रेल ने खूबसूरत ढंग से आइसक्रीम ‘सर्व’ करने के लिए सुंदर डिजाइन वाले कप-प्लेट ईजाद किये, जिससे आइसक्रीम का पूरा आनंद लिया जाये। जाहिर है, अब तक आइसक्रीम का खूब प्रसार होने के साथ-साथ वह सभ्य समाज की पहचान भी बन चुकी थी।

इसके बाद फ्रिज या रेफ्रिजरेटरों की ईजाद और उनके घर-घर पहुँचने पर तो आइसक्रीम को जमाना एक साथ सस्ता और आसान भी हो गया। इस दिशा में एक बड़ी कामयाबी तब मिली, जब आइसक्रीम जमाने का ऐसा फ्रीजर बना लिया गया, जो बिना रुके, लगातार काम करता था और व्यावसायिक रूप से सस्ता भी था। फिर तो आइसक्रीम की सब ओर दुंदुभी बजने लगी।

इसके बाद आइसक्रीम के नये-नये लुभावने रूप खोजे गये। इनमें सबसे लोकप्रिय हुआ आइसक्रीम कोन, क्योंकि यह बेहद सुविधाजनक था और मेले तथा उत्सवों में चलते-फिरते उसका आनंद लिया जा सकता था। सन 1904 में लुइस विश्‍व मेले में सबसे पहले ऐसे कोन देखे गये, जिनमें आइसक्रीम भरकर उन्हें चलते-फिरते खाया जा सकता था। कई व्यापारी अच्छे से अच्छे, सुंदर और कलात्मक कोन बनाकर उनमें आइसक्रीम पेश करने लगे, ताकि उनकी बिक्री बढ़े। इनमें लेबनान का एक व्यापारी अबे ड्रमर भी था। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि आइसक्रीम कोन बनाने की मशीन तैयार करने वाला पहला शख्स अबे ड्रमर ही था। यों आइसक्रीम कोन बनाने का इतिहास खासा लम्‍बा है और किसी एक को उसका श्रेय देना मुश्किल है। कई लोग इस दिशा में एक साथ सोच रहे थे, ताकि आइसक्रीम की लोकप्रियता से ज्यादा से ज्यादा लाभ हासिल किया जा सके। धातु के सुन्‍दर और आकर्षक कोन बनाने के साथ-साथ, कागज के कोन भी बनाए गये।

सन् 1904 में सेंट लुइस स्थान के चार्ल्‍स ई. मेचेंस के मन में ‘पेस्ट्री कोन’ बनाने का विचार आया और उसी ने पहला आइसक्रीम कोन बनाया। कहा जाता है कि इस साल सेंट लुइस विश्‍व मेले में कम से कम पचास जगहों पर ऐसे आइसक्रीम कोन मिल रहे थे। इससे पता चलता है कि एक ही समय में कई लोगों ने एक साथ आइसक्रीम का यह रूप खोजा था, जो आज भी खासा लोकप्रिय है। खासकर मेलों और उत्सवों का तो यह खास आकर्षण ही है और हलकी धूप वाले गुनगुने मौसम में, इसे टहलते हुए खाने का आनंद ही कुछ और है! बहरहाल, इतना तय है कि बीसवीं शताब्दी के प्रारम्‍भ में सेंट लुइस के विश्‍व मेले में कोन प्रसिद्ध हुए और एकाएक दुनिया भर में छा गये थे।

इसके बाद आइसक्रीम का युग आया। इसके आविष्कार की कहानी भी खासी रोचक है। इसे बनाने का विचार आयोवा के एक दुकानदार के मन में आया। यह सन् 1920 के आसपास की बात है। हुआ यह कि एक बच्चा उसके पास आइसक्रीम खरीदने आया। उसे यह तय करने में मुश्किल आ रही थी कि वह आइसक्रीम सेंडविच ले या फिर चॉकलेट बार? तब नेल्सन के मन में एक नया विचार आया। उसने एक आइसक्रीम बार खोज निकाली, जिसके ऊपर चाकलेट की हलकी सी परत थी। सन् 1934 में चाकलेट से मढ़ी हुई यह नये ढंग की, अनोखी आइसक्रीम बार खोज ली गई, जो आज भी ज्यादातर बच्चों की पहली पसंद है। और अब तो लोगों की जरूरतों के हिसाब से ऐसी आइसक्रीम भी खोज ली गई हैं, जिनमें चीनी नहीं है तथा जो कतई मोटापा नहीं बढ़ाती।

आइसक्रीम की लोकप्रियता बढऩे के साथ-साथ, तरह-तरह की आइसक्रीम खोजने की जो होड़ लग गई। सन् 1960 में रुबेन मैट्स ने एक अलग तरह की आइसक्रीम खोजकर उसे अनोखा नाम ‘हैगन डाज’ दिया। इसी समय लियो स्टीफेनस ने ‘डब बार’ खोजी। इससे भी मजेदार थी ‘गुड ह्यूअर आइसक्रीम बार’ की खोज। इसे बेचने का भी एक नायाब तरीका खोज निकाला गया। सफेद ट्रकों का एक खूबसूरत काफिला उन्हें बेचने के लिये निकला। इन ट्रकों पर मीठी ‘रुन-झुन, रुन-झुन’ करने वाली घंटियाँ लगी थीं और एक ही तरह की पोशाक वाले ड्राइवर बैठे थे, जो खरीदने वालों को अपने इस अनोखे रूप से चकित और आकर्षित करते थे। जाहिर है, इस आइसक्रीम का जैसा दिलचस्प नाम था, उसे बेचने का तरीका भी वैसा ही मनोरंजक था, जिसने सभी को लुभाया। कुछ इतिहासकार इसी को पहली आइसक्रीम बार मानते हैं।

बेशक आइसक्रीम आज अपनी लोकप्रियता के शिखर पर है और उसने प्रसिद्धि की दौड़ में दुनिया की सारी स्वादिष्ट मिठाइयों को पीछे छोड़ दिया है। बड़े हों या बच्चे, सभी आइसक्रीम के दीवाने हैं—शायद इसलिए कि यह ऐसी लाजवाब चीज है, जिसे कितना ही खाओ, मन नहीं भरता! इसलिए आइसक्रीम की कहानी जो पिछले ढाई हजार सालों से चली आती है, उम्मीद है, अभी हजारों सालों तक मनुष्य के साथ-साथ यात्रा करेगी। उसके नये-नये लुभावने रूप सामने आएँगे तथा उसका स्वाद और आनंद कभी कम न होगा!

(‘अनोखी कहानि‍याँ ज्ञान-वि‍ज्ञान की’ से साभार)
सभी चि‍त्र : कीर्ति मि‍त्‍तल, कक्षा 11

छोटी सी बात : जाकिर अली रजनीश

 

वैज्ञानि‍क तथ्‍यों पर आधारि‍त युवा कथाकार जाकि‍र अली रजनीश की बाल कहानी-

आसमान में बादल छाए होने के कारण उस समय काफी अंधेरा था। हालाँकि घड़ी में अभी साढ़े चार ही बजे थे, लेकिन इसके बावजूद लग रहा था जैसे शाम के सात बज रहे हों। लेकिन सलिल पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। वह अपने हाथ में गुलेल लिये सावधानीपूर्वक आगे की ओर बढ़ रहा था। उसे तलाश थी किसी मासूम जीव की, जिसे वह अपना निशाना बना सके। नन्हे जीवों पर अपनी गुलेल का निशाना लगाकर सलिल को बड़ा मज़ा आता। जब वह जीव गुलेल की चोट से बिलबिला उठता, तो सलिल की प्रसन्नता की कोई सीमा न रहती। वह खुशी के कारण नाच उठता।

अचानक सलिल को लगा कि उसके पीछे कोई चल रहा है। उसने धीरे से मुड़ कर देखा। देखते ही उसके पैरों के नीचे की ज़मीन निकल गयी और वह एकदम से चिल्ला पड़ा। सलिल से लगभग बीस कदम पीछे दो चिम्पैंजी चले आ रहे थे। सलिल का शरीर भय से काँप उठा। उसने चाहा कि वह वहाँ से भागे। लेकिन पैरों ने उसका साथ छोड़ दिया। देखते ही देखते दोनों चिम्पैंजी उसके पास आ गये। उन्होंने सलिल को पकड़ा और वापस उसी रास्ते पर चल पड़े, जिधर से वे आये थे।

कुछ ही पलों में सलिल ने अपने आप को एक बड़े से चबूतरे के सामने पाया। चबूतरे पर जंगल का राजा सिंह विराजमान था और उसके सामने जंगल के तमाम जानवर लाइन से बैठे हुये थे। सलिल को जमीन पर पटकते हुए एक चिम्पैंजी ने राजा को सम्बोधित कर कहा, ‘‘स्वामी, यही है वह दुष्ट बालक, जो जीवों को अपनी गुलेल से सताता है।’’
शेर ने सलिल को घूर कर देखा, ‘‘क्यों मानव पुत्र, तुम ऐसा क्यों करते हो?’’

सलिल ने बोलना चाहा, लेकिन उसकी ज़बान से कोई शब्द न फूटा। वह मन ही मन बड़बड़ाने लगा, ‘‘क्योंकि मैं जानवरों से श्रेष्ठ हूँ।’’

‘‘देखा आपने स्वामी ?’’ इस बार बोलने वाला चीता था, ‘‘कितना घमंड है इसे अपने मनुष्य होने का। आप कहें तो मैं अभी इसका सारा घमंड निकाल दूँ ?’’ कहते हुए चीता अपने दाहिने पंजे से ज़मीन खरोंचने लगा।

सलिल हैरान कि भला इन लोगों को मेरे मन की बात कैसे पता चल गयी? लेकिन चीते की बात सुनकर वह भी कहाँ चुप रहने वाला था। वह पूरी ताकत लगाकर बोल ही पड़ा, ‘‘हाँ, मनुष्य तुम सब जीवों से श्रेष्ठ है, महान है। और ये प्रक्रति का नियम है कि बड़े लोग हमेशा छोटों को अपनी मर्जी से चलाते हैं।’’

तभी आस्ट्रेलियन पक्षी नायजी स्क्रब, जिसकी शक्ल कोयल से मिलती–जुलती है, उड़ता हुआ वहाँ आया और सलिल को डपट कर बोला, ‘‘बहुत नाज़ है तुम्हें अपनी आवाज़ पर, क्योंकि अन्य जीव तुम्हारी तरह बोल नहीं सकते। पर इतना जान लो कि सारे संसार में मेरी आवाज़ का कोई मुकाबला नहीं। दुनिया की किसी भी आवाज़ की नकल कर सकती हूँ मैं। …क्या तुम ऐसा कर सकते हो?’’ सलिल की गर्दन शर्म से झुक गयी और नायजी स्क्रब अपने स्थान पर जा बैठी।

सलिल के बगल में स्थित पेड़ की डाल से अपने जाल के सहारे उतरकर एक मकड़ी सलिल के सामने आ गयी और फिर उस पर से सलिल की शर्ट पर छलांग लगाती हुई बोली, ‘‘देखने में छोटी ज़रूर हूँ, पर अपनी लम्बाई से 120 गुना लम्बी छलांग लगा सकती हूँ। क्या तुम मेरा मुकाबला कर सकते हो? कभी नहीं। तुम्हारे अन्‍दर यह क्षमता ही नहीं। पर घमंड ज़रूर है 120 गुना क्यों?” कहते हुये उसने दूसरी ओर छलांग मार दी।

तभी गुटरगूँ करता हुआ एक कबूतर सलिल के कन्‍धे पर आ बैठा और अपनी गर्दन को हिलाता हुआ बोला, ‘‘मेरी याददाश्त से तुम लोहा नहीं ले सकते। दुनिया के किसी भी कोने में मुझे ले जाकर छोड़ दो, मैं वापस अपने स्थान पर जाता हूँ।’’

सलिल सोच में पड़ गया और सर नीचा करके ज़मीन पर अपना पैर रगड़ने लगा।

‘‘मैं हूँ गरनार्ड मछली। जल, थल, नभ तीनों जगह पर मेरा राज है।’’ ये स्वर थे पेड़ पर बैठी एक मछली के, ‘‘पानी में तैरती हूँ, आसमान में उड़ती हूँ और ज़मीन पर चलती हूँ। अच्छा, मुझसे मुकाबला करोगे?’’

ठीक उसी क्षण सलिल के कपड़ों से निकल कर एक खटमल सामने आ गया और धीमे स्वर में बोला, ‘‘सहनशक्ति में मनुष्य मुझसे बहुत पीछे है। यदि एक साल भी मुझे भोजन मिले, तो हवा पीकर जीवित रह सकता हूँ। तुम्हारी तरह नहीं कि एक वक्‍त का खाना मिले, तो आसमान सिर पर उठा लो।’’

खटमल के चुप होते ही एल्सेशियन नस्ल का कुत्ता सामने आ पहुँचा। वह भौंकते हुये बोला, स्वामीभक्ति में मनुष्य मुझसे बहुत पीछे है। पर इतना और जान लो कि मेरी घ्राण शक्ति (सूँघने की क्षमता) भी तुमसे दस लाख गुना बेहतर है।’’

पत्ता खटकने की आवाज़ सुनकर सलिल चौंका और उसने पलटकर पीछे देखा। वहाँ पर बार्न आउल प्रजाति का एक उल्लू बैठा हुआ था। वह घूर कर बोला, ‘‘इस तरह मत देखो घमण्डी लड़के, मेरी नज़र तुमसे सौ गुना तेज़ होती है समझे?’’

सलिल अब तक जिन्हें हेय और तुच्छ समझ रहा था, आज उन्हीं के आगे अपमानित हो रहा था। अन्य जीवों की खूबियों के आगे वह स्वयं को तुच्छ अनुभव करने लगा था। इससे पहले कि वह कुछ कहता या करता, दौड़ता हुआ एक गिरगिट वहाँ आ पहुँचा और अपनी गर्दन उठाते हुये बोला, ‘‘रंग बदलने की मेरी विशेषता तो तुमने पढी़ होगी, पर इतना और जान लो कि मैं अपनी आँखों से एक ही समय में अलग-अलग दिशाओं में एक साथ देख सकता हूँ। मगर तुम ऐसा नहीं कर सकते। कभी नहीं कर सकते।’’

दोनों चिम्पैंजियों के बीच खड़ा सलिल चुपचाप सब कुछ सुनता रहा। भला वह जवाब देता भी  तो क्या? उसमें कोई ऐसी खूबी थी भी तो नहीं, जि‍से वह बयान करता। वह तो सिर्फ दूसरों को सताने में ही अभी तक आगे रहा था।

तभी चीते की आवाज सुनकर सलिल चौंका। वह कह रहा था, ‘‘खबरदार, भागने की कोशिश मत करना। क्योंकि 112 किलोमीटर प्रति घण्टे की रफ्तार है मेरी। और तुम मुझ से पार पाने के बारे में सपने में भी न सोच सकोगे। क्योंकि तुम्हारी यह औकात ही नहीं है।’’

‘‘क्यों नहीं है औकात?’’ चीते की बात सुनकर सलिल अपना आपा खो बैठा और जोर से बोला, ‘‘मैं तुम सबसे श्रेष्ठ हूँ, क्योंकि मेरे पास अक्ल है । और वह तुममें से किसी के भी पास नहीं है।’’

सलिल की बात सुनकर सामने के पेड़ की डाल से लटक रहा चमगादड़  बड़बड़ाया, ‘‘बड़ा घमण्ड है तुझे अपनी अक्ल पर नकलची मनुष्य। तूने हमेशा हम जीवों की विशेषताओं की नकल करने की कोशिश की है। जब तुम्हें मालूम हुआ कि मैं एक विशेष की प्रकार की अल्ट्रा साउंड तरंगें छोड़ता हूँ, जो सामने पड़ने वाली किसी भी चीज़ से टकरा कर वापस मेरे पास लौट आती हैं, जिससे मुझे दिशा का ज्ञान होता है, तो मेरी इस विशेषता का चुराकर तुमने रडार बना लिया और अपने आप को बड़ा बु‍द्धिमान कहने लगे?’’

‘‘बहुत तेज़ है अक्ल तुम्हारी?’’ इस बार मकड़ी गुर्रायी, ‘‘ऐसी बात है तो फिर मेरे जाल जितना महीन व मज़बूत तार बनाकर दिखाओ। नहीं बना सकते तुम इतना महीन और मज़बूत तार। इस्पात के द्वारा बनाया गया इतना ही महीन तार मेरे जाल से कहीं कमज़ोर होगा।… और तुम्हारे सामान्य ज्ञान में वृद्धि के लिये एक बात और बता दूँ कि‍ यदि मेरा एक पौंड वजन का जाल लिया जाये, तो उसे पूरी पृथ्वी के चारों ओर सात बार पलेटा जा सकता है।’’

इतने में एक भंवरा भी वहाँ आ पहुँचा और भनभनाते हुये बोला, ‘‘वाह री तुम्हारी अक्ल? जो वायु गतिकी के नियम तुमने बनाये हैं, उनके अनुसार मेरा शरीर उड़ान भरने के लिये फिट नहीं है। लेकिन इसके बावजूद मैं बड़ी शान से उड़ता फिरता हूँ। अब भला सोचो कि कितनी महान है तुम्हारी अक्ल, जो मुझ नन्हे से जीव के उड़ने की परिभाषा भी कर सकी।’’

हँसता हुआ भंवरा पुन: अपनी डाल पर जा बैठा। एक पल के लिये वहाँ सन्नाटा छा गया। सन्नाटे को तोड़ते हुए शेर ने बात आगे बढ़ाई, ‘‘अब तो तुम्हें पता हो गया होगा नादान मनुष्य कि तुम इन जीवों से कितने महान हो? अब ज़रा तुम अपनी घमण्ड की चिमनी से उतरने की कोशिश करो और हमेशा इस बात का ध्यान रखा कि सभी जीवों में कुछ न कुछ मौलिक विशेषतायें पाई जाती हैं। सभी जीव आपस में बराबर होते हैं। न कोई किसी से छोटा होता है कोई किसी से बड़ा। समझे?’’

‘‘लेकिन इसके बाद भी यदि तुम्हारा स्वभाव नहीं बदला और तुम जीव-जन्तुओं को सताते रहे, तो तुम्हें इसकी कठोर से कठोर सज़ा मिलेगी।’’ कहते हुये हाथी ने सलिल को अपनी सूंड़ में लपेटा और ज़ोर से ऊपर की ओर उछाल दिया।
सलिल ने डरकर अपनी आँखें बन्‍द कर लीं। लेकिन जब उसने दोबारा अपनी आँखें खोलीं, तो न तो वह जंगल था और न ही वे जानवर। वह अपने बिस्तर पर लेटा हुआ…

‘‘इसका मतलब है कि मैं सपना…’’ सलिल मन ही मन बड़बड़ाया। उसने अपनी पलकों को बन्‍द कर लिया और करवट बदल ली। हाथी की कही हुई बातें अब भी उसके कानों में गूँज रही थीं।

चि‍त्र : अंजलि‍ कुमारी, कक्षा-7

नये साल पर प्रकाश मनु के दो गीत

 

नये साल के अवसर पर वरिष्‍ठ कथाकार प्रकाश मनु के दो गीत-

नये साल क्या-क्या लाओगे?

नये साल क्या-क्या लाओगे?
प्यारा-प्यारा नया कलेंडर
ताजा दिन, ताजी-सी शाम,
चिडिय़ाघर की सैर, और फिर
हल्ला-गुल्ला मार तमाम।
हलुआ, पूड़ी, बरफी, चमचम
से मुँह मीठा करवाओगे?

मीठी-मीठी एक बाँसुरी
नयी कहानी, नयी किताब,
मीठी-मीठी अपने शामें
हँसता जैसे सुर्ख गुलाब।
खुशबू का एक झोंका बनकर
सबके मन को बहलाओगे?

या बुखार पढऩे का सब दिन
कागज-पतर रँगवाओगे,
टीचर जी की डाँट-डपट
मम्मी की झिडक़ी बन जाओगे।
खेलकूद के, शैतानी के
सारे करतब भुलवाओगे?

झगड़ा-टंटा रस्ता चलते
जाने कैसे-कैसे झंझट,
बिना बात की ऐंचातानी
बिना बात की सबसे खटपट।
गया साल सच, बहुत बुरा था,
उसकी चोटें सहलाओगे?

नया कलेंडर

पापा, नए साल पर लाना,
बढिय़ा सा
एक नया कलेंडर!

बैठक में जो टँगा हुआ है
हुआ कलेंडर बहुत पुराना,
उस पर मैंने कभी लिखा था
कालू-भालू वाला गाना।
मम्मी ने भी लिखा उसी पर
शायद राशन का हिसाब है,
इसीलिए बिगड़ा-बिगड़ा सा
जैसे डब्बू की किताब है!

नया कलेंडर लाना जिस पर
फूल बने हो
सुंदर-सुंदर!

फूलों पर उड़ती हो तितली
उसे पकडऩे डब्बू भागा,
आसमान में नया उजाला
सूरज भी हो जागा-जागा।
ऐसा नया कलेंडर जिसमें
गाना गाये मुनमुन दीदी,
सुनकर के पेड़ों पर बैठी,
चिडिय़ा चहके चीं-चीं, चीं-चीं!

नई सुबह आएगी पापा
उस नन्ही
चिडिय़ा-सी फुर-फुर!

चित्रांकन  : प्रगति त्‍यागी

रिंकू और टिंकू: उमेश कुमार

युवा लेखक और पत्रकार उमेश कुमार की बाल कहानी-

छोटा-सा ही था रिंकू, पर था बड़ा नटखट। एक दिन वह स्कूल से घर आ रहा था। रास्ते में उसे एक पिल्ला मिल गया। गोल-मटोल पिल्ले को देखकर रिंकू रुक गया। पिल्ला बहुत ही प्यार था। उसने सोचा कि सभी का नाम होता है। इसका नाम भी जरूर होना चाहिए।
उसने कहा, ‘‘शेरू।’’
पिल्ला चुपचाप रहा।
‘‘टाइगर।’’
पिल्ले ने अब भी कोई हरकत नहीं की।
‘‘टिंकू।’’
पिल्ले ने मुँह उठाकर पूँछ हिला दी।
रिंकू खुशी से चिल्ला उठा, ”मिल गया…मिल गया। इसका नाम मिल गया। इसका नाम टिंकू है।’’
रिंकू ने प्यार से बुलाया, ”टिंकू…टिंकू…।’’
टिंकू पूँछ हिलाते हुए रिंकू के पास आ गया।
रिंकू मजे से टिंकू के साथ खेलने लगा। टिंकू भागता तो रिंकू उसे पकड़ता और रिंकू भागता तो टिंकू उसे पकड़ता। दोनों पकड़म पकडा़ई का खेल बहुत देर तक खेलते रहे। रिंकू को ध्यान आया कि उसे देर हो रही है। वह बोला, ”बाप रे, देर हो गई। मम्मी गुस्सा होगी। अच्छा टिंकू मैं घर जाता हूं। कल फिर
आऊँगा।’’
वह चल दिया। कुछ दूर जाकर उसने पीछे मुड़कर देखा। टिंकू उसके पीछे-पीछे आ रहा है। तब उसने टिंकू से पूछा, ”तुम कहाँ आ रहे हो? अपने घर जाओ।’’ पर टिंकू अपनी जगह खड़ा चुपचाप पूँछ हिलाता रहा।
”मैं अपनी मम्मी के पास जा रहा हूँ। तुम भी अपनी मम्मी के पास जाओ।’’ रिंकू ने बड़े प्यार उसकी पीठ सहलाते हुए कहा।
लेकिन टिंकू चुपचाप खड़ा रहा।
रिंकू ने पूछा, ”क्या तुम्हारा घर नहीं है?’’
टिंकू ने चुपचाप पूँछ हिला दी।
रिंकू ने सोचा, ”लगता तो यही है कि इसका घर नहीं है। इसे अपने साथ ही ले जाता हूँ।’’
रिंकू ने टिंकू से कहा, ”चलो टिंकू तुम मेरे घर चलो।’’ वह उसे अपने घर ले गया।
टिंकू को देखते ही मम्मी ने उसे डाँटा, ”इस पिल्ले को कहाँ से उठा लाया?’’
रिंकू ने कहा, ”मम्मी यह मेरा दोस्त टिंकू है। इसका कोई नहीं है- न मम्मी न पापा। इसका घर भी नहीं है। आज से यह हमारे घर में ही रहेगा, हमारे साथ!’’
मम्मी झुँझलाकर बोली, ”जा…जा…इसे बाहर छोड़ आ। सारे घर को गंदा कर देगा।’’
रिंकू टिंकू को अपने से अलग नहीं करना चाहता था। वह जब से यहाँ आया था, चुपचाप एक कोने में बैठा था। वह उसे हरहाल में अपने साथ रखना चाहता था। उसने मम्मी से बार-बार टिंकू को रखने के लिए कहा लेकिन वह तैयार नहीं हुईं।
अब रिंकू क्या करें? वह देर तक सोचता रहा। उसने टिंकू से कहा, ”मम्मी ने तुम्हें घर में रखने से मना कर दिया है। अब क्या करें?’’
टिंकू क्या जवाब देता। वह रिंकू की ओर देखकर आँखें टिमटिमाता रहा।
रिंकू को आइडिया आया कि घर के पिछवाड़े टिंकू के लिए घर बनाया जाए।
रिंकू और टिंकू घर के पिछवाड़े चले गए। रिंकू ईंटे और लकड़ी के दो फट्टे ले आया। उसने ईंटों से दीवार खडी कर दी। छत के लिए एक फट़टा लगा दिया और
दूसरे को दरवाजे की जगह लगा दिया। टिंकू के लिए घर तैयार हो गया। रिंकू ने टिंकू से कहता है, ”आज से तुम इस घर में रहोगे। मैं तुम्हारे लिए खाना ले आया करूंगा। अब मैं पढ़ने जा रहा हूं।’’
रिंकू जाने के लिए उठने लगा तो टिंकू ने उसके हाथ चाट लिए। रिंकू ने उसे समझाया, ”कुछ दिन की बात है। मैं मम्मी  को मना लूंगा। फिर तुम साथ मेरे कमरे में ही रहना।’’
रिंकू मम्मी से छिप-छिपकर टिंकू के लिए घर से खाना ले जाता था। रिंकू और टिंकू में काफी प्यार था। दोनों हमेशा साथ-साथ रहते। रिंकू स्कूल जाता
तो वह पीछे-पीछे चल देता। जब स्कूल की छुट्टी होती तो वह गेट पर पहुंच जाता।

अचानक एक दिन गांव के लोगों में बदहवासी दिखाई दी। एक पागल बिल्ली ने गांव में आतंक मचा दिया था। वह रात को लोगों पर सोते समय हमला कर काट लेती। गांव में सभी लोग काफी परेशान थे। गांव वाले बिल्ली से छुटकारा पाना चाहते थे, लेकिन उसे कोई पकड़ नहीं पाता था।
रिंकू और टिंकू को जब इस बात का पता चला तो दोनों ने गांव वालों को उस पागल बिल्ली से छुटकारा दिलाने की ठानी।
दोनों रात को बिल्ली की ताक में लगे रहते। एक रात बिल्ली रिंकू के पड़ोस में सो रहे एक बच्चे पर हमला कर दिया। बच्चे का शोर सुनकर रिंकू और टिंकू
जाग गए।
रिंकू ने टिंकू से कहा, ”कमॉन टिंकू।’’ टिंकू ने तेजी से बिल्ली का पीछा किया। भागते-भागते गांव से काफी दूर जंगल तक चले गए। बिल्ली डर गई। फिर
दोबारा गांव में नहीं आई।
गांव वालों ने रिंकू और टिंकू की बहादुरी पर दोनों को बधाई दी। मम्मी ने टिंकू को घर में रखने की इजाजत दे दी। उसके बाद रिंकू और टिंकू
साथ-साथ रहते। उनकी दोस्ती देखकर गांव वाले कहते, ”दोस्ती हो तो रिंकू और टिंकू जैसी।’’

देवेन्द्र कुमार की कुछ बाल कविताएं

19 अक्टूबर, 1940 को दिल्लीं में जन्में  कवि देवेन्द्र कुमार 27 वर्षों  तक प्रतिष्ठित बाल पत्रिका ‘नंदन’ के  साथ जुड़े रहे। बाल कहानियों और कविताओं की कई पुस्‍तकें प्रकाशित। उनकी कुछ बाल कविताएं-

आइसक्रीम

आइसक्रीम-आइसक्रीम
ठंडम-ठंडम आइसक्रीम

धत तेरी गरमी तो देखो
पिघल गई लो आइसक्रीम

अब क्या  होगा कैसे होगा
पिघल गई लो आइसक्रीम

बर्फ मंगाओ इसे जमाओ
जम जाए तो मिलकर खाओ

मेरी मानो तो कहता हूँ
झटपट खाओ, खाते जाओ

जैसी भी है, अच्छी ही है
आइसक्रीम-आइसक्रीम

ठंडम-ठंडम आइसक्रीम
पिघलम-पिघलम आइसक्रीम।

फूल महकते हैं

पापाजी जब हँसते हैं
मम्मी खुश हो जाती हैं
मौसम रंग बदलता है

दोनों मुझे बुलाते हैं
ढेरों प्यार जताते हैं
जो मांगो मिलता है

मम्मीं सुंदर दिखती हैं
पापा अच्छे लगते हैं
घर में फूल महकते हैं।

हँसने का स्कूल

पहले सीखो खिल-खिल खिलना
बढ़कर गले सभी से मिलना
सारे यहीं खिलेंगे फूल
यह है हँसने का स्कूल

जल्दी  आकर नाम लिखाओ
पहले हँसकर जरा दिखाओ
बच्चे जाते रोना भूल
यह है हँसने का स्कूल

झगड़ा-झंझट और उदासी
इसको तो हम देंगे फांसी
हँसी-खुशी से झूलम झूल
यह है हँसने का स्कूल।

चूहा किताबें पढ़ता है

पढ़ते-पढ़ते खाता है
जाने किसे सुनाता है
हर पुस्तक पर चढ़ता है
चूहा किताबें पढ़ता है

अभी भगाया झट फिर आया
इसने शब्दकोश है खाया
ज्ञान इसी से बढ़ता है
चूहा किताबें पढ़ता है

बार-बार पिंजरा लगवाया
फिर भी चुंगल में न आया
मेरा पारा चढ़ता है
चूहा किताबें पढ़ता है।

दादी का मौसम

गरमी को पानी से धोएं
बारिश को हम खूब सुखाएं
जाडे़ को फिर सेंक धूप
में दादी को हम रोज खिलाएं

कैसा भी मौसम आ जाए
उनको सदा शिकायत रहती
इससे तो अच्छा यह होगा
उनका मौसम नया बनाएं

कम दिखता है, दांत नहीं हैं
पैरों से भी नहीं चल पातीं
बैठी-बैठी कहती रहतीं
ना जाने कब राम उठाए

शुभ-शुभ बोलो प्यारी दादी
दर्द भूलकर हँस दो थोड़ा
आंख मूंदकर लेटो अब तुम
बच्चे मीठी लोरी गाएं।

गड़बड़झाला

आसमान को हरा बना दें
धरती नीली पेड़ बैंगनी
गाड़ी नीचे ऊपर लाला
फिर क्या होगा- गड़बड़झाला

दादा मांगें दांत हमारे
रखगुल्ले हों खूब करारे
चाबी अंदर बाहर ताला
फिर क्या होगा- गड़बड़झाला

दूध गिरे बादल से भाई
तालाबों में पड़ी मलाई
मक्खी बुनती मकड़ी जाला
फिर क्या‍ होगा- गड़बड़झाला।

मीठी अम्मा

ताक धिना धिन
ताल मिलाओ
हँसते जाओ
गोरे गोरे
थाल कटोरे
लो चमकाओ

चकला बेलन
मिलकर बेलें
फूल फुलकिया
अम्मा मेरी
खूब फुलाओ

भैया आओ
मीठी-मीठी
अम्मा को भी
पास बुलाओ
प्यारी अम्मा
सबने खाया
अब तो खाओ।

सड़कों की महारानी

सुनो कहानी रानी की
सड़कों की महारानी की

झाड़ू लेकर आती है
कूड़ा मार भगाती है
सड़कें चम चम हो जाएं
वह प्यारी है नानी की

धूल पुती है गालों पर
जाले उलझे बालों पर
फिर भी हँसती रहती है
बात बड़ी हैरानी की

आओ उसके दोस्त बनें
अच्छी-अच्छी बात सुनें
बस कूड़ा ने फैलाएं
शर्त यही महारानी की।

दिल्ली के रिक्शा वाले

ये बंगाल बिहार उड़ीसा
उधर हिमाचल मध्य प्रदेश
दूर-दूर से चलकर आए
ये दिल्ली के रिक्शावाले

पहियों के संग पहिए बनकर
सारा दिन हैं पैर घुमाते
मेहनत पीते, मेहनत खाते
ये दिल्ली के रिक्शा वाले

सर्दी में भी बहे पसीना
कैसा मुश्किल जीवन जीना
सच्चे अच्छे परदेसी हैं
ये दिल्ली के रिक्शावाले

मुनिया, बाबा, अम्मा, भैया
सबको भूल चले आए हैं
न जाने कब वापस जाएं
ये दिल्ली  के रिक्शा वाले।

चालाक चिडिय़ा और दो गप्पी

ये दो बाल कहानियां मुंशी प्रेमचंद के नाती और वरिष्‍ठ लेखक प्रबोध कुमार से प्राप्‍त हुई हैं। उनका कहना है कि उनकी मां कमला देवी (प्रेमचंद जी की पहली संतान) ये कहानियां बचपन में हम भाई-बहन को सुनाती थीं-

चालाक चिडिय़ा

एक पेड़ पर एक घोंसला था जिसमें चिड़ा और चिडिय़ा की एक जोड़ी रहती थी। एक दिन चिडिय़ा ने चिड़ा से कहा, ‘‘आज मेरा मन खीर खाने को कर रहा है, जाओ जाकर कहीं से चावल, दूध और चीनी ले आओ।’’ चिड़ा ने चिडिय़ा को समझाया, ‘‘आजकल बहुत महंगाई है। लोग चावल खाते नहीं है या कम खाते हैं। चावल लाने में बड़ी मुसीबत है, लोग झट भगा देते हैं। और दूध ? उसका भी मिलना बड़ा कठिन है और मिला भी तो दूध के नाम सफेद पानी ! कहीं ऐसा भी दूध होता है भला- न गाढ़ापन और न चिकनाई ! और चीनी ? अरे बाप रे ! बिल्कुल नदारद, लोग तरस रहे हैं चीने के लिए ! ऐसे में कैसे बनेगी तुम्हारी खीर ?  हाँ, खिचड़ी-विचड़ी बनाना चाहो तो बना लो हालांकि वह भी सरल नहीं है।’’
पर स्त्री की जिद बुरी होती है। चिडिय़ा बोली,  ‘‘नहीं,  खीर ही बनेगी। जाओ इंतजाम करो और नहीं तो दूसरी चिडिय़ा तलाश लो, मैं बाज आई ऐसे कामचोर चिड़ा से। अरे ये झंझट तो रोज की है और इन्हीं के लिए बैठे रहो तो हो गई जिंदगी। मैं रोज तो किसी बड़ी चीज की फरमाइश करती नहीं हूँ। कभी कुछ अच्छा खाने का मन हुआ भी तो तुम ऐसे निखट्टू हो कि वह साध भी पूरी करने में इधर-उधर करते हो। मैं खीर खाऊँगी और आज ही खाऊँगी। अब जाओ जल्दी से और करो सारा इंतजाम। खीर क्या मैं अकेली खाऊँगी, तुम्हे भी तो मिलेगी।’’ अब चिड़ा करे तो क्या करे ! निकला खीर की सामग्री जुटाने। जैसे-तैसे चावल लाया,  दूध लाया और चीनी नहीं मिली तो कहीं से गुड़ ले आया।
चिडिय़ा तो बस खुशी से निहाल हो उठी और लगी चिड़ा को प्यार करने। खैर, खीर पकाई गई। दूध के उबाल की सोंधी महक चिडिय़ा की तो नस-नस में नशा छा गई। खीर तैयार हो जाने पर चिड़ा से कहा, ‘‘थोड़ी ठंडी हो जाए तब हम खीर खाएँगे। तब तक मैं थोड़ा सो लेती हूँ और तुम भी नहा-धोकर आ जाओ। चिड़ा नहाने चला गया तो चिडिय़ा ने सारी खीर चट कर डाली। और फिर झूठ-मूठ में सो गई। नहा-धोकर चिड़ा लौटा तो देखा चिडिय़ा सो रही है। उसने चिडिय़ा को जगाया और कहा, ‘‘मुझे बहुत भूख लगी है, चलो खीर खाई जाए। चिडिय़ा बोली, ‘‘तुम खुद निकालकर खा लो और जो बचे उसे मेरे लिए हांडी में ही रहने दो,  मैं तो अभी थोड़ा और सोऊँगी। आज इतनी थक गई हूँ खीर बनाते-बनाते कि कुछ मत पूछो !’’
चिड़ा ने छोटी-सी खीर की हाँड़ी में चोंच डाली तो खीर की जगह उसकी चोंच में चिडिय़ा की बीट आ गई। सारी खीर खाकर चिडिय़ा ने छोड़ी हाड़ी में बीट जो कर दी थी। चिड़ा गुस्से से चिल्ला पड़ा, ‘‘सारी खीर खाकर और हांड़ी में बीट कर अब नींद का बहाना कर रही हो !’’ चिडिय़ा ने अचरज दिखाते हुए कहा, ‘‘यह तुम क्या कह रहे हो ? मैं तो थकावट के मारे उठ तक नहीं पा रही हूँ और तुम मुझ पर झूठा इलजाम लगा रहे हो ? मैंने खीर नहीं खाई । मुझे क्या पता कौन खा गया। मैं तो खुद अब भूखी हूँ।’’ चिड़ा फिर चिल्लाया,  ‘‘अच्छा, खाओ कसम कि तुमने खीर नहीं खाई।’’ चिडिय़ा बोली,  ‘‘मैं तैयार हूँ। बोलो कैसे कसम खाऊँ।’’ चिड़ा ने कहा, ‘‘चलो, मेरे साथ कुएँ पर चलो तो बताता हूँ।’’ दोनों कुएँ पर गए। चिड़ा ने एक कच्चा, सूत का धाग कुएँ के एक किनारे से दूसरे किनारे तक बाँधा और चिडिय़ा से कहा,  ‘‘इस धागे को पकड़कर इस ओर से उस ओर तक जाओ। यदि तुमने खीर खाई होगी तो धागा टूट जाएगा और तुम पानी में गिर जाओगी। और जो नहीं खाई होगी तो मजे से इस ओर से उस ओर पहुंच जाओगी।’’ चिडिय़ा धागे पर चली। खीर से उसका पेट भरा था। उसने तो सचमुच खीर खाई थी। चिड़ा से वह झूठ बोली थी सो बीच रास्ते में धागा टूट गया और वह धम्म से पानी में जा गिरी। चिड़ा गुस्से में उसे  झूठी,  बेईमान  कहता वहां से उड़ गया और चिडिय़ा पानी में फडफ़ड़ाने लगी।
तभी शिकार की खोज में एक बिल्ली कुएँ पर पहुँची। उसकी नजर चिडिय़ा पर पड़ी वह सावधानी से कुएँ में उतरी और चिडिय़ा को मुँह में दबाकर निकाल लाई। बिल्ली ने अब चिडिय़ा को खाना चाहा। चिडिय़ा तो चालाक थी ही,  झट बोली, ‘‘बिल्ली रानी, अभी मुझे खाओगी तो मजा नहीं आएगा। थोड़ा ठहर जाओ। मुझे धूप में सूखने रख दो,  मेरे पंख सूख जाएँ तब खा लेना। और हाँ, न हो तो तुम भी मेरे पास बैठ जाना। तुम भी गीली हो गई हो। धूप में सूख भी जाओगी और मेरे ऊपर नजर भी रख सकोगी।’’
बिल्ली को चिडिय़ा की बात जँच गई। उसने चिडिय़ा को धूप में सूखने के लिए रख दिया और खुद भी वहीं पास में बैठ धूप का मजा लेने लगी। चिडिय़ा के पंख धीरे-धीरे सूखने लगे। गीले पंख लेकर वह ठीक से उड़ नहीं सकती थी। इसलिए उसने बिल्ली को यह सलाह दी थी। उसने सोचा था, जैसे ही मेरे पंख सूखें और मुझ में उडऩे की शक्ति आई फिर देखूँगी बिल्ली रानी मेरा क्या बिगाड़ सकती है ! इधर बिल्ली सावधान थी। इसकी पूरी नजर चिडिय़ा पर थी, पर वह धूप की गरमाहाट का मजा भी ले रही थी। चिडिय़ा के पंख जब काफी कुछ सूख गए और उसे लगा कि अब वह ठीक से उड़ सकती है तब उसने बिल्ली की ओर नजर फेरी। बिल्ली उसे पूरी तरह सावधान दिखी। उसने बिल्ली से कहा, ‘‘बिल्ली रानी,  मेरे पंख बस सूखने ही वाले हैं। वे सूख जाएँ तो तुम्हें अपनी पसंद का गरम-गरम गोश्त खाने को मिल जाएगा पर हाँ, बिल्ली रानी,  उसके पहले आँखे बंद कर तुम थोड़ी देर भगवान का ध्यान कर लो तो कितना अच्छा रहे ! भगवान का स्मरण कर मुझे खाओगी तो मेरा अगला जीवन सुधर जाएगा और मेरा कल्याण करने से भगवान भी तुमसे बहुत प्रसन्न होंगे।’’ चिडिय़ा की सलाह बिल्ली को अच्छी लगी। उसने आँखें बंद कर लीं और भगवान का स्मरण करने लगी। चालाक चिडिय़ा तो इसी मौके का इंतजार कर रही थी। जैसे ही बिल्ली की आँखें बंद हुईं वह फुर्र से उड़ कर एक पेड़ पर जा बैठी और बोली, ‘‘ बिल्ली रानी, आँखें खोलकर देखा तो सही मेरे पंख कैसे सूख गए ! ’’ बिल्ली ने आँखें खोली तो चिडिय़ा को पेड़ पर बैठी देख उसके गुस्से का ठिकाना न रहा। वह चिल्ला पड़ी,  ‘‘बेईमान, धोखेबाज चिडिय़ा….।’’ लेकिन बिल्ली की गालियाँ सुनने वाला पेड़ पर अब कौन था। चिडिय़ा तो आसमान में चहचहाती इधर-उधर चक्कर लगा रही थी। बिल्ली अपनी मूर्खता पर खिसिया कर रह गई और चिडिय़ा के गोश्त का स्वाद याद करते-करते अपनी जीभ अपने ही मुँह पर फेरने लगी।

दो गप्पी

एक छोटे से शहर में दो गप्पी रहते थे। दूर की हाँकने वाले। अपने को सबसे बड़ा बताने वाले। एक दिन दोनों में ठन गई। देखें कौन बड़ा गप्पी है। शर्त लग गई। जो जीते दो सौ रुपये पाए और जो हारे वह दो सौ रुपये दे।
बात शुरू हुई। गप्पें लगने लगीं। पहला बोला, ‘‘ मेरे बाप के पास इतना बड़ा, इतना बड़ा मकान था कि कुछ पूछो मत। बरसों घूमों,  दिन-रात घूमों पर उसके
ओर-छोर का पता न चले।’’ दूसरे ने कहा, ‘‘सच है भाई, वह मकान सचमुच इतना बड़ा रहा होगा।’’ उसे मालूम था कि पहला गप्पी बिल्कुल झूठ बोल रहा है, लेकिन इस होड़ में यह शर्त थी कि कोई किसी को झूठा नहीं कहेगा, नहीं तो शर्त हार जाएगा। इसीलिए उसे, ‘सच है भाई’, कहना पड़ा।
पहला गप्पी फिर बोला,  ‘‘उस बड़े मकान में घूमना बहादुरों का काम था, कायरों का नहीं। मेरे बाप ने उस मकान को ऐसे बनवाया था- ऐसा, जैसे चीन की दीवार हो। बाप भी मेरे बस दूसरे भीमसेन ही थे- इतने तगड़े, इतने तगड़े कि बस हाँ।
दूसरा गप्पी बोला, ‘‘भाई,  मेरे बाप के पास इतना लम्बा बाँस था कि कुछ पूछो मत- इतना लम्बा कि तुम्हारे बाप के मकान के इस सिरे से डालो तो उस सिरे से निकल जाए और फिर भी बचा रहे। उस बाँस से यदि आसमान को छू दो तो बस छेद हो जाए आसमान में और झर-झर-झर वर्षा होने लगे, पानी की धार लग जाए।’’
पहले गप्पी ने कहा,  ‘‘ठीक है भाई ठीक है, और अब मेरी सुनो- मेरे बाप उस मकान से निकले तो उन्हें मिल गई एक घोड़ी। घोड़ी क्या थी, हिरण बछेड़ा थी। हवा से बातें करती थी- उड़ी सो उड़ी, कहो दुनिया का चक्कर मार आए। हाँ,  तो बाप थे मेरे घोड़ी पर सवार और तभी किसी कौए ने बीट कर दी घोड़ी पर और उग आया उस पर एक पीपल का पेड़। मेरे बाप तो आखिर मेरे बाप ही थे न। अकल में भला कोई उनकी बराबरी कर सकता था। उन्होंने झट पीपल के पेड़ पर मिट्टी डाली और खेत तैयार कर उसमें ज्वार बो दी। अब बिना पानी के ज्वार बढ़े तो कैसे बढ़े ! पानी बरस नहीं रहा था। लोग परेशान थे। फसलें बर्बाद हो रही थीं। बस समझो कि अकाल पड़ गया था, अकाल ! तभी मेरे बाप को वह लम्बा बाँस याद आया जिससे तुम्हारे बाप आसमान में छेदकर पानी बरसाते थे। बस घोड़ी पर सवार मेरे बाप तुम्हारे बाप के घर पहुँच गये और उन्हें पानी बरसाने के लिए मना लिया। फिर क्या कहना था ! जहां-जहां तुम्हारे बाप आसमान में छेद कर पानी बरसाते, वहां-वहां मेरे बाप घोड़ी को ले जाते और जहां-जहां घोड़ी जाती, वहां-वहां पीपल और जहां-जहां पीपल, वहां-वहां ज्वार का खेत। भाई मेरे, कुछ पूछो न ! ऐसी ज्वार हुई, ऐसी ज्वार हुई जैसे मोती- सफेद झक्क और मोटे दाने। ज्वार क्या थी भाई, अमृत था ! अब जो तुम्हारे बाप ने देखी वैसी अजूबा ज्वार तो मचल गए और पांच सौ रुपये की ज्वार लेकर ही रहे। मेरे बाप ने पैसे माँगे तो बोले, ‘अभी मेरे पास नहीं हैं, उधार दे दो।’ मेरे बाप बड़े दरियादिली तो थे ही, उन्होंने उधार दे दी ज्वार। और भाई क्या कहें, तुम्हारे बाप भी बड़े ईमानदार थे। उन्होंने कहा, ‘अगर मैं यह कर्ज न उतार सकूँ तो मेरे बेटे से पूरे पैसे ले लेना। मेरा बेटा बहुत अच्छा है और अच्छे बेटे अपने बाप का कर्ज जरूर अदा करते हैं।’’
दूसरे गप्पी ने यह सूना तो उसकी तो बोलती बंद ! न तो वह,  सच है भाई,  कह सकता था न,  झूठ है,  ही कह सकता था। सच कहता तो पाँच सौ रुपये का कर्ज चुकाना पडे़गा और झूठ कहता तो शर्त हारने के दो सौ रुपये देने पड़ेंगे। मतलब यह कि इधर कुँआ तो उधर खाई। उसने सोचा कुँए से तो खाई ही भली। वह झट बोला, ‘‘झूठ-झूठ-झूठ मेरे बाप ने कभी तुम्हारे बाप से पाँच सौ रुपये की ज्वार नहीं ली।’’ उसका इतना कहना था कि पहला गप्पी बोला, ‘‘मैं जीत गया, लाओ दो सौ रुपये दो।’’ दूसरे गप्पी ने दो सौ रुपये देकर अपनी जान छुड़ाई।

चित्रांकन : प्रगति त्‍यागी, कक्षा-11

रमेश तैलंग के बाल गीत

रमेश तैलंग के शीघ्र प्रकाश्य बाल-गीत संग्रह ‘काठ का घोड़ा टिम्मक टूँसे कुछ नये मनोरंजक बाल-गीत-

माँ जो रूठे

चाँदनी का शहर, तारों की हर गली
माँ की गोदी में हम घूम आए।
नीला-नीला गगन चूम आए।

पंछियों की तरह पंख अपने न थे,
ऊँचे उड़ने के भी कोई सपने न थे,
माँ का आँचल मिला हमको जबसे मगर
हर जलन, हर तपन भूल आए।
नीला-नीला गगन चूम आए।

दूसरों के लिए सारा संसार था,
पर हमारे लिए माँ का ही प्यार था
सारे नाते हमारे थे माँ से जुड़े
माँ जो रूठे तो जग रूठ जाए।
नीला-नीला गगन चूम आए।

अम्माँ की रसोई में

हल्दी दहके
धनिया महके
अम्माँ की रसोई में।

आन बिराजे हैं पंचायत में
राई और जीरा,
पता चले न यहाँ किसी को
राजा कौन फकीरा
सिंहासन हैं ऊँचे सबके
अम्माँ की रसोई में।

आटा-बेसन, चकला-बेलन
घूम रहे हैं बतियाते,
राग-रसोई बने प्यार से
ही, सबको ये समझाते,
रूखी-सूखी से रस टपके
अम्माँ की रसोई में।

थाली- कडुछी और कटोरी
को सूझी देखो मस्ती,
छेड़ रही है गर्म तवे को
दूर-दूर हँसती-हँसती,
दिखलाती हैं लटके-झटके
अम्माँ की रसोई में।

समुंदर की लहरों!

समुंदर की लहरों, उछालें न मारो।
हवाओं का गुस्सा न हम पर उतारो।

बनाएंगे बालू के घर हम यहाँ पर,
जगह ऐसी पाएंगे सुंदर कहाँ पर?

न यू अपनी ताकत की शेखी बघारो,
कभी झूठी-झूठी ही हमसे भी हारो।

हमें तो यहाँ पर ठहरना है कुछ पल,
दिखा लेना गुस्से के तेवर कभी कल,

करो दोस्ती हमसे, बाँहें पसारो।
बहो धीरे-धीरे, थकानें उतारो।

समुंदर की लहरों, उछालें न मारो।

जम्हाई, जम्हाई, जम्हाई, जम्हाई !

दद्दू को आई तो दादी को आई,
जम्हाई, जम्हाई, जम्हाई, जम्हाई!

लगा छूत का रोग जैसे सभी को
मुँह खोले बैठे हैं सारे तभी तो,
करे कोई कितनी भी क्यों न हँसाई।
जम्हाई, जम्हाई,जम्हाई, जम्हाई!

छुपाए न छुपती, रूकाए न रूकती,
बिना बात छाने लगी सब पे सुस्ती,
हमने तो चुटकी भी चट-चट बजाई।
जम्हाई, जम्हाई,जम्हाई, जम्हाई!

हद हो गई अब, दवा कोई देना,
जम्हाई को आ कर भगा कोई देना,
न फिर से हमें घर में दे ये दिखाई।
जम्हाई, जम्हाई,जम्हाई, जम्हाई!

बारिश के मौसम के हैं कई रूप

पिछली गली में झमाझम पानी
अगली गली में है सुरमई धूप
बारिश के मौसम के हैं कई रूप।

माई मेरी, देखो चमत्कार कैसा,
धोखाधड़ी का ये व्यापार कैसा,
किसना की मौसी की टोकरी में ओल,
बिसना की मोसी का सूखा है सूप।

सुनता नहीं सबकी ये ऊपर वाला,
उसके भी घर में है गड़बड़ घोटाला
चुन्नू के घर में निकल गए छाते
मुन्नू के घर वाले रहे टाप-टूप।

बारिश के मौसम के हैं कई रूप ।

वाह, मेरे किशन कन्हाई!

मेट्रो में घूमे न शापिंग मॉल देखा,
मूवी-मूवी देखी न सिनेमाहॉल देखा,
माखन के चक्कर में खाई पिटाई।
वाह मेरे, वाह मेरे किशन कन्हाई!

बाँसुरी की धुन में ही मस्त रहे हर दिन,
काम कैसे चल पाया सेलफोन के बिन ?
थाम के लकुटिया बस गैया चराई।
वाह मेरे, वाह मेरे किशन कन्हाई!

काश कहीं द्वापर में इंटरनेट होता,
ईमेल से सबका कांटेक्ट होता,
गली-गली ढूँढ़ती न फिर जसुदा माई।
वाह मेरे, वाह मेरे किशन कन्हाई!

रजत की क्यारी में पिल्ले : डा. सुनीता

चर्चित लेखिका डा. सुनीता की  बाल कहानी-

पिछले दो दिनों से भूरे रंग की एक कुतिया आकर रजत के घर के बाहर बनी क्यारी में, जब देखो तब बैठी दिखाई देती थी। रजत और उसके दोस्तों ने उसका नाम भूरी रख दिया था। उन्हें भूरी का इस तरह दिन भर एक ही जगह बैठे रहना अजीब लगता था।
एक दिन रजत ने मम्मी से पूछा, ’’मम्मी, क्या यह बीमार है? यह कल से यहीं बैठी है। कहीं और क्यों नहीं जाती?’’
रजत की मम्मी अंजली जी उसे देखकर समझ गईं कि यह पिल्लों को जन्म देने वाली है। उन्होंने रजत से कहा, ‘‘बेटे, इसे मारना नहीं। शायद इसकी तबीयत ठीक नहीं है। ठीक होते ही अपने आप चली जाएगी।’’
रजत ने देखा, भूरी बहुत उदास आँखों से उसे देख रही थी। वह भीतर जाकर एक रोटी ले आया और उसे खिलाने की कोशिश करने लगा। भूरी ने धीरे से एकाध टुकड़ा खाया, बाकी रोटी वहीं पड़ी रही।
अगले दिन इतवार था। उस दिन रजत को स्कूल नहीं जाना था, इसलिए वह देर से उठा। उठते ही उसने मम्मी से पूछा, ‘‘मम्मी, वो चली गई?’’
‘‘कौन?’’ मम्मी समझ नहीं पाईं, रजत किसके बारे में पूछ रहा है।
‘‘वही जो कल से हमारी क्यारी में बैठी थी?’’
‘‘अरे, मैंने तो देखा ही नहीं। चलो, देखते हैं।’’
रजत और उसकी मम्मी गेट का ताला खोलकर ज्यों ही क्यारी के पास आए, तो रजत खुशी से चीख पड़ा, ‘‘मम्मी, देखो-देखो, वन-टू-थ्री-फोर… चार-चार पिल्ले! एक काला, एक भूरा, एक धब्बे वाला और चौथा काला और सफेद।’’ वह खुशी से तालियाँ बजाने लगा और तुरंत दौड़कर अपने दोस्त अमित और साबिर को बुला लाया।
तीनों क्यारी के भीतर पिल्ले उठाने जा रहे थे, तो अंजली ने बड़ी मुश्किल से उन्हें रोका,  ‘‘नहीं बेटे, अभी उनके पास मत जाओ। वे बहुत छोटे हैं। उनकी अभी आँखें भी नहीं खुली हैं। और उनकी माँ को देखा है? इस समय वह अपने बच्चों को हाथ भी नहीं लगाने देगी। काट लेगी, इसलिए दूर से देखो।’’
रजत ठिन-ठिन करने लगा और पिल्ले लेने के लिए मचलने लगा। अपनी आँखों के ठीक सामने बिल्कुल रेशम की तरह चमकते चार-चार सुंदर पिल्लों को देखकर वह किसी भी तरह अपने पर काबू नहीं रख पा रहा था।
अंजली जी ने कहा, ‘‘अच्छा बेटे, ठीक है! पहले इसे कुछ खाने के लिए देते हैं। फिर इसे लगेगा कि हम इसके दोस्त हैं, तो यह हमें अपने पास आने देगी। तभी हम इसके पिल्लों को छू सकेंगे।’’
रजत और उसके दोस्त मान गए और गेट के पास ही बनी सीढिय़ों पर बैठ गए। अंजली ने फटाफट लपसी बनाई और उसे एक खुली-सी प्लेट में डाल दिया। फिर वह बाहर ले आईं। कुछ देर बाद अंजली जी हाथ में लपसी की प्लेट लिए क्यारी के अंदर गईं।
पहले तो पिल्लों की माँ अंजली को चौकन्नी होकर देखती रही। फिर विश्वास हो जाने पर, उसने धीरे-धीरे लपसी खाना शुरू किया! अंजली ने धीरे से उसके सिर पर हाथ फेरा, तो उसकी आँखों में कृतज्ञता उभर आई। फिर धीरे से अंजली ने पिल्लों को भी छुआ। इतने में ही जैसे ही रजत और उसके दोस्त क्यारी के अंदर आने लगे, तो वह जोर से गुर्राई। अंजली ने फिर धीरे-से उसे पुचकारा तो उसे अहसास हो गया कि ये मेरे दोस्त ही हैं, दुश्मन नहीं।
अब रजत, अमित और साबिर ने भी उन्हें डरते-डरते छुआ। पर जैसे ही रजत ने एक पिल्ले को उठाने की कोशिश की, तो उनकी माँ फिर गुर्राई। रजत फौरन क्यारी से बाहर हो गया।
खैर, अगले दिन से पिल्लों और उनकी माँ से रजत और उसके दोस्तों की जान-पहचान हो गई। अब वे उन्हें गोद में उठा सकते थे। रजत तो जितना समय मिलता, पिल्लों के आसपास ही बिताता। अब स्कूल जाना भी उसे अच्छा नहीं लगता था। उसे लगता था, सारे खिलौने एक तरफ और ये पिल्ले एक तरफ। यही उसके सबसे अच्छे खिलौने हैं।
कुछ दिन बाद पिल्लों की आँखें खुल गईं और वे घर के अंदर भी आने लगे। अंजली उन्हें दिन में तीन बार एक खुली प्लेट में दूध देती थीं जिसे वे पिल्ले अपनी पूँछ हिलाते हुए और एक-दूसरे से होड़ लगाते हुए, पाँच-सात मिनट में ही सफाचट कर जाते। रजत इस सीन में इतना तन्मय और खुश होता कि ऐसे समय उसे कोई वहाँ से हिला नहीं सकता था। जितनी तेजी से वे दूध पीते, उतनी तेजी से उनकी पूँछ हिलती थी। कभी-कभी तो यह देख, रजत की मम्मी को जोर से हँसी आ जाती थी।
पिल्ले कुछ और बड़े हुए तो उन्होंने दौडऩा-भागना शुरू किया। रजत या उसके मम्मी-पापा में से कोई भी घर से बाहर जाता, तो वे थोड़ी दूर तक उसके साथ-साथ जरूर जाते- एक-दूसरे से कुश्तियाँ लड़ते हुए, और फिर वापस क्यारी के आसपास ही बने रहते।
पिछले दो दिन से रजत को एक नया खेल मिल गया है। वह पिल्ले की पूँछ पकड़ता है, तो पिल्ले की दोनों पिछली टाँगें उठ जाती हैं। फिर वह अगली दो टाँगों से चलता है। पूँछ जोर से पकड़े जाने पर पिल्ले को जोर से दर्द होता है, तो वह ‘कैं-कैं, कैं-कैं’ करके चिल्लता है। इस पर रजत खुश होकर ताली पीटता है। यह खेल वह अपने दोस्तों को भी दिखाने लगा है।
कल जब रजत की मम्मी ने उसे ऐसा करते देखा, तो उसे पहले डाँटा और फिर प्यार से समझाया, ‘‘बेटे, अगर कोई तुम्हारी एक टाँग पकड़कर ऊपर उठा दे, तो तुम्हें कितना दर्द होगा? बस, वैसे ही समझ लो, इन पिल्लों को भी दर्द होता है। तभी तो ये दर्द से चिल्लाते हैं। ये बोल नहीं सकते, पर इसका मतलब यह तो नहीं कि हम इन्हें अपने मजे के लिए बेवजह परेशान करते रहें। मेरी बात समझ रहे हो न रजत? आगे से ऐसा नहीं करोगे न?’’
‘‘नहीं!’’ रजत ने धीरे से कहा। पर उसका मन कुछ और कह रहा था।
इसके थोड़े ही दिन बाद की घटना है। रजत अब घर के अंदर पिल्लों की पूँछ नहीं पकड़ता था। पर स्कूल जाते हुए जब पिल्ले बस स्टॉप तक उसके पीछे-पीछे चलते तो उसका मन बेकाबू हो जाता। उसके हाथ उनकी पूँछ पकडऩे को मचलने लगते।
आज सुबह ऐसा ही हुआ। रजत स्कूल की बस पकडऩे जा रहा था। आदतन पिल्ले भी खूब उछलते-कूदते उसके पीछे चल पड़े। रजत ने फौरन एक पिल्ले की पूँछ पकड़ी और उसे जमीन से ऊपर उठा दिया। पिल्ला जोर-जोर से कैं-कैं करके चिल्लाने लगा। तभी उसकी माँ झटपट कहीं से भागती हुई आई और जिस हाथ से रजत ने पूँछ पकड़ी थी, वहीं काट लिया। बस आ चुकी थीं, पर रजत के हाथ से खून टपकता देख और उसे रोते देख, कंडक्टर उसे घर छोड़ गया।
रोते हुए रजत ने मम्मी को बताया कि उसे पिल्ले की माँ ने काट लिया है।
मम्मी घाव धोते हुए बोलीं, ‘‘मना किया था न तुम्हें, पर तुम नहीं माने। अब देख लिया न, किसी को बेवजह परेशान करने का क्या नतीजा होता है!’’
अंजली उसे तुरंत डॉ. वर्मा के यहाँ ले गईं। डाक्टर ने ऐंटी-रैबीज के पाँच इंजेक्शन एक दिन छोड़कर लगने की बात कही। सुनकर रजत की हालत खराब हो गई। उसकी मम्मी अलग परेशान!
अब रजत के घाव पर पट्टी बँधी है। एक दिन छोड़कर इंजेक्शन भी लग रहे हैं। उसे अपनी गलती का अहसास हो गया है। पिल्ले तो पिल्ले हैं। वे अब भी उसके आगे-पीछे घूमते हैं। कभी उसका पैर चाट लेते हैं, कभी हाथ! पर अब रजत ने सोच लिया है कि वह नाहक किसी को परेशान नहीं करेगा। वैसे भी ये पिल्ले तो उसके सबसे खूबसूरत और जानदार खिलौने हैं। फिर उन्हें तंग करने और रुलाने से फायदा ?

हिदी के कुछ प्रसिद्ध कवियों की बाल कविताएँ

हिंदी के सुप्रसि‍द्ध कवि‍ श्रीधर पाठक, महावीर प्रसाद द्विवेदी, बालमुकुंद गुप्त, सुखराम चौबे गुणाकर, कामता प्रसाद गुरु, प. सुदर्शनाचार्य और राजर्षि पुरुषोत्तम टंडन की बाल कवि‍ताएं-

देल छे आए : श्रीधर पाठक

बाबा आज देल छे आए,
चिज्जी-पिज्जी कुछ ना लाए!
बाबा क्यों नहीं चिज्जी लाए,
इतनी देली छे क्यों आए?
का है मेला बला खिलौना,
कलाकद लड्डू का दोना।
चू चू गाने वाली चिलिया,
चीं चीं करने वाली गुलिया।
चावल खाने वाली चुइया,
चुनिया मुनिया मुन्ना भइया।
मेला मुन्ना मेली गैया,
का मेले मुन्ना की मैया।
बाबा तुम औ का से आए,
आ-आ चिज्जी क्यों न लाए?

कोकिल : महावीर प्रसाद द्विवेदी

कोकिल अति सुदर चिड़िया है,
सच कहते हैं अति बढ़िया है।
जिस रगत के कुवर कन्हाई,
उसने भी वह रगत पाई।
बौरों की सुगध की भाती,
कुहू-कुहू यह सब दिन गाती।
मन प्रसन्न होता है सुनकर,
इसके मीठे बोल मनोहर।
मीठी तान कान में ऐसे,
आती है वशीधुनि जैसे।
सिर ऊंचा कर मुख खोलै है,
कैसी मृदु बानी बोलै है!
इसमें एक और गुण भाई,
जिससे यह सबके मन भाई।
यह खेतों के कीड़े सारे,
खा जाती है बिना बिचारे।

हिम्मत : बालमुकुंद गुप्त

‘कर नहीं सकते हैं’ कभी मुँह से कहो न यार,
क्यों नहीं कर सकते उसे, यह सोचो एक बार।
कर सकते हैं दूसरे पाँच जने जो कार,
उसके करने में भला तुम हो क्यों लाचार।
हो, मत हो, पर दीजिए हिम्मत कभी न हार,
नहीं बने एक बार तो कीजे सौ-सौ बार।
‘कर नहीं सकते’ कहके अपना मुँह न फुलाओ,
ऐसी हलकी बात कभी जी पर मत लाओ।
सुस्त निकम्मे पड़े रहें आलस के मारे,
वही लोग ऐसा कहते हैं समझो प्यारे।
देखो उनके लच्छन जो ऐसा बकते हैं,
फिर कैसे कहते हो कुछ नहिं कर सकते हैं?
जो जल में नहिं घुसे तैरना उसको कैसे आवे,
जो गिरने से हिचके उसको चलना कौन सिखावे।
जल में उतर तैरना सीखो दौड़ो, सीखो चाल,
‘निश्चय कर सकते हैं’ कहकर सदा रहो खुशहाल।

बनावटी सिंह : सुखराम चौबे गुणाकर

गधा एक था मोटा ताजा
बन बैठा वह वन का राजा!
कहीं सिंह का चमड़ा पाया,
चट वैसा ही रूप बनाया!
सबको खूब डराता वन में,
फिरता आप निडर हो मन में,
एक रोज जो जी में आई,
लगा गरजने धूम मचाई!
सबके आगे ज्यों ही बोला,
भेद गधेपन का सब खोला!
फिर तो झट सबने आ पकड़ा,
खूब मार छीना वह चमड़ा!
देता गधा न धोखा भाई,
तो उसकी होती न ठुकाई!

छड़ी हमारी : कामता प्रसाद ‘गुरु’

यह सुदर छड़ी हमारी,
है हमें बहुत ही प्यारी।
यह खेल समय हर्षाती,
मन में है साहस लाती,
तन में अति जोर जगाती,
उपयोगी है यह भारी।
हम घोड़ी इसे बनाएँ,
कम घेरे में दौड़ाएँ,
कुछ ऐब न इसमें पाएँ
है इसकी तेज सवारी।
यह जीन लगाम न चाहे,
कुछ काम न दाने का है,
गति में यह तेज हवा है,
यह घोड़ी जग से न्यारी।
यह टेक छलाँग लगाएँ,
उँगली पर इसे नचाएँ,
हम इससे चक्कर खाएँ,
हम हल्के हैं यह भारी।
हम केवट हैं बन जाते,
इसकी पतवार बनाते,
नैया को पार लगाते,
लेते हैं कर सरकारी।
इसको बंदूक बनाकर,
हम रख लेते कधे पर,
फिर छोड़ इसे गोली भर,
है कितनी भरकम भारी।
अधे को बाट बताए,
लगड़े का पैर बढ़ाए,
बूढ़े का भार उठाए,
वह छड़ी परम उपकारी।
लकड़ी यह बन से आई,
इसमें है भरी भलाई,
है इसकी सत्य बड़ाई,
इससे हमने यह धारी।

हाऊ और बिलाऊ : प. सुदर्शनाचार्य

किसी गाँव में थे दो भाई–
हाऊ और बिलाऊ,
दोनों में था बडा़ बिलाऊ
छोटा भाई हाऊ,
था धनवान बिलाऊ पर था
वह स्वभाव का खोटा,
था गरीब, पर चतुर बहुत था
हाऊ भाई छोटा।
गाय-बैल थे बहुत
बिलाऊ के घर रुपया-पैसा,
पर गरीब हाऊ के केवल
था एक बूढ़ा भैंसा।

बंदर सभा : राजर्षि पुरुषोत्तम टंडन

हियॉं की बातें हियनै रह गईं अब आगे के सुनौ हवाल,
गढ़ बंदर के देश बीच माँ पड़ा रहा एक खेत विशाल!
सौ जोजन लबा अरु चौड़ा अरबन बानर जाय समाय,
तामें बानर भये इकट्ठा जौन बचे वे आवैं धाय!
जब सगिरा मैदनवा भरिगा पूछें टोपी लगीं दिखाय,
सबके सब कुरसिन से उछले हाथ-पाँव से ताल बजाय!
इतने माँ मल्लू-सा आए, बंदरी और मुसाहिब साथ,
बंदरी बड़ी चटक-चमकीली थामे मल्लू-सा को हाथ!
ओढ़े गउन लगाए टोपी, हीरे जड़े पांत के पांत,
मटकत आवत भाव दिखावत, आखिर मेहरारू की जात!

(नीरजा स्‍मृति‍ बाल साहि‍त्‍य न्‍यास, सहारनपुर से प्रकाशि‍त और बाल साहि‍त्‍यकार कृष्‍ण शलभ द्वारा संपादि‍त पुस्‍तक बचपन एक समंदर से साभार)

फूलों की घाटी में एक दिन : प्रकाश मनु

वसंत ऋतु में खूबसूरत फूलों की घाटी में जाने का अवसर घर बैठे मि‍ल जाए तो मजा ही आ जाए। आइए, राजा हक्कू शाह के साथ सैर पर चलते हैं-
अगले दिन राजा हक्कू शाह अपने प्रमुख दरबारियों और सहायकों के साथ फूलों की घाटी देखने गए, तो शेर राजा बब्बू भी उनके साथ थे। राजा हक्कू शाह ने फूलों की घाटी के बारे में तरह-तरह की कहानियाँ सुनी थीं।
उन्होंने चलते-चलते रास्ते में शेर राजा बब्बू से पूछा तो उन्होंने कहा, ”आपने ठीक सुना है महाराज! वास्तव में फूलों की घाटी है ही इतनी सुंदर कि इसकी जितनी तारीफ की जाए, कम है। हम लोगों ने भी अपने पुरखों से सुना है कि यह फूलों की घाटी हजारों साल पुरानी है और इसकी सुंदर ऐसी ही अछूती है। सुना है कि पहले धरती पर वनदेवता रहा करते थे, तो उनका यही निवास था। उन्होंने अपने घर को मानो फूलों का घर बना लिया था और वही फूलों का घर यानी फूलों की घाटी मातुंगा जंगल का गौरव है और सारी धरती से यात्री और सैलानी यहाँ घूमने के लिए आते हैं।’’
सुनकर राजा हक्कू शाह मुस्कराते हुए बोले, ”अच्छा, तब तो इस फूलों की घाटी को देखकर मैं भी अपने आपको थोड़ा धन्य कर लूँ।’’
बातें करते-करते थोड़ी ही देर में वे मालिनी नदी के किनारे पर फैली फूलों की घाटी के प्रवेश-द्वार पर आ गए। सुगंधित हवा के झकोरों ने जैसे दूर ही घोषणा कर दी कि यही है फूलों की घाटी, यही!
राजा ने कुछ सोचते हुए कहा, ”हवाओं में कमल की सुगंध भी महसूस होती है। क्या यहाँ पास ही कमल सरोवर भी है?’’
शेर राजा बब्बू ने कहा, ”हाँ महाराज, आपने ठीक सोचा। फूलों की घाटी के बीच एक विशाल तालाब है, जहाँ कमल ही कमल खिलते हैं। एक नजर में वहाँ हजारों कमल नजर आते हैं। वे पानी में इस तरह सिर उठाए हँसते-मुस्कराते नजर आते हैं मानो प्रकृति का स्वागत-गीत गा रहे हों।’’
राजा हक्कू शाह अपनी मंडली और शेर राजा बब्बू के साथ फूलों की घाटी में आगे बढ़े, तो वहाँ चारों तरफ रंग-रंग के फूलों की ऐसी बहार नजर आई कि वे चकरा गए। बार-बार वे बब्बू राजा से पूछते, ”आपको इनके नाम पता हैं?’’ और बब्बू राजा मुस्कराते हुए जब उन फूलों के नाम और विशेषताएँ बता देते तो राजा हक्कू शाह का चेहरा खिल उठता।
फिर चारों ओर मधुर आवाजों के साथ-साथ उड़ते-फुदकते रंग-रंग के पक्षी भी फूलों की घाटी की सुंदरता को और बढ़ा रहे थे। राजा हक्कू शाह कुछ और आगे आ गए, तो सामने दिखाई दिया ‘हाथी द्वार’  जहाँ सात हाथियों ने आगे बढ़कर अपनी सूँड़ में पकड़ी हुई फूलों की मालाएँ राजा हक्कू शाह को पहनाईं।
कुछ आगे गए तो हृदय द्वार आया। यह फूलों की घाटी का सबसे अछूता हिस्सा था। यहाँ ऐसे अनोखे फूल थे कि राजा हक्कू शाह ने उनकी पहले कभी झलक तक नहीं देखी थी, उनके बारे में कभी सुना भी नहीं था। फूलों की घाटी का सबसे सुंदर दृश्य यहाँ नजर आ रहा था। तभी फूलों का मुकुट पहने हुए एक व्यक्ति आगे बढ़ा और राजा को तरह-तरह के रंग-बिरंगे फूलों से बना अद्भुत गुलदस्ता भेंट किया। राजा हक्कू शाह हैरान। उन्हें लगा, कहीं यह वनदेवता तो नहीं? पर बब्बू राजा ने बताया, ”यह रामलु काका हैं। बचपन से ही हम इन्हें देखते आ रहे हैं। यहीं रहते हैं। फूलों की दुनिया का आनंद लेते हैं और इन्हें एक-एक फूल के बारे में पता है।’’
राजा हक्कू शाह कुछ आगे गए तो कमल सरोवर नजर आया, जिसमें हल्के गुलाबी रंगों के फूलों की ऐसी अपार छवियाँ नजर आईं कि राजा को लगा, पैर यहाँ से हिलना ही नहीं चाहते। पास ही श्वेात कुमुदनी के फूल थे। राजा कुछ और आगे गए, तो फूलों के सात द्वार आए, जहाँ सुंदर पुष्पित लताएँ खुद-ब-खुद प्रवेश-द्वार जैसी बन गई थीं।
राजा बब्बू शाह को लगा, जैसे बस वे हमेशा-हमेशा के लिए यहीं रह जाएँ, यहाँ से कहीं और न जाएँ। उन्हें थोड़ी सी लज्जा भी आई। सारी दुनिया उन्हें घुम्मी घुम्मा राज्य का राजा कहती है जिसकी शान मातुंगा जंगल की वजह से ही है। और मातुंगा जंगल उनकी राजधानी टमटमपुर से कोई ज्यादा दूर भी नहीं है। फिर भी उन्होंने आज तक कभी इसे पास आकर फुर्सत से देखा ही नहीं।
उन्होंने बब्बू राजा से मन की बात कही, तो वे हँसकर बोले, ”कोई बात नहीं महाराज, पर अब आपकी आँखों से सारी दुनिया इसे देखेगी।’’
राजा हक्कू शाह के साथ-साथ कमालदास भी चल रहा था। राजा ने कमालदास से कहा, ”सुनो कमालदास, तुम मातुंगा जंगल पर जल्दी ही एक किताब लिखो। अद्वितीय होनी चाहिए वह किताब। उसमें यहाँ का रोचक वर्णन हो और यहाँ के सुंदर दृश्यों के लाजवाब फोटो भी।’’
कमालदास ने हँसकर कहा, ”ठीक है महाराज। यहाँ से लौटते ही, मैं इसी काम में जुट जाऊँगा।’’
राजा हक्कू शाह फूलों की घाटी से लौटे तो बार-बार एक ही बात कह रहे थे हमें यूनेस्को में इस फूलों की घाटी का विवरण भेजना चाहिए। कमालदास की किताब पूरी हो तो उसे भी साथ ही भेज देंगे। मातुंगा जंगल को और सुंदर बनाने के लिए हम कोई कोर-कसर नहीं छोड़ेंगे, ताकि दुनिया का सरताज बने हमारा प्यारा मातुंगा जंगल!
(मातुंगा जंगल की 51 अचरज भरी कहानियाँ से साभार)