Category: परिक्रमा

हिंदी अकादेमी ने पुरस्कारों का दायरा बढ़ाया

नई दिल्लीः हिंदी अकादेमी ने शलाका साहित आठ पुरस्कारों का दायरा बढ़ा दिया हैं। अब इन पुरस्कारों के लिए चयन में पुरस्कार पाने वाले का दिल्ली का होना जरूरी नहीं रह गया है। अकादमी के इस निर्णय से पुरस्कारों के लिए नाम का चयन राष्टीय स्तर पर किया जा सकेगा।
इसके अलावा सम्मान राशि भी बढ़ी दी गई है। शलाका सम्मान में एक लाख ग्यारह हजार की जगह राशि दो लाख कर दी गई है। विशिष्ट सम्मान के लिए इक्कीस हजार की जगह पचास हजार रुपए सम्मान राशि दी जाएगी। विशिष्ट पुरस्कारों में हिंदी अकादमी विशेष योगदान सम्मान, हिंदी अकादमी काव्य सम्मान, हिंदी अकादमी गद्य विधा सम्मान, हिंदी नाटक सम्मान, हिंदी हास्य व्यंग्य सम्मान, हिंदी बाल साहित्य सम्मान और ज्ञान- प्रोद्योगिकी सम्मान शामिल हैं।

केदरानाथ सिंह ने शलाका ठुकराया, कार्यक्रम स्थगित

नई दिल्ली : वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह ने शलाका पुरस्कार लेने से इनकार कर दिया है। उनके अलावा छह अन्य साहित्यकारों ने भी अकादमी पुरस्कार नहीं लेने की घोषणा की है।
इसके पीछे चर्चित साहित्यकार कृष्ण बलदेव वैद को शलाका सम्मान से वंचित रखने का मामला है। अकादमी की पिछली कार्यकारिणी ने वैद को वर्ष 2008-2009 के शलाका सम्मान के लिए नामित किया गया था। कुछ लोगों ने वैद के साहित्य पर अश्लीलता का आरोप लगाया था। इसके चलते उनका नाम काट दिया गया और किसी को भी यह सम्मान नहीं दिया।
केदारनाथ सिंह के सम्मान ठुकराना के बाद कई अन्य साहित्यकार भी विरोध में आ गए है। प्रसिद्ध लेखक प्रियदर्शन ने साहित्य कृति पुरस्कार नहीं लेने की घोषणा कर दी। इनके अलावा पुरस्कार ठुकराने वालों में पुरुषोत्तम अग्रवाल, रेखा जैन, गगन गिल और विमल कुमार भी हैं।
अकादमी के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है, जब सात साहित्यकारों ने पुरस्कार लेने से इनकार कर दिया है।
सूत्रों के अनुसार पुरस्कार को लेकर हुए विवाद के बाद 23 मार्च को होने वाला पुरस्कार समारोह स्थगित कर दिया गया हैं। जो नाम बचे हैं, उनके अलावा अकादमी फिर से पुरस्कारों के लिए नाम का चयन करेगी। उसके बाद समारोह की तिथि घोषित की जाएगी।

अज्ञेय की 100वीं जयंती पर व्याख्यान

जम्मू : चर्चित कवि हीरानंद सच्चिदानंद वात्सयायन अज्ञेय की 100वीं जयंती के अवसर पर 6 मार्च को शाश्वती की ओर से अज्ञेय स्मारक व्याख्यान-2010 का आयोजन किया गया। विषय था- बदलते सामाजिक परिवेश में व्यंग्य की भूमिका। केएल सहगल हॉल में आयोजित कार्यक्रम का शुभारंभ अज्ञेय की रिकार्ड की गई कविताओं को सुनाकर हुआ।
मुख्य वक्ता व्यंग्य यात्रा के संपादक प्रेम जनमेजय ने कहा कि व्यंग्य समाज की बुराइयों पर चोट करता है। साहित्यकार विदू्रपताओं और विसंगतियों से समाज को मुक्ति दिलाने के लिए इसका इस्तेमाल ठीक वैसे की करता है, जैसे डाक्टर नश्तर लगाकर फोड़े की मवाद की सफाई करता है। उन्होंने कहा कि समाज को आईना दिखाने के लिए व्यंग्य जरूरी है। बदलते परिवेश में व्यंग्य का महत्व बढ़ता जा रहा है।
जम्मू यूनिवर्सिटी के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष प्रोफेसर ओम प्रकाश ने हास्य और व्यंग्य के अंतर को स्पष्टï किया और अज्ञेय को महान व्यंग्यकार बताया। उन्होंने कहा कि टूटते रिश्तों के इस दौर में व्यंग्य और महत्वपूर्ण हो जाता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मुख्यधारा में साहित्य की कौन सी विधा है।
शाश्वती के संयोजक रमेश मेहता ने कार्यक्रम का संचालन किया। प्रोफेसर चंचल डोगरा ने अज्ञेय का जीवन परिचय पढ़ा। डॉक्टर निर्मल विनोद ने धन्यवाद ज्ञापन दिया।

केदारनाथ सिंह को शलाका सम्मान

नई दिल्ली : तीसरे सप्तक के कवि, आलोचक और चिंतक केदारनाथ सिंह को दिल्ली की हिंदी अकादमी का सर्वोच्च शलाका सम्मान देने की घोषणा की गई है।   

उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के ग्राम चकिया में 7 जुलाई, 1934 को जन्मे केदारनाथ सिंह ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय से अध्ययन किया और 1964 में वहीं से पीएचडी की। उनका पहला कविता संग्रह ‘अभी बिल्कुल नहीं’ 1960 में प्रकाशित हुआ और इसी साल प्रकाशित ‘तीसरा सप्तक’ में भी उनकी कविताएं शामिल की गईं। उनके प्रमुख कविता संगहों में ‘जमीन पक रही है’, ‘यहां से देखो’, ‘अकाल में सारस’, ‘उत्तर कबीर और अन्य कविताएं’ और ‘बाघ’ प्रमुख हैं। आलोचनात्मक कृतियां ‘कल्पना और छायावाद’, ‘आधुनिक हिंदी कविता में बिंब विधान’ और ‘मेरे समय के शब्द’ हैं। उनकी कविताओं के अंग्रेजी, स्पेनिश, रूसी, जर्मन, हंगेरियन और देश की प्रमुख क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद प्रकाशित हुए हैं।

दिल्ली की मुख्यमंत्री और अकादमी की अध्यक्ष शीला दीक्षित के मुख्य आतिथ्य में प्रख्यात बांग्ला लेखिका महाश्वेता देवी 23 मार्च को केदारनाथ सिंह को यह सम्मान प्रदान करेंगी। सम्मान के रूप में दो लाख रुपए, प्रतीक चिह्न और शॉल प्रदान किया जाएगा।

कथाकार मार्कण्डेय को दोबारा कैंसर हुआ

नई दिल्ली: वरिष्ठ साहित्यकार और कथा के संपादक मार्कण्डेय दोबारा कैंसर की चपेट में आ गए हैं। उनका इलाज राजीव गांधी कैंसर अस्पताल में इलाज चल रहा है।
प्रेमचंद के बाद हिंदी कथा साहित्य में ग्रामीण जीवन को पुनस्र्थापित करने वालों में मार्कण्डेय महत्वपूर्ण कथाकार हैं। उन्होंने आम आदमी के जीवन में साहित्य में जगह दी। वह जनवादी लेखक संघ के संस्थापकों में हैं।
1965 में उन्होंने माया के साहित्य महाविशेषांक का संपादन किया। कई महत्वपूर्ण कहानीकार इसके बाद सामने आए। 1969 में उन्होंने साहित्यिक पत्रिका कथा का संपादन शुरू किया। इसके अभी तक 14 अंक ही निकल पाए हैं। साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में पत्रिका को मील का पत्थर माना जाता है।
उन्होंने जीवनभर कोई नौकरी नहीं की। अग्निबीज, सेमल के फूल(उपन्यास), पान फूल, महुवे का पेड़, हंसा जाए अकेला, सहज और शुभ, भूदान, माही, बीच के लोग (कहानी संग्रह), सपने तुम्हारे थे (कविता संग्रह), कहानी की बात  (आलोचनात्मक कृति), पत्थर और परछाइयां (एकांकी संग्रह) आदि उनकी महत्वपूर्ण कृतियां हैं। हलयोग (कहानी संग्रह) प्रकाशनाधीन है। उनकी कहानियों का अंग्रेजी, रुसी, चीनी, जापानी, जर्मनी आदि में अनुवाद हो चुका है। उनकी रचनाओं पर 20 से अधिक शोध हुए हैं।
80 वर्षीय मार्कण्डेय को दो साल पहले गले का कैंसर हो गया था। इलाज से वह ठीक हो गए थे। अब आहार नली के पिछले हिस्से में कैंसर हो गया है। वह 1 फरवरी को इलाज के लिए दिल्ली आ गए हैं। राजीव गांधी कैंसर अस्पताल, रोहिणी में उनका इलाज चल रहा है। सप्ताह में पांच दिन रेडियोथैरेपी की जा रही है। उनका करीब डेढ़ माह इजाल चलेगा।

'द्रोपदी' को लेकर साहित्य अकादेमी समारोह में हंगामा

नई दिल्ली : द्रोपदी पर विवादित किताब लिखने वाले तेलुगु लेखक वाईएल प्रसाद को साहित्य अकादमी द्वारा सम्मानित किए जाने को लेकर हंगामा हुआ। साहित्य अकादमी का साहित्योत्सव कार्यक्रम 15 फरवरी से शुरू हो गया है। यह 20 फरवरी तक चलेगा। कमानी सभागार में आयोजित समारोह में कार्यक्रम के दूसरे दिन देश की 25 भाषाओं के लेखकों को सम्मानित किए जाने के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार-2009 रखा गया था। समारोह में कुछ भाषाओं के लेखकों को सम्मानित किया जा चुका था। विवादित पुस्तक ‘द्रोपदी’ के लेखक वाईएल प्रसाद को सम्मानित करने के लिए बुलाया गया तो दर्शक दीर्घा में बैठे कई लोग भड़क उठे और नारेबाजी करते हुए मंच पर चढ़ गए। आक्रोशित लोगों ने धक्का-मुक्की की तो कुछ ने लेखक पर पत्रिका व कागज आदि फेंके। उन्होंने अकादेमी के अध्यक्ष सुनील गंगोपाध्याय को भी निशाना बनाया।  पुलिस ने हंगामा करे लोगों को सभागार से बाहर निकाला। इसके बाद कार्यक्रम आगे बढ़ाया जा सका।
आक्रोशित लोगों का आरोप है कि लेखक ने द्रोपदी का अपमान किया है। उन्होंने लेखक की तुरंत गिरफ्तारी की मांग की। अखिल भारतीय साहित्य परिषद के राष्ट्रीय मंत्री प्रवीण आय ने साहित्य अकादमी को भंग करने की मांग की। उन्होंने कहा कि यह सांकेतिक विरोध भारतीयता के विरुद्ध लेखन करने वालों के खिलाफ है। जो अकादमी हमारी संस्कृति पर आपत्तिजनक साहित्य लिखने वाले लेखक को सम्मानित करती है, उसके चेयरमैन जनता से माफी मांगें। उन्होंने माफी नहीं मांगने पर अकादमी के बाहर धरना-प्रदर्शन करने की चेतावनी दी।

प्रभाष जोशी पर किताब का विमोचन

हिंदी पत्रकारिता के स्तंभ प्रभाष जोशी पर 28 जनवरी को किताब हद से अनहद गए का विमोचन हुआ। स्वराज प्रकाशन से प्रकाशित इस किताब में कुल 37 लेखकों, पत्रकारों और दूसरे क्षेत्रों से जुड़े लोगों के लेख संकलित हैं। इसका संपादन मुरली मनोहर प्रसाद सिंह, रेखा अवस्थी और स्मित पराग ने किया। गांधी शांति प्रतिष्ठान में आयोजित समारोह में इसका विमोचन प्रसिद्ध पत्रकार कुलदीप नैय्यर ने किया। समारोह की अध्यक्षता जनसत्ता के संपादक ओम थानवी ने की। इस मौके पर नित्यानंद तिवारी, मंगलेश डबराल, अशोक वाजपेयी, अनुपम मिश्र, पुण्य प्रसून वाजपेयी, पुष्पराज और प्रभाष जोशी के सुपुत्र सोपान जोशी भी उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन रवीन्द्र त्रिपाठी ने किया।       

चर्चित कवि अशोक वाजपयी ने कहा कि प्रभाष जी ने हिंदी की नयी शैली विकिसत की और हिंदी को आगे बढ़ाया। पत्रकार कुलदीप नैय्यर ने कहा कि आपातकाल में प्रभाष जोशी ने जो काम किया, उसे दुनिया याद रखेगी। उनका अध्ययन संसार विशाल था। सुप्रसिद्ध कवि मंगलेश डबराल ने कहा कि प्रभाषजी ऐसे संपादक थे जो मूलरूप से लेखक थे। प्रभाष जोशी के पुत्र सोपान जोशी ने आभार व्यक्त किया। ओम थानवी ने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि प्रभाषजी जैसा निर्भीक पत्रकार बहुत कम पैदा होता है।