Category: परिक्रमा

अंधेरे वक्त में रोशनी के लिए ज्ञान-मीमांसा की कुदरती मानवीय प्रवृत्ति को बढ़ावा देना होगा: लाल्टू  

कार्यक्रम में अपने वि‍चार रखते लाल्टू।

कार्यक्रम में अपने वि‍चार रखते लाल्टू।

नई दिल्ली: ‘ज्ञान की जमीन’ यानी मनुष्य को वह कहां से मिलता है और जो कुछ वह जानता है, जिसे सच मानता है, वह किस हद तक ठोस सचाई है, इस बारे में कवि-वैज्ञानिक और पत्रकार लाल्टू ने गांधी शांति प्रतिष्ठान में ‘ज्ञान की जमीन और जमीनी ज्ञान: अंधेरे वक्त में रोशनी की तलाश’ विषय पर 20 नवंबर 2016 को आयोजित पांचवे कुबेर दत्त स्मृति व्याख्यान में अपने विचार रखे।

लाल्टू ने कहा कि आदतन लोग उन बातों को नहीं जानना चाहते जो उनकी मान्यताओं से संगति नहीं रखती हैं। इसलिए उनकी हर जानकारी के साथ उनकी पृष्ठभूमि और पूर्वाग्रह जुड़े होते हैं। उदाहरण के तौर पर गुजरात और मानव विकास के आंकड़े का संदर्भ देखा जा सकता है। भाजपा के चुनाव प्रचार के लिए लगभग एक दशक से यह झूठ फैलाया गया कि गुजरात देश का सबसे विकसित राज्य है, लेकिन तथ्य यह है कि मानव विकास के आंकड़े में गुजरात पिछले तीन दश कों से ग्यारहवें नंबर पर रुका हुआ है। भक्तों को यह जानकारी नहीं चाहिए, इसलिए वे इसे कभी नहीं देखते हैं।
लाल्टू ने सवाल उठाया कि जो कुछ प्रत्यक्ष दिखता है, वही सच होगा यह मान लेना स्वाभाविक है, पर ऐसा क्या है, जो दिखने से छूट गया ? अगर वह दिख जाए तो क्या जो पहले दिख रहा था, उस बारे में हमारा निर्णय पहले जैसा ही रह जाएगा ? उन्होंने कहा कि सामान्य समझ ज्ञान की बुनियाद नहीं होती, वह देशकाल पर निर्भर होती है और अक्सर विरोधाभासों से भरी होती है। उन्होंने कहा कि कि ‘हमें ज्ञान है’ का अहसास एक तरह का अहं पैदा करता है। यह जान लेना कि हम इस अहंकार से ग्रस्त हो सकते हैं, काफी नहीं होता। इस अहंकार के नतीजे भयंकर होते हैं। लाल्टू ने सवाल उठाया कि जिन्हें अज्ञानी मानकर हम अनजाने में दरकिनार कर रहे होते हैं, वे किसके दर जा पहुंचते हैं? क्या वे किसी शैतान के गुलाम हो जा सकते हैं? उन्हें वह समझ क्यों नहीं हासिल हासिल होती है, जो हममें है? ये कौन हैं जो ‘झूठ ही सच है’ का नारा लगाते हुए हमें दबोच रहे हैं?

भारत और अमेरिका की हाल की राजनैतिक घटनाएं ऐसे सवाल खड़ी करती हैं। लाल्टू ने कहा कि जिस अंधेरे दौर से हम गुजर रहे हैं उसमें कुदरती तौर पर हमें ज्ञान-मीमांसा की जो काबिलियत मिली है, उसको बढ़ावा देना होगा। इस अँधेरे दौर में हम रोशनी की तलाश कैसे करें, यह हमारे लिए अहम सवाल है। मनुष्य तर्क और भावनात्मकता के साथ भाषा और एहसासों के अर्थ ढूंढ सकता है। इसे बचाए रखना इस वक्त की सबसे बड़ी लड़ाई है।
व्याख्यान के बाद श्रोताओं के साथ लाल्टू का विचारोत्तेजक संवाद हुआ। शम्भु यादव ने मौजूदा वैज्ञानिक विकास और मार्क्सवाद के अंतर्संबंधों पर सवाल किया। मृत्युंजय ने ज्ञान के माध्यमों के लगातार अप्रामाणिक होते जाने का सवाल उठाया। वन्दना ने ज्ञान की प्रक्रिया में ‘एक्सपोजर’ का सवाल उठाया। आस्था और भ्रम के सन्दर्भ का सवाल महेश महर्षि ने पूछा। मंगलेश डबराल ने ज्ञान के सामान्यीकरण का प्रश्न उठाते हुए बहस को और जीवंत बनाया। इसके पहले कवि-वैज्ञानिक लाल्टू ने कुबेर दत्त के गद्य की पहली पुस्तक ‘एक पाठक के नोट्स’, कवि कृष्ण कल्पित ने जयनारायण द्वारा सम्पादित  ‘कल के लिए’ के कुबेर दत्त विशेषांक का और वरिष्ठ कवि विष्णुचंद्र शर्मा ने कुबेर दत्त की बिल्लियों और बिल्लियों पर लिखी गई देश-दुनिया की कविताओं पर आधारित टेबल कैलेण्डर का लोकार्पण किया। इस मौके पर वरिष्ठ कवि रामकुमार कृषक ने कुबेर दत्त पर केंद्रित कविता पढी, ‘कल के लिए’ के सम्पादक जयनारायण का ऑडियो सन्देश सुनाया गया। डॉ. बलदेव बंशी ने कुबेर जी से जुड़े संस्मरण सुनाए। कृष्ण कल्पित ने कहा कि दुनिया में शायद ही कुबेर जी जैसा कोई दूसरा प्रसारक होगा, जिसने 30 साल तक कला-साहित्य पर उत्कृष्ट कार्यक्रम बनाया हो। उन्होंने उनको उच्च कोटि के प्रसारक और संवेदनशील कवि के रूप में याद किया। युवा आलोचक गोपाल प्रधान ने उन्हें अत्याधुनिक दृष्टि वाला और भारतीय समाज में गहरे धंसा जनसांस्कृतिक बुद्धिजीवी बताया।
आयोजन की अध्यक्षता वरिष्ठ कवि विष्णुचंद्र शर्मा ने की। उन्होंने कहा कि हम किससे संवाद करते हैं, इस पर विचार करना बेहद जरूरी है। हमारे समय की विडम्बना यह है कि संवाद के भीतर से जनता गायब होती जा रही है जबकि इस दौर में दोस्तों की खोज बेहद जरूरी है। कार्यक्रम का संचालन सुधीर सुमन ने किया। कार्यक्रम के आरम्भ में रेल दुर्घटना और नोटबंदी के कारण मारे गए आम लोगों के शोक में एक मिनट का मौन रखा गया। उसके बाद संगवारी के कपिल शर्मा, अतुल और देवव्रत ने हबीब जालिब की नज़्म ‘क्या लिखना’ सुनाया। धन्यवाद ज्ञापन दूरदर्शन आर्काइव्स की पूर्व निदेशक और सुप्रसिद्ध नृत्य निर्देशक कमलिनी दत्त ने किया।

इस अवसर पर कवि मंगलेश डबराल, मृत्यंजय, कहानीकार महेश दर्पण, योगेन्द्र आहूजा, चर्चित चित्रकार अशोक भौमिक, जसम के महासचिव आलोचक प्रणय कृष्ण, आशुतोष कुमार, बजरंग बिहारी तिवारी, कवितेंद्र, पत्रकार आनंद प्रधान, पंकज श्रीवास्तव, रंगकर्मी लोकेश, राजेशचंद्र, फ़िल्मकार संजय जोशी, शिक्षिका उमा गुप्ता, शुभेंदु घोष, भारतेंदु मिश्र, श्याम सुशील, वासुदेवन, मालती गुप्ता, जितेन्द्र, किरण शाहीन, बृजेश, मनीषा, वंदना, तूलिका, सोमदत्त शर्मा, रविदत्त शर्मा, अरुणाभ सौरभ, इरेंद्र, रामनिवास, रोहित, दिनेश, अनुपम आदि मौजूद थे।

 (जसम दिल्ली की ओर से रामनरेश द्वारा जारी)

‘अभिरंग’ नाटक प्रतियोगिता में प्रथम

नाटक 'जनता पागल हो गई है' का एक दृश्य।

नाटक ‘जनता पागल हो गई है’ का एक दृश्य।

नई दिल्ली : भारत सरकार के प्रतिष्‍ठान भारत कंटेनर निगम लिमिटेड की ओर से  आयोजित  सतर्कता जागरूकता सप्ताह-2016 के अन्तर्गत हुई नाट्य प्रतियोगिता में हिन्दू कॉलेज की नाट्य संस्था ‘अभिरंग’ ने पहला स्थान प्राप्‍त किया। दिल्ली विश्वविद्यालय के श्रीराम कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स में हुई इस प्रतियोगिता में छह कॉलेजों श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स, श्री अरबिंदो कॉलेज, रामलाल आनंद कॉलेज, आत्माराम सनातन धर्म कॉलेज, सेंट स्टीफंस कॉलेज और हिंदू कॉलेज ने भाग लिया था। ‘अभिरंग’ ने प्रसिद्ध नाटककार शिवराम के चर्चित और बहुमंचित नाटक ‘जनता पागल हो गई है’  के लिए पच्चीस हजार रुपये का पहला पुरस्कार जीता। नाटक के निर्देशक युवा रंगकर्मी और शिवराम की नाट्य मंडली के सदस्य आशीष मोदी थे। ‘अभिरंग’ के परामर्शदाता डॉ. पल्लव ने बताया कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध सतर्कता के निमित्त आयोजित इस प्रतियोगिता में शिवराम के नाटक में पागल की भूमिका में आशुतोष  कुमार शुक्ल, जनता की भूमिका में पियूष पुष्पम, नेता की भूमिका में शिवानी, पूंजीपति की भूमिका में पूजा, पुलिस अधिकारी की भूमिका में स्नेहदीप, और सिपाहियों की भूमिका में राहुल, दीपिका, जागृति ने अपने जीवंत अभिनय से दर्शकों  को खासा प्रभावित किया। नेपथ्य सहयोग में चंचल सचान और अन्य विद्यार्थी थे।

सभागार में भारत कंटेनर निगम लिमिटेड के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक, मुख्य सतर्कता अधिकारी, निदेशक, प्रख्यात जूरी सदस्यों, कॉनकोर के अधिकारियों, मीडिया और शिक्षा बिरादरी के प्रतिनिधि उपस्थित थे।

निर्णायक मंडल में श्री रॉबिन आईपीएस (दिल्ली पुलिस), श्री आलोक शुक्ला (थिएटर अभिनेता, लेखक, निर्देशक और पत्रकार) और श्रीमती रत्ना बाली कांत (मूर्तिकार और प्रदर्शन कलाकार) थे। हिन्दू कालेज की प्राचार्या डॉ अंजू श्रीवास्तव ने ‘अभिरंग’ के नाट्य मंडल को इस उपलब्धि के लिए बधाई दी है।

प्रस्तुति‍-आशुतोष कुमार शुक्ल, संयोजक, अभिरंग, हिन्दू कॉलेज

हिंदी अकादमी में सरकारी हस्तक्षेप बंद हो!

Hindi Academy

नई दि‍ल्ली : हिंदी अकादमी द्वारा हिंदी दिवस के अवसर पर ‘भाषादूत सम्मान’ देने का पूरा आयोजन जिस तरह एक प्रहसन में बदल गया, वह दुर्भाग्यपूर्ण है। चिंताजनक रूप से हिन्दी में सम्मानों का सम्मान लगातार घटता गया है और उस सिलसिले में जुड़ने वाली सबसे ताज़ा कड़ी हिन्दी अकादमी का यह आयोजन है।

हिन्दी अकादमी ने कुछ दिन पहले ब्लॉगिंग एवं अन्य माध्यमों से जुड़े नौ लेखकों के नामों का चयन किया और उन्हें ईमेल से सूचना दी गई कि 14 सितम्बर को दिल्ली के हिंदी भवन में उन्हें सम्मानित किया जाएगा। उसके दो-तीन दिन बाद ही गुज़रे सोमवार को उनमें से तीन लेखकों– अरुणदेव (समालोचन), संतोष चतुर्वेदी (पहली बार) और अशोक कुमार पाण्डेय (असुविधा), को ईमेल से सूचित किया गया कि उन्हें ‘त्रुटिवश’ इस सम्मान का निमंत्रण मिल गया था, वे पिछले पत्र को ‘मानवीय भूल’ मानकर उसकी अनदेखी करें। बताया जा रहा है कि सम्मानित होने वाले लेखकों की सूची को अंतिम समय में मंत्रालय के स्तर बदला गया। सम्मान देने के निर्णय को संचालन समिति में विचार-विमर्श के लिए न रखने और जो भी चयन हुआ था, उसमें संस्कृति मंत्री द्वारा मनमाने बदलाव किये जाने के विरोध में अकादमी की संचालन समिति से श्री ओम थानवी ने इस्तीफा भी दिया है।

हिंदी अकादमी दिल्ली सरकार के कला एवं संस्कृति मंत्रालय के अधीन एक स्वायत्तशासी संस्था है। ‘दिल्ली में हिंदी भाषा, साहित्य और संस्कृति के परिवर्धन और प्रचार-प्रसार’ के लिए बनी इस संस्था की जो संचालन समिति हिंदी अकादमी के अध्यक्ष (मुख्यमंत्री, दिल्ली सरकार) द्वारा दो साल की अवधि के लिए गठित की जाती है, वह अगर स्वतंत्र रूप से काम करने में सक्षम न हो तो ऐसी संस्थाओं का कोई मतलब नहीं है। मसला सिर्फ़ पुरस्कारों और सम्मानों का नहीं। किसी भी तरह की गतिविधि के मामले में स्वायत्तता और पारदर्शिता ऐसी संस्थाओं के उपयोगी एवं उत्पादक बन पाने/बने रहने की बुनियादी शर्त है। वह न होने की स्थिति में वे जिनके ‘परिवर्धन और प्रचार-प्रसार’ के लिए गठित की गयी हैं, उनका अहित करने वाले तंत्र में तब्दील हो जाती हैं। इसलिए हम इस तरह के सरकारी हस्तक्षेप की कठोर शब्दों में निंदा करते हैं। हम आम आदमी पार्टी की सरकार से यह मांग करते हैं कि जिन साहित्यकारों को उसने अकादमी का संचालन करने के लिए चुना है, उन्हें अपने विवेक से काम करने दे और अकादमी की स्वायत्तता का सम्मान करे। साथ ही, जनवादी लेखक संघ हिंदी अकादमी के लेखक पदाधिकारियों से भी यह उम्मीद करता है कि वे इस संस्था की स्वायत्तता की रक्षा को अपना ज़रूरी दायित्व मानेंगे और अनपेक्षित सरकारी हस्तक्षेप को अस्वीकार करेंगे। वे हिंदी में लिखने वाले लेखक-समाज के प्रतिनिधि के रूप में अपनी ज़िम्मेदार भूमिका को समझें, ऐसी उनसे उम्मीद की जाती है।

(मुरली मनोहर प्रसाद सिंह (महासचिव) और संजीव कुमार (उप-महासचिव) की ओर से 16.09.2016 को जारी बयान)

बच्चो ने बनाए मॉडल और लगाया बाल विज्ञान मेला

मॉडल बनाते बच्चे

मॉडल बनाते बच्चे

अल्मोड़ा : अलायन्स फॉर साइंस प्रोग्राम के तहत रामगंगा वेली पब्लिक स्कूल मासी अल्मोड़ा में 7-10 सितम्बर 2016 तक मॉडल मेकिंग वर्कशॉप तथा बाल विज्ञान मेले का आयोजन किया गया। इस मेले में 30 मॉडल को लिया गया। मॉडल मेकिंग के लिए 8वीं व 9वीं कक्षा के 36 छात्रों को मेले के लिए चुना गया था।

मॉडल मेकिंग

7 व 8 सितम्बर  को बाल विज्ञान मेले के लिए चयनित मॉडल बनाए गए। इसके लिए 36 छात्रों को 8 समूह में बांटा गया। सभी ग्रुप ने 3-3 मॉडल्स बनाए। जब भी कोई मॉडल बनता तो उसकी कार्यप्रणाली व मॉडल से पुष्ट होने वाले नियम पर भी चर्चा की जाती थी। दो दिनों में सभी मॉडल्स बना लिए गए। मॉडल मेकिंग के दौरान बच्चे बहुत तल्लीन थे। बच्चों से हुई बातचीत से पता लगा कि उन्होंने ऐसे मॉडल पहली बार बनाए। बच्चे मॉडल की सुन्दरता पर विशेष ध्यान दे रहे थे।

मॉडल्स पर चर्चा

9 सितम्बर को स्थानीय अवकाश की वजह से स्कूल बंद था। इसलिए सभी 36 छात्रों को कुछ समय के लिए बुलाया गया था ताकि मॉडल्स के ऊपर चर्चा की जा सके। यह दिन चर्चा के लिए रखा था। सभी 8 ग्रुप्स को दो बड़े ग्रुप में बांटा गया और अपने-अपने मॉडल्स पर चर्चा के लिए आधा घंटे के समय दिया गया। क्योंकि मॉडल मेकिंग के दौरान भी मॉडल्स पर चर्चा हुई थी,  इसलिए बच्चे अपने मॉडल के लिए घर से तैयारी करके आए थे। ग्रुप चर्चा के दौरान बच्चों को स्वयं यह तय करना था कि उन्हें कौन-सा मॉडल प्रस्तुत करना है। बच्चों ने अपनी रुचि के आधार पर अपने मॉडल चुने। जिस मॉडल में बच्चों को समझने में कठिनाई हो रही थी, उस पर उन्हें मदद की गई। इस दिन बच्चों को अपने मॉडल पर आधारित चार्ट भी बनाने थे। यह काम घर के लिए दिया गया।

बाल विज्ञान मेला

10 सितम्बर को बाल विज्ञान मेले का आयोजन हुआ। इसमें कम्युनिटी इन्वोल्मेंट के लिए स्कूल की आर्ट शिक्षिका द्वारा पोस्टर थे, जिन्हें कस्बे में 4-5 जगहों पर चिपकाया गया था। अभिभावकों को भी सूचित किया गया था। पास के दो राजकीय विद्यालयों के शिक्षक और छात्रों को भी विज्ञान मेला देखने के लिए निमंत्रण भेजा गया था। लगभग 150 से ज्यादा अभिभावक, 30 शिक्षकों तथा 250 छात्रों ने मेले का आनंद लिया। सभी ने इस तरह के प्रयास की सराहना की।

मासी जैसे छोटे से कस्बे में यह पहला आयोजन था, जिसमें बच्चों द्वारा बनाए गए मॉडल्स की प्रदर्शनी लगी थी और बच्चे बिना किसी झिझक के अपने मॉडल के बारे में बता रहे थे। स्कूल के व्यवस्थापक संतोष मासीवाल ने बच्चों को उत्साहित करने के लिए पुरस्कार भी रखे थे। इसके लिए कुछ मापदंडों पर बच्चों को परखा गया। जैसे- मॉडल की कार्यप्रणाली, प्रस्तुतीकरण, बच्चे का आत्मविश्वास, मॉडल की सुन्दरता आदि।

अपने बनाए मॉडल के बारे में बताते बच्चे ।

अपने बनाए मॉडल के बारे में बताते बच्चे ।

प्रस्तुति‍: आशीष कंडपाल

विज्ञान केन्द्रों में प्रेमचंद

कौशाम्बी में आयोजि‍त कार्यक्रम में बच्चों को प्रेमचंद की कहानी सुनाती छात्रा।

कौशाम्बी में आयोजि‍त कार्यक्रम में बच्चोंद को प्रेमचंद की कहानी सुनाती छात्रा।

नई दि‍ल्ली : 31 जुलाई 2016 को कथाकार मुंशी प्रेमचंद की 136वीं जयंती को पहली बार प्रथम विज्ञान केन्द्रों में मनाया गया। पांच केन्द्रों इलाहाबाद, झाल्डा, मसूदा, रालेगांव और सालिपुर में इस अवसर पर कार्यक्रम आयोजि‍त कि‍ए गए। इनमें मुख्यतौर पर सत्यजीत रे द्वारा निर्मित फीचर फिल्म सद्गति व पूस की रात दिखाई गई। बच्चों ने कहानियों का पाठ किया, चित्र बनाए, उनकी प्रदर्शनी लगाई गई और नाटक भी किए। हालांकि यह ऐसा पहला मौका था, जब विज्ञान केन्द्रों को इस तरह का कोई आयोजन कि‍या गया, लेकिन सभी ने पूरे उत्‍साह से कार्यक्रमों में भाग लि‍या। वि‍शेष रूप से बच्‍चे बढ़चढ़कर आयोजन का हि‍स्‍सा बने। इस तरह के कार्यक्रमों की सार्थकता यह है कि‍ इससे विज्ञान के साथ-साथ समाज के प्रति भी बच्चों के सकारात्मक नजरिये को विकसित किया जा सकता है। केंद्रों की कार्यक्रम की रि‍पोर्ट-

झाल्दा कार्यक्रम का आयोजन साइंस सेंटर पर किया गया, जिसमें 43 बच्चों की भागेदारी रही। सभी बच्चों को सत्यभान व केशब ने दो कहानियां पढ़कर सुनाईं। उन पर बात की और उन कहानियों पर चित्र बनाने के लिए कहा। सभी ने चित्र बनाए। बच्चों ने खुद जज करके कुछ बेहतरीन चित्रों को चुना, उन्हें प्रोत्साहित करने के लिए इनाम भी दिए गए। बाकी सभी बच्चों को सांत्वना पुरस्कार दिए गए। बिजली न होने के कारण फिल्म का शो नहीं हो पाया।

सालिपुर  कार्यक्रम का आयोजन साइंस सेंटर में किया गया, जिसमे 12 बच्चों ने हिस्सा लिया। कई बच्चे प्रेमचंद के बारे में नहीं जानते थे। उन्‍हें प्रेमचंद के जीवन और रचनाकर्म के बारे में बताया गया। सद्गति फिल्म दिखाई गई।

मसूदा मसूदा ब्लॉक में दो जगह बाल विज्ञान खोजशाला मसूदा व बाल विज्ञानं खोजशाला नगर में कार्यक्रम का आयोजन हुआ। दोनों जगह कुल 62 (56 बच्चे, 5 अभिभावक व 1 अध्यापक) लोगों ने भागेदारी की। प्रेमचंद की तीन कहानियां पढ़ी गईं। उन पर चर्चा की गई व बच्चों ने चित्र बनाए। इसके अलावा दोनों ही जगह सद्गति फिल्म के शो हुए।

इलाहाबादयहाँ दो जगहों पर कार्यक्रम हुए। पहला कार्यक्रम श्रीमती लखपती देवी जूनियर हाई स्कूल बिरौली बेरुवा कौशाम्बी में हुआ। यहां कुल 127 लोगों ने भागीदारी की। दूसरा कार्यक्रम साइंस सेंटर पर हुआ, जिसमे कुल 27 लोगों की भागीदारी रही। मुंशी जी की कथा और उपन्यास के गँवई परिवेश से जुड़े पात्रों को 22 बच्चों ने अपनी  चित्रकारी से प्रदर्शित किया। इतना ही नहीं बच्चों ने प्रेमचंद की कहानी- ईदगाह, पूस की रात, घास वाली और बलि‍दान आदि कहानियां सुनाईं। इसके अलावा लोगों को सत्यजीत राय द्वारा निर्देशित फिल्म ‘सद्गति एवं पूस की रात’ भी दिखाई गई।

रालेगांव कार्यक्रम का आयोजन ब्रह्मगुप्‍त साइंस सेंटर रालेगांव, बाल विज्ञान शोधिका डोंगरखरडा और बाल विज्ञान शोधिका हिंगनघाट तीन जगह किया गया। इनमें कुल 35 बच्चों की भागीदारी रही।  मुंशी प्रेमचंद के बारे में बच्चों को जानकारी दी गई जिस के आधार पर बच्चों ने चित्र बनाए।

प्रेमचंद और बच्चे

प्रेमचंद की कहानि‍यों पर आधारि‍त बच्चों के बनाए चित्र

प्रेमचंद की कहानि‍यों पर आधारि‍त बच्चों के बनाए चित्र

प्रेमचंद जयंती के अवसर पर जगह-जगह कार्यक्रम हुए और उनमें आम लोगों खासकर बच्‍चों की जो भागेदारी रही, वह सुखद संकेत है। जरूरत इसी बात की है कि‍ हम अपने लेखकों, कलाकारों, वैज्ञानि‍कों, चिंतकों और अन्‍य महापुरुषों के माध्‍यम से लोगों से जुड़ें। अगर हम ऐसा कर पाए, तो तब का समाज, आज से बेहतर ही होगा।

प्रेमचंद जयंती के अवसर पर आयोजि‍त दो कार्यक्रमों में भाग लेने का अवसर लेखक मंच प्रकाशन को भी मि‍ला। 31 जुलाई को वसुंधरा, गाजि‍याबाद स्थि‍त जनसत्ता अपार्टमेंट में जन संस्कृति मंच की ओर से मशाल-ए-प्रेमचंद का आयोजन किया गया। इसमें प्रेमचंद के साहि‍त्‍य और जीवन पर वि‍शेष प्रस्‍तुति‍ हुई। इसके साथ ही प्रेमचंद के सपनों का भारत विषय पर परिचर्चा हुई, प्रेमचंद की कथा पर एक नाट्य प्रस्तुति, मशहूर रंगमंडली ‘संगवारी’  ने जनगीत गाए, सत्यजित राय की फ़िल्म ‘सद्गति’ का प्रदर्शन हुआ और एक छोटा-सा पुस्तक मेला भी लगा। इसमें लेखक मंच प्रकाशन की ओर से भी स्‍टाल लगाया गया। कि‍ताबें देखने और खरीदने में बच्‍चों और बड़ों ने रुचि‍ दि‍खाई।

बुक स्टाेल पर कि‍ताब पढ़ती परी

बुक स्टाेल पर कि‍ताब पढ़ती परी

कि‍ताबों को उलटते-पलटते करीब पांच वर्ष की परी ने चहकते हुए कहा कि‍ आपकी कि‍ताबें तो बहुत अच्‍छी हैं। कुछ क्षण बाद फि‍र बोली- क्‍या में क्या कि‍ताब पढ़ सकती हूं। हमने उसे कुर्सी दे दी। वह कुर्सी पर बैठकर कि‍ताबों के पन्‍ने पलटने लगी। उसकी सहेली तरु ने भी कहा- अंकल, मैं भी कि‍ताब पढ़ सकती हूं। फि‍र दोनों सहेलि‍यां कि‍ताबों के पन्‍ने पलटते रहीं।

इस अवसर पर प्रेमचंद की कहानि‍यों पर आधारि‍त बच्चों के बनाए चित्रों‍ की प्रदर्शनी तो इस आयोजन की एक खास उपलब्‍धि‍ रही। इससे बच्‍चों की कलात्मकता तो सामने आई ही, इस बहाने उनका प्रेमचंद साहि‍त्‍य से भी परि‍चय हुआ।

शाइनिंग स्टार में कार्यक्रम का आनंद लेते बच्चे

शाइनिंग स्टा्र स्कूल में कार्यक्रम का आनंद लेते बच्चे

2 अगस्त को शाइनिंग स्टार स्कूल, रामनगर में प्रेमचंद जयंती के अवसर पर कार्यक्रम का आयोजन कि‍या गया। वहां भी बच्‍चों के बीच जाने के अवसर मि‍ला। बच्‍चों ने प्रेमचंद की कहानी कफन का मंचन कि‍या। बहुत से बच्‍चों ने प्रेमंचद की कहानि‍यां सुनाईं और उनके जीवन और साहि‍त्‍य के बारे में अपने वि‍चार व्‍यक्‍त कि‍ए। दो छात्रों  ने तो प्रेमचंद की दो कहानि‍यों को गढ़वाली और कुमांउनी में रूपांतरि‍त कर सुनाया। स्‍कूल के नि‍देशक डीएस नेगी जी ने बताया कि‍ बच्‍चों ने यह सारी तैयारी तीन-चार दि‍न में ही की है। जि‍न छात्रों  ने गढ़वाली और कुमाउनी में रूपांतरण कि‍या है, उन्‍हें आधे घंटे पहले ही कहानि‍यां दी गई थीं। उन्‍होंने एक बार कहानी को पढ़ा और फि‍र बि‍ना देखे, बि‍ना कि‍सी रूकावट या घबराहट के पूरी कहानी सुना दी।

यहां लगाए गए बुक स्टाल में भी बच्चों ने अपने लि‍ए कि‍ताबें पसंद कीं।

डॉ डीडी पन्त स्मारक बाल विज्ञान खोजशाला, बेरीनाग, उत्तराखंड में 31 जुलाई को प्रेमचंद जयंती समारोह हुआ। यहां हम तो नहीं जा पाए, लेकि‍न यहां की रि‍पोर्ट भी उत्‍साहजनक है।

डॉ डीडी पन्त स्मारक बाल विज्ञान खोजशाला में कार्यक्रम प्रस्तुत करते बच्चे

डॉ डीडी पन्त स्मारक बाल विज्ञान खोजशाला में कार्यक्रम प्रस्तुत करते बच्चे

प्रेमचंद जयंती के अवसर पर 10 से ज्यादा विद्यालयों के करीब 125 बच्चों ने पूरे जोशोखरोश से विभिन्न कार्यक्रमों में हिस्सा लिया। 68 बच्चों द्वारा प्रेमचंद की कहानियों पर बनाए गए चित्रों की प्रदर्शनी लगाई गई। दो कहानियों- ‘दो बहनें’ और ‘राष्ट्र का सेवक’ का मंचन किया गया। छह बच्चों ने कहानियों का पाठ किया। मगर सबसे प्रभावशाली था रा.बा.इ.का. बेरीनाग की कक्षा 6 की छात्रा भावना द्वारा ‘ठाकुर का कुआं’ कहानी का स्वअनूदित कुमांउनी पाठ। इन सब के अलावा कई शिक्षकों ने भी बच्चों का उत्साहवर्धन किया।समारोह का समापन कहानी ‘सद्गति’ पर सत्यजित रे निर्देशित फिल्म से किया गया।

साथि‍यो, जन संस्कृति मंच की ओर से प्रेमचंद  जयंती पर जनसत्ता अपार्टमेंट, वसुंधरा में आयोजित कार्यक्रम के बारे में गौरव सक्सेनाजी ने सुखद जानकारी भेजी है—

prem chand

31 जुलाई को प्रेमचंद जयंती पर जनसत्ता अपार्टमेंट, वसुंधरा में आयोजित ‘मशाल-ए-प्रेमचन्द’ कार्यक्रम में कोठारी इंटरनेशनल स्कूल, नॉएडा ने भी भागीदारी की। इस कार्यक्रम के तहत विद्यालय में बच्चों को प्रेमचंद की कहानियां सुनाई गईं। बच्चों को कहानी के आधार पर पोस्टर बनाने के लिए प्रेरित किया गया। इस कार्यक्रम में हिंदी विभाग की अध्यापिकाओं (श्रीमती गीता शर्मा, श्रीमती रश्मि सिन्हा,  श्रीमती पंकजा जोशी) ने पूरे उत्साह से साथ भागीदारी की। हफ्तेभर चले इस कार्यक्रम के अंत में मन को हर लेने वाले तीस पोस्टर मिले। सबसे ज्यादा पोस्टर ईदगाह और नन्हा दोस्त पर बनाए गए। पंच परमेश्वर पर भी  बेहद सुन्दर पोस्टर बनाए गए। बच्चों को प्रेमचन्द तक और प्रेमचन्द को बच्चों तक लाने की इस अनूठी पहल का हिस्सा बनना बच्चों और विद्यालय के लि‍ए सुखद अनुभव रहा।

विद्यालय प्रबंधन द्वारा इस पहल को सराहा गया और भविष्य में इस तरह के आयोजन करते रहने व भागीदारी के लिए प्रेरित किया गया। विद्यालय की ओर से गौरव सक्सेना इस कार्यक्रम का हिस्सा बने। अगले वर्ष प्रेमचन्द जयंती को विद्यालय में हर्षोउल्लास के साथ मानाने का प्रण किया गया।

काव्योत्सव के बहाने सार्थक पहल

दीवार पत्रिका पर स्लाइड शो प्रस्तुोत करते महेश पुनेठा।

दीवार पत्रिका पर स्लाइड शो प्रस्तुोत करते महेश पुनेठा।

गंगोलीहाट: लोकतांत्रिक साहित्य मंच की ओर से 11 व 12 जून को ब्लाक संसाधन केन्द्र गंगोलीहाट के सभागार में दो दिवसीय ‘ काव्योत्सव’ संपन्न हुआ। इसमें कविता पोस्टर प्रदर्शनी, दीवार पत्रिका पर स्लाइड शो, काव्यगोष्‍ठी, प्रकृति भ्रमण तथा नागार्जुन के कृतित्व पर विचार गोष्‍ठी का आयोजन किया गया।

पहले दिन दीवार पत्रिका पर स्लाइड शो से कार्यक्रम की शुरूआत हुई। दीवार पत्रिका के सम्बन्ध में शि‍क्षक-कवि व आलोचक  महेश चंद्र पुनेठा ने इसके उद्देश्‍यों पर प्रकाश डालते हुए, विभिन्न विद्यालयों से आए हुए बच्चों, अभिभावकों, शि‍क्षकों व उपस्थित जन समूह को उपयोगी व्याख्यान दिया। दीवार पत्रिका के माध्यम से किस प्रकार बच्चों की रचनात्मक क्षमता का विकास होता है तथा वे विषय को आसानी से समझते हुए अपनी सम्पूर्ण भागीदारी का निर्वहन करते हैं, को देशभर में चल रहे दीवार पत्रिका निर्माण व उसके प्राप्त हो रहे सकारात्मक परिणाम के माध्यम से समझाया। उन्होंने स्वयं अपने विद्यालय में इसके माध्यम से प्राप्त परिणामों को साक्ष्य सहित छात्र-छात्राओं तथा अध्यापकों के सम्मुख प्रस्तुत किया तथा शि‍क्षकों से अपील की कि वे बच्चों में रचनात्मक शक्ति का विकास करने तथा उनकी कल्पना शक्ति को पंख देने के लिए व स्थाई ज्ञान को प्राप्त करने में सहज रूप से दीवार पत्रिका का उपयोग करें। इससे जहां एक ओर बच्चे अपने समय का सदुपयोग करेंगे, वहीं दूसरी ओर उनमें सीखने और समझने की जिज्ञासा निरन्तर बढ़ेगी। उन्होंने विभिन्न उदाहरणों के माध्मम से सीखने-सिखाने में इसकी उपयोगिता का सहज चित्रण किया। बीच-बीच में बच्चों के साथ पहेली, चुटकुले, बिंब निर्माण, षीर्शक चयन से संबंधित गतिविधियां करवाई गईं। एक अच्छी दीवार पत्रिका में क्या-क्या स्तम्भ होने चाहिए तथा उन्हें कैसे तैयार किया जा सकता है आदि के संबंध में स्लाइड शो के माध्यम से बताया। बच्चों को कुछ छोटी-छोटी फिल्में भी दिखाईं। इस स्लाइड शो तथा उस पर आधारित आकर्षक प्रस्तुतीकरण के बाद विद्यालयों से आए हुए छात्र-छात्राओं से विविध विधाओं पर मौलिक लेखन करवाया गया। यद्यपि प्रारंभ में बच्चों में कुछ झिझक देखी गई, परन्तु जैसे ही उन्होंने लिखना आरंभ किया, धीरे-धीरे उनका आत्मविश्‍वास बढ़ता गया और वे सहज रूप से लिखने लगे। इस कार्यशाला में बच्चों ने लेखन की बारीकियों को समझते हुए कई विधाओं पर स्वयं अपनी रचनाएं तैयार कीं।

इस अवसर पर कार्यक्रम स्थल में सुप्रसिद्ध चित्रकार कुंवर रवीन्द्र द्वारा बनाए गए देश के प्रतिष्ठित और युवा कवियों की कविताओं की पोस्टर प्रदर्शनी का भी आयोजन किया गया। रेनेसां और कस्तूरबा आवासीय बालिका विद्यालय के विद्यार्थियों सहित स्थानीय शि‍क्षकों, आमंत्रित कवियों और साहित्य व कला प्रेमियों ने दशाईथल में आयोजित इस प्रदर्शनी का अवलोकन किया। इन कविता पोस्टरों का अवलोकन करते हुए भी बच्चों ने कविता की बारीकियों को समझा और शायद इसी का परिणाम था कि शाम को आयोजित कवि गोष्ठी में लगभग बीस छात्र-छात्राओं ने अपनी मौलिक कविताओं का मंच पर पाठ किया। गंगोलीहाट जैसी छोटी जगहों पर इस तरह की प्रदर्शनी का आयोजन होना बड़ी बात है। इससे बच्चों में कला और साहित्य के प्रति रूझान बढ़ता है। बच्चों में चित्रों को पढ़ने की क्षमता का विकास होता है। कविता की समझ पैदा होती है। लगभग चार दर्जन पोस्टरों का प्रदर्शन किया गया, जिनमें हिंदी के प्रतिष्ठित कवियों की कविताएं थीं। जिन कवियों की कविताओं के पोस्टर लगाए गए उनमें प्रमुख थे- शील, रघुवीर सहाय, मानबहादुर सिंह, नागार्जुन, मुक्तिबोध, केदारनाथ सिंह, ओमप्रकाश बाल्मीकि, नरेश सक्सेना, केशव तिवारी, शि‍रीष कुमार मौर्य, अनुज लुगुन, नवनीत पांडे, बुद्धिलाल पाल, महेश चंद्र पुनेठा, अविनाश मिश्र, रेखा चमोली।

उल्लेखनीय है कि कुंवर रवीन्द्र अब तक लगभग अठारह हजार से अधिक चित्र और कविता पोस्टर बना चुके हैं। देश के लगभग दो सौ छोटे-बड़े शहरों में उनके चित्रों की प्रदर्शनी लग चुकी है। गत वर्ष पिथौरागढ़ में आयोजित पहले लोक विमर्श कार्यक्रम में इन चित्र और पोस्टरों की प्रदर्शनी लगी थी, जिसमें देशभर से लगभग दो दर्जन साहित्यकार उपस्थित रहे।

सायं सात बजे से ब्लाक संसाधन केन्द्र के सभागार में कवि गोष्ठी का आयोजन किया गया जिसमें कुमाऊंभर से आए हुए प्रतिष्ठित कवियों ने काव्य पाठ किया। साथ ही बीच-बीच में देश-विदेश के प्रतिष्ठित कवियों का काव्य पाठ उनके स्वयं के स्वर या किसी दूसरे के स्वर में प्रोजेक्टर के माध्यम से किया गया। इन कवियों में मंगलेश डबराल, नरेश सक्सेना, पाश, नाजिम हिकमत, ओमप्रकाश बाल्मीकि, अनामिका, मुक्तिबोध आदि प्रमुख थे। कवि सम्मेलन में कस्तूरबा बालिका आवासीय विद्यालय से आए लगभग दो-दर्जन छात्राओं द्वारा भी स्वरचित कविताओं का वाचन किया, जिसे काफी सराहा गया। कुमाऊंनी कवि जनार्दन उप्रेती की अध्यक्षता में आयोजित इस काव्य संगोष्ठी के मुख्य अतिथि राजकीय इण्टर कालेज दशाईथल के प्रधानाचार्य किशोर कुमार पन्त रहे। काव्‍य संगोष्‍ठी का संयोजक युवा साहित्यकार रमेश जोशी ने कि‍या।

अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में व्याप्त बुराइयों पर कवियों ने अपनी कलम की पैनी धार चलाते हुए समाज को सकारात्मक दिशा की ओर ले जाने का आह्वान किया। सम सामयिक विषयों के साथ-साथ ऐसे विषयों को इन्होंने अपनी कविताओं में स्थान दिया, जहां पर सामान्य व्यक्ति की निगाह नहीं जाती है। सभी प्रतिष्ठित कविगणों द्वारा अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज में मौजूद विसंगतियों-विडंबनाओं पर करारी चोट की गई तथा एक लोकतांत्रिक और शोषणमुक्त समाज बनाने का स्वप्न पेश किया। देर रात्रि तक चले इस कवि सम्मेलन में अल्मोड़ा से आये चर्चित कुमाऊंनी कवि शंकर दत्त जोशी, युवा कवि-आलोचक  महेश पुनेठा, रमेश चन्द्र जोशी, कुमाऊंनी कवि प्रकाश चन्द्र जोशी,  विनोद उप्रेती, राजेश पन्त, डा. मोहन आर्य, आशा सौन, विक्रम नेगी, नवीन विश्‍वकर्मा, ‘बाखली’ के संपादक गिरीश पाण्डे ‘प्रतीक’ दिनेश पाण्डे, कवि-रंगकर्मी जनार्दन उप्रेती, किशोर कुमार पन्त आदि ने अपनी कविताओं का पाठ किया। इस कवि गोष्ठी में विद्या प्रसाद भट्ट, रवि पुनेठा, नवीन चन्द्र पन्त,  कमलेश पन्त,  राजेन्द्र खाती,  सुनील उप्रेती,  संदीप जोशी, हरीश पण्डा, मनोज वर्मा, श्री दिनेश पाण्डे, डा. ज्योति निवास पन्त, कुमारी रेणू साह, दीपक पन्त और पिथौरागढ़ से आए ‘आरम्भ’ समूह के युवा साथी रोहित बि‍ष्‍ट, आयुष जोशी, महेन्द्र रावत, अभि‍षेक पुनेठा सहित दो दर्जन से अधिक साहित्य प्रेमी उपस्थित रहे।

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दूसरे दिन की शुरूआत पाताल भुवनेश्‍वर गुफा के भ्रमण से हुई। देवदार के जंगलों के बीच अवस्थित यह गुफा लगभग डेढ़ सौ मीटर लंबी है। यह पौराणिक गुफा है, जिसका वर्णन स्कंदपुराण के मानसखंड में भी है। वहां से लौटकर  बाबा नागार्जुन के कृतित्व पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन हुआ। वक्ताओं का कहना था कि बाबा नागार्जुन जनता के कवि हैं। उनकी कविताएं सीधे जनता से संवाद करती हैं। उनके जीवन और भाषा दोनों को अपनी कविताओं का अंग बनाते हैं। क्रियाशील जीवन से कथ्य और रूप का चुनाव करते हैं। नागार्जुन जीवनभर उन्हीं के पक्ष में लिखते रहे और जनविरोधी सत्ता का प्रतिपक्ष रचते रहे। यह प्रतिपक्ष केवल कविता तक ही सीमित नहीं था, बल्कि जीवन में भी दिखता था। जनआंदोलनों में भाग लेना और जेल जाना इस बात का उदाहरण है। नागार्जुन न केवल जनता के कष्‍टों और संघर्षों को चित्रित करते हैं, बल्कि उनसे मुक्ति का रास्ता भी बताते हैं। सामूहिकता पर उनका गहरा विश्‍वास रहा। अपने लोक और जनपद से गहरे तक सपृक्त रहे। इस सबके चलते वह जनकवि कहलाए।

‘नागार्जुन का व्यक्तित्व और कृतित्व’ विषयक गोष्‍ठी की अध्यक्षता करते हुए युवा साहित्यकार रमेश जोशी ने कहा कि नागार्जुन एक ऐसे कवि थे, जो आजीवन समाज में बदलाव के लिए लिखते रहे और सत्य के पक्ष में खड़े रहे। उन्होंने अपने जीवन में जो भी कविताएं लिखीं, पहले वे उससे होकर गुजरे। उनकी समदृष्टि ही उन्हें समकालीन साहित्यकारों से पृथक बनाती है। उन्होंने समाज में व्याप्त कुरीतियों, घटित हो रहे अत्याचारों आदि पर अपनी कलम चलाई और इसके लिए जो भी दोषी हो, उसे कटघरे में खड़ा किया। चाहे वो कितना ही प्रभावशाली ही क्यों न हो। जन सामान्य की भलाई के लिए आजीवन सत्ता से उन्होंने संघर्ष किया। उन्हें समाज में वो सब दिखता था, जो कि औरों की नजरों में नहीं होता था। उन्होंने कवियों से अपील करते हुए कहा कि आज साहित्यिक क्षेत्र के लोगों को लिखने के लिए बाबा नागार्जुन को पहले पढ़ना होगा। विशेषतया कवियों को ध्यान देना होगा कि वे जिस प्रकार का साहित्य सृजन कर रहे हैं, उसे जि‍ए भी। कविता को जीना बहुत जरूरी है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में तो इसका और भी महत्व हो जाता है, जबकि महत्वाकांक्षाएं चरम पर हैं। ऐसी स्थिति में कोरे आदर्शों का कोई महत्व नहीं होगा। अतः हम सभी साहित्य बिरादरी के लोगों को चाहिए कि समाज की आवश्‍यकताओं के अनुरूप लिखा जाए और उसे जिया जाना भी जरूरी है। बाबा नागार्जुन चूंकि जनकवि थे, उनके आदर्शों पर चलकर ही हम वास्तविक साहित्य साधना करते हुए समाज हित में कुछ सकते हैं।

बतौर मुख्य अतिथि पशु चिकित्सक व युवा कवि डॉ. मोहन आर्या ने नागार्जुन की चर्चित कविता ‘हरिजन गाथा’ का संदर्भ देते हुए कहा कि भले इस कविता की कुछ सीमाएं हैं, बावजूद इसके यह दलित जीवन और प्रतिरोध की एक बड़ी कविता है। उनके समकालीनों ने कभी इस तरह के वि‍षय नहीं उठाए। उन्होंने आगे कहा कि आज आवश्‍यकता है कि हम बाबा नागार्जुन को समझें। इसके लिए जरूरी है कि पहले हम उनके साहित्य का अध्ययन करें। जिन परिस्थितियों व देशकाल में उनके द्वारा लिखा गया, इसे भी ध्यान में रखना होगा। इससे पूर्व युवा कवि विक्रम नेगी ने नागार्जुन की कविता ‘बाकी बच गया अंडा’ का पाठ किया। शि‍क्षक-कवि राजेश पंत ने नागार्जुन की काव्य-प्रतिभा पर बोलते हुए उनकी ‘अकाल और उसके बाद’ तथा ‘देवदार’ कविताओं को प्रस्तुत किया। उन्होंने भी इस बात पर बल दिया कि कवियों के लिए उनका साहित्य पढ़ना ही नहीं, बल्कि उनकी परम्परा को आगे बढ़ाना भी जरूरी है। ‘आरम्भ’ समूह की ओर से अभिषेक पुनेठा, रोहित बिष्‍ट, महेंद्र रावत, आयुष जोशी ने संयुक्त रूप से नागार्जुन की प्रदीर्घ कविता ‘हरिजन गाथा’ की नाट्य प्रस्तुति दी। युवा कवि-छायाकार विनोद उप्रेती ने नागार्जुन की कविताओं का पाठ करते हुए कहा कि हमें नागार्जुन के जीवन-मूल्यों को अपने में उतारकर कविता लिखनी होगी। तभी सही अर्थों में हम उनकी परम्परा को आगे बढ़ा पाएंगे। अल्मोड़ा से आए कुमाऊंनी कवि शंकर दत्त जोशी ने नागार्जुन को समर्पित अपनी ‘आरक्षण’ कविता सुनाई। महेश चंद्र पुनेठा ने नागार्जुन के जनकवि कहलाने के कारणों पर अपना आलेख पढ़ा। उन्होंने कहा कि नागार्जुन की कविताएं जनता के यथार्थबोध को जाग्रत कर उसकी चेतना का विस्तार करते हुए जनता के मुक्ति संघर्ष को शक्ति और दिशा देती हैं। अपने समय और समाज की जनता की इच्छाओं, भावनाओं, जीवन उद्देश्‍यों और संघर्षों को अभिव्यक्त करने के कारण ही नागार्जुन की कविताएं लोकप्रिय हैं और इन्हें जनकवि होने का सम्मान प्राप्त है। उन्होंने रेखांकित किया कि नागार्जुन की लोकप्रियता का सबसे पहला कारण उनकी सहजता ही है। उनके पास जटिल से जटिल बातों को भी बड़ी सहजता से कविता में व्यक्त करने का कौशल है। दूसरा कारण उन्होंने कविता को पहले अपने जीवन में रचा फिर कागज पर। तीसरा कारण उनकी लोकपरकता रही। वह लोक और जनपद के बहुत नजदीक रहे, वहीं से कथ्य और रूप ग्रहण किया। क्रियाशील जन से ही भाषा सीखी। चौथा कारण- बाबा में सामूहिकता की भावना गहरे तक पैठी हुई थी। समूह में रहना और सामूहिक संघर्ष करना उनकी फितरत में शामिल रहा। उन्होंने जहां भी दमन-शोषण-उत्पीड़न तथा जीवन का अपमान देखा, अपनी रचना से उसका प्रतिरोध किया। पांचवा कारण- प्रकृति से उनकी निकटता है। उनकी कविताओं में प्रकृति के विविध रूप-रंग देखे जा सकते हैं। इनमें जीवन का सौंदर्य और जीवन का संघर्ष दोनों ही व्यक्त होते हैं। वरिष्‍ठ कवि-रंगकर्मी जनार्दन उप्रेती, जनकवि प्रकाश चंद्र जोशी ‘शूल’, युवा कवयित्री आशा सौन आदि ने भी अपने विचार व्यक्त किए। इस अवसर पर ज्योति निवास पंत, दीप पंत, जोगा राम आदि साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे। विचार गोष्‍ठी  का सफल संचालन युवा कवि और ‘बाखली’ के संपादक गिरीश चंद्र पाण्डेय ‘प्रतीक’ ने किया।

प्रस्तुति – रमेश चन्द्र जोशी

 ‘स्क्रीन पर स्त्री’ विषय  पर संगोष्ठी आयोजि‍त

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दिल्ली :  टेलीविजन अपने चरित्रों को पहले लोकप्रिय बनाता है और फिर हमारे वास्तविक जीवन मे उसकी दखल होती है। हम जो वास्तविक जिंदगी मे हैं, वो व्यक्तित्व टेलीविजन बाहर निकालकर लाता है। यह विचार सुपरिचित मीडिया विश्‍लेषक विनीत कुमार ने हिन्दू कालेज की वीमेंस डेवलपमेंट सेल के वार्षिक उत्सव समारोह मे ‘स्‍क्रीन पर स्‍त्री’ विषय  संगोष्ठी में व्यक्त किए।  विषय के टेलीविजन से जुड़े पक्ष पर विनीत कुमार ने कहा कि इस दिल्ली शहर में दर्जनों ऐसी शॉप, शोरूम हैं, जहां बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा होता है- यहां टीवी सीरियलों की डिजाइन की जूलरी मिलती है। आप चले जाइए कटरा अशर्फी और सिरे से खारिज कीजिए साडियों के डिजाइन, लंहगे के स्टाइल और रंगों को..दूकानदार आपको सीधा जवाब देगा कि आप जिसे नापसंद कर रही हैं, उसे अक्षरा, काकुली, पार्वती, प्रिया भाभी पहनती हैं। कई बार दर्शक खुद ग्राहक की शक्ल में इनकी मांग करते हैं। उन्होंने कहा कि दूसरी तरफ टीवी स्‍क्रीन का पर्दा अपने तमाम स्त्री चरित्रों को अच्छे-बुरे में विभाजित करता है।  कोहेन ने सोप ओपेरा पर गंभीर अध्ययन करते हुए विस्तार से बताया है कि जो अच्छी चरित्र के खाते में होंगी, वो परंपरा, परिवार, मूल्य, संस्कार आदि ( भले ही वो कई स्तरों पर जड़ ही क्यों न हों) बचाने में सक्रिय होंगी, जबकि जो खल चरित्र होंगी, वो प्रगतिशील, पढ़ी-लिखी, कामकाजी, खुद की पहचान के लिए जद्दोजद करती नजर आएंगी अकादमिक-साहित्यिक दुनिया से ये बिल्कुल उलट छवि है।

संगोष्ठी में पक्ष सिनेमा पर बात करते हुए युवा फिल्म आलोचक मिहिर पंड्या  ने बताया  कि हिन्दी सिनेमा हमेशा नायक प्रधान होता है। इसमें नायिका का काम नायक को उत्कर्ष तक पहुँचाना होता है। स्त्री को केन्द्र मे रखकर सिनेमा इतिहास पर बात करते हुए ‘मदर इंडिया’ से इधर की ‘क्‍वीन’  और ‘मसान’  जैसी समसामयिक फिल्मों की चर्चा की। ‘मदर इंडिया’ के क्लाइमेक्स पर बात करते हुए ‘राधा माँ’ को भारत माँ का सुपर इंपोज़ होते हुए बताया, जिसका सीधा संबंध आज़ाद भारत मे प्रेम के मानक को गढ़ना था। 1995 मे आई सुपर हिट फिल्म ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएगे’ को उदारीकरण, भूमंडलीकरण से जोड़कर देखते हुए थम्स अप जैसे उत्पादों को सिनेमा द्वारा संकेतिक रूप से स्वीकारने की बात कही।

संगोष्ठी में मौजूद विद्यार्थियों ने दोनों वक्ताओं से सवाल पूछे। संगोष्ठी के प्रारम्भ में दोनों वक्ताओं का परिचय देते हुए हिंदी विभाग के अध्यापक डॉक्‍टर पल्लव ने कहा कि सिनेमा और टीवी की आलोचना को अकादमिक बहसों की गंभीरता के स्तर पर चिंतन योग्य बनाने में विनीत और मिहिर के लेखन की बड़ी भूमिका है। दोनों अतिथियों, सेल की छात्राओं और डॉ नीलम सिंह ने दीप प्रज्ज्वलन कर आयोजन का शुभारम्भ किया। संगोष्ठी में हिन्दू कालेज के अतिरिक्त बाहर के कालेजों से भी अध्यापक और विद्यार्थी उपस्थित थे। अंत में वीमेंस डेवलपमेंट सेल की प्रभारी डॉ रचना सिंह ने सभी का आभार माना।

प्रस्तुति‍: अनुपमा रे
अध्यक्षा, वीमेंस डेवलपमेंट सेल, हिन्दू कालेज, दिल्ली

साहित्य लोगों को सहिष्णु बनाता है: उदय प्रकाश

 

Uday Prakash

कार्यक्रम में विचार व्‍यक्‍त करते कथाकार उदय प्रकाश।

दिल्ली : साहित्य सिर्फ कहानी नहीं कहता है, वह  लोगों को सहिष्णु और संवेदनशील बनाता है। हो सकता है कि सहिष्णु बनाने की यह  प्रक्रिया बहुत ही छोटे स्तर पर हो, और हो सकता है कि यह सिर्फ वैयक्तिक स्तर पर हो। ये विचार चर्चित लेखक उदय प्रकाश ने व्यक्त किए। वह जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के एल्युमनी एसोसिएशन का 21 नवंबर 2015 को तीसरा सालान व्याख्यान दे रहे थे। एल्युमनी एसोसिएशन ऑफ जेएनयू के इस आयोजन में उन्होंने साहित्य की भूमिका पर बात करते हुए कहा कि साहित्य अपने समय की अर्थव्यवस्था को भी समझाता है, हालांकि उसके समझाने का तरीका अलग होता है। उपन्यास की अवधारणा पर जोर देते हुए उदय प्रकाश ने कहा कि यूरोप में भले ही उपन्यास की अवधारणा मध्यवर्ग से जुडी़ हुई हो, लेकिन एशियाई देशों में यह किसानी अर्थव्यवस्था को अभिव्यक्त करने वाली विधा है। उन्होंने अपने लेखन के संदर्भ से कहा कि साहित्य उन परिस्थितियों को पहचानता है, जिनमें व्यक्ति जीवनयापन करता है।

अपने व्याख्यान में उदय प्रकाश ने वर्तमान समय में लेखक की असुरक्षा के प्रसंग पर कहा की आज हमारी भाषा में लेखक का हिस्सा कम हो गया है। यह चिन्ताजनक स्थिति है और इसी के कारण समाज में लेखक के हालात पर कोई ख़ास ध्यान नहीं दिया जाता है। असहिष्णुता के मुद्दे पर साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि मैंने सबसे पहले पुरस्कार लौटाया था इसलिए मुझे सबसे ज़्यादा यह पूछा जाता है कि आपातकाल के दौरान मैंने क्या किया? उन्होंने बताया कि आपातकाल के दौर में मैं 20-22 साल का था, अवार्ड तो था ही नहीं, लेकिन आपातकाल के विरोध के कारण उन्हें सागर विश्वविद्यालय छोड़ना पड़ा था। अपने जेएनय़ू के दिनों को याद करते हुए उन्होंने यहाँ के अंतरानुशासनात्मक अध्ययन की प्रशंसा की और कहा कि उस समय जेएनयू में औपचारिकताएँ नहीं होती थीं।

कार्यक्रम के प्रारंभ में एसोसिएशन के अध्यक्ष देवेन्द्र चौबे ने कहा की उदय प्रकाश कहानी कहने की शैली में तो अनूठे हैं ही, साथ ही, उनके कथा संसार की संवेदना इतनी व्यापक है कि समाज का कोई तबका उससे नहीं छुटता है। उन्होंने एसोसिएशन की गतिविधियों की जानकारी देते हुए कहा कि जेएनयू सिर्फ डिग्री नहीं देता है, बल्कि समाज से जुड़े हुए लेखक और बौद्धिक भी देता है, उदय प्रकाश ऐसे ही लेखक और बुद्धिजीवी हैं। एसोसिएशन के उपाध्याक्ष्य राजेश कुमार ने धन्यवाद ज्ञापित करते हुए उदय प्रकाश के साहित्य की प्रासंगिता पर जोर देते हुए कहा कि आज के समय में उदय प्रकाश जैसे लेखकों का दायित्व और महत्व बढ़ जाता है। व्याख्यान के बाद हुई परिचर्चा में मणीन्द्र नाथ ठाकुर, दुर्गाप्रसाद गुप्त, अखलाक आहन, जैनेन्द्र कुमार, प्रणव कुमार, मीता नारायण, उदय शंकर, अनीसुर रहमान सहित कई लोगों ने भाग लिया।

प्रस्‍तुति- गणपत तेली

लोकतांत्रिक समाज में प्रतिरोध के स्वर का होना जरूरी है : मंगलेश डबराल

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नई दि‍ल्‍ली :  ‘हमारे देश में जो फासीवादी माहौल बना है, उसके पीछे एक लंबी प्रक्रिया रही है। यह धर्म आधारित फासीवाद है, जो जाति और जेंडर के स्तर पर हिंसा को वैधता प्रदान करता है। घृणा और हिंसा को स्टेट पावर का समर्थन हासिल है। कल तक आपस में एक-दूसरे समुदाय पर जो आक्षेप लोग घरों के भीतर बैठकर लगाते थे, जो गंदगी दबी हुई थी, अब उसे खुल्लममखुल्ला मान्यता मिल गई है।’ 7 नवम्‍बर को गांधी शांति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली में ‘हिंसा की संस्कृति बनाम असहमति, चुनाव और प्रतिरोध’ विषय पर चौथा कुबेर दत्त स्मृति व्याख्यान देते हुए मशहूर नारीवादी और इतिहासकार उमा चक्रवर्ती ने यह कहा।

उमा चक्रवर्ती ने कहा कि डॉ. नरेंद्र दाभोलकर और पानसरे तो तर्कवादी बुद्धिजीवी थे, कलबुर्गी तो उसी समाज के बारे में लिख रहे थे, जिसकी जाति और कर्मकांड विरोधी परंपरा थी, लेकिन  उसे भी बर्दाश्त नहीं किया गया। अब तो हालत यह हो गई है कि हम अपनी ही परंपरा को खोलकर नहीं देख सकते, क्योंकि हमारे ऊपर जो ठेकेदार बैठे हैं, वे हमारा मुंह दबा देंगे। जो हमारी परंपरा है उसके भीतर भी हम उतरेंगे तो हम पर इल्जाम लगेगा कि हम भावनाओं को आहत कर रहे हैं। भावनाएं आहत होने को आज एक तरह से संवैधानिक अधिकार बना दिया गया है। आज के जमाने में ज्योति बा फुले होते, तो उन्हें भी मार दिया जाता।

उमा चक्रवर्ती ने कहा कि आज जो बगावत शुरू हुई है, वह देर से ही सही पर दुरुस्त शुरुआत है। सोचने और चुनने का अधिकार और उसके अनुरूप क्रियाशील होना हमारा बुनियादी अधिकार है। इसका कोई मतलब नहीं है कि पहले क्यों नहीं बोले, अब क्यों बोल रहे हैं? आनंद पट्टवर्धन ने कहा कि वे इमरजेंसी के खिलाफ थे, तो उनसे पूछा जा रहा है कि माओइस्टों के खिलाफ क्यों नहीं बोला? कारपोरेट मीडिया में जो डिबेट हो रहा है, उसके जरिए एक पोलराइज्ड हिस्टिरिया निर्मित की जा रही है। एक ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि कोई किसी चीज के बारे में कुछ बोल नहीं सके।

उमा चक्रवर्ती ने यह भी संकेत किया कि इस उन्माद और हिंसा का जनविरोधी आर्थिक नीतियों को ढंकने के लिए भी इस्तेमाल किया जा रहा है। वे नहीं चाहते कि बजट में जो कटौती हो रही है, उस पर कोई बात हो। अब हमारे सामने सवाल यह है कि हम कैसे अपनी बात कहेंगे, कैसे लिखेंगे, कैसे दूसरों से बातचीत करेंगे? कैसे हम अंततः कोई राजनीतिक गोलबंदी करेंगे?

उमा चक्रवर्ती ने कहा कि सांप्रदायिकता आज की चीज नहीं है, इसका लंबा इतिहास है। उन्होंने कुछ घटनाओं का जिक्र करते हुए बताया कि लिंग और जाति के स्तर पर मौजूद मानवविरोधी व्यवहार भी सांप्रदायिक शक्तियों के लिए मददगार सिद्ध हो रहा है। उन्होंने कहा कि जिस समाज में अंतर्जातीय शादियों पर घिनौनी प्रतिक्रियाएं होती हैं, वहां बाबू बजरंगी पैदा होंगे ही। उसने कहा था कि हर हिंदू घर में एक एटम बम है यानी घर में जो लड़की है, वह एटम बम है, कभी भी फूट सकती है, क्योंकि वह कभी भी किसी के साथ जा सकती है, क्योंकि उस लड़की के हाथ में यह अधिकार है कि वह किसी को चुन लेगी। इसकी गहरी वजह हमारी सामाजिक संरचना में है। यही मानसिकता ‘लव जेहाद’ का प्रचार करती है, जिसे लेकर दंगे हो जाते हैं।

उन्होंने कहा कि राजनीति हर चीज में है। किस तरह का घर होगा, किस तरह की शादी होगी, किस तरह का कौम बनेगा, किस तरह का हमारा देश बनेगा, ये सवाल राजनीति से अलग नहीं हैं। मुझे लगता है कि फासिज्म तो हमारे प्रतिदिन के जीवन में है। उन्होंने कहा कि सहिष्णुता तो हमारी सामाजिक संरचना में है ही नहीं। पहले जो लोग अपनी जीवन शैली थोड़ी –सा बदलते थे तो समाज उन्हें बहिष्कृत कर देता था, आज तो मार ही दिया जा रहा है। मीडिया की छात्रा निरूपमा जो ब्राह्मण थी और कायस्थ लड़के से प्रेम करती थी, उसकी मौत का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि उसके पिता ने उसे चिट्ठी लिखी थी कि तुम जिस संविधान की बात कर रही हो, उसको सिर्फ साठ साल हुए हैं, हमारा संविधान जो है वह 2000 साल का है। उनका जो संविधान है, वह ब्राह्मणवादी मान्यताओं पर आधारित है।

उमा चक्रवर्ती ने कहा कि आज हाशिये के समाजों से चुनौती आएगी ही आएगी। वे लोग अपना हक मांगेंगे, कोई भी चुप नहीं रहने वाला। युवाओं की ओर से भी चुनौती आ रही है। वे बड़े दायरे में चीजों को देख रहे हैं, उनमें प्रश्नात्मकता आई है। आपातकाल के दौरान बुद्धिजीवियों की भूमिका को याद करते हुए उन्होंने कहा कि शासकवर्ग देख रहा है कि विश्वविद्यालयों से भी चुनौती आ रही है, तो वहां भी हिंसा जरूर आएगी, हमें उसका विरोध करना होगा। सार्वजनिक बयानों से कुछ तो फर्क पड़ा है। आगे चलकर हमें देखना होगा कि हम किस तरह का प्रतिरोध और आंदोलन खड़ा कर सकते हैं। प्रतिरोध की संस्कृति को हमें बनाना होगा, उसे फिर से सृजित करना होगा। हमें हर चीज पर बोलना होगा। हक के लिए हो रही हर लड़ाई को आपस में जोड़ना होगा। अगर मैं जिंदा हूं तो बोलूंगी। बकौल फैज़ – बोल कि सच जिंदा है अब तक।

व्याख्यान के बाद श्रोताओं ने उनसे सवाल पूछे, जिसका जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि हम सच्चे देशभक्त हैं। देश के प्रतिनिधि सत्ताधारी नहीं हो सकते। कारपोरेट मीडिया और देश के शासकवर्ग के बीच एक तरह की मैच फिक्सिंग है। वे सोनी सोरी के टार्चर के मुद्दे को नहीं उठाते। टार्चर करने वाले अधिकारी को इस देश में गैलेंट्री एवार्ड मिलता है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब सरकार कह रही है कि लेखकों-कलाकारों का विरोध मैनुफैक्चर्ड है, तो फिर ऐसी सरकार से बात कैसे हो सकती है?

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ कवि और जसम के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मंगलेश डबराल ने कहा कि लेखकों ने किसी राजनीतिक या सामूहिक निर्णय के आधार पर नहीं, बल्कि अपने विवेक और जमीर के आधार पर सम्मान वापसी का निर्णय लिया, जो स्वतःस्फूर्त रूप से एक अभियान बन गया।

उन्होंने सवाल उठाया कि क्या यह महज संयोग है कि भारत के तथाकथित राष्ट्रवादी और पाकिस्तान के उग्रवादी लगभग एक ही तरह की भाषा बोल रहे हैं? भारत में प्रतिरोध का सांस्कृतिक कर्म अगर अधिक मजबूत रहता तो ऐसी भाषा का विकास संभव न हो पाता जो अपनी प्रकृति में हिंसक और अलोकतांत्रिक है, जैसा आज आमतौर पर लोग अपने विरोधियों के लिए करते देखे जा रहे हैं। लोकतांत्रिक समाज में प्रतिरोध के स्वर का होना जरूरी है, उसका बहुमत या अल्पमत होना जरूरी नहीं। उन्होंने कहा कि देश किसी शेर की सवारी करती देवी का नाम नहीं है जिसे हम भारतमाता कहते हैं। देश, उस भूमि पर रहने वाली जनता की बहुत ठोस आकांक्षाओं और जरूरतों का नाम है जिसे जानबूझकर इन दिनों झुठलाया जा रहा है।

जसम के राष्ट्रीय सहसचिव सुधीर सुमन ने संचालन के क्रम में कुबेर दत्त की कुछ कविताओं के अंशों का पाठ करते हुए कहा कि सत्ता के इशारे पर होने वाले दमन और उसके संरक्षण में चलने वाली हिंसा का विरोध किसी भी जेनुईन रचनाकार की पहचान है। आज पहली बार एक साथ साहित्य-कला की सारी विधाओं से जुड़े लोग सामाजिक-राजनीतिक हिंसा की संस्कृति के खिलाफ खड़े हुए हैं। इस लड़ाई को जारी रखना देश और समाज के बेहतर भविष्य लिए जरूरी है।

कार्यक्रम में जमशेदपुर में इस साल जुलाई में हुए सांप्रदायिक दंगे पर फिल्म बनाने वाले युवा फिल्मकार कुमार गौरव को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और विश्व हिंदू परिषद द्वारा जान से मारने की धमकी दिए जाने की भर्त्सना की गई तथा छात्रों के आक्युपाई यूजीसी आंदोलन के समर्थन में प्रस्ताव लिया गया।

इस मौके पर वरिष्ठ कवि रामकुमार कृषक, वरिष्ठ चित्रकार हरिपाल त्यागी, लेखक प्रेमपाल शर्मा, दूरदर्शन आर्काइव की पूर्व निदेशक और नृत्य निर्देशक कमलिनी दत्त, कथाकार विवेकानंद, जसम के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष चित्रकार अशोक भौमिक, चित्रकार सावी सावरकर, आलोचक आशुतोष कुमार, लेखक  बजरंग बिहारी तिवारी, लेखिका अनीता भारती, संजीव कुमार सिंह, विकास नारायण राय, ज्ञानपीठ के पूर्व निदेशक दिनेश मिश्र, जसम उ.प्र. के सचिव युवा आलोचक प्रेमशंकर, प्रतिरोध का सिनेमा के राष्ट्रीय संयोजक संजय जोशी, पत्रकार प्रसून लतांत, अखिल रंजन, भाषा सिंह, उपेंद्र स्वामी, कलकत्ता से आए बुद्धिजीवी आशुतोष सिंह, कवि श्याम सुशील, तृप्ति कौशिक, शिक्षाविद राधिका मेनन, युवा कवि अरुण सौरभ, कल्लोल दास, आशीष मिश्र, वेद राव, रामनिवास, कमला श्रीनिवासन, निशा महाजन, रोहित कौशिक, राम नरेश राम, अनुपम सिंह, रविदत्त शर्मा, सोमदत्त शर्मा, चंद्रिका, असलम, दिनेश, सौरभ, पाखी जोशी आदि मौजूद थे।

सुधीर सुमन द्वारा जसम, दिल्ली के लिए जारी