Category: बच्चों की करामात

साइि‍कल के पंप से उड़ा राकेट : समीर मिश्रा

अगर आप कभी ओडिशा के गंजाम ज़िले से गुजरें तो वहां ग्राम विकास विद्या विहार स्कूल में ज़रूर जाइएगा। पूरबी घाटों के बीच में स्थित इस स्कूल में विज्ञान  सिखाने की अद्भुत तकनीक इस्तेमाल की जाती है।

यहाँ पर सातवीं क्लास के बच्चे अपना खुद का पानी का राकेट बनाते हैं और उसे उड़ाते हैं। एक पुरानी  पानी  की बोतल और साइकिल  के  पंप का इस्तेमाल करके बनाये हुए राकेट को उड़ाते हुए इन बच्चों को देखना एक अलग ही अनुभव था| यहाँ के दो बच्चों ने अपने स्कूल के कंप्यूटर लैब में एक नवोन्मेष प्रयोगशाला नामक केंद्र की स्थापना की है, जहाँ बच्चे रोज़मर्रा की चीज़ों का इस्तेमाल करके विज्ञान के नए-नए मॉडल बनाते हैं। जैसे एक विद्यार्थी ने कॉफ़ी कप, पुराने पेन और जूते के डब्बे का इस्तेमाल करके एक कप एनीमोमीटर बनाया जिससे वायु का वेग नाप सकते हैं। यह सभी प्रारूप इन बच्चों के पाठ्यक्रम का हिस्सा हैं। इसकी शुरुआत करने वाले यहाँ पर काम कर रहे नौजवान समीर कुमार मिश्रा एसबीआई फेलो हैं। वह कहते हैं कि‍ अगर इस तरह की प्रयोगशालाएं हर स्कूल में हों तो वह दिन दूर नहीं, जब आप अखबारों में भारतीय आविष्कारों के बारे में पढ़ेंगे।

समीर ने यहाँ पर एक और प्रयोग किया। उन्होंने यहाँ के स्कूली प्रोजेक्ट वर्क में परिकल्प की नीव रखी। परिकल्प एक नए प्रकार का प्रोजेक्ट करने का तरीका है, जिसके अंदर आप बच्चों से फाइलें न बनवाकर असल ज़िन्दगी की दिक्कतों का समाधान खोजने के लिए प्रेरित करते हैं और उसे प्रोजेक्ट के तौर पर प्रस्तुत करते हैं। उदाहरण के तौर पर बच्चों के कई ग्रुप बनाए जाते हैं। फिर अलग-अलग ग्रुप को वि‍भि‍न्‍न कार्य दिए जातें हैं। एक ग्रुप को स्कूल में होने वाली बीमारियों की लिस्ट बनानी थी और उसका इलाज कैसे होगा, इस पर एक पोस्टर बनाना था। दूसरे ग्रुप को इसी पर काम करते हुए उन दवाओं के लिए एक प्राथमिक उपचार पेटी बनानी थी, जिसमें उन बीमारि‍यों की दवायें रखी जाएंगी। एक ग्रुप को मंगल यान का प्रतिरूप बनाना था। इस तरह बच्चे सीखतें भी हैं और स्कूल का भी स्तर बढ़ता है।

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यह स्कूल ऐसी जगह है जहाँ बिजली और नेटवर्क की काफी दिक्कत है। हमें पता चला कि‍ इसी स्कूल के एक बच्चा है सुभकांत जानी जिसने ने जवाहर नवोदय विद्यालय की परीक्षा उत्तीर्ण की है। गौरतलब है कि‍ उसके गाँव में बिजली है ही नहीं। वहां सूर्यास्त के बाद लालटेन और कैंडल पर ही ज़िन्दगी निर्भर है। अगर ऐसी जगह से एक बच्चा नवोदय जैसा परीक्षा में सफल होने का माद्दा रखता है और दीपक और सीताराम जैसे बच्चे अपने सीमित संसांधनों से कभी न डरते हुए विज्ञान के नए-नए प्रारूप बना सकते हैं तो हम अगर ठान लें तो जल्दी ही भारत को शिक्षा के पायदान में पानी के राकेट की तरह ही सबसे ऊपर ले जा सकते हैं|

वाटर राकेट बनाने  की विधि

आवश्यक सामग्री

1: पानी की पुरानी बोतल (1 लीटर )
2: कॉर्क
3: साइकिल पंप
4: फुटबॉल आदि में हवा भरने वाली पिन

विधि

1: पुरानी  बोतल का ढक्कन खोलें और उसमें आधे लीटर से थोड़ा कम पानी भरें |
4: बोतल का मुँह कॉर्क से इस प्रकार बंद करें जिससे बोतल पर दबाव देने पर ही वह निकले।
3: कॉर्क के बाहरी सिरे से हवा वाली पिन इस प्रकार अंदर डालें जिससे वह आधी अंदर और आधी बहार रहे | कोशिश करें कि‍ पिन कॉर्क के मध्य से होती हुई अंदर जाए।
4: बाहर वाले पिन के सिरे से साइकिल पंप की  नली  जोड़ दें।
5: पानी की बोतल को ज़मीन पर उल्टा रख दें जिससे कॉर्क वाला सिरा नीचे रहे। कॉर्क पानी को बाहर निकलने से रोके रखेगा।
6: बोतल को सहारा देने के लिए ईंट का उपयोग करें। ईंटों को बोतल के साइड में लगा दें, लेकि‍न ध्यान रहे वे बोतल को सिर्फ सहारा दें और पकड़े नहीं।
7: साइकिल पंप से बोतल के अंदर हवा पंप करना शुरू करें |
8: कुछ देर पंप करने के बाद आपको आपका हाथों से बना राकेट हवा से बातें करता नज़र आएगा |

 वैज्ञानिक सिद्धांत

यह उड़ान न्यूटन के तीसरे गति नियम पर आधारित है जो कहता है कि‍-
‘प्रत्येक क्रिया की उसके बराबर तथा उसके विरुद्ध दिशा में प्रतिक्रिया होती है।‘जितनी जोर से हम जमीन पर अपना पैर पटकते हैं, उतनी ही अधिक हमें चोट लगती है अर्थात् जितनी जोर से हम जमीन को नीचे की ओर दबाते हैं उतनी ही जोर से पृथ्वी हमें ऊपर की और धकेलती है. जितनी जोर से हम गेंद को पटकते हैं उतना ही ऊपर वह उछलती है।
इसी प्रकार बोतल से हवा के दबाव से बहार आता पानी ज़मीन से टकराता है। प्रतिक्रिया में वह बोतल को ऊपर की और धक्का देता है । इस प्रकार बोतल से जब तक पानी निकलता है बोतल ऊपर की ओर उड़ती चली जाती है।

प्रक्षेपण के दौरान ध्यान रखने लायक बातें-

1: इसे खुली जगह में ही किया जाए।
2: प्रक्षेपण के दौरान उसकी सीध में ना देखें और थोड़ा दूर खड़े रहें।
3: बोतल में आप पानी में रंग भी मिला सकते हैं। इससे नज़ारा बहुत अद्भुत लगेगा।
4:कॉर्क की जगह आप रबर का भी इस्तेमाल कर सकते है।  बैडमिंटन के शटलकाक के पीछे लगे हुए हिस्से का भी उपयोग कर सकते हैं।
5: आप इसे राकेट की तरह रूप देकर सुप्रवाही बना सकते हैं। लेकिन राकेट का वज़न कम रखें
6: 1 लीटर की बोतल से सफल प्रक्षेपण के बाद आप 2 लीटर की बोतल से भी यह प्रयोग कर सकते हैं।

 

बचपन की अलग-अलग छवि की मोहक कहानियां : शकुन्तला कालरा

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साहित्यकार संजीव ठाकुर का लेखन प्रौढ़ एवं बाल पाठकों में समान रूप से समादृत है। देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में वे निरंतर प्रकाशित दिखाई देते हैं। बड़ों के साथ-साथ बच्चों के लिए भी उन्होंने विपुल साहित्य की रचना की है। उनकी प्रतिभा का प्रस्फुटन लेखन के साथ-साथ शास्त्रीय संगीत में भी है। बहुमुखी प्रतिभा के धनी संजीव ठाकुर अध्यापन-क्षेत्र से भी जुड़े रहे हैं। बच्चों के लिए लिखे साहित्य में उनके इसी बहुआयामी व्यक्तित्व का प्रतिबिंब देखा जा सकता है।

‘कबूतरी आंटी’ संजीव ठाकुर का अलग-अलग ज़मीन पर लिखी बाल कहानियों का संग्रह है। कथानक या विषयवस्तु कहानी की आत्मा है। बालकहानी में शिल्प उतना महत्त्वपूर्ण नहीं होता और न शास्त्रीय दृष्टि से कहानी के तत्‍व महत्त्वपूर्ण हैं। संग्रह में विविध विषयों से सजी 15 कहानियां हैं, जो बच्चों को अलग-अलग दुनिया में प्रवेश कराके उनका मनोरंजन भी करती हैं और चुपके-चुपके कुछ संदेश भी संप्रेषित कर जाती हैं। यह संदेश कहानी की आत्मा में इस तरह अनुस्यूत है कि दिखाई नहीं देता किंतु प्रभावित करता है।

संग्रह में विभिन्न शीर्षकों की कहानियां हैं- ‘दो दोस्तों की कहानी’, ‘हमें नहीं जाना’, ‘मिट्ठू’, ‘रूठनदास’, ‘घिर गया बंटा’, ‘डरपोक’, ‘रामदेव काका’, ‘राखी नहीं बाँधूंगी’, ‘जालिम सिंह’, ‘चुन्नू-मुन्नू का स्कूल’, ‘सुबू भी खेलेगी होली’, ‘संगीत की धुन’, ‘जादूगर’, ‘नेहा को इम्तहान से डर नहीं लगता’, ‘कबूतरी आंटी’ आदि। संग्रह की पहली कहानी ‘दो दोस्तों की कहानी’ है- बिल्ली और कुत्ते की दोस्ती की कहानी। बिल्ली और कुत्ते की दुश्मनी की कहानी तो बड़ी पुरानी है, पर प्रस्तुत कहानी में इनकी दोस्ती की नवीन गाथा है। कुत्ते के नाली में गिरने पर बिल्ली उसे निकालने में उसकी मदद करती है। तब से कृतज्ञ कुत्ता उसका दोस्त बन जाता है। दोनों मिलकर मुसीबतें झेलकर घरों/बाज़ार से कुछ खाने का सामान उड़ा लाते हैं किंतु लोगों की मार के डर से वे दुःखी होकर भविष्य का कार्यक्रम बनाते हुए खेतों में जाकर रहने का फैसला करते हैं, जहां उन्हें चूहे मिलेंगे और नदी किनारे ताज़ी मछलियां भी।

‘हमें नहीं जाना’ ग्रामीण पृष्ठभूमि पर लिखी गई दूसरी कहानी है। बिन्नी और टीनू छुट्टियों में अपने पापा के साथ दादाजी के गांव आते हैं। शहर की भीड़-भाड़ से दूर अपने दादाजी का गांव और उनका खुला और बड़ा सा मकान रास आ जाता है। आम, कटहल, अमरूद के वृक्षों को देखकर तो दोनों बहन-भाई उछल पड़ते हैं। आम की झुकी हुई डाली पर बैठकर झूला झूलते। जब नदी में नहाते तो स्कूल के स्वीमिंग पूल को भूल जाते। पहाड़ी पर चढ़कर प्रकृति का नज़ारा देखते। इस तरह आनंदपूर्वक छुट्टियां कब बीत जाती हैं, उन्हें पता ही नहीं चलता। शहर लौटने का उनका मन ही नहीं होता और वे कहते हैं- ‘हमें नहीं जाना’। तब दादाजी पढ़ाई की जीवन में अनिवार्यता बतलाते हुए अगली छुट्टियों में फिर आ जाने का आश्वासन देते हैं किंतु जाने वाले दिन वे मचान पर चढ़कर छिप जाते हैं। यह कहानी बच्चों की सहज प्रकृति को दर्शाती हैं। पढ़ाई का बंधन, अध्यापकों और घर में माता के अनुशासन में ‘यह करो यह न करो’ के उपदेश भरे वाक्यों से बच्चे ऊब जाते हैं।

‘मिट्ठू’ उन्मुक्त आकाश में उड़ते हुए एक तोते की कहानी है जो एक दिन श्रुति की बॉलकनी की रैलिंग में आकर बैठ जाता है। श्रुति मां के कहने पर उसे हरी मिर्च खिलाती है। तोता ऐसे ही रोज़ आने लगता है। श्रुति उसे हरी मिर्च और भिगोए हुए चने खिलाती है। कटोरे में पानी भी रखती है। मिट्ठू रोज़ आता। उछलता, कूदता, मिर्च खाता, श्रुति के कंधे पर चढ़ बैठता, कभी उसकी हथेली पर। लेकिन पकड़ने पर कभी हाथ नहीं आता। एक दिन श्रुति उसका इंतज़ार करती रहती है, पर वह नहीं आता और ऐसे ही अगले दिन, फिर अगले से अगले दिन भी नहीं आता। श्रुति परेशान होकर मां से पूछती है तो मां उसे बताती है कि कोई बहेलिया उसे पकड़कर ले गया होगा और पिंजरे में बंद करके बेच दिया होगा। श्रुति बहुत दुःखी होती है और रात को सोते समय सोचती है कि अगर कहीं से सचमुच उसके हाथ बंदूक आ जाती तो वह बहेलिए को गोली मार देती। श्रुति की यह सोच आज की पीढ़ी की सोच है जो टी.वी. संस्कृति से हिंसात्मक प्रवृत्ति की हो गई हैं। लेखक ने इस ओर भी हमारा ध्यान आकर्षित किया है क्योंकि श्रुति साफ कहती है- ‘‘मैं उसे उसी तरह गोली मार देती जिस तरह सीरियल में या फिल्मों में कोई बदमाश को मारता है।…..’’

‘नेहा को इम्तहान से डर नहीं लगता’ बच्चों को सीधे-सीधे नसीहत देने वाली कहानी है कि जैसे नेहा नियमित रूप से पढ़ती है वैसे ही सभी बच्चे पढ़ें तो उन्हें तनाव नहीं होगा। ‘रूठन दास’ बाल मानसिकता से जुड़ी है। बच्चे बात-बात पर रूठ जाते हैं। कभी मनपसंद नाश्ता न मिला या मनपसंद खिलौना या कोई और प्रिय वस्तु न मिलने पर वे न केवल बात करना बंद करते हैं, वरन् खाना तक नहीं खाते। बाल-प्रकृति को दर्शाती इस कहानी में रूठनदास का चरित्र भी इसी प्रकार का है। घर में तो सब उसके नाज़-नखरे उठाते हैं और उसकी ज़िद पूरी कर देते किंतु मित्र तो मित्र ठहरे। वह उसे ‘रूठनदास’ कहकर चिढ़ाने लगे। यह आदत उसकी बनी रही। कुछ दिन गांव से दूर शहर के बड़े स्कूल में जब पढ़ने जाता है तो वह वहां भी रूठने लगा किंतु वहां उसे कोई नहीं मनाता। वह रूठना भूल गया। घर आया तो उसके इस परिवर्तित स्वभाव से सबको सुखद आश्चर्य हुआ। वह खुद भी अब बहुत प्रसन्न था।

बच्चों के स्वभाव से जुड़ी एक दूसरी शरारती बच्चे की कहानी है ‘घिर गया बंटा’। बंटा कभी किसी बच्चे को नाली में गिरा देता तो कभी किसी की साइकिल। किसी को बकरी पर चढ़ाकर उसे दौड़ाना आदि उसके प्रिय शौक थे। एक बार उसने ‘हीरा’ के माथे पर नमक लगा कर पत्थर से घिसकर गूमड़ बना दिया। बेचारा दर्द से तड़पने लगा। पप्पू के हाथ बांधकर उसकी पैंट खोल दी। अब तो सब बच्चों ने उसको भी मज़ा चखाने की ठानी। सभी बच्चों ने अपनी-अपनी कमर में बेल्ट या बिजली की तार का कोड़ा बनाकर बांधा और बगीचे में बंटा को छोड़ दिया। बंटा भागने लगा। सब बच्चे उसके पीछे-पीछे भागने लगे। वह भागते-भागते एक कच्चे कुएं में गिर जाता है। किंतु यहां बच्चे ‘बंटा’ के स्वभाव और उसकी मित्रों के साथ की गई ज्यादतियों को भूलकर उन्हीं तारों को बांधकर एक लम्बी रस्सी बनाकर कुएं में डाल देते है, जिससे बंटा बाहर आ जाता है। बंटा शर्मिंदा सा खड़ा था। वह समझ चुका था कि मित्र तो मित्र होते हैं- वे चाहते तो उसे कुएं में गिरा रहने देते और अपना बदला ले सकते थे, किंतु बच्चों ने ऐसा नहीं किया। उसने सबसे माफ़ी मांगी और सबका दोस्त बन गया।

‘रामदेव काका’ कहानी बच्चों के कोमल संवेदनशील स्वभाव और उनकी सहृदयता को दर्शाती है। बच्चे देबू का अपने घरेलू नौकर रामदेव के प्रति स्नेह, उसके अर्धनग्न बेटे को देबू का अपनी कमीज़ उतारकर देना बच्चों में निष्छल स्वभाव और उनकी सहृदयता का सुन्दर उदाहरण है। ‘राखी नहीं बाँधूंगी’ भाई-बहन के प्रेम की कहानी है जहां रूठना-मनाना, लड़ना-झगड़ना और फिर सब भूलकर दुगुने प्रेम से एक हो जाना दिखाया गया है। ‘जालिम सिंह’ कहानी चपरासी जालिम सिंह के कठोर स्वभाव के हृदय-परिवर्तन की कहानी है। ‘चुन्नू-मुन्नू का स्कूल’ में उन बच्चों की प्रकृति बतलाई है जिन्हें स्कूल फालतू लगता है और जो रोज़ नया बहाना गढ़-गढ़ कर स्कूल से छुट्टी करते हैं किंतु एक दिन पिता के द्वारा पकड़ लिए जाते हैं। यह कहानी यहीं खत्म हो जाती है किंतु यदि लेखक बच्चों को किसी घटना के माध्यम से स्कूल से भागने का दुष्परिणाम या कोई नुकसान दिखाते तो कहानी एक अच्छा मनोवैज्ञानिक प्रभाव छोड़ती और बच्चों के लिए भी प्रेरक बन जाती। यहां बच्चों को अभी भी इस बात का अहसास नहीं हुआ कि उन्होंने कोई गलती की है। भोले माता-पिता के विश्वास को छला है या अपनी पढ़ाई का कोई नुकसान किया है।

‘सुबू भी खेलेगी होली’ में बच्चों की डर की भावना को पिता अपनी समझ-बूझ से दूर करते हैं तो ‘संगीत की धुन’ में समीर की संगीत के प्रति धुन उसे एक दिन सचमुच बहुत बड़ा गायक बना देती है। निःसंदेह यह कहानी बच्चों को धुन का पक्का होना सिखाएगी और लक्ष्य की ओर बढ़ाएगी। ‘जादूगर’ संवेदना और सहृदयता की कहानी है जो निश्चय ही बच्चों में भावात्मक संस्कारों को पुष्ट करेगी।

संग्रह की अंतिम शीर्षक कहानी ‘कबूतरी आंटी’ बाल मानसिकता की कहानी है। बच्चों में पशु-पक्षियों के साथ ‘मानवीकरण’ की कहानी है। सुबू कबूतरी आंटी के बच्चे में अपने को देखती है और छत पर उसके लिए वे सारी वस्तुएं फैंकती जाती हैं जो उसके लिए आवश्यक हो सकती हैं- मसलन, कंघी, पानी पीने का बरतन, चावल-दाल के दाने सब। वह उसको रोज़ बढ़ता देख बड़ी खुश होती है। वह कबूतरी आंटी से खूब बतियाती है और यह कहकर अपनी पेंसिल बॉक्स भी गिरा देती है कि वह स्कूल जाएगा और उसे ज़रूरत पड़ेगी। कबूतरी का बच्चा उड़ना सीख जाता है। वह कुछ देर उड़कर जाता है और फिर छज्जे पर आकर बैठता है। सुबू सोचती है- वह स्कूल जाता है और फिर लौट आता है। पशु-पक्षियों के प्रति संवेदनशीलता जगाती यह कहानी बच्चों में प्रकृति के प्रति उत्सुकता का भाव जगाती है।

इन कहानियों से लेखक ने बाल मनोभावों को अभिव्यक्ति दी है। बालकों की रुचि, प्रवृत्ति को केन्द्र में रखते हुए सीधी-सरल एवं बालोपयोगी भाषा में लिखी ये कहानियां बच्चों को पसंद आएंगी। मानवीय संवेदनाएं बच्चों के हृदय तक पहुँचेगी चाहे मानव के प्रति हों चाहे मूक पशु-पक्षी के प्रति हों। हर कहानी बचपन की अलग-अलग छवि को मोहक ढंग से प्रस्तुत करती है। बाल हृदय से जुड़ी सादगी से कही ये कहानियाँ बच्चों को अपनी कहानियाँ लगेंगी।

पुस्तक:  कबूतरी आंटी
कहानीकार: संजीव ठाकुर
प्रकाशक:  प्रखर प्रकाशन, 1/11486ए, सुभाष पार्क एक्सटेंशन,
नवीन शाहदरा, दिल्ली-110032

संस्करण: प्रथम संस्करण, 2014
मूल्य   :   150 रुपये मात्र

मिली आलस की सजा : मनोहर चमोली ‘मनु’

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ये उन दिनों की बात है, जब बिल्ली खूब मेहनत करती थी। खेती किसानी से अपना पेट भरती थी। वहीं विशालकाय चूहे दिन-रात खर्राटें लिया करते थे। एक दिन बिल्ली ने चूहों से कहा, ‘‘पेटूओं, कुछ काम क्यों नहीं करते?’’ चूहों का सरदार बोला, ‘‘हमारे पास काम ही नहीं हैं। तुम ही कोई काम दिला दो।’’

बिल्ली सोचने लगी। कहने लगी, ‘‘तुम तो जानते हो, मेरे खेत जंगल के उस पार हैं। मैं बगीचे की देखभाल करती हूं तो मेरे खेतों की फसलें बरबाद होती हैं। ये अखरोट का बगीचा यहां है। तुम सब मिलकर मेरे बगीचे की रखवाली करो। तुम्हें रोजाना भरपेट भोजन बगीचे में ही भिजवा दूंगी। याद रहे, अखरोट पक जाने पर उन्हें बोरों में रखकर मुझे देने होंगे।’’ चूहों के सरदार ने हामी भर दी। चूहे खुश हो गए। बिल्ली चूहों को बगीचे में ही खाना भिजवाती। वहीं चूहे भरपेट भोजन करते और चादर तानकर सो जाते। वे और भी आलसी हो गए थे।

दिन बीतते गए। पेड़ों पर अखरोट के फूल आए। पत्तियां आईं। अखरोट के फल लगे। पकने लगे। पककर खोल से बाहर आकर नीचे गिरने लगे। बगीचे में चूहों के खर्राटें ही सुनाई दे रहे थे। फिर एक दिन बिल्ली ने संदेशा भिजवाया, ‘‘सर्दियां आने से पहले अखरोट पक जाते हैं। बोरों के ढेर एक कोने में इकट्ठा कर दिए?’’

बंदर जैसे नींद से जागे हों। उछलकर खड़े हो गए। सरदार जम्हाई लेते हुए बोला, ‘‘चिंता न करें। अखरोट अपने खोल से बाहर आ गए हैं। पेड़ों के नीचे अखरोटों का अंबार लगा हुआ होगा। कल से उन्हें बोरों में भर देंगे। फिलहाल चादर ओढ़कर सो जाओ।’’ चूहों ने ऐसा ही किया।

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सुबह हुई। चूहों को देर से उठने की आदत थी। वे सोते ही रह गए। बगीचे में बंदरों का झुण्ड आ गया। गिलहरियां और खरगोश भी आ गए। बंदरों को मनपंसद भोजन जो मिल गया था। दोपहर हो गई। चूहे हड़बड़ाकर उठ बैठे। तभी बिल्ली भी आ पहुंची। बगीचा तहस-नहस हो चुका था। सारा नजारा देखकर बिल्ली आग बबूला हो गई। बिल्ली चिल्लाई, ‘‘आलसियो। तुम्हारा यह विशालकाय शरीर पिद्दीभर का हो जाए। तुम चैन से न रहोगे। दिन-रात खाते-कुतरते रहोगे। यदि ऐसा नहीं करोगे तो तुम्हारे दांत बढ़ते ही चले जाएंगे। दूर हो जाओ, नहीं तो मैं तुम्हें खा जाऊंगी।’’

ऐसा ही हुआ। पलक झपकते ही विशालकाय चूहे नन्हे से हो गए। सींग के बदले उनकी मूंछें उग आईं। चूहों में अफरा-तफरी मच गई। बेचारे चूहे डर के मारे खरगोशों के बिलों में दुबक गए। कहते हैं, तभी से चूहे बिल में रहने लगे। चूहों को देखते ही बिल्ली उन पर झपट पड़ती है।

 

(नंदन, अक्टूबर 2016 से साभार)

चि‍त्र : हि‍मानी मि‍श्र

एक बादल एक बूँद एक नाव  : रजनी गुसाईं

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गड-गड-गरड़… आकाश में बादल गरज रहे थे। चमकती धूप गायब हो गई थी। काले बादलों ने सूरज को ढक दिया था। दोपहर में ही अँधेरा छा गया। “मम्मी, लगता है, बारिश होने वाली है। बड़ा मजा आएगा।” नन्हीं हिमी ने अपना होमवर्क करते हुए कहा।

“पता नहीं ये बादल कब बरसेंगे! इतनी देर से तो बस गरज ही रहे हैं! यह उमस भरी गर्मी और बिजली भी चली गई हैं।” मम्मी हाथ का पंखा हिलाते हुए बोली और किचन में चली गई।

हिमी पहली तीन में पढ़ती हैं और अपने मम्‍मी–पापा के साथ बहुमंजिला इमारत की पंद्रहवी मंजिल के फ्लैट में रहती है। हिमी ने अपने कमरे की खिड़की खोल दी। ठंडी हवा का झोंका कमरे में ठंडक भर गया। हिमी खिड़की के पास खड़ी हो गई। उसने बाहर झांककर देखा। आकाश में बादल-ही-बादल दि‍खाई दे रहे थे। वे हवा के झोंको से इधर-उधर दौड़ लगा रहे थे। तभी हिमी की खिड़की के पास से एक बड़ा-सा काला बादल गुजरा। हिमी उसे आवाज लगाते हुए बोली, “सुनो बादल राजा, बस गरज ही रहे हो! बरसोगे कब?”

हिमी की आवाज सुनकर काला बादल रुक गया। वह बहुत उदास लग रहा था। वह बोला “मेरा मन बरसने को नहीं करता।” बादल के अंदर बैठी नन्हीं-नन्हीं बूँदें भी बादल की ‘हाँ’ में ‘हाँ’ मिलाती हुई बोलीं “हमें भी रिमझिम-रिमझिम बारिश बनकर नहीं बरसना।”

हिमी को उनकी बातें सुनकर आश्‍चर्य हुआ। अपनी आँखों को गोल-गोल घुमाते हुए वह बोली, “लेकिन तुम लोग धरती पर बरसना क्यों नहीं चाहते?”

काला बादल बोला “पहले जब में बरसता था तो बच्चे अपने-अपने घरों से बाहर आ जाते थे। गलियों में, घरों की छतों में बारिश में भीगते थे। धमाचौकड़ी मचाते थे।”

नन्ही बूँदें बात को आगे बढ़ाते हुए बोलीं, “हम जब बरसती थीं, तो हमारे पानी में बच्चे पैरों से छप-छपकर खेलते थे! रुके हुए पानी में कागज की रंग-बिरंगी नाव बनाकर तैराते थे। बच्चों की यह चुलबुली शरारतें देखकर बड़ा मजा आता था। लेकिन अब वो बात नहीं हैं।” कहते-कहते नन्हीं बूँदें उदास हो गईं।

काला बादल बोला, “अब बच्चे बारिश में घर से बाहर नहीं निकलते। बच्चों की शरारतों के बिना हमें भी बरसना अच्छा नहीं लगता।”

काले बादल और बूंदों की बात सुनकर हिमी सोच में पड़ गई। फिर धीरे से बोली, “ओ काले बादल सुन। हम बच्चे बारिश में भीगना चाहते हैं। खेलना चाहते हैं, लेकिन मम्मी-पापा हमें खेलने नहीं देते। वे कहते हैं, ‘बारिश में भीगने से जुखाम हो जाएगा। बीमार पड़ जाओगे।”

हिमी की बात सुनकर अब काला बादल सोच में पड़ गया।

“हिमी, हिमी उठो। होमवर्क करते-करते ही सो गई।” हिमी को नींद से जगाते हुए मम्मी बोली।

मम्मी की आवाज सुनकर हिमी एकदम से उठकर बैठ गई। आँखों को मींचते हुए बोली, “मम्मी, काला बादल कहाँ गया?”

“कैसा काला बादल? हिमी लगता हैं, तुमने कोई सपना देखा होगा।” कहते हुए मम्मी कमरे से बाहर चली गई!

हिमी ने खिड़की से बाहर देखा। बारिश हो रही थी। हिमी ने मम्मी को आवाज लगाई, “मम्मी मुझे कागज की नाव तैरानी है।”

मम्मी कमरे में आई! हँसते हुए बोली, “यहाँ कागज की नाव कहाँ तैराओगी?”

“मम्मी नीचे सोसाइटी के कंपाउंड में चलते हैं। वहां पानी भर गया है।” हिमी जिद करने लगी। आखिर मम्मी को हिमी की जिद के आगे झुकना पड़ा, “ठीक हैं चलते हैं, लेकिन ज्यादा देर बारिश में नहीं भीगना।” मम्मी ने हिमी से कहा। यह सुनकर ख़ुशी से उछलते हुए हिमी ने टेबल के नीचे से पुराना अखबार निकाला और मम्मी के साथ बैठकर जल्दी-जल्दी नाव बनाने लगी। नाव बनकर तैयार थी। इसके बाद दोनों सोसाइटी के कंपाउंड में आ गए! हिमी पानी में छपाक-छपाक करते हुए बारिश में भीगने लगी। कागज की नाव उसने बारिश के बहते पानी में छोड़ दी। नाव पानी में डगमग-डगमग करते हुए आगे बढ़ने लगी। यह देखकर हिमी ख़ुशी से उछलते हुए ताली बजाने लगी। हिमी को बारिश के पानी में खेलते देख सोसाइटी में रहने वाले दूसरे बच्चे भी कागज की नाव लेकर कंपाउंड में आ गए। अब बारिश के पानी में कागज की बहुत सारी नाव तैरने लगीं। नन्हीं-नन्हीं बूँदें रिमझिम-रिमझिम बरस रही थीं। सारे बच्चे पानी में छपाक-छपाक करते और ख़ुशी से चिल्लाते। हिमी आसमान की तरफ देखकर बोली, “ओ बादल राजा, ओ नन्हीं बूंदों, अब तो खुश हो।”

उसकी सहेली दि‍व्या ने पूछा, “हि‍मी कि‍ससे बात कर रही हो।”

“कि‍सी से नहीं।” कहकर हि‍मी मुस्‍कराई और पानी में छप-छप करने लगी।

मिट्ठू : संजीव ठाकुर

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स्कूल से आकर, खाना खाकर रोज की तरह श्रुति बालकनी में खड़ी हो गई थी। उसकी मम्मी किचन में काम कर रही थीं। तभी कहीं से आकर एक तोता रेलिंग पर बैठ गया। श्रुति उसे देख बहुत खुश हुई। उसने उसे पकडऩा चाहा, मगर वह उड़ गया और दो मिनट बाद फिर आकर रेलिंग पर बैठ गया। श्रुति ने समझा, ‘जरूर इसे भूख लगी है।‘ वह किचन के अंदर गई और फ्रिज से ब्रेड का टुकड़ा निकालकर ले आई। मम्मी पूछती रह गईं कि ‘क्या ले जा रही हो?’ लेकिन उसने नहीं बताया। मम्मी उसका पीछा करते-करते बालकनी तक आ गईं। मम्मी के आते ही तोता उड़कर चला गया।

श्रुति नाराज हो गई, ”आप क्यों आ गईं? मेरा तोता उड़कर चला गया। मैं उसके लिए ब्रेड लाई थी।’’

”बेटा! तोतों को ब्रेड ज्यादा पसंद नहीं है। उन्हें तो भिगोए चने पसंद हैं और हरी मिर्चें पसंद हैं।’’ मम्मी ने समझाना चाहा।

”तो ठीक है, मैं हरी मिर्च ही ले आती हूँ।’’ श्रुति ने कहा और फ्रिज खोलकर हरी मिर्च ले आई। लेकिन तोता दुबारा नहीं आया। निराश होकर श्रुति सो गई।

अगले दिन फिर जब श्रुति स्कूल से आकर, खाना खाकर बालकनी में खड़ी थी, तोता फिर आ पहुँचा। श्रुति खुश हो गई। बोली, ”आओ, तोता, आओ! मैं तुम्हारे लिए मिर्च लाती हूँ।’’

वह मिर्च ले आई। तोता उसे खाने लगा। श्रुति को देखकर बहुत मजा आ रहा था। वह सोच रही थी, ”अब इसे मिर्च लगेगी और यह ‘आह! आह!’ करने लगेगा।‘’ लेकिन पूरी मिर्च खाने के बाद भी तोता निश्चिंत बैठा रहा।

श्रुति मम्मी को यह बात बताना चाहती थी इसलिए वह अंदर गई। तोते के मिर्च खाने की बात बताई और कहा, ”मम्मी! कल थोड़े चने भिगो देना? मैं तोते को दूँगी!’’

”ठीक है।’’ कहकर मम्मी उसे सोने को ले गई। सोते समय वह तोते की ही बात करना चाहती थी। उसे लग रहा था कि तोते का भी कोई नाम होना चाहिए। पता नहीं उसके मम्मी-पापा ने उसका क्या नाम रखा होगा? उसने अपनी मम्मी से यह बात पूछी। मम्मी ने बताया, ”इसका नाम मिट्ठू है।’’

”अच्छा! बड़ा प्यारा नाम है! आपको कैसे पता चला?’’ श्रुति ने कहा।

”बेटे! सभी तोतों के नाम मिट्ठू ही हुआ करते हैं।… अब सो जाओ।’’

श्रुति की समझ में नहीं आया कि सभी तोतों के नाम मिट्ठू ही क्यों होते हैं? लेकिन उसे यह नाम पसंद आया था।

अब वह रोज मिट्ठू की प्रतीक्षा करती। उसके लिए चना-मिर्च एक कटोरे में लेकर बाहर खड़ी रहती। एक दूसरे कटोरे में पानी भी रख लेती। मिट्ठू रोज आता। उछलता, कूदता। मिर्च खाता, पानी पीता और फुर्र हो जाता। अब वह श्रुति के कंधे पर भी चढ़कर बैठ जाता, कभी उसकी हथेली पर भी। लेकिन जैसे ही वह उसे पकडऩा चाहती, वह उड़ जाता।

मम्मी श्रुति के रोज-रोज के इस खेल से ऊबतीं। उसे जल्दी सोने को कहतीं। श्रुति को सोना अच्छा नहीं लगता—मिट्ठू के साथ खेलना अच्छा लगता था। उसने एक उपाय निकाल लिया। मम्मी के साथ वह बिस्तर पर चली जाती और आँखें मूँदकर सोने का नाटक करती। जब उसकी मम्मी सो जातीं तो उठकर बालकनी में चली जाती, और मिट्ठू के साथ खेलती।

एक दिन इसी तरह मम्मी को सुलाकर जब वह बालकनी में गई तो मिट्ठू नहीं आया। वह सोने चली गई। अगले दिन भी वह नहीं आया। उसके अगले दिन भी नहीं। कई दिनों तक वह नहीं आया तो श्रुति परेशान हो गई।

एक दिन मम्मी की डाँट की परवाह न कर उसने पूछ ही लिया, ”मम्मी! अब मिट्ठू क्यों नहीं आता?’’

”तुम्हें कैसे पता कि नहीं आता है? तुम तो सो जाती हो? वह आता होगा।’’

”नहीं मम्मा! मैं तो रोज मिट्ठू से मिलती थी। तुम्हारे सोने के बाद वह आता था।’’

”तो ठीक ही है, नहीं आता है। अब कम-से-कम तुम ठीक से सोओगी तो?’’

”मगर मम्मी, वह आता क्यों नहीं?’’

”क्या पता बेटे?….हो सकता है किसी बहेलिये ने उसे पकड़कर पिंजरे में बंद कर दिया हो? बाजार में बेच दिया हो?’’

”ये बहेलिया क्या होता है, मम्मा?’’

”बेटे! बहेलिया पक्षियों को पकडऩे वाला होता है।’’

”वो तो बहुत खराब आदमी होता है मम्मा!’’

आज सोते समय श्रुति सोच रही थी कि कहीं से उसके पास सचमुच की कोई बंदूक आ जाती तो वह बहेलियों को उसी तरह गोली मार देती, जिस तरह सीरियल में या फिल्मों में कोई बदमाश को मारता है!….पता नहीं उसका मिट्ठू कहाँ चला गया?

मेरा ओलियगाँव : शेखर जोशी

शेखर जोशी

शेखर जोशी

वरिष्ठ कथाकार शेखर जोशीजी की ‘लेखक मंच प्रकाशन’ से शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक ‘मेरा ओलियागांव’ के अंश ‘हर शुक्रवार’ के दीपावली विशेषांक में प्रकाशित हुए हैं। आप भी इन अंशों का आनंद लीजिए-

पक्की फसलों का सुनहरा सरोवर

हिमालय के प्रांगण में अल्मोड़ा जनपद की पट्टी पल्ला बौरारौ के गणनाथ रेंज की उत्तर-पूर्व दिशा में प्राय: 5500 फुट की ऊँचाई पर बसा मेरा ओलियगाँव दो भागों में विभाजित है। इस छोटे से गाँव में मात्र ग्यारह घर हैं। गाँव की बसासत ऊँचाई वाले भाग में  बांज, फयांट, बुरुँश, पयाँ और काफल के वृक्षों से घिरी है। ऊपर की पहाडिय़ों में चीड़ का घना जंगल है।

‘कुमाऊँ का इतिहास’ के लेखक पंडित बद्रीदत्त पाण्डे के अनुसार उन्नाव जनपद अन्तर्गत डोडिया खेड़ा नामक स्थान के प्रकाण्ड ज्योतिषी पंडित सुधानिधि चौबे ने कुँवर सोमचन्द से एक भविष्यवाणी की थी। वह यह थी कि यदि वह उत्तराखण्ड की यात्रा करें, तो उन्हें राज्य की प्राप्ति हो सकती है। तो, कुँवर 22 लोगों के साथ उत्तराखण्ड की यात्रा पर चले और ज्योतिषी जी की वाणी सच साबित हुई। कुँवर सोमचन्द ने कुमाऊँ में चन्द वंश राज्य की स्थापना की। सुधानिधि चौबे ने राज्य का दीवान बनकर चन्द राज्य को विस्तार और स्थायित्व प्रदान किया। सुधानिधि के वंशज इस राज्य के पुश्तैनी दीवान रहे। ज्योतिषी जी के गर्ग गोत्रीय वंशज झिजाड़ गाँव के जोशी कहलाए।

अनुमान किया जा सकता है कि झिजाड़ से कुछ परिवार नौ पीढ़ी पूर्व किसी सुरम्य स्थान की खोज में ओलियागाँव में आकर बस गए।

काठगोदाम-गरुड़ मोटरमार्ग पर मनाण और सोमेश्वर के बीच एक स्थान रनमन है। सड़क के दाँईं ओर खेतों से आगे कोसी नदी प्रवाहित होती है। दड़मिया का पुल पार कर जंगलात की सड़क पर आगे बढ़ें, तो मात्र आधा किलोमीटर चलने पर देवदारु का घना जंगल शुरू हो जाता है, जो प्राय: एक किलोमीटर तक फैला है और उसके बाद चीड़ वन प्रारम्भ होता है। इसी चीड़ वन से घिरा है ओलियागाँव शस्य श्यामल भूमि पर एक कटोरे के आकार में। गाँव के दोनों भागों के बीच कल-कल करती हुई एक छोटी नदी बहती है और उस पार चार मकानों के बाद गिरिखेत का मैदान, देवी थान और फिर सीधी चढ़ाई। इसी पहाड़ पर बहुत ऊपर बहता है, एक झरना। बरसात के मौसम में उस छोटी अनाम नदी की तेज धारा और इस झरने के शुशाट के कारण गाँव के आर-पार के घरों तक अपनी आवाज पहुँचाना मुश्किल हो जाता है।

गाँव की पूरब दिशा में बहुत दूरी पर भटकोट के शिखर दिखाई देते हैं, जिन पर सूर्य की किरण पड़ती हैं तो दिनारम्भ की प्रतीति होती है। इन्हीं शिखरों पर शीतकाल में पहली बर्फबारी होती है, तो ये रजत शिखर चमकने लगते हैं।

ऋतु परिवर्तन के साथ यह कटोरा भिन्न प्रकार के धान्य से भर उठता है। पहले धानी रंग के पादप, फिर खड़ी फसल की हरियाली और जब फसल पक जाती, तो धान्य का यह कटोरा सुनहरे सरोवर का रूप ले लेता है। घास के हाते ऊँची-ऊँची घास का कम्बल ओढ़ लेते हैं।

मैं भाग्यशाली था कि इसी गाँव में श्री दामोदर जोशी और श्रीमती हरिप्रिया जोशी के घर में सन 1932 के पितर पक्ष में तृतीया के दिन मेरा जन्म हुआ। नामकर्ण के दिन पुरोहितजी ने मुझे चन्द्र दत्त नाम दिया था, परन्तु वर्ष 1944 में मामा ने स्कूल में मेरा नाम चन्द्र शेखर लिखवाया। चन्द्र का दिया हुआ नहीं, शीर्ष पर चन्द्र धारण करने वाले शिवजी का पर्याय बना दिया।

हम तीन भाई-बहन थे। मैं उनमें सबसे छोटा था। कहा जाता है कि जब मैं पैदा हुआ, तब मेरी नाक बहुत चपटी और सिर हांडी जैसा था। लेकिन माता-पिता को अपनी सन्तान कैसी भी हो, बहुत प्यारी होती है। मैं सबका लाड़ला था।

गाँव में हर घर के साथ फल-फूलों के बगीचे थे, पेड़ थे। हम लोगों का बचपन पेड़ों के साथ, पशुओं के साथ और फूल-पत्तियों के साथ बीता। हमने यह भी सीखा कि किस तरह से अनाज बोया जाता है, अनाज उगता है और अनाज काटा जाता है।

खेती में लड़कपन में हमारा कोई विशेष योगदान नहीं होता था, लेकिन हमें इसमें बहुत आनन्द आता था, खास तौर से जब धान की रोपाई होती थी। एक छोटे खेत में बेहन बोया जाता था। उसमें खूब घने पौधे होते थे। जब वे बड़े हो जाते थे, करीब 6-7 इंच ऊँचे, तो उनको वहाँ से उखाड़कर दूसरे खेतों में रोपते थे। उससे पहले जिन-जिन खेतों में रोपाई होनी होती, उनको पानी से खूब सींचा जाता। पानी से भरे खेत में दाँता चलाया जाता, जो कि मिट्टी के ढेलों को तोड़ देता। उससे खेत की मिट्टी समतल हो जाती थी। धान रोपाई का काम पूरे दिन का होता था। बहुत से खेतों में रोपाई होती थी, तो खूब सारे मजदूर लगते थे। वे लोग भी उसको एक उत्सव की तरह से मनाते थे, क्योंकि उस दिन उनको खूब अच्छा खाना मिलता था—रोपाई वाला। उस दिन हलवाहे की विशिष्ट भूमिका होती थी। अगर हलवाहा हुड़किया भी होता, तब तो उसकी भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती थी। हुड़किये का मतलब यह है कि वह डमरूनुमा वाद्य ‘हुड़कीÓ को हाथ में लेकर बजाता और पगड़ी बांध कर खेत में सिर्फ गाता फिरता। कतार में औरतें पूलों में से पौधे लेकर रोपती जातीं। अलग-अलग जगहों पर पूले रख दिए जाते। औरतें पूले खोलकर उनमें से पौधें निकालतीं और रोपती जातीं। हुड़किया चंद्राकार या सीधे पीछे हटता जाता और हुड़की बजाता हुआ गाता जाता। वह कोई कथानक लगा देता—राजा भर्तृहरि या राजा हरिश्चन्द्र का, बम-बम्म-बम… हुड़की की आवाज के साथ। औरतें आखिर में टेक लेतीं और वे भी साथ में गातीं। खेत में जाने से पहले हरेक को रोली और अक्षत का टीका लगाया जाता। उस दिन उनके लिए विशेष किस्म का कलेवा बनाया जाता—मोटी रोटियाँ होती हैं, बेड़ुवा मतलब मंडुवा और गेहूँ की मिली हुईं रोटियाँ, कुछ पूडिय़ां और सब्जी। कलेवा हुड़किया के लिए अलग, हलवाहे के लिए अलग, हलवाहे की पत्नी के लिए अलग और आम महिलाओं के लिए अलग बनता। दिन में सभी के लिए खेत में ही दाल-भात पहुँचाया जाता। सभी भर पेट खाना खाते और उनके बच्चे भी आ जाते। शाम को जब औरतें काम खत्म कर देती थीं, तो हाथ-पैरों में लगाने के लिए उनको थोड़ा-थोड़ा तेल दिया जाता था।

खेतों में बने बिलों में पानी भर जाने से बड़े-बड़े चूहे निकलते थे। शाम को अगर खेत बकाया रह जाता, तो मालिक नाराज न हो जाए, इसलिए हुड़किया हुँकारी लगाता था—’धार में दिन है गो, ब्वारियो…। छेक करो, छेक करो।’ मतलब कि चोटी पर सूरज पहुँच गया है। जल्दी करो, बहुओ, जल्दी करो।

कार्तिक में जब धान की फसल पक जाती थी, तो उसकी पूलियाँ खेत में ही जमा करके रख दी जाती थीं। धान की पेराई के लिए इस्तेमाल होने वाली बाँस की चटाइयाँ को ‘मोस्टÓ कहते थे। ये पतले बाँस की नरसल की चटाइयाँ होती थीं, जो कि 10 फुट बाई 10 फुट या 8 फुट बाइ 8 फुट की होती थीं। ये चटाइयाँ बड़े खेत में बिछा दी जाती थीं और उनमें धान के पूले रख दिए जाते थे। लकड़ी का बड़ा-सा कुंदा रखकर उसमें धान को पछीटा जाता था। पूलियों में जो धान रह जाता, उसे पतली संटियों से झाड़ा जाता था। धान के खाली पराल को अलग करते। चाँदनी रात को पूरी रात यह कार्यक्रम चलता। एकाध बार मैं भी जिद करके इस तरह के कार्यक्रम में गया। कई मजदूर लगे थे। हमारी ईजा भी गई थीं। धान की वह खुशबू और चाँदनी रात, बहुत आनन्द आता था।

धान की पकी फसलों को नुकसान पहुँचाने में जंगली सुअरों का बड़ा हाथ रहता। वे अपनी थूथन से खेत की मिट्टी को खोद कर न जाने क्या ढूँढ़ते रहते। लीलाधर ताऊजी के पास एक भरवाँ बन्दूक थी, जिसमें बारूद, साबुत उड़द के दाने, कपड़े का लत्ता, ठूँस-ठूँस कर ट्रिगर के ऊपरी सिरे पर टोपी चढ़ाने के बाद फायरिंग की जाती, तो सुअर भाग जाते। यह काम देर रात में किया जाता था।

इस बन्दूक से जुड़ा एक रोचक प्रसंग है, जिसने हमें बचपन में बहुत गुदगुदाया था। हमारी माधवी बुआ की ससुराल मल्ला स्यूनरा में थी, जो हमारे गाँव से अधिक दूरी पर नहीं था।

उस बार उनका पोता राम अकेला ही अपनी दादी के मायके में आया था। वह 14-15 वर्ष का किशोर बहुत ही दुस्साहसी था। ताऊजी की भरवाँ बन्दूक उनके शयनकक्ष में कोने पर टंगी रहती थी। एक दिन महाशय राम की नजर उस पर पड़ी। उसने साबुत उड़द के दाने, पुराने चिथड़े, कुछ कठोर पत्थर के टुकड़े जमा किए। उसे न जाने कैसे बारूद का पाउडर भी आलमारी में मिल गया था। उसने खूब ठूँस कर बारूद से सना यह सामान बन्दूक की नाल में भरा। अब समस्या ट्रिगर (घोड़ी) में पहनाने वाली टोपी की थी। वह नहीं मिली, तो राम ने ट्रिगर उठा कर छेद के मुँह के सामने जलता चैला (छिलुक) रख दिया। बन्दूक ऊँचाई पर टिकाई हुई थी। उसके अन्दर भरे मसाले में आग लगी, तो बारूद विस्फोट करता हुआ, दीवार के ऊपर रखे ताऊजी के जूते से टकराया। दूसरी तरफ छिद्र से निकली चिंगारी के छींटे राम के कपाल पर जा लगे। खैरियत यह थी कि उसकी आँखें सुरक्षित रहीं। गाँव के लड़कों की तरह वह टोपी पहने रहता था। उस दिन राम ने अपनी टोपी आँख की भँवों तक खींच रखी थी। हादसे के बाद वह बन्दूक को यथास्थान रख आया ।

बाद में ताऊजी जब अपना जूता पहनने लगे, तो उसमें बड़ा-सा छेद देख कर वह चौंके। राम ने उन्हें बताया कि एक काला कुत्ता जूतों के पास बैठा था। शायद उसी की यह कारस्तानी हो। लेकिन जब किसी ने राम की टोपी को ऊपर खिसका कर ठीक से पहनाने की कोशिश की, तो ललाट में चानमारी के निशानों ने उसकी पोल खोल दी। राम अपने गाँव भाग गया।

पकी फसलों, विशेषकर धान के खेतों के बीच से गुजरने का अपना आनन्द होता था। पके धान की मादक गंध तन-मन को एक नई स्फूर्ति से भर देती थी।

धान की पेराई के अलावा मुझे गेहूँ की मड़ाई में भी बहुत आनन्द आता था। गेहूँ की पूलियाँ घर के आँगन के ऊपर वाले खेत में लाकर जमा कर दी जाती थीं। आँगन की खूब अच्छे से सफाई करके लिपाई कर दी जाती थी। जब आँगन सूख जाता, तो पूलियाँ आँगन में फैला दी जातीं। फिर बैलों को गेहूँ की बालियों के ढेर के ऊपर चलाया जाता था। हम बच्चे उनके पीछे-पीछे हाथ में संटी लेकर चलते थे—’हौ ले बल्दा, हौ ले- हौ ले… कानि कै लालै बल्दा… पुठि कै लालै, हौ ले-हौ ले…’ मतलब बैल राजा चल/धीरे-धीरे चल/कंधे में लाद कर लाएगा, पीठ पर लाद कर लाएगा/बल्दा चल। बैल गेहूँ की पूलियों को अपने पैरों से कुचलकर दानों को अलग कर देते थे। बैल गेहूँ न खा लें, इसलिए उनके मुँह में जाली बांधी जाती थी। बाद में सूपों से या चादरों से हवा करके भूसे को उड़ाया जाता। एक सयाना इधर से, तो दूसरा उधर से चादर पकड़ता और चादर को तेज-तेज ऊपर-नीचे कर हवा करते। इससे भूसा उड़ता जाता और गेहूँ नीचे गिरता जाता। उसके बाद हम बच्चे जहाँ गाय-भैंस चरने जातीं, वहाँ से सूखा हुआ गोबर लेकर आते। पहाड़ में गोबर का ईंधन के रूप में इस्तेमाल नहीं होता था, क्योंकि गोबर खेती के लिए बहुत जरूरी होता है, इसलिए उसे बरबाद नहीं किया जाता। गोशाला की रोज सफाई होती। गोबर को गोशाला के बाहर डाल दिया जाता। वहाँ खाद का ढेर लगा रहता। जो घास पशुओं के नीचे बिछाई जाती, वह उनके पेशाब और गोबर में सन कर सुनहरी खाद हो जाती। वही जैविक खाद खेतों में डाली जाती थी। वह खाद फर्टिलाइजर से कहीं ज्यादा अच्छा होती थी।

हम बच्चे सूखा हुआ गोबर लेकर आते थे। उस गोबर का ढेर लगा करके उसमें आग लगा दी जाती थी। उसके जलने से राख बनती। बाँस की चटाइयाँ बिछा कर और उन पर गेहूँ डाल कर उसमें राख डाली जाती। फिर पैरों से उसको मिलाया जाता। राख कीटनाशक दवा का काम करती थी। यह गाँव की विधि थी कि किस तरह से अनाज को सुरक्षित किया जाता था। जिन चटाइयों पर खेती का काम होता था, उनको ऐसे ही लपेट कर नहीं रखा जाता था। उन चटाइयों के लिए बकायदा गोशालाओं में गाय का या अन्य पशुओं का मूत्र कनस्तर में इकट्् ठा किया जाता था। पशुओं के मूत्र को इन चटाइयों पर छिड़का जाता था। उससे एक तो चटाइयों में लचीलापन आ जाता था। दूसरा, कीड़े नहीं लगते थे। इससे ये चटाइयाँ वर्षों चलती थीं। मूत्र सूखने पर चटाइयों को लपेटकर टाँड़ के ऊपर डाल दिया जाता। जब जरूरत हुई, तब निकाल लिया जाता।

हम बच्चे बचपन से ही खेती-बाड़ी के बारे में जान जाते थे और अपनी क्षमता के अनुसार कुछ करते भी रहते थे। जैसे—गर्मियों में बैंगन और मिर्च की पौध लगाते। हम अपनी-अपनी क्यारियाँ बनाते थे। फिर उनमें मिर्ची और बैंगन के पौध रोपते थे। भिंडी की पौध नहीं होती थी। भिंडी के बीज बोए जाते। शाम को हम पौधों  में गिलास से पानी डालते थे। फिर पौधों का क्रमिक विकास देखते थे—पौधे बड़े होते जाते। फिर उनमें फूल लगते। इसके बाद उनमें फल लगते। जब पौधों में पहला फल दिखाई देता, तो हमें बहुत खुशी होती। अगर कोई सीधी उंगली से फल की तरफ इशारा कर देता, तो हम टोकते कि ऐसा करने से सड़ जाएगा। उंगली टेढ़ी करके दिखाना होता था कि वह देखो, फल आ गया है।

इस तरह का मनोविज्ञान और लगाव बचपन से वनस्पतियों के साथ था।

पहाड़ों में मैदानी इलाकों की तरह पतली ककड़ी नहीं होती। वहाँ बड़ा खीरा होता है जिसे कहते ककड़ी ही हैं। खीरे की बेल को कोई सहारा देना पड़ता है। बेलों के सहारे के लिए कोई छोटा पेड़ काटकर या पुराने पेड़ की टहनी को काटकर उसे लगाया जाता था। बेल उस पर लिपट कर चढ़ जाती। पेड़ के सहारे खीरे लटके रहते थे। जब फसल समाप्त हो जाती, तो बेल को निकाल दिया जाता। उसमें छोटे-छोटे खीरे लगे रहते थे। इनकी अब बढऩे की सम्भावना नहीं रहती थी। हम बच्चे उनको निकालकर उन पर सीकों की टाँगें लगाकर बकरे की तरह से उनकी बलि देते थे। ऐसा हमने मन्दिरों में देखा होता था, जहाँ बलि दी जाती थी। मेरी एक कविता है–

काली की बलि पूजा का स्वांग,
रचा लगा तिनकों की टाँग
हरी ककड़ी के अन्तर को छेद
छिन्न कर उसका मस्तक बाँटा प्रसाद
न रखा छूत-अछूत का भेद।

खट्टे अनार को दाडि़म कहते हैं। पन्सारी के यहाँ चटनी के लिए जो अनार दाना बिकता है, वह दाडि़म का ही बीज होता है। दाडि़म का फूल सिन्दूरी रंग का होता है। आरी के दाँतों की तरह तिकोनी उसकी चार-पाँच पंखुडिय़ाँ होती हैं। उसको उल्टा करके रख देने से फूल खड़ा हो जाता। वे फूल पेड़ों के नीचे खूब गिरे रहते थे। हम उनको इकट्ठा करके लाते और कतार में रखकर बारात निकालते थे। उनमें सींकें लगाकर डोली वगैरह बना लेते. इस तरह के खेल होते थे हमारे जो वनस्पति संसार से हमको जोड़ते थे।

बिगौत की दावत

हमारे घर में गायें थीं। हमारी सबसे प्रिय गाय का नाम बसंती था। वह ईजा के मायके से आई हुई गाय की तीसरी पीढ़ी की थी, इसलिए ईजा उसको बहुत प्यार करती थीं। हम भाई-बहन उसको मौसी कहते थे। मैं जब थोड़ा बड़ा हुआ, तो कभी-कभी गायों को ग्वाले के पास छोडऩे के लिए ले जाता था। एक बार मैं बसंती के साथ छेड़-छाड़ कर रहा था—कभी उसके थन में हाथ लगा देता, तो कभी उसकी पूँछ को पकड़ कर सिर पर लगा देता।

बसंती ने सींग हिलाकर मना किया, लेकिन मेरी शैतानी बढ़ती गई। पहाड़ी रास्ते घुमावदार होते हैं। आखिर में तंग आकर बसंती ने सिर नीचा करके मेरी टाँगों के नीचे से सींग डाले और मुझे उठाकर ऊपर घुमावदार रास्ते पर रख दिया। जैसे—मुझे सजा दे दी हो। तब में समझ गया कि ज्यादा छेड़-छाड़ नहीं करनी चाहिए।

यह बात बसंती के प्रसंग में समझ में आई कि पशु मनुष्य की भाषा कैसे समझते थे। जब खेतों में फसल कट जाती थी, तो पशुओं को कुछ दिनों तक उन्हीं खेतों में चरने के लिए छोड़ दिया जाता था। एक बार कोई मेहमान आए, तो उस समय घर में चाय के लिए दूध नहीं था। ईजा ने खेत की तरफ जाकर बसंती को हाँक दी। बसंती ने सिर उठाकर ऊपर देखा। ईजा ने कहा, ”आ बसंती।’’ वह नजदीक आ गई। ईजा के हाथ में गिलास था। ईजा ने उस गिलास में थोड़ा दूध दुहा। फिर ईजा ने बसंती से कहा, ”अभी ठहर’’ और बसंती खड़ी रही। जैसे—सब कुछ समझ रही हो। ईजा घर आईं। गिलास अलमारी में रखा। कटोरदान से एक रोटी निकाल कर बसंती के लिए ले गईं। ईजा ने बसंती को रोटी खिलाकर उसकी पीठ थपथपाकर कहा, ”जाओ’’ तो वह चली गई। इस तरह का सम्वाद पशुओं और मनुष्यों के बीच होता था।

और थोड़ा बड़े होने पर एक और घटना मेरे जीवन में घटी। हमारे गाँव के एक परिवार की गाय सुरमा थी। सफेद रंग की बड़ी खूबसूरत गाय थी। हमारे पंचायती ग्वाले मोहनदा को उस गाय से बहुत लगाव था। सुनते हैं कि वह अपने दिन के कलेवे से एक रोटी बचाकर सुरमा को खिलाते थे। सुरमा भी उनको बहुत प्यार करती होगी। एक बार मोहनदा काफल तोड़ते हुए पेड़ से नीचे गिर गए। वह शाम को जब जंगल से लौटते थे, तो बच्चों के लिए मौसम के हिसाब से जंगली फल लेकर आते थे। वह हम बच्चों के लिए काफल लाने के लिए पेड़ पर चढ़े होंगे, गिर गए। शाम हो गई। सारी गायें अपने-अपने बच्चों की याद कर घर चली आईं, लेकिन सुरमा मोहनदा के पास ही रह गई। मोहनदा उठने में लाचार थे। गाँव वालों ने देखा कि सभी गायें चली आई हैं, लेकिन मोहनदा साथ में नहीं हैं। सुरमा के घरवालों ने देखा कि सुरमा भी नहीं आई है। सब लोग दौड़े-दौड़े जंगल की तरफ गए। वहाँ देखा कि मोहनदा गिरे हुए हैं और सुरमा उनको चाट रही है। मोहनदा को उठा कर लाया गया और पीछे-पीछे सुरमा भी आ गई।

वह ऐसे आई, जैसे—मोहनदा की माँ हो।

हमारे ईजा-बाबू में एक गाय को लेकर खूब मतभेद हुआ था। इसकी याद मुझे आज भी है। हुआ यह कि एक दिन बाबू कहीं जा रहे थे। उन्होंने देखा कि पड़ोसी  गाँव का एक आदमी अपने ढोरों को चरा रहा है। सभी पशु बहुत दुर्बल हो रहे थे। पैलागी-आशीष के बाद बाबू ने उन पशुओं की हालत पर चिंता जताई, तो वह व्यक्ति अपने पास घास-चारा न होने का रोना रोने लगा। उसने आग्रह किया कि एक गाय बाबू रख लें।

बाबू ने विनोद के लहजे में कहा, ”अब इस हाड़ के पिंजर का गोदान लेने के लिए मैं ही रह गया हूँ?’’

उस व्यक्ति ने फिर जिद की, ”आप वैसे न रखो, तो कुछ दाम दे देना, लेकिन आपके घर में यह पल जाएगी। मेरे घर में तो यह भूखी मर जाएगी और मुझे गोहत्या लगेगी। अच्छी नस्ल की गाय है, पर मुझ अभागे के घर आ मरी।’’

बाबू तब भी सहमत नहीं हुए तो वह गिड़गिड़ाया, ”आप पन्द्रह रुपये ही दे देना। उससे मैं दूसरे पशुओं के लिए घास खरीद लूँगा। मेरे दोनों ‘लुट’ इन्होंने चट कर दिए हैं।’’

उसकी इस दलील पर बाबू पसीज गए। उन्होंने उसे पन्द्रह रुपये देकर गाय हमारे घर पहुँचाने का आदेश दिया।

वह सफेद रंग की कद्दावर गाय थी। उसके सींग बैलों की तरह खूब बड़े थे। थनों के अलावा उसमें कोई भी लक्षण स्त्रैण होने का नहीं दिख रहा था। ईजा की पहली प्रतिक्रिया हुई, ”यह गाय है या बैल?’’

वह व्यक्ति गाय को गोशाला में खूँटे पर बाँधकर चला गया।

कहाँ ईजा की सुन्दर सलोनी बसंती गाय और कहाँ यह हड्डियों का ढाँचा!

नई गाय उपेक्षित ही रही। उस गाय को लेकर ईजा के अलावा दूसरा विरोध पंचायती ग्वाले मोहनदा का था। यह एक अलिखित नियम था कि गाँव में किसी गृहस्थ में किसी पशु की खरीद-फरोख्त हो, तो उसमें मोहनदा की सहमति जरूरी मानी जाती थी। इस बार ऐसा नहीं हुआ था। मोहनदा गुस्साए हुए थे। दूसरे दिन एक आँख के धनी मोहनदा ने पशुओं को जंगल ले जाते हुए इस गरीब जीव को हाँक कर भगा दिया। वह इधर-उधर डोलती रही।

बाबू ने मोहनदा को पूरी बात बताई, तो वह नरम पड़े, लेकिन ईजा के विचारों में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। वह घर की जूठन पूर्ववत अपनी लाड़ली बसंती को देती रहीं और इसकी भरपूर उपेक्षा करती रहीं। लेकिन बाबू हार मानने वाले व्यक्ति नहीं थे। वह भिगोए हुए भट और दूसरी पौष्टिक चीजें गो-ग्रास के पिण्ड में रखकर उसे खिलाते और उसके लिए अच्छा चारा छाँटकर अलग रखते।

कुछ दिनों बाद उस गाय की काया में सुधार आने लगा। उसके दूध की मात्रा भी बढ़ गई। बाबू कहते, ”इसका दूध अलग से गर्म कर उसे दूसरी ठेकी में जमाया करो। यह अच्छी नस्ल की गाय है। इसके दूध में चिकनाई ज्यादा है। इसके मक्खन में ज्यादा घी निकलेगा।’’ ईजा मुँह बिचकाती, लेकिन बाद में यह बात सच निकली।

उस गाय को हमारे गोठ में मान्यता प्राप्त करने में काफी समय लगा। इसका एक कारण शायद उसका कद और बड़े सींग भी थे और बसंती की तुलना तो थी ही!

गोधूलि में गले में बंधी घंटियों के साथ गायों का जंगल से लौटना बड़ा मोहक होता था। एक मुख्य गाय होती थी। उसके गले में एक गोल खोखल ताम्बे या पीतल का पाइप जैसा होता था। उसके अन्दर टकराने वाला लकड़ी का एक टुकड़ा होता था। जब गाय चलती थी, तो घन-घन-घन-घन-घन की आवाज आती थी। अन्य गायें मुख्य गाय के पीछे-पीछे आती थीं। यह एक संकेत होता था कि गायें लौट आई हैं। घन-घन-घन की आवाज को बछड़े भी सुनते होंगे, तो वे भी अपनी भाषा में खुशी जताने लगते थे। गाय के गले में बंधे पाइपनुमा वाद्य की घन-घन चिडिय़ों की चहचहाट के साथ एक मधुर सांगीतिक रचना प्रस्तुत कर देती थी।

गायें जब जंगल से लौटतीं, तो कभी-कभी, कोई गाय बेचैन-सी दिखाई देती। घर वाले उसकी बेचैनी का कारण समझ जाते और एक छोटे टब में पानी लाकर उसमें मुट्ठीभर नमक घोलकर उसके सामने रख देते। वह ज्यों ही पानी पीती, उसकी नाक के दोनों छेदों से लपलपाती हुई जोंकें बाहर निकलतीं, जिन्हें हाथ से खींचकर बाहर फेंक दिया जाता। जो जोंकें नमकीन पानी में गिर जातीं, वे तत्काल विलीन हो जातीं। जोंकों से मुक्ति पाकर गायें फिर सहज हो जाती थीं। पहाड़ों में गीली जगहों पर जोंकें रहती हैं और पैदल चलने वालों के पैरों से चिपक कर खून चूसने के बाद मोटी होकर अपने आप गिर जाती हैं। आदमी को जब पैर में खुजली होने लगती है, तब उसे इस शोषण का पता चलता। मेरे साथ जब भी ऐसा हुआ, खुजलाने पर उस जगह सूजन आ जाती थी।

जब गायें बियाती थीं, तो सयाने लोग 22 दिनों तक उनका दूध नहीं पीते थे। गाय बियाने के 22वें दिन लापसी बनाई जाती थी और चमू देवता के थान पर चढ़ाई जाती थी। चमू पशुओं के देवता होते हैं। उसके बाद सयाने लोग भी दूध पीने लगते थे। लेकिन इस बीच दूध को गर्म करने पर वह छेने जैसा हो जाता था। पहाड़ में उसे बिगौत कहते हैं और मैदानी इलाके में खिजरी। प्राय: गाय दूध कम देती थी। ऐसा होता नहीं था कि पूरे गाँव के बच्चों को खिजरी खाने के लिए एक साथ बुला लिया जाए। ऐसे में एक-एक घर के बच्चों को बुलाया जाता था। उनको खिजरी दी जाती थी। फिर दूसरे दिन अगले घर के बच्चों को बुला लिया जाता। ऐसे मौके कई आते थे। लोगों की गाय बियाती थी, तो दूध फेंका नहीं जाता था, बच्चों को दिया जाता था। आज भी खिजरी खाने की इच्छा होती है।

गायों के नवजात बछड़ों को कुलाँचे भरते देखने का सुख और उनके साथ हाथ-पैरों के सहारे उछल-कूद करने का सुख जिन बच्चों ने उठाया है, वे ही इसकी ताईद कर सकते हैं।

अन्न और गोरस के प्रति बहुत आदर भाव प्रदर्शित किया जाता था, क्योंकि ये दोनों ही जीवनदायी तत्व माने जाते थे। दूध या दही यदि भूमि पर गिर जाता, तो उसे तत्काल पोंछ दिया जाता था ताकि किसी का पैर उस पर न पड़े। इसी प्रकार अन्न को भी पवित्र माना जाता था।

बुद्धिमान राजा : फ़ैयाज़ अहमद

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यह कहानी है जंगल के राजा शेर की। शेर और राजाओं की तरह नहीं था। यह राजा था बड़ा चालाक, बड़ा शातिर। हर काम सोच-विचार कर करता। हर निर्णय संभल कर लेता। यही कारण था कि वह वर्षों से राज कर रहा था। कभी-कभार किसी कोने से अगर विरोध की हल्की-सी भी चिंगारी उठती, उस पर फ़ौरन पानी डाल देता। मंत्री से संतरी तक सभी राजा की बुद्धिमानी के क़ायल थे।

एक दिन राजा को अचानक विचार आया कि उसके मंत्रीमंडल में एक भी पक्षी नहीं है। फिर उसने सोचा, ‘क्यों न अपने मंत्रीमंडल में इस बार पक्षियों को भी शामिल कर लिया जाए।’

और राजाओं की तरह यह राजा अपनी राय या अपना विचार किसी पर थोपता नहीं था, क्योंकि उसे थोपने की ज़रुरत ही नहीं पड़ती थी। उसने बड़ी विनम्रता से अपने दिल की बात अपने मंत्रियों से कही। अब राजा का मन था और उसका विचार, कौन मना करता। सारे मंत्रियों ने बिना सोचे-समझे ‘हाँ’ में सिर हिला दिए। महामंत्री गीदड़ की पक्षियों से कभी नहीं बनती थी। गीदड़ राजा की इस सोच से ख़ुश तो नहीं था मगर ‘ना’ कहने की उसमें हिम्मत नहीं थी। ‘जान की अमान पाऊं तो कुछ कहूँ?’ राजा ने अपने शाही अन्दाज़ में मुस्कराते हुए कहा, ‘‘इजाज़त है!’’ महामंत्री गीदड़ बोला, ‘‘महाराज की सोच कभी ग़लत हुई है? महाराज ने कुछ सोचकर ही पक्षियों को मंत्रीमंडल में शामिल करने का निर्णय लिया होगा। बस एक समस्या है……।’’ महाराज ने बात पूरी ही नहीं होने दी और बड़े प्यार से बोले, ‘‘कैसी समस्या?’’

महराज की इसी अदा पर तो पूरा मंत्रीमंडल जान छिड़कता था। वह कभी गुस्सा नहीं होते थे। फिर भी गीदड़ डर गया और उसने कांपते स्वर में अपनी बात पूरी की, ‘‘…पक्षियों का एक विशाल समूह है, इसमें से कौन उनका प्रतिनिधि बनेगा? और कैसे?’’ राजा मुस्कराए, बारी-बारी से सभी को देखा और बोले, ‘‘एक आम सभा में, मैं ख़ुद पक्षियों का नेता नियुक्त करुँगा। मुनादी करवा दी जाए।’’

मुनादी हो गई। पक्षियों के बीच बड़े उत्साह का माहौल बन गया। हर तरफ़ जश्न मनाया जाने लगा। पटाख़े छूटने लगे। गीत-संगीत के कार्यक्रम आयोजित किये जाने लगे। राजा की जय-जयकार हो रही थी, जैसे राजा ने उन्हें मंत्रीमंडल में जगह नहीं, बल्कि पूरा राज-पाट देने का फैसला कर लिया हो। ख़ैर जो भी हो उनके लिये तो बड़ी बात थी। पहली बार उनकी ओर से किसी को राजा के समक्ष उनकी समस्या रखने का मौक़ा मिल रहा था। उनके लिये यही काफ़ी था। अब उनके सामने एक ही समस्या थी। बहुत बड़ी समस्या!! कौन होगा उनका नेता? कौन लड़ेगा उनकी ओर से? यह विचार आते ही रंग में भंग पड़ गया हो, जैसे। सभी सिर जोड़ कर बैठ गए। तय हुआ कि पक्षियों की एक आम सभा बुलाई जाए। आनन-फ़ानन सभा भी बुला ली गई। सभी पहुँचे, यहाँ तक कि उनके समर्थन में कीड़े-मकोड़े भी आ गए, मगर एक ग़ायब था… भटकू कौवा! वह कहीं दिखाई नहीं दे रहा था। उसकी अनुपस्थिति को लेकर सभी बातें करने लगे।

‘‘जब मुनादी हो रही थी, उस समय भटकू ही सब से आगे-आगे था।’’

‘‘कहाँ चला गया?’’

‘‘अपने रिश्तेदार के यहाँ तो नहीं चला गया?’’

‘‘इस स्थिति में कोई ऐसा कैसे कर सकता है?’’

‘‘मगर वह है कहाँ?’’

‘‘उसे तलाश किया जाए।’’

‘‘उसे राजमहल की तरफ़ जाते देखा गया है!’’

‘‘मतलब!’’

‘‘आप ख़ुद समझ लीजिये।’’

‘‘यह कैसे हो सकता है?’’

‘‘इधर कुछ दिनों से भटकू को कई बार राजमहल की ओर जाते देखा गया है।’’

‘‘हो सकता है, वह उधर किसी और काम से गया हो?’’

सभा में इसी तरह की बातें होती रहीं, मगर उनका नेता कौन होगा, यह तय नहीं हो पाया। अब सभी की नज़र थी आम सभा पर।

आम सभा में सभी ने अपने-अपने कमाल दिखाए। बुलबुल ने गाना सुनाया तो मोर ने नाच दिखाया। मगर बात बन नहीं रही थी। नाचने या गाने से मंत्रीमंडल का काम नहीं चल सकता था। ख़बर लाने-ले जाने के लिये तो कबूतर ठीक था… मगर एक मंत्री के रुप में? नहीं, नहीं… राजा को कुछ जँचा नहीं। जँचता भी कैसे? आँखों में तो कोई और बसा था। शाम होने वाली थी। परिणाम की घोषणा भी करनी थी। राजा उठे। प्यार से थोड़ा ग़ुर्र-ग़ुर्र किया, दहाड़ कर गला साफ़ किया, पंजों को हिला-हिला कर अपनी जनता को अपनी तरफ़ आकर्षित किया, फिर मुस्कराते हुए एक ओर देखा और किसी को मंच पर आने का इशारा किया। भटकू कौवे को मंच पर लाया गया। पूरा मजमा स्तब्ध था। कोई सोच भी नहीं सकता था कि भटकू को मंत्री बनाया जाएगा। वैसे भटकू ने यहाँ तक पहुँचने में बड़ी मेहनत की थी। इतने पापड़ बेले थे कि ख़ुद लाग़र हो गए थे। लेकिन क्या फ़र्क़ पड़ता है? मंत्री तो बन ही गए…सभा समाप्त हो गई। एक बार फिर से पूरा जंगल राजा की जय-जयकार से गूंज उठा।

लेकिन बहुतेरों के मन में एक सवाल था,… ‘भटकू राजा का प्रतिनिधि बना या पक्षियों का?’

चि‍त्र : हि‍मानी मि‍श्र, बीएसी-2

खेलें कहाँ : मनोहर चमोली ‘मनु’

मनोहर चमोली ‘मनु’

मनोहर चमोली ‘मनु’

शि‍क्षा जगत से जुडे़ युवा लेखक मनोहर चमोली ‘मनु’ ने वि‍द्यालयी शिक्षा के लि‍ए प्रचुर मात्रा में लेखन और संपादन कि‍या है। इसके अलावा उनकी कहानी, कविता, नाटक, व्यंग्य, समीक्षा आदि‍ वि‍भि‍न्‍न पत्र-पत्रि‍काओं में प्रकाशि‍त हुए हैं। उनकी बाल कहानि‍यों का मराठी में अनुवाद हुआ है। उनकी बाल कहानी-

दिव्या ने स्कूल बैग कंधे से उतारा और सीधे दरवाजे की ओर जाने लगी। उसकी मम्मी ने पीछे से टोकते हुए पूछा, ‘‘दिव्या ! कहां जा रही हो। पहले कपड़े बदलो। मुंह हाथ धो लो। कुछ खा-पी लो। तब जाना।’’

लेकिन दिव्या ने जैसे कुछ सुना ही नहीं। दिव्या की मम्मी भी पीछे-पीछे चल दी। नजदीक ही कॉलोनी का पार्क था। कॉलोनी के कुछ बच्चे पार्क के बाहर खड़े थे। दिव्या उन बच्चों के साथ खड़ी थी। दिव्या की मम्मी हैरान थी कि आखिर बात क्या है। दिव्या ने आज से पहले कभी ऐसा नहीं किया था। वह स्कूल से आती है तो सबसे पहले अपने बैग से वो सारी कॉपी-किताबें निकालती है, जिनमें उसे होमवर्क करना होता है। फिर वह कपड़े बदलती है। मुंह-हाथ धोकर इत्मीनान से कुछ खाती है। स्कूल की रोचक बातें भी बताती है। होमवर्क निपटाने के बाद ही खेलने जाती है, लेकिन आज तो उसने घर आते ही बैग पटका और सीधे पार्क की ओर आ गई।

‘‘जरा सुनूं तो आखिर ये बच्चे आपस में क्या बात कर रहे हैं?’’ दिव्या की मम्मी पार्क के कोने में चुपचाप खड़ी हो गई और सावधानी से बच्चों की बातें सुनने लगीं। दिव्या के अलावा कॉलोनी के बच्चों में श्रेया, आकांक्षा, चिक्की, अभय, अनुभव और आदित्य भी खड़े थे। अभय जोर से बोला, ‘‘घर के अंदर तो खेलने का सवाल ही नहीं होता। कॉलानी में भी सब हमें टोकते रहते हैं। एक पार्क ही तो है जहां हम खेलते हैं।’’ अब दिव्या की आवाज सुनाई दी, ‘‘पार्क का ताला तोड़ देते हैं।’’

श्रेया ने कहा, ‘‘उससे क्या होगा? ताला तो दूसरा आ जाएगा।’’

चिक्की ने पूछा, ‘‘फिर क्या करें? यूं ही खड़े रहें क्या?’’ तभी किसी की नजर दिव्या की मम्मी पर पड़ गई। वे सब चुप हो गए। दिव्या की मम्मी भी उनके झुण्ड में शामिल हो गई।

‘‘ये सब क्या है? दिव्या क्या हुआ?’’ दिव्या की मम्मी ने नाराज़गी से पूछा। तब तक श्रेया और अनुभव की मम्मी भी वहां आ गईं। दिव्या को छोड़कर बाकी सभी अपने स्कूल बैग के साथ वहां खड़े थे। श्रेया की मम्मी दूर से ही चिल्लाई, ‘‘श्रेया। स्कूल की छुट्टी हुए आधा घंटा हो गया है। तू यहां क्या कर रही है?’’

श्रेया ने जैसे कुछ सुना ही नहीं था। वह दिव्या की मम्मी से बोली-‘‘आंटी। ये पार्क में ताला किसने लगाया? सुबह तो नहीं था। हम सब ताला देखकर यहां रुके हैं।’’

श्रेया की बात पर ध्यान न देते हुए अनुभव की मम्मी लगभग चीखी, ‘‘ताला लग गया तो कौन-सा आफत आ गई। तुम बच्चों को सीधे पहले घर आना चाहिए। मैं तो घबरा ही गई कि आज बच्चे अब तक घर क्यों नहीं आए। चल अनुभव। तू घर चल पहले। तूझे घर में बताती हूं।’’

दिव्या की मम्मी ने हस्तक्षेप किया, ‘‘एक मिनट भाभी। ज़रा मैं भी तो सुनूं ये बच्चे आपस में खुसर-पुसर कर क्यों रहे हैं। वाकई! पार्क में ताला तो लगा है।’’

अब तक चिक्की की मम्मी भी आ गई थी। चिक्की की मम्मी ने कहा, ‘‘मैं बताती हूं। आज सुबह ही कॉलोनी के शर्मा अंकल ने यहां ताला लगाया है। अब कॉलोनी वाले जगह-जगह पर अपनी गाडि़यां खड़ी कर देते हैं। सड़क तक गाडि़या निकालने में सभी को दिक्कत होती है। शर्मा अंकल कह रहे थे कि सन्डे को सभी कालोनी वालों की मीटिंग होगी। अब सब अपनी गाडि़या पार्क के अंदर खड़ी करेंगे।’’

दिव्या बीच में ही बोल पड़ी, ‘‘तो आंटी फिर हम खेलेंगे कहां? पार्क तो खेलने के लिए है।’’

अभय बोला, ‘‘घर में खेलने की मनाही है। सड़क में जाने नहीं देते। कॉलोनी में खेलो तो सब कहते हैं शोर मत करो। ले-दे कर एक पार्क बचा था तो उसमें ताला लगा दिया। किसी ने हमसे पूछा भी नहीं। आज तो मन्डे है। सन्डे तो दूर है। तब तक हम खेलेंगे नहीं क्या? अब हम कहां जाएंगे?’’

चिक्की की मम्मी ने कहा, ‘‘तो जरूरी है कि तुम खेलो। घर में रहो। घर के अंदर खेलने वाले खेल खेलो। पढ़ाई करो।’’

चिक्की मुंह बनाते हुए बोली, ‘‘क्या मम्मी। आपको तो हमे सपोर्ट करना चाहिए। महीने में आपकी एक किटी पार्टी घर में क्या होती है आप कितनी परेशान हो जाती हो। चार दिन से तैयारी में लग जाती हो। घर के अंदर कौन से खेल खेलूंगी मैं। किसके साथ? आप मेरे दोस्तों को तो घर में आने भी नहीं देती।’’

यह सुनकर चिक्की की मम्मी सकपका गई। दिव्या भी चुप नही रही। वह बोली, ‘‘शर्मा अंकल अपने आप को क्या समझते हैं। हम यहां से तब तक नहीं जाएंगे जब तक पार्क का ताला नहीं खुलता है।’’

दिव्या की मम्मी ने उसे डांटते हुए कहा, ‘‘चुप! ऐसा नहीं कहते।’’

‘‘जब बड़ों ने फैसला ले ही लिया है। तो तुम कौन होते हो उस पर बाते बनाने वाले। चल आकांक्षा यहां से।’’ आकांक्षा की मम्मी ने कहा।

आकांक्षा ने कहा, ‘‘मम्मी एक मिनट। हम बच्चों की स्कूल बस सड़क के बाहर खड़ी रहती है। कॉलोनी के अंदर नहीं आती। गाडि़यां भी तो सड़क पर खड़ी हो सकती हैं। पार्क के अंदर क्यों? हम बच्चों की तो कोई गाड़ी नहीं है। बड़ों की समस्या है तो बड़े जानें। हमें हमारा पार्क खाली चाहिए।’’

दादा-दादी जैसे कई हैं, जो सुबह-शाम इस पार्क में टहलते हैं। उनका क्या होगा। क्या वे हर रोज शर्मा अंकल से ताला खुलवाएंगे?’’ अब आदित्य ने जोर से कहा।

तभी शर्मा अंकल वहां आ गए। वह मुस्कराते हुए बोले, ‘‘क्या हो रहा है यहां? मेरे खिलाफ क्या-क्या बोल रहे हो तुम बच्चे लोग? ज़रा मैं भी तो सुनूं।’’

दिव्या की मम्मी बोली, ‘‘नमस्ते भाई साहब। ये बच्चे पार्क को लेकर परेशान हैं? इनका कहना है कि हम कहां खेलेंगे?’’

शर्मा अंकल पार्क के गेट की ओर बढ़ चुके थे। उन्होंने ताला खोलते हुए कहा, ‘‘ये लो। मेरे बच्चों ने अपने प्रिंसिपल सर से मेरे आफिस फोन तक कर दिया। यही नहीं, आज जब मैं उन्हें लेने स्कूल गया तो वे मेरे साथ मेरी कार में आए ही नहीं। उनका कहना है कि वे आज के बाद मेरी कार पर ही नहीं बैठेंगे। सॉरी बच्चों। हम बड़े भी कई बार बच्चों जैसी हरकत कर डालते हैं। पार्किंग के लिए हम कुछ ओर सोचेंगे। पार्क में ताला कभी नहीं लगेगा। बस।’’

बच्चे ताली बजाने लगे। लेकिन दिव्या ने कहा, ‘‘बच्चों जैसी हरकत से आप क्या कहना चाहते हैं अंकल?’’

शर्मा अंकल झेंप गए। फिर मुस्कराते हुए बोले, ‘‘यही कि जैसे आप सब अपना सारा काम छोड़कर भरी दुपहरी में यहां खड़े हैं। यह बातें तो शाम को भी हो सकती थी। मुझे भी तो ऑफिस से यहां आना पड़ा। मुझे भी तो मेरे बच्चों ने यही कहा कि जब तक पार्क का ताला नहीं खुलेगा, वे न खाना खाएंगे न ही होमवर्क करेंगे। अब तुम सबसे पहले एक काम करो। मेरे घर जाओ और मेरे बच्चों को बताओ कि ताला खुल गया है। ये लो ताला और चाबी।’’

दिव्या ताला-चाबी पर झपटी और सारे के सारे बच्चे शर्मा अंकल के घर की ओर दौड़ पड़े। बच्चों की मम्मी एक-दूसरे के मुंह ताक रही थीं।

आइसक्रीम की कहानी : प्रकाश मनु

आइसक्रीम का नाम सुनते ही बच्‍चों ही नहीं, बड़ों के मुँह में भी पानी आ जाता है। आइसक्रीम की दि‍लचस्‍प कहानी बयां कर रहे हैं कथाकार प्रकाश मनु-

अगर आज बच्चों से उनकी सबसे प्रिय खाने की चीज के बारे में पूछा जाये, तो ज्यादातर बच्चों का जवाब होगा—आइसक्रीम! खाने-पीने की कोई शानदार पार्टी हो, या फिर कोई मेला या उत्सव, बच्चों की उत्सुक निगाहें सबसे पहले आइसक्रीम को ढूँढ़ती हैं। खाने-पीने को कुछ और मिले या न मिले, मगर आइसक्रीम जरूर चाहिए। और जी भरकर आइसक्रीम खाने के बाद भी उनकी तबीयत होती है—काश, थोड़ी-सी फलाँ आइसक्रीम या सॉफ्टी या चॉकबार और मिल जाती, तो मजा आ जाता! यों भी किसी को वैनिला और स्ट्राबरी पसंद है, तो किसी को कसारा, चॉकबार और केसर पिस्ता! और ऐसे बच्चे भी कम नहीं जो वैनिला या स्ट्राबरी खाते हुए मन-ही-मन खयालों में उड़ रहे होते हैं कि काश, इसके बाद कसारा या केसर पिस्ता और मिल जाती तो क्या कहने!

यों आइसक्रीम अब कोई दुर्लभ चीज नहीं रही। शायद ही कोई छोटा या बड़ा शहर या कसबा हो, जहाँ रोशनी में जगमगाता आइसक्रीम पार्लर या फिर लुभावने पोस्टरों से सजे, किस्म-किस्म की स्वादिष्ट आइसक्रीम बेचने वाले ठेले न हों! हालाँकि बच्चे अपनी इस पसंदीदा चीज को मजे से खाते हुए शायद ही कभी सोचते हों, कि यह आइसक्रीम जो आज इतनी असानी से मिल जाती है, कभी इतनी दुर्लभ थी कि बड़े-बड़े राजाओं के दरबारों या फिर धनी लोगों की पार्टियों में ही नजर आती थी। ज्यादातर लोग इस ‘ठंडी स्वादिष्ट मिठाई’ के लिये तरसते थे! और सच तो यह है कि आइसक्रीम की कहानी कोई सौ-दो सौ साल पहले की नहीं, बल्कि तकरीबन ढाई हजार साल पुरानी है और इतिहास में अनेक महान हस्तियों के साथ, अनेक प्रसंगों में उसका जिक्र मिलता है।

शुरू में बगैर दूध के आइसक्रीम बनाने का चलन था। यह आइसक्रीम कभी ठोस रूप में होती तो कभी आधी जमी हुई। इसमें फलों का रस, चीनी और पानी का इस्तेमाल होता था। सदियों पहले चीन, तुर्की, भारत और एशिया के कई देशों में आइसक्रीम का प्रचलन था। उसके बाद यूरोपीय देशों में भी आइसक्रीम का प्रचलन हुआ और निरन्‍तर बढ़ता गया।

आइसक्रीम की कहानी का एक छोर ढाई हजार बरस पहले, विश्‍वविजयी सिकंदर से जुड़ता है। सिकंदर ने जब मिस्र को जीता, तो उसने जीत का जश्‍न मनाने के लिये ढेर सारी आइसक्रीम तैयार करने का आदेश दिया। हालाँकि यह आज की आइसक्रीम से अलग थी। सिकंदर के आदेश पर पंद्रह बड़े-बड़े गड्ढे खोदे गये। फिर उन्हें पहाड़ के ऊँचे शिखरों से लाई गई मुलायम, दूधिया बर्फ से भरने के लिये कहा गया, ताकि महान सिकंदर इस ठंडी मिठाई का भरपूर आनंद ले सके।

यों आइसक्रीम की कहानी आज से कोई ढाई हजार बरस पहले से शुरू होती है। कहा जा सकता है कि किसी न किसी रूप में तब आइसक्रीम या ऐसी ही कोई चीज एक स्वादिष्ट मिठाई के रूप में मौजूद थी। इसके बाद तो आइसक्रीम के होने के काफी पक्के प्रमाण मिलने लगते हैं। ईसा की पहली शताब्दी में रोम के शासक नीरो ने अपने सेवकों को आदेश दिया था कि पहाड़ों से बर्फ लाई जाये और उसे फलों के रस और शहद में मिलाकर यह ठंडी मिठाई तैयार की जाए!

इसके बाद सातवीं शताब्दी में चीन के राजा तांग ने बर्फ और दूध को मिलाकर आइसक्रीम बनाने का तरीका खोज निकाला। सारी दुनिया में स्वादिष्ट आइसक्रीम बनाने की कला को लेकर चीन का दूर-दूर तक नाम हो गया। तब चीन से आइसक्रीम यूरोप में पहुँची और तरह-तरह के रूपों में इटली और फ्रांस के राज दरबारों में पेश की जाने लगी।

कहा जाता है कि प्रसिद्ध विश्व-यात्री मार्को पोलो जब लंबे समय तक चीन में रहने के बाद इटली लौटा, तो अपने साथ-साथ आइसक्रीम तैयार करने की कला लेकर गया था। और इस तरह आइसक्रीम देखते ही देखते दुनिया के दूसरे देशों में जा पहुँची। कैथेरीन मेडिसी फ्रांस की रानी बनीं, तो उनके साथ आइसक्रीम बनाने की कला फ्रांस भी जा पहुँची। और फिर देखते ही देखते फ्रांस के राज दरबार और रईसों की पार्टियों में भी आइसक्रीम नई सज-धज के साथ सामने आने लगी।

आधुनिक काल में आइसक्रीम को लोकप्रियता दिलाने में अमेरिका का बड़ा हाथ है। अमेरिका में न सिर्फ आइसक्रीम बनाने की नई-नई विधियाँ खोजी गईं, बल्कि दावतों और पार्टियों में आइसक्रीम परोसने और मेलों में आइसक्रीम बेचने के नये-नये अंदाज सामने आने लगे। सन् 1750 में मैटीलैंड के गवर्नर ब्लैडन ने अपने मेहमानों को आइसक्रीम की दावत दी थी। अठारहवीं शताब्दी के आखिर में फिलिप लेजी नाम के लंदन के एक मिठाई बेचने वाले व्यापारी ने ‘न्यूयार्क’ अखबार में घोषणा की कि वह आइसक्रीम समेत किस्म-किस्म की मिठाइयाँ बेचने जा रहा है। उसकी इस घोषणा ने सभी का ध्यान आकर्षित किया। अमेरिका में पहला आइसक्रीम पार्लर भी अठारहवीं शताब्दी में ही खुला और उसके बाद तो सचमुच आइसक्रीम की कहानी को पंख लग गये। सब ओर उसकी धूम मच गई। कहा जाता है कि अमेरिका की बड़ी हस्तियाँ, जिनमें जॉर्ज वाशिंगटन भी थे, आइसक्रीम के खासे शौकीन थे।

आइसक्रीम को यह नाम कैसे मिला? इसका श्रेय भी अमेरिका को ही जाता है। पहले इसे ‘आइस्ड क्रीम’ यानी ‘ठंडी की गई क्रीम’ कहा जाता था। पर बाद में धीरे-धीरे संक्षिप्त होकर इसका कहीं अधिक सुंदर और आकर्षक नाम ‘आइसक्रीम’ हो गया, जो अब पूरी दुनिया में फैल चुका है।

अब तक आइसक्रीम बनाने की नई से नई विधियाँ खोज ली गई थीं। जब पैडल से चलने वाला लकड़ी का फ्रीजर बना, तो इसके निर्माण में एकाएक तेजी आ गई। सन् 1832 में फिलेडेल्फिया के एक मिष्ठान्न निर्माता ऑगस्टस ने आइसक्रीम बनाने का एक नया तरीका खोजा। किन-किन चीजों को, किस अनुपात में मिलाने से स्वादिष्ट आइसक्रीम तैयार होती है, उसने यह खोज की। यह आइसक्रीम बहुत कुछ आज मिलने वाली आइसक्रीम जैसी थी।

नैन्सी जॉनसन नाम की इंग्लैंड की एक महिला ने सन् 1846 में हाथ से चलने वाले फ्रीजर की खोज की। इससे आइसक्रीम बनाने का सही, वैज्ञानिक तरीका खोज लिया गया, जो कमोबेश आज भी इस्तेमाल होता है। नैन्सी जॉनसन ने तो अपने आविष्कार को पेटेंट नहीं करवाया, पर आगे चलकर विलियम जी. चंच ने सन् 1848 में जॉनसन द्वारा निर्मित आइसक्रीम फ्रीजर को उसी के नाम के साथ पेटेंट करवाया।

इसके बाद आइसक्रीम के निर्माण में एक बड़ी छलाँग सन् 1851 में दिखाई दी। कारण यह था कि इसी वर्ष बाल्टीमोर के जेकब फसेल ने बड़ी मात्रा में आइसक्रीम तैयार करने का व्यापारिक संयंत्र कायम किया। जाहिर है, इसके साथ ही आइसक्रीम के निर्माण और प्रचार में आश्‍चर्यजनक तेजी आई। दूसरे व्यापारियों में भी इसी तरह के संयंत्र लगाकर आइसक्रीम बनाने की होड़ नजर आने लगी। इसे आइसक्रीम की विश्‍व-यात्रा का एक बड़ा और महत्त्वपूर्ण पड़ाव कह सकते हैं।

अब सभी का ध्यान आइसक्रीम को खूबसरत ढंग से सर्व करने की ओर गया और उसे परोसने के लिये आकर्षक, डिजायनदार कप तैयार करने की कोशिशे हुईं। आखिर उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में अल्फ्रेड एल. क्रेल ने खूबसूरत ढंग से आइसक्रीम ‘सर्व’ करने के लिए सुंदर डिजाइन वाले कप-प्लेट ईजाद किये, जिससे आइसक्रीम का पूरा आनंद लिया जाये। जाहिर है, अब तक आइसक्रीम का खूब प्रसार होने के साथ-साथ वह सभ्य समाज की पहचान भी बन चुकी थी।

इसके बाद फ्रिज या रेफ्रिजरेटरों की ईजाद और उनके घर-घर पहुँचने पर तो आइसक्रीम को जमाना एक साथ सस्ता और आसान भी हो गया। इस दिशा में एक बड़ी कामयाबी तब मिली, जब आइसक्रीम जमाने का ऐसा फ्रीजर बना लिया गया, जो बिना रुके, लगातार काम करता था और व्यावसायिक रूप से सस्ता भी था। फिर तो आइसक्रीम की सब ओर दुंदुभी बजने लगी।

इसके बाद आइसक्रीम के नये-नये लुभावने रूप खोजे गये। इनमें सबसे लोकप्रिय हुआ आइसक्रीम कोन, क्योंकि यह बेहद सुविधाजनक था और मेले तथा उत्सवों में चलते-फिरते उसका आनंद लिया जा सकता था। सन 1904 में लुइस विश्‍व मेले में सबसे पहले ऐसे कोन देखे गये, जिनमें आइसक्रीम भरकर उन्हें चलते-फिरते खाया जा सकता था। कई व्यापारी अच्छे से अच्छे, सुंदर और कलात्मक कोन बनाकर उनमें आइसक्रीम पेश करने लगे, ताकि उनकी बिक्री बढ़े। इनमें लेबनान का एक व्यापारी अबे ड्रमर भी था। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि आइसक्रीम कोन बनाने की मशीन तैयार करने वाला पहला शख्स अबे ड्रमर ही था। यों आइसक्रीम कोन बनाने का इतिहास खासा लम्‍बा है और किसी एक को उसका श्रेय देना मुश्किल है। कई लोग इस दिशा में एक साथ सोच रहे थे, ताकि आइसक्रीम की लोकप्रियता से ज्यादा से ज्यादा लाभ हासिल किया जा सके। धातु के सुन्‍दर और आकर्षक कोन बनाने के साथ-साथ, कागज के कोन भी बनाए गये।

सन् 1904 में सेंट लुइस स्थान के चार्ल्‍स ई. मेचेंस के मन में ‘पेस्ट्री कोन’ बनाने का विचार आया और उसी ने पहला आइसक्रीम कोन बनाया। कहा जाता है कि इस साल सेंट लुइस विश्‍व मेले में कम से कम पचास जगहों पर ऐसे आइसक्रीम कोन मिल रहे थे। इससे पता चलता है कि एक ही समय में कई लोगों ने एक साथ आइसक्रीम का यह रूप खोजा था, जो आज भी खासा लोकप्रिय है। खासकर मेलों और उत्सवों का तो यह खास आकर्षण ही है और हलकी धूप वाले गुनगुने मौसम में, इसे टहलते हुए खाने का आनंद ही कुछ और है! बहरहाल, इतना तय है कि बीसवीं शताब्दी के प्रारम्‍भ में सेंट लुइस के विश्‍व मेले में कोन प्रसिद्ध हुए और एकाएक दुनिया भर में छा गये थे।

इसके बाद आइसक्रीम का युग आया। इसके आविष्कार की कहानी भी खासी रोचक है। इसे बनाने का विचार आयोवा के एक दुकानदार के मन में आया। यह सन् 1920 के आसपास की बात है। हुआ यह कि एक बच्चा उसके पास आइसक्रीम खरीदने आया। उसे यह तय करने में मुश्किल आ रही थी कि वह आइसक्रीम सेंडविच ले या फिर चॉकलेट बार? तब नेल्सन के मन में एक नया विचार आया। उसने एक आइसक्रीम बार खोज निकाली, जिसके ऊपर चाकलेट की हलकी सी परत थी। सन् 1934 में चाकलेट से मढ़ी हुई यह नये ढंग की, अनोखी आइसक्रीम बार खोज ली गई, जो आज भी ज्यादातर बच्चों की पहली पसंद है। और अब तो लोगों की जरूरतों के हिसाब से ऐसी आइसक्रीम भी खोज ली गई हैं, जिनमें चीनी नहीं है तथा जो कतई मोटापा नहीं बढ़ाती।

आइसक्रीम की लोकप्रियता बढऩे के साथ-साथ, तरह-तरह की आइसक्रीम खोजने की जो होड़ लग गई। सन् 1960 में रुबेन मैट्स ने एक अलग तरह की आइसक्रीम खोजकर उसे अनोखा नाम ‘हैगन डाज’ दिया। इसी समय लियो स्टीफेनस ने ‘डब बार’ खोजी। इससे भी मजेदार थी ‘गुड ह्यूअर आइसक्रीम बार’ की खोज। इसे बेचने का भी एक नायाब तरीका खोज निकाला गया। सफेद ट्रकों का एक खूबसूरत काफिला उन्हें बेचने के लिये निकला। इन ट्रकों पर मीठी ‘रुन-झुन, रुन-झुन’ करने वाली घंटियाँ लगी थीं और एक ही तरह की पोशाक वाले ड्राइवर बैठे थे, जो खरीदने वालों को अपने इस अनोखे रूप से चकित और आकर्षित करते थे। जाहिर है, इस आइसक्रीम का जैसा दिलचस्प नाम था, उसे बेचने का तरीका भी वैसा ही मनोरंजक था, जिसने सभी को लुभाया। कुछ इतिहासकार इसी को पहली आइसक्रीम बार मानते हैं।

बेशक आइसक्रीम आज अपनी लोकप्रियता के शिखर पर है और उसने प्रसिद्धि की दौड़ में दुनिया की सारी स्वादिष्ट मिठाइयों को पीछे छोड़ दिया है। बड़े हों या बच्चे, सभी आइसक्रीम के दीवाने हैं—शायद इसलिए कि यह ऐसी लाजवाब चीज है, जिसे कितना ही खाओ, मन नहीं भरता! इसलिए आइसक्रीम की कहानी जो पिछले ढाई हजार सालों से चली आती है, उम्मीद है, अभी हजारों सालों तक मनुष्य के साथ-साथ यात्रा करेगी। उसके नये-नये लुभावने रूप सामने आएँगे तथा उसका स्वाद और आनंद कभी कम न होगा!

(‘अनोखी कहानि‍याँ ज्ञान-वि‍ज्ञान की’ से साभार)
सभी चि‍त्र : कीर्ति मि‍त्‍तल, कक्षा 11

छोटी सी बात : जाकिर अली रजनीश

 

वैज्ञानि‍क तथ्‍यों पर आधारि‍त युवा कथाकार जाकि‍र अली रजनीश की बाल कहानी-

आसमान में बादल छाए होने के कारण उस समय काफी अंधेरा था। हालाँकि घड़ी में अभी साढ़े चार ही बजे थे, लेकिन इसके बावजूद लग रहा था जैसे शाम के सात बज रहे हों। लेकिन सलिल पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। वह अपने हाथ में गुलेल लिये सावधानीपूर्वक आगे की ओर बढ़ रहा था। उसे तलाश थी किसी मासूम जीव की, जिसे वह अपना निशाना बना सके। नन्हे जीवों पर अपनी गुलेल का निशाना लगाकर सलिल को बड़ा मज़ा आता। जब वह जीव गुलेल की चोट से बिलबिला उठता, तो सलिल की प्रसन्नता की कोई सीमा न रहती। वह खुशी के कारण नाच उठता।

अचानक सलिल को लगा कि उसके पीछे कोई चल रहा है। उसने धीरे से मुड़ कर देखा। देखते ही उसके पैरों के नीचे की ज़मीन निकल गयी और वह एकदम से चिल्ला पड़ा। सलिल से लगभग बीस कदम पीछे दो चिम्पैंजी चले आ रहे थे। सलिल का शरीर भय से काँप उठा। उसने चाहा कि वह वहाँ से भागे। लेकिन पैरों ने उसका साथ छोड़ दिया। देखते ही देखते दोनों चिम्पैंजी उसके पास आ गये। उन्होंने सलिल को पकड़ा और वापस उसी रास्ते पर चल पड़े, जिधर से वे आये थे।

कुछ ही पलों में सलिल ने अपने आप को एक बड़े से चबूतरे के सामने पाया। चबूतरे पर जंगल का राजा सिंह विराजमान था और उसके सामने जंगल के तमाम जानवर लाइन से बैठे हुये थे। सलिल को जमीन पर पटकते हुए एक चिम्पैंजी ने राजा को सम्बोधित कर कहा, ‘‘स्वामी, यही है वह दुष्ट बालक, जो जीवों को अपनी गुलेल से सताता है।’’
शेर ने सलिल को घूर कर देखा, ‘‘क्यों मानव पुत्र, तुम ऐसा क्यों करते हो?’’

सलिल ने बोलना चाहा, लेकिन उसकी ज़बान से कोई शब्द न फूटा। वह मन ही मन बड़बड़ाने लगा, ‘‘क्योंकि मैं जानवरों से श्रेष्ठ हूँ।’’

‘‘देखा आपने स्वामी ?’’ इस बार बोलने वाला चीता था, ‘‘कितना घमंड है इसे अपने मनुष्य होने का। आप कहें तो मैं अभी इसका सारा घमंड निकाल दूँ ?’’ कहते हुए चीता अपने दाहिने पंजे से ज़मीन खरोंचने लगा।

सलिल हैरान कि भला इन लोगों को मेरे मन की बात कैसे पता चल गयी? लेकिन चीते की बात सुनकर वह भी कहाँ चुप रहने वाला था। वह पूरी ताकत लगाकर बोल ही पड़ा, ‘‘हाँ, मनुष्य तुम सब जीवों से श्रेष्ठ है, महान है। और ये प्रक्रति का नियम है कि बड़े लोग हमेशा छोटों को अपनी मर्जी से चलाते हैं।’’

तभी आस्ट्रेलियन पक्षी नायजी स्क्रब, जिसकी शक्ल कोयल से मिलती–जुलती है, उड़ता हुआ वहाँ आया और सलिल को डपट कर बोला, ‘‘बहुत नाज़ है तुम्हें अपनी आवाज़ पर, क्योंकि अन्य जीव तुम्हारी तरह बोल नहीं सकते। पर इतना जान लो कि सारे संसार में मेरी आवाज़ का कोई मुकाबला नहीं। दुनिया की किसी भी आवाज़ की नकल कर सकती हूँ मैं। …क्या तुम ऐसा कर सकते हो?’’ सलिल की गर्दन शर्म से झुक गयी और नायजी स्क्रब अपने स्थान पर जा बैठी।

सलिल के बगल में स्थित पेड़ की डाल से अपने जाल के सहारे उतरकर एक मकड़ी सलिल के सामने आ गयी और फिर उस पर से सलिल की शर्ट पर छलांग लगाती हुई बोली, ‘‘देखने में छोटी ज़रूर हूँ, पर अपनी लम्बाई से 120 गुना लम्बी छलांग लगा सकती हूँ। क्या तुम मेरा मुकाबला कर सकते हो? कभी नहीं। तुम्हारे अन्‍दर यह क्षमता ही नहीं। पर घमंड ज़रूर है 120 गुना क्यों?” कहते हुये उसने दूसरी ओर छलांग मार दी।

तभी गुटरगूँ करता हुआ एक कबूतर सलिल के कन्‍धे पर आ बैठा और अपनी गर्दन को हिलाता हुआ बोला, ‘‘मेरी याददाश्त से तुम लोहा नहीं ले सकते। दुनिया के किसी भी कोने में मुझे ले जाकर छोड़ दो, मैं वापस अपने स्थान पर जाता हूँ।’’

सलिल सोच में पड़ गया और सर नीचा करके ज़मीन पर अपना पैर रगड़ने लगा।

‘‘मैं हूँ गरनार्ड मछली। जल, थल, नभ तीनों जगह पर मेरा राज है।’’ ये स्वर थे पेड़ पर बैठी एक मछली के, ‘‘पानी में तैरती हूँ, आसमान में उड़ती हूँ और ज़मीन पर चलती हूँ। अच्छा, मुझसे मुकाबला करोगे?’’

ठीक उसी क्षण सलिल के कपड़ों से निकल कर एक खटमल सामने आ गया और धीमे स्वर में बोला, ‘‘सहनशक्ति में मनुष्य मुझसे बहुत पीछे है। यदि एक साल भी मुझे भोजन मिले, तो हवा पीकर जीवित रह सकता हूँ। तुम्हारी तरह नहीं कि एक वक्‍त का खाना मिले, तो आसमान सिर पर उठा लो।’’

खटमल के चुप होते ही एल्सेशियन नस्ल का कुत्ता सामने आ पहुँचा। वह भौंकते हुये बोला, स्वामीभक्ति में मनुष्य मुझसे बहुत पीछे है। पर इतना और जान लो कि मेरी घ्राण शक्ति (सूँघने की क्षमता) भी तुमसे दस लाख गुना बेहतर है।’’

पत्ता खटकने की आवाज़ सुनकर सलिल चौंका और उसने पलटकर पीछे देखा। वहाँ पर बार्न आउल प्रजाति का एक उल्लू बैठा हुआ था। वह घूर कर बोला, ‘‘इस तरह मत देखो घमण्डी लड़के, मेरी नज़र तुमसे सौ गुना तेज़ होती है समझे?’’

सलिल अब तक जिन्हें हेय और तुच्छ समझ रहा था, आज उन्हीं के आगे अपमानित हो रहा था। अन्य जीवों की खूबियों के आगे वह स्वयं को तुच्छ अनुभव करने लगा था। इससे पहले कि वह कुछ कहता या करता, दौड़ता हुआ एक गिरगिट वहाँ आ पहुँचा और अपनी गर्दन उठाते हुये बोला, ‘‘रंग बदलने की मेरी विशेषता तो तुमने पढी़ होगी, पर इतना और जान लो कि मैं अपनी आँखों से एक ही समय में अलग-अलग दिशाओं में एक साथ देख सकता हूँ। मगर तुम ऐसा नहीं कर सकते। कभी नहीं कर सकते।’’

दोनों चिम्पैंजियों के बीच खड़ा सलिल चुपचाप सब कुछ सुनता रहा। भला वह जवाब देता भी  तो क्या? उसमें कोई ऐसी खूबी थी भी तो नहीं, जि‍से वह बयान करता। वह तो सिर्फ दूसरों को सताने में ही अभी तक आगे रहा था।

तभी चीते की आवाज सुनकर सलिल चौंका। वह कह रहा था, ‘‘खबरदार, भागने की कोशिश मत करना। क्योंकि 112 किलोमीटर प्रति घण्टे की रफ्तार है मेरी। और तुम मुझ से पार पाने के बारे में सपने में भी न सोच सकोगे। क्योंकि तुम्हारी यह औकात ही नहीं है।’’

‘‘क्यों नहीं है औकात?’’ चीते की बात सुनकर सलिल अपना आपा खो बैठा और जोर से बोला, ‘‘मैं तुम सबसे श्रेष्ठ हूँ, क्योंकि मेरे पास अक्ल है । और वह तुममें से किसी के भी पास नहीं है।’’

सलिल की बात सुनकर सामने के पेड़ की डाल से लटक रहा चमगादड़  बड़बड़ाया, ‘‘बड़ा घमण्ड है तुझे अपनी अक्ल पर नकलची मनुष्य। तूने हमेशा हम जीवों की विशेषताओं की नकल करने की कोशिश की है। जब तुम्हें मालूम हुआ कि मैं एक विशेष की प्रकार की अल्ट्रा साउंड तरंगें छोड़ता हूँ, जो सामने पड़ने वाली किसी भी चीज़ से टकरा कर वापस मेरे पास लौट आती हैं, जिससे मुझे दिशा का ज्ञान होता है, तो मेरी इस विशेषता का चुराकर तुमने रडार बना लिया और अपने आप को बड़ा बु‍द्धिमान कहने लगे?’’

‘‘बहुत तेज़ है अक्ल तुम्हारी?’’ इस बार मकड़ी गुर्रायी, ‘‘ऐसी बात है तो फिर मेरे जाल जितना महीन व मज़बूत तार बनाकर दिखाओ। नहीं बना सकते तुम इतना महीन और मज़बूत तार। इस्पात के द्वारा बनाया गया इतना ही महीन तार मेरे जाल से कहीं कमज़ोर होगा।… और तुम्हारे सामान्य ज्ञान में वृद्धि के लिये एक बात और बता दूँ कि‍ यदि मेरा एक पौंड वजन का जाल लिया जाये, तो उसे पूरी पृथ्वी के चारों ओर सात बार पलेटा जा सकता है।’’

इतने में एक भंवरा भी वहाँ आ पहुँचा और भनभनाते हुये बोला, ‘‘वाह री तुम्हारी अक्ल? जो वायु गतिकी के नियम तुमने बनाये हैं, उनके अनुसार मेरा शरीर उड़ान भरने के लिये फिट नहीं है। लेकिन इसके बावजूद मैं बड़ी शान से उड़ता फिरता हूँ। अब भला सोचो कि कितनी महान है तुम्हारी अक्ल, जो मुझ नन्हे से जीव के उड़ने की परिभाषा भी कर सकी।’’

हँसता हुआ भंवरा पुन: अपनी डाल पर जा बैठा। एक पल के लिये वहाँ सन्नाटा छा गया। सन्नाटे को तोड़ते हुए शेर ने बात आगे बढ़ाई, ‘‘अब तो तुम्हें पता हो गया होगा नादान मनुष्य कि तुम इन जीवों से कितने महान हो? अब ज़रा तुम अपनी घमण्ड की चिमनी से उतरने की कोशिश करो और हमेशा इस बात का ध्यान रखा कि सभी जीवों में कुछ न कुछ मौलिक विशेषतायें पाई जाती हैं। सभी जीव आपस में बराबर होते हैं। न कोई किसी से छोटा होता है कोई किसी से बड़ा। समझे?’’

‘‘लेकिन इसके बाद भी यदि तुम्हारा स्वभाव नहीं बदला और तुम जीव-जन्तुओं को सताते रहे, तो तुम्हें इसकी कठोर से कठोर सज़ा मिलेगी।’’ कहते हुये हाथी ने सलिल को अपनी सूंड़ में लपेटा और ज़ोर से ऊपर की ओर उछाल दिया।
सलिल ने डरकर अपनी आँखें बन्‍द कर लीं। लेकिन जब उसने दोबारा अपनी आँखें खोलीं, तो न तो वह जंगल था और न ही वे जानवर। वह अपने बिस्तर पर लेटा हुआ…

‘‘इसका मतलब है कि मैं सपना…’’ सलिल मन ही मन बड़बड़ाया। उसने अपनी पलकों को बन्‍द कर लिया और करवट बदल ली। हाथी की कही हुई बातें अब भी उसके कानों में गूँज रही थीं।

चि‍त्र : अंजलि‍ कुमारी, कक्षा-7