Category: यात्रावृतांत

उस्ताद अलाउद्दीन खान के मैहर में कुछ घण्‍टे : सुधीर सुमन

उस्ताद अलाउद्दीन खान

पिछले साल भोपाल में फैज पर आयोजित एक कार्यक्रम से लौटते वक्त लेखक-पत्रकार सुधीर सुमन पहली बार मैहर गए। उनका रिपोर्ताज-

13 फरवरी, 2011, भोपाल, जश्ने फैज।
इंकलाब का इश्क, इश्क का इंकलाब-
बामे मीना से माहताब उतरे, दश्ते साकी में आफताब आए
हर रगे खूं में फिर चरागां हो, सामने फिर वो बेनकाब आए।
कैसा है वह महबूब जो बेनकाब होके सामने आये तो हर रगे खूं में चरागां हो जाएगा! अचानक मानो कोई भेद पा लिया हो मैंने। पहली बार जैसे इन पंक्तियों का पूरा अर्थ खुला। ट्रेन तो छूट ही जाती, अगर दोस्त राजू को एक बार उसका समय न देखने को कहता।

रात के अंधेरे से होके ट्रेन भागी जा रही है, भीतर भी कोई सफर जारी है। कटनी स्टेशन गुजर चुका है। एक अजीब-सा रोमांच है। मालूम है कि जहाँ उतरना है वह छोटा-सा स्टेशन है, कहीं आँख न लग जाए। जाग रहा हूँ। रात धीरे-धीरे घुल रही है किसी रोशनी के भीतर। रात का अंतिम प्रहर है। राग बसंत का कोई टुकड़ा जेहन में चल रहा है। अभी सूरज की लालिमा दूर है। सुबह के पहले प्रहर का राग अल्हैया बिलावल चेतना के किसी तलघर में बज रहा है। फूलों के बंद पंखुड़ी मानो धीरे-धीरे खुल रहे हों, संग भागते दृश्य अब खुलने लगे हैं। घरों और वृक्षों के साये नजर आ रहे हैं। खेत हैं और खेतों में गेहूँ की फसल है, इसका अंदाजा हो रहा है। एक साधु ट्रेन के गेट के पास खड़ा है। उसे भी वहीं उतरना है। आखिर सूरज भी आज हमारे साथ ही दाखिल होता है वहाँ। हल्का ललछौंहा सूरज, परवाज करते पंछी, ज्यों मद्धम सा कोई राग, जैसे राग जैजैवंती। जिसके सरोद और जिसकी भैरवी का जादू हमारे हृदय को हमेशा झंकृत करता रहा है, आज उसी साधक की कर्मभूमि पर था। और भैरवी ही क्या, उसने तो कितने ही राग-रागनियों को साधा था, उसे तो हेमंत, शोभावती, दुर्गेश्वरी, मदनमंजरी सरीखे कई रागों के निर्माण का श्रेय जाता है, वह तो कई-कई साज बजाने में पारंगत था, कई साजों के महान फनकारों का वह उस्ताद था। उसके शिष्य आज भी दुनिया में उसका नाम रोशन कर रहे हैं। उसी ने तो आम लोगों का एक बैंड बनाया था- मैहर बैंड। 14 फरवरी की वह सुबह सदा के लिए यादगार बन गई। मैं पहली बार मैहर में था, भारतीय शास्त्रीय संगीत के महान उस्ताद अलाउद्दीन खान की जमीन पर।

मैहर- एकदम छोटा-सा स्टेशन है। जहाँ टिकट मिलता है, वहीं एक तरह से क्लॉक रूम भी है। अपना भारी-भरकम बैग थमाया, रसीद ली और चल पड़ा किसी वाहन की तलाश में। चाय पीते हुए पता चला कि अकेले जाने पर छह गुना अधिक किराया लगेगा। समय कम है, अगली ट्रेन भी पकड़नी है। एक किशोर ऑटो वाले को हाथ देता हूँ। वह नहाने पर जोर दे रहा है, पहले मुझे ऐसी जगह ले जाना चाहता है, जहाँ नहा भी सकूँ। मैं पूछता हूँ कि मैं बिना नहाया लग रहा हूँ, तो वह सकपकाता है। ऑटो खुला और मैंने उससे पूछा कि क्या उस्ताद अलाउद्दीन के बारे में वह जानता है, 2 मिनट भी न हुये होंगे, उसने उनके घर के सामने ऑटो रोक दिया, घर रास्ते में ही था। सुबह हो चुकी थी, गेट बंद था। सामने बड़ा सा कैंपस था, गेरु रंग की दीवारें और खिड़़की और झरोखों का रंग- हरे और नीले का मेल हो जैसे। बायीं ओर एक खूबसूरत कलाकारी वाला घर, ऊपर एक छप्पर, बाद में मालूम हुआ कि वह मजार थी। खैर, बाहर से मैंने घर की तस्वीरें ली और आगे बढ़ गया कि लौटते वक्त देखूँगा।

मैं पहले पहाड़ पर मौजूद सरस्वती का वह मंदिर देखना चाहता हूँ, जहाँ अलाउद्दीन खां संगीत की साधना करते थे। ड्राइवर ऑटो आगे बढ़ा देता है। वहाँ पहुँचते ही वह जोर देने लगा कि चलिये मैं अपने जान-पहचान के प्रसाद वाले ले चलता हूँ, वह ठीक-ठाक प्रसाद देता है। मैंने उससे कहा कि मुझे प्रसाद वगैरह नहीं लेना, मैं सिर्फ इस मंदिर को देखने आया हूँ। उसने अजीब तरीके से मुझे देखा और तुरंत बोला- ‘तब मुझे भाड़ा दीजिए, मैं चलूँ।’ जबकि उसने वादा किया था कि लौटते वक्त वह मुझे उस्ताद के घर ले जाएगा। जाहिर है देवी तो इन लोगों के लिए रोजी-रोटी हैं और भक्त उसके माध्यम। उसने रास्ते में बताया भी कि इस कस्बे की जो भी तरक्की हुई, वह देवी के कारण ही हुई है। यद्यपि तरक्की कितनी हुई है, यह तो वहाँ मौजूद बहुसंख्यक लोगों के चेहरे और उनके कपड़ों से महसूस किया जा सकता है। ऑटो चालक जिसने बड़े गर्व से बताया था कि उसके पिता ने भी मंदिर तक सीढि़याँ बनाने के लिए पत्थर काटा था, और कि उस्ताद बड़े कलाकार हैं, जिन्होंने मैहर का नाम पूरी दुनिया में रोशन किया, पैसे लेकर अगली सवारी की तलाश में निकल गया। हालाँकि एक जगह चप्पल रखने के चक्कर में संकोचवश प्रसाद तो मुझे लेना ही पड़ा, वह अलग किस्सा है। खैर, ऑटो से उतरते ही सामने दिखते पहाड़ों ने नजर को जैसे बांध लिया।

मोबाइल का कैमरा ऑन किया और उस सड़क पे आगे की ओर बढ़ चला, जो मंदिर की ओर जाती है। सुबह के लगभग साढ़े सात बज रहे थे। चिडि़यों की चहचहाहट से वातावरण गुंजायमान था। मुझे मोबाइल से तस्वीरें लेते देख, एक छोटे लड़के ने आवाज दी- ‘इसका फोटो खींचो’, उसने अपने से एक बड़े लड़के की ओर इशारा किया, जो एक कुर्सी पर बैठा हुआ था। मैंने उसकी तस्वीर ली, वह थोड़ा-सा अचकचाया, लेकिन छोटे लड़के को खुश देखकर फिर सामान्य हो गया। सड़क के दोनों ओर चुनरी और प्रसाद की दूकानें थीं। पयासी जी, पांडेय प्रसाद भंडार, कामना प्रसाद भंडार, इसी तरह के कई टीन शेड वाले भंडार यानी प्रसाद की दूकानें। ग्रामीण स्त्री-पुरुषों का समूह और बच्चे बडे़ जोश में उनसे कदम से कदम मिलाते चले जा रहे हैं, कहीं पीछे न रह जाएँ, मुड़-मुड़ के देखती एक छोटी-सी बच्ची, बार-बार मेरे मोबाइल कैमरे की जद में आती है। एक बूढी अपने परिवार के पुरुष सदस्य से धीरे चलने का आग्रह करती है- ‘आगिए चली जाइत हऊअ भइया!’  मेरे बायें पुलिस चौकी है- ‘पुलिस चौकी, शारदा धाम, मैहर’ और दायीं ओर आगे एक विशाल ‘दीवार पोस्टर’ की तरह विवेकानंद की मूर्ति- उनकी सर्वाधिक मशहूर छवि। विवेकानंद की मूर्ति यहाँ किसने बनाई और उसका क्या मकसद हो सकता है, एक पल ये सवाल आए जेहन में, पर दृश्य तो तेजी से बदल रहे थे और कानों तक आती आवाजें भी। अब निगाह कैफे सुरबहार पर चली गई, बनाया है मध्य प्रदेश राज्य पर्यटन विभाग ने, मगर वह सिर्फ कैफे है, सुरबहार की आज की हकीकत है- कइसे बनी कइसे बनी फुलौरी बिना चटनी कइसे बनी और ये गोटेदार लहंगा जैसे गीतों की तर्ज पर बने धर्मिक गीत- आठो पहर माँ की करती हूँ पूजा/ मन में बसी हो, मन में बसी…. म्यूजिक बहुत तेज है।

तेज ही नहीं, कुछ ज्यादा ही सुलभ भी है आजकल म्यूजिक, उसको तो हम जेब में ही डाले घूमते रहते हैं। अचानक मोबाइल घनघना उठता है।

-अच्छा, तो आज वेलेंटाइन डे है! ओहो, 14 फरवरी है न! तो क्या करूँ? शमशेर की पंक्तियाँ झटके से जेहन में आती हैं- इल्मो-हिकमत, दीनो-ईमाँ, मुल्को-दौलत, हुस्नो-इश्क/आपको बाजार से जो कहिए ला देता हूँ मैं। एक शरारत भरा तंज फेंका जाता है कि मेरे जैसा नास्तिक भी मंदिर में पहुँच गया। लेकिन धर्म का जो बाजार सजा है, उसमें तो कोई खरीदार बनके गया ही नहीं हूँ मैं, और न ही मुझे देवी से कुछ मांगना है। क्या फर्क पड़ता है कि किसी महानगर या नगर के मार्केट में नहीं हूँ, मैहर में हूँ वेलेंटाइन डे के दिन।

उस्ताद अलाउद्दीन खान का घर।

सुनते हैं कि मैहर के राजा बृजनाथ उस्ताद अलाउद्दीन को मैहर ले आए थे। लेकिन कितना गहरा स्वाभिमान था उस जमाने के कलाकारों में! कहीं पढ़ी हुई एक घटना की याद आ गई कि किस तरह एक सूटेड-बूटेड युवक आया और बागीचे में साधारण पोशाक में मिट्टी से सने उस्ताद को देखकर उन्हें माली समझ बैठा और उस्ताद को बुलाने के लिए कहा। उस्ताद ने पूछा कि क्या काम है, तो उसका जवाब था कि संगीत सिखना है। उस्ताद ने कहा कि वे आराम कर रहे हैं, तो उसने बिगड़कर कहा कि जाकर कहो कि कोई बड़ा आदमी आया है। खैर, उस्ताद अंदर गए और कपड़े बदलकर जब बाहर आए तब तक एक रियासत के राजा पहुँच गए और उन्होंने पहुँचते ही उनके पैर छुए। अब शागिर्द बनने आया नौजवान लगा माफी मांगने। इस पर उस्ताद बोले- ‘तुमसे कोई भूल नहीं हुई, जिनके पास दो पैसे आ जाते हैं, वे गरीबों को इसी निगाह से देखते हैं। रही संगीत सिखाने की बात तो मैं तुम्हें संगीत नहीं सिखा सकता, क्योंकि जिस आदमी के दिल में गरीबों के लिए कोई दर्द नहीं है, उसमें संगीत जन्म नहीं ले सकता।’ कहते हैं कि उसने उस्ताद को रुपये पैसे का लालच भी दिया, लेकिन उनका दो टूक जवाब था- ‘संगीत को रुपये-पैसे से नहीं खरीदा जा सकता।’

मालूम नहीं यह घटना कितनी सच्ची है, लेकिन एक प्रिय और आदर्श कलाकार की जो छवि जनता गढ़ती है, वह भी तो कुछ ऐसी ही होती है न! कुदरत में मौजूद और हमारे अपने भीतर मौजूद संगीत की साधना भी तो किसी पहाड़ पर दम साधकर चढ़ने जैसा ही होता होगा। ऊपर पहाड़ पर मौजूद मंदिर को देखकर मैं तो सिर्फ कल्पना ही कर सकता हूँ कि कैसे उस्ताद उस मंदिर में पहुँचते होंगे और किस तरह उनकी संगीत साधना चलती होगी।

गो कि अब तो हमारे लिए मंदिर तक जाने के लिए लिफ्ट भी थी। लेकिन अपने पैरों से पहाड़ पर चढ़ने की चुनौती छोड़कर लिफ्ट में कौन जाए! और वैसे भी जब सीढि़याँ हों तो चढ़ना थोड़ा आसान हो जाता है। लेकिन आप आदी न हों तो थोड़ी अतिरिक्त मेहनत और ताकत तो लगती ही है। एक ओर सीढि़यों पर बैठे हैं भीख मांगते लाचार भिखारी, तो दूसरी ओर उन पर सीमेंट कंपनियों और सेठों के नाम विराजमान हैं- यश की लालसा है या विज्ञापन! दावे हैं कि किसी ने 200 तो किसी ने 400 तो किसी ने 500 सीढियाँ बनवाई हैं। इस लिहाज से तो लगता है करीब 1000 सीढि़याँ तो चढ़नी ही पड़ेगी, वैसे सीढि़याँ गिनने में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है। मैं तो एक सुर में ऊपर जाना चाहता हूँ, पर एक जगह दो-तीन मिनट के लिए रुकना पड़ता है। एकाध पेड़ों पर फूल नजर आते हैं। लगता ही नहीं कि बहार का मौसम है। झड़े हुए पत्तों वाले एक पेड़ पे एक बड़ा-सा सुर्ख लाल फूल आकर्षित करता है अपनी ओर। पहाड़ से नीचे एक जगह पानी ऐसे जमा हुआ है, जैसे किसी ने कहीं से उठा के उसे वहाँ रख दिया हो और वह वहीं लेट गया हो पैर पसारे, सिर ढलका है, बाजू फैले हैं, अपने बिखरे हुए कपड़ों का भी मानो उसे ध्यान नही है, वह ठहरा हुआ पानी मानो नींद में है अब तक- सुबह की सुगबुगाहटों से बेखबर।

देवी के मंदिर तक विज्ञान का पहुँचना लाजिम हैं, बिजली के तार हैं, जिस पर बैठी एक चिडि़या को देख रहा हूँ। भीड़ में फँसा हुआ, धीरे-धीरे ऊपर खिसक रहा हूँ। फिल्मी पैरोडी का शोर थमा नहीं है, पर इसी शोर में अचानक स्थानीय भाषा में गीत गाता महिलाओं का एक काफिला मिलता है, कानों को कुछ राहत मिलती है। सोचता हूँ कि कितना अच्छा होता कि या तो इन ग्रामीण महिलाओं की आवाज होती या सुबह के इस वक्त उस्ताद की भैरवी ही यहां गूँज रही होती या वायलिन पर उनके द्वारा संगीतबद्ध कीर्तन ही बज रहा होता, तो वातावरण कितना सुकूनदेह होता। लेकिन वह सब तो बस सीडी और इंटरनेट में है। उस महान साधक ने जहाँ वर्षों तक साधना की, वहीं से उसका महान सम्मोहक संगीत लापता है और फिल्मी गानों के तर्ज पर बनाए गए सतही किस्म के धार्मिक कहे जाने वाले गानों का बोलबाला है।

देर हो रही है, भीड़ में बच्चों के रोने की आवाजें हैं। लोग इतने हैं कि सीढि़याँ कुछ ज्यादा ही संकरी लग रही हैं। नीचे झाँकने पर हल्का-सा डर लगता है। अचानक कुत्तों के चिल्लाने और लड़ने की आवाज आती है, भीड़ में किसके पैर के नीचे दबे, पता नहीं! कहीं किसी के पैर के नीचे तो नहीं आ गए! ठीक मंदिर के पास वाली सीढ़ी से पहले मोड़ पर हैं हम। अपने अंदर से ही कोई चिल्लाता है- यहीं आना था तुम्हें, अभी अगर भगदड़ मच जाए तो चले जाओगे हजार फिट नीचे। वह व्यंग्य भी करता है- कितना अच्छा है, मोक्ष पा जाओगे! लेकिन एक बार चल पड़े तो वापस लौटना मुश्किल है, जो हो, जाना तो पड़ेगा ही ऊपर तक। एक तरफ बाबा अलाउद्दीन की लगन, उनकी साधना और माँ शारदा के प्रति भक्ति का इतिहास है, तो दूसरी ओर एक भीड़ का वर्तमान है, जहाँ एक मैहर माई हैं, जो लोगों की मनोकामनाएं पूरी करती हैं। दर्शनार्थियों में महिलाओं की संख्या अधिक है। आर्थिक रूप से ज्यादातर निम्न और कुछ मध्यवित्त लगते इन भक्तों के लिए कोई फर्क नहीं पड़ता कि मूर्ति किसकी है, इतना ही काफी है कि वह देवी हैं, वैसी ही जैसी बहुत सारी देवियाँ होती हैं। आखिर हम मंदिर में पहुँच जाते हैं, जहाँ मूर्ति को ठीक से देख पाना भी सम्‍भव नहीं है। जल्दी-जल्दी निकल जाने का निर्देश है। लोगों को भी इससे मतलब नहीं है कि कब की मूर्ति है, कैसी मूर्ति है। फोटो खींचना मना है, फोटो में देख लेंगे तो यहां आएँगे क्यों! बाजार प्रभावित होगा न! ऊपर पर्याप्त चौड़ी जगह है।

मैं मंदिर के चारों ओर मौजूद दूसरे पहाड़ों को देखने में मशगूल हो जाता हूँ। सूखे घास और उसके रंग वाली झाडि़यों और बौने पेड़ों वाले पहाड़ हैं और पहाड़ों के सामने वाले हिस्सों को जैसे किसी ने बिल्कुल सीधी दीवारों की तरह तरास दिया है। दूसरी ओर पहाड़ों के नीचे बीच के समतल मैदानी जगह में कुछ छोटे-छोटे खेतों में बिछी हरियाली की चादर और पानी के दर्पणों का अपना जादू है। मोबाइल कैमरे को जूम करके खेतों की हरियाली को करीब लाता हूँ। चारों ओर अद्भुत लैंडस्केप है, ट्री स्केप और माउंटेन स्केप भी। दूर क्षितिज पर चारों ओर कुछ धुंध-सा है, आसमान नीला और पहाड़ मटमैले, सामने बिल्कुल पास के पेड़ों के पत्ते पर कुछ पीलापन अधिक है।  मंदिर के पीछे की सड़क पर बिल्कुल शांति है। कहीं दूर कौए की काँव-काँव की आवाज सुनाई पड़ती है। कोई पक्षी बोल रहा है- डिक, डिक, डिक, डिक,….एक परिक्रमा-सा हो जाता है।

उस्ताद अलाउद्दीन खान की मजार।

अचानक घड़ी पर निगाह जाती है, अरे! ट्रेन का समय नजदीक आ रहा है। लगभग कूदता-फाँदता, वापस लौटते लोगों के बीच से रास्ता बनाता, तेजी से नीचे उतरता हूँ और पहुँच जाता हूँ उस्ताद के घर। इस बार गेट खुला मिलता है। जिसने भारतीय शास्त्रीय संगीत को कई रत्न दिए उस अप्रतिम साधक की मजार के पास खड़ा हूँ। उसी कैंपस में उनकी तथा उनकी पत्नी की मजार है। सामने जो घर है उसके दरवाजों की रंगाई का काम हो रहा है। मैं एक मजदूर से पूछता हूँ कि क्या उस्ताद से संबंधित कुछ चीजें देख सकता हूँ। एक प्रौढ़ सज्जन आते हैं और मुझे अंदर वहाँ ले जाते हैं, जहाँ उस्ताद की जिंदगी के सफर को समेटे हुए कई तस्वीरें मौजूद हैं। कहीं वे अंग्रेजी सूटबुट मे कड़ी-नुकीली मूंछों में किसी रायबहादुर सरीखे दिखते हैं, कहीं प्रधानमंत्री राजेंद्र प्रसाद से पद्मभूषण ले रहे हैं, षष्ठिपूर्ति के मौके पर मिला अभिनंदन पत्र भी है। उनके गुरु अमीर खां और उनके भी गुरु की तस्वीरें हैं। उस्ताद पाँच भाई थे। पाँचों एक तस्वीर में नजर आते हैं। उस्ताद अकबर अली खान की भी तस्वीर है। वे सज्जन जिनकी तीन पीढि़याँ उनकी सेवा में रही है, बताते हैं कि यहीं रविशंकर और निखिल बनर्जी को वे संगीत सिखाया करते थे। उनका नाम है दंडक रावत।

विजीटर बुक में जसम की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की ओर से अपनी साझी संस्कृति की इस महान प्रतिभा के प्रति अपने उद्गार दर्ज करता हूँ। दंडक जी मुझे उनकी मजार के पास ले जाते हैं, चेंबर खोल के दिखाते हैं चिरनिद्रा में सोए उस्ताद को। मैं उन्हें सलाम करता हूँ। बाहर दीवार पर एक बड़ा शिलापट्ट लगा हुआ है जिस पर यह दर्ज है कि यह मजार पद्मविभूषण आचार्य बाबा अलाउद्दीन खां साहब और माता श्रीमती मदीना खातून की स्मृति में बनाई गई है। किसी का लिखा हुआ याद आता है, अपनी पत्नी मदीना खातुन के लिए ही उस्ताद ने राग मदनमंजरी बनाया था। इस मजार को बनाने का काम 13. 2. 1992 को शुरू हुआ और 15.12.1994 को पूरा हुआ। इसके निर्माण में वास्तुशिल्पी तपन घोष, मिस्त्री मुहम्मद कमरुद्दीन, लखानी लाल पटेल की भूमिका और बाबा के घराने के कुछ छात्रा और अनुयायी तथा पंडित रविशंकर के सहयोग का भी जिक्र है।

बाबा के पुत्र और शिष्य अली अकबर खान के तरफ से लिखा गया यह संदेश पढ़ता हूँ- ‘‘मेरा यह हार्दिक विश्वास है कि एक महान संगीतज्ञ और महात्मा की स्मृति में निर्मित यह मजार किसी प्रकार के जाति, रंग एवं धर्मभेद न रखते हुए जीवन के उच्च लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए भावी पीढ़ी को प्रेरित करेगी और उनका ज्ञान पथ आलोकित करेगी।’’ मेरे मुँह से अनायास निकल जाता है- आमीन!

हर साल यहाँ संगीत समारोह होता है। इस समारोह में आने की सोचता हुआ, उस कैंपस से निकलता हूँ। जल्दी जल्दी भाग रहा हूँ, स्टेशन की ओर। जोरों की भूख भी लगी हुई है। एक नौजवान से स्टेशन की ओर जाने वाली सड़क के बारे में पूछता हूँ। वह भी स्टेशन जा रहा होता है। अपना नाम साहबलाल कोल बताता है, नेहरु युवा केंद्र और किसी एक एनजीओ से जुड़ा हुआ है। इस इलाके की शिक्षा के कम प्रतिशत को लेकर चिंतित है। उसे लगता है कि एनजीओ के माध्यम से वह दूर-दराज के लोगों से जुड़ पाता है। वह किसी भी पिछड़े हुए, अभावग्रस्त इलाके के नौजवान-सा है। माँ शारदा का नाम होटलों और दूकानों के साईनबोर्डों पर मौजूद हैं, लेकिन इस इलाके में शिक्षा को लेकर चिंतित इस नौजवान के सपने मालूम नहीं कब साकार होंगे! फिलहाल मंदिर की ओर जाने वालों की तादाद बढ़ गई है। मैं वापस लौट रहा हूँ। एक ऑटो के पीछे लिखा हुआ है- ऐ सनम तू जन्नत की हूर है, पर यह भी है कि तू मुझसे दूर है। सोच रहा हूँ कौन किससे दूर है और क्यों? कला, शिक्षा, नया समाज, आजादी, प्रगति, बेहतर जिंदगी, इंकलाब!  फिर फैज हैं लबों पर-
आइए हाथ उठाए हम भी
हम जिन्हें रस्मे-दुआ याद नहीं
हम जिन्हें सोजे-मुहब्बत के सिवा
कोई बुत कोई खुदा याद नहीं।

अमेरिकी पुलिस का लोकतंत्र : अनिल सिन्हा

हाल ही में (25 फरवरी को) जाने-माने लेखक और पत्रकार अनि‍ल सि‍न्‍हा का नि‍धन हो गया है। श्रद्धांजलि‍ स्‍वरूप में उनका यह यात्रावृतांत दि‍या जा रह है-

अमेरिकी सैनिकों की बर्बरता व क्रूरता से आज पूरी दुनिया परिचित है। ऐसा शायद ही कोई दिन होता हो जब अमेरिकी सैनिक दुनिया के किसी न किसी हिस्से में अपने करतब न दिखा रहे हों। दरअसल उनका प्रशिक्षण ही ऐसा है कि उन्हें ट्रिगर, बैरल, बम राकेट आदि के सामने जो भी दिखाई देता है, चाहे वह आदमी हो या प्रांतर, उसे उड़ा देना है, उसे नेस्तनाबूद कर देना है। यह ट्रेनिंग उन्हें तब से मिलती आ रही है जब कोलम्बस ने अमेरिका की खोज की थी और वहां के मूल निवासियों को नेस्तनाबूद करते हुए ब्रितानी, मेक्सिकन आदि साम्राज्यवादियों के लिए यहां का रास्ता खोल दिया था। हॉवर्ड जिन जैसे अमेरिकी लेखक ने इस स्थिति को बड़े प्रमाणिक और तथ्यपूर्ण ढंग से अपनी किताब ‘पीपुल्स हिस्ट्री आफ अमेरिका’ में लिखा है। सैनिकों की बात छोड़ दें तो अमेरिकी पुलिस और जितनी तरह के सुरक्षाकर्मी हैं, जैसे- इमिग्रेशन आफिसर, रेल पुलिस, सिविल पुलिस आदि कानून लागू करने के नाम पर हिंसा और बर्बरता की हद पार करते हुए दिखाई देते हैं। फोमांट (कैलीफोर्निया, अमेरिका) से लौटते हुए मुझे कुछ महीने बीत गए हैं, पर वहां की पुलिस की बर्बरता मेरी आंखों के सामने बार बार नाच उठती है। किस हद तक जातीय द्वेष-

वह एक ठंडा दिन था। 31 दिसंबर, 2008 की मध्य रात्रि, कुहराविहीन, झक्क तारों से भरे आसमान में अमेरिकी बत्तियों की तेज रोशनी तुरंत ही कहीं गुम हो जा रही थी। अमेरिका में और शायद पश्‍चि‍म में भी दो बड़े त्यौहार समारोह होते हैं- बड़ा दिन (क्रिसमस) और नया साल। सैन फ्रांसिस्‍को में नये साल का भारी उत्सव होता है। पूरी बे एरिया (खाड़ी) के शहर से लोग सैन फ्रांसिस्को के घंटाघर के खुले में इकट्ठे होते हैं। पुराने साल की वि‍दाई देने के लिए और नए साल का स्वागत करने के लिए। प्रशांत महासागर की खाड़ी पर बसा सैन फ्रांसिस्को इस समय जन समुद्र की लहरें एक तरह से संभाल नहीं पा रहा है। फ्रीमांट से हम भी सैन फ्रांसिस्को के इस समुद्र में खो गए थे। मेरे लिए नया अनुभव था जहां उम्र और अवस्था, काले-गोर का भेद नहीं था। कोई एक समारोह-उत्सव था जो लोगों को जोड़े हुए था इस घंटाघर चौक से। शीत की परवाह नहीं, लोग कॉफी पी रहे हैं, आइसक्रीम, बर्गर और पेस्ट्री खा रहे हैं, कोक पी रहे हैं और बारह बजने का इंतजार कर रहे हैं। एक दूसरे पर गिरते पड़ते व घंटाघर के नजदीक पहुंचना चाहते हैं। चारों ओर ऊंची अट्टालिकाएं हैं। विशाल होटल सीरीज बल्ब से जगमगा रहे हैं। दूर-दूर तक कोई पब्लिक ट्रांसपोर्ट (गो की अमेरिका में सार्वजनिक यातायात अच्छा नहीं है) और निजी वाहन का पता नहीं। आज सब प्रतिबंधित हैं और सुरक्षा के जवान चारों ओर छितराए हैं- पूरी तरह से चौकस। बिल्ली की तरह उनकी नजरें चारों ओर घूम रही हैं पर कोई हस्तक्षेप नहीं कर रही हैं। बारह बजा और पटाखों और विभिन्न प्रकार की आतिशबाजियों से सैन फ्रांसिस्को जगमगा उठा। ऐसी ही आतिशबाजियां तमाम लोगों के मन में छूट रही थीं। यहां हम विदेशी थे फिर भी पूरा माहौल अच्छा लग रहा था, खुशियों से भरा हुआ और उन युवाओं का तो पूछना ही क्या जिन्होंने प्यार की दुनिया की पहली यात्रा शुरू की थी। अभी तो कुछ ही कदम चले थे। पूरी यात्रा बाकी थी…

हम फ्रीमांट से सैन फ्रांसिस्को ‘बार्ट’ (बे एरिया रैपिड ट्रांजिट डिस्ट्रिक्ट- इसे बोलचाल में यहां बे एरिया रैपिड ट्रांसपोर्ट भी कहते हैं) से आए थे। वापसी भी उसी से थी क्योंकि आज निजी वाहन समारोह स्थल तक पहुंच ही नहीं सकते थे। छोटी दूरी की रेल सेवाओं में ‘बार्ट’ सबसे सुव्यवस्थित सेवा मानी जाती है। (कुछ दूरी तक इसे समुद्र के नीचे से भी गुजरना पड़ता है)। कुछ सेवायें सैन फ्रांसिस्को से सीध हैं, कुछ बीच में तोड़कर यानी सेवा बदल कर फ्रीमांट पहुंचती हैं। सुरक्षा का प्रबंध बार्ट में भी है। जिस तरह भारतीय रेल में रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) होते हैं, उसी तरह ‘बार्ट’ में भी बार्ट पुलिस हैं- अपने ‘काम’ में पूरी तरह चाक चौबंद।

31 दिसंबर 2008 की मध्य रात्रि थी पूरी तरह सर्द और हमारे लिए हाड़ भेदने वाली फिर भी बहुत उत्साह के साथ लोगों ने सन् 2009 का स्वागत किया था। किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता था कि रात कितनी सर्द है या समय कितनी तेजी से भाग रहा है पर लोगों को पता था कि तीन बजे भोर में अंतिम गाड़ी जाएगी। फिर ट्रेनें विराम लेंगी और सुबह से ही शुरू हो पाएंगी। इसी अहसास के कारण लोगों के समय बंध गए थे और भीड़ लगातार ‘बार्ट’ स्टेशन की ओर भाग रही थी। अमूमन यहां की बसें और ट्रेनें खाली होती हैं पर उस दि‍न सर्द रात में भी ट्रेनें ठसाठस भरीं थी। हम दो बजे तक ही स्टेशन पहुंच पाए तब पता चला कि सीधी फ्रीमांट जाने वाली अब कोई ट्रेन नहीं हैं। हमें बीच के किसी स्टेशन संभवत ओकलैंड में ट्रेन बदलनी होगी। एशियाई मूल के हर उम्र के लोगों से स्टेशन भरा था। उनमें काले लोगों की संख्या ज्यादा थी। अमेरिकी नागरिकों में काले लोगों की संख्या काफी है, फिर भी वे कानूनी दृष्टि से हर चीज में बराबर हैं। जहां मेरिट का मामला है अगर वे उसमें आ जाते हैं तो किसी गोरे अमेरिकी नागरिक को वहां नहीं डाल दिया जाएगा, पर अंदर कहीं एक जातीय श्रेष्ठता का दर्प गोरे अमेरिकी नागरिकों में मौजूद है। कई जगह इसके उदाहरण भी मिलते हैं। व्यवहार में ऐसी जातीय श्रेष्ठता या काले होने के कारण उसे दोयम दर्जे का मानाना दीखता है।

शायद यह संयोग ही होगा कि हमारे आगे युवाओं का एक जत्था चलता रहा। उनमें पांच लड़के और तीन लड़कियां । सभी 20 से 25 वर्ष के आसपास रहे होंगे- पर्व के उत्साह से भरे हुए- बहस, हंसी ठट्ठा, थोड़ी बहुत टीका-टिप्पणी जिसे हम पूरी तरह समझ नहीं पा रहे थे पर उनकी मुद्रा से लग रहा था कि वे उनके युवा- मस्ती व फाकेमस्ती के दिन थे। वे काम भी करते थे, पढ़ भी रहे थे। अपनी प्रेमिकाओं से शादी भी करना चाहते थे और रि‍सेशन (व्यापक छटनी, मंदी, बेरोजगारी) से डरे हुए थे। दुनिया के पहले देश का युवा नागरिक बेरोजगारी व अनिश्‍चि‍त  भविष्य ये चिंतित था। वे इन्हीं बातों को लेकर आपस में बहस भी कर रहे थे और शायद बुश प्रशासन की आलोचना भी जिसने अमेरिका को गारत में डाल दिया। उनकी बातें शायद कुछ सफेद, गोरे बुजुर्गों को अच्छी नहीं लग रही थीं। वे भी हमारे साथ ही चल रहे थे और भीड़ के दबाव के कारण कभी उन्‍हीं की तरफ हो जाते तो कभी हमारी तरफ। वे उन्हें घूर रहे थे। हमारी ओर भी देख रहे थे पर उन्हें अहसास हो गया कि हम एशियाई विदेशी हैं।

ट्रेन आई। भीड़ जितनी उतरी उससे ज्यादा चढ़ गई। हम सब एक ही डिब्बे में चढ़े पर एक किनारे हम थे और दूसरे किनारे आठ युवाओं की वह जत्था और गोरे अमेरिकी। युवाओं का जत्था पहले की तरह  उन्मुक्त होकर बातें कर रहा था, कभी-कभी उनकी आह्लाद भरी चीख हमारे पास भी पहुंच रही थी जिससे लगता था कि गाड़ी की गति के शोर, भीड़ भरे डिब्बे का शोर चीर कर अगर वह हमारे तक पहुंच रही है तो उस आह्लाद में कितना जोश होगा। नये साल के स्वागत ने शायद उनमें आशाएं भर दी थीँ क्योंकि ओबामा उन्हीं की बदौलत उन्हीं की बिरादरी का देश का सर्वशक्तिशाली नेता बन गया था और बुश प्रशासन के विभिन्‍न कदमों के विरुद्ध निर्णय लेने की सार्वजनिक घोषणाएं कर चुका था। खासतौर से इस खाड़ी क्षेत्र और कैलिफोर्निया से उसे भारी समर्थन मिला था।

ट्रेन की गति काफी तेज थी। इस बीच उन गोरे बुजुर्गों में कोई कहीं बार-बार फोन कर रहा था। उनके चेहरों पर संताप व क्षोभ के भाव रहे होंगे। डिब्बे में तेज रोशनी होते हुए भी जहां हम बैठे थे वहां से उनका चेहरा नहीं दिख रहा था। गाड़ी बीच में ही (शायद टवे, ओकलैंड) रुक गई। उसका अंतिम पड़ाव यहीं था। अब हमें दूसरी गाड़ी में सवार होकर फ्रीमांट पहुचना था। डिब्बे में जो सुखद गर्मी थी वह प्लेटफार्म पर आकर लहूलुहान हो गयी। हमने अपने कोर्ट के कालर खड़े कर लिए। मफलर को इस तरह लपेटा जो कान, गला ढंकते हुए सिर पर पहुंचकर टोपी का भी काम दे दे। गो कि यह मौसम यहां पतझड़ का था पर ठंड मेरे लिए दुख पहुंचाने वाली स्थिति तक जा रही थी- रात्रि के ढाई बज रहे थे। इसी समय प्लेटफार्म पर गोली चली, उसकी बहुत धीमी आवाज के बावजूद वह हमें सुनाई दे गई क्योंकि जितने लोग भी यहां चढऩे-उतरने वाले थे सब चुपचाप अगली गाड़ी का इंतजार कर रहे थे, सर्द रातें वैसे भी काफी सन्नाटा भरी होती हैं। गाड़ी दो मिनट बाद आने वाली थी।

गोली की आवाज से हम चौंके। जिस डिब्बे से हम उतरे थे उसी के दूसरे दरवाजे के सामने गोली चली थी और उन आठों में से एक गठीला नौजवान प्लेटफार्म पर खून के बीच तडफ़ड़ाकर शांत हो चुका था। बार्ट पुलिस के एक अधिकारी ने उसे गोली मार दी थी। अधिकारी गोरा था जोहान्स मेहशर्ल। बार्ट पुलिस ने उन्हें घेर रखा था और बाकी लोगों को वहां से हटा रही थी। लोगों को हटाने के लिए महिला पुलिस को तैनात किया गया था। शायद पुलिस लोगों को लिंग संबंधी कमजोरी को जानती थी। पर प्लेटफार्म पर ही बार्ट पुलिस के विरोध में नारे लगने शुरू हो गए। नारे उस जत्थे के बचे सात साथियों ने शुरू किये जो एकदम से प्लेटफार्म के इस पार से उस पार फैल गए। मीडिया ने तत्काल कवर किया। कुछ ही देर में खबर आग की तरह फैल गई। और प्लेटफार्म के बाहर शहर का जो हिस्सा था वहां से भी नारे की आवाजें आ रही थीं। वह लड़का ओकलैंड का निवासी ऑस्कर ग्रांट था। वह काम भी करता था, पढ़ाई भी करता था। उसकी एक बेटी थी और वे फरवरी, 2009 में किसी तारीख को शादी करने वाले थे। बाइस साल के किसी युवा को तड़प कर शांत होते हुए मैंने पहली बार देखा था। इस घटना ने मुझे सन्न कर दिया था। स्टेशन पर ट्रेन आने की जो सूचना आ रही थी वह मुझे दिखाई नहीं दे रही थी। सन् 1984 में जब भारत में सिख विरोधी दंगा हुआ था, तब लखनऊ जंक्‍शन के बाहर कुछ सांप्रदायिक उग्रवादी हिंदुओं द्वारा मैंने एकसिख युवा को जलाया जाते हुए देखा था। वहां स्टेशन पर पंजाब मेल घंटों से रुकी थी, वह कब आएगी इसकी कोई सूचना नहीं आ रही थी। सारा देश स्थगित था उस दिन। पंजाब मेल से ही आनंद स्वरूप वर्मा, अजय सिंह तथा पार्टी के विभिन्न साथियों को कलकत्ता सम्मेलन में जाना था। मैं उन्हें विदा करने आया था क्योंकि मेरा जाना संभव नहीं हो पाया था। उस एक घटना ने मुझे कई साल तक परेशान किया। आज भी वह समय-समय पर एक काले निशान की तरह उभरता है और असहज कर जाता है- कम से कम उस दिन तो कोई काम नहीं हो पाता। और इतने वर्षोँ बाद एक काले अमेरिकी नागरिक की गोरे अमेरिकी पुलिस के एक हिस्से द्वारा सरेआम पहली तारीख के नव वर्ष पर्व के दिन हत्या कर दिया जाना…

हम जानते हैं कि अमेरिकी पुलिस लॉ एन्फोर्समेंट एजेंसी है। उसके लिए वह किसी हद तक जा सकती है (इसके ताजा उदाहरण हावर्ड के प्रोफेसर के साथ बदसलूकी, पिछले दिनों भारत के पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे अब्दुल कलाम, शाहरुख खां आदि की घटनाओं को लिया जा सकता है)

दरअसल, अमेरिकी पुलिस और सुरक्षाकर्मियों को लेकर बहुत सारे प्रश्‍न उठते रहे हैं। मसलन इस पुलिस पर किसका प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष नियंत्रण है- वहां के कॉरपोरेट घरानों का, राजसत्ता का ? क्योंकि हावर्ड के प्रोफेसर की तमाम दलीलों के बावजूद उन्हें पुलिस द्वारा परेशान किया जाना और बाद में पुलिस के उस छोटे से अधिकारी को ओबामा द्वारा आमंत्रित कर बियर पिला कर एक तरफ उसे हीरो बना देना और दूसरी तरफ पुलिस की ज्यादतियों को किसी आवरण में लपेट कर जस्टीफाई करना। संभवत: कछ ऐसा ही रुख होगा जिसके कारण घोर जन प्रतिरोध के बावजूद आस्कर ग्रांट के हत्यारे पुलिस अधिकारी को अब तक कोई सजा नहीं हुई। उसने दूसरे दिन ही यानी पहली जनवरी, 2009 को अपने कार्यालय जाकर बड़े अधिकारियों के सामने त्यागपत्र दे दिया जो स्वीकार भी कर लिया गया और व्यापक जन प्रतिरोध व मीडिया की भूमिका के कारण उसके विरुद्ध हत्या का मामला दर्ज कर लिया गया। बस मामला ठंडे बस्‍ते में पड़ गया है गो कि समय-समय पर लोगों द्वारा विरोध प्रदर्शन भी होते ही रह रहे हैं। अमेरिका में इस मानी में व्यापक लोकतंत्र है कि लोग खुले तौर पर प्रदर्शन कर सकते हैं। उन्हें तंग नहीं किया जाएगा।

अमेरिका की क्रांतिकारी कम्युनिस्ट पार्टी (जिसके सर्वेसवा हैं चेयरमैन बॉब अवेकन) के कुछ फ्रंटल ऑर्गनाइजेशन जैसे बे एरिया रिवोल्यूशन क्लब, रिवोल्यूशनरी वर्कर्स आदि ने इस घटना को लेकर 22 मार्च, 2009 को ओकलैंड में एक बड़ा प्रदर्शन किया। उन्होंने जन अदालतें भी लगाईं और पिछले 15 वर्षों में कानून लागू कराने के नाम पर हजारों काले नागरिकों को वहां की पुलिस द्वारा मौत के घाट उतार दिए जाने की एक लिस्ट भी जारी की और सबके विरुद्ध चल रहे मुकदमें को न्यायपूर्ण ढंग से निपटाने की मांग की। ऐसे कुछ लोगों के नाम हैं- ऑस्कर ग्रांट, अमाडू डिआलो, ताइशा मिलर, जे रॉल्ड हाल, गैरी किंग, अनीता गे, जुलिओ परेड्स, असा सुलिवान, मार्क गार्सिया, रैफेल ग्रिनेत, ग्लेन विलिस, रिचर्ड डी सैन्टिस आदि थे। ये केवल कैलिफोर्निया खाड़ी क्षेत्र के ही काले अमेरिकी नागरिक नहीं हैं, बल्कि इनमें न्यायार्क के भी लोग हैं। इन्हें गोलियों से, पीट-पीट कर और आंख-मुंह में मिर्ची का चूरा झोंक कर यानी तड़पा-तड़पा कर मारा गया। यह ठीक उसी तरह का कृत्य था जैसा अमेरिका के ईजाद के बाद आम लोगों को भूखे रखकर, बीमारी की हालत में छोड़कर, सोने की जगह न देकर, कोड़ों से पिटाई कर-यानी तड़पा-तड़पा कर मारा गया था। लगभग तीन सौ साल बाद आज अमेरिका अपने को हर तरह से दुनिया का ‘नंबर वन’ देश घोषित करता रहाता है। ओबामा ने भी अपने शुरुआती भाषण में यही कहा था कि हम दुनिया के नंबर वन देश हैं और भविष्य में भी बने रहेंगे।

मेरे वहां रहते ही एक दूसरी घटना घटी,  बीस साल का ब्रैंडनली इवांस नवंबर, 2008 में सैन फ्रांसिस्को पढ़ाई और नौकरी के लिए सैन्टियागो से आया था। सैन फ्रांसिस्को के प्रसिद्ध गोल्डेन गेट ब्रिज के पास उसने शेयर में एक फ्लैट लिया था, पर दिसंबर के अंत में गोल्डेन गेट ब्रिज पार्क में उसकी हत्या कर दी गई। पुलिस जिस तरह से इस मामले की छानबीन में उदासीन दिखाई दे रही है, उससे वहां के लोगों को अंदाज है कि शायद इसमें पुलिस की भी भूमिका है क्योंकि वह इलाका अत्यंत व्यस्त और महत्वपूर्ण है और सुरक्षा व्यवस्था भी चौकस।

अमेरिकी पुलिस कानून लागू कराने के लिए तो किसी हद तक जा सकती है पर उसकी केवल यही भूमिका नहीं है- अपराध रोकना उसकी मुख्य भूमिका है। पर अमेरिका में अपराध बेतहाशा हैं चाहे हत्या हो, अपहरण हो, या अपराध के जितने भी रूप हो सकते हें। जि‍स अपराध को हम अपनी आंखों के सामने देख आए हैं, वह अमेरिकी पुलिस की तस्वीर बहुत साफ करती है।

पूरा प्रकरण देखते हुए लगता है कि अपराध जगत में यहां भी कॉरपोरेट घरानों और बड़े पूंजीपतियों का हाथ है। एक उदाहरण देकर मैं इसे स्पष्ट करना चाहूंगा क्योंकि मेरे फ्रीमांट में रहते हुए यह मामला उछला था। इलेना मिशेल नाम की एक लड़की थी जो 13 वर्ष की उम्र में ही पूरे बे एरिया (खाड़ी क्षेत्र) में आइस स्केटिंग में नंबर एक पर पहुंच गई थी और 30  जनवरी, 1989 के ओलंपिक गेम्स में भागीदारी की उसकी दावेदारी तय हो गई थी। 30 जनवरी, 1989 में उसका अपहरण कर लिया गया। आज तक उसके बारे में कुछ पता नहीं चला। अमेरिका स्टेट डिपार्टमेंट आफ जस्टिस की एक रिपोर्ट के अनुसार हर साल कैलि‍फोर्निया राज्‍य से पचास बच्‍चों का अपहरण होता है और उनका मि‍ल पाना असंभव सा ही होता है, बल्‍कि‍ वहां के संघीय आंकड़ों के अनुसार गायब बच्‍चों में से केवल एक प्रति‍शत ही 10 वर्षों की अवधि‍ में वापस आ पाते हैं।

फ्रीमांट लौटने के लि‍ए ट्रेन कुछ देर से मि‍ली। भारी मन से हम सवार हुए। ठंड गायब हो चुकी थी और मन पर तकलीफ का एक कुहासा छा गया था। आज भी वह घटना याद आती है तो प्रशांत महासागर की खाड़ी का सारा सौन्‍दर्य ति‍रोहि‍त हो जाता है और रातभर नींद नहीं आती…।

(समकालीन तीसरी दुनि‍या, अक्‍टूबर, 2009 से साभार)