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कुत्ते (केनिस फेमिलिएरिस) की दुम टेढ़ी क्यों : देवेंद्र मेवाड़ी

देवेंद्र मेवाड़ी

देवेंद्र मेवाड़ी

आपने देवेंद्र मेवाड़ी जी की वि‍ज्ञान वि‍षयों पर लेख, कहानी, संस्‍मरण, कवि‍ता, यात्रावृत्तांत आदि‍ वि‍धाओं पर लि‍खी रचनाएं तो बहुत पढ़ी होंगी। अब पढ़ि‍ए उनका लि‍खा बेहद रोचक व्यंग्य-   

पिछली बार ट्रेन से सफर करते हुए मेरे सहयात्री किसी स्टेशन पर सुबह के धुंधलके में उस समय उतर गए थे, जब मैं नींद के सुखद झौंकों में झूल रहा था। उन्होंने मुझे झंझोड़ा था और उनींदी आंखों से मैंने देखा, वे अपने दोनों हाथों में मेरी दाईं हथेली दबाए कह रहे थे- इतने बढ़िया साथ के लिए धन्यवाद। फिर वे उतर गए, मगर बाद में आंख खुली तो पाया रात भर अपने महत्वपूर्ण अनुसंधान कार्यों के बारे में बताते हुए उस मेधावी वैज्ञानिक ने शोध पत्रों की जो फाइल मुझे दिखाई थी, वह उसे सीट पर ही भूल गए हैं। लेकिन, अब क्या हो सकता था? नाम-पते के लिए सारी फाइल टटोल डाली लेकिन लगता है, शोध पत्र लिखने-लिखवाने में वे इतना व्यस्त रहे होंगे कि नाम-पता लिखना भूल गए अथवा वरिष्ठता क्रम में बाद में लिखने का निश्चय किया होगा कि क्या पता शोधपत्र प्रकाशनार्थ भेजते समय तक कौन नाम जोड़ना-छोड़ना पड़े। और, जो नाम जल्दी में उन्होंने मुझे बताया था वह कुछ इतना नया और अपरिचित-सा था कि मेरे मस्तिष्क से ही निकल गया है।

लेकिन, उस मेधावी और कुछ कर गुजरने की उद्दाम इच्छा वाले वैज्ञानिक की महत्वपूर्ण उपलब्धियों का दस्तावेज यह फाइल तो है। उसी में से एक शोधपत्र प्रस्तुत कर रहा हूं। संयोगवश यदि मेरे सहयात्री उन वैज्ञानिक महोदय की दृष्टि इस शोधपत्र पर पड़े तो उनसे मेरा विनम्र अनुरोध है कि अविलंब पत्र-व्यवहार करें तथा इस महत्वपूर्ण शोधपत्र पर अपने हक की घोषणा करें ताकि इस खोज का श्रेय कोई अन्य व्यक्ति बिना मेहनत किए ही न लूट ले। इसी आशय के साथ उनकी फाइल से निकालकर फिलहाल यह एक शोध प्रबंध प्रकाशित किया जा रहा है। इससे उनकी मेधा और वैज्ञानिक अनुसंधान के अथक प्रयास का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। – लेखक

 भूमिका

कुत्ता अर्थात् केनिस फेमिलिएरिस रीढ़धारी, स्तनपोषी पशु है। आम बोलचाल में इसे ‘कुक्कुर’ या ‘श्वान’ भी कहा जाता है। यह मांसाहारी कुल और ‘कैनिडी’ परिवार का सदस्य है। अब तक प्रकाशित साहित्य के अध्ययन से पता चलता है कि दुनिया में इस पशु की लगभग 37 जातियां पाई जाती हैं, लेकिन श्वान प्रजनकों द्वारा व्यापक संकरण करके इनकी अनेक नस्लें तैयार करने में सफलता प्राप्त की गई है (फेयरचाइल्ड, 1921, स्मिथ, 1933)। यही कारण है कि आज नन्हें मोंगरेल और चाऊ से लेकर खूंखार ग्रेहाउंड और टैरियर तक सैकड़ों प्रकार के श्वान हमारे आसपास दिखाई देते हैं।

इनके आकार और रूप-रंग में भारी विभिन्नता पाई जाती है। आकार में कोई छोटा (एडवर्ड, 1913) तो कोई बहुत बड़ा (नेल्सन, 1915) होता है। एंडर्सन (1917) के अनुसार कई कुत्ते झबरीले होते हैं लेकिन इमर्सन इत्यादि (1914,17,21) ने इस बात का स्पष्ट उल्लेख किया है कि उनके द्वारा जांचे गए 155 में से 137 कुत्तों के शरीर पर 5 से.मी. से बड़े बाल नहीं थे। इससे साफ पता चलता है कि अधिकांश कुत्तों के शरीर पर छोटे-छोटे बाल होते हैं। लेकिन, स्मिथ (1705) का कहना है कि इनके शरीर पर लंबे बाल होते हैं। इनकी आंखें, कान और घ्राणशक्ति बहुत तेज होती है (मिलर, 1918) और ये गंध के आधार पर आखेट करते हैं (पावेल, 1941)। इनकी टांगें लंबी, पतली और पूंछ प्रायः झबरीली होती है (वाकर, 1891)। चोपड़ा (1946), प्रियर्सन (1975) तथा विक्टर (1976) द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण में 150 में से 104 कुत्तों की पूंछें झबरीली नहीं पाई गईं जिससे यह स्पष्ट कहा जा सकता है कि अधिकांश कुत्तों की पूंछ पर बाल छोटे होते हैं।

उपलब्ध साहित्य के गहन अध्ययन और अनेक प्राणिशास्त्रियों के साथ निजी पत्र व्यवहार (अप्रकाशित) से पता चला है कि कुत्ता चाहे किसी देश, जाति, नस्ल या रंग-रूप का हो, पूंछ उसकी टेढ़ी ही होती है। यह सार्वभौम सत्य है। लेकिन, लेखकों को आश्चर्य है कि इस दिशा में अब तक नगण्य कार्य किया गया है। आज तक वैज्ञानिकों का ध्यान इस महत्वपूर्ण समस्या की ओर आकर्षित न हो सका कि कुत्ते की दुम (पूंछ) टेढ़ी ही क्यों होती है। इस धारणा पर कि ‘कुत्ते की दुम बारह वर्ष तक नली में रखने के बाद भी टेढ़ी ही रहती है’ अब तक कोई वैज्ञानिक परीक्षण नहीं किया गया है। वैज्ञानिक दृष्टि से इसकी सत्यता प्रमाणित करने का कोई प्रयास ही नहीं किया गया। सामान्यजन से जुड़े इस प्रश्न के समाधान के लिए लेखकों ने पहली बार प्रयास किया है और अपने परीक्षण के परिणाम इस शोधपत्र में प्रस्तुत किए हैं। इस 12 वर्षीय विशिष्ट अनुसंधान योजना के लिए लेखकों को राष्ट्रीय अनुसंधान परिषद से कुल 50 लाख रुपये की आर्थिक सहायता प्राप्त हुई, जिससे आवश्यक उपकरणों और विभिन्न साधनों के अतिरिक्त एक वरिष्ठ तथा एक कनिष्ठ अनुसंधान अधिकारी, दो वरिष्ठ तथा तीन कनिष्ठ तकनीकी सहायकों, एक प्रयोगशाला सहायक, एक पत्रवाहक, एक ड्राइवर तथा चार एनिमल अटेंडेंटों की व्यवस्था की गई।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

अनेक वैज्ञानिकों का मत है कि आदमी ने कम से कम 10 हजार वर्ष पहले केनिस फेमिलिएरिस को पालना शुरू किया था। कहा जाता है, कभी मानव भेड़िए के बच्चे पकड़ कर अपनी गुफा में लाया था जो उसके साथ हिल-मिल गए और शिकार के साथी बन गए। बाद में यह प्राणी लगातार स्वामिभक्त बनता गया। (खूंखार भेड़ियों से खून का रिश्ता होने के बावजूद इसमें इतनी स्वामिभक्ति किस ‘जीन’ के कारण और कब आई, यह श्वान प्रजनकों के लिए पृथक शोध का महत्वपूर्ण विषय है।) लेकिन, अब तक इस बात की पुष्टि नहीं हो पाई है कि क्या कुत्तों के मूल जनकों की पूंछें भी टेढ़ी थीं अथवा नहीं। गुफाचित्रों में अब तक हिरन, रेंडियर और सांडों की ही अनुकृतियां देखी गई हैं। कुछ देशों में कुत्तों की जो प्राचीन मिट्टी की मूर्तियां मिली हैं, उनसे भी इस बारे में कुछ पता नहीं चलता क्योंकि पूंछ बहुत छोटी बनाई गई है।

प्राचीन साहित्य का अवलोकन करने पर लेखकों को इस तथ्य का पता लगा है कि धर्मग्रंथ ‘महाभारता’ में एक ऐसे कुत्ते का उल्लेख किया गया है जो ‘युधिष्ठिर’ नामक व्यक्ति के साथ हिमालय की चोटियों में चढ़ा था और उसके बिना ‘युधिष्ठिर’ ने स्वर्ग जाने से इंकार कर दिया था (ब्राउन, 1814, हम्फ्री, 1880), लेकिन उसकी पूंछ के स्वरूप के विषय में कोई उल्लेख नहीं मिलता। इसी प्रकार एक और रिलीजियस बुक ‘रामचरितमानस’ में तुलसीदास ने नवयुवकों, इंद्र और कुत्तों में एक समानता बताई है। लेकिन, इंद्र और नवयुवकों में किसी की भी दुम नहीं होती है (ब्राउन, 1809, प्रूथी 1813),, जिसे वे हिला सकें या जो टेढ़ी हो। इसलिए लेखक इस मत से सहमत नहीं हैं। उधर प्राचीन रोम में रीबिगल देवता को प्रसन्न करने के लिए कुत्ते की बलि दी जाती थी, ऐसा पता लगा है (डेविडसन, 1923)।

चिकित्सा विज्ञान के इतिहास में इस प्राणी पर किए गए अनगिनत प्रयोगों का उल्लेख मिलता है। 60 वर्षीय ब्राउन-सेक्वार्ड (1889) ने इसके महत्व का उल्लेख किया। उसने इसके वृषणों के सत की सुई लगाकर पुनर्योवन पाने की घोषणा की थी। प्रो. नोनिन, मिंकोवस्की और मेरिंग (1889) ने इसकी पाचनक्रिया पर प्रयोग किए, मगर बरामदे में एक प्रयोगाधीन श्वान के मूत्र पर भिनभिनाती मक्खियां देखकर उसमें चीनी का पता लगा डाला। मगर केनिस फेमिलिएरिस पर सर्वाधिक प्रयोग रूसी शरीर-क्रिया विज्ञानी इवान पैत्रोविच पावलोव (1872-1888) ने किए। पावलोव (1888) ने अपने प्रारंभिक परीक्षण इसकी पाचन प्रणाली पर केंद्रित किए। उसने कुत्ते की आंत से एक नली जोड़ दी और उसके सामने मांस दिखा कर पाचनतंत्र में पैदा होने और नली के जरिए बूंद-बूंद टपकते पाचक रसों का पता लगाया। उसने यह भी सिद्ध किया कि खाने की घंटी बजने या खाना परोसने वाले की मात्र पदचाप से भी कुत्ते के पेट में पाचक रस पैदा होने लगते हैं। (पावलोव, 1902)।

इस विशिष्ट प्रयोग में न केवल कुत्ते वरन मानव की पाचन क्रिया पर तो प्रकाश पड़ा, लेकिन पूंछ पर प्रकाश डालने में ये वैज्ञानिक भी असमर्थ रहे। यह बात अलग है कि पाचन पर किए गए प्रयोगों के लिए पावलोव को सन् 1904 का नोबेल पुरस्कार दिया गया। रूस में ही एक कुत्ते पर दो सिर जोड़ने के सफल प्रयोग भी किए गए। कनाड़ा में बैंटिंग तथा बैस्ट (1920) ने केनिस फेमिलिएरिस की पेंक्रिएज नामक ग्रंथि पर कार्य करके इंसुलिन की खोज की, जिससे डायबिटीज के मूल कारण का रहस्योद्घाटन हो सका। इस खोज के लिए उन्हें सन् 1923 का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। इसके बावजूद पूंछ के वक्र होने के कारण अंधकार में ही पड़े रहे।

इसके बाद अंतरिक्ष संबंधी प्रयोगों में इस प्राणी का उपयोग किया गया। अनेक कुत्तों पर भारहीनता, गुरुत्वाकर्षण आदि के प्रभावों का गहन अध्ययन किया गया। लाइका नामक एक कुतिया को स्पुतनिक-2 नामक उपग्रह में 3 नवंबर 1957 को प्रथम बार अंतरिक्ष में भेजा गया। लेखकों को आश्चर्य है कि केनिस फेमिलिएरिस पर इतना अनुसंधान होने के बावजूद इसकी पूंछ का प्रश्न फिर भी अछूता ही रहा।

उपलब्ध साहित्य के गहन अध्ययन से केवल एक संदर्भ का पता चलता है, जिसमें इस प्राणी की पूंछ पर ध्यान देने का प्रयास किया गया है। ज़ार के जमाने में रूस के चेलम नामक स्थान में (जो हमारे देश के शिकारपुर की तरह विख्यात है) लेयाक बिन लेकीश नामक एक दार्शनिक थे। उनसे यह पूछने पर कि कुत्ता अपनी दुम क्यों हिलाता है, जवाब मिला- क्योंकि उसका शरीर दुम की तुलना में अधिक ताकतवर है। अगर ऐसा नहीं होता तो जरूर दुम कुत्ते को हिलाती।

लेकिन, दुम टेढ़ी होने की समस्या यहां भी अछूती रह गई। इसीलिए लेखकों को आम आदमी की जिज्ञासा के विशेष संदर्भ में इस सार्वभौम समस्या पर विश्व में पहली बार अनुसंधान करने का श्रेय प्राप्त है।

सामग्री एवं विधि

इस अध्ययन के लिए निम्नलिखित सामग्री का उपयोग किया गयाः

कुत्ते के पिल्ले 40 (देशी 15, अलसेशियन 5, स्पेनियल 5, टैरियर 5, ग्रेटडेन 5, बुलडाग 5 ), लोहे की जंजीरें 40, प्लेटें 40, जलपात्र 40, चिलमचियां 40, बांस की नलियां 15, तांबे की नलियां 5, स्टील की नलियां 10, वर्नियर कैलिपर्स 5, एक किलो तक के विभिन्न बांट, पैमाने 10, एप्रन 10, रिकार्ड बुक, लेखन सामग्री आदि। इसके अतिरिक्त 40 पैराम्बुलेटर भी खरीदे गए। उनका उपयोग पिल्लों के लिए किया गया क्योंकि पिल्ले बड़े होने तक नलियों को संभालने में असमर्थ थे। अतः पैराम्बुलेटरों में उचित व्यवस्था की गई। कुत्तों को मौसम के कुप्रभावों से बचाने के लिए एक वातानुकूलित प्रयोगशाला का निर्माण किया गया। व्यय में यथासंभव कमी करने के लिए प्रयोगशाला के ही कुछ कमरों का वैज्ञानिकों एवं अन्य कर्मचारियों के बैठने हेतु उपयोग कर लिया गया, जिससे पृथक कार्यालय का भारी खर्चा बचाया जा सके।

प्रयोग के आरंभ में ही पिल्लों को 6 समूहों में बांट दिया गया जो इस प्रकार हैं-

10 पिल्लों की दुम में बांस की नली,

10 पिल्लों की दुम में स्टील की नली,

5 पिल्लों की दुम में तांबे की नली

5 पिल्लों की दुम में आवश्यक वजन लटकाया

5 पिल्लों का पुच्छ विच्छेदन, तथा

5 पिल्ले तुलना के लिए सामान्य रूप से बढ़ने दिए गए।

पिल्लों की पूंछ में नलियां पहना दी गईं। उन्हें पैराम्‍बुलैटरों में घुमाया गया और आवश्यकता पड़ने पर नलियों को हाथ से सहारा देकर कमरों में घूमने-फिरने की सुविधा भी प्रदान की गई। पूंछविहीन अवस्था का अध्ययन करने के लिए 5 पिल्लों की पूंछें काट दी गईं। नली के बजाय पूंछ सीधी करने के लिए आवश्यक भार के मीट्रिक बांट लटकाए गए। पांच पिल्ले बिल्कुल सामान्य रूप से बढ़ने दिए गए। सभी पिल्लों को दिन में दो बार दूध, चपाती व मांस और तीन बार पानी दिया जाता रहा। उनके स्वास्थ की नियमित रूप से जांच की जाती रही और प्रतिदिन शरीर का तापमान, रक्तदाब, नाड़ी हृदय की धड़कनों तथा सांस लेने की गति और त्वचा की संवेदनशीलता के आंकड़ें रिकार्ड किए जाते रहे। एक बार मांस और दो बार दूध में किसी खराबी के कारण कुत्ते बीमार पड़ गए थे, जिन्हें उचित देखभाल से ठीक कर लिया गया। लेकिन, आश्चर्य इस बात का है कि कुत्तों के साथ ही प्रयोगशाला के सभी कर्मचारी भी बीमार पड़ गए थे। इस संबंध में बाद में काफी सावधानी बरती गई।

परिणाम

12 वर्ष की अवधि पूरी होने तक केवल 11 कुत्ते जीवित रहे। 29 में से 10 कुत्ते पेचिस, 5 कुत्ते रेबीज और 14 कुत्ते अज्ञात कारणों से मर गए (हो सकता है यह कुत्तों का कोई अज्ञात मगर महत्वपूर्ण रोग हो, इस पर गहन अनुसंधान की आवश्यकता है)। 11 जीवित कुत्तों में से 2 बांस की नली वाले, 2 स्टील की नली वाले, 2 तांबे की नली वाले, 1 वजन वाला, 2 दुमकटे और 2 सामान्य रूप से बढ़े हुए कुत्ते थे।

12 वर्षों की अवधि में इनका रक्तचाप, हृदय की धड़कनें, सांस और नाड़ी की गति कभी सामान्य और कुछ अवसरों जैसे छेड़ने, मांस देखने या एक-दूसरे पर झपटने में असामान्य रही। पुच्छ- विच्छेदन के समय दिल की धड़कनें बहुत तेज हो गईं।

ठीक 12 वर्ष बाद 6 कुत्तों की पूछें नलियों में से बाहर निकालने पर कुत्तों के आकार के अनुसार उनकी मोटाई और लंबाई में पर्याप्त वृद्धि पाई गई और नली के बाहर निकलते ही पूंछें सामान्य रूप से टेढ़ी हो गईं। इसके साथ ही प्रयोगाधीन कुत्तों का व्यवहार भी सामान्य पाया गया क्योंकि शोधकर्त्ताओं को देखते ही वे सामान्य रूप से अपनी दुमें हिलाने लगे।

निष्कर्ष

उक्त 12 वर्षीय प्रयोग के परिणामों का विश्लेषण करने से सिद्ध होता है कि केनिस फेमिलियेरिस अर्थात् कुत्ते की पूंछ को 12 वर्ष तक नली में रखने पर भी (भले ही नली बांस की हो अथवा धातु की) वह टेढ़ी की टेढ़ी ही रहती है।

आभार

इस महत्वपूर्ण  अनुसंधान योजना को स्वीकृत कर आर्थिक सहायता प्रदान करने के लिए लेखक राष्ट्रीय अनुसंधान परिषद के प्रति अत्यंत आभार प्रकट करते हैं। इस दीर्घकालीन प्रयोग के मार्गदर्शन तथा साहस बढ़ाने के लिए तथा विभिन्न देशों के कुत्तों का अध्ययन करने के लिए विदेश यात्रा की स्वीकृति देने हेतु हम अपने राष्ट्रीय अनुसंधान संस्थान के निदेशक महोदय के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। विभागीय तथा अनुभागीय स्तर पर कार्य की सुविधा प्रदान करने के लिए हम विभागाध्यक्ष तथा अनुभागाध्यक्ष महोदय के आभारी हैं। हमारे विभागीय सहयोगियों के बहुमूल्य सहयोग के बिना यह कार्य हो ही नहीं सकता था। और, इस अनुसंधान आलेख की पांडुलिपि को फेयर तथा टाइप करने में अपनी गृहणियों से मिले अमूल्य सहयोग (घर के सभी कार्यों के अतिरिक्त!) के लिए हम व्यक्तिगत स्तर पर आभार प्रकट करते हैं।

नोटबंदी के सम्मोहन में इश्क़ :  शम्भू राणा

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जनसंख्या का अधिकांश हिस्सा इन दिनों जान पड़ता है कि सम्मोहन के असर में है और साथ ही इश्क में भी मुब्तिला है। सम्मोहित आदमी वही महसूस करता है जो उसे करवाया जाता है। क्योंकि सम्मोहनकर्ता का यही निर्देश होता है। और इश्क की कैफियत का तो फिर कहना ही क्या। चारों ओर बस फूल ही फूल खिले होते हैं। दर्द मीठी लोरी सा लगता है और सड़े चूहे से गेंदे की सी महक आती है- जो तुमको पसंद वही बात कहेंगे, दिन को अगर रात कहो रात कहेंगे।

हर वो हिन्दुस्तानी जो वर्तमान में सांसे ले रहा है परम सौभाग्यशाली है कि उसे उपरोक्त अद्भुत और ऐतिहासिक मनोदशा के अनुभव के लिए एक और जन्म लेने की जहमत से राहत मिल गई। जो मर गए और जो अजन्मे हैं, हमें उनके फूटे नसीबों पर दो आंसूं बहाने चाहिए कि वे इस अद्भुत अनुभव से वंचित रह गए।
इन्द्रजाल कॉमिक्स का मुख्य पात्र मेंड्रेक आपको याद होगा जो जबरदस्त मैस्मेरिज्म से अपने प्रतिद्वंदियों को भ्रमित कर पल भर में धराशाई कर देता था। बांकी उठा-पटक का काम उसका बलवान दोस्त लोथार कर देता था। शुद्व स्वदेशी अंदाज में बताइए- वर्तमान समय में चाचा चौधरी कौन, साबू कौन और राकेट कौन ?
मौजूदा समय को यूं ही अद्भुत नहीं कहा, यह वाकई अद्भुत, अनोखा और टाइम कैप्सूल में ममी बना कर रखने लायक है। क्योंकि इतिहास में ही भविष्य के बीज छिपे होते हैं।
हम एक नये किस्म का तर्कशात्र गढ़ा जाना देख रहे हैं। बड़े से बड़े तर्कशास्त्री को भी लाजवाब कर देने वाली नई दलीलों के जनसुलभ संस्करण इन दिनों फिजा में गर्दिश कर रहे हैं। हमारे जवान रात, दिन खड़े होकर देश की हिफाजत कर रहे हैं और आप जरा देर लाइन में खड़े नहीं रह सकते, क्यों देश को बदनाम करते हो ? जनता को जब इतनी तकलीफ हो रही है तो उस आदमी की तकलीफ का अंदाजा लगाइए जो अकेला करोड़ों लोगों की परेशानी दूर करने में लगा है…।
यह समय नए धंधों और लतीफों का भी है। एक धंधा कमीशनखोरी का है और दूसरा कुछ पैसों के बदले किसी के लिए लाइन में लगने का, कि ज्यों ही नंबर आए मुझे फोन कर देना, मैं तब तक दूसरे काम निपटा लूं। लतीफा एक बैंक कर्मचारी ने सुनाया कि हमारी ब्रांच में चार-छः लोग शादी का कार्ड लेकर आ चुके हैं, कि हमें ढ़ाई लाख रुपया दो। चैक करने पर उनके खाते में ढ़ाई लाख से कम निकले। उन्होंने कार्ड लहराते हुए कहा, तो क्या हुआ, अखबार में छपा है शादी है तो ढ़ाई लाख मिलेंगे, टीवी में भी आया था।
यह मनोदशा प्यार में पड़े हुए की-सी नही तो और क्या है कि आदमी यह सोच कर खुश है जिन्दगी में पहली बार उनके खाते में इतना रुपया है, वर्ना मेरी कहां औकात। ठीक है मेरा नहीं है, दोस्त का है, रिश्तेदार का है, बनिए का है, मालिक का है पर है तो अभी मेरे खाते में न ? तो ? मैं तो इस जनम में सोच भी नहीं सकता था।
टेलीविजन में अलौकिक नजारा है, देखने वालों की आंखें एक अजीब सी कैफियत से डबडबा आई हैं। एक 97 साल की उम्रदराज महिला लाइन में लगकर पुराने नोट बदलवा रही हैं। निःसन्तानों को अपने बेऔलाद होने का अब कोई अफसोस नहीं। जब वो महिला लाइन में लग सकती हैं तो हम अपनी पेशाब की थैली हाथ में लिए, गर्भ में बच्चा लिए, दुधमुंहे बच्चे को घर में छोड़, दुःखते घुटने और कमर, शुगर और बीपी के साथ, कुछ देर धंधा बंद करके, नौकरी से बंक मार के, बैसाखी के सहारे क्यों नहीं लाइन में लग सकते? अन्न जहां का हमने खाया, वस्त्र जहां के हमने पहने, उनकी रक्षा कौन करेगा बे ? हम करेंगे-हम करेंगे।
रोज सुबह-सुबह चाय के साथ बड़े ही शुभ-शुभ समाचार हमारी रगों में कानों और आंखों के जरिए उतर रहे हैं। हमारा पड़ोसी पाकिस्तान पूरा बर्बाद हो गया और चीन आधा। कश्मीर में अमन आ गया। माओवादी पता नहीं कहां चले गए। सारे जमाखोर उजड़ गए, बड़े-बड़े उद्योगपतियों का भट्टा बैठ गया, सारे राजनीतिक दलों को खाने के लाले पड़ गए, फंला लालाजी ने अपने सारे कर्मचारियों को दो साल का वेतन एक मुश्त दे दिया, काली कमाई गंगाजी में बहा दी, लोग नहर में जाल डालकर नोट पकड़ रहे हैं। हर खोखे वाले ने स्वाइप मशीन रख ली है। (शनिदान वालों ने भी शायद मशीन आर्डर कर दी हो) आम आदमी खुश है ये देखकर कि पृथ्वी में जब से जीवन शुरू हुआ पहली बार ऐसा हुआ कि सबकी औकात ढ़ाई लाख मात्र की हो गई, फिर चाहे राजा हो या रंक। यह अद्भुत दौर है। इतने बड़े फैसले की खबर मंत्रीमंडल तो क्या वित्‍त मंत्री तक को नहीं लगने दी- लोग बातें कर रहे हैं, ताली पीट रहे हैं, आपस में धौल जमा रहे हैं, खुशी के अतिरेक में गुटके की पीक अपने ही गिरेबान में गिरी जा रही है, कोई नहीं जी-कोई नहीं, सोने की चिड़िया, विश्व गुरु और भौत सही दिमाग लगाया गुरु उसने, नास्त्रेदमस ने भी कहा है….. जैसे वाक्य, कानों में रस घोल रहे हैं।
एकाध टीवी चैनल, बीच-बीच में कुछ अखबार और सोशल मीडिया बदमजगी पैदा कर दे रहे हैं, कि लाइन में लगे इतने लोग मर गए, शादी टल या टूट गई, मय्यत घर में पड़ी रही बेटा लाइन में लगा रहा, पुराने नोट होने पर मरीज भर्ती नहीं हो पाया नतीजन दर्द ही दवा बन गया। सेना के साथ हुई मुठभेड़ के बाद कश्मीरी अलगाववादियों के पास चूरन के नोटों की खेप बरामद, हजार का नोट छः सौ में चला, लोग रजाई लेकर एटीएम के बाहर सोये, देर रात काम निपटा कर बैंक कर्मचारी घर जा रहे थे, गाड़ी भिड़ गई परलोक सिधारे, विदेशी पर्यटक वापस जाने के लिए चन्दा कर रहे हैं, दिहाड़ी मजदूर मजबूरन घर चले गए, बाजार बैठ गया, दो हजार रुपया जेब में है मगर आदमी चाय नहीं पी सकता, दारू की दुकान में सैल्स मैन कहता है- पव्वा नहीं पूरा खम्बा लो तभी नोट चलेगा, पार्टी विशेष से जुड़े कई लोगों के पास से लाखों-करोड़ों की नई करेंसी पकड़ी गई…।
एक योगाचार्य बेचारे न जाने किस मजबूरी से बैंक की लाइन में लगे और गश खाकर गिर पड़े। अब बताइए योग विद्या का इससे ज्यादा नुकसान और कौन कर सकता है? मजे की बात यह कि उन्होंने ही फरमाया था कि बैंकों में लम्बी लाइनें जो हैं वो विपक्षी दलों द्वारा प्रायोजित हैं।
लगता है जैसे कोई पागल या नशेड़ी एक बेतरतीव सी कहानी सुना रहा हो- एक बुढ़िया थी जो बचपन ही में गुजर गई…।
मैंने भी अपने बड़ों से सुना है सो आगे बढ़ा देता हूं कि उम्मीद का दामन नहीं छोड़ना चाहिए। थामे रहिए, हमें हर हाल में सकारात्मक सोचना चाहिए, उम्मीद करनी चाहिए कि भला होगा। उम्मीद के इस दामन को हाथों में ही थामे रहें, इससे आंखें न ढंक लें।
वर्तमान परिदृश्य की तुलना सम्मोहित और प्यार में पड़े हुए की-सी मनोदशा से की थी। सम्मोहन में आदमी लगभग बेहोश होता है और प्यार तो जगजाहिर है कि अंधा होता ही है। सम्मोहन से देर सबेर आदमी बाहर निकल आता है पर इश्क बड़ा कमीना होता है, इसे आदमी दिल पर ले लेता है। दरअसल, आजकल इश्क कोई करता नहीं, इसकी आड़ में व्यापार करते हैं, बदले में कुछ चाहते हैं। वर्ना तेजाब से चेहरा क्यों जला देते या ऐसा गाना क्यों लिखते- तुम किसी और की होगी तो मुश्किल होगी? इश्क करने के लिए बड़ा जिगर चाहिए साहब कि जरूरत पड़ने पर आप खुशी-खुशी अपने हाथों अपनी प्रेमिका का कन्यादान कर दें। ऐसे आशिक इस संसार में कुल जमा कितने होंगे आपके हिसाब से? यही बात सोच के मैं खुश हूं कि डरा हुआ हूं, कह पाना मुश्किल है फिलहाल।

बजट में हुई बड़ी नाइंसाफी : चन्द्रशेखर करगेती

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बल, सरकार ने जगरिये, डंगरिये, मंगलगीत गायक और पुजारियों सहित बोनो को भी समाज कल्याण विभाग के माध्यम से पेंशन का लाभ देकर राज्य के विकास में
एक मील का पत्थर गाड़ दिया है l
बल, कितना अच्छा होता अगर राज्य के मुख्यमंत्री ‪‎हरीश रावत जी इसी बजट सत्र के दौरान राज्य के शराबियों को भी समाज कल्याण विभाग के माध्यम से पेंशन देने का ऐलान कर देते l आपको बात हंसी ठठ्ठे की लग रही होगी लेकिन, यह हैं नहीं। उनका भी हक़ बनता हैं पेंशन पर ! आखिर वे उत्तराखण्ड को सर्वाधिक राजस्व कमवाने वाले जो ठहरे !
स्वयं राज्य के मुख्यमंत्री भी कह चुके हैं कि राज्य में शराबबंदी नहीं की जा सकती है, क्योंकि वह सरकार के लिए राजस्व का बड़ा स्रोत है। अब जिनकी बदौलत से सरकार चल रही हो, जो अपना पेट काट-काटकर सरकार का खर्च चला रहे हों, ऐसे राज्य सेवक वर्ग के लिए क्या स्थायी पेंशन का प्रावधान नहीं होना चाहिए ? आखिर उत्तराखण्ड में उनके साथ ही नाइंसाफी क्यों, उनकी अनदेखी क्यों ?
वर्तमान राज्य सरकार को चाहिए कि वह राज्य आन्दोलनकारियों की तर्ज पर शराबियों का सरकारी चिन्हीकरण करवाये, सरकारी ठेकों से नियमित रूप से शराब खरीद कर पीने वाले राज्य के शराबियों को सरकारी शराबी घोषित क उन्हें भी पेंशन पाने का हकदार माना जाए !
फर्ज करो अगर राज्य भर के शराबियों ने अपना कोई संगठन बना लिया और सत्याग्रह आन्दोलन करने की घोषणा कर दी। उन्‍होंने यह ऐलान कर दिया कि हम राज्य के समस्त शराबी सरकारी शराब का बहिष्कार करते हैं। हम सत्याग्रह के तहत अपनी शराब खुद बनाकर स्वरोजगार को बढ़ावा देते हुए उसे औरो को भी पिलायेंगे और स्वयं भी पीयेंगे, तब क्या होगा ? ऐसे में क्या सरकार के सामने मुश्किल नहीं हो जायेगी? आखिर सरकार बगैर समूह के लोगों की जाय मांगों को बगैर हो हल्ला मचाये मानती क्यों नहीं है ?
बल शराबियों ने अगर हड़ताल कर दी तो सरकार कैसे चल पायेगी और कैसे महानुभावों के लिए 17 लाख वाली गाड़ियां खरीदी जायेंगी, राज्य के कार्मिको को कैसे वेतन मिलेगा, कैसे नए स्कूल-अस्पताल खुलेगे, कैसे नई सड़कें बनेंगी, मुख्यमंत्री सहित अधिकारियों के हवाई दौरों का क्या होगा। बगैर राजस्व प्राप्ति के विकास को अंतिम छोर तक कैसे पहुँचाया जायेगा ? मैं तो कल्पना कर ही सिहर उठा हूँ। पता नहीं सरकार जाने क्यों बेसुध पडी़ है !
बल मुख्यमंत्री जी शराबियों को पेंशन देने के मामले में सोचने-विचारने की ज्यादा जरुरत नहीं है, क्योंकि यदि सरकार राज्य के समस्त शराबियों को पेंशन देने का आदेश जारी कर भी देती है तो इससे राजकोष पर कोई अतिरिक्त बोझ नहीं पडे़गा, बल्कि इससे राजस्व में बढ़ोतरी ही होगी l साथ ही राज्य की नारी शक्ति भी सरकार को दुवाएं ही देंगी ! अभी तक शराबियों के घर में क्लेश होने का कारण नारी शक्ति के घर चलाने के खर्चों में कटौती हो जाना मुख्य है, क्योंकि शराबियों द्वारा अपने स्रोतों की जो कमाई परिवार की जरूरतों पर लगानी थी, वह शराब के ठेकों पर खर्च हो जा रही है। पेंश देने से वह खर्च रुक जाएगा, गृहक्लेश के प्रकरणों में भी कमी भी आयेगी। इसका असर राज्य की सुख शान्ति पर भी पडेगा !
जाहिर है पेंशन मिलने पर समस्त शराबी उसे भी शराब पर ही खर्च करेंगे, वे पेंशन को बचत खाते में तो डालने से रहे l इस प्रकार से सरकार का पैसा घूम फिर कर वापस सरकार के खजाने में ही आयेगा, अतिरिक्त में जो आ जायेगा वो अलग से। चुनावी वर्ष में सरकार के इस निर्णय पूरे राज्य में वाह वाही भी होगी, क्योंकि उत्तराखण्ड में जनमत बनाने में तो शराबियों और शराब का विशेष हाथ रही ही है, जो परखी हुई बात है। सरकार के ऐसे निर्णयों से सत्ता वापसी की राह भी और आसान होगी !

यह सरकार के लि‍ए ठीक हींग लगे ना फिटकरी और रंग भी चौखा आये जैसा ही है !
पोस्ट इस आशा से सरकार को प्रेषित कि अभी बजट सत्र के दौरान चर्चा के लिए दिन बचे हुए हैं और सरकार तुरत फुरत में विधानसभा में प्रस्ताव ला भी सकती है l इस ग्याडू की बात का यकीन मानिए कि शराबियों को पेंशन देने की सरकार की योजना का विरोध विपक्ष भी नहीं कर पायेगा ! याद हैं ना आपको,
आपने अभी दो दिन पहले सदन में घोषणा करवाई है कि सरकार इस साल में 30 हजार लोगो नयी नौकरी देगी। जब 30 हजार नये लोगो नौकरी दे दी जायेगी तो
उनकी तनख्वाह भी तो सरकार को ही देनी है। राज्य में शराबी सुरक्षित एंव संरक्षित ना हुए तो कर्मचारियों की तनख्वाह कहाँ से आयेगी ?

अथ चुनाव गीता : शंभू राणा

maaf karna he pita.shambhu rana

चुनावी समर में पढि‍ए शंभू राणा का व्‍यंग्‍य। आप भी अर्जुन सिंह की तरह राजनीति‍ के सर्वज्ञाता हो जाओगे-

खुली जीप में सवार नेता ने उसे सुनने आए और लाए गए जनसमुदाय को दूर से देखा। रामलीला मैदान इस छोर से उस छोर तक ठसाठस भरा था। सर-ही-सर नजर आते थे। नेता और पार्टी आलाकमान अपार भीड़ देख कर अत्यन्त हर्षित हुए। नेता बहुत देर तक मंत्र-मुग्ध-सा भीड़ को निहारता रहा। फिर उसने अपने पहलू में खड़े आलाकमान से यूँ कहा- “सर, मंच पर जाकर भाषण देने से पहले मैं जरा जनसमुदाय को ध्यान से देखना चाहता हूँ, जायजा लेना चाहता हूँ। इससे मुझे स्थिति का सही आकलन करने तथा इस निर्णायक मानी जा रही सभा को सम्बोधित करने में मदद मिलेगी। प्लीज…”

आलाकमान के निर्देश पर ड्राइवर ने जीप को ऐसी जगह पर ला खड़ा किया, जहाँ से मजमे को ब-गौर देखा जा सकता था। लो भई, देखो, क्या देखना चाहते हो!- कहा आलाकमान ने।

सांसद का चुनाव लड़ रहे अर्जुन सिंह ने जीप में खडे़-खड़े देखना शुरू कर दिया भीड़ को।

उसने देखा मंच के करीब बैठी अपने मोहल्ले की महिलाओं को, जिन्हें वह भाभी, चाची, तायी और दादी आदि कह कर बुलाता था। उसे दिखाई दिए वे मास्साब, जिन्होंने उसे पढ़ाया था। अपने दूधवाले, पानवाले और अखबारवाले को भी देखा उसने। वहीं हसीन पेंटर भी खड़ा था, जिसने एक बार उसे खून दिया था और कॉफी पिये बगैर ही अस्पताल से गायब हो गया था। दीपा आंटी को भी वह देख रहा था जिन्होंने उसे एक बार अपनी बेटी के साथ बदतमीजी करने पर वहीं सड़क पर तमाचा जड़ दिया था, लेकिन शिकायत लेकर घर नहीं आयीं। नेता की माँ वहाँ मौजूद थी और बच्ची को गोद में लिये उसकी पत्नी थी। और…

अर्जुन सिंह के चेहरे पर एकाएक मायूसी की बदली छा गई। उसका आत्मविश्वास जाता रहा। उसने आलाकमान की ओर पनाह माँगने वाली निगाहों से देखा।

‘‘क्या हुआ? तुम्हारी तबियत तो ठीक है?’’ आलाकमान ने उसके चेहरे का रंग बदलते देख कर पूछा।

‘‘कुछ नहीं सर, मेरी तबियत ठीक है पर…।’’

‘‘पर क्या?’’ उन्होंने सावधानीवश जीप में लगा माइक ऑफ कर दिया, ‘‘क्या बात है?’’

मैं…मैं… इस सभा को सम्बोधित नहीं कर सकता सर।

क्या कह रहे हो? दिमाग तो खराब नहीं हो गया तुम्हारा? क्यों किये कराये पर पानी फेर दे रहे हो? क्या इसीलिये दिल्ली से बुलाया तुमने मुझे? जानते हो न कि यह सीट हमारे लिये कितनी महत्वपूर्ण है? हमें हर हाल में यह सीट चाहिये। देखो, हजारों की भीड़ जमा है, मीडिया के लोग यहाँ हैं। तुम्हारी इस हरकत से देश में क्या सन्देश जायेगा? क्यों तुम पार्टी की फजीहत करवाने पर तुले बैठे हो! पागल मत बनो। माहौल हमारे पक्ष में है। जीत पक्की है। सभा तो तुम्हें सम्बोधित करनी ही पडे़गी। आलाकमान ने अर्जुन सिंह को समझाने की कोशिश की।

मगऱ…मगर…सर…अर्जुन सिंह हकलाने लगा। मैं कैसे सम्बोधित करूँ सभा को?… किस मुँह से दूँ वह भाषण जो हमने हफ्तों की मगजमारी के बाद खासतौर से इस मौके के लिये तैयार करवाया है, क्योंकि उसका अधिकांश तो झूठ है, मनगढ़ंत है। मैं कैसे ऐसी निराधार बातें कहूँ इन लोगों के सामने, किस मुँह से? यहाँ मेरे लिये पराया और अनजान कौन है? सभी तो मेरे मोहल्ले के लोग हैं, मेरे शहर के। इस छोटे से शहर में कौन ऐसा है जिसे मैं नहीं जानता, स्वयं मैं यहाँ किसके लिये अपरिचित हूँ? यहाँ मौजूद हर आदमी या तो मेरा दोस्त है, रिश्तेदार है या परिचित। इस भीड़ में मुझे एक भी ऐसा शख्स नजर नहीं आ रहा जिसके साथ मेरे कम से कम हाय-हलो के सम्बन्ध न हों।

जिन बातों की स्वयं कल तक इन लोगों के साथ खिल्ली उड़ाया करता था, आज कैसे उन्हीं बातों का पक्ष लूँ और लोगों को समझाऊँ? आखिर कौन-सी ऐसी अनोखी बात मेरे पास कहने को है कि जिसके आधार पर मैं वोट माँगूँ? कैसे कह दूँ कि मैं आपके वास्ते चाँद तोड़ कर ला दूँगा? विपक्षी झूठे हैं, बेईमान हैं, गलतबयानी करते हैं! पिछली आधी सदी से जनता को लूटते आये हैं। इन्होंने अपनी आइन्दा की सात पीढ़ियों के लिये कमा कर रख छोड़ा है। यह लुटेरों की जमात है। इनके धोखे में मत आइये। बस, अब और नहीं। मुझे एक मौका दीजिये। सिर्फ एक मौका। यकीन करिये मैं और मेरी पार्टी ही सच्ची, ईमानदार और दूध की धुली है। यकीन जानिये मैं आपको चाँद-तारे तोड़ कर ला दूँगा। आप खुशहाल हो जायेंगे। हमारा शहर गुलजार हो जायेगा। चारों ओर बहारें होंगी, हर दिन त्योहार सरीखा…

जरा आप ही मुझे बताइयेगा सर कि मैं किस मुँह से प्रतिपक्षियों पर यह आरोप लगाऊँ कि़…कि… मसलन शिक्षा व्यवस्था चौपट कर दी इन्होंने, उसका कोई स्तर नहीं रह गया़, जबकि मैं खुद नकल से पास हुआ। नम्बर बढ़ाने के लिये अपने राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल किया। राजनीतिक प्रभाव के बूते ही विश्वविद्यालय में अपनी बीवी को नौकरी दिलवायी़… तो मैं कैसे कह दूँ इन बातों को? उधर उस कोने में देखिये, लाठी के सहारे जो बुजुर्ग खडे़ हैं, वह मेरे टीचर रहे हैं। इन्होंने एक बार मुझे क्लास में चरस पीते हुए पकड़ा और पीटते हुए प्रिंसिपल के कमरे की ओर ले गये। प्रिंसिपल बड़े सख्त आदमी थे। चरस शब्द सुनते ही आगबबूला हो गये। नाम काटने को रजिस्टर मँगवा लिया। तब यही मास्साब थे जिन्होंने मुझे आड़ में कर लिया और अड़ गये कि मेरे रहते नाम नहीं कटेगा बच्चे का। समाज में एक लफंगा पैदा करने का दोष में अपने सर पर नहीं लूँगा…

हालांकि वो बात अलग है कि मैं पता नहीं क्यों नहीं सुधरा! इस नुक्ते से कभी चीजों को देखा ही।

अगर सोच पाता इस तरह तो आज यह धर्मसंकट उत्पन्न ही क्यों होता? राजनीति में ही जाना था तो किसी ढंग की पार्टी में गया होता, जो आम जनता के मुद्दों पर लड़ती, उनकी आवाज बनती। जात-पात और मजहब जिसके लिये बेमानी होते। माना कि आजकल कोई ऐसी पार्टी ढूँढ़ पाना मुश्किल है। तो क्या, मैं निर्दलीय की हैसियत से चुनाव लड़ लेता। नक्कारखाने में तूती की आवाज ही सही। शायद विषयान्तर हो गया।

तो सर, इन कब्र में पाँव लटकाये बैठे मास्साब से नजरें मिला कर मैं कैसे शिक्षा व्यवस्था को गाली दूँ? हालाँकि इस सबका सम्बन्ध शिक्षा व्यवस्था से उतना नहीं, पर शिक्षा व्यवस्था को गरियाने से पहले मेरे लिये लाजिम है कि मैं एक आदर्श विद्यार्थी होता। व्यवस्था के बहाने विरोधियों को कोसने का कोई मतलब नहीं। पब्लिक सब समझती है।

यहाँ डाँ. पन्त अपनी डाँ. पत्नी के साथ बैठे हैं, मैं देख पा रहा हूँ। उनकी मौजूदगी में क्योंकर मैं विपक्षियों पर दुश्‍चरित्रता का इल्जाम लगा दूँ? जबकि मैं स्वयं कितनी ही लड़कियों को डाँ. पन्त के जच्चा-बच्चा केन्द्र में भेजता रहा हूँ। यहाँ कम से कम दर्जन भर ऐसी लड़कियों को भी मैं देख रहा हूँ जिनसे मेरे ताल्लुकात न सिर्फ शादी से पहले थे, बल्कि अब भी बने हुए हैं। मेरी पत्नी दो-तीन दफे मुझे रंगे हाथों पकड़ चुकी है। इन सबसे नजरें मिला कर कैसे मैं विरोधियों के चरित्र पर कीचड़ उछालूँ? एक ने भी व्यंग्य से मुस्कुराकर मेरी तरफ देख लिया तो आप समझते हैं कि मारे घबराहट के मेरा पेशाब नहीं निकल जायेगा।

लोग मन ही मन हँसेंगे नहीं मेरी बातों पर? मुझे दोगला कहेंगे, गालियां देंगे। सुरक्षा हटा दी जाय तो लोग मुझे जुतियाने से भी बाज नहीं आयेंगे।

मैं यह सब नहीं कर सकता। नहीं…नहीं कैसे झूठ बोलूँ? कथनी और करनी में इतना बड़ा विरोधाभास… ना, मुझसे नहीं हो पाएगा सर। यह तो सरासर पाप है। ऐसा करके मुझे रातों को नींद नहीं आयेगी। मैं पागल हो जाऊँगा।

मैं अगर जीत भी गया तो शर्म से सर नहीं उठा पाऊँगा। खुद को गुनहगार महसूस करूँगा। मेरी आत्मा कलपती रहेगी। मुझे ऐसा पद नहीं चाहिये सर, जो झूठ बोलकर और दूसरों की चारित्रिक हत्या करके मिलता हो। झूठ किसके खिलाफ और हत्या भी किनकी! अपने ही लोगों की जिनके साथ मेरे संबंध बडे़ ही दोस्ताना हैं। जिन्होंने मेरे साथ सदा ही नेकी की, मुझे गले लगाया, मेरी छोटी-मोटी गलतियों को नजरअंदाज किया। यह सभी मेरे भाई-बन्द हैं। सभी के साथ मैं किसी न किसी रिश्ते की डोर से बंधा हूँ। इनसे झूठ बोलने, गाली देने और इन्हें बेवकूफ बनाने की मैं सोच भी कैसे सकता हूँ। नहीं सर, माफ कीजिये, मुझसे यह सब नहीं हो पायेगा। मैं चुनाव नहीं लड़ना चाहता। आप कोई दूसरा उम्मीदवार खड़ा कर लीजिये या किसी को सशर्त समर्थन दे दीजिये़। भाड़ में गया पद और ऐश्वर्य। मुझे नहीं चाहिये। मैं मूंगफली बेच लूंगा।

देखिये सर, मारे घबराहट के मेरे माथे पर पसीना आ गया है, टांगें काँप रही हैं। मेरे लिये खड़े रह पाना मुश्किल हो रहा है। मेरी जबान नशे में धुत्त शराबी की तरह लडखड़ा रही है। हाथों में माइक फिसला जा रहा है। पार्टी मैनीफेस्टो की प्रतियाँ मुझे बोझ लग रही हैं। सर, माफ कीजिये मैं अब और खड़ा नहीं रह सकता। मैं बैठूंगा… पानी… और यह कह कर अर्जुन सिंह वहीं धम से सर थाम कर बैठ गया। माइक और मैनीकैस्टो की प्रतियाँ उसके हाथों से निकल कर आलाकमान के कदमों में बिखर गयीं।

ठा.  अर्जुन सिंह को यूँ व्यवहार करता देख आलाकमान कई पल उसे हैरान-परेशान से देखते रहे। उसका रवैय्या उनकी समझ में नहीं आया। गुस्सा भी उस पर बड़ा आया। बल्कि उनका तो जी चाहा कि कस कर दो ठोकरें अर्जुन सिंह की पसलियों में जमायें और जीप से उतर कर चलते बनें। पर क्या करते, मजबूर थे। सीट निकालनी थी, चुनाव थे। ऐसा कुछ भी नहीं कर सकते थे। तैश में आकर सार्वजनिक रूप से ऐसा कर पाना संभव नहीं था। खासतौर पर चुनाव के समय जबकि बकौल कहावत, बड़े-बड़े तुर्रमखां गधे को बाप कहते संकोच नहीं करते, विनम्रता में पानी से पतले हुए जाते हैं और नमस्कार कहने में इतना झुकते हैं कि ख्वामखां धोखा हो जाता है, कि नेताजी एक अच्छे जिमनास्ट भी हैं।

आलाकमान ने गंभीरता से सोचा सारी स्थिति पर। फिर अर्जुन सिंह को राहे रास्ते पर लाने की गरज से यूँ बोले- अर्जुन सिंह, मेरे प्यारे! मुझे देखो, मैं उम्र में तुमसे कितना बड़ा हूँ, कितना अनुभवी हूँ। मेरे बाल यूँ ही धूप मे सफेद नहीं हुए हैं। तुम मेरे बेटे की तरह हो, तुमसे जो भी कुछ कहूँगा, उसमें तुम्हारा ही हित निहित होगा। ऐसा विश्वास जानो। इसलिये कहता हूँ कि उठो और इस चुनावी समर में अपना रोल प्ले करो।

इस तरह का भावुकता एवं अव्यवहारिकता पूर्ण व्यवहार तुम्हें शोभा नहीं देता। क्यों अपनी जग हंसायी करवाते हो। देख बेटा, तू जिनके वास्ते इतना कलप रहा है, शर्म और संकोच से मरा जा रहा, वे लोग सच पूछ तो इस लायक हैं ही नहीं। जो पहले से ही दुखी हैं बल्कि दुख और अभाव झेलने के लिये ही मृत्युलोक में आये हैं, यही सब उनका भाग्य है, तू क्यों उनके लिये दुखी होता है। दुख मत कर, इसे नशीली वस्तु की भांति त्याज्य जान। क्योंकि यह संक्रामक होता है। एक समय बाद दूसरों के दुख में दुखी होने वाले को अजीब-सा सुख मिलने लगता है। अपने धावों से पपड़ियां उखाड़ने का-सा सुख। और लोग ऐसे व्यक्ति को झाड़ में चढ़ा देते हैं कि दुखियों, अभावग्रस्तों की आवाज है, गरीबों का मसीहा है। वगैरा वगैरा। जबानी जमाखर्च के तमगे खूब मिलते हैं, पर पेट नहीं भरता।

तू ऐसों के लि‍ये क्यों दुख करता है! तेरी यह सोच मेरी समझ से परे है। एक राजनीजिज्ञ होकर भी तेरे खून में यह कवियों की-सी संवेदना कहाँ से घुस आयी? यह मेरे पॉलिटिकल कैरियर का सबसे अनोखा केस है। तेरी बातों ने मेरी खोपड़ी चकरा दी है। तेरा सोचना और यूं व्यवहार करना भदेस है, अशोभनीय है क्योंकि तू एक राजनीतिज्ञ है, बेटा।

तुम ऐसा क्यों समझते हो अर्जुन सिंह कि तुम ही पहली बार यह सब कर रहे हो! यह तो होता आया हैं। तुम से पहले भी, तुम्हारे समय में भी और जबकि तुम-हम नहीं रहेंगे मौजूद इस जहानेफानी में, रहेगा तब भी जारी यह तौर, यह तरीका। यह तर्जेसियासत क्योंकि चली आ रही है आदि काल से, इसलिये तुम क्यों नहीं समझते इस छोटी-सी बात को कि तुम मात्र परंपरा का ही निर्वाह कर रहे हो। परंपराओं से मुंह मोड़ना पाप है, न कि‍ उन पर चलते रहना। परंपराएँ हमने नहीं बनायीं। पाप अगर लगता भी है तो बनाने वालों को लगेगा।

पब्लिक के वास्ते इतना और इस नुक्‍ते से क्यों सोचना? देखो, इनके नौनिहाल मिट्टी में लोटते हैं, दु:ख-बीमारी में दवा नहीं पाते, यह जनता कीचड़-सा पानी पीती है। दिसम्बर-जनवरी में फुटपाथों पर सोती है। भर पेट भोजन इनके लिये एक अय्याशी है। फिर भी इन्हें न पीलिया होता है, न हैजा। जाडे़ में ये लोग जमते नहीं और गर्मी भी इन्हें गला नहीं पाती। हर साल बाढ़ और सूखे से भी मिटती नहीं है इनकी हस्ती। बड़ी सख्त जान है यह पब्लिक प्यारे। बिना शिकायत के जिये चली जाती है और इलेक्शन के वक्त वादों के एवज बच्चों की तरह खुश होकर वोट देने को मचल उठती है, जानती है कि कुछ नहीं बदलेगा। उसे यूँ ही घुट-घुट कर जीना है और फिर एक दिन बेगोरो-कफन मर जाना है। मगर फिर भी़… तो क्यों तुम इनके वास्ते शोकाकुल होते हो, क्यों स्वयं अपने दुख का कारण बनते हो?

चुनाव जीतने के लाभ बाद में कहूँगा, पहले बिना कुछ किये चुनाव हार जाने के फायदों का श्रवण करो। खुदा-न-ख्वास्ता तुम चुनाव हार गये तो भी हर प्रकार से फायदे में ही रहोगे। दस लोग तुम्हें पहचानने लगेंगे। अफसर तुम्हें खड़े-खडे यूँ ही आम जनता की तरह नहीं टरका देंगे। कुर्सी पेश करेंगे, चाय मंगवायेंगे और तुम्हारे काम बआसानी हो जाया करेंगे। सत्ता पक्ष के बराबर तो नहीं, पर फिर भी काफी ठेके आदि तुम्हें मिल ही जायेंगे वगैरा-वगैरा।

और अगर जीत गये तो कहने ही क्या! उसका तो आनन्द ही अलग है, ब्रह्मानंद सहोदर हैं। उसका स्वाद तुमने अभी चखा ही कहाँ। तुम्हें पद, सम्मान, कीर्ति और ऐश्वर्य की प्राप्ति होगी। दुनिया से विदा होओगे जब तुम्हारा सीना खाली होगा ख्वाहिशों से। सोचो, कितनी बड़ी बात है। वर्ना ज्यादातर लोग हजारों अधूरी तमन्नायें लिये-लिये मर जाते हैं। इसलिये उठो और सभा के समक्ष विशेषतौर से तैयार भाषण थोड़ा और नमक-मिर्च लगाकर पढ़ो। यकीन जानो तुम कतई पाप के भागीदार नहीं होओगे।

मोहल्लेवालों, रिश्तेदारो और यार-दोस्तों का लिहाज मत करो। शर्म और संकोच का त्याग करो। यह जो तात्कालिक तौर पर (पता नहीं क्यों) तुम्हारे भीतर एक किस्म का वैराग्य-सा उत्पन्न हो गया है, इसे तर्क की कसौटी पर परखो। भावुकता में मत बहो। जिस प्रकार बलात्कार की शिकार महिला से भरी अदालत में वकील बहस की आड़ में बलात्कार करता है, उसी तरह निर्दयतापूर्वक अपने आप से तर्क करो। तुम देखोगे कि तुम्हारी बातें कितनी हास्यास्पद हैं।

सोचो कि जब तुम जीत जाओंगे तो तुम्हारे क्या ठाठ होंगे। दुनिया की हर अय्याशी तुम्हारे कदमों में होगी। याद करो जब तुम राजधानी आये थे और मेरे सरकारी अवास में ठहरे थे, मैंने अपनी व्यस्तताओं के बावजूद तुम्हारे कैसे ऐश करवाये थे। अपने किये की तारीफ करना ठीक नहीं। तुम्हे याद तो होगा। उस मात्र पन्द्रह दिनों के वक्त को याद करो और हिसाब लगाओ कि पाँच साल में कितने पखवाड़े होते हैं! चुनाव के समय जो थोड़ी-बहुत मेहनत करनी पड़ती है उसे मत देखो, उसके फलों पर नजर रखो, क्योंकि तुम एक मेहनतकश वर्ग के नहीं, बल्कि उस वर्ग द्वारा किये गये श्रम से उत्पन्न मलाई चाट जाने वाले वर्ग के प्रतिनिधि हो। इसलिये सिर्फ मलाई पर गिद्ध दृष्टि जमाये रखो। मेहनत करना दूर उसके बारे में सोचो भी मत। मात्र फलों के बारे में सोचो। इससे तुम्हें सभा को संबोधित करने की प्रेरणा मिलेगी।

फिर एक समय ऐसा भी आयेगा तुम्हारे कैरियर में कि जब यह नाम मात्र की मेहनत भी तुम्हें नहीं करनी पडे़गी। तुम निर्विवाद चुन लिये जाओगे। धनबल और बाहुबल के योग से या ऐसे पदों पर बिठा दिये जाओगे जिन्हें जनता नहीं चुनती। तब तुम कर्म बंधन सहित बाकी सभी किस्म के बंधनों से मुक्त हो जाओगे। इसी को ज्ञानियों ने परमपद की अवस्था कहा है।

इस अवस्था तक पहुँचने के लिये आवश्यक है कि तुम्हें पब्लिक का हानि-लाभ, जीवन-मरण, भूख-कुपोषण, लाचारी-बेकारी तथा शोषण आदि कुछ भी न व्यापता हो। यह एक उच्च स्थिति है जो कडे़ और निरंतर अभ्यास से कठिन होने के बावजूद संभव है। क्यों नहीं तुम अभी से यह एक्सरसाइज शुरू कर देते।

और तुमने अभी भाषण न देने के जो कारण कहे, वह कोई कारण नहीं, कोई मुद्दा नहीं। तुम्हें हो क्या गया अर्जुन सिंह मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा। मसलन तुम जिक्र कर रहे थे डॉ. पंत के प्रसूति गृह का तो मेरे भोले भाई, जरा मुझे यह तो समझा दो कि आज के जमाने में लोग जच्चा-बच्चा केन्द्र खोलते क्यों हैं? तुम्हें क्या लगता है कि वहाँ डॉक्टरों के रूप में फरिश्ते बसते हैं! जिन्हें प्राणी मात्र की सेवा और जीवन बचाने की शपथ दिलवायी जाती है, तुम क्या सोचते हो कि मात्र सामान्य जच्चगी करवा के डॉक्टर साहबन और उनका स्टाफ रोटी खा लेगा। अवैध गर्भपात नहीं होंगे और सामान्य जच्चगी को अगर सिजेरियन केस नहीं बनाया जायेगा तो कैसे चलेगा भैया। ऐसा अगर न करें तो पढ़ाई में जो पैसा लगा वही वसूल नहीं कर पायेंगे अपने पूरे कैरियर में। क्या फायदा! छोड़ो प्राइवेट क्लीनिकों की बात, सरकारी अस्पतालों में तक यहीं सच होता है। तुम्हें पता होना चाहिये, एक बच्ची के बाप हो। कोई जरूरत नहीं किसी डॉक्टर से शर्माने की, क्योंकि तुम उन्हें केस न दो तो उनका क्लीनिक कितने दिन चल पायेगा।

विवाहेतर संबंधों की तुमने अच्छी कही। तुम्हारी इस बात पर हसूँ कि रोऊँ ?  ऐसी बातों पर सोच कर अगर वक्त जाया करोगे तो कर ली तुमने राजनीति।

देखो, प्राचीन पुस्तकों में ज्यादातर बातें परस्पर विरोधाभासी हैं। मसलन भाई लोग औरत को सौ बेटों की माँ होने का आशीर्वाद देते हैं और पुरुष से कहते हैं कि बेटा, तू जाकर इन्द्रिय निग्रह कर, जितेन्द्रिय बन! भैया मेरे, यह किस लोक की बायलॉजी पढ़ा रहे हो? अरे यार कार्य कारण के नियम का तो कुछ ख्याल करो!  लेकिन पुरुष इस चक्कर में न तब फँसा, न आज आता है। देवताओं तक ने यह बात नहीं मानी। हाँ, पुरुष ने स्त्री पर उल्टा जरूर लागू कर दिया इसे। और अच्छा हुआ कि औरत ने इसे मान लिया और फिर धीरे-धीरे यह उसका स्वभाव बन गया। वर्ना सोचो तुम्हारी बीवी तुम्हें रंगे हाथों पकड़ चुकी है, फिर भी उसने बदला लेने के लिये वही सब नहीं किया जो तुम कर रहे थे या तुम्हारे मुँह पर थूक कर चली नहीं गयी… तुम गधे हो अर्जुन सिंह। ऐसी बातों का जिक्र किया जाता है कहीं। मैंने सुनाये तुम्हें कभी ऐसे किस्से! एक बात गाँठ बाँध लो, कत्ल के बाद लाश के पहलू में खंजर भूल कर भी मत भूल आना। वर्ना पश्चिम के एक राष्ट्राध्यक्ष की तरह न सिर्फ भारी बदनामी होगी, बल्कि मोटी रकम भी हाथ से जायेगी। जो पकड़ा गया उसी को चोर कहकर दौड़ाने की परंपरा अति प्राचीन है। अनदेखा चोर पितरों की श्रेणी में आता है।

अपनी पहुँच और प्रभाव का इस्तेमाल व्यक्‍ति‍गत हितों के लिये करने में भला गलत क्या है, सुनूँ तो जरा। तुम्हारी पत्नी तुम्हारे प्रभाव के चलते नौकरी पा गई तो इसमें सर पीटने की क्या बात है! राजधानी तक जिसकी पहुँच है, ऐसा व्यक्ति नौकरी अपनी बीवी को नहीं तो क्या मोहल्ले की गरीब विधवा को दिलवायेगा? बर्तन कौन मलेगा तुम्हारे घर मैं? घर फूँक तमाशा देखने वालों के लिये राजनीति नहीं है। ऐसे लोगों को मेरा मशवरा है कि जाकर चीटियों को बूरा खिलायें या मछलियों को चारा चुगायें।

स्वस्थ होने के बाद मरीज डॉक्टर के पास क्यों जायेगा रे! राजनीति में अगर ऊँचे जाना है तो पब्लिक को घोड़ा समझो और खुद को सवार। यह एक अत्यंत सरल किंतु गोपनीय विधि है, एकाग्र हो कर सुनो। एक लंबा बाँस लेकर उसके अगले सिरे पर आश्वासन रूपी घास बाँध लो। अब घोड़े पर सवार होकर घास को भूखे घोड़े की नाक के दो फुट आगे लहराओ। घोड़ा घास की और लपकेगा। डंडा तुम्हारे हाथ में है, घास की दूरी घोड़े को मुँह से दो फुट बनाये रखो। घोड़ा घास की उम्मीद में दौड़ा चला जायेगा़। घास लगे न भूसा, मुफ्त की सवारी। खड़ी चढ़ाई में भी गाड़ी न्यूट्रल में चढ़ जाती है इस विधि से!

नियम, कानून, व्यवस्था के लिये तुम क्यों मरे जा रहे हो। तुम्हारा कहीं काम अटका पड़ा है या कोई दिक्कत है तो बताओ! अरे अर्जुन सिंह, अनाड़ी की बंदूक! गोली बंदूक की नाल से निकलती है, बट से नहीं। कानून बनाने वाले वर्ग के प्रतिनिधि होकर तुम उससे डरते हो! अपने आपमें एक लतीफा हो तुम भी। कानून शासितों की चमड़ी से बनाया जाता है और उन्हीं पर फटकारा जाता है। ताकि पब्लिक हद में रहे, क्यू न तोडे़… अब तुम ही कहो कि जो कोड़ा हाथ में लेकर कोडे़ से डरे वह बेवकूफों का सरदार हुआ कि नहीं?

इतिहास की किस किताब में लिखा है कि कानून बनाने वालों पर उन्हीं का बनाया लागू हुआ? भूख से बेहाल होकर रोटी का टुकड़ा चुराने वाले को पुलिस भले ही पोटा के तहत उल्टा लटका दें पर करोड़ों डकार जाने वाले राजनेता का पुलिस क्या कर लेगी? मीडिया में मौजूद कुछ सिरफिरों ने अगर ज्यादा ही हल्ला मचाया, मामला तूल पकड़ गया तो भी क्या होना है! ज्यादा से ज्यादा यही होगा कि बंगले पर जाकर प्रतीकात्मक गिरफ्तारी के बाद वहीं पर जमानत दे दी जायेगी। केस की सुनवायी अगर हुई तो इतनी लंबी होगी कि फैसला होने तक नेताजी की तस्वीर में माला टँग चुकी होगी।

अर्जुन सिंह अपलक, मुँह फाड़े और सम्मोहित सा एकटक आलाकमान को देखता रहा।

लाओ पानी की बोतल दो। गला सूख गया तुम्हें समझाते-समझाते। और यूँ बेवकूफ की तरह मुँह खोल कर मत बैठो, देखते नहीं मक्खियाँ कितनी घूम रहीं हैं यहाँ। क्या कुछ और पूछना चाहते हो? आलाकमान ने रुक कर पानी पिया।

नहीं-नहीं है श्‍वेत वस्त्रधारी। पूछने को अब बाकी ही क्या रहा! मैं जानता हूँ कि आप अनंत काल तक बोलते रह सकते हैं। परन्तु मैं सब समझ गया, क्योंकि एकदम ही जड़ बुद्धि तो मैं भी नहीं हूँ। आपने जिस तरह मुझे ब्रीफ किया उससे मुझे बिजली का नंगा तार छू जाने की सी अनुभूति हो रही है। समझ नहीं पा रहा हूँ कि अपने जजबात हँस के व्यक्‍त करूं कि रो कर! मेरी सारी इंद्रियाँ चैतन्य हो उठी हैं।

मैं तो आपको एक राजनीतिज्ञ ही समझता था, आप तो सर्वज्ञ हैं। जिस तरह आपने मेरी शंका का समाधान किया वह अद्भुत है। कोई दूसरा तत्वज्ञानी इन विषयों पर बोलना शुरू करता तो अठारह-उन्नीस दिन से पहले क्या ही चुप होता। आपने अठारह मिनट बमुश्किल लिये! मेरे ज्ञान की फ्लॉपी छलछला उठी है। एक भी शब्द अगर आप और बोले तो मेरे दिलो-दिमाग से सब कुछ डिलीट हो जायेगा। मेरा नाम तक मुझे याद नहीं रह जायेगा। नहीं सर, मुझे कह लेने दीजिये कि मैं संपूर्ण जगत ही आप में समाया हुआ महसूस कर रहा है। आप मार्शल आर्ट में ब्रूस ली है, पोल वॉल्ट में सर्गेई बुबका,  हॉकी में ध्यानचंद, फुटबॉल में पेले, क्रिकेट में ब्रेडमैऩ… लोकगायकों में तीजन बाई और शास्त्रीय गायकों में कुमार गंधर्व भी आप ही हैं।

राजनीति में अपनी मिसाल आप हैं… उफ! अर्जुन सिंह को शब्द कम पड़ गये और उसने आला कमान के पैर पकड़ लिये।

चलो अच्छा हुआ। तुम्हारा अज्ञानताजनित मोह दूर हो गया। अब तुम विदाउट एनी हैजिटेशन न सिर्फ सभा को संबोधित करोगे, बल्कि इलैक्शन जीत कर भी दिखाओगे।

आलाकमान मोबाइल पर कॉल गर्ल रैकेट चलाने वाले एक आला अफसर को एस.एम.एस. करते हुए प्रसन्नतापूर्वक बोले, चलो, अब मंच पर चलें। भीड़ को बिठाये रखने के चक्कर में तुम्हारा छुटभय्या उल्टा-सीधा बकने लगा है।

(‘माफ करना हे पि‍ता’ से साभार)

पुस्‍तक – माफ करना हे पि‍ता

प्रकाशक- नैनीताल मुद्रण एवं प्रकाशन सहकारी समि‍ति‍

तुलसी भवन, कैन्‍ट रोड, तल्‍लीताल, नैनीताल-263002

मूल्‍य – रुपये 175 (पेपरबैक), रुपये 350 (सजि‍ल्‍द)

दिल और दिमाग़ की जंग : बीनू भटनागर

Binu Bhatnagar

चर्चित लेखि‍का बीनू भटनागर का व्‍यंग्‍य-  

‘जब दिल ही टूट गया, हम जी कर क्या करेंगे ’ पुराना गाना है, पर शायद सबने सुना हो। दिल टूटने के बाद जी   ही नहीं सकते, जब आपके पास ऐसा कोई विकल्प है ही नहीं, तो ये क्या कहना कि जी कर क्या करेंगे!

शायरों को थोड़ा सा जीव-विज्ञान का ज्ञान होता तो बहुत से बेतुके गीत न बनते जैसे ‘दिल के टुकड़े हज़ार हुए इक यहाँ  गिरा इक वहाँ गिरा ’,   दिल न हुआ काँच का गिलास हो  गया, दिल में तो एक मामूली सा छेद हो जाए तो बड़ा सा  आपरेशन करवाना पड़ता है।

शायर और कवि तो दिल से ऐसे खेलते हैं, मानो दिल ना हो कोई खिलौना हो, ‘खिलौना जानकर तुम दिल ये मेरा तोड़े जाते हो’ जैसा गीत ही लिख डालते हैं।

गीत हों या संवाद, फिल्म हो या टी.वी. धारावाहिक,  उपन्यास हो या कहानी, नया हो या पुराना, दिल से ऐसे-ऐसे काम करवाये जाते हैं जो हो ही नहीं सकते। गुर्दे की चोरी हो सकती है, क्योंकि वो दो होते हैं, एक चोरी हो जाए दूसरा पूरा काम संभाल लेता है, पर दिल निकालने से तो आदमी तुरन्त मर जायेगा। फिर भी हमारे बुद्धिजीवी  कवि प्यार मे दिल चुराने की बात करते थकते नहीं, ‘चुरा लिया है तुमने जो दिल को नज़र नहीं चुराना सनम’ दिल चोरी होने के बाद नज़र यानी आँख चुराने के लिये कोई ज़िन्दा बचेगा क्या ? ये तो सीधे-सीधे क़त्ल का मामला हो जयेगा !

एक और गाना याद आया ‘दिल विल प्यार व्यार मैं क्या जानू रे’ सही कहा दिल के बारे मे कवि महोदय ने, दिल तो सिर्फ  ख़ून को पूरे शरीर मे पम्प करके भेजता है प्यार व्यार जैसे काम तो दिमाग़ कुछ हारमोन्स के साथ मिलकर  करता है, और  कवि ठीकरा उस बेचारे मुठ्ठी भर नाप के दिल के सर फोड़ते हैं।

‘ ऐ मेरे दिले नादान तू ग़म से न घबराना’,  अजी  साहब!  नादान तो कवि हैं, दिल को तो घबराना आता ही नहीं, ये काम भी दिमाग़ का ही है। घबराने के लिये दिमाग़ को कुछ ज़्यादा ही रक्त की आवश्यकता पड़ती है, इसलिये दिल को तेज़ी से धड़कना पड़ता है। वह तो बस दिमाग़ को घबराहट के लिये तेज़ी से ख़ून भेजता है और कवि समझने लगते हैं कि‍ दिल ही घबरा रहा है।

कभी कोई अंतर्द्वन्द हो तो लेखक दिल और दिमाग़ को आमने-सामने लाकर खड़ा करने से भी नहीं चूकते।  फिल्मों में, टी.वी. धारावाहिकों में एक ही किरदार आमने-सामने खड़ा होकर बहस करता है। एक भावुक सा लगता  है जो दिल से सोचता हुआ बताया जाता है और दूसरा थोड़ा तर्क करता है, व्यावहारिक सा होता है, वह दिमाग़ से सोचता है, जबकि भावनायें और तर्क दोनों ही दिमाग़ से ही उपजती हैं, दिल बेचारे को तो सोचना आता ही नहीं है।

जब कोई दुविधा होती है, किसी पात्र को तो दूसरा कोई पात्र आकर उसे दिल-दिमाग़ पर एक भाषण दे डालता है कि ‘भैया, दिल से सोच दिमाग़ की मत सुन, दिल से लिया गया निर्णय ही हमेशा सही होता है।’ अब लेखक दिल और दिमाग़ में ही जंग शुरू करवा देते हैं कि दिल का ओहदा बड़ा है या दिमाग़ का। यह जंग एकदम बेमानी है । दिल का काम दिमाग़ नहीं कर सकता और दिमाग़ का काम दिल नहीं कर सकता।  इनसान दोनों के बिना जी ही नहीं सकता।  दिमाग़ देखा जाए तो सोच पर ही नहीं शरीर पर भी नियंत्रण रखता है, पर यदि कुछ सैकिंड भी दिल दिमाग को ख़ून न भेजे तो दिमाग़ को निष्क्रिय होते देर नहीं लगेगी। मेरे प्रिय लेखक भाई-बहनो ! दिल और दिमाग़ की  लड़ाई मत करवाइये। दोनों को अपना-अपना काम करने दीजिये। दिल या दिमाग़ की लड़ाई में सिर्फ डाक्टरों का ही फायदा होगा।

दिल और दिमाग़ के बीच सभी भाषाओं मे भ्रांतियाँ हैं। हिन्दी मे  ‘हार्दिक प्रेम’,’ हार्दिक आशीर्वाद’ जैसे वाक्याँश  हमेशा से प्रयोग हुए हैं। उर्दू मे ‘दिली ख्वाहिश’ और ‘दिल से मुबारकबाद’ कहने का रिवाज है। इंगलिश मे भी ‘hearty congratulations’ कहा जाता है। जबकि प्यार, बधाई और  ख़्वाहिश सब दिमाग़ से जुड़ी हैं, दिल से नहीं। मेरे विचार से देश की अन्य भाषाओं और विदशों की भाषाओं मे भी ऐसे वाक्याशों का प्रयोग होता ही रहा होगा। अब इस  विषय में तो भाषा वैज्ञानिकों को शोध करने की ज़रूरत है। जीव विज्ञान मे तो इस विषय मे कोई भ्रांति है ही नहीं।  अतः मेरा मानना है कि अब इन वाक्याशों की जगह दिमाग़ या मस्तिष्क से जुड़े वाक्याँश तलाशने की ज़रूरत है।

‘दिमाग़ी आशीर्वाद’ या ‘मस्तिष्कीय प्यार’ भी जमा नहीं। मानसिक शब्द लोगों को मानसिक बिमारियों या मनोविकार   की याद दिलाता है। अतः वह भी प्रयोग नहीं कर सकते। एक चीज़ होती है ‘मन’ जो मस्तिष्क में ही कहीं छुपा बैठा  होता है। उससे कोई वाक्याँश सोचते हैं – ‘मन से आशीर्वाद’, ‘मन से प्यार’ कैसा रहेगा ? मुझे तो ठीक लग रहा है। बस, थोड़ी आदत डालने की बात है!

मैंने अपने कवि और लेखक भाई-बहनों से दिल और दिमाग़ या हृदय और मस्तिष्क या heart और brain  (मुझे और कोई भाषा नहीं आती है) के बारे मे काफ़ी चर्चा कर ली है। आशा है कि अब कोई भ्रम किसी को नहीं होगा, फिर भी यदि कोई शंका हो तो हमारे टोल-फ्री नम्‍बर पर संपर्क करें। यह हेल्पलाइन 24 घंटे सातों दिन उपलब्ध है। आप चाहें तो हमारी  वेबसाइट दि‍लदि‍माग डॉट कॉम पर लॉगइन कर सकते हैं। हम इस विषय पर देश-विदेश के जीव वैज्ञानिकों और साहित्यकारों के साथ   एक संगोष्ठी के आयोजन पर भी विचार कर रहे हैं। आप अपने विचार प्रतिक्रिया के बॉक्स मे लिख देंगे तो हमें इस आयोजन को करने मे सुविधा होगी। यह विश्‍वस्तरीय आयोजन करने मे कुछ समय तो लगेगा। इसलि‍ए इसकी संभावित तारीख़ 1 अप्रैल, 2013 सोची हुई है। सभी से सहयोग की अपेक्षा रहेगी।

बी.ए. आनर्स इन बाबागिरी /मातागिरी : बीनू भटनागर

Binu Bhatnagar

आजकल बाबाओं और गुरुमाताओं का बोल-बाला है। धन-सम्‍पदा के साथ अंधभक्‍त। ऐेसे में बाबाओं और गुरुमाता बनने की शि‍क्षा देने के लि‍ए कोर्स शुरू करने पर बल दे रही हैं बीनू भटनागर-  

शिक्षा का सबसे बड़ा उद्देश्य व्यक्ति को किसी रोज़गार के लिए तैयार करना होता है। पहले विज्ञान, वाणिज्य, कला, इंजीनियरिंग,  चिकित्सा और वकालत के अलावा स्नातक स्तर पर अधिक विषय नहीं पढ़ाये जाते थे। समय के साथ  पत्रकारिता, फैशन, अभिनय जैसे क्षेत्र में हर स्तर के 4-6 महीने से लेकर तीन साल के डिग्री कोर्स होने लगे। कम्प्यूटर  के आते ही हर गली-नुक्कड़ पर कम्प्यूटर कोर्स की दुकानें खुल गईं।  विश्‍वविद्यालयों में कम्प्यूटर  इंजीनियरिंग, बीसीए और एमसीए काफी लोकप्रिय हुए।

आजकल देश-विदेश में बाबाओं और गुरुमाताओं के लिए रोज़गार के बहुत अवसर हैं। अभी तक ये लोग अपनी योग्यता और बुद्धि के बल पर ही अपना कारोबार चला रहे हैं क्योकि इस विषय में शिक्षा संस्थान कहीं उपलब्‍ध नहीं हैं। शिक्षा के बिना भी यह व्यवसाय ख़ूब फलफूल रहा है। उचित शिक्षा मिलने से इसमें और निखार आएगा। वैसे तो  चोरी, डकैती, धोख़ाधड़ी, लूटपाट, तस्करी और भ्रष्टाचार भी व्यवसाय हैं, पर इन्हें गैर कानूनी माना जाता है इसलिए  इनसे संबंधित कोर्स नहीं खोले जा सकते,  लेकि‍न बाबागिरी /मातागिरि को तो बड़ा आदर-सत्कार मिलता है। अतः ये कोर्स खोलने में कोई दिक्कत नहीं होगी,  बहुतों को लाभ होगा।

इस पाठ्यक्रम में सबसे पहले छात्रों को बाबा या माता के ‘लुक’ के बारे में,  उसके महत्व के बारे में पढ़ाया जाएगा । इस व्यवसाय में ‘लुक’ का महत्व अभिनेताओं से अधिक है। फिल्मी अभिनेता हर फिल्म के लिए एक नहीं, कभी-कभी दो ‘लुक’ में आते हैं। हीरोइन भी एक फिल्म में कई ‘लुक’ दिखा सकती है। टी.वी. धारावाहिक में ‘लीप’ पर  हल्का सा ‘लुक’ बदलने की गुंजाइश होती है, परन्तु बाबा और गुरुमाताओं को आजीवन एक ही ‘लुक’ में रहना पड़ता है जिससे उनके भक्तों  (clients) का ध्यान न भटके।

‘लुक’ के अंतर्गत कई उप विभाग होंगे जैसे- ‘स्टाइलिंग’, ‘हेयर स्टाइलिंग’,   ‘फैशन डिज़ाइनिंग’,   ‘फुटवेयर  (खड़ाऊँ) डिज़ाइन’,  ‘मेकअप आर्टिस्ट, ‘कम्प्यूटर ग्राफिक विशेषज्ञ’ और ‘फोटोग्राफर’। इन विभागों में छात्रों से ज़्यादा फैकल्टी को काम करना पड़ेगा। छात्रों को सिर्फ  स्टाइलिस्ट द्वारा चलने,   उठने-बैठने के तरीके, उपयुक्त वेशभूषा के साथ सिखाये जाएंगे। फोटोग्राफर विभिन्न ‘लुक्स’ में समय-समय पर इनके चित्र लेते रहेंगे जिन्हें ग्राफिक डिज़ाइनर अपने तरीकों से उलट-पलट कर, सजाकर अच्छे से अच्छा ‘लुक’ देंगे।  सभी छात्रों के लिए कम से कम 100 ‘लुक’ तैयार करने ज़रूरी  होंगे,  जिनका एक पोर्टफोलियो बनेगा।

‘लुक’ के बाद इनको भाषा विभाग से भी दूसरे सैमेस्टर में गुज़रना होगा। भाषा विभाग से गुज़रने के बाद इनके   ओडियो और विडियो बनेंगे। भाषा विभाग मे इन्हे कहाँ से काम की शुरुआत करनी है, उस भाषा का एक मुख्य पेपर पास करना होगा। हिन्दी -इंगलिश बोलने का तरीका भी सिखाया जाएगा जो भले ही सही न हो पर लोगों को आकर्षित करे, शाँत भाव से बोलते-बोलते कहीं कोई चुटकी ले लेना, कभी कोई शेर जड़ देना आदि। अच्छा वक्ता बनना ज़रूरी है, बात में क्या  कुछ तथ्य है ये भक्त ख़ुद ढूँढ लेंगे। थोड़ी बहुत गीता पढ़ा  दी जाएगी। रामायण की कहानी या कबीर, रहीम, रैदास के दोहे चुनकर, कम से कम पाँच प्रवचन तैयार करने होंगे। इनके अलग-अलग ‘लुक’ में छात्रों के ओडियो-विडियो बनेंगे। ये पहले साल का कोर्स होगा। इसी बीच चुने हुए ओडियो-विडियो धार्मिक चैनलों पर भेजने का भी प्रावधान फैकल्टी करेगा।

पहले वर्ष की परीक्षा को पास करके तीसरे सैमेस्टर में इन्हें मनोवैज्ञानिक तथ्यों को बिना समझाये उनका इस्तेमाल  अपने फ़ायदे के लिए करना सिखाया जाएगा।  सामाजिक मनोविज्ञान से भीड़ का मनोविज्ञान, भीड़ में अफ़वाहें  कैसे फैलती हैं,  इन्हें अपने पक्ष में कैसे कर सकते हैं, सिखाया जाएगा। एक पेपर ‘ब्रेनवाश’ का होगा जिसमें भक्तों (clients) के दिमाग़ की ऐसी धुलाई करना सिखाया जाएगा कि भावी बाबा या गुरु माँ पर भक्तों के मन मे कोई शंका न  हो,  भक्तों का विवेक और तर्क  धीरे-धीरे मर जाए, वे पूरी तरह अंधभक्त बनकर बाबा या माता का अनुसरण करें और अपनी जेबे ख़ाली करें। हिप्नोटिज़म की भी शिक्षा दी जाएगी। जो छात्र हिप्नोटिज़म न पढ़ना चाहें उनको जादू सीखना होगा। वही हवा मे हाथ घुमाकर कुछ निकालना वगैरह।

छात्रों को अपना व्यवसाय पूरी ईमानदारी से करने के लिए कारोबारी सदाचार (business ethics ) चौथे सैमेस्टर में पढ़ाया जाएगा। सबसे पहले उन्हें समझाया जाएगा कि वह चाहे जितना कमायें पर आय कर समय पर दें चाहे थोड़ा कम दें।  हर काम कानून के दायरे में रहकर करें। दूसरों के धर्मों या अपने व्यवसाय के अन्य लोगों से रिश्ते न बिगाडे़ं। आतंकवाद न फैलायें।   महिलाओं पर कुदृष्टि न डालें। अपने व्यवसाय की गरिमा बनाये रखें।

तीसरे साल यानि पाँचवा सैमेस्टर छात्रों को किसी वरिष्ठ बाबा या माता के पास प्रशिक्षण के लिये भेजा जाएगा। इन आश्रमों के प्रतिनिधि आकर छात्रों को चुनकर अपने आश्रम (कम्पनी)  में इंटर्न रखेंगे। वहाँ किए कामकाज की  रिपोर्ट तैयार करके फैक्ल्टी को देनी होगी, इस पर एक समूह वार्ता भी होगी।

अंतिम सैमेस्टर में छात्रों को कुछ भक्त ढूँढने का प्रोजेक्ट दिया जाएगा। भक्तों को पहली बार ढूँढ़ने के लिए संस्थान संभावित भक्तों को आर्थिक प्रलोभन देने की आज़ादी देगा। 50 भक्त पैसे देकर और 50 भक्त वाक्चातुर्य के बल पर इकठ्ठे करने होंगे, उनका ब्रेनवाश करना होगा।  इस प्रोजेक्ट के द्वारा छात्रों को अपनी योग्यता सिद्ध करनी होगी। पूरी प्रोजेक्ट रिपोर्ट अंतिम प्लेसमैंट में बहुत काम आएगी।

बड़े-बड़े आश्रमों के प्रतिनिधि प्लेसमैंट के लिए देश-विदेश से बुलाये जाएंगे, जो बहुत आकर्षक पैकेज योग्य छात्रों  को देंगे। सभी छात्र आर्थिक रूप से इतने सशक्त नहीं हो पाएंगे कि फौरन अपना आश्रम खोल लें। कुछ वर्ष का अनुभव लेने के बाद सभी छात्र अपना आश्रम खोल पायें, इस डिग्री का पाठ्यक्रम इसी बात को ध्यान में रखकर बहुत शोध के बाद तैयार किया गया है।

इस रिपोर्ट की एक एक प्रति भारत सरकार और राज्य सरकारों के शिक्षा विभाग तथा यूजीसी को भेजी जा रही है। इस रिपोर्ट को शिक्षा विभाग पता नहीं कहाँ-कहाँ घुमाएगा, कितनी कमेटी पास करेंगी, इसलिये इसकी एक प्रति मीडिया को भी भेज रही हूँ। मीडिया को कम से कम 24 घंटे बहस करने का मसाला मिल जाएगा, वो तो कृतज्ञ हो जाएगा। फिर जब प्राइवेट विश्‍वविद्यालय मीडिया पर यह रिपोर्ट देखेंगे तो इसके फायदे गिनते-गिनते इन संस्थानों के खुलने की होड़ लगते देर नहीं लगेगी।

शौचालय या मंदिर- राग दरबारी की फिर आती याद : सुधीर सुमन

मंदि‍र और शौचालय को लेकर केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश के वक्‍तव्‍य और उस पर मचे बबाल पर युवा लेखक-पत्रकार सुधीर सुमन की व्‍यंग्‍यात्‍मक  टि‍प्‍पणी-

जिस सरकार का एक आदमी लाखों का शौचालय बनाता है, उसका एक मंत्री शौचालय को मंदि‍‍र से पवित्र बताता है। अब मंदि‍‍र जरूरी है या शौचालय, यह तो हाजत के वक्त ही पता चलता है। इस पर बीजेपी ने बयानबाजी शुरू कर दी है। बीजेपी मंदिर को पवित्र बताएगी और जयराम रमेश शौचालय बनाने के दावे करके जनता के उद्धारक साबित करेंगे खुद को। लेकिन सच तो यह है कि शौचालय और मंदिर दोनों की बात करने वालों का असली धंधा कुछ और है। ये दोनों पार्टियां महंगाई बढ़ाने के लिए जिम्मेवार हैं। दोनों को अनाज के उत्पादन करने वाले मजदूर किसानों की कोई चिंता नहीं है। और न ही समाज और अर्थव्यवस्था को बुनियादी तौर पर बदलने में कोई दिलचस्पी है। दोनों ने ग्रामीण समाज की तो उपेक्षा ही की है। जब खेती चौपट हो चुकी है, लोग अपने आजीविका के परम्‍परागत साधनों से वंचित किये जा रहे हैं, भोजन का संकट बढ़ रहा है, तब ये शौचालय और मंदिर के हिमायती बन रहे हैं।

जयराम रमेश देश के दो लाख 40 हजार ग्राम पंचायतों को दस साल के भीतर स्वच्छ बनाने के लिए निर्मल भारत अभियान चलवा रहे हैं। विडम्बना देखिए कि कुपोषण से प्रभावित देश के 200 जिलों में इस अभियान को विशेष रूप से केन्द्रित किया जायेगा। कुपोषण और शौचालय के बीच क्या रिश्ता है, कोई आमिर खान बताएगा क्या?

आज मुझे अचानक राग दरबारी की याद आ गई। धुंधलके में सड़क के किनारे गठरियों-सी रखी हुईं शौच के लिए कतार बांधकर बैठी हुईं औरतों, घूरे से उठती बदबू और कुत्तों के भौंकने की आवाज की पृष्ठभूमि में ही तो रंगनाथ शिवपालगंज में दाखिल होता है। शौच के लिए बैठी हुईं औरतों पर जो दो पंक्तियां उपन्यास में हैं वे पाठकों को चुभती भी हैं। हर बार इस प्रसंग से गुजरते हुए उपन्यासकार पर गुस्सा आता है कि क्या वह इन औरतों को बख्स नहीं सकता था, पर अक्सर अचानक पलट के जैसे वह सवाल दागता है कि किस पर नाराज हो रहे हो, मुझ पर या इस व्यवस्था पर जो आजादी के बीस वर्षों बाद तक सबके लिए शौचालय तक की व्यवस्था नहीं कर सकी है?

उपन्यास के आखिरी हिस्से में जहां गंदगी का पर्याय बन चुके बस अड्डों पर टिप्पणी है, वहाँ फिर से शौचालय प्रसंग आता है। उपन्यासकार व्यंग्य करता है- ‘‘गाँव सुधार के धुरंधर विद्वान उधर शहर में बैठकर ‘गाँव में शौचालयों की समस्या’ पर गहन विचार कर रहे थे और वास्तव में 1937 से अब तक विचार-ही-विचार कर रहे थे।’’

आज शौचालयों के धंधे में सरकारी-गैरसरकारी स्तर पर करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं, जिनसे कितने नेता, अधिकारी, अभिनेता, बुद्धिजीवी, सरकारी-गैरसरकारी समाजसेवी अपने जीवन की सुविधाएं जुटा रहे हैं, मगर यथार्थ यही है कि इस उपन्यास के प्रकाशित होने के पैंतालीस वर्षों के बाद भी देश के बहुसंख्य गाँवों और कस्बों में शाम में गठरियों की तरह औरतों का सड़क के किनारे शौच के लिए बैठने की नियति खत्म नहीं हुई है। जयराम रमेश ने यह भी कहा कि ‘इतने समय बीत जाने के बाद भी हमारे समाज पर एक बहुत बड़ा कलंक यह है कि आज भी 60 फीसदी महिलाएं खुले में शौच करती हैं। इस पर हरेक भारतवासी को शरम महसूस होना चाहिए। आज भी हम नहीं कह सकते हैं कि हरेक महिला को देश में शौचालय उपलब्ध है।’ जैसे उन्हें अचानक ज्ञान मिला हो, उन्होंने बताया कि ’64 फीसदी भारतीय खुले में शौच करते हैं। अब यह साबित हो चुका है कि खुले में शौच भारत में कुपोषण की बड़ी वजह है।’ यानी शौचालय कुपोषण की बड़ी वजह है, भुखमरी के कारण होने वाली मौतें, जिन पर प्रशासन तंत्र लगातार पर्दा डालता है। वे जरूर मंत्री महोदय की नजर में कोई वजह ही नहीं होंगी। आइए उम्मीद जगाइए, ‘यूपीए सरकार ने ग्रामीण इलाकों में शौचालय के निर्माण पर 45 हजार करोड़ रुपये खर्च किया है और इस मद में आने वाले पाँच सालों में 1.08 लाख करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे।’

क्या इसमें रागदरबारी की ऊपर वर्णित पंक्तियों कि अनुगूँज नहीं सुनाई पड़ रही है। काश! जयराम रमेश की बयानबाजी और करोड़ों रुपयों के खर्चे से शौचालय की ‘पवित्रता’ सबको हासिल हो जाती! और काश शौचालय से कुपोषण दूर हो जाता! काश, औरतों के गठरी की तरह सड़क किनारे बैठने की मजबूरी खत्म हो जाती! क्या किसी नए राग दरबारी से गुजर रहे हैं हम? कहाँ हो रंगनाथ, कहीं तुम दरबार में शामिल तो नहीं हो चुके?

जनवादी सरकार के समाजवादी फैसले : अनुराग

मनमोहन सरकार से पहले इस तरह की समाजवादी और वैज्ञानिक सोच वाली सरकार स्‍वंतत्र भारत के इतिहास में कभी नहीं आई। भविष्‍य के बारे में दावे के साथ कुछ नहीं कह सकता। वैसे हमारे राजनेताओं में जिस तरह की सोच विकसित हो गई है, उससे तो उम्‍मीद है कि आने वाली सरकारें मनमोहना से भी बढ़कर समाजवादी और वैज्ञानिक सोच की होंगी। वह भारत कितना खूबसूरत होगा, जिसमें एक भी गरीब नहीं बचेगा। बस अमीर ही अमीर होंगे।

करीब चालीस साल पहले श्रीमती इंदिरा गांधी ने नारा दिया था- गरीबी हटाओ। उसके बाद जनता पार्टी, कांग्रेस, जनता दल, समाजवादी जनता पार्टी, भारतीय जनता पार्टी आदि कई पार्टियों की सरकारें आईं और गईं, लेकिन कोई भी गरीबी नहीं हटा सका। इसलिए मनमोहन सरकार ने दिल पर पत्‍थर रखकर गरीबों को ही हटाने का निर्णय ले लिया। एक समझदार शल्‍य चिकित्‍सक बीमारी को जड़ से ही खत्‍म करता है। भले ही इसके लिए रोगी को बीमारी से भी गहरा जख्‍म क्‍यों न देना पडे़। निसंदेह इससे रोगी को तात्‍कालिक तकलीफ होती होगी, लेकिन यह उसी के हित में होता है। देश में सभी समस्‍याओं की जड़ गरीब हैं। इन्‍हें रोटी चाहिए, मकान चाहिए, शि‍क्षा चाहि‍ए, दवा चाहिए और भी न जाने क्‍या-क्‍या। इनकी जरूरतें कभी पूरी ही नहीं होतीं। देश अंतरिक्ष में पहुंच गया, इससे इन्‍हें खुशी नहीं मिलेगी। देश में आलीशान मॉल खुल रहे हैं, बडे़-बडे़ हाईवे बन रहे हैं, लेकिन ये बात केवल रोटी की करेंगे। इतना भी नहीं समझते कि रोटी नहीं मिल रही है तो बोटी खा लो और देश के वि‍कास के बढ़ते ग्राफ को देखकर खुश रहो। कुल मिलाकर गरीब देश के विकास और तरक्‍की में धब्‍बा हैं। सरकार कुछ कठोर निर्णय लेकर देश की बीमारियों की जड़ को ही समाप्‍त कर देना चाहती है तो इसमें किसी को ऐतराज नहीं होना चाहिए।

महान वैज्ञानिक डार्विन का सिद्धांत है कि पृथ्‍वी पर अस्तित्‍व बचाने के लिए निरंतर संघर्ष चलता रहता है। इसमें दुर्बल नष्‍ट हो जाते हैं और सक्षम बच जाते हैं। इतिहास गवाह है कई जीवों की प्रजातियां संघर्ष न कर पाने के कारण नष्‍ट हो गईं। गरीब नामक प्रजाति भी संघर्ष न कर पाने या खुद को परिस्थिति के अनुकूल नहीं ढाल पाने के कारण नष्‍ट हो जाती है तो इसमें किसी का क्‍या कसूर।

समय-समय पर पेट्रोल, डीजल के दाम बढ़ने से खाद्य पदार्थों के दाम भी बढ़े हैं। गरीब खाद्य पदार्थ खरीद नहीं पा रहे हैं और जले में नमक यह कि वे जितने चाहे सबसिडी वाले गैस सिलेंडर खरीद सकते हैं। इसलिए सरकार ने ऐसे सिलेंडर की संख्‍या भी सीमित कर दी है। जब खाना खरीदने की ही औकात नहीं है तो सबसिडी पर सिलेंडर देने का क्‍या फायदा। और जो खरीद सकते हैं, उन्‍हें स‍बसिडी की जरूरत नहीं है।

मनुष्‍य में अधिकांश बीमारियों की जड़ मोटापा यानी अधिक खाना है। महंगाई बढ़ने से लोगों का अनाप-शनाप खाना कम हो जाएगा। वे जैसे-तैसे करके जीने लायक ही खा पाएंगे। इससे वे मोटापा का शिकार नहीं होंगे। और उनका स्‍वास्‍थ्‍य भी ठीक रहेगा। इसके बावजूद यदि कोई नासमझ मोटापा बढ़ा ले तो उसे दुरूस्‍त करने के लिए डीजल, पेट्रोल के दाम फिर बढ़ाए जाएंगे। इससे वह अधिक से अधिक पैदल चलेगा और स्‍वस्‍थ रहेगा। फिर भला उससे धनी कौन होगा। कहा भी गया है- हेल्‍थ इज वेल्‍थ।

आओ लंदन घूम आयें : चंद्रशेखर करगेती

पेशे से अधि‍वक्‍ता चंद्रशेखर करगेती का व्‍यंग्‍यात्‍मक आलेख-

9 नवम्बर 2000 को उत्तराखण्ड राज्य बना।अलग राज्य होने पर यहाँ के सभी विभाग व ऑफिसों की स्थापना नये सिरे से हुयी। भले ही आज उत्तराखण्ड उत्तरप्रदेश से अलग होकर एक पर्वतीय राज्य बन चुका है, लेकिन शुरू से लेकर आजतक अधिकांश योजनायें व कार्यप्रणाली उत्तरप्रदेश की तरह हैं । बुरा हाल तो सबसे ज्यादा राजनीतिज्ञों का है। आज अधिकतर वे लोग इस प्रदेश के भाग्यविधाता बने हुए हैं जो इस राज्य की मूलभाषा को ही नहीं जानते, जब राजनेताओं के हाल ये है तो अधिकारियों के तो माशाल्लाह। किसी को कर्नाटक से उठाकर कर लाया गया तो किसी को हैदराबाद से तो किसी को मुम्बई से। कुछ को तो अपना नया घर इतना रास आया कि अपने घर का रास्ता ही भूल गये । उत्तराखण्ड संभवत: देश का पहला ऐसा राज्य होगा जहाँ घर की मुर्गी दाल बराबर है, इस राज्य के मुखिया (राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों) ऐसे हैं जिन्हें यहाँ की बोली तक नहीं आती।

इन बारह सालों के दौरान हमारे प्रदेश में राज्य के बाहर से आयात किये गये उत्कृष्ट अधिकारियों ने मंत्रियों के साथ मिलकर कई स्कीमें ऐसी निकालीं जिन्हें पूरे देश में सराहा गया । इन नीतियों को लागू करने के लिये हमारे प्रदेश के मंत्री व अधिकारीगण बहुत बार विदेश यात्रा के लिये गये । इनमें कुछ यात्रा किसी सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिये हुई हैं, तो बहुत सी यात्राएं विदेश में नयी चीजें समझने, सीखने व स्टडी करने के लिये की गईं । इन यात्राओं का उद्देश्य बाहरी दुनिया से कुछ सीख कर उस तकनीक का उपयोग प्रदेश की बेहतरी के लिये किया जाना था।

हर एक यात्रा में प्रदेश सरकार के लाखों रुपये खर्च होते हैं । हर एक यात्रा की जरूरत का पहले आंकलन किया जाता है कि इसकी आवश्यकता क्यों हैं ? इससे प्रदेश को तत्काल और दूरगामी, क्या लाभ होंगे ? इन यात्राओं में यह भी देखने की आवश्यकता होती है कि जो लोग प्रदेश सरकार की तरफ से जा रहे हैं, उनका ओबजर्वेशन कैसा है, तकनीकी ज्ञान कैसा है और आवश्यक बातों को समझने की और फिर यहाँ वापस आकर प्रदेश के लाभ के लिये उपयोग करने के लिये क्षमता कितनी है ?

प्रदेश हित के लिए शायद यात्रा से पहले उससे होने वाले फायदें की रिपोर्ट व उसकी जरूरत की रिपोर्ट व प्रतिनिधिमण्डल के सदस्यों की सक्षमता की रिपोर्ट बनायी गई होगी । वापसी के बाद उत्तराखण्ड  में कैसे नयी स्कीम लागू की जाये, इसकी रिपोर्ट भी दी गई होगी । शायद उन रिपोर्टों के अनुसार प्रदेश के बहुमुखी विकास के लिए कार्य भी किये होंगे और शायद बहुत विकास भी हो गया होगा !

बस यह दिखाई नही देता, अदृश्य है !

वैसे इस बारे में न तो कोई उच्च पदस्थ पूछता है और न ही कोई बताता है। हो  सकता है प्रदेश को अदृश्य लाभ कराने के लिए उन्हें भी विदेश यात्रा का मौका हाथ लगे ?

आजकल चर्चा है कि राज्य में ओलम्पिक स्तर के खिलाड़ी पैदा करने के लिये फिर राजनेताओं और अधिकारीयों का एक दल एक माह के लिये लंदन ओलम्पिक का टिकट कटवाने वाला है। अब इन अधिकारियों और मंत्रियों ने बचपन में भले ही गिल्ली-डंडा भी न खेला हो, पर इनसे पूछे कौन कि कौन से खेल में महारत हासिल है ? कितने ठो मेडल जीते हो भाई राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय खेलों में ? पर आज समझ में आ रहा है कि खिलाड़ी पैदा करने के लिये खुद का खिलाड़ी नहीं, राजनेता होना जरूरी है क्योंकि भारत भर में उससे बड़ा खिलाड़ी कौन ?

शौचालय का अर्थशास्त्र : दिनेश चन्द्र भट्ट ‘गिरीश’

मोंटेक सिंह आहलूवालि‍या के 35 लाख रुपये खर्च करके दो शौचालय बनाने के कारणों, इसकी आवश्‍यकता और इसके दूरगामी लाभ बता रहे हैं शि‍क्षक और लेखक दिनेश चन्द्र भट्ट ‘गिरीश’-

‘शौचालय’ दो शब्दों के योग से बना है- ‘शौच’ और ‘आलय’। शौच शब्द ‘शुचि’ से बना है जिसका अर्थ है- पवित्र। ऐसा ‘आलय‘ (भवन) जहाँ से व्यक्ति पवित्र होकर निकलता है। जिसका शौचालय जितना बडा़ वह उतना ही अधिक पवित्र- वर्तमान परिपेक्ष्य में यही अभिप्राय ज्यादा समीचीन है। ऐसे शौचालय का प्रयोग न कर पाने वालों को क्या कहा जाय- म्लेच्छ यही न।

शुचिता या पवित्रता के पायदान पर हमारे देश में आज अगर कोई विराजमान हैं तो वे हैं- योजना आयोग के उपाध्यक्ष माननीय मोंटेक सिंह आहलूवालिया । 35 लाख रुपये खर्च करके दो भव्य शौचालय निर्मित करवाने वाले की शुचिता पर कैसे सन्देह किया जा सकता है। समग्र राष्ट्र के हितार्थ आर्थिक नियोजन करने का कार्य कितना मष्तिष्क को थकाने वाला होगा, जिस कारण उन्हें कब्ज की शिकायत रहती होगी। उनके शुभचिन्तकों ने उन्हें भव्य शौचालय निर्मित कराने की सलाह दी होगी। यह ऐसा शौचालय होगा जो संगमरमर से निर्मित, उसकी दीवारें स्वर्णरचित और उसकी सामग्री रत्‍नखचित ही होगी। ऐसा अनुमान मैं लगा रहा हूँ। शुचिता हेतु जब वह बैठते होंगे, मंद-मंद संगीत की सुरलहरियाँ बज उठती होंगी। वहाँ त्रिविध बयारि (शीतल, मंद, सुगन्धि से परिपूर्ण वायु) बहती होगी ताकि वह शुचिता परिपूर्ण होकर उस आलय से बाहर आयें।

मल-मूत्र विसर्जन के लिये एक और शब्द प्रयुक्त होता है- लघुशंका और दीर्घशंका। जब कोई व्यक्ति फ्रेश होने के लिये जाता है तो वह कहता है- दीर्घशंका हेतु जा रहा हूँ। निश्‍चय ही वह निम्नमध्य या मध्यम आर्थिक स्थिति वाला ही व्यक्ति है जिसे शंका है (लघु या दीर्घ) कि शारीरिक श्रम न करने, अव्यवस्थित दिनचर्या, तनावग्रस्तता के कारण उसकी आँतो में पल रहे या सड़ रहे मलमूत्र का परित्याग वह यथोचित ढंग से कर पाता है या नही! उसकी शंका समाधान को प्राप्त ही होगी, निश्‍चयपूर्वक कहा नहीं जा सकता। अपच, अम्लीयता, गैस, बवासीर जैसी बीमारियाँ इसीलिये अस्तित्वमान हैं।

निम्न आर्थिक स्थिति वर्ग का तो कहना ही क्या ‘मलत्याग‘ शब्द की अश्‍लील मानते हुए वह कहता है- दिशा मैदान जाना। आज के सन्दर्भ में उसमें ऐसा करने के लिये न तो कोई दिशा बची है और न मैदान ही। हाँ रेल लाइन या सड़क के किनारे समूह बनाकर मजबूरी में शर्म का परित्याग किये हुए बैठने को मजबूर हैं। रेल के ए.सी. क्लास में सफर करने वाले भद्रपुरुष के लिये ऐसे दृश्य कितनी जुगुप्सा पैदा करते होंगे। देश की अधिसंख्य आबादी ऐसा करती है। इसे सहन भी तो करना ही पड़ता है कि एक चुनाव से दूसरे चुनाव तक वोट बैंक के रूप में इनका जीवित रहना कितना जरूरी है। अन्यथा अभावग्रस्तता में ये जियें या मरें किसे परवाह है।

शौचालय के लिए यदाकदा ‘बाथरूम’ का प्रयोग किया जाता है। कहीं-कहीं विद्यालयों में बच्चे मलमूत्र त्याग के लिये ‘बाथरूम’ शब्द का प्रयोग करते हैं। जरूरतमंद व्यक्ति अगर किसी मंत्री या बड़े नेता के यहाँ पहुँच जाय तो वह नेताजी को घण्टों बाथरूम के आश्रय में पाता है। आज समझ में आ रहा है कि आलीशान शौचालय का उपयोग करने वाला बाथरूम की भव्यता से मोहित होकर ही घण्टों सुखभोग करता हुआ परितृप्त होकर वहाँ से निकलता होगा।

तो बात निकली थी मोंटेक सिंह का शौचालय भव्य और आकर्षक है। आर.टी.आई. के तहत हमारे देश की सभी उच्च-आर्थिक स्थिति वालों के शौचालयों की स्थिति का ब्यौरा मंगाया जाना चाहिए। साथ ही विदेशों की ऊँची हस्तियों के शौचालयों से सम्बन्धित अभिलेख माँगे जाने चाहिए। सबसे महंगे शौचालय वाले का नाम ‘गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड’ में दर्ज होना चाहिए। हो सकता है मोंटेक सिंह का नाम इस रिकार्ड में दर्ज हो जाय। अमेरिका के राष्ट्रपति इस हेतु उन्हें गले लगा लें जैसा कि पिछले माह एक अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर उन्होंने हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को गले लगा लिया था। इससे बड़ा सम्मान हमारे देश के लिये और क्या हो सकता है।

शौचालय दीर्घशंका और दिशा मैदान का सम्बन्ध जीवन स्तर से ही है। जो व्यक्ति 35 लाख रुपये के शौचालयों का इस्तेमाल कर रहा है वह निश्‍चय ही छप्पन भोग का आनन्द तो लेता ही होगा। वह करोड़ालय (करुणालय नहीं) में तो अवश्य निवास करता होगा। उसके मातहत पलने वाले लोगों का जीवन स्तर भी उन्नत होता होगा। पत्रकारों को चाहिए कि वे उन सभी का साक्षात्कार लें (मोंटेक सिंह और उनके मातहतों से) और पूछें आपको कैसा लगता है इतने भव्य शौचालयों का उपयोग करते हुए? क्या-क्या विशिष्टताएँ हैं इन शौचालयों में? कितना आनन्द आता है शुचिता की प्रक्रिया में? आदि-आदि। हमारी नई पीढ़ी को यह जानकारी अवश्य ही होनी चाहिए ताकि उनका लक्ष्य बने- मोंटेक सिंह जैसा बनना और भव्य शौचालयों का सदुपयोग कर एक काबिल भारतवासी बनना। माता-पिता अपने बच्चों को एक सीख दें कि बनो तो मोंटेक सिंह जैसा अन्यथा मानुष देह धारण करने का क्या औचित्य? ‘बड़े भाग मानुस तन पावा, सुर नर मुनि सदग्रंथन गावा‘, हमारा बचपन क्यों ऐसा आदर्श ग्रहण कर पा रहा है बड़ा चिन्तनीय विषय है।

बच्चे का महंगा स्कूल, हमारा आवास, हमारी कार, गहने आदि स्टेटस सिम्बल हुआ करते हैं। स्टेटस मेन्‍टेन करने के लिए आज व्यक्ति क्या नहीं करता! गुणवत्ता से अधिक प्रचलन का ध्यान रखा जाता है। हमारे  लिये सौभाग्य का विषय है कि आज शौचालय स्टेटस सिम्बल बनने जा रहा है। सम्पन्नता की अभिव्यक्ति या व्यक्ति की पहचान इसलिये नही होगी कि वह किस कार में सवारी करता है। या उसके बच्चे कितने महंगे स्कूल में पढ़ते है। या वह कितना महंगा भोजन करता है। बस महत्वपूर्ण यह होगा कि उसका शौचालय कितना महंगा है। और उसके भीतर किन-किन सुख सुविधाओं की ध्यान में रखा जाता है। अब शौचालय से सम्बन्धित टायलेट सीट, उसमें लगने वाले मार्बल आादि का विज्ञापन अधिकाधिक देखने को मिलेगा। अगर कोई फिल्मी हस्ती तत्सम्बन्धी आइटम का विज्ञापन करे तो कहना ही क्या! क्रिकेट स्टार घड़ी बेच रहा है। फिल्म अभिनेत्री कुरकरे खाकर और खिलाकर अपने परिवार को सम्पन्न और खुशहाल बता रही है। इसी प्रकार का बहुत कुछ। लेकिन अब फिल्मतारिका और फिल्म स्टार टायलेट में बैठा यह बताने का प्रयास कर रहा होगा कि फलाँ कम्पनी की टायलेट सीट या शौचालय में प्रयुक्त होने वाला मार्बल या इसी तरह के अन्य आयटम आपको कैसे सुख प्रदान करते हैं। अगर आप बताए गए आयटम का प्रयोग करते हैं तो आपका जीवन धन्य हो जायेगा और यह भी कि आपका शौचालय आपके लिए गर्व और पड़ोसी की ईर्ष्या का कारण भी होगा। उस विज्ञापन का मूलमंत्र होगा- उसका शौचालय आपके शौचालय से आकर्षक कैसे! उपभोक्ता के लिये अंग्रेजी का शब्द है-कष्टमर। अगर उपभोक्ता को आर्थिक तंगी से जीवन यापन करते हुए विज्ञापित वस्तुओं का प्रयोग स्टेटस के दबाब में करना पड़े तो वह कष्टमर ही है यानी आर्थिक तंगी के कारण कष्ट से मरने वाला। शौचालय आज बाजार के मायावी संसार का प्रिय विषय बनने जा रहा है। यही प्रेरणा काम करने वाली है कि आप अपने जीवन में भवन बनाएँ या न बनाएँ एक अदद आलीशान शौचालय अवश्य बनवा लें। ‘एक बंगला बने  न्यारा’  नहीं, ‘एक शौचालय बने उजियारा’।

मुझे लगता है कि मोंटेक सिंह का सम्बन्ध मण्टो की एक कहानी के एक चरित्र टोबाटेक सिंह से है। कहें तो मोंटेक सिंह और टोबाटेक सिंह भाई-भाई। टोबाटेक सिंह ने अपनी आखिरी श्‍वास तक भारत विभाजन को स्वीकार नहीं किया। भारत और पाकिस्तान के पूरे क्षेत्र को वह हिन्दुस्तान ही मानता आया। दुर्भाग्य से पाकिस्तान में रहना पड़ा। हर समस्या की शिकायत वह पण्डित नेहरू से करने की बात कहा करता था। इसी प्रकार मोंटेक सिंह आर्थिक विभाजन को स्वीकार नही करना चाहते। सभी भारतवासियों को वह खाते-पीते और उभरती आर्थिक महाशक्ति वाले देश का नागरिक समझते हैं। अगर किसी व्यक्ति को भुखमरी, किसानों की आत्महत्या, भ्रष्टाचार, संशाधनों का असमान वितरण आदि समस्याएँ या विसंगतिया दिखाई देती है तो उसकी दृष्टि का दोष है। उसकी भावना का दोष है- ‘जाकी रही भावना जैसी’। हमें बलिहारी होना चाहिये उस शौचालय का जिसके उपयोग के उपरान्त ऐसी कोई भी अनुभूति नहीं होती जो देश के लिये चिन्तनीय हो। वहाँ ऐसा अनुभव अवश्य होता होगा कि भारत 2020 तक विश्‍व की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरने वाला है। ऐसा अनुभव प्रदान कराने वाला शौचालय अगर महिमामण्डित करने के योग्य नहीं तो और क्या है?

काले धन पर इस वर्ष और विगत वर्ष अत्यधिक चर्चाएं हुईं कि कालाधन विदेशों मे जमा है। कई लोगों ने बि‍स्तर के अंदर, दीवार की चिनाई में, छत के भीतर आदि कई जगहों पर धन संचित किया हुआ था। हमारे देश के मनीषी इसे कालाधन बता रहे थे। अगर मेरे पास इतना धन होता तो मैं इसे काला नहीं रहने देता, पीला बना लेता। शौचालय की दीवारों को स्वर्णनिर्मित बनाकर भव्य शौचालय की निर्मिति के बाद भी अगर देश की तीन चौथाई आबादी बेधडक यत्र-तत्र दिशा मैदान वाला कार्य भी करती या 28 रुपये रोजाना कमाकर अमीर भी बन जाती तो मुझ पर क्या असर होता। शायद कुछ भी नहीं क्योंकि मैं तो उस भव्य शौचालय का उपभोग करने वाला होता जहां से गरीबी, बेकारी, भुखमरी, कुपोषणा, बदहाल व्यवस्थाऐं आदि तो कुछ भी महसूस नही होता। बचपन मे याद की हुई एक कविता का स्मरण मुझे इस सन्‍दर्भ में हो रहा है-

यदि होता किन्नर नरेश मैं, राजमहल में रहता।
सोने का सिंहासन होता, सिर पर मुकुट चमकता।।
-आमीन