Category: साक्षात्कार

खराब समीक्षा खराब रचना से भी अधिक घातक है  : महेश पुनेठा

महेश पुनेठा

सोशल मीडि‍या का कैसे सार्थक प्रयोग कि‍या जा सकता है, इसकी बानगी कवि-शि‍क्षक महेश चंद्र पुनेठा का ‘बाखली’ के सपांदक गि‍रीश चंद्र पाण्‍डेय द्वारा लि‍या यह साक्षात्‍कार है। फेसबुक के माध्‍यम से हुई इस बातचीत में लेखन के लि‍ए समीक्षा अथवा आलोचना की भूमि‍का, दक्षि‍णपंथ व वामपंथ, साहित्य में ‘लोक’, छंदबद्ध और छंदमुक्त कवि‍ता, शि‍क्षण में दीवार पत्रि‍का की भूमि‍का आदि‍ वि‍भि‍न्‍न वि‍षयों पर लंबी बातचीत हुई है-

मुख्यतया किसी पुस्तक की समीक्षा के पैरामीटर्स क्या होते हैं ?

बहुत कठिन सवाल है।

आपके लिए कठिन नहीं है।

इस पर तो आमने-सामने बैठकर ही चर्चा हो सकती है। फिर भी संक्षेप में यही कहूँगा कि किसी किताब में क्या खास है और उसकी क्या सीमाएं हैं? इन दोनों पक्षों को लेकर समीक्षा में बात होनी चाहिए।

खास किसके लिए?

खास का मतलब नया या मौलिक, समाज को आगे ले जाने के लिए। मानवता के पक्ष में भी कहा जा सकता है।समीक्षा ऐसे प्रश्न भी खड़े करती है जो नई बहस को जन्म देते हैं। समीक्षा किसी भी पहलू को देखने का समीक्षक का अपना पक्ष भी होती है।

समीक्षक सीमाएं किस मायने में तय करता है?

सीमाओं का मतलब उसकी नजर में कथ्य-विचार -शिल्प और भाषाई की दृष्टि से उसमें क्या कमी रह गयी हैं? क्या वह रचना कहीं मानवीय मूल्यों के विरोध में तो नहीं खड़ी है?उसकी पक्षधरता किसी ताकतवर के साथ तो नहीं है? वह यथार्थ को भ्रमित तो नहीं करती हैं? आदि।

बहुत सारे समीक्षक लेखक का चेहरा देखकर समीक्षा करते हैं या फिर ये कहूँ समीक्षा करते ही नहीं। ऐसा क्यों होता है?क्या ये उस लेखक और पुस्तक के साथ अन्याय नहीं?

बिलकुल यह समीक्षा का बहुत बड़ा संकट है। आज समीक्षा किसी को स्थापित या किसी को खारिज करने के लिए ही अधिक हो रही है।निश्चित रूप यह लेखक और पुस्तक के साथ ही नहीं, साहित्य और समाज के प्रति भी अन्याय है।खराब समीक्षा खराब रचना से भी अधिक घातक है।

समीक्षा और छिद्रान्वेषण में अंतर को किस तरह समझा जा सकता है?

समीक्षा में समीक्षक पुस्तक की ताकत और कमजोरी दोनों बताता है और छिद्रान्वेषण में खोज-खोजकर कमियों को सामने रखता है। उसका उद्देश्य केवल रचना या रचनाकार की कमजोरियों को उजागर करना और उसे खारिज करना होता है।

क्या वाकई कोई समीक्षा या टिप्पणी पुस्तक को या लेखक को ऊंचा या नीचा स्तर दे सकती है। इसमें आपको कुछ घालमेल नहीं दि‍खता?

बिल्कुल देती ही है। लेखक को उठाती भी हैं और गिरा भी देती हैं। ऐसे बहुत सारे उदाहरण हैं, जहाँ समीक्षा ने लेखक को सामने लाने का काम किया। और बहुत सारे उदाहरण ऐसे भी हैं, जहां समीक्षा ने किसी रचनाकार के प्रति भ्रम फैलाकर पाठक के मन में उसकी गलत छवि प्रस्तुत करने का काम किया। क्योंकि सामान्य पाठक तो समीक्षक की कही बात को महत्वपूर्ण मानकर उसी अनुसार अपनी राय बनाता है।

क्या ये माना जाए कि‍ पुस्तक लिखने के बाद उसकी समीक्षा होना जरूरी है?

जरूरी जैसा तो कुछ नहीं है। लेकिन समीक्षा होने से नये पाठकों तक किताब की जानकारी पहुंचती है। वह अधिक पढ़ी जाती है। लोग पढ़ने के लिए प्रेरित होते हैं। खुद रचनाकार को भी अपने लेखन की सीमाओं का पता चल पाता है। उसका आत्मविश्वास बढ़ता है। वह और बेहतर लिखने के लिए प्रेरित होता है। विमर्श भी आगे बढ़ता है।

पुस्तक के शीर्षक और उसके अंतर्निहित तत्वों का तादात्म्य कैसे होना चाहिए। बहुत सारे शीर्षक रोचक होते हैं, पर तत्व उतना रोचक नहीं। इस पर आपका मन्तव्य?

केवल शीर्षक के रोचक होने से काम नहीं चलेगा। मुख्य बात तो किताब की विषयवस्तु ही है। उसे ताकतवर होना चाहिए। यदि उसमें दम नहीं है तो लिखना बेकार।

वर्तमान में हिंदी साहित्य में कुछ ऐसे नाम जो समीक्षाकर्म वाकई निष्पक्ष होकर कर रहे हैं?

नाम बहुत सारे हैं, किस-किस के नाम लिये जाएं ? विशेषकर कुछ युवा बहुत उम्मीद जगाते हैं।

जितने नाम भी अभी सूझ रहे हों, बताएं।

दरअसल, नाम लेने में नाम छूटने का खतरा अधिक होता है। प्रत्येक व्यक्ति की पढ़ने और देखने की अपनी सीमा होती है। हम केवल उन्हीं का नाम ले सकते हैं, जिन्हें हमने पढ़ा होता है लेकिन कोई जरूरी नहीं कि जो हमने पढ़ा हो वह सब महत्वपूर्ण ही हों और जिन्हें नहीं पढ़ पाए हैं, वे महत्वपूर्ण न हों। फिर एक व्यक्ति ने जितना पढ़ा होता है, उससे कई गुना उससे अपढ़ा छूट जाता है।

यानी आप उस खतरे से बचना चाहते हैं?

माना जा सकता है। अनावश्यक विवाद मुझे पसंद नहीं है।

आप भी समीक्षा कर्म और आलोचना से जुड़े रहे हैं।किन पुस्तकों की समीक्षा करते-करते आपने खुद के लेखन में परिवर्तन पाया है?

सीखना तो हर नई किताब पढ़ने के बाद होता ही है। हर नई किताब ने मेरे लेखन में कुछ न कुछ परिवर्तन किया,  भले ही वह एक कमजोर किताब ही क्यों न रही हो। उसने मुझे बताया कि अपने लेखन में किन बातों से बचना चाहिए। नागार्जुन, त्रिलोचन, केदारनाथ अग्रवाल, मुक्तिबोध, भगवत रावत, विजेंद्र, वीरेन डंगवाल, मंगलेश डबराल, हरीश चन्द्र पाण्डेय, जीवन सिंह, रमाकांत शर्मा आदि कवि-आलोचकों पर लिखते हुए मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला। विशेषरूप से यह कि जनपक्षधरता, जीवन में ईमानदारी-सादगी, जन और प्रकृति से निकटता, जमीन व समाज से लगाव किसी रचनाकार के व्यक्तित्व और कृतित्व को कितना ऊंचा उठा देता है? इससे लेखन में कितनी गहराई और व्यापकता आ जाती है? मेरी हमेशा कोशिश रहती है कि किसी भी रचनाकार पर लिखने से पहले उनके लिखे को गहराई और विस्तार से जानूं-समझूं। इस प्रक्रिया में हमेशा कुछ न कुछ नया जानने-समझने को मिला।

आपने बड़ा सधा हुआ जबाब दिया है। इस सूची में कोई युवा तो नहीं दिख रहा।

युवाओं की एक लम्बी सूची है, जिन पर मैं निरंतर लिखता रहा हूँ। उतने नाम गिनाने यहाँ संभव नहीं हैं। उनमें से कुछ ऐसे भी हैं, जिन पर मित्रों के बार-बार आग्रह पर लिखा। इसको आप मेरी बेमानी भी कह सकते हैं। लेकिन यह मेरी कमजोरी रही है कि मैं मित्रों के आग्रह को नजरंदाज नहीं कर पाता हूँ। समीक्षा लिखने के चलते कुछ मित्रों के साथ संबंधों में खटास भी आई।

क्या उन युवाओं के साथ अन्याय नहीं होगा, नाम न लेकर?

अन्याय जैसा कुछ नहीं है क्‍योंकि‍ मेरे नाम लेने या न लेने से किसी के कद पर कोई प्रभाव नहीं पड़ना है।

एक थोड़ा-सा अटपटा सा प्रश्‍न जिसे पूछ ही लेता हूँ। कोई ऐसा उदाहरण किसी युवा के लेखन में आपकी समीक्षा के बाद बदलाव देखा गया हो?

मैं एक अदना सा पाठक और पाठक की प्रतिक्रिया से किसी के लेखन में भला क्या परिवर्तन आएगा मित्रवर।

आप ऐसा कैसे कह सकते हैं कि आपके लिखने या न लिखने से फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि कोई भी समीक्षा परिवर्तन लाती है। इसे आपने खुद माना है।

वह समीक्षा लिखने वाले के व्यापक अनुभव और गहरी दृष्टि पर निर्भर करता है। जहाँ तक मेरा सवाल है, न मेरे पास ऐसा कोई व्यापक अनुभव है और न ही कोई गहरी दृष्टि। मैं तो अभी खुद सीख रहा हूँ। साहित्य और समाज को समझने की कोशिश कर रहा हूँ।

जब हम साहित्य में समीक्षा की बात करते हैं तो वाम और दक्षिण दो पक्ष प्रमुख रूप से मिलते हैं। दोनों पक्षों की समीक्षा में मूलभूत अंतर क्या दिखता है?

वाम और दक्षिणपंथ की समीक्षा में वही अंतर है, जो इन दोनों विचारधाराओं के जीवन दृष्टि और साहित्य में है। दरअसल, हम किसी भी रचना का मूल्यांकन अपनी जीवन दृष्टि के आधार पर ही करते हैं। दुनिया को हम कैसे देखते हैं और उसे कैसा बनाना चाहते हैं? इसी आधार पर हम हर क्षेत्र का अन्वेषण-विश्लेषण करते हैं। कोई रचना या समीक्षा कर्म भी इसका अपवाद नहीं है। दक्षिणपंथ यथास्थितिवादी और परम्परावादी होता है। वह परम्परा में ऊपरी सुधार कर उसे मूलरूप में ही बनाए रखना और आगे ले जाना चाहता है। अतीत के प्रति अति मोहग्रस्त रहता है। अतीत में उसे अच्छाइयाँ ही अच्छाइयाँ नजर आती हैं। उसे पुरानी समाजिक और राजनीतिक व्यवस्था और नियम-कानूनों से भी कोई विशेष परेशानी नहीं होती है। पुराने जीवन मूल्यों को ही स्थापित और संरक्षित करना चाहता है। सामाजिक असमानता को भी जस्टीफाई करता है। इसके विपरीत वामपंथ सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन करने की बात करता है और परम्परा के उन्हीं मूल्यों को आगे ले जाने का समर्थन करता है, जो प्रगतिशील और वैज्ञानिक चेतना से लैस होते हैं। साथ ही एक समतावादी समाज के निर्माण में सहायक होते हैं। जीवन के प्रति यही दृष्टि उनके लेखन में भी अभिव्यक्त होता है। दोनों पक्ष समीक्षा के दौरान रचना में अपनी-अपनी विचारधारा के अनुकूल मूल्यों की पड़ताल और उसका खंडन-मंडन करते हैं।

वैसे क्या एक प्रश्न नहीं उठता कि समीक्षा पक्ष की प्रतिपक्ष को करनी चाहिए। वो ज्यादा लोकतान्त्रिक होती?

तब तो प्रत्येक रचना खारिज ही होगी। कोई भी रचना कसौटी में फिट नहीं बैठेगी, क्योंकि हर विचारधारा की अपनी-अपनी कसौटी होती है।

क्या यह भी सामन्तवाद की श्रेणी में नहीं आएगा कि आप अपने पक्ष को श्रेष्ठ मानते हैं। जरूरी नहीं कि‍ आपका पक्ष ही सही हो। दूसरा पक्ष भी हमेशा गलत तो हो नहीं सकता। इस पर क्या कहेंगे?

तब विचारधाराओं पर ही बात करनी पड़ेगी कि कौन सी विचारधारा अधिक जनपक्षीय, प्रगतिशील, मानवीय और वैज्ञानिक है?  इतिहास को खंगालना पड़ेगा। पुराने अनुभवों को देखना होगा। लेकिन यह बात तो स्वीकार करनी ही पड़ेगी कि हर विचारधारा की कसौटी तो अलग-अलग होती ही है। आप ही बताइये क्या किसी राजतन्त्र का मूल्यांकन, लोकतान्त्रिक कसौटी के आधार पर किया जा सकता है?

क्या यह माना जाए कि प्रतिपक्ष हमेशा गलत होता है

बिलकुल नहीं। पक्ष भी गलत हो सकता है। पर उसका निर्धारण किसी भी मूल्य, मान्यता तथा विचार को इतिहास के विकास क्रम में द्वंद्वात्मक दृष्टि से देखने पर ही हो सकता है। भले ही अंतिम सत्य जैसी कोई बात नहीं होती है, लेकिन हर देश-काल-परिस्थिति का अपना सत्य तो होता ही है। हमें उस सत्य तक पहुंचने की कोशिश करनी चाहिए।

साहित्य में ‘लोक’ एक ऐसा शब्द है, जिसे कवि, कथाकार, उपन्यासकार या कहूँ लेखक, समीक्षक, आलोचक सब अपने को लोक के नजदीक दिखाना चाहते हैं। इसके पीछे का कारण क्या हो सकता है? लोक के प्रति दया भाव या लोक के प्रति आस्था ?

लोक से नजदीकी दिखाने के सबके अलग-अलग कारण रहे हैं। कुछ के लिए यह लोकप्रियता हासिल करने का माध्यम है तो कुछ के लिए प्रतिबद्धता का। जो लोकप्रियता हासिल करना चाहते हैं और यह दिखाना चाहते हैं कि वे लोक के कितने नजदीक हैं,  वे लोक के मीठे-मीठे या उत्सवधर्मी रूप को अपनी रचनाओं में व्यक्त करते हैं और लोकधर्मी होने का भ्रम पैदा करते हैं। बिलकुल उसी तरह से जैसे आज बहुत सारे लोग महोत्सवों में लोकगीत-नृत्य की प्रस्तुति कर या फिल्मों में लोक धुनों और लोकसंस्कृति का इस्तेमाल कर खुद को लोक संस्कृति का सच्चा समर्थक और संरक्षक दिखाने की कोशिश करते हैं। जो लोक के प्रति प्रतिबद्ध होते हैंख्‍ वे लोक के संघर्षधर्मी, सामूहिक, सहकारी और प्रतिरोधीस्वरूप को अपनी रचनाओं में स्थान देते हैं। लोक को द्वंद्वात्मक रूप से देखते और दिखाते हैं। लोक की ताकत के साथ-साथ उसकी कमजोरियों को भी रेखांकित करते हैं। वे लोक को महिमामंडित नहीं, बल्कि जागरूक या चेतना संपन्न करते हैं। वे न दया दिखाते हैं और न ही आस्था। दरअसल, लोक को इन दोनों की ही आवश्यकता नहीं है। उसे तो अभिजात्य वर्ग द्वारा उसके खिलाफ की जा रही दुरभिसंधियों के प्रति सचेत कर उठ खड़े होने को ताकत देने वालों की जरूरत है। लोक की सामूहिक ताकत का अहसास कराने की आवश्यकता है।

एक मुकम्मल कविता जैसी कोई चीज भी होती है क्या?

दुनिया में मुकम्मल तो कुछ भी नहीं है। हो भी नहीं सकती है। ऐसा होगा तो फिर ठहराव आ जाएगा। जीवन का सौन्दर्य उसकी गतिशीलता में और परिवर्तनशीलता में ही है। हमेशा आगे बढ़ने में। क्या आप किसी नदी को देखकर कह सकते हैं कि‍ यह मुकम्मल नदी है या किसी पेड़ को देखकर कि यह मुकम्मल पेड़ है यानी कविता एक नदी की तरह है, प्रवाहमान होना ही उसका जीवंत होना है। कविता का काम हमें अधिक मानुष बनाना है, अर्थात अधिक संवेदनशील बनाना। हमारी संवेदनाओं का अधिकाधिक विस्तार करना। जीवन के सारतत्व तक पहुंचाना। सामान्यतः जिसे लोग नहीं देख पा रहे हैं, उसे दिखाना। यह तभी हो सकता है, जब वह नदी के सामान हमेशा प्रवाहमान हो ताकि उसमें नित नया जल प्रवाहित हो सके। वह छोटी-बड़ी धाराओं-सरिताओं को अपने में समाते हुए चले। वह गंदे नालों को भी अपने में मिलाकर उन्हें भी शुद्ध कर दे। अपने किनारे बसे जनों को अपना सर्वस्व देकर उनके जीवन में नया जीवन और नई स्फूर्ति का संचार कर दे। खुरदुरे पत्थरों को चिकना कर दे और कठोर चट्टानों पर सुन्दर आकृतियाँ गढ़ दे। यह सब करते हुए किसी तरह का कोई भेदभाव न करे। अंत में सबको एक समुद्र का नागरिक बना दे।

लोग मानते हैं कि छंद मुक्त कविता जब से प्रचलन में आयी तब से कविता ने अपनी जमीन खोई है। छंदबद्ध और छंदमुक्त कविता के बीच की खाई को किस रूप में देखते हैं, आप?

मुझे नहीं लगता है कि छंदबद्ध और छंदमुक्त कविता के बीच की खाई जैसी कोई बात है। यह खाई हमारे पाठ्यपुस्तकीय संस्कारों ने पैदा की है। पाठ्यपुस्तकों में हमेशा से छंदबद्ध कविता पढ़ने के कारण कविता को लेकर एक संस्कार बन गया है कि कविता का मतलब एक छंदबद्ध रचना। जबकि छंदबद्ध हो जाने मात्र से कोई रचना कविता नहीं हो जाती है। कविता अपने मितकथन, नवीनता, रूपकात्मकता, लय और सरसता से बनती है। अपनी लाक्षणिकता और व्यंजना से बनती है। उसमें विचारबोध, भावबोध और इन्द्रियबोध का सही तालमेल होना जरूरी है। यदि छंदबद्धता में ही कविता की लोकप्रियता होती तो आज भी वह कविता जो छंदों में लिखी जा रही है, उसी तरह लोकप्रिय होती। जैसे सूर-तुलसी-कबीर की कविता। हाँ, यह जरूर स्वीकार करना पड़ेगा कि कविता के नाम पर आज जो लयहीन लद्धड़ गद्य लिखा जा रहा है, जिसमें शब्दस्फीति बहुत अधिक है और बिम्बों, प्रतीकों और रूपकों की घोर उपेक्षा करते हुए शुष्क विचार व्यक्त किए जा रहे हैं, जिसमें इन्द्रियबोध और भावबोध सिरे से नदारत है। उसने कविता से पाठकों को दूर किया है। कविता के नाम पर जो अमूर्त और दुरूह गद्य लिखा जा रहा है, उससे बचने की आवश्यकता है।

कविता पढ़ी सबसे ज्यादा जाती है। पर कविता को वो सम्मान नहीं मिल पाता जो एक कहानी को मिलता है और चर्चा भी कम ही होती है। इसके क्या कारण हो सकते हैं?

मुझे नहीं लगता है कि कविता का सम्मान कम है या कम चर्चा होती है । अच्छी रचना किसी भी विधा में हो, उसको सम्मान भी मिलता है और चर्चा भी होती है। दरअसल, खराब या नकली कविता इतनी अधिक लिखी जा रही है कि उसके ढेर में अच्छी कविता कुछ दब सी गयी है। फिर हर पाठक की अपनी-अपनी रुचि होती है। मैं तो आज भी सबसे अधिक कविता ही पढ़ता हूँ। सबसे अधिक मन कविताओं में ही रमता है। किसी भी पत्रिका में सबसे पहले कविता ही पढ़ता हूँ। हाँ, यह जरूर है कि कविताओं को कुछ ठहरकर पढ़ने की जरूरत पड़ती है। बार-बार पढ़ने की जरूरत पड़ती है।

क्या आपको यह नहीं लगता कि कविता के प्रति नैराश्य भाव बढ़ा है। कवि भी तो कहानी की तरफ पलायन कर रहे हैं?

किसी कवि द्वारा कहानी लिखना न नैराश्य भाव है और न ही पलायन। हर विधा की अपनी सीमा होती है और हर जीवनानुभव की अपनी मांग। कभी-कभी रचनाकार को लगता है कि वह अपनी बात को किसी विधा विशेष में अच्छी तरह नहीं कह पाया है। कुछ ऐसा है, जो उस विधा विशेष की सीमाओं में बंध नहीं पा रहा है तो वह किसी अन्य विधा में अपनी बात कहने की कोशिश करता है। विषयवस्तु और जीवनानुभवों की प्रकृति के अनुसार विधाओं के बीच आवजाही चलती रहती है। यह सामान्य प्रवृत्ति है। हमेशा रही है। बहुत सारे समर्थ कवि हैं, जिन्होंने कविता के साथ-साथ कहानी या अन्य विधाओं में भी रचना की है। कभी-कभी यह भी होता है जो बात हम छोटी से कविता में कह जाते हैं, वह एक बड़े उपन्यास में भी नहीं कह पाते हैं। हर विधा की अपनी-अपनी ताकत और प्रभाव है। किसी को कमतर नहीं माना जा सकता है। जहाँ सुई की जरूरत है वहां सुई का ही इस्तेमाल करना होगा। जहाँ संबल की जरूरत है, वहां सुई का मोह छोड़ना ही पड़ेगा।  क्या इसे हम पलायन कह सकते हैं?

बिल्कुल नहीं।

पर ऐसा देखने में आता है कि पहले कविता लिखने वाला कवि कहानी की और रुख करता है। उसके पीछे शायद जीवनानुभवों का दबाव रहता हो।

कहीं इसके पीछे महत्वाकांक्षा तो नहीं?

महत्वाकांक्षा कैसी?

यश भी हो सकता है?

यश तो अच्छी कविता लिखने पर भी मिलता ही है। यश का संबंध विधा से नहीं, बल्कि लेखन के स्तर से होता है।

आप अपने को समीक्षा कर्म में कविता में सहज पाते हैं या कहानी या अन्य किसी विधा में?

मैं कविता में ही खुद को सहज पाता हूँ।

सबसे पहली कविता या संकलन जिस पर आपने कलम चलायी?

विजेंद्र जी के एक कविता संग्रह पर मैंने पहली समीक्षा लिखी जो वर्तमान साहित्य में प्रकाशित हुई।

उस पर विजेंद्र जी की क्या प्रतिक्रिया थी?

उन्हें अच्छा लगा। उन्होंने खुद अपना संग्रह भिजवाया था। कौन नहीं चाहता है कि उसके लिखे पर कोई बात करे।

अधिकतर देखा जाता है कि लोग समीक्षा करवाना तो चाहते हैं, परंतु सच्ची और खरी समीक्षा को पचा नहीं पाते।

आपने बिल्कुल सही कहा। सच कहो तो यह समीक्षा के सामने बहुत बड़ा संकट है। हर रचनाकार चाहता तो है कि उसकी रचना की समीक्षा हो, उस पर लिखा जाए। इस चाह में कोई बुराई भी नहीं है। आखिर कोई भी रचनाकार लिखता ही इसलिए है कि उसका लिखा हुआ पढ़ा जाए। उस पर बात हो ताकि उसकी बात अधिक से अधिक लोगों तक पहुँच सके। लिखे की सार्थकता भी यही है। लेकिन अधिकांश रचनाकारों की अपेक्षा रहती है कि उनके लिखे पर अच्छा-अच्छा ही कहा या लिखा जाए। उसकी खूब प्रशंसा हो। यदि आप दो-चार पंक्तियों में भी उनकी सीमा बता दो या उस ओर संकेत भी कर दो तो वे नाराज हो जाते हैं। इस सबके चलते मैं इधर अब समीक्षा करने से ही बचता हूँ। बहुत सारे मित्रों ने बोलचाल कम कर दी, जबकि पहले उनके साथ बहुत अच्छे सम्बन्ध थे। वैसे तो मैं किसी भी किताब के मजबूत पक्ष पर ही अधिक लिखता हूँ, क्योंकि मेरा मानना है कि कमजोर ढूंढ़ने चलो तो बड़े से बड़े रचनाकार के यहां बहुत सारा कमजोर मिल जाएगा। कोई भी रचनाकार ऐसा नहीं हो सकता है( जिसका लिखा हुआ सब कुछ श्रेष्ठ ही हो। इसलिए जब कभी बहुत जरूरी लगता है तो सीमाओं की ओर भी संकेत कर देता हूँ, लेकिन मेरा अनुभव है कि अधिकतर रचनाकार ऐसा पसंद नहीं करते हैं। एक और अनुभव रहा है मेरा- कुछ रचनाकार अपनी किताब भेजने के बाद तब तक समय-समय पर फोन करते रहते हैं, जब तक उनकी किताब की समीक्षा न लिख दी जाए और जब लिख दी जाती है तो यह सिलसिला बंद हो जाता है।

यह प्रवृति अधिकांश किस वयवर्ग के लेखकों में पायी जाती है?

ऐसे रचनाकारों में जो पत्र-पत्रिकाओं में छपने के बाद अपनी एक पहचान बना चुके होते हैं। जिनकी एक-दो किताबें भी आ चुकी होती हैं।

वही कहना चाह रहा था- समीक्षा से जुड़ा कोई अप्रिय वाकया।

इतना बड़ा तो कुछ नहीं है, जिसका उल्लेख किया जाए। छुटपुट प्रवृत्तियों के बारे में जिक्र कर ही चुका हूं।

आप समीक्षा के अलावा शिक्षा से भी जुड़े हुए है- एक संपादक के रूप में और एक शिक्षक के रूप में। क्या समीक्षा और संपादन दोनों एक-दूसरे के सहायक होते हैं या कठिनाई महसूस होती है?

जिस तरह से शिक्षा और साहित्य एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। उसी तरह लेखन और संपादन भी। इसलिए इनको करते हुए मुझे कभी कोई कठिनाई महसूस नहीं हुई, बल्कि यह कहना चाहिए कि मदद ही अधिक मिली। साहित्य ने शिक्षा की और शिक्षा ने साहित्य की समझदारी बढ़ाने का ही काम किया। मुझे लिखने का शौक नहीं होता तो शायद मैं बहुत सारी शिक्षा की वे किताबें नहीं पढ़ पाता, जो मैंने पढ़ीं। साहित्य में अभिरुचि ने शिक्षण में भी मेरी बहुत सहायता की। साहित्य ने मुझे बच्चों और समाज के प्रति अधिक संवेदनशील और रचनात्मक बनाया। मेरा तो मानना है कि हर शिक्षक को रचनाकार और साहित्य का गहरा पाठक होना चाहिए। साहित्य हमारी कल्पनाशीलता, दृष्टि और संवेदना का विस्तार करता है। एक शिक्षक के लिए ये तीनों जरूरी होते हैं। एक रचनाकार-शिक्षक बच्चों में अभिव्यक्ति कौशल और भाषाई दक्षताओं का अधिक अच्छी तरह विकास कर सकता है। उनके भीतर पढ़ने की आदत डाल सकता है। बालमन को अधिक अच्छी तरह से पकड़ सकता है। साहित्य और शिक्षा मुझे जुड़वा भाई-बहन की तरह लगते हैं। मैं तो यह मानता हूं कि विज्ञान-गणित के शिक्षकों को भी साहित्य का पाठक होना चाहिए। यदि ऐसा हो तो वे इन विषयों को और अधिक रोचक तरीके से पढ़ा सकते हैं।

एक सामान्य पाठक अगर कविता को पढ़ने और समझने का तरीका पूछ बैठे तो उसे किस तरह समझाया जा सकता है?

सूत्र जैसा तो कुछ नहीं है। दरअसल, यह संस्कार जैसा कुछ है, जिसे धीरे-धीरे ही प्राप्त किया जा सकता है। इसके लिए निरंतर, न केवल कविता बल्कि जीवन को भी पढ़ने की जरूरत होती है। उस जीवनानुभव से गुजरने की भी जरूरत पड़ती है, जिस पर कविता लिखी गयी गई अर्थात उन स्रोतों तक जाना पड़ता है, जहाँ से कविता का उद्गम हुआ है। कविता को चलते-फिरते नहीं समझा जा सकता है। उसके पास ठहरना पड़ता है। संवाद करना पड़ता है। उसे बार-बार पढ़ने की जरूरत पड़ती है। कविता शब्दों में नहीं होती है। शब्दों में खोजोगे तो भटक जाओगे। कुछ भी हाथ नहीं लगेगा। वह तो शब्दों के ओट में या दो शब्दों या फिर वाक्यों के अंतराल में भी हो सकती है। कभी-कभी तो कविता जहाँ शब्दों और पक्तियों में खत्म हो जाती है, वहां से शुरू होती है। इसलिए कविता को समझने के लिए धैर्य जरूरी है और साथ में अभ्यास भी। यही विशेषता है जो कविता को अन्य विधाओं से अलगाती है। अस्तु न कविता लिखना आसान है और न उसे समझना। कभी-कभी कविता जब शब्दों और पंक्तियों में खत्म हो जाती है, तब वहां से शुरू होती है। इसको सामान्य पाठक किस रूप में समझे। कविता को समझने को लेकर प्रतिष्ठित कवि वीरेन डंगवाल की कविता की ये पंक्तियाँ मुझे सटीक लगती हैं- जरा सम्हल कर/धीरज से पढ़/बार-बार पढ़/ठहर-ठहर कर/आँख मूंदकर आँख खोलकर/गल्प नहीं है/कविता है यह।

अलेक्सेई तोल्स्तोय ने कहीं कहा है कि कविता को पढ़ना और समझना मक्खन के चाकू से मक्खन को काटना है। इसे आप किस रूप में मानते है? कविता जहां खत्म होती है, वहां से शुरू होती है, से आपका क्या आशय है?

बहुत सारी कवितायें जहाँ खत्म होती हैं, वहाँ से शुरू होती हैं हमारे मन मस्तिष्क में। पाठक उन्हें रचता है। कविता उसके मन में बहुत सारे प्रश्न पैदा करती है, जिनका उत्तर खुद पाठक तलाशता है और खुद ही देता है। इस तरह अपने भीतर एक कविता बुनता जाता है और उस कविता की उलझनों को सुलझाता जाता है, बिलकुल इसी तरह जैसे अलेक्सेई तोल्स्तोय का यह कथन कि कविता को पढ़ना और समझना मक्खन के चाकू से मक्‍खन को काटना है। इस कथन का हर पाठक अलग-अलग अर्थ लेगा। हरेक अपनी-अपनी तरह से देखेगा। कोई जरूरी नहीं है कि वह आशय वही हो जो कवि व्यक्त करना चाहता हो। यही है शब्दों और पंक्तियों के बाद कविता शुरू होने से मेरा आशय।

कविता और एक्टिविज्म।

कविता और एक्टिविज्म, दोनों बहुत जरूरी हैं। एक्टिविज्म के बिना कविता का मेरे लिए कोई मतलब नहीं। मैं इस बात का कट्टर समर्थक हूँ कि कविता लिखे जाने से पहले उसे जिया जाना जरूरी है। एक्टिविज्म कविता को जीने का एक तरीका है। हमारे आसपास कविता लिखने वाले तो बहुत हैं, लेकिन जीने वाले बहुत कम इसलिए उसका प्रभाव बहुत दूर तक नहीं जाता है। फिर ऐसी कविता लिखने का क्या मतलब जो खुद को ही न बदले। कम ज्यादा जितना भी हो, हमें इस दिशा में प्रयासरत रहना चाहिए। एक्टिविज्म हमें नये-नये जीवनानुभव भी देता है, जो लिखने के लिए बहुत जरूरी है। मेरा मानना है कि कविता कविता के लिए नहीं, बल्कि जीवन के लिए होनी चाहिए। यश प्राप्ति इसका उद्देश्य नहीं होना चाहिए।

आपकी सबसे प्रिय कविता जिसे आप खुद का प्रतिबिम्ब कह सकते है। उसकी चार पंक्तिया अगर संभव हो?

बहुत सारी कविताएं प्रिय हैं। किसी एक का उल्लेख करें मैं दूसरों को कम नहीं करना चाहता हूँ। फिर प्रिय होना और खुद का प्रतिबिम्ब होना, दो अलग-अलग बातें हैं। एक साथ नहीं मिलाई जा सकती हैं। कोई जरूरी नहीं कि जो मुझे प्रिय हो, वह मेरे जीवन का प्रतिबिम्ब भी हो। बहुत सारी कवितायें हमें एक साथ अलग-अलग कारणों से प्रिय होती हैं बिल्कुल लोगों की तरह, क्या हम एक समय में एक से अधिक लोगों से प्रेम नहीं करते हैं? इसलिए यह बहुत कठिन प्रश्न है।

कविता अपने किस रूप में असरदार होती है?

कोई अपने कहन में असरदार होती है तो कोई कथन में। इसी तरह एक भावबोध में तो दूसरी विचारबोध और तीसरी इन्द्रियबोध में। फिर यह पाठक की रुचि और दृष्टि पर भी निर्भर करता है।

वही जानना चाह रहा हूँ कि‍ इन सब में किस रूप में सबसे ज्यादा असरदार होती है?

सबसे असरदार तो वही होगी जिसमें भावबोध, विचारबोध और इन्द्रियबोध तीनों का सही संतुलन हो।

आप ‘दीवार पत्रिका’ पर सालों से काम कर रहे हैं। इस प्रोजेक्ट से आपके जीवन में क्या परिवर्तन आए- एक साहित्यकार एक शिक्षक, और एक आम आदमी के रूप में।

परिवर्तन जैसा तो कुछ नहीं आया। हाँ, एक जिम्मेदारी का अहसास हुआ, लगा बच्चों के बीच उनकी रचनात्मकता के विकास के लिए बहुत अधिक काम करने की जरूरत है। यह पूरा क्षेत्र एक तरह से खाली पड़ा है। यह बहुत बुनियादी काम भी है। यदि हम एक विवेकशील, लोकतान्त्रिक और शांतिपूर्ण समाज बनाना चाहते हैं तो नीवं से ही शुरुआत करनी होगी। बच्चों को रचनात्मक लेखन-अध्ययन का चस्का लगा देना होगा। ‘दीवार पत्रिका’ इस दिशा में मुझे सबसे कारगर माध्यम नजर आती है। इसमें बहुत अधिक संभावनाएं दिखाई देती हैं। ‘दीवार पत्रिका’ अपने-आप में एक स्कूल है। एक ऐसा स्कूल, जिसमें बच्चों ‘हेड-हार्ट और हैण्ड’के संतुलित विकास का अवसर प्राप्त होता है। साथ ही इसे पुस्तकालय के साथ जोड़कर पढ़ने की संस्कृति के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया जा सकता है। बच्चों के साथ ‘दीवार पत्रिका’ पर काम करते हुए मेरी यह धारणा और पुख्ता हुई कि बच्चों के भीतर अपार क्षमता होती है, बस उन्हें अवसर देने और विश्वास करने मात्र की जरूरत होती है। वे ऐसा करके दिखा देंगे जैसा आप सोच भी नहीं सकते हैं। ‘दीवार पत्रिका एक अभियान’में काम करते हुए बच्चों को जानने-समझने का और अधिक मौका मिला। यह समझ में आया कि बच्चों के भीतर अपार है। बस, हमेशा उन्हें अपने अनुसार चलाने की कोशिश की जाती है। सब उन्हें अपना जैसा बना देना चाहते हैं। वे जैसा बनना चाहते हैं, वैसा कोई उनको बनने ही नहीं देता है। बच्चे बड़ों की महत्वाकांक्षाओं के शिकार है।

‘दीवार पत्रिका’ का विचार आया कहां से?

‘दीवार पत्रिका’ का विचार आने का किस्सा बहुत लम्बा है। इस बारे में मैंने अपनी किताब ‘दीवार पत्रिका और रचनात्मकता’में विस्तार से लिखा है। हाँ, यहाँ यह बता देना जरूरी समझता हूँ कि यह मेरा कोई मौलिक विचार नहीं है। ‘दीवार पत्रिका’ का इतिहास बहुत पुराना है। कहीं पढ़ रहा था कि द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान भी अपनी बात कहने के लिए कुछ लोगों ने इस तरह के माध्यम का इस्तेमाल किया। देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में विद्यार्थियों के समूह ‘दीवार पत्रिका’ प्रकाशन करते रहे हैं। मैंने कुछ शिक्षक मित्रों के साथ मिलकर इसे एक अभियान का रूप देने तथा पाठ्यक्रम से जोड़कर शिक्षण का माध्यम बनाने का प्रयास अवश्य किया, जो आगे भी जारी रहेगा। सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हुए हमने इसका व्यापक प्रचार-प्रसार किया। साथी शिक्षकों को इसके लिए प्रोत्साहित किया। बच्चों के भीतर जिज्ञासा पैदा की। शिक्षकों और बच्चों के साथ दीवार पत्रिका निर्माण के लिए कार्यशालाओं का आयोजन किया। इसका परिणाम यह हुआ कि आज प्राथमिक स्कूलों तक में भी यह व्यापक पैमाने पर निकाली जाने लगी है। शिक्षण का एक सशक्त और सस्ता माध्यम बनकर सामने आया है। अच्छे परिणाम आ सामने आ रहे हैं। बच्चों को अपनी बात कहने का एक मंच मिला है। उनकी भाषायी दक्षता और अभिव्यक्ति की क्षमता का विकास हो रहा है। यह पाठ्यचर्या का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है। आशा करते हैं कि‍ आने वाले समय में एक ऐसी पीढ़ी सामने दिखेगी, जिसकी रचनात्मकता को उभारने में ‘दीवार पत्रिका’ की अहम भूमिका रही होगी।

फिर मैं कविता की ओर लौटता हूँ। अधिकतर देखा जाता है कि‍ विद्रोह कविता का मूल कारण होता है। कविता का विद्रोही होना या कवि का विद्रोही होना इस पर आप क्या कहेंगे?

प्रतिरोध एक जरूरी जीवन मूल्य है। उसे जीवन में भी होना चाहिए और कविता में भी। यदि प्रतिरोध जीवन में नहीं होगा तो कविता में भी नहीं आ पाएगा। केवल दिखाने के लिए लाने की कोशिश की जाएगी तो वह भौंथरा प्रतीत होगा। पाठक जल्दी ही समझ जाएगा कि वह केवल कविता में कहने भर  के लिए प्रतिरोध है। ऐसी कविता पाठक के मन में प्रतिरोध के मूल्य को पैदा भी नहीं कर पाएगी। पाब्लो नेरुदा, ब्रेख्त, नाजिम हिकमत,  सारोवीवा से लेकर नागार्जुन, पाश,  गिर्दा, वीरेन डंगवाल, वरवर राव सरीखे तमाम कवियों की कविताओं में हम जो प्रतिरोध देखते हैं, वह उनके जीवन में भी दिखाई देता है। मेरा मानना है कि कवि के विद्रोही हुए बिना कविता विद्रोही हो ही नहीं सकती है। ऊपर जिन कवियों का मैंने जिक्र किया उनके जीवन में पहले विद्रोह था, तब उनकी कविताओं में उतरा। एक बात और सच्चा होगा जो कवि उसके जीवन में विद्रोह होगा ही होगा। बिना विद्रोह के एक बड़ी कविता जन्म ले ही नहीं सकती है। वह कवि खाक कविता लिखेगा, जो संतोषी होगा। कविता तो असंतोष की ही उपज होती है। जब कवि अपने चारों-ओर से असंतुष्ट होता है और उसे बदलना चाहता है, तब उस बदलाव की पहली अभिव्यक्ति कविता के रूप में ही होती है। आदि कवि बाल्मीकि की कविता भी विद्रोह स्वरूप ही निकली, चाहे वो करुणा के रूप में हो। एक कवि जिस तरह का समाज बनाना या देखना चाहता है, उसी तरह की अभिव्यक्ति अपनी कविता में करता है। वह शिकारी के प्रति कवि का विद्रोह ही तो था, जिसके चलते उसके मुंह से वह श्राप फूटा।

जी जी…वो श्राप किसी भी संवेदनशील के मुँह से निकलता। हाँ, वह अलग बात है कि‍ उसे छंद का रूप दे दिया गया।

वह छंद में नहीं भी होता, तब भी कविता होती। हाँ, छंद ने उसे अधिक प्रभावशाली बना दिया। इसलिए मुझे बार-बार लगता है कि कविता रूप में नहीं, बल्कि कथ्य में होती है। बहुत सारे लोग कविता नहीं लिखते हैं, लेकिन कवि होते हैं। उनकी अभिव्यक्ति किसी कविता से कम नहीं होती है। हमारे लोकगायक इसी तरह के तो थे। वे कवि कहलाने के लिए कविता नहीं करते थे। अपने आसपास के हर्ष-विषाद, दुःख-सुख, दर्द-आनंद को महसूस कर उनके भीतर से शब्द फूट पड़ते थे।

ऐसा क्या कारण है कि गेय पद ही सामान्य पाठक को अपनी ओर ज्यादा आकर्षित करते हैं?

स्वर जब संगीत के साथ मिल जाते हैं, अपना अधिक प्रभाव तो पैदा करते ही है। इसके पीछे एक कारण मुझे यह भी लगता है कि आदमी का स्वर से पहले सुर-संगीत से परिचय होता है। संगीत से आदमी का पहला लगाव होता है। वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना की कविता पंक्ति भी है- शिशु लोरी के शब्द नहीं/संगीत समझता है।

मैंने आज तक एक सरल और सहज महेश पुनेठा को देखा है, क्या कभी महेश पुनेठा को भी क्रोध आता है? अगर आता है तो घर, शिक्षण और साहित्य के माहौल में उसे किस तरह नियंत्रित करते हैं?

आपने आधे महेश पुनेठा को ही देखा है। बाहर कोई भी पूरा दि‍खता कहाँ है? घर में ही किसी को पूरा देखा जा सकता है। क्रोध प्राणी मात्र का मूल संवेग है, तब महेश पुनेठा भला उसका अपवाद कैसे हो सकता है? हाँ, उसे नियंत्रित करने की जरूरत पड़ती है। बादल बनेंगे तो बरसेंगे जरूर और बरस जाना ही ठीक भी होता है, फटना नहीं चाहिए। ‘बादल फटने’का क्या हश्र होता है? इसे हम पहाड़ियों से अधिक अच्छी तरह कौन समझ सकता है? क्रोध आता है तो व्यक्त कर देता हूँ। लेकिन हमेशा खुद को चैक भी करता रहता हूँ कि क्या मेरे व्यक्त करने का तरीका सही था और क्या उससे बचा नहीं जा सकता था? दूसरे को ही दोषी न मान खुद के दोष को स्वीकार करता हूँ इसलिए दूसरी बार क्रोध करने से बच जाता हूँ। मेरा मानना है कि दूसरे को भी क्रोध करने का अवसर दिया जाना चाहिए। यदि हम यह मान लें कि क्रोध करने का अधिकार छोटों और कमजोरों का भी उतना ही है, जितना बड़ों और ताकतवरों का, तो हम अपने क्रोध पर भी नियन्त्रण कर सकते हैं।

कविता और प्रेम इसको आज लिखे जा रही कविताओं में किस स्तर पर पाते हैं?

प्रेम जीवन का सनातन भाव है और कविता का सनातन विषय भी। जब तक जीवन रहेगा, प्रेम भी रहेगा और कविता में व्यक्त भी होगा और खूब हो रहा है।

क्या आपने कविता में प्रेम को जिया है?

क्या प्रेम को जिए बिना कविता रच पाना संभव है? मेरा छोटा अनुभव तो यही कहता है, असम्भव है। तब मैं बिना प्रेम का कविता कैसे लिख सकता हूँ, मित्रवर। वह तो केवल रोबोट के लिए ही संभव है।

आप पतली गली से निकलने की कोशिश कर रहे हैं। आपकी अपनी कोई प्रेम पगी पंक्तियां?

सारी ही कवितायेँ प्रेम में पगी हैं। कहा न, प्रेम के बिना तो कविता लिखना ही असंभव है। आप मानवीय मूल्यों से प्रेम करते हैं,  कमजोर,  दमित, शोषित, पीड़ित से प्रेम करते हैं,  इसीलिए कविता लिखते हैं और लिख पाते हैं। यदि आप इनके प्रेम में पगे न हों तो इनके पक्ष में एक पंक्ति भी नहीं लिख पायेंगे और जो लिखेंगे भी तो भले वह कुछ भी हो, लेकिन कविता नहीं होगी।

आजकल लिखी जा रही प्रेम कविताओं की गहराई और उनका फैंटेसी पर कुछ बोलना चाहेंगे?

गहराई किसी काल की मुहताज नहीं होती हैं। उथली प्रेम कवितायेँ हर काल में लिखी गयी हैं, आज भी लिखी जा रही हैं। उसमें से मोती चुनने का काम तो सहृदय का है। फैंटेसी का इस्तेमाल कविताओं में खूब होता रहा है, पर इसके साथ खतरा यह है कि यह अक्सर यथार्थ से पलायन का बहाना बन जाती हैं। फैंटेसी की सर्थाकता तो तभी है, जब वह यथार्थ से साक्षात्कार का माध्यम बने। जैसा कि हम मुक्तिबोध के यहाँ पाते हैं।

बात मुक्तिबोध की आ ही गयी। मुक्तिबोध की कविता सामान्य पाठक के लिए तो समझना बहुत मुश्किल होता ही है। मंझे हुए साहित्यकार भी उलझ जाते हैं, उनकी कविता के भंवर में। इसे मुक्तिबोध की कमजोरी कहेंगे या विद्वता?

बिलकुल आप ठीक कह रहे हैं, मुक्तिबोध की कविता में सामान्य पाठक ही नहीं, मंझे हुए साहित्यकार भी उलझ जाते हैं। डॉ. रामविलास शर्मा, केदारनाथ अग्रवाल, विजेंद्र जैसे प्रतिष्ठित साहित्यकार भी उनकी कविता में जटिलता और दुर्बोधता की शिकायत करते हैं। इसलिए उन्हें ‘कवियों का कवि’भी कहा जाता है। लगभग सभी साहित्यिक मानते हैं कि उनकी कविता को समझना बहुत आसान नहीं है। उनका भावबोध और रचना प्रक्रिया दोनों जटिल हैं। फंतासी का इस्तेमाल भी उनकी कविता को दुरूह बना देता है। संस्कृत, तत्सम और अप्रचलित शब्दों की प्रधानता भी उनकी भाषा को कठिन बना देती है। मैं इसे मुक्तिबोध की कविता की एक सीमा मानता हूँ। लेकिन जब हम उनकी आलोचनात्मक लेखों, डायरी के पन्नों और पत्रों को पढ़ते हैं, तो उनकी कवितायें खुलने लगती हैं। एक ताना हाथ आने की देर होती है, बस। दरअसल, मुक्तिबोध की कविता की जटिलता जानबूझकर पैदा की गई, जटिलता नहीं है। जैसा कि बहुत सारे कवि करते हुए पाए जाते हैं। अपनी बात को जलेबी की तरह घुमाकर एक प्रभाव पैदा रकने की कोशिश करते हैं, जबकि कथ्य के स्तर में उसमें कुछ खास होता नहीं है। केवल वाग्जाल फैलाते हैं। लेकिन मुक्तिबोध की जटिलता जीवनानुभवों और नवीनता से पैदा जटिलता है। जिनका मंथन करने पर मक्खन निकलता है। वह हमें मनुष्य के भीतर और बाहर दोनों ओर चल रहे संघर्षों की अनुभूति से परिचित कराते हैं। चेतन और अवचेतन की बात करते हैं। कभी-कभी इतनी गहराई में चले जाते हैं कि उनको पकड़ना कठिन हो जाता है, लेकिन जब धैर्य रखते हुए उनके साथ उतरते हैं, तो नायाब मोती भी हाथ लगते हैं। मुक्तिबोध के दुरूह लगने का एक कारण उनका मराठी भाषा से हिंदी में आना भी रहा। हिंदी उनकी मातृभाषा नहीं थी, बल्कि अर्जित भाषा थी। मुक्तिबोध ने जिंदगी के जिन सवालों को उठाया और जिस विचार व भावभूमि का निर्माण किया,  वैसा हिंदी के बहुत कम कवि कर पाए।

कहीं किसी का लिखा हुआ पढ़ रहा था,कविता को छंदों की ओर लौटना होगा, अगर उसे पाठक से जुड़ना है तो ।’ क्या आप इससे सहमत हैं?

सवाल छंद का नहीं है। यह कहना कि छंद में न होने के कारण आज कविता से पाठक दूर हो रहे हैं, यह स्थिति का सामान्यीकरण है। कारण बहुत सारे हैं। यदि छंद जुड़ाव का एकमात्र कारण होता, तो वे सारी कवितायें जो आज भी छंद में लिखी जा रही हैं, उनके बहुत सारे पाठक होने चाहिए थे या वे बहुत पढ़ी जानी चाहिए थीं,  क्या ऐसा है ? आज कविता छंदबद्ध हो या छंदमुक्त उसके पाठक कम ही हैं, बल्कि हमेशा ही गम्भीर साहित्य के पाठक कम ही रहे हैं। मेरे राय में कविता के छंदबद्ध होने से अधिक जरूरी है- कविता का जीवन से जुडा होना। जीवन के ज्वलंत सवालों को उठाना,  उनसे जूझना, पाठकों को नए जीवनानुभवों से परिचित कराना, जो कविता इस रूप में हमारी संवेदनाओं को झकझोरती है और उससे जुडती है,  उन कविताओं से पाठक अवश्य जुड़ता है। उन्हें पढ़ता है। बहुत सारी मुक्तछंद कवितायें इस बात का प्रमाण हैं। ऐसी बहुत सारी मुक्तछंद कवितायें हैं, जो बहुत सारे पाठकों द्वारा पसंद की जाती हैं। इस सबको थोड़ी देर के लिए अलग भी कर दें तो फिर भी पीछे नहीं लौटा जा सकता। कविता छंद से बहुत आगे आ चुकी है,  यह केवल हिंदी में ही नहीं, दुनियाभर के साहित्य में हो रहा है। मुक्तछंद में कविता लिखी जा रही हैं। इसका कारण छंद की अपनी कुछ सीमायें रही हैं। आज जीवन की जटिलता को छंदों में बांधकर पूरी तरह से कहना संभव नहीं लगता है। छंद बहुत बार भाव और विचार का गला घोंट देते हैं। हाँ, यह जरूरी है कि कवि को छंद की परम्परा का ज्ञान होना चाहिए। उससे ताकत ग्रहण करनी चाहिए। यदि छंद में आज का यथार्थ व्यक्त हो पाता है, तो व्यक्त भी किया जाना चाहिए। छंद से किसी को कोई परहेज नहीं है, लेकिन केवल छंदबद्ध रूप में ही कविता मान्य होगी, यह अब नहीं चलने वाला है। मुक्तछंद अब बहुत आगे निकल आया है।

आपने कविता और समीक्षा के साथ-साथ क्या कभी किसी कहानी पर भी काम किया?

एक दौर में लघुकथाएं लिखी थीं। उससे अधिक नहीं।

पहली लघुकथा कौन सी थी?

अपराधिनी।

लघुकथा कथा में परिवर्तित क्यों नहीं हो पायी?

कोई कोशिश नहीं की।

कहानी और कविता के सृजन में मूलभूत अंतर आप क्या पाते हैं?

कहानी विस्तार की अधिक आजादी देती है, जबकि कविता में कम शब्दों में अधिक कहने की जरूरत पड़ती है। कविता में बिम्बों, प्रतीकों, रूपकों आदि का प्रयोग एक तरह से विधागत आवश्यकता होती है। कविता किसी अन्न को पोटली में रखना है, तो कहानी उसे बिछा देना। कहानी सृजन अधिक समय की मांग भी करती है। फिर विषयवस्तु की अपनी मांग का भी सवाल होता है। मुक्तिबोध ने तो एक ही विषय पर कविता भी लिखी है और कहानी भी।

जी, वही अंतर जानना चाह रहा था ।

उन्हें लगा होगा कि‍ शायद कविता में वह अपनी बात पूरी तरह नहीं कह पाए इसलिए उन्होंने कहानी द्वारा कहने की कोशिश की होगी।

कहानी और नाटक की भारतीय परंपरा में सुखान्त को तरजीह देते आए हैं। लेखक पर वेस्टर्न लेखक इस का अनुपालन नहीं करते ऐसा क्यों?

यह जीवन दृष्टि का अंतर है। भारतीय जीवन दृष्टि संतोषम परम सुखम पर विश्वास करती है। जो है, अच्छा ही है। जो होगा, अच्छा ही होगा। जो तय है, वही होगा। उसे कोई बदल नहीं सकता है। हमारा अधिकांश साहित्य इसी दृष्टि को ही स्थापित करता है। इसको अंत भले का भला वाली दृष्टि भी कह सकते हैं। जबकि ऐसा हो, कोई जरूरी नहीं। अक्सर देखा गया है कि‍ भला तो ताकतवर का ही होता है। ताकत की भला-बुरा तय करती है। इतना ही नहीं, भारतीय दृष्टि यह भी है कि यदि कहीं कोई बुरा है तो उसमें कोई बदलाव भी करेगा तो वह कोई अवतारी पुरुष ही करेगा। जनशक्ति की उसमें कोई भूमिका नहीं। यह दृष्टि यथास्थितिवादी दृष्टि है।

क्या आपने कभी किसी कहानी को भी एक समीक्षक की दृष्टि से देखा?

बहुत अधिक तो नहीं। कुछ कहानी संग्रहों और उपन्यासों की भी समीक्षा लिखी है, मैंने।

कहानी की समीक्षा के वो तथ्य और कथ्य जिन्हें आप मानते हैं कि कहानी उनके बिना कहानी नहीं होती है?

कहानी में सबसे पहली बात है- उसमें कहानीपन का होना, वह निबंध की तरह न हो। शेष किसी भी रचना की समीक्षा करते हुए चाहे वह कविता हो या कहानी, सबसे पहले यही देखता हूँ कि उस रचना के माध्यम से रचनाकार ने जीवन की किस बुनियादी बात को उठाया है, जिसे अब तक किसी और ने न उठाया हो? क्या रचना में वही दिखाया गया है, जो सब देख रहे हैं या उसे दिखाया गया है,जिसे सामान्यतः लोग देख नहीं पाते हैं? उस रचनाकार की अपने जन, समाज और प्रकृति को देखने की दृष्टि क्या है? वह अपनी रचना में किसके पक्ष में खड़ा है? रचना में जिस समाधान की ओर संकेत किया गया है, वह कितना तर्कसंगत और मानवीय है? रचना पाठक की संवेदनाओं का विस्तार करने में कितनी सक्षम है?  क्या उसे पढ़ने के बाद पाठक वही रह जाता है, जो उसे पढ़ने से पहले था या कुछ परिवर्तन आता है? आदि-आदि।

हम कहानी की बात कर रहे थे, बहुत सारे लोग कहानी लिख रहे हैं। कहानी गढ़ने में काल्पनाशीलता की कितनी आवश्यक्ता होती है?

कल्पना तो सृजन का एक आवश्यक तत्व है। इसके बिना कोई भी रचना अनुभववाद की शिकार होकर रह जाती है। कल्पनाशीलता के बिना कोई भी रचना बड़ी नहीं हो सकती है। इसके अभाव में कोई भी रचनाकार केवल एक दर्पण बनकर रह जाता है। उसके सामने जो घट रहा है, उतना ही वह अपनी रचना में दिखायेगा, उससे अधिक कुछ नहीं। जबकि रचनाकार का काम वह दिखाना भी होता है, जो उसके सामने नहीं घट रहा है। दूसरे शब्दों में जिसे एक सामान्य आदमी नहीं देख पाता है। वह जिस नये समाज को अपनी रचना में दिखाता है, वह कल्पनाशीलता से ही संभव होता है। लेखन ही नहीं, बल्कि कोई भी सृजन हो वह कल्पनाशीलता के बिना संभव नहीं होता है। शिक्षण को भी में इसी रूप में देखता हूँ।

क्या आपने किसी पाश्चात्य कहानीकार को भी पढ़ा है?

थोडा़ बहुत मैक्सिम गोर्की और ताल्स्तॉय को।

पाश्चात्य लेखन और भारतीय लेखन शैली में क्या अंतर पाते हैं?

ज्यादा पढ़ा ही नहीं है, क्या अंतर बताऊंगा भला।

अपने लेखन के बारे में कुछ कहना चाहेंगे?

कुछ नही।

क्यों?

अपने लेखन पर भला खुद क्या कहा जा सकता है? जो लिख दिया, लिख दिया। अब वह मेरा कहाँ रहा।

आपके लेखन को मजबूती देने में आपकी धर्मपत्नी शीला जी के योगदान को आप किस रूप में रेखांेकित करना चाहेंगे?

मैं तो पूरा उनका ही योगदान मानता हूँ। वह यदि सहयोग नहीं करतीं तो शायद में न पढ़ पाता और न लिख। कभी भी उन्होंने मेरे पढ़ने-लिखने को लेकर नकारात्मक टिप्पणी नहीं की। उसे कभी भी फालतू या बैठे-ठाले का काम नहीं कहा। जैसा कि अक्सर मान लिया जाता है। मेरे लिखे की पहली पाठक वह ही रहीं हैं। मैं सुनाता हूँ और वह सुनती रहती हैं। बहुत बार तो पहला प्रूफ वह ही देखती हैं। व्याकरण और वर्तनी की गलतियों को पकड़ती हैं।घर की पूरी जिम्मेदारी को अपने ऊपर लेकर मुझे पढ़ने-लिखने के लिए छोड़ा है। मेरे बैंक-पोस्ट ऑफिस वाले काम भी वह निपटा देती हैं। पहले जब हाथ से लिखना होता था, तो मेरी कविताओं को फेयर करने का काम भी बहुत बार वहीं करती थीं। शुरू-शुरू में वापस आई रचनाओं के लिफाफों को छुपाने का काम भी। जब मैं नाश्‍ता-पानी कर लेता था, तब वह उन लिफाफों को मुझे दिखाती थीं। उन्हें इस बात का अहसास रहता था कि मुझे रचनाओं के लौटने पर कितना दुःख होता है। मेरा मानना है कि पत्नी के सहयोग के बिना कोई भी लेखक लम्बा लेखन नहीं कर सकता है।आपको तो पता है कि मैं जितने समय भी घर में रहता हूँ, लिखने या पढ़ने का काम ही करता रहता हूँ, लेकिन शीला ने कभी इस पर कोई नाराजगी व्यक्त नहीं की, बल्कि जब उनको घरेलू कामों से फुर्सत हो जाती है तो अपनी बुनाई लेकर या किताब लेकर मेरे बगल में आकर बैठ जाती हैं। बीच-बीच में घर-गृहस्थी और आसपडो़स की बातें मुझे बताती रहती हैं। कभी-कभी पढ़ने-लिखने में डूबे रहने के कारण सुन नहीं पाता हूँ, तो हल्की नाराजगी व्यक्त करते हुए कहती हैं कि आपके पास मेरी बात सुनने के लिए समय कहाँ ? लेकिन यह नाराजगी क्षणिक ही होती है। फिर थोड़ी देर में अदरक का पानी बनाकर ले आती है। वह खुद भी बहुत अच्छी पाठक हैं। घर में आनेवाली साहित्यिक पत्रिकाओं की कहानियां तो शायद ही कोई उनसे अपठित रही हो। घर में आने वाली कोई भी कहानी संग्रह या उपन्यास सबसे पहले वही पढ़ती हैं। अच्छा हुआ तो मुझे भी पढ़ने का सुझाव देती हैं।

मनाने का समय ही नहीं होता होगा, कभी यह वाक्‍य नहीं निकला- ये किताबें मेरी सौतन हैं?

यह वाक्‍य तो सुनने को नहीं मिला अब तक।

अच्छी बात है।

इतना ही नहीं, हमारे घर में पढ़ने-लिखने वाले लोगों का हमेशा आना-जाना लगा रहा है। घंटों तक बैठा रहना और बहस सामान्य बात रही है। हमारी बहस चलती रहती है और शीला बहुत प्रेम से चाय-पानी पिलाती रही हैं। खाना खिलाती रही हैं। खुद भी हमारे बातचीत में शामिल होती रही हैं। बाहर से आये साहित्यकारों का रुकना भी होता रहा है।उनकी सेवा-सुश्रुषा में भी कभी कोई कमी नहीं आने दी होगी। गंगोलीहाट में हमने अपने आवास में एक पुस्तकालय स्थापित किया था, उसकी साफ-सफाई और देख-रेख का काम भी शीला ही देखती थीं। यहाँ भी मेरे द्वारा अपने पुस्तकालय को सार्वजनिक करने पर भी उन्हें कोई आपत्ति नहीं हुई। पुस्तकालय से पाठकों को किताब देने के साथ-साथ चाय भी पिला देती हैं। ‘शैक्षिक दखल’ शुरू की उसके प्रकाशक की भूमिका में भी उन्होंने पूरी सक्रियता दिखाई। पंजीकरण का पूरा काम उन्होंने अपने हाथ में लिया। बैंक में खाता खोलना और लेन-देन करना सभी काम वही देखती थीं।

आपकी कविताओं को जब पढ़ता हूँ तो आंचलिक शब्दों का प्रयोग बहुत कम ही होता है, फिर भी आपकी कविताएं आंचलिकता को पूर्णतया उभार पाती हैं। यह कैसे संभव हो पाता है?

आंचलिक शब्दों के प्रयोग के बारे में मेरा स्पष्ट मानना रहा है कि इन शब्दों का इस्तेमाल जबरदस्ती नहीं होना चाहिए। ये शब्द सहज रूप से कथ्य की जरूरत के मुताबिक ही आने चाहिए। वहीं आने चाहिए, जहाँ भाव-विचार या प्रसंग की सटीक अभिव्यक्ति के लिए जरूरी हों। जब उनका कोई और विकल्प न हो। किसी दूसरे शब्द के माध्यम से वह गहराती, तीव्रता और व्यापकता नहीं आ पा रही हो। देश-काल-परिस्थिति और पात्र की प्रमाणिकता के लिए अति आवश्यक हो। किसी रचना को आंचलिक रंग देने मात्र के लिए मैंने कभी बोली के शब्दों का प्रयोग नहीं किया। आंचलिक शब्दों के अतिशय प्रयोग से रचना के बोझिल और दुरूह होने का उसी तरह खतरा पैदा हो जाता है, जैसे तत्सम और संस्कृतनिष्ठ शब्दों के प्रयोग से। केवल बोली के शब्दों से ही कोई रचना आंचलिक नहीं हो जाती है। जीवन की घटनाएँ, प्रकृति, समाज और उसमें आये चरित्र भी रचना को आंचलिक बनाते हैं।

यह कह सकते हैं लेखकों को आंचलिक शब्दों के प्रयोग सतर्कता बरतनी चाहिए।

बिलकुल। बोली के शब्दों के प्रयोग में यह ध्यान रखने की जरूरत होती है कि वे सहज रूप से आयें, कहीं भी जबरदस्ती ठूंसे नहीं लगने चाहिए। पाठक को उन्हें समझने के लिए किसी शब्दकोश की जरूरत नहीं पढ़नी चाहिए, सन्दर्भ से ही उनके आशय खुल जाने चाहिए। बेहद सतर्कता की जरूरत है।

साहित्य के केंद्रीकरण पर आप क्या कहना चाहेंगे?

केन्द्रीकरण से आपका क्या आशय है ? प्रश्न को थोडा और खोलें।

साहित्य का कुछ गिने-चुने लोगों के इर्द-गिर्द होना।

पाठकों के या साहित्यकारों के?

साहित्यकारों के।

मुझे लगता है कि‍ आज ऐसा नहीं है। छोटी-छोटी जगह से निकलने वाली ‘बाखली’जैसी सैकड़ों लघु पत्रिकाओं और सोशल मीडि‍या ने इसे तोडा़ है।

यानी ये आज केवल भ्रम रह गया है।

वस्तुस्थिति में काफी बदलाव आया है और आता जा रहा है। गढ़ और मठ टूट रहे हैं। अब दूर-दराज से लिखने वाले राष्ट्रीय स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज कर रहे हैं। कुछ महानगरों या साहित्य के केन्दों की बपोती नहीं रहा। सोशल मीडिया साहित्य को आम पाठक तक ले जाने और साहित्यकारों के आपसे संवाद का एक प्रभावशाली और सशक्त माध्यम है। इसका भरपूर इस्तेमाल किया जाना चाहिए। सोशल मीडिया के प्रचलन बढ़ने से साहित्यकार और पाठक के बीच से संपादक और आलोचक की भूमिका कम हो गयी है। अब साहित्यकार इनका मुहताज नहीं रह गया है।

वेदप्रकाश जी के जाने पर लुग्दी साहित्य पर बहुत कुछ लिखा जा रहा है। आप लुग्दी साहित्य को किस स्तर पर देखते हैं?

लुगदी साहित्य को मैं साहित्य के क्षेत्र में प्राथमिक स्कूल के रूप में देखता हूँ। पढ़ने की लत लगाने में इसकी भूमिका हमेशा से असंदिग्ध रही है। उससे अधिक मैं इसके कोई सार्थकता नहीं देख पाता हूँ।

जो शास्त्रीय साहित्य अलमारियों और पुस्तकालयों में डम्प है, उसको किस श्रेणी में रखेंगे?

उच्च शिक्षा।

थोड़ा विस्तार से।

शास्त्रीय साहित्य हमें जीवन की गहराई और व्यापकता में ले जाता है। जीवन के विविध रूप-रंग-गंधों का दर्शन कराता है। अधिक मानवीय बनाता है। संवेदना का विस्तार करता है। मुक्तिबोध के शब्दों में कहूं तो अंतरात्मा के आयतन का विस्तार करता है। जीवन के ज्वलंत प्रश्नों से मुठभेड़ करता है। और एक बदलाव की दिशा बताता है। उसके लिए एक बेचैनी पैदा करता है। उसे पढ़ने के बाद पाठक वैसा नहीं रह जाता है, जैसा उससे पहले था। वह अपने को अधिक समृद्ध पाता है। केवल वस्तुस्थिति का चित्रण ही नहीं करता है, बल्कि उसके कारणों की पड़ताल भी करता है। कार्य और कारणों के संबंधों की तार्किक व्याख्या प्रस्तुत करता है। कुल मिलकर विवेकशीलता, संवेदनशीलता,  भाषाई संस्कार और वैज्ञानिक सोच पैदा करतस है।

सामन्तवाद और उदारवाद दोनों के साहित्य पर पर प्रभाव को आप किस रूप में देखते हैं?

समाज में मौजूद हर विचारधारा का प्रभाव साहित्य में दिखाई देना स्वाभाविक है। साहित्य के मूल में तो विचार ही होता है। हर विचारधारा साहित्य के माध्यम से ही प्रचार-प्रसार और मान्यता प्राप्त करती है। समाज में जितनी तरह की विचारधाराएँ होंगी, उतने तरह का साहित्य मिलेगा।

दोनों के कुप्रभावों को इंगित करने की भी तो आवश्यकता है?

वह तो हर नयी विचारधारा करती ही है।

मेरे कहने का आशय नयी पीढ़ी को उसके कुप्रभावों से आगाह किन शब्दों किया जाए,  हतोत्साहित भी न हों और कार्य में मौलिकता और प्रगतिशीलता भी आए?

उदारवाद एक तरह से सामन्तवाद के कुप्रभावों की उपज है। उसके लिए तो नई पीढ़ी को अपने समय और समाज को गहराई से समझना होगा। आर्थिक-सामजिक तथा राजनीतिक हर पहलू पर विचार करना होगा। मानव समाज के पूरे विकासक्रम को जानना होगा। उसका अन्वेषण-विश्‍लेषण करना होगा।यह एक लम्बी प्रक्रिया है। एक या दो दिन में किसी के दृष्टिकोण को नहीं बदला जा सकता है। या किसी विचारधारा की सीमाओं को नहीं बताया जा सकता है। एक बात और महत्वपूर्ण है कि यदि कोई बदलने के लिए तैयार न हो तो आप उसे नहीं बदल सकते हो।

मैं फिर समीक्षा में लौटता हूँ।आजकल समीक्षा और आलोचना में हो रहे घालमेल पर आपका मन्तव्य क्या है?

किस तरह की घालमेल ?

मेरा आशय गिराने-उठाने से है।

उठाने-गिराने का यह खेल हमेशा ही रहा है। इधर सोशल मीडिया के आने से कुछ बढ़ गया है। यह साहित्य और साहित्यकार दोनों के हित में नहीं है और अंतत समाज के हित में भी नहीं है।

आपको नहीं लगता कि हिंदी साहित्य में जो तथाकथित बड़े आलोचक, लेखक,  समीक्षक हैं,  वही उसे सम्मान की दृष्टि से नहीं देखते?

ऐसा कहना तो ठीक नहीं होगा।

क्या कारण है कि हिंदी साहित्य आज भी अंग्रेजी साहित्य से पीछे दिखता है?

किस रूप में पीछे मानते हैं, आप?

पाठक तक पहुँच और उसकी विषयवस्तु, उसकी लोकप्रियता, उसकी व्यवसायिकता।

यदि आप केवल भारत के सन्दर्भ में बात कर रहे हैं तो मुझे नहीं लगता है कि अंग्रेजी साहित्य पढ़ने वालों की संख्या हिंदी साहित्य पढ़ने वालों से अधिक है। अंग्रेजी अन्तरराष्‍ट्रीय भाषा है, उसकी लोकप्रियता और व्यवसायिकता का अधिक होना स्वाभाविक है। इसके पीछे बाजार की शक्तियों का भी हाथ है। विषयवस्तु में मुझे हिंदी का साहित्य कहीं से भी कम नहीं लगता।

आपकी मातृभाषा कुमाउंनी ही है। क्या आपने कुमाउंनी में भी कभी कुछ लिखने की कोशिश की?

नहीं।

नहीं लिखने के क्या कारण रहे?

लम्बी कहानी है, कुमांउनी में न लिख पाने की।

बचपन में पढने के लिए पिताजी के साथ लोहाघाट जाना हुआ। मैं अपनी सोर्याली में बोलता था, वहां भी उसी में बोलने लगा जिसमें काली कुमांउनी से कुछ अंतर है। इन दोनों बोलियों के शब्दों में अंतर है। वहां साथी बच्चों के द्वारा मेरी बोली के शब्दों की मजाक बनाया जाने लगी। मैंने हिंदी में बोलना शुरू किया फिर वहां से घर लौटने के बाद हिंदी में ही बोलने लगा। गांव में, लोगों के बीच हिंदी में बोलने के चलते तारीफ होने लगी। बस फिर वही सिलसिला चल पड़ा। कुमाउंनी का अभ्यास छूटता ही गया। जब बोलने का ही अभ्यास छूट गया तो लिखना तो दूर की बात रही। हिंदी में ही मौखिक-लिखित अभियव्यक्ति का अभ्यास अधिक रहा। उस समय अपनी बोली-बानी के प्रति कोई अतिरिक्त चेतना भी नहीं थी। शहर के नजदीकी गांव में रहने के चलते कुछ ऐसा माहौल भी था कि कुमाउंनी में बोलना पिछड़ेपन का प्रतीक समझा जाता था। हर माता-पिता अपने बच्चों को हिंदी में बोलने के लिए ही प्रोत्साहित करते थे, बल्कि कुमांउनी में बोलने पर टोकते थे। इस तरह छूटती ही चली गयी, अपनी दुधबोली। जब तक अपनी बोली-बानी के महत्व को समझने लगा, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। हिंदी में लिखना और छपना अधिक हो गया। उसी में सहज भी लगने लगा। हिंदी में लिखकर अधिक पाठकों तक पहुंचना संभव था। कभी यह भी नहीं लगा कि जो बात हिंदी में कह रहा हूँ, उसे कुमाउंनी में बेहतर तरीके से कह सकता हूँ। जहाँ लोक की संवेदना को अधिक गहराई से व्यक्त करने हेतु इसकी जरूरत लगी, हिंदी में ही लोक बोली के शब्दों का इस्तेमाल कर लिया। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि लोक बोली को लेकर किसी तरह का कोई हीनताबोध हो मन में। कुमांउनी से मुझे उतना ही लगाव है, जितना हिंदी से। कभी फुर्सत मिलेगी तो जरूर कुमांउनी में भी लिखना चाहूँगा। कुछ कवितायें और समीक्षाएं लिखी भी हैं।

बुद्धिजीवियों, दलितों, पिछड़ों पर हो रहे हमलों के पीछे क्या कारण पाते हैं, आप?

यह अपनी सत्ताओं को संरक्षित रखने का कुप्रयास है। एक वर्ग विभाजित समाज में सत्ताएं किसी तरह के प्रतिरोध को बर्दास्त नहीं कर पाती है। उनको किसी तरह की चुनौती पसंद नहीं। वे हमेशा अपना एकाधिकार चाहती हैं। शासक वर्ग कभी नहीं चाहता है कि शासित वर्ग किसी रूप में भी सर उठाये। उसकी बराबरी में खड़ा हो। वह समाज में लगातार विभाजन को बनाये रखना चाहता है ताकि उसका वर्चस्व बना रहे और वह ऐशो आराम की जिंदगी जी सके। इसलिए दलितों और पिछड़ों पर हमलों का इतिहास बहुत पुराना है। उनको कमजोर बनाये रखने और भयग्रस्त करने के लिए शारीरिक और मानसिक हमले हमेशा से होते रहे हैं और जब तक वर्ग विभाजित समाज रहेगा, इनका खत्म होना संभव भी नहीं दिखाई देता है। सत्ता में जितनी अधिक सामन्ती और पूंजीवादी ताकतें हावी होंगी, उतना अधिक यह दमन तेज होगा। इन ताकतों द्वारा कमजोर वर्गों पर अपना प्रभुत्व बनाए रखने के लिए शारीरिक बल और मानसिक गुलाम बनाने के तरीकों का इस्तेमाल किया जाता है। हमेशा कोशिश रहती है कि शासित वर्ग की चेतना को कुंद कर दिया जाय। उसे धर्म, जाति, लिंग, रंग, क्षेत्र आदि की संकीर्णताओं में जकड़ दिया जाय। इसके लिए पूरा शिक्षाशास्त्र तैयार किया जाता है। लेकिन बुद्धिजीवी इस सबके खिलाफ चेतना के प्रसार का काम करते हैं, शासक वर्ग के कुचक्रों को उघाड़ते हैं, जनता को उनकी काली करतूतों से सचेत करते हैं। इस तरह प्रतिरोध को संगठित और धारदार करने का काम करते हैं। ऐसे में भला सत्ताएं उन्हें कैसे सहन कर सकती हैं? उनकी पहली कोशिश होती है कि वे बुद्धिजीवियों को लालच देकर अपने साथ मिला लें, न मानें तो उन्हें किसी भी तरह बदनाम किया जाय। उनकी छवि को संदिग्ध कर दिया जाय। इसके बावजूद न मानें तो उनको किसी तरह से कानूनी पचड़े में फांस लिया जाय या फिर उनका काम तमाम कर दिया जाय। दाभोलकर, पानसारे, कुलबुर्गी आदि इसके ताजे उदहारण हैं।

उभरते साहित्यकारों और कवियों के लिए उनके लेखन के विकास और भविष्य के लिए भी कुछ कहना तो बनता ही है?

अभी ऐसी न उम्र हुई और न अनुभव। मैं तो अभी खुद समाज और साहित्य को समझने की कोशिश में लगा हूँ। अपने भीतर के इंसान को बचाने की जद्दोजहद कर रहा हूँ। आज के दौर में कितना कठिन है- अपनी संवेदनशीलता को बचाए रखना। बस उसी दिशा में संघर्षरत हूँ। संवेदनशीलता को खत्म करने के लिए चारों ओर से सुनियोजित हमले हो रहे हैं। एक इंसान का इंसान बने रहना कठिन हो गया है। उसके ऊपर शारीरिक और मानसिक हमले किए जा रहे हैं। उससे कहा जा रहा है कि तुम कुछ भी बन जाओ, लेकिन तुम्हारा इंसान बने रहना हमें मंजूर नहीं है। सांप बन जाओ, केंचुए बन जाओ, सियार बन जाओ, गिद्द या चील बन जाओ, मकड़ी या जोंक बन जाओ, सब चलेगा लेकिन अपनी रीढ़ पर सीधा खड़ा इंसान उन्हें पसंद नहीं।

 

साहित्य की कलम से विज्ञान लिखता हूं: देवेंद्र मेवाड़ी

देवेंद्र मेवाड़ी

7 मार्च 1944 को नैनीताल जिले के एक दूरस्थ पर्वतीय गांव-कालाआगर में जन्‍में वरिष्ठ विज्ञान लेखक श्री देवेंद्र मेवाड़ी के पर्यावरण, कृषि, जीव-जंतु, खगोल विज्ञान और विज्ञान कथा पसंदीदा विषय हैं, जिन पर वे पिछले पांच दशकों से निरंतर लेखनी चला रहे हैं। देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में उनके वैज्ञानिक विषयों पर 1500 से अधिक लेख प्रकाशित हो चुके हैं। वे अब तक 25 मौलिक पुस्तकें लिख चुके हैं जिनमें प्रमुख है- ‘विज्ञाननामा’, ‘मेरी यादों का पहाड़’ (आत्मकथात्मक संस्मरण), ‘मेरी विज्ञान डायरी’ (भाग-1), ‘मेरी विज्ञान डायरी’ (भाग-2), ‘मेरी प्रिय विज्ञान कथाएं’, ‘भविष्य’ तथा ‘कोख’ (विज्ञान कथा संग्रह), ‘नाटक-नाटक में विज्ञान’, ‘विज्ञान की दुनिया’, ‘विज्ञान और हम’, ‘सौरमंडल की सैर’, ‘विज्ञान बारहमासा’, ‘विज्ञान प्रसंग’, ‘सूरज के आंगन में’, ‘फसलें कहें कहानी’, ‘विज्ञान जिनका ऋणी है’ (भाग-1 तथा भाग-2), ‘अनोखा सौरमंडल’, ‘पशुओं की प्यारी दुनिया’, ‘हॉर्मोन और हम’। प्रस्तुत है मेवाड़ी जी के साथ हुई मनीष मोहन गोरे की बातचीत के अंश-    

उत्तराखंड के दूर-दराज के गांव में जन्मे एक बालक से प्रख्यात विज्ञान लेखक देवेंद्र मेवाड़ी बनने का सफर किस तरह तय किया?

आज पीछे पलट कर देखता हूं मनीष जी, तो मुझे अपनी इस पचास वर्ष लंबी यात्रा की राह साफ दिखाई देती है जो मुझे फिर से पहाड़ के मेरे गांव और मेरे बचपन के दिनों में पहुंचा देती है। उत्तराखंड के नैनीताल जिले में पहाड़ के जिस गांव कालाआगर में मेरा जन्म हुआ, वह तब खेतों की हरियाली और घने जगलों से घिरा हुआ था। उन घने जंगलों में असंख्य वन्य जीव होते थे। गांव में चिड़ियां चहचहाती रहती थीं। कितनी तरह की रंग-बिरंगी तितलियां और कीट-पतंगे होते थे। हमारे गांव के सिरमौर जंगल में वसंत आते ही बुरांश के सुंदर लाल फूल खिल जाते थे तो खेतों के आसपास पीले रंग की प्यूली के फूल मन को लुभाने लगते थे। हम नीचे घाटियों से उठता हुआ कोहरा देख सकते थे जो पेड़-पौधों और खेतों से होकर हमसे मिलने के लिए भागता हुआ ऊपर चला आता था। वहां प्रकृति थी और हमारी तमाम जिज्ञासाओं के जवाब प्रकृति ही देती थी। हम बीजों को उगते, फूलों को खिलते, बादलों को उमड़-घुमड़ कर बरसते हुए देख सकते थे। रात में लाखों-लाख तारों भरा आसमान हमारा मन मोह लेता था। आज याद आता है कि कितना कुछ जानना चाहता था मैं तब अपने आसपास की दुनिया के बारे में। मेरे भीतर बैठा वही बालक आज अपने विज्ञान लेखन के जरिए प्रकृति की किताब के बारे में आमजन को बताने की विनम्र कोशिश कर रहा है।

वनस्पति विज्ञान में एम.एस-सी., हिंदी साहित्य में एम.ए. और जनसंचार में उपाधि हासिल करने के बाद आप विज्ञान लेखन की ओर कैसे उन्मुख हुए?

आपको मैं यहां बताना चाहता हूं कि इस तरह प्रकृति की किताब पढ़ते-पढ़ते मैं अपने गांव के सामने के दूसरे पहाड़ पर गोविंद बल्लभ पंत इंटर कालेज मैं पहुंच गया और वहां भी प्रकृति के बीच रह कर विज्ञान के विषयों के साथ इंटर की परीक्षा पास की। पेड़-पौधों और वन्य जीवों से बहुत प्यार था, इसलिए नैनीताल में उच्च शिक्षा के दौरान वनस्पति विज्ञान, प्राणि विज्ञान और रसायन विज्ञान जैसे विषय चुने। फिर वनस्पति विज्ञान में एम.एस-सी की। उन्हीं दिनों की बात है-  मैं कहानियां लिखने लगा था। मेरी कहानियां कहानी, माध्यम, उत्कर्ष आदि पत्रिकाओं में छपने लगी थीं। विज्ञान मुझे बहुत रोचक लगता था और मेरा मन करता था कि मैं विज्ञान की वे तमाम बातें अपने साथियों और अन्य लोगों को बताऊं। इसलिए मैंने विज्ञान पर लिखना शुरू किया। मेरा पहला लेख सन् 1965 में ‘कुमाऊं और शंकुधारी’ इलाहाबाद की ‘विज्ञान’ पत्रिका में और दो लेख- ‘जानि शरद ऋतु खंजन आए’ तथा ‘शीत निष्क्रियता’ ‘विज्ञान जगत’ मासिक पत्रिका में प्रकाशित हुए। ‘विज्ञान जगत’ के संपादक प्रो. आर.डी. विद्यार्थी ने मेरे पत्र के उत्तर में लिखा था, “लिखते रहना, कौन जाने किसी दिन तुम स्वयं एक विज्ञान लेखक बनो।” उनके इस वाक्य ने मुझमें विज्ञान लेखन की लौ जगा दी और मैं विज्ञान लेखक बन गया।

50 वर्ष लंबी अबाध विज्ञान लेखन यात्रा के दौरान आपके जीवन में अनेक पड़ाव आये होंगे और आपने संघर्ष किया होगा। कभी ऐसा महसूस नहीं हुआ कि जीवन के तमाम झंझावातों और नौकरी-चाकरी के बीच विज्ञान लेखन नहीं हो पा रहा है और इसे छोड़ ही देते हैं।

मैंने तय कर लिया था कि मुझे जीवन में विज्ञान लेखक बनना है, परिवार के भरण-पोषण के लिए मुझे भले ही किसी भी तरह की नौकरी करनी पड़े। विज्ञान लेखक बनने के मेरे संकल्प ने मुझे निरंतर विज्ञान लेखन के लिए प्रेरित किया। मुझे पहली नौकरी भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (पूसा इंस्टीट्यूट, नई दिल्ली) में मिली। वहां मैंने तीन वर्ष तक मक्का की फसल पर शोध कार्य किया। उस बीच मैंने मक्का पर कई लेख लिखे। उसके बाद पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय के आमंत्रण पर मैं पूसा इंस्टीट्यूट छोड़ कर पंतनगर चला गया। वहां मैंने तेरह वर्षों तक कृषि की मासिक पत्रिका ‘किसान भारती’ का संपादन किया। इसके अलावा पाठ्य-पुस्तकों के अनुवाद और पत्रकारिता शिक्षण से भी जुड़ा रहा। वहां से मैं देश के सबसे बड़े राष्ट्रीयकृत बैंक पंजाब नैशनल बैंक में जनसंपर्क तथा प्रचार की जिम्मेदारी संभालने के लिए चला गया। वहां 22 वर्ष रहा, चीफ (जनसंपर्क) के रूप में अवकाश प्राप्त करने के बाद एक वर्ष तक विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी विभाग (भारत सरकार) की संस्था विज्ञान प्रसार में फैलो रहा। यह सब इसलिए बता रहा हूं कि नौकरी चाहे कोई भी रही हो, मैं निरंतर विज्ञान लेखन करता रहा क्योंकि यही मेरे जीवन का लक्ष्य था। इन तमाम वर्षों में देश की अग्रणी पत्र-पत्रिकाओं के लिए लगातार लिखता रहा। प्रिंट के अलावा, रेडियो, टेलीविजन तथा फिल्म जैसे माध्यमों के लिए भी लिखा। मैंने हर नौकरी पूरी ईमानदारी और मेहनत से की तथा नौकरी के काम को निर्धारित समय से भी अधिक समय दिया। लेकिन नौकरी के बाद का समय तथा छुट्टियों के दिन मेरे अपने होते थे जिनका मैंने पूरा उपयोग विज्ञान लेखन के लिए किया। एक बात और, विज्ञान लेखन मुझे सदा नौकरी के तनावों से मुक्त होने का सुअवसर देता रहा। बल्कि यों कहूं कि दवा का काम करके मुझे तनाव से मुक्त करता रहा।

आपके लिए लोकप्रिय विज्ञान लेखन के क्या मायने हैं? विज्ञान लेखन करते हुए आपके मन में क्या लक्ष्य रहते हैं?

मेरे लिए लोकप्रिय विज्ञान लेखन का अर्थ यह है कि तकनीकी भाषा में लिखा गया विज्ञान का ज्ञान ‘खग ही जाने खग की भाषा’ न बना रहे। वह वैज्ञानिकों और विज्ञान के शिक्षकों तथा विद्यार्थियों तक ही सीमित न रहे, बल्कि आम जन तक पहुंच सके। यह तभी हो सकता है जब विज्ञान के ज्ञान को सरल-सहज भाषा, रोचक शैली और विविध विधाओं में लिखा जाए। अपनी  लेखन यात्रा में मेरा यही लक्ष्य रहा है।

आपके विज्ञान लेखन की एक अलग पहचान है। इस मुकाम को कैसे हासिल किया आपने?

आपकी यह बात सुन कर मुझे बहुत खुशी हो रही है। असल में मैं यह सोचता रहता था कि मेरे लेखन की एक अलग पहचान बने। मेरी रचना का अगर कोई भी अंश किसी पाठक को मिल जाए तो वह पहचान ले कि यह तो लगता है देवेंद्र मेवाड़ी ने लिखा होगा। इसका सबूत मुझे कई वर्ष पहले मिला था जब पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक दूरस्थ इलाके से किसी सीता बहिन का पत्र मिला। उनके दो बच्चे एक पत्रिका के पन्ने से खेल रहे थे जिसे उनके हाथ से लेकर सीता ने पढ़ा। उसमें लेखक का नाम नहीं था। उसने पत्र में लिखा कि वह पन्ना पढ़ कर मैं समझ गई थी कि वह सब आपने ही लिखा होगा। वह मेरी रचनाएं पढ़ती रही थी इसलिए उसने मेरे लिखने का अंदाज बखूबी समझ लिया था। असल में अपने लेखन को एक अलग पहचान देने के लिए मैंने उसे विविध विधाओं में लिखा और उसमें साहित्य की सरसता भी भरी। इसीलिए मैं कहता हूं कि मैं साहित्य की कलम से विज्ञान लिखता हूं। अपने इस प्रयास में मैं हरसंभव कोशिश करता हूं कि विज्ञान की जो बात मैं पाठकों को बताने जा रहा हूं, वह ऐसी भाषा और शैली में हो कि वे उसे अच्छी तरह समझ लें और उसका आनंद उठाएं।

 साहित्य की कलम से विज्ञान लेखन सचमुच प्रेरक पंक्ति है युवा विज्ञान लेखकों के लिए। आपने 13 वर्ष तक कृषि पत्रिका किसान भारतीका सम्पादन कार्य भी किया है। इस अनुभव ने आपमें किस प्रकार का संस्कार भरा?

वे तेरह वर्ष मेरे लिए लेखन और संपादन की परीक्षा के वर्ष थे। पत्रिका किसानों की थी, इसलिए मुझे विज्ञान की जानकारी ऐसी भाषा-शैली में उन तक पहुंचानी थी जिसे वे आसानी से समझ सकें। उस दौरान मुझे तरह-तरह की शैलियों में लिखने का मौका मिला। और, यह तो सच है कि किसान विज्ञान की जानकारी का लाभ तभी उठाते जब उन्हें वह जानकारी सरल-सहज भाषा में मिलती। मैंने वही किया।

आपको ऐसा नहीं लगता कि इतर क्षेत्र में रहने से मन में जो तड़प उठती है, वही व्यक्ति से उसके पसंदीदा क्षेत्र में उल्लेखनीय काम करवाती है।

लगता है, बशर्ते यह हर क्षण याद रहे कि जीवन में मुझे क्या करना है, क्या बनना है। जो चाहा, वह सदा मिलता नहीं। इसलिए जो मिलता है, उसमें समर्पित रूप से काम करते हुए शेष समय में वह किया जा सकता है जो जीवन का लक्ष्य है। इतर क्षेत्र में काम करने पर मन में वह तड़प बार-बार उठती है। वह काम पिछड़ने पर हूक भी उठती है।

आपके लेखन के आरम्भिक दौर में बड़ी पत्रिकाएं थीं, मनीषी संपादक थे, आपने उन पत्रिकाओं में खूब लिखा भी। लेकिन, बाद में वे पत्रिकाएं कम हो गईं, अखबारों में विज्ञान कम हो गया। तब कैसे आपने अपना विज्ञान लेखन जारी रखा?

आप ठीक कह रहे हैं। मेरे लेखन के प्रारंभिक दौर में धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, नवनीत, कादंबिनी और दिनमान जैसी बड़ी प्रसार संख्या वाली मासिक पत्रिकाएं तो थीं ही, सभी अखबार भी रविवासरीय पत्रिका प्रकाशित किया करते थे जिनमें कथा-कहानी, कविता के साथ-साथ विज्ञान भी छपता था। डा. धर्मवीर भारती, मनोहर श्याम जोशी, नारायण दत्त, अज्ञेय और रघुवीर सहाय जैसे मनीषी संपादक भी थे। मेरा सौभाग्य है कि उन मनीषी संपादकों ने मेरे विज्ञान लेखन को न केवल प्रोत्साहित किया, बल्कि उसे संवारा भी। वैसी पत्रिकाओं की कमी हुई तो मैं समाचारपत्रों के रविवारीय संस्करणों और संपादकीय पृष्ठ पर विज्ञान लिखता रहा। मैंने रेडियो के लिए भी विज्ञान खूब लिखा। बाद में टेलीविजन आ जाने पर उसके लिए भी कार्यक्रमों के आलेख लिखे और प्रस्तुत किए।

आपने रेडियो-टेलीविजन का जिक्र किया। इन इलैक्ट्रानिक माध्यमों के लिए आपने लेखन की शुरूआत कैसे की?

वैज्ञानिक विषयों पर रेडियो वार्ताओं से। आकाशवाणी के दिल्ली और लखनऊ केन्द्रों से विज्ञान के विविध विषयों पर मेरी बड़ी संख्या में वार्ताएं प्रसारित हुईं। मुझे याद है, उस दिन जब पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी हमारे देश के प्रथम अंतरिक्षयात्री राकेश शर्मा से सीधे अंतरिक्ष में बात करने वाली थीं तो उस वक्त मैं लखनऊ केन्द्र से ‘अंतरिक्ष में भारत का योगदान’ विषय पर अपनी वार्ता दे रहा था। वार्ता के अंत में मेरे पास एक पर्ची भेज कर श्रोताओं के लिए यह घोषणा करने के लिए कहा गया कि ‘अभी कुछ ही क्षणों के बाद प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी हमारे देश के प्रथम अंतरिक्ष यात्री राकेश शर्मा से बातचीत करेंगी। कृपया प्रतीक्षा करें।’ मैंने यह घोषणा की। और, तभी लिंक जुड़ गया और प्रधानमंत्री की राकेश शर्मा से बातचीत शुरू हो गई। वे मेरे लिए रेडियो प्रसारण के यादगार क्षण थे। दिल्ली केन्द्र से मैंने लाइव प्रसारण में वर्ष 1995 के सूर्यग्रहण के विशेषज्ञ की हैसियत से आंखों देखा हाल और ग्रहण से जुड़े वैज्ञानिक तथ्य बताए। ब्रिज-इन और फोन-इन कार्यक्रमों में भाग लिया। विज्ञान पत्रिका कार्यक्रम की प्रस्तुति की और ‘मानव का विकास’ सहित अनेक विज्ञान धारावाहिकों के लिए वर्षों तक पटकथाएं लिखीं। इसी तरह दूरदर्शन, लखनऊ के ‘चैपाल’ कार्यक्रम में नियमित ‘नई बातरू नया चलन’ की धारावाहिक प्रस्तुति दी। दिल्ली आकर ‘विज्ञान दर्पण’ के पचासों एपिसोड लिखे। प्रख्यात फिल्मकार अरुण कौल की संगत में ‘धूमकेतु’ वृत्तचित्र बनाया।

संचार के मुद्रण स्वरूपों की जगह डिजिटल मीडिया ने समाज के लगभग हर वर्ग को अपनी ओर आकर्षित किया और अपना उपयोगकर्ता बनाया है। यह एक बड़ी घटना है। इसके चलते बच्चों और युवाओं में किताबी पठनीयता घटी है और फेसबुक, वाट्सएप जैसे डिजिटल मंचों पर उपस्थिति बढ़ी है। इन मंचों का सहारा लेकर इन्हें लोकप्रिय विज्ञान या ललित विज्ञान साहित्य से कैसे जोड़ा जा सकता है?

यह बात सही है कि विगत कुछ वर्षों में डिजिटल माध्यम की लोकप्रियता बढ़ी है। लेकिन, मैं यह भी मानता हूं कि किताब का अपना अस्तित्व है और वह सदा बना रहेगा। जिन्हें किताब पढ़नी है, वे किताबें पढ़ रहे हैं। हां, हमें समय की जरूरत के अनुसार डिजिटल मीडिया का भी विज्ञान लेखन के लिए भरपूर उपयोग करना चाहिए। मैंने भी कुछ वर्ष पहले से फेसबुक और अपने ब्लाग पर विज्ञान की बातें लिखना शुरू किया। आभासी दुनिया के साथियों ने मेरे इस लेखन में रुचि ली और उनकी संख्या बढ़ती गई। यहां मैं आपको यह भी बता दूं कि अनेक साहित्यकार और साहित्य प्रेमी भी मेरे विज्ञान लेखन के नियमित पाठक हैं। इस तरह मैं विज्ञान और साहित्य के बीच एक सेतु बनने की भी हर संभव कोशिश कर रहा हूं। डिजिटल माध्यम के लाखों-लाख पाठक हैं। हमें इस माध्यम का भरपूर उपयोग करके उन पाठकों तक विज्ञान का ज्ञान पहुंचाने का निरंतर प्रयास करना चाहिए।

सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों पर विज्ञान लेखन का कितना प्रभाव है?

सोशल मीडिया विज्ञान की जागरूकता बढ़ाने के लिए एक सशक्त माध्यम के रूप में काम आ सकता है। इस दिशा में कुछ विज्ञान लेखक समर्पित रूप से काम भी कर रहे हैं और उनके ब्लाग सामयिक वैज्ञानिक जानकारी पाठकों को दे रहे हैं। ‘विज्ञान विश्व’ और ‘साइंटिफिक वर्ल्ड’ काफी अच्छे ब्लाग हैं। लेकिन, विज्ञान लेखकों को इस विधा का अधिक से अधिक उपयोग करना चाहिए।

विज्ञान डायरी, संस्मरण जैसी अनोखी साहित्यिक विधाओं को आपने विज्ञान लेखन से जोड़कर काम किया है। इस दिशा में काम करने की प्रेरणा आपको कहां से मिली?

यह जानकर खुशी हुई कि आपका ध्यान इस ओर गया है। केवल लेखों के रूप में विज्ञान प्रस्तुत करने की एकरसता को तोड़ने के लिए मैंने डायरी के रूप में विज्ञान लिखना शुरू किया। इस विधा में मेरी दो पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। डायरी के रूप में विज्ञान लिखने पर उसमें एक व्यक्तिगत लगाव और अधिक विश्वसनीयता आ जाती है। पाठक उसे लेखक के निजी बयान के रूप में लेता है। इसी तरह मैंने संस्मरण की विधा में निकट से देखे विज्ञान लेखकों के बारे में लिखा है जिनमें उनका पूरा व्यक्तित्व और कृतित्व उजागर होता है। इसके अलावा मैंने नाट्य विधा में भी काफी विज्ञान लिखा है और शीघ्र ही मेरे रेडियो नाटकों की पुस्तक ‘नाटक-नाटक में विज्ञान’ प्रकाशित होने जा रही है। विगत दो वर्षों से मैं स्कूल-कालेजों और विश्वविद्यालयों में जाकर विज्ञान की किस्सागोई यानी स्टोरी टेंलिंग भी कर रहा हूं। अब तक पांच हजार से अधिक बच्चों को मैं सौरमंडल की सैर कराने के साथ-साथ विज्ञान की कहानियां भी सुना चुका हूं। जहां तक प्रेरणा का सवाल है, वह तो अंतःप्रेरणा ही है। जब मन कुछ नया करने के लिए बेचैन होता है तो नई विधा के रूप में रास्ता सामने दिखाई देने लगता है।

अनुवाद एक महत्वपूर्ण काम है। इसमें दो भाषाओं का ज्ञान आवश्यक है, लेकिन जब वैज्ञानिक साहित्य के अनुवाद की बात आती है तो इसमें विज्ञान की जानकारी का तीसरा आयाम जुड़ जाता है। मेरी चिंता है कि विज्ञान साहित्य के अनुवादकों को कैसे तैयार किया जाना चाहिए?

बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया आपने। अनुवाद एक बेहद गंभीर कार्य है। वैज्ञानिक साहित्य का अनुवाद करते समय अनुवादक की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। भारत में हिंदी सहित विभिन्न भारतीय भाषाओं में वैज्ञानिक साहित्य के अनुवाद की स्थिति संतोषजनक नहीं कही जा सकती। इस ओर ध्यान दिए जाने की जरूरत है। यहां पर विज्ञान संचार की सरकारी और गैर सरकारी एजेंसियों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है।

जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण जैसी मौजूदा सार्वभौमिक समस्याओं के लिहाज से विज्ञान लेखकों और विज्ञान संपादकों के दायित्व को आप किस तरह देखते हैं?

जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण जैसे खतरों से जन सामान्य को आगाह करने में विज्ञान लेखक महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकते हैं। विज्ञान संपादक ऐसे जानकारीपूर्ण विज्ञान लेखों को लिखवाने और उन्हें प्रकाशित करने में अहम योगदान दे सकते हैं।

वैज्ञानिक साहित्य सृजन में मानवीय पहलुओं और मूल्यों का संपोषण कितना अहम है? पर्यावरण संरक्षण और वैज्ञानिक शोध की दिशा में इनकी भूमिका को आप किस प्रकार महसूस करते हैं?

विज्ञान और प्रौद्योगिकी को मनुष्य के जीवन तथा समाज से अलग करके नहीं देखा जा सकता है। ये हमारे जीवन और समाज से अभिन्न रूप से जुड़े हुए विषय हैं। वहीं दूसरी ओर यह भी उतना ही सच है कि वैज्ञानिक अनुसंधान के दौरान यह सुनिश्चित किया जाए कि इससे पर्यावरण और जीव-जंतुओं के अस्तित्व पर संकट न आने पाए।

विज्ञान लेखन की कौन-कौन सी सशक्त विधाओं में काम करने की संभावना है?

लेख और फीचर लेखन के अलावा ललित विज्ञान भी लिखा जाना चाहिए ताकि लोग उस सरस विज्ञान को पढ़ने के लिए लालायित हों। इससे पाठकों की संख्या तो बढ़ेगी ही, वैज्ञानिक जागरूकता का भी प्रसार होगा। इधर मैं यात्रावृत्तांतों के रूप में विज्ञान लिख रहा हूं जिसे आभासी दुनिया के साथी काफी पसंद कर रहे हैं। इस तरह यात्रा के बहाने यात्रा के दौरान देखी गई तमाम चीजों से जुड़े विज्ञान की जानकारी भी पाठकों को मिल जाती है। विज्ञान नाटकों के क्षेत्र में भी लिखने की बहुत गुंजाइश है। हिंदी में मंचन के लिए स्तरीय विज्ञान नाटकों की बहुत कमी है, इस दिशा में भी काम किया जाना चाहिए। विज्ञान कथाओं का बहुत अभाव है, इसलिए इस विधा में भी लिखने की बहुत संभावना है। लेकिन, विज्ञान कथा लिखते समय यह जरूर ध्यान रखना चाहिए कि वह विज्ञान कथा ही है और कहानी की परिभाषा के भीतर आती है।

अपनी भावी योजनाओं के बारे में बताएं।

मैं फिलहाल विज्ञान की विविध विधाओं में निरंतर विज्ञान लेखन कर रहा हूं और यह क्रम भविष्य में भी जारी रहेगा। ‘मेरी विज्ञान डायरी भाग-3‘ को पुस्तक रूप में तैयार कर रहा हूं और अपने यात्रावृत्तातों पर आधारित किताब की पांडुलिपि को भी संजो रहा हूं। विज्ञान कथाएं और उपन्यास लिखने का भी मन है। सोचता हूं, विज्ञान पर कुछ ऐसा लिखूं जिसे लोग कथा-कहानी की जैसी रोचकता के साथ पढ़ सकें। कुछ योजनाएं और भी हैं, जो पूरी हो जाने के बाद विश्वास है पाठकों को अपनी ओर आकर्षित करेंगी।

युवा विज्ञान लेखकों के लिए आपके क्या सन्देश हैं?

विज्ञान लेखन की अपार संभावनाएं हैं और सच पूछिए तो भविष्य विज्ञान लेखन का है, क्योंकि दुनिया में विज्ञान का प्रभाव लगातार बढ़ता जा रहा है। नई पीढ़ी को स्वयं जागरूक होने के लिए और समाज में वैज्ञानिक जागरूकता फैलाने के लिए, विज्ञान लेखन के क्षेत्र में आगे आना चाहिए। इस तरह वे समाज में वैज्ञानिक चेतना जगाने का उत्तरदायित्व पूरा कर सकेंगे। आज जनसंचार माध्यमों में और विशेष रूप से अनेक निजी चैनलों में जिस तरह भूत-प्रेत, आत्माओं, इच्छाधारी नाग-नागिनों और आत्माओं का महिमामंडन किया जा रहा है, उससे आगे बढ़ते समाज को बहुत नुकसान हो रहा है। विकसित देशों में जहां युवा पीढ़ी समंदरों के गर्भ में झांकने, पृथ्वी के अनजाने रहस्यों को बूझने और अंतरिक्ष में सौरमंडल तथा उसके पार ब्रह्मांड की अबूझ पहेलियों को सुलझाने के सपने देख रही है, वहां हमारी युवा पीढ़ी को चैनलों पर यह सब दिखाया जा रहा है। इसका प्रतिगामी प्रभाव पड़ेगा। यह दुखद स्थिति है। इसलिए नई पीढ़ी को मशाले-राह बन कर सामने आना चाहिए। कल की दुनिया वह होगी जिसे आज की नई पीढ़ी बनाएगी।

आपकी आत्मा में किसी कला के लिए स्थान नहीं है, तो आप अपाहिज हैं : जीवन सिंह

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डॉ. जीवन सिंह

डॉ. जीवन सिंह हिंदी के प्रतिष्ठित, प्रतिबद्ध और ईमानदार आलोचक हैं। अलवर राजस्थान में रहते हैं। अब तक आलोचना की तीन किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। लोकधर्मी कविता के लिए जाने-जानी वाली पत्रिका ‘कृति ओर’ में वह निरंतर लिखते रहे। अलीबख्शी ख्याल और मेवाती लोक संस्कृति पर गहरी पैठ रखते हैं। अपने गांव जुरहरा (भरतपुर) की रामलीला में पिछले पैंतालीस वर्षों से जुड़ाव और रावण का अभिनय करते रहे हैं। 1968 से 2004 तक राजस्थान के विभिन्न राजकीय कॉलेजों में अध्यापन करते रहे। प्रस्तुत है उनसे फेसबुक के माध्यम से महेश चंद्र पुनेठा  की हुई लंबी बातचीत के कुछ अंश-

हमारे समाज में पढने की संस्कृति का जबरदस्त अभाव है। पढ़ना केवल परीक्षा पास करने के लिए जरूरी माना जाता है। पाठ्यपुस्तकों से इतर पढ़ना एक फालतू काम माना जाता है। इसके लिए बच्चों को हमेशा रोका जाता है। नयी पीढ़ी में पढ़ने की आदत विकसित करना किसी चुनौती से कम नहीं है। आपको पढ़ने की संस्कृति के अभाव के पीछे कौन से कारण नजर आते हैं? आप विदेशों में भी रहे हैं क्या वहां भी पढ़ने की संस्कृति की स्थिति भारतीय समाजों की तरह ही है?

मैंने न पढ़ने और अपने घरों में किताब न रखने की बात इसलिए कही है कि हम पहले उस समाज को जान सकें जिसमें हम छंद-रचित कविता के लोकप्रिय होने की बात अक्सर करते रहते हैं। जहां कविता को पढ़ाने वाले अध्यापक तक अपने घरों में पुस्तक रखने से परहेज करते हों, वहां कौन है जो कविताओं से प्रेम कर रहा है, कुछ पता तो चले। दरअसल, हम मिथकों में जीने के अभ्यासी हो चुके हैं, वास्तविकता में कम। जो वास्तविकता को कुछ बदले हुए रूप में लाने का प्रयास करता है, उस पर धावा बोल देते हैं। जब मिथक टूटता है तभी वास्तविकता प्रकट होती है।

हमारा हिन्दी समाज इकसार समाज नहीं है, दूसरे भी नहीं हैं। एक बहुत बड़ा निम्न मेहनतकश वर्ग तो रोजी-रोटी के संकट से ही मुक्त नहीं हो पाता। वह अपने जीवन के भावात्मक पहलुओं को अपने लोकसाहित्य (मौखिक साहित्य) में ही पाकर संतुष्ट हो लेता है। अब रहा मध्यवर्ग, इस वर्ग में ही पढ़ने-लिखने वाला वर्ग निकलता है, वह भी उंगलियों पर गिना जा सकता है। हमारे यहां एक कविता संग्रह की ज्यादा से ज्यादा पांच सौ प्रतियां रोते-धोते छपती हैं। इसी से पता चल जाता है कि हमारा समाज कितना साहित्य प्रेमी है?  लगभग पचास करोड़ हिन्दी भाषी होंगे, उसमें कितने लाख या करोड़ साहित्य प्रेमी हैं। जरा हिसाब लगाकर देखें तो सब कुछ पता चल जायगा। एक-दो लाख ज्यादा से ज्यादा होंगे। किताबों की खरीद से अन्दाज लगाएं तो यह संख्या हजारों में सिमट जाएगी। मध्यवर्ग में कोई आसपास आपको नजंर आता है, जो अपने बच्चों को इंजीनियर या डॉक्टर के अलावा कुछ बनाना चाहता है। कितने लोग हैं जो अपने बच्चों को मन से अध्यापक बनाना चाहते हैं और उसमें भी साहित्य का और वह भी हिन्दी का। हिन्दी आज कहीं प्राथमिकता में ही नहीं है। हमारा मन पूरी तरह से धन का गुलाम बन रहा है, जो साहित्य-संस्कृति सिर्फ धनार्जन को मानता है। सब कुछ को मैनेज करता है। तकनीक और प्रबंधन ने हमारे दिमागों को आक्रांत सा कर लिया है और यह पिछले पच्चीस वर्षों में बहुत तेजी से हुआ है। जब पूंजी ही जीवन का ध्येय बन जाती है तो अन्य सब कुछ उसके सामने गौण हो जाता है। पूंजी अपने लिए अलग एक नई सभ्यता और संस्कृति विकसित करती जाती है और अपने प्रभाव में दूसरे वर्गों को भी लेती जाती है।

जहां तक विदेशों की बात है, पढ़ने-लिखने की संस्कृति में वे पहले से हमसे आगे हैं। वहां उन्होंने अपने लिए सारे प्रबंध एक तार्किक प्रक्रिया के तहत लगातार किए हैं। वहां पढ़ना-लिखना न होता तो आज ज्ञान-विज्ञान और नई से नई तकनीक का विकास कैसे होता? विश्व संचार क्रांति कौन करता? उन्होंने अपने शिक्षा-प्रबंधन पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया है। हमारे यहां शिक्षा नहीं,  मानव-संसाधन का प्रबंधन चलता है। ऐसे में पढ़ने की सहज संस्कृति का विकास कैसे संभव है। हमारे राजनेता जो सारी बातों के नियंता हैं, वे क्या इन सवालों पर गंभीर हैं। जिन्दगी जीने का एक सामान्य नैतिक बोध और मानवीय आकांक्षाएं जब तक हमारी प्राथमिकताओं में नहीं आएंगी, तब तक जो चल रहा है वही चलता रहेगा। इसके लिए हर स्तर पर, खासकर प्राथमिक, माध्यमिक स्कूली स्तर पर बहुत बड़े अभियान और नवजागरण की आवश्यकता है, जो शिक्षा को पारम्परिक तौर पर नहीं वरन आधुनिक सेक्युलर पद्धति पर आगे ले जाए। हमको अपनी शिक्षा को महंगे तरीकों से नहीं, बहुत सस्ते और सादगी से पूर्ण तरीकों से आगे बढ़ाने की जरूरत है। हमारा गरीब समाज तभी शिक्षित हो सकेगा।

आप के पोते आस्ट्रेलिया में पढ़ते हैं। आपने उनके साथ समय भी व्यतीत किया है। क्या आप बता सकते हैं कि वहां पाठ्यपुस्तक के अलावा बच्चे अन्य पुस्तकें भी पढ़ते हैं? स्कूल या शिक्षक उन्हें इस बात के लिए कितना प्रोत्साहित करते हैं? वहां पर स्कूलों में पुस्तकालयों की स्थिति कैसी है?

पहली बात तो यह है कि वहां के बच्चों के मन पर शिक्षा का वैसा प्रतियोगी दबाव नहीं होता,  जैसा हमारे यहां बच्चों के दिमाग पर रहता है। वहां बच्चों के पढ़ना शुरू करने की आयु 6 साल है। इससे पहले खेलने के सिवाय और कुछ नहीं करता। हमारे यहां शिक्षा लेते हुए बच्चे शायद ही सहज रह पाते हों। दूसरी बात यह है कि स्कूल भी बच्चों के प्रति सहज सहानुभूति पूर्ण व्यवहार रखते हैं। मैं जब वहां था, तब अपने पौत्र को एक प्ले स्कूल में ले जाता था क्योंकि वह 6 साल का नहीं हुआ था। हम दोनों रेल से 15 किलोमीटर दूर एक प्ले स्कूल में जाते थे, जहां मैं चार घण्टे तक पास में स्थित एक पब्लिक लाइब्रेरी में बैठकर पढ़ता था। उस लाइब्रेरी में सप्ताह में दो बार छोटे बच्चों को उनकी अध्यापिकाएं अपने साथ लेकर आती थीं। उनसे सामूहिक तौर पर छोटी-छोटी कविताएं भी बुलवाती रहती थीं। उनकी विशेषता इस बात में है कि वे.बच्चों को हमेशा हास्य-विनोद के वातावरण में रखते हैं। जगह-जगह बच्चों के खेलने-कूदने के पार्क हैं। उन पार्कों में पुस्तकालय भी हैं। स्कूल भी अपने बच्चों को उनमें सभी तरह के खेल खिलाने ले जाते हैं। कहने का मतलब यह है कि शिक्षा मन के ऊपर न बोझ है न ही उसका प्रतियोगी आतंक है और न ही वहां डॉक्टर,  इंजीनियर बनाने की होड है। वहां सुनियोजित और बेहद तार्किक ढंग से सभी तरह के जरूरी प्रबंधन किए जाने की परम्परा है। बच्चे बड़ों से और अपने परिवार से भी बहुत कुछ सीखते हैं, इसलिए बूढ़े-बूढे़ लोग भी वहां पुस्तकालय में जाकर कुछ न कुछ पढ़ते रहते हैं। हमने पढ़ने की जगह केवल स्कूल को ही बना रखा है, जबकि बच्चे का पहला विद्यालय उसका अपना घर होता है। घर से ही वह पढ़ना सीखता है। मुक्तिबोध का एक निबंध है- मुझे मेरी मां ने प्रेमचंद का भक्त बनाया। हमारे यहां कुछ समय पहले तक स्त्री शिक्षा पर कितना बल था, हम अच्छी तरह से जानते हैं।

मैं फिर कहूंगा कि हमारे यहां कितने लोग अपने घरों में निजी पुस्तकालय बनाते हैं और किताबें खरीद कर पढ़ते हैं। घर में किताबें होंगी और मां-बाप भी कुछ न कुछ पढ़ते दिखेंगे तो बच्चा भी पढ़े बिना नहीं रह सकेगा। केवल स्कूल के भरोसे पुस्तकें पढ़ने का संस्कार डालना मुश्किल है। गनीमत है कि वहां पर वह अपना कोर्स ही पूरा और अच्छी तरह से पढ़ ले। स्कूलों में तो पुस्तकालय वहां हैं ही, खेलना भी है। इसके अलावा सार्वजनिक पुस्तकालय भी जरूरत के अनुसार खूब हैं।

वहां घरों में किताबों का क्या स्थान है? क्या वहां निजी पुस्तकालय दिखाई दिए? आप अमरीका भी कुछ समय रहे वहां पर क्या स्थिति है?

वहां के वासियों के घर देखने का कोई बड़ा अवसर तो मुझे नहीं मिला, किन्तु लाइब्रेरी से पुस्तकें इश्यू कराते और लौटाते देखा। जगह-जगह पुस्तकालय देखे, जिनका रखरखाव और अद्यतन सुविधाएं देखकर एक तरह की तसल्ली मिलती है और इच्छा भी होती है कि काश, हमारे यहाँ भी ऐसा हो। वैसे हमारे यहां ही अक्सर सुनने में आता है कि हमारी तुलना में बंगाली समाज अधिक पुस्तक प्रेमी व कला प्रेमी समाज है। अमरीका में पुस्तक स्टोर(माल) होते हैं जहां से यदि आपको पुस्तक पसंद न आए तो उसे पढ़कर निर्धारित अवधि में लौटा सकते हैं। मैं यहां सोवियत संघ का उदाहरण रखना चाहता हूं जिस व्यवस्था ने अपने देश में ही नहीं वरन हमारे जैसे देशों में भी एक पुस्तक प्रेमी समाज बना दिया था। सस्ती और सुन्दर पुस्तकों की एक नई संस्कृति विकसित करने की उन्होंने लगातार कोशिश की थी। इसलिए यह व्यवस्था का सवाल भी है कि आप कैसा समाज बनाना चाहते हैं। अभी तो हमारी व्यवस्था का लक्ष्य है कि एक बड़े पूंजी प्रेमी समाज का निर्माण करना, जो बहुत तेजी से किया जा रहा है। यह समाज की जिम्मेदारी भी है कि वह विभिन्न स्तरों पर स्वयं भी प्रयत्न करे कि उसे कैसा समाज बनना है और किस दिशा में जाना है। सब कुछ सरकारों के भरोसे नहीं छोड़ देना चाहिए। सरकारें तो वही करेंगी, जो उनको करना है।

जिन देशों के आपने उदहारण दिए हैं, क्या वहां यह सरकारी प्रयासों से हुआ है या व्यक्तिगत प्रयासों से? आपने सस्ती और सुन्दर पुस्तकों की एक नई संस्कृति विकसित करने के सन्दर्भ में सोवियत संघ का उदाहरण दिया , इस बारे में कुछ और विस्तार से बताइए।

दरअसल, जितने भी सामाजिक कार्य हैं, उनको केवल सरकार पर नहीं छोड़ा जा सकता। समाज और सरकार दोनों की पारस्परिक सहयोग से ही इनमें सफलता हासिल की जा सकती है। यदि कोई पुस्तक पढ़ना चाहता है तो कौन सी ऐसी सरकार है, जो उसे पढ़ने से रोकने आती है। स्कूलों,  शिक्षकों को पुस्तक संस्कृति की शुरुआत करने में सबसे बड़ी और प्राथमिक भूमिका अदा करनी होगी,  क्योंकि सबसे ज्यादा पुस्तकों से वास्ता उन्हीं का पड़ता है। जिस समाज में शिक्षक स्वयं कोर्स के अलावा और कुछ पढ़ने और जानने की इच्छा शायद ही रखते हों, उस समाज में पुस्तक संस्कृति का विकास कर पाना बहुत मुश्किल है। एक ही तरह के प्रयास करने से सामाजिक और सामूहिक स्तर पर कुछ नहीं होता। व्यक्ति और समाज दोनों स्तरों पर काम करने से ही बदलाव आते हैं। इस मामले में विकसित देशों का वातावरण हमारे यहां के वातावरण से बहुत अलग है। ब्रिटेन के औपनिवेशिक शासन से मुक्ति पा लेने के बावजूद हमारे समाज की प्रकृति, परिस्थिति और जरूरतों के अनुसार बड़े और बुनियादी बदलाव करने के बजाय उन्हीं के द्वारा स्थापित व्यवस्था को अपना लिया। उसमें इतना सा बुनियादी बदलाव भी न कर पाए कि यहां पठन-पाठन की संस्कृति अपनी भाषाओं में विकसित हो। बच्चा भाषाओं को अपने परिवेश और वातावरण से सीखता है और उसी में बिना किसी दबाव के सहजता तथा आनंद भाव से अपनी विभिन्न प्रवृत्तियों का विकास करता है। अंग्रेजी दो सौ साल बाद भी हमारे अपने घर-परिवारों के वातावरण की भाषा कहां बन पाई है। उसे अर्जित करने के लिए अतिरिक्त अस्वाभाविक प्रयास करना पड़ता है। जबकि हम अपनी भाषाओं को मां के दूध के साथ सीख लेते हैं। इस वजह से भी बच्चे पढ़ने के प्रति अनमना और उदासीनता का भाव रखते हैं।

अपनी भाषा में लिखी किताब को पढ़ने की स्वप्रेरणा विकसित होने की संभावनाएं ज्यादा रहती हैं। सोवियत संघ का ध्येय था कि पूरी दुनिया में पूंजी बाजार की गलाकाटू प्रतिस्पर्धा खत्म हो और यह दुनिया सभी के रहने लायक एक सुखद शान्तिपूर्ण दुनिया हो। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए शिक्षा से बेहतर कोई दूसरा माध्यम नहीं है। इसलिए अपने देश के अलावा मित्र देशों की भाषाओं में भी उन्होंने एक सस्ती, उन्नत और सुन्दर पुस्तक संस्कृति को सर्वत्र विकसित किया। उनके द्वारा मुद्रित पुस्तकें सस्ती ही नहीं,  दिखने में भी बहुत आकर्षक होती थीं। उनको देखते ही खरीदने का मन हो जाता था। बाल साहित्य भी बहुत सस्ता और आकर्षक होता था। वे जगह-जगह पुस्तक प्रदर्शनी भी लगाते थे। इससे सामाजिक स्तर पर वातावरण बनता था। हर साल प्रदर्शनी का इंतजार रहता था। पूंजीवादी व्यवस्था में पढ़ना ही इतना मंहगा और प्रतियोगिता से बोझिल बना दिया जाता है कि इस वातावरण में सिर्फ धन कमाने वाली पढ़ाई करने के अलावा कोई कुछ सोच ही नहीं पाता।

सस्ता और अच्छा साहित्य पहुंचाने के लिए हमारे यहां सरकारी या व्यक्तिगत स्तर पर अब तक किस तरह के प्रयास आपको दिखाई दिए?

देश को आजादी मिलने के बाद पुस्तकें पढ़ने और जीवन को ज्ञान सम्पन्न करने का एक जज्बा लोगों में मौजूद रहा। मैं अपने एक छोटे से गांव का उदाहरण आपको बतलाता हूं। आजादी मिलने के दिनों में दो-तीन हजार की आबादी से ज्यादा गांव की आबादी नहीं होगी, लेकिन तब भी गांव का अपना एक पुस्तकालय और वाचनालय- सुधारिणी समिति के नाम से चलता था। इसमें हंस, माधुरी जैसी उस समय की पत्रिकाएं तक मंगाई जाती थीं। उस पुस्तकालय में अधिकांश किताबें स्वाधीनता के भाव को जगाने वाली थीं। हमारा गांव तत्कालीन भरतपुर रियासत का आखिरी गांव था, जो इस समय के हरियाणा और उस समय के पंजाब की सीमा से लगता था। उस समय की स्वाधीनता आंदोलन के सेनानी स्वाधीनता पाने के लिए पठन-पाठन को जरूरी मानते थे कि ज्ञान के बिना मुक्ति संभव नहीं है। इसी उद्देश्य से छोटे-छोटे गांवों में भी पुस्तकालय खोले गए थे। आजादी का भाव पैदा करने में इन पुस्तकालयों की बहुत बड़ी भूमिका रही है। उस समय लालटेन की रोशनी में लोग इनमें रात्रि को भी पढ़ने जाते थे। तब यह सब एक बड़े आंदोलन के तहत हुआ है। ऐसे ही हमारे पास के कस्बों कामां, डीग, कुम्हेर आदि में पुस्तकालय और वाचनालय खुले हुए थे। डीग में हिंदी साहित्य समिति और उसका एक बड़ा पुस्तकालय था, जो आज भी मौजूद है किन्तु पहले जैसा जज्बा अब नहीं है। भरतपुर में एक जमाने में वहां की हिंदी साहित्य समिति एकमात्र ज्ञान चर्चा और पठन-पाठन का सबसे बड़ा केन्द्र थी। इसके एक सम्मेलन में शायद 1930 में रवींद्रनाथ टैगोर आए थे। वह वातावरण व माहौल ही अलग होता है, जो लोगों में बड़े स्तर पर ज्ञान की भूख जगाता है। आज का युवा पहले से कम पढा़कू नहीं है। वह खूब पढ़ता है। पढ़ने में रात-दिन एक कर अपनी जी-जान लगा रहा है, किन्तु अब उसके अध्ययन का उद्देश्य अच्छे से अच्छा व्यवसाय हासिल कर थोड़े समय में अधिकतम पूंजी हासिल करना हो गया है। अब वह समाज परिवर्तन की जगह बाजार में अपनी जगह बनाने के लिए खूब पढ़ता है। प्रयोजन बदल जाने से पुस्तकों की दिशा और उपयोगिता दोनों बदल जाती हैं।

यदि सर्वेक्षण किया जाए तो आज पहले से बहुत ज्यादा बड़ा पुस्तकों का बाजार है और शिक्षा पाने के प्रति भी लोगों में जागरूकता आई है। लोग अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए बहुत तेजी से गांवों को छोडकर शहरों में आकर बस रहे हैं। गांव बहुत तेजी से वीरान जैसे हो रहे हैं। जो किसी वजह से गांव में ही रहने को मजबूर हैं, वे ही अब गांवों में रह रहे हैं। गांव छोड़ने के पीछे उनका उद्देश्य बच्चों को अच्छी और ऊंचे स्तर की शिक्षा, खासकर अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में दिलवाने का है। यह अलग बात है कि उस शिक्षा का गहरा रिश्ता सिर्फ बाजार से है।

सस्ता और सुरुचिपूर्ण साहित्य आज के माहौल के अनुकूल ही नहीं है। हर कोई अपने बच्चों को डॉक्टर,  इंजीनियर बनाने की होड में लगा हुआ है। पुस्तकें खूब हैं और उनको पढ़ने वाले भी। प्राइवेट स्कूलों में बहुत ऊंची फीस होने पर भी उनमें जगह खाली नहीं हैं। सरकारी संस्थानों पर से विश्वास स्वयं सरकारों ने ही उठा दिया है। वे सब कुछ को प्राइवेट हाथों में सौंप देने के लिए व्यग्र हो उठी हैं। अब तो केवल निजी प्रयास ही रह गए हैं।

आजादी मिलने के शुरूआती दिनों में पुस्तकें पढ़ने और जीवन को ज्ञान सम्पन्न करने का जो जज्बा था, उसके कम होने के पीछे आप मुख्य रूप से क्या कारण देखते हैं? एन.बी.टी. जैसे सरकारी प्रकाशन आज भी चल रहे हैं जो सस्ता और सुरुचिपूर्ण साहित्य प्रकाशित करने, उसको लोगों तक पहुंचाने और पढ़ने के लिए कुछ-कुछ कार्यक्रम करते रहते है। इसको आप किस रूप में देखते हैं?

मुख्य कारण है आजादी के बाद बदला हुआ माहौल और स्वाधीनता मिल जाने के बाद यह मान लिया जाना कि स्वाधीनता मिल जाने से अब सब कुछ अपने आप हो जाएगा। जबकि स्वाधीनता कभी एक दिन में नहीं आती, यह एक सतत प्रक्रिया है। आज जब आजादी मिले सत्तर साल होने को जा रहे हैं, तब भी हमारा समाज कितने ही तरह के सामाजिक-आर्थिक बंधनों से मुक्त नहीं हुआ है। इसलिए जहां-जहां भी दलित, स्त्री, आदिवासी और गरीबी,  गैरबराबरी जैसे अनेक मुद्दे हैं, उनका समाधान लगातार आंदोलन से ही संभव हो सकता है। जिस समाज में अनेक तरह के वर्ग होते हैं, उसमें आजादी का उपभोग व्यावहारिक तौर पर केवल उच्च वर्ग ही करता है। आजादी मिल जाने के बाद इन मुद्दों को लेकर संघर्ष तो अवश्य हुए, किंतु आजादी के समय का आन्दोलन जैसा जज्बा खत्म होता चला गया। इससे यहां के लोग सत्ता की हिस्सेदारी करने जैसी नयी प्रवृत्तियों में ज्यादा उलझ गये। मध्य वर्ग ऊंची नौकरी पाने, नए नौकरशाह आदि बनने की हिस्सेदारी करने में लग गया। यही वजह रही कि पुराने पुस्तकालयों की आवश्यकता की बात पुरानी पड़ने लगी। एनबीटी जैसा संस्थान इतने बड़े देश की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है। दूसरे आम जन में रोजगारी साहित्य पढ़ने-पढ़ाने का भाव पहले से काफी बढ़ा है। पढ़ना-लिखना पहले से बढ़ा है, लेकिन नीचे का एक बहुत बड़ा वर्ग आज भी अपनी रोजी-रोटी के मसले से उबर नहीं पाया है। मध्यवर्ग व्यावसायिकता और सिर्फ बाजार की शिक्षा लेने तक सीमित होकर रहने की स्थिति में सिमट गया है। पुस्तक छापने और बेचने के कुछ-कुछ कार्यक्रम केवल नौकरी पूरी करना और एक तरह की रस्म अदायगी जैसे बनकर रह गए हैं। वे कुछ पढ़ने वाले लोगों की पूर्ति कर देते हैं। गीताप्रेस द्वारा जैसे धार्मिक साहित्य के बेहद सस्ते साहित्य प्रकाशन का अभियान चलाया गया। कुछ इसी तर्ज पर अन्य विषयों पर पुस्तक प्रकाशन के अभियान चलें और एक माहौल बने तो इन स्थितियों में बदलाव संभव है।

मध्यप्रदेश की शैक्षिक संस्था एकलव्य द्वारा इस दिशा में किए जा रहे प्रयासों को आप किस रूप में देखते हैं? क्या इस तरह के प्रयास राजस्थान में भी कोई संस्था कर रही है?

एकलव्य ने इस दिशा में बहुत बड़ा और प्रशंसनीय काम किया है जिसका सर्वत्र स्वागत हुआ है, किन्तु लगभग पचास करोड़ हिन्दी आबादी के लिए इस तरह के सौ कार्य भी पर्याप्त नहीं हैं। वास्तविकता यह है कि आज भी बहुत बड़ी आबादी शिक्षा से महरूम है। सच तो यह है कि समाज को बदलना है तो शिक्षा के सम्पूर्ण ढांचे में बुनियादी बदलाव जरूरी है जिससे वह अभावग्रस्त वर्ग के अनुकूल बन सके। कुल मिलाकर बात यह है कि हमारे यहां महौल अभी सच्ची शिक्षा के अनुकूल नहीं है। शिक्षा सरकार की प्राथमिकताओं में ही नहीं है। जबकि हिन्दुस्तान में हर बात सरकार के भरोसे छोड़ दिए जाने का रिवाज सा बन चुका है। सरकारें ऐसी शिक्षा क्यों देना चाहेंगी, जो समाज में उनका प्रतिरोध खड़ाकर एक और बड़ा एवं उदार जनतांत्रिक विकल्प खड़ा करने में मददगार हो। मुझे मालूम नहीं कि छुटपुट प्रयासों को छोड़कर राजस्थान में इस दिशा में कोई उल्लेखनीय कार्य हो रहा है। मेरी जानकारी में नहीं है। संभव है कोई गैर सरकारी संगठन इस क्षेत्र में काम कर रहा हो।

हमारे कवि मित्र राजेश उत्साही जो लम्बे समय तक बाल पत्रिका चकमकके संपादक और एकलव्य संस्था से जुड़े रहे, पिछले दिनों एक बातचीत में कहा कि बाजार ने एक भ्रम बनाया है कि हिंदी की किताबें बिकती नहीं हैं। जहां प्रयास हुए हैं, वहां यह भ्रम टूटा भी है। होशंगाबाद के एक मित्र हैं अशोक जमनानी। वे अब तक सात-आठ उपन्यास लिख चुके हैं। उन्होंने पहले किसी व्यावसायिक प्रकाशक को दिए थे। बाद में खुद जोखिम उठाकर छपवाए और खुद ही गांव-गांव जाकर बेचे। उनके उपन्यासों के छह से अधिक संस्करण निकल चुके हैं। यह एक उदाहरण भर है। एकलव्य द्वारा प्रकाशित किताबों में से कुछ की अब तक पचास हजार से ज्यादा प्रतियां प्रकाशित हो चुकी हैं। हां, यह बात अलग है कि उनमें से अधिकांश सरकारी या थोक खरीद में जाती हैं। यह भी एक उदाहरण है। महाराष्ट्र  में बालसाहित्य में काम करने वाले लोग गांव-गांव जाकर अपनी किताबें बेचते रहे हैं। मुझे लगता है वर्तमान समय पढ़ने की आदत को टीवी जैसे माध्यम से बहुत कड़ी टक्कर मिल रही है। चाहे वह समाचार हो, या विचार। सब कुछ तो टीवी से आ रहा है। फिर भी यह कहना ठीक नहीं है कि पढ़ने की संस्कृति नहीं है। आप इस पर क्या टिप्पणी करेंगे? क्या बाजारू उपन्यासों या पत्रिकाओं का बड़ी संख्या में पढ़ा जाना इस बात का प्रमाण नहीं है कि अभाव पढ़ने की संस्कृति का नहीं, बल्कि किसी और बात का है?

जिस देश की आबादी एक अरब तीस करोड़ के आसपास हो उसमें इतना तो अवश्य होगा ही कि दो चार या दस पांच करोड़ लोग ठीक-ठाक ढंग से पढ़-लिख रहे हों। सवाल जब सौ-पचास करोड़ का आता है तो हिन्दी में आज किसी भी अच्छी किताब का एक-दो करोड़ का संस्करण होना चाहिए, लेकिन अभी तो यह लाखों तक भी नहीं पहुंची हैं। पढ़ना तो पहले से ज्यादा हुआ ही है। पुस्तकें भी पहले से ज्यादा प्रकाशित हो रही हैं और मुनाफा बटोरने वालों के पक्ष में जा रही हैं। पुस्तकों के व्यवसायी करोडों तभी कमा सकते हैं, जब पुस्तकें प्रकाशित करें इसलिए पुस्तकें तो छप रही हैं, किन्तु उनके अनुसार पाठक नहीं हैं। निसंदेह मुनाफाखोर प्रकाशक इस विभ्रम को फैलाता है किन्तु इसमें कुछ सचाई भी है। मैं तो इस धारणा की जांच अपने मोहल्ले के लोगों के बीच से करता हूं, जिसमें मेरे साथी पढ़े-लिखे समझे जाने वाले लोग अक्सर यह सवाल करते हैं कि आजकल आप क्या काम कर रहे हैं? मैं जब जवाब में कहता हूं कि मैं तो पढ़ता-लिखता हूं तो वे फिर पूछते हैं कि आप यह बतलाइए कि सेवानिवृत होने के बाद क्या काम करते हैं? पढ़ना-लिखना हमारे यहां काम करने की कोटि में नहीं आता। काम की परिभाषा में सिर्फ उसे ही काम कहा जाता है जिससे आपको धन की प्राप्ति होती है। यह है हमारे समाज का सामूहिक शैक्षिक मनोविज्ञान। हमारे आसपास अडोस-पडोस में रहने वाले सभी पढ़े-लिखे और खाते-पीते लोग हैं किन्तु लगभग सभी का दृष्टिकोण यही है कि सिर्फ और हमेशा धन कमाना ही काम करना होता है। वैसे तो आजादी मिलने के बाद से ही समाज का सामूहिक दृष्टिकोण कुछ इसी तरह का बना, किंतु जब से नवउदारवादी अर्थव्यवस्था का तेजी से प्रचलन हुआ है और एक नव धनाढ्य वर्ग पैदा हुआ है, तब से तो धन ही जीवन का एकमात्र प्रतिमान बना दिया गया है कि धन में ही विकास है और धन में ही गति है। अन्यत्र सभी जगह दुर्गति है। ऐसे माहौल में अपवाद स्वरूप ही एक समुदाय विशेष पुस्तक संस्कृति की लड़ाई लड़ता है। वह हमारे देश में भी चल रही है, उसको व्यापक जीवन स्तरों और जरूरत के अनुसार फैलाने की आवश्यकता है। हिन्दी जाति की तुलना में बंगाली और मराठी जातियां हमसे पहले से आगे रही हैं,  उनमें जातीय एकता का भाव सदा से ज्यादा रहा है। इस मामले में हिन्दी का कभी कोइ एक केन्द्र नहीं रहा। वह प्रशासनिक और राजनीतिक तौर पर बहुत बड़े और गहरे विभाजन का शिकार रही है। संस्कृति सभी तरह की होती है। पचास करोड़ आबादी में यदि पचास लाख लोग भी पढ़ने-दिखने लग जाएं तो यह संख्या बहुत बड़ी लगती है, किन्तु जब पचास करोड़ के सामने पचास लाख को रखते हैं, तब वास्तविकता मालूम पड़ती है।

बाजारू बातें हर युग में रही हैं। बाजारू साहित्य भी और उस सामान्य अभिरुचि का साहित्य और उसी तरह की पत्र-पत्रिकाएं भी। कई बार इसी में से रास्ता निकलता है। लेकिन इसके लिए समाज में लगाव की भावना होनी चाहिए, जबकि पूंजीवादी व्यवस्था का पहला ही पड़ाव होता है अलगाव और अजनबीपन। पूंजी जोड़ने के साथ-साथ तेजी से बांटने का काम भी करती है, जिससे सामूहिक भावना का क्षरण होता जाता है। जबकि कोई भी संस्कृति सामूहिकता के बिना संभव नहीं है।

बच्चों में पढ़ने की आदत विकसित करने में परिवार की क्या भूमिका है? कैसे यह आदत विकसित की जा सकती है?

जीवन में किसी भी बेहतर प्रवृति के विकास के लिए एक सामाजिक-सांस्कृतिक और नैतिक वातावरण होता है,   कोई भी अच्छी प्रवृति तभी सामूहिक तौर पर विकसित हो पाती है। निजी और व्यक्तिगत तौर पर या छोटे-मोटे आंचलिक स्तरों पर भी अपवाद स्वरूप कुछ प्रवृत्तियां विकसित होने की संभावनाएं खूब रहती हैं और इस तरह के काम करने वाले भिन्न रुचियों वाले लोग सभी क्षेत्रों में होते हैं और अपना काम भी करते हैं । उन क्षेत्रों में वातावरण भी बनता है किन्तु वह बड़े समर्थन के अभाव में दीर्घजीवी नहीं हो पाता। बनता है और एक बिन्दु तक पँहुचकर खत्म हो जाता है। जैसे- निजी स्तर पर कुछ खिलाड़ी ओलम्पिक में पदक ले आते हैं । इसका मतलब यह नहीं कि हमारे देश में खेलों का कोई वातावरण बना हुआ है। यहाँ निजी स्तर पर तो बहुत कुछ है । प्रतिभाएं हैं, अपार धन दौलत है। आज के अखबार में ही आया है कि दौलत के मामले में हमारा देश दुनिया के सबसे अमीर देशों में सातवें पायदान पर है, लेकिन इससे यह प्रमाणित नहीं होता कि हम गरीब देशों की श्रेणी में नहीं हैं। ऐसे ही अन्य बातों में भी हैं। पुस्तकें पढ़ने वाले खूब पढ़ रहे हैं किन्तु पढ़ने-लिखने का वातावरण नहीं है। इसकी प्रमुख वजह है कि गैरबराबरी से या अन्य किसी भी तरह की विषमता से मुक्ति पाने का कोई बड़ा आन्दोलन नहीं है। जितने बड़े आकार का आन्दोलन है, उतने ही आकार का पठन-पाठन भी है।  जब से देश में दलित आन्दोलन में तेजी आई, तब से उसका अलग साहित्य भी प्रकाशित हुआ और नए पाठक भी पैदा हुए। स्त्री साहित्य के बारे में भी यह बात कही जा सकती है। दरअसल, मुक्ति आन्दोलन के बिना व्यापक स्तर पर पुस्तक आन्दोलन भी नहीं चल सकता। मुक्ति आन्दोलन से एक स्पष्ट जीवनोद्देश्य सामने आ जाता है जिसकी पूर्ति के लिए लोगों में उससे सम्बंधित साहित्य, इतिहास आदि पढ़ने की जरूरत होती है। नई सोच विकसित होती है तो नई राष्ट्रीय चेतना का निर्माण करती है।

बच्चा हमेशा अनुकरण से सीखता है। वह वही भाषा बोलता है और वैसे ही सोचता और आचरण करता है जैसे उसके परिवार के दूसरे लोग करते हैं। बच्चे को कहाँ मालूम होता है कि वह किस जाति और धर्म का है । यह उसका वातावरण ही होता है जो उसे बड़ा होने पर जाति और धर्म दोनों सिखा देता है। फिर वह स्कूल जाता है तो वहाँ भी उसके ये परिवार से प्राप्त बंधन टूटने के बजाय और ज्यादा मजबूत होते हैं। यही बात पुस्तकों के बारे में भी है। सबसे पहले हमारे देश का सामान्य युवक बेरोजगारी से जूझता है और उसके लिए जी जान एक कर देता है। माता-पिता, अभिभावक आदि भी यही चाहते हैं कि वह सिर्फ वही पढ़े, जिससे रोजगार मिले।  रोजगार मिल जाने के बाद पढ़ने-लिखने का सारा काम खत्म हो जाता है। हमारे यहाँ रोजगार पा लेना जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि माना जाता है, जो उसे अलौकिक स्तर की संतुष्टि से भर देती है। एक कहावत भी इस बारे में है- पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नबाव। जो समाज नबाव बनने के लिए पढे़गा, वह नबाव बन जाने के बाद किसलिए पढ़े। जहाँ तक इस आदत को विकसित करने का सवाल है कि यदि घर, परिवार से लेकर स्कूल स्तर तक यदि पढ़ने पढ़ाने का वातावरण मिले तो इसको विकसित किया जा सकता है। जब परिवार वाले और शिक्षक पढ़ते हुए दिखाई देंगे तो बच्चे पर इसका प्रभाव पड़े बिना नहीं रहेगा।

इसके अलावा सार्वजनिक पुस्तकालय-वाचनालय श्रृंखला का विकास किया जाए और स्कूल स्तर पर पुस्तकें पढ़ने वालों के लिए हर साल ऐसे आयोजन हों जिनमें पाठ्येतर पुस्तकें पढ़ने वालों से उनके विचार व्यक्त कराये जाएं और उनको सार्वजनिक तौर पर सम्मानित किया जाए।

दीवार पत्रिकाओं में ऐसे पाठकों के लिए अलग से कालम हो कि वे आजकल क्या नया पढ़ रहे हैं। सुगम, सुबोध और रोचक साहित्य की आसान सुलभता निश्चित की जाए।

आपकी यह बात बिलकुल सही है कि हमारे परिवारों की भी यही धारणा बनी हुई है कि पढ़ना-लिखना सिर्फ रोजगार पाने के लिए होता है। इसके चलते केवल वही किताबें पढ़ी जाती हैं जो प्रतियोगिता परीक्षा की दृष्टि से उपयोगी होती हैं। इसी तरह स्कूली शिक्षा के दौरान भी वही किताबें और पाठ पढ़े जाते हैं जो परीक्षा में अधिक अंक दिला सकें। सार रूप में कहा जाए तो हमारा पढ़ना परीक्षा केन्द्रित होता है। इस धारणा के चलते साहित्यिक किताबें बहुत कम पढ़ी जाती हैं। कहानी-कविता-उपन्यास तो मनोरंजन और समय व्यतीत करने के लिए ही पढ़े जाते हैं। स्कूली बच्चों के लिए तो ये समय बर्बाद करने वाली मानी जाती हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं या अच्छे अंक प्राप्त करने की दृष्टि से क्या साहित्यिक किताबों की कोई उपयोगिता है? आखिर विज्ञान-गणित के विद्यार्थियों के लिए साहित्यिक पुस्तकों की क्या जरूरत है?

दरअसल, हमारी मौजूदा शिक्षा प्रणाली उन अंग्रेजी शासक वर्ग की बनाई हुई है, जो हमारे ऊपर लम्बे समय तक राज करते हुए यहाँ के मानवीय श्रम और प्राकृतिक सम्पदा का दोहन एवं शोषण करके अपने देश को सम्पन्न करने के उद्देश्य से यह सब कुछ करना चाहते थे। जो उन्होंने किया भी। उनके जमाने की शिक्षा पद्धति आज भी चली आ रही है, जो अंग्रेजी शासक वर्ग ने अपने लिए एक नौकरशाही निजाम तैयार करने के लिए बनाई थी, जिसके माध्यम से वे हिन्दुस्तान पर शासन कर सकें। उनका उद्देश्य यहाँ की जनता को ज्ञान-वि‍ज्ञान सम्पन्न और वास्तविक तौर पर शिक्षित करना था ही नहीं, कि यहाँ के निवासी अपनी रूढ़ियों से लड़ते हुए एक आधुनिक समाज का निर्माण कर सकें। अफसोस की बात यह है कि आजादी मिल जाने के बाद भी हमारी सरकारों का जितना ध्यान पूँजी के प्रभुत्व वाले विकास पर रहा, उतना श्रम शक्तियों की एकजुटता और जनजागरण पर नहीं। इस काम के लिए अँग्रेजी शिक्षा पद्धति को बुनियादी तौर पर बदलने की जरूरत लोकतांत्रिक शासक वर्ग ने समझी ही नहीं। इसी का परिणाम है कि आज का युवा वर्ग एक समग्र शिक्षा प्रणाली से महरूम है। वि‍ज्ञान पढ़ने वाले युवा को साहित्य, इतिहास, दर्शन का ज्ञान नहीं और साहित्य, इतिहास आदि पढ़ने वाले को विज्ञान से दूर रखा जाता है जबकि हमारा जीवन इस तरह से ज्ञान-वि‍ज्ञान के मामले में विभाजित नहीं होता। व्यक्ति का जीवन समग्र होता है। उसे सुविधा के लिए विभाजित जब से किया गया है, तब से वैसे ही चला आ रहा है। जबकि आज वि‍ज्ञान तकनीक को जाने बिना कोई एक कदम आगे नहीं बढ़ सकता। इसी तरह से हरेक व्यक्ति का काम मानवीय भावनाओं से पड़ता है। उस इतिहास,  दर्शन से पड़ता है, जिससे हर व्यक्ति अपनी जिन्दगी में गुजरता है। यह हमारे जीवन की समग्रता ही है कि व्यक्ति को जीवन के हर क्षेत्र के ज्ञान की जरूरत है। ज्ञान का ऐसा संकायपरक विभाजन मनुष्य और उसकी मनुष्यता को विभाजित करने जैसा काम है। यह विभाजन किसी भी समय के शासक वर्ग के लिए फायदेमंद रहता है। वि‍ज्ञान वाला साहित्य से अलग और साहित्य वाला वि‍ज्ञान से कोसों दूर। यह बहुत कृत्रिम है।

जब इस पृथ्वी पर सोवियत संघ का अस्तित्व था, तब के शिक्षा के अनेक तरह के अनुभव निकल कर आए थे, जिनका ज्ञान और जागरण की दृष्टि से आज भी महत्व जरा सा भी कम नहीं हुआ है। उस समय शिक्षा के पहले जन-कमिसार लेनिन ने लुनाचार्स्की को बनाया था। उन्होंने शिक्षा क्षेत्र में विशेषज्ञता के साथ सामान्यता के रिश्तों पर विचार करते हुए बतलाया था कि शिक्षित आदमी वह है ,जिसे सबका सामान्य और संक्षिप्त ज्ञान होता है, लेकिन जिसके पास अपनी विशेषज्ञता भी होती है, जो अपने कार्य को भली भाँति जानता है और जो शेष चीजों के बारे में भी कह सकता है कि कोई भी मानवीय चीज मेरे लिए पराई नहीं है। वह आदमी, जिसे टेक्नोलॉजी, औषधि विज्ञान, कानून,  इतिहास के मूल तत्वों और निष्कर्षों का ज्ञान होता है, वास्तव में शिक्षित आदमी है। लुनाचार्स्की ने यह भी माना है कि किसी को भी अज्ञानी नहीं रहना चाहिए। सबको सभी विज्ञानों और कलाओं के मूल तत्वों का ज्ञान होना चाहिए। चाहे आप मोची हों या रसायन शास्त्र के प्रोफेसर। यदि आपकी आत्मा में किसी कला के लिए स्थान नहीं है, तो इसका मतलब है कि आप काने और बहरे की भाँति अपाहिज हैं। क्योंकि आदमी की शिक्षा वस्तुतः इसमें है कि वह सब कुछ, जिसमें मानव जाति अपने इतिहास और संस्कृति का निर्माण करती है, जो मनुष्य के लिए उपयोगी या सांत्वनाप्रद अथवा जीवन में आनंद प्रदान करने वाली कृतियों में प्रतिबिंबित होता है– यह सब कुछ प्रत्येक आदमी की पँहुच के भीतर हो, पर साथ ही उसके पास विशेषज्ञता भी हो। इस आधार पर कहा जा सकता है कि ज्ञान की दुनिया में सबको सबकी जरूरत होती है किसी एक विषय में विशेषज्ञता के साथ। ज्ञान और शिक्षा की दुनिया में कोई विभाजन नहीं होता।

प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से साहित्य किस तरह से मददगार है?

दुनिया में प्राप्त किसी भी क्षेत्र का ज्ञान सभी तरह की परीक्षाओं में कहीं न कहीं मददगार होता है। सामान्य ज्ञान के प्रश्न पत्र में भी साहित्य के बारे में कुछ न कुछ पूछा जाता है । इससे ज्यादा कुछ परीक्षाओं में यह विषय इन्टरव्यू में मदद करता है। दूसरे साहित्य पठन का असर भाषा के माध्यम से परीक्षार्थी के अभिव्यक्ति कौशल पर होता है। निबंध जैसे प्रश्न पत्र में निबंध लेखन की कला साहित्य के माध्यम से सीखी जा सकती है। साहित्य से जीवन के प्रति समग्र दृष्टिकोण का विकास होता है जो पाठक को इतिहास,  दर्शन, समाजशास्त्र आदि विषयों की जानकारी भी देता है। कुल मिलाकर बात यह है कि साहित्य पढ़ने वाला कभी नुकसान में नहीं रहता,  उसका जीवन के प्रति आत्मविश्वास बढ़ता है और वह विभिन्न चरित्रों के बीच स्वयं की स्थिति का आकलन आसानी से कर सकता है। लेकिन. आज ज्ञान क्षेत्रों में विशेषीकरण इस हद तक बढ़ गया है कि उसने व्यक्ति को समाज से अलग करके एकांगी और आत्मकेन्द्रित बना दिया है। ज्ञान के क्षेत्रों में बढ़ते विशेषीकरण ने मानव जीवन का रूप ही बिगाड़ दिया है। यह विशेषीकरण एक अच्छे भले इंसान को अपाहिज बना रहा है। इससे व्यक्ति की रचनात्मक भूमिका कमजोर होती जा रही है और वह ज्यादा से ज्यादा एय्याश तथा सामन्ती स्वभाव जैसा बनता जा रहा है। यही कारण है कि आज आसपास हमें सच्चे और सम्पूर्ण ढंग से शिक्षित लोग नहीं मिलते। शिक्षा के नाम पर आधे-अधूरे और अपाहिज लोग ज्यादा नजर आते हैं।

इसी वजह से हमारे यहाँ शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं की सारी प्रणाली एकांगी एवं विशेषीकृत होने को अभिशप्त है।

प्रसिद्ध कथाकार मोपांसा ने अपने समय के अनुभव के आधार पर कभी कहा था कि आदमी हमेशा अकेला होता है और उसका सर्वोत्तम मित्र भी उसके लिए एक पहेली होता है। दरअसल, यह पहेली बनती है उस निजी पूँजी की व्यवस्था से, जो आदमी के ज्ञान को विशेषीकृत करते हुए उसे उसके सच्चे और वास्तविक जीवन से अलग करती जाती है।

प्रतियोगी परीक्षाओं में पूछे जाने वाले प्रश्न भी आज विशेषीकृत ज्ञान से ज्यादा जोड़ दिए गये हैं। इससे समाज के भीतर ज्ञानात्मक विभाजन और विशेषीकरण की प्रक्रिया तेज हुई है। इस वजह से भी आज के लोग अपने आज के साहित्य से दूर होते जा रहे हैं।

साहित्य की इस महत्वपूर्ण भूमिका को आज बिलकुल नजरंदाज किया जा रहा है। पब्लिक स्कूलों में तो हाईस्कूल के बाद साहित्य और मानविकी विषय पढा़ए ही नहीं जा रहे हैं। उच्च शिक्षा में भी केवल वही विद्यार्थी इन्हें पढ़ रहे हैं, जो विज्ञान और गणित जैसे विषयों को पढ़ने में अक्षम पाते हैं। मेरा तो मानना है कि विज्ञान वर्ग के हर विद्यार्थी के लिए साहित्य पढ़ना अनिवार्य होना चाहिए। आप क्या कहेंगे?

आपका मानना सही है। साथ ही साहित्य पढ़ने वालों को भी विज्ञान का सामान्य ज्ञान उतना ही आवश्यक है, जितना विज्ञान पढ़ने वालों को साहित्य का। ज्ञान की यात्रा कभी इकतरफा नहीं होती। सामान्य ज्ञान सभी को सबका और विशेष ज्ञान किसी एक क्षेत्र का। जीवन समग्र है और विशेष भी। मानव भावनाओं की जानकारी विज्ञान से नहीं हो पाती इसलिए साहित्य की जरूरत होती है। और दुनिया गतिशील कैसे रहती है, इसकी वस्तुस्थिति का पता विज्ञान से चलता है और ऐसी अनेक तरह का अदृश्य सचाइयों का भी, जो विज्ञान के बिना संभव ही नहीं थी। ज्ञान कभी इकहरा और सपाट नहीं होता। आदमी ने अपनी हजारों सालों की जीवन यात्रा में बहुत कुछ अपने अनुभवों से जाना है और उसे ही ज्ञान में परिवर्तित किया गया है। इसका उपयोग हर कोई अपने जीवन में करता है। पब्लिक स्कूल नामधारी प्राइवेट स्कूल अपना धंधा करने के लिए हैं, समाज को शिक्षित करने के लिए नहीं। उनके यहां वही माल तैयार किया जाता है, जो बाजार में बिकता है। साहित्य और मानविकी जिस रोज बाजार में बिकने लग जाएंगी, ये स्कूल उनको पढ़ाने लगेंगे। जनशिक्षा का असली काम कभी बाजार नहीं कर सकता। यह काम तो उन स्कूलों को करना होगा, जो जनशिक्षण की भूमिका में हैं। दरअसल, हमारे देश में युवकों और अभिभावकों पर एक ही दबाव है, रोजगार हासिल करने का। साहित्य और मानविकी बाजार और रोजगार के मामले में छोटी सी भूमिका में हैं। इस वजह से ऐसा हुआ है। दूसरी बात यह भी है कि पिछले बीस-पच्चीस सालों में विज्ञान और तकनीक की भूमिका बहुत अग्रणी और जरूरी हो गई है। हमारी सारी शिक्षा व्यवस्था सीधे रोजगार पाने का जरिया है इसलिए ऐसा हुआ है। सरकारें तो वही काम करने लगती हैं जो जनता की जरूरत बन जाता है। उनको वास्तविक जन-शिक्षण से ज्यादा लेना-देना नहीं होता। वास्तविक शिक्षा बहुत अलग बात है। वह पूँजी की शिक्षा से बहुत भिन्न होती है।

यह काम समाज के जागरूक और संवेदनशील लोगों को स्वयं आगे आकर और अपना सब कुछ दाव पर लगाकर करना पडे़गा। ऐसे स्कूल चलाने पडे़गे जो समाज को सम्पूर्ण मुक्ति की ओर ले जाएं। जो रोजगार देने के साथ समाज का शिक्षण मानवता के विश्व मानदंडों के आधार पर करें। तब ही इस समस्या का कोई हल निकल सकता है। सरकारी स्कूलों से यह काम तभी किया जा सकता है, जब शिक्षकों का दृष्टिकोण समग्रता वाला हो और जीवन के प्रति उनकी दृष्टि आधुनिक एवं वैज्ञानिक हो। शिक्षा में एक अलग तरह के राष्ट्रीय अभियान से ऐसा संभव किया जा सकता है। एक अलग तरह की स्कूली शिक्षा व्यवस्था चलाकर।

उदार और धर्मनिरपेक्ष परम्परा की निरन्तरता जारी रहेगी : हामि‍द दाभोलकर

हामिद दाभोलकर

हामिद दाभोलकर

हामि‍द दाभोलकर अंधवि‍श्वास के खि‍लाफ संघर्षरत रहे नरेंद्र दाभोलकर के पुत्र है, जि‍नकी 20 अगस्त 2013 में पूणे में हत्या कर दी गई थी। हामि‍द अपने पि‍ता की वि‍रासत को उसे तेवर के साथ आगे बढ़ा रहे हैं। हामि‍द दाभोलकर से लेला बावदम की बातचीत-

सभी सार्वजनिक मन्दिरों में स्त्रियों के प्रवेश की माँग को लेकर आपके पिता ने सन् 2000 में एक आंदोलन की शुरुआत की थी। उनके इस संघर्ष के बारे में कुछ बताएं।

शनि सिगनापुर मध्य महाराष्ट्र में एक जगह है, जिस पर वर्ष 1998 में गुलशन कुमार द्वारा ‘सूर्य पुत्र शनिदेव’ नाम से एक फि़ल्म बनाने के बाद इस स्थान की मान्यता बढ़ी और यह स्थान एक चर्चित तीर्थस्थल बन गया। बहुत से लोगों का विश्वास है कि यह मन्दिर एक जागृत देवस्थान है। शाब्दिक रूप से ‘जागृत’ का अर्थ होता है कि मन्दिर में स्थापित प्रतिमा में ईश्वर का वास है। अत: दृश्यमान रूप से देखें तो ईश्वर नहीं चाहता कि उसके पवित्र स्थान पर महिलाएं प्रवेश करें, इसलिए पारम्परिक रूप से यहाँ उनका प्रवेश वर्जित रहा। मजेदार तथ्य यह है कि यहाँ मन्दिर के चारों तरफ दीवार नहीं है और यह पवित्र स्थल महज एक चबूतरा है जिस पर एक काले पत्थर के रूप में देवता स्थापित है। यह भी मान्यता है कि यहाँ देवता चोरी करने वालों को दंड देते हैं इसलिए इस गाँव में चोरी की घटनाएं नहीं होतीं तथा घरों के दरवाजों पर ताला भी नहीं लगाया जाता। हालाँकि सिगनापुर की कोतवाली में दर्ज एफ.आई.आर. कुछ अलग ही कहानी कहती हैं। नरेंद्र दाभोलकर के नेतृत्व में ‘महाराष्ट्र अंध श्रद्धा निर्मूलन समिति’ ने इन्हीं मान्यताओं के खिलाफ गत पन्द्रह वर्षों में लम्बा संघर्ष किया था।

यह सब वर्ष 1998 में शुरू हुआ जब सत्यशोधक सभा नाम की एक संस्था (जिसका गठन महात्मा फुले के समता और न्याय सम्बन्धी विचारों के प्रसार हेतु किया गया था) द्वारा अहमदनगर में एक राज्य स्तरीय महत्वपूर्ण बैठक का आयोजन किया गया, जिसमें इस मन्दिर की भेदभावपूर्ण कार्यप्रणाली पर प्रश्न उठाए गए। सत्यशोधक सभा ने इस मुद्दे को आगे नहीं बढ़ाया, परन्तु महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति ने संघर्ष का मन बना लिया था। इस तरह व्यापक प्रारम्भिक तैयारी तथा समाज और मीडिया में गहन विचार-विमर्श के बाद नवम्बर 2000 में एम.ए.एन.एस. ने शनि सिगनापुर की तरफ मार्च करने की घोषणा कर दी। महाराष्ट्र की अनेक सामाजिक विभूतियां जैसे डॉ एनडी पाटिल, बाबा अधव, श्रीराम लागू आदि ने इस आंदोलन को समर्थन दिया और इस मार्च में शामिल होने का भी निश्चय किया। इस मार्च में करीब 1200 एम.ए.एन.एस. स्वयंसेवक अपनी-अपनी पत्नियों के साथ शामिल हुए। दाभोलकर इस बात को लेकर प्रयत्नशील थे कि यह आन्दोलन पूरी तरह सत्याग्रह के सिद्धांतों पर आधारित रहे और कोई भी व्यक्ति कानून अपने हाथ में न ले तथा बलपूर्वक इस पवित्र स्थल में प्रवेश न करे।

क्या उस वक्त तीव्र विरोध का सामना नहीं करना पड़ा था, जबकि राजनीति और धर्म का मिश्रण किया जा रहा था और हिन्दू धार्मिक संगठनों के साथ-साथ शिवसेना और बीजेपी भी इस आंदोलन के विरोध में डटे हुए थे?

महाराष्ट्र अंध श्रद्धा निर्मूलन समिति द्वारा इस आंदोलन की घोषणा के बाद बीजेपी, शिवसेना और अन्य कट्टर समूहों ने विरोध शुरू कर दिया, जो हिंदुत्व का इस्तेमाल घृणा फ़ैलाने के लिए कर रहे थे। इनकी तरफ से यह विरोध अपेक्षित था, परन्तु दुर्भाग्य से कांग्रेस ने भी इस आंदोलन का विरोध किया, हालाँकि वे यह विरोध अपरोक्ष रूप से कर रहे थे। विडम्बना देखि‍ए कि महाराष्ट्र के तत्कालीन सामाजिक न्याय मंत्री दिलीप सोपल ने दाभोलकर को खुलेआम धमकी देते हुए कहा कि यदि उन्होंने शनि सिगनापुर की तरफ बढ़ने की कोशिश की तो उनके हाथ-पैर काट दिए जाएंगे।

दाभोलकर और एम.ए.एन.एस. के सक्रिय सदस्यों को यह चुनौती भी दी गई कि वे इस मार्च में अपने साथ अपनी माताओं और पत्नियों को भी साथ लाकर दिखाएँ और शनि के प्रकोप को भुगतें। यही कारण था कि आंदोलन से जुड़े सभी एक्टिविस्ट के साथ या तो उनकी माँ थी या फिर पत्नी। जैसा कि अंदेशा था दाभोलकर और एम.ए.एन.एस. के सभी कार्यकर्ताओं को अहमदनगर जिले में प्रवेश करते ही गिरफ्तार कर लिया गया, परन्तु इस आंदोलन ने जो लहर पैदा की, उस पर नियंत्रण नहीं किया जा सका। हमें लगता है कि अभी दो महीने पहले जिस महिला ने वहाँ पूजा-अर्चना की तथा अन्य संगठनों द्वारा महिलाओं के प्रवेश के अधिकार को लेकर जो आवाज बुलन्द की जा रही है दरअसल, इसी आंदोलन को अपनी तरह से आगे बढ़ाने की ही मुहिम है।

यह आंदोलन आगे कैसे बढ़ा था?

इस आंदोलन के शुरू होने के बाद हमने इसे और मजबूत बनाने के लिए न्यायिक प्रक्रिया की राह पकड़ी। इस मुद्दे को लेकर दाभोलकर तथा एम.ए.एन.एस. की वरिष्ठ साथी शालिनी ओक द्वारा बॉम्बे उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की गई। इस याचिका पर अनेक बार सुनवाई हुई, परन्तु अत्यंत धीमी न्यायिक प्रक्रिया के चलते यह मामला पन्द्रह साल तक अटका रहा।

एक बार फिर इस जनहित याचिका की तरफ लोगों का ध्यान गया जब सबरीमाला से सम्बंधित इसी तरह की एक और जनहित याचिका सर्वोच्च न्यायालय में दायर की गई और नवम्बर 2015 में एक महिला द्वारा शनि सिगनापुर के पवित्र स्थल पर पूजा आदि सम्पन्न की गई। महाराष्ट्र अंध श्रद्धा निर्मूलन समिति द्वारा इस रोक के खि‍लाफ इसी सप्ताह एक राज्य स्तरीय विरोध आयोजित किया और जनहित याचिका के मामले में जल्दी सुनवाई के लिए एक याचिका दायर की गई। पिछले सप्ताह एडवोकेट नलिनी वर्तक द्वारा इसी मुद्दे को लेकर एक अलग जनहित याचिका भी दायर की गई और एम.ए.एन.एस. की याचिका को भी इसी के साथ जोड़ दिया गया। उच्च न्यायालय द्वारा दिया गया निर्णय इसी जनहित याचिका के सन्दर्भ में आया है।

इस सम्बन्ध में उल्लेखनीय बात है कि इसी भेदभाव पर हाजी अली दरगाह को लेकर दो मुस्लिम महिलाओं द्वारा दायर की गई जनहित याचिका। मुझे लगता है कि‍ इस जनहित याचिका को जितना ध्यान मिलना चाहिए था, उतना मिला नहीं। मुस्लिम महिलाओं का दरगाह के खि‍लाफ इस तरह जनहित याचिका के लिए आगे आने का निर्णय ऐतिहासिक है। उन्होंने सार्वजनिक रूप से भी स्वीकार किया है कि यह प्रेरणा उन्हें शनि सिगनापुर से संबंधित जनहित याचिका से मिली थी। दाभोलकर हमारे बीच नहीं हैं, परन्तु हाल ही में हुए संघर्ष के दौरान एम.ए.एन.एस. ने इस मुद्दे को तार्किक परिणिति तक ले जाने की पूरी कोशिश की है।

न्यायिक लड़ाई में बहुत लम्बा समय लगा, परन्तु इसने कुछ लोगों को इस दौरान शिक्षित भी किया। उदाहरण के लिए शिव सेना और बीजेपी ने पलटी खाते हुए वर्ष 2011 में कोल्हापुर के महालक्ष्मी मन्दिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सफल मुहिम चलाई थी।

यह एक तरह का आदर्श न्याय (poetic justice) ही कहा जाएगा कि जिन लोगों ने सन् 2000 में महालक्ष्मी मन्दिर में महिलाओं के प्रवेश के मुद्दे पर दाभोलकर का विरोध किया था, उन्हीं के द्वारा सन् 2011 में इस मुद्दे के पक्ष में मुहिम चलाई गई। अब तो आर.एस.एस. तक खुलेआम इस मुद्दे को अपना समर्थन दे रही है।

दाभोलकर कहा करते थे कि यदि हम किसी भी मुद्दे को लेकर समाज के भीतर लगातार अपनी बात करते रहें तो समाज की गुणात्मक व्यवस्था में परिवर्तन आना शुरू हो जाता है। इन दिनों इस मुद्दे को लेकर यही सब महसूस किया जा सकता है।

कुछ अत्यंत उग्र तत्वों और उन समूहों को छोड़कर जिनके आर्थिक हित सीधे तौर पर जुड़े हुए है। जैसा कि शनि सिगनापुर के ट्रस्ट का मामला है, जहाँ यह मुद्दा धर्म से अधिक स्थानीय अर्थव्यवस्था से जुड़ा है, बाकी समाज की मुख्यधारा में बहुत कम समूह हैं, जो इस आंदोलन के विरोध में हैं, क्योंकि इन दिनों लैंगिक समानता लगभग स्वीकार्य है।

महिलाओं को मन्दिर में प्रवेश करने से रोकना पूर्वाग्रह के साथ- साथ असंवैधानिक भी है। इसके बावजूद इस असमानता को विभिन्न हलकों से सहयोग मिल रहा है। क्या यह आधुनिक भारत और उदारवादी महाराष्ट्र का मज़ाक उड़ाना नहीं है? वास्तव में यह महाराष्ट्र की उदारवादी सोच की परम्परा पर हमला है। आपके पिता तथा गोविन्द पानसरे दोनों की हत्या मूलत: विचारधारा, तर्क और धर्म की रचनात्मक आलोचना पर हमला है?

इन दिनों यह एक मिथक है कि महाराष्ट्र एक उदार राज्य है। अधिक-से-अधिक हम यही कह सकते हैं कि यह एक उदार राज्य था। हम इसे किस मुँह से उदार कह सकते हैं, जब दिनदहाड़े दाभोलकर और कॉमरेड पानसरे की हत्याएं की गई हों और सालों बाद भी हत्यारों का कोई पता नहीं चल सका हो। यह बेहद दु:खद है कि यह धरती न सिर्फ महात्मा फुले, छत्रपति शिवाजी महाराज और डॉ अम्बेडकर की जन्मभूमि है, बल्कि नाथूराम गोडसे और अन्य धार्मिक कट्टर संगठनों की भी जन्मस्थली है, जो सम्भवत: दाभोलकर, कॉमरेड पानसरे और प्रो. कलबुर्गी के हत्यारे हैं। अपने नेतृत्वकर्ताओं को खोने के बावजूद एम.ए.एन.एस. जैसे संगठन महाराष्ट्र के उदारवादी चरित्र और धर्मनिरपेक्ष परम्परा को जीवित रखने के लिए कठिन संघर्ष कर रहे हैं।

आपने कहा था कि आर.एस.एस. और बीजेपी तथा दक्षिणपंथी विचारधारा से लैस अन्य संगठनों पर आरोप-प्रत्यारोप लगाना बहुत सुविधाजनक विरोध का रास्ता है और जरूरत इस बात की है कि इन संगठनों को इनके कृत्यों के लिए जिम्मेदार ठहराया जाए। कृपया इस बात की हाल ही में आए न्यायालय के फैसले, तर्कशीलता और धर्म की रचनात्मक आलोचना के सन्दर्भ में व्याख्या करें?

यह सच है। किसी भी सामाजिक आंदोलन के बारे में एक आत्मश्लाधापूर्ण विकल्प के बारे में सोचना बहुत आसान काम है। परन्तु एक राजनीतिक कालखण्ड में जहाँ बीजेपी जो योजनाबद्ध रूप से साम्प्रदायिक है और कांग्रेस जो व्यावहारिक रूप से सांप्रदायिक है और इन दोनों दलों के बीच इस देश का आम नागरिक पिस रहा हो, तब इस तरह की लम्बी लोकतान्त्रिक लड़ाई का रास्ता ही एक मात्र विकल्प के रूप में बचता है।

हम इस बात को लेकर सचेत हैं कि हाल ही में आया न्यायलय का फैसला महज शुरुआत है। इस फैसले के बाद की घटनाओं को यदि हम ध्यानपूर्वक देखें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि हमें अपने संघर्ष को जारी रखना होगा ताकि किसी भी अन्य धार्मिक स्थल पर लैंगिक आधार पर भेदभाव न हो सके। यही नहीं संगठित धर्म द्वारा जारी शोषण के खि‍लाफ भी आमजन को शिक्षित करना होगा तथा धर्म की रचनात्मक आलोचना के प्रति सचेत करने की दिशा में भी काम करना होगा।

फ्रंटलाइन (फरवरी अंक) से साभार
अनुवाद : मणि मोहन

मैं कविता के लिए इंतजार करता हूँ : संतोष अलेक्‍स

संतोष अलेक्स

संतोष अलेक्स

द्वि‍भाषी कवि एवं बहुभाषी अनुवादक डॉ. संतोष अलेक्‍स को अनुवाद एवं सृजनात्‍मक लेखन के माध्‍यम से भारतीय साहित्‍य को दिए गए योगदान के लिए हाल ही में ‘एशियन एडमाइरेबल एचिवर’ की उपलब्धि से नवाजा गया। इस अवसर पर युवा कवि विमलेश त्रिपाठी द्वारा लिया गया साक्षात्‍कार-

आप अनुवादक होने के साथ-साथ कवि भी हैं। अनुवाद और लेखन में किसे आप अधिक निकट महसूस करते हैं ? अनुवाद में कब से कार्यरत हैं और आपकी अनुवाद यात्रा पर संक्षिप्‍त रूप में बताएं

मैं दोनों को महत्‍वपूर्ण समझता हूँ। लेखन सृजन है और अनुवाद पुन: सृजन। लेकिन लेखन की अपेक्षा अनुवाद काफी मुशिकल होता है। अनुवादक का काम स्रोत भाषा में प्रस्‍तुत सामग्री को लक्ष्‍य भाषा में प्रस्‍तुत करना होता है।

मैं पिछले दो दशकों से अनुवाद के क्षेत्र में कार्यरत हूँ। मैं पाँच भाषाएँ बोलता हूँ और उन भाषाओं में अनुवाद करता हूँ। मैंने शुरुआत मलयालम कहानियों का हिन्‍दी में अनुवाद करते हुए की। फिर कविताएँ और उपन्‍यासों का हिन्‍दी में अनुवाद किया। मलयालम कवियों में  अयप्‍प पणिक्‍कर, ओ एन वी आदि से लेकर युवा कवि पी.ए. अनीश तक की कविताएँ एवं कहानीकारों में एमटी वासुदेवन नायर से लेकर युवा कहानीकार संतोष एचिकानम तक की कहानियों का हिन्‍दी में अनुवाद किया। इस बीच में मलयालम रचनाकारों को अंग्रेजी में भी परिचित करवाया। उसी प्रकार हिन्‍दी के युवा कवियों को मलयालम में परिचित करवाया। तेलुगु के चर्चित कवि के. शिवारेड्डी, एम हैमावती, गरीमल्‍ला नागेश्‍वर राव, शिखामणि आदि को हिन्‍दी में परिचित करवाया। मशहूर अंग्रेजी कवि जयंत महापात्र की कविताओं का हिन्‍दी में अनुवाद किया और हिन्‍दी कवि एंकात श्रीवास्‍तव की कविताओं का अंग्रेजी में अनुवाद किया।

हाल ही में मेरे द्वारा किया गया तमिल कवयित्री सलमा की कविताओं का हिन्‍दी अनुवाद ‘पूर्वग्रह’ में प्रकाशित हुआ। साहित्‍य अकादमी के अनुरोध पर मलयालम के मशहूर उपन्‍यासकार वैकम मुहम्‍मद बशीर के उपन्‍यास का हिन्‍दी अनुवाद ‘दीवारें’ शीर्षक से कि‍या। अब तक मेरी अनुवाद के नौ किताबें हिन्‍दी में एवं एक किताब अंग्रेजी में प्रकाशित है। मेरी अनूदित रचनाओं का प्रकाशन समकालीन भारतीय साहित्‍य, राजस्‍थान साहित्‍य अकादमी, मध्‍यप्रदेश साहित्‍य अकादमी, भारतीय भाषा परिषद, भारतीय अनुवाद परिषद, भारतीय ज्ञानपीठ की पत्रिकाओं, कादंबिनी, आजकल आदि पत्रिकाओं में हो चुका है।

अनुवाद और रचनात्‍मक लेखन में आपके लिहाज से क्‍या अंतर है ?

जैसा मैंने पहले कहा कि‍ लेखन सृजन है और रचनात्‍मकता पुन: सृजन। रचनात्‍मकता में लेखक आजाद है। वह साहित्‍य की किसी भी विधा पर लिख सकता है। लेखक कहानी या कविता में अपने विचारों को प्रस्‍तुत करता है। अनुवादक उस कहानी या कविता को दूसरी भाषा में प्रस्‍तुत करता है। जहाँ तक कहानी की बात है, अनुवादक को ज्‍यादा मश्‍क्‍कत करने की जरूरत नहीं पडती। लेकिन जब कविता का अनुवाद होता है, तो अनुवादक तनाव में पड़ जाता है। यह इसलिए है कि स्रोत भाषा की कविता को लक्ष्‍य भाषा में प्रस्‍तुत करना आसान नहीं होता।

कभी-कभी मूल भाषा में ही कविता को ठीक तरह से समझ पाना मुशिकल होता है। ऐसे में उसका अनुवाद तो दूर की बात है, कभी-कभी कविताएँ ठीक तरह से खुल नहीं पातीं। ऐसे में मूल लेखक से संपर्क करता हूँ ताकि अर्थ का अनर्थ न हो जाए।

आपने दक्षिण भारत के बहुत सारे लेखकों का अनुवाद हिन्‍दी में किया है। अनुवाद करते समय कौन लेखक आपको अपने बहुत निकट लगा। साथ में यह प्रश्‍न भी कि‍ किस लेखक को अनुवाद करते समय आपको कड़ी मशक्‍कत करनी पड़ी ?

जैसे मैंने पहले बताया मैंने तेलुगु, तमिल और मलयालम से हिन्‍दी में अनुवाद किया। वैसे जिन लेखकों का अनुवाद किया वे मेरे पसंद के ही लेखक हैं। मुझे मलयालम के कवि ए. अयप्‍पन, अनवर अली और अनिता तंभी की कविताओं का अनुवाद करने में कठिनाई महसूस हुई।

ए. अयप्‍पन की कविताओं के तेवर को अनुवाद में ला पाना मुशिकल होता है। अनवर अली और अनिता तंभी की कविताओं का भाषागत सौंदर्य अनुवादक के लिए चुनौती भरा होता है।

भारत की विभिन्‍न भाषाओं से हि‍न्‍दी में ढेर सारे अनुवाद हुए हैं, लेकिन हिन्‍दी साहित्‍य का अन्‍य भारतीय भाषाओं में अनुवाद उतना नहीं हुआ। आप इसका क्‍या कारण मानते हैं ? क्‍या आपने हिन्‍दी से दक्ष्‍िाण भारतीय भाषाओं से अनुवाद का कार्य किया है  ?

हाँ, यह सही बात है कि अन्‍य भारतीय भाषाओं से हिन्‍दी में काफी अनुवाद हुआ है। इसकी एक वजह यह है कि हिन्‍दी देश की राष्‍ट्रभाषा है और देश में सबसे ज्‍यादा बोली और समझी जाती है। इसलिए प्राय हर लेखक अपनी रचनाओं का हिन्‍दी में अनुवाद होते देखना पसंद करेगा। यही नहीं एक बार किसी रचना का अनुवाद हिन्‍दी में हो जाती है, तो हिन्‍दी माध्‍यम से उस रचना का अन्‍य भारतीय भाषाओं में अनुवाद हो जाता है।

जहाँ तक हिन्‍दी रचनाओं का दक्षि‍ण भारतीय भाषाओं में अनुवाद की बात है, अनुवाद तो हो रहे हैं लेकिन पर्याप्‍त मात्रा में नहीं। इसके कई कारण हैं। पहला- अच्‍छे अनुवादकों की कमी। दूसरा- पत्रिकाओं का अभाव जो अनूदित साहित्‍य को प्रकाशित करें। तीसरा- सम्‍पादकों का संकुचित दृष्टिकोण।

हिन्‍दी में लगभग सभी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में अनुवाद के लिए स्‍थान रहता है। दक्ष्‍िाण भारतीय भाषाओं में प्रकाशित पत्रिकाओं की स्थिति भिन्‍न है। जहाँ तक मलयालम की बात है, यहाँ की पत्रिकाएँ अनूदित रचनाओं को कम ही प्रकाशित करती हैं।  यहाँ की ‘मातृभूमि’ पत्रिका हर साल गणतंत्र दिवस के अवसर पर भारतीय भाषाओं की चुनिंदा कहानियों का मलयालम अनुवाद प्रकाशित करती है, विशेषांक के रूप में। इसके अलावा ‘पच्‍च कुदिरा’, ‘साहित्‍य लोकम’, ‘यरलव’ और ‘तोरचा’ जैसी मलयालम पत्रिकाओं में मेरे द्वारा अनूदित हिन्‍दी कवि एकांत श्रीवास्‍तव, बद्रीनारायण, अनामिका आदि की कविताओं का अनुवाद प्रकाशित हुआ है। आमतौर पर मलयालम में पत्रिकाएँ अनुवाद कम ही प्रकाशित करती हैं।

आप अच्‍छे कवि भी हैं। कविता को लेकर आज बहुत सारे सवाल उठाए जा रहें हैं- अच्‍छी कवि‍ता नहीं लिखी जा रही है, जैसे कई सवाल हैं। इसके बारे में आपकी क्‍या राय है ?

कविता तो हमेशा से हाशिए पर रही है। इसलिए इसे अंग्रेजी में नेगलेक्‍टेड जेनेर कहते हैं। मेरी राय में अच्‍छी कविता किसी बिंदू या खास विषय पर नहीं लिखी जाती। अच्‍छी कविता की कोई खास परि‍भाषा नहीं है। यदि कविता पाठक को सोचने में बाध्‍य करे, उसे झकझोरे तो अच्‍छी कविता कही जा सकती है। आज अच्‍छी कविता न लिखने के कई कारण भी हैं। पहला, युवा कवि वरिष्‍ठ कवियों की कविताओं को पढ़ते नहीं है। न ही कविता की यात्रा को समझने की कोशिश करते हैं। अंग्रेजी में एक कहावत है- इफ यू वांट टू बीकम ए मास्‍टर रीड यूवर मास्‍टर्स। यही नहीं आज के युवक बहुत जल्‍दी नाम कमाना चाहते हैं। इस चक्‍कर में वे कविता को या रचना को परिपक्‍व होने तक इंतजार नहीं करते। यह बात कविता या रचना के लिए बहुत घातक साबित हो सकती है।

महत्‍वपूर्ण कवि होने के नाते आप कविता के गंभीर पाठक भी हैं। हिन्‍दी ही नहीं दक्षिण के अन्‍य कवियों की कविताओं से आपका गहरा परिचय है। हिन्‍दी में पठनीयता के संकट की बात बार-बार कही जाती है। क्‍या यह संकट तेलुगु, मलयालम एवं अन्‍य दक्षिण भारत की भाषाओं में भी है  ?

यह सवाल पहले के सवाल से मिलता हुआ सवाल है। कविता का पठनीय होना और अच्‍छी कविता अन्‍योन्‍याश्रित है। कविता कई प्रकार की हो सकती है। कभी छोटी कविता, तो कभी लंबी। कभी मात्र बेनेवलेंट एक्‍सप्रेशन होती है।

यह संकट तेलुगु, मलयालम, तमिल, कन्‍नड आदि दक्षिण भारतीय भाषाओं में भी है। इन भाषाओं में बहुत सारे कवि भी हैं। जब कविता कथ्‍य, शिल्‍प और भाषा की दृष्टि से संतुलित हो, तो कविता पठनीय होती है।

समकालीन कविता की बात करें तो कई आलोचकों का आरोप है कि आजकल फार्मूला के आधार पर कविताएँ लिखी जा रही हैं। आप स्‍वयं को इस आरोप से कितना मुक्‍त मानते हैं ?

समकालीन कविता फार्मूला के आधार पर लिखी जा रही है, मैं ऐसा नहीं मानता। मेरा ख्‍याल है कि कविता जन्‍म लेती है। आजकल कविताएँ जबरदस्‍ती लिखी जा रही हैं। कविता जब तक पूर्ण रूप नहीं लेती, उसे उतारा नहीं जाना चाहिए। कई बार कविता दूसरे व तीसरे ड्राफ्ट में परिपक्‍व रूप धारण करती है, तो कभी-कभी यह पहली बार ही वांछित रूप प्राप्‍त करती है। मैं कविता के लिए इंतजा़र करता हूँ।

आप मलयालम, हिन्‍दी एवं अंग्रेजी तीनों भाषाओं में कविता लिखते हैं। अपनी कविताओं के बारे में कुछ बताएँ।   

मलयालम में मेरे दो काव्‍य संग्रह प्रकाशित हैं। पहला 2008 में ‘दूरम’ शीर्षक से और दूसरा 2013 में ‘जान निणेक्‍क ओरू गज़ल’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ। हिन्‍दी में मेरी कविताएँ पिछले चार सालों से प्रकाशित हो रही हैं। मेरा पहला काव्‍य संग्रह ‘पाँव तले की मिट्टी’ शीघ्र ही प्रकाशित होने वाला है।अंग्रेजी में मैंने बहुत कम कविताएँ लिखी हैं। यह मेरे लि‍ए सौभाग्‍य की बात है कि इनमें कुछ कविताओं का प्रकाशन ‘सनराइस फ्राम द व्‍लू थंडर’, ‘इंडो आस्‍ट्रेलियन एंथोलोजी आफ कंटेपोरेरी पोएट्री : वाइब्रेंट वोएसेस’ आदि अंतरराष्‍ट्रीय काव्‍य संग्रहों में हुआ है।

आपके पहले काव्‍य संग्रह के लिए अग्रिम बधाइयाँ। समकालीन  हिन्‍दी कविता का भविष्‍य क्‍या है। बहुत लोग कहते हैं कि यह दौर गद्य का है। इसके बारे में आपके क्‍या विचार हैं ?

धन्‍यवाद। हिन्‍दी कविता के भविष्‍य के बारे में कुछ कहने की हिम्‍मत मैं नहीं रखता। आज हिन्‍दी में कविता की कोई कमी नहीं है। पहले की अपेक्षा कवियों की संख्‍या ज्‍यादा है।

हाँ, निश्‍चितरूप से यह दौर गद्य का है। आज कविता गद्य में लिखी जाती है। लेकिन दुख की बात है कि गद्य का रूप लेने के कारण कवियों की संख्‍या बढ़ गई है। लोग यह समझने लगे हैं कि खत लिखना आता है, तो कविता भी लिखी जा सकती है। यही नहीं, फेसबुक और ब्‍लॉग के चलते प्रकाशन आसान हो गया है। हर कोई कवि बन गया है। यह भी देखा गया है कि दसेक कविताएँ प्रकाशित होने के बाद युवक काव्‍य संग्रह प्रकाशित कर रहे हैं। यह कविता के लिए खतरा है। इनमें से कितने टिके रहेंगे, यह वक्‍त ही बताएगा।

अनुवाद की दिशा मे आपके भविष्‍य की योजनाएँ क्‍या हैं ? मतलब आप अभी अनुवाद की किन योजनाओं पर काम करे रहे हैं ?

फिलहाल मैं तिब्‍बती कवि तेनसिंग सूंडे की कविताओं का हिन्‍दी में अनुवाद कर रहा हूँ। समकालीन मलयालम कवियों का हिन्‍दी में अनुवाद कर रहा हूँ। हाल ही में केंद्रीय साहित्‍य अकादमी के लिए चर्चित मलयालम उपन्‍यासकार श्री सेतू के उपन्‍यास ‘अडयालंगल’ (प्रतीक) का हिन्‍दी में अनुवाद पूरा किया। युवा हि‍न्‍दी कवि‍यों की कविताओं का मलयालम में अनुवाद करने की योजना भी है।

वैज्ञानिक सोच से ही आगे बढ़ेगा समाज : देवेंद्र मेवाड़ी

देवेंद्र मेवाड़ी

देवेंद्र मेवाड़ी

वरिष्ठ विज्ञान लेखक देवेंद्र मेवाड़ी विगत लगभग 45 वर्षों से विभिन्न संचार माध्यमों से विविध विधाओं में विज्ञान लेखन करके समाज में वैज्ञानिक जागरूकता लाने का प्रयास कर रहे हैं। उनसे देश में विज्ञान लेखन की स्थिति और वैज्ञानिक सोच पर अनुराग की अंतरंग बातचीत-

सदियां बीत गईं लेकिन विज्ञान के इस युग में भारत में अभी भी अंधविश्‍वास चरम पर है। लोग अपने बच्‍चे की बलि तक दे देते हैं। इसका क्‍या कारण मानते हैं आप?

दे.मे. :  मेरे विचार से इसकी वजह यह है कि लोगों को विज्ञान की जानकारी कम है। अगर उन्‍हें विज्ञान की जानकारी मिलती और सच का पता होता तो उन्‍हें विश्‍वास होता कि यह सब फरेब है। इस पर हमें विश्‍वास नहीं करना चाहिए।

हमारे देश में लोगों तक विज्ञान की जानकारी पहुँचाने के लिए हर साल करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं। इसके बाद भी लोगों के पास तक जानकारी क्‍यों नहीं पहुंच रही है, इसके बहुत से कारण हो सकते हैं। लोगों तक विज्ञान पहुँचाने की जो योजनाएं बनाई जाती हैं, वे लक्ष्य-वेध से क्यों चूक रही हैं- यह एक विचारणीय विषय है। ऐसी योजनाओं का ‘पीयर रिव्यू’ यानी मूल्याँकन जरूर होना चाहिए ताकि पता लग सके कि योजनाएं लक्ष्य वेध रही हैं या नहीं। यदि नहीं तो उन्हें अधिक कारगर बनाने का रास्ता खोजा  जाना चाहिए। इस प्रयास में सबसे बड़ा नुकसान जो कर रहे हैं, और समाज को कम से कम पाँच सौ साल या हजार साल पीछे धकेल रहे हैं,  वे हैं इलेक्‍ट्रानिक चैनल और हिंदी फिल्में। इनके माध्‍यम से भूत-प्रेत, पुरानी रूढ़ियों, अंधविश्‍वासों पर आधारित कार्यक्रम करोड़ों लोगों तक पहुँचाए जा रहे हैं। यह बहुत गलत है। इन फिल्मों और चैनलों को समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए। कई सामाजिक मुद्दों पर उन्होंने सराहनीय भूमिका निभाई भी है। उन्हें अंधविश्‍वास को दूर करने का बीड़ा भी उठाना चाहिए।

भारत में विज्ञान लेखन की क्‍या स्थिति है?

दे.मे. :  विभिन्‍न भारतीय भाषाओं में, विशेषकर हिंदी में विज्ञान लेखन की स्थिति बहुत अच्‍छी है। 1884 के आसपास विज्ञान की बातें भारतीय समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में छपने लगी थीं। और, जो कुछ पश्चिम में विज्ञान का विकास हो रहा था या हमारे यहाँ विज्ञान का जो काम हो रहा था, उस पर तत्‍कालीन सम्‍पादकों व लेखकों की नजर थी। वे लेखक विज्ञान लेखक नहीं कहलाते थे, वे साहित्‍यकार थे। वे साहित्‍य और विज्ञान पर समान रूप से लिखते थे। 1900 में सरस्‍वती शुरू हुई। सरस्‍वती ने साहित्‍य के साथ-साथ विज्ञान को अधिक से अधिक छाप कर बड़ी भूमिका अदा की। उसमें हिंदी के जाने-माने साहित्‍यकारों ने भी विज्ञान की रचनाएं लिखीं। चंद्रधर शर्मा गुलेरी, हरिवंश राय बच्‍चन, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला और बहुत से साहित्‍यकारों ने लिखा। विज्ञान से जो बदलाव आ रहा था, उस पर प्रेमंचद ने भी अपने संपादकि‍यों में लिखा।   

हिंदी में विज्ञान लेखन की शताब्‍दी पूरी हो चुकी है। जो यह कहा जाता है कि हिंदी में विज्ञान की पुस्‍तकें नहीं हैं तो यह झूठ है। विज्ञान के लगभग सभी विषयों पर हिंदी में सैकड़ों पुस्‍तकें उपलब्‍ध हैं। धीरे-धीरे विज्ञान शब्‍दावली का भी विकास हुआ। भारत सरकार के शब्‍दावली आयोग ने पारिभाषिक शब्‍दावलियां छापी हैं। इनमें वैज्ञानिक शब्‍दों की कमी नहीं है। हालाँकि उनमें कई शब्‍द कारखाने में बने शब्‍द जैसे हैं। उन्हें आम भाषा के शब्‍दों से बदला जा सकता है। लोक में जो शब्‍द प्रचलित हैं, उन्‍हें अधिक लेना चाहिए ताकि हर  व्‍यक्ति उन्हें समझ सके।

विज्ञान के प्रचार-प्रसार में समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के साथ ही संस्‍थाओं का भी बड़ा योगदान रहा है। यह बहुत कम लोगों को मालूम है कि विज्ञान परिषद, प्रयाग के मार्च, 2013 में सौ वर्ष पूरे हो गए। देश में ऐसी कोई दूसरी संस्‍था नहीं है जो 100 वर्षों से विज्ञान का प्रचार-प्रसार कर रही हो और जिसने सौ साल पूरे कर लिए हों। इस परिषद की स्थापना पं. गंगानाथ झा, रामदास गौड़, प्रो. सालिग्राम भार्गव और प्रो. हमीदुदीन साहब जैसे विद्वानों ने की थी। इसके सभापति और उपसभापति पं. मदन मोहन मालवीय, श्रीमती एनी बेसेंट, सर सी.वाई. चिंतामणि जैसे विद्वान रहे हैं। आचार्य जगदीश चंद्र बसु, आचार्य प्रफुल्ल चंद्र राय, मेघनाद साहा, डा. के.एस. कृष्णन और डा. आत्माराम जैसे वैज्ञानिक इसके सदस्य रहे हैं। यह परिषद 1915 से ‘विज्ञान’ मासिक पत्रिका का निरंतर प्रकाशन कर रही है जिसके लक्ष्य के बारे में पं. अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ ने दोहा लिखा था।

इसके अलावा विज्ञान लोक आगरा से और विज्ञान जगत इलाहाबाद से प्रकाशित हुईं जो विशेष रूप से विज्ञान की पत्रिकाएं थीं और काफी लोकप्रिय भी हुईं। इनके माध्यम से आम लोगों के लिए विज्ञान सामने आया। इसी तरह मराठी, बांग्‍ला, तमिल, असमी आदि तमाम भारतीय भाषाओं में विज्ञान खूब लिखा गया है और लिखा जा रहा है। लेकिन, आम लोगों तक पूरी बात क्‍यों नहीं पहुँच पा रही है, यह बहुत जटिल सवाल है। इसका एक कारण तो मुझे यह लगता है कि बचपन से ही विज्ञान को कठिन और जटिल बता दिया जाता है। जबकि, ऐसा है नहीं। अगर विज्ञान को प्रकृति और जीवन से जोड़ कर समझाया जाए तो वह किस्से-कहानियों-सा रोचक लगेगा। कौन नहीं जानना चाहेगा कि सूरज क्या है, तारे क्या हैं, बादल कहाँ से आते हैं, वर्षा क्यों होती है, अन्न कहाँ से आया, फूल क्यों खिलते हैं, बीमारियाँ क्यों होती हैं, धातुएं कहाँ से आईं, कंप्यूटर क्या है, मोबाइल क्या है और यह भी कि हमारा शरीर क्या है? ये बातें रोचक तरीके से बताई जाएं तो सभी समझना चाहेंगे।  विज्ञान को आम आदमी तक पहुँचना ही चाहिए।                                       

आज इक्कीसवीं सदी की शुरूआत में भी  हम कितना अंधविश्‍वास देख रहे हैं। डायनों की बात सुन रहे हैं, भूत-प्रेतों की बात सुन रहे हैं। एक छोटी-सी खबर जंगल की आग की तरह फैला दी जाती है कि गणेश जी दूध पी रहे हैं। अफवाह फैलती है कि रात को सोए तो पुतले बन जाएंगे, मूर्तियाँ बन जाएंगे तो लोग सारी रात जागते हैं। दीवारों पर हथेलियों की छाप लगा कर भूत-प्रेतों से बचने का उपाय किया जाता है। इतना भी तर्क नहीं करते कि यह सम्‍भव नहीं है। हम इतनी मामूली सी  विज्ञान की समझ भी लोगों में क्‍यों नहीं डाल पाए। उनमें वैज्ञानिक चेतना और जागरूकता क्‍यों नहीं फैला पाए हैं, इसका पता लगाया जाना चाहिए और इस कमी को दूर होना चाहिए।  

विज्ञान को जन-जन तक पहुँचाने के लिए क्‍या किया जाना चाहिए ?

दे.मे. :  विज्ञान के सच को फैलाने के लिए हर सम्‍भव माध्‍यम का उपयोग किया जाना चाहिए। इलेक्‍ट्रानिक माध्‍यमों से जिस तरह अंधविश्‍वासों को फैलाया जा रहा है, इस पर सरकार को पाबंदी लगानी चाहिए। यह देखना चाहिए कि इससे समाज में अविज्ञान फैल रहा है, अंधविश्‍वास फैल रहा है। जब विज्ञान का सच मालूम होता है तो लोगों में जागरूकता आती है। इसका एक उदाहरण देना चाहता हूँ। 1980 में मैं पंतनगर में था। जब पूर्ण सूर्यग्रहण लगा तो पूरे पंतनगर विश्‍वविद्यालय क्षेत्र में जहाँ पूरा वैज्ञानिक माहौल था, लोग घरों में बंद रहे। सड़कें खाली थीं। बाहर कोई दिखाई नहीं देता था। ग्रहण का इतना भय था। लेकिन, 1995 में पूर्ण सूर्यग्रहण लगा तो देश में काफी लोगों ने उसे सुरक्षित तरीके से देखा। तब इतनी जागरूकता आ चुकी थी कि सूर्यग्रहण एक प्राकृतिक घटना है और इससे कोई दुष्‍प्रभाव नहीं पड़ेगा। पिछला सूर्यग्रहण 22 जुलाई 2011 को लगा। इसमें लाखों लोगों ने सूर्यग्रहण को देखा। ये लाखों लोग इसलिए सूर्यग्रहण को देखने के लिए तैयार हुए क्‍योंकि उन्‍हें ग्रहण का सच मालूम हो गया था

लेकिन, अगर हम मास मीडिया के माध्‍यम से इनके खिलाफ अंधविश्‍वास फैलाते हैं तो मुश्किल होगी। खगोलीय और अन्य प्राकृतिक घटनाओं की व्याख्या तक के लिए टीवी चैनल ज्‍योतिषियों, टैरो कार्ड और न्‍यूमरोलॉजी वालों को बुला रहे हैं। अखबारों में भविष्‍य फल बाँचा जा रहा है। यह सब निराधार है। इसका कोई परीक्षण और प्रयोग नहीं किया गया है, बस आस्था के नाम पर चल रहा है। इसको महसूस किया जाना चाहिए और इसमें कमी लानी चाहिए। कुँडली मिला कर विवाह करने के बावजूद बहू-बेटियों का जीवन संकट में पड़ रहा है क्योंकि कुँडली सुखद जीवन की गारंटी नहीं है। इसके लिए तो आपसी प्रेम और समझ जरूरी है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण की बात सबसे पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने की थी। उन्होंने देश में वैज्ञानिक वातावरण के विकास के लिए 1958 में ससंद में ‘विज्ञान और प्रौद्योगिकी नीति’ प्रस्तुत की जिसे संसद ने पारित किया। संसद में विज्ञान और प्रौद्योगिकी नीति पारित करने वाला भारत विश्व का पहला देश है। नेहरू ने देश में आधुनिक विकास के लिए राष्ट्रीय विज्ञान प्रयोगशालाओं की नींव रखी। वे मानते थे कि प्राचीन रुढ़िवादी सोच को बदलने के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण जरूरी है।

आम धारणा है कि विज्ञान बहुत क्लि‍ष्‍ट विषय है। किताबें भी जटिल भाषा में लिखी गई हैं। दूसरे, विज्ञान का संबंध केवल पाठ्यक्रम तक सीमित है। क्‍या लोगों तक विज्ञान नहीं पहुँचने  का यह बड़ा कारण नहीं है ?

दे.मे. :  यह बहुत बड़ा कारण है। मैं इस बात पर जोर देना चाहूँगा कि पाठ्य-पुस्‍तकों में जो विज्ञान पढ़ाया जा रहा है, उसके लिए जो सहायक पुस्तकें हैं यानी उस विषय को समझने लायक जो लोकप्रिय शैली में लिखी गईं किताबें हैं, उन्‍हें निश्चित रूप से विद्यार्थियों को दिया जाना चाहिए। पाठ्य पुस्‍तकों के साथ ही उस विषय में लिखी रचनाओं के बारे में उसी पुस्‍तक में सूची दी जानी चाहिए। मान लीजिए कोई अंतरिक्ष के बारे में किताब है या सौरमंडल के बारे में किताब है, उसके साथ-साथ उन लोकप्रिय शैली में लिखी गई पुस्‍तकों का भी उसमें जिक्र किया जाना चाहिए कि बच्‍चो ये पुस्‍तकें हैं, इन्‍हें संदर्भ के रूप में पढ़ सकते हो। इससे उन्हें विषय को समझने में आसानी होगी। इसके अलावा रोचक व्‍याख्‍यान, पुस्तक प्रदशर्नियों, विज्ञापनों आदि और ऐसे ही अन्‍य कार्यक्रमों के माध्‍यम से भी विज्ञान की जानकारी उन तक पहुँचाई जानी चाहिए।

रेडियो पर विज्ञान के तमाम सीरियल आ रहे हैं। टेलीविजन पर भी कुछेक कार्यक्रम दिए जा रहे हैं, लेकिन ये नगण्‍य हैं। उनकी तुलना में अवैज्ञानिक कार्यक्रम कहीं ज्‍यादा दिए जा रहे हैं। इस समय देश की बड़ी जरूरत है कि सरकार की ओर से एक विज्ञान का चैनल चलाया जाना चाहिए, जो विज्ञान का प्रचार-प्रसार करे। उसमें यह सुनिश्चित किया जाए कि वह केवल सरकारी चैनल बनकर न रह जाए। वह भी नेशनल ज्‍योग्राफी या डिस्‍कवरी की तरह रोचक और ज्ञानवर्धक सामग्री देने वाला चैनल बने। उसमें बच्चों, आम लोगों, विद्यार्थियों और वैज्ञानिकों की भागीदारी हो। उसका समय-समय पर मूल्‍याँकन किया जाना चाहिए कि किस कार्यक्रम को दर्शकों ने अधिक देखा। किसको कितनी टीआरपी मिल रही है।

वैज्ञानिकों और विशेषतौर पर भारतीय वैज्ञानिकों की जीवनियाँ बच्‍चों को बहुत प्रेरित कर सकती हैं। उन्‍हें जिंदगी में अपने सपने पूरा करने की राह दिखा सकती हैं। प्रसिद्ध भारतीय वैज्ञानिक मेघनाथ साहा जब इं‍टर की कक्षा में पढ़ते थे, तब भी नंगे पैर स्‍कूल जाते थे। एक बार स्‍कूल में अंग्रेज गवर्नर आया। मेघनाथ को जूता न पहनने के जुर्म में स्कूल से निकाल दिया गया। इसे गर्वनर के प्रति असम्‍मान माना गया। लेकिन, मेघनाथ के पास तो जूता था ही नहीं, वे कहाँ से पहनते। वे तैर कर नदी पार अपने गाँव जाते थे क्‍योंकि नाव के लिए पैसे नहीं थे। ऐसे हालतों में भी वे हमारे देश की ही नहीं विश्व  की वैज्ञानिक विभूति बने। ऐसे वैज्ञानिकों की जीवनी बच्चों को पढ़ने को मिले जिन्होंने कठिनाइयों में भी कभी हार नहीं मानी।

यह सरकार और हम सबकी जिम्‍मेदारी है कि विज्ञान की जानकारी का प्रसार करें। हम लोगों को समझाएं कि मनुष्य सिर्फ मनुष्य है। उसमें जाति, धर्म का कोई भेद नहीं है। विज्ञान की इतनी सी बात हम अभी तक लोगों को नहीं समझा पाए हैं। बार-बार राजनीतिक कारणों से जाति और धर्म के भेद को फैलाया जा रहा है। हमें मनुष्य के बजाए जातियों में बाँटा जा रहा है ताकि जाति को वोट दें। सच यह है कि मनुष्य की केवल एक जाति है- होमो सेपिएंस।

क्या हिंदी में विज्ञान की शिक्षा देना कठिन है?

दे.मे. :  कतई नहीं। विज्ञान की शिक्षा हिंदी माध्यम से देने के लिए केवल कड़े संकल्‍प की जरूरत है। जैसे, 1968 में पंतनगर विश्‍वविद्यालय के कुलपति डॉक्‍टर ध्यानपाल सिंह ने निश्‍चय किया कि उन्हें अपने विश्‍वविद्यालय में कृषि की शिक्षा हिंदी माध्‍यम से देनी है। इसके लिए उन्‍होंने हिंदी के विज्ञान लेखकों को पत्र लिखे कि हमें पुस्तकें तैयार करने के लिए आप जैसे विज्ञान लेखकों की आवश्‍यकता है। उन्होंने विश्वविद्यालय में अनुवाद एवं प्रकाशन निदेशालय खोला। पहले अंग्रेजी पाठ्य पुस्तकों का अनुवाद कराया गया ताकि निर्धारित तिथि से हिंदी माध्यम से उच्च शिक्षा दी जा सके। विभिन्न  विषयों की पुस्तकें तैयार हुईं। मैंने भी वहाँ पादप प्रजनन की प्रमुख पाठ्य पुस्तक ‘एशियाई फसलों का प्रजनन’ का अनुवाद किया।  

विश्‍वविद्यालय की क्षमता उतनी पुस्तकों के प्रकाशन की नहीं थी। इसके लिए नई मशीनें लगवाई गईं। पुस्‍तकों का प्रकाशन भी विश्‍वविद्यालय ने शुरू किया। हिंदी में किताबें विद्यार्थियों को उपलब्‍ध हो गईं।  इसके साथ ही हमें निर्देश दिया कि हम वैज्ञानिकों से मिलें। उन्‍हें प्रेरित करें कि वे हिंदी में पुस्‍तकें लिखें। हम उन्‍हें विभिन्‍न विषयों पर लिखने के लिए प्रेरित करते रहे। इस तरह किसानों तक कृषि विज्ञान की नई जानकारी पहुँचाने के लिए हिंदी में किसान भारती पत्रिका प्रकाशित की गई। उसकी शुरुआत प्रसिद्ध हिंदी विज्ञान लेखक श्री रमेश दत्त शर्मा ने की। बाद में 13 साल तक मैंने उसका सम्‍पादन किया। कृषि, पशुपालन, पशु चिकित्‍सा आदि की हिंदी में अनूदित और मौलिक पुस्‍तकें आ गईं और हिंदी शिक्षा का माध्‍यम लागू कर दिया गया। आज विश्‍वविद्यालय के पास हिंदी में सैकड़ों किताबें हैं। कुलपति डॉ. ध्‍यान पाल सिंह का कहना था कि कौन-सा ऐसा भारतीय किसान है जो अंग्रेजी की पुस्‍तकें पढ़कर खेत में हल चला रहा है। कौन-सा ऐसा ग्रामीण परिवार है, जो अंग्रेजी में जानकारी लेकर खेतों में उसका उपयोग कर रहा है। उनको तो हमारी आबोहवा में, हमारी फसलों, हमारे पशुओं से संबंधित जानकारी दी जानी चाहिए।

क्‍या आपको नहीं लगता कि हिंदी में विज्ञान लेखन के लिए यदि कुछ पुरस्‍कार घोषित किए जाएं तो विज्ञान के प्रचार-प्रसार को बढ़ावा मिलेगा ?

दे.मे. : विज्ञान लेखन के लिए कई पुरस्‍कार पहले से ही हैं। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अंतर्गत राष्‍ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संचार परिषद का राष्ट्रीय पुरस्‍कार है। चार-पांच वर्गों में पुरस्‍कार दिए जाते हैं लेकिन इनका समुचित प्रचार नहीं होता। इनके बारे में समाचारपत्र-पत्रिकाओं में कोई नहीं लिखता। हर साल 28 फरवरी को विज्ञान दिवस पर ये पुरस्‍कार दिए जाते हैं, लेकिन कहीं कोई खबर नहीं होती। ज्ञान-विज्ञान के प्रसार के लिए राजीव गांधी ज्ञान-विज्ञान पुरस्कार दिया जाता है। यह एक बड़ा पुरस्कार है। आपने सुना कभी इसके बारे में? वे पुरस्कृत पुस्तकें कहाँ हैं? हिंदी में विज्ञान लेखन के लिए केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा की ओर से आत्माराम पुरस्कारदिया जाता है। यह पुरस्कार राष्ट्रपति के कर-कमलों से दिया जाता है इसलिए समाचारपत्रों में थोड़ी-बहुत चर्चा हो जाती है। इसके अलावा भी विज्ञान लेखन के लिए विभिन्न मंत्रालय पुरस्कार देते हैं।

समाज को बदलने में वैज्ञानिक सोच का क्‍या महत्‍व है।

दे.मे. : वैज्ञानिक सोच सच का पक्षधर है। इसलिए यह समाज को जागरूक बनाता है, उसे आगे बढ़ाता है। जबकि, रूढ़िवादिता और अंधविश्वास प्रतिगामी सोच को बढ़ाते हैं और समाज को पीछे ढकेलते हैं। अगर हम देश-काल पर नजर डालें तो साफ दिखाई देगा कि आज हम जहाँ खड़े हैं वहाँ तक विज्ञान और प्रौद्योगिकी के बल पर पहुँचे हैं। अनाज के मामले में आत्मनिर्भरता हो या दूध क्रांति, चिकित्सा की नई तकनीकें या अंतरिक्ष में उड़ते हमारे संचार व मौसम उपग्रह अथवा चाँद पर दस्तक देने वाला चंद्रयान-1, ये सभी विज्ञान और प्रौद्योगिकी की देन हैं। तंत्र-मंत्र और ज्योतिष से आज तक न कोई अंतरिक्षयान बना है, न फसलों की पैदावार बढ़ी है और न चिकित्सा विज्ञान के चमत्कार सामने आए हैं। इसलिए हमें वैज्ञानिक सोच के साथ आगे बढ़ना चाहिए। अंधविश्वासों को आँख मूंद कर अपनाने के बजाय तर्क करना चाहिए कि क्या ऐसा हो सकता है? वैज्ञानिक सोच हमें प्रगति की राह पर आगे बढ़ाता है।

आप व्यक्तिगत जीवन में अंधविश्वासों और अवैज्ञानिकता का कैसे विरोध करते हैं?

दे.मे. : मैं और मेरा परिवार तर्क का सहारा लेते हैं और ऐसी धारणाओं को नहीं मानते। बिल्ली के रास्ता काटने पर हम तुरंत आगे बढ़ते हैं ताकि आसपास के लोग समझ सकें कि इससे कुछ नहीं होता। हम सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण को सुरक्षित विधि से देखते हैं और उस दौरान खाते-पीते रहते हैं ताकि साबित हो सके कि यह एक शानदार खगोलीय घटना है। इसका कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ता। हम दिन, वार, दिशा के फलाफल नहीं मानते। हमने अपनी मानसिकता ऐसी बना ली है इसलिए इन वहमों और अंधविश्वासों में नहीं फँसते।

आपने लेखने के लिए विज्ञान क्यों चुना?

दे.मे. :  क्योंकि मैं बचपन से ही जिज्ञासु था और हर बच्चे की तरह अपने चारों ओर की हर चीज के बारे में जानना चाहता था- सूर्य, चंद्रमा और तारों के बारे में, पेड़-पौधों, फूलों, तितलियों, जीव-जंतुओं, बादल, वर्षा और हर उस चीज के बारे में जो दिखाई देती थी। फिर, विज्ञान की पढ़ाई शुरू की और धीरे-धीरे विज्ञान की बातों का पता लगता गया। मुझे पता लगता गया तो मेरा मन दूसरों को बताने के लिए बैचेन हुआ। और,  मैंने वे बातें साथियों को बताईं, बच्चों को बताईं। लोगों को बताने के लिए हिंदी में विज्ञान के लेख लिखने लगा। पहला लेख लिखा ‘जानि शरद ऋतु खंजन आए’, दूसरा ‘शीत निष्क्रियता’, तीसरा ‘कुमायूं और शंकुधारी’। पहले दोनों लेख ‘विज्ञान जगत’ को भेजे। तीसरा ‘विज्ञान’ को। ‘विज्ञान जगत’ के संम्‍पादक प्रोफेसर आर.डी. विद्यार्थी का उत्तर मिला, “लिखते रहना, कौन जाने कल तुम स्वयं एक विज्ञान लेखक बनो।” इस एक पंक्ति ने मेरे भीतर विज्ञान लेखन की लौ जगा दी। अप्रैल 1965 में मेरा पहला लेख ‘विज्ञान’ मासिक में छप गया और दोनों लेख ‘विज्ञान जगत’ के मई-जून 1965 संयुक्तांक में। इस तरह मेरे विज्ञान लेखन की शुरुआत हो गई हालाँकि तब तक मैं हिंदी में कहानियाँ भी लिख रहा था जो ‘कहानी’, ‘माध्यम’, ‘नई कहानियां’, ‘उत्कर्ष’ आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं।

शुरुआती दौर में आपको विज्ञान लेखन में किस तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ा और किन लोगों ने आपको इसके लिए प्रेरित किया?

दे.मे. :  शुरुआती दौर में कोई विशेष मुश्किलें सामने नहीं आईं क्योंकि विज्ञान की जो बातें में पढ़ता था, जो जानकारी मिलती थी उसे अपनी भाषा में, अपने ढंग से लिख देता था। लेकिन, दीक्षा ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’, ‘धर्मयुग’ और ‘नवनीत’ जैसी पत्रिकाओं के विद्वान सम्‍पादकों, मतलब मनोहर श्याम जोशी, डा. धर्मवीर भारती और नारायणदत्त जी से ली जिनके द्वारा सम्‍पादित लेख पढ़ कर सरल भाषा-शैली में लिखने का क ख ग सीखा। रमेश दत्त शर्मा, गुणाकर मुले और रमेश वर्मा जैसे अग्रज विज्ञान लेखकों की रचनाएं पढ़ कर निरंतर लिखने की प्रेरणा मिलती रही। निरंतर लिखना ही नई ऊर्जा देता रहा। आपको बताऊँ, मैंने भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (पूसा इंस्टिट्यूट), पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय और पंजाब नेशनल बैंक में दीर्घकाल तक नौकरी की लेकिन हर व्यस्तता के बावजूद विज्ञान लेखन करता रहा। कई बड़ी स्टोरीज हिंदी में पहली बार मैंने दीं जैसे- कृषि वैज्ञानिक डा. नार्मेन बोरलाग को नोबेल शांति पुरस्कार, दक्षिणी ध्रुव में एक भारतीय वैज्ञानिक और सिरोही बिंदु, विश्व के पहले परखनली शिशु का जन्म आदि।

आपने विज्ञान कथाएं भी लिखी हैं?

दे.मे. :  जी हाँ, मेरी पहली वैज्ञानिक उपन्यासिका ‘सभ्यता की खोज’ 1979 में ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ में प्रकाशित हुई थी। उसके बाद कई विज्ञान कथाएं लिखीं जो मेरे तीन कथा संग्रहों में संकलित हैं। विज्ञान कथा लेखन में मेरी विशेष रुचि रही है और मैं इसके राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य का अध्ययन करता रहता हूँ। हिंदी साहित्य में इस विधा की रचनाओं की भारी कमी है, हालाँकि हिंदी में लगभग 1884 से विज्ञान कथा साहित्य रचा जा रहा है। इस क्षेत्र में राहुल सांकृत्यायन, डा. संपूर्णानंद, आचार्य चतुर सेन जैसे साहित्यकारों ने भी अपना योगदान दिया है। नई पीढ़ी के कई विज्ञान कथाकार इस विधा को समृद्ध कर रहे हैं। असल में विज्ञान कथा लेखन एक कठिन कार्य है जिसमें कहानी की समझ और विज्ञान के तंतुओं से कथा बुनने की कला आना जरूरी है। एक बात और, विज्ञान कथाओं से जनमानस तक विज्ञान को आसानी से पहुँचाया जा सकता है।

कवि‍ता जि‍न्‍दगी की ओर ले जाती है : पवि‍त्रन तीकूनी

पवि‍त्रन तीकूनी

केरल के तीकूनी में जन्मे युवा मलयालम कवि‍ पवि‍त्रन तीकूनी के दस काव्य  संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। उन्‍हें कई पुरस्‍कारों से सम्‍मानि‍त कि‍या जा गया है। केरल दिवस के दौरान विशाखपटणम पहुँचे पवित्रन तीकूनी से हिन्‍दी एवं मलयालम कवि व बहुभाषी अनुवादक संतोष अलेक्स द्वारा लिया गया साक्षात्कार-

संतोषः आपने कवितायें लिखना कब शुरू किया ? पहली कवि‍ता कब और कहाँ प्रकाशित हुई ?
पवित्रन: मैं अस्सी के अंतिम दौर में कवितायें लिखने लगा। मेरी पहली कविता ‘चंद्रिका’ नामक पत्रिका में प्रकाशित हुई। कविता का शीर्षक था- ‘रोसापूवूम मेषुकुतिरियुम़’ (गुलाब का फूल व मोमबत्ती)।

संतोष: ‘मुरीवकलुडे वसंतम’ (घावों का वसंत) से ‘कुरीदिक्कु मुनपु’ (हत्या से पहले) तक की यात्रा को आप कैसे आँकते हैं ?
पवि‍त्रन: मेरा जीवन बहुत ही कठिनाइयों से गुजरा। पिताजी की मानसिक हालत खराब थी, जिसके चलते माँ ने दूसरी शादी की। घर में कमानेवाला कोई नहीं था इसलिये मैं चौथी कक्षा में पढ़ते वक्त घर छोड़कर भाग कर कण्णूर पहुँचा। वहाँ एक होटल में काम करने लगा।

एक नवम्बर की बात है। वहीं पास के एक स्कूल में बाल दिवस पर प्रतियोगितायें हो रही थीं। मैंने भी प्रतियोगिता में भाग लिया और मुझे पुरस्कार मिला। पुरस्कार देते समय मुझसे मेरे स्कूल का नाम पूछा तो मैं चुप रहा। तो मन में फिर से पढ़ने की इच्छा जागी।

मैं घर वापस आ गया। घर के पास स्थित स्कूल में पढ़ने लगा। ‍पि‍ताजी स्कूल जाते हुए बच्चों पर पत्थर फेंकते और गाली-गलोच करते। पिताजी की इस हरकत से तंग आकर मैं घर से बीस किलोमीटर की दूरी पर स्थित वटटोली हाई स्कूल में पढ़ने लगा। दसवीं कक्षा पहली श्रेणी में पास हुआ। फिर मुंगेरी सरकारी कॉलेज में इंटरमीडिएट के लिये दाखिल हुआ और पहली श्रेणी में पास हुआ।

इस बीच फिर से पिताजी के कारण मुझे घर छोड़कर भागना पडा़। इस बार मैं वयनाड जिले में पहुँचा। वहाँ एक नाई के घर आश्रय मिला। उनके साथ रहकर नाई का काम सीखा। इस बीच माही के सरकारी कॉलेज में बी.ए. में एडमि‍शन मिला। लेकिन मेरा नसीब ठीक नहीं था। मेरी बहन की शादी करवानी थी। घर की आर्थिक स्थिति खराब थी। इसलिये बीस साल की उम्र में मुझे शादी करनी पडी़। मुझे जो कुछ मि‍ला उसे बहन को देकर उसकी शादी करवा दी।

मुसीबत फिर भी नहीं टली। दो साल बाद बहन अपने बच्चे को लेकर वापस घर आ गयी। मैं पूरी तरह टूट गया और अपनी बीवी और दो बच्चों को लेकर अलेप्पी पहुँचा। वहाँ पर अपनी बेटी को नोचकर, रुलाकर भीख मांगी ताकि पापी पेट को पाला जाय।ऐसे में एक दिन भीख मांगते समय मुझे एक आदमी ने पुकारा। वह मुझे समीप के एक कार्यालय में ले गया। वहाँ पर राजन कैलाश नामक कवि ने मुझे गले लगाकर पूछा, ‘‘आप पवित्रन तीकूनी हैं न?’’ मैं अवाक रह गया। उन्होंने मुझे मेरा एक काव्य सग्रंह दिखाया और कहा, ‘‘तुम कवितायें लिखना मत छोडो़। तुम्हारी कविताओं में जिन्दगी है।’’ तब से आज तक मैंने जीने के लिये कई काम किये, लेकिन कविता का सहारा नहीं छोडा़।

आज मैं जो भी हूँ वह कविता के कारण ही है। कविता को जानने से पहले मैंने कविता लिखना शुरू किया। जैसे-जैसे मैं कवितायें लिखता गया, वे प्रकाशित होती गईं। अब मैं कविताओं को जानकर लिख रहा हूँ।

संतोषः आपने किन-किन कवियों को पढा़ है और किन-किन कवियों ने आपको प्रभावित किया है ?
पवित्रन: जैसे मैंने आपको बताया जिन्‍दगी की आपाधापी में मुझे पढ़ने का समय नहीं मिला। इंटरमीडिएट की पढा़ई के बाद अन्य कवियों को पढ़ने लगा। के. सच्चिदानंदन, अयप्प पणिकर, बालचंद्रन चुल्लकाड, कुरीपुषा श्रीकुमार आदि की कवितायें मुझे अच्छी लगती हैं लेकि‍न किसी का खास प्रभाव मुझ पर नहीं है।

संताषः 1990 से 2000 के साल केरल की कविता के इतिहास में अनोखे हैं। इस दौरान आपको मिलाकर ग्यारह कवियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज करायी। वरिष्ठ कवि श्री आटूर रविवर्मा ने इन दस कवियों पर ‘पुदुमोषीवषिकल’ (नये रास्ते) नामक किताब का सम्‍पादन करते हुए इन कवियों को साहित्यिक जगत से परिचित करवाया। इस किताब में आपको शामिल नहीं किया गया। कोई खास वजह?
पवित्रनः मुझे इसका कोई गम नहीं है। मैं किसी भी कवि द्वारा चलाये जी रही संस्थाओं में अपने को शामिल नहीं करता। तब भी और आज भी मैं जि‍न्‍दगी के एक छोटे से रास्ते से गुजर रहा हूँ। मेरा विश्‍वास है कि कविता मृत्यु की ओेर नहीं, बल्कि जिन्‍दगी की ओर ले चलती है।

मैंने और कवि मित्र एस. जोसफ ने ऐसी कवितायें लिखीं जो पहले किसी ने नहीं लिखीं। मछली बाजार, वहाँ का माहौल आदि पर हमने कवितायें लिखीं। कविता के लिये जो जगह मना थी, हम वहाँ चले गये और उन अवस्थाओं पर कवितायें कीं क्योंकि हमारा विश्‍वास था कि वहाँ भी जिन्‍दगी है और वहाँ भी लोग रहते हैं।

इसलिये आपके द्वारा बताए संग्रह में शामिल कवियों की अपेक्षा मेरी कविताओं को पाठकों ने पहचाना और सराहा है। इसके लिये मैं पाठकों का आभारी हूँ। अब तक मेरे नौ काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। सब मिलाकर मैंने अब तक 600 कवितायें लिखी हैं।

संतोषः आपकी कविताओं में मार्क्सवाद का प्रभाव देखा जा सकता है। आपको नहीं लगता कि आज मार्क्सवाद अपनी प्रासंगिकता खो चुका है?
पवित्रनः यह सही है कि मेरी कविताओं में मार्क्सवादी विचारधारा का प्रभाव है। मेरी राय में मार्क्सवाद दुनिया का सबसे उत्कृष्ठ सिद्धान्त है। लेकिन खेद की बात है कि इसको सही मायने में न समझा गया और न ही अमल किया गया। आज मार्क्सवाद अपने सिद्धान्तों से कोसों दूर है।

संतोषः तेलुगु के महाकवि श्री श्री ने इस प्रकार बताया है, ‘कुछ भी कविता बनने में अक्षम नहीं है, लेकिन शिल्प पक्ष मुख्य है।’ आपकी राय में अच्छी कविता क्या है?
पवित्रनः हाँ, यह सही है कि कविता में शिल्प पक्ष महत्वपूर्ण है लेकिन केवल शिल्प पक्ष पर ध्यान देने से कविता नहीं बनती। कविता पढ़ने के बाद पाठक यदि मेरी पक्तियों में अपनी जिन्‍दगी के किन्ही क्षणों या अवस्थाओं से अपने को जोड़ पाये तो मैं अपने को कृतार्थ महसूस करूँगा। मेरी राय में कविता में आप जिन्‍दगी को पढ़ पायें तो वही अच्छी कविता है।

संतोषः आपने कई विषयों पर कवितायें लिखी हैं।आपकी शैली में एकरूपता आती जा रही है। आपके समकालीन कवियों में भी यह समस्या है। क्या आपको नहीं लगता कि इससे बच निकलना है?
पवित्रनः हाँ, मैं यह मानता हूँ, मेरे लिये कविता एक प्रवाह है। मैंने अब तक जो कवितायें लिखी हैं, उनमें से कोई भी कविता जबरदस्ती नहीं लिखी गई है। अपनी शैली से हटना आसान नहीं है। ‘वीटीलेकुल्ला वषीकल’ (घर की ओर का रास्ता) कविता में मैंने एक अलग शैली में कविता लिखी है। यह सही है कि मेरे समकालीनों की शैली में भी एकरूपता है। बदलाव जरूरी है। मेरा विश्‍वास है कि मेरे मित्र भी इससे छुटकारा पाने की कोशिश करेंगे।

संतोषः ‘सौजन्यम’ (मुफ्त), ‘पटटम’ (पंतग) आदि कविताओं में आपने गाँधीजी का जि‍क्र कि‍या है। क्‍या आप मानते हैं कि‍ गाँधी जी आज भी प्रासंगिक हैं?
पवित्रनः गाँधी जी युग पुरुष थे। सत्‍य और अहिंसा के उपासक थे। उनका कहना था कि यदि आपको कोई एक गाल पर तमाचा मारे तो दूसरा गाल भी दि‍खायें। मैं इससे सहमत नहीं हूँ। क्‍योंकि‍ आज के समय में व्‍यक्‍ति‍ इतना वि‍नयशील बनें, यह सम्‍भव नहीं होता। अहिंसा का मार्ग अच्‍छा है लेकि‍न सहने की भी तो एक हद होती है।

संतोष : आज साहि‍त्‍य, राजनीति‍ और धर्म अपने लक्ष्‍यों से हट गये हैं। इसके प्रति‍ आपकी क्‍या प्रति‍क्रि‍या है?
पवि‍त्रन: आज व्‍यक्‍ति‍ अपने स्‍वार्थ के लि‍ये कि‍सी भी राजनीति‍क दल, संस्‍था से जुड़ जाता है। जब कोई दल सत्‍ता में है तो वह कई समस्‍याओं को स्‍वीकारता है, वही दल जब वि‍पक्ष में बैठता है तो उन्‍हीं बातों को नकारता है। आज राजनीति‍ मौकापरस्‍त ज्‍यादा व समाज सेवा कम करती है। जहाँ तक साहि‍त्‍य की बात है, यहाँ भी राजनीति‍ हावी होने लगती है। यही बात धर्म की भी है। राजनीति‍ का हस्‍तक्षेप धर्म और साहि‍त्‍य में नहीं होना चाहि‍ये।

संतोष : आपकी कवि‍ताओं का अनुवाद हि‍न्‍दी, अंग्रेजी और अन्‍य भारतीय भाषाओं में हुआ है। क्‍या कवि‍ता का अनुवाद न्‍यायोचि‍त है ?
पवि‍त्रन: मैंने अनुवाद पढ़ा है। तमि‍ल कवयि‍त्रि‍यों तथा स्‍पेन की एक हजार साल पुरानी कवि‍ताओं का मलयालम अनुवाद पढ़ा है। उसी प्रकार हि‍न्‍दी में केदारनाथ सिंह और एकांत श्रीवास्‍तव की कवि‍ताओं को अनुवाद के माध्‍यम से पढ़ा। कवि‍ताओं का अनुवाद बहुत ही कठि‍न काम है। एक पौधे को उसकी मि‍ट्टी से उखाड़ कर दूसरी मि‍ट्टी में लगाना अनुवाद है। अगर यह ध्‍यान से नहीं कि‍या गया तो नतीजा बुरा हो सकता है। आप अनुवाद के क्षेत्र में सराहनीय काम कर रहे हैं। साहि‍त्‍य जगत को आप जैसे अनुवादक की जरूरत है जो बडे़ लगन और नि‍ष्‍ठा से अनुवाद के क्षेत्र में कार्यरत हैं। अनुवादक की बदौलत ही एक भाषा का रचनाकार को दूसरी भाषा से परि‍चि‍त हो पाता है।

संतोष : मछली बेचना आपका पेशा है। क्‍या आपको लगता है कि‍ कहीं-न-कहीं एक कवि‍ की छवि‍ को इससे ठेस पहुँची है?
पवि‍त्रन : पाठकों से मेरा अनुरोध है कि‍ मेरी कवि‍ताओं को स्‍वीकारें, न कि‍ मेरे पेशे पर जायें। पापी पेट को पालने के लि‍ये मैं बाजार में मछली बेचता हूँ। हाँ, कभी-कभी साहि‍त्‍यि‍क खेमों में मुझे अपने पेशे के कारण वह आदर नहीं मि‍लता जो मुझे मि‍लना चाहिये।

लेकि‍न यह बताते हुए मुझे गर्व महसूस होता है कि‍ केरल में खासकर मलबार इलाके के कई प्रसि‍द्ध कॉलेजों में मुझे मुख्‍य अति‍थि‍ के रूप में आमंत्रि‍त कि‍या गया। मुझे कई साहि‍त्‍यि‍क कार्यक्रमों का उद्घाटन करने का सौभाग्‍य मि‍ला। यह सब इस बात का सबूत है कि‍ लोग मेरे पेशा नहीं, बल्‍कि‍ मेरी कवि‍ताओं को चाहते हैं। यही नहीं केरल में इंटरमीडि‍एट और बी.ए. मलयालम के लि‍ये मेरी कवि‍ताओं को चुना गया है। इससे ज्‍यादा खुशी मेरे लि‍ये क्‍या हो सकती है।

संतोष : आपको अब तक प्राप्‍त पुरस्‍कारों के बारे में कुछ बताएं?
पवि‍त्रन: मुझे अब तक लगभग बारह पुरस्‍कार मि‍ल चुके हैं। उनमें प्रमुख हैं- कनक श्री पुरस्‍कार, इंडि‍यन जेसीस पुरस्‍कार, आशान पुरस्‍कार, रहीम एचेरी पुरस्‍कार, पंतजलि‍ पुरस्‍कार और कैरली पुरस्‍कार।

संतोष : आपकी नई योजनाएं क्‍या हैं? कोई नया काव्‍य संग्रह नि‍कट भवि‍ष्‍य में प्रकाशि‍त होने वाला है?
पवि‍त्रन : डी.सी. बुक्‍स की ओर से मेरा नया कवि‍ता संग्रह प्रकाशि‍त होने वाला है। पहली बार एक उपन्‍यास लि‍ख रहा हूँ। इस यात्रा (आंध्र प्रदेश की यात्रा) के आधार पर आंध्र प्रदेश के स्‍कैचस शीर्षक से कुछ नई कवि‍तायें लि‍खी हैं और कुछ वापस जाकर लि‍खूँगा।

संतोष : आशा करता हूँ कि‍ आप ज्‍यादा कवि‍तायें लि‍खें और आपको ज्‍यादा कामयाबी मि‍ले। आपने समय दि‍या इसके लि‍ये आभारी हूँ।
पवि‍त्रन : धन्‍यवाद आपको भी। अनुवाद के क्षेत्र में आप और भी नये रचनाकारों को परि‍चि‍त करायें।

भाषा हमारे अस्तित्व का मूल : नोम चोम्‍स्‍की

नोम चोम्‍स्‍की

वि‍श्‍व वि‍ख्‍यात भाषावैज्ञानि‍क, दार्शनि‍क, वामपंथी लेखक नोम चोम्‍स्‍की ने भाषाविज्ञान संबंधी कई क्रान्‍ति‍कारी सिद्धांतों का सूत्रपात किया। भाषा और भाषा के वि‍कास को लेकर उनका यह साक्षात्‍कार वि‍ज्ञान पत्रि‍का ‘डि‍स्‍कवर’ में 29 नवम्‍बर, 2011 को प्रकाशि‍त हुआ था। उनसे यह बातचीत ‘डिस्कवर’ के संवाददाता वेलरी रॉस ने की थी। इसका अनुवाद वरि‍ष्‍ठ लेखक-पत्रकार आशुतोष उपाध्‍याय ने कि‍या है

सदियों से विशेषज्ञ यह मानते रहे कि हर भाषा अनूठी होती है। फिर एक दिन 1956 में भाषाविज्ञान के एक युवा प्रोफेसर ने शीर्ष अमेरिकी शिक्षा संस्थान एमआईटी में सूचना सिद्धांत पर आयोजित एक गोष्ठी में अपना ऐतिहासिक भाषण दिया। उन्होंने तर्क दिया कि प्रत्येक अर्थपूर्ण वाक्य न सिर्फ अपनी भाषा के नियमों का, बल्कि सभी भाषाओं पर लागू होने वाले वैश्‍वि‍क व्याकरण का भी पालन करता है। यही नहीं, बच्चे बड़ों की बातचीत की नकलकर या अपने बाहरी परिवेश से भाषा सीखने के बजाय भाषा में महारत प्राप्त करने की अंदरूनी क्षमता से परिपूर्ण होते हैं। यह एक ऐसी शक्ति है जो जैविक विकास ने सिर्फ हम मनुष्यों को सौंपी है। युवा प्रोफेसर के इस क्रान्‍ति‍कारी विचार ने रातोंरात भाषाविदों की सोच को बदलने की शुरुआत कर दी।

एवराम नोम चोम्स्की का जन्म 7 दिसंबर, 1928 को अमेरिकी नगर फिलाडेल्फिया में हुआ था। उनके पिता विलियम चोम्स्की हिब्रू भाषा के विद्वान थे और माँ एल्सी सिमोनोफ्स्की भी विदुषी व बाल पुस्तकों की लेखिका थीं। नोम ने बचपन में ही मध्यकालीन हिब्रू व्याकरण पर अपने पिता द्वारा लिखी पांडुलिपि पढ़ डाली, जिसने उनके भविष्य के काम की जमीन तैयार की। सन् 1955 तक वह एमआईटी में भाषाविज्ञान पढ़ाने लगे। यहाँ रहकर उन्होंने अपने भाषाविज्ञान संबंधी क्रान्‍ति‍कारी सिद्धांतों का सूत्रपात किया। चोम्स्की उस नजरिए को चुनौती देते हैं, जिससे हम आज भी खुद को देखते हैं। वह कहते हैं, ‘भाषा हमारे अस्तित्व का मूल है। हम हर वक्त भाषा में लीन रहते हैं। जब हम सड़क पर चल रहे होते हैं तो खुद से अपनी बातचीत को रोकने के लिए जबर्दस्त इच्छाशक्ति की जरूरत पड़ती है। क्योंकि खुद के साथ हमारी बातचीत निरंतर चलती रहती है।’

चोम्स्की ने राजनीति से दूरी बनाए रखने की वैज्ञानिकों की परम्‍परा के विपरीत सक्रिय राजनीति में बढ़चढ़कर हिस्सा लिया। वह वियतनाम में अमेरिकी आक्रमण के मुखर विरोधी थे और उन्होंने 1967 के प्रसिद्ध पेंटागन विरोधी मार्च के आयोजन में भी मदद दी। जब इस आंदोलन के नेता गिरफ्तार कर लिये गये तो उन्हें जेल में नॉर्मन मेलर के साथ रखा गया। मेलर ने अपनी पुस्तक ‘आर्मीज ऑफ द नाइट’ में चोम्स्की को, ‘दुबला-पतला, तीखे नाक-नक्श और खास लहजे वाला ऐसा शख्स बताया, जिसकी सोहबत में भलमनसाहत व दृढ़ नैतिक बल की महक आती है।’

चोम्स्की के साथ यहाँ पेश की जा रही बातचीत कनेक्टीकट की पत्रकार मैरिऑन लांग के साथ कई तयशुदा बैठकों के निरस्त होने के बाद की गई। लॉग बताती हैं, ‘वह चोम्स्की के लिये बहुत मुश्किल समय था। पत्नी गम्‍भीर रूप से बीमार थीं और वह उनकी सेवा में जुटे थे। इस बातचीत के महज 10 दिन पहले वह गुजर गईं। इस हादसे के बाद चोम्स्की का यह पहला साक्षात्कार होना था लेकिन वह इसके लिये राजी हो गए।’ बाद में उन्होंने ‘डिस्कवर’ संवाददाता वेलरी रॉस को कई सवालों के जवाब दिये।

आप इंसानी भाषा को अनोखा गुण बताते हैं। कौन सी बात इसे खास बनाती है?

मनुष्य दूसरे प्राणियों से फर्क हैं और इस लिहाज से हर मनुष्य मूलत: एक जैसे होते हैं। अगर अमेजन के शिकार-संग्राहक आदिवासी समुदाय के किसी बच्चे को बोस्टन में पाला-पोसा जाये तो वह भाषाई क्षमता के मामले में यहाँ पल-बढ़ रहे मेरे बच्चों से जरा भी फर्क नहीं होगा। इससे उलटी परिस्थिति में भी यही होगा। यानी बोस्टन का कोई बच्चा अमेजन आदिवासियों के बीच पले-बढ़े तो उनकी भाषा-बोली सजह ढंग से बोलने लगेगा। यह अनोखा इंसानी खजाना, जो हम सब के पास है, हमारी संस्कृति व हमारे कल्पनाशील बौद्धिक जीवन के बड़े हिस्से का बुनियादी तत्व है। इसी वजह से हम योजनाएँ बना पाते हैं, सृजनात्मक कलाकर्म करते हैं और जटिल समाजों का निर्माण कर लेते हैं।

भाषा की इस ताकत का जन्म कब और कैसे हुआ?

अगर आप पुरातात्विक अभिलेखों को देखें तो करीब डेढ़ लाख से 75 हजार वर्ष पूर्व समय की एक छोटी सी खिड़की में रचनात्मक विस्फोट होता दिखाई पड़ता है। इस काल में अचानक जटिल हस्तशिल्प, प्रतीकात्मक निरूपण, आकाशीय घटनाओं का मापन तथा जटिल सामाजिक संरचनाओं जैसी सृजनात्मक गतिविधियों का विस्फोट देखने को मिलता है। प्रागैतिहासिक काल का लगभग हर विशेषज्ञ इस घटना को भाषा से औचक उद्भव के साथ जोड़ता है। ऐसा नहीं लगता कि इस घटना का मानव के शारीरिक बदलावों से कोई संबंध है; आज के इंसान के बोलने व सुनने के तंत्र बिल्कुल वैसे ही हैं जैसे छह लाख साल पहले के मनुष्य के थे। मगर मनुष्य में अभूतपूर्व संज्ञानात्मक बदलाव आया है। कोई नहीं जानता क्यों?

इंसानी भाषा में आपकी दिलचस्पी कब शुरू हुई?

बहुत छोटी उम्र में मुझे अपने पिता से आधुनिक हिब्रू साहित्य व दूसरी पाठ्य सामग्री पढ़ने को मिली। 1940 के आसपास उन्हें फिलाडेल्फिया की एक हिब्रू संस्था ड्रॉप्सी कॉलेज से पीएच.डी. की डिग्री मिली। वह सीमेटिक थे और मध्यकालीन हिब्रू व्याकरण पर काम करते थे। मुझे याद नहीं कि मैंने अपने पिता की किताब के आधिकारिक तौर पर प्रूफ पढ़े थे या नहीं, लेकिन मैंने उसे पढ़ा जरूर था। कुछ हद तक व्याकरण संबंधी आम समझ मुझे इसी किताब से मिली। लेकिन इससे पीछे जाएँ तो व्याकरण के अध्ययन का मतलब था, ध्वनियों को व्यवस्थित करना, कालों को देखना,  इन चीजों को सूचीबद्ध करना और यह देखना कि ये एक-दूसरे के साथ कैसे जुड़ती हैं।

भाषाविद् ऐतिहासिक व्याकरण और विवरणात्मक व्याकरण में फर्क करते हैं। इन दोनों में क्या अंतर है?

ऐतिहासिक व्याकरण कुछ इस तरह का अध्ययन है- जैसे, किस तरह आधुनिक अंग्रेजी का मध्यकालीन अंग्रेजी से विकास हुआ। किस तरह मध्यकालीन, प्रारम्‍भि‍क व पुरानी अंग्रेजी से निकली और किस तरह वह जर्मेनिक से और जर्मेनिक उस भाषा स्रोत से विकसित हुई जिसे हम प्रोटो-इंडो-यूरोपियन कहते हैं और जिसे कोई नहीं बोलता इसलिए इसे फिर से गढ़ना पड़ता है। भाषाएं समय के साथ कैसे विकसित होती हैं, यह इस बात को पुनर्निर्मित करने का एक प्रयास है। आप इसे जैविक उद्वि‍कास (बायोलॉजिकल इवोल्यूशन) के अध्ययन के समकक्ष मान सकते हैं। विवरणात्मक व्यापकरण किसी समाज या व्यक्ति विशेष के लिये मौजूदा भाषाई व्यवस्था को जानने का प्रयास है। आप इस अंतर को जैविक विकास और मनोविज्ञान के बीच फर्क की तरह देख सकते हैं।

और आपके पिता के जमाने के भाषाविद्, वे क्या करते थे?

वे वास्तविक धरातल पर इस्तेमाल की जा रही भाषाई विधियों पर काम करते थे। उदाहरण के लिये अगर आप चेरोकी के व्याकरण पर काम करना चाहते हैं तो आप उस समुदाय के बीच जायेंगे। और स्थानीय बोलने वालों से सूचनाएं इकट्ठा करेंगे।

ये भाषाविद् किस तरह के सवाल पूछते थे?

मान लीजिये आप चीन से आये मानवशास्त्रीय भाषाविद् हैं और मेरी भाषा का अध्ययन करना चाहते हैं। पहली बात आप यह जानना चाहेंगे कि मैं किस तरह की ध्वनियों का इस्तेमाल करता हूँ। और फिर आप पूछेंगे कि ये ध्वनियाँ एक साथ कैसे जुड़ती हैं। उदाहरण के लिये मैं ‘ब्निक’ न बोल कर ‘ब्लिक’ क्यों बोलता हूँ और इन ध्वनियों को कैसे व्यवस्थित किया जाता है? उन्हें किस तरह जोड़ा जाता है? अगर आप उस ढंग को देखें, जिसके मुताबिक शब्द के ढाँचे को व्यवस्थित किया जाता है,  तो क्या किसी क्रिया में भूतकाल भी होता है? अगर होता है तो क्या यह क्रिया के बाद होता है या इसके पहले? या यह किसी और तरह की चीज है? और आप इसी तरह के कई और सवाल पूछते चले जाते हैं?

लेकिन आप तो इस नजरिए से सहमत नहीं थे. क्यों?

मैं उस वक्‍त पेन यूनिवर्सिटी में था और मेरी ग्रेजुएट थीसिस का शीर्षक था- बोलचाल की हिब्रू का आधुनिक व्याकरण। इस भाषा की मेरी समझ खासी अच्छी थी। मैंने भी इस पर ठीक उसी तरह काम करना शुरू किया, जैसा हमें उस वक्‍त पढ़ाया जाता था। मुझे एक हिब्रूभाषी सूचनादाता मिला,  जिससे मैंने सवाल पूछने शुरू किए और मुझे

आँकड़े मिलने लगे। एक मौका ऐसा आया कि अचानक मुझे लगा: क्या बेहूदगी है! मैं ऐसे सवाल पूछ रहा हूँ, जिनके जवाब मैं पहले से ही जानता हूँ।

जल्द ही आपने भाषाविज्ञान में अपने शोध की निहायत नई विधि विकसित कर ली। ये विचार कैसे जन्मे?

इससे पहले 1950 में, जब मैं हारवर्ड में स्नातक छात्र था, यह आम धारणा थी कि अन्य मानवीय गतिविधियों की तरह भाषा भी सीखी जाने वाली आदतों का एक संग्रह है। यह उसी तरह सीखी जाती है जैसे पालतू जानवर प्रशिक्षित किये जाते हैं। यानी प्रबलीकरण के जरिये। उन दिनों यह धारणा एक तरह से अंधविश्‍वास की तरह व्याप्त थी। लेकिन हम दो या तीन लोग ऐसे थे, जो इस बात से सहमत नहीं थे और हमने चीजों को बिल्कुल अलग तरह से देखना शुरू किया।

खासतौर पर, हमने कुछ बुनियादी तथ्यों पर गौर किया: प्रत्येक भाषा अनगिनत सुव्यवस्थित अभिव्यक्तियों को गढ़ने और प्रकट करने का एक माध्यम है, जिसमें हर अभिव्यक्ति की एक अर्थगत व्याख्या और ध्वन्यात्मक रूप है। इसलिए यहाँ ऐसी चीज है जिसे हम जेनरेटिव प्रोसीजर कहते हैं, अनगिनत वाक्यों या अभिव्यक्तियों को पैदा करने और उन्हें अपने विचार व स्नायुतंत्र से जोड़ने की क्षमता। हमें हर बार इस केन्‍द्रीय गुण को ध्यान में रखकर शुरुआत करनी होती है। व्यवस्थित अभिव्यक्तियों और उनके अर्थ के बेरोकटोक उत्पादन का गुण। हमारे ये विचार बाद में उस सिद्धांत के रूप में घनीभूत हुये जिसे आज हम बायोलिंग्विस्टिक फ्रेमवर्क कहते हैं। यह सिद्धांत भाषा को मानव जीवविज्ञान के एक तत्व के रूप में देखता है, ठीक वैसे ही जैसे हमारा दृष्टि तंत्र है।

आपका सिद्धांत है कि सभी मनुष्यों का एक वैश्‍वि‍क व्याकरण होता है। इस बात का क्या अर्थ है?

इसका मतलब इंसानी भाषा संकाय की आनुवांशिक जड़ों से है। उदाहरण के लिये आप अपने अंतिम वाक्य पर गौर करें। यह ध्वनियों का बेतरतीब क्रम नहीं है। आपने शब्दों का अत्यंत सुनिश्‍चि‍त ढाँचा खड़ा किया है और इसका अत्यंत विशिष्ट भाषाई अर्थ है। इसका एक खास मतलब है,  कोई दूसरा मतलब नहीं और इसकी एक खास ध्वनि है, दूसरी नहीं। बताइए, आपने यह किया कैसे? यहाँ दो संभावनाएँ हो सकती हैं। एक,  इसे एक चमत्कार मान लिया जाय। या दूसरी,  आपके पास नियमों की एक आंतरिक व्यवस्था है जो शब्दों के ढाँचे और उसके अर्थ को निर्धारित करती है। मैं नहीं समझता यह एक चमत्कार की देन है।

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आपके भाषावैज्ञानिक विचारों पर शुरुआत में कैसी प्रतिक्रियाएं हुईं?

शुरू-शुरू में ज्यादातर लोगों ने हमारे विचारों को खारिज किया या इनकी उपेक्षा की। यह बिहेवियरल साइंस का दौर था, मानव क्रियाओं और व्यवहार का अध्ययन,  जिसमें व्यवहार का नियंत्रण तथा रूपांतरण भी शामिल किया जाता है। बिहेवियरिज्म कहता है कि आप किसी व्यक्ति को मनचाहे रूप में बदल सकते हैं,  बशर्ते आप उसके परिवेश व प्रशिक्षण पद्धति को ठीक से व्यवस्थित कर सकें। मनुष्य के रूपांतरण में आनुवांशिक घटक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, इस विचार को अजनबी बताकर हल्के में लिया गया।

बाद में मेरे इस विधर्मी विचार को ‘इन्नेटनेस हाइपोथीसिस’ का नाम दे दिया गया और इसकी भर्त्‍सना में रचे गये साहित्य का ढेर लग गया। आज भी आप प्रमुख शोध पत्रिकाओं में ऐसे सूत्रवाक्य पढ़ सकते हैं कि भाषा सिर्फ संस्कृति, परिवेश तथा प्रशिक्षण का परिणाम है। एक तरह से यह धारण हमारे सहजबोध का हिस्सा बना दी गई है। हम सब भाषा सीखते हैं, चाहे वह कितनी भी मुश्किल क्यों न हो। हम पाते हैं कि परिवेश भी अपना असर छोड़ता है।

इंग्लैंड में पलने-बढ़ने वाले लोग अंग्रेजी बोलते हैं, स्वाहिली नहीं। और वास्तविक सिद्धांत- वे हमारी चेतना तक नहीं पहुँच पाते। हम अपने भीतर झाँककर उन छुपे हुए सिद्धांतों को नहीं देख सकते जो हमारे भाषाई व्यवहार को निर्धारित करते हैं। और हम उन सिद्धांतों को भी नहीं देख सकते जो हमें अपने शरीर को हिलाने की इजाजत देते हैं। यह भीतर ही भीतर होता रहता है।

भाषा वैज्ञानिक इन छुपे हुए सिद्धांतों की खोज कैसे कर लेते हैं?

आप आँकड़ों को संग्रहकर किसी भाषा के बारे में जानकारी हासिल कर सकते हैं। मसलन- मेरी भाषा का अध्ययन कर रहा चीनी भाषाविद् इस बारे में मुझे से सवाल पूछकर जवाब इकट्ठा कर सकता है। यह एक तरह का संग्रह होगा। दूसरे तरह का संग्रह यह हो सकता है कि लगातार तीन दिन तक जो कुछ मैं बोलूँ उसे वह टेप करता रहे। और किसी भाषा को सीखते और इस्तेमाल करते वक्‍त लोगों के दिमाग में जो कुछ चल रहा है, उसका अध्ययन कर आप भाषा के बारे में जाँच-पड़ताल कर सकते हैं। आज के भाषाविदों को चाहिए कि वे उन नियमों व सिद्धांतों पर ध्यान देने का प्रयास करें जिन्हें,  उदाहरण के लिए, आप ठीक इस वक्त मेरे द्वारा गढ़े जा रहे वाक्यों का अर्थ निकालने और उन्हें समझने या फिर अपने वाक्यों को बनाने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।

क्या यह व्याकरण की उस पुरानी व्यवस्था जैसा नहीं, जिसे आप पहले ही खारिज कर चुके हैं?

नहीं। व्याकरण के परम्‍परागत अध्ययन में आप ध्वनियों व शब्द रचना पर ध्यान देते हैं और शायद थोड़ा बहुत वाक्य विन्यास पर। पिछले 50 वर्षों के उत्पादक भाषाविज्ञान (जेनरेटिव लिंग्विस्टिक्स) में आप, मसलन, यह पूछ रहे हैं कि प्रत्येक भाषा के लिए नियमों व सिद्धांतों का वह कौन सा तंत्र है जो व्यवस्थित अभिव्यक्तियों की अनगिनत शृंखलाओं को तय करता है?  इसके बाद आप उन्हें एक निश्‍चि‍त व्याख्या से जोड़ते हैं।

हमारी भाषाई समझ के साथ क्या मस्तिष्क छवियाँ जुड़ी हुई हैं?

मिलान के एक ग्रुप ने हाल ही में भाषा के साथ होने वाली मस्तिष्क की क्रियाशीलता संबंधी एक दिलचस्प अध्ययन किया है। उन्होंने अपने शोधपात्रों को निरर्थक भाषाओं वाली दो तरह की लिखित सामग्री दी। इनमें एक प्रतीकात्मक भाषा थी, जिसे इतावली भाषा के नियमों के आधार पर गढ़ा गया था, हालाँकि शोधपात्र इसे नहीं जानते थे। दूसरी को वैश्‍वि‍क व्याकरण के नियमों का उल्लंघन कर तैयार किया गया था। एक खास मामले में, माना आप किसी वाक्य का निषेध करना चाहते हैं, ‘जॉन यहाँ था, जॉन वहाँ नहीं था।’ कुछ निश्‍चि‍त चीजें हैं जिन्हें करने की इजाजत भाषाओं में आपको दी जाती है। आप ‘नहीं’ शब्द को कुछ स्थानों में रख सकते हैं लेकिन कुछ अन्य स्थानों में नहीं रख सकते। इसलिए पहली मनगढ़ंत भाषा में आप निषेधकारी तत्व को किसी स्वीकार्य जगह पर रखते हैं, जबकि दूसरे में आप इसे अस्वीकार्य जगह पर रख देते हैं। मिलान ग्रुप ने पाया कि स्वीकार्य निरर्थक वाक्य के साथ मस्तिष्क के भाषाई क्षेत्र में सक्रियता दिखाई देती है लेकिन अस्वीकार्य वाक्य- वे जो वैश्‍वि‍क व्याकरण के नियमों का उल्लंघन करते हैं- मस्तिष्क में कोई सक्रियता पैदा नहीं करते। इसका मतलब यह हुआ कि लोग अस्वीकार्य वाक्यों के साथ भाषा की तरह नहीं बल्कि पहेली की तरह खेल रहे थे। यह एक शुरुआती परिणाम है, लेकिन यह स्पष्ट रूप से संकेत देता है कि भाषाओं की पड़ताल से निकलने वाले भाषाई सिद्धांतों का दिमागी क्रियाशीलता के साथ गहरा रिश्ता है, जैसी कि किसी को उम्मीद और अपेक्षा हो सकती है।

हाल के आनुवांशिक अध्ययन भी भाषा के बारे में कुछ इसी तरह के संकेत देते हैं. क्या यह सही है?

हाल के वर्षों में एक जीन की खोज हुई है, जिसका नाम है- फॉक्सपी2। यह जीन खासतौर पर दिलचस्प है, क्योंकि इसमें किसी किस्म का उलटफेर (म्युटेशन) होने पर भाषाई इस्तेमाल संबंधी कमजोरियाँ सामने आने लगती हैं। इस जीन को उस क्रिया से जोड़ा जाता है जिसे हम ऑरोफेशियल एक्टीवेशन कहते हैं,  यानी बोलते वक्त हम अपने मुँह, अपने चेहरे और जीभ को किस प्रकार नियंत्रित करते हैं। इसलिये फॉक्सपी2 का संभवत: भाषा के इस्तेमाल के साथ कोई रिश्ता है। यह जीन सिर्फ मनुष्यों में ही नहीं, बल्कि कई अन्य प्राणियों में भी पाई जाती है और अलग-अलग प्रजातियों में अलग-अलग ढंग से काम करती है। ये जीन कोई एक काम नहीं करतीं। लेकिन इस खोज को भाषा के कुछ पहलुओं के आनुवांशिक आधार की मौजूदगी की पुष्टि की दिशा में एक दिलचस्प शुरुआती कदम माना जा सकता है।

आप कहते हैं कि जन्मजात भाषाई क्षमता मनुष्यों की विशिष्टता है, मगर फॉक्सपी2 की सततता कई प्रजातियों में देखी गई है। क्या ये दोनों बातें परस्पर विरोधाभासी नहीं हैं?

यह बात लगभग अर्थहीन है कि इसमें प्रजातिगत सततता है। इसमें किसी को संदेह नहीं कि मनुष्य का भाषाई तंत्र जीन, तंत्रिका तंत्र आदि पर आधारित है। भाषा के प्रयोग, समझ, अधिग्रहण और निर्माण में शामिल पद्धतियाँ एक स्तर तक सम्‍पूर्ण जंतु जगत में दिखाई देती हैं। और सच कहें तो सम्पूर्ण जीव जगत में दिखाई देती हैं। कुछेक को तो आप जीवाणुओं में भी देख सकते हैं। लेकिन यह बात इसके उद्विकास या समान मूल से पैदा होने का शायद ही कोई संकेत देती हैं। भाषा उत्पन्न करने जैसे विशिष्ट मामले में कोई प्रजाति अगर मनुष्य के सबसे ज्यादा नजदीक कही जा सकती है, तो वह हैं पक्षी। लेकिन इसकी वजह समान उद्गम नहीं है। यह एक अलग परिघटना है, जिसे हम कनवर्जेंस कहते हैं- लगभग एक जैसी व्यवस्थाओं का अलग-अलग स्वतंत्र रूप से विकास। फॉक्सपी2 खासी दिलचस्प है मगर यह ज्यादातर भाषा के हाशिए पर रहने वाले हिस्सों का निर्धारण करती है, जैसे भाषा का (भौतिक) उत्पादन। इसके बारे में जो कुछ भी खोजा जा रहा है, उसका भाषावैज्ञानिक सिद्धांतों पर प्रभाव पड़ने की सम्‍भावना बहुत कम है। पिछले 20 वर्षों से आप भाषा की ‘सरलतम’ (मिनिमलिस्ट) समझ पर काम कर रहे हैं। इसकी क्या जरूरतें हैं?

मान लीजिए भाषा बर्फ के एक फाहे की तरह है। यह प्रकृति के नियम के मुताबिक आकार ग्रहण करती,  इस शर्त के साथ कि यह बाहरी निर्धारकों को संतुष्ट करती है। भाषा की खोज के बारे में इस नजरिए को मिनिमलिस्ट प्रोग्राम कहा जाता है। मैं समझता हूँ,  इसने कुछ महत्वपूर्ण परिणाम दिये हैं। इसने दिखाया है कि भाषा यकीनन कुछ शब्दार्थ संबंधी अभिव्यक्तियों का आदर्श हल है लेकिन स्पष्ट अभिव्यक्त के लिहाज से बहुत खराब तरीके से डिजाइन है। एक विशिष्ट आवाज निकाल कर आप ‘बेसबॉल’ कहते हैं, इसके लिये ‘पेड़’ नहीं कहते।

भाषाविज्ञान में सामने बड़े सवाल कौन से हैं?

अब भी कई अनुत्तरित रिक्त स्थान हैं। कुछ सवाल ‘क्या’ से शुरू होने वाले हैं। जैसे- भाषा क्या है? इस वक्त आप और मैं जो कुछ कर रहे हैं, उसके नियम और सिद्धांत क्या हैं? कुछ और सवाल ‘कैसे’ से शुरू होते हैं: आपने और मैंने इस क्षमता को कैसे हासिल किया। हमारे आनुवांशिक भंडार व अनुभवों में और प्रकृति के नियमों में आखिर क्या छुपा हुआ है? और इसके बाद ‘क्यों’ से शुरू होने वाले सवाल हैं, जो सबसे कठिन हैं: भाषा के नियम ऐसे ही क्यों है, कुछ और तरह के क्यों नहीं? किस हद तक यह सही है कि भाषा का बुनियादी डिजाइन उन बाहरी शर्तों के अनुकूल हल पेश करता है, जिन्हें भाषा अपरिहार्य रूप से पूरा करती है? यह एक बड़ी समस्या है। भाषा की प्रकृति के बार में जो कुछ हम जानते हैं उसे हम किस हद तक मस्तिष्क में होने वाली क्रियाओं से जोड़कर देख सकते हैं? और अंतत: क्या भाषा के आनुवांशिक आधार के बारे में कोई गम्‍भीर पड़ताल हुई है? इस सभी बिंदुओं पर बेशक प्रगति दिखाई देती है लेकिन बड़े रिक्त स्थान अब भी बने हुए हैं।

हर माता-पिता इस बात पर हैरान होते हैं कि किस तरह बच्चे भाषा सीखते हैं। यह बात सहसा अविश्वसनीय लगती है कि इस प्रक्रिया के बारे में हम अब भी बहुत कम जानते हैं।

आज हम जानते हैं कि जन्म के समय एक शिशु को अपनी माँ की भाषा के बारे में बहुत थोड़ी जानकारी होती है। अगर कोई दो भाषाएँ जानने वाली कोई महिला उसके सामने बोले तो वह अपनी मातृभाषा और दूसरी भाषा के बीच फर्क समझ सकता है। उसके परिवेश में तमाम तरह की चीजें घट रही होती हैं, जिसे विलियम जेम्स ‘बढ़ता, उभरता विभ्रम’ कहते हैं। मगर शिशु किसी तरह इस जटिल परिवेश से खुद ब खुद उन आँकड़ों को छाँट लेता है, जो भाषा से संबंध रखते हैं। कोई भी दूसरा प्राणी ऐसा नहीं कर पाता। एक चिम्पांजी ऐसा नहीं कर पाता। और बहुत जल्दी व स्वत: ढंग से शिशु एक आंतरिक तंत्र हासिल करने की दिशा में बढ़ जाता है। यह तंत्र अंतत: उस क्षमता के रूप में प्रकट होता है, जिसका इस्तेमाल हम इस वक्त कर रहे हैं। शिशु के दिमाग में क्या चल रहा है? मानव जीनोम के कौन से तत्व इस प्रक्रिया में योगदान कर रहे हैं? ये चीजें कैसे विकसित होती हैं? इन बातों को ठीक से समझना अभी बाकी है।

उच्चतर स्तर पर अर्थ के बारे में क्या कहेंगे? जो महान गाथाएँ लोग पीढ़ी दर पीढ़ी सुनाते आए हैं, उनके विषय बार-बार दोहराए जाते हैं। क्या यह दोहराव मनुष्य की जन्मजात भाषा के बारे में कुछ संकेत देता है?

जानी-पहचानी परीकथाओं में से एक कहानी एक खूबसूरत राजकुमार की है, जिसे कोई दुष्ट जादूगरनी मेढक में बदल देती है। कहानी के अंत में एक सुन्‍दर राजकुमारी आकर मेढक को चूमती है और वह फिर से राजकुमार में बदल जाता है। हर बच्चा इस बात को जानता है कि वह मेढक दरअसल राजकुमार है, लेकिन उन्हें यह कैसे पता चलता है? वह अपने प्रत्येक शारीरिक गुण के हिसाब से मेढक है। कौन सी बात उसे राजकुमार बनाती है? यह पता चलता है कि यहाँ एक नियम काम करता है: लोगों व जन्तुओं तथा अन्य जीवित प्राणियों को हम उनके एक गुण से पहचानते हैं, जिसे मनोवैज्ञानिक सततता (साइकिक कंटीन्युइटी) कहा जाता है। बच्चे उसकी पहचान एक तरह के दिमाग या आत्मा या एक ऐसे अंदरूनी तत्व के रूप में करते हैं जो उनके भौतिक गुणों से स्वतंत्र है। वैज्ञानिक इस बात पर विश्‍वास नहीं करते लेकिन हर बच्चा करता है और हर मनुष्य जानता है कि इस तरह दुनिया की व्याख्या कैसे की जाती है।

आपकी बातों से ऐसा लगता है जैसे भाषाविज्ञान का विज्ञान बस शुरू ही हुआ है।

भाषा के बारे में कई ऐसे सरल विवरणात्मक तथ्य हैं, जिन्हें समझा नहीं गया है: वाक्य किस तरह अपना अर्थ हासिल करते हैं? उनकी आवाज कैसे बनती है? किस प्रकार दूसरे लोग उन्हें समझ लेते हैं? भाषा संगणना (कंप्यूटेशन) में एक-रेखीयता (लीनियर ऑडर) का पालन क्यों नहीं करती? उदाहरण के लिए एक सरल वाक्य लीजिए, जैसे ‘क्या उड़ रहे गिद्ध तैरते हैं?’ आप इसे समझते हैं, हर कोई इसे समझता है। एक बच्चा इसे इस प्रश्‍न के रूप में लेता है कि क्या गिद्ध तैर सकते हैं। सवाल में यह नहीं पूछा जा रहा है कि क्या वे उड़ सकते हैं। आप कह सकते हैं, ‘क्या जो गिद्ध उड़ रहे हैं तैरते हैं?’ मतलब क्या इसे यह माना जाए कि गिद्ध जो उड़ रहे हैं तैरते हैं? ये वे नियम हैं, जिन्हें हर कोई जानता है, बिना सोचे-समझे जान लेता है। लेकिन क्यों? यह अब भी एक रहस्य है। और इन नियमों के स्रोत मूतल: अनजान हैं।

दुनिया नाक रगड़ कर हिंदी के पास आएगी : अरविंद कुमार

पेंगुइन वाले कोश के विमोचन पर बोलते अरविंद कुमार

ऐसे सौभाग्यशाली लोग बहुत ही कम होते हैं जिन्हें अपने सपने साकार करने में पूरे परिवार का निरंतर सहयोग मिले। विशेषकर ऐसे जोख़िमभरे सपने जिस में स्वप्नद्रष्टा को अपनी अच्छी भली नौकरी छोड़नी हो, अनुदान तो दूर की बात है, कहीं से कैसी भी आर्थिक सहायता न मिलने वाली हो, जिनका पूरा होना भी अनिश्चित हो। इतना ही नहीं, जिसके रास्ते में एक के बाद एक भारी से भारी अड़चन आती रहे, फिर भी किसी का मनोबल न टूटे, ऐसी मिसालें दुनिया में कुछ कम ही हैं। अरविंद कुमार ऐसे ही सौभाग्यशाली व्यक्ति हैं। प्रस्तुत हैं उनसे अनुराग की बातचीत के कुछ अंश-

आपको शलाका सम्‍मान प्रदान किया गया। आपकी क्‍या प्रतिक्रिया है?

कभी सपने में भी कल्पना नहीं थी कि मेरे साथ ऐसा कुछ होगा। ग़ालिब के शब्दों में इतना ही कह सकता हूं– बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा। हिंदी अकादेमी के उपाध्यक्ष श्री अशोक चक्रधर और उनके चयन मंडल ने मुझे इस योग्‍य समझा—चमत्कृत हूं और बहुत प्रसन्न।

आपको यह नहीं लगता कि भाषा के क्षेत्र में जितना काम किया है, उस हिसाब से आपको समुचित मान-सम्‍मान नहीं मिला ?

काम करने वाले का काम है काम करना, मान-सम्मान करने वाले का काम है मान-सम्मान करना। उनके बारे में मियाँ ग़ालिब के ही अल्फ़ाज़ हैं– चाहिए अच्छों को जितना चाहिए, वे अगर चाहें तो फिर क्या चाहिए। इसका संदर्भ तो बिल्कुल दूसरा है, पर सम्मान देने वालों पर भी चस्पाँ होता है।

जब पंद्रह साल की उमर में बालश्रमिक के रूप में छापेख़ाने में दाख़िल हुआ, तभी से मेरे लिए काम, अपने आप में सम्‍पूर्ण आत्मसम्मान रहा है। कभी किसी से कोई गिला नहीं किया। सन् 45 में ही मैं करोलबाग़, दिल्ली के कांग्रेस सेवादल और आज़ादी के दीवाने एक उग्र दल ‘लालक़िला ग्रुप’ का सदस्य बन गया था। सन् 47 में देश आज़ाद हुआ तो मुझ जैसे कुछ दोस्तों ने देशभक्ति की एक परिभाषा गढ़ी। वह यह कि हर काम मेहनत से करना, ईमानदारी से करना ही 47 के बाद देशभक्ति का पैमाना है। मैं अभी तक उस पर क़ायम हूँ—हर नारेबाज़ी से दूर, जितना कर सकता हूँ, करता हूँ। दूसरों की बात दूसरे जानें।

समांतर कोश’, ‘द पेंगुइन इंग्लिश हिंदी/हिंदी इंग्लिश थिसारस एंड डिक्‍शनरीऔर अब अरविंद लैक्सिकन। क्‍या इन सबके लिए आपको किसी संस्‍थान या सरकार से आर्थिक सहायता या अन्‍य तरह की मदद मिली ? आपने इसके लिए कभी कोशिश की ? इसे लेकर आपको किस तरह के अनुभव हुए।

शुरू में, यानी 1973-74 में कई जगह कोशिश की। किसी-न-किसी बहाने टाल दिया गया। हिंदी के किसी काम के लिए कुछ माँगना सब से बड़ी ज़लालत है। अगर कोई कुछ देता भी है तो पहले सारे काम का श्रेय लेना चाहता है, फिर किसी-न-किसी बहाने टालता रहता है। सहायता के पीछे भागते-भागते न जाने कितना समय निकल जाता। मैंने सोचा, चलो समुद्र में कूद पड़ते हैं, जो होगा देखा जाएगा। एक सहारा बिल्कुल अपना था। दिल्ली के मॉडल टाउन में अपना मकान था। रहन-सहन सादा था। मुंबई में ‘माधुरी’ के संपादन काल की थोड़ी-बहुत बचत थी। सोचा था कि दो साल में थिसारस बनाने का काम पूरा हो जाएगा।

पर ऐसा हुआ नहीं। कहावत है सिर मुँडाते ही ओले पड़े। मुझ पर ओले नहीं पड़े, बारिश पड़ी। 1978 की 21 मई को दिल्ली पहुँचे थे। कुछ ही महीने बीते थे। 4 सितंबर को यमुना की मैनमेड भारी बाढ़ ने हमारे घर को सात फ़ुट तक ग़र्क़ कर दिया। मुंबई का जो भी थोड़ा-बहुत अच्छा सामान था, यमुना में बह गया। घर माँ-बाप और भाई और उसकी पत्नी के लिए छोटा था। बस, यही हमारा तारनहारा बना। ‘समांतर कोश’ का काम हम कार्डोँ पर कर रहे थे। मकान में ऊपर ज़ीने के रास्ते में छः फ़ुट ऊँची, गरमी में आँवे जैसी तपती मियानी थी। वहीं कार्ड जमाए थे। यमुना मैया वहाँ तक नहीं गईं। हमारा भविष्य बच गया। वहीं पूरा टब्बर पाँच दिन टंगा रहा। चारों ओर पानी था। हम बिना किसी ख़र्चे के वैनिस में रहने का मज़ा उठाते रहे। चारों तरफ़ कामचलाऊ किश्तियाँ चलती देखते रहे।

मेरा विश्वास है कि ‘समांतर कोश’ ने अपने होने का संकल्प कर लिया था। वह अपने को तो बचाता रहा, और इसके लिए हर क़दम पर मेरी रक्षा करता रहा।

हिंदी की व्यापारिकता और हिंदी के नाम पर सरकारी तंत्रोँ की कृपणता कई बार दयनीय लगती है। स्वयं हिंदी वाले इसमें आगे बढ़ कर हिस्सा लेते हैं, और हिंदीवालों के शोषण में सहभागी बनते हैं। एक कारण यह है कि हम हिंदी वाले अपना अवमूल्यन आप करते हैँ। हिंदी को इंग्लिश से हीनतर समझने की आदत हमें पड़ गई है। अपने 65 साल के प्रिंटमीडिया और अब कंप्यूटर पर काम के बल पर मैँ कह सकता हूँ कि हम अंगरेजी वालोँ से कहीँ आगे और बढ़ कर हैं।

जब ‘समांतर कोश’ प्रकाशित हुआ तो DOE नाम की एक सरकारी संस्था की ओर से मुझे फ़ोन मिला। फ़ोन पर ही उसे इंटरनेट पर डालने की अनुमति तत्काल चाहते थे। मैंने पछा, ‘बीस-पच्चीस साल के तनदेही के बदले मुझे क्या मिलेगा।’ जवाब मिला, ‘कुछ नहीं। आप यह कोश जनहित में सरकार को दे दीजिए!’ मैँ हक्का बक्का रह गया। फिर एक पल बाद मैंने हिंदी के उन लाभभोक्ता से पूछा कि ‘क्या आप महान जनहित वाली नौकरी अवैतनिक कर रहे हैं। चलिए नहीं, तो भी क्या आप भविष्य में पगार लेना बंद कर देंगे। यदि हाँ तो मैं जनहित के लिए यह कोश सरकार को देने के लिए तत्पर हूँ।’ उधर से फ़ोन काट दिया गया।

इसी प्रकार अब मेरे ई-कोश के लिए मेरी बेटी ने उस विभाग से संपर्क किया। अब भी वही उत्तर था ‘अरविंद लैक्सिकन आप हमें जनहित में दे दीजिए…’

अरविंद कुमार का परिवार– ऊपर बाएं पुत्र सुमीत कुमार, बेटी मीता लाल, दामाद अतुल बिहारी लाल। नीचे बीच में अरविंद कुमार और कुसुम कुमार, बाएँ धेवती तन्वी, दाहिने धेवता अक्षय

जो काम कोई संस्था नहीँ कर सकी, आप ने कर दिखाया। कैसे इतना बड़ा काम कर सके ?

किसी संस्था ने यह काम नहीं किया तो कारण यह था कि किसी संस्था ने ऐसा करने का विचार नहीं किया। भारत सरकार ने कोश निर्माण के लिए कई संस्थाएँ बनाई थीं। जहाँ तक मुझे पता है, किसी के पास ऐसा कार्यक्रम नहीं था। अगर कोई संस्था इसमें लगती तो जो होता वह मैंने जापान में देखा है। 1997 में मुझे वहाँ की भाषा संस्था के निमंत्रण पर विश्‍व में थिसारसों की विशाल गोष्ठी में जाना पड़ा। उस संस्था ने 200 लोगों के स्टाफ़ के साथ लगभग बीस साल में जो थिसारस बनाया था, वह समांतर कोश के सामने पिद्दी-सा था। मेरे पास उनका थिसारस है। शायद अब दस-बारह साल में वह कुछ बड़ा हो गया हो।

आपकी दिनचर्या क्‍या है?

आज जब डाटा का काम एक तरह से पूरा हो चुका है, उसमेँ एक-एक अभिव्यक्ति संस्करणानुसार क्रमांकित हो चुकी, तो भी काम को पूरी तरह पूरा नहीं माना जा सकता। मूल डाटा में शब्दकोशोँ जैसी परिभाषाएँ नहीँ थीँ। आख़िर हम तो थिसारस बना रहे थे, न कि शब्दार्थ कोश। पर अब मुझे लगा कि सभी मुखशब्दों या शीर्षशब्दोँ की हिंदी और इंग्लिश परिभाषाएँ जोड़ दी जाएँ तो ‘अरविंद लैक्सिकन’ और भी उपयोगी हो जाएगा। यह काम अब धीरे-धीरे चल रहा है। लगभग 15 प्रतिशत काम हो गया है। शेष भी कालांतर में हो जाएगा। ऑनलाइन संस्करण का सबसे बड़ा लाभ ही यह है कि इसकी सामग्री जब चाहे परिष्कृत होकर सभी उपभोक्ताओँ को मिल जाती है।

आज भी अकसर मैं सुबह सबेरे पाँच बजे उठ जाता हूँ। आचमन आदि से निवृत्त होकर कंप्यूटर के सामने आ बैठता हूँ। बीच-बीच मेँ नहाने के लिए, नाश्ते के लिए, खाने के लिए ब्रेक लेता रहता हूँ। इससे काम की ऊब से आराम मिल जाता है।

शाम के समय, सात बजते-बजते टीवी के सामने जा बैठता हूँ, तथाकथित सस्ते सोप आपेरा यानी सीरियल सपत्नीक देखता हूँ। इसी बीच शाम का खाना भी हो जाता है।

और हाँ, जब से हमारे इलाक़े में बहुत सारे मल्टीप्लैक्स सिनेमा खुल गए हैँ, तो जब भी मन करता है फ़िल्म देख आते हैं। हर तरह की, अच्छी हो या बुरी– इससे कोई मतलब नहीँ होता। घर से निकलने का बहाना भर होता है। जब तब कोई रंगमंचीय नाटक। या कोई साहित्यिक गोष्ठी- यह बहुत ही कम।

थिसारस की रचना प्रक्रिया क्‍या है। मसलन आप शब्‍दों को कहां-कहां से और कैसे ढूंढते हैं। उनसे जुडे़ शब्‍दों को कैसे ढूंढते हैं। शब्‍दों के बीच के संबंध को ध्‍यान में रखकर उन्‍हें कैसे क्रम देते हैं ?

पहले हमें थिसारस और शब्दकोश का अंतर समझना चाहिए।

थिसारस को हम शब्द सूची भी कह सकते हैं। बस, फ़र्क़ यह है कि इसमें शब्दों का संकलन संदर्भ क्रम से किया जाता है। यह संदर्भ क्या हो, यह तय करना बड़ी टेढ़ी खीर है। अपने अनुभव से बताता हूँ। मूर्खतावश मैंने जब दो साल मेँ हिंदी का थिसारस बना डालने की बात सोची थी, तो रोजेट के थिसारस के आधार पर। मुझे लगा था कि उसका संदर्भ क्रम तो बना बनाया है, उसी के खाँचों में हिंदी के शब्द डालने ही तो हैं। पर बाबा रे, ऐसा संभव नहीं था।

हमने हिंदी कोशोँ के ‘अ’ से शब्द खोजने शुरू किए और उन्हें रोजेट के खाँचों में डालना चाहा तो पता चला कि वहाँ उनके उपयुक्त आर्थी कोटियाँ थीं ही नहीं। वे संदर्भ, वे भाव ही वहाँ नहीं थे। भारत के लिए वह मॉडल बेकार था। हमारे पैरों तले से ज़मीन खिसक गई।

उसका थिसारस 1852 में बना था। 20वीं सदी का साठादिक दशक आते-आते उसके बृहद संस्करण बनने लगे। तब तक रोजेट का क्रम अधूरा मालूम पड़ने लगा था। मूल में कुल छः मुख्य विभाग थे। उनमें दो और जोड़े गए। खेद की बात यह है कि इन बृहद् तथाकथित अंतरराष्ट्रीय संस्करणोँ की रचना रोजेट के उत्तराधिकारियोँ से फ़्रैंचाइज़ लेकर कई प्रकाशकों द्वारा संपादक नियुक्त करवा के की गई। इन लोगों ने ऊपरी टीमटाम मात्र की। इधर-उधर किसी ऐंट्री की क्रम संख्या बदल दी गई– किसी अन्य प्रकाशक का कापीराइट ब्रेक करने भर के लिए। मूल आधार रोजेट का वही पुराना संदर्भ क्रम रहा।

रोजेट वैज्ञानिक थे, और उनका वर्गीकरण विज्ञान पर आधारित था। पर मानव मन वैज्ञानिक वर्गीकरण थोड़े ही जानता है! आम आदमी के लिए गेहूँ का संबंध अनाजों से है। विज्ञान में गेहूँ एक घास है। अतः रोजेट में गेहूँ, केला और घास एक साथ हैं। यह क्रम आम आदमी के काम का हो ही नहीँ सकता। हम स्टील या इस्पात की बात करते हैं, दिमाग़ में लोहा भी आता है। पर रोजेट में इन दोनों में कोई रिश्ता नहीं है। लोहा धातुओं में है,  इस्पात एलौय के अंतर्गत। शेर बिल्ली के साथ है,  रीछ आदि वन्य पशुओं के साथ नहीं।

जब यह आधार छिन गया, तो हमने सोचा कि कोई बात नहीं। हमारा अपना छठी सदी का सुप्रसिद्ध ‘अमर कोश’ तो है ही। उसी को मॉडल बना लेते हैं। यह विचार और भी लचर निकला। कहाँ छठी सदी का वर्णाश्रम से ग्रस्त समाज और कहाँ आज का भारत। ‘अमर कोश’ में संगीत तो नैसर्गिक गतिविधि निकली, गायक शूद्र। कैसे संबंध बैठाएँ, कैसे कहाँ जोड़ें!

आपने अभी बताया कि रोजेट का खाँचा काम नहीं आया और न ही अमर कोश का। ऐसे में आपने कौन-सा तरीका अपनाया?

हम तो एक तरह से मर ही गए थे। कहाँ दो साल में काम पूरा करने की बात सोची थी, कहाँ कामचलाऊ क्रम की तलाश में ही चौदह साल निकल गए। बस,  इतना था कि हमने शब्दों का संकलन एक दिन के लिए भी नहीं रोका। हर विषय और उसके उपविषय के कार्ड एक स्वतंत्र ट्रे में रखते गए। ट्रे हमने अपनी ज़रूरत के हिसाब से बनवाई थीं, और कार्ड भी अपने काम के लिए विशेष रूप से डिज़ाइन किए थे। संदर्भ क्रम बदलना होता तो ट्रेओं का क्रम बदल देते। इसे ही मैँ अपनी शब्दोँ को कोई क्रम देने की तलाश की प्रक्रिया कह सकता हूँ। यह आसान सा तरीक़ा ही हमारे काम आया।

थिसारस का विचार आपके मन में कब आया और आपको यह काम इतना महत्‍वपूर्ण क्‍यों लगा कि आपने जमी-जमाई नौकरी छोड़ दी और अपना जीवन थिसारस को समर्पित कर दिया।

मैं आपको 22-23 साल के एक लड़के से मिलवाता हूँ। इससे पहले वह ‘सरिता’ पत्रिका में उपसंपादक था। शाम के समय सांध्य कॉलेज में पढ़ रहा था। बीए में पहुँचा, और मालिक तथा संपादक विश्‍वनाथ जी ने उसकी इंग्लिश के साथ-साथ विश्‍व साहित्य में रुचि देखी तो ‘कैरेवान’ (CARAVAN) में उप संपादक बना दिया। सबसे पहला काम था- सरिता की हिंदी कहानियों का इंग्लिश अनुवाद। साथ-साथ प्रकाशनार्थ आई इंग्लिश रचनाओं को पढ़ना, लेखकों से वांछित विषयों पर लिखवाना, और छपने के लिए तैयार करना। वह ठहरा नौसिखिया! बहुत से शब्द तो वह जानता ही नहीं था। हिंदी से अनुवाद करना हो या किसी इंग्लिश शब्द को बदल कर बेहतर करना हो, तो शब्द संपदा समृद्ध चाहिए। तभी किसी ने उससे रोजेट का थिसारस ख़रीदने को कहा। वह मगन हो गया, उसका दीवाना हो गया। जब वह ‘सरिता’ में था तो इंग्लिश से हिंदी अनुवाद भी करता था। तब हिंदी शब्द नहीं मिलते थे। इसीलिए रोजेट देखते ही वह सोचने लगा कि ऐसी कोई किताब हिंदी में होनी चाहिए।

लेकिन वह जो लड़का था, जिससे मैंने आपको अभी मिलवाया, वह लड़का मैं था। मैं यह हिमाक़त सोच ही नहीं सकता था कि मैं वैसी कोई किताब बनाऊँ। मैं तो यही सोचता था, सोचता क्या था, मुझे पूरा भरोसा था कि तब (बीसवीं सदी के पचासादि दशक में) हिंदी शब्दावली बनाने के जो ताबड़तोड़ प्रयास हो रहे थे, उन्हीं में से हिंदी का थिसारस भी कभी-न-कभी निकलेगा ही। मैं तो अपने काम को बेहतर करने में लगा रहा। मेहनत कर रहा था, तो तरक्क़ी भी होती रही। लेकिन कभी इतना भी नहीं सोचा था कि मैं उस समूह की सभी पत्रिकाओं का एग्ज़क्टिव सहायक संपादक बन जाऊँगा। इस सैंस में मेरी कोई महत्वाकांक्षा कभी नहीं रही। अगर भविष्य की कोई तस्वीर मन में थी थी तो बस यही कभी-न-कभी कंपोज़िंग विभाग का फ़ोरमैन बन पाऊँगा। बस, काम करता रहा, बढ़ता गया, बढ़ता क्या गया, बढ़ाया जाता रहा।

1973 तक वह लड़का 43 साल का अधेड़ हो चुका था। ‘माधुरी’ जैसी यशस्वी और लोकप्रिय पत्रिका का प्रथम संपादक बन चुका था। लेकिन दस साल वहाँ रह कर ऊब चुका था। बार-बार वह सोचता कि क्या इसीलिए पैदा हुआ हूँ। क्या यही उस की नियति है। और तब फ़िल्मी दुनिया की चकाचौंध भरी पार्टियों से परेशान थका-हारा वह 25-26 दिसंबर की रात देर रात तक सो नहीं पा रहा था। न जाने किसने उस रात में उसे याद दिलाया–

‘बीस साल पहले जो तेरी चाहत थी, हिंदी थिसारस की, वह अभी तक अधूरी है। तुझे जो तलाश है जीवन में कुछ करने की, तो उस चाहत को पूरा कर। इच्छा तेरी थी, सपना तेरा था। बस, उसे पूरा करने में जुट जा।’

तब तक मेरे जीवन का कोई सुनिश्चित उद्देश्य नहीँ था। अगली सुबह (26 दिसंबर 1973 की सुबह) मलाबार हिल पर सैर करते करते कुसुम और मैंने मिल कर संकल्प कर लिया चाहे जो हो, हम हिंदी को थिसारस देंगे।

विवाह की स्वर्ण जयंती पर अरविंद कुमार को केक खिलातीं कुसुम कमार

आपके परिवार ने आपकी किस तरह मदद की।

उस सुबह से ही मैं और कुसुम पति-पत्नी से बढ़ कर सहकर्मी हो गए। बच्चे छोटे थे। सुमीत 13 साल का था, मीता 8 की। सबसे पहला काम था महाप्रयास के लिए अपने को तैयार करना। हर तरह के संदर्भ ग्रंथ ख़रीदे—अधिकतर हिंदी और इंग्लिश कोश थे। इंग्लिश के दसियों थिसारस भी ख़रीद डाले। यह भी पता था कि नौकरी छोड़ने के बाद जेब हल्की होगी। काफ़ी कपड़े भी बना लिए। साथ-साथ प्रोविडेंट फ़ंड बचत की दर बढ़ा दी। घर का ख़र्च कम से कम कर दिया।

19 अप्रैल, 1976 को नासिक में गोदावरी स्नान के बाद हमने किताब को पहला कार्ड बनाया। उस पर हम चारोँ के दस्तख़त हैं। सुमीत और मीता थे तो बच्चे, लेकिन उनके मन में सहभागिता की बात कहीँ अड़ी रही होगी। जैसे-जैसे वे बड़े होते गए, हमारे काम के सक्रिय भागीदार बनते गए। कोई 1988 से सुमीत ने हमारे काम के लिए कंप्यूटर की आवश्यकता पर बल देना शुरू किया। बाद में उसने कार्डों के कंप्यूटराइजेशन की प्रक्रिया सँभाली। मीता ने इंग्लिश डाटा की आधारशिला तैयार की।

समाज के लिए कोश ग्रंथों की क्या उपयोगिता है ? या कहें की जीवंत समाज के लिए शब्दकोश क्यों ज़रूरी हैं ?

शब्द मानव की महानतम उपलब्धि हैं। शब्दों ने ही ज्ञान-विज्ञान को जन्म दिया, एक पीढ़ी से दूसरी तक, एक देश से दूसरे तक पहुँचाया, मानवों में संप्रेषण सहज बनाया। यही कारण है कि भाषा के जन्म के साथ ही थिसारस (शब्द सूचियाँ) और शब्दार्थ कोश बनने लगे थे। सबसे पहले सटीक थिसारस और शब्दकोश भारत में बने। निघंटु था तो कुल 1,800 शब्दों की सूची, लेकिन तत्‍कालीन समाज ने उसके निर्माता कश्यप को प्रजापति कह कर सम्माना। और फिर महर्षि यास्क ने निघंटु की व्याख्या के रूप में संसार को सबसे पहला शब्दार्थ कोश और ऐनसाइक्लोपीडिया दिया- निरुक्त। ये दोनों अभी तक पूरे सम्मान के भागी हैं।

शब्दकोश एक आदमी से दूसरे तक पहुँचे शब्द को प्रमाणित करते हैं, ताकि ग़लतफ़हमी की गुंजाइश न रहे। थिसारस हमें अपनी बात कहने के लिए सही शब्दावली देता है। शब्दकोश और थिसारस एक दूसरे के पूरक हैं, लेकिन दो अलग तरह की चीज़ें हैं।

हिंदी का भविष्य क्या है ? वैश्‍वीकरण के दौर में क्या हिंदी सिमट कर रह जाएगी?

हिंदी को कई निराशावादी लोग एक मरती हुई ज़बान समझते और कहते फिर रहे हैं। वे उसी तरह के लोग हैं जो इस्लाम ख़तरे में, हिंदुत्व संकट में जैसे नारे लगाते रहते हैं। हिंदी में इंग्लिश शब्दों के बढ़ते चलन को देख कई बार उनकी बात सही लग सकती है, लेकिन मैं उनसे सहमत नहीं हूँ। बदलते समाज, बदलती तकनीक के साथ हिंदी का बदलना ज़रूरी है। यह बात हर भाषा पर लागू होती है। आज हिंदी वह नहीं है जो ‘चौरासी वैष्णवन की वार्ता’ के ज़माने में थी, न ही वह जो भारतेंदु जी के युग में थी। और सन् 2050 में वह नहीं होगी, जो आज है। वह हर जगह से शब्द लेगी, विचार लेगी। नए मुहावरे आएँगे। नए लोग नई शैलियाँ लाएँगे। वे लोग नई वर्तनी भी ला सकते हैं। तब हिंदी संसार में शायद सबसे अधिक प्रचलित भाषाओं में बहुत ऊपर होगी।

आप देख रहे हैं, हिंदी के समाचार पत्र प्रसार संख्या में सबसे आगे हैं, और उनकी गुणवत्ता दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ रही है। हिंदी के टीवी चैनल संसार के सर्वाधिक लोकप्रिय चैनलों में गिने जाते हैं। हमारी फ़िल्में पूरी तरह अंतरराष्ट्रीय हो चुकी हैं। तो डर कैसा, डर किससे। आप यह बात समझ लीजिए कि हिंदी बोलने वाले संख्या में इतने अधिक हैं और आज हिंदी वाले संसार में एक बहुत बड़ा ग्राहक समूह हैं। उन तक माल पहुँचाने और बेचने के लिए दुनिया को नाक रगड़ कर उनके पास आना होगा। हिंदी ही क्योँ, दुनिया को भोजपुरी, ब्रजभाषा, गढ़वाली—सब के पास आना होगा।

आज विश्‍व की कई भाषाएँ मरणासन्न हैं। क्या उन्हें बचाया जा सकता है ?

जिन भाषाओं के बोलने वाले कम हैं, या कम होते जा रहे हैं, वे म्यूज़ियम पीस बन कर ही बची रह सकती हैं। यही बात शब्दों की भी है। मेरे बचपन के वे सब शब्द मर चुके हैं, जो उन चीज़ों के थे जो तब काम आती थीं, या उन रीतिरिवाज़ों के हैं जो तब चलते थे। दमड़ी, छदाम, कौड़ी, अधन्ना, इकन्नी कुछ ऐसे ही शब्द हैं। कुछ ही दिनों में चवन्नी शब्द भी भुला दिया जाएगा। यह होना अवश्यंभावी है।

अब आप की क्या योजनाएँ हैं ? हिंदी-इंग्लिश के अतिरिक्त अन्य भाषाओं के कोश भी बनाएँगे क्या ?

हमारे सपने बहुत बड़े हैं। और योजनाएँ भी बहुत बड़ी हैं। अरविंद लैक्सिकन से जो पैसा आएगा, उसका बहुत बड़ा भाग हमारे डाटा में नई भाषाएँ जोड़ने में काम आएगा। तमिल और चीनी भाषाएँ हमारी प्राथमिकता हैं।

इसके पीछे जो राष्ट्रीय और देशभक्ति से भरा विचार है, आप वह समझने की कोशिश करें। भारत की आर्थिक और राजनीतिक सामर्थ्य बढ़ रही है, बढ़ेगी। जिस तरह इंग्लिश भाषी समाजों ने दुनिया भर के देशों से उनकी भाषाओं के कोश बनाए, जैसे इंग्लिश-हिंदी-इंग्लिश या इंग्लिश-चीनी-इंग्लिश, इंग्लिश-जापानी-इंग्लिश, उसी तरह हमारे देश को करना होगा- हिंदी-इंग्लिश-हिंदी, हिंदी-चीनी-हिंदी, हिंदी-जापानी-हिंदी… । सरकार तो इस तरफ़ कुछ करती नज़र नहीं आ रही। इतनी दूरदृष्टि भी उनके पास कभी नहीं रही है। सरकार न ही करे तो ठीक ही है। इंग्लिश में भी ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस के साथ अनेक निजी प्रकाशकों ने यह काम किया।

आपने बाहरी आर्थिक सहायता की बात शुरू में ही पूछी थी। तब मेरे पास अपने को सुपात्र सिद्ध करने का कोई साधन नहीं था। क्या था मैं ? एक महत्वाकांक्षी कोशकार तो था, पर था तो कोरा फ़िल्म पत्रकार ही। लेकिन अब तो मैं अपने को सिद्ध कर चुका हूँ। फिर भी मैं जानता हूँ कि मुझे या मेरे समूह को कहीं से कैसी भी सहायता नहीं मिलेगी। शायद मुझे माँगने की कला ही नहीं आती। लेकिन अब एक हद तक मैं और मेरे साथी आत्मनिर्भर हैं। हम समर्थ हैं, हमारे पास इरादा है। हम न सिर्फ़ तमिल और चीनी शब्द सँजोएँगे, हम जापानी, अरबी, फ़्रैंच, जरमन, स्पेनी—सभी भाषाएँ समाहित करेंगे। बरसों लगेंगे, शायद पीढ़ियाँ, लेकिन जो काम शुरू होता है, या होना चाहता है वह अपना कारिंदा भी चुन लेता है और उसके कंधे पर सवार होकर उसे धकेलता रहता है। इस काम ने हमें चुन लिया है।

‘अरविंद लैक्सिकन’ में आपने रोमन लिपि को भी शामिल किया है। इसकी ख़ास वज़ह क्या है ?

रोमन लिपि शामिल करने के पीछे एक सीधी सी समझ थी। कितने लोग हैं जो हिंदी में टाइपिंग कर सकते हैं ? कितने सारे अ-हिंदी भारतीय हैं, जैसे, लदाखी, बंगाली, तमिल, कन्नड़ जो हिंदी तो समझते हैं पर पढ़ना नहीँ जानते या समझना चाहते हैं पर देवनागरी न जानने के कारण पढ़ नहीं सकते, उनके लिए किसी कोश में हिंदी शब्दों की खोज के लिए रोमन लिपि होनी चाहिए। मेरे छोटे भाई विनोद अमरीका में रहते हैं। उनका बेटा रोहित बड़ा अफ़सर है, पर हिंदी नहीं जानता। विदेशों में बसे भारतीय परिवारोँ की दूसरी पीढ़ी का यही हाल है। पर उनका भारत प्रेम या हिंदी से लगाव कम नहीं हुआ है। अगर रोमन लिपि के साथ-साथ वे लोग वही शब्द देवनागरी में लिखा देखेंगे तो हिंदी का रंगरूप उनकी समझ में आने लगेगा।

अरविंद लैक्सिकन 24 जून से उपलब्ध हो गया है। उसे http://arvindlexicon.com पर देखा जा सकता है। हो सकता है कुछ कमियाँ हों, हमारे सर्वर अभी उतने समर्थ न हों। पर हम और सर्वरों पर ख़र्च करने के संसाधन जुटा रहे हैं। मैं समझता हूँ उस साइट पर उपलब्ध अरविंद लैक्सिकन का नि:शुल्‍क संस्करण आम हिंदी भाषी परिवार की दैनिक शब्दावली की सारी आवश्यकताएं पूरी कर देगा। हिंदी और इंग्लिश के ढेर सारे पर्याय और एक भाषा से दूसरी भाषा के लिए शब्दों की तलाश यहाँ पूरी होगी। लेकिन इसके लिए साइट पर रजिस्टर कराना– अरविंद परिवार का सदस्य बनना ज़रूरी है। आवश्यक फ़ार्म या प्रपत्र साइट पर ही मिलता है।

प्रेस में बाल श्रमिक के रूप में आपने करियर की शुरूआत की। बाद में वहाँ की सभी पत्रिकाओं के प्रभारी सहायक संपादक बने। ‘माधुरी’ और ‘सर्वोत्तम’ जैसी पत्रिकाओं के प्रथम संपादक बने। आपकी सफलता का राज़ क्या है ?

तीन राज़ हैं— मेहनत, लगन, ईमानदारी।

आपका जन्‍म मेरठ में हुआ। बचपन के कुछ वर्षों को छोड़कर आप मेरठ में नहीं रहे। दुनिया भर में घूमे। क्‍या मेरठ याद आता है ?

मेरठ शहर में जन्मा और वहाँ रहा बंदा मेरठ को कभी भूल ही नहीं सकता। नौचंदी उसे हमेशा याद आती रहेगी, वहाँ की रेवड़ी गज़क़ हमेशा मुँह में लार लाती रहेगी।

एक बार टाइम्स संस्थान की कर्ताधर्ता श्रीमती रमा जैन ने मुझ से पूछा था कि आपकी क्या महत्वाकांक्षा है। मेरा जवाब था,  गुज़ारे लायक़ आमदनी और मेरठ में वास। उन्होंने कहा था कि गुज़ारे लायक़ आमदनी की बात समझ में आती है, मेरठ में रहना क्यों ? जवाब में मैंने पूछा था– आपने कभी मेरठ की चाट खाई है। वह हँस पड़ी थीं, और बोली थीं- मैं समझ गई।

आपको बताऊँ कि हम मेरठ वाले चटोरे होते हैं। सुबह नाश्ते में हलवाई की बेड़वीं के साथ जलेबी पर रखा हलवा, तीसरे पहर चाट पकौड़ी। चाट की बात यह है, कभी समोसा, कभी आलू का लच्छा, आलू का भल्ला (टिकिया, कटलेट), दही सौंठ वाली पकौड़ियाँ, गोलगप्पे (पानी पूरी) तो खाते ही हैं, वहाँ शादी-ब्याह में जो ख़ास तरह की कचौरी बनती है, वह कहीं और नहीं मिलती। बाहर हम उसके लिए तरसते रहते हैँ। यह और बात है कि अब न तो वैसा स्वास्थ्य है, न वैसा हाज़मा कि ये लज्जत पूरी तरह उठा सकें।

और एक बात। मेरठ खड़ी बोली का जन्म स्थान माना जाता है। लेकिन वहाँ की बोली वह नहीं है, जो आज की लिखत की हिंदी है। वहाँ के कुछ अजीब मुहावरे हैं। जैसे: अजी, हुआ बहुत! इस का मतलब होता है कि होने की कोई संभावना नहीं है। ऐसे कितने ही मुहावरे मैं गिनाता रह सकता हूँ। काश कोई उनका कोश बनाए।

 

‘जनता के समर्थन से ही इस व्यावसायीकरण को रोका जा सकता है : डॉक्‍टर अनूप सराया

विश्‍व बैंक लगातार तीसरी दुनिया के देशों की सरकारों को सामाजिक क्षेत्र में वित्तीय कटौती की सलाह देता रहा है और यहां की दलाल सरकारें इन नीतियों को लागू करने में जुटी हुई हैं। पिछले कुछ वर्षों से इस बात की लगातार कोशिश की जा रही है कि एम्स में अब तक जो सुविधाएं उपलब्ध हैं उनके बदले मरीजों से पैसे लिए जायं जो बाजार की दर पर हों। इसके लिए सरकार की ओर से तरह-तरह के सुझाव पेश किये जा रहे हैं। सारा प्रयास एम्स के बुनियादी चरित्र को बदलने का है। इसी क्रम में वेलियाथन कमेटी का गठन हुआ और प्रधानमंत्री कार्यालय इस कमेटी की सिफारिशों को लागू करने पर जोर दे रहा है। ‘प्रोग्रेसिव मेडिकोज ऐंड साइंटिस्ट फोरम’ के सक्रिय सदस्य और एम्स के गैस्ट्राइटिस विभाग में प्रोफेसर डॉ. अनूप सराया का कहना है कि एम्स ऐक्ट के मुताबिक एम्स के कामकाज में किसी भी तरह का हस्तक्षेप नहीं हो सकता- प्रधनमंत्री भी हस्तक्षेप नहीं कर सकता। इसके स्वरूप में कोई भी बुनियादी तब्दीली संसद में बहस के बिना नहीं की जा सकती है। डॉ. सराया का यह भी कहना है कि  उन संस्थाओं के लिए जो जनता की सेवा के लिए हैं वित्तीय आधर पर स्वायत्‍तता  की अवधरणा ही गलत है। इसके पीछे असली मकसद एम्स को आम जनता की पहुंच से दूर करना है… प्रस्तुत है उनसे बातचीत के प्रमुख अंश-

आखिर सरकार एम्स के चरित्र में बदलाव क्यों चाहती है ?

दरअसल स्वास्थ्य संबंधी नीति में भूमंडलीकरण के बाद जो आमूल परिवर्तन आया है उसी का यह असर है। आज ये लोग रेवेन्यू पैदा करने के मॉडल की ओर जा रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और वर्ल्ड बैंक के स्ट्रक्चरल ऐडजस्टमेंट प्रोग्राम के तहत सामाजिक सुरक्षा में कटौती की नीति जब से बनी है तो स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाले खर्च में भी कटौती की योजना बनी। राजस्व पैदा करने के मॉडल पर ये लोग चलना चाहते हैं और कह रहे हैं कि हम उन लोगों को जिनके लिए बहुत जरूरी है और जो बीपीएल कार्ड होल्डर हैं उनको फ्री कर देंगे। अब सवाल ये है कि बीपीएल कार्ड कौन हासिल कर सकता है। अगर राज्य कहता है कि हमारे यहां गरीबी रेखा से नीचे के लोगों की संख्या ज्यादा है तो केंद्र इस पर सवाल खड़े करता है। बीपीएल के साथ दिक्कत यह भी है कि अगर यह दूसरे राज्य का है तो हो सकता है दिल्ली में इसे स्वीकार न किया जाय। मसलन इंस्टीट्यूट ऑफ बिलिअरी साइंसेज जैसी कुछ संस्थाएं ऐसी हैं जिसमें केवल दिल्ली का बीपीएल कार्ड होल्डर ही फायदा ले सकता है। अगर दूसरे राज्य से कोई इलाज कराने आ गया और बीपीएल कार्ड उसके पास नहीं है तो क्या आप उसका इलाज नहीं करेंगे?

जो लोग बीपीएल से ऊपर हैं उनमें से भी तो बहुत सारे लोग ऐसे हैं जिनको यहां इलाज कराने की जरूरत पड़ती है।

बिलकुल ठीक कह रहे हैं। जो लोग गरीबी रेखा से ऊपर हैं उनकी भी हैसियत ऐसी नहीं है कि वे अच्छी चिकित्सा के लिए पैसे खर्च कर सकें। अब ये लोग नयी नीति के तहत बहुत सारे लोगों को इलाज से वंचित कर रहे हैं। ज्यादा से ज्यादा लोगों को शामिल करने (इन्क्ल्यूजन) की बजाय अब ज्यादा से ज्यादा लोगों को इससे दूर करने (एक्सक्ल्यूजन) की नीति पर ये लोग चल रहे हैं। इसके अलावा लगातार व्यावसायीकरण की एक मुहिम चल रही है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष और विश्‍व बैंक के नुस्खे के बाद आप देखेंगे कि स्वास्थ्य के बजट में बढ़ोत्तरी नहीं हुई। यूपीए ने अपने न्यूनतम साझा कार्यक्रम में कहा था कि इसे तीन प्रतिशत करेंगे जो आज भी डेढ़ प्रतिशत से नीचे ही है। भारत जैसे एक गरीब देश में जहां बड़ी तादाद में लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं, जहां 77 प्रतिशत लोग 20 रुपये से कम की दैनिक आय पर गुजारा करते हैं वहां अगर आप चिकित्सा को महंगी कर देंगे तो लोगों की क्या हालत होगी। एन सी सक्सेना कमीशन की रिपोर्ट हो या योजना आयोग की ढेर सारी रपटों को अगर आप देखें तो साफ पता चलता है कि इस देश में कितनी बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो चिकित्सा पर पैसा नहीं खर्च कर सकते। हालांकि उन रिपार्टों में भी जो उन्होंने प्रति व्यक्ति कैलोरी का मानदंड रखा है वह आईसीएमआर की गाइड लाइंस को अगर देखें या नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूट्रीशन की गाइड लाइन देखें तो वह कैलोरी इनटेक भी कम है। यानी अगर आप उसे भी उपयुक्त कैलोरी पर ले आयें तो यह संख्या और भी ज्यादा बढ़ जाएगी। तो ऐसी हालत में भारत जैसे देश में स्वास्थ्य सुविधाएं प्रदान करने की जिम्मेदारी सरकार की हो जाती है। लेकिन सरकार अपना पल्ला झाड़ रही है और कह रही है कि वह महज प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधा प्रदान करेगी। यानी प्राथमिक से ऊपर की जरूरत है तो वह खरीदकर उसका लाभ उठायें। जहां पहले ‘सबके लिए स्वास्थ्य’ की बात होती थी अब एफोर्डेबुल हेल्थ पर बात होने लगी है। इतना ही नहीं सरकारी अस्पताल में भी बहुत सारी सेवाएं अब आउट सोर्स की जाने लगी हैं। धीरे-धीरे सरकार अब अपने हाथ खींचने लगी है। नियुक्तियों में भी अगर आप देखें तो मनमाने ढंग से काम हो रहा है। सरकार धीरे-धीरे अपनी संस्थाओं को तबाह करके प्राइवेट संस्थाओं को मदद करने में लगी है।

क्या पिछले 10 वर्षों में एम्स में इसकी कोई झलक मिली है ?

पिछले 10 वर्षों से लगातार इस दिशा में सरकार काम कर रही है। यहां एम्स में पहले 1992-93 में यूजर्स चार्जेज लगाने की कोशिश की गयी। उसके बाद 1996-97 में उसका विरोध कर हमने उसे रुकवाया। इसी वर्ष के आस पास इन्सेंटिव स्कीम लागू करने की कोशिश की गयी कि जो आय होगी उसका एक हिस्सा डॉक्टरों में बांटा जाएगा। उसको भी हम लोगों ने रुकवाया। हमने कहा कि हमारा सबसे बड़ा इन्सेंटिव यही है कि हमारा मरीज सही सलामत ठीक होकर यहां से चला जाय। हमने कहा कि आप जो भी इन्सेंटिव देंगे वह पैसा गरीब आदमी की जेब से ही निकलकर आयेगा इसलिए हमें उसकी जरूरत नहीं है। हां, आप अगर इन्सेंटिव देना ही चाहते हैं तो सरकार अपने किसी मद से इसकी व्यवस्था कर दे। आप किस तरह का इन्सेंटिव देना चाहते हैं। हमने कहा कि यह तो लूट में हिस्सेदारी होगी जो हमें नहीं चाहिए। फि‍र इन्होंने 2002 में कुछ यूजर्स चार्जेज लगाने की कोशिश की। फि‍र उसका विरोध हुआ। मेन इंस्टीट्यूट में तो नहीं लगा लेकिन जहां-जहां सेंटर बन गये हैं,  जैसे कार्डियो-न्यूरो सेंटर में- वहां लगा दिया। मेन इंस्‍टीट्यूट में वही जांच निःशुल्क होती है लेकिन इस सेंटर में उसके पैसे देने पड़ते हैं, जबकि वह भी इंस्टीट्यूट का ही हिस्सा है। यह लगभग सन् 2000 से शुरू हुआ। फि‍र इन्होंने 2005 में बाकायदा ‘रेश्‍नलाइजेशन ऑफ चार्जेज’ के नाम पर (जिसे मैं कामर्शियलाइजेशन ऑपफ हेल्थ केयर कहता हूं) हर जांच के,  हर ऑपरेशन के, हर चीज के पैसे लगा दिये। ये शुरू भी हो गया। सितंबर, 2005 से यह लागू हुआ जिसका फि‍र हम लोगों ने लगातार विरोध किया। इसके लिए हम लोगों ने लिखने से लेकर धरना-प्रदर्शन सब कुछ किया। लगातार सांसदों से मिलकर इस मुहिम को चलाया। अंततः आठ महीने बाद उस आदेश को वापस लिया गया। यह भूमंडलीकरण के दौर में हमारी एक बड़ी जीत थी। अब फि‍र से उसको किसी न किसी तरीके से लागू करना चाहते हैं। पहले फैकल्टी का कोई भी व्यक्ति छूट दे सकता था जिसे अब विभागाध्यक्ष तक सीमित कर दिया गया है। इनकी कोशिश है कि किसी तरह फि‍र से पैसा वसूला जाय लेकिन हम लोग लगातार इसका विरोध कर रहे हैं।

इसका मतलब यहां के डॉक्टरों में एक तरह की चेतना है?

हम लोग लगातार इन मुद्दों पर लड़ते रहे हैं इसलिए कुछ चीजों को रोक पाते हैं।

अच्छा ये बताइए कि वेलियाथन कमेटी का गठन किस मकसद से किया गया?

पहली चीज तो यह समझ लीजिए कि वेलियाथन साहब हैं कौन। वेलियाथन साहब जब श्री चित्रा इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर थे तो वहां उन्होंने एक रेवेन्यू जेनरेशन मॉडल लागू किया था। उसके बाद उन्होंने अवकाश ग्रहण करने के बाद मनीपाल ग्रुप ऑफ हॉस्पिटल के लिए प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों के खोलने का काम शुरू किया। तो इस प्रकार वेलियाथन साहब इंडस्ट्री के मददगार और रेवेन्यू जेनरेशन मॉडल की वकालत करने वाले डॉक्टर हैं। इसलिए मनमोहन सिंह और मंटेक सिंह अहलूवालिया की सोच के साथ उनका तालमेल पूरी तरह बैठ गया और उनकी अध्यक्षता में एक कमेटी बनायी गयी। पहली बार जब यहां रेवेन्यू जेनरेशन प्रोग्राम लागू करने की कोशिश की गयी थी उसमें मुंह की खानी पड़ी। दूसरी बार मई, 2006 में यह कोशिश हुई। वह एम्स में आरक्षण विरोधी आंदोलन का दौर था और आंदोलन के जोर पकड़ने के साथ एम्स में अराजकता का माहौल बन गया। यहां के डायरेक्टर पूरी तरह आरक्षण विरोधि‍यों को समर्थन दे रहे थे। और कांग्रेस में भी एक बड़ा सेक्शन था जो आरक्षण विरोधि‍यों के साथ खड़ा था। अब देखिए कि प्रधनमंत्री मनमोहन सिंह प्रोटोकोल तोड़ कर हड़ताली डॉक्टरों से दो बार मिले, जबकि कोई भी प्रधनमंत्री यही कहता कि पहले आप हड़ताल समाप्त करिए फि‍र बात करिए। वह हड़ताल अदालत के आदेश का उल्लंघन करके चल रही थी। उसमें न कोर्ट हस्तक्षेप कर रहा था और न स्थानीय प्रशासन। डॉक्टरों को हड़ताल के लिए टेंट लगवाये जा रहे थे, कूलर लगवाये जा रहे थे और सारी व्यवस्था की जा रही थी। तो पूरी तरह से अराजकता का माहौल था। उसमें यह कमेटी बनायी गयी थी जो इसकी कार्यक्षमता बढ़ाने के तरीकों का सुझाव दे सके। लेकिन उसने उन कारणों के बारे में कोई टिप्पणी नहीं की जिसकी वजह से अराजकता पैदा हुई थी। हां, उसने यह जरूर बताया कि एम्स को किस तरह बड़े उद्योगों के लिए उपलब्ध कराया जाय। यह रिपोर्ट तैयार हो गयी। इसमें भी एक बात ध्यान देने की है। कमेटी की रिपोर्ट को इंस्टीट्यूट के निकाय ने स्वीकृति नहीं दी। उस सूरत में इसकी कोई वैधता नहीं थी। तब भी पीएमओ यह बार बार लिख रहा है कि वेलियाथन की सि‍फारिशों को लागू करिए। कैबिनेट मीटिंग में प्रधनमंत्री ने इंस्टीट्यूट को तीन महीने का समय दिया था कि इसे लागू कर दिया जाय। इस प्रकार हम देखते हैं कि जो रिपोर्ट तैयार की गयी है वह इंस्टीट्यूट के कामकाज के लिए नहीं, बल्कि इसलिए कि इंस्टीट्यूट को इंडस्ट्री के लिए कैसे उपलब्ध कराया जाय। उसका इरादा ही कुछ और है।

तो अगर एम्स पर यह लागू हो जायेगा तो जितने पीजीआई हैं उन पर भी यह लागू होगा ?

देखिए, यह कमेटी इंस्टीट्यूट के लिए बनायी गयी थी। लेकिन सरकार अपनी नीयत साफ कर चुकी है। प्लानिंग कमीशन की मीटिंग के बाद मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने साफ कहा है कि एम्स जैसी संस्थाओं को पीपीपी मोड पर डाल दिया जाय- प्राइवेट-पब्लिक पार्टीसिपेशन। लिहाजा जितनी और संस्थायें हैं या बनेंगी वे सभी प्राइवेट-पब्लिक पार्टीसिपेशन के तरीके पर ही चलेंगी। अभी तो तमाम कमियों के बावजूद गरीब से गरीब आदमी को भी यहां से राहत मिल जाती है, लेकिन अब यह जो आखिरी उम्मीद है वह भी खत्म हो जायेगी। इसका चरित्र ही बदल जायेगा। गौर करिये कि इस इंस्टीट्यूट को किस लिए बनाया गया था। जब नेहरू मंत्रिमंडल में तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री अमृतकौर ने संसद में इसका बिल पेश किया तो उसमें कहा गया था कि इसका मकसद गरीब से गरीब आदमी को उत्तम स्वास्थ्य सुविधा प्रदान करना, राष्ट्र के हित में शोध करना,  चिकित्सा के लिए लोगों को प्रशिक्षित करना और अध्यापन के नये तरीके विकसित करना है। इसका मतलब अनुसंधान और मरीजों की देखभाल पर मुख्य जोर था।

अब जब आप इंडस्ट्री के साथ जुड़ेंगे तो इसका इस्तेमाल इंडस्ट्री करेगी, जो कंसल्टेंट हैं वे इंडस्ट्री के लिए काम करेंगे, पढ़ाई पर बुरा असर पड़ेगा, मरीजों की स्वास्थ्य सुविधा पर बुरा असर पड़ेगा और अगर आप इसका व्यावसायीकरण करेंगे तो गरीब से गरीब आदमी को आप इलाज नहीं दे सकेंगे। इसका जो मुख्य उद्देश्य है उससे आप दूर हो जायेंगे। इसलिए बुनियादी चरित्र में कोई भी परिवर्तन अगर आप लाना चाहते हैं तो उसके लिए संसद में बहस की जानी चाहिए।

अभी आपको इसका भविष्य कैसा दिखायी दे रहा है? क्या आप लोग इस बदलाव को रोक पायेंगे?

हम लोग तो इसको रोकने की लड़ाई लड़ रहे हैं। हमको जनता से जितना ही अधि‍क समर्थन मिलेगा और राजनीतिक क्षेत्रों से जो समर्थन मिलेगा उतना ही हम इसे रोक पायेंगे। लेकिन राजनीतिक दलों से कोई उम्मीद नहीं है क्योंकि अगर वे इसके प्रति गंभीर होते तो काफी पहले ही इसे रोकने की दिशा में कुछ करते। जहां तक मीडिया का सवाल है, जो मेनस्ट्रीम अखबार हैं और नयी आर्थिक नीति का समर्थन करते हैं, वे हर क्षेत्र की तरह स्वास्थ्य सेवाओं के भी निजीकरण और व्यावसायीकरण के ही समर्थन में आमतौर पर दिखायी देते हैं। इसलिए उन अखबारों में ये खबरें जगह नहीं पातीं।0

क्या स्वतंत्रा रूप से डॉक्टरों का ऐसा कोई समूह है जो आम जनता के स्वास्थ्य को लेकर चिंतित हो और उसकी तरफ से कोई सामूहिक प्रयास किया जा रहा हो?

जब तक हम लोग रेजिडेंट डॉक्टर थे, यह कोशिश हमारी लगातार चलती रही। ऑल इंडिया फेडरेशन ऑफ जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन का अंतिम अधि‍वेशन 1987 में हुआ। उसमें इस तरह के तमाम मुद्दे हमने उठाये थे और इस पर प्रस्ताव पारित किये थे। इसमें स्वास्थ्य नीति से लेकर स्वास्थ्य सेवाओं के लिए बजट बढ़ाने तक की बातें शामिल थीं। हम लोगों ने मेडिकल संस्थाओं में कैपिटेशन फी का विरोध किया था। आज मानव संसाध्न मंत्रालय, यूजीसी और मेडिकल काउंसिल ये सभी डॉक्टरी की पढ़ाई के निजीकरण और व्यावसायीकरण के पक्ष में हैं। जितने कॉलेज सरकारी सेक्टर में खुले हैं उससे ज्यादा प्राइवेट सेक्टर में हैं। प्रतिभा के इन सारे पुजारियों को उस समय मेरिट की याद आ जाती है जब हम लोग जाति आधरित आरक्षण की बात करते हैं। उन मेडिकल कॉलेजों में जहां सिर्फ पैसे से एडमिशन दिया जाता है वहां इन्हें मेरिट की चिंता नहीं होती। दरअसल जो सुविधाप्राप्त वर्ग है उसने अपने लिए कुछ अपने संस्थान खोल लिए हैं और सरकार अब उन्हीं को मदद करना चाहती है। इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि यूजीसी ने हाल में एक निर्णय लिया है कि वे लोग जो प्राइवेट विश्वविद्यालयों या प्राइवेट कालेजों में भी हैं वे भी रिसर्च ग्रांट के लिए हकदार हैं और आवेदन कर सकते हैं। अब अगर आपने इसकी अनुमति दे दी तो आप देखेंगे कि प्राइवेट संस्थानों के लोगों को ही सारी फेलोशिप जायेगी। इनके निहितार्थों पर गौर करिए। वे लोग जो अभी मेडिकल एजुकेशन की सीट्स के लिए एक एक करोड़ तक दे रहे हैं वो फि‍र धीरे-धीरे यूजीसी से टाईअप करके कुछ फेलोशिप्स भी अपने यहां रख लेंगे। वे कहेंगे आप इतना दे दीजिए हम आपको फेलोशिप दे देंगे। तो जो पैसा अभी रेजीडेंसी का देना पड़ता है वे भी ये संस्थान नहीं देंगे। रेजीडेंसी की जो तनख्वाह देनी पड़ती वे भी न देकर वे फेलोशिप दे देंगे। तो यह सब एक सुनियोजित ढंग से लूट की साजिश चल रही है। प्राइवेट कैपिटल के लिए सब कुछ है, आम जनता के लिए कुछ नहीं। यही निदेशक सिद्धांत बन गया है।

वेलियाथन कमेटी रिपोर्ट को पूरी तरह खारिज करने की जरूरत है या इसकी कुछ सिफारिशों को स्वीकार किया जा सकता है ?

यह जिस भावना से लिखी गयी है उसमें ही यह बात निहित है कि इसका पूरा मकसद बहुसंख्यक गरीब जनता के खिलाफ और सुविधासंपन्न वर्ग तथा उद्योगों के हित में है। इसलिए इसे तो पूरी तरह खारिज करने की जरूरत है। इसमें सब कुछ आउटसोर्सिंग पर आधरित है। अब इसकी अनुसंधान परिषद (रिसर्च काउंसिल) के ढांचे की परिकल्पना देखिए जिसमें कहा गया है कि उद्योग क्षेत्र से दो लोग होंगे और एक विख्यात वैज्ञानिक होगा। यह वैज्ञानिक भी किसी फर्मास्यूटिकल उद्योग का नामांकित व्यक्ति होगा। इसमें अनुसंधान और शोध को भी उद्योगों के हित के लिए बताया गया है। इसमें यह भी कहा गया है कि एम्स ऐक्ट में संशोध्न कर दिया जाय और इसके निकायों में जिन लोगों को रखा जाय उनमें उद्योग के लोग हों, सीआईआई और पिफक्की से लोग लिए जायं। इंस्टीट्यूट के काम काज के बारे में इन्होंने जिनसे राय मांगी वे सभी उद्योग क्षेत्र से आते हैं। इसमें रिसर्च इंसेंटिव देने की बात कही गयी है जिसके खिलाफ हम 150 लोगों ने हस्ताक्षर करके भेजा कि हमें यह नहीं चाहिए क्योंकि इससे हमारा पूरा ओरिएंटेशन गड़बड़ हो जायेगा, फर्जी रिसर्च किए जाएंगे और फि‍लहाल उसे रोक दिया गया है।

(डॉक्‍टर सराया से यह बातचीत समकालीन तीसरी दुनि‍या के संपादक और वरि‍ष्‍ठ पत्रकार आनन्‍द स्‍वरूप वर्मा ने की है। समकालीन तीसरी दुनि‍या, जनवरी-2011 से साभार)