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भाषा नहीं रहेगी तो हमारी पहचान भी लुप्त हो जाएगी : बिष्ट

कवयित्री देवकी मेहरा को शेर सिंह बिष्ट 'अनपढ़' कुमाउनी कविता पुरस्कार से सम्मानित करते हुए।

कवयित्री देवकी मेहरा को शेर सिंह बिष्ट ‘अनपढ़’ कुमाउनी कविता पुरस्कार से सम्मानित करते हुए।

अल्मोड़ा : ‘कुमाउनी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति प्रचार समिति’ और ‘पहरू’ पत्रिका ने संयुक्त रूप से 12, 13, व 14 नवम्बर को आठवाँ ‘राष्ट्रीय कुमाउनी भाषा सम्मलेन’ जिला पंचायत सभागार, अल्मोड़ा में आयोजि‍त कि‍या। इसमें दिल्ली, लखनऊ, संभल, सहारनपुर, चंदौसी, फरीदाबाद, देहरादून और कुमाऊँ मंडल के सभी जिलों से आए हुए लगभग 160 कुमाउनी के साहित्यकारों और कुमाउनी भाषा प्रेमियों ने भागीदारी की।

सम्मेलन में कहानी, कविता, गीत, लेख, हास्य, रिपोर्ताज, शब्दचित्र आदि विधाओं की कुल 10 पुस्तकों का लोकार्पण किया गया।

इस बार देवकी महरा को शेर सिंह बिष्ट ‘अनपढ़’ कुमाउनी कविता पुरस्कार, खुशाल सिंह खनी को बहादुर बोरा ‘श्रीबंधु’ कुमाउनी कहानी पुरस्कार, त्रिभुवन गिरि को शेर सिंह मेहता स्मृति कुमाउनी उपन्यास लेखन पुरस्कार तथा त्रिभुवन गिरि, श्याम सिंह कुटौला व पवनेश ठकुराठी को प्रेमा पंत स्मृति कुमाउनी खण्ड काव्य लेखन पुरस्कार प्रदान किया गया। कुमाउनी भाषा में हर विधा में साहित्य तैयार करने के लिए कुमाउनी भाषा प्रेमियों द्वारा दी गई आर्थिक मदद से चलाई जा रही लेखन पुरस्कार योजनाओं के अन्तर्गत इस वर्ष 21 रचनाकारों की कृतियों को पुरस्कृत किया गया।

सम्मेलन में हर वर्ष कुछ बुजुर्ग रचनाकारों को ‘कुमाउनी साहित्य सेवी सम्मान’, कुछ भाषा प्रेमियों को ‘कुमाउनी भाषा सेवी सम्मान’ तथा कुछ संस्कृतिकर्मियों को ‘कुमाउनी संस्कृति सेवी सम्मान’ से भी सम्मानित किया जाता है। इस वर्ष भी नौ लोगों को कुमाउनी साहित्य सेवी सम्मान, पांच लोगों को ‘कुमाउनी भाषा सेवी सम्मान’ तथा चार संस्कृतिकर्मियों को ‘कुमाउनी संस्कृति सेवी सम्मान’ से सम्मानित किया गया।

ज्ञातव्‍य है कि‍ 13, 14, व 15 नवम्बर 2009 को अल्मोड़ा के कुन्दनलाल साह स्मारक प्रेक्षागार में पहला तीन दिवसीय ‘कुमाउनी भाषा सम्मेलन’ आयोजित किया गया था। तब से अब तक हुए सम्मेलनों में नि‍म्‍न प्रस्ताव पारित किए गए हैं- 1. कुमाउनी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाए

  1. उत्तराखण्ड में स्कूली पाठ्यक्रम में कुमाउनी भाषा को एक विषय के रूप में शामिल किया जाए
  2. कुमाउनी भाषा के विकास के लिए उत्तराखण्ड में ‘कुमाउनी भाषा अकादमी’ गठित की जाए
  3. अल्मोड़ा नगर के सांस्कृतिक, साहित्यिक राजधानी स्वरूप को देखते हुए ‘कुमाउनी भाषा अकादमी’ का मुख्यालय अल्मोड़ा में बनाया जाए
  4. उत्तराखण्ड सरकार द्वारा कुमाउनी भाषा के आदि कवि गुमानी पंत जी की याद में कुमाउनी भाषा रचनाकारों के लिए समग्र योगदान पर एक लाख रुपये के सालाना पुरस्कार की घोषणा की जाए
  5. उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद वर्ष 2009 से आज तक के सालाना पुरस्कारों की एकमुश्त घोषणा की जाए
  6. कुमाउनी भाषा के विकास के लिए उत्तराखण्ड सरकार द्वारा पांच करोड़ धनराशि का एक कोष बनाया जाए। इसमें से रचनाकारों को पुरस्कृत-सम्मानित करने की योजना बनाई जाए
  7. कुमाउनी भाषा के रचनाकारों को किताब छपवाने के लिए अनुदान दिया जाए
  8. कुमाउनी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति प्रचार समिति कसारदेवी, अल्मोड़ा द्वारा कसारदेवी में प्रस्तावित ‘कुमाउनी भाषा संस्थान’ के सभागार, पुस्तकालय आदि निर्माण हेतु शासन स्तर से अनुदान दिया जाए
  9. कुमाउनी भाषा के तीन बुजुर्ग और नामी कवियों शेर सिंह बिष्ट ‘अनपढ़’, चारुचन्द्र पाण्डे व वंशीधर पाठक ‘जिज्ञासु’ को उत्तराखण्ड भाषा संस्थान देहरादून द्वारा सम्मान योजना में इसी बार ‘गुमानी पंत सम्मान’ या उससे भी बड़े सम्मान से सम्मानित किया जाए
  10. उत्तराखण्ड भाषा संस्थान देहरादून द्वारा कुमाउनी रचनाकारों को दिए जाने वाले सम्मानों में कुमाउनी भाषा के महत्वपूर्ण रचनाकारों गौरीदत्त पाण्डे ‘गौर्दा’, शेर सिंह बिष्ट ‘अनपढ़’, गिरीश तिवाड़ी ‘गिर्दा’ व बालम सिंह जनौटी के नाम पर सम्मान का नाम रखा जाए
  11. अगले वर्ष सन् 2012 से समिति द्वारा कुमाउनी भाषा के महत्वपूर्ण कहानीकार स्व. बहादुर बोरा ‘श्रीबंधु’ कुमाउनी कहानी पुरस्कार दिया जाएगा
  12. उत्तराखण्ड सरकार के उपक्रम ‘ उत्तराखण्ड हिन्दी अकादमी’ व ‘उत्तराखण्ड भाषा संस्थान’ में अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, निदेशक मंडल (कार्यकारिणी) में साहित्यकारों को शामिल किया जाए
  13. उत्तराखण्ड भाषा संस्थान द्वारा हर साल कुमाउनी साहित्यकारों को पुरस्कार/सम्मान और किताब छापने के लिए आर्थिक मदद दिए जाने की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। पुरस्कार/सम्मान तथा पुस्तक प्रकाशन सहायता के लिए अलग-अलग चयन समितियों का गठन किया जाए और इन चयन समितियों में कुमाउनी भाषा के साहित्यकारों को शामिल किया जाए
  14. उत्तराखण्ड भाषा संस्थान द्वारा पुस्तक प्रकाशन सहायता के रूप में वर्तमान में मात्र दस-पंद्रह हजार रुपये स्वीकृत किए जा रहे हैं, जो कि बहुत कम हैं। इतनी कम धनराशि में पुस्तक प्रकाशन संभव नहीं हैं। अतः पुस्तक प्रकाशन सहायता के रूप में कम से कम पच्चीस हजार रुपये की धनराशि का प्रावधान किया जाए।

सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में आधार व्याख्यान प्रस्तुत करते हुए जाने-माने इतिहासकार ताराचन्द्र त्रिपाठी ने कहा कि कुमाउनी भाषा तभी बच सकती है, जब यहाँ के बच्चे, युवा और आम जन इसका प्रयोग निरन्तर दैनिक बोलचाल में करेंगे। यदि इसे हमारी नई पीढ़ी उपयोग में नहीं लाती है तो फिर इसे संविधान की आठवीं अनुसूची में दर्ज करने की माँग की भी कोई सार्थकता नहीं रह जाएगी। अतः अपनी भाषा व संस्कृति को बचाने के लिए हमें सरकारों की ओर देखते रहने के बजाए स्वयं अधिक से अधिक प्रयत्न करने चाहिए। हमें सालभर विद्यार्थियों के बीच जाकर जगह-जगह अनेक ऐसे कार्यक्रम करने चाहिए, जिससे उनमें कुमाउनी भाषा के प्रति रुचि जाग्रत हो। फिर बच्चों को साल में एक बार होने वाले इस तरह के बड़े सम्मेलन में अवश्य बुलाया जाना चाहिए। भविष्य में हमारे सम्मेलनों में नई पीढ़ी की अधिकाधिक उपस्थिति बेहद जरूरी है।

डॉ. शमशेर सिंह बिष्ट का कहना था कि भाषा का सवाल बहुत महत्वपूर्ण सवाल है, क्योंकि हमारी भाषा ही नहीं रहेगी तो हमारी पहचान भी लुप्त हो जाएगी। आज जब उत्तराखण्ड राज्य बने सोलह साल बीत चुके हैं, तो यह अत्यंत शोचनीय स्थिति है कि हम आज भी अपने ही राज्य में अपनी पहचान के संकट से जूझ रहे हैं। पिछले इन सोलह सालों में हमारी कोई पहचान ही नहीं बन पाई है। उत्तराखण्ड राज्य की लड़ाई इसलिए लड़ी गई थी कि हमारा अस्तित्व बचा रहे और हमारी पहचान बनी रहे। कुछ विधायक, सांसद व मंत्री बना दिए जाने मात्र से हमारी पहचान नहीं बन सकती। हमारी पहचान तभी बनेगी, जब यहाँ के निवासियों की जिन्दगी और यहाँ की प्रकृति बची रहेगी तथा सामान्य जन को आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के साधान उपलब्ध होंगे। आज जब हमारे जीवन की सारी चीजों को राजनीति ही तय कर रही है तो ऐसे में प्राकृतिक संसाधनों की लूट-खसोट करने और आम जनता की घोर उपेक्षा करने वाली राजनीति पर सवाल उठाने के साथ-साथ जनहित की राजनीति को स्थापित करना भी बहुत जरूरी है।

उन्होंने उपस्थित साहित्यकारों का ध्यान इस ओर भी दिलाया कि केवल ढेरों रचनाएँ लिखने और प्रकाशित करते चले जाने से कोई विशेष बात नहीं बनती है। असली सवाल रचनाओं की दृष्टिसम्पन्नता और उत्कृष्टता का है। यदि हमारे द्वारा लिखी जा रही रचनाओं में बहुसंख्यक जनता के जीवन से जुड़े यथार्थ की सच्ची अभिव्यक्ति न हो पाए तो लोग ऐसे साहित्य को पढ़ेंगे भी नहीं। अतः आज ऐसा साहित्य लिखे जाने की आवश्यकता है जो वर्तमान जीवन की प्रमुख समस्याओं और उनके समाधान की सही समझ विकसित करने के साथ ही पाठक में एक अच्छे समाज के निर्माण के लिए सक्रिय होने की प्रेरणा भी जगा सके।

पी.सी. तिवारी ने कहा कि समाज को दिशा तो अन्ततः राजनीति ही देती है। उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद कितनी जमीन हमसे छिन गई, हमें इसके बारे में भी बात करनी पड़ेगी। अपनी कृषि भूमि, अपनी जमीन बचाने की बात मुख्य है। उन्होंने सवाल उठाया कि सरकारों द्वारा उद्योगपतियों व पूँजीपतियों को जिस तरह यहाँ की जमीन को कौड़ी के भाव दे दिए जाने का सिलसिला जारी है, क्या इससे हमारा सरोकार नहीं होना चाहिए। अपनी बोली-भाषा बचाने के लिए अपना परिवेश बचाना चाहिए, अपनी जमीन बचानी चाहिए, क्योंकि हमारा परिवेश बचेगा तो हमारी भाषा भी बचेगी। अतः भाषा के संकट पर सोचते हुए इसके राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक अन्तर्सम्बन्ध पर भी अवश्य विचार किया जाना चाहिए। जब तक हम गाँवों को अधिकार नहीं देंगे, विकेन्द्रित व्यवस्था नहीं बनाएंगे, तक तक मुकम्मल तौर पर भाषा के संकट को भी हल नहीं किया जा सकता।

सम्‍मेलन में यह भी एक महत्वपूर्ण बात रही कि सरकारों द्वारा कुमाउनी भाषा के विकास और इसके रचनाकारों की माँगों के संदर्भ में अपेक्षित सहयोग न किए जाने से नाराज होकर, ताराचन्द्र त्रिपाठी जी के सुझाव पर, सम्मेलन में उपस्थित लोगों ने समिति द्वारा कसारदेवी में निर्मित किए जा रहे ‘कुमाउनी भाषा संस्थान’ हेतु लगभग दो लाख रुप जमा किए जाने की घोषणा की।

ज्ञातव्य है कि‍  ‘जब भाषा बचेगी, आगे बढ़ेगी तभी हमारी संस्कृति भी बचेगी, वह भी आगे बढ़ेगी’ इसी सोच के तहत संस्कृति को बचाने के लिए भाषा को बचाना जरूरी समझते हुए सन् 2004 में ‘कुमाऊंनी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति प्रचार समिति’ कसारदेवी, अल्मोड़ा के नाम से संस्था का गठन कराया गया था। फिर भाषा के विकास के लिए उसे बोलना, उसमें लिखना-पढ़ना जरूरी समझते हुए लिखने-पढ़ने का माहौल बनाने के लिए तथा कुमाउनी भाषा में साहित्य की हर विधा में लेखन को बढ़ावा देने के लिए नवम्बर, 2008 से कुमाउनी मासिक पत्रिका ‘पहरू’ का प्रकाशन शुरू किया गया। तब से यह पत्रिका लगातार नियमित रूप से निकल रही है और अक्टूबर 2016 तक इसके 96 अंक प्रकाशित हो चुके हैं। इनमें 600 कुमाउनी रचनाकारों की रचनाएँ प्रकाशि‍त हो चुकी हैं और वर्तमान में लगभग 800 रचनाकार कुमाउनी में लिख रहे हैं।

संस्था द्वारा कहानी, कविता, बाल कविता, जनगीत, लोकगीत, जीवनी, यात्रावृत्तांत, उपन्यास, नाटक, देवगाथा आदि विधाओं की 29 कुमाउनी पुस्तकें भी प्रकाशित की जा चुकी हैं।

रेनबो में दिव्यांग बच्चों ने बि‍खेरे इंद्रधनुषी रंग

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नोएडा : कोठारी इंटरनेशनल स्कूल में दिव्यांग बच्चों को प्रोत्साहित करने व मुख्यधारा के विद्यालयों में दिव्यांग बच्चों की भागीदारी को बढ़ाने के लिए दो दिवसीय कार्यक्रम रेनबो-2016 का आयोजन किया गया। इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य दिव्यांग बच्चों को ऐसा मंच उपलब्ध कराना था, जहाँ वे अपने कौशल का प्रदर्शन कर सकें। इस कार्यक्रम में पहले दिन 8 दिसंबर को एकल गीत, ड्राइंग कलरिंग, कोलाज मेकिंग तथा पेंटिंग प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। इन प्रतियोगिताओं में दिल्ली-एनसीआर के 15 विद्यालयों के 67 बच्चों ने भागीदारी की। बच्चों ने अपने सुरों से एक नए इन्द्रधनुष की रचना कर दी।

चार घंटे चले इस कार्यक्रम में साक्षी एनजीओ की प्रबंधक-संस्थापक समाज सेविका डॉक्टर मृदुला टंडन तथा रोड सेफ्टी इमरजेंसी के प्रबंधक, मीडियाकर्मी व चर्चित शायर सुबोध लाल ने अपनी उपस्तिथि से बच्चों का मनोबल बढ़ाया।

कार्यक्रम में निर्णायक की भूमिका के लिए वरिष्ठ रंगकर्मी, चित्रकार व मूर्तिकार पंकज मोहन अग्रवाल तथा युवा चित्रकार सहर रज़ा को आमंत्रि‍त किया गया।  गीत प्रतियिगिता में निर्णायक की भूमिका ख्यातिलब्ध ग़ज़ल गायक उस्ताद शकील अहमद खान तथा सितार वादक व ग़ज़ल गायक अकील अहमद ने निभाई। बच्चों की बनायीं कलाकृतियां देख सहर बरबस ही कह पड़ीं कि‍ यदि ऐसा विद्यालय उन्हें मिले तो वे दोबारा छात्र जीवन में लौटने को तैयार हैं।

बच्चों के सुरों से शकील साहब इतना प्रभावित हुए कि‍ बजाय सम्मान लेने के वे बच्चों से सीधा मुखातिब हुए और कहा कि‍ जो भी मंच की चौखट पर चढ़ गया, वो हर बच्चा विजेता है।

कार्यक्रम का समापन पुरस्कार वितरण से किया गया। ड्राइंग-कलरिंग में रयान इंटरनेशनल स्कूल नोएडा, बाल भारती स्कूल नोएडा, सेठ आनंदराम जयपुरिया स्कूल को क्रमशः पहला, दूसरा और तीसरा स्थान मिला।  कोलाज मेकिंग में रयान इंटरनेशनल स्कूल नोएडा, डीएलफ स्कूल नोएडा तथा खेतान स्कूल नोएडा को क्रमशः पहला, दूसरा और तीसरा स्थान मि‍ला।

पेंटिंग में रयान इंटरनेशनल स्कूल नोएडा, कैम्ब्रिज स्कूल साहिबाबाद, खेतान स्कूल नोएडा को  क्रमशः  पहला,  दूसरा व तीसरा स्थान मि‍ला।

मन के गीत में रयान इंटरनेशनल स्कूल नोएडा, डीपीएस आरकेपुरम, डीएलएफ़ साहिबाबाद को क्रमशः पहला, दूसरा तथा तीसरा स्थान प्राप्त हुआ।

कार्यक्रम में विद्यालय की प्रधानाध्यापिका मंजू गुप्ता, उपप्रधानाचार्य जसवीर चौधरी,  हेडमिस्ट्रेस नीरजा चैथले तथा समन्वयक रुचि बिष्ट ने निर्णायकमंडल व अतिथियों को सम्मानित किया।

धन्यवाद ज्ञापन में प्रधानाध्यापिका मंजू गुप्ता ने इस कार्यक्रम को नियमित रूप से प्रतिवर्ष मनाने की योजना को साझा किया।

कार्यक्रम के दूसरे दिन विशेष शिक्षा से जुड़े पेशेवरों को एक मंच पर लाकर उनके द्वारा व्यवहार में लायी जा रही सर्वोत्तम विधियों तथा प्रक्रियाओं पर चर्चा की गई। दूसरे दिन की सेमीनार में 17 पेशेवरों ने भागीदारी की और आने वाली संभावनाओं और चुनौतियों पर चर्चा की।  सेमीनार में अमर ज्योति स्कूल की प्रधानाध्यापिका सम्मा तुली तथा प्रकृति स्कूल की संस्थापिका प्रियंका भाबू भी उपस्तिथि रहीं। सेमीनार  की अध्यक्षता जाने-माने बाल मनोचिकित्‍सक डॉक्टर नागपाल ने की। प्रधानाध्यापिका ने अंत में घोषणा की कि‍ प्रत्येक वर्ष 9 दिसम्बर को इसी तरह सेमीनार का आयोजन किया जाएगा।

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दून लिटरेचर फेस्टिवल 24-25 दिसम्बर को

नई दि‍ल्ली : टी.एस. इलियट ने कहा था, ‘जो लोग अपनी साहित्यिक विरासत की चिन्ता करना छोड़ देते हैं, वे जंगली तथा बर्बर हो जाते हैं और जो लोग साहित्य-सृजन करना छोड़ देते हैं, वो विचार और संवेदनशीलता को खो देते हैं।’ हिन्दी के क्षेत्र में यह संकट साफ़-साफ़ नजर आने लगा है। यहाँ के लोगों के जीवन की प्राथमिकता में बच्चों का कामयाब भविष्य, मकान तथा नये दौर के सुख-साधन तो हैं, लेकिन साहित्य, कला तथा संस्कृति से वे दूर होते जा रहे हैं। आबादी का एक बड़ा हिस्सा न तो अपनी साहित्यिक विरासत से परिचित होना चाहता है और न ही समकालीन सृजन से ही जुड़ना चाहता है। इस कारण न उसके पास कोई विचार है, न कोई आदर्श! न उसकी कोई प्रतिबद्धता रह गई है, न संघर्ष का माद्दा! सोशल मीडिया तथा स्मार्ट फ़ोन ने सारी दुनिया को लोगों की मुट्ठी में समेट दिया है। ऐसे में व्यक्ति भयानक तरीक़े से व्यस्त हो चुका है। वह त्वरित सूचनाओं के प्रभाव में है।
सोशल मीडिया के रूप में आया यह सामाजिक बदलाव विज्ञान और तकनीक से जुड़े वैश्विक परिवर्तन का एक चरण है जो समाज को परिवर्तित कर रहा है। आभासी दुनिया को अपने जीवन के अभिन्न अंग बना चुकी युवा पीढ़ी समाज की मुख्यधारा से किस प्रकार कट रही है, इसे हम अपने परिवेश को देखकर समझ सकते हैं। यद्यपि यह भी सत्य है कि साहित्य, सरोकार और संघर्ष की चर्चा के मंच के रूप में भी सोशल मीडिया का प्रयोग हो रहा है। मध्य-पूर्व में हुए जनसंघर्षों में सोशल मीडिया की भूमिका को पूरी दुनिया ने देखा है। शेष दुनिया की भाँति भारत भी तेज़ रफ़्तार से बदलाव के साथ क़दमताल कर रहा है। इसी क़दमताल के बीच परम्परावादी भारत और आधुनिक भारत के विरोधाभास भी हैं। भारत एक बहुसांस्कृतिक और बहुभाषी देश है। हमारी जीवनशैली, लोकपरम्पराओं, धार्मिक प्रथाओं और बहुभाषावाद में यह स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। सामाजिक मान्यता, प्रथा, इतिहास और संस्कृति जैसे तत्व मिलकर लोक परम्पराओं को समृद्ध करते हैं। लेकिन थ्री डायमेंसनल (3डी) के इस युग में घर के भीतर और बाहर लोक-परम्पराओं के सकारात्मक चिह्न निरन्तर धूमिल हो रहे हैं।
देवी-देवताओं के पूजन की प्राचीन लोक-प्रथाओं से लेकर सार्वजनिक समारोहों तथा मेलों का स्वरूप भी बदल गया है। विवाह समारोहों में गाये जाने वाले प्राचीन गीत अब लुप्तप्राय हो गये हैं। इसी प्रकार दादी-नानी के क़िस्से और कहानियाँ भी अब केवल चर्चाओं के अंग बनकर रह गये हैं। कुल मिलाकर दुनिया के इस बदलाव ने लोक-परम्पराओं को न सिर्फ कड़ी चुनौती दी है, बल्कि शहरीकरण और एकल परिवारों के मौजूदा ढाँचे ने सामाजिक व्यवस्था के इन परम्परागत तत्वों को समाप्त कर दिया है। सामाजिक व्यवस्था में आ चुका यह बदलाव हमें कला और साहित्य में भी स्पष्ट हो गया है। कहानी और कविता का कथ्य भी भूमंडलीकरण के साथ ही बदल रहा है। इस बदलाव को हम चाय और पान के नुक्कड़ों के गायब हो जाने के रूप में भी महसूस कर सकते हैं, जहाँ अपनी बात कहने और सुनने को लोग आया करते थे। कहानी अब पढ़ने से ज़्यादा देखने और सुनने के लिए लिखी जा रही है, ऐसा प्रतीत होता है। यह वही दौर है जहाँ फिल्मों और धारावाहिकों की तरह ही कहानियों से भी गाँव के गँवई पात्र गायब हो गए हैं।
इन सब स्थितियों-परिस्थितियों के बीच पहाड़ हैं और पहाड़ के रचनाकार हैं। पहाड़ से जुड़ी उनकी चिंतायें भी हैं। रोज़ी-रोज़गार के लिए टूट चुके पहाड़ के परिवार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और संचार के सवाल भी हैं। इनके सबके केन्द्र में कहीं वह लोक भी है जिसने दुनिया को मौजूदा स्वरूप प्रदान किया है। लोक के गीत, लोक की कथाओं और लोक की गाथाओं के बिना साहित्य के मौजूदा ढाँचे की चर्चा कैसे संभव है। इसी प्रकार दलित, स्त्री आदि मौजूदा दशकों के विमर्श लगातार जरूरी बने हुए हैं। इन सबके बीच भारत की बहुसांस्कृतिक, बहुभाषी, बहुलवादी व समृद्ध लोकपरम्परा को कला और साहित्य के माध्यम से समझने व समझाने के साथ ही साझा करने के प्रयास के रूप में ‘समय साक्ष्य’ (प्रकाशन) की ओर से क्रि‍श्चयन रि‍ट्रीट एंड स्टडी सेंटर, राजपुर रोड, देहरादून में दून लिटरेचर फेस्टिवल (डीएलएफ-2016) का आयोजन में किया जा रहा है। इस आयोजन की परिकल्पना निम्न उद्देश्यों के साथ की गई है-

-हिन्दी साहित्य के मौजूदा परिदृश्य पर विमर्श।
-पुस्तक लोकार्पण, पुस्तक चर्चा तथा पुस्तक प्रदर्शनी।
-लोक-साहित्य व लोक-कला की मौजूदा स्थिति पर चर्चा।
-साहित्यकारों, लोक कलाकारों, शिल्पियों, संस्थाओं, समूहों व पाठकों का एक मंच पर समागम।
-आंचलिक, स्थानीय व लोक-परम्पराओं से जुड़े रचनाकारों का एक मंच पर एकत्रीकरण।
-कार्यक्रम में साहित्य व कला से जुड़ी प्रदर्शनी, फिल्म स्क्रीनिंग आदि का आयोजन।

कार्यक्रम

प्रथम दिवस 24 दिसम्बर 2016
पंजीकरण 9-10 बजे
उद्घाटन सत्र 10 बजे 11.00 बजे
हिन्दी साहित्य का वर्तमान परिदृश्य और नया मीडिया
संबोधनः पुरुषोत्तम अग्रवाल, बटरोही
संयोजकः डॉ. सुशील उपाध्याय

प्रथम सत्र 11.00 बजे 1.00 बजे तक 
भूमण्डलीकरण और हिन्दी कहानी
(सन्दर्भः जाति, धर्म, स्त्री, साम्प्रदायिकता, गांव, बाजार, नया पाठ और तकनीक)
अध्यक्षः सुभाष पंत
बीज भाषणः जितेन ठाकुर
सहभागः कॉन्ता रॉय, मनीषा कुलश्रेष्ठ, दिव्य प्रकाश दुबे, अनिल कार्की
संयोजकः दिनेश कर्नाटक
खुली चर्चा/प्रश्नोत्तर
मध्याह्न भोजन 1.00-2.00 बजे

द्वितीय सत्र 2.00-4.00 बजे
हिन्दी कविताः चेतना और पक्षधरता
(सन्दर्भः खेत, किसान, गांव, शहर, पहाड़, घर, परिवार और समाज आदि)
अध्यक्षः मंगलेश डबराल
बीज भाषणः लीलाधर जगूड़ी
सहभागः राजेश सकलानी, शैलेय, प्रकृति करगेती, आशीष मिश्र
संयोजकः डॉ. अरुण देव
चाय: कार्यक्रम में ही खुली चर्चा/प्रश्नोत्तर

तृतीय सत्र 4.00-6.00 बजे
स्त्री और आधुनिकता
अध्यक्षः सुमन केसरी
बीज भाषणः शीबा असलम
मंच पर: सुजाता तेवतिया, सन्ध्या निवेदिता, निधि नित्या
संयोजकः मनीषा पांडे
खुली चर्चा/प्रश्नोत्तर
भोजन 8-9 बजे रात्रि

चतुर्थ सत्र: 9 बजे से 11 बजे
कवि और कविता
अध्यक्षः डॉ. अतुल शर्मा
आमंत्रित कविः स्वाति मेलकानी, डॉ. माया गोला, केशव तिवारी, चेतन क्रान्ति, डॉ. राम विनय सिंह, अंबर खरबंदा, मुनीश चन्द्र सक्सेना, राजेश आनन्द ‘असीर’, नदीम बर्नी, जिया नहटौरी, शादाब अली, रेखा चमोली, नदीम बिस्मिल, प्रतिभा कटियार, सुभाष तराण।
संयोजकः डॉ. प्रमोद भारतीय

द्वितीय दिवस, 25 दिसम्बर 2016

प्रथम सत्र 10.00-12.00 बजे
लोक साहित्य: अतीत, वर्तमान और भविष्य
(सन्दर्भः लोकगीत, लोककथाएं, लोकगाथाएं, वीरगाथाएं, कहावतें व किं‍वदंतियां)
अध्यक्षः डॉ. दाताराम पुरोहित
बीज भाषणः डॉ. प्रभा पंत
मंच पर: डॉ. प्रभात उप्रेती, महाबीर रवांल्टा, डॉ. शेर सिंह पांगती
संयोजक: डॉ. उमेश चमोला
खुली चर्चा/प्रश्नोत्तर
चाय: कार्यक्रम में ही

द्वितीय सत्र 12.00-2.00 
बाल साहित्यः चुनौतियां और संभावनाएं
(सन्दर्भः परिवार, समाज, संस्कृति, स्कूल, घर, किताबें, बस्ता, पुस्तकालय, वाचलनालय, विकास, परिवर्तन आदि)
अध्यक्षः उदय किरौला
बीज भाषणः राजेश उत्साही
मंच परः डॉ. दिनेश चमोला, मुकेश नौटियाल, डॉ. शीशपाल, डॉ. उमेश चन्द्र सिरतवारी
संयोजकः मनोहर चमोली ‘मनु’
खुली चर्चा/प्रश्नोत्तर

समानान्तर
द्वितीय सत्र 12.00-2.00
बाजार, मीडिया और लोकतंत्र
अध्यक्षः कुशल कोठियाल
बीज भाषणः सुन्दर चन्द्र ठाकुर
मंच परः अनुपम त्रिवेदी, पवन लाल चंद, लक्ष्मी पंत
संयोजकः भूपेन सिंह
खुली चर्चा/प्रश्नोत्तर
मध्याहन भोजन 2.00-2.30

तृतीय सत्र 2.30- 4.30 बजे
कथेतर साहित्यः समय और समाज
(यात्रा, संस्मरण, डायरी, पत्र, आत्मकथा, विज्ञान लेखन आदि पर संवाद)
अध्यक्षः देवेन्‍द्र मेवाड़ी
बीज भाषण- डॉ. शेखर पाठक
मंच परः तापस चक्रवर्ती, एस.पी. सेमवाल, आकांक्षा पारे कासिव
संयोजकः डॉ. सुशील उपाध्याय

चतुर्थ सत्र 4.30-6.30 बजे 
आंचलिक साहित्यः चुनौतियाँ एवं संभावनाएं
अध्यक्षः डॉ. अचलानंद जखमोला
बीज भाषणः डॉ. देब सिंह पोखरिया
मंच पर: मदन मोहन डुकलाण, नेत्र सिंह असवाल, डॉ. हयात सिंह रावत, रमाकांत बैंजवाल
संयोजकः गिरीश सुन्दरियाल

पंचम सत्र-6.30- 7.30 
विभिन्न पुस्तकों पर चर्चा
व्यावहारिक वेदान्त: सरला देबी, समीक्षकः शशि भूषण बडोनी
साहिर लुधियानवीः मेरे गीत तुम्हारेः सुनील भट्ट, समीक्षकः- मुकेश नौटियाल
मैकाले का जिन्न तथा अन्य कहानियां: दिनेश कर्नाटक, समीक्षकः- भाष्कर उप्रेती
खुली चर्चा/चाय
भोजनः  8-9.00 बजे

छठा सत्र 9-11 बजे 
समापन

अंधेरे वक्त में रोशनी के लिए ज्ञान-मीमांसा की कुदरती मानवीय प्रवृत्ति को बढ़ावा देना होगा: लाल्टू  

कार्यक्रम में अपने वि‍चार रखते लाल्टू।

कार्यक्रम में अपने वि‍चार रखते लाल्टू।

नई दिल्ली: ‘ज्ञान की जमीन’ यानी मनुष्य को वह कहां से मिलता है और जो कुछ वह जानता है, जिसे सच मानता है, वह किस हद तक ठोस सचाई है, इस बारे में कवि-वैज्ञानिक और पत्रकार लाल्टू ने गांधी शांति प्रतिष्ठान में ‘ज्ञान की जमीन और जमीनी ज्ञान: अंधेरे वक्त में रोशनी की तलाश’ विषय पर 20 नवंबर 2016 को आयोजित पांचवे कुबेर दत्त स्मृति व्याख्यान में अपने विचार रखे।

लाल्टू ने कहा कि आदतन लोग उन बातों को नहीं जानना चाहते जो उनकी मान्यताओं से संगति नहीं रखती हैं। इसलिए उनकी हर जानकारी के साथ उनकी पृष्ठभूमि और पूर्वाग्रह जुड़े होते हैं। उदाहरण के तौर पर गुजरात और मानव विकास के आंकड़े का संदर्भ देखा जा सकता है। भाजपा के चुनाव प्रचार के लिए लगभग एक दशक से यह झूठ फैलाया गया कि गुजरात देश का सबसे विकसित राज्य है, लेकिन तथ्य यह है कि मानव विकास के आंकड़े में गुजरात पिछले तीन दश कों से ग्यारहवें नंबर पर रुका हुआ है। भक्तों को यह जानकारी नहीं चाहिए, इसलिए वे इसे कभी नहीं देखते हैं।
लाल्टू ने सवाल उठाया कि जो कुछ प्रत्यक्ष दिखता है, वही सच होगा यह मान लेना स्वाभाविक है, पर ऐसा क्या है, जो दिखने से छूट गया ? अगर वह दिख जाए तो क्या जो पहले दिख रहा था, उस बारे में हमारा निर्णय पहले जैसा ही रह जाएगा ? उन्होंने कहा कि सामान्य समझ ज्ञान की बुनियाद नहीं होती, वह देशकाल पर निर्भर होती है और अक्सर विरोधाभासों से भरी होती है। उन्होंने कहा कि कि ‘हमें ज्ञान है’ का अहसास एक तरह का अहं पैदा करता है। यह जान लेना कि हम इस अहंकार से ग्रस्त हो सकते हैं, काफी नहीं होता। इस अहंकार के नतीजे भयंकर होते हैं। लाल्टू ने सवाल उठाया कि जिन्हें अज्ञानी मानकर हम अनजाने में दरकिनार कर रहे होते हैं, वे किसके दर जा पहुंचते हैं? क्या वे किसी शैतान के गुलाम हो जा सकते हैं? उन्हें वह समझ क्यों नहीं हासिल हासिल होती है, जो हममें है? ये कौन हैं जो ‘झूठ ही सच है’ का नारा लगाते हुए हमें दबोच रहे हैं?

भारत और अमेरिका की हाल की राजनैतिक घटनाएं ऐसे सवाल खड़ी करती हैं। लाल्टू ने कहा कि जिस अंधेरे दौर से हम गुजर रहे हैं उसमें कुदरती तौर पर हमें ज्ञान-मीमांसा की जो काबिलियत मिली है, उसको बढ़ावा देना होगा। इस अँधेरे दौर में हम रोशनी की तलाश कैसे करें, यह हमारे लिए अहम सवाल है। मनुष्य तर्क और भावनात्मकता के साथ भाषा और एहसासों के अर्थ ढूंढ सकता है। इसे बचाए रखना इस वक्त की सबसे बड़ी लड़ाई है।
व्याख्यान के बाद श्रोताओं के साथ लाल्टू का विचारोत्तेजक संवाद हुआ। शम्भु यादव ने मौजूदा वैज्ञानिक विकास और मार्क्सवाद के अंतर्संबंधों पर सवाल किया। मृत्युंजय ने ज्ञान के माध्यमों के लगातार अप्रामाणिक होते जाने का सवाल उठाया। वन्दना ने ज्ञान की प्रक्रिया में ‘एक्सपोजर’ का सवाल उठाया। आस्था और भ्रम के सन्दर्भ का सवाल महेश महर्षि ने पूछा। मंगलेश डबराल ने ज्ञान के सामान्यीकरण का प्रश्न उठाते हुए बहस को और जीवंत बनाया। इसके पहले कवि-वैज्ञानिक लाल्टू ने कुबेर दत्त के गद्य की पहली पुस्तक ‘एक पाठक के नोट्स’, कवि कृष्ण कल्पित ने जयनारायण द्वारा सम्पादित  ‘कल के लिए’ के कुबेर दत्त विशेषांक का और वरिष्ठ कवि विष्णुचंद्र शर्मा ने कुबेर दत्त की बिल्लियों और बिल्लियों पर लिखी गई देश-दुनिया की कविताओं पर आधारित टेबल कैलेण्डर का लोकार्पण किया। इस मौके पर वरिष्ठ कवि रामकुमार कृषक ने कुबेर दत्त पर केंद्रित कविता पढी, ‘कल के लिए’ के सम्पादक जयनारायण का ऑडियो सन्देश सुनाया गया। डॉ. बलदेव बंशी ने कुबेर जी से जुड़े संस्मरण सुनाए। कृष्ण कल्पित ने कहा कि दुनिया में शायद ही कुबेर जी जैसा कोई दूसरा प्रसारक होगा, जिसने 30 साल तक कला-साहित्य पर उत्कृष्ट कार्यक्रम बनाया हो। उन्होंने उनको उच्च कोटि के प्रसारक और संवेदनशील कवि के रूप में याद किया। युवा आलोचक गोपाल प्रधान ने उन्हें अत्याधुनिक दृष्टि वाला और भारतीय समाज में गहरे धंसा जनसांस्कृतिक बुद्धिजीवी बताया।
आयोजन की अध्यक्षता वरिष्ठ कवि विष्णुचंद्र शर्मा ने की। उन्होंने कहा कि हम किससे संवाद करते हैं, इस पर विचार करना बेहद जरूरी है। हमारे समय की विडम्बना यह है कि संवाद के भीतर से जनता गायब होती जा रही है जबकि इस दौर में दोस्तों की खोज बेहद जरूरी है। कार्यक्रम का संचालन सुधीर सुमन ने किया। कार्यक्रम के आरम्भ में रेल दुर्घटना और नोटबंदी के कारण मारे गए आम लोगों के शोक में एक मिनट का मौन रखा गया। उसके बाद संगवारी के कपिल शर्मा, अतुल और देवव्रत ने हबीब जालिब की नज़्म ‘क्या लिखना’ सुनाया। धन्यवाद ज्ञापन दूरदर्शन आर्काइव्स की पूर्व निदेशक और सुप्रसिद्ध नृत्य निर्देशक कमलिनी दत्त ने किया।

इस अवसर पर कवि मंगलेश डबराल, मृत्यंजय, कहानीकार महेश दर्पण, योगेन्द्र आहूजा, चर्चित चित्रकार अशोक भौमिक, जसम के महासचिव आलोचक प्रणय कृष्ण, आशुतोष कुमार, बजरंग बिहारी तिवारी, कवितेंद्र, पत्रकार आनंद प्रधान, पंकज श्रीवास्तव, रंगकर्मी लोकेश, राजेशचंद्र, फ़िल्मकार संजय जोशी, शिक्षिका उमा गुप्ता, शुभेंदु घोष, भारतेंदु मिश्र, श्याम सुशील, वासुदेवन, मालती गुप्ता, जितेन्द्र, किरण शाहीन, बृजेश, मनीषा, वंदना, तूलिका, सोमदत्त शर्मा, रविदत्त शर्मा, अरुणाभ सौरभ, इरेंद्र, रामनिवास, रोहित, दिनेश, अनुपम आदि मौजूद थे।

 (जसम दिल्ली की ओर से रामनरेश द्वारा जारी)

‘अभिरंग’ नाटक प्रतियोगिता में प्रथम

नाटक 'जनता पागल हो गई है' का एक दृश्य।

नाटक ‘जनता पागल हो गई है’ का एक दृश्य।

नई दिल्ली : भारत सरकार के प्रतिष्‍ठान भारत कंटेनर निगम लिमिटेड की ओर से  आयोजित  सतर्कता जागरूकता सप्ताह-2016 के अन्तर्गत हुई नाट्य प्रतियोगिता में हिन्दू कॉलेज की नाट्य संस्था ‘अभिरंग’ ने पहला स्थान प्राप्‍त किया। दिल्ली विश्वविद्यालय के श्रीराम कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स में हुई इस प्रतियोगिता में छह कॉलेजों श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स, श्री अरबिंदो कॉलेज, रामलाल आनंद कॉलेज, आत्माराम सनातन धर्म कॉलेज, सेंट स्टीफंस कॉलेज और हिंदू कॉलेज ने भाग लिया था। ‘अभिरंग’ ने प्रसिद्ध नाटककार शिवराम के चर्चित और बहुमंचित नाटक ‘जनता पागल हो गई है’  के लिए पच्चीस हजार रुपये का पहला पुरस्कार जीता। नाटक के निर्देशक युवा रंगकर्मी और शिवराम की नाट्य मंडली के सदस्य आशीष मोदी थे। ‘अभिरंग’ के परामर्शदाता डॉ. पल्लव ने बताया कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध सतर्कता के निमित्त आयोजित इस प्रतियोगिता में शिवराम के नाटक में पागल की भूमिका में आशुतोष  कुमार शुक्ल, जनता की भूमिका में पियूष पुष्पम, नेता की भूमिका में शिवानी, पूंजीपति की भूमिका में पूजा, पुलिस अधिकारी की भूमिका में स्नेहदीप, और सिपाहियों की भूमिका में राहुल, दीपिका, जागृति ने अपने जीवंत अभिनय से दर्शकों  को खासा प्रभावित किया। नेपथ्य सहयोग में चंचल सचान और अन्य विद्यार्थी थे।

सभागार में भारत कंटेनर निगम लिमिटेड के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक, मुख्य सतर्कता अधिकारी, निदेशक, प्रख्यात जूरी सदस्यों, कॉनकोर के अधिकारियों, मीडिया और शिक्षा बिरादरी के प्रतिनिधि उपस्थित थे।

निर्णायक मंडल में श्री रॉबिन आईपीएस (दिल्ली पुलिस), श्री आलोक शुक्ला (थिएटर अभिनेता, लेखक, निर्देशक और पत्रकार) और श्रीमती रत्ना बाली कांत (मूर्तिकार और प्रदर्शन कलाकार) थे। हिन्दू कालेज की प्राचार्या डॉ अंजू श्रीवास्तव ने ‘अभिरंग’ के नाट्य मंडल को इस उपलब्धि के लिए बधाई दी है।

प्रस्तुति‍-आशुतोष कुमार शुक्ल, संयोजक, अभिरंग, हिन्दू कॉलेज

हिंदी अकादमी में सरकारी हस्तक्षेप बंद हो!

Hindi Academy

नई दि‍ल्ली : हिंदी अकादमी द्वारा हिंदी दिवस के अवसर पर ‘भाषादूत सम्मान’ देने का पूरा आयोजन जिस तरह एक प्रहसन में बदल गया, वह दुर्भाग्यपूर्ण है। चिंताजनक रूप से हिन्दी में सम्मानों का सम्मान लगातार घटता गया है और उस सिलसिले में जुड़ने वाली सबसे ताज़ा कड़ी हिन्दी अकादमी का यह आयोजन है।

हिन्दी अकादमी ने कुछ दिन पहले ब्लॉगिंग एवं अन्य माध्यमों से जुड़े नौ लेखकों के नामों का चयन किया और उन्हें ईमेल से सूचना दी गई कि 14 सितम्बर को दिल्ली के हिंदी भवन में उन्हें सम्मानित किया जाएगा। उसके दो-तीन दिन बाद ही गुज़रे सोमवार को उनमें से तीन लेखकों– अरुणदेव (समालोचन), संतोष चतुर्वेदी (पहली बार) और अशोक कुमार पाण्डेय (असुविधा), को ईमेल से सूचित किया गया कि उन्हें ‘त्रुटिवश’ इस सम्मान का निमंत्रण मिल गया था, वे पिछले पत्र को ‘मानवीय भूल’ मानकर उसकी अनदेखी करें। बताया जा रहा है कि सम्मानित होने वाले लेखकों की सूची को अंतिम समय में मंत्रालय के स्तर बदला गया। सम्मान देने के निर्णय को संचालन समिति में विचार-विमर्श के लिए न रखने और जो भी चयन हुआ था, उसमें संस्कृति मंत्री द्वारा मनमाने बदलाव किये जाने के विरोध में अकादमी की संचालन समिति से श्री ओम थानवी ने इस्तीफा भी दिया है।

हिंदी अकादमी दिल्ली सरकार के कला एवं संस्कृति मंत्रालय के अधीन एक स्वायत्तशासी संस्था है। ‘दिल्ली में हिंदी भाषा, साहित्य और संस्कृति के परिवर्धन और प्रचार-प्रसार’ के लिए बनी इस संस्था की जो संचालन समिति हिंदी अकादमी के अध्यक्ष (मुख्यमंत्री, दिल्ली सरकार) द्वारा दो साल की अवधि के लिए गठित की जाती है, वह अगर स्वतंत्र रूप से काम करने में सक्षम न हो तो ऐसी संस्थाओं का कोई मतलब नहीं है। मसला सिर्फ़ पुरस्कारों और सम्मानों का नहीं। किसी भी तरह की गतिविधि के मामले में स्वायत्तता और पारदर्शिता ऐसी संस्थाओं के उपयोगी एवं उत्पादक बन पाने/बने रहने की बुनियादी शर्त है। वह न होने की स्थिति में वे जिनके ‘परिवर्धन और प्रचार-प्रसार’ के लिए गठित की गयी हैं, उनका अहित करने वाले तंत्र में तब्दील हो जाती हैं। इसलिए हम इस तरह के सरकारी हस्तक्षेप की कठोर शब्दों में निंदा करते हैं। हम आम आदमी पार्टी की सरकार से यह मांग करते हैं कि जिन साहित्यकारों को उसने अकादमी का संचालन करने के लिए चुना है, उन्हें अपने विवेक से काम करने दे और अकादमी की स्वायत्तता का सम्मान करे। साथ ही, जनवादी लेखक संघ हिंदी अकादमी के लेखक पदाधिकारियों से भी यह उम्मीद करता है कि वे इस संस्था की स्वायत्तता की रक्षा को अपना ज़रूरी दायित्व मानेंगे और अनपेक्षित सरकारी हस्तक्षेप को अस्वीकार करेंगे। वे हिंदी में लिखने वाले लेखक-समाज के प्रतिनिधि के रूप में अपनी ज़िम्मेदार भूमिका को समझें, ऐसी उनसे उम्मीद की जाती है।

(मुरली मनोहर प्रसाद सिंह (महासचिव) और संजीव कुमार (उप-महासचिव) की ओर से 16.09.2016 को जारी बयान)

बच्चो ने बनाए मॉडल और लगाया बाल विज्ञान मेला

मॉडल बनाते बच्चे

मॉडल बनाते बच्चे

अल्मोड़ा : अलायन्स फॉर साइंस प्रोग्राम के तहत रामगंगा वेली पब्लिक स्कूल मासी अल्मोड़ा में 7-10 सितम्बर 2016 तक मॉडल मेकिंग वर्कशॉप तथा बाल विज्ञान मेले का आयोजन किया गया। इस मेले में 30 मॉडल को लिया गया। मॉडल मेकिंग के लिए 8वीं व 9वीं कक्षा के 36 छात्रों को मेले के लिए चुना गया था।

मॉडल मेकिंग

7 व 8 सितम्बर  को बाल विज्ञान मेले के लिए चयनित मॉडल बनाए गए। इसके लिए 36 छात्रों को 8 समूह में बांटा गया। सभी ग्रुप ने 3-3 मॉडल्स बनाए। जब भी कोई मॉडल बनता तो उसकी कार्यप्रणाली व मॉडल से पुष्ट होने वाले नियम पर भी चर्चा की जाती थी। दो दिनों में सभी मॉडल्स बना लिए गए। मॉडल मेकिंग के दौरान बच्चे बहुत तल्लीन थे। बच्चों से हुई बातचीत से पता लगा कि उन्होंने ऐसे मॉडल पहली बार बनाए। बच्चे मॉडल की सुन्दरता पर विशेष ध्यान दे रहे थे।

मॉडल्स पर चर्चा

9 सितम्बर को स्थानीय अवकाश की वजह से स्कूल बंद था। इसलिए सभी 36 छात्रों को कुछ समय के लिए बुलाया गया था ताकि मॉडल्स के ऊपर चर्चा की जा सके। यह दिन चर्चा के लिए रखा था। सभी 8 ग्रुप्स को दो बड़े ग्रुप में बांटा गया और अपने-अपने मॉडल्स पर चर्चा के लिए आधा घंटे के समय दिया गया। क्योंकि मॉडल मेकिंग के दौरान भी मॉडल्स पर चर्चा हुई थी,  इसलिए बच्चे अपने मॉडल के लिए घर से तैयारी करके आए थे। ग्रुप चर्चा के दौरान बच्चों को स्वयं यह तय करना था कि उन्हें कौन-सा मॉडल प्रस्तुत करना है। बच्चों ने अपनी रुचि के आधार पर अपने मॉडल चुने। जिस मॉडल में बच्चों को समझने में कठिनाई हो रही थी, उस पर उन्हें मदद की गई। इस दिन बच्चों को अपने मॉडल पर आधारित चार्ट भी बनाने थे। यह काम घर के लिए दिया गया।

बाल विज्ञान मेला

10 सितम्बर को बाल विज्ञान मेले का आयोजन हुआ। इसमें कम्युनिटी इन्वोल्मेंट के लिए स्कूल की आर्ट शिक्षिका द्वारा पोस्टर थे, जिन्हें कस्बे में 4-5 जगहों पर चिपकाया गया था। अभिभावकों को भी सूचित किया गया था। पास के दो राजकीय विद्यालयों के शिक्षक और छात्रों को भी विज्ञान मेला देखने के लिए निमंत्रण भेजा गया था। लगभग 150 से ज्यादा अभिभावक, 30 शिक्षकों तथा 250 छात्रों ने मेले का आनंद लिया। सभी ने इस तरह के प्रयास की सराहना की।

मासी जैसे छोटे से कस्बे में यह पहला आयोजन था, जिसमें बच्चों द्वारा बनाए गए मॉडल्स की प्रदर्शनी लगी थी और बच्चे बिना किसी झिझक के अपने मॉडल के बारे में बता रहे थे। स्कूल के व्यवस्थापक संतोष मासीवाल ने बच्चों को उत्साहित करने के लिए पुरस्कार भी रखे थे। इसके लिए कुछ मापदंडों पर बच्चों को परखा गया। जैसे- मॉडल की कार्यप्रणाली, प्रस्तुतीकरण, बच्चे का आत्मविश्वास, मॉडल की सुन्दरता आदि।

अपने बनाए मॉडल के बारे में बताते बच्चे ।

अपने बनाए मॉडल के बारे में बताते बच्चे ।

प्रस्तुति‍: आशीष कंडपाल

विज्ञान केन्द्रों में प्रेमचंद

कौशाम्बी में आयोजि‍त कार्यक्रम में बच्चों को प्रेमचंद की कहानी सुनाती छात्रा।

कौशाम्बी में आयोजि‍त कार्यक्रम में बच्चोंद को प्रेमचंद की कहानी सुनाती छात्रा।

नई दि‍ल्ली : 31 जुलाई 2016 को कथाकार मुंशी प्रेमचंद की 136वीं जयंती को पहली बार प्रथम विज्ञान केन्द्रों में मनाया गया। पांच केन्द्रों इलाहाबाद, झाल्डा, मसूदा, रालेगांव और सालिपुर में इस अवसर पर कार्यक्रम आयोजि‍त कि‍ए गए। इनमें मुख्यतौर पर सत्यजीत रे द्वारा निर्मित फीचर फिल्म सद्गति व पूस की रात दिखाई गई। बच्चों ने कहानियों का पाठ किया, चित्र बनाए, उनकी प्रदर्शनी लगाई गई और नाटक भी किए। हालांकि यह ऐसा पहला मौका था, जब विज्ञान केन्द्रों को इस तरह का कोई आयोजन कि‍या गया, लेकिन सभी ने पूरे उत्‍साह से कार्यक्रमों में भाग लि‍या। वि‍शेष रूप से बच्‍चे बढ़चढ़कर आयोजन का हि‍स्‍सा बने। इस तरह के कार्यक्रमों की सार्थकता यह है कि‍ इससे विज्ञान के साथ-साथ समाज के प्रति भी बच्चों के सकारात्मक नजरिये को विकसित किया जा सकता है। केंद्रों की कार्यक्रम की रि‍पोर्ट-

झाल्दा कार्यक्रम का आयोजन साइंस सेंटर पर किया गया, जिसमें 43 बच्चों की भागेदारी रही। सभी बच्चों को सत्यभान व केशब ने दो कहानियां पढ़कर सुनाईं। उन पर बात की और उन कहानियों पर चित्र बनाने के लिए कहा। सभी ने चित्र बनाए। बच्चों ने खुद जज करके कुछ बेहतरीन चित्रों को चुना, उन्हें प्रोत्साहित करने के लिए इनाम भी दिए गए। बाकी सभी बच्चों को सांत्वना पुरस्कार दिए गए। बिजली न होने के कारण फिल्म का शो नहीं हो पाया।

सालिपुर  कार्यक्रम का आयोजन साइंस सेंटर में किया गया, जिसमे 12 बच्चों ने हिस्सा लिया। कई बच्चे प्रेमचंद के बारे में नहीं जानते थे। उन्‍हें प्रेमचंद के जीवन और रचनाकर्म के बारे में बताया गया। सद्गति फिल्म दिखाई गई।

मसूदा मसूदा ब्लॉक में दो जगह बाल विज्ञान खोजशाला मसूदा व बाल विज्ञानं खोजशाला नगर में कार्यक्रम का आयोजन हुआ। दोनों जगह कुल 62 (56 बच्चे, 5 अभिभावक व 1 अध्यापक) लोगों ने भागेदारी की। प्रेमचंद की तीन कहानियां पढ़ी गईं। उन पर चर्चा की गई व बच्चों ने चित्र बनाए। इसके अलावा दोनों ही जगह सद्गति फिल्म के शो हुए।

इलाहाबादयहाँ दो जगहों पर कार्यक्रम हुए। पहला कार्यक्रम श्रीमती लखपती देवी जूनियर हाई स्कूल बिरौली बेरुवा कौशाम्बी में हुआ। यहां कुल 127 लोगों ने भागीदारी की। दूसरा कार्यक्रम साइंस सेंटर पर हुआ, जिसमे कुल 27 लोगों की भागीदारी रही। मुंशी जी की कथा और उपन्यास के गँवई परिवेश से जुड़े पात्रों को 22 बच्चों ने अपनी  चित्रकारी से प्रदर्शित किया। इतना ही नहीं बच्चों ने प्रेमचंद की कहानी- ईदगाह, पूस की रात, घास वाली और बलि‍दान आदि कहानियां सुनाईं। इसके अलावा लोगों को सत्यजीत राय द्वारा निर्देशित फिल्म ‘सद्गति एवं पूस की रात’ भी दिखाई गई।

रालेगांव कार्यक्रम का आयोजन ब्रह्मगुप्‍त साइंस सेंटर रालेगांव, बाल विज्ञान शोधिका डोंगरखरडा और बाल विज्ञान शोधिका हिंगनघाट तीन जगह किया गया। इनमें कुल 35 बच्चों की भागीदारी रही।  मुंशी प्रेमचंद के बारे में बच्चों को जानकारी दी गई जिस के आधार पर बच्चों ने चित्र बनाए।

प्रेमचंद और बच्चे

प्रेमचंद की कहानि‍यों पर आधारि‍त बच्चों के बनाए चित्र

प्रेमचंद की कहानि‍यों पर आधारि‍त बच्चों के बनाए चित्र

प्रेमचंद जयंती के अवसर पर जगह-जगह कार्यक्रम हुए और उनमें आम लोगों खासकर बच्‍चों की जो भागेदारी रही, वह सुखद संकेत है। जरूरत इसी बात की है कि‍ हम अपने लेखकों, कलाकारों, वैज्ञानि‍कों, चिंतकों और अन्‍य महापुरुषों के माध्‍यम से लोगों से जुड़ें। अगर हम ऐसा कर पाए, तो तब का समाज, आज से बेहतर ही होगा।

प्रेमचंद जयंती के अवसर पर आयोजि‍त दो कार्यक्रमों में भाग लेने का अवसर लेखक मंच प्रकाशन को भी मि‍ला। 31 जुलाई को वसुंधरा, गाजि‍याबाद स्थि‍त जनसत्ता अपार्टमेंट में जन संस्कृति मंच की ओर से मशाल-ए-प्रेमचंद का आयोजन किया गया। इसमें प्रेमचंद के साहि‍त्‍य और जीवन पर वि‍शेष प्रस्‍तुति‍ हुई। इसके साथ ही प्रेमचंद के सपनों का भारत विषय पर परिचर्चा हुई, प्रेमचंद की कथा पर एक नाट्य प्रस्तुति, मशहूर रंगमंडली ‘संगवारी’  ने जनगीत गाए, सत्यजित राय की फ़िल्म ‘सद्गति’ का प्रदर्शन हुआ और एक छोटा-सा पुस्तक मेला भी लगा। इसमें लेखक मंच प्रकाशन की ओर से भी स्‍टाल लगाया गया। कि‍ताबें देखने और खरीदने में बच्‍चों और बड़ों ने रुचि‍ दि‍खाई।

बुक स्टाेल पर कि‍ताब पढ़ती परी

बुक स्टाेल पर कि‍ताब पढ़ती परी

कि‍ताबों को उलटते-पलटते करीब पांच वर्ष की परी ने चहकते हुए कहा कि‍ आपकी कि‍ताबें तो बहुत अच्‍छी हैं। कुछ क्षण बाद फि‍र बोली- क्‍या में क्या कि‍ताब पढ़ सकती हूं। हमने उसे कुर्सी दे दी। वह कुर्सी पर बैठकर कि‍ताबों के पन्‍ने पलटने लगी। उसकी सहेली तरु ने भी कहा- अंकल, मैं भी कि‍ताब पढ़ सकती हूं। फि‍र दोनों सहेलि‍यां कि‍ताबों के पन्‍ने पलटते रहीं।

इस अवसर पर प्रेमचंद की कहानि‍यों पर आधारि‍त बच्चों के बनाए चित्रों‍ की प्रदर्शनी तो इस आयोजन की एक खास उपलब्‍धि‍ रही। इससे बच्‍चों की कलात्मकता तो सामने आई ही, इस बहाने उनका प्रेमचंद साहि‍त्‍य से भी परि‍चय हुआ।

शाइनिंग स्टार में कार्यक्रम का आनंद लेते बच्चे

शाइनिंग स्टा्र स्कूल में कार्यक्रम का आनंद लेते बच्चे

2 अगस्त को शाइनिंग स्टार स्कूल, रामनगर में प्रेमचंद जयंती के अवसर पर कार्यक्रम का आयोजन कि‍या गया। वहां भी बच्‍चों के बीच जाने के अवसर मि‍ला। बच्‍चों ने प्रेमचंद की कहानी कफन का मंचन कि‍या। बहुत से बच्‍चों ने प्रेमंचद की कहानि‍यां सुनाईं और उनके जीवन और साहि‍त्‍य के बारे में अपने वि‍चार व्‍यक्‍त कि‍ए। दो छात्रों  ने तो प्रेमचंद की दो कहानि‍यों को गढ़वाली और कुमांउनी में रूपांतरि‍त कर सुनाया। स्‍कूल के नि‍देशक डीएस नेगी जी ने बताया कि‍ बच्‍चों ने यह सारी तैयारी तीन-चार दि‍न में ही की है। जि‍न छात्रों  ने गढ़वाली और कुमाउनी में रूपांतरण कि‍या है, उन्‍हें आधे घंटे पहले ही कहानि‍यां दी गई थीं। उन्‍होंने एक बार कहानी को पढ़ा और फि‍र बि‍ना देखे, बि‍ना कि‍सी रूकावट या घबराहट के पूरी कहानी सुना दी।

यहां लगाए गए बुक स्टाल में भी बच्चों ने अपने लि‍ए कि‍ताबें पसंद कीं।

डॉ डीडी पन्त स्मारक बाल विज्ञान खोजशाला, बेरीनाग, उत्तराखंड में 31 जुलाई को प्रेमचंद जयंती समारोह हुआ। यहां हम तो नहीं जा पाए, लेकि‍न यहां की रि‍पोर्ट भी उत्‍साहजनक है।

डॉ डीडी पन्त स्मारक बाल विज्ञान खोजशाला में कार्यक्रम प्रस्तुत करते बच्चे

डॉ डीडी पन्त स्मारक बाल विज्ञान खोजशाला में कार्यक्रम प्रस्तुत करते बच्चे

प्रेमचंद जयंती के अवसर पर 10 से ज्यादा विद्यालयों के करीब 125 बच्चों ने पूरे जोशोखरोश से विभिन्न कार्यक्रमों में हिस्सा लिया। 68 बच्चों द्वारा प्रेमचंद की कहानियों पर बनाए गए चित्रों की प्रदर्शनी लगाई गई। दो कहानियों- ‘दो बहनें’ और ‘राष्ट्र का सेवक’ का मंचन किया गया। छह बच्चों ने कहानियों का पाठ किया। मगर सबसे प्रभावशाली था रा.बा.इ.का. बेरीनाग की कक्षा 6 की छात्रा भावना द्वारा ‘ठाकुर का कुआं’ कहानी का स्वअनूदित कुमांउनी पाठ। इन सब के अलावा कई शिक्षकों ने भी बच्चों का उत्साहवर्धन किया।समारोह का समापन कहानी ‘सद्गति’ पर सत्यजित रे निर्देशित फिल्म से किया गया।

साथि‍यो, जन संस्कृति मंच की ओर से प्रेमचंद  जयंती पर जनसत्ता अपार्टमेंट, वसुंधरा में आयोजित कार्यक्रम के बारे में गौरव सक्सेनाजी ने सुखद जानकारी भेजी है—

prem chand

31 जुलाई को प्रेमचंद जयंती पर जनसत्ता अपार्टमेंट, वसुंधरा में आयोजित ‘मशाल-ए-प्रेमचन्द’ कार्यक्रम में कोठारी इंटरनेशनल स्कूल, नॉएडा ने भी भागीदारी की। इस कार्यक्रम के तहत विद्यालय में बच्चों को प्रेमचंद की कहानियां सुनाई गईं। बच्चों को कहानी के आधार पर पोस्टर बनाने के लिए प्रेरित किया गया। इस कार्यक्रम में हिंदी विभाग की अध्यापिकाओं (श्रीमती गीता शर्मा, श्रीमती रश्मि सिन्हा,  श्रीमती पंकजा जोशी) ने पूरे उत्साह से साथ भागीदारी की। हफ्तेभर चले इस कार्यक्रम के अंत में मन को हर लेने वाले तीस पोस्टर मिले। सबसे ज्यादा पोस्टर ईदगाह और नन्हा दोस्त पर बनाए गए। पंच परमेश्वर पर भी  बेहद सुन्दर पोस्टर बनाए गए। बच्चों को प्रेमचन्द तक और प्रेमचन्द को बच्चों तक लाने की इस अनूठी पहल का हिस्सा बनना बच्चों और विद्यालय के लि‍ए सुखद अनुभव रहा।

विद्यालय प्रबंधन द्वारा इस पहल को सराहा गया और भविष्य में इस तरह के आयोजन करते रहने व भागीदारी के लिए प्रेरित किया गया। विद्यालय की ओर से गौरव सक्सेना इस कार्यक्रम का हिस्सा बने। अगले वर्ष प्रेमचन्द जयंती को विद्यालय में हर्षोउल्लास के साथ मानाने का प्रण किया गया।

काव्योत्सव के बहाने सार्थक पहल

दीवार पत्रिका पर स्लाइड शो प्रस्तुोत करते महेश पुनेठा।

दीवार पत्रिका पर स्लाइड शो प्रस्तुोत करते महेश पुनेठा।

गंगोलीहाट: लोकतांत्रिक साहित्य मंच की ओर से 11 व 12 जून को ब्लाक संसाधन केन्द्र गंगोलीहाट के सभागार में दो दिवसीय ‘ काव्योत्सव’ संपन्न हुआ। इसमें कविता पोस्टर प्रदर्शनी, दीवार पत्रिका पर स्लाइड शो, काव्यगोष्‍ठी, प्रकृति भ्रमण तथा नागार्जुन के कृतित्व पर विचार गोष्‍ठी का आयोजन किया गया।

पहले दिन दीवार पत्रिका पर स्लाइड शो से कार्यक्रम की शुरूआत हुई। दीवार पत्रिका के सम्बन्ध में शि‍क्षक-कवि व आलोचक  महेश चंद्र पुनेठा ने इसके उद्देश्‍यों पर प्रकाश डालते हुए, विभिन्न विद्यालयों से आए हुए बच्चों, अभिभावकों, शि‍क्षकों व उपस्थित जन समूह को उपयोगी व्याख्यान दिया। दीवार पत्रिका के माध्यम से किस प्रकार बच्चों की रचनात्मक क्षमता का विकास होता है तथा वे विषय को आसानी से समझते हुए अपनी सम्पूर्ण भागीदारी का निर्वहन करते हैं, को देशभर में चल रहे दीवार पत्रिका निर्माण व उसके प्राप्त हो रहे सकारात्मक परिणाम के माध्यम से समझाया। उन्होंने स्वयं अपने विद्यालय में इसके माध्यम से प्राप्त परिणामों को साक्ष्य सहित छात्र-छात्राओं तथा अध्यापकों के सम्मुख प्रस्तुत किया तथा शि‍क्षकों से अपील की कि वे बच्चों में रचनात्मक शक्ति का विकास करने तथा उनकी कल्पना शक्ति को पंख देने के लिए व स्थाई ज्ञान को प्राप्त करने में सहज रूप से दीवार पत्रिका का उपयोग करें। इससे जहां एक ओर बच्चे अपने समय का सदुपयोग करेंगे, वहीं दूसरी ओर उनमें सीखने और समझने की जिज्ञासा निरन्तर बढ़ेगी। उन्होंने विभिन्न उदाहरणों के माध्मम से सीखने-सिखाने में इसकी उपयोगिता का सहज चित्रण किया। बीच-बीच में बच्चों के साथ पहेली, चुटकुले, बिंब निर्माण, षीर्शक चयन से संबंधित गतिविधियां करवाई गईं। एक अच्छी दीवार पत्रिका में क्या-क्या स्तम्भ होने चाहिए तथा उन्हें कैसे तैयार किया जा सकता है आदि के संबंध में स्लाइड शो के माध्यम से बताया। बच्चों को कुछ छोटी-छोटी फिल्में भी दिखाईं। इस स्लाइड शो तथा उस पर आधारित आकर्षक प्रस्तुतीकरण के बाद विद्यालयों से आए हुए छात्र-छात्राओं से विविध विधाओं पर मौलिक लेखन करवाया गया। यद्यपि प्रारंभ में बच्चों में कुछ झिझक देखी गई, परन्तु जैसे ही उन्होंने लिखना आरंभ किया, धीरे-धीरे उनका आत्मविश्‍वास बढ़ता गया और वे सहज रूप से लिखने लगे। इस कार्यशाला में बच्चों ने लेखन की बारीकियों को समझते हुए कई विधाओं पर स्वयं अपनी रचनाएं तैयार कीं।

इस अवसर पर कार्यक्रम स्थल में सुप्रसिद्ध चित्रकार कुंवर रवीन्द्र द्वारा बनाए गए देश के प्रतिष्ठित और युवा कवियों की कविताओं की पोस्टर प्रदर्शनी का भी आयोजन किया गया। रेनेसां और कस्तूरबा आवासीय बालिका विद्यालय के विद्यार्थियों सहित स्थानीय शि‍क्षकों, आमंत्रित कवियों और साहित्य व कला प्रेमियों ने दशाईथल में आयोजित इस प्रदर्शनी का अवलोकन किया। इन कविता पोस्टरों का अवलोकन करते हुए भी बच्चों ने कविता की बारीकियों को समझा और शायद इसी का परिणाम था कि शाम को आयोजित कवि गोष्ठी में लगभग बीस छात्र-छात्राओं ने अपनी मौलिक कविताओं का मंच पर पाठ किया। गंगोलीहाट जैसी छोटी जगहों पर इस तरह की प्रदर्शनी का आयोजन होना बड़ी बात है। इससे बच्चों में कला और साहित्य के प्रति रूझान बढ़ता है। बच्चों में चित्रों को पढ़ने की क्षमता का विकास होता है। कविता की समझ पैदा होती है। लगभग चार दर्जन पोस्टरों का प्रदर्शन किया गया, जिनमें हिंदी के प्रतिष्ठित कवियों की कविताएं थीं। जिन कवियों की कविताओं के पोस्टर लगाए गए उनमें प्रमुख थे- शील, रघुवीर सहाय, मानबहादुर सिंह, नागार्जुन, मुक्तिबोध, केदारनाथ सिंह, ओमप्रकाश बाल्मीकि, नरेश सक्सेना, केशव तिवारी, शि‍रीष कुमार मौर्य, अनुज लुगुन, नवनीत पांडे, बुद्धिलाल पाल, महेश चंद्र पुनेठा, अविनाश मिश्र, रेखा चमोली।

उल्लेखनीय है कि कुंवर रवीन्द्र अब तक लगभग अठारह हजार से अधिक चित्र और कविता पोस्टर बना चुके हैं। देश के लगभग दो सौ छोटे-बड़े शहरों में उनके चित्रों की प्रदर्शनी लग चुकी है। गत वर्ष पिथौरागढ़ में आयोजित पहले लोक विमर्श कार्यक्रम में इन चित्र और पोस्टरों की प्रदर्शनी लगी थी, जिसमें देशभर से लगभग दो दर्जन साहित्यकार उपस्थित रहे।

सायं सात बजे से ब्लाक संसाधन केन्द्र के सभागार में कवि गोष्ठी का आयोजन किया गया जिसमें कुमाऊंभर से आए हुए प्रतिष्ठित कवियों ने काव्य पाठ किया। साथ ही बीच-बीच में देश-विदेश के प्रतिष्ठित कवियों का काव्य पाठ उनके स्वयं के स्वर या किसी दूसरे के स्वर में प्रोजेक्टर के माध्यम से किया गया। इन कवियों में मंगलेश डबराल, नरेश सक्सेना, पाश, नाजिम हिकमत, ओमप्रकाश बाल्मीकि, अनामिका, मुक्तिबोध आदि प्रमुख थे। कवि सम्मेलन में कस्तूरबा बालिका आवासीय विद्यालय से आए लगभग दो-दर्जन छात्राओं द्वारा भी स्वरचित कविताओं का वाचन किया, जिसे काफी सराहा गया। कुमाऊंनी कवि जनार्दन उप्रेती की अध्यक्षता में आयोजित इस काव्य संगोष्ठी के मुख्य अतिथि राजकीय इण्टर कालेज दशाईथल के प्रधानाचार्य किशोर कुमार पन्त रहे। काव्‍य संगोष्‍ठी का संयोजक युवा साहित्यकार रमेश जोशी ने कि‍या।

अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में व्याप्त बुराइयों पर कवियों ने अपनी कलम की पैनी धार चलाते हुए समाज को सकारात्मक दिशा की ओर ले जाने का आह्वान किया। सम सामयिक विषयों के साथ-साथ ऐसे विषयों को इन्होंने अपनी कविताओं में स्थान दिया, जहां पर सामान्य व्यक्ति की निगाह नहीं जाती है। सभी प्रतिष्ठित कविगणों द्वारा अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज में मौजूद विसंगतियों-विडंबनाओं पर करारी चोट की गई तथा एक लोकतांत्रिक और शोषणमुक्त समाज बनाने का स्वप्न पेश किया। देर रात्रि तक चले इस कवि सम्मेलन में अल्मोड़ा से आये चर्चित कुमाऊंनी कवि शंकर दत्त जोशी, युवा कवि-आलोचक  महेश पुनेठा, रमेश चन्द्र जोशी, कुमाऊंनी कवि प्रकाश चन्द्र जोशी,  विनोद उप्रेती, राजेश पन्त, डा. मोहन आर्य, आशा सौन, विक्रम नेगी, नवीन विश्‍वकर्मा, ‘बाखली’ के संपादक गिरीश पाण्डे ‘प्रतीक’ दिनेश पाण्डे, कवि-रंगकर्मी जनार्दन उप्रेती, किशोर कुमार पन्त आदि ने अपनी कविताओं का पाठ किया। इस कवि गोष्ठी में विद्या प्रसाद भट्ट, रवि पुनेठा, नवीन चन्द्र पन्त,  कमलेश पन्त,  राजेन्द्र खाती,  सुनील उप्रेती,  संदीप जोशी, हरीश पण्डा, मनोज वर्मा, श्री दिनेश पाण्डे, डा. ज्योति निवास पन्त, कुमारी रेणू साह, दीपक पन्त और पिथौरागढ़ से आए ‘आरम्भ’ समूह के युवा साथी रोहित बि‍ष्‍ट, आयुष जोशी, महेन्द्र रावत, अभि‍षेक पुनेठा सहित दो दर्जन से अधिक साहित्य प्रेमी उपस्थित रहे।

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दूसरे दिन की शुरूआत पाताल भुवनेश्‍वर गुफा के भ्रमण से हुई। देवदार के जंगलों के बीच अवस्थित यह गुफा लगभग डेढ़ सौ मीटर लंबी है। यह पौराणिक गुफा है, जिसका वर्णन स्कंदपुराण के मानसखंड में भी है। वहां से लौटकर  बाबा नागार्जुन के कृतित्व पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन हुआ। वक्ताओं का कहना था कि बाबा नागार्जुन जनता के कवि हैं। उनकी कविताएं सीधे जनता से संवाद करती हैं। उनके जीवन और भाषा दोनों को अपनी कविताओं का अंग बनाते हैं। क्रियाशील जीवन से कथ्य और रूप का चुनाव करते हैं। नागार्जुन जीवनभर उन्हीं के पक्ष में लिखते रहे और जनविरोधी सत्ता का प्रतिपक्ष रचते रहे। यह प्रतिपक्ष केवल कविता तक ही सीमित नहीं था, बल्कि जीवन में भी दिखता था। जनआंदोलनों में भाग लेना और जेल जाना इस बात का उदाहरण है। नागार्जुन न केवल जनता के कष्‍टों और संघर्षों को चित्रित करते हैं, बल्कि उनसे मुक्ति का रास्ता भी बताते हैं। सामूहिकता पर उनका गहरा विश्‍वास रहा। अपने लोक और जनपद से गहरे तक सपृक्त रहे। इस सबके चलते वह जनकवि कहलाए।

‘नागार्जुन का व्यक्तित्व और कृतित्व’ विषयक गोष्‍ठी की अध्यक्षता करते हुए युवा साहित्यकार रमेश जोशी ने कहा कि नागार्जुन एक ऐसे कवि थे, जो आजीवन समाज में बदलाव के लिए लिखते रहे और सत्य के पक्ष में खड़े रहे। उन्होंने अपने जीवन में जो भी कविताएं लिखीं, पहले वे उससे होकर गुजरे। उनकी समदृष्टि ही उन्हें समकालीन साहित्यकारों से पृथक बनाती है। उन्होंने समाज में व्याप्त कुरीतियों, घटित हो रहे अत्याचारों आदि पर अपनी कलम चलाई और इसके लिए जो भी दोषी हो, उसे कटघरे में खड़ा किया। चाहे वो कितना ही प्रभावशाली ही क्यों न हो। जन सामान्य की भलाई के लिए आजीवन सत्ता से उन्होंने संघर्ष किया। उन्हें समाज में वो सब दिखता था, जो कि औरों की नजरों में नहीं होता था। उन्होंने कवियों से अपील करते हुए कहा कि आज साहित्यिक क्षेत्र के लोगों को लिखने के लिए बाबा नागार्जुन को पहले पढ़ना होगा। विशेषतया कवियों को ध्यान देना होगा कि वे जिस प्रकार का साहित्य सृजन कर रहे हैं, उसे जि‍ए भी। कविता को जीना बहुत जरूरी है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में तो इसका और भी महत्व हो जाता है, जबकि महत्वाकांक्षाएं चरम पर हैं। ऐसी स्थिति में कोरे आदर्शों का कोई महत्व नहीं होगा। अतः हम सभी साहित्य बिरादरी के लोगों को चाहिए कि समाज की आवश्‍यकताओं के अनुरूप लिखा जाए और उसे जिया जाना भी जरूरी है। बाबा नागार्जुन चूंकि जनकवि थे, उनके आदर्शों पर चलकर ही हम वास्तविक साहित्य साधना करते हुए समाज हित में कुछ सकते हैं।

बतौर मुख्य अतिथि पशु चिकित्सक व युवा कवि डॉ. मोहन आर्या ने नागार्जुन की चर्चित कविता ‘हरिजन गाथा’ का संदर्भ देते हुए कहा कि भले इस कविता की कुछ सीमाएं हैं, बावजूद इसके यह दलित जीवन और प्रतिरोध की एक बड़ी कविता है। उनके समकालीनों ने कभी इस तरह के वि‍षय नहीं उठाए। उन्होंने आगे कहा कि आज आवश्‍यकता है कि हम बाबा नागार्जुन को समझें। इसके लिए जरूरी है कि पहले हम उनके साहित्य का अध्ययन करें। जिन परिस्थितियों व देशकाल में उनके द्वारा लिखा गया, इसे भी ध्यान में रखना होगा। इससे पूर्व युवा कवि विक्रम नेगी ने नागार्जुन की कविता ‘बाकी बच गया अंडा’ का पाठ किया। शि‍क्षक-कवि राजेश पंत ने नागार्जुन की काव्य-प्रतिभा पर बोलते हुए उनकी ‘अकाल और उसके बाद’ तथा ‘देवदार’ कविताओं को प्रस्तुत किया। उन्होंने भी इस बात पर बल दिया कि कवियों के लिए उनका साहित्य पढ़ना ही नहीं, बल्कि उनकी परम्परा को आगे बढ़ाना भी जरूरी है। ‘आरम्भ’ समूह की ओर से अभिषेक पुनेठा, रोहित बिष्‍ट, महेंद्र रावत, आयुष जोशी ने संयुक्त रूप से नागार्जुन की प्रदीर्घ कविता ‘हरिजन गाथा’ की नाट्य प्रस्तुति दी। युवा कवि-छायाकार विनोद उप्रेती ने नागार्जुन की कविताओं का पाठ करते हुए कहा कि हमें नागार्जुन के जीवन-मूल्यों को अपने में उतारकर कविता लिखनी होगी। तभी सही अर्थों में हम उनकी परम्परा को आगे बढ़ा पाएंगे। अल्मोड़ा से आए कुमाऊंनी कवि शंकर दत्त जोशी ने नागार्जुन को समर्पित अपनी ‘आरक्षण’ कविता सुनाई। महेश चंद्र पुनेठा ने नागार्जुन के जनकवि कहलाने के कारणों पर अपना आलेख पढ़ा। उन्होंने कहा कि नागार्जुन की कविताएं जनता के यथार्थबोध को जाग्रत कर उसकी चेतना का विस्तार करते हुए जनता के मुक्ति संघर्ष को शक्ति और दिशा देती हैं। अपने समय और समाज की जनता की इच्छाओं, भावनाओं, जीवन उद्देश्‍यों और संघर्षों को अभिव्यक्त करने के कारण ही नागार्जुन की कविताएं लोकप्रिय हैं और इन्हें जनकवि होने का सम्मान प्राप्त है। उन्होंने रेखांकित किया कि नागार्जुन की लोकप्रियता का सबसे पहला कारण उनकी सहजता ही है। उनके पास जटिल से जटिल बातों को भी बड़ी सहजता से कविता में व्यक्त करने का कौशल है। दूसरा कारण उन्होंने कविता को पहले अपने जीवन में रचा फिर कागज पर। तीसरा कारण उनकी लोकपरकता रही। वह लोक और जनपद के बहुत नजदीक रहे, वहीं से कथ्य और रूप ग्रहण किया। क्रियाशील जन से ही भाषा सीखी। चौथा कारण- बाबा में सामूहिकता की भावना गहरे तक पैठी हुई थी। समूह में रहना और सामूहिक संघर्ष करना उनकी फितरत में शामिल रहा। उन्होंने जहां भी दमन-शोषण-उत्पीड़न तथा जीवन का अपमान देखा, अपनी रचना से उसका प्रतिरोध किया। पांचवा कारण- प्रकृति से उनकी निकटता है। उनकी कविताओं में प्रकृति के विविध रूप-रंग देखे जा सकते हैं। इनमें जीवन का सौंदर्य और जीवन का संघर्ष दोनों ही व्यक्त होते हैं। वरिष्‍ठ कवि-रंगकर्मी जनार्दन उप्रेती, जनकवि प्रकाश चंद्र जोशी ‘शूल’, युवा कवयित्री आशा सौन आदि ने भी अपने विचार व्यक्त किए। इस अवसर पर ज्योति निवास पंत, दीप पंत, जोगा राम आदि साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे। विचार गोष्‍ठी  का सफल संचालन युवा कवि और ‘बाखली’ के संपादक गिरीश चंद्र पाण्डेय ‘प्रतीक’ ने किया।

प्रस्तुति – रमेश चन्द्र जोशी