Category: परिक्रमा

काशी का अस्सी पर केंद्रित बनास के विशेषांक का लोकार्पण

उदयपुर : साहित्य संस्कृति के संचयन बनास के विशेषांक गल्पेतर गल्प का ठाठ का लोकार्पण फतहसागर झील के किनारे स्थित बोगेनवेलिया आर्ट गेलेरी परिसर में 18 जून को किया गया।
काशीनाथ सिंह के उपन्यास काशी का अस्सी पर केंद्रित इस अंक का लोकार्पण सुविख्यात चित्रकार पीएन चोयल, चर्चित चित्रकार अब्बास बाटलीवाला, वरिष्ठ कवि नंद चतुर्वेदी और वरिष्ठ समालोचक नवल किशोर ने किया। पीएन चोयल ने कहा कि जब बाहर के दृश्य भीतर बदल जाते हों और सीधी भाषा हमारे अंदर हलचल पैदा करने में असफल हो रही हो तब व्यंग्य और प्रतीकों से बनी कोई कृति आवश्यक हो जाती है। बनास द्वारा पूरा अंक एक उपन्यास पर केंद्रित करना बताता है कि काशी का अस्सी हमारे समय और समाज को देखने वाली बड़ी कृति है।
नंद चतुर्वेदी ने हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता के समक्ष आ रही चुनौतियों की चर्चा करते हुए कहा की इसे साहित्य की भूमिका को पहचानने और ठीक से चिह्नित करना होगा। साहित्यिक पत्रकारिता को अब अंतरानुशासनिक भी होना पड़ेगा क्योंकि इसके बिना अपने समय और समाज को समझना मुश्किल है।
सुखाडिय़ा विश्वविद्यालय के मानविकी संकाय के अध्यक्ष प्रो. शरद श्रीवास्तव ने काशी का अस्सी से एक महत्वपूर्ण अंश नरभक्षी राजा की कथा का पाठ किया। इन्द्रप्रस्थ विश्वविद्यालय,दिल्ली  के प्रो. आशुतोष मोहन ने कहा कि हमारे जीवन से हंसी के हिज्जे बदल दिए गए हैं ,काशी का अस्सी इसी हंसी के गायब होने की दास्तान की महागाथा है। सिरोही महाविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. माधव हाड़ा ने रेणु के बाद हिंदी में पहली बार बहुत निकट रहकर निस्संग भाव से भारतीय समाज को देखने के लिए काशी का अस्सी को असाधारण रचना बताया। वरिष्ठ समालोचक प्रो. नवलकिशोर ने लघु पत्रिका की अवधारणा का उल्लेख कर लघु पत्रिकाओं के लिए नएपन की जरूरत पर बल दिया। उन्होंने कहा कि मीडिया की नई तकनीकों के सामने लघु पत्रिकाओं को नया पाठक वर्ग बनाने की चुनौती है।
प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी रामचंद्र नंदवाना, चित्रकार शैल चोयल, हेमंत द्विवेदी, शाहिद परवेज़, साहित्यकार मूलचंद्र पाठक, एस.एन. जोशी, लक्ष्मण व्यास, हिमांशु पंड्या, सुखाडिय़ा विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग के अध्यक्ष डॉ. रईस अहमद, मीरा गल्र्स कालेज की हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. मंजू चतुर्वेदी, आकाशवाणी के सहायक केंद्र निदेशक डॉ. इंद्रप्रकाश श्रीमाली, महिला अध्ययन केंद्र की प्रभारी डॉ. प्रज्ञा जोशी, डॉ. चंद्रदेव ओला, डॉ. लालाराम जाट, डॉ. नीलेश भट्ट आदि उपस्थित थे। स्वागत कर रही बोगेनवेलिया आर्ट गेलेरी की निदेशक तनुजा कावडिय़ा ने कहा की सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए साझा काम करने होंगे। 
(प्रस्तुति : पल्लव)

जीवन की बेहतरी के लिए कविता जरूरी : मंडलोई

गुडग़ांव : सुरुचि साहित्य कला संस्थान की ओर से सीसीए स्कूल सभागार में 13 जून को आयोजित समारोह में दो कविता संग्रह और एक गजलों की सीडी का लोकार्पण किया गया। समारोह की अध्यक्षता चर्चित कवि लीलाधर मंडलोई ने की। उन्होंने जीवन को बेहतर बनाने के लिए कविता की जरूरत पर बल दिया।
इस अवसर पर जगदीश प्रसाद की कविताओं का संग्रह अतीत के प्रेत, मंजू भारती का बाल कविताओं का संग्रह इंद्रधनुष और राजगोपाल सिंह की गजलों की सीडी चंद पल तेरी बांहों में लोकार्पण किया गया। मदन कश्यप, लवलीन, डा. विवेक मिश्र आदि का काव्यपाठ भी हुआ।

मलयालम के वरिष्ठ लेखक कोविलन का निधन

दिल्ली : मलयालम के वरिष्ठ लेखक कोविलन का बुधवार सुबह त्रिचुर के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया। वह 87 वर्ष के थे। वह सांस संबंधी बीमारी से पीडि़त थे। इलाज के लिए उन्हें एक सप्ताह पहले अस्पताल में भर्ती कराया गया था।
9 जुलाई, 1923 को जन्में कोविलन का असली नाम वीवी अय्यप्पन है।  वह प्रयोगधर्मी रचनाकार माने जाते हैं। उनका मलायलम कथा साहित्य में विशिष्ठ स्थान हैं। साहित्यिक योगदान के लिए उन्हें कई बार पुरस्कारों और सम्मानों से विभूषित किया गया। इनमें साहित्य अकादेमी पुरस्कार, केरल साहित्य अकादेमी पुरस्कार (दो बार), बशीर पुरस्कार, केरल साहित्य परिषद पुरस्कार आदि प्रमुख हैं। उन्हें केरल साहित्य फेलोशिप से भी सम्मानित किया गया था।

नीरज का काव्यपाठ 28 को

नई दिल्ली : पंडित गोपालप्रसाद व्यास की पांचवीं पुण्यतिथि के अवसर पर 28 मई को हिंदी भवन सभागार में काव्य-यात्रा : कवि के मुख से कार्यक्रम का आयोजन किया जाएगा। इसमें लोकप्रिय कवि गोपालदास ‘नीरज’ का एकल काव्यपाठ होगा। मुख्य अतिथि पृथ्वीराज साहनी, मेयर दिल्ली होंगे।

हिंदी अकादमी समारोह में 28 साहित्यकार सम्मानित

दिल्ली : साहित्यकारों के विरोध के बावजूद हिंदी अकादमी, दिल्ली ने समारोह आयोजित कर 28 साहित्यकारों एवं कार्टूनिस्ट का सम्मानित किया। पुरस्कार लेने से मना करने वाले लेखकों के नामों की घोषणा भी नहीं की गई। इस अवसर पर अकादमी की त्रैमासिकी इंद्रप्रस्थ भारती का लोकार्पण भी किया गया।
दिल्ली में मंगलवार को हिंदी अकादमी की अध्यक्ष और दिल्ली मुख्यमंत्री शीला दीक्षित, उडिय़ा कवि डॉ. जगन्नाथ प्रसाद दास, अकादमी के उपाध्यक्ष अशोक चक्रधर और दिल्ली की संस्कृति मंत्री किरण वालिया ने पुरस्कृत लोगों को सम्मानित किया। अकादमी की अध्यक्ष शीला दीक्षित ने कहा कि बीते वर्षों के पुरस्कार अकादमी के कारण देर से दिए जा रहे हैं। उन्होंने घोषणा की कि पुराने पुरस्कृत लोगों को कम राशि देना उचित नहीं लगता इसलिए 2007-08 और 2008-09 के विभिन्न विधाओं में पुरस्कृत लोगों को भी सम्मान राशि 20 हजार रुपये के स्थान पर 50 हजार रुपये दी जाएगी।
सम्मान समारोह के दौरान कुल 28 साहित्यकारों को वर्ष 2007-08, 2008-09 और 2009-10 के लिए पुरस्कृत किया गया। पहले यह पुरस्कार 23 मार्च को दिए जाने थे, लेकिन विवादों के कारण तिथि बढ़ा दी गई थी। समारोह में 2009-10 के लिए कन्हैयालाल नंदन को काव्य सम्मान, असगर वजाहत को नाटक सम्मान, सुधीश पचौरी को गद्य विधा सम्मान, ज्ञान चतुर्वेदी को हास्य व्यंग्य सम्मान, बालेंदु दाधीच को ज्ञान प्रौद्योगिकी सम्मान, कार्टूनिस्ट इरफान को काका हाथरसी सम्मान और मुजीब रिज़वी को विशिष्ट सम्मान से सम्मानित किया गया। वर्ष 2008-09 के लिए द्रोणवीर कोहली, प्रो. इंद्रनाथ चौधरी, सुरेश सलिल, रामेश्वर प्रेम, बनवारी, अब्दुल बिस्मिल्लाह और गगन गिल को सम्मानित किया गया। प्रो. कृष्ण कुमार और लीलाधर मंडलोई के नाम की घोषणा की गई, लेकिन दोनों साहित्यकार किन्ही कारणवश कार्यक्रम में शामिल नहीं हुए।
इसके साथ ही 14 साहित्यकारों को 2007-08 के कृति सम्मान से सम्मानित किया गया। हिंदी अकादमी की कार्यकारिणी द्वारा शलाका सम्मान के लिए वरिष्ठ साहित्यकार कृष्ण बलदेव वैद के चयन के बाद उनके साहित्य को कथित रूप से अश्लील बताए जाने पर उनको सम्मान नहीं देने के बाद पुरस्कार लेने से मना करने वाले केदारनाथ सिंह (शलाका सम्मान), प्रियदर्शन, विमल कुमार, रेखा जैन, अशोक गुप्ता, पंकज सिंह, पुरुषोत्तम अग्रवाल के नाम की घोषणा भी नहीं की गई।

अकादमी पुरस्कार समारोह में मीडिया को इजाजत नहीं

नई दिल्ली : ऐसा पहली बार हो रहा है कि हिंदी अकादमी के पुरस्कार समारोह में मीडिया को आने की इजाजत नहीं है। समारोह का आयोजन आज है। हिंदी अकादमी के सचिव प्रो.रवींद्रनाथ श्रीवास्तव के अनुसार समारोह की कवरेज के लिए मीडिया आमंत्रित नहीं है। समारोह के अगले दिन प्रेस रिलीज जारी कर मीडिया को जानकारी दी जाएगी। उनका कहना है कि यह अकादमी का फैसला है।
वरिष्ठ साहित्यकार कृष्ण वलदेव वेद को शलाका सम्मान नहीं देने को लेकर विवाद चल रहा है। शलाका सम्मान के लिए चयनित केदारनाथ सिंह सहित सात वरिष्ठ साहित्यकारों ने पुरस्कार लेने से मना कर दिया। पुरस्कार समारोह में कोई बखेड़ा न खड़ा हो इसलिए इस बार आयोजन दिल्ली सचिवालय में हो रहा है और इससे मीडिया को दूर रखा गया है। समारोह में मुख्य अतिथि हिंदी अकादमी की अध्यक्ष मुख्यमंत्री शीला दीक्षित होंगी। सम्मान अर्पण उडिया के वरिष्ठ लेखक डॉ. जगन्नाथ प्रसाद दास करेंगे और अध्यक्षता प्रो.अशोक चक्रधर करेंगे।

कविगुरु की जयंती पर संस्कृति एक्सप्रेस रवाना

कोलकाता : कविगुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर की 150वीं जयंती के अवसर पर 9 मई को देशभर में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए गए। उनकी जन्मस्थली और रवीन्द्रभारती विवि के तौर पर परिवर्तित जोड़ासांकू ठाकुरबाड़ी में दिनभर लोगों का तांता लगा रहा। विशिष्ट लोगों ने गुरुदेव के कक्ष में जाकर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की व उनकी प्रतिमा पर माल्यार्पण किया। कलाकारों ने शांति निकेतन में उनके कुछ गीतों पर नृत्य नाटिकाएं पेश कर श्रद्धांजलि दीं।
रेल मंत्री ममता बनर्जी ने हावड़ा स्टेशन से संस्कृति एक्सप्रेस को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। यह गुरुदेव की कृतियों व उनसे जुड़े अनछुए पहलुओं से देशवासियों को परिचित कराएगी। एक साल की यात्रा के दौरान यह ट्रेन देश के पंद्रह-बीस पर्यटनस्थलों से गुजरने के बाद 9 मई, 2011 को वापस हावड़ा पहुंचेगी। रेल मंत्री ने कहा कि कविगुरु की 150वीं जयंती पर वर्ष भर विभिन्न कार्यक्रम होंगे। हावड़ा स्टेशन पर रवीन्द्र म्यूजियम व बोलपुर में गीतांजलि म्यूजियम निर्माण के लिए 25 करोड़ मंजूर किए गए हैं। रेलमंत्री ने कहा कि शांतिनिकेतन स्टेशन का आधुनिकीकरण किया जाएगा।
नई दिल्ली में प्रधानमंत्री ने संसद भवन के केंद्रीय कक्ष में टैगोर के चित्र पर पुष्प अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी। विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज, संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी और भाजपा संसदीय दल के अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी सहित अनेक केंद्रीय मंत्री और सांसद उपस्थित थे। बाद में नेशनल गैलरी आफ माडर्न आर्ट में उनकी कला प्रदर्शनी का उद्घाटन प्रधानमंत्री ने किया। उन्होंने कहा कि विश्व भारती, संस्कृति मंत्रालय और एनजीएमए मिलकर अगले साल पेरिस में टैगोर की कला प्रदर्शनी लगाने की योजना बना रहे हैं। पेरिस में इस प्रदर्शनी के जरिए उनका 150वां जन्म दिवस मनाया जाएगा, क्योंकि यही वह शहर है जहां 1930 में उन्होंने अपनी कला की पहली प्रदर्शनी लगाई थी। इसके लिए सरकार ने राष्ट्रीय समिति का गठन कर दिया है। इसमें अनेक वरिष्ठ मंत्री, मुख्यमंत्री और विख्यात विद्वान एवं विशेषज्ञ शामिल हैं। प्रधानमंत्री इसके अध्यक्ष हैं। उन्होंने बताया कि इसके साथ ही वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी की अध्यक्षता में एक अन्य समिति गठित की गई है जो इस भव्य समारोह के कामकाज को देखेगी।

महाश्वेता देवी की जगह जगन्नाथ प्रसाद होंगे मुख्य अतिथि

नई दिल्ली : हिंदी अकादमी दिल्ली के पुरस्कारों समारोह में महाश्वेता देवी की जगह वरिष्ठ उडिय़ा लेखक व विचारक डा. जगन्नाथ प्रसाद दास मुख्य अतिथि होंगे। अकादमी के पुरस्कार 11 मई को दिल्ली सचिवालय में दिए जाएंगे। इससे पहले पुरस्कार समारोह 23 मार्च को होना था। चर्चित साहित्यकार कृष्ण बलेदव वैद को शलाका सम्मान से वंचित रखने को मामले को लेकर कई लेखकों ने सम्मान लेने से इनकार कर दिया था। इसके चलते कार्यक्रम स्थागित करना पड़ा था। अकादमी के सचिव प्रो. रवींद्र नाथ श्रीवास्तव ने कहा कि समारोह शानदार तरीके से होगा। उन्होंने कहा कि पुरस्कार पाने वाले सभी साहित्यकारों से पत्र के अलावा फोन पर भी अनुरोध किया गया है कि वे पुरस्कार समारोह में शामिल हों। समारोह की अध्यक्षता मुख्यमंत्री शीला दीक्षित करेंगी तथा मुख्य अतिथि साहित्यकार महाश्वेता देवी का स्थान डा.जगन्नाथ प्रसाद दास होंगे।

विष्णु जी एक : संस्मरण अनेक

नई दिल्ली: कालजयी जीवनी आवारा मसीहा के रचियता विष्णु प्रभाकर की पहली पुण्यतिथि पर 12 अप्रैल को हिंदी भवन और चित्र-कला-संगम के तत्वावधान में विष्णु जी एक : संस्मरण अनेक गोष्ठी का आयोजन किया गया। स्नेही साहित्यकारों ने श्रद्धापूर्वक उन्हें याद किया। गोष्ठी की शुरुआत मणिकुंतला के कबीर पद गायन से हुई।
वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी ने कहा कि विष्णुजी का व्यक्तित्व अभिभूत करने वाला था। वह बड़े साहित्यकार थे और उनका युग भी बड़ा था। विष्णु जी सिद्धांतप्रिय मसिजीवी साहित्यकार थे। उन्होंने कभी अपनी संतानों तक के लिए सिद्धांतों के साथ समझौता नहीं किया, लेकिन अफसोस है कि सात दशकों तक विष्णुजी कहानी लिखते रहे, लेकिन कहानी के इतिहास में उनका नामोल्लेख तक नहीं है।
उन्होंने कहा कि विष्णुजी के साहित्य के प्रकाशन व प्रचार तथा उनकी जन्मशती मनाने के लिए कुछ उपक्रम होना चाहिए। हिंदी भवन के मंत्री डॉ. गोविंद व्यास ने कहा कि हिंदी भवन जैनेंद्र कुमार, रामकुमार वर्मा, सुभद्राकुमारी चौहान, रामधारी सिंह दिनकर तथा हरिवंश राय बच्चन की जन्मशती राष्ट्रीय स्तर पर मना चुका है। उन्होंने घोषणा की कि विष्णुजी की जन्मशती भी हिंदी भवन राष्ट्रीय स्तर पर धूमधाम से मनाएगा। विष्णुजी के ज्येष्ठ पुत्र अतुल प्रभाकर ने बताया कि विष्णु प्रभाकर की स्मृति-रक्षा के लिए एक न्यास का गठन किया जा चुका है।
कथाकार हिमांशु जोशी ने कहा कि विष्णुजी अपनी पीढ़ी के अंतिम साहित्यकार थे। उनमें जरा भी दिखावा नहीं था। वह अपने पर लगे आपेक्षों का कभी जवाब नहीं देते थे। सुपरिचित आलोचक राजकुमार सैनी ने कहा कि विष्णुजी ने काफी हाउस को एक विश्वविद्यालय बनाया, जिसमें हम जैसे उनके छात्र थे। विष्णु जी लोकतांत्रिक संस्कृति के संवाहक थे।
वरिष्ठ पत्रकार रामशरण जोशी ने कहा कि विष्णुजी से मेरी पहली मुलाकात कोलकाता में तब हुई, जब वह आवारा मसीहा के लिए शरच्चंद्र पर शोध-सामग्री के संकलन के सिलसिले में आए थे। जब विष्णुजी ने 75 वर्ष पूरे किए तो मैंने उनका साक्षात्कार सशर्त लिया था। मैंने शर्त रखी कि मैं साक्षात्कार दो हिस्सों में लूंगा। पहला साक्षात्कार आपके अजमेरी गेट स्थित कुण्डेवालान घर पर और दूसरा कनॉट प्लसे के कॉफी हाउस में। विष्णुजी ने मेरी शर्त को स्वीकार करते हुए लंबा साक्षात्कार दिया। विष्णुजी यथास्थितिवादी नहीं, मानवतावादी थे। उनके चरित्र में कहीं भी दोहरापन नहीं था।
संत साहित्य के मर्मज्ञ डॉ. बलदेव वंशी ने कहा कि विष्णुजी की वैष्णवता उनके साहित्य के माध्यम से हमारी विरासत बन चुकी है। विष्णुजी ने साहित्य कमाया, जीवन कमाया और मृत्यु भी कमाई। उन्होंने संतों का सा जीवन जिया। खुद ठगे गए, लेकिन कभी किसी को नहीं ठगा। युवा कथाकार-पत्रकार महेश दर्पण ने कहा कि विष्णुजी के पास कृत्रिमता का अहसास नहीं होता था। वह दिल्ली के होकर भी दिल्ली के नहीं लगते थे। वह स्वयं को पूर्णत: गांधीवादी नहीं मानते थे।
सुपरिचति व्यंग्यकार प्रदीप पंत ने कहा कि विष्णुजी विरोधाभासों के सामंजस्य थे। हंसराज रहबर, भीष्म साहनी से वैचारिक भिन्नता होते हुए भी विष्णुजी की उनसे खूब पटती थी। विष्णुजी ने गांधीवाद को अपने निजी जीवन में उतारा था।
विष्णुजी की पुत्री अनीता ने कहा कि सबसे बड़ी पुत्री होने के नाते मुझे पिताजी का सबसे अधिक स्नेह मिला। जब मैं कॉलेज जाती थी तो मुझे वह दस रुपये जबखर्ची दिया करते थे और खुद भी अपना जेबखर्च दस रुपये में चलाते थे। उनके साथ दक्षिण भारत की यात्रा अविस्मरणीय है। विष्णुजी अपने चार गुरु मानते थे- मां, मामा, बड़े भाई और पत्नी को।
ेगोष्ठी का संचालन डॉ. हरीश नवल ने किया। उन्होंने कहा कि अस्वस्थ्य होते हुए भी विष्णु जी मेरी बेटी की शादी में आए और बहुत देर तक रहे। जब तक वह रहे, तब तक स्नेहीजनों से घिरे रहे।
गोष्ठी में वीरेंद्र प्रभाकर, महेशचन्द्र शर्मा, हरिनारायण, रामकुमार कृषक, हरि बर्मन, संतोष माटा, सविता चड्ढा, रामकिशोर द्विवेदी, डॉ. धर्मवीर, डॉ. रवि शर्मा, भगवान सिंह, राजेंद्र नटखट आदि उपस्थित रहे।

महिलाओं को मान्यता खुद स्थापित करनी होंगी: मैत्रेयी

देहरादूनः महिला दिवस के सौ साल होने के उपलक्ष्य में प्रसिद्ध कवयित्री महादेवी वर्मा के जन्मदिन 26 मार्च को महिला समाख्या, उत्तराखंड ने दो दिवसीय सेमिनार का आयोजन किया। इसे चार सत्रोंं, महिला आंदोलन के सौ वर्ष, महिला आंदोलन और मुस्लिम महिलाएं, महिला आंदोलन और दलित महिलाएं, महिला आंदोलन और गांधी में बांटकर महिला आंदोलन और उसकी स्थिति को समझने का प्रयास किया। कार्यक्रम का उद्घाटन उत्तराखंड की राज्यपाल माग्र्रेट आल्वा ने किया।
महिला समाख्या की निदेशिका गीता गैरोला ने अब तक की यात्रा का विवरण देते हुए इस दौर में सामने आई चुनौतियों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि चुनौतियों से निपटने मंे लगातार चली जद्दोजहद के बाद समाख्या की अवधारणा व कार्यक्रम को समझने में समाज के अंदर निरंतर चली बहस से काफी चीजें स्पष्ट हुईं। इस दौर के अनुभव इतने महत्वपूर्ण हैं कि स्त्री मुक्ति के आंदोलन को आगे ले जाने के लिए हिम्मत और वैचारिक धरातल प्रदान करते हैं।
महादेवी सृजन पीठ के अध्यक्ष डॉ लक्ष्मण सिंह बटरोही ने ‘महादेवी वर्मा के साहित्य में स्त्री विमर्श’ से महादेवी के स्त्री चेतना वाले साहित्य व सरोकार तथा आज के संदर्भ में उनके महत्व को सामने रखा। 20वीं शताब्दी के आखिरी दशक में महादेवी का उदय पुरुषवादी वर्चस्व के विरोध में उभर कर सामने आता है। एक बार महादेवी ने बौद्ध भिक्षुणी बनने की कोशिश की थी। दीक्षा के समय जब गुरु और उनके मध्य परदा रखा तो महादेवी यह कह कर चली आईं कि जो धर्म स्त्री से सीधा संवाद नहीं कर सकता, उसकी उन्हें जरूरत नहीं। डॉ बटरोही के अनुसार मीरा भारत की पहली विद्रोही कवि थीं, लेकिन महादेवी ने मीरा के आध्यात्मिक मिथक को तोड़ा और उसके संघर्ष को सामान्य स्त्री के संघर्ष के रूप में देखा। शिक्षा और पति में से शिक्षा को चुना। घर की देहली से बाहर निकली और कभी नहीं लौटी।
मुख्य अतिथि माग्र्रेट आल्वा में कहा कि कोई हमारी (स्त्रियों की) बात सुने या न सुने, हम तो अपने हक की बात करते रहेंगे। उन्होंने कहा कि हर महिला अपने जीवन में कुछ-न-कुछ मुश्किलें उठाती हैं। महिला होने के कारण जन्म के दिन से ही बहुत कुछ सहना पड़ता है। महिलाओं को पंचायतों से लेकर संसद तक में आरक्षण की बहस के दौरान बहुत से लोग इस परिवर्तन को पचा नहीं पाए। बहस के दौर में महिलाओं की क्षमताओं पर जो सवाल उठाए जाते थे, आज उन तमाम सवालों के जबाब महिलायें दे रही हैं। पंचायत से लेकर संसद तक में महिलायें इसलिए होनी चाहिए कि वे महिलाओं की मुश्किलें बेहतर जानती हैं।
100 साल की इस लंबी अवधि में कुछ महिलाओं ने अपने व्यक्तिगत संघर्ष को लिखकर सार्वजनिक करने की हिम्मत दिखाई। जिससे पितृसत्तात्मक सामाजिक ढांचे में घुट-घुट कर जीने वाली बाकी औरतों को जीने के रास्ते मिल सके और वे उन रास्तों पर चलने की हिम्मत कर सके। इन जीवंत उदाहरणो को ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं तक पहुंचाने और उन पर बहस कर उनके रास्तों को सहज बनाने की प्रक्रिया में महिला समाख्या द्वारा देश की कुछ चर्चित व संघर्शषील महिलाओं की कथा-आत्मकथाओं के अंशों की पुस्तक ‘ना मैं बिरवा, ना मैं चिरिया’ का विमोचन भी किया।
‘महिला आंदोलन के 100 वर्ष’ विषय का संचालन गीता गैरोला ने किया। मुख्य वक्ता प्रसिद्ध नारीवादी जया श्रीवास्तव ने कहा कि महिला के जीवन चक्र में हिंसा और अन्याय का चक्र बना है। इसलिए महिलाओं की लड़ाई इंसाफ के लिए है। पांच ‘इ’,  इंसाफ,  इंसान, इश्क,  इमान और इल्म पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि इन भावनाओं के बीच एक रिश्ता है जिसे महिला आंदोलन के संदर्भ में समझने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि स्त्री आंदोलन कभी भी पुरुष विरोधी नहीं, बल्कि दासता, अत्याचार व दमन विरोधी रहा है, यह समझने की जरूरत है।
स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी को सुधारवाद की बजाए हक आधारित दृष्टिकोण बताते हुए उन्होंने उदाहरण दिया कि ऐनी बेसेंट ने भी कहा था, ‘महिलाओं को हक नहीं दे सकते तो मानवाधिकार की बात भी मत कीजिए और मानवाधिकार की बात करनी है तो महिला अधिकारांे की बात भी करनी होगी।’
नारीवादी महिला संगठनों के इतिहास मे हैदराबाद के पुरोगामी महिला संगठन को भारत का पहला नारीवादी संगठन बताया। जेपी आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी के साथ ही 1975-1990 के दौरान उभरे बहुत से महिला संगठनों व उनकी भूमिका को महत्वपूर्ण मानते हुए कहा कि इन सबसे महिला आंदोलन की समझ आगे बढ़ी है। रचनात्मक स्तर पर भी इस दौरान महिला जागरण के अनेक गीत व नाटक रचे गए। उत्तराखंड में जल, जंगल व जमीन के हक तथा चिपको व शराब बंदी आन्दोलन में महिलाओं की नेतृत्वकारी भूमिका को भी उन्होंने महिला आंदोलन का हिस्सा बताया और इन्हें समग्र रूप में देखे जाने की जरूरत बताई।
द्वितीय सत्र ‘महिला आंदोलन और मुस्लिम महिलायें’ की अध्यक्षता हम्माद फारूखी ने की। मुख्य वक्ता शीबा असलम थीं। संचालन सनत पत्रिका के संपादक फैजल मलिक ने किया।
सत्र की अध्यक्षता कर रहे हम्माद फारूखी ने कहा कि मुस्लिम समाज और इस समाज की महिलाओं की समस्याएं दूसरे समाज की मूल समस्याओं से भिन्न नहीं हैं। गरीबी, अशिक्षा, कुपोषण, बेरोजगारी यहां भी दूसरे समाजों की तरह है, लेकिन अलग-अलग क्षेत्र में निवास, स्थानीय संस्कृति, रीति-रिवाज आदि के कारण भिन्न पहचान बनती है। इसे एक जैसे परिभाष्ति करने की कोशिश होती है, जबकि पूरा समाज एक जैसा होता नहीं है।
संबोधन के दूसरे हिस्से में उन्होंने कहा कि चिंतन का परित्याग करने से इस्लाम में जड़ता आ गई है। चिंतन हो तो परिस्थिति अनुसार समाधान के विकल्प भी इस्लाम में मौजूद हैं और सहमति-असहमति के बीच संवाद रास्ता भी दिखाएगा।
मुख्य वक्ता शीबा असलम ने कहा कि जब सब तरह के समुदायों में मंथन व हलचल है, तब मुस्लिम महिलायें कैसे खामोश हैं, उनकी स्थिति कैसे भिन्न है। राजनीतिक क्षेत्र में संस्कृतिक विविधता को अल्पसंख्यकवाद के रूप में देखा जाने लगा है। मुस्लिम कट्ठरपंथियों ने भी अपनी आधी आबादी (औरत) को धर्म की आड़ में अलग-थलग रखा। इस्लाम को गलत रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश हुई, जबकि इस्लाम के सिद्धांतों में भेदभाव था ही नहीं।
उन्होंने कहा कि यह एक चुनौती है कि भारत जैसे देश में जहां व्यवस्था भ्रष्ट है, लोग मजहब को छोड़ व्यवस्था पर भरोसा कैसे करें ? सेकुलर होना तो सरकार का काम है, लोग मजहबी हों, इसमें कोई बुराई नहीं है, इसलिए परिवर्तन की बहस मजहब के भीतर से भी चलाई जा सकती है और रास्ता वहीं से भी निकलेगा। इसमें तर्कहीनता बड़ी बाधा है।
उन्होंने कहा कि इस्लाम में निश्चित है कि बालिग होने पर ही शादी हो और कुरान में किसी आपातकालीन स्थिति के अलावा किसी को भी एक से अधिक शादी की इजाजत नहीं है। एक से अधिक विवाह सामान्य मुस्लिम अधिकार नहीं है। तलाक, फतवा व काजी व्यवस्था पर उन्होंने कहा कि किस तरह इस्लाम की दुहाई देकर इन सब की आड़ में औरत का शोषण होता रहा है। फतवे की व्यवस्था को महज मशवरा बताते हुए उन्होंने कहा कि फतवा कोई कानून नहीं है, लेकिन औरत और पढ़े-लिखे व्यक्ति के खिलाफ फतवे को जबरन थोपा जाता है। शिया समुदाय में तलाक व्यवस्था में हुए कुछ सुधारों का उन्होंने स्वागत किया।
उन्होंने कहा कि जेहाद को इस्लाम से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। इससे पढ़े-लिखे और समझदार लोगों को दिक्कत होती है। प्रतिभागियों द्वारा सवाल उठाए जाने पर “ाीबा असलम ने बताया कि तीन बार तलाक का कुरान से कोई लेना-देना नहीं है। तलाक एक प्रक्रिया है, जिसमें पत्नी की सहमति आवश्यक होती है। इस्लाम में परिवार नियोजन की मनाही नहीं है।
फैजल मलिक ने कहा कि कुछ वर्षों से कुछ ऐसा माहौल बना है कि मुसलमान होने से डर लगता है। जैसे कोई सिराहने बैठा हो और कह रहा हो,‘उठ, तू मुसलमान है।’ इस स्थिति महिलाओं के लिए ज्यादा पीड़ादायक है। इस्लाम की ठीक से व्याख्या नहीं की गई है। धर्मगुरुओं ने धर्म से उतना ही लिया, जिससे उनको फायदा हो, समाज को नहीं।
हजरत मोहम्मद ने समझाया था कि सांप्रदायिकता घर उजाड़ती है और मजहब इन्सान बनाता है। उन्होंने स्वयं एक विधवा से शादी की और कन्या भू्रण हत्या का विरोध किया था।
मंजू मलिक ने कहा कि औरत की तकलीफें नस्ल-दर-नस्ल, पीढ़ी-दर-पीढ़ी खून में दौड़ती रही हैं। सदियोें तक औरत की जो भावनाएं दबाई गईं, वे सकारात्मक माहौल बनने से उभर रही है। विपरीत परिस्थितियों में समाज में अपना मुकाम बनाने वाली नाहिद ने ‘मेरे संघर्ष की कहानी-मेरी जुबानी’ सुना कर समाज के समक्ष कई प्रश्न खड़े किए।
सत्रों की समाप्ति के बाद ‘संभव’ नाट्य मंच, देहरादून ने कथाकार विद्यासागर नौटियाल की कहानी ‘फट जा पंचधार’ के नाट्य रूपांतरण का मंचन किया।
ओमप्रकाश बाल्मिकी की अध्यक्षता में ‘महिला आंदोलन एवं दलित महिलायें’ का विषय पर सत्र की शुरुआत डा. चंद्रा भण्डारी ने किया। उन्होंने कहा कि समाज की प्रारंभिक आत्मनिर्भर व्यवस्था टूटने से श्रम और सम्पत्ति के बंटवारे में पुरुष सम्पत्ति के मालिक के रूप में स्थापित हुए। इस जटिल सामाजिक श्रम विभाजन ने पुरुष के मुकाबले महिला की सामाजिक स्थिति कमजोर की और फिर इसने लिंगभेद को भी स्थापित कर दिया। महिलायें घर की सीमा तक सिमटने लगीं। भारतीय समाज में वर्णव्यवस्था के रूप में एक और तरह का विभाजन हुआ, जिसमें ऊंची-नीची श्रेणियों के कार्य के आधार पर जातियां थोप दी गईं। उत्पादन के कार्य करने वाले निम्न जातियों में वर्गीकृत हुए और उनके हिस्से शोषण और उपेक्षा आई। राज-काज के साथ सम्पत्ति और संसाधनों के मालिक ऊंची जातियां बन बैठीं। श्रम और सम्पत्ति के विभाजन ने भारतीय समाजों को दूसरी बार विभाजित कर दिया। पहले विभाजन से महिला और दूसरे विभाजन से दलित शोषण के शिकार हुए।
मुख्य वक्ता दलित आंदोलन की प्रसिद्ध नेता रजनी तिलक ने कहा कि समाज ने जिन जातियों को हाशिये पर रखा, उन्हें अछूत, अनुसूचित व दलित रूप में देखा। उनके श्रम का शोषण किया और सम्मान से भी वंचित किया गया। अंग्रेजी शासन काल में भी महिलाओं व दलितों को हाशिये पर रखने की कोशिश हुई। अंग्रेजी राज के कानूनों में भी यह दिखाई देता है।
भारत में कई बार महिला व दलित आंदोलन समानांतर भी चलते रहे। डॉ अंबेडकर के नेतृत्व में चले दलित आंदोलन इस समाज में जागरूकता के लिए महत्वपूर्ण रहे। स्त्री मुक्ति की भावना भी इन आंदोलनों में शमिल रही है।
सावित्री बाई फुले के जन्मदिन को महिला जाग्रति दिवस के रूप में मनाने की परंपरा दलित स्त्री की आवाज को सम्मान देने की कोशिश है। अलग-अलग राज्यों में महिला आंदोलन चल रहे हैं। इनके समंवय व मंथन की निरंतर जरूरत है। समय-समय पर मानवाधिकार आयोग व महिला आयोग को महत्वपूर्ण सुझाव दिए गए हैं, लेकिन अब भी समग्र रूप में आवाज उठाने की जरूरत है।
जातिगत शोषण को ऐतिहासिकता में देखने और आजादी को स्त्री मुक्ति के संदर्भ में परिभाषित करने की जरूरत बताते हुए उन्होनें कहा कि आगे का रास्ता भी इसी से निकलेगा। उन्होंने अन्याय झेलने वाले सभी समाजों से चुप्पी तोड़ने की अपील भी की। उन्होंने कहा कि ब्राह्मणवादी व्यवस्था को पहली चुनौती महिला और दलित समाज ने ही दी है। मेहनतकश समाज के श्रम के शोषण पर अधिकार के लिए कुछ लोगों को दलित बना दिया गया। उन्होंने ध्यान दिलाया कि महिला आंदोलन का नेतृत्व मुख्य रूप से ऊंची जाति की महिलाओं का है इसलिए निचले स्तर के असली मुद्दे अब भी चर्चा में नहीं आ पा रहे हैं। महिलाओं का सार्वजनिक मंचों पर आने को सकारात्मक बदलाव बताते हुए वह सार्वजनिक मंचों का उपयोग राजनीतिक बदलाव के लिए करने की जरूरत पर भी जोर देती हैं।
उत्तराखंड आंदोलन के दौरान महिलाओं के दमन का प्रसंग उठाते हुए उन्होंने अफसोस जताया कि राज्य आज तक एक दोषी को भी दंडित नहीं कर सका।
अध्यक्षीय भाषण में ओमप्रकाश बाल्मीकी ने सवाल उठाया कि क्या हम अब भी ऐसे समाज में रह रहे हैं, जहां हर स्तर पर महिलाओं को प्रताड़ित-उत्पीड़ित किया जा रहा है। समाज में दलितों से नफरत करना अब भी सिखाया जाता है। जो विचार समाज में घृणा पैदा करता है, उस पर चोट करना जरूरी है। ‘कन्यादान’ जैसी धारणा और प्रपंचों से, जो लड़की को वस्तु समझता है, उससे बाहर निकलना भी महिला आंदोलन का हिस्सा होना चाहिए। उत्तराखंड के सभी आंदोलनों में महिलाओं की भागीदारी अग्रिम मोर्चे पर रहने के बावजूद आंदोलन के बाद फायदा उठाने वालों में लड़ने वाली महिलायें कहीं नहीं दिखाई देतीं, इस स्थिति को उन्होंने सोचनीय बताया।
इस सत्र के दौरान नन्दी नैनवाल एवं विजय लक्ष्मी ने ‘मेरे संघर्ष की कहानी मेरी जुबानी’ सुनाई। चिपको आंदोलन की प्रसिद्ध नेत्री और कठिन परिस्थितियों में समाज में जगह बनाने वाली सुदेषा देवी को सम्मानित किया।
प्रसिद्ध लेखिका मैत्रेयी पुष्पा की अध्यक्षता में ‘महिला आंदोलन एवं गंाधी’ की मुख्य वक्ता डा. दिवा भट्ट तथा सत्र का संचालन डा. बसंती पाठक ने किया।
सत्र को आरंभ करते हुए हेमलता खण्डूड़ी ने कहा कि आजादी के आंदोलन के साथ गंाधी जी ने उपेक्षित समुदायों, दलितों व महिलाओं के प्रति संवेदनशील होकर सबकी भागीदारी के प्रयास किए। बाल विवाह, सती, पर्दा व विधवा उपेक्षा जैसी उत्पीड़नकारी परंपराओं का विरोध निरंतर करते रहे। महिलाओं की नेतृत्व क्षमता का मूल्यंाकन किया और नेतृत्व में आने को प्रेरित किया। स्त्री शिक्षा व स्वावलंबन की जरूरत भी गंाधी जी ने समझाई थी।
मुख्य वक्ता डॉ दिवा भट्ट ने कहा कि आजादी के आंदोलन में हर अवसर पर महिलाओं की भागीदारी में गंाधी जी की महत्वपूर्ण प्रेरणा रही है। गंाधी जी ने महिलाओं की “ाक्ति व सामथ्र्य को पहचाना और उन्हें सम्मान दिया। उनका मानना था कि स्त्री व पुरुष एक-दूसरे के पूरक हैं। आत्मबल में गंाधी जी महिला को पुरुष से आगे बताते थे। महिला के लिए अबला शब्द का वे विरोध करते व कहते कि यदि बल का अर्थ पशुबल है, तब जरूर महिला का बल पुरुष से कम है।
उन्होंने कहा कि गंाधी जी सार्वजनिक हित के आंदोलनों में महिलाओं के नेतृत्व पर जोर देते थे। उनकी मान्यता थी कि इससे सफलता मिलनी आसान होगी। मनुष्य समाज को आगे ले जाने में वे महिलाओं की बराबर भागीदारी पर जोर देेते रहे। उन्होंने कहा कि अब करीब 100 वष बाद गांधी जी के इन विचारों के आधार पर महिला स्वतंत्रता की स्थिति का आंकलन किया जाना चाहिए। यह भी स्मरण रहना चाहिए कि गांधी जी की अहिंसा आत्मसमर्पण नहीं था, क्योंकि स्त्री के खिलाफ शील भंग जैसे अत्याचार पर उन्होंने कहा था, ‘तुम्हारे हाथ हैं, नाखून हैं, उनका इस्तेमाल करो।’
आजादी के आंदोलन में महिलाओं को साथ ले जाने का प्रयोग सबसे पहले गांधी जी का था। गांधी जी के विचारों में विरोधाभास को भी रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि महिलाओं की भिन्न भूमिका की बात गांधी जी करते थे। क्या गंाधी जी महिलाओं को सीमित भूमिका में देखते थे ? यह जरूर बहस का विषय है।
डॉ0 सविता मोहन ने कहा कि गांधी जी ने जिन तीन अखबारों का प्रकाशन किया था, उनमें स्त्री शिक्षा पर सर्वाधिक जोर होता था।
डॉ0 शेखर पाठक ने कहा कि अंग्रेजी राज के दौरान उत्तराखंड का संदर्भ लें तो बहुत से लोगों को स्त्री संघर्ष नहीं दिखाई देता। वे सवाल खड़ा करते हैं, क्या इतिहास के पास ऐसा देखने की दृष्टि थी ? अब नए संदर्भ में महिला की भूमिका को देखा जा रहा है और इसकी जरूरत भी हैं। उन्होंने कहा कि शुरू में महिलायें इसलिए पृष्ठभूमि में रहीं कि कठिन परिस्थितियों में घर, परिवार व समाज को देखना चुनौतिपूर्ण था। जब वन आंदोलन शुरू हुआ तो महिलायें घर से बाहर निकलने लगीं। आजादी के आंदोलन में भी महिलाओं की प्रत्यक्ष भागीदारी बढ़ती गई।
गांधी जी से प्रभावित सरला बहन व मीरा बहन का उत्तराखंड आगमन व गांधी के विचारों के साथ महिलाओं के बीच काम करना महत्वपूर्ण रहा। इसका प्रभाव उत्तराखण्ड में आज भी है।
डॉ0 पाठक के अनुसार आजादी के आंदोलन और उसके बाद भी काफी समय तक दलित स्त्री इसलिए नहीं दिखाई देती क्योंकि उनका योगदान व संघर्ष मौखिक परंपरा में आगे बढ़ा, लिखित में नहीं आ पाया। महिलाओं के बहुत से संघर्ष इतिहास व साहित्य में स्थान नही बना पाए। उत्तराखंड में यह लंबी श्रंृखला है। राज्य आंदोलन में वह प्रखर रूप से सामने आती है। इन सबको स्थान मिलने का समय भी आएगा। जल, जंगल और जमीन के आंदोलन आज फिर महत्वपूर्ण हो गए हैं और इनमें महिलाओं की भागीदारी फिर निर्णायक होगी।
अध्यक्षीय भाषण में कथाकार मैत्रेयी पुष्पा ने कहा कि महिलाओं के आज के आंदोलन भी गंाधी के सत्याग्रह जैसे ही हैं। समय बदल गया है इसलिए गंाधी के विचारों में विसंगतियां दिखाई देती हैं। उन्होंने कहा कि महिला आंदोलन में पुरुष का विरोध भी क्यों न हो। जो उत्पीड़न करे, संघर्ष तो उससे होगा ही। संघर्ष के बिना सृजन संभव नहीं। उन्होंने कहा कि स्त्री की छटपटाहट किसी को दिखाई क्यों नहीं देती ? छटपटाहट से बाहर निकलने के लिए वह विरोध क्यों न करें ? नैतिकता का पाठ उसे ही क्यों पढ़ाया जाता है ? महिलाओं को धर्मग्रंथों की दुहाई दी जाती है, लेकिन इन ग्रंथों में तो चीर हरण, अग्नि परीक्षा है। चैराहे पर लुटती महिला का चीर बचाने अब कोई क्यों नहीं आता ?
उन्होंने कहा कि महिलाओं की स्थिति आज भी कैसी है, असलियत सब जानते हैं, इसलिये सच्चाई स्वीकार कर ही रास्ता निकलेगा। मान्यताएं बदलनी पड़ेंगी। महिलाओं से भी वह सवाल करती हैं कि महिला दिवस से ज्यादा आकर्षण जब करवाचैथ का हो गया है, तब परिवर्तन कैसे आएगा।
महिलाओं को अपनी मान्यता खुद स्थापित करनी होंगी। नए पर्व, त्योहार, उत्सव कायम करने होंगे। ऐसी मर्यादाएं, मान्यताएं बनानी होंगी, जिसमें महिलायें सम्मान के साथ शामिल हों। उन्होंने कहा कि हजारों साल की गुलामी महिलाओं की रही है, इसे कसटने में समय जरूर लगेगा।
‘आलो आंधारी’ की लेखिका बेबी हालदार ने अपने संघर्ष सुनाने के साथ अपनी सफलता को भी बांटा। गीता गैरोला ने कहा कि महिला आंदोलन के इतिहास में महिला समाख्या के प्रयास एक खामोश परिवर्तन साबित हो रहे हैं, इसे अनुभव किया जा सकता है।