Category: लघुकथा

सुभाष चन्द्र लखेड़ा की लघुकथाएं

सुभाष चन्द्र लखेड़ा

सुभाष चन्द्र लखेड़ा

रक्षा शरीर क्रिया एवं सम्बद्ध विज्ञान संस्थान से सेवानिवृत वैज्ञानि‍क सुभाष चन्‍द्र लखेड़ा के वैज्ञानिक अनुसंधान कार्यों से जुड़े तीस से अधिक शोधपत्र एवं रिपोर्ट प्रकाशि‍त हो चुकी हैं। एक हजार पांच सौ से अधिक वैज्ञानिक लेख और विविध रचनाएं राष्ट्रीय स्तर की पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं और वि‍ज्ञान वि‍षयक करीब 140 वर्ताएं आकाशवाणी से प्रसारि‍त हो चुकी हैं। उनकी तीन लघुकथाएं- 

अपनी-अपनी कीमत   

राघवजी इस बार फिर लोकसभा का चुनाव लड़ रहे थे। वे पिछले चुनाव में हुई अपनी हार के कारणों का विश्‍लेषण कर रहे थे। उन्हें याद आये अपने  क्षेत्र के जाने-माने

लोक कवि ‘जागर’। जागरजी ने उस चुनाव में उनके प्रतिद्वंदी को अपना समर्थन दिया था। इसकी खास वजह भी थी। राघवजी इस क्षेत्र में मौजूद सभी शराब की दुकानों के मालिक थे और गांधीजी के अनुयायी जागरजी मद्य निषेध के कठोर समर्थक। ऐसे में वे राघवजी का समर्थन कैसे कर सकते थे ? खैर, ऐसा नहीं था कि तब राघवजी ने उनका समर्थन पाने के लिए कोशिश न की थी। वे तो किसी दलाल के माध्यम से जागरजी को  एक लाख रुपये तक देने को तैयार थे, लेकिन जागरजी ने उस प्रस्ताव को ठुकरा दिया था।
बहरहाल,  राघवजी के पास तभी उनके एक मित्र सुजान सिंह आये। वे स्थानीय इंटर कॉलेज में हिंदी के प्राध्यापक थे और अभी कोई दो वर्ष पूर्व यहाँ स्थानांतरित होकर आये थे।

राघवजी ने जब सुजान सिंह जी को जागर जी वाली बात बताई, तो थोड़ी देर तक तो वे भी किसी सोच में डूबे दिखे, लेकिन तभी वे खिलखिलाते हुए बोले, ” इस बार जागरजी का समर्थन आपको ही मिलेगा और अगर आपको नहीं भी मिला तो इतना पक्का समझिये कि किसी दूसरे को भी नहीं मिलेगा।”

” लेकिन वह कैसे ? ” राघवजी ने अपनी खुशी को दबाते हुए पूछा।

” बस आपको एक शॉल, श्रीफल और कुछ लोगों के लिए जलपान का प्रबंध करना है। यही कोई पांच-छह हजार खर्च होगा।” सुजान सिंह ने बताया। फिर उन्होंने अपनी इस योजना को सविस्तार राघवजी को समझाया।

एक सप्ताह बाद जागरजी को एक स्थानीय संस्था की ओर से ‘राष्ट्र गौरव सम्मान’ से  सम्मानित किया गया। समारोह में राघवजी के हाथों से उन्हें पुष्प माला पहनाई गई और शॉल एवं श्रीफल भेंट किया गया।
एक लाख रुपये में न बिकने वाले जागरजी को एक शॉल और श्रीफल में खरीदा जा चुका था और खुद जागरजी भी ये न जान पाये कि वे बिक चुके हैं।

उम्मीद

अपनी झुग्गी में लेटा हुआ वह अपने भविष्य के बारे में सोच रहा था। उसे गाँव में किसी रिश्तेदार के द्वारा कहे ये शब्द याद आ रहे थे- मुन्ना, शहर जा रहे हो तो वहाँ

ऐसा काम पकड़ना जिसमें भविष्य सुनहरा हो, भले ही शुरू में पैसे कम मिलते हों।

काफी सोच-विचार के बाद उसने तय किया कि वह चाय बेचने का काम करेगा क्योंकि कल शाम जब वह बगल के मैदान के सामने से गुजर रहा था तो कोई नेता मंच से कह रहा था- उन्होंने अपने जीवन की शुरुआत चाय बेचने से की थी और देखिये अब वे इस देश के प्रधानमंत्री बनने वाले हैं।

नजरिया 

सिन्हा साहब उस दिन शाम को पार्क में टहलते हुए मिले। अभी कुछ महीने पहले उनके बेटे की शादी में जाने का अवसर मिला था। कुशलक्षेम के बाद कुछ उदास स्वर में बोले, ” बहू का झुकाव अपने मायके की तरफ इतना अधिक है कि कभी-कभी लगता है कि‍ हमारा लड़का घर जंवाई है।

मैंने सांत्वना देते हुए कहा, ” आप चिंता न करें। धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा।” फिर मैंने टॉपिक बदलते हुए उनसे उनकी बेटी के बारे में पूछा तो उनके चेहरे की रौनक लौट आई। वे हँसते हुए बोले,” वर्माजी, भगवान ऐसी बेटी सबको दे। शादी हुए पांच साल हो गए हैं, लेकिन जब तक दिन में हमें दो बार फोन न कर ले, उसे चैन नहीं मिलता है।”

दीपक मशाल की दो लघुकथाएं

युवा लेखक दीपक मशाल की दो लघुकथाएं-

प्रतिनिधि

सुरजादेवी जिंदाबाद’, ‘जिंदाबाद जिंदाबाद’
‘बलवंत भईया जिंदाबाद’, ‘जिंदाबाद जिंदाबाद’

जयघोषों के बीच, चेलों-चपाटों से घिरे मुख्य अतिथि और समारोह की अध्यक्षा मंच पर जाकर आसीन हो गये। उस गाँवनुमा कस्बे में कुछ दिन पहले ही आये शहरी परदेसी ने अपनी जानकारी बढ़ाने हेतु अपने करीब वाले सज्जन से पूछा , ‘‘भाईसाब, ये कार्यक्रम की अध्यक्षा, सुरजादेवी तो आप लोगों की नगर पंचायत अध्यक्षा हैं ना?’’

‘‘जी भाई, सही पहचाना आपने।’’
‘‘तो फिर ये इनके साथ बलवंत भईया कौन हैं, जिनको लोग सुरजादेवी से भी अधिक मान दे रहे हैं?’’
‘‘इन्हें नहीं जानते आप? अरे ये नगर पंचायत अध्यक्ष प्रतिनिधि हैं, सुरजादेवी के घरवाले।’’
‘‘प्रतिनिधि! लेकिन जब पंचायत अध्यक्षा खुद ही मंच पर उपस्थित हैं तो प्रतिनिधि का क्या काम?’’

‘‘भाई असल में भाभी तो नाम की अध्यक्षा हैं, काम तो सब बलवंत भाई को ही देखना होता है। अच्छा भी तो नहीं लगता कि घर में आदमियों के होते हुए कोई औरत इतने बड़े फैसले ले। फिर ये तो हमारे संस्कार कहते हैं कि पराई औरत के गले में माला नहीं डाली जाती, इसलिए जनता का सम्मान स्वीकारने के लिए भईया को मजबूरन हर जगह मुख्य अतिथि बनना पड़ता है। अब जरा सुनने दो भईया जी क्या कहते हैं।’’

हराम-हलाल

मुझे थोड़ा बुरा तो लगा जब उसने मेरे घर आने पर खाना परोसते वक़्त मुझसे पूछा, ‘‘यह चिकन किस दूकान से खरीदा था तुमने?’’
‘‘वही पिकाडेली सर्कस स्टेशन के बाहर निकलते ही सीधे हाथ पर जो शॉप है ना, वहीं से।’’
‘‘ओत्तेरे की! यार मुझे कुछ वेज हो तो खाने को दे दो, वो स्साला गोरा हलाल मीट नहीं बेचता और तुम जानते ही हो कि मैं हराम नहीं खा सकता।’’

खैर, कैसे भी मैंने जल्द-फल्द उसके लिए आलू-मटर की सब्जी तैयार कर दी थी। लेकिन अगले दिन जब ऑफिस में बॉस के गैरहाजिर होने पर उसे कम्प्यूटर पर ताश का कोई गेम खेलते देखा तो पिछली रात को उसका बताया गया उसूल मैंने उसे याद दिला दिया। वो अगला-पिछला सब भूल हाथापाई पर कुछ यूँ उतरा कि मेरी नज़र से उतर गया। तब से न वो मेरी सुनना पसंद करता है और न मैं उसे कुछ कहना।

बीनू भटनागर की दो लघुकथायें

बीनू भटनागर

चर्चित लेखि‍का बीनू भटनागर की दो लघु कथायें-

नाम गुम जायेगा..

श्री वरुण सक्सेना एक सरकारी उच्च अधिकारी हैं, आयु  55 के क़रीब होगी। अपने सारे काम पूरी निष्ठा से करते हैं। बुद्धिमान हैं, अपने कार्यालय मे अच्छी छवि है।  याददाश्त इतनी अच्छी है कि क्रिकेट में कब क्या हुआ या कोई ऐतिहासिक घटना हो तुरन्त बता देते हैं। कभी-कभी उनकी पत्नी कहती हैं, ‘‘आपको तो कौन बनेगा करोड़पति में जाना चाहिये। जब भी यह कार्यक्रम देखते हैं फटाफट उत्तर देते जाते हैं, कोशिश करके एक बार वहाँ पहुँच  जायें तो कम से कम 50 लाख तो जीत ही सकते हैं।’’

याददाश्त इतनी अच्छी होते हुए भी सक्सेना साहब  के लिये अपनी पत्नी और बच्चों का जन्मदिन याद रखना मुश्किल  होता है, पर बच्चे और पत्नी इन अवसरों के आने से पहले ही इतने उत्साहित रहते हैं कि उन्हें याद आ जाता है। कभी बच्चे पहले आकर कह देते हैं, ‘‘मम्मी-पापा शादी की सालगिरह मुबारक हो’’ तो उन्हें भी याद आ जाता है कि  पत्नी को मुबारकबाद दे  दें।

सक्सेना साहब की सबसे बड़ी परेशानी है कि वह लोगों के और कभी-कभी स्थानों के नाम भी भूल जाते हैं। कभी किसी पार्टी में कोई बहुत दिन बाद मिलता और उत्साहित होकर पूछता, ‘‘कैसे हैं सक्सेना साहब, पहचाना नहीं क्या ?’’

‘‘अरे, कैसी बात कर रहे हैं पहचानूँगा क्यों नहीं।’’ कहने को तो सक्सेना साहब कह देते, वह उन महाशय को पहचान  भी रहे होते, बस नाम दिमाग़ से फ़िसल जाता। ऐसे मे वहाँ से खिसक लेने में ही भलाई समझते कि कहीं बात बढ़े और पोल न खुल जाये।

सक्सेना साहब का अपना परिवार काफ़ी बड़ा है। अपने भाई-बहनों के नाम तो याद रहते, पर उनके बच्चों के नाम कभी-कभी भूल जाते हैं। उनकी पत्नी के परिवार में बहुतों के दो नाम हैं- घर का एक नाम और असली नाम  कुछ बिल्कुल अलग, वहाँ तो उनकी मुश्किल दोगुनी हो जाती है। सक्सेना साहब को अक्सर सरकारी काम से शहर से बाहर जाना पड़ता। एक बार वह नई दिल्ली से लखनऊ  मेल मे सवार हुए। रात का समय था। ट्रेन चल चुकी थी। वह आराम से सोने की तैयारी में थे, कंडक्टर ने आकर भारतीय रेल का पास देखा। जैसे ही वह जाने को हुआ तो सक्सेना साहब ने कहा, ‘‘मुझे हरिद्वार में जगा देना।’’

कंडक्टर ने कहा, ‘‘सर, यह ट्रेन हरिद्वार नहीं जाती।’’

‘‘अरे, कैसे नहीं जाती, लखनऊ मेल ही है न।’’

कंडक्टर ने कहा, ‘‘जी सर, लखनऊ मेल ही है, पर हरिद्वार इस रूट पर नहीं पड़ता।’’

सक्सेना साहब कहने लगे अच्छा, ‘‘लखनऊ से क़रीब ढाई घंटे पहले कौन सा स्टेशन आता है ?’’

‘‘सर, हरदोई’’, कंडक्टर ने जवाब दिया।

‘‘बस, वहीं जगा देना।’’ सक्सेना साहब ने कहा।

‘‘जी सर,’’ कहकर कंडक्टर मुस्‍कराता हुआ चला गया।

आइने

दर्पण, आइना या शीशा जो भी कहें,  आख़िर किस काम आता है  ? यह भी क्या सवाल हुआ  ! चेहरा देखते हैं सब।  स्त्री हो या पुरुष अपना चेहरा सँवारने के लिये सबको इसकी ज़रूरत पड़ती है। जवानी में यह ज़्यादा ही काम आता है।   आमतौर पर आइना स्नानघर और ड्रैसर में ही लगाया जाता है।

पिछले कई सालों से आइने का प्रयोग वजह-बेवजह कुछ अधिक ही होने लगा है। मॉल के कौरिडोर में, बड़े-बड़े शोरूम की दीवारों पर, सीढ़ियों पर बड़े-बड़े महंगी किस्मों के चमचमाते शीशे लगे रहते हैं, पता ही नहीं चलता कि  सामने वाला दाँईं ओर से आ रहा है या बाँईं ओर से। कहते हैं कि शीशे लगाने से स्थान बड़ा नज़र आता है। मैं तो कहूँगी कि बड़ा क्या, पूरा दो गुना नज़र आता है। साड़ी की दुकान में आप साड़ियाँ देख रहे होंगे, सामने पुतले साड़ी पहने सजे होंगे और बहुत सी साड़ियाँ फैला कर सजाई गई होंगी। अगर आपके पीछे वाली दीवार पर पूरा शीशा ही लगा होगा तो ऐसा भ्रम होगा मानो जितना सामान दुकान में सामने है, उतना ही पीछे की ओर सजा है और  उतने ही ग्राहक बैठे हैं  तो हो गया  न दोगुने का भ्रम !

अब तो शीशे लगाने का रिवाज घरों मे भी चल पडा है, जिनके घर छोटे हैं वो घर बड़े दिखाने का भ्रम पैदा करना चाहते हैं। बड़े मकानों वाले लोग शायद मकान  को हवेली दिखाने का भ्रम पैदा करने का प्रयत्न करते हैं। घरों की सीढ़ियों पर, कमरों की किसी दीवार पर या कभी  बाल्कनी या बरामदों में भी बड़े-बड़े शीशे लोग लगाने लगे हैं। इससे एक फ़ायदा और भी है कि घर के लोग भी और मेहमान भी आते-जाते अपना चेहरा देख लें और ज़रूरत हो तो सँवार लें।

आइनों के भ्रमजाल में कई लोग भ्रमित हो जाते हैं। मैं भी हुई हूँ, पर मेरी मित्र शारदा को एक नहीं, दो बार आइनों की वजह से अजीब सी परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। एक बार वह अकेली ही कपड़ों की ख़रीदारी के लिये एक नये शोरूम मे गईं। आरंभिक डिसकाउंट चल रहा था। भीड़ भी थी ही।  काफ़ी ख़रीदारी कर ली, बिल बन गया। पेमैंट काउंटर पर ही कपड़ों के थैले मिलने थे। काउंटर पर पहुँचकर उन्होंने बिल और क्रैडिट कार्ड सामने  बैठे व्यक्ति की ओर बढ़ाया। पास मे बैठा हुआ व्यक्ति बोला, ‘‘मैडम, मै इधर बैठा हूँ।’’

असल में शारदा को भ्रम हो  गया  था कि काउंटर पर दो व्यक्ति बैठे हैं, जबकि था केवल एक  ! दूसरा तो उसका ही प्रतिबिम्ब था जिसकी ओर शारदा ने बिल और क्रैडिट कार्ड बढ़ाये थे। शारदा के मन की क्या स्‍थि‍ति‍ हुई होगी बताने की ज़रूरत है क्या  ?

दूसरी बार शारदा अपने पति विनोद जी के साथ कुछ आभूषण ख़रीदने एक बड़़े शोरूम में गईं। शोरूम पहली  मंज़िल पर था। सीढियों पर एक ओर की दीवार पर पूरा शीशा लगा हुआ था। सीढियों पर शारदा आगे थीं विनोद पीछे। शारदा ऊपर पहुँच कर कुछ पल के लिये रुक गईं।

विनोद जी ने कहा, ‘‘चलो न।’’

शारदा ने जवाब दिया, ‘‘इधर  बैठें या उधर।’’

विनोद जी को हँसी आ गई। बोले, ‘‘दाँईं ओर चलो। बाँईं तरफ़ कुछ नहीं है, शीशा   है।’’

ग़नीमत है, इस बार बात पति-पत्नी के बीच ही रही। किसी बाहर वाले को हँसने का मौक़ा नहीं मिला।  शारदा चाहती तो ये घटनायें किसी को नहीं बताती, पर उसने हम सबको बता कर ख़ुद भी ख़ूब मज़ा लिया।

वीरेंद्र नारायण झा की लघुकथाएं

 

गांव समया, महिनाथपुर(बिहार) में 08 अप्रैल, 1954 को जन्में चर्चित कथाकार-पत्रकार वीरेंद्र नारायण के लेख, कहानी, व्यंग्य, लघुकथाएं और कविताएं हिंदी तथा मैथिली की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। उनके पहले मैथिली कहानी संग्रह जीबाक बाट का प्रकाशन 2004 में हुआ।
समाजिक जीवन की विद्रुपताओं, राजनीतिक पतन और तेजी से फैल रही अपसंस्कृति के दुष्प्रभावों को चित्रित करती उनकी लघुकथाएं झकझोर देती हैं –
  

बच्चे की खुशी

शहर के सबसे बड़े सेठ के एक वर्षीय पुत्र का जन्मदिन बड़ी धूमधाम से मनाया जा रहा था। शानदार पार्टी रखी गई थी। शहर के तमाम बड़े लोगों को पार्टी में शिरकत करने के लिए निमंत्रण भेजा गया। आखिर वह शाम भी आई, जब सेठ के बच्चे का हाथ पकड़कर केट कटवाया गया तथा मोमबत्तियां बुझाने की रस्म अदा की गई। प्राय: सारे मेहमान पहुंच चुके थे।
ऐन वक्त पर बच्चा रोने लगा। सारे नौकर-चाकर दौड़े, आया दौड़ी। सभी बच्चे को चुप कराने का प्रयास करने लगे। जब उसने रोना बंद नहीं किया तो सेठ तथा सेठानी मेहमानों से क्षमायाचना करते हुए लाडले को चुप कराने में जुट गए। बच्चा था कि चुप होने का नाम ही नहीं ले रहा था। सेठ के डॉक्टर मित्र जो वहां मौजूद था, उसने बच्चे का डॉक्टरी जांच की, लेकिन सब कुछ ठीक-ठाक था। फिर भी बच्चे रोये जा रहा था।
अब मेहमान भी परेशान हो उठे। सभी बारी-बारी से बच्चे को चुप करने का उपाय करने लगे। एक महिला मेहमान ने सोने की साड़ी-पिन(ब्रोच) खोलकर बच्चे की हथेली पर रख दी। नेता-मंत्री मित्रों ने अपनी-अपनी टोपी उसके हवाले कर दी, अमीर मित्रों ने सोने की अंगूठी तथा सोने का फाउंटेन पेन दिखाई। कई घोड़े बने और बच्चे को अपनी पीठ पर लादकर घुमाया। छोटे-छोटे बच्चों ने भालू-बंदर की आवाज निकाली लेकिन सब व्यर्थ। जिद्दी बच्चे ने किसी भी चीज में अपनी रुचि नहीं दिखाई। रोता ही रहा।
अंत में पुलिस के एक बहुत बड़े अफसर तथा सेठ के जिगरी दोस्त ने अपनी जेब से पिस्तौल निकालकर बच्चे के हाथ में पकड़ा दी। बच्चा पिस्तौल थामते ही न केवल चुप हुआ, बल्कि खुशी के मारे उछलने भी लगा। सभी खुश थे कि बच्चे ने रोना बंद किया। पार्टी में जैसे जान आ गई।

संदेश

एक नोबेल पुरस्कार विजेता बाढ़ पीडि़तों की व्यथा-कथा जानने हेतु मिथिलांचल पहुंचा। व्यथा सुनने के बाद उसने सबसे एक ही प्रश्न पूछा, ”फिलवक्त आप लोग अपने भविष्य के बारे में क्या सोचते हैं?” सबने एक ही उत्तर दिया, ”हमने सपने देखने छोड़ दिए।” पहले तो वह चकित हुआ, लेकिन जब अपने प्रश्न को उसने अन्य लोगों के समाने रखा तो तब भी उनके उत्तर एक-से थे।
पीडि़तों का साहस, धैर्य तथा सुख-दुख के प्रति उनका समत्व भाव देखकर वह दंग रह गया।
राजधानी वापस आने पर पत्रकारों ने उनसे पूछा, ”मिथिलावासियों के नाम कोई संदेश?”
उसने बड़े ही सहज भाव से उत्तर दिया, ”संदेश में क्या दूं? संदेश लेकर तो मैं वापस जा रहा हूं।”
”वह क्या?” पत्रकारों ने एक साथ प्रश्न किया।
”यही कि कम सपने देखने वाले अधिक सुखी रहते हैं।”

शुक्रगुजारी

 पति और पत्नी दोनों कोख में पल रहे बच्चे के लिंग को लेकर काफी चिंतित थे। इस बार वे किसी तरह का जोखिम नहीं उठाना चाहते थे। डॉक्टरी जांच के बाद पाया गया कि कोख में दो जुड़वा बच्चे हैं। एक लड़का और दूसरी लड़की। उन्होंने भगवान को याद किया और आभार प्रकट किया।
उधर, लड़की अपने भाई का तहे दिल से शुक्रिया अदा कर रही थी जिसकी वजह से उसकी जान बच गई।

फिर हम क्या करेंगे

”बापू कल क्या है?” रसिया ने अपने बापू से पूछा।
बापू ने जवाब दिया, ”बेटी, कल नया साल आनेवाला है।”
”नया साल आने से क्या होता है, बापू?”
रामसरूप जो ग्रेजुएट था, रिक्शा चलाकर आपने परिवार का निर्वाह करता था। परिवार में पत्नी तथा सात साल की बेटी रसिया थी। पत्नी भी सरकारी फ्लैटों में कामकाज कर थोड़ा-बहुत उपार्जन कर लिया करती थी।
रामसरूप ने बिटिया को समझाते हुए कहा, ”बेटी, बारह महीने का एक साल होता है और आज रात खत्म हो जाएगा। कल आनेवाले साल का पहला दिन होगा। लोग खुशियां मनाएंगे, मिठाई खाएंगे, नाचेंगे-गाएंगे…।”
”फिर हम क्या करेंगे, बापू?” रसिया की आंखों में चमक थी।
”तुम भी इस्त्री किया हुआ कपड़ा पहनकर अम्मा के साथ मेमसाहब के यहां चली जाना। वहीं नया साल मना लेना। ढेर सारी मिठाई खाना, खेलना-कूदना…।”
”लेकिन बापू, मैं उनके यहां कैसे जाऊंगी! अम्मा बता रही थी कि साहब और बच्चों के साथ मेमसाहब मोटरगाड़ी में कही घूमने जाएंगी। रात को देर से घर वापस आएंगी। फिर हम नया साल कैसे मनाएंगे?”
रसिया के चेहरे पर उदासी छायी हुई थी। रामसरूप ने ढाढ़स देते हुए कहा, ”कल ने सही, एक दिन बाद तो मिठाई मिलेगी। मेमसाहब के यहां तो रोज नया-नया पकवान बनता है…। अब खुश?”
रसिया चहक उठी, उल्लास से बोली, ”क्या मेमसाहब के यहां रोज नया साल आता है बापू।”

सेज

एक किसान ने सपने में देखा कि उसके खेत में धान, गेहूं, मक्का, बाजरा वगैरहा की जगह छोटी-छोटी मोटरों के पौधे उग आएं हैं। पहले तो चकित हुआ, लेकिन चारों ओर रंग-बिरंगी चमचमाती मोटर कार की फसलें देखकर खुशी से खिल उठा। उसने अपने पड़ोसी के खेतों पर नजर दौड़ाई तो सब ओर मोटर की ही फसलें लहलहा रही थीं। फिर सबने एक-दूसरे को यह खुशखबरी सुनाई और समय से मोटरें काटरक घर लाने लगे। घर के बच्चे-बढ़े-औरतें सभी खुश थे कि उनका खेत अब अन्न के बदले मोटरें उगलने लगा है।
मोटरें बेचकर वे आराम से गुजर-बसर करने लगे। खाने के लिए घर में अन्न-पानी था ही, कमी होने पर दूर के हाट-बाजार से मोटरों में भरकर ले आते।
कुछ महीने बड़े ही आराम से कटे। धीरे-धीरे सब तरफ आनाज की कमी होती गई, क्योंकि किसानों ने अब मोटरों की खेती शुरू कर दी थी। हालात कुछ ऐसे बदले कि अन्न के लाले पडऩे लगे किसानों के घर। फिर उन्होंने खेती में आग लगा दी ताकि मोटरों की फसल नष्टï हो जाए और वे फिर से खेतीबारी शुरू कर सकें। लेकिन दुर्भाग्यवश ऐसा नहीं हो सका। मोटरें जल तो गईं, लेकिन जमीन खेती के लायक नहीं रह पाई। लाख कोशिशों के बावजूद वे खेतों में अन्न नहीं उगा सके।
अब वे अपने खेतों की मिट्टी के भाव बेचकर कहीं और पलायान करने की सोच रहे थे।
अचानक किसान की नींद खुली और वह सीधा खेत की ओर दौड़ा, यह देखने केे लिए नहीं कि वहां अन्न की फसल लहलहा रही है या मोटरों की, बल्कि यह देखने के लिए कि कहीं उसकी जमीन मिट्टी के भाव तो नहीं बिक गई?

(लघुकथा संग्रह भगवान भरोसे से साभार)

अपरोध बोध

सर्दियों के दिन थे। सुबह आठ बजे का समय। कर्मचारियों को फैक्टरी व दफ्तर और छात्र-छात्राओं को स्कूल-कॉलेज जाने की जल्दी। बस ने आज फिर देर कर दी। सवारियां मधुमक्खियों की तरह भिनभिना रही हैं।
बस रुकी। मैं तेजी से लपका। एक आदमी उठा। मैंने तुरंत सीट पर कब्जा कर लिया। पहले से खडे़ लोगों की ओर दयनीयता से देखते हुए मन ही मन विजयी भाव से मुस्कारा दिया।
अगला स्टाप आया। सैलाब फिर उमड़ा। जोर-जबरदस्ती करके कुछ लोग और चढ़ गए। उनमें एक महिला अपने दो बच्चों के साथ जैसे-तैसे चढ़ गई। एक बच्चा गोद में बिलखता हुआ और दूसरा पैरों के बीच भिंचा हुआ।
सबकी नजरें उसे घूरने लगीं। उसने याचना की दृष्टि से देखा, परंतु सभी ने मेरी तरह सभी न नजरें ऐसे घुमा लीं जैसे कुछ देखा समझा ही न हो।
मेरा पास बैठा व्यक्ति खिड़की से लगी अपनी बैसाखियां को खट-खट करता हुआ खड़ा हो गया और उसने महिला से कहा, ”आइए, बैठिए।”
मुझे लगा, जैसे में संवेदनाविहीन मांस का लोथड़ा मात्र हूं।

लेट-लतीफ

मुझे आज फिर देर हो गई। मैंने हड़-बड़ाकर घर से निकलते हुए घड़ी पर नजर डाल तो पांच मिनट लेट था। मैं तेजी से बस स्टाप की ओर बढ़ते हुए सोचने लगा- आज तो देर हो गई। बस तो निकल गई होगी। काश, आज बस लेट हो।
मोड़ पर मुड़ते ही बस दिखाई दी। मैंने दौड़ते हुए हाथ हिला दिया। बस रुक गई। मैं लपक कर चढ़ गया। मैंने घड़ी पर पुनः नजर डाली। दो-तीन मिनट और बीत गए थे।
भाई, ”बस जरा जल्दी चलवा।” पायदान पर पैर रखते ही मैं बोला।
”वे दो लोग भाग कर आ रहे हैं। अभी चलते हैं”, कंडेक्टर ने सपाट सा जवाब दिया।
”ऐसे तो कोई-न-कोई आता रहेगा। दफ्तर के लिए पहले ही बहुत देर हो गई। जल्दी-जल्दी बस चलवा”, मैं झुंझलाकर बोला।
कंडेक्टर ने ऐसे घूर कर देखा, मानो कह रहा हो कि यदि मैं भागकर आती हुई सवारियांे का ध्यान न रखता और बस को चलवा देता तो तुम तो रह ही जाते।
मैं चुपचाप आगे खिसक लिया।

सीख

मैंने बिस्किट का पैकेट दिया तो दोनों भाई आपस में लडऩे लगे।
‘आपसे में नहीं लड़ते। सब चीज मिल बांटकर खाते हैं’, मैंने समझाया।
दोनों भाइयों ने सहमति में सिर हिलाया और पैकेट खोलकर आपस में बिस्किट बांटने लगे। तभी पड़ोस का बच्चा आता दिखाई दिया।
‘चींटू आ रहा है। बिस्किट बाद में खाना’, मैंने पैकेट झपट लिया और अलमारी में रख दिया।
मेरा तीन वर्षीय बेटा बिस्किट का टुकड़ा चींटू की ओर बढ़ाते हुए बोला, ‘ले बइया, बित्कित थाले।’
मुझे शर्मिंदगी महसूस  हुई।

रीत

मैं रेलवे स्टेशन पर मधु को लेने गया। उसका चेहरा उतरा हुआ था। मैंने छेड़ा, ‘भैया-भाभी की याद आ रही है?’
वह तुनक गई, ‘मैं वहां नहीं जाऊंगी। वे लोग बुलाएंगे, तब भी नहीं जाऊंगी।’
‘परंतु तुम तो जिद करके गई थी।’
‘हां, पर अब मैं पछता रही हूं। हमारी वहां कोई इज्जत नहीं है। भाभी ने तो हमें देखते ही ऐसे मुंंह बना लिया, जैसे कोई मुसीबत आ गई हो। बात-बात पर सुनाना मेरे से सहा नहीं गया।’
‘राकेश भैया ने कुछ नहीं कहा’, मैंने और कुरेदा।
‘भैया क्या दोष? वह तो बहुत अच्छे हैं, लेकिन भाभी ही….’
‘खैर, अच्छा हुआ तुम लोग जल्दी आ गए। दीदी का पत्र आया है। वे लोग अगले सप्ताह आ रहे हैं।’
बच्चे तो खुश हुए, लेकिन मधु ने गहरी सांस ली। मानो उस पर घोर विपत्ति आने वाली हो।
मैं मन-ही-मन मुस्करा दिया।