Category: संस्मरण

रंगीली के होटल की खिचड़ी : कमल जोशी

कर्मठ रंगीली।

हालत कुछ-कुछ डिप्रेशन जैसे थे। भारी उदासी घेरे थी। कुछ दिन पहले ही तबियत खराब हुई थी और उससे जल्दी उबर नहीं पा रहा था। पहले भी तबियत खराब होती थी, परन्तु हफ्ते भर में ही खुद को फिट समझने लगता था। इस बार डेढ़ महीना हो गया था। शरीर दुरुस्त नहीं लग रहा था। एक डर सा मन में बैठ गया था कि क्या अब बुढ़ापा आ ही गया। सफेद दाढ़ी और कुल जमा बासठ साल तो शीशा देखते ही चिल्लाने लगते कि‍ भाई तुम बुढ़ापे में कदम रख चुके,  लेकि‍न वह गाना है ना- ‘दिल है के मानता नहीं..,’ की तर्ज पर दिमाग भी अभी तक स्वीकार नहीं कर पा रहा था कि‍ असलियत तो असलियत है…कब तक सींग कटा कर बछड़ों में शामिल हुआ जा सकता है?

पर आवारागर्दी अजीब लत होती है। इसीलिए डिप्रेशन की सी अनुभूति हो रही थी की- सुख भरे दिन गए रे भैया !

पर जैसा मैंने ऊपर लिखा ही है- ‘दिल है के मानता नही’- मैंने जिंक्स तोड़ने का मन बनाया और तय कर लिया कि चमोली जिले की ओर निकला जाए, जहां इस चाचा का भतीजा मधु है, जो जरूरत पड़ने पर देखभाल कर सकता है- बिना मुंह बनाए।

महीना अक्‍टूबर का था। सुबह हवा में खुनक थी। बादलों के दो बच्चे आसमान में धमा चौकड़ी करने की तर्ज में डराने लगे, पर मैं डरा नहीं और लगभग 6:30 पर फटफटिया स्टार्ट कर चल पड़ा। मूड अभी भारी ही था और मन अन्यमयस्क।

दस बजे के आसपास बुवाखाल पहुंचा, हिमालय भी दिखा, पर मन खिला नहीं। एक होटल में थोड़ा नाश्ता किया और पौड़ी होते हुए श्रीनगर की उतार पार की। श्रीनगर पार करते हुए कई परिचित चेहरे भी दिखे, पर मैंने बाइक रोकी नहीं। और मेरे हेलमेट की वजह से वे मुझे पहचान भी नहीं पाए। सर्र से श्रीनगर भी पार हो गया।

मुझे खाना खाने के लिए घोलतीर पहुँचना था, जहां मधु से मुझे मिलना था। वह दो बजे तक पहुँचने वाला था। इसलिए मेरे पास काफी समय था। मैं अब आराम से धीरे-धीरे फटफटिया चलाने लगा। थोड़ा आगे बढ़ा था कि‍ मुझे दो बच्चे सड़क के किनारे दिखे। दोनों भाई की तरह लग रहे थे। एक की उम्र दस ग्यारह साल और दूसरे की छह-सात साल। मैं आराम से बाइक चला रहा था। बच्चे मुझे देखते रहे। बाइक के बहुत करीब पहुँचने पर अचानक छोटे वाले ने मुझे रुकने के लि‍ए हाथ दिया। मुझे एकदम ब्रेक लगाने पड़े। तब भी थोड़ा आगे निकल गया। मैंने पीछे मुड़ कर उनकी ओर देखा। बच्चों को शायद आशा नहीं थी कि‍ मैं फटफटिया रोक दूंगा। वे सकपका से गए। मैंने पूछा, ‘‘क्या है?’’  बड़े बच्चे ने छोटे की तरफ इशारा करते हुए कहा, ‘‘इसने हाथ दिया।’’

अब मैंने छोटे बच्चे की तरफ प्रश्‍नवाचक दृष्टि से देखा। वह चुप ही रहा। मैंने अपने चहरे के भाव दुरुस्त किए और हंसते हुए पूछा, ‘‘क्यों हाथ दिया बताओ!’’ अब शायद बच्चों को लगा कि‍ बताने में कोई खतरा नहीं है, तो बड़े वाला बोला, ‘‘हमें आगे जाना है। रुद्रप्रयाग तक।’’ वे लिफ्ट मांग रहे थे। मेरे बैठो बोलने की देर थी कि‍ छोटा बच्चा इस गति से पिछली सीट पर चढ़ गया कि‍ एक बारगी तो मैं डिसबैलेंस ही हो गया था। दोनों बच्चे पिछली सीट पर जम गए। छोटे वाले बच्चे ने मुझे बन्दर के बच्चे की तरह कस कर पकड़ लिया। फटफटिया चलने से पहले मैंने उनसे पूछा, ‘‘ठीक से बैठे हो ना..गिरना मत।’’ तो उन्होंने ‘हाँ’ कहा और छोटे ने तो मेरी जैकेट इतनी कस कर पकड़ ली कि‍ उसकी अंगुलि‍यां मुझे चुभने लगीं।

मैं उनसे बात करते हुए बाइक चलना चाहता था, पर हेलमेट की वजह से उनके जवाब मुझे सुनाई नहीं दे रहे थे। मैंने बाइक रोकी,  हेलमेट उतारा कर हैंडल में लटका दिया। ऐसा करना नहीं चाहिए था, पर मैंने तय किया कि‍ हेलमेट उतार कर बाइक बहुत धीरे चलाऊंगा। तभी छोटे वाले ने मेरा हेलमेट माँगा और पहन लिया। हमारी गपशप शुरू हुई। पता चला कि‍ उनके नाम दीवान सिंह और हयात सिंह हैं। जहां वे खड़े थे, वहीं ऊपर उनका गाँव है। वे रुद्रप्रयाग अपने चाचा की लड़की के नामकरण पर जा रहे हैं और गाडी़ का इंतजार कर रहे थे।

‘‘तुम्हें अकेले कैसे भेज दिया माँ-बाप ने।’’ मैंने पूछा, तो दीवान,  जो बड़ा था,  ने मुझे बताया कि‍ माँ तो कई दिन से चाची के साथ ही है। पिता शाम को आएंगे। बच्चों ने पहले जाकर भूली को देखने की जिद की तो उन्हें किराया देकर सड़क पर भेज दिया। वे पहले भी इस तरह अकेले चाचा के घर जा चुके हैं। बच्चों को पारिवारिक ज्ञान भी था। बताया कि‍ उनकी बड़ी बहन अब काफी ‘बड़ी’  हो गई है। अब उसके लिए लड़का ढूंढ़ा जा रहा है। मेरी समझ में नहीं आया कि‍ इन बच्चों की शादी लायक बड़ी बहन कैसे हो सकती है। मैंने पूछा कि‍ बहन काफी बड़ी है, क्या?  तो छोटा बोला, ‘‘भोत बड़ी है। हमको मारती भी है।’’ उसके चेहरे पर पिटने का बहुत रोष रहा होगा, जो मैं देख नहीं पाया। बात आगे बढ़ाने के लिए मैंने पूछा कि‍ कहीं कोई लड़का देखा है। बड़ा बड़े ही प्रौढ़ अंदाज में बोला, ‘‘हाँ, देख रहे हैं। बात चल रही है!’’ उसकी बात पूरी ही हुई थी कि‍ छोटा वाला बोला, ‘‘बस दारू पीने वाला नहीं होना चाहिए!’’  इतने छोटे बच्चे के मु्ंह से यह बात सुनकर मैं अचम्भित रह गया। मैंने उससे ही पूछा, ‘‘क्यों दारू पीने से क्या होता है।’’ तो वह बोला, ‘‘दारूडी लोग ठीक नहीं होते। हमारे स्कूल में मास्टर दारूडी है। पढाता नहीं….मारता है!’’ फिर कुछ देर रुककर बोला, ‘‘नाक में दम कर रखा है, माचेत ने।’’  मैंने बाइक रोक कर गर्दन घुमाकर उसकी नाक देखने की कोशिश की। हेलमेट के भीतर से नाक ही नहीं दिखाई दे रही थी, दम कहाँ से दिखता। मैंने उससे कहा, ‘‘तुम्हारी नाक में तो दम दिखाई नहीं दे रहा।’’ वह पहले चौंका। फिर मेरे व्यंग्‍य को समझकर दोनों भाई हंसने लगे। मैंने उनसे पूछा कि‍ क्या सभी मास्टर ऐसे होते हैं, तो बड़े वाला बोला कि‍ नहीं ज्यादातर मास्टर तो अच्छे हैं। बस वह ही खराब हैं- ‘‘कभी स्कूल आते हैं कभी नहीं, पढा़ते भी नहीं। कुछ पूछो तो चिढ़ जाते हैं, पीटता भौत है।’’ अब मैं समझा कि‍ छोटे ने क्यों तय किया कि वह जीजा के रूप में किसी दारू पीने वाले को स्वीकार नहीं कर सकता।

रुद्रप्रयाग से पहले कुछ दुकानों के पास दीवान बोला, ‘‘बस…बस… हमें यहीं उतार दो!’’ मैंने बाइक में ब्रेक लगाए। फटफटिया रुकते ही दोनों बच्चे उतर गए। मैं कुछ कहता उससे पहले ही छोटा वाला बोला, ‘‘हमसे किराये के पैसे लोगे तुम!’’  मैंने उसके भोलेपन पर फिदा होते हुए कहा, ‘‘वैसे तो लेता, पर तुम दोनों अब दोस्त हो गए हो इसलिए नहीं लूंगा।’’ फिर दोस्ती को मजबूत करने के लिए मैं भी बाइक से उतरा और पास की दुकान से तीन बिस्कुट लिए। दो उन दोनों को दिए और एक खुद खाने के लिए सड़क के किनारे के पैरापिट पर बैठ गया। वे दोनों बच्चे भी वहीं बैठकर बिस्कुट खाने लगे। बड़े वाले ने मेरा नाम पूछा तो मैंने अपना नाम बताया। दीवान बोला कि हमारे साथ चलो, आज घर में पूरी-पकौड़ी बनी होंगी, खाकर जाना। मैने मना किया तो छोटा बोला, ‘‘चलो, चाचा जी कुछ नहीं कहेंगे।’’ उन्‍हें लगा कि शायद मैं हिचकिचा रहा हूं। उसने फिर पूछा कि‍ कहाँ जा रहे हो। मैंने बताया कि‍ आवारागर्दी करने। छोटे को शायद अवारागर्दी का मतलब समझ नहीं आया, पर बड़ा बोला, ‘‘झूठ।’’  मैंने कहा, ‘‘हां, सच में।’’ तो वह बोला, ‘‘बुड्ढे़ भी कभी आवारागर्दी करते हैं।’’ मैं उन्हें क्या बताता कि‍ मैं तो बिगड़ा हुआ बुड्ढा़ हूँ!

बिस्कुट हम लोगों ने निपटा लिए थे। विदा होने की बारी थी। मैंने कहा कि‍ मैं चलता हूँ और अपनी मोटरसाइकिल पर बैठ गया। एक झिझक के बाद छोटा वाला हयात सिंह आया और मेरी ओर हाथ बढ़ा कर हाथ मिलाने लगा। मैंने भी गर्मजोशी से उससे हाथ मिलाया। तभी बड़ा वाला भी दौड़कर आया और मुझसे हाथ मिलाने लगा। उनकी इस अदा से मुझे भरोसा हो गया कि‍ उन्होंने मुझे अपना पक्का दोस्त मान लिया है। जोर की ‘बाय’ के साथ मैं आगे बढ़ गया। अब मैं मोटरसाइकिल चलाते हुए मुस्करा रहा था और बेसुरे राग में गुनगुना भी रहा था। मुझे महसूस हुआ कि मैं बहुत खुश हूँ। डिप्रेशन गायब हो चुका था।

दो बजे के आसपास मैं घोलतीर पहुंचा। वहां भतीजा मधु और बहू इंतजार कर रहे थे। मेरी पसंद का पहाड़ी खाना और चटनी बनी थी। खाना खाकर, तृप्त होकर मैंने इजाजत ली और उखीमठ के लिए रवाना हो गया। रात उखीमठ से आगे उनियाना में गुजारी। दो सौ रुपये में खाने के साथ साफ-सुथरा कमरा मिल गया था। आज मैं मद्महेश्वर पहुँचना चाहता था। बाहर साफ धूप थी। बाइक से ही रांसी पहुंचा और एक होटल में नाश्ता किया। होटल क्या था दुकांन थी,  जहां सामान के साथ-साथ दुकानदार नाश्ता भी बना रहा था। नाश्ता करने के बाद मैंने उससे कहा की मैं मद्महेश्वर जा रहा हूँ। दो दिन तक मोटरसाइकिल खड़ी करनी है। कहाँ करूं? वह बोला कि‍ दुकान की साइड में चिपका कर खड़ी कर दो। कोई नहीं छेड़ेगा। उसके आश्वासन पर शत-प्रतिशत यकीन कर लिया, क्योंकि‍ वह किसी भी एंगल से नेता मार्का नहीं लग रहा था। मैंने मोटरसाइकिल उसके निदेशित स्थान पर खड़ी की, कवर लगाया और रांसी से गोंडार की ओर पैदल चल पडा़। कुछ दूर तक तो निर्माणाधीन मोटर रोड कटी हुई थी। उसके बाद खच्चर रास्ता था। जंगल धीरे-धीरे मदगंगा नदी की घाटी में उतरने लगा। पेड़ों से घिरा कैंचीदार रास्ता गोंडार की और जा रहा था। मैंने सोचा था कि‍ गोंडार तक का सात किलोमीटर का रास्ता मैं खाने के समय तक तय कर लूंगा। उसके बाद बचे हुए नौ किलोमीटर में से चौथे-पांचवे किलोमीटर पर किसी चट्टी पर रात काटूंगा और अगले दि‍न मद्महेश्वर चला जाऊंगा। गोंडार पहुंचने तक थक गया था। पहले ही ढाबे में पिट्ठू उतारा, अन्दर कोई नहीं था। मैं निराश बाहर निकल ही रहा था, तो देखा कि‍ एक औरत पीठ में लकड़ी लिए अन्दर आ रही है। उसने मुझे देखते हुए कहा, ‘‘टूरिस्ट?’’ मैंने मुंडी हिला कर ‘हाँ’ कहा तो वह बोली, ‘‘चाय पीनी है क्या?’’ मैंने सहमति में सर हिलाया। उसने तुरंत कमर पर धोती लपेटी और चूल्हे पर फूंक मार कर दबी आग को सुलगाया। उस पर पानी की केतली, जिस में पहले से ही पानी गुनगुना था, चढ़ा दी। मैंने पूछा कि‍ खाने के लि‍ए है कुछ तो वह बोली, ‘‘मैगी बना दूं क्या?’’ मैंने मना किया और बिस्कुट के बारे में पूछा। उसने ‘हाँ हैं’ कहा और एक बक्से से बिस्कुट निकाले। बिस्कुट लोकल बने थे और शायद कुछ पुराने ही थे। मैंने ध्यान से बिस्कुट देखे। कहीं भी फंगस नहीं लगी थी। मैंने उनको खाने का रिस्क ले ही लिया। महिला कुछ जल्दी में थी। मुझे चाय और दो अतिरिक्त बिस्कुट थमाते हुए बोली, ‘‘मुझे डंगरों के पास जाना है। चाय पीकर गिलास बाहर रख देना और पंद्रा रुपये चूल्हे के पास रख देना।’’ मैंने मजाक में कहा, ‘‘अगर बिना रखे चला गया तो?’’ वह हंसते हुए बोली, ‘‘किस्मत थ्वोड़ी लिजाला तुम!’’(किस्मत थोडे़ ही ले जाओगे तुम)। वह जाने को हुई तो मैंने उसे रोका और पन्द्रह रुपये दे दिए। उसने पैसे कमर में खोंसे और तेजी से चली गई। आगे के दो-तीन ढाबों में देखा कि‍ महिलाएं अपने पतियों के साथ होटल चलाने में हाथ बंटा रही थीं।

मैं आगे बढ़ गया, पैदल रास्ते में। मेरे आगे दो तीर्थयात्री जो पहाड़ के ही थे, चल रहे थे। पति-पत्‍नी प्रेम से बात शुरू करते, वह बहस में बदल जाती,  फिर लड़ते और गुस्से से चुप हो जाते। थोड़ी देर में फिर बात शुरू करते, फिर-फिर लड़ते और फिर से चुप हो जाते। उनकी बातों में मेरा रास्ता कटने लगा। अचानक मुझे भूख महसूस हुई, तो याद आया कि‍ गोंडार में खाना तो खाया ही नहीं। बिस्कुटों ने मेरी भूख मार दी थी। अब चढा़ई में भूख लगने लगी थी।

कुछ लोग मद्महेश्वर से वापस आ रहे थे। उन लोगों से पूछा तो बताया कि आगे तीन किलोमीटर खाना मिल सकता है। इसी आस में आगे बढ़ा।

अचानक जाने कहाँ से बादल आ गए। मौसम एक दम घिर गया। बादल गरजने लगे थे। मैं तेजी से आगे बढ़ने लगा। तीर्थयात्री अनुभवी महिला बोली, ‘‘बरिस आती है अब!’’ बादलों को मानो उसके कहने का ही इंतजार था! तेज बारिश पड़ने लगी। भाग्य से हमें 50 मीटर की दूरी पर टिन का बना शेल्टर दिखाई दिया। मैं और वह दम्पति दौड़ कर उसमें शरण लेने चले गए। वहां और लोग भी शरण लिए थे। अचानक ओले भी पड़ने लगे। बड़े-बड़े ओले! इतने बड़े ओले मैंने कभी देखे नहीं थे। मैं यह सोच ही रहा था कि‍ अगर हमें यह शेल्टर ना मिला होता तो सर फूटना तय था, तभी दो लोग पहुंचे। वे दौड़ कर आए। एक ने सि‍र पकड़ा हुआ था। शेल्टर में पहुँच कर जैसे ही उसने सि‍र से हाथ हटाया, पानी के साथ सि‍र से खून चहरे पर पहुँच गया। उसे यह चोट ओले से ही लगी थी। मेरे पास बेंड-ऐड थी। मैंने उसे लगाने के लि‍ए बेंड-ऐड दी, पर वह ठीक से चिपकी नहीं। तब तौलिये से उसका से सि‍र बांधा गया।

चारों तरफ ओलों से सफेद हो गया था। बारिश-ओले जिस तेजी से आए, उसी तेजी से बंद भी हो गए। आसमान साफ होने लगा। हम आगे बढे़। थोड़ा चलने के बाद हम उस जगह पहुंचे चट्टी में, जहां खाना मिल सकता था। वहां ताला लगा था। वहां एक लड़का था। उसने बताया कि‍ चट्टीवाला एक घंटे में आएगा। अभी वह बकरी चराने गया है। दम्पति वहीं सुस्ताने लगे। उनके पास कुछ चना चबेना था। उसे निकाल कर खाने लगे।

मेरी समझ में नहीं आया कि‍ मैं क्या करूं। मैंने लड़के से और जानकारी चाही, तो उसने बताया कि‍ आधा किलोमीटर आगे मोखम्बा जगह है। वहाँ खाने को मिल सकता है। अब घंटे भर यहां रुकना बेकार था। मैं मोखम्बा की ओर बढ़ चला।

मेरा लोअर कीचड से लथपथ हो गया था। जूते भी गीले हो गए थे। चलना दुश्‍वार हो रहा था। आधा घंटा चलने के बाद एक पत्थरों का बना छाना जैसा दिखा। मैं समझ गया कि‍ यह ही मोखम्बा है। खाना मिलने की संभावना ने चाल बढ़ा दी और मैं दस मिनट में ही उस छाने के दरवाजे पर था। दरवाजे से झांक कर देखा कि‍ एक लगभग तीस-पैंतीस साल की औरत बैठी कुछ काम कर रही थी। मैंने उससे पूछा, ‘‘खाना मिलेगा?’’ उसने आश्‍चर्य से कहा,  ‘‘इस वक्त?’’  मैंने कहा, ‘‘हाँ,  भूख लगी है।’’ उसने कहा कि‍ खिचड़ी बना सकती हूँ। मैंने जवाब दिया, ‘‘चलेगी, बनाओ।’’ फिर मैं बाहर बैठ गया। लगभग बीस- पच्चीस मिनट बाद उसने कहा, ‘‘अन्दर आ जाओ। खिचड़ी बन गयी है।’’

मैं अन्दर गया। थाली में गरम-गरम खिचड़ी थी। उसमें खूब सारा घी भी था। घी की खुशबू ने भूख और बढ़ा दी। मैं खिचड़ी पर टूट पड़ा। जब कुछ खिचड़ी पेट में पहुँच गई, तो उस महिला से बात करने का ख्याल आया। उसका नाम रंगीली था। पहाड़ के हिसाब से यह कुछ अटपटा,  कम प्रचलित नाम था।

रंगीली मोखम्‍बा चट्टी पर होटल चलाती है। गोंडार की रहने वाली है, जहां उसकी थोड़ी खेती है। पति का देहावसान चार-पांच साल पहले हो गया। रंगीली ने जमाने के हालत देखते हुए साथ रहने के लिए अपनी माँ को बुला लिया। माँ आज गोंडार वापस गई हुई थी। रंगीली की एक बेटी है। रंगीली तो अनपढ़ है और उसके वैधव्य ने उसे शिक्षा के महत्व को जता दिया है। इसलिए रंगीली को बेटी के भविष्य की चिंता है। 12वीं पढ़ने के बाद बेटी आगे पढ़ना चाहती थी। इसलिए उसे गुप्तकाशी कॉलेज में भेज दिया। बेटी के भविष्य की खतिर उसने बेटी को पढ़ने भेज तो दिया, पर अब साल का चालीस-पचास हजार का खर्चा भारी पड़ रहा है। इसीलिए उसने इस सुनसान जगह, जहां उसका पहले सिर्फ गाय पालने का ग्रीष्मकालीन छाना था, वहां यात्रियों के लिए खाने की व्यवस्था शुरू की। जब एकाध बार थके यात्रियों ने रात रुकने की व्यवस्था के बारे में पूछा तो उसने तथाकथित ढाबे में अपनी मेहनत से एक और कमरा चिन दिया, दो बिस्तर भी रख दिए। अब अगर कोई रहना चाहे तो किराया देकर रात भी काट सकता है। जंगल में वह अकेली अपनी माँ के साथ रहती है इस छाने में, जो अब होटल भी कहलाता है।

रंगीली ने पांच-छह गाय और कुछ बकरियां पाली हैं। उसने जंगल में क्यारियां बनायी हैं, जिनमें वह आलू और अन्य उपज बोती है। दूध सिर्फ एक गाय देती है, बाकि जानवर उसकी क्यारियों के लिए खाद पैदा करते हैं। सर्दियों में अपने गाँव में रहती है, गोंडार के खेतों को जोतती है। बेटी की पढ़ाई के खर्चे को पूरा करने के लिए बकरियों को बेचती है। होटल अतिरिक्त आय है।

पेट भर चुका था। कपड़े गीले थे। इसलिए तय किया कि रात रंगीली के होटल में ही गुजारी जाए। रंगीली को रात के खाने के लिया कहा और यह भी बताया कि रात को उसके होटल में ही रहूंगा। मुझे रंगीली की हिम्मत और कर्मठता ने बहुत प्रेरणा दी थी।

गीले कपडे़ बदल कर मैं बाहर आया। ठण्ड बढ़ गई थी। सि‍र में मैंने गमछा बांध लिया। कल सुबह कोटद्वार से बहुत डिप्रेश चला था। मैं इस वक्‍त अन्दर से बहुत खुश था। कल दो दोस्त दीवान और हयात मिले थे और आज अब ये कर्मठ भुली रंगीली।

मन की आँखें : शशि‍ कांडपाल 

बच्चों के साथ शशि‍ कांडपाल।

जिंदगी अनुभवों से भरी रंगीन किताब ही तो है- कुछ खट्टे, कुछ मीठे, कुछ सबक की तरह और कुछ जीवन को नया मोड़ देने वाले अनुभव। उनमें से एक बच्चा है- बाताश! जैसे- हिंदी में पवन होता है न!

पति की नौकरी के तबादले कहीं टिकने ही नहीं देते थे और नए माहौल में ढलने के साथ-साथ आसपास के स्कूल में नौकरी भी ढूंढ़नी पड़ती, क्योंकि स्कूल जाये बिना मेरा मन नहीं लगता था- चाहे छुटपन में पढ़ने जाना हो, चाहे अब पढ़ाने। जहाँ जाती शिक्षिका की आवश्यकता मेरा इन्तजार कर रही होती।

पति‍ को नागालैंड, दीमापुर ट्रांसफर मिलते ही लगा, शायद अब मैं नहीं पढ़ा सकूंगी क्योंकि वह जगह हमारे लिए न सिर्फ नई थी, बल्कि कई भ्रांतियां भी सुनने को मिल रही थीं। असम बहुत बुरे दौर से गुजर रहा रहा था। बोडो आन्दोलन का असर दीमापुर में भी था। भारत के अन्य प्रांतों से आए लोगों को जिन्हें नागा लोग ‘प्लेन मानु’ कहते, उनके बारे में कोई अच्छी राय नहीं रखते और स्कूल में सिर्फ दक्षिण भारतीय इसाइयों को पढ़ाने के लिए चुना जाता है आदि आदि। स्टाफ़ ने हमारे लिए तीसरी मंजिल पर मकान भी ढूंढ़ रखा था, लेकिन रात-बिरात आते भूकम्पों से परेशान हो गए। ऐसे में एक पड़ोसन ने सुन्दर सा मकान दिखाकर सूचना दी कि यह डीएफओ साहब के बंगले का आउट हाउस है। वह सिर्फ एक टीचर को ही किराये पर देंगे। अगर आप नौकरी ढूंढ़ लें तो काम बन सकता है।

दो-चार स्कूलों के पते के साथ नौकरी ढूंढ़नी  शुरू की और एक मिशनरी स्कूल में हिंदी टीचर की  जगह खाली  मिल गई। मिशनरी स्कूल सुबह से दोपहर तक सामान्य बच्चों के लिए चलता और दोपहर बाद ग़रीब बच्चों को पढा़या जाता था। उन बच्‍चों को पढ़ाने लोग स्वेच्छा से आते थे। आवश्यक सामग्री भी मिशनरी और लोगों की चैरिटी से जुटाई जाती।  सिस्टर्स के ग्रुप्स न सिर्फ पढ़ाते, बल्कि गरीब, कमजोर तबकों से आये बच्चों का एक हॉस्टल भी चलाते, जिनमें उन बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने के लि‍ए कई काम-धंधे भी सिखाये जाते। देखा-देखी मैं भी चल रहे प्रयासों में हाथ बंटाती या कहूं मुझे ऐसी सेवा देने में अजीब-सा सुकून मिलने लगा था।

हम छुट्टियों में अन्य संस्थाओं द्वारा किये जा रहे कामों को देखते, कहीं लूम पर बुनाई होती तो कहीं कपड़े सिले जाते और उससे हुए लाभ से संस्थाओं के बच्चों का भरण पोषण होता। उनमें कई बच्चे मंदबुद्धि, हाथ-पैरों से लाचार, लेकिन अपनी दिनचर्या कर सकने लायक होते। फिर भी सामान्य से कमजोर ही रह जाते, ज्यादा दिक्कत अंधे बच्चों के साथ होती। उनका दीमापुर में कोई अलग से विद्यालय न होने की वजह से ख़ास ट्रेनिंग नहीं दी जा पा रही थी और वे सिर्फ गिरिजाघरों में गाये जाने वाले कोरस सीखते या कोई वाद्ययंत्र सीखते।

मैं प्रभु के बनाये संसार के हर अणु की प्रशंसक हूं। माँ कहती- कभी किसी की कमजोरियों पर मत हँसों क्योंकि यह उस व्यक्‍ति‍ का नहीं, बल्कि उस महाप्रभु की कृति का अपमान होगा जिसने उसे बनाया।
कभी सोचती- अगर मेरी एक टांग न रही तो?
लंगडा के चलती…
कभी चीजें टटोलती, गिर-गिर पड़ती और घरवाले समझ जाते कि‍ आज मेरे नयन छुट्टी पर हैं।
कभी बहरी और कभी गूंगी…
मुझे गूंगा होना सबसे ज्यादा भाया और आज तक इस्तेमाल में लाती हूं- न जाने कितनी खरीददारी में होने वाली झक-झक, झगडे़ टालना, समय को उसका हिसाब करने देना जैसे बड़े प्रोजेक्ट, गूंगे रह कर पूरे किये। दीमापुर सब्जी मंडी में सब्जीवाले मुझे कई महीने तक गूंगा समझ कर इशारों से मोलभाव समझा देते और मैं शांति से काम चला लेती, क्योंकि भाषा आती नहीं थी और कहीं सुना था कि‍ नहीं बोलने से एनर्जी भी बचती है।

जाड़े के दिनों में स्कूल सबसे ज्यादा कार्यशालाएं आयोजित करता। बच्चों में स्फूर्ति भी रहती और बड़े-बड़े मैदानों का उपयोग होकर शारीरिक वर्जिश भी होती। एक दिन कोहिमा की एक संस्था जो अंधे और बहरे बच्चों के लिए काम करती थी, से आग्रह आया कि‍ वह एक पखवाडे़ के लिए इच्छुक टीचर्स को आमंत्रित करते हैं ताकि वे इस संस्था  में आकर अपनी सेवाएं दें-  क्राफ्ट, डांस, मार्शल आर्ट या सिलाई-कढ़ाई ताकि बच्चों को कुछ नया सिखाया जा सके। सच कहूं तो ये मौके टीचर्स को बहुत कुछ सिखा जाते हैं और कोहिमा घूमने का आकर्षण भी था।

मदर ने हम पांच लोगों को भेजने का निर्णय लिया और काम भी निर्धारित किए। किसी भी तरह के शारीरिक कमजोर बच्चों की संस्थाओं में सामान्य बच्चों से कुछ अलग कई काम होते हैं। इसलि‍ए क्राफ्ट या कुछ भी सिखाने के लिए भी अलग तरीके अपनाने पड़ते हैं और ये हम सब के लिए एक चुनौती भी था। लेकिन बच्चों का मनोरंजन एक ऐसा काम था, जिसके लिए एक बचकाने व्यक्तित्व का होना जरूरी था, जो उन बच्चों में घुल मिल सके। नई-नई कहानियां बना सके और पूरे फील या आवाजों से उसे और मनोरंजक बना सके क्योंकि वहाँ उपलब्ध हर किताब की कहानियां, कवितायें बच्चे सुन-सुन कर ऊब चुके थे। जैसे ही कोई रटी रटाई कहानी या कवि‍ता शुरू करता वे शोर मचा देते…ये नहीं..ये नहीं…।

मुझे अपनी बेटी को बहलाने के लिए दिन में दो-चार कहानियां तो गढ़नी ही पड़ती थीं और इस काम से मानो मेरी कल्पनाशीलता को एक दिशा और उद्देश्य मिल गया था। चलते-फिरते बस कहानियां याद करने की कोशिश करती, कुछ अंग्रेजी में, कुछ हिंदी में, लेकिन आश्चर्य की बात यह रही कि कहानियां समझने में भाषा कभी बाधा नहीं बनी। मैं  बड़ों की कहानियों को छुटका बनाती…उसमें बचकाने भाव भरती और अपनी आवाज में बदलाव और मुरकियों के साथ उन्हें सुनाती, तो वहां उपस्थित करीब पचास बच्चे सांस भी बिना आवाज के ले रहे होते कि‍ कहीं कुछ छूट न जाए…कोई मुझे देख नहीं पाता था तो मैं भी शर्म से परे आराम से उन्हें प्रसन्न होता देखती।

एक दिन कक्षा में घुसते ही एक किलकारी सी आवाज आई…
शशि दीदी!
मैंने सोचा- शायद कोई नार्मल बच्चा भी इनके बीच है, जो मुझे देखता और पहचानता है और बात आई गई हो गई।
मैंने कुछ खेल भी विकसित कर लिए थे। इसलि‍ए उन्हें खेलने के दौरान पाया कि‍ इनमें से किसी को कुछ भी दिखाई नहीं देता, तो आखिर मुझे पहचाना किसने? और कैसे ?
अगले दिन क्लास के दरवाजे पर पहुंचते ही फिर वही आवाज आई, लेकिन आज मैं चैतन्य थी। पाया कि‍ एक किशोर, दुबला और अति आकर्षक बच्चा ऊपर की तरफ देखते हुए मेरा नाम ले रहा है।
मैं उसके पास पहुंची और पूछा कि‍ उसने मुझे कैसे पहचाना?
‘आपकी खुशबू से।’ बच्‍चा मुस्‍कराया।
मैं निरुत्तर..हालाँकि ऐसा कुछ ख़ास नहीं था, लेकिन हां, चन्दन की खुशबू लगाई थी।
दूसरे दिन फिर पहचान गया, जबकि आज चन्दन नहीं था।
कैसे पहचाना?
आपकी खुशबू से।
तीसरे दिन पावडर त्यागा, चौथे दिन क्रीम और पांचवें दिन सादे पानी से नहाई, लेकिन पहुंचते ही उसकी कुहुक ने मुझे फेल कर दिया।

वि‍ज्ञान के पास हजारों तर्क होंगे, विशेषज्ञ भी अपने मत रखेंगे, लेकिन मैंने अपने जीवन में पहली बार यह जाना कि दरवाजे पर कदम रखते ही मुझे पहचानने वाला यह बच्चा अति विशिष्ट है। मैदान में मैं उससे दूर घेरे में बैठती और वह पता नहीं कब आकर मेरी बगल में बैठ जाता और पल्लू को अपनी उंगलियों में लपेट रहा होता। उसने उन तमाम तरह के बच्चों की गंध के बीच मुझे कैसे पहचाना? मैं उठने की सिर्फ सोचती और वह पूछ बैठता- दीदी जा रही हो क्या?
मुझे उससे डर लगने लगा- और भी न जाने मेरे बारे में क्या-क्या जान जाता हो!

पंद्रह दिन बीतने तक यूं लगा कि‍ हम तो हमेशा से साथ हैं- दिन-रात, मेस में, ऑडिटोरियम में, बाग़ में हर समय साथ रहते। साथ ही यह और लगा कि‍ अब तो कार्यशाला  खत्‍म होने वाली है। इन मासूमों को छोड़ कर कैसे जायेंगे?

मैं बच्चों से खुलकर बात करना चाहती थी, लेकिन उससे पहले ही सिस्टर्स ने राय दी कि‍ तुम अचानक अपने घर चली गई हो और कुछ दिन बाद आओगी, कहकर बच्चों को बहला लेंगे। इन्हें जाने की सूचना मत देना, क्योंकि इनका जुड़ाव तुमसे बहुत ज्यादा हो गया है। रोना-धोना करेंगे और तुम्हे भी असुविधा होगी। इसलि‍ए मुझे चुप रहना पडा।
लेकिन वह लाठी टेकता स्टाफ रूम तक आ गया और बिना किसी की सहायता से सीधे मेरी जगह पर आकर बोला, ‘‘आप, कल से नहीं आएँगी ना?’’
मैंने सर पकड़ लिया क्योंकि अगर हंगामा हुआ तो सिस्टर्स मुझे दोष दे सकती थीं।
मुझे चुप पाकर बोला, ‘‘दीदी, आज आपकी आवाज में वह बात नहीं थी। आपने बहुत गलतियाँ भी कीं।’’ बात सच थी क्योंकि मैं अन्दर ही अन्दर उन बच्चों के लिए भावुक थी कि कल से इन्हें कौन कहानी सुनाएगा।

कुछ पल हम दोनों चुप रहे और बहुत साहसी होकर वह बोला, ‘‘अच्छा जब मैं बुलाऊं, तब आओगी क्या एक बार?’’ मैं बोल न सकी और उसका हाथ पकड़ कर थपथपा दिया।

छह महीने बाद मुझे संस्था की तरफ से एक समारोह में बुलाया गया। समारोह बोर्ड पर नजर पड़ी तो कुछ नवीन कहानियों को ब्रेल में परिवर्तित करने का सन्देश लिखा था।
और मेरे आश्‍चर्य का कोई ठिकाना न रहा, जब मैंने कहानी पढ़ने वाले की स्टाइल और कहानियां सुनीं। वे मेरी कहानियां थीं, जो किचेन में खाना बनाते, बर्तन धोते या अपनी बच्ची को बहलाते यूं ही बनाई थीं और उनको इस तरह से सराहे जाते देख कर निशब्द थी।
उस बच्चे ने उन कहानियों को ब्रेल में बदल कर अपने जैसे और बच्चों के लिए भी संरक्षित कर दिया।

इस बात को बीस साल से ज्यादा हो गए हैं। मुझे नहीं पता कि‍ अब वह बच्चा कहाँ होगा, लेकिन जहाँ भी होगा कुछ आश्चर्यजनक ही कर रहा होगा, ऐसा मुझे विश्वास है।

हौसले की उड़ान : शशि‍ काण्डपाल

खुद को पैदायशी शिक्षिका मानने वाली शशि‍ काण्डपाल दि‍व्यांग

शशि‍ काण्डपाल

शशि‍ काण्डपाल

बच्चों के लि‍ए वि‍शेष रूप से संवेदनशील हैं। वर्तमान में वह दिव्यांग बच्चों के लिए संस्था ‘शाश्वत जिज्ञासा’ से जुड़ी हैं। लखनऊ के नामी स्कूल में पढ़ाने के दौरान उनके संपर्क में आए दि‍व्यांग बच्चे का संस्मरण-

कुछ समय पहले मॉल में बहुत जरूरी सामान ढूंढ़ने की दौड़ में अचानक लगा मानो कोई अजीब सी आवाज़ में मेम, मेम पुकार रहा है। आम इंसान शायद उस मेम शब्द को न समझ पाए, लेकिन मैं जान जाती हूं कि‍ कोई वि‍शेष बच्चा मुझे पुकार रहा है। नज़र घुमाई तो व्हील चेयर से आधा लटका बच्चा मुझे यूं लपकने को तैयार था, मानो जरा सी ताक़त आ जाये तो वो मुझे पकड़ ले।

मैं याद करने की कोशिश में उस तक पहुंची तो हैरान रह गई। वह रुद्रांश था।

मेरा वह वि‍शेष बच्चा, जिसके लिए मुझे कई चट्टानों से टकराना पड़ा था और सबसे बड़ी चट्टान खुद उसका अपना परिवार था, समाज था और स्कूल था। अब वह शरीर से कमजोर नहीं था। अच्छा खासा अठारह साल का नौजवान। आवाज़ भले ही भारी हो गई थी, हँसी वही दूधिया थी।
रुद्रांश एक संभ्रांत परिवार के अत्यंत कामयाब पिता की नाकामयाबी का प्रतीक बन चुका था। वह मुझे तब मि‍ला, जब उसके छोटे भाई के स्टडी टूर के सि‍लसि‍ले में उसके घर गई।

मैं ड्राइंग रूम में बैठी चिंघाड़ने सी आवाज़ें सुन रही थी, जिसे घरवाले कभी बिस्कुट, कभी मिठाई या कभी फालतू के ठहाकों से बहका रहे थे। मुझे वह आवाज़ बार-बार परेशान कर रही थी और लगता था मानो किसी को यातना दी जा रही हो। ऐसे में मेरा बेचैन होना स्वाभाविक था। मैं पूछ बैठी कि‍ आखिर यह क्या हो रहा है? यह आवाज़ किसकी है और क्यों है? क्योंकि आपके जिस बच्चे की रिपोर्ट मुझे स्कूल में जमा करनी है, उसे तब तक पूरा कैसे कर सकूंगी जब तक उसका वातावरण नहीं जानूंगी या आप लोग मुझे सब कुछ सच-सच नहीं बताएँगे। वे सभी अचानक चुप हो गए और एक-दूसरे का मुंह देखने लगे। मैं मन ही मन डरने लगी कि‍ पता नहीं अब किस सच्चाई से मेरा सामना होगा।

वे लोग मुझे बड़ा सा बरामदा पार कराकर एक कमरे में ले गए। इसकी बड़ी-बड़ी खिडकियों में जालियाँ लगी थीं और जानवर बंद करने के बाड़े सा अहसास दिला रही थीं। उसी के भीतर एक नन्ही सी जान अपनी व्हीलचेयर पर चमड़े की बेल्ट से बंधा  चीख रहा था। शायद वह दिनभर चिल्लाता होगा इसलि‍ए उसका गला बैठ गया था और आवाज घो-घो में बदल गयी थी | वह एडमिशन चाहने वाले अक्षत का बड़ा भाई था, लेकिन दिखता उससे भी छोटा था। उम्र दस साल, लेकिन कद, काठी पांच साल सी। बोलने, चलने, हाथ-पैरों की हरकतों से लाचार, दिमाग से कमजोर लेकिन सुन सकता है। मुझे देखते ही शांत हो गया। मैं स्पेशल एजुकेटर नहीं हूं। लेकिन मानव हूं और उसका इतना परेशान होना मुझे बर्दाश्त नहीं था। उसके पिता और दादा की परिवार के हर सदस्य और नौकरों को सख्त हिदायत थी कि उसे कमरे तक सीमित रखा जाये ताकि उनका सो कॉल्ड सम्मान बचा रहे। लेकिन वह जैसे-जैसे बड़ा हो रहा था, उसकी रुचियाँ बदल रही थीं और उसे संभालना मुश्किल होता जा रहा था।

माँ का दिल भर-भर आता कि‍ उसके बच्चे का क्या होगा? कैसे जियेगा? मेरे पूछने पर कि‍ उसे आज तक स्कूल क्यों नहीं भेजा गया या कोशिश क्यों नहीं की गई, का जवाब मिला कि हालत तो आप देख ही रही हैं। दो-चार स्कूलों में बात की थी तो उन्होंने ये बवाल लेने से साफ़ मना कर दिया और बड़ा होने पर किसी स्पेशल स्कूल भेजने का मशविरा दे दिया।

मैंने रिसर्च में पढ़ा था कि‍ यदि ऐसे बच्चों को सामान्य बच्चों के साथ रखा जाये तो इनमें ना सिर्फ सुधार आता है, बल्कि कई चीजें सीख भी जाते हैं। सामान्य बच्चे भी इनके साथ रह कर अपनी जिम्मेदारी समझ पाते हैं और आपसी समझ का वातावरण पैदा होता है। आखिर, समाज के इतने बड़े हिस्से को समाज से काटने का अपराध हम कैसे कर सकते हैं?

उसकी माँ ने मेरी भावुकता का फायदा उठाते हुए कहा कि‍ क्या मैं इसे अपनी क्लास में दाखिला दिलवा सकती हूं? मैंने उन्हें स्कूल आने का न्योता और सहायता का आश्वासन दिया। हालाँकि, मैं खुद नहीं जानती थी कि स्‍कूल प्रशासन मेरी इस सिफारिश को कैसे लेगा?

दूसरे दिन मेरी रिपोर्ट और रुद्रांश का केस प्रिंसिपल ने मीटिंग बुलाकर सबके सामने रखा। मेरी सोच से परे वहां हर इंसान के मुह पर सिर्फ ना थी। हर टीचर इस पचड़े से दूर रहने की राय दे रहा था। यह स्कूल का माहौल बिगाड़ने की कोशिश थी। जो बच्चे यहाँ ऊँची फीस देकर पढ़ रहे हैं, उनकी पढा़ई में खलल डालने का हक़ मुझे किसने दिया, यह पूछा जा रहा था। जब वह चिलाएगा, तब आप क्या कर पाएंगी? कितनी कक्षाएं डिस्टर्ब होंगी, आपने सोचा है? क्या हमारे यहां बच्चों की कमी है, जो हम ऐसे बच्चों को दाखिला देने लगें? आखिर आपके सि‍र पर यह समाज सेवा का भूत क्यों सवार है? मेरी कम जानकारी और भावुकता पर ताने थे और व्‍यावाहरि‍क बनने की सलाह थी।

उसके बाद मेरी साम दाम दंड भेद की लड़ाई खुद और स्कूल से हुई। मैंने ना सिर्फ क़ानून के कुछ अंश और विकलांगों से सम्बंधित कुछ तथ्य उनके सामने रखे, बल्कि खुद के इस्तीफे की पेशकश भी कर डाली। उसमें लिखा कि‍ मैं असंवेदनशील लोगों के साथ काम नहीं कर सकती। उसके बाद रुद्रांश मिड सेसन में मेरा शिष्य बना, छोटी सी कुर्सी में चमड़े की बेल्ट से बंधा।

एडमिशन के बाद मुझे दूसरी जंग लड़नी थी। रुद्रांश दिनभर चिल्लाता, तो क्लास के बाकी बच्चे डिस्टर्ब होते और तमाम शिकायतें करते। उनके घरों से भी फोन आते- क्या आपने किसी पागल को एडमिशन दिया है? और यह सब सुनकर मैं आहात होती। प्रिंसिपल धमकाने का कोई मौका नहीं छोड़ती, लेकिन मुझे लगता हमारे इसी असंवेदनशील रवैये ने इन वि‍शेष बच्चों को समाज की मुख्यधारा में जोड़ने का काम नहीं किया। न उनकी जरूरतों का ध्यान रखा और न सहारा देने की कोशिश की।

स्कूल ऑफिस में रुद्रांश के साथ रोज मेरी भी पेशी होती, लेकिन मेरे प्रयोग जारी थे। कुछ टीचर अब मेरी मंशा और कोशिश से सहमत थे और यदा कदा उसकी व्हीलचेयर को क्लास तक पंहुचा देते। उससे हंस कर बात कर लेते, हालाँकि वह सिर्फ टुकुर-टुकुर ताकता। लेकिन आश्चर्य था कि उसे स्कूल का वातावरण पसंद आ गया था और लोगों को देखना उसे अच्छा लगता था। वह प्रार्थना के दौरान चिल्लाता, सो उसे स्कूल लगने के आधा घंटे बाद लाने की हिदायत दी गई। इसे मैंने मान लिया क्योंकि क्लास के और बच्चे भी बहुत छोटे थे और उनका ख्याल रखना जरूरी था। रुद्रांश गाड़ी से किलकता हुआ आता तो आया भी उसे भुनभुनाते हुए लेने जाती।

एक दिन जब रुद्रांश बहुत अशांत था, मैंने वह बेल्ट खोल दी जो उसे कुर्सी से बांधे रखती थी। वह आजादी की ख़ुशी में गिर पड़ा, लेकिन शांत भी हुआ। उसे मैंने चीजें छूने को दी- पुराने अखबार, ब्लॉक्स, फ़ुटबाल, रबर के जानवर और फल। वह बहुत खुश होता। अक्सर अपने दोनों हाथों से मेरा चेहरा छूता मानो कुछ तसल्ली चाहता हो। वह मेरा सब्जेक्ट बन चुका था और मैं अनगढ़ हाथों से उसको संवारने में लगी थी।

उसे खाना-पीना, बाथरूम जाना, कुछ नहीं आता था। लेकिन बच्चों को देखकर अब उसके कांपते हाथ हरकत करते- खाने को मुंह चलता और शैतानियाँ भी सीख गया था, क्योंकि खाली जो रहता था।

पिता यूं फोन करता मानो अपनी कीमती थाती मुझे सौंप चुका हो और मैं उसको नुकसान न पंहुचा दूं। बच्चे क्लास में जोर-जोर से पढ़ते और वह सुन सकता था। रुद्रांश घरघराती आवाज़ में दिनभर घर में रट्टा लगता और माँ को निहाल करता।

धीरे-धीरे क्लास के बच्चे रुद्रांश का साथ देने लगे। वे उसको एक सामान्य बच्चे की तरह समझाते और वह कुछ न समझ के भी हँसता और खुश रहता। उसकी देखभाल होती। ढेर सारे दोस्त जो थे, उसके पास अब।

आज रुद्रांश ने अपने साथियों का हाथ पकड़ खड़े होने की कोशिश की, आज वह गिर पडा़ और उसके अति कोमल घुटने छिल गए, यह सब चलता। लेकिन मैंने अब डरना बंद कर दिया था क्योंकि हम दोनों एक-दूसरे का साथ जो देने लगे थे।

पोयम्स के दौरान रुद्रांश हंसता, तरह-तरह से मुंह बनाता, हाथों को नचाता और पैर भी चलाता। टुकड़े करके देने पर रोटी खाने लगा। कलाई से चम्मच बाँध देती और वह चावल, मैगी खा लेता। आश्चर्यजनक परिवर्तन थे।

कानून भी कहता है कि‍ यदि कोई वि‍शेष बच्चा, नार्मल बच्चों के साथ पढ़ना चाहे तो स्कूल को उसे जगह देनी पड़ेगी और यही कानून मेरा सहारा था। हालाँकि, मैं जानती थी कि इन बच्चों के लिए वही स्कूल ज्यादा उपयुक्त हैं, जहां उनके लिए बाथरूम, टूल्स, पठन सामग्री, सहायता और टेकनीक्स उपलब्ध हैं, लेकिन मैं तो बस उसे पहले उस अँधेरे कमरे से बाहर लाना चाहती थी और खुद की क्षमता भी देखना चाहती थी।

एक और जंग…एक साल के बाद रुद्रांश को उसके जैसे अच्छे वि‍शेष स्कूल में दाखिला दिलाने के लिए उसके दादा और पिता को राजी करना और दबाव डालना। उन्हें कतई  गवारा न था कि विशेष स्कूल की बस रोज उनके दरवाजे पर आये और एक दिव्यांग यहाँ रहता है, यह सब जाने।…हाय रे झूठी शान!

लेकिन अब हम तीन थे- मैं, रुद्रांश और उसकी माँ। परिवर्तनों से उसकी माँ का आत्मविश्वास भी बढ़ चुका था। काफी हुज्जत के बाद स्पेशल स्कूल चुना तो गया, लेकिन दिल्ली शहर में।

रुद्रांश चला गया।

तीस बच्चों के बावजूद क्लास में सन्नाटा था। अब मुझे हर समय मुस्कुरा कर देखने वाला कोई नहीं था। इस बीच सभी को रुद्रांश से लगाव हो गया था। प्रिंसिपल अक्सर उस भोले बच्चे की मुस्कान याद करतीं। इंटरवल में टीचर्स उसे देखने आती थीं। वह हेल्लो कहना और हाथ मिलाना भी सीख गया  था। अक्सर टीचर्स के दुपट्टे  या साडी़ का छोर पकड़ कर हँसता और सबको अपने मोह में बाँध लेता। अब सब उसे मिस करते थे।

रुद्रांश तो चला गया, लेकिन उसके जाने के बाद कई वि‍शेष बच्चों को लेकर उनके माँ-बाप आगे आये। उनकी आशा और हिम्मत के लिए रुद्रांश एक रास्ता खोल कर चला गया था।

जब लोग अपने बच्चों के 90 प्रति‍शत मार्क्स पर हताश होते हैं, तो मुझे रुद्रांश जैसे बच्चे बहुत याद आते हैं, जिनके माँ-बाप उनके मुंह से सिर्फ एक संबोधन सुनने को तरसते हैं। वो अपना नाम बता दें तो क्या कहने! वो खुद कुछ आराम से खा ले तो माँ निहाल।
सच्चाई तो यह है कि‍ ज्यादातर लोग इन बच्चों को अपनी अज्ञानता से घरों में बंद करके उन्हें और भी अक्षम बना देते हैं और दोष बच्चों पर मढ़ देते हैं या ऊपर वाले पर।

जानकर बहुत अच्छा लगा कि‍ रुद्रांश जिसे मैंने पेन्सिल पकड़वाने में अपना पूरा जोर लगा दिया था, उसने कला में रुचि दिखाई और स्पेशल स्कूल ने उसे खूब प्रेरित किया। उनकी और अपनी माँ की सहायता और जिद की वजह से रुद्रांश  अपने पिता की परवाह किये बिना दिल्ली के एक नामी फ़ास्ट फ़ूड सेण्टर में लोगों की आवभगत का काम करता है। स्कूल इन बच्चों को ना सिर्फ शिक्षित करता है, बल्कि अपने पेरों पर खड़े होने में भी सहायता करता है। रुद्रांश  आज भी बोल नहीं पाता, लेकिन प्रभावशाली मुस्कान से सबको अपना बना लेता है। वहां आये बच्चो के स्केच बना कर उन्हें खुश और फिर से आने को प्रेरित करता है। हॉस्टल में रहता है। घर नहीं आना चाहता। शायद वो काली यादें उसे डराती हैं।

इस बातचीत के दौरान वह लगातार मेरा हाथ अपनी हथेलियों में पकडे रहा मानो अब कभी नहीं छोड़ेगा। लेकिन माँ के समझाते ही अपना मोबाइल निकाल कर हिलते हाथो से मेरा फोटो लिया। मेरे पूछने पर कि‍ इसे मैं कैसे याद रही तो पता चला उन्होंने क्लास ग्रुप की इनलार्ज फोटो बनवा कर उसे दी है, जिसे वह अपने साथ रखता है।

मुझे लगा कि‍ मेरे संघर्ष का फल अगर ये वाला रुद्रांश है, तो मैं जीवन भर संघर्ष करने को तैयार हूं।

रुद्रांश…मेरी आँखें खोलने और मुझे गौरान्वित करने का शुक्रिया बच्चे!!
शुभकामनायें!!

शशि‍ काण्डपाल

शशि‍ काण्डपाल

शशि‍ काण्डपाल

शशि‍ काण्डपाल

चित्रकार जे.पी. सिंघलः कुछ यादें : ओमा शर्मा

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प्रसि‍द्ध चित्रकार और छायाकर जे.पी. सिंघल पर ओमा शर्मा का संस्मरण-

कुछ यादें आपके जेहन में हमेशा के लिए तारी हो जाती हैं और बारहा अनजाने ही। जे.पी. सिंघल साहब के साथ पहली मुलाकात की मुझे खूब याद है, जो वरिष्ठ लेखिका सुधा अरोड़ा के घर एक दोपहर को हुई थी। जब मैं वहां पहुंचा तो लेखक-कलाकार मित्र प्रभु जोशी अपने सुपरिचित अंदाज में वहां उपस्थित मेहमानों को कला और साहित्य की अपनी समझ के किसी पहलू पर संबोधित कर रहे थे। वहां घुसने के बाद मैं चुपचाप एक सोफे पर बैठ गया। थोड़ी देर बाद उन्होंने मुझे वहां उपस्थित मेहमानों से मिलवाया। पहली मुलाकात के समय जैसा होता है सभी ने एक नागरीय मुस्कुराहट के साथ परिचय की अदला-बदली की, सिवाय सिंघल साहब को छोड़कर जो पहली मुलाकात पर ही ऐसे गले मिले जैसे कि मैं उनका कोई भूला-बिछड़ा दोस्त रहा हूँ। मैं तब तक उनको नहीं जानता था। उसी दौरान उन्होंने हाजी अली स्थित घर पर आने का निमंत्रण भी दे डाला जो उन दिनों मेरे घर से चंद मिनटों की ही दूरी पर था।

अगले रोज जब मैं उनके घर पहुंचा तो मुझे बड़े विरल कलात्मक अनुभव का एहसास हुआ। लिफ्ट के पास ही उनकी कई पेंटिंग लगी थीं। प्रवेश द्वार के पास उनके खास कलात्मक हस्ताक्षर की लिपि पीतल में जड़ी थी हालांकि मैं तब तक उससे वाकिफ नहीं था। उसके ठीक ऊपर कोई पुराना भित्तीचित्र था। थोड़ी देर इंतजार के बाद किसी ने दरवाजा खोला और मुझे अंदर बुला लिया। उस चौकोर कमरे में मेरा बाद में भी कई मर्तबा जाना हुआ लेकिन उसमें ऐसी अद्भुत चित्रकारियां, शिल्पकृतियाँ, म्यूरल और तरह-तरह की इतनी सारी आकृतियां सजी रखी थीं कि मैं वहां बैठकर सिर्फ हैरान और सुकून महसूस कर सकता था क्योंकि वैसा कमरा न मैंने पहले कभी देखा था न बाद में। शायद इसका कारण यह भी रहा हो कि उस कमरे में सिर्फ अंतिम आकार लेती हुई चित्रकारियां ही नहीं, बल्कि कुछ ऐसी अधबनी भी थीं जो किसी मधुबनी से कम नहीं थीं। थोड़ी देर बाद वे अपने उसी खास अंदाज यानी गोल गर्दनवाले कुर्ते और पायजामे में मुस्कुराते हुए आये और फिर से लिपटकर गले मिले। मैंने उनका एक मेजबान का अपनापन महसूस किया। मुझे थोड़ा ताज्जुब हुआ क्योंकि वो इतने बड़े-बुजुर्ग कलाकार थे और ऐसे खुलकर स्नेह बरसा रहे थे जिसकी कोई वाजिब वजह मुझे समझ नहीं आ रही थी। हां, मुझे एक सच्चे कलाकार की इंसानियत का एहसास जरूर हो रहा था। उसके बाद भी कई मर्तबा मिलना हुआ इसलिए उस पहली मुलाकात की बहुत सारी चीजें मैं भूल गया हूँ। बस मुझे याद है तो ये कि वो डेढ़ घण्टे का वक्फा मानो पलक झपकते ही निकल गया था। उस समय वे 76 साल के जवान थे। जिंदगी और आवेग से भरे हुए और दुनियादारी से तो एकदम ही बेपरवाह। और तो और उनमें कोई कलाकार होने तक का भरम नहीं था। उस समय वे सिर्फ शरीफ इंसान थे जो अपनी जिंदगी पूरी आजादी से जी रहा हो। अलबत्ता ये आजादी पाने के लिए उन्होंने आधी सदी से ऊपर मशक्कत की थी। उनके दिमाग में उस समय अगर कुछ था तो बस यही कि अपने मेहमान को कैसे तवज्जो दी जाए। वे बातें करते और जैसे बेलगाम अतीत रास्तों में घुमक्कड़ी करने लगते। थोड़ी देर बाद ही मुझे लगा कि मैंने तयशुदा वक्त से कहीं ज्यादा उनका वक्त ले लिया है। जब मैं चलने लगा तो वो मेरे साथ लिफ्ट तक आ गये। लेकिन जब लिफ्ट आई, उसके बाद भी मेरे साथ उतर आये। मेरे लाख माना करने पर भी जब तक मैं अपने कार में नहीं बैठ गया उन्होंने मुझे नहीं छोड़ा (और यह क्रम हर बार दोहराया गया)। जब मैं घर लौटा तो उनसे हुई मुलाकात मुझे रह रहकर याद आने लगी। मुम्बई में कौन किसी से इस तरह मिलता है? इतने खुले मन से कौन गले लगता है? कौन इतने गरमजोशी के साथ बातें करता है? कौन ऐसे ही मिलने-मिलाने के लिए आमंत्रित करता है।

थोड़े दिन बाद उनका मेरे पास फोन आया कि भाई अरसा हो गया मिला जाए। मुझे पिछली मुलाकात अभी तक गुदगुदा रही थी। मैंने अपनी पत्नी को भी उनके घर जाने को राजी कर लिया ताकि वो भी महसूस कर सके कि एक सच्चे कलाकार से मिलना कितना ऊर्जा भरा होता है। सिंघल साहब और उनकी पत्नी श्रीमती माया सिंघल हमेशा बेहतरीन मेजबान थे। हम हमेशा उसी कमरे में बैठते जहां मैं पहली बार बैठा था। मैं किसी भित्तीचित्र के बारे में उनसे पूछता तो वह उसे हासिल करने तक की दास्तान छेड़ देते जिनकी तादात अच्छी खासी थी। पता नहीं उन्होंने ये बात छेड़ी या मैंने जिक्र किया, थोड़ी देर बाद हम उनके पेंटिंग रूम में चले गये जहां उनकी कई पेंटिंग्स अधबनी रखी थीं। एक तो ईजल पर ही रखी थी। एक बार तो मुझे लगा कि वह ईजल पर क्यों रखी है क्योंकि वह तो सम्पूर्ण हो चुकी है लेकिन उन्होंने थोड़ा सहमते करते हुए बताया कि अभी… इसका निचला हिस्सा थोड़ा खुरदुरा है…चेहरे के हाव-भाव में भी… ऊपर का आसमान बाकी चित्र से मेल नहीं खा रहा है। मुझे वाकई लगा कि मेरे देखने का नजरिया अभी कितना संकुचित है हालांकि मैं पॉल वालरी के इस कथन से वाकिफ था कि कोई भी कलाकृति कभी पूरी नहीं होती है; एक अवस्था के बाद वह दुनिया में समर्पित करनी होती है। शायद इसी को प्रभु जोशी ‘नष्ट होने का कगार’ कहते हैं। उसके बाद उन्होंने मुझे एक और पेंटिंग दिखाई जो एक स्त्री की थी। फकत काले रंग का इस्तेमाल। सांझ ढले के वक्त वह स्त्री किसी पहाड़ी पर आँखें मुंदे कुदरत और अपने आप से मगन थी। एक पारदर्शी हिजाब उसके ऊपर जरूर था लेकिन उसके रोम-रोम से मादकता रिस रही थी। अपनी कोहनी मोड़े वह औरत कमर के बल लेटी अपने ही खयालों में ऐसे खोयी थी जैसे- उसे अपनी दुनिया की या किसी और की कुछ पड़ी ही नहीं हो। या एक अबूझ आनन्द में डूबी हो। उस कमसिन की नाभी पूरी चित्रकारी को एक अतीव मादकता में घोले दे रही थी। इस तरह की चित्रकारी को देखना करिश्माई अनुभव था। यह एक बड़े आकार की पेंटिंग थी जिसमें सिर्फ एक ही रंग यानी काला और और उसमें अलग-अलग शेड्स इस्तेमाल किये गये थे। देखने में बहुत सहज लेकिन उतनी ही आकर्षक लग रही थी। मैं सोचने लगा फकत एक रंग और वह भी काले के सहारे कोई किसी के हावभावों को इतनी बारीकी से कैसे चित्रित कर सकता है? लेकिन हाथ कंगन को आरसी क्या? वह पेंटिंग तो मेरे सामने थी। तब तक मुझे पेंटिंग की बारीकियों के बारे में बहुत ज्यादा जानकारी नहीं थी (अभी भी नहीं है) लेकिन उस पेंटिंग का असर सम्मोहित करने वाला था।

लेकिन ये तो उस शाम इस तरह के अनुभव से गुजरने की शुरुआत भर थी। मैंने कला दीर्घायें देखीं हैं लेकिन इस तरह का कला अनुभव, और वह भी किसी के घर के छोटे से कमरे के भीतर, कहीं नहीं हुआ था। उसके बाद उन्होंने वहीं पर आधा दर्जन रखी पेंटिंगों में से एक उठाई और मुझे दिखाने लगे। अपनी पेंटिंग को दिखाने का उनका लहजा और जज्बा क्या खूब था। मैं पेंटिंग को उठाने में उनकी मदद करता तो वे मुझे रोक देते और इसरार करते कि मैं कहां किस कोण पर खड़ा होकर उस पेंटिंग को देखूं ताकि उनके सृजन को महसूस कर सकूं। मुझे एक पेंटिंग की अभी भी याद है। वह एक आदिवासी महिला की थी जो अपने अधनंगे बच्चे को गोदी में उठाये आसमान की तरफ देख मुस्कुराए जा रही थी। चित्रकार की बारीक निगाह से कुछ छूटा हुआ लग ही नहीं रहा था… उनके फटैले कपड़े, अलग-अलग रंगों के मोती, तरह-तरह के रंग-बिरंगे कंगन, आँखों की चमक… बाजू में एक पेड़ भी था जिसके पत्तों के बीच से उतरी हुई धूप अलग-अलग आकारों में पसरी थी। वह महिला अपने बच्चे के साथ जहां खड़ी थी, उसका आस-पास भी चित्रकार ने पूरी बारीकी से दर्ज कर रखा था। प्रकृति की बारीकियों को इस तरह ‘चित्रित’ करना मेरे लिए बड़ा हैरत भरा था और वह आज भी है। कितनी देर तक काम किया गया होगा ताकि कुछ अखरे भी न और छूटे भी न… आखिर यही तो यथार्थवादी चित्रकारी की कसौटी होती है। बाद में मेरे मित्र भाई प्रभु जोशी ने बतलाया कि सिंघल साहब के यहां सूखे ब्रश का जिस अद्भुत और उस्ताद-परक ढंग से इस्तेमाल होता है, उसकी कहीं कोई मिशाल नहीं है। उनमें कहीं भी कोई ‘स्ट्रोक’ जैसी चीज गोचर नहीं हो सकती। इसलिए वे मानते हैं कि उनकी यथार्थवादी चित्रकारी समूचे बंगाल स्कूल की यथार्थवादी चित्रकारी पर भारी पड़ती है। उनको याद करते हुए जब मैं यह सब लिख रहा हूँ तो उस शाम देखी और दिखाई गयी दूसरी चित्रकारियां भी जेहन में आ रही हैं। लेकिन जो खास चीज याद आ रही है वह है सिंघल साहब का अपनी कला में यकीन। वो अपने रचे को ऐसी मार्मिक विनम्रता से दिखाते थे कि पता लगता कि उनके भीतर बैठा कलाकार कितना सच्चा और ईमानदार है। मेरे लिए तो यह जैसे कुबेर का खजाना था।
* *

धीरे-धीरे हम लोगों की खूब छनने लगी। किसी बड़े बुजुर्ग कलाकार जिसने पूरी जिन्दगी ही कला के सृजन में बिताई हो, उससे उसकी या दूसरों की कला या फिर जिंदगी के दूसरे पहलुओं पर बात करना बड़ा आस्वाद भरा था। सिंघल साहब क्योंकि उम्र और अऩुभव के किसी अऩ्तर को नहीं मानते थे इसलिए हम बड़े याराने ढंग से गुफ्तगू करते। उसी दौरान मुझे पता लगा कि वे अपने श्वेत-श्याम वाले छाया-चित्रों को एक जगह इकट्ठा कर कॉफी टेबल बुक तैयार करना चाह रहे थे। पिछले चालीस साल के परिदृश्य में एक भी तो अभिनेत्री ऐसी नहीं…सायरा बानो से लेकर रेखा-हेमा-जीनत और श्रीदेवी से लेकर माधुरी-ऐश्वर्य और कैटरीना तक… जो अपने कमसिन दौर में उनके कैमरे की गिरफ्त में न आयी हो। इनमें ज़्यादातर छाया चित्र उनके मशहूर होने से ठीक पहले के दिनों के रहे होंगे। उन्होंने मुझे बैलगाड़ी के पीछे बैठी एक तस्वीर दिखायी और पहचानने का इसरार किया। तस्वीर में मुझे बहुत कुछ पहचाना सा लग रहा था लेकिन मैं सुनिश्चित नहीं हो रहा था कि वह कौन हो सकती है। बारह-तेरह साल की उम्र में सभी उसी मासूमियत और भोलेपन से भरे होते है। मेरे असमंजस को ताड़ते हुए उन्होंने बताया कि ये नीतू सिंह है जो यकीनन कमसिन होते हुए संभावनाओं से भरी-भरी लग रही थी। कनखियों से देखती हुई उसकी अदा किसी को भी अपनी तरफ लुभा सकती थी। मैंने और दूसरे चित्र भी पलटे, हर चित्र अपने उस श्वेत-श्याम रूप में उस अभिनेत्री के बाहरी ही नहीं भीतरी सौंदर्य तक को छलका दे रहा था। एक चित्र को देखकर मैं रुक गया। उसमें वह युवती पत्तों से भरी जमीन पर दोनों हाथों को सिर की तरफ फैलाए ऐसे लेटी थी जैसे कुदरत ने इसे अभी-अभी किसी सुकून से नवाजा हो… शान्त, तृप्त और अपने में मगन। सिंघल साहब की यह भी एक खूबी थी कि वे सिर्फ प्राकृतिक रौशनी ही इस्तेमाल करते थे, कैमरे का फ्लैश नहीं। उस छायाचित्र को देखकर मैंने वाजिब सवाल किया कि उस चित्र के ऐंगल को देखकर उन्होंने कैमरे को कैसे सेट किया होगा। उन्होंने बताया कि इसके लिए उन्होंने कैमरे को लेकर पेड़ की टहनी के ऊपर बमुश्किल संतुलन बनाते हुए लेटना पड़ा था।
“लेकिन आप पेड़ पर चढ़े कैसे?”
उस दृश्य की कल्पना से मेरे भीतर जिज्ञासा हुई।
“अरे उस हिरोइन ने ही मुझे सहारा देकर ऊपर चढ़ाया था।”
उन्होंने चुश्की ली।

बातों के बीच में ये मजाहिया तेवर उनकी आदत थी। लेकिन जब बात उनकी कला या किसी की भी कला की बात हो तो वो एकदम गैर-समझौतावादी हो जाते। प्रभु जोशी के जल रंगों के वो ऐसे मुरीद थे कि कोई भी उनकी बातों से लहालोट हो जाए। उनके जलरंगों की इतनी तारीफ करते, उनकी बारीकियों को ऐसे मार्मिक ढंग से बताते कि कैसे धूसर रंगों का इस्तेमाल किया जा सकता है। कैनवस के एक-एक गोशे को किस अनुपात में पिरोया गया है कि प्रभु जोशी जैसा जलरंगी चित्रकार कोई दूसरा नहीं हो सकता। और यह सब कहते हुए किसी को ये लग ही नहीं सकता था कि वे खुद एक चित्रकार हैं। लेकिन एक बार जब उन्होंने प्रभु जोशी के गणेश श्रृंखला के चित्रों को देखा (जो बेशक मुम्बई के बाजार के लिए तैयार किये गये थे) तो वे उन्हीं प्रभु जोशी को लगभग लताड़ने में रत्ती भर नहीं हिचके!
“क्यों? तुम ये सब क्यों करते हो, क्या जरूरत है? इससे तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा…. और तो और वो पैसे भी नहीं जिसके लिए तुमने इन्हें बनाया है…”
मेरे सामने ही वे प्रभु जोशी पर दहाड़ने लगे।

इसी तरह एक बार जब वे मेरे घर आये और हुसेन साहब की बनी पेंटिंग को देखकर मन्द-मन्द मुस्कुराते हुए बोले “… ये हुसेन साहब का बहुत चालू वाला काम है… हुसेन साहब ने इसे ज्यादा से ज्यादा एक घण्टे में बना दिया होगा… ये उनकी आदत थी, दोस्तों को खुश रखने की।”
मुझे उनकी बात और बारीकी पसन्द आयी।

जेपी सिंघल के साथ ओमा शर्मा।

जेपी सिंघल के साथ ओमा शर्मा।

उन्हीं दिनों भारतीय ज्ञानपीठ से मेरा कहानी संग्रह आने वाला था। मेरे मन में ऐसे ही बात उठी कि क्या किताब के कवर पर उनकी किसी पेंटिंग का इस्तेमाल हो सकता है? या वे कोई मेरी फोटो खींच सकते हैं? मैंने उनसे इस बात का जिक्र भर क्या कर दिया कि उनका दिल तो मदद के लिए उमड़ पड़ा। वे मुझे अपने दूसरे कमरे में ले गये जहां उनकी न जाने कितनी अमूर्त चित्रकारियां बनी रखी थी। एक यथार्थवादी चित्रकार की कूची ने जो अमूर्तन का संसार रचा हुआ था वह कम स्तब्धकारी न था। एक तरह से यथार्थवादी और अमूर्तन, पेंटिंग की दुनिया के दो छोर हैं। कला में अमूर्तन की जरूरत और महत्तव एक दिलचस्प विषय रहा है। अमूर्तन उत्तरोत्तर विकास का पैमाना माना जाता रहा है हालांकि बाज़ हल्कों में जो कलाकृति समझ में न आये या कुछ भी समझाती सी न लगे उसे सहजता से अमूर्त कह दिया जाता है। खैर, मैंने उनके भण्डारगृह से एक का चयन किया जो अंततः बहुत खुबसूरत ढंग से मेरे कहानी संग्रह “कारोबार” का कवर बनी। भारतीय ज्ञानपीठ में कार्यरत मेरे एक मित्र ने बताया कि उसको देखकर तत्कालीन संपादक गदगद हो गये थे क्योंकि इस तरह की चित्रकारी उनकी नजर में इसके पहले कभी नहीं आयी थी और न शायद इसके बाद। जहां तक फोटो लेने की बात थी वह भी उन्होंने उसी वक्त कह दिया कि शनिवार को खींचेंगे। अभी तक मेरी किताबों में गये मेरे चित्र किसी नुक्कड़ के फोटो स्टूडियो में पासपोर्ट साइज के बनवाये हुए थे। मैं यह तो नहीं कहूँगा कि मेरे भीतर किसी नामी या अच्छे फोटोग्राफर द्वारा चित्र खिंचवाने की इच्छा न थी क्योंकि मैं किसी ऐसे-वैसे से वाकिफ ही नहीं था। कोई फोटो खींचने में कितनी देर लगती है? लेकिन पहली बार पता चला कि फोटो खींचने का भी एक ‘सत्र’ होता है। और वो उस पूरे ‘सत्र ‘की तैयारी से ही उस शनिवार मेरे घर आये थे…हैट और सस्पेंडर चढ़ाए…तरह-तरह के लेंसों का जत्था उठाए। कभी वे मुझे खिड़की के पास खड़ा कर देते, कभी सोफे पर बिठाते, कभी खुद सोफे पर चढ़ जाते और कभी नीचे बैठकर, यहां तक की लेटकर अपने कैमरे का ऐंगल सेट करते। कई बार ये भी हुआ कि वे उस मुद्रा में यूँ ही पड़े रहे क्योंकि उनके मुताबिक मैं ‘रिलैक्स’ नहीं था।
“मैंने तुम्हारी कहानियां नहीं पढ़ी हैं, मगर पढ़ लूंगा… लेकिन तुम्हारे चेहरे में एक दार्शनिकपना(इदन्नमं) है … मैं उसे पकड़ना चाहता हूँ… इसलिए… कुछ जान-बूझकर सोचने या पोज बनाने की जरूरत नहीं है… जैसे हो वैसे ही रहो… क्योंकि मैं जानता हूँ तुम क्या हो।” वे कैमरा छोड़ बड़े मनुहार और संयम से मुझे समझाने लगते। कौन फोटोग्राफर, जिसके पास हिन्दी सिनेमा की एक से एक अभिनेत्री अपना फोलियो बनवाने को ललायित रहती रही हों, इस तरह कर सकता था? लेकिन सिंघल साहब तो सिंघल साहब थे। उन्हें कुछ करना होता था तो पूरे सलीके और स्नेह से करते थे। सृजन का अभिप्राय ही उनके लिये पूरे जी जान से अपने को समर्पित कर देना था। मैंने यह भी देखा कि उन्होंने जान लिया था की किस तरह तकनीकी के सहारे से( मैकेनटॉश कंप्यूटर) अपने सृजन में चार चांद लगाये जा सकते हैं। मेरी किताब को आये अब कई वर्ष हो चुके हैं। उसका दूसरा संस्करण भी आ गया जिसमें वही पेंटिंग और उनका खींचा गया मेरा चित्र है। इतना ही नहीं उस चित्र को मैंने उसके बाद आई दूसरी किताबों में भी इस्तेमाल किया। मुझे ही नहीं मेरे करीबी कई मित्रों को लगता है कि कोई दूसरा चित्र मुझे इससे बेहतर नहीं दिखा सकता है।
जो भी हो इस बहाने सिंघल साहब के साथ मेरी संगत बनी रहती है।

लेकिन उनके साथ बातें करना, उनके बताये अनुभव का गवाह बनना, उनके खयालात से वाकिफ होना या कभी-कभी उनकी तुनक मिजाजियों से गुजरना बहुत रोमांचक था। वे अपने यकीनों में पूरे जोश-खरोश से जीते थे जैसा बहुत सारे कलाकारों की फितरत होती है। एक बार जब मैं उनसे मिलने गया तो वो कुछ फोटोग्राफ्स का पुलिंदा लिये बैठे थे। बड़े अजीबो-गरीब ढंग के फोटोग्राफ्स थे। बम्बई और उसकी तमाम भीतरी-बाहरी पहचान को दर्ज करते हुए। कई वर्षों का काम रहा होगा। और फोटोग्राफ्स क्या थे? बम्बई की दीवारों पर लिखी गयी इबारतें और पोस्टर्स… कोई चारकोल से लिखा हुआ… कोई आधा मिटा हुआ… कोई एक दूसरे के ऊपर चढ़ा हुआ… कोई भीड़-भड़क्के के बीच दबा हुआ तो कोई सुनसान में पड़ा हुआ। क्या ऐसे वाहियात संदेशों–जिन्हें उस शहर को पढ़ने की फुर्सत नहीं– से कोई कला बरामद की जा सकती है? या कहें, कि क्या इस तरह की मामूलियत कला में ढाली जा सकती है? मैं सोचने लगा। लेकिन सिंघल साहब एक सोचते-विचारते कलाकार थे। जीवन के आंवे से अपना माल-पानी उठाते थे। उनके भीतर हरदम कुछ न कुछ चलता रहता था। पिछली सदी के सातवें और आठवें दशक में बंबई आकर अपनी कैलेंडर आर्ट के सहारे उन्होंने आर्थिक रूप से अपने को ठीक-ठाक सुरक्षित कर लिया था जिसे बाद में उनके फिल्मों से जुड़ने के कारण और पुख्तगी मिल गयी थी। वे मुख्य धारा की लगभग सौ फिल्मों से उनके पब्लिसिटी डिजाइनर के तौर पर जुड़े रहे। फिल्मी दुनिया का जिक्र करते वक्त उनका जायका कुछ कसैला सा हो जाता “… बड़ी कारोबारी दुनिया है भाई…एक से एक कमजर्फ वहां बैठा होता है…फिल्मों की दुनिया कलाकार की दुनिया नहीं हो सकती है… लेकिन मेरे को क्या मेरा तो इसने भला ही किया।” वे जैसे सब कुछ भूलते-भालते एक फलसफे के सहारे बाहर निकल चुस्की लेने लग जाते। लेकिन उनको अपने संघर्ष के दिन याद रहते थे। यानी लड़कपन में मेरठ के दिन और बम्बई में आने के शुरुआती दिन भी। आडवानी एण्ड ऑरलीकॉन में काम करते हुए उन्होंने अच्छा-खासा मकाम बना लिया था, लेकिन वे खुलेआम स्वीकारते कि वे अभी भी कई तरह की असुरक्षाओं के शिकार हैं। हर कलाकार को अपने को चलायमान रखने के लिए अपने तईं कुछ न कुछ करना पड़ता है, चाहे वह कोई मुगालता हो या कोई टोटका। अगर कोई लेखक बीस-तीस साल से लगातार लिख रहा है तो उसे कुछ नहीं तो उस नैरंतर्य के लिए ही सराहा जाना चाहिए। सिंघल साहब तो फोटोग्राफी और चित्रकारी की दुनिया से पचास साल से ऊपर से जुड़े हुए थे और फिर भी वे ‘प्रवाह’ में थे। उन्होंने अभी अपने हथियार नहीं फेंके थे… जैसे कलाकार होना उनका स्वभाव हो। जहांगीर आर्ट गैलरी में हुई उनकी कला प्रदर्शनी का मैं गवाह था। वह सचमुच एक विराट उपलब्धि थी। जहांगीर के नीचे के तीनों हॉल ही नहीं, पहली मंजिल पर बने दोनों कमरों को भी उन्होंने शामिल कर लिया था। मुम्बई का कला-जगत जैसे सकते में आ गया था। एक तरफ उनकी आदिवासियों की श्रृंखला थी तो दूसरी तरफ उनकी अजंता-एलोरा की। एक तरफ उनकी अमूर्त चित्रकारियां थी तो दूसरी तरफ कैलेंडरों के लिए बनायी गई चित्रकारियां। एक कमरे में तो उनके पिछले चालीस सालों की मुम्बई की तमाम खूबसूरत अभिनेत्रियों के ही श्वेत-श्याम छायाचित्र थे। उन दिनों बात करते हुए वे एक अजीब मस्ती के आलम में झूमते दिखते! कभी वे अपनी पेंटिंगों के बारे में ही बताते तो कभी उनके सृजन के रहस्य के बारे में और कभी अपनी खुद की ग्रन्थियों के बारे में। वे उम्र और कला के ऐसे मकाम पर थे जहां सराहना और आलोचना बेमानी हो जाते हैं। उन्हें कहीं दिली तसल्ली थी कि अपनी आदिवासी श्रृंखला में वे एक ठेठ भारतीयता को दर्ज कर पाये हैं और अपनी अजन्ता एलोरा श्रृंखला में उन्होंने उन तमाम बेनाम कलाकारों को श्रद्धांजली दी है जिन्होंने सदियों पहले ऐसा करिश्माई काम कर छोड़ा था। प्रदर्शनी का विमोचन अभिनेत्री श्रीदेवी ने किया जो मुझे बड़ा वाहियात लगा क्योंकि सारा मामला कम से कम कुछ समय के लिए कला की दुनिया से बेमेल हो चला था। लोगों के बीच अपनी बात रखते हुए उन्होंने कतर में बैठे मकबूल फिदा हुसेन से भी मोबाइल के जरिये आशीर्वचन लिये। मुझे वह गैरजरूरी लगा। मगर सिंघल साहब शायद हर सूरत उस प्रदर्शनी की सफलता देखना चाह रहे थे। जो भी हो प्रदर्शनी हर लिहाज से कामयाब थी। उन्हें भीतर कहीं ये भी सुकून था कि मुम्बई की कला की दुनिया में आखिर उन्होंने अपना झण्डा गाड़ दिया।
तो क्या वाकई उनका सपना पूरा हो गया?
क्या वाकई अब कुछ करने को नहीं बचा?
* *

पीछे मुड़कर देखता हूँ तो मुझे याद आता है कि अपने आखिरी दिनों में वे मुझसे कुछ कहना और बांटना चाहते थे… उनकी देखी-भाली कुछ कहानियां या वे अनुभव जिनसे वे गुजरे… जो उनके भीतर एक तड़प मचाये हुए थीं कि वे बाहर आयें। लेकिन सिंघल साहब के हाथ में कूची थी, कलम नहीं। एक बार मुझे देखकर लढ़ीयाते से बोले “… हम दोनों की जोड़ी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जैसी होगी… एक सोचता है, दूसरा उसे अंजाम देता है।” वे बतायेंगे और मैं लिखूंगा। उन्होंने दक्षिण की अभिनेत्री का कई बार जिक्र किया जिसका बचपन में ही उसके पिता ने बलात्कार किया था। आज वह न सिर्फ एक जानी-मानी अभिनेत्री और सांसद रह चुकी हैं बल्कि उसके नाम का एक मंदिर तक है। मुझे यह संक्रमण दिलचस्प लगा। मगर किसी न किसी वजह से हम लोगों की वह देर तक चलने वाली मुलाकातें नहीं हो सकीं। मैं कभी उनसे इसका जिक्र करता तो वे कुछ टालमटोली सी कर जाते। मुझे कुछ नहीं सूझता क्योंकि यदि कुछ होने वाला था तो उसमें पहल उन्हीं की थी। अस्सी वर्ष के एक कलाकार व्यक्ति के साथ बर्ताव करते समय आपको खयाल ज्यादा रखना होता है (हुसेन के साथ मेरा तजुर्बा गवाह था!)। वे अब भी कला की दुनिया में विचरण करते थे लेकिन निजी चैनलों पर आने वाले कुछ अनाप-सनाप धारावाहिकों में रमने लगे थे। उन धारावाहिकों के कुटिल चरित्रों के साथ वे निजी दुश्मनी सी मानने लगते। भाभी जी यानी श्रीमती माया सिंघल ने मुझे हौले से सूचित भी किया कि वे उन धारावाहिकों के रिपीट शोज को भी उसी तन्मयता और आवेग से देखते हैं। उसके चरित्रों के साथ ऊपर-नीचे होते हैं।

“लेकिन सिंघल साहब ये टी.आर.पी.के लिए बनाये गये, खड़े किये चरित्र हैं, असली नहीं हैं…” मैंने हौले से उन्हें समझाने की कोशिश की।
“क्या ऐसे चरित्र हमारे आस-पास नहीं भटक रहे हैं, क्या तुम अखबार नहीं पढ़ते हो। कितना कुछ गलत हो रहा है दुनिया में।”  वे लगभग मुझ पर गरज से पड़े।
मैं सहम गया।
मुझे लगा जैसे उन पर कोई बाधा आ गयी है क्योंकि यह सब इतना अप्रत्याशित था। पता नहीं अपने दिल के भीतर वे किस रहस्यमयी झंझट में उलझे थे।
जिन्हें हम चाहते हैं कई हमें उनके गुस्से और अप्रत्याशित को स्वीकारना ही होता है।
* *

आठ मई, 2014 को मैं नाशिक में था जब फोटोग्राफर मित्र प्रदीप चन्द्रा का मेरे पास संदेश आया कि‍ प्रिय कला के हमारे एक दिग्गज सिंघल साहब नहीं रहे। मैं अवसन्न रह गया। पिछले चार वर्षों की मेल-मुलाकातों के बहुत सारे पल यकायक उमड़ने-घुमड़ने लगे। मेरे आस-पास एक बेचारगी तैर गई। उनके अप्रत्याशित रवैये का भी जैसे खुलासा सा हाथ लगने लगा। लेकिन मेरी चाहना थी कि उनके अन्तिम दर्शन अवश्य करूं। क्या यह मुमकिन होगा? संयोग से कनाडा में रहने वाले उनके छोटे पुत्र के आने से यह सम्भव हो सका।
जब मैंने उनको आखिरी बार देखा तो उनकी देह सिकुड़कर बहुत छोटी रह गयी थी। उन्होंने अपने संघर्षपूर्ण जीवन से कला की दुनिया को जो दिया था, उसकी अनूगूँज बनी हुई थी। लेकिन उनके दाह-संस्कार में शामिल होने वालों की तादाद बहुत कम थी। सिर्फ अंगुलियों पर गिनने लायक। कला की वह दुनिया जिसे उन्होंने जतन से इतना संवारा, उसे भी उनसे कुछ पड़ी नहीं रह गयी। क्या कहेंगे इसे? एक कलाकार का नसीब या मुम्बई की भागमभाग।
अलबत्ता, उनके चेहरे पर एक बच्चे की मासूमियत अभी भी तारी थी और मैं देख पा रहा था कि कैसे अपनी अंतिम सांस तक वे एक कलाकार की गरिमा बनाये रहे।

( ‘अकार’ से साभार)


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जेपी (जयंती प्रसाद) सिंघल  का परि‍चय

चित्रकार जे.पी. सिंघल।

चित्रकार जे.पी. सिंघल।

जन्म 24 अक्तूबर 1934, मेरठ, उत्तर प्रदेश। दस बरस की उम्र से चित्रकारी। आत्म दीक्षित। अठारह बरस की उम्र में मेरठ छोड़ बम्बई प्रस्थान। शेष जीवन मुम्बई में। बीस बरस की उम्र में ‘धर्मयुग’ में चित्र प्रकाशित। भारतीय देवी-देवताओं, लोक-कथाओं, मंदिरों, आदिवासियों और अजन्ता-एलोरा को लेकर कई कंपनियों के लिए कलैंडर बनाए जिनकी बिक्री की तादाद अस्सी करोड़ के ज्यादा। लगभग 2700 से अधिक मूल पेंटिंग्स। जितने अच्छे चित्रकार, उतने ही  अच्छे छायाकर। पिछले चालीस- पचास बरसों में देश की शीर्ष अभिनेत्रियों और मॉडल्स के छायाकर। राज कपूर की ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ के लिए ज़ीनत अमान के किरदार को रूप देने में अहम योगदान। तभी से फिल्मों से जुड़ाव। ‘शान’, मिस्टर इंडिया’, ’हिना’ त्रिदेव’, ‘रॉकी’, ‘बॉर्डर’, ‘गदर’, और ‘बेताब समेत हिन्दी सिनेमा की सौ से अधिक फिल्मों की पब्लिसिटी डिजाइन। मकबूल फिदा हुसेन की फिल्म ‘मीनाक्षी’ में विशेष सहयोग। जे जे स्कूल और जहांगीर कला दीर्घा में प्रदर्शनियाँ। श्री राम(75-76), कृष्ण लीला(1977) के कलेंडरों पर भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय पुरस्कार। कलेंडर आर्ट्स के लिए दूसरे राष्ट्रीय पुरस्कार भी। सात मई 2014 को हृदय गति रुकने से मुंबई में निधन।

मेरा ओलियगाँव : शेखर जोशी

शेखर जोशी

शेखर जोशी

वरिष्ठ कथाकार शेखर जोशीजी की ‘लेखक मंच प्रकाशन’ से शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक ‘मेरा ओलियागांव’ के अंश ‘हर शुक्रवार’ के दीपावली विशेषांक में प्रकाशित हुए हैं। आप भी इन अंशों का आनंद लीजिए-

पक्की फसलों का सुनहरा सरोवर

हिमालय के प्रांगण में अल्मोड़ा जनपद की पट्टी पल्ला बौरारौ के गणनाथ रेंज की उत्तर-पूर्व दिशा में प्राय: 5500 फुट की ऊँचाई पर बसा मेरा ओलियगाँव दो भागों में विभाजित है। इस छोटे से गाँव में मात्र ग्यारह घर हैं। गाँव की बसासत ऊँचाई वाले भाग में  बांज, फयांट, बुरुँश, पयाँ और काफल के वृक्षों से घिरी है। ऊपर की पहाडिय़ों में चीड़ का घना जंगल है।

‘कुमाऊँ का इतिहास’ के लेखक पंडित बद्रीदत्त पाण्डे के अनुसार उन्नाव जनपद अन्तर्गत डोडिया खेड़ा नामक स्थान के प्रकाण्ड ज्योतिषी पंडित सुधानिधि चौबे ने कुँवर सोमचन्द से एक भविष्यवाणी की थी। वह यह थी कि यदि वह उत्तराखण्ड की यात्रा करें, तो उन्हें राज्य की प्राप्ति हो सकती है। तो, कुँवर 22 लोगों के साथ उत्तराखण्ड की यात्रा पर चले और ज्योतिषी जी की वाणी सच साबित हुई। कुँवर सोमचन्द ने कुमाऊँ में चन्द वंश राज्य की स्थापना की। सुधानिधि चौबे ने राज्य का दीवान बनकर चन्द राज्य को विस्तार और स्थायित्व प्रदान किया। सुधानिधि के वंशज इस राज्य के पुश्तैनी दीवान रहे। ज्योतिषी जी के गर्ग गोत्रीय वंशज झिजाड़ गाँव के जोशी कहलाए।

अनुमान किया जा सकता है कि झिजाड़ से कुछ परिवार नौ पीढ़ी पूर्व किसी सुरम्य स्थान की खोज में ओलियागाँव में आकर बस गए।

काठगोदाम-गरुड़ मोटरमार्ग पर मनाण और सोमेश्वर के बीच एक स्थान रनमन है। सड़क के दाँईं ओर खेतों से आगे कोसी नदी प्रवाहित होती है। दड़मिया का पुल पार कर जंगलात की सड़क पर आगे बढ़ें, तो मात्र आधा किलोमीटर चलने पर देवदारु का घना जंगल शुरू हो जाता है, जो प्राय: एक किलोमीटर तक फैला है और उसके बाद चीड़ वन प्रारम्भ होता है। इसी चीड़ वन से घिरा है ओलियागाँव शस्य श्यामल भूमि पर एक कटोरे के आकार में। गाँव के दोनों भागों के बीच कल-कल करती हुई एक छोटी नदी बहती है और उस पार चार मकानों के बाद गिरिखेत का मैदान, देवी थान और फिर सीधी चढ़ाई। इसी पहाड़ पर बहुत ऊपर बहता है, एक झरना। बरसात के मौसम में उस छोटी अनाम नदी की तेज धारा और इस झरने के शुशाट के कारण गाँव के आर-पार के घरों तक अपनी आवाज पहुँचाना मुश्किल हो जाता है।

गाँव की पूरब दिशा में बहुत दूरी पर भटकोट के शिखर दिखाई देते हैं, जिन पर सूर्य की किरण पड़ती हैं तो दिनारम्भ की प्रतीति होती है। इन्हीं शिखरों पर शीतकाल में पहली बर्फबारी होती है, तो ये रजत शिखर चमकने लगते हैं।

ऋतु परिवर्तन के साथ यह कटोरा भिन्न प्रकार के धान्य से भर उठता है। पहले धानी रंग के पादप, फिर खड़ी फसल की हरियाली और जब फसल पक जाती, तो धान्य का यह कटोरा सुनहरे सरोवर का रूप ले लेता है। घास के हाते ऊँची-ऊँची घास का कम्बल ओढ़ लेते हैं।

मैं भाग्यशाली था कि इसी गाँव में श्री दामोदर जोशी और श्रीमती हरिप्रिया जोशी के घर में सन 1932 के पितर पक्ष में तृतीया के दिन मेरा जन्म हुआ। नामकर्ण के दिन पुरोहितजी ने मुझे चन्द्र दत्त नाम दिया था, परन्तु वर्ष 1944 में मामा ने स्कूल में मेरा नाम चन्द्र शेखर लिखवाया। चन्द्र का दिया हुआ नहीं, शीर्ष पर चन्द्र धारण करने वाले शिवजी का पर्याय बना दिया।

हम तीन भाई-बहन थे। मैं उनमें सबसे छोटा था। कहा जाता है कि जब मैं पैदा हुआ, तब मेरी नाक बहुत चपटी और सिर हांडी जैसा था। लेकिन माता-पिता को अपनी सन्तान कैसी भी हो, बहुत प्यारी होती है। मैं सबका लाड़ला था।

गाँव में हर घर के साथ फल-फूलों के बगीचे थे, पेड़ थे। हम लोगों का बचपन पेड़ों के साथ, पशुओं के साथ और फूल-पत्तियों के साथ बीता। हमने यह भी सीखा कि किस तरह से अनाज बोया जाता है, अनाज उगता है और अनाज काटा जाता है।

खेती में लड़कपन में हमारा कोई विशेष योगदान नहीं होता था, लेकिन हमें इसमें बहुत आनन्द आता था, खास तौर से जब धान की रोपाई होती थी। एक छोटे खेत में बेहन बोया जाता था। उसमें खूब घने पौधे होते थे। जब वे बड़े हो जाते थे, करीब 6-7 इंच ऊँचे, तो उनको वहाँ से उखाड़कर दूसरे खेतों में रोपते थे। उससे पहले जिन-जिन खेतों में रोपाई होनी होती, उनको पानी से खूब सींचा जाता। पानी से भरे खेत में दाँता चलाया जाता, जो कि मिट्टी के ढेलों को तोड़ देता। उससे खेत की मिट्टी समतल हो जाती थी। धान रोपाई का काम पूरे दिन का होता था। बहुत से खेतों में रोपाई होती थी, तो खूब सारे मजदूर लगते थे। वे लोग भी उसको एक उत्सव की तरह से मनाते थे, क्योंकि उस दिन उनको खूब अच्छा खाना मिलता था—रोपाई वाला। उस दिन हलवाहे की विशिष्ट भूमिका होती थी। अगर हलवाहा हुड़किया भी होता, तब तो उसकी भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती थी। हुड़किये का मतलब यह है कि वह डमरूनुमा वाद्य ‘हुड़कीÓ को हाथ में लेकर बजाता और पगड़ी बांध कर खेत में सिर्फ गाता फिरता। कतार में औरतें पूलों में से पौधे लेकर रोपती जातीं। अलग-अलग जगहों पर पूले रख दिए जाते। औरतें पूले खोलकर उनमें से पौधें निकालतीं और रोपती जातीं। हुड़किया चंद्राकार या सीधे पीछे हटता जाता और हुड़की बजाता हुआ गाता जाता। वह कोई कथानक लगा देता—राजा भर्तृहरि या राजा हरिश्चन्द्र का, बम-बम्म-बम… हुड़की की आवाज के साथ। औरतें आखिर में टेक लेतीं और वे भी साथ में गातीं। खेत में जाने से पहले हरेक को रोली और अक्षत का टीका लगाया जाता। उस दिन उनके लिए विशेष किस्म का कलेवा बनाया जाता—मोटी रोटियाँ होती हैं, बेड़ुवा मतलब मंडुवा और गेहूँ की मिली हुईं रोटियाँ, कुछ पूडिय़ां और सब्जी। कलेवा हुड़किया के लिए अलग, हलवाहे के लिए अलग, हलवाहे की पत्नी के लिए अलग और आम महिलाओं के लिए अलग बनता। दिन में सभी के लिए खेत में ही दाल-भात पहुँचाया जाता। सभी भर पेट खाना खाते और उनके बच्चे भी आ जाते। शाम को जब औरतें काम खत्म कर देती थीं, तो हाथ-पैरों में लगाने के लिए उनको थोड़ा-थोड़ा तेल दिया जाता था।

खेतों में बने बिलों में पानी भर जाने से बड़े-बड़े चूहे निकलते थे। शाम को अगर खेत बकाया रह जाता, तो मालिक नाराज न हो जाए, इसलिए हुड़किया हुँकारी लगाता था—’धार में दिन है गो, ब्वारियो…। छेक करो, छेक करो।’ मतलब कि चोटी पर सूरज पहुँच गया है। जल्दी करो, बहुओ, जल्दी करो।

कार्तिक में जब धान की फसल पक जाती थी, तो उसकी पूलियाँ खेत में ही जमा करके रख दी जाती थीं। धान की पेराई के लिए इस्तेमाल होने वाली बाँस की चटाइयाँ को ‘मोस्टÓ कहते थे। ये पतले बाँस की नरसल की चटाइयाँ होती थीं, जो कि 10 फुट बाई 10 फुट या 8 फुट बाइ 8 फुट की होती थीं। ये चटाइयाँ बड़े खेत में बिछा दी जाती थीं और उनमें धान के पूले रख दिए जाते थे। लकड़ी का बड़ा-सा कुंदा रखकर उसमें धान को पछीटा जाता था। पूलियों में जो धान रह जाता, उसे पतली संटियों से झाड़ा जाता था। धान के खाली पराल को अलग करते। चाँदनी रात को पूरी रात यह कार्यक्रम चलता। एकाध बार मैं भी जिद करके इस तरह के कार्यक्रम में गया। कई मजदूर लगे थे। हमारी ईजा भी गई थीं। धान की वह खुशबू और चाँदनी रात, बहुत आनन्द आता था।

धान की पकी फसलों को नुकसान पहुँचाने में जंगली सुअरों का बड़ा हाथ रहता। वे अपनी थूथन से खेत की मिट्टी को खोद कर न जाने क्या ढूँढ़ते रहते। लीलाधर ताऊजी के पास एक भरवाँ बन्दूक थी, जिसमें बारूद, साबुत उड़द के दाने, कपड़े का लत्ता, ठूँस-ठूँस कर ट्रिगर के ऊपरी सिरे पर टोपी चढ़ाने के बाद फायरिंग की जाती, तो सुअर भाग जाते। यह काम देर रात में किया जाता था।

इस बन्दूक से जुड़ा एक रोचक प्रसंग है, जिसने हमें बचपन में बहुत गुदगुदाया था। हमारी माधवी बुआ की ससुराल मल्ला स्यूनरा में थी, जो हमारे गाँव से अधिक दूरी पर नहीं था।

उस बार उनका पोता राम अकेला ही अपनी दादी के मायके में आया था। वह 14-15 वर्ष का किशोर बहुत ही दुस्साहसी था। ताऊजी की भरवाँ बन्दूक उनके शयनकक्ष में कोने पर टंगी रहती थी। एक दिन महाशय राम की नजर उस पर पड़ी। उसने साबुत उड़द के दाने, पुराने चिथड़े, कुछ कठोर पत्थर के टुकड़े जमा किए। उसे न जाने कैसे बारूद का पाउडर भी आलमारी में मिल गया था। उसने खूब ठूँस कर बारूद से सना यह सामान बन्दूक की नाल में भरा। अब समस्या ट्रिगर (घोड़ी) में पहनाने वाली टोपी की थी। वह नहीं मिली, तो राम ने ट्रिगर उठा कर छेद के मुँह के सामने जलता चैला (छिलुक) रख दिया। बन्दूक ऊँचाई पर टिकाई हुई थी। उसके अन्दर भरे मसाले में आग लगी, तो बारूद विस्फोट करता हुआ, दीवार के ऊपर रखे ताऊजी के जूते से टकराया। दूसरी तरफ छिद्र से निकली चिंगारी के छींटे राम के कपाल पर जा लगे। खैरियत यह थी कि उसकी आँखें सुरक्षित रहीं। गाँव के लड़कों की तरह वह टोपी पहने रहता था। उस दिन राम ने अपनी टोपी आँख की भँवों तक खींच रखी थी। हादसे के बाद वह बन्दूक को यथास्थान रख आया ।

बाद में ताऊजी जब अपना जूता पहनने लगे, तो उसमें बड़ा-सा छेद देख कर वह चौंके। राम ने उन्हें बताया कि एक काला कुत्ता जूतों के पास बैठा था। शायद उसी की यह कारस्तानी हो। लेकिन जब किसी ने राम की टोपी को ऊपर खिसका कर ठीक से पहनाने की कोशिश की, तो ललाट में चानमारी के निशानों ने उसकी पोल खोल दी। राम अपने गाँव भाग गया।

पकी फसलों, विशेषकर धान के खेतों के बीच से गुजरने का अपना आनन्द होता था। पके धान की मादक गंध तन-मन को एक नई स्फूर्ति से भर देती थी।

धान की पेराई के अलावा मुझे गेहूँ की मड़ाई में भी बहुत आनन्द आता था। गेहूँ की पूलियाँ घर के आँगन के ऊपर वाले खेत में लाकर जमा कर दी जाती थीं। आँगन की खूब अच्छे से सफाई करके लिपाई कर दी जाती थी। जब आँगन सूख जाता, तो पूलियाँ आँगन में फैला दी जातीं। फिर बैलों को गेहूँ की बालियों के ढेर के ऊपर चलाया जाता था। हम बच्चे उनके पीछे-पीछे हाथ में संटी लेकर चलते थे—’हौ ले बल्दा, हौ ले- हौ ले… कानि कै लालै बल्दा… पुठि कै लालै, हौ ले-हौ ले…’ मतलब बैल राजा चल/धीरे-धीरे चल/कंधे में लाद कर लाएगा, पीठ पर लाद कर लाएगा/बल्दा चल। बैल गेहूँ की पूलियों को अपने पैरों से कुचलकर दानों को अलग कर देते थे। बैल गेहूँ न खा लें, इसलिए उनके मुँह में जाली बांधी जाती थी। बाद में सूपों से या चादरों से हवा करके भूसे को उड़ाया जाता। एक सयाना इधर से, तो दूसरा उधर से चादर पकड़ता और चादर को तेज-तेज ऊपर-नीचे कर हवा करते। इससे भूसा उड़ता जाता और गेहूँ नीचे गिरता जाता। उसके बाद हम बच्चे जहाँ गाय-भैंस चरने जातीं, वहाँ से सूखा हुआ गोबर लेकर आते। पहाड़ में गोबर का ईंधन के रूप में इस्तेमाल नहीं होता था, क्योंकि गोबर खेती के लिए बहुत जरूरी होता है, इसलिए उसे बरबाद नहीं किया जाता। गोशाला की रोज सफाई होती। गोबर को गोशाला के बाहर डाल दिया जाता। वहाँ खाद का ढेर लगा रहता। जो घास पशुओं के नीचे बिछाई जाती, वह उनके पेशाब और गोबर में सन कर सुनहरी खाद हो जाती। वही जैविक खाद खेतों में डाली जाती थी। वह खाद फर्टिलाइजर से कहीं ज्यादा अच्छा होती थी।

हम बच्चे सूखा हुआ गोबर लेकर आते थे। उस गोबर का ढेर लगा करके उसमें आग लगा दी जाती थी। उसके जलने से राख बनती। बाँस की चटाइयाँ बिछा कर और उन पर गेहूँ डाल कर उसमें राख डाली जाती। फिर पैरों से उसको मिलाया जाता। राख कीटनाशक दवा का काम करती थी। यह गाँव की विधि थी कि किस तरह से अनाज को सुरक्षित किया जाता था। जिन चटाइयों पर खेती का काम होता था, उनको ऐसे ही लपेट कर नहीं रखा जाता था। उन चटाइयों के लिए बकायदा गोशालाओं में गाय का या अन्य पशुओं का मूत्र कनस्तर में इकट्् ठा किया जाता था। पशुओं के मूत्र को इन चटाइयों पर छिड़का जाता था। उससे एक तो चटाइयों में लचीलापन आ जाता था। दूसरा, कीड़े नहीं लगते थे। इससे ये चटाइयाँ वर्षों चलती थीं। मूत्र सूखने पर चटाइयों को लपेटकर टाँड़ के ऊपर डाल दिया जाता। जब जरूरत हुई, तब निकाल लिया जाता।

हम बच्चे बचपन से ही खेती-बाड़ी के बारे में जान जाते थे और अपनी क्षमता के अनुसार कुछ करते भी रहते थे। जैसे—गर्मियों में बैंगन और मिर्च की पौध लगाते। हम अपनी-अपनी क्यारियाँ बनाते थे। फिर उनमें मिर्ची और बैंगन के पौध रोपते थे। भिंडी की पौध नहीं होती थी। भिंडी के बीज बोए जाते। शाम को हम पौधों  में गिलास से पानी डालते थे। फिर पौधों का क्रमिक विकास देखते थे—पौधे बड़े होते जाते। फिर उनमें फूल लगते। इसके बाद उनमें फल लगते। जब पौधों में पहला फल दिखाई देता, तो हमें बहुत खुशी होती। अगर कोई सीधी उंगली से फल की तरफ इशारा कर देता, तो हम टोकते कि ऐसा करने से सड़ जाएगा। उंगली टेढ़ी करके दिखाना होता था कि वह देखो, फल आ गया है।

इस तरह का मनोविज्ञान और लगाव बचपन से वनस्पतियों के साथ था।

पहाड़ों में मैदानी इलाकों की तरह पतली ककड़ी नहीं होती। वहाँ बड़ा खीरा होता है जिसे कहते ककड़ी ही हैं। खीरे की बेल को कोई सहारा देना पड़ता है। बेलों के सहारे के लिए कोई छोटा पेड़ काटकर या पुराने पेड़ की टहनी को काटकर उसे लगाया जाता था। बेल उस पर लिपट कर चढ़ जाती। पेड़ के सहारे खीरे लटके रहते थे। जब फसल समाप्त हो जाती, तो बेल को निकाल दिया जाता। उसमें छोटे-छोटे खीरे लगे रहते थे। इनकी अब बढऩे की सम्भावना नहीं रहती थी। हम बच्चे उनको निकालकर उन पर सीकों की टाँगें लगाकर बकरे की तरह से उनकी बलि देते थे। ऐसा हमने मन्दिरों में देखा होता था, जहाँ बलि दी जाती थी। मेरी एक कविता है–

काली की बलि पूजा का स्वांग,
रचा लगा तिनकों की टाँग
हरी ककड़ी के अन्तर को छेद
छिन्न कर उसका मस्तक बाँटा प्रसाद
न रखा छूत-अछूत का भेद।

खट्टे अनार को दाडि़म कहते हैं। पन्सारी के यहाँ चटनी के लिए जो अनार दाना बिकता है, वह दाडि़म का ही बीज होता है। दाडि़म का फूल सिन्दूरी रंग का होता है। आरी के दाँतों की तरह तिकोनी उसकी चार-पाँच पंखुडिय़ाँ होती हैं। उसको उल्टा करके रख देने से फूल खड़ा हो जाता। वे फूल पेड़ों के नीचे खूब गिरे रहते थे। हम उनको इकट्ठा करके लाते और कतार में रखकर बारात निकालते थे। उनमें सींकें लगाकर डोली वगैरह बना लेते. इस तरह के खेल होते थे हमारे जो वनस्पति संसार से हमको जोड़ते थे।

बिगौत की दावत

हमारे घर में गायें थीं। हमारी सबसे प्रिय गाय का नाम बसंती था। वह ईजा के मायके से आई हुई गाय की तीसरी पीढ़ी की थी, इसलिए ईजा उसको बहुत प्यार करती थीं। हम भाई-बहन उसको मौसी कहते थे। मैं जब थोड़ा बड़ा हुआ, तो कभी-कभी गायों को ग्वाले के पास छोडऩे के लिए ले जाता था। एक बार मैं बसंती के साथ छेड़-छाड़ कर रहा था—कभी उसके थन में हाथ लगा देता, तो कभी उसकी पूँछ को पकड़ कर सिर पर लगा देता।

बसंती ने सींग हिलाकर मना किया, लेकिन मेरी शैतानी बढ़ती गई। पहाड़ी रास्ते घुमावदार होते हैं। आखिर में तंग आकर बसंती ने सिर नीचा करके मेरी टाँगों के नीचे से सींग डाले और मुझे उठाकर ऊपर घुमावदार रास्ते पर रख दिया। जैसे—मुझे सजा दे दी हो। तब में समझ गया कि ज्यादा छेड़-छाड़ नहीं करनी चाहिए।

यह बात बसंती के प्रसंग में समझ में आई कि पशु मनुष्य की भाषा कैसे समझते थे। जब खेतों में फसल कट जाती थी, तो पशुओं को कुछ दिनों तक उन्हीं खेतों में चरने के लिए छोड़ दिया जाता था। एक बार कोई मेहमान आए, तो उस समय घर में चाय के लिए दूध नहीं था। ईजा ने खेत की तरफ जाकर बसंती को हाँक दी। बसंती ने सिर उठाकर ऊपर देखा। ईजा ने कहा, ”आ बसंती।’’ वह नजदीक आ गई। ईजा के हाथ में गिलास था। ईजा ने उस गिलास में थोड़ा दूध दुहा। फिर ईजा ने बसंती से कहा, ”अभी ठहर’’ और बसंती खड़ी रही। जैसे—सब कुछ समझ रही हो। ईजा घर आईं। गिलास अलमारी में रखा। कटोरदान से एक रोटी निकाल कर बसंती के लिए ले गईं। ईजा ने बसंती को रोटी खिलाकर उसकी पीठ थपथपाकर कहा, ”जाओ’’ तो वह चली गई। इस तरह का सम्वाद पशुओं और मनुष्यों के बीच होता था।

और थोड़ा बड़े होने पर एक और घटना मेरे जीवन में घटी। हमारे गाँव के एक परिवार की गाय सुरमा थी। सफेद रंग की बड़ी खूबसूरत गाय थी। हमारे पंचायती ग्वाले मोहनदा को उस गाय से बहुत लगाव था। सुनते हैं कि वह अपने दिन के कलेवे से एक रोटी बचाकर सुरमा को खिलाते थे। सुरमा भी उनको बहुत प्यार करती होगी। एक बार मोहनदा काफल तोड़ते हुए पेड़ से नीचे गिर गए। वह शाम को जब जंगल से लौटते थे, तो बच्चों के लिए मौसम के हिसाब से जंगली फल लेकर आते थे। वह हम बच्चों के लिए काफल लाने के लिए पेड़ पर चढ़े होंगे, गिर गए। शाम हो गई। सारी गायें अपने-अपने बच्चों की याद कर घर चली आईं, लेकिन सुरमा मोहनदा के पास ही रह गई। मोहनदा उठने में लाचार थे। गाँव वालों ने देखा कि सभी गायें चली आई हैं, लेकिन मोहनदा साथ में नहीं हैं। सुरमा के घरवालों ने देखा कि सुरमा भी नहीं आई है। सब लोग दौड़े-दौड़े जंगल की तरफ गए। वहाँ देखा कि मोहनदा गिरे हुए हैं और सुरमा उनको चाट रही है। मोहनदा को उठा कर लाया गया और पीछे-पीछे सुरमा भी आ गई।

वह ऐसे आई, जैसे—मोहनदा की माँ हो।

हमारे ईजा-बाबू में एक गाय को लेकर खूब मतभेद हुआ था। इसकी याद मुझे आज भी है। हुआ यह कि एक दिन बाबू कहीं जा रहे थे। उन्होंने देखा कि पड़ोसी  गाँव का एक आदमी अपने ढोरों को चरा रहा है। सभी पशु बहुत दुर्बल हो रहे थे। पैलागी-आशीष के बाद बाबू ने उन पशुओं की हालत पर चिंता जताई, तो वह व्यक्ति अपने पास घास-चारा न होने का रोना रोने लगा। उसने आग्रह किया कि एक गाय बाबू रख लें।

बाबू ने विनोद के लहजे में कहा, ”अब इस हाड़ के पिंजर का गोदान लेने के लिए मैं ही रह गया हूँ?’’

उस व्यक्ति ने फिर जिद की, ”आप वैसे न रखो, तो कुछ दाम दे देना, लेकिन आपके घर में यह पल जाएगी। मेरे घर में तो यह भूखी मर जाएगी और मुझे गोहत्या लगेगी। अच्छी नस्ल की गाय है, पर मुझ अभागे के घर आ मरी।’’

बाबू तब भी सहमत नहीं हुए तो वह गिड़गिड़ाया, ”आप पन्द्रह रुपये ही दे देना। उससे मैं दूसरे पशुओं के लिए घास खरीद लूँगा। मेरे दोनों ‘लुट’ इन्होंने चट कर दिए हैं।’’

उसकी इस दलील पर बाबू पसीज गए। उन्होंने उसे पन्द्रह रुपये देकर गाय हमारे घर पहुँचाने का आदेश दिया।

वह सफेद रंग की कद्दावर गाय थी। उसके सींग बैलों की तरह खूब बड़े थे। थनों के अलावा उसमें कोई भी लक्षण स्त्रैण होने का नहीं दिख रहा था। ईजा की पहली प्रतिक्रिया हुई, ”यह गाय है या बैल?’’

वह व्यक्ति गाय को गोशाला में खूँटे पर बाँधकर चला गया।

कहाँ ईजा की सुन्दर सलोनी बसंती गाय और कहाँ यह हड्डियों का ढाँचा!

नई गाय उपेक्षित ही रही। उस गाय को लेकर ईजा के अलावा दूसरा विरोध पंचायती ग्वाले मोहनदा का था। यह एक अलिखित नियम था कि गाँव में किसी गृहस्थ में किसी पशु की खरीद-फरोख्त हो, तो उसमें मोहनदा की सहमति जरूरी मानी जाती थी। इस बार ऐसा नहीं हुआ था। मोहनदा गुस्साए हुए थे। दूसरे दिन एक आँख के धनी मोहनदा ने पशुओं को जंगल ले जाते हुए इस गरीब जीव को हाँक कर भगा दिया। वह इधर-उधर डोलती रही।

बाबू ने मोहनदा को पूरी बात बताई, तो वह नरम पड़े, लेकिन ईजा के विचारों में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। वह घर की जूठन पूर्ववत अपनी लाड़ली बसंती को देती रहीं और इसकी भरपूर उपेक्षा करती रहीं। लेकिन बाबू हार मानने वाले व्यक्ति नहीं थे। वह भिगोए हुए भट और दूसरी पौष्टिक चीजें गो-ग्रास के पिण्ड में रखकर उसे खिलाते और उसके लिए अच्छा चारा छाँटकर अलग रखते।

कुछ दिनों बाद उस गाय की काया में सुधार आने लगा। उसके दूध की मात्रा भी बढ़ गई। बाबू कहते, ”इसका दूध अलग से गर्म कर उसे दूसरी ठेकी में जमाया करो। यह अच्छी नस्ल की गाय है। इसके दूध में चिकनाई ज्यादा है। इसके मक्खन में ज्यादा घी निकलेगा।’’ ईजा मुँह बिचकाती, लेकिन बाद में यह बात सच निकली।

उस गाय को हमारे गोठ में मान्यता प्राप्त करने में काफी समय लगा। इसका एक कारण शायद उसका कद और बड़े सींग भी थे और बसंती की तुलना तो थी ही!

गोधूलि में गले में बंधी घंटियों के साथ गायों का जंगल से लौटना बड़ा मोहक होता था। एक मुख्य गाय होती थी। उसके गले में एक गोल खोखल ताम्बे या पीतल का पाइप जैसा होता था। उसके अन्दर टकराने वाला लकड़ी का एक टुकड़ा होता था। जब गाय चलती थी, तो घन-घन-घन-घन-घन की आवाज आती थी। अन्य गायें मुख्य गाय के पीछे-पीछे आती थीं। यह एक संकेत होता था कि गायें लौट आई हैं। घन-घन-घन की आवाज को बछड़े भी सुनते होंगे, तो वे भी अपनी भाषा में खुशी जताने लगते थे। गाय के गले में बंधे पाइपनुमा वाद्य की घन-घन चिडिय़ों की चहचहाट के साथ एक मधुर सांगीतिक रचना प्रस्तुत कर देती थी।

गायें जब जंगल से लौटतीं, तो कभी-कभी, कोई गाय बेचैन-सी दिखाई देती। घर वाले उसकी बेचैनी का कारण समझ जाते और एक छोटे टब में पानी लाकर उसमें मुट्ठीभर नमक घोलकर उसके सामने रख देते। वह ज्यों ही पानी पीती, उसकी नाक के दोनों छेदों से लपलपाती हुई जोंकें बाहर निकलतीं, जिन्हें हाथ से खींचकर बाहर फेंक दिया जाता। जो जोंकें नमकीन पानी में गिर जातीं, वे तत्काल विलीन हो जातीं। जोंकों से मुक्ति पाकर गायें फिर सहज हो जाती थीं। पहाड़ों में गीली जगहों पर जोंकें रहती हैं और पैदल चलने वालों के पैरों से चिपक कर खून चूसने के बाद मोटी होकर अपने आप गिर जाती हैं। आदमी को जब पैर में खुजली होने लगती है, तब उसे इस शोषण का पता चलता। मेरे साथ जब भी ऐसा हुआ, खुजलाने पर उस जगह सूजन आ जाती थी।

जब गायें बियाती थीं, तो सयाने लोग 22 दिनों तक उनका दूध नहीं पीते थे। गाय बियाने के 22वें दिन लापसी बनाई जाती थी और चमू देवता के थान पर चढ़ाई जाती थी। चमू पशुओं के देवता होते हैं। उसके बाद सयाने लोग भी दूध पीने लगते थे। लेकिन इस बीच दूध को गर्म करने पर वह छेने जैसा हो जाता था। पहाड़ में उसे बिगौत कहते हैं और मैदानी इलाके में खिजरी। प्राय: गाय दूध कम देती थी। ऐसा होता नहीं था कि पूरे गाँव के बच्चों को खिजरी खाने के लिए एक साथ बुला लिया जाए। ऐसे में एक-एक घर के बच्चों को बुलाया जाता था। उनको खिजरी दी जाती थी। फिर दूसरे दिन अगले घर के बच्चों को बुला लिया जाता। ऐसे मौके कई आते थे। लोगों की गाय बियाती थी, तो दूध फेंका नहीं जाता था, बच्चों को दिया जाता था। आज भी खिजरी खाने की इच्छा होती है।

गायों के नवजात बछड़ों को कुलाँचे भरते देखने का सुख और उनके साथ हाथ-पैरों के सहारे उछल-कूद करने का सुख जिन बच्चों ने उठाया है, वे ही इसकी ताईद कर सकते हैं।

अन्न और गोरस के प्रति बहुत आदर भाव प्रदर्शित किया जाता था, क्योंकि ये दोनों ही जीवनदायी तत्व माने जाते थे। दूध या दही यदि भूमि पर गिर जाता, तो उसे तत्काल पोंछ दिया जाता था ताकि किसी का पैर उस पर न पड़े। इसी प्रकार अन्न को भी पवित्र माना जाता था।

सशस्त्र होली युद्ध : कमल जोशी

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कोटद्वार तब कस्बे का रूप ले चुका था, पर इसके दिल में गाँव ही धड़क रहा था । मेरी तरह की एक पूरी पीढ़ी पैदा तो कोटद्वार में हुई थी, पर घर का माहौल उस पीढी से संचालित होता था, जो पहाड़ी गांवों से यहाँ आई थी। गांव की इस पीढी़ ने अपनी गाँव की परम्परा और विरासत को अभी छोड़ा नहीं था, पर कस्बे की मानसिकता हम पर हावी हो रही थी। पुरानी पीढी़ को परम्परा को ज़िंदा रखने की जिम्मेदारी थी, पर हम जो यहीं पैदा हुए और पले बढे़ थे। एक अलग मानसिकता में जी रहे थे। हमें विपरीत माहौल में, जहां हम अपेक्षाकृत संसाधनविहीन परिवारों से थे, संसाधन वालों से टक्कर लेनी थी, न केवल जीना था वरन ‘इज्ज़त’ से और आत्म सम्मान से जीना था| संघर्ष वही पुराना और शास्वत था- वर्ग संघर्ष ! ‘हेव्स और हेव नोट’ के बीच का! और अपना सम्मान जुटाने के लिए ‘जुगाड़’ ही हमारा अस्त्र था|

मेरी होली की यादें 1964 से 1968 तक का फ़्लैशबेक है। परिवार अपनी होली गाँव की यादों के साथ गीत गाकर, मीठे स्वालीं (भरी पूरी) बनाकर और होलिका दहन के गीतों के साथ मनाता| मारवाड़ी व्यापारिक लोग अब होलिका दहन की परंपरा अपने हिसाब से मनाते। महिलायें राजस्थानी गीत  गातीं और गोबर के बने विशेष उपलों की माला से होलिका दहन स्थल पर पूजा करतीं। घरों में उनके गुजिया और नमक पारे बनते।

हम बच्चे होली अपने जुगाड़ तंत्र से मनाते। हमारी होली परम्पराओं की कम और वर्ग संघर्ष का नज़ारा थी। साफ़-साफ़ दो वर्ग थे। एक व्यापारी वर्ग के परिवार के बच्चे और कुछ नौकरी पेशा वाले माँ-बाप के बच्चे। ये बच्चे संसाधन युक्त थे। हमारी टक्कर दरअसल ऐसे ही परिवार के बच्चों से होती थी। इनके पास अब कुछ था, बाज़ार का खरीदा हुआ, और हमारे पास था केवल जुगाड़!

होली खेलने के लिए इनके अभिभावक खर्च कर सकते थे और हमें अपना मजा जुगाड़ से पैदा करना होता!

इस तरह होली हमारे लिए सिर्फ एक त्यौहार नहीं था- ये एक उल्लास, कर्मठता, रणनीति और जुगाड़ का समय होता था। आज की तरह बाजार में चायनीज़ टॉय पिचकारी और खुशबू वाले रंग नहीं थे। कैसा माहौल था और क्यों हम रणनीति में उलझते थे, आगे वृतांत में यह खुलासा होगा।

हमारी यानी मेरी और मेरे षड्यंत्रकारी साथियों की उम्र ही होगी यही कोई 12-13 साल। हम बच्चे भी थे और बड़े भी। हम उस परिवार से थे, जहां ये समझा जाता बच्चे को पैसा देने का मतलब उसे बिगाड़ना है! हमें यानी अनिल को और मुझे साल में तीन बार ही खर्चे के लिए पैसे मिलते थे। एक दशहरे के रावण फूंकने के मेले के लिए, जिसमें हम लाल सेलिफेन की पन्नी के बने चश्मे और एक गुब्बारे लगी पिपरी खरीदते। यह बात अलग थी कि‍ घर आते-आते चश्मे टूट जाते और पिपरी की आवाज ख़त्‍म हो जाती। और यदि आवाज कामयाब रही तो पों पों से परेशान घरवाले पिपरी छीन लेते। पर हम हिम्मतवाले अगले साल फिर यही दोहराते। पैसे मिलने का दूसरा मौक़ा होता था, गिंदी के मेले का, जो मवाकोट में होता। यहां नारंगी रंग से सरोबार जलेबी की चाह पिपरी पर भारी पड़ती और पूरे दो आने की ज़लेबी खा जाते। हां, एकाध टुकड़ा साथ आए दोस्त को दे देते, जो अपनी रकम फूटे हुए चश्मे पर गंवा चुका होता। तीसरा मौका खर्च मिलने का होता था- होली। इससे रंग ख़रीदने की जुगत होती थी। पिताजी गीले रंगों के खिलाफ थे। वे गुलाल खरीदकर लाते और हम से कहते कि‍ इसी से होली खेलो। अब आप ही सोचिए कि‍ उस उम्र में क्या सिर्फ सूखी होली खेली जा सकती है? हम मां के पीछे पड़ जाते, रोते, ज़मीन पर पैर घिसटते़। इतने पराक्रम करने के बाद मां हम दोनो भाइयों को चार आने देतीं, इस हिदायत के साथ कि ‘फालतू में मत खर्च करना !’

बाजारी सिंथेटिक रंग उस वक्त जर्मनी से इम्पोर्ट होते थे- महंगे होते। इन रंगों के आने से पहले नारंगी रंग के टेसू के फूलों से ही होली खेलने का प्रचलन था। पहाड़ से लगे मैदानी इलाके के गांवों के ज्यादातर लोग इन्ही फूलों का रंग बनाने के लिए प्रयोग करते थे। मां के दिए इतने कम पैसों में कितना बाजारी रंग आ पाता?

हमारे कस्‍बे के ही व्यापारिक परिवारों और ऊंची आर्थिक स्थिति वाले परिवारों के बच्चे भी होते थे। ये खुलकर बाजारी रंग का इस्तेमाल करते। महंगे बाजारी रंग को हम विशेष दोस्त पर लगाने के लिए बचाते थे और बाकी गीले रंग के लिए हम एडवेंचर ट्रिप पर जाते। कोटद्वार से 12 किलोमीटर दूर, नजीबाबाद जाने वाली सड़क पर टेसू के फूल के पेड़ थे। टेसू माने पलाश या ढाक। फ़रवरी मार्च में इस पर फूलों का उबाल आता है। उबाल ही कहूंगा, क्योंकि‍ उस वक्त इस पर पत्ते नहीं दिखाते, बल्कि ये फूलों की रजाई ओढ़ लेता है।

होली हमारे लिए महंगी पिचकारी और रंग से लैस विरोधियों पर दबदबा बनाने का संघर्ष होती। हम ‘आर्थिक संकुचन’ की वजह से रंग खरीद नहीं खरीद सकते थे। विकल्प के तौर पर हम टेसू के फूलों से रंग बनाने की रणनीति पर काम करते। पर इस पर भी पेंच था। हमारे घरवाले हमें उतनी दूर जाने की इज़ाज़त नहीं देते थे। इसलिए हमें उन्हें बिना बताए टेसू के फूल जमा करने जाना होता था।

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हमारी चुनौती यह होती कि उतनी दूर से टेसू के फूलों को लाया कैसे जाए, वह भी बिना घर वालों के पता चले। इसके लि‍ए ज़रूरी था कि‍ आने-जाने के लिए साइकिल हो। हमारी गैंग के कुछ सदस्य साइकिल-धारी होते थे। वे अचानक महत्वपूर्ण हो जाते। अब हम उनकी चमचागिरी करते और वह भी तात्कालिक महत्व का फायदा उठाते हुए नखरे दिखाते और हमसे उस दौरान होमवर्क से लेकर पहले बैटिंग करने की शर्तें रखते। हम मन ही मन बाद में देख लेने का संकल्प करते हुए उनकी हर बात मानने को मजबूर रहते। कुछ ऐसे दोस्त भी निकल आते जो वैसे तो अपने दम पर बाज़ार से रंग लाकर होली खेल सकते थे, पर हमारे एडवेंचर की बाते सुन हमारे साथ रोमांच के अनुभव के लिए अपनी साइकिल ऑफर कर देते। इन दोस्तों के बावजूद ज्यादा साइकिल की जरूरत होती तो किसी ऐसे व्यक्ति की तलाश होती, जिसके पास साइकिल हो और दूसरे हमारे गिडगिड़ाने का उस पर प्रभाव हो सकने की गुंजाइश हो। ऐसे लोगों को आईडेंटीफाई कर किन्ही दो-तीन पर ‘जीरो-इन’ किया जाता। उतने ही समूह बना कर उनके पीछे पड़ जाते कि‍ हमें एक दिन के लिए साइकिल उधार दे दो। हम विनीत दिखने की, भीषण आज्ञाकारी होने के और अच्छे बच्चे होने के तमाम सबूत उन्हें देते| चाहे हमारे माता-पिता दयाशील हों ना हों, एकाध सज्जन ऐसे दयावान मिल ही जाते थे कि जो हमें साइकिल देने पर राज़ी होते। पर इस शर्त भी होती कि वह टेस्ट लेंगे कि हमें साइकिल चलानी आती भी है कि‍ नहीं। हम अपने बीच के सबसे कुशल साइकिल चालक का चुनाव कर परीक्षा में पेल देते। वह बेचारा भी कई बार परीक्षक की पैनी निगाहों से घबरा जाता और साइकिल ठीक से चला नहीं पाता, फेल हो जाता तो उस व्यक्ति से साइकिल मिलना कठिन हो जाता। फिर हमें दूसरे ऐसे व्यक्ति को खोजना पड़ता, जिसकी मान मनुव्वल कर साइकिल मिल सकती हो। साइकिलों की व्यवस्था होने के बाद तय होता कि‍ कब टेसू के फूल जमा करने चलना है!

अब होली से तीन-चार दिन पहले का कोई दिन फूल जमा करने के लिए चुन लिया जाता। घर से थैले या पुराने मेजपोश जमा कर किसी एक के घर में रख दि‍ए जाते। इस काम के लिए जगदीश का घर था। उसके पिता नहीं थे। माँ अकेली थीं। उसे घर से होली खेलने के लिए कुछ मिलता नहीं था। सबसे बड़ी बात, उसकी माँ शुरू में तो जंगल जाकर फूल इकठ्ठा करने की मना ही करती थीं। पर जब जगदीश, बिना बाप का इकलौता पुत्र दहाड़ मार-मार कर रोने लगता, तो माँ का दिल पिघल जाता। वह न केवल उसे हमारे साथ जाने की आज्ञा दे देतीं, बल्कि हमारे षड्यंत्र में शामिल भी हो जातीं। यहाँ तक की एक्सपिडिशन–दिवस पर हमारे लिए दस-बारह रोटी भी बना देतीं। एक्सपिडिशन के लिए ऐसा दिन चुना जाता, जो इतवार न हो, क्योंकि इतवार को घर वालों को दिन का हिसाब देना होता। इसलिए स्कूल लगने वाला दिन चुना जाता। साल के इस वक्त स्कूल दिन का हो जाता था यानी सुबह 10 से शाम 5 बजे तक का। एग्जाम नज़दीक होते इसलिए एक्स्ट्रा क्लास का बहाना कर हम 8 बजे ही जगदीश के घर जमा हो जाते और चल पड़ते एक साइकिल पर दो-तीन के हिसाब से अपने थैले लेकर। नजीबाबाद की तरफ जाते हुए ढाल होता। तेज़ी से चले जाते। पता ही नहीं चलता की कब बारह किलोमीटर पूरे हुए। पलक झपकते ही 12 किलोमीटर तय हो जाते और लगता कि‍  सामने सड़क के किनारे के टेसू के पेड़ हमारा ही इंतज़ार कर रहे हैं। साइकिल किनारे खड़ी कर दी जाती। कमज़ोर दिल वाले तो नीचे झड़े हुए फूलों को जमा करने लगते और हम एड्विन्चारिस्ट पेड़ों पर चढ़ कर फूलों भरी टहनी तोड़ कर नीचे गिराते। सारे फूलों को इकट्ठा कर थैलों में और मेजपोश में बांधने का काम नीचे रहने वाले सदस्यों का होता। अब जाने का वक्त होता, तो एक बड़ी समस्या हो जाती। हम में से कुछ अति जोश में पेड़ पर ज्याद ऊपर चढ़ जाते पर वापस उतर नहीं पाते, क्योंकि‍ वापस उतारते वक्त नीचे देखना होता है। नीचे देखते तो पता लगता कि‍ हम कितने ऊपर आ गए हैं! यह सोचते ही पैर कांपने लगते कि पैर फिसला तो कितनी चोट लगेगी। हिम्मत टूटने लगती। अब सारा समूह उन्हें किसी तरह सुरक्षित उतारने में लग जाता। कुछ ऊपर चढ़ कर उसे बताते हुए उतरते कि वह कहाँ पर पैर रखे, कहाँ से टहनी को पकड़े। बाकी सदस्य नीचे से ही निर्देश देते। ये निर्देश उतरने वाले को ज्यादा कन्फ्यूज़ कर देते। कुल जमा बात यह होती कि‍ जितना समय फूल तोड़ने में खर्च होता, उससे डेढ़ गुना पेड़ पर चढ़े महारथियों को उतरने में लगता।

अब तू-तू मैं-मैं का समय होता। बात यह थी कि‍ आते वक्त तो ढाल था। कोई भी आराम से साइकिल चला लेता। वापस आते वक्त काम की थकान तो होती, साथ-साथ चढा़ई भी, ऊपर से डबलिंग यानी दो-दो एक साइकिल पर। फूलों का बोझ अतिरिक्त। जहां आते वक्त सब कहते साइकिल मैं चलाऊंगा-साइकिल मैं चलाऊंगा। जाते वक्त हाल उल्‍टे हो जाते। अब कहते कि‍ साइकिल तू चला–साइकिल तू चला। खैर थोड़ी कहासुनी के बाद मामला सेटल होता कि‍ बारी-बारी से सब चलाएंगे। इस वक्त सबसे सुखी अपने को वह समझते जिन्हें साइकिल चलानी नहीं आती। पर उन्हें खुश कैसे रखा जा सकता था, जब सब दुखी हों? इसलिए उनसे कहा जाता कि‍ तुम साइकिल पर धक्का लगाओ। अब उनकी हंसी गायब हो जाती और वह रस्तेभर साइकिल को धक्का देते आते। वापसी में बस एक सुकून था। रास्ते में गन्ने के क्रशर थे, वहाँ पेराई होती थी। वहां की शर्त एक होती थी की जितने चाहे गन्ने खा लो, पर ले जाने की इज़ाज़त नहीं थी। वहां पर रुक कर गन्ने खाए जाते और एनर्जी रिस्टोर की जाती। गन्ने खाने में हमें समय का ध्यान ही नहीं रहता। कितनी भी जल्दी करते, पर घर पहुँचने में देर हो जाती। अब देर शाम को घर पहुंचते। जिन के घरवाले भले मानस होते वे सिर्फ डांट खाते, हमारे नसीब ये भलमनसाहत नहीं थी इसलिए मार पड़ती। पर हमें और दिनों की अपेक्षा दर्द कम होता था क्योंकि हम टेसू के फूल जो ले आए थे। अगले दि‍न टेसू का रंग बनाने की कल्पना में देर तक नींद नहीं आती और जब आती तो थके शरीर को इतनी नींद आती कि सुबह हमें उठाने के लिए घर वालों को खूब मशक्कत करनी पड़ती|

अब बारी थी, रंग पकाने की। टेसू के फूलों से रंग नि‍कालने के लिए उन्हें पानी में उबालना पड़ता है। अब इतने सारे यानी बोराभर कर जमा किए गए फूलों को उबालने के लिए बर्तन भी बड़ा चाहिए। वह कहाँ से आए। गांव की तरह पंचायत घर के बर्तन तो इस कस्‍बे में होते नहीं थे। हमारी नज़र में एक ही बर्तन रहता था- हज्ज़न मियां का टब। पास के धोबी का बड़ा टब। हज्ज़न चच्चा हमारे शहर के धोबी थे। उनका नाम हज्ज़न मियां क्यों पड़ा, यह भी कथा थी। उन्हें हज जाने की बड़ी तमन्ना थी। पर गरीब आदमी हज जाने का खर्चा कैसे जुटाए ! वे अपने हज जाने की हसरत की और हज की कहानियाँ हर एक को सुनाते थे। शायद इसलिए ही उनका नाम हज्ज़न मियां पड़ गया। अब हमारा सारा गैंग हज्ज़न चच्चा के चक्कर काटने लगता, “चच्चा- एक दिन के लिए हमें टब दे दो।” हम जानते थे कि‍ हम तीन-चार दिन तक टब लौटा नही सकते। पर एक दिन के लिए मांगने पर टब मिल सकता था। और सच बात तो यह भी थी कि‍ हज्ज़न चच्चा भी जानते थे कि‍ अगर ये लोंडे-मोंडे  रंग बनाने के लिए टब ले गए, तो जल्दी वापस मिलेगा नहीं। वह हमारे अनुनय-विनय पर ‘कत्तई नही’ ही जवाब देते। हम सुबह से हज्ज़न चच्चा ‘प्रेसवाले’ के पास आकर बारी-बारी से अनुनय-विनय करते पर हमें ‘कत्तई नहीं’ से ज्यादा जवाब सुनने को नहीं मिलता। वे कहते, “पिछली बार भी दिया था। तुमने उसे काला कर वापस किया। मेरे धोये हुए कपड़े खराब हो गए। मैं दो दिन तक टब धोता रहा।”

हम भगवान से लेकर माँ तक की कसम खाकर उनसे कहते, “चच्चा, इस बार मोसे (धुवें) से काला नहीं करेंगे और धो कर देंगे।” पर हमारी बात सुनकर वह फिर ‘कत्तई नहीं’ कहते और अपने काम में लग जाते। हम हज्ज़न चच्चा की मस्जिद से लगी दुकान पर उन्हें घेर कर बैठ जाते— उदास| दिन के खाने का समय हो जाता। हम भूखे प्यासे बैठे रहते। घर से बार-बार खाना खाने आने के संदेशे आने लगते। पर हम टस से मस नहीं होते| हज्ज़न चच्चा परेशान होने लगते। चहरे का भाव बदले बिना बार-बार कनखियों से हमारी और देखते। बच्चे बिना खाना खाए भूखे प्यासे बैठे हैं। बाहर से कठोर दिखने वाले हज्ज़न चच्चा को यह सहना मुश्किल हो जाता। वह जब इस तरह देखते तो हम समझ जाते कि‍ अब हम जंग जीतने वाले हैं। हम अपना मुंह और लम्बा लटका लेते, पेट पकड़ने लगते मानो भूख से दम निकल रहा हो। अब इससे आगे हज्ज़न चच्चा सह नहीं सकते थे। दो-चार गालियाँ देते और टब देने की हामी भर देते, इस ताकीद के साथ कि‍ ‘हरामियों, टब जैसा साफ़ दिया जा रहा है, वैसे ही साफ़ वापस करना होग!’ हम सब समवेत स्वर में ‘बिलकुल’ कहते और हज्ज़न चच्चा बिना दांत वाली मुस्कराहट के साथ हमें टब दे देते। वह जानते थे कि‍ हमारी ‘बिलकुल’ में बिलकुल भी इमानदारी नहीं है और उन्हें टब कालिख से भरा हुआ मिलेगा। पर बच्चे तो उनके लिए फ़रिश्ते थे।

अब रंग बनाने की कारसाजी शुरू होती! जगदीश के घर की छत पर ही चूल्हा बनता। मोहल्ले में और कोई अपनी छत ख़राब क्यों करने देता भला। फिर जगदीश की माँ की शरण में जाया जाता। जगदीश की माँ को भी सफाई कर देने का भरोसा दिया जाता और पत्थर-ईंट जमा कर टब के लिए चूल्हा बना दिया जाता। लकड़ी की विशेष परेशानी नहीं थी। सभी घरों में लकड़ी के चूल्हों का इस्तेमाल होता था। सभी अपने अपने घर से लकड़ी चुरा-चुराकर जगदीश के घर की छत पर जमा कर देते थे। उत्साह में हम इतनी लकड़ी जमा कर देते थे कि‍ रंग बनाने के बाद भी इतनी बच जाती कि जगदीश  की माँ को महीने भर तक लकड़ी के लिए जंगल जाने की ज़रूरत नही रहती।

तय होता कि‍ छोटी होली यानी होलिका दहन वाले दिन से एक दिन पहले रंग ‘पकाया’ जाएगा। हम सभी जगदीश के यहाँ जमा हो जाते। छत पर भट्टी लगती, टब चढ़ाया जाता। उसमे टेसू के फूल और पानी भर दिया जाता। इसके बाद भट्टी सुलगाने का काम शुरू होता। हमने कभी भट्टी सुलगाई होती, तो सुलगती ना! इस काम का अनुभव किसी को नहीं था। जब जगदीश की माँ आधे घंटे तक हमें इस तरह परेशान देखतीं तो वह हंसती हुई आतीं और लकड़ी ठीक से बैठा कर आग सुलगातीं। रंग पकने लगता।

अब हमारा काम होता भाग सिंग हलवाई के कारीगर को घेरना। रंग फेंकने के लिए पिचकारी भी चाहिए होती है। व्यापारी वर्ग के परिवार के बच्चों के पास तो बाज़ार से खरीदी पीतल की बेहतरीन पिचकारी होती। महँगी पिचकारी खरीदने के लिए हमारे माँ-बाप साफ़ मना कर देते कि‍ एक दिन के खेलने के लिए पिचकारी खरीदना फ़िज़ूलखर्ची है। बात सही भी थी। जब घर में दूसरी ज्यादा प्राथमिकताएं हों, तो पिचकारी पर खर्च वास्‍तव में फ़िज़ूलखर्ची ही था। यहाँ पर भाग सिंग हलवाई के मिठाई बनाने वाले कारीगर की एक्सपर्टाइज की ज़रूरत होती। मिठाई कारीगर नत्था भाई बांस की पिचकारी बनाना जानता था। शाम को जब मिठाई बनाई जानी बंद होती, तो हम उसके पीछे पड़ जाते। वह भी अपनी कला दिखाने को बेताब रहता, पर चाहता था कि‍ हम उसकी कुछ खुशामद करें ही। हम तो खुशामद करने को उतारू रहते। जब वह ‘हाँ’ कहता, तो अगला काम होता बांस की व्यवस्था करना। पिचकारी बनाने के लिए बांस की ज़रूरत होती। हम कुछ मोटे-मोटे बांस आम के बाग़ वाले मुस्लिम मालियों से माँगते। उन्हें तब कुंजड़ा कहा जाता था। उनके पास मोटे बांस होते। उनका इस्तेमाल वह अपनी बहंगी बनाने के लिए करते थे। उनके पास इस्तेमाल के बाद मोटे बांस के टुकड़े बचे होते। उन्हें वे सम्‍भाल देते थे। वे जानते थे कि‍ होली के पास बच्चे बांस माँगने आएंगे। वह इन बांसों का सौदा करते। बांस देने से पहले वह हमसे कसम खिलवाते कि‍ इस बार गर्मियों में जब आम लगेंगे, तो हम उनके बगीचों में आम चोरने (चुराने) नही आएंगे। हमारा हाल तो यह होता कि‍ उनके कुछ कहने से पहले ही हम कसम खाकर बताते कि‍ इस साल तो क्या, हम तो पिछले साल भी आम चुराने नहीं आए थे। हमारे ज्यादा कलाकार साथी तो उनसे मुखबरी की डील तक कर लेते। बच्चों की स्मृति बहुत कम होती है। गर्मी आते-आते हमारी स्मृति सूख जाती और आम चुराने का मौलिक अधिकार का जज्बा हमारी रगों में दौड़ने लगता।

बांस मिलने के बाद शाम को नत्था भाई की पिचकारी वर्कशॉप लगाती। वह बांस को गाँठ के पास से आरी से काटता और गाँठ के दूसरी तरफ के हिस्से को अगली गाँठ के समीप इस तरह एक खोखला बांस का सिलिंडर बन जाता। इन बांस के टुकड़ों को रात को छिपाकर भट्टी के पर रख देता। सुबह जब भट्टी सुलगती, तो वह भट्टी में एक मोटा सुवां लाल करने को रख देता और काम के बीच जब भी फुर्सत मिलाती बांस के सिलिंडर के गाँठ वाली मुंह की तरफ से ‘औप्तिमाम मार’ के लिए  गरम सुवें से छेद कर देता। हम भट्टी के बाहर से भीतर झांकते और नत्था भाई हमें देख कर वापस भागने को कहता कि‍ कहीं मालिक को यह पता न चले कि‍ काम के वक्त वह बच्चों की पिचकारी के लिए बांस पर छेद कर रहा है।

शाम को नत्था भाई छेद किए बांस लेकर आता। अब पिचकारी के लिए पिस्टन बनते। बांस की पतली डंडी के ऊपर कपडे की पट्टियाँ लपेट कर गुंडा सा बना लिया जाता। उसे खोखले बांस के सिलिंडर के अन्दर कस कर जाने लायक बनाया जाता। जिसे पीछे खींचने से बाल्टी से रंग पिचकारी में भर जाता और पुनः दबाने से वह फुहार की तरह बाहर निकालता। यह हमारी पिचकारी होती। छोटी होली को इस पिचकारी का ट्रायल होता, ‘ओप्तिमम मार’ के लिए बार-बार छेद का व्यास ठीक किया जाता। पिस्टन पर कपड़ा लपेटा जाता। जगदीश के घर की छत हमारा ‘एम्युनिशन स्टोर’ होता।

होली का दिन हमारा डी-डे होता। प्रभुत्व के संघर्ष का, जुगाड़ी वर्सेज संसाधन वालों का। लगभग आठ-नौ बजे हमें होली खेलने की इजाज़त मिलती। हमारा दल अपने ‘हथियारों’  और ‘अम्न्युनेशन’ के साथ गली के एक ओर तैनात होता। दूसरी ओर वह जिनके पास बाज़ार से ख़रीदे रंग और पिचकारी होती। लोकल वर्सेज़ ग्लोबल मार्किट की सीधी लड़ाई। पहले विरोधी पक्ष मार करता। लम्बी दूरी तक मार करने वाली पीतल की पिचकारी के रंगों से हम बिना हथियार उठाए ही रंगीन हो जाते। हमारी पिचकारियां आधी दूरी तक भी मार नहीं कर पातीं! उन्हें पिचकारी की रेंज तक लाने के लिए हमें रंगों की बौछारों में ही आगे बढ़ कर उन पर रंग डालना होता। हममे से कई हताहत हो जाते। हमारी हिम्मत भी काम नहीं आती, क्योंकि‍ बाजारी रंग तेज़ होते और हमारा टेसू का रंग उनके सामने फीका होता। बीच-बीच में हमारी पिचकारी के पिस्टन के कपडे़ की पट्टी खुल जाती और पिचकारी बेकार हो जाती। हमारी नाकामी पर विरोधी हमें चिढा़ते। हम तरबतर हो जाते, निराश होकर पीछे लौटते। अब हम दूसरी रणनीति का सहारा लेते। उस वक्त तक न तो हमें शिवाजी के छापामार युद्ध शैली का पता था और न ही चे-गुएरा के गुर्रिल्ला रणनीति का। बस अनुभव ने हमें ज्ञानी बना दिया था। हम कुछ जो कमजोर किस्‍म के थे, वे पिचकारी थामे मोर्चा सम्हाले रहते और हमारे बीच के कुछ मुस्टंडे साथी छतों से कूद, छिपकर गली के उस छोर पर पहुंच जाते क्योंकि‍ विरोधी दल का ध्यान तो हम पर रहता। वे उस ओर पहुँच कर उनके रंगों की बाल्टी छीनने लगते। अपनी रंगों की बाल्टी बचने के चक्कर में अब वे लोग पिचकारी नीचे रख कर बाल्टी बचाने लगते, तो हम पैदल सिपाही दौड़ कर आगे बढ़ते और उनकी पिचकारिया फेंक देते। सशस्त्र होली युद्ध अब पिचकारी के बजाय हाथों से लड़ा जाने लगता। रंग की बाल्टियों की छीना-झपटी में दोनों पक्ष तरबतर होते। इस बार विरोधी पक्ष अपने ही पक्के रंगों से पुँता होता, जो हमारी मुस्टंडा-ब्रिगेड का कारनामा होता। अब जब दोनों दल बराबर रंगों से पुत गए और रंग भी बह गए, तो अब क्या गिला शिकवा। दोनों दल आपस में मिलकर हँसने लगते। छीना झपटी में चोट फटाक भी लग जाती, तो उसका सामूहिक इलाज होता! इलाज में आँख में फूंक मारने से लेकर मलाशने और मुंह धोना तक शामिल था। अब सबके घरों में जाकर नमकीन खाते और जिन घरों में गुजिया बनी होतीं, वहाँ पहले पहुंचते।

अंत में दो-तीन बातें बतानी ज़रूरी हैं। हमारी होली यहीं पर ख़त्म नहीं होती। रंगों से पुते जब हम घर पहुंचते तो जो बर्तन हम घर से मांग कर रंग रखने के लिए ले गए थे, उन पर गुर्रिल्ला युद्ध के समय पिल पड़ जाते थे। अब जब हम अपने पिल पड़े बर्तनों को घर लाते, तो हमें यह अंदेशा हो जाता था कि‍ जितने पिल बर्तन पर पड़े हैं, उतने थप्पड़ तो पड़ने ही हैं| हम पहले से ही रोने लगते और एक-दूसरे का नाम बताने लगते। बिना पिटे ही हमारा विलाप कई बार हमें मार से बचा भी लेता था। यह भी नित्य होली कर्म था। इसके अलावा रंग छुड़ाने के लिए नहलाते वक्त जो हमारी घिसाई होती, वह अलग। माँ साबुन घिसती, बीच-बीच में पट-पट मारती भी रहतीं। हमारा क्रंदन पांचवें और सातवें सुर पर रहता। कोई ध्यान नहीं देता क्योंकि‍ लगभग हर घर से इस तरह की आवाजें आती  रहतीं|

अंत में एक यादगार के तौर पर हज्ज़न चच्चा की याद। यह भी हमारी होली का हिस्सा ही था।

हज्ज़न चच्चा का टब लौटाना भी हमारे लिए समस्या होती, क्योंकि‍ फिर वह काला हो गया होता। हम सब टब लेकर ऐसे मोड़ पर खड़े हो जाते, जहां से हम तो हज्ज़न मियां को देख सकें, पर वह हमें नहीं। वह अपनी दुकान से इधर-उधर जाते ही रहते थे। उस वक्त भी जाते थे (आज मुझे यह भी लगता है कि‍ हज्ज़न चच्चा जानते थे कि‍ हम उनका टब लौटाने के लिए छुप कर बैठे हैं। वह यह भी जानते थे कि‍ टब काला ही होगा। वह जानबूझकर अपनी दुकान से चले जाते थे कि‍ हम टब रख सकें और इज्ज़त से भाग सकें !) हम दौड़ कर उनकी दुकान में काला टब रख कर चम्पत हो जाते। थोड़ी  देर में हमें हज्ज़न चच्चा की ऊंची आवाज सुनाई देती.. ‘‘हरामियो, फिर काला कर दिया टब! अगली बार नहीं दूंगा।’’

हम सब हंसने लगते|

श्यूं-बाघ : देवेंद्र मेवाड़ी

meri yadoon ka pahad

कथाकार देवेंद्र मेवाड़ी की पुस्तक ‘मेरी यादों का पहाड़’ नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया से प्रकाशित हुई है। इसमें पचास-साठ वर्ष  पहले के उनके गाँव, वहाँ के लोग, उनके सुख-दुख का सजीव चि‍त्रण हुआ है। यह पुस्‍तक पहाड़ी संस्‍कृति‍ को जानने-समझने में भी सहायक है। इस पुस्‍तक का एक अंश-

द ऽ, श्यूं-बाघों के तो किस्से ही किस्से ठैरे मेरे गाँव में। मुझे जैंतुवा ने कई बार रात में जंगल से आती ‘छां’ फाड़ने की गज्यांठि की जैसी घुर्र, घुर्र, घुर्र की आवाज सुना कर बताया, “ददा, बाघ बासनारो।” पहाड़ के गाँव में थे तो बकरियाँ और कुत्ते चुराने वाले वे छोटे-मोटे बाघ सचमुच मट्ठा मथने की फिरकी की तरह ही घुर्राते थे। लेकिन, सर्दियों में जब हम श्यूं-बाघों के असली इलाके मतलब अपने सर्दियों के गाँव ककोड़ जाते थे और भुंयारे यानी एक ही तल्ले के कोप के पत्थरों से बने अपने मकान या घास-फूस के मजबूती से बने बड़े से गोठ में रहते थे तो रात को पास ही से निकलती कच्ची सड़क पर, साज के पेड़ के सामने, उध्योंन के बड़े पत्थर के पास रुक कर दहाड़ते श्यूं की दिल दहलाने वाली आवाज सुनते रहते थे….आ..ऊ ऽऽऽ। टांड़ यानी दुछत्ती में  सोए हुए हम तो सहम ही जाते थे, नीचे सो रही हमारी गाय-भैंसें भी सिहर उठती थीं। न हम मुँह से कोई आवाज निकालते थे, न हमारी गाय- भैंसें। वे तो बस परेशान होकर दाँए-बाएँ सिर हिलातीं या डर कर थोड़ी देर खड़ी हो जाती थीं। श्यूं शायद गोठों की ओर से आती जानवरों और आदमियों की मिली-जुली गंध सूँघ कर जता जाता था कि मुझे पता है तुम लोग यहाँ हो। फिर आगे कनौट की संकरी गीली गली से होकर उस पार के जंगलों में चला जाता था। अगली सुबह गीली मिट्टी में बड़े-बड़े खोज देख कर पता लग जाता कि रात में सड़क से कौन गुजरा। श्यूं अकेला था या उसका पूरा परिवार भी साथ था, या केवल मादीन अपने बच्चे लेकर जा रही थी- सब कुछ पता लग जाता।

आगे शाल, शौंर्यां और भेष आदि के पेड़ों का जंगल था। मैंने शाल के वे ऊँचे पेड़ देखे थे, जिन पर शिकारियों के लिए मचान बाँधा जाता था ताकि रात में अगर श्यूं कनौट से निकले तो उनकी बंदूक की ज़द में आ जाए। पता नहीं, उन शिकारियों को कोई श्यूं मिला या नहीं।

उन दिनों, कालाआगर से ककोड़ तक यानी मेरे दोनों गाँवों के बीच आदमी और श्यूं-बाघों के जीने की जंग जारी थी। दोनों अपने अस्तित्व के लिये लड़ रहे थे। कभी पलड़ा एक ओर झुकता तो कभी दूसरी ओर। कभी शेर जीतता, कभी आदमी। आप विश्‍वास करेंगे, एक बार गाँव के ही मेरे एक रिश्तेदार पहाड़ में हमारे घर में आए। खाना बना। उन्हें खाने के लिये बुलाया। चीड़ के छ्योंल (छिलके) के हलके उजाले में मैं देख रहा था, वह रोटी का ग्रास चबाते और गले पर हाथ रख कर निगल लेते। ठुलि भौजी ने पूछा, “क्या हुआ? ऐसे क्यों खा रहे हैं?”

वह बोले, “कुछ नहीं, श्यूं ने दाड़ दिया था। असत्ती दुश्मन ने गला फाड़ दिया!” शेर के नाखूनों से उनके गले में छेद हो गया था! पता लगा, वे जैराम दा थे।

बकण्या गाँव के सोबन सिंह अपनी सैंनी (पत्नी) को श्यूं के पंजों से छुड़ा लाए ठैरे। श्यूं उनकी सैंनी को नीचे की ओर घसीटता और वह ऊपर को खींचते। आखिर श्यूं हार गया। उनकी न जाने कितनी गाय-भैंसें श्यूं ने मार दी ठैरीं। वे दिन थे, जब माल-ककोड़ निपट जंगल हुआ। तब गिने-चुने परिवार ही वहाँ रहते थे।

और, टकार के रमदा? रमदा तो अपनी घिंगारू की लाठी से श्यूं को पीट-पीट कर घायल श्याम सिंह को छुड़ा लाए ठैरे! गाजा से अद्वाड़ को जाने वाली सड़क आगे चल कर दो-फाट हो जाती थी। एक रास्ता अद्वाड़ को जाता था और दूसरा हल्द्वानी को वाया हैड़ाखान। घने जंगल से गुजरते अद्वाड़ के रास्ते में तो श्यूं ने न जाने कितने लोग मारे ठैरे, लेकिन उस दिन वह दो-फाट से थोड़ा आगे झाड़ी में घात लगा कर बैठा होगा। आगे-आगे राम सिंह, बीच में घोड़ा और पीछे श्याम सिंह। हल्द्वानी जा रहे ठैरे। उसने उन तीनों को आते हुए देखा होगा। पास आते ही उन पर छलाँग लगाई और श्याम सिंह को दबोच लिया। श्याम सिंह की चीख से घोड़ा बिदका और राम सिंह ने पीछे पलट कर देखा। देखा कि श्यूं श्याम सिंह को घसीट रहा है। कोई और जैसा होता तो शायद डर कर भाग जाता। लेकिन, वह डर कर नहीं भागे। बस, लाठी उठाई और टूट पड़े श्यूं पर। ले दनादन, ले दनादन। राम सिंह मजबूत काठी के आदमी थे। श्यूं सह नहीं पाया उनकी लाठी की मार। दहाड़ मार कर झाड़ियों में घुस गया। राम सिंह ने बुरी तारह घायल श्याम सिंह को उठा कर घोड़े की गून पर बैठाया और 6-7 मील दूर गाँव की ओर वापस लौट पड़े। गाँव में ही देशी दवा-दारू की। श्याम सिंह के घाव भर गए और कुछ समय बाद वह ठीक हो गए। श्यूं से भिड़ने वाले रमदा और उसके पंजों से बच कर आए श्याम सिंह पूरी उम्र जिए।

माल-ककोड़ के श्यूं-बाघों के तो इतने किस्से हुए कि आप पूरी रात सुनते रह जाएंगे। आदमी और जंगली जानवरों की जिंदगी की लड़ाई ठैरी। जो जीत गया, जी गया। उन दिनों वहाँ घनघोर वन थे और वनों में हर तरह के जंगली जानवर थे सूअरों से लेकर हिरन और श्यूं-बाघ तक। गाँव के लोग जानवर चराने जंगल जाते और श्यूं कई बार वहीं किसी गाय-भैंस का शिकार कर देता। बस, यहीं से दुश्मनी ठन जाती। गाँव में दो-एक भरवां बंदूकें होती थीं। उनसे कई बार रात-बिरात घात लगा कर लोग श्यूं-बाघ पर फायर कर देते। अक्सर वह घायल हो जाता और पालतू जानवरों या आदमी का शिकार करने लगता। बूढ़े बाघ भी पालतू जानवरों को मारते या आदमखोर हो जाते। लोग कहते थे, कुछ लोगों को तो जंगल में तरूड़ खोदते-खोदते खाड़ (गड्ढ़ा) में ही श्यूं ने दबोच लिया था।

लेकिन, रहना तो उन्हीं के बीच था। क्या करते? याद करके दुखी होते रहते। एक ही बात ध्यान में रहती कि इस दुश्मन ने मेरे इतने जानवर मारे या इलाके के इतने लोग मारे। श्यूं-बाघ मारना जुर्म था। जुर्माना और सजा हो सकती थी। इसलिए गाँव के लोगों ने श्यूं-बाघ से छुटकारा पाने का अपना अलग रास्ता निकाल लिया। वे ‘जिबाला’ सिलाने लगे। गजब की चीज थी, जिबाला। हम बच्चों ने उसका छोटा नमूना बनाना सीख लिया था। बड़ों ने ही सिखाया। आलू, पिनालू के खेतों में भी सौल मारने के लिए जिबाला सिलाते थे। वही बड़े आकार में श्यूं मारने के लिए बनाया जाता। जिबाले में तिकोन की तरह तीन मजबूत लट्ठे बांधे जाते। बीच में डंडियाँ और पटरे बाँधते। एक मजबूत लट्ठा त्रिकोण के सिरे में फँसाया जाता। उसके पीछे मजबूत डोरी के साथ एक गिल्ली बाँधी जाती। उस गिल्ली को फँसाने की ‘किदल’ यानी युक्ति में ही जिबाले का असली हुनर छिपा होता था। जिबाले के पूरे तिकोन को आगे से उठा कर, उसे पीछे तक जा रहे मजबूत लट्ठे के नीचे टेक पर टिकाते, तिकोन की पीठ पर भारी-भरकम पत्थर रखे जाते और पीठ पर बँधी गिल्लियों के बीच ऊपरी डंडे की गिल्ली फँसा दी जाती। इस तरह कि नीचे की गिल्ली पर मारे हुए जानवर से बंधी रस्सी अगर जिबाले के भीतर से जरा भी खींच दी जाती तो जिबाला अपने पूरे वजन के साथ धम्म से जमीन पर आ गिरता। जिबाला सिलाने वाले उसके चारों ओर हलका गड्ढा-सा बना देते और श्यूं के मारे हुए जानवर का बचा-खुचा हिस्सा निचली गिल्ली के सहारे लटका देते। रात को श्यूं दबे पाँव अपने मारे हुए शिकार के पास आता। अगर आदमी की कुड़बुद समझ गया तो वापस लौट जाता। लेकिन, अगर भूखा हुआ और शिकार का मोह नहीं  छोड़ पाया तो धीरे से जिबाले के नीचे जाकर शिकार को खींचता और दब कर खुद शिकार हो जाता।

गाँव के लोग कहते थे, एकाध बार तो ऐसा हुआ कि श्यूं आया भी और समझ भी गया। फिर भी चालाकी दिखा कर बगल से पंजा डाल कर शिकार खींचने की कोशिश की होगी। तभी, जिबाला गिरा होगा और तिकोन के मजबूत लट्ठे के नीचे श्यूं के पंजे दब गए। छूटना तो सम्‍भव था ही नहीं, चीखता, चड़फड़ाता वहीं फँस गया। कहते हैं, एकाध बार तो ऐसा भी हुआ कि श्यूं जिबाले के भीतर आया, देखा-भाला और धीरे से हाथ लगाया। गिरते जिबाले से एकदम बाहर छलांग लगाई, लेकिन पूँछ पकड़ में आ गई। जड़ से ही जिबाले के नीचे दब गई। पूरा श्यूं बाहर, पूँछ अंदर। अगले दिन लोगों ने देखा तो सिर पर पैर रख कर भागे। वापस लौटे तो देखा अधमरा श्यूं फिर वहीं। तब मामला समझ में आया।

लोगों का कहना था, बाद-बाद में जिबाला­ की जरूरत खतम हो गई क्योंकि जंगलात विभाग श्यूं-बाघ पकड़ने के लिए लोहे के मजबूत पिंजरे लगाने लगा। दो तरह के पिंजरे होते थे- एक कमरे और दो कमरे वाले। एक कमरे वाले में शिकार या चारा बाँध दिया जाता। श्यूं आता और शिकार के लालच में ज्यों ही भीतर जाता तो उसका गेट गिर कर बंद हो जाता। वह लाख सिर-पैर मारे लेकिन लोहे की उन मोटी-मजबूत छड़ों से बने पिंजरे से बाहर नहीं निकल सकता था।

दूसरी तरह के पिंजरे के बीचों-बीच में लोहे की मोटी छड़ों का पार्टिशन होता था। पिंजरे के पीछे के कमरे में कोई आदमी बैठता जिसे इस काम के लिए पैसे मिलते थे। वह आगे के कमरे में श्यूं आ जाने पर बैठे-बैठे ही उसका आगे का लोहे का फाटक गिरा देता। गिरते ही आगे का कमरा बंद हो जाता। पिंजरा जंगल में या श्यूं-बाघ के सुनसान रास्ते में रखा जाता था। उसके भीतर बैठने के लिए बहुत हिम्मती आदमी चुना जाता था जिसका हो-हल्ला या चीख-पुकार सुन कर श्यूं-बाघ आए और उसके लालच में पिंजरे में फँस जाए। मगर, ऐसे मजबूत कलेजे वाला आदमी कहाँ से आए जो रात के सन्नाटे में श्यूं-बाघ का चारा बनने का स्वांग कर सके?

लोग कहते थे- झाझ्, खुड़ानी के इलाके में डर-भर हुई ठैरी। श्यूं वारदात कर चुका था। उसे पकड़ने के लिए दो कमरों वाला लोहे का पिंजरा आ गया। उसमें बैठने के लिए मजबूत कलेजे वाले आदमी की ढूँढ-खोज शुरू हुई। वहीं आसपास कुछ डोटियाल यानी नेपाली मजदूर भी काम कर रहे थे। एक डोटियाल ने सुना तो बोला, बल, “हुजूर, मैं भैटन्या छ।”

जंगलात वालों ने पूछा, “तुम? तुम बैठोगे? डरोगे तो नहीं?”

“नैं हुजुर, मैं त नैं डरन्या छ। हाँ, श्यूं से भी जरूर पुछ लेना हुजूर!” हँसते हुए जंगबहादुर ने कहा। फिर पूछा, “रुपिया तो टैम पर मिल जाएगा न हुजूर? ”

“बिलकुल मिल जाएगा। तुम्हें लोगों की दुआ भी मिलेगी। श्यूं फँस जाने पर बहुत लोगों और मवेशियों की जान बच जाएगी।”

“मैं राजी छ हुजूर।”

“तो ठीक है जंग बहादुर। आज की रात तुम पिंजरे के इस पीछे के कमरे में बैठोगे। तुम्हें कुछ नहीं होगा। श्यूं तुम्हारे पास तक पहुँच ही नहीं सकता। रात में तुम्हें कुछ न कुछ बोलते रहना पड़ेगा। चाहो तो गीत भी गा सकते हो।”

“हुजुर श्यूं का सामने त ठुला-ठुला लोगों का गीत बंद ह्वै जान्या भयो। लेकिन, फिकर नहीं, जंग बहादुर जरूर गाएगा।”

“अगर आज की रात श्यूं नहीं आया तो दो-तीन रात बैठना पड़ सकता है। समझ लो तुम्हारी आवाज सुन कर उसे आना है।”

“ठीक छ। मैं एता बैठन्या भयो।”

बैठा, जंग बहादुर रोज-रोज की ध्याड़ी के बदले एकमुश्त रकम कमाने के लिए पिंजरे में बैठ गया। रात घिरने के बाद वह पिंजरे में जोर-जोर से बोलने लगा। बीच-बीच में कभी ‘नेवल्या ऽऽ’ की टेक पर नेपाली गीत गाने लगता।

लेकिन, रात बीत गई। श्यूं नहीं आया। अगली दो रातें भी खाली गईं। जंग बहादुर की हिम्मत बढ़ गई। मगर चौथी रात जब वह अपने ही सुर में डूब कर गा रहा था तो अचानक ‘आ…ऊ ऽऽऽ’ की दिल को चीर देने वाली आवाज और लोहे की छड़ों के पार्टीशन पर जबर्दस्त झन्नाटे से झनमना कर उठ खड़ा हुआ। अंधेरे में मुँह के सामने मौत खड़ी थी। मौत ने उसे पकड़ने के लिए पार्टीशन पर झपट कर फिर पंजे मारे। अंधेरे में उसकी आँखें चूल्हे के तपते अंगारों की तरह चमक रही थी। तभी, जंगबहादुर को होश आया कि फाटक गिराना है। उसने फाटक गिरा दिया। श्यूं पिंजरे में बंद हो गया। अब मौत और उसके बीच बस लोहे की छड़ों की रुकावट थी। श्यूं फिर दहाड़ा और जंग बहादुर का मजबूत कलेजा काँप उठा। वह धीरे-धीरे बेहोश हो गया। होश में आता और सामने मुँह फाड़े मौत को देखता।

वह गला फाड़ कर चीखता, “बचाओ! बचाओ! श्यूं खै (खा) दिन्या छ! हुजूर, बचाओ! ” और, चीखते-चीखते फिर बेहोश हो जाता।

सुबह भी होश में आया जब चारों ओर लोगों की आवाजें सुनीं। धीरे से उठा और एकटक हवा में ताकने लगा। फिर उसे अचानक जैसे कुछ याद आ गया और वह जोर-जोर से चीखने लगा, “खै दिन्या छ! खै दिन्या छ! बचावा! बचावा! ” चीखने के बाद फिर एकटक हवा में ताकने लगा। चारों ओर आदमी थे, लेकिन वह किसी की ओर नहीं देख रहा था। मूर्ति की तरह बैठा था। लगता था, जैसे उसे पता ही नहीं था कि वहाँ और आदमी भी हैं। वह बहुत डर गया था और गहरे सदमे में था।

उसे पिंजरे से निकाल लिया गया। श्यूं को भी पकड़ कर कहीं और भेजने की तैयारी की जाने लगी। जंगबहादुर किसी से कुछ नहीं बोला। बस, वह थोड़ी-थोड़ी देर बाद चीख उठता, “खै दिन्या छ! बचावा! बचावा! ” फिर हवा में ताकने लग जाता। कुछ लोग उसे साथ लेकर अस्पताल में दिखाने के लिए चल पड़े। अस्पताल उन जंगलों से बहुत दूर था। लोग कहते थे, जंगबहादुर वहाँ पहुंचने तक बीच-बीच में उसी तरह चिल्लाता रहा, “बचावा! बचावा! खै दिन्या छ! ”

रनजीत सिंह जी के कई जानवर मार डाले थे श्यूं ने। उनकी और श्यूं की लाग लग गई। गाँव के लोग कहते थे, श्यूं उनकी गाय-भैंसों की घंटियों की आवाज तक पहचानता था। वह जंगल में जानवरों को बुलाने के लिए ‘टेल’ (टेर) भी नहीं दे सकते थे क्योंकि श्यूं उनकी भी आवाज पहचानता था और बदला लेने पहुँच जाता था। कहते हैं, एक बार तो वह आमने-सामने मुकाबले में श्यूं की पूँछ काट कर ले आए थे!

और, नैथन गाँव के शेर सिंह जी पूँछ काट कर तो नहीं लाए लेकिन बकरी दबोचने की फिराक में गोठ के दरवाजे पर टकटकी लगाए बाघ को उन्होंने पूँछ से पकड़ कर, बाहर जरूर छटका दिया था! घर में दो दरवाजे थे- इधर और उधर। उनके ठीक नीचे गोठ के दरवाजे थे। गोठ में बकरियाँ थीं। उनकी बास चिता कर, मतलब गंध महसूस करके बाघ चुपचाप आकर ऊपर दरवाजे के सामने किसी बकरी की ताक में बैठ गया। दूसरे दरवाजे से शेर सिंह जी की नजर पड़ी।

वह भीतर ही भीतर दबे पाँव बाघ के पीछे पहुँच गए। जब तक बाघ कुछ समझे, उन्होंने कस कर उसकी पूँछ पकड़ ली और एक ही झटके में चौतरे से बाहर छटका दिया, बल।

एक ओर श्यूं-बाघ का इतना डर-भर और दूसरी ओर इसी डर में मेरे गाँव के लोगों के जीने का जीवट। डर-भर को हलका करने के लिए वे कैसे-कैसे किस्से गढ़ लेते थे! आखिर जीना तो वहीं था- उन्हें श्यूं-बाघों के बीच। तो, हँस-बोल कर ही क्यों न जी लिया जाये? इसलिए ऐसे किस्से भी खूब चल पड़े।

एक किस्सा कुछ यों था…

उस साल डर-भर हुई ठैरी। फिर भी उस आदमी को चोरगलिया से ऊपर गाँव लौटने में हो गई देर। नंदौर नदी का रौखड़ पार कर रहा था तो दूसरी ओर से छिप-छिपा कर आते, पीछा करते श्यूं पर नजर पड़ गई। अब क्या करता? कुछ कदम आगे चल कर फटाफट पेड़ में चढ़ गया। वहां दुफंगिया (दो शाखा) में आराम से बैठ गया। सामने रास्ते की ओर देखा। वहाँ श्यूं का कोई अता-पता नहीं। अचानक नीचे पेड़ की जड़ पर नजर पड़ी। वहाँ बैठ कर श्यूं जीभ से पंजे चाट रहा ठैरा! अरे, अब क्या हो? बहुत देर हो गई। लेकिन, श्यूं वहाँ से हिला नहीं। सोचता होगा, कभी तो उतरेगा! समय काटने के लिए जेब से सुलपाई (चिलम) निकाली, सुरकौन्या थैली में से तमाखू निकाला और सुलपाई में भरा। डाँसी पत्थर के टुकड़े पर ठिनका घिस कर ‘झूला’ जलाया, तमाखू में आग टेकी। दो-चार कस मारे और तमाखू पीने लगा। श्यूं टस से मस नहीं हुआ।…अब क्या हो? आसपास कोई आदमी नहीं। दिन ढल रहा ठैरा। कुछ देर बाद फिर सुलपाई भरी, तमाखू पिया। श्यूं फिर भी वहीं।…तीसरी बार फिर तमाखू भरा, पिया और श्यूं को देखते हुए तने पर खट-खट सुलपाई टटक्याई।…अचानक देखा, श्यूं सिर पर पैर रख कर भाग रहा था। थोड़ी देर बाद मामला समझ में आया। इस बार तमाखू की जलती हुई गट्टी का अँगारा नीचे आराम से लेटे श्यूं के पेट पर पड़ गया होगा। और, आग से जो चिसकाटी लगी होगी, उसके होश ही ठिकाने आ गए होंगे। श्यूं कूच कर गया वहाँ से! और वह आदमी? वह पेड़ से उतरा और पूरा जंगल पार करके, उकाव चढ़ कर तल्ली ककोड़ होता हुआ घर पहुँच गया। इतना ही नहीं, जब पूछा गया कि श्यूं फिर पीछे पड़ जाता तो? तो जानते हैं क्या जवाब दिया बल उसने? “द क्याप बात। कहाँ से आ जाता? जाने कहाँ कूच कर गया ठैरा। फिर गट्टी की चिसकाटी थोड़े ही भूल जाता? जनम भर नहीं भूलेगा वह। बंदूक की गोली क्या ठैरी चिसकाटी के सामने।…और, फिर रात भर मैं  भी क्या करता पेड़ पर! ”

लोग यह किस्सा भी सुन कर खूब हँसते थे…एक आदमी ने बहुत बकरियाँ पाली हुई थीं। शाम हुई और बकरियों का झुंड में-में करता हुआ लौट आया। आदमी ने उन्हें गोठ में गोठिया (बंद) कर टूटा हुआ दरवाजा फेर दिया। बकरियाँ गोठ की गरमाहट में बैठ कर आराम करने लगीं।…एक बाघ बकरियों की बास चिता (महसूस) कर दबे पाँव गोठ के दरवाजे पर आया और टूटे दरवाजे से धीरे से भीतर घुस गया। बकरियों की बकरैंन बास से भरे गोठ में बाघ की बास का पता नहीं लगा। बाघ अपने खाने के लिए अंधेरे में आँख घुमा कर मोटा-तगड़ा बकरा खोज रहा होगा कि अंधेरी रात में किसी पहर दो बकरी चोर भी दबे पाँव गोठ में घुस आए। उन्होंने भी अंधेरे में मोटा-तगड़ा हेलवान (बकरा) टटोलना शुरू कर दिया। अंधेरे में  ही सहलाते हुए एक चिकना-चुपड़ा हेलवान हाथ लगा तो उसके गले में रस्सी बाँध कर दरवाजे से चुपचाप बाहर निकल गए। घुप्प अंधेरे में गिरते-पड़ते चलते गए। एक रस्सी खींचता और दूसरा छड़ी मार कर पीछे से हाँकता, ‘मुना (बकरा) चल! चल! चलते-चलते रात ब्या (खुल) गई। हलका उजाला हुआ तो ‘बकरे’ पर नजर पड़ते ही दोनों बकरी चोर चीख मार कर भाग खड़े हुए! जिसे वे हेलवान समझ कर पकड़ लाए थे, वह मोटा-तगड़ा बकरिया-बाघ निकला!

ये तो हुआ खैर मन हलका करने के लिए हलका-फुलका किस्सा लेकिन कैसी कलकली लगती होगी दिल में, जब बाघ किसी की भरपूर दूध देने वाली गाय- भैंस को मार डालता होगा? लोग उस पार के पहाड़ों पर बसे कड़ैजर गाँव के टिकराम रुवाली ज्यू का किस्सा सुनाते थे। कड़ैजर गाँव देवगुरु पहाड़ के घने जंगलों की गोद में हुआ।…अब महाराज एक दिन ऐसा हुआ बल कि टिकराम रुवाली ज्यू के गोरु-बाछ जंगल में चरने गए हुए थे। वहाँ उन पर श्यूं की नजर पड़ गई ठैरी। उस दुश्मन ने मारने के लिए सबसे अच्छी दुधारु गाय छाँट ली। बस, उस पर झपटा और उसे चित्त मार दिया।

टिकराम पंडिज्जी ने सुना तो बौखला उठे। पकड़ा एक बाँज का मोटा-मजबूत और भारी कांगा (तीखा डंडा) और पहुँच गए सीधे जंगल। गाय मरी ठैरी। श्यूं का पता नहीं। उनका गुस्सा भड़क गया। पत्थर पर खड़े होकर जोर से धाद दी- “हं रै, कहाँ है तू? चोरी से मेरी गाय मार दी। आ, हिम्मत है तो सामने आ…”

श्यूं सिर झुका कर सामने आ गया बल। उसे देखते ही वे चिल्लाए, “अब क्या मूंड़ झुका कर आ रहा है? मुँह ऊपर उठा।”

श्यूं का सामने देखना और उनका दोनों हाथों को उठा कर पूरी ताकत से बाँज का काँगा मारना। खोपड़ी फट कर दो हो गई बल! श्यूं  वहीं ढेर हो गया।

रात-बिरात दीदी से एक और गाँव की उस सैंनी (औरत) का किस्सा सुन कर तो रौंगटे ही खड़े हो जाते थे।…

गाँव की चार-छह सैंनियां (औरतें) घास काटने जंगल में  गई हुई थीं, बल। सब आसपास ही घास काटने लगीं। श्यूं दुश्मन छिप कर उनके पीछे लग गया। मौका पा कर एक सैंनी पर झपट पड़ा और उसे घसीट कर ले गया। बाकी सैंनियां चीखती-चिल्लातीं भाग कर वापस गाँव पहुंच गईं। वहां रो-धो कर लोगों को बताया। कुछ लोग इकट्ठा होकर, लाठी-कुल्हाड़ियों से लैस होकर उस सैंनी को खोजने जंगल पहुँचे। शाम ढल चुकी थी। चारों ओर अंधेरा घिरने लगा। लोगों ने म्याल जला कर सैंनियों की बताई हुई जगह के आसपास उस सैंनी के कपड़े और शरीर के बचे-खुचे टुकड़े ढूँढना शुरू किए। सभी जानते थे कि अब तक तो उस बेचारी को श्यूं चबा-चुबू कर चट कर चुका होगा। लेकिन, न खून के निशान दिखे, न फटे कपड़े और न शरीर के टुकड़े। यहीं से तो घसीट कर ले गया था श्यूं? तो, फिर उस सैंनी का हुआ क्या?

तभी जंगल के सन्नाटे में कुछ दूर से दर्द भरी आवाज आई, “अरे, कोई छा, बचावा मैंकें, मैं ज्यूनी छों!” (कोई है, बचाओ मुझे, मैं जीवित हूँ) आवाज सुन कर सभी धक्क से रह गए। यह कौन है? किसकी आवाज है सुनसान जंगल के इस अंधेरे में?

लोग सोच ही रहे थे कि फिर आवाज आई, “अरे, मैं छौं, पारभति (पार्वती), ज्योंनी छौं मैं। आओ, ले जाओ मुझे…” कोई कातर आवाज में  पुकार रहा था।

दो-एक आदमियों से रहा नहीं गया। बोले, “उसकी आत्मा आवाज दे रही है शायद। उसे तो श्यूं कब के जो खा चुका होगा…”

किसी ने उनकी हाँ मैं हाँ मिलाई। कहा, “भूत-परेत की आवाज लगती है। बेचारी की अकाल मौत हुई है, तभी तो…”

डर कर वे लोग गाँव लौट गए। वहाँ बाकी लोगों से कहा। कुछ लोगों का मन नहीं  माना। उन्होंने साथ की सैंनियों से फिर पूछा। सैंनियों  ने कहा कि खुद उन्होंने देखा। उनकी आँखों के सामने उसे श्यूं ने पंजों से दबोचा और घसीट कर ले गया।

“तब कहाँ बचती,” उन लोगों ने कहा, “सुबह ज्यादा लोग चलेंगे। हल्ला-गुल्ला मचा कर खोजेंगे। कुछ तो मिलेगा? कपड़े जो क्या खा जायेगा श्यूं? वे तो मिलेंगे ही।”

गए, सुबह वे लोग हथियार लेकर, ढोल-कनिस्तर बजाते हुए वहाँ गए। चारों ओर फिर ढूंढा़। और, तभी फिर वही कातर आवाज आई, “अरे यहाँ हूँ मैं। मुझे ले जाओ…बचाओ…बचाओ मुझे! ”

“हैं, दिन में भी? दिन में तो आत्मा की आवाज नहीं आनी चाहिए। चलो, वहाँ जाकर देखते तो हैं,” किसी आदमी ने कहा।

“हाँ-हाँ चलो,” कह कर सब लोग उस तरफ गए कि आखिर आवाज आ कहाँ से रही है?

और, वहाँ जाकर दूर से देखते क्या हैं कि पारभती तो ज़िंदा है! एक ऊँचे पेड़ के दो-फाँगे में तने को कस कर बैठी हुई थी।

पास जाने पर वह जोर से चिल्लाई, “पेड़ की जड़ में श्यूं बैठा हुआ है। जरा देख कर आना…”

लोगों ने देखा पेड़ की जड़ पर सचमुच श्यूं बैठा हुआ था। वह कभी उनकी ओर देख रहा था और कभी ऊपर पेड़ में बैठी पारभती की ओर। अब क्या किया जाए? लोगों ने ढोल और कनिस्तर जोर-जोर से पीटना शुरू किया और ‘हुई-हुई’ की आवाजें लगा कर श्यूं को भगाने की कोशिश की। लेकिन, रात भर पेड़ पर से शिकार के उतरने का इंतजार करने वाला वह भूखा श्यूं वहां से नहीं हिला। तब लोगों ने आग जलाई। जलती हुई लकड़ियां उसकी ओर फेंकीं। आखिर हो-हल्ला सुन कर और आग से डर कर श्यूं वहाँ से हट कर दूर जाकर बैठ गया। तब एक-दो आदमी हिम्मत करके पेड़ के पास पहुँचे। श्यूं ने गुस्से में पेड़ को नाखूनों से बुरी तरह नोचा हुआ था। कई जगह शायद दाँतों से भी पपोड़ दिया था।

एक आदमी रस्सी लेकर पेड़ में चढ़ा और दो-फाँगे पर पहुँच कर रात भर डर से काँपती, भूखी-प्यासी पारभती के पास पहुँचा। उसने धोती से अपने-आप को पेड़ के तने पर कस कर बाँधा हुआ था ताकि डर से बेहोश होकर नीचे न गिर पड़े। वह आदमी पारभती को पीठ पर बाँध कर नीचे उतार लाया और लोग हो-हल्ला मचा कर उसे गाँव में वापस ले आए।

लेकिन, हुआ क्या? श्यूं तो उसे घसीट कर ले गया था? तो, खाया क्यों  नहीं? उसका खून तक नहीं पिया?

जो हुआ, वह पारभती ने गाँव वालों को बताया।

उसने बताया, “श्यूं मुझे घसीट कर उस पेड़ के पास तक ले गया होगा। वहाँ पर थोड़ा मैदान जैसा है। मैं बेहोश थी। होश आया तो देखा, मुझे उस पेड़ के तने पर टिका कर, वह अपने पंजों से कुतक्याली (गुदगुदी) जैसी करके वापस पीछे को दौड़ रहा था। दूर जाकर वह पलटा और जमीन पर पंजे फैलाए। उन पर मुँह रख कर इधर-उधर सिर हिलाते हुए मेरी ओर देखा। पूँछ हिला कर फिर तेजी से दौड़ता हुआ मेरे पास आया और मुझे पंजों से पकड़ कर हिलाने लगा। उसे देख कर मैं फिर बेहोश हो गई। होश आया तो देखा वह फिर वापस दौड़ रहा था। मेरे साथ वह बिल्ली और चूहे का जैसा खेल, खेल रहा था।…थोड़ी देर खेल खेलता, फिर बैठ कर मेरा हाड़-माँस चबाता।

“जब तीसरी बार होश में आई और उस दुश्मन को दूसरी ओर दौड़ते हुए देखा तो मुझमें हिम्मत आ गई। मन ने कहा, पारभती तू बच सकती है। सारा आँग (शरीर) डर के मारे थर-थर, थर-थर कर रहा था। लेकिन, मैंने हिम्मत जुटाई और पेड़ में चढ़ गई। लगता था उस दुश्मन ने अब नीचे घसीटा, अब नीचे घसीटा। ऊपर दो फाँगे पर पहुँच कर मैंने कमर से धोती खोली और उससे अपने आप को तने के साथ बाँध लिया कि डर से बेहोश होकर गिर न पड़ूँ।

“उधर वह असत्ती दूसरे किनारे पर पहुँचा। पंजों पर सिर रख कर खेल-खेलने लगा तो देखा-पेड़ के नीचे तो कुछ है ही नहीं। बस, वह बौखला कर दहाड़ता हुआ वापस पेड़ की जड़ की तरफ दौड़ा। इधर-उधर सूँघा कि कहाँ भाग गई। कुछ पता नहीं लगा। गुस्से में ‘आऊ ऽऽ आऊ ऽऽ’ करके बुरी तरह दहाड़ता रहा। फिर पेड़ को सूँघ कर ऊपर की तरफ देखा तो मुझ पर नजर पड़ गई। अरे, कैसा जो बौली (बौरा) गया ठेरा! आसमान की ओर उछाल मारने लगा। गुस्से से पागल होकर दाँतों से पेड़ की छाल पपोड़ दी, नाखूनों से उसे चीरने लगा। ऐसी ‘आऊ ऽऽ’ करता था कि मेरा कलेजा बैठ जाता था।

“कुछ देर बाद मैंने आदमियों का बोलना जैसा सुना। म्याल की आग दिखाई दी। तब मैंने जोर से आवाज लगाई, ‘अरे कोई छा? बचावा मैं कैं!’ लेकिन, शायद किसी ने नहीं सुना। आदमियों की आवाज सुन कर नीचे बैठा वह दुश्मन उस समय चुप हो गया। सुबह फिर आप लोग आ ही गए।”

दीदी कहती थी, कई महीनों तक वह श्यूं रात को उस सैंनी के मकान तक आता रहा, बल। उसके मुँह का शिकार जो छूटा ठैरा।

मगर एक असली और मजेदार किस्सा तो ठुल ददा भी सुनाते थे। जाड़ों में गोरु- भैंसों के साथ ककोड़ गए थे। तब तक वहाँ पहाड़ से कम ही लोग पहुँचे थे। वनों में खूब चारा उगा हुआ था। ददा जानवर चराने कभी टीले की तरफ जाते, कभी उससे आगे म्यलगैर के वन में, कभी गैन के घने जंगल की ओर और कभी औंसानि धार। उस दिन म्यलगैर गए हुए थे। डर-भर के दिन थे। श्यूं रौंती रहा था। बुरी तरह बौराया हुआ था। हर समय डर लगा रहता था, न जाने कब कहाँ किस पर टूट पड़े। मगर जब म्यलगैर पहुँचे तो देखा पानी के स्रोत के पास देबुवा सोया ठेरा! श्यूं-बाघ से बिलकुल बेखबर। ददा ने सोचा, पगली गया है क्या? परसुद्द (बेफिक्र) होकर सो रहा है।

उन्होंने पास जाकर मजाक में उसके सीने पर दोनों हाथों की अंगुलियां गड़ाते हुए श्यूं की आवाज निकाली- आ ऽऽ ऊ ऽऽ! देबुवा हड़बड़ा कर उठा और गला फाड़ कर चीखने लगा, ‘बचावा! बचावा! खै हालि छों! श्यूं लि खै हालि छों…’ मतलब, ‘बचाओ, बचाओ, शेर ने खा लिया। ददा हैरान-परेशान। वे दोनों हाथ हिलाते हुए चिल्लाए, “देबुवा! देबुवा! मैं हूँ। उठ।” लेकिन, उन्हें अविश्वास से देखते-देखते देबुवा डर के मारे बेहोश हो गया। ददा भी परेशान। उसे वहीं अकेला छोड़ कर जा नहीं सकते थे। समझ में नहीं आ रहा था, क्या करें?

मैंने पूछा, “तो फिर क्या किया? ”

बोले, “सामने ही कुछ दूर, एक पेड़ गिरा हुआ था। मैं जाकर उसके मोटे तने पर बैठ गया। सोचा, देबुवा होश में आएगा तो खुद ही देख लेगा। मैं तने पर उकडूं बैठ कर देबुवा के होश में आने का इंतजार करने लगा। थोड़ी देर बाद वह होश में आया। उसने चौंक कर अविश्वास से इधर-उधर देखा। तभी मुझ पर नजर पड़ गई। मैंने हँस कर कहा- क्यों उठ गया? लेकिन, मुझे हिलते हुए देख कर मेरी ओर इशारा करके देबुवा फिर जोर से चीखने लगा-‘य छ! य छ! ये मुझे खा देता है! अरे, बचाओ, बचाओ…हुई ऽऽ हुई ऽऽ।’ इसके साथ ही वह फिर बेहोश हो गया।“

“मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा था, उसका क्या करूँ? लगता था, वह रात भर सोया नहीं था। निनभंग (अनिद्रा) का मांच लगा था। लेकिन, अब क्या हो? उसकी कहाँ गोरु-भैंसें, कहाँ क्या? फिर ख्याल आया, उसके मुँह पर पानी के छींटे मारूँ तो शायद होश आ जाए। वही किया। अंजुलि में थोड़ा-सा पानी लिया और उसके मुँह पर छींटे मारे। डर मैं भी रहा था कि बचने के लिए कहीं मुझ पर न टूट पड़े। लेकिन, पानी के छींटे पड़ते ही वह जागा। धीरे से आँखें खोलीं। मुझे घूर कर देखा। फिर बदहवास होकर चारों ओर देखा और रोता हुआ मुझसे चिपट गया। बोला, ‘काकज्यू आज तुम नहीं होते तो श्यूं ने मुझे खा ही लिया होता। तुमने बचा लिया! ”

श्यूं-बाघ सामने ही टपक पड़े तो उसे भगाने का एकमात्र तरीका था- पूरी ताकत से चीखना ‘हुई ऽऽ हुई ऽऽ।’ ददा बताते थे, एक बार वे गैन के घने वन में गए हुए थे। पेड़ों की टहनियां काट कर गाय-भैंसों को चरा रहे थे। वह आगे बढ़ते और गाय-भैंसें भी उनके साथ-साथ आगे बढ़तीं। एक पेड़ का तना पकड़ कर खड़े हुए। पास में झाड़ी थी और जमीन पर थोड़ा गहरी गल्ली बनी हुई थी। अचानक गल्ली में से श्यूं ने दो पंजे ऊपर रख दिए और पूरा मुँह फाड़ कर दहाड़ा। ददा कहते थे, “लाल खाप (मुख) दिखती थी उसकी और भाप सीधे मुँह पर आ रही थी। निंगुरी (बुरी) बास आ रही थी। हाथ में तेज दात था टहनियाँ काटने के लिए। उसे उठा कर मैं पूरी ताकत से चिल्लाया-????? लेकिन, गले से आवाज ही नहीं  निकली। मुँह चल रहा था लेकिन हुई ऽऽ हुई ऽऽ नहीं  हुई। श्यूं आगे बढ़ा, जानवर बिदके और उसने अलग-थलग पड़ी भैंस की थोरी (बच्चा) को थप्पड़ मार कर फेंक दिया। उसकी गर्दन तोड़ दी। तभी भैंसों ने घेरा बना लिया। वे सींगों से श्यूं पर टूट पड़ीं। श्यूं तो खिसक लिया मगर वे श्यूं की गंध के कारण मरी हुई थोरी पर सिर मारने लगीं। उन्हें मुश्किल से हटाया। मेरे मुँह से तो बहुत देर बाद आवाज निकली। और, निकली तो वह बिल्कुल बदली हुई थी। गले की नसें बुरी तरह खिंच गई थीं। मैं डरी-बिदकी गाय-भैंसों को किसी तरह हाँक कर घर वापस लाया।”

लेकिन, श्यूं-बाघ भी वहीं, वह भी वहीं । रहना तो सभी को वहीं था। इसलिए उनसे भेंट होती ही रहती थी। बताते थे कि एक बार म्यलगेर के वन से लौट रहे थे। सबसे आगे चौड़े सींगों वाली बड़ी कद-काठी की ‘फूल’ भैंस। उसके पीछे दूसरी भैंसें और थोरियाँ। उनके साथ ठुल ददा। अचानक फूल बेचैन हो उठी। नथुनों से ‘फ्वां-फ्वां’ करके कभी इधर देखती, कभी उधर। फिर मुड़ी और पीछे आ गई। ददा उसे आगे जाने के लिए हकाते, लेकिन वह अड़ गई। ददा को सिर से धकेल कर बीच में भेज दिया और खुद सबसे पीछे लग गई। हर कदम पर पीछे मुड़ कर देखती। फुँकारती। ददा समझ गए कि गड़बड़ है। जानवर डुडाने (रंभाने) लगे। थोड़ा आगे ऊँची जमीन में पहुँचे तो देखा, पीछे-पीछे दूर एक श्यूं भी आराम से चला आ रहा है। फूल फ्वां-फ्वां करती हवा में सींग मारती, पीछे मुड़-मुड़ कर खड़ी हो जाती, फिर आगे बढ़ती। इसी तरह वे धार के खेत में खरक (छप्पर) तक पहुँचे।

मैंने पूछा, “ और श्यूं?”

बोले, “वह भी पहुँच गया। जितनी दूर चल रहा था, उतनी ही दूरी बना कर खेत के किनारे जरा ओट में को बैठ गया। गाय-भैंसों की हालत खराब। किसी तरह उन्हें शांत किया। घास-पात डाला। लेकिन, बीच-बीच में वे फिर बेचैन होने लगतीं। डुडाने लगतीं। मैंने आग जलाई। धुवां-हुवां निकला। मगर, न जाने कैसा श्यूं था, वहाँ पर बैठा ही रहा, जैसे पालतू हो। आग जला कर रात भर जागना पड़ा। सुबह का उजाला होते-होते मैंने भैंसों का दूध दुहा। भद्याली (बड़ी कढ़ाई) में गरम करने के लिए आग पर चढ़ाया और उसके उबलने का इंतजार करने लगा।

“बैठे-बैठे आँख लग गई होगी। रात भर की निनभंग हुई। आँख खुली तो देखा, सूरज आसमान पर चढ़ आया था। आग बुझ चुकी थी। भद्याली में दूध उबल-उबल कर सूख गया था। तले में बस घी जैसा रह गया था।”

“और, श्यूं? गाय-भैंसें?”

“उजाला होने पर श्यूं उठ कर चला गया होगा और गाय-भैंसें खूंटों पर ही बंधी ठैरीं। अड़ाती होंगी लेकिन सुने कौन? मैं तो नींद के भरमस्के में पड़ा ठैरा। फिर सोचा होगा, ये तो उठता नहीं, क्या फायदा अड़ाने का।…बड़े समझदार होते हैं जानवर। अब देखो, मुझे धकेल-धकेल कर अपने बच्चों के साथ झुंड के बीच में पहुँचा दिया और वैसे ही चलते-चलते घर तक ले आईं! कौन कहता है, जानवर कुछ नहीं समझते? अपने ग्वाले के लिए इतना प्रेम? ”

लेकिन, जंगल के जीवन में हर जानवर इतना भाग्यशाली नहीं होता।…उस दिन  मैं पिताजी के साथ शाम को अपने मकान के आगे खड़ा था। दिन ढलने को था। सूरज साज और भीमुल के पेड़ों की फुनगियों के पीछे छिप चुका था। पिताजी की आँखें हर रोज की तरह पार शिमल धार पर टिकी हुई थीं, जहाँ अब भी ढलती पीली धूप दिखाई दे रही थी। आज गाय-भैंसें लेकर ददा उधर ही गए थे। अब उनके लौटने का समय हो गया था। पिताजी धार के पार से वापस आती गाय-भैंसों को एक-एक करके गिन लेते थे।…एक…दो…तीन…उस दिन भी धार पर पहली भैंस दिखाई दी, फिर दूसरी, फिर तीसरी गाय भी, बैल भी। लेकिन, अचानक चौंके- गिनती में एक कम क्यों है? फिर गिना, फिर भी एक कम। परेशान होकर बोले, ‘कौन कम है?’ आगे से पीछे तक नजर दौड़ाई। ध्यान से देखने पर घर को लौटती गाय-भैंसों की उस कतार में सफेद ‘सेतुवा’ को न देख कर बोले, ‘सेतुवा नहीं रहा शायद। वह तो दूर से ही साफ-सुकीला चमकता था।’ फिर वहीं से ददा को लंबी धाद लगाई, “बच्या! सेत्व काँछ? ”

किसी ने कहा, “आने तो दीजिए, खुद ही बताएंगे।” सेतुवा और गुजार हमारे दो बैल थे। सेतुवा झक सफेद रंग का था।

ददा ने आकर बताया, “सभी गाय-भैंसें चर रही थीं। मैं जिस पेड़ से पत्तियां-टहनियाँ काट-काट कर गिरा रहा था, उसके पास ही सेतुवा चर रहा था। वह जरा-सा किनारे को बढ़ा झाड़ी की तरफ। वहाँ पर हलकी ढलान जैसी थी। सेतुवा ने झाड़ी के पास उगी हरी घास के तिनाड़ लपकने के लिए शायद जीभ निकाली कि तभी वह पीड़ा से तिरछा हो गया। पलटी खाने लगा। घों-घों की जैसी आवाज आई, तब मुझे पता चला। मैंने सोचा किसी चीज ने काट खाया है। नीचे उतरा। देखा तो मुँह से खून की धार फूट रही थी। सेतुवा डर कर झाड़ी की ओर देख रहा था। मैंने उधर देखा तो श्यूं दुश्मन की आँखें चमकीं। मामला समझ गया। सेतुवा ने जीभ लपकाई होगी और श्यूं ने पंजा मार कर जीभ खींच ली। बेचारा सेतुवा चीख भी नहीं  पाया। बिना जीभ के घों-घों कर पाया, बस। बाकी जानवरों को तो तब तक पता भी नहीं  चला था। मैं झटपट पेड़ में चढ़ा और धाद लगा कर बाकी लोगों को सावधान किया कि यहाँ श्यूं आया है। मेरा बैल दाड़ दिया है। मैं पेड़ में  क्या चढ़ा कि वह दुश्मन झाड़ी से निकला और उसने थप्पड़ मार कर सेतुवा की गर्दन तोड़ दी। तब तक बाकी जानवरों को भी पता लग गया। सभी डुडाने लगे। उस अफरातफरी में असत्ती श्यूं एक ओर को कूद गया।

“सेतुवा में अभी प्राण थे। वह कातर आँखों से मुझे देख रहा था। आँसू बहा रहा था। लेकिन, मैं कुछ नहीं कर सकता था। उसके मुँह को थपथपाया और कहा- तेरा-मेरा इतना ही साथ रहा होगा सेतुवा। जा, बेटा जा।”

ददा का गला भर आया। आगे नहीं बोल पाए। पिताजी ने गुस्से से भड़क कर कहा, “असत्ती, दुश्मन!”

मैं वन में श्यूं के पास छूट गए अपने सेतुवा के बारे में डर कर तरह-तरह की कल्पनाएं करने लगा।….उन घने जंगलों में हमारी रक्षा भला कौन करता? “किले, हमार द्यौ-द्याप्त,” मतलब हमारे देवी-देवता, लोग कहते थे।

कौन थे हमारे देवी-देवता? बताऊँ?

“ओं”

पुस्‍तक : मेरी यादों का पहाड़
लेखक: देवेंद्र मेवाड़ी
मूल्‍य : 140 रुपये, पृष्‍ठ: 288
प्रकाशक: नेशनल बुक ट्रस्‍ट, इंडि‍या, 5, नेहरू भवन, इंस्‍टीट्यूशनल एरि‍या, वसंत कुंज, नई दि‍ल्‍ली- 110070

मि‍ष्‍ठान्‍न महाराज : हेमंत शर्मा

बनारस में ‘मिष्ठान्न महाराज’ के नाम से मशहूर राज कि‍शोर गुप्‍त उर्फ बचानू साव पर पत्रकार हेमंत शर्मा का संस्‍मरण-

दीपावली पर खूब मिठाइयाँ खाना। बाँटना और बटोरना। ऐसा बचपन से देखता आया था। लेकिन इस दफा अपनी दीपावली बिना मिठाई के बीती, क्योंकि अखबार में यह खबर पढ़ ली थी कि इस साल दीपावली पर छह हजार करोड़ का मिठाइयों का कारोबार हुआ और इसमें सत्तर फीसदी मिठाइयाँ मिलावटी थीं। लेकिन मिठाई न खाने की बड़ी वजह थी अपने मित्र बचानू साव का दुनिया से चले जाना। बचानू काशी के ‘मिष्ठान्न पुरुष’ थे। बनारसियों के ‘मिष्ठान्न महाराज।’ बचानू इसलिए बिरले थे कि मेरे जैसे सैकड़ों लोगों में मिठाई खाने-खिलाने की समझ और संस्कार उन्हीं ने बनाए।

राज किशोर गुप्त उर्फ बचानू साव बनारस की रईस परम्‍परा के हलवाई थे। बनारस की मिठाई का डेढ़ सौ साल का इतिहास बचानू की परम्‍परा में था। मिठाई में शोध, प्रयोग और पौष्टिकता बढ़ाने के उपायों में इनका कोई सानी नहीं था। उनकी कोशिश होती थी कि मिठाइयों को कैसे सेहतमंद बनाया जाए। वे बनारस की विभूति थे। महात्मा गाँधी हों या पंडित नेहरू, मार्शल टीटो हों या इंदिरा गांधी या फिर सीरीमावो भंडारनायके या दलाई लामा, बचानू सबको खुद पका कर भोजन करा चुके थे। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जब तिरंगा फहराना जुर्म था, तब बनारस में बचानू साव ने तिरंगी बर्फी का ईजाद किया। लेकिन मिठाइयों मे रंग डाल कर नहीं। काजू से सफेद, केसर से केसरिया और पिस्ते की हरी परत से तिरंगी बर्फी बनाई जो बाद में राष्ट्रीय आंदोलन की मिठाई बन गई। एक हलवाई का स्वतंत्रता संग्राम में इससे बेहतर योगदान क्या हो सकता है!

वे मिठाइयों के अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र का भी खयाल रखते थे। अगर काजू का मगदल गरीब आदमी की पहुँच से बाहर है तो वे काजू हटा बाजरे का मगदल बना, उसकी तासीर और स्वाद वैसा ही रख उसे सामान्य आदमी की पहुँच के भीतर कर देते थे। मगदल उड़द दाल, काजू, जायफल, जावित्री, घी और केसर से बनती है। यह स्मृति और पौरुष बढ़ाने वाली मिठाई मानी जाती है। आयुर्वेद और यूनानी ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है। आपको कब्ज है तो काजू की मिठाई से रोग और बढ़ सकता है। पर अगर उसके साथ अंजीर मिला कर बर्फी बने तो यह दवा बनी जो फायदेमंद होगी। ये बचानू के फॉर्मूले थे।
कब कौन-सी और कैसी मिठाइयाँ खानी चाहिए, इसका ज्ञान मुझे उन्हीं से हुआ था। ठंड में वात नाशक, वसंत में कफ नाशक और गर्मियों में पित्त नाशक मिठाइयाँ होनी चाहिए। वात, पित्त और कफ। पूरा आयुर्वेद का चिकित्सा विज्ञान इसी में संतुलन बिठाता है। बादाम सोचने-समझने की ताकत बढ़ाता है, पर उसका पेस्ट कब्ज बनाता है। बादाम के दो भागों के बीच अनन्नास का पल्प डाल उन्होंने एक मिठाई बनाई ‘रस माधुरी।’ इसमें फाइबर भी था और एंटी-ऑक्सीडेंट भी। नागरमोथ, सोंठ, भूने चने के बेसन और ताजी हल्दी से वे एक लड्डू बनाते थे ‘प्रेम वल्लभ’, जो कफ नाशक था। स्वाद में बेजोड़। मिष्ठान्न निर्माण में सिर्फ ऋतुओं का ही ध्यान नहीं, वे और विस्तार में जाते थे। सूर्य के उत्तरायण और दक्षिणायन होने से भी उनकी मिठाइयों की तासीर और तत्त्व बदल जाते।

बचानू मिठाई के साथ ही दुनिया छोड़ना चाहते थे। दिल्ली के एक बड़े अस्पताल में जब उनका दिल का ऑपरेशन हुआ तो एक रोज वे डॉक्टर से उलझ पड़े। उनके कमरे में मिठाइयों के ढेर सारे डिब्बे रखे थे। आने वाले को खिलाने के लिए। डॉक्टर ने समझा हृदय की धमनियाँ बंद हैं और इतनी मिठाई! कहीं वे खा तो नहीं रहे हैं! इसे कमरे से हटाएं। वे हटाने को तैयार नहीं। पंचायत करने मैं गया। उन्होंने कहा- ‘जान भले चली जाए, पर मैं मिठाई को अपने से दूर नहीं करूँगा।’ मैंने डॉक्टर से कहा- ‘वे खाते नहीं हैं, सिर्फ देखते हैं। मिठाइयों से उनका गहरा नाता है। इसके बिना उनकी जिजीविषा कम हो सकती है। उसे रहने दें।’ बचानू साव का ऑपरेशन हुआ। वे ठीक होकर बनारस लौट गए।

बचानू ‘सेमी लिटरेट’ थे। पर धर्म, दर्शन, साहित्य और संगीत पर वे हर बनारसी की तरह बहस कर सकते थे। काशी विश्‍वनाथ मंदिर से जो ‘सुप्रभातम’ पिछले चालीस वर्षों से प्रसारित हो रहा है, वह उन्हीं की देन है। पूरे देश के संगीतकारों-गायकों से मिठाई खिला ‘सुप्रभातम’ गवा लिया। जब वे एमएस सुबुलक्ष्मी के पास पत्रमपुष्पम का चेक लेकर पहुँचे तो सुबुलक्ष्मी ने चेक लौटा दिया और कहा इसे आप अपने ट्रस्ट में लगाएं। दिन के हिसाब से यह प्रसारण हर रोज बदलता है। आज भी ‘सुबहे बनारस’ की शुरुआत इसी ‘सुप्रभातम’ से होती है।

गलियों और गालियों के बाहर बनारस के वे सांस्कृतिक लिहाज से रत्न थे। हर साल ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी को देश की सभी नदियों से जल लाकर वे काशी विश्‍वनाथ का अभिषेक करवाते थे। अभिषेक में प्रमुख जल बारी-बारी से जिस ज्योतिर्लिंग से आता था, उसी के पुजारी काशी विश्‍वनाथ का अभिषेक करते थे। देश की सांस्कृतिक एकता को मजबूत करने में यह एक अनूठा प्रयास था। मिठाइयों के एवज में हम उन्हें लिफाफा देते जिसमें कुछ शब्द होते, अर्थ नहीं। वे कहते कि शब्द में भी तो अर्थ ही होता है!
(जनसत्‍ता, 19 नवम्‍बर 2012 से साभार)

खट्टी-मीठी यादें : चंद्रकला जोशी

लूकरगंज, इलाहाबाद में अपने घर में चंद्रकला जोशी और शेखर जोशी, नवम्‍बर, 1999।

कथाकार शेखर जोशी की पत्‍नी और हमारी इजा(माँ) चंद्रकला जोशी जी का 23 अक्‍टूबर, 2012 की रात नि‍धन हो गया। मैं उन भाग्‍यशाली लोगों में से हूं जि‍न्‍हें उनकी आत्‍मीयता और स्‍नेह मि‍ला। अपने बारे में लि‍खा उनका संस्‍मरण श्रद्धांजि‍ल स्‍वरूप दे रहे हैं- 

मेरा बचपन राजस्थान के छोटे शहर अजमेर में बीता। मेरे बाबूजी वहाँ एक गवर्नमेंट स्कूल में अंग्रेजी व हिन्‍दी के अध्यापक थे। आठ भाइयों के बीच में मैं ही अकेली बहिन थी। बाद में 18 वर्ष के जवान भाई की मृत्यु के बाद दो बहिनें हुईं। बाबूजी ने तो मेरा पालन-पोषण बिल्कुल लड़कों की तरह किया था। वे पिता कम मित्र अधिक थे।

सन् 1955 में जब मैं बीए में थी तो प्राय: हम वयस्क सहेलियाँ आपस में होने वाले पति के बारे में बहस किया करती थीं। मेरी एक सहेली तो यह भी कहती थी कि भले ही पति काना हो पर पैसे वाला हो। मेरी राय उससे भिन्न थी। मैं कहती थी कि जीवनसाथी जैसा भी मिले मित्र जैसा हो और उसकी रुचि पढऩे-लिखने में हो, भले ही वह पैसा कम कमाता हो।

सावित्री कॉलेज, अजमेर में तो मैंने यूनियन के चुनाव में भी भाग लिया था और सर्वसम्मति से सेकेट्री पद के लिये चुन ली गई थी। सावित्री कॉलेज में एमए की कक्षाएं नहीं थीं। अत: एमए में मैंने अजमेर के गवर्नमेंट कॉलेज में प्रवेश लिया। वहाँ उस समय प्रिंसिपल साहब वी.वी. जॉन थे। वे बहुत नामी शिक्षाविद् थे। वहाँ वर्ष में एक सप्ताह सोशियल वीक भी मनाया जाता था। उसमें अनेक प्रकार के क्रियाकलाप भी होते थे। मैंने भी डिबेट और नाटकों में भाग लिया था। उसी सप्ताह में एक दिन कवि सम्मेलन और एक दिन मुशायरा भी होता था।

हमारे बड़े भाई साहब इन सम्मेलनों में हमें वहाँ ले जाते थे। वे रात-रात भर वहीं चलते थे। कवि बच्चन जी,  नीरज और राजस्थानी कवि मेघराज ‘सेनाणी’ को तब मैंने पहली बार वहीं सुना था। मुशायरे में अली सरदार जाफरी भी आए थे और उनका ‘नींद क्यों रात भर नहीं आती मुझे’ आज भी याद है।

बाबू जी ने क्योंकि गवर्नमेंट कॉलेज घर से दूर था,  अत: एक लेडी साइकिल भी मुझे दिलवा दी थी। उस जमाने में स्कूटर आदि का रिवाज नहीं था।

जॉन साहब ने एक और अच्छा काम छात्र-छात्राओं के हित में किया था। कॉलेज की लाइब्रेरी में ओपन सिस्टम कर दिया था। अब हम लोग अपनी पुस्तकें काउंटर पर रखकर जो मन में आए वही किताबें और पत्रिकाएं पढ़ सकते थे। वहीं मैंने ‘कहानी’ पत्रिका में अमरकांत जी की पुरस्कृत कहानी ‘डिप्टी कलेक्टरी’ और कमलेश्‍वर जी की ‘राजा निरबंसिया’ पढ़ी। भैरव जी ‘कहानी’ पत्रिका के संपादक थे। ‘कहानी’ के ही दूसरे अंक में शेखर जी की ‘कविप्रिया’ पढ़ी। अमरकांत जी की कहानी पढ़कर तो मुझे उस उम्र में भी रोमांच-सा हो आया था।

शेखर जी और मैं विवाह के 8-10 वर्ष पूर्व भी एक-दूसरे से परिचित थे। मेरे बाबूजी और इनके मामा एक-दूसरे के मित्र थे। पढ़ाई इन्होंने भी मामा के यहाँ रहकर ही की थी। अर्थशास्त्र से एम.ए. करने के बाद मैंने फिर मीरशाली से बी.एड. किया था। मीरशाली में हमारा बी.एड. का पहला बैच थ।

सन् 58 में ही मेरी नियुक्ति बीकानेर से लेडी एलगिन में अर्थशास्त्र की प्रवक्ता के पद पर हो गई थी। वहीं ‘कोसी का घटवार’ की एक प्रति इन्होंने मेरे लिए भेजी थी। बाबूजी रिटायर होने के बाद बीकानेर में एक जैन स्कूल के प्रिंसिपल होकर आ गये थे। मैं उनके साथ ही थी। मैंने वह प्रति बाबूजी को भी दिखलाई।

मैंने ‘कोसी का घटवार’ पुस्तक के लिये एक धन्यवाद का पत्र लिखा। वहीं मेरी एक बुआ (स्व. मोहन बल्लभ पंत जी की पत्नी) रहती थीं। मोहन बल्लभ जी वहाँ एक डिग्री कॉलेज में हिन्‍दी के प्रोफेसर पद पर थे। किताब पढ़कर बुआ व फूफाजी की प्रतिक्रिया हुई कि ‘‘क्या इस युवक से तुम्हारा विवाह नहीं हो सकता है?’’ मैंने बाबूजी को अपना विचार बतलाया। विवाह के बारे में इलाहाबाद पत्र लिखा गया। इलाहाबाद से फिर इनका पत्र मेरे लिए आया था। ‘‘कहीं तुम शेखर जोशी के लेखकीय व्यक्तित्व से प्रभावित होकर तो विवाह के लिये तैयार नहीं हो। वह जीवन भर का फैसला है। कहीं तुम्हें बाद में पछताना न पड़े।’’ पर मैं अपने निर्णय पर अडिग थी। बाबूजी भी थोड़ी सी आनाकानी के बाद तैयार हो गये थे। सम्‍भवत: उनका स्वप्न किसी ऊँचे अधिकारी पद वाले दामाद का रहा होगा। इलाहाबाद रहने का आकर्षण तो ‘कहानी’ पत्रिका पढ़कर भी बहुत हो गया था।

सन् 60 में हमारा विवाह भी हो गया था। विवाह से पूर्व मैंने बीकानेर की नौकरी भी छोड़ दी थी। इलाहाबाद आकर तो मैं बहुत ही प्रसन्न थी। इलाहाबाद में इनके सभी मित्रों अमरकांत जी, भैरव जी, मार्कण्डेय जी ने छोटे भाई की पत्नी की तरह मुझे स्नेह सम्मान दिया। दो वर्ष करेलाबाग में रहकर फिर हम लोग भैरवजी के घर में आ गये थे। भैरव जी लूकरगंज में रहते थे। वे ‘नई कहानियाँ’ पत्रिका का सम्‍पादन करने दिल्ली चले गये थे। अश्कजी तो प्राय: टहलते हुए हमारे यहाँ आ जाते थे और बार-बार कहते थे, ‘‘शेखर इस पढ़ी-लिखी लड़की को तुमने घर में बिठा रखा है?’’ उस समय इलाहाबाद तो साहित्यकार का अड्डा था। विभिन्न मत वाले साहित्यकार वहीं थे। अश्क जी के घर में साहित्यकारों की बैठकें हुआ करती थीं। बाहर से भी साहित्यकार वहाँ आते थे। साहित्यिक गोष्ठियों में ये हमेशा मुझे अपने साथ ले जाते थे।

सन् 60 के ही अप्रैल माह में अश्क जी के बड़े पुत्र उमेश जी के विवाह में साहित्यकार सम्मिलित हुए थे। राजेन्‍द्र यादव, मन्नू जी, मोहन राकेश, राजेंद्र सिंह बेदी आये थे। मोहन राकेश के ठहाके मैंने तभी सुने थे।

विवाह के तुरन्‍त बाद बाबू जी ने मेरी साइकिल पार्सल करके भेज दी थी। ‘‘पर साइकिल तुम इलाहाबाद में नहीं चलाओगी।’’ यह इनका कहना था।

सन् 62 में ही प्रतुल पैदा हो गया था और लूकरगंज के ही एक स्कूल विद्यावती दरबारी बालिका इंटर कॉलेज से मेरे लिये नियुक्ति का पत्र आ गया था। ‘‘मैं प्रात: 7 बजे से 5 बजे सायं तक वर्कशाप से लौटता हूँ। प्रतुल आया के भरोसे पर नहीं पलेगा। जब मैं 8 वर्ष का था मेरी माँ दिवंगत हो गई थी। मैं चाहूँगा कि मेरे बच्चों को उनकी मां मिले।’’

जीवन में कितनी ही बार अवसर नौकरी करने के आए पर ये हमेशा मेरी नौकरी के विरोध में रहे। कहने लगे सुधाजी  (स्व. अमृतराय की पत्नी) ने भी तो बच्चों के पीछे विधायकी छोड़ दी थी।

विवाह आप चाहे अपने मन से करें अथवा माता-पिता या मित्रों द्वारा तय किया गया हो, आपको सुखी वैवाहिक जीवन के लिए बहुत से समझौते करने पड़ते हैं।

सावित्री कॉलेज और गवर्नमेंट कॉलेज में तो जागरुक छात्रा की तरह नेतागिरी करती रही थी। यहाँ आकर परिवार की शांति के लिए मेरी नेतागिरी ठप्प हो गई थी।

यूँ 45 वर्ष के वैवाहिक जीवन की अनेक खट्टी-मीठी यादें हैं। शेखर जी को जो मैंने निकट से देखा, वे अपने लेखक मित्रों भैरव जी, अमरकांत जी और मार्कण्डेय जी के साथ जीवन में जब भी सुख-दुख के अवसर आये छोटे भाई की तरह विनम्र और संकोची ही रहे।

वर्कशाप के साथियों शर्मा जी, बसरा जी, गोयल साहब और विनोद जी के बीच ये हमेशा बड़े भाई की तरह रहे। भैरवजी व भाभी जी को दिवंगत हुए कई वर्ष हो गये पर उनके बच्चे, बहुएँ जब भी मिलते हैं, वही पुराना आदर-सम्मान देते हैं।

मेरे मायके और ससुराल के लोग हमेशा सहायक रहे हैं। मेरे छोटे भाई की किडनी फेल हो गई थी। इन्होंने मुझे हमेशा उत्साहित ही किया कि अगर मैं उसे अपनी किडनी दे दूँ तो उन्हें प्रसन्नता ही होगी, उस समय तीनों बच्चे छोटे ही थे।

आज जबकि मेरी दोनों बहुएं नौकरी वाली हैं और इस कारण उन्हें बच्चों को पालने में खासी दिक्कत हो रही है। मुझे लगता है कि उस समय मेरा नौकरी न करना ठीक ही था। लेकिन अब महिलाएं शौक के लिये नहीं, दिन-प्रतिदिन की घर की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये नौकरी कर रही हैं।

अब जबकि सब बच्चे अपने-अपने इस संसार में व्यवस्थित हो गये हैं। एक-दूसरे का साथ एक पल का भी नहीं छोड़ा जा रहा है। अब यह साथ न छूटे यही कामना है।

(सर्वनाम : 79/ जुलाई, अगस्‍त, सि‍तम्‍बर 2005 से साभार)


गोवा में बेटी कृष्णा और नाती ऋतुराज व देवराज के साथ चंद्रकला जोशी।

रामलीला में बंदर : कमल जोशी

बचपन को याद कर रहे हैं फोटो जर्निलिस्‍ट और लेखक कमल जोशी-

बचपन के दिनों में हमारी सबसे बडी़ कोशिश होती थी रामलीला में बंदर बनने की । तब हमारा शरीर या रसूख इतना नहीं होता था कि हम हनुमान बनने की सोचें। हाँ, सपना जरूर था। रामलीला में बंदर बनने के लिये भी कितने पापड़ बेलने पड़ते थे, यह हमको ही पता है।

रामलीला में बंदर बनने की आकांक्षा की सबसे पहले अड़चन घर से ही होती थी। रामलीला रात नौ बजे से शुरू होती थी। बंदर या राक्षस बनने के इच्छुक बच्चों को साढे़ आठ बजे तक रामलीला मुख्य स्टेज के पीछे मेकअप रूम में पहुँचना पड़ता था। उसके बाद एन्ट्री बन्द हो जाती थी। हमारे घर वाले हमें साढे़ आठ बजे तक खाना देते ही नहीं थे जिससे हम समय पर रामलीला स्टेज में पहुँच कर बंदर बनने का मेकअप कर सकें। घर में पिताजी को खाना मिलता था। रसोई से गर्म-गर्म रोटी ले जाने की जिम्मेदारी मेरी या अनिल की होती। पिताजी साढे़ आठ के बाद खाना खाते। उसके बाद ही हमें खाना मिलता। तब खाना खाने के बाद ही जा सकते थे। हम तो बंदर बनने के लिये रात के खाने की बलि‍ तक देने को तैयार थे। पर माँ थीं कि हमें बिना खाना खिलाये जाने नहीं देतीं।

साढे़ आठ बजे रामलीला पहुँचने की गर्ज में मैंने तथा अनिल ने तय किया कि हम कहेंगे कि हमारी खाना खाने की इच्छा नहीं है। पेट भरा है जिससे माँ हमें खाना खाने के झंझट से मुक्त कर दें। पर हुआ उल्टा ही। दोनों भाइयों के एक साथ खाना नहीं खाने की इच्छा तथा पेट भरे होने की शिकायत पर माँ को लगा कि हमारी तबियत खराब हो रही है। तुरंत हमारे पेट पर गयान्धूँ (गाय के दूध का घी) मलकर रजाई ओढ़ा कर सुला दिया। हमने कि‍तना कहा कि तबियत ठीक है पर माँ कहाँ मामने वाली। हमने खाना खाकर भी दिखा दिया पर माँ ने रामलीला नहीं जाने दिया। रातभर मेरी फ्लॉप तरकीब पर अनिल मुझसे लड़ता रहा।

इन विषम परिस्थितियों के बावजूद हम मेकअप रूम में दाखिल हो जोने में सफल हो जाते थे। यहाँ भी लोचा था। सब बंदर बनना चाहते थे क्योंकि रामलीला मास्टर की साफ-साफ ताकीद होती थी कि मंच पर बंदर ही राक्षसों का संहार करेंगे यानी वानर-राक्षस युद्ध होने पर राक्षस ही पिटेंगे। राक्षस पात्र वानरों को नहीं मारेंगे। यद्यपि कई बार ऐसा भी हुआ कि ज्यादा पिट जाने पर राक्षस को गुस्सा आ गया और उसने मंच की मर्यादा के विपरित दर्शकों के सामने ही वानर को पीट डाला और वानर रोने लगा। दर्शकों का हँसी के साथ-साथ सीटियाँ बजाना आम बात थी। ऐेसे में मंच की व्यवस्था सम्भालने वाले मुस्टंडे आकर वानर-राक्षस द्वन्द को तुरन्त मंच के अंदर खींच लेते। मंच मर्यादा तोड़ने के फलस्वरूप तबियत से उनकी पिटाई होती और दोनों को भविष्य में वानर या राक्षस बनने से अलग कर दिया जाता।

हमारे नसीब में अधिकांशतः राक्षस बनना था और पिटना भी बदा था। परन्‍तु वानर भी हम बनें इसलिये सब जल्दी पहुँचने के साथ-साथ लाल स्वेटर की व्यवस्था में लग जाते। क्योंकि घुटना तो रामलीला की ड्रेस में मिल जाता जो अमूमन हनुमान के पुराने कच्छे होते। हर साल भक्‍त नये कच्छे चढा़ते और हनुमान हर साल नये कच्छे में रोल करता। कभी-कभी तो एक वर्ष की रामलीला में वह दो बार नये कच्छे बदल देता। पुराने घुटने वानर सेना की ड्रेस बन जाते।

हाँ तो हमारे पास लाल स्वेटर के नाम पर स्कूल की ड्रेस की लाल स्वेटर ही होता। वानर बनने के लिये हमें घर से स्कूल स्वेटर ले जाने की मनाही थी क्योंकि वानर-राक्षस युद्ध में कई बार हम स्वेटर को फड़वा चुके थे। फिर भी हम घरवालों से आँख चुराकर स्वेटर स्मगल कर लेते थे तथा वानर बनने को हाजिर हो जाते। वानर बनने के सब सुख थे, पर एक परेशानी थी। वानरों को मुखौटे पहनने पड़ते थे। जिससे वे बंदर जैसे दिखें। मुखौटे पहनने के बाद दर्शक दीर्घा से हमारे दोस्तों को पता ही नहीं चलता था कि आज वानर कौन बना है? अपनी उपलब्धि को दिखाने के लिये यह बहुत जरूरी होता था कि हम हनुमान की टीम में बीच-बीच मे मुखौटे उठाकर अपने दोस्तों-परिचितों को अपनी शक्ल दिखाते रहें कि‍ कन्फर्म हो सके कि इस रात में मैं ही बंदर बना हूँ। हमारी इस हरकत को यदि हनुमान देख लेता तो वह एक चपत जड़ देता। हम झट से मुखौटा नीचे कर देते थे। हनुमान-वानरों की इस हालत पर दर्शक हँसते। हम उदास होते कि पता नहीं कितने देख पाये हमारी शक्ल।

राक्षस बनने की नियति तो सार्वजनिक रूप से पिटने की थी। पर वानर बनकर भी सुरक्षित नहीं रहा जा सकता था। होता ये था कि हम अति उत्साह में अपने से बडे़ लड़कों को बंदर के रूप में ज्यादा ही पिट दिया करते थे क्योंकि वे राक्षस बनते थे। शायद वो उनकी ज्यादती जो हम रोज सहते थे, उसका परिणाम होती थी। राक्षस मंच मर्यादा की वजह से उस वक्त संयमि‍त और चुप रहते पर बाद में हमारी बहुत ठुकाई होती। फिर हम घर की राह पकड़ते। अगले दिन पीठ में दर्द रहता चाहे हम बंदर बने हों या राक्षस। भरत मिलाप के दिन बंदर बनना सबसे बडी़ उपलब्धि थी। झाँकी में हनुमान की सेना बनकर हिस्सा लेने के लिये बहुत से तिकड़म लगानी पड़ती। झाँकी के लिये बहुत बेगारी करनी पड़ती तब कहीं रामलीला मास्टर का दि‍ल पि‍घलता। और हम बंदर बनते। उस दिन हनुमान के साथ बैठने का सुख तो मिलता ही साथ ही सारे शहर में घूमने का और मुखौटा उठा-उठाकर लोगों को पहचानने का मौका भी मिलता।

पता नहीं रामलीला की एक घटना का जिक्र करना उचित है कि नहीं। रामलीला में सीता स्वयंवर का दृश्य था। एक व्‍यक्ति‍ को एक देश के राजा का रोल दिया गया तो आदत के अनुसार वह शराब की घुट्टी लगाकर आया। राजाओं में से किसी ने उसका किसी बात पर मूड ऑफ कर दिया। राजा बेचारा गुस्से में क्या करता। उसने शिव धनुष तोड़ने की एक्टिंग नहीं की बल्कि तोड़ ही डाला। मंच पर सीता-दशरथ हतप्रभ। राम-लक्ष्मण हक्के-बक्के पर सीता को उसके साथ कैसे भेजा जा सकता था। पर्दा गिराया गया। पीछे उस राजा की पिटाई की गयी। दूसरी पार्टी ने शिवधनुष रिपेयर किया तब लीला शुरू हुई।

हमारा बचपन अभाव में तो नहीं गुजरा परन्तु हमें उतनी सुविधायें तथा रिसोर्स नही मिलते थे जो हमारे साथ के सम्पन्न घरों के दोस्तों को मिलते थे। सन् साठ में हम बचपन के अन्तिम मोड पर थे तो अहम जाग रहा था। हम क्यों किसी से कम हों, यह भाव था।

हमारे सम्पन्‍न दोस्त कोटद्वार के सबसे महंगे ओके टेलर तथा दून टेलर्स से कपडे़ सिलवाते थे। इन टेलरों ने कॉलर के पीछे अपना लेबल लगाना शुरू किया। इसी बिल्ले से पता चलता था किसकी कमीज महंगे टेलर ने सिली है। सम्पन्‍न घर के लड़के लेबल दिखा-दिखा तडी दिखाते।

हमारे कपडे़ मकान के बाहर पटरी पर बैठने वाले दर्जी सिला करते थे। उन बेचारों की हैसियत इतनी नहीं कि लेबल बनवाते। इसी बीच हमें नई ड्रेस सिलवानी थी। उस पर बिल्ला नहीं लगा तो बेइज्जती हो सकती थी। सवाल तडी़ का था। घर वाले तो दून टेलर से कमीज सिलवाने से रहे। ऐसे में हम कहाँ से बिल्ले लगवाते। अपने दर्जी को हमने बिल्ले के लिए परेशान करना शुरू किया। उसने चिढ़कर कहा कि‍ कहीं से बिल्ला मांग कर ले आओ। मैं सिल दूँगा। दर्जी लेबल सिलने को तैयार था। अब सवाल यह लेबल कहाँ से आये। इसी उधेड़ बुन में था। तभी युक्ति आई कि हमारे पिताजी जो अन्डरशर्ट पहनते थे, उसके पीछे गर्दन के पास लेबल लगा रहता था। हौजरी की कम्पनी का। उस समय महिलायें भी सैंडो बनियान पहनती थीं ब्लाउज के ऊपर। हमें इससे मतलब नहीं था कि बिल्ले में क्या लिखा है। वैसे भी तो अंग्रेजी में होता था। हमने चुपचाप माँ-पिताजी की बनियानों से बिल्ले काटकर टेलर को कमीज में सिलने को दे दिये। घर में बनियान पीछे से कटी देखकर कोहराम मचा कि किसने काटे क्यों काटे ? मैं चुप। खैर, हमने कमीज पर बिल्ले लगवाये।

अगली बार हम भी लेबल वाली कमीज पहनकर स्कूल गये। हर बात पर कॉलर पीछे बिल्ले दिखाते रहे। अब हमारी भी तडी़ थी कि बाहर के टेलर से कमीज सिलवाई। पर एक बार जब पिताजी दर्जी के पास पैसे देने पहुँचे तो उसने बातों ही बातों में कहा, ‘‘अब बच्चे कपडे़ की सिलाई कम फैशन ज्यादा देखते हैं। आपके बच्चे भी बिगड़ गये है। दोनों बिल्ले के चक्कर में किसी की बनियान से बिल्ले लाये और सि‍लवाये।’’

पिताजी की समझ में आ गया कि उनकी बनियान किसने काटी। घर आये। कमीज मंगवाई पूछा, ‘‘ये लेबल कहाँ से आये ?’’ मैं चुप रहा। पिटाई हुई, ‘‘उधेडो ये बिल्ले, पढा़ई में जीरो हैं और फैशन करने में सबसे आगे।’’ मुझे पिटाई का दर्द कम हुआ पर बिल्ले उखाडे़ जाने का डर ज्यादा सताने लगा। मैं जोर-जोर से रोने लगा। माँ ने बिल्ले उखाड़ने से मना कर दिया।

ऐसे ही क्रियटिविटी का एक और किस्सा। हम बचपन में अपने घर के बगलवाली नहर में नहाते थे। तैरना वहीं सीखा हमने। छोटे रहे होंगे तो नंगे नहाते थे। नंगे नहाते-नहाते तैरना भी सीख गये। जब छठीं-सातवीं में पढ़ने लगे तब हॉफ पैंट पहनकर नहाने लगे। लड़कियों की नजर में नोटिस होना जरूरी है इसलिये उनके आते ही डुबकी लगाना और तैरने की कलाबाजी के करतब दिखाना शुरू हो जाता । मैं ही नहीं सभी ऐसा करते।

इन्हीं दिनों हमारा साथी जो सबसे बडे़ व्यापारी का लड़का था, एक वी शेप वाली चड्डी ले आया। अन्य लड़के हमारी तरह पुरानी हॉफ पैंट में या धारी घुटनों में नहाते थे। सभी लड़के उसके कच्छे पर मरते थे। तैरना उसे कम आता था पर उसके वी शेप के कच्छे के चक्कर में उसका ज्यादा बडा़ रौब हो गया। वह अपने गुट के साथ तैरता और हमारी जगह कम कर देता। अब हमारे लिये यह सम्मान का प्रश्‍न हो गया। कैसे उसके वी शेप की चड्डी से टक्कर ली जाये।

उन्हीं दिनों मेरे चचेरे भाई आये थे। उनके पास वैसी ही वी शेप चड्डी थी। वह दो दिन के लिये आये थे। मैंने उनका कच्छा चुरा लिया। जब वह जाने लगे तो कच्छे की ढूंढ़ हुई, वो कहाँ से मिलता। अब वो मेरा था। पर उसे मैं पहन नहीं सकता था। वो मेरे साइज से बहुत बडा़ था।

अब अपनी क्रि‍यटि‍वि‍टी का इस्‍तेमाल की जरूरत थी। उसे अपने साइज का काटकर बना लि‍या। अगले दि‍न में इसे पहनकर नहर में चला गया। सबने पूछा, ‘‘कहाँ से ले आया यह ?’’

‘‘भाईजी फौज से लाये हैं।’’ मैंने कहा।

‘‘अब फौज में बच्‍चे के कच्‍छे मि‍लते हैं ?’’ प्रति‍द्वन्‍दी लड़के ने पूछा।

मैंने अकड़कर कहा, ‘‘तू क्‍या जाने फौज के बारे में। तू तो मूंग तोल मूंग। मेरी फिर धाक जम गई।

वे कत्‍ल के पाँच दि‍न थे। उतने भारी दि‍न उससे पहले कभी नहीं गुजरे थे। इतनी ग्‍लानि‍ मुझे कभी नहीं हुई थी। कि‍स्‍सा यूँ हुआ कि‍ मैं स्‍काउटिंग के शि‍वि‍र में गया था। दस दि‍वसीय शि‍वि‍र स्‍काउटिंग गति‍वि‍धि‍यों को हि‍स्‍सा था। मैं क्रि‍याकलापों का नेता था। कम वजन होने के कारण मुझे पि‍रामि‍ड बनाते हुए सबसे ऊपर लड़कों के कन्‍धों पर खड़ा होना था। गढ़ देवा का प्रमुख रोल होता है इस कि‍स्‍से में। शि‍वि‍र में पि‍ताजी भी आये थे। जैसे कि‍ अन्‍य अभि‍भावक भी आते थे। वे साथ में चने-लैचीदाणे(चने-इलायची दाने) भी लेकर आये। गढ़ देवा लैंसडाउन होना था। उन्‍होंने कहा, ‘‘ठीक है मैं तेरे लि‍ये गर्म पैंट सि‍लवा देता हूँ।’’ पैंट का नाम सुनते ही खुशी में नींद उड़ गई। अब तक हॉफपैंट ही पहनते थे। पहली बार पैंट सि‍लवाई जा रही थी। पैंट टेलर के पास थी। मैं इंतजार करते-करते सो गया। सुबह उठकर माँ से पूछा तो उन्‍होंने कहा, ‘‘मैं पि‍ताजी से पूछ कर बताऊँगी। कहाँ रखी है।’’ वह पि‍ताजी से पूछकर पैंट ले आईं। अगले दि‍न लैंसडाउन पहुँचे। हम कोटद्वार की स्‍पोर्ट्स लड़कि‍यों की भी देखभाल करते। शाम को मैंने नई पैंट नि‍काली, पहनी। तभी एक लड़के ने कहा कि‍ नई पैंट नहीं है। इसके पीछे तो टल्‍ला लगा है। कमरे में गया। उदास नजरों से टल्‍ले को देखा। मैं रोने लगा। दरअसल बडे़ भाई साहब की पैंट उधेड़कर मेरे लि‍ये बनवाई गई थी। पर उसी पैंट को पहनकर जाना पड़ा। लड़के मजाक बनाते थे। कहाँ तो मैं जोर-जोर से नारे लगाता था, पर उस साल गढ़ देवा की अवधि‍ में डर-डर कर रहा। धीरे-धीरे टल्‍ले वाली पैंट पहनने की आदत बन गई।

रामलीला में बंदर बनने का कि‍सी ने सरल रास्‍ता बताया कि‍ अगर तुम अपनी पलकों के ऊपर के बाल और भौं के बाल नोंच कर दो पत्‍थरों के बीच रख दोगे तब तुम्‍हारी मनोकामना पूरी होगी। मैं और अनि‍ल इस काम में लग गये। रोज आँखों के बाल नोंचते और जब लोगों के सामने जाते तो बि‍ना बालों और पलकों की भौंहे देखकर वे आश्‍चर्य भी करते और हँसते भी। हमारे लि‍ये हँसी-मजाक को मौका नहीं था पर अपना ही चेहरा आइने में देखकर पहचाना नहीं जाता। यह सि‍लसि‍ला कैसे खत्‍म हुआ, याद नहीं पर बचपन याद है।

(अतुल शर्मा द्वारा सम्‍पादि‍त शीघ्र प्रकाश्‍य पुस्‍तक से)