Category: समीक्षा

सरल-सहज भाषा में विज्ञान – ‘विज्ञान और हम’ : सुन्दर नौटियाल

‘विज्ञान और हम’ विज्ञान गल्प के सिद्धहस्त जाने-माने वैज्ञानिक-लेखक देवेन्द्र मेवाड़ी जी की ‘लेखक मंच प्रकाशन’ से प्रकाशित विज्ञान पुस्तक है। विज्ञान की पुस्तकों और लेखों में सरल-सहज हिंदी के प्रयोग से विज्ञान की जटिलता के हौवे को दूर करते मेवाड़ी जी का पाठक समाज को ये एक बेहतरीन तोहफा है। यह किताब बच्चों तक विज्ञान के सन्दर्भों को पहुँचाने की सरस और रोचक कोशिश है। इसका मतलब यह कतई नहीं है कि यह किताब केवल बच्चों के लिए ही बनी है। न जाने कितने ही प्रसंगों को कल्पना, तथ्यों, संस्मरणों, नाटकों, कवितांशों आदि के माध्यम से सामान्य विज्ञान और तत्कालीन पर्यावरणीय चुनौतियों से रूबरू करवाती यह किताब पाठक में मानवीय मूल्यों, तर्कपूर्ण चिंतन, सामाजिक दायित्वों, जीवों के प्रति दया, जैव विविधता की समझ आदि विकसित करती है। साथ ही यह नए पाठकों को और अधिक पढ़ने की प्रेरणा के साथ-साथ अपने संस्मरणों को लिखित रूप देने के लिए भी प्रोत्साहन देती है।

19 विभिन्न शीर्षकों से प्रस्तुत सन्दर्भ बहुत ही व्यवस्थित ढंग से सजे हुए हैं। ‘सुनो मेरी बात’ शीर्षक से जहाँ लेखक ने अपने जीवन के अंशों को बच्चों के साथ साझा किया है, अपने आंचलिक शब्दों के प्रयोग से मात्रभाषा के प्रति अपने प्रेम को व्यक्त किया है, वह किसी भी नव पाठक को अपनी मातृभाषा पर गर्व करने और इसे प्रसारित करने के लिए योगदान देने के लिए प्रेरित करता है। किताब के पन्ने दर पन्ने आगे बढ़ता पाठक देवीदा के साथ कभी ‘अनोखे सौरमंडल’ के तथ्यों से विस्मित होता है तो कभी एलियन के साथ कल्पना के यान पर सवार हो ‘प्यारी और निराली धरती’ की समझ विकसित करने आकाश में उड़ने लगता है। देवीदा की आँखों से उनकी लेखनी के शब्द समुंदर में ‘समन्दर के अन्दर की अनोखी दुनिया’ देख आता है, तो कभी ‘लो आ गया वसंत’ पाठ में शब्दों के गुलदस्तों में सजे फूलों, कलियों और नयी अंगडाई लेती धरती की महक को महसूस करता है। वसंत के खुशनुमा अहसास से पाठक अचानक ही गर्म होती धरती की उष्मता से पसीने में नहाने लगता है, जब वह रूबरू होता है ‘क्यों तपती है धरती’ से | बादलों के बनने-बरसने की घटनाओं से परिचय करने के लिए पाठक ‘कैसे-कैसे मेघ’ पढ़ता है और अचानक ही ‘आये पंछी दूर देश से’ पढ़कर प्रवासी पक्षियों के साथ सायबेरिया से भारत तक की यात्रा पर उड़ चलता है। घर के आंगन में गौरैया के घोंसले में नवान्गंतुक बाल पक्षी की पहली उड़ान ‘उड़ गयी गौरैया’ तो किसी भी उम्र के पाठक को सरल, सहज भाषा में अपने अनुभवों को संजोने की अद्भुत प्रेरणा दे जाती है। देवीदा के साथ ‘पेड़ों को प्रणाम’ करते गार्गी, शेफाली, गौरव, माधवी जैसे बच्चे चिप्स खाते-खाते बच्चों के साथ पाठक भी ‘आलू की कहानी’ सुनने लगता है, चिप्स, नमकीन, बिस्कुट खाते-खिलाते बच्चे फ्रैंक स्मिथ द्वारा खोजी गयी ‘फूलों की घाटी में’ कब पहुँच जाते हैं, उनके साथ-साथ पाठक को भी पता नहीं चलता। आगे के पाठों में ‘बच्चों का विज्ञान और कवि के कबूतर’ उड़ाते बच्चे, ‘आ गये रोबोट’ पाठ से मानव जीवन में मशीनी मानवों की धमक को महसूस करते हैं। ‘ताबीज़’ पहने एक बेरोजगार युवक कहानी के माध्यम से समाज में फैले ‘चमत्कार या विज्ञान’ के अन्धविश्वास पर तो कटाक्ष करता ही है, साथ ही में मजबूरी को अन्धविश्वास से जोड़कर भी दिखाता है। एक नाटक में बच्चों को ‘पर्यावरण के प्रहरी’ बनाकर ‘वृक्ष बचाओ-वृक्ष लगाओ’ की प्रेरणा देते लेखक जाते-जाते बच्चों को ‘आर्यभट्ट’ और ‘मेघनाथ साहा’ जैसे भारतीय विभूतियों से परिचित करवाते हैं और ‘माइकल फैराडे’ की जीवनी के एक प्रेरक प्रसंग ‘अनजान से बना महान’ से बच्चों को आत्मविश्वास से सरोबार कर जाते हैं |

विशेष– सुन्‍दर नौटि‍याल पेशे से शि‍क्षक हैं। उन्‍होंने मवोड़ी जी की यह किताब अपनी एक छात्रा नवमी को पढ़ने को दी। उसके अन्दर इस किताब से उमड़े-उपजे भावों की झलक देखने लायक है–

किताब में लिखे गये एक संस्मरण ‘उड़ गयी गौरैया’ को पढ़कर वह कहती है –“सर! हमने भी कई बार चिड़ियों को घोंसले में बच्चों को दाना देते और उन्हें उड़ाते हुए देखा है। आपने लिख दिया और हम लिखते नहीं हैं, परन्तु यह पाठ पढ़कर मुझे विश्वास हो गया है कि हम भी ऐसा ही अच्छा लिख सकते हैं |”

वैज्ञानिक, विज्ञान कथा लेखक को सम्बोधित करते हुए वह लिखती है– “सर! आपकी लिखी हुई किताब बहुत ही सरल भाषा में लिखी हुई है और इसमें कोई भी पाठ ऐसा नहीं था, जिसे मैं समझी न हूँ। आपने अपने बचपन की बातें लिखीं जो मुझे बहुत अच्छी लगीं। अनोखा सौरमंडल, फूलों की घाटी, ताबीज़, रोबोट और मेघनाथ साहा, ये सब कहानियां बहुत ही अच्छी लगीं।”

“हमारे सर भी आपके जैसे ही हैं। उन्होंने एक कविता लि‍खी जो मुझे बड़ी अच्छी लगी। उन्होंने मेरी एक कविता भी अपने पास रखी हुई है। शायद उनका सपना हमें आपके जैसा वैज्ञानिक बनाने का है।”

वह देवीदा से गुजारिश करती है– “आपसे बस यह कहना है कि सर ! यदि कभी मौका मिले तो हमारे विद्यालय में जरूर आना। हम आपसे सवाल करना चाहते हैं, आपसे कुछ सीखना चाहते हैं। शायद! हमने आज तक वैज्ञानिक नहीं देखे हैं, किन्तु हमारे सर हमारे लिए दुनिया के सबसे बड़े और सबसे अच्छे वैज्ञानिक हैं। हमारे सर हमसे कहानियां पढ़वाते हैं, गाना गाने को कहते हैं, हमें नयी चीज़ें दिखाते हैं और सबसे बड़ी बात– हमे लिखने पर जोर देते हैं।”

इस पुस्तक से प्रभावित होकर उसने इस लेख में तीन कवितायें भी लिखीं– ‘बच्चों का अपना सपना है’, ‘ये दुनियां किसकी?’ और ‘वैज्ञानिक सोच’।

वैज्ञानिक सोच’

सर तक लदे विज्ञान से,
फिर भी कहे भगवान है।
जीवित हैं विज्ञान से,
फिर भी कहें भगवान है।
विज्ञान तो हर तरफ बस चुका,
भगवान कहाँ है आपका?
कोई दर्शन करवा दे भगवान के,
हम घुटने टेकें, माफ़ी मांग के।
बस सोच का फरक पड़ चुका
अन्धविश्वास बहुत ही बढ़ चुका।
वैज्ञानिक सोच अपनाकर बनें
वैज्ञानिक नए विचार के।
दुनियां चाहे कुछ भी कहे,
हम वैज्ञानिक नये संसार के।

नवमी, कक्षा 9
रा.इं.का. कोटधार गमरी, उत्तरकाशी

जहाँ मिलता है सुनहरे सपनों को अथाह ज्ञान :डॉ. दीनानाथ मौर्य

शैक्षिक सरोकारों को समर्पित शिक्षकों तथा नागरिकों के साझा मंच द्वारा प्रकाशित ‘शैक्षिक दखल’ पत्रिका का दसवां अंक (जुलाई 2017) स्कूलों की अवधारणा को सीखने की प्रक्रिया से जोड़ते हुए ‘परम्परागत स्कूलों’ से हटकर कुछ कुछ ऐसे स्कूलों की प्रक्रियाओं को सामने लाता है, जो न सिर्फ नवाचारी स्कूल हैं, बल्कि जहाँ पर यह विश्वास भी व्यवहार में लाया जाता है कि ‘‘स्वतंत्रता, विश्वास और संवाद, सीखने-सिखाने की प्रक्रिया के मूल तत्व हैं। इन तीनों तत्वों के सही तालमेल के बिना सीखना-सिखाना संभव नहीं लगता है। यह बात शिक्षक और शिक्षार्थी दोनों पर बराबर रूप से लागू होती है। शिक्षक सिखाने की प्रक्रिया में स्वतंत्र, संवाद और विश्वास चाहता है, तो बच्चे सीखने की प्रक्रिया में…।”

सामाजिक विकास की ऐतिहासिक प्रक्रिया को देखें तो यह साफ़ होता है कि सीखने की सामाजिकता और सामाजिकता को सीखने की प्रक्रिया दरअसल सामाजिक विकास की द्वंदात्मक स्थितियों के आपसी सम्वाद से ही आगे बढ़ी है। इसके लिए ही स्कूल जैसी अवधारणा भी विकसित हुई। किसी भी समाज में स्कूलों की जरूरत क्यों होती है ? स्कूल आखिरकार करते क्या हैं? समाज के बीच स्कूल जैसी अवधारणा क्यों आती है ? इन्हीं सवालों का दूसरा किनारा वह है, जहाँ से यह बात की जाती है कि स्कूल समाज के निर्माण में क्या योगदान देते हैं? जिसे हम शिक्षण कहते हैं, वह सभ्यता के विकास क्रम की वह अवस्था होती है, जहाँ से हम अपने ज्ञान के विस्तार को नया आयाम दे रहे होते हैं- न सिर्फ व्यापकता में, बल्कि उसकी गहरायी के तौर पर भी।

रानीबाग़, नैनीताल उत्तराखंड से निकलने वाली इस पत्रिका के संपादक महेश पुनेठा और दिनेश कर्नाटक है। पत्रिका का यह अंक अपने 20 विचारपरक लेखों को समेटे हुए है। इनमें शिक्षा जगत के नामी-गिरामी हस्तियों, शिक्षाविदों और शिक्षक साथियों के अपने अनुभव भी जगह पा सके हैं। ‘स्कूल कुछ हटकर’ यह पत्रिका के मुख्य पृष्ठ पर लिखा गया एक वाक्य है, जिसमें इस अंक की मूल भावना भी समाहित है। यह अंक कुछ नवाचारी स्कूलों की शैक्षिक प्रक्रियों को केंद्र में रखकर सिखाने और सीखने की पूरी प्रणाली को हमारे सामने लाता है। ये नवाचारी स्‍कूल परम्परागत स्कूलों से सही मायने में कुछ हटकर हैं। ‘बच्चे’ शीर्षक से डॉ. माया गोला वर्मा की कविता है, जो पत्रिका के अन्दर के कवर पर बड़े इत्मीनान से पाठक के शैक्षिक परिप्रेक्ष्य को झकझोरती है… ‘बच्चे को करनी है शरारतें/बच्चे को देखनी हैं चिड़ियाएँ/उड़ानी हैं पतंगें/फूलने हैं गुब्बारे/गाना है गीत/चीखना है/चिल्लाना है/हँसना है जी भरकर… परन्तु/बस्ते के भीतर भरे अथाह ज्ञान में/बच्चा डूब गया है/खुश हैं सब/डूबते बच्चे को देखकर/खुश हैं सब/उसके सुनहरे सपने को मरते देखकर….।’ पत्रिका की मूल भावना क्या है ? ‘अनुरोध’ में संपादक लिखते हैं- ‘बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य प्रदान करना एक लोकतान्त्रिक राज्य का पहला दायित्व है। सार्वजानिक शिक्षा का विशाल ढांचा सुविचारित प्रक्रिया के तहत ढहने के कगार पर खड़ा है। इस गफलत के दौर में यह आवश्‍यक हो जाता है कि हम सब शिक्षा से जुड़े हुए तथा शिक्षा को समाज निर्माण का महत्त्वपूर्ण तत्व मानने वाले लोग शिक्षा के लोकतान्त्रिक, उदार, बहुलतावादी, वैज्ञानिक तथा धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को बचाने के लिए आगे आएं। यह पत्रिका इसी दिशा में एक प्रयास है…।’

‘स्वतंत्रता, संवाद और विश्वास’ शीर्षक सम्पादकीय में महेश पुनेठा का जोर इस बात पर है कि ‘शिक्षण एक कला है। कोई भी कला तब तक पूर्णरूप में विकसित नहीं हो सकती है, जब तक उसके लिए दबावमुक्त वातावरण न हो।’ संपादक इस बात से बाखबर भी है कि स्‍कूली शिक्षा में इस शब्द के मायनों को बहुत ही सरलीकृत करके उसकी मूल भावना से अलग करने का प्रयास भी क्या जा सकता है। इसीलिए वह यह भी लिखते है कि ‘स्वतंत्रता का मतलब यह कतई नहीं है कि बच्चों को उनके हाल पर छोड़ दिया जाए। वे जैसा चाहें, वैसा करते रहें। बच्चों के लिए स्वतंत्रता के साथ-साथ खुला संवाद भी बहुत जरूरी है…संवादहीन स्वतंत्रता को अराजकता में बदलने में देर नहीं लगती है। बच्चों को स्वतंत्रता देने के साथ ही उनसे और अधिक संवाद करना जरूरी हो जाता है। ऐसे में शिक्षक-अभिभावक की जिम्मेदारी बढ़ जाती है।’ स्वत्रंत्रता, संवाद और विश्वास को जैसे मूल्यों को विद्यालय की मूल भावना से जोड़ते हुए पत्रिका का यह अंक कुछ ऐसे स्कूलों की बानगी हमारे सामने पेश करता है, जहाँ नवाचार पूरे विद्यालयी परिवेश में फलता-फूलता है- किसी सैधांतिक अवधारणा के रूप में ही नहीं, व्यावहारिक प्रतिफलन में भी।

फेसबुक आज के समय में वर्चुअल दुनिया का एक ऐसा समाज बन गया है, जहाँ हम अपने विचारों के साथ दूसरे से मिलते-जुलते हैं, बतियाते हैं और समय के सवालों से दो–चार होते हैं। पत्रिका का एक पूरा लेख ही ‘फेसबुक परिचर्चा’ का है। इसमें शिक्षा से जुड़े हुए तमाम बिन्दुओं पर संपादक के साथ विभिन्न क्षेत्रों के लोगों से की गई बातचीत को संकलित किया गया है। सोशल मीडिया का यह सकारात्मक उपयोग तात्कालिक तौर पर सराहनीय और दीर्घकालिक तौर पर अनुकरणीय है। इसे संवाद की संस्कृति को प्रसारित करने में अहम् भूमिका निभाने वाले कारक के रूप में भी देख सकते हैं। संपादक ने इस तरह के प्रयोग से यह सिद्ध कर दिया है कि ‘विचारों का कभी अंत नहीं होता’ जरूरत उसकी अनन्तता की पहचान की है। कक्षा में अनुशासन को केंद्र में रखकर की गई बातचीत को इस लेख के माध्यम से कई आयामों में समझा जा सकता है। इस विषय पर हेमा तिवारी, अनिल अविश्रांत, मुकेश वशिष्ठ, रणजीत कुमार, जगमोहन कठैत, कमलेश जोशी तथा भाष्कर चौधरी के विचार महत्त्वपूर्ण हैं।

कवियित्री और शिक्षिका रेखा चमोली का आलेख ‘जहाँ बच्चे मनपसंद विषय से अपना दिन शुरू करते हैं’ विश्व प्रसिद्ध पुस्तक ‘तोतोचान’ को आधार बनाकर जापान के तोमोए गाकुएन स्कूल की शिक्षण पद्धति को बयाँ करता है। अपने अनुभव को स्कूल की प्रक्रिया से जोडती हुई लेखिका का यह निष्कर्ष है कि- “तोमोए की एक प्रमुख विशेषता थी स्वाभाविकता़। स्कूल चाहता था कि बच्चों के व्यक्तित्व यथासंभव स्वाभाविकता के साथ निखरें।” स्कूल का माहौल और समाज के साथ आपसी रिश्ते की ख़ूबसूरत सहजता ऊपर से शिक्षकों का विद्यार्थियों के साथ साहचर्य का सम्बन्ध ये सब कुछ मिलकर बच्चों को सीखने के जीवंत अनुभव देते थे। यहाँ विशिष्टता का सम्मान भी था और वि‍भिन्नता की कद्र भी थी। तोतोचान स्कूल की शिक्षण प्रक्रिया को समझने के लिए यह आलेख भी अनिवार्यतः पढ़ना चाहिए।

चिंतामणि जोशी का लेख ‘बाल ह्रदय की गहराइयों में पैठना शिक्षा का सार’ उक्रेन, अविभाजित सोवियत संघ के ‘खुशियों का स्कूल’ की कहानी कहता है। स्कूल के संस्थापक वसीली सुखोम्लिंस्खी के विजन को उद्धरित करते हुए लेखक का कहना है कि- ‘स्कूल में चरित्र निर्माण के दौरान इस बात पर विशेष ध्यान दिया जाता था कि ज्ञान प्राप्ति की प्रक्रिया में हर बच्चा मानव गरिमा का, गर्व का अनुभव करे। बाल ह्रदय की गहराइयों में पैठना वसीली की शिक्षण विधि का सार था।’ शिक्षा में बाल मनोविज्ञान की व्यावहारिकता के लिए इस आलेख को देखा जाना चाहिए।

तारा चन्द्र त्रिपाठी जिनका शिक्षा के क्षेत्र में लंबा अनुभव रहा है, का साक्षात्कार भी इस अंक की ख़ूबसूरती है। एक शिक्षाकर्मी की हैसियत से वे विभिन्न मुद्दों पर दर्शक की भांति अपनी राय नहीं देते होते हैं, बल्‍कि‍ भागीदार होकर चीजों को जानने और समझने का अनुभव उनके साक्षात्कार में दिखायी पड़ता है। ‘शैक्षिक दखल’ के साथ की गई लंबी बातचीत में वे अपने व्यावहारिक अनुभवों से बाल मनोविज्ञान को सामने रखने का प्रयास भी करते है।
समरहिल स्कूल, लन्दन को आधार बनाकर लिखा गया अंशुल शर्मा का आलेख शिक्षा सिद्धांतों और प्रयोग की जाने वाली विधियों को लेकर हमारे मन में बनी कुछ शंकाओं का समाधान करता है। लेखक ने अपने लेख का शीर्षक ‘मनमर्जी का स्कूल’ देते हुए लिखा है कि- ‘एक स्कूल है जिसमें बालकों को कक्षा में न जाने की आज़ादी है, बालकों को गाली निकालने की आज़ादी है, अपने निर्णय खुद लेने की आजादी है, बालकों को शिक्षकों के नाम लेकर संबोधित करने की आज़ादी है।’

नीलबाग स्कूल की शिक्षण प्रणाली पर राजाराम भादू का साक्षात्कार कई मायनों में अहम् है। डेविड आसबरा के शैक्षिक दर्शन को आधार बनाकर उन्होंने इस विद्यालय की सीखने-सिखाने की पूरी प्रक्रिया को डिटेल में बताया है।

इसी तरह से ऋषि वैली स्कूल चित्तूर, आंध्रप्रदेश पर राजीव जोशी, आनंद निकेतन डेमोक्रेटिक स्‍कूल भोपाल और इमली महुआ, कोंदागावं (बस्तर), छतीसगढ़ पर प्रमोद दीक्षित मलय, साल सबील ग्रीन स्कूल त्रिशूर, केरल पर सुनील, उमंग पाठशाला, गन्नूर(सोनीपत), हरियाणा पर मिनाक्षी गाँधी, रा.आ.प्रा.वि. कपकोट, बागेश्वर, उत्तराखंड पर डॉ. केवलानंद कांडपाल, रा.प्रा.वि. मेतली, पिथौरागढ़ पर दिनेश सिंह रावत, रा.उ.प्रा.वि.पौड़, पिथौरागढ़, उत्तराखंड पर नरेश पुनेठा, प्रा.वि.स्यूणी मल्ली, चमोली पर देवेश जोशी, रा.प्रा.वि. गणेशपुर, उत्तरकाशी, उत्तराखंड पर सुनीता के लेख इन स्कूलों की पूरी प्रक्रिया को हमारे सामने रखते है। शिक्षा जहाँ सीखने का दूसरा नाम ही नहीं है, बल्कि आनंद लेने और देने का जरिया भी है।
सुप्रसिद्ध विज्ञान लेखक देवेन्द्र मेवाड़ी की डायरी का वह अंश भी पत्रिका को इस मायने में वैचारिक गहरायी प्रदान करता है, जिसमें वे राजकीय पूर्व माध्यमिक विद्यालय, देहरा, देहरादून की शिक्षण प्रक्रिया का आँखों देखा और खुद का अनुभव किया हुआ सच बयाँ करते हैं। इस स्कूल में उन्हें सेवा, समर्पण और शिक्षा का अनूठा संगम दिखाई दिया।

सुप्रसिद्ध पर्यावरणविद अनुपम मिश्र का व्याख्यान ‘एक अजीब स्कूल’ गुमनाम स्कूल लापोड़िया जयपुर की कहानी कहता है, जहाँ परिवेश के साथ सीखने की प्रक्रिया सहजता के साथ अपना रूप ग्रहण करती है। वहां कोई बंधन नही है- सीखने में भी और जीने में भी। समाज और स्कूल का कोई बंटवारा नहीं, स्कूल समाज के साथ कुछ इस तरह घुला-मिला है कि‍ कौन किससे सीख रहा है, यह पता लगाना मुश्किल है अर्थात सब एक दूसरे के सानिध्य में आगे बढ़ रहे हैं। पसंद और नापसंद के साथ विषयों की दीवारें बनतीं और बिगड़ती रहती थीं और बच्चे इस गुमनाम स्कूल से शिक्षा की एक नई इबारत लिख रहे थे। सीखने की स्वाभाविकता और जीने की सहजता के आपसी संबध को समझने के लिए यह आलेख महत्त्वपूर्ण है।

‘और अंत में’ तीन स्कूलों 1. ग्राम भारती विद्या मंदिर, रानिचौरी, टेहरी गढ़वाल. 2. दून घाटी शिक्षण संस्थान, बापू ग्राम,ऋषिकेश. 3.जीवन जागृति निकेतन, ऋषिकेश के हवाले से दिनेश कर्नाटक ने गाँधीवादी शिक्षा के मूल्यों की व्यावहारिकता को दिखाया है। इन तीनों स्कूलों की स्थापना गाँधीवादी विचारक योगेश चन्द्र बहुगुणा ने की थी। उनके लिए शिक्षा का पेशा रोजगार का नहीं, सेवा का पेशा था। यह आलेख किसी शिक्षण संस्था के निर्माण के साथ उसमें विकसित होने वाली मूल्य-चिंता की पूरी प्रक्रिया को समझने के लिए पठनीय है।

‘आदमी बनने के क्रम में’ मिथिलेश कुमार राय की कविता शुरुआती कविता की तरह फिर एक बार हमारे परिपेक्ष्य को दुरुस्त करती जान पड़ती है- पिता मुझे रोज पीटते थे/गरियाते थे/कहते थे कि साले/राधेश्याम का बीटा दीपवा/पढ़-लिखकर बाबू बन गया/और चंद्नमा अफसर/और तू ढोर हांकने चल देता है/हँसियाँ लेकर गेहूं काटने बैठ जाता है/कान खोल कर सुन ले/आदमी बन जा/नहीं तो खाल खीचकर भूसा भर दूंगा/और बांस की फुनगी पर टांग दूंगा…/आदमियों की तरह सारी हरकतें करते पिता/क्या अपने आपको आदमी नहीं समझते थे/आदमी बनने के क्रम में/मैं यह सोचकर उलझ जाता हूँ…।’
कुल मिलाकर ‘शैक्षिक दखल’ का यह अंक काफी महत्त्वपूर्ण है। इसमें लिखे गये लेख रोचक, उपयोगी और संग्रहनीय हैं।

—-

शैक्षिक दख़ल (छमाही)
एक अंक- 40 रुपये
5+1 अंक- 200 रुपये
आजीवन-1500 रुपये
संस्थागत आजीवन सदस्यता-2000 रुपये
विशिष्ट सदस्यता-5000 रुपये
सम्‍पर्क : महेश चंद्र पुनेठा, शि‍व कॉलोनी,
न्‍यू पि‍याना, पो. ऑ डि‍ग्री कॉलेज श्‍जोशी भवन, नि‍कट लीड बैंक, पि‍थौरागढ़-262502, मोबाइल नम्‍बर- 09411707470
ईमेल- punetha.mahesh@gmail.com

आदर्शवाद का ओवरडोज : संजीव ठाकुर

साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित परशुराम शुक्ल की यह किताब एक शिक्षक दीनदयाल के आदर्श जीवन और उसके कर्म को दिखलाने का काम करती है। अपनी मेहनत और लगन से आई.ए.एस. बनने वाले दीनदयाल अपने सहयोगियों, अधिकारियों और नेताओें के भ्रष्टाचार से तंग आकर नौकरी छोड़ देते हैं और गाँव में जाकर मास्टरी करने लगते हैं। मास्टरी करते हुए ही वह जाति-पाति के खिलाफ काम करते हैं, गाँव को नशा-मुक्त करवाते हैं, बिगड़े हुए बच्चों को सुधारते है, किसी साहूकार को ईमानदार बनाते है, प्रौढ़-शिक्षा कार्यक्रम चलाते है। आगे चलकर वह आदिवासियों के बीच काम करते हैं और उनकी संगीत-मंडली को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाते हैं। अपने कामों के कारण वह राष्ट्रपति से सम्मान पाते हैं तो आदिवासियों की संस्कृति पर किताब लिखकर ‘बुकर पुरस्कार’ पाते हैं यानी हर तरह की सफलता वह पाते हैं। सवाल उठता है कि एक साथ इतने-इतने काम करने वाले मास्टर दीनदयाल क्या असली पात्र हो सकते हैं? बच्चों को पाठ पढ़ाने के उद्देश्य से लिखी गई इस किताब को नकलीपन बच्चों से भले ही छुपा रह जाए, लेकिन क्या वे इससे जुड़ाव महसूस कर पाएँगे? इससे प्रेरणा ग्रहण कर पाएँगे? क्या आदर्शवाद के इस ओवरडोज को वे पचा पाएँगे? सच्चाई तो यह है कि बच्चे वैसे ही पात्रों से तादात्म्य स्थापित कर पाते हैं, जो उनके आस-पास के हों? उनके जैसे हों!

इस किताब के जरिए परशुराम शुक्ल ने ‘बाल धारावाहिक’नाम की एक ‘नई’ विधा को स्थापित करने का प्रयास किया है, लेकिन दुर्भाग्यवश ऐसा हो नहीं पाया है। ‘बाल धारावाहिक’ को परिभाषित करते हुए भूमिका में उन्होंने लिखा है- ‘बाल धारावाहिक को एक विशिष्ट संरचना वाली ऐसी कहानी शृंखला के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जिसकी प्रत्येक कहानी अपने पीछे की कहानियों और आगे की कहानियों से स्वतंत्र होती है और संबद्ध भी!’ उनकी इसी परिभाषा के आधार पर इस किताब की परीक्षा करें तो हम पाएँगे कि इस ‘धारावाहिक’के कुछ अध्याय अन्य अध्यायों से सर्वथा स्वतंत्र हो गए हैं। ‘झूठे का बोलबाला’ और ‘पश्चाताप के आँसू’ ऐसे ही दो अध्याय हैं। ‘झूठे का बोलबाला’ तो एक लोककथा को परिवर्तित कर इस धारावाहिक में घुसा दिया गया है। इसको पढ़कर पाठक अचरज में पड़ सकते है कि किसी ठाकुर के सेवकों के द्वारा धकेलकर बाहर कर दिए गए दीनदयाल क्या वही दीनदयाल हैं, जो इतने बड़े-बड़े काम करते हैं? इसी तरह ‘पश्चाताप के आँसू’में बेचारे मास्टर दीनदयाल को जिस तरह आध्यात्मिक विषयों का प्रवचनकर्ता बना दिया गया है और किसी दूसरे कथावाचक की दुष्टता का शिकार दिखा दिया गया है, वह हास्यास्पद ही नहीं अनर्गल भी लगता है। और कोई गलत नहीं कि ऐसी अनर्गल बातें इस किताब में एक नहीं अनेक हैं।

इस किताब को पढ़कर जो सवाल सबसे अधिक मुखरता से सिर उठाता है वह यह कि क्या साहित्य अकादेमी जैसी संस्था के पास अच्छी और बुरी चीज को परखने को कोई पैमाना नहीं है? इस स्तरहीन किताब को छपवाकर साहित्य अकादेमी हिन्दी के व्यापक पाठक-वर्ग को आखिर क्या संदेश देना चाहती है?

पुस्तक: मास्टर दीनदयाल, परशुराम शुक्ल

प्रकाशक : साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, 60  रुपये

हमारा परिवेश- हमारा विज्ञान : प्रेमपाल शर्मा

vigyan-aur-hum

देवेन्द्र मेवाड़ी जाने-माने विज्ञान लेखक हैं। भारतीय परिवेश में बच्‍चों की चेतना और मनोरंजन दोनों को साधते और शिक्षित करने का उनका अपना अनोखा अंदाज है। ‘विज्ञान और हम’ उनकी नई पुस्‍तक है। असल में, हर लेखक पहले स्थानीय होता है, उसके बाद ग्‍लोबल। अंग्रेजी में इसके लिए एक प्रचलित वाक्य है- लोकल इज ग्लोबल। ‘विज्ञान और हम’ में देवेन्द्र मेवाड़ी ने इसलि‍ए सबसे पहले अपने गाँव, बचपन की बातें बच्चों को बताई हैं, स्‍थानीय भाषा की सुगंध और स्वाद के साथ। स्थानीयता का यह स्पर्श एक अलग मिठास पैदा करता है। किताब और लेखन में चस्का ऐसी ही शुरुआत से पैदा होता है। साधारणीकरण का यह ढंग ही पाठकों में असाधारण पैठ बनाता है। विज्ञान जैसे विषय को बच्चों के बीच ले जाने के लिए इससे बेहतर शुरुआत नहीं हो सकती।

पता नहीं यह हमारी शिक्षा पद्धति का दोष हे या उस समाज का जो जीवन को सामान्‍य तर्क से समझने के बजाय उसे पढ़ाई के नाम पर इतना भारी-भरकम उबाऊ बना देता है कि विज्ञान की मोटी-मोटी डिग्रियों वाले भी विज्ञान की सामान्‍य समझ में शून्‍य होते हैं। क्‍या यह कोई अलग से पढ़ने-पढ़ाने, रटने की चीज है? क्‍या रोज आप आकाश में सौरमंडल नहीं देखते? दिन में सूरज उगते ही सारा आकाश चन्‍द्रमा सहित गायब। कितने किस्‍से, रोचक कहानियां गड़ी गई हैं कि‍ताब में। चंदा मामा और इन सितारों के आसपास सदियों से गांवों के किसानों का जीवन और समय का अंदाज इन्‍हीं तारों- हि‍न्नी पैना, सप्तश्री, ध्रुव और उपग्रह चांद के आकार से चलता रहा है। देवेन्द्र मेवाड़ी ने बड़ी सहजता से कोपर्निकस, गैलिलियो, उनकी खोजी दूरबीन आदि‍ के कि‍स्सों के सहारे पूरे सौरमंडल को समझाया है। क्या इस लेख को पढ़ने के बाद बच्चों को कोई चंदामामा की कहानी से गुमराह कर सकता है? शायद नहीं। हां, कविता कहानी में इनकी जगह वैसी ही बनी रहेगी। विज्ञान और गल्प में यही अंतर है।

अगले लेख में मेवाड़ी जी आकाश से जमीन पर उतरते हैं। एक लंबे पत्र के माध्यम से पृथ्वी, पहाड़ और उसकी पूरी संरचना का एक-एक विवरण देते हैं। रोचकता को बनाए रखने के लिए एलियन भी वहां है, पृथ्वीवासियों को सलाह देते हुए कि कल-कारखाने के धुएं से पूरे वातावरण को बचाने की जरूरत है। बातों ही बातों में पत्र के माध्‍यम से कहना और प्रभावी बना देता है। इससे पत्र लिखने की शिक्षा तो बच्‍चों को मिलेगी ही।

आकाश, धरती के बाद मेवाड़ी जी बच्‍चों को समंदर की सैर कराते हैं- ‘समंदर के अंदर है अनोखी दुनिया’ लेख में। कम रहस्‍यमय नहीं है समन्‍दर। हालांकि कई बच्चों ने समुद्र साक्षात नहीं देखा होगा, लेकिन मीडिया की दुनिया ने क्‍या संभव नहीं बना दिया और शेष पूर्ति यह लेख करता है, एक-एक विवरण के साथ। मछुआरों के साहस, डार्विन ओर उनका जहाज बीगल, समुद्र में रहने वाले लाखों जीवों, वनस्‍पतियों की प्रजातियां। स्‍पंज प्रवाल से लेकर केकड़े, मछली जैलीफिश, व्‍हेल, डाल्फिन-समुद्र की इतनी बडी़ दुनिया। पढ़ते-पढ़ते बच्‍चों का कौतूहल आकाश छूने लगेगा। पूरी प्रमाणिक जानकारी भरा लेख।

‘क्यों तपती है इतनी धरती’ लेख तो देश के मौजूदा सूखे के संकट की याद दिला देता है। नंदू, शेफाली, गार्गी विक्रम, देवीदा की बातों से जो शिक्षा मिलेगी, वह भारी भरकम लेखों से नहीं मि‍ल सकती। ऐसे लेखों की सहजता बच्‍चों पर स्‍थायी असर छोड़ती है और यही विज्ञान लेखक देवेन्‍द्र मेवाड़ी का उद्देश्‍य है। हालांकि ऐसे लेखों की लंबाई कुछ कम होती तो और भी अच्‍छा होता। ‘कैसे कैसे मेघ,’ ‘लो आ गया वंसत’ बच्‍चों के लिए ऐसी ही जानकारि‍यों से भरपूर लेख हैं। पंछियों (पक्षियों) से बच्‍चों को विशेष लगाव होता है, गांव के बच्‍चों को और भी ज्‍यादा। आंगन में फुदकती तरह-तरह की चि‍डि़यों को कौन बच्‍चा भूल सकता है? गायब होती गौरया की चिंता, हम सबकी चिंता है। ‘उड़ गयी गौरियां’ (1 मई 2012) और ‘पेड़ों को प्रणाम’ (5 जून 2012) को लेख के बजाय ‘डायरी’ खंड में रखा जाना चाहिए। देवेन्‍द्र मेवाड़ी की एक और पुस्‍तक ‘मेरी विज्ञान डायरी’ बच्‍चों को बहुत सहज ढंग से अपनी दिनचर्या में घटित अनेक वैज्ञानिक बातों, निरीक्षणों और निष्‍कर्षों को लिखने का मौका देती है। अच्छी शिक्षा ऐसी ही प्रक्रियाओं से होकर गुजरती है।

बच्चों के जीवन में सैर सपाटा, यात्रा न हो तो मजा ही क्‍या। ‘फूलों की घाटी में’ और ‘बच्चों का वि‍ज्ञान और कवि का कबूतर’ यात्रा-कथा का आनंद देते हैं। ‘ताबीज’ और ‘पर्यावरण के प्रहरी’ जैसे दो छोटे नाटकों को शामिल करने से पुस्तक की उपयोगिता और बढ़ गई है। पुस्तक में तीन वैज्ञानि‍कों की जीवनी भी दी गई है।

ऐसी पुस्तकों को केवल विज्ञान के खांचों में रखना, उनके असर को सीमित करना है। यह पुस्तक बच्चों को उनके पूरे परिवेश से जोड़ती है और साथ ही शिक्षा और शिक्षण की विविध विधाओं– लेख, डायरी, यात्रा, नाटक, कविता और जीवनी से भी। शि‍क्षा का मूल मंत्र भी तो बच्चों को उनके परिवेश से जोड़कर शिक्षित करना है। पुस्तक में हरे जंगल का कवर तो मंत्रमुग्धकारी है ही।

(बालवाणी, नवम्बर-दि‍सम्बर, 2016 से साभार)

पुस्तक: विज्ञान और हम
लेखक : देवेन्द्र मेवाड़ी
कीमत:140, सजिल्द- 260/- रुपये
प्रकाशक: लेखक मंच प्रकाशन
433 नीति‍खंड-3, इंदि‍रापुरम
गाजियाबाद-20014
Email- anuraglekhak@gmail.com

‘अनहद’ का भीष्म साहनी अंक और राजेश उत्साही की कवि‍ताएं

charchaye-kitab

चर्चा-ए-कि‍ताब-

17 मई 2016

आज ‘अनहद’ अंक-6 प्राप्त हुआ। हर बार की तरह विविध सामग्री से भरा हुआ है। ‘शताब्दी वर्ष’ के चलते पत्रिका का बड़ा हिस्सा भीष्म साहनी पर केन्द्रित है। ‘समालोचना’ खंड-1 में वरिष्ठ कवि हरीश चन्द्र पाण्डेय पर चार महत्वपूर्ण आलेख और उनकी पांच नयी कवितायें हैं, तो खंड-2 में प्रदीप सक्सेना पर आलोचनात्मक आलेख और उनका स्वयं का एक आलेख। विशेष प्रस्तुति के रूप में वरिष्ठ कवि-आलोचक विजेंद्र का लोकधर्मी चीनी कविता पर विस्तृत आलेख है। हमारे समय के महत्वपूर्ण कवि चंद्रकांत देवताले की डायरी के पन्ने हैं। ममता कालिया, भालचंद्र जोशी और योगिता यादव की कहानियां हैं। हरवंश मुखिया का इतिहास पर एक आलेख है। अमृता शेरगिल की चित्रकला पर अशोक भौमिक ने लिखा है। मधुरेश, बजरंग बिहारी तिवारी और विजय गौड़ ने अलग-अलग विषयों पर विमर्श किया है। रामजी तिवारी का यात्रा वृतांत है। साथ ही एक दर्जन से अधिक किताबें ‘कसौटी’पर कसी गयी हैं। इसके अलावा नीलकमल, शंकरानंद, जयप्रकाश फ़कीर और ज्ञान प्रकाश की कवितायेँ हैं।

आज सायंकालीन भ्रमण में इन कविताओं का ही पाठ किया गया और उन पर चर्चा हुई। जयप्रकाश फ़कीर की कविताओं ने सभी को विशेष रूप से प्रभावित किया। आज से हमारे एक और युवा साथी राजेश पन्त इस सायंकालीन भ्रमण का हिस्सा बने हैं। उनके शामिल होने से हम और अधिक समृद्ध हुए हैं। हम सभी उनकी साहित्य और समाज की गहरी समझ से लाभान्वित होंगे।

कल का सायंकालीन भ्रमण चर्चित कवि-संपादक राजेश उत्साही के कविता संग्रह ‘वह, जो शेष है’ के नाम रहा। कुछ दूर टकाडी गाड़ के किनारे चलने के बाद हम हरी-मुलायम घास पर बैठ गए। उत्साही जी की गाड़ की धारा और हरी घास की मानिंद जीवन से भरी कविताओं का आनंद लिया। सबसे पहले संग्रह की अंतिम और लम्बी कविता –‘नीमा’ का पाठ किया। यह मध्यवर्गीय जीवन के अंतर्विरोधों और संघर्षों को व्यक्त करती हुयी अनूठी कविता है। लगभग 18 पृष्ठों में फैली यह कविता जैसे-जैसे आगे बढती है, पाठक को अपने से जोड़ते चलती है। पता ही नहीं चलता है कि कब कविता पूरी हो गई। कवि-पत्नी को केंद्र में रखकर लिखी गयी यह कविता हर मध्यवर्गीय परिवार की दास्ताँ है। जिसमें यह विडंबना मुखरित होती है कि किस तरह एक स्त्री भावनात्मक, नैतिक और सामाजिक दबाव के चलते अपना पूरा जीवन परिवार के नाम कर देती है, लेकिन फिर भी हासिल आता है शून्य, तमाम कोशिशों के बावजूद वह बड़े-बूढों के आदर्शों पर खरी नहीं उतर पाती है कविता इतनी ईमानदारी से लिखी गई है कि हर पढने वाला उसमें अपना जीवन देखने लगता है। जब कविता पूरी हुई तो कवि मित्र चिंतामणि जोशीजी कहने लगे- इसे सुन मुझे अपना बीता जीवन याद आ गया। ऐसा ही कुछ मेरे साथ भी हुआ। बहुत कम कवि होंगे, जो आपबीती को इतनी बेबाकी से कह पाते हों। कहीं भी पुरुष का अहं आड़े नहीं आता है। पत्नी के प्रति इतना सम्मान उसी मन में हो सकता है, जो सच्चे अर्थों में पत्नी से प्रेम करता हो। इस कविता में पूरी बात अभिधा और सीधी-सरल भाषा में कही गई है। बावजूद इसके कहीं भी कविता लद्धड गद्य में नहीं बदलती। जीवन राग में डूबी होने के कारण काव्य की लय उसमें शुरू से अंत तक बनी रहती है। यह राजेश उत्साही की कविताओं की मुख्य विशेषता ही है कि उनकी कवितायेँ कला के बोझ से दबी हुई नहीं, बल्कि जीवन राग से भरी हुई हैं। उनमें जीवन धडकता हुआ मिलता है। इसका कारण है, उनकी कविताओं में जीवन की जद्दोजहद का होना है।

राजेश उत्साही की कविता के केंद्र में श्रम संलग्न दुनिया है, वे लोग हैं जिनके बिना उच्च और मध्यमवर्ग अपने आरामदायक जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकता है। इस दुनिया में कबाड़ खरीदते, गीत गाते, पालिश करते, झाड़ू लगाते बच्चे, चक्की पीसती स्त्री और तरह-तरह के श्रम करते जवान-बूढ़े सभी हैं। इस दुनिया के लोगों के दुःख-दर्दों और संघर्षों को कवि बहुत बारीकी से व्यक्त करता है। उनके साथ अभिजात्य दुनिया द्वारा किए जाने वाले अमानवीय और असंवेदनशील व्यवहार को रेखांकित करते हुए हमें उनके प्रति संवेदित करने की कोशिश करता है। साथ ही इस दुनिया के लोगों की आशा-आकांक्षाओं को स्वर देता है।

राजेश उत्साही के इस कविता संग्रह में प्रेम कवितायें भी हैं, सामाजिक सरोकारों की कवितायें भी और अपने व्यक्तिगत अनुभवों की कवितायें भी। व्यक्तिगत अनुभव की कवितायें इतनी सघन एवं सान्द्र हैं कि व्यक्तिगत न होकर हम सबकी जीवन की कवितायें हो जाती हैं। हर पाठक उनमें अपना जीवन देखने-महसूसने लगता है। उनके सुख-दुःख और संघर्ष में खुद को शामिल कर लेता है। यह इन कविताओं की सबसे बड़ी ताकत है।इन कविताओं को पढ़ते हुए लगता है कि कविता केवल वही नहीं होती है, जो कम शब्दों में अधिक बात कहती हैं, बल्कि कविता वहां भी होती है, जहाँ जीवन की सघनता और उसके ताजे विवरण होते हैं। राजेश उत्साही अपने आसपास जो अनुभव करते हैं, अपनी ज्ञानेन्द्रियों से और महसूस करते हैं अपने अन्तस् से उसे ही अपनी कविता में अभिव्यक्त करते हैं। इसलिए उनकी कवितायें सीधे दिल में उतर जाती हैं। हमें उनके नये कविता संग्रह का इन्तजार है।

आशा के बादलों की बरसात करतीं कवि‍ताएं

पढना बहुत लोगों का शौक होता है। अपने-अपने तरीके से लोग इसके लिए समय निकालते हैं। लेकिन घुमते हुए भी पढना और वह भी सामूहिक रूप से, ऐसा आपने  कम ही सुना होगा। घूमना  हो और  उसके साथ पढना, साथ ही पढ़े पर चर्चा इसके तो क्या कहने। उत्तराखंड के सीमान्त जनपद पि‍थौरागढ़ में कुछ शिक्षक-साहित्यकार साथी- महेश पुनेठा, चिंतामणि‍ जोशी, गि‍रीश पांडे, वि‍नोद उप्रेती, राजेश पंत, नवीन वि‍श्वकर्मा ‘गुमनाम’ आदि‍, जब सायंकालीन भ्रमण में जाते हैं, तो उनके हाथों में कोई-न-कोई पुस्तक होती है। वे उस पुस्तक को न  केवल पढ़ते हैं, बल्कि उस पर चर्चा भी करते हैं। उन्होंने इसे ‘चर्चा-ए-किताब’ नाम दिया है। इस अभियान की शुरुआत इस वर्ष (2016) मई से हुई। इसमें दो-तीन से लेकर कभी दस-बारह तक भी लोग हो जाते हैं। बाहर से  शहर में आने वाले साहित्यिक मित्र भी इसका हिस्सा बनते हैं। कभी-कभार पत्रिका या किताबों के लोकार्पण जैसे आयोजन भी इसमें होते है।

‘चर्चा-ए-किताब’ को ‘लेखक मंच’ पर इसी स्‍तंभ के तहत दि‍या जा रहा है। आप भी इस अनोखे ‘सायंकालीन भ्रमण’ का आनन्‍द लीजि‍ए। साथ ही अनुरोध है कि‍ आप भी जब अपने मि‍त्रों, परि‍चतों से मि‍लें तो इस पर चर्चा जरूर करें कि‍ पि‍छले दि‍नों कौन-सी अच्‍छी रचना या कि‍ताब पढ़ी। इससे समाज में रचनात्‍मक माहौल बनने में जरूर मदद मि‍लेगी।

9 मई 2016

rohit-kaushik

आज सायंकालीन भ्रमण के दौरान साथ में था, पिछले दिनों प्रकाशित रोहित कौशिक का काव्य संग्रह- ‘इस खंडित समय में’। संग्रह की कुछ  कविताओं का पाठ किया गया। इस संग्रह की कवितायें एक ऐसे समय को बारीकी से व्यंजित करती हैं, जिसमें ‘तार-तार हैं रिश्ते, तार-तार हैं संवेदनाएं, भरोसा तार-तार है, तार-तार हैं कल्पनाएँ और वहशीपन के  द्वारा मासूमियत को तार-तार किया जा रहा है।’ रोहित की कविता इस  तार-तार होते समय में जिसे वह खंडित समय कहते हैं, एक भरोसा पैदा करने की कोशिश करती हैं। वह दुःख-पीड़ा-करुणा, हर्ष-उल्लास के जीवद्रव्य से हृदयहीनता की बंजर जमीन पर कविता का पौधा पैदा करते हैं। यह कविता का पौधा उनके लोकजीवन के अनुभव और संवेदना से फलता-फूलता है। उसमें किसान-मजदूर का पसीना भी चमकता है और  कूड़ा बीनती फटेहाल बच्ची की करुणा भी फूटती है। उनकी कविता  अन्याय, शोषण और दमन के खिलाफ तनकर खडी हो जाती है। इस तरह निराशा के वातावरण में घिर आए आशा के बादलों की बरसात करती है। हमसे बढ़ती हमारी दूरी को ही ख़त्म करती है। साथ ही धर्म के हथियार से चेतना को कुंद करने की सत्ता की साजिश का पर्दाफाश करते हुए उसमें चोट भी करती है। अच्छी बात यह है कि रोहित अँधेरे के पसर जाने को जिंदगी का ख़त्म हो जाना नहीं मानते हैं, बल्कि वह मानते हैं कि अँधेरे से ही आती है रौशनी की लौ। हमारी जिंदगी को नयी राह दिखाता है अँधेरा। ऐसा वही कवि मान सकता है, जो जिंदगी के कागज़ पर अहसास की कलम से कविता लिखता है। वही गाँव से गायब होते गाँव को देख सकता है। अपने समय और समाज में घट रही समसामयिक घटनाओं को अपनी कविताओं का विषय बना सकता है। रोहित ने साम्प्रदायिकता, किसानों की आत्महत्या, उग्र राष्ट्रवाद, दामिनी बलात्कार काण्ड जैसे विषयों पर कवितायें लिखी हैं। उनका यह पहला ही संग्रह है और इसमें कथ्य और शिल्प के स्तर पर जैसी परिपक्वता दिखाई देती है, वह उनके भविष्य के प्रति हमें आश्वस्त करती है।

एक और दिवास्वप्न : कैलाश मंडलोई 

shekshik-dakhal

‘शैक्षिक दख़ल’ की समीक्षा-

शिक्षा जगत में हलचल मचाने वाली, बच्चों की शिक्षा-दीक्षा का चिंतन-मनन करती पत्रिका ‘शैक्षिक दखल’, शिक्षा जगत के अंगों में लग रहे जंग को शिक्षकों के साझा प्रयास से खुरचने का प्रयास कर रही है। यह एक अनूठी पहल है। जुलाई 2016 का यह अंक ‘प्रश्न पूछने से क्यों डरते हैं बच्चे’ विषय पर केन्द्रित है। इसका प्रत्येक आलेख बच्चों की शिक्षा-दीक्षा का एक प्रारूप प्रस्तुत कर रहा है। अपने बच्चों के प्रति चिंतित अभिभावकों एवं शिक्षकों के लिए यह अंक मार्गदर्शिका है। प्रारंभ के दो आलेख इस अंक की प्रस्तावना हैं। पहला आलेख ‘बच्चों के प्रश्नों को मरने न दे’ महेश पुनेठा का है, जो इस और संकेत करते हैं कि अधिकांश पालक एवं शिक्षक अपनी झूठी सत्ता को बनाए रखने के लिए बच्चों के प्रश्नों से बचते हैं। ज्यादा प्रश्न करने वाले बच्चों को नापसंद करते हैं। इस आलेख द्वारा समझाने का प्रयास किया गया है कि ‘बच्चों के प्रश्नों को मरने न दें’ क्योंकि प्रश्न ही तो हैं, जो हमें खोज-आविष्कार-सृजन की और ले जाते हैं। प्रश्न ही बच्चे में कल्पनाशीलता और रचनात्मकता का विकास करते हैं। इस विषय की प्रस्तावना को आगे बढ़ाता हुआ दूसरा आलेख है- प्रश्न न करने का मनोविज्ञान जो फेसबुक परिचर्चा पर आधारित है। इस फेसबुक परिचर्चा में लग-भग 60-65 शिक्षकों, चिंतक व लेखकों ने प्रश्न न करने के मनोविज्ञान पर अपने-अपने विचार निम्न बिंदुओं पर दिए हैं-

  1. आप बच्चे को प्रश्न पूछने के लिए क्यों प्रोत्साहित करना चाहेंगे?
  2. बच्चे प्रश्न करने से क्यों डरते हैं?
  3. यह भी एक तथ्य है कि बच्चे प्रश्न के गलत होने के डर से भी प्रश्न नहीं करते हैं,बहुत सारे बच्चों ने अपने उत्तर में यह बात कही। क्या आपको लगता है कि प्रश्न भी गलत हो सकता है? बच्चे के पास यह बात कहां से आई होगी?
  4. बच्चों में‘प्रश्न करने के प्रति झिझक’ की जड़ें क्या हमारे सामाजिक-राजनीतिक जीवन में भी देखी जा सकती हैं? 5. क्या आपको लगता है कि भाषा में अधिकार न होना भी बच्चे को प्रश्न करने से रोकता है?
  5. क्या प्रश्न करना सिखाया जा सकता है और कैसे?
  6. बच्चों को प्रश्न करने के लिए कैसे प्रोत्साहित किया जा सकता है?

डॉक्‍टर अनिता जोशी का आलेख ‘प्राथमिक शिक्षण एक चुनौती’, प्राथमिक स्तर के बच्चों एवं प्राथमिक कक्षा के शिक्षकों को ध्यान में रखकर लिखा गया है। प्राथमिक स्तर पर बालक सृजन की प्रवृत्तियाँ रखता है। जिज्ञासा के कारण पूछताछ की प्रवृत्ति अधिक होती है। प्राथमिक स्तर पर शिक्षक का कार्य संवेगात्मक विकास द्वारा बच्चों को सामाजिक सामंजस्य स्थापित करने योग्य बनाना है। अत: प्राथमिक स्तर पर अध्यापन करने वाला शिक्षक ही शिक्षा व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण स्तम्भ है।

डॉक्‍टर इसपाक अली का आलेख जनजातीय समाज, उसकी शिक्षा और समस्या की बात करता है।  ‘बचपन, कल्पनाशीलता और शिक्षा’ आलेख में आनन्द गुप्ता प्रश्न उठाते हैं कि बच्चों की कल्पनाशीलता और रचनात्मक सोच को कैसे बचाया जाए। इस बारे में सबसे बड़ी भूमिका विद्यालय और शिक्षकों को भी निभानी होगी। उनका कहना है कि शिक्षकों की सोच में भी रचनात्मकता और कल्पनाशीलता होनी चाहि‍ए तभी वे अपने बच्चों में इन गुणों का विकास कर सकेंगे। कालूराम शार्मा अपने आलेख में कहते हैं कि ‘जब जवाब पता है तो सवाल क्यों?’ कथित शिक्षा व्यवस्था चाहती है कि उसकी कक्षा के बच्चे हूबहू वहीं जवाब दें, जो अपेक्षा की जाती है। और वह अपेक्षा पाठ्य पुस्तक की सीमा से बंधी होती है। यानी सवाल भी मेरे और जवाब भी मेरे। यह कैसे हो सकता है। यहाँ वे प्रोफेसर यशपाल की बात रखते हैं। प्रोफेसर यशपाल कहते हैं कि स्कूल के सवालों और असल जिंदगी के सवालों में फर्क क्यों? वैसे इस निराशाजनक स्थिति के बावजूद ऐसे शिक्षक मिल ही जाएंगे, जो मौलिक सवाल उठाते हैं या बच्चों को सवाल करने को प्रेरित करते रहते हैं। देवेश जोशी का आलेख ‘उत्तर से मत डरिए, प्रश्‍न न पूछने से डरिए’, जब छात्र द्वारा पाठ्यक्रम को छोड़कर कोई प्रश्न पूछा जाता है, तो शिक्षक की क्या प्रतिक्रिया होती है और एक छात्र के मन पर इसका क्या प्रभाव हुआ, शिक्षकों को संदेश देता आलेख है। जब बच्चों को बार-बार चुप कराया जाता है, उन्हें आधे-अधूरे जवाब दिए जाते हैं, तो धीरे-धीरे बच्चों मन में प्रश्न के प्रति एक नकारात्मक ग्रंथि बन जाती है, जिससे वे प्रश्न करने से हिचकिचाते हैं। क्या करें कि प्रश्न के प्रति बच्चों की हिचकिचाहट दूर हो, इसे प्रस्तुत करता आलेख ‘प्रश्न करने से हिचकिचाते बच्चे’।

चिंतामणि जोशीजी कि कहानी ‘और दिलबर नठ गया’, एक ड्राप-आउट बालक की कहानी है। यह दिल को छूने और मन को झकझोर देने वाली कहानी है, जो अभिभावकों एवं शिक्षकों को अपने दायित्वबोध का संदेश दे रही है कि प्रताड़ना कभी भी प्रेरणा नहीं बन सकती और न ही प्रेरणा के बिना कोई बच्चा किसी प्रकार की सफलता प्राप्त कर सकता है। इसलिए यह सत्य है कि‍ बच्चे प्रताड़ित होकर आगे नहीं बढ़ते और इसी बात को आपने सही तरीके रखा है।

‘बचपन के दिन’ स्तम्भ के तहत ‘गुड-सेकेंड लड़का’ आलेख में लेखक पद्मनाभ मिश्र ने अपने बचपन से लेकर नौकरी लगने तक के जीवन का एक ऐसा स्पष्ट चित्र प्रस्तुत किया है, जिसमें हर बार उनकी इच्छा के विपरीत हुआ। इसे पढ़ने पर लगता है कि कई बार हमारे साथ भी ऐसा ही हुआ है और हम देखते है कि‍ कहीं-न-कहीं आम बच्चों के साथ भी ऐसा ही हो रहा है। मिश्रजी ने अपने जीवन चरित्र के माध्यम से यह बताने का प्रयास किया है कि‍ बच्चों को उनकी रुचि के अनुसार विषय पढ़ने की व्यवस्था की जानी चहिए। लेख बड़ा है, लेकिन बहुत कुछ देने वाला है। ‘आते हुए लोग’ स्तम्भ में, ‘मैं मासाप नहीं, तानाशाह बन गया’ आलेख में लेखक तारा सिंह चुफाल शाला में भयमुक्त वातावरण की बात करते हैं। बचपन में उन्होंने जो शिक्षकों की तानाशाह झेली, उसका सतही चित्रांकन किया है, जिसे आज भी कई मासूम बच्चे झेल रहे हैं। जब उन्हें गरीबी और बेरोजगारी ने बेमन से शिक्षक बनाया, वे भी तानाशाह बन गए। जब कई वर्षों बाद उन्होंने पाया की बच्चों को सिखाने की नहीं, उनसे सीखने की आवश्यकता है। और फिर कैसे उन्होंने बच्चों को प्यार किया, अपना बनाया। वे चाहते हैं कि‍ प्रत्येक शिक्षक बच्चों से प्यार करे, दुलार करे फिर पढ़ने-पढ़ाने की बात हो। ‘डायरी के पन्ने’ स्तम्भ में रेखा चमोली का आलेख ‘बच्चों की रचनात्मकता का एक मंच- बाल शोध मेला’, जो बच्चों को सीखने- सिखाने की प्रक्रिया में एक नवाचार लिए है। क्या है बाल शोध मेला इसका वर्णन विस्तार से किया गया है। बहुत ही रोचक व गतिविधि आधारित जानकारी है। अलग-अलग विषय लेकर इसे शाला में वर्ष में एक या दो बार करवाना चहि‍ए।

‘अनुभव अपने-अपने स्तम्भ’ में उत्तम मिश्रा का आलेख ‘मैं अपने छात्रों के घर जाऊंगा’, एक शाला त्यागी बच्चे को शाला में वापस लाने से उसकी नौकरी लगने तक की सच्ची कहानी। पत्रि‍का का प्रत्येक आलेख समाज, अभिभावक एवं शिक्षकों से यही प्रश्न पूछ रहा है कि प्रश्न पूछने से क्यों डरते हैं, बच्चे? कौन से कारक हैं, जो बच्चे को प्रश्न पूछने से रोकते हैं? लेकिन एक स्कूल ऐसा भी है, जहां बच्चे स्वयं प्रश्न पत्र तैयार करते हैं। यह एक नया प्रयोग कर रहा है- अजबपुर प्राथमिक विध्यालय।

अंत में दिनेश कर्नाटक लिखते हैं कि बच्चे प्रश्न नहीं करते क्यों कि हम उनसे संवाद स्थापित नहीं करना चाहते। क्योंकि हम उनके साथ आगे नहीं बढ़ना चाहते। क्योंकि हम अपने रोजमर्रा के सुविधाजनक ढर्रे को तोड़ना नहीं चाहते। क्योंकि हम परिश्रम नहीं करना चाहते। बच्चे प्रश्न नहीं करते क्योंकि हम भी प्रश्न नहीं करते। हम प्रश्न करते तो बच्चे भी प्रश्न करते।

शहरयार से एक मुकम्मल मुलाक़ात : संजीव ठाकुर

Shahryar

ज्ञानपीठ पुरस्कार से पुरस्कृत उर्दू शायर शहरयार की प्रसिद्धि उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलने से पहले से ही रही है । उनकी शायरी उर्दू से बाहर– विशेष रूप से हिन्दी के पाठकों के बीच अरसे से पढ़ी–सुनी जा रही है । हालांकि एक सच और है कि शहरयार की प्रसिद्धि में चार चाँद लगाने का काम उनकी उन ग़ज़लों ने किया है जो उन्होंने  फिल्मों– खासकर ‘उमराव जान’ के लिए लिखीं थीं । फिल्म का असर समाज पर ज्यादा व्यापक पड़ता है इसलिए शहरयार का नाम भी ज्यादा लोगों की जुबान पर चढ़ा । लेकिन  शहरयार नहीं चाहते थे कि उनकी पहचान फिल्मी गीतकार के रूप में बने । उन्हें ‘उमराव जान’ के गीतकार के रूप में स्वयं का परिचय देने में परेशानी भी होती थी । प्रेम कुमार को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा है– “पहले इस इंटरोडकशन पर कि मैंने उमराव जान के लिए गाने लिखे हैं, मुझे उलझन होती थी। लेकिन अब मैंने इस उलझन पर काबू पा लिया है। कभी-कभी मुझे एहसास होता है कि मैं अपनी अदबी अहमियत की वजह से फिल्म में गया था- और अब अदब में फिल्म की वजह से वापस आ रहा हूँ।“ (पृ.69)

शहरयार साहब ने ऐसी अनगिनत बातें की हैं प्रेम कुमार को दिए साक्षात्कारों में! प्रेम कुमार ने उन साक्षात्कारों को ‘बातों-मुलाकातों में शहरयार’ नाम से संकलित कर दिया है। वैसे तो इस किताब में संकलित तीन लंबे साक्षात्कारों से शहरयार साहब के व्यक्तित्व और कृतित्व की काफी बातें निकलकर सामने आती हैं, लेकिन सन 2011 के आठ महीनों की कई बैठकों में कभी किसी, तो कभी किसी मुद्दे पर शहरयार साहब से बात कर तिथिवार जो सामग्री प्रेम कुमार ने प्रस्तुत की है, उसमें शहरयार साहब के जीवन, उनके परिवेश, उनके घर-परिवार, उनके साहित्य आदि की अनेकानेक बातें कभी सायास तो कभी अनायास पाठकों के सामने आ गई हैं। साक्षात्कार करने की प्रेम कुमार की खासियत है कि बहुत कम पूछकर वह किसी से बहुत अधिक कहलवा लेते हैं। प्रेम कुमार की यह खासियत इस किताब में भी बखूवी दिखाई दे जाती है। बहुत ही शालीनता से प्रेम कुमार वैसे सवाल भी पूछ डालते हैं, जिन्हें पूछने में आम-तौर पर किसी को झिझक हो सकती है। मसलन सेक्स, स्त्री-पुरुष संबंध, समलैंगिकता, विवाहेतर संबंध आदि से जुड़े सवाल! जवाब देने वाले शायर शहरयार की ईमानदारी की बात भी कबूल करनी पड़ेगी कि उन्होंने पूरी ईमानदारी से सवालों के जवाब दिए हैं। अपने बारे में कही उनकी यह बात काबिले गौर है- “सेक्स की जानकारी मुझे बहुत कम उम्र में हो गई थी। ये मेरी बहुत कमजोरी रही। मैं बहुत इमेजिनेटिव था। जिस्म मुझे अट्रेक्ट करता रहा। अच्छी ज़िंदगी गुजारने का बहुत शौक रहा। यही कि अच्छा खाना, अच्छा पहनना, ताश खेलना…! शराब पीना बहुत जल्दी शुरू कर दिया था।“ (पृ.36)

इसी तरह अपनी पत्नी से अलगाव की बात भी वह बड़े आराम से कह जाते हैं। (पृ.75) पत्नी पर बिना किसी दोषारोपण के जिस तरह वह इस हकीकत का बयान करते हैं, वह उनके बड़प्पन का एहसास कराए बिना नहीं रहता। प्रेम कुमार तो उनसे दूसरी शादी के बारे में भी सवाल पूछने से नहीं चूकते! इसके जवाब में वह अपना ही शेर प्रेम कुमार को सुना देते हैं- “बुझने के बाद जलना गवारा नहीं किया/हमने कोई भी काम दोबारा नहीं किया।“

इस किताब को पढ़कर शहरयार साहब के बचपन, घर-परिवार, पिता, बच्चे, मित्र आदि के बारे में पता चलता ही है, धर्म, ईश्वर, आम-आदमी, स्त्री-पुरुष संबंध, स्त्री आरक्षण बिल, विश्वविद्यालय, समकालीन साहित्यकारों, हिन्दी के साहित्यकारों आदि के बारे में भी उनके विचारों का पता चल जाता है। मंचों पर शायरी कम पढ़ने के बारे में भी उनका एक खास तर्क था। मंच पर पापुलर शायरी पढ़ने को वह अच्छा नहीं मानते थे- “बहुत पापुलर करना वल्गराइज़ करना भी हो जाता है बहुत बार!” (पृ.26)

शहरयार साहब ने गज़लों से ज्यादा नज़्मो को अपनी शायरी में महत्त्व दिया था, लेकिन लोग उन्हें गज़लकार ही ज्यादा मानते थे। इस संबंध में पूछे जाने पर उन्होंने कहा था- “आमतौर से जब मेरी शायरी पर बात की जाती है तो आम लोग गज़ल को ही सामने रखते हैं… जबकि मैंने नज़्में गज़लों से ज्यादा लिखी हैं और नयी उर्दू शायरी के सिलसिले में मेरा ज़िक्र मेरी नज़्मों के हवालों से ज्यादा किया जाता है।“ (पृ.64)

और जब प्रेम कुमार शहरयार साहब से उनके ‘साहित्यिक प्रदेय’ के बारे में पूछते हैं तो वह बड़ी विनम्रता से कहते हैं- “हिन्दोस्तान और दुनिया में इतने बड़े-बड़े लोग…. कारनामे करने वाले लोग पैदा हुए हैं…। उस पर… हम अपनी ढपली बजाते रहें…। हमारी क्या विसात… समंदर में कतरा! ऊपर से देखिए…. नुक्ता-नुक्ता नज़र आता है आदमी! नीचे से आप देखते रहें…आईना सामने रखकर खुद को देखते हैं और बड़ा समझते हैं। मगर सच तो यह है…जैसा यगाना चंगेजी का एक शेर है….

‘बुलंद हो तो खुले तुझपे राज़ पस्ती का
इस ज़मीन में दरिया समाए हैं क्या-क्या!’

इस किताब में एक लंबा साक्षात्कार पाकिस्तानी शायर फैज अहमद फैज पर भी है। इस साक्षात्कार में फैज के बार में शहरयार साहब ने कई महत्त्वपूर्ण बातें कही हैं। एक प्रस्तुत है-“हाँ, हाँ, मेरी उनसे बारहा मुलाक़ात हुईं। बहुत ही निजी तरह की महफिलें। उन मुलाकातों में कभी हिंदुस्तान-पाकिस्तान की समस्याओं या रिश्तों वगैरह पर बातें नहीं हुआ करती थीं। वो यहाँ या वहाँ के मसायलों के बारे में कभी गुफ्तगू नहीं किया करते थे। वो कहते थे कि हम तो भाई मुहब्बत के सफ़ीर हैं। और इसके अलावा कुछ सोचते नहीं। उनकी पूरी शायरी में भी कोई ऐसी फीलिंग नहीं है जिसमें नफरत, जंग की हिमायत, दूरी फैलाने या फासला पैदा करने वाला कुछ हो। ऐसा कुछ दूर-दूर तक वहाँ नहीं है।“ (पृ.81)

इस किताब की एक और खासियत है कि इसमें प्रेम कुमार ने शहरयार साहब की चुनी हुई शायरी भी पेश कर दी है। इससे यह किताब शहरयार साहब की शायरी से अनजान पाठकों के लिए भी बहुत उपयोगी बन गई है। शहरयार साहब के व्यक्तित्व, उनके जीवन, उनके विचार वगैरह के साथ-साथ उनकी शायरी को पढ़कर पाठक शहरयार साहब से एक मुकम्मल मुलाक़ात इस किताब के जरिये कर सकते हैं। शहरयार साहब के ज्ञानपीठ मिलने के बाद उनसे हुई मुलाक़ात और उनकी मृत्यु के बाद का विवरण भी प्रेम कुमार ने इस किताब में प्रस्तुत कर दिया होता तो यह किताब शहरयार साहब की और मुकम्मल तस्वीर पेश करने में कामयाब होती !

पुस्तक : बातों–मुलाकातों में शहरयार
साक्षात्कारकर्ता : प्रेम कुमार
प्रकाशक : वाणी प्रकाशन, नई दिल्ल
मूल्य : 395 रुपये            

गागर में सागर : स्मिता

vigyan aur hum

विज्ञान को अगर रोचक तरीके से लिखा जाए, तो किशोर छात्रों के लिए यह विषय जानकारीपरक होने के साथ-साथ मजेदार भी हो सकता है। विज्ञान को कुछ ऐसा ही बनाने का प्रयास किया है वरिष्ठ विज्ञान लेखक देवेन्द्र मेवाड़ी ने। देवेन्द्र लगभग 25 पुस्तकें लिख चुके हैं, जिनमें से ज्‍यादातर विज्ञान पर आधारित हैं। ‘विज्ञाननामा’, ‘सूरज के आंगन में’, ‘विज्ञान बारहमासा’, ‘सौरमंडल की सैर’ आदि प्रमुख किताबें हैं, जो किशोरों के बीच बेहद लोकप्रिय हैं। विज्ञान को सरल और रोचक अंदाज में लिखने के लिए उन्हें कई राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित भी किया जा चुका है। लेखक उत्तराखंड के नैनीताल जिले से हैं। जो व्यक्ति प्रकृति के बीच ही पला-बढ़ा है, उससे बेहतर प्रकृति को और कौन समझ सकता है?

देवेन्द्र ने ‘वि‍ज्ञान और हम’ में कम शब्दों में विज्ञान के कई पहलुओं को खेल-खेल में बताया है। ‘सुनो मेरी बात’ अध्याय में लेखक ने अपने स्कूल और कॉलेज के दिनों को याद करते हुए विज्ञान के प्रति अपनी रुचि के पनपने की बात बताई है। आसमान में चमकते सूरज, चांदनी बिखेरते चांद, आकाश में अनगिनत तारों, पहाड़, घाटियों, मैदानों, नदियों, पेड़-पौधों के बारे में भी ढेरों सवाल रहते हैं। अमीर खुसरो की एक पहेली ‘एक थाल मोती भरा..’ की मदद से लेखक ने सौरमंडल के बारे में बड़े ही रोचक अंदाज में बताया है। उन्होंने एक पत्र के माध्यम से पृथ्वी के बारे में कुछ खास जानकारियां दी हैं, जिससे जटिल टॉपिक भी पठनीय बन जाता है। आगे एलियन के माध्यम से पृथ्वी, उसकी गोलाई, लंबाई, भार, केंद्र के तापमान आदि के बारे में बिल्कुल अलग तरीके से पेश किया है। इसके अलावा, समुद्र की अनोखी दुनिया, धरती के तपने और पर्यावरण और पर्यावरण संरक्षण के उपायों के बारे में बड़े ही आकर्षक ढंग से बताया है।

‘ताबीज’ नाटक के माध्यम से उन्होंने अंधविश्वासों के पीछे के सत्य को उजागर करने की कोशिश की है। इस किताब की जान है महान गणितज्ञ आर्यभट्ट, वैज्ञानिक मेघनाद साहा और माइकेल फैराडे के जीवन की झलकियों की दिलचस्प अंदाज में प्रस्तुति। यदि कहानी के फॉर्मेट और सरल भाषा में बात कही जाए, तो कठिन विषय भी आसानी से समझा जा सकता है। माता-पिता अपने बच्‍चों के लिए यह किताब खरीद कर उनका ज्ञानवर्धन कर सकते हैं।

(दैनि‍क जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण्‍, 08 मई 2016 से साभार)

पुस्‍तक- वि‍ज्ञान और हम
लेखक- देवेन्‍द्र मेवाड़ी
मूल्य – अजि‍ल्‍द-140 रुपये, सजि‍ल्‍द – 260 रुपये
प्रकाशक – लेखक मंच प्रकाशन
433, नीति‍खंड-3, इंदि‍रापुरम
गाजि‍याबाद-201014
ईमेल-anuraglekhak@gmail.com

एक शब्‍दयोगी की आत्‍मगाथा : अनुराग

Shabdvedh

शब्‍दों के संसार में पि‍छले सत्‍तर साल से सक्रिय अरविंद कुमार को आधुनि‍क हिंदी कोशकारि‍ता की नीवं रखने का श्रेय जाता है। कोशकारि‍ता के लि‍ए कि‍ए अपना सब कुछ दांव में लगाने वाले अरविंद जी का जीवन संघर्ष भी कम रोमांचक नहीं है। पंद्रह साल की उम्र में उन्‍होंने हाई स्‍कूल की परीक्षा दी और पारि‍वारि‍क कारणों से रि‍जल्‍ट आने से पहले ही दि‍ल्‍ली प्रेस में कंपोजिंग से पहले डि‍स्‍ट्रीब्‍यूटरी सीखने के लि‍ए नौकरी शुरू कर दी। एक बाल श्रमि‍क के रूप में अपना कॅरि‍यर शुरू करने वाले अरविंद कुमार कैसे दि‍ल्‍ली प्रेस में सभी पत्रि‍काओं के इंचार्ज बने, कैसे अपने समय की चर्चित फि‍ल्‍म पत्रि‍का ‘माधुरी’ के संस्‍थापक संपादक बन उसे एक वि‍शि‍ष्‍ट पहचान दी और फि‍र कैसे रीडर डायजेस्‍ट के हिंदी संस्‍करण ‘सर्वोत्‍तम’ की की शुरुआत कर उसे लोकप्रि‍यता के शि‍खर तक पहुंचाया, ये सब जानना, एक कर्मयोगी के जीवन संघर्ष को जानने के लि‍ए जरूरी है।

कोशकार अरविंद कुमार के जीवन के वि‍भि‍न्‍न पहलुओं और कोशकारि‍ता के लि‍ए कि‍ए गए उनके कार्यों को समेटे हुए पुस्‍तक ‘शब्‍दवेध’ एक दस्‍तावेजी और जरूरी    कि‍ताब है। अरविंद जी के जीवन और कर्मयोग के अलावा इस दस्‍तावेजी पुस्‍तक में प्रकाशन उद्योग के वि‍कास और हि‍न्‍दी पत्र-पत्रि‍काओं के उत्‍थान-पतन की झलक भी इसमें मि‍लती है। यह पुस्‍तक नौ संभागों पूर्वपीठि‍का, समांतर सृजन गाथा, तदुपरांत, कोशकारि‍ता, सूचना प्रौद्योगि‍की, हिंदी, अनुवाद, साहि‍त्‍य और सि‍नेमा में बंटी है।

समांतर कोश बना कर हिंदी में क्रांति लाने वाले अरविंद कुमार की यह अपनी तरह की एकमात्र आत्मकथा है। कारण- वह अपने निजी जीवन की बात इस के पहले संभाग पूर्वपीठिका के कुल 21 पन्नोँ मेँ निपटा देते हैं। जन्म से उस दिन तक जब वह माधुरी पत्रिका का संपादक पद त्याग कर दिल्ली चले आए थे और लोग उन्हें पागल कह रहे थे। उन का कहना है, ‘मेरे जीवन मेँ जो कुछ भी उल्लेखनीय है, वह मेरा काम ही है। मेरा निजी जीवन सीधा सादा, सपाट और नीरस है।’ इसके बाद तो  किताब में शब्‍दों के संसार में उनके अनुभवों और योगदान की उत्तरोत्तर विकास कथा है।

समांतर सृजन गाथा और तदुपरांत नाम के दो संभागों में हम पहले तो समांतर कोश की रचना की समस्याओँ और अनोखे निदानोँ से अवगत होते हैं। यह जानते हैं कि कथाकार कमलेश्‍वर द्वारा उसके नामकरण में सहयोग और नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा उसका प्रकाशन कैसे हुआ और उनके अन्य कोशों (समांतर कोश, अरविंद सहज समांतर कोश, शब्देश्‍वरी, अरविंद सहज समांतर कोश, द पेंगुइन इंग्लिश-हिंदी/हिंदी-इंग्लिश थिसारस ऐंड डिक्शनरी, भोजपुरी-हिंदी-इंग्लिश लोकभाषा शब्दकोश, बृहत् समांतर कोश, अरविंद वर्ड पावर: इंग्लिश-हिंदी, अरविंद तुकांत कोश) से परिचित होते हैं। किसी एक आदमी का अकेले अपने दम पर, बिना किसी तरह के अनुदान के इतने सारे थिसारस बना पाना अपने आप मेँ एक रिकॉर्ड है।

कोशकारिता संभाग हमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोश कला के सामाजिक संदर्भ और दायित्व तक ले जाता है। अमर कोश, रोजेट के थिसारस और समांतर कोश का तुलनात्मक अध्ययन पेश करता है।

सूचना प्रौद्योगिकी संभाग में अरविंद बताते हैं कि उन्होंने प्रौद्योगिकी को किस प्रकार हिंदी की सेवा में लगाया। साथ ही वह वैदिक काल से अब तक की कोशकारिता को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य मेँ पेश करने में सफल होते है। मशीनी अनुवाद की तात्कतालिक आवश्यकता पर बल देते है।

हिंदी संभाग मे वह हिंदी की मानक वर्तनी पर अपना निर्णयात्मक मत तो प्रकट करते ही हैं, साथ ही हिंदी भाषा में बदलावों का वर्णन करने के बाद आंखों देखी हिंदी पत्रकारिता मेँ पिछले सत्तर सालोँ की जानकारी भी देते है।

अनुवाद संभाग मेँ अनुवादकों की मदद के लिए कोशों के स्थान पर थिसारसों की वांछनीयता समझाते हैं। इसके साथ ही गीता के अपने अनुवाद के बहाने संस्कृत भाषा को आज के पाठक तक ले जाने की अपनी सहज विधि दरशाते हैं और ऐसे अनुवादों में वाक्यों को छोटा रखने का समर्थन करते हैं। वह प्रतिपादित करते हैँ कि पाठक के लिए किसी संस्कृत शब्द का अर्थ समझना कठिन नहीँ होता, बल्कि दुरूह वाक्य रचना अर्थ ग्रहण करने मेँ बाधक होती है।

साहित्य संभाग हर साहित्यकार के लिए अनिवार्य अंश है। इंग्लैंड के राजकवि जान ड्राइडन के प्रसिद्ध लेख काव्यानुवाद की कला के हिंदी अनुवाद शामिल कर उन्होंने हिंदी जगत पर उपकार किया हैा ड्राइडन ने जो कसौटियां स्थापित कीं, वे देशकालातीत हैं। ग्रीक और लैटिन महाकवियों को इंग्लिश में अनूदित करते समय ड्राइडन के अपने अनुभवों पर आधारित लंबे वाक्यों और पैराग्राफ़ोँ से भरे इस लेख के अनुवाद द्वारा उन्होँने इंग्लिश और हिंदी भाषाओँ पर अपनी पकड़ सिद्ध कर दी है। यह अनुवाद वही कर सकता था जो न केवल इंग्लिश साहित्य से सुपरिचित हो, बल्कि जिसे विश्व साहित्य की गहरी जानकारी हो।

सिनेमा संभाग की कुल सामग्री पढ़ कर कहा जा सकता है कि यह सब साहित्य संभाग मेँ जाने का अधिकारी था। कोई और फ़िल्म पत्रकार होता तो सिने जगत के चटपटे क़िस्सों का पोथा खोल देता, लेकिन अरविंद यह नहीं करते। जिस तरह उन्होंने माधुरी पत्रिका को उन क़िस्सोँ से दूर रखा, उसी तरह यहाँ भी वह उस सब से अपने आप को दूर रखते हैँ। यहाँ हम पढ़ते हैं जनकवि शैलेंद्र पर एक बेहद मार्मिक संस्मरणात्मक लेख, राज कपूर के साथ उन की पहली शाम के ज़रिए फ़िल्मोँ के सामाजिक पक्ष और दर्शकों की मानसिकता पर पड़ने वाले प्रभाव की चर्चा, फ़िल्म तकनीक के कुछ महत्वपूर्ण गुर।

माधुरी पत्रिका की चर्चा करने के बहाने वह बताते हैँ कि क्यों उन्होँने फ़िल्म वालों से अकेले में मिलना बंद कर दिया- जो बात उजागर होती है, वह पत्रकारिता मेँ छिपा भ्रष्टाचार।

इस संभाग मेँ संकलित लंबा समीक्षात्मक लेख माधुरी का राष्ट्रीय राजमार्ग प्रसिद्ध सामाजिक इतिहासकार रविकांत ने लिखा है,  जो अरविंद जी के संपादन काल वाली माधुरी के सामाजिक दायित्व पर रोशनी डालता है और किस तरह अरविंद जी ने अपनी पत्रिका को कलात्मक फ़िल्मोँ और साहित्य सिनेमा संगम की सेवा मेँ लगा कर भी सफलता हासिल की।

शब्दवेध की अंतिम रचना है प्रमथेश चंद्र बरुआ द्वारा निर्देशित और कुंदन लाल सहगल तथा जमना अभिनीत देवदास का समीक्षात्मक वर्णन। यह एक ऐसी विधा है जो अरविंदजी ने शुरू की और उन के बंद करने के बाद कोई और कर ही नहीँ  पाया। देवदास फ़िल्म का उन का पुनर्कथन अपने आप मेँ साहित्य की एक महान उपलब्धि है। यह फ़िल्म की शौट दर शौट कथा ही नहीँ बताता, उस फ़िल्म के उस सामाजिक पहलू की ओर भी इंगित करता है। देवदास उपन्यास पर बाद मेँ फ़िल्म बनाने वाला कोई निर्देशक यह नहीँ कर पाया। उदाहरणतः ‘पूरी फ़िल्‍म मेँ निर्देशक बरुआ ने रेलगाड़ी का, विभिन्‍न कोणों से लिए गए रेल के चलने के दृश्यों का और उस की आवाज़ का बड़ा सुंदर प्रयोग किया है। पुराने देहाती संस्‍कारों में पले देवदास को पार्वती से दूर ले जाने वाली आधुनिकता और शहर की प्रतीक यह मशीन फ़िल्‍म के अंत तक पहुँचते देवदास की आवारगी, लाचारी और दयनीयता की प्रतीक बन जाती है।

———————–

पुस्‍तक : शब्दवेध: शब्दों के संसार में सत्तर साल– एक कृतित्व कथा
लेखक : अरविंद कुमार
मूल्य रु. 799.00
प्रकाशक: अरविंद लिंग्विस्टिक्स, ई-28 प्रथम तल, कालिंदी कालोनी, नई दिल्ली 110065
संपर्क – मीता लाल. फ़ोन नंबर: 09810016568–ईमेल: lallmeeta@gmail.com