Category: परिक्रमा

अलविदा, चिरयुवा साथी दूधनाथ सिंह!

दूधनाथ सिंह

नई दि‍ल्‍ली : ‘आख़िरी क़लाम’ जैसे अविस्मरणीय महाकाव्यात्मक उपन्यास और ‘रक्तपात’, ‘रीछ’, ‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे’, ‘माई का शोकगीत’ जैसी लम्बे समय तक चर्चा में बनी रहने वाली कहानियों के लेखक, जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष दूधनाथ सिंह नहीं रहे। उनका न रहना हिन्दी की दुनिया के लिए और विशेष रूप से जनवादी लेखक संघ के लिए एक अपूरणीय क्षति है। वे एक साल से प्रोस्ट्रेट कैंसर से पीड़ित थे। लगभग एक हफ़्ते पहले हालत बहुत बिगड़ने पर इलाहाबाद के फिनिक्स अस्पताल के गहन चिकित्सा कक्ष में उन्हें भर्ती कराया गया था। वहीं 11 जनवरी की रात 12 बजे उनका इंतकाल हुआ।

17 अक्टूबर 1936 को उत्तर प्रदेश के बलिया ज़िले के एक गाँव में जन्मे दूधनाथ जी अपनी शुरुआती कहानियों के साथ ही हिन्दी में साठोत्तरी पीढ़ी के प्रमुख हस्ताक्षर के रूप में उभरे थे। सत्तर के दशक की शुरुआत में आलोचना-पुस्तक ‘निराला: आत्महंता आस्था’ के साथ वे आलोचना के क्षेत्र में भी प्रतिष्ठित हुए। सन साठ के आसपास शुरू हुए, तकरीबन साठ वर्षों के अपने रचनात्मक जीवन में उन्होंने कहानी, उपन्यास, कविता, नाटक, संस्मरण और आलोचना—इन सभी क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान किया। पूर्वोल्लिखित रचनाओं के अलावा ‘यमगाथा’ नाटक, महादेवी पर लिखी आलोचना-पुस्तक, और संस्मरणों की पुस्तक ‘लौट आ ओ धार’ उनकी यादगार कृतियाँ हैं।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से 1957 में हिन्दी में एम.ए. करने के बाद दूधनाथ जी ने 1959 में कलकत्ता के रुंगटा कॉलेज से अध्यापन की शुरुआत की। कलकत्ता रहते हुए ही उन्होंने ‘चौंतीसवां नरक’ शीर्षक से एक उपन्यास-अंश और ‘बिस्तर’ कहानी लिखी जिसे कमलेश्वर के सम्पादन में निकलनेवाली ‘सारिका’ पत्रिका ने छापा और पुरस्कृत किया। दो साल बाद वे नौकरी छोड़कर इलाहाबाद लौट आये जहां कुछ समय बेरोज़गारी में गुज़ारने के बाद उन्हें इलाहाबाद विश्वविद्यालय में तदर्थ प्राध्यापक के रूप में नौकरी मिली। रचनात्मक कार्य इस बीच लगातार जारी रहा। 1963 में प्रकाशित ‘रक्तपात’ कहानी के साथ कहानीकारों की उस समय उभर रही पीढ़ी के प्रमुख हस्ताक्षर के रूप में उनकी पहचान बनी।

दूधनाथ जी की महत्वपूर्ण पुस्तकों की संख्या बीस से ऊपर है: उपन्यास—‘आख़िरी क़लाम’, ‘निष्कासन’, ‘नमो अन्धकारम’; कहानी-संग्रह—‘सपाट चेहरे वाला आदमी’, ‘सुखान्त’, ‘प्रेमकथा का अंत न कोई’, ‘माई का शोकगीत’, ‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे’, ‘तू फू’; कविता-पुस्तकें—‘अगली शताब्दी के नाम’, ‘एक और भी आदमी है’, ‘युवा खुशबू’, ‘सुरंग से लौटते हुए’; नाटक—‘यमगाथा’; संस्मरण—‘लौट आ ओ धार’; आलोचना—‘निराला: आत्महंता आस्था’, ‘महादेवी’, ‘मुक्तिबोध: साहित्य में नई प्रवृत्तियां’; साक्षात्कार—‘कहा-सुनी’. इनके अलावा उन्होंने ‘भुवनेश्वर समग्र’ और शमशेर पर केन्द्रित पुस्तक ‘एक शमशेर भी है’ का सम्पादन किया।उन्हें मिलनेवाले पुरस्कारों और सम्मानों में भारत भारती सम्मान, भारतेंदु हरिश्चंद्र सम्मान, शरद जोशी स्मृति सम्मान और कथाक्रम सम्मान प्रमुख हैं।

सामाजिक-राजनीतिक मसलों पर सजग और पैनी निगाह रखनेवाले दूधनाथ जी का लेखन अपने समय को इतने कोणों से पकड़ता है कि उन्हें पढ़ना एक युग के आरपार गुज़रने की तरह है।आज हमारा मुल्क जिस दौर में है, वहाँ 2003 में प्रकाशित, बाबरी मस्जिद ध्वंस पर केन्द्रित ‘आख़िरी क़लाम’ को बार-बार पढ़े जाने की ज़रूरत है, जिसकी भूमिका के रूप में लिखे शुरुआती हिस्से में आया यह वाक्य जैसे हमारे समय पर एक इल्हामी टिप्पणी है: ‘हमें इस बात का डर नहीं कि लोग कितने बिखर जायेंगे, डर यह है कि लोग नितांत ग़लत कामों के लिए कितने बर्बर ढंग से संगठित हो जायेंगे।’

ऐसे दूधनाथ जी अब हमारे बीच नहीं हैं। वे हमारी स्मृतियों में सदा बसे रहेंगे और अपनी रचनाओं से हमारा मार्गदर्शन करते रहेंगे।

(जनवादी लेखक संघ के महासचि‍व मुरली मनोहर प्रसाद सिंह और उप-महासचिव संजीव कुमार की ओर से जारी)

 

 

 

सावित्रीबाई फुले का संघर्ष भारतीय समाज के नवनिर्माण का संघर्ष था: डा. रामायन राम    

अमेठी : 3 जनवरी 2018 की सर्द सुबह देश के विभिन्न हिस्सों से जुटे साहित्यकार, लेखक, बुद्धिजीवी, शिक्षक सुल्तानपुर से लगे रामगंज बाजार के पास स्थित गाँव अग्रेसर में सावित्रीबाई फुले के जन्मदिन के अवसर पर ‘सावित्रीबाई फुले पुस्तकालय’ के उद्घाटन के साक्षी बने। पुस्तकालय का उद्घाटन प्रेमचंद, रेणु और श्रीलाल शुक्ल की परंपरा के वाहक और वारिस, ग्रामीण जीवन के यथार्थ के सजग चितेरे कथाकार शिवमूर्ति ने किया। इस पुस्तकालय का निर्माण इसी गांव में रहने वाली युवा लेखिका और शिक्षिका ममता सिंह ने अपने मित्रों, परिवार और स्थानीय लोगों की सहायता से किया है और वही इसका संयोजन, संचालन करेंगी।

उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए कथाकार शिवमूर्ति ने अपने बचपन की यादें साझा कीं। उन्होंने बताया कि किस तरह उन्हें अपने बचपन में एक मित्र के यहाँ किताबें पढ़ने को मिलती थीं, जिससे उनके भीतर पढ़ने की जिज्ञासा और लालसा पैदा हुई। उन्‍होंने कहा कि जिस प्रकार हमारे पारिवारिक वारिस होते हैं, ठीक उसी प्रकार हमारे लेखकीय, साहित्यिक वारिस भी होते हैं। अगर मैं कहानीकार के रूप में अपने को प्रेमचंद, रेणु और संजीव का वारिस मानूं तो ममता के रूप में हमें हमारा साहित्यिक वारिस मिल गया है, जो हमारे लिए बहुत गौरव की बात है। सावित्रीबाई फुले के स्त्री शिक्षा और समाज में दिए योगदान को याद करते हुए शिवमूर्ति ने बताया कि जब सावित्रीबाई ने स्त्रियों के लिए विद्यालय खोलने का निर्णय लिया तो लोगों ने उन्हें अनेक प्रकार से तंग किया। विद्यालय जाते समय उनके ऊपर छतों पर से कूड़ा फेंका जाता था, किंतु वे अपने संकल्प पर अडिग रहीं और भारत की पहली महिला शिक्षिका के रूप में जानी गईं।

शिवमूर्ति जी ने पुस्तकालय को आधुनिक और डिजिटल बनाने की आवश्यकता पर भी बल दिया।

वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. रामदेव शुक्ल ने  लेखि‍का बेबी हालदार की कहानी के ज़रिए बताया कि पढ़ने और लिखने के अवसर मनुष्य को किस तरह बदल देते हैं। घरों में चौका-बर्तन करने वाली  एक स्त्री को  लिखने-पढ़ने का अवसर मिला और आज वह अंतरराष्ट्रीय ख्याति की लेखिका हैं। ‘आलो आंधारि’ उनकी चर्चित पुस्तक है। उनके बच्चे बहुत गर्व से कहते हैं कि उनकी माँ ऑथर हैं ।

दिल्ली से आईं लेखिका और शिक्षिका मृदुला शुक्ल ने आज के समाज में स्त्रियों की भयानक दुर्दशा और शोषण के ज़रिए सावित्रीबाई फुले के संघर्षों के महत्व को याद किया। आज आधुनिक कहा जाने वाला हमारा समाज स्त्रियों को एक खास तरह की सामंती और पितृसत्तात्मक सोच के दायरे से बाहर निकल कर नहीं देख पाता तो डेढ़ सौ साल पहले के हमारे रूढ़िवादी समाज में स्त्रियों के लिए विद्यालय खोलने और स्त्री शिक्षा के लिए काम करने का निर्णय कितना चुनौतीपूर्ण रहा होगा, इसकी कल्पना की जा सकती है। उन्‍होंने सावित्रीबाई फुले को इस रूप में भी याद किया कि वे न होतीं तो शायद हमारी स्त्रियों को इस तरह के पढ़ने के मौके न मिल पाते।

पहले सत्र की अध्यक्षता ‘युग तेवर’ पत्रिका के संपादक कमल नयन पाण्डेय ने की। उन्‍होंने अपने वक्तव्य में बच्चों, स्त्रियों, युवाओं, किसानों, कामकाजी महिलाओं सभी के लिए पुस्तकें रखने का सुझाव दिया। संचालन पुस्तकालय के सह संयोजक गीतेश ने तथा धन्यवाद ज्ञापन पुस्तकालय की संयोजक ममता सिंह ने किया। अनेक शुभचिंतकों प्रो. राजेन्द्र कुमार, मीना राय, अनीस सिद्दीकी साहब आदि ने पुस्तकालय के लिए पुस्तकें भेंट की तथा शिवमूर्ति जी ने भविष्य में महत्वपूर्ण पुस्तकों, पत्रिकाओं के रूप में पुस्तकालय का सहयोग करते रहने का आश्वासन दिया।

पहला सावित्रीबाई फुले व्याख्यान

इस मौके पर ललितपुर से आए युवा आलोचक और जन संस्कृति मंच उत्‍तर प्रदेश के राज्य सचिव डॉ. रामायन राम ने पहला सावित्रीबाई फुले व्याख्यान दिया। उन्‍होंने न केवल सावित्रीबाई के स्त्री शिक्षा में योगदान को याद किया, बल्कि हमारे समाज के लिए सावित्रीबाई के संपूर्ण योगदान को रेखांकित किया। सावित्रीबाई फुले जब स्त्री शिक्षा के लिए निकलीं तो उनका विरोध सिर्फ रूढ़ विचार से ही नहीं, बल्कि शारीरिक हमलों के द्वारा भी किया गया। सावित्रीबाई फुले ने पुणे में विधवा गर्भवती स्त्रियों की प्रसूति के लिए आश्रम का निर्माण कराया तथा अपने जीवन काल में लगभग पाँच हजार ऐसी स्त्रियों को प्रसूति का अवसर उपलब्ध कराया। उन्होंने पूना में नाइयों की एक ऐतिहासिक हड़ताल कराई जिसमें शहर के नाइयों ने विधवा स्त्रियों का मुंडन करने से इन्कार कर दिया ।

रामायन ने इस बात की ओर ध्यान दिलाया कि हमारे समाज के वे तत्व जो जाति के भेदभाव और शोषण को और सघन बनाना चाहते थे, वे जानते थे कि सामंतवाद और स्त्री की यौनिकता पर नियंत्रण उनका प्रमुख हथियार होगा। यही कारण है कि सावित्रीबाई के प्रयासों का इतना भयंकर विरोध हुआ।

कोरेगांव में दलितों पर हुए ताजा हमले को याद करते हुए रामायन ने कहा कि आज की सामंती और साम्प्रदायिक ताकतें नया इतिहास गढ़ने का काम कर रही हैं और इसमें सोशल मीडिया पर झूठ और नफ़रत का जहर फैलाया जा रहा है, जिसके प्रतिरोध के लिए हमें किताबों की दुनिया में जाना होगा। यह पुस्तकालय इस लिहाज़ से भी एक महत्त्वपूर्ण पहल है।

अंत में रामायन राम ने सावित्रीबाई फुले की मौत को भी एक महान और प्रेरक मौत की तरह याद किया। उन्होंने बताया कि जब पुणे में प्लेग की महामारी फैली थी तो प्लेग रोगियों की सेवा करते हुए वे बीमार हुईं जो उनकी मौत का सबब बना, किंतु वे अपने अंतिम समय तक रोगियों की सेवा में लगी रहीं। सावित्रीबाई फुले का अभियान केवल शिक्षा के लिए नहीं था। वह भारतीय समाज के नवनिर्माण का आन्दोलन था। शिक्षा से शुरू करके उन्होंने स्त्री मुक्ति तक का सफर तय किया जो जाति उन्मूलन की लड़ाई से जुड़ा, जिसे बाद में अम्बेडकर ने हिन्दू कोड बिल के जरिए उठाया। लोकतंत्र, समता, बराबरी अचानक से नहीं आते हैं। वे समाज के भीतर के आंतरिक संघर्षों और विचार को लेकर लोगों के संघर्ष से आता है। भारतीय समाज एक जटिल समाज है, इसमें आधुनिकता के एक-एक कदम के लिए संघर्ष करना पड़ा है। सावित्रीबाई फुले ने ऐसे ही समाज के भीतर स्त्री शिक्षा और विधवा पुनर्वास के लिए संघर्ष किया। यह सिर्फ स्त्री शिक्षा के लिए चलने वाला आन्दोलन नहीं था, बल्कि समाज को भीतर से बदलने वाला, उसे जड़ से हिलाने वाला आन्दोलन/अभियान था। सावित्रीबाई फुले के इस आन्दोलन को आज फिर से नए सिरे से शुरू करने का समय है, जिसका एक रूप यह पुस्तकालय है।

सावित्रीबाई के नाम पर आयोजित यह व्याख्यान वार्षिक रूप में उनके जन्मदिन पर मनाने की योजना है।

हिंदी की साहित्यिक पत्रिका ‘कथा’ का लोकार्पण

तमाम तामझाम से दूर ‘कथा’ के 21वें अंक का लोकार्पण ‘सावित्रीबाई फुले पुस्तकालय’ अग्रेसर के उद्घाटन समारोह के दौरान  सादगी के साथ हुआ।   कथा के संपादक दुर्गा सिंह, कथाकार शिवमूर्ति, प्रो. प्रणय कृष्ण, प्रो. रामदेव शुक्ल और कमल नयन पाण्डेय ने पत्रिका का लोकार्पण किया। कथा का यह अंक अपनी सामग्री में बहुत समृद्ध और पठनीय है। पत्रिका का प्रकाशन कथाकार मार्कण्डेय की परंपरा को आगे बढ़ाने वाला है तथा सम्पादक दुर्गा सिंह से उम्मीद है कि इसे आगे भी जारी रखेंगे।

 रंगकर्मी, निर्देशक सफ़दर हाशमी की शहादत को याद किया गया

‘समकालीन जनमत’ के संपादक केके पाण्डेय ने इस अवसर पर रंगकर्मी, निर्देशक सफ़दर हाशमी की शहादत को याद किया। सफ़दर को याद करते हुए  पाण्डेय ने उनकी रंगकर्म के प्रति निष्ठा, राजनीतिक चेतना, किसान-मजदूरों के बीच उनके काम और उनकी लोकप्रियता का जिक्र किया तथा उनकी एक कविता का पाठ भी किया जो पुस्तकालय स्थापना के लिहाज से भी बहुत मौजूँ है-

किताबें करती हैं बातें
बीते जमानों की
दुनिया की, इंसानों की
आज की कल की
एक-एक पल की।
खुशियों की, गमों की
फूलों की, बमों की
जीत की, हार की
प्यार की, मार की।
सुनोगे नहीं क्या
किताबों की बातें?

 पुस्तकालय का एक हॉल होगा त्रिलोचन के नाम पर

पुस्तकालय से जुड़े हुए एक रीडिंग हॉल को सुल्तानपुर की धरती के महाकवि त्रिलोचन के नाम पर ‘त्रिलोचन सभागार’ नाम दिया गया। ललित कला अकादमी से पुरस्कृत चित्रकार प्रभाकर राय द्वारा बनाये गए त्रिलोचन के पोर्ट्रेट कथाकार शिवमूर्ति ने ममता सिंह को भेंट किया,  जिसे हॉल में लगाया जाएगा।

दूसरा सत्र रहा कविताओं के नाम

 कार्यक्रम के दूसरे सत्र में केके पाण्डेय के संचालन में कविता पाठ हुआ जिसमें सर्वश्री ओमप्रकाश मिश्र, प्रदीप कुमार सिंह,  डॉ. सी.बी. भारती, अनिल सिंह , बृजेश यादव,  मृदुला शुक्ल, आशा राम जागरथ और बालेन्द्र परसाई ने कविता पाठ किया।

इस गरिमामय आयोजन में मध्य प्रदेश के पिपरिया से एकलव्य के गोपाल राठी ने शिरकत। उन्‍होंने अपने विचार साझा करते हुए पाठकों की गिरती संख्या और पढ़ने के प्रति अरुचि पर चिंता जाहिर की और इस विपरीत समय में इस प्रयास की सराहना की। कार्यक्रम में ममता सिंह की अर्मेनियाई मित्र  लूसी ने  अपने हिंदी भाषा के प्रति प्रेम को व्यक्त किया। अनुराग सिंह ने इस पूरे कार्यक्रम को अपने सपने के पूरा होने की शुरुआत के रूप में रेखांकित किया। इस कार्यक्रम में सम्भावना कला मंच, गाजीपुर  के राजकुमार, ममता और  टीम ने शानदार कविता पोस्टर  तैयार किये और प्रदर्शनी लगायी। कार्यक्रम में उपस्थित अनेक मित्रों ने अपने यहाँ भी इस तरह की पहल का वायदा किया और हम उम्मीद करते हैं कि इस अभियान का हम अन्य जगहों पर तेजी से प्रसार कर सकेंगे।

गीतेश सिंह द्वारा सावित्रीबाई फुले पुस्तकालय के लिए जारी

पलायन की मजबूरी और छटपटाहट का चि‍त्रण- ‘नेचुरल रिंगटोन’  

चित्तौडगढ़ : ‘सम्भावना’ की ओर से आयोजित कार्यक्रम में कहानीकार कर्नल मुकुल जोशी ने अपनी कहानी ‘नेचुरल रिंगटोन’ का पाठ किया।

विजन स्कूल ऑफ मैनेजमेंट में 14 नवंबर को आयोजि‍त कार्यक्रम में कर्नल जोशी ने प्रभावपूर्ण ढंग से कहानी सुनाई। कहानी में पहाडी़ गांव के वातावरण, खानपान, आस्थाओं, मानवीय पारिवारिक सम्बन्धों से लेकर गीत और परम्पराओं को पिरोया गया है। कुमाऊंनी भाषा के आंचलिक शब्दों ने कहानी को मर्मस्पर्शी बना दिया। आधुनिक जीवन में पढा़ई या आजीविका के कारण गांव छोड़कर मजबूरी में शहर में बस जाने पर होने वाली छटपटाहट भी कहानी में बारिकी से चित्रित हुई है।

कहानी पाठ के बाद महेंद्र खेरारू के प्रश्‍न के जवाब में कहानीकार ने बताया कि आधुनिक सोशल मीडिया के कारण बडी़ संख्या में रचनाएं इन पर आ रही हैं, पर जल्दबाजी के चलते इनमें सार्थकता की कमी है। हालांकि नये रचनाकारों को इससे प्रोत्साहन मिल रहा है। इन रचनाओं में से वे ही बचेंगी, जो शाश्‍वत होंगी। एम.एल. डाकोत ने पश्‍चि‍मी संस्कृति ओैर भारतीय संस्कृति में बेहतर कौन का सवाल उठाया। जोशी ने बताया कि भारतीय संस्कृति विश्‍व में प्राचीन और श्रेष्ठतम मानी जाती है, पर हमें सभी से उपयोगी तत्वों को ग्रहण करना चाहिए। कवि नन्दकिशोर निर्झर ने कहानी पर अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि रचना में रचनाकार बोलता है। कहानी पर योगेश शर्मा ने भी अपने विचार प्रकट किये। कार्यक्रम का संचालन कर रहे लक्ष्मण व्यास के प्रश्‍नों के जवाब में कर्नल जोशी ने बताया कि सेना में काम करना नौकरी मात्र नहीं है, यह देश की सेवा और जीवन जीने की शैली और कला है।

प्रारम्भ में कहानीकार का परिचय देते हुए डॉ. कनक जैन ने बताया कि मुकूल जोशी का कहानी संग्रह ‘मैं यहां कुशल से हूं’  प्रकाशि‍त हो चुका हैं। उनकी कहानियां हंस, ज्ञानोदय, कथादेश जैसी साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशि‍त हो चुकी हैं। वे चित्तौड़गढ़ के सैनिक स्कूल सहित ऑफिसर्स ट्रेनिंग एकेडमी चेन्नई एवं पंचमढ़ी आदि स्थानों पर कार्य कर चुके हैं। कार्यक्रम में स्थानीय कॉलेज में हिन्दी विभागाध्यक्ष अखिलेश चाष्टा, चित्रकार मुकेश शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार नटवर त्रिपाठी, विकास अग्रवाल, गोपाल जाट,  पूजा जोशी आदि‍ साहित्य प्रेमी उपस्थित थे। विजन कॉलेज की निदेशक डॉ. साधना मण्डलोई ने कहानीकार जोशी का स्वागत कि‍या। संभावना के अध्यक्ष डॉ. के.सी. शर्मा ने सभी का आभार व्यक्त किया।

प्रस्‍तुति‍ : डॉ. कनक जैन

कभी धूमिल नहीं होगी कुँवर नारायण की स्मृति 

कुँवर नारायण

नई दि‍ल्‍ली : मुक्तिबोध ने उन्हें पसंद किया और उनके दूसरे कविता-संग्रह ‘परिवेश : हम-तुम’ की समीक्षा करते हुए लिखा था कि वह ‘अंतरात्मा की पीड़ित विवेक-चेतना और जीवन की आलोचना’ के कवि हैं।

इससे पहले मुक्तिबोध मस्तिष्काघात के चलते अपने अंतिम समय में दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में लगभग एक महीने तक कोमा में रहे थे।

उसके बाद आसन्न साहित्यिक इतिहास में शायद दूसरी बार उतनी दुखद और भयावह घटना घटी है कि उस समय के मुक्तिबोध के प्रिय युवा कवि और इन दिनों हिंदी के शीर्ष कवियों में अग्रगण्य श्री कुँवर नारायण का 15 नवम्‍बर 2017 को  दिल्ली के एक अस्पताल में मस्तिष्काघात के चलते लम्बे समय तक कोमा में रहने के बाद देहावसान हो गया।

स्तब्ध कर देनेवाली इस मुश्किल घड़ी में हम उनके उत्कृष्ट रचनात्मक और वैचारिक अवदान को समकालीन सन्दर्भों में बेहद प्रासंगिक और मूल्यवान् मानते हुए उनके प्रति हार्दिक श्रद्धांजलि व्यक्त करते हैं और यह संकल्प कि शोक की इस वेला में हम उनकी जीवन-संगिनी श्रीमती भारती नारायण और उनके बेटे अपूर्व नारायण जी के साथ हैं।

हमारा समय बेशक कठिन है, जो कुँवर नारायण की विदाई से और कठिन ही हुआ है। लेकिन जब तक मनुष्यता रहेगी, कविता भी रहेगी और उसमें कुँवर जी के समुज्ज्वल हस्ताक्षर से हमें उसी तरह रौशनी मिलती रहेगी, जैसे कि उन्होंने स्वयं मनुष्यता में यह अविचलित आस्था व्यक्त की थी-

”कहीं कुछ भूल हो
कहीं कुछ चूक हो कुल लेनी देनी में
तो कभी भी इस तरफ़ आते जाते
अपना हिसाब कर लेना साफ़
ग़लती को कर देना मुआफ़
विश्वास बनाये रखना
कभी बंद नहीं होंगे दुनिया में
ईमान के ख़ाते।”

( ‘जन संस्कृति मंच’ की राष्ट्रीय परिषद की ओर से पंकज चतुर्वेदी द्वारा जारी)

वीरेनियत-2 : एक बहुविध कविता गोष्ठी

वीरेन डंगवाल की स्मृति में आयोजि‍त सालाना काव्य-जलसे का संचालन करते आशुतोष कुमार।

नई दि‍ल्‍ली : हरदिलअजीज कवि वीरेन डंगवाल की स्मृति में होने वाले जन संस्कृति मंच के सालाना काव्य-जलसे का यह दूसरा आयोजन था। 29 नवम्बर की शाम 6 बजे से ही श्रोता और कवि हैबिटेट सेंटर, दिल्ली के गुलमोहर सभागार पर जुटाने लगे थे। मनमोहन, शुभा, उज्जवल भट्टाचार्य और दिगंबर जैसे वरिष्ठों के साथ अनुपम, निखिल, सुनीता, कुंदन, आशीष जैसे युवा भी कविता-पूर्व की गहमागहमी भरी बहस में सभागार के बाहर घास के मैदान पर बतकही में मशगूल थे। ठीक 6:30 पर वीरेन डंगवाल पर बने दस्तावेजी सिनेमा का एक अंश दिखाया जाना शुरू हुआ। वीरेन डंगवाल की कवितायें उनकी जुबान से सुनना रससिक्त कर देनेवाला अनुभव तो था ही, इस वीडियो-पाठ ने होने वाले कवि सम्मलेन का एक गहरा पर्यावरण रच दिया।

वीरेन डंगवाल की कविता  के बहुतेरे रंग हैं, उनमें से कई रंग कवि-सम्मलेन में उभरे, चमके, दिपे। उनके समकालीन कवियों की काव्य-भूमि तो उनकी साझे की थी ही, युवा कवियों ने भी अपनी कविताओं की मार्फ़त इस काव्य-भूमि को आपेक्षिक विस्तार दिया।

संयोजक-संचालक आशुतोष कुमार के बुलावे पर सबसे पहले अनुज लुगुन कविता पढने आये। अनुज की कविताओं की अलहदा दुनिया हम श्रोताओं को उन इलाकों तक ले गयी जहां सचमुच रवि की पहुँच नहीं है। एक अलग आँख से दुनिया को भांपती अनुज की कविता हमारे पारंपरिक आस्वाद-बोध को चुनौती देती है।अनुज द्वारा पढी गयी ‘हमारा दुःख, उनका दुःख’ कविता एक रूपक बनकर उभरी, जो दो दुनियाओं के बीच की जगह को ठीक-ठीक पहचानती है।

रुचि भल्ला हिन्दी कविता की दुनिया में अपेक्षाकृत नया नाम हैं, वे गोष्ठी की दूसरी कवि थीं। लगभग बतकही के शिल्प में रची रुचि की कविताओं ने दिखाया कि  रोजमर्रा की जिन्दगी की नगण्य चीजें-बातें कैसे कविता बन जाती हैं। एक कविता में स्वर्णाबाई की नज़र से देखी गयी दिल्ली का रंग यों उभरा- ‘दिल्ली वही है जहां शिंदे साहब टूर पर जाता है’। शरीफे पर लिखी उनकी कविता ने वीरेन डंगवाल की ‘पपीता’ जैसी कविताओं की याद ताजा कर दी। चर्च हिन्दी कविता में कम ही आया है, रुचि ने इलाहाबाद और गोवा के चर्चों की। चर्चा के जरिये श्रोताओं को ‘चर्च के पीछे के उस पेड़’ की याद दिलाई जो कभी किसी चर्च के पीछे था ही नहीं।

तीसरे कवि थे संजीव कौशल जिनकी कविताओं में राजनीतिक रंग साफ़ दिखे। ‘सत्ता की सोहबत बिजूकों को भी नरभक्षी बना देती है’ जैसी पंक्ति इस कठिन-कठोर समय में सत्ता के चरित्र और असर का जायजा लेती है। ‘चूल्हे’ और ‘कठपुतलियाँ’ जैसी कविताओं के सहारे संजीव हमारे वक्त का विद्रूप चेहरा दिखाते हैं, पर तरीका उनका बेहद संवेदनशील था।

अगले कवि महेश वर्मा अपने गहरे संवेदना बिंबों और अपनी अनूठी दार्शनिक नज़र के कारण  सराहे गए। डिस्टोपिक यथार्थ की बारीक समझ वाले संवेदन-बिम्ब मसलन ‘तालाब में उतराती अपनी ही लाश’ श्रोताओं को गहरे परेशान कर गए।

बिहार से आए वरिष्ठ कवि अमिताभ बच्चन की कवितायें जीवन प्रसंगों से कविता बुनने की विलक्षणता से भरी हुई थीं। व्यंग्य, जिसे आचार्यों ने कविता की जान कहा है, से भरी-पूरी अमिताभ जी की कवितायें आख़िर में एक गहरी उदासी छोड़ गयीं। हमारे वक़्त की शिनाख्त करती ये कवितायें एक हल्का कथा ढाँचा रखती हैं जिससे  तादात्मीकरण में बेहद आसानी हुई।

वीरेन डंगवाल के चिर-सखा और हिंदी के अप्रतिम कवि मंगलेश डबराल की कवितायें एक दूसरी, ज़्यादा इंसानी दुनिया की तलाश की कवितायें हैं, ऐसा उन्हें सुनते हुए फिर महसूस हुआ। ‘हमारे देवता’ जैसी कविता देव-लोक को मानुष-लोक में बदलकर समाज के सांस्कृतिक द्वंद्वों को रेखांकित कर गयी। मंगलेश जी के कलम में ही वह ख़ूबी है जो ‘बेटी पलटकर पूछती है/पापा आपने कुछ कहा’ जैसी पंक्ति पूरे काव्य-वैभव के साथ श्रोताओं के  दिलों में चुभ गयी।  अपनी एक गद्य कविता के माध्यम से उन्होंने राज की मुश्किलों व उसके भविष्य की ओर  इशारा किया।

गोष्ठी के आख़िरी कवि बल्ली सिंह चीमा की गजलें हिंदी कविता के छांदस रंग को उकेरने वाली थीं। उर्दू से हिंदी में आकर गजल का  न सिर्फ़ स्वर, बल्कि सँवार भी बदल जाता है,यह महसूस किया गया। जनता से संवाद करने की भाषा और लबों-लहजा इन गजलों की ख़ासियत थी। जैसे –

“कुछ तो किरदार नए मंच पर लाए जाएं
और नाटक को सलीके से निभाया जाए।”

एक और शेर था-” मेन दुश्मन को हारने के लिए लाज़िम है/हर विरोधी को ही दुश्मन न बनाया जाए।”

तीन घंटों तक चली इस बहुविध कविता गोष्ठी में ठसाठस भरे सभागार में मौजूद श्रोताओं की सक्रिय भीगीदारी इसे और समृद्ध बना गयी।

प्रस्‍तुति‍ : मृत्युंजय
संयोजक, कविता समूह, जन संस्कृति मंच

साहित्य अपने समय की स्थितियों का प्रतिबिंब: मैनेजर पांडेय

चूरू में आयोजि‍त कार्यक्रम में वि‍चार व्‍यक्‍त करते मैनेजर पांडेय।

चूरू : प्रयास संस्थान की ओर से शनिवार 30 सितंबर को शहर के सूचना केंद्र में हुए पुरस्कार समारोह में जोधपुर की लेखिका पद्मजा शर्मा को उनकी पुस्तक ‘हंसो ना तारा’ के लिए इक्यावन हजार रुपये का घासीराम वर्मा साहित्य पुरस्कार एवं गांव सेवा, सवाई माधोपुर के लेखक गंगा सहाय मीणा को उनकी पुस्तक ‘आदिवासी साहित्य की भूमिका’ के लिए ग्यारह हजार रुपये का रूकमणी वर्मा युवा साहित्यकार पुरस्कार प्रदान किया गया। इस दौरान ‘भय नाहीं खेद नाहीं’ पुस्तक के लिए नई दिल्ली की दीप्ता भोग व पूर्वा भारद्वाज को संयुक्त रूप से पचास हजार रुपये का विशेष घासीराम वर्मा सम्मान प्रदान किया गया।

देश के प्रख्यात गणितज्ञ डॉ घासीराम वर्मा की अध्यक्षता में हुए समारोह को संबोधित करते हुए नामचीन आलोचक मैनेजर पांडेय ने कहा कि कवि किसी अर्थशास्त्री और इतिहासकार पर निर्भर नहीं रहता, वह अपने समय को जैसा देखता है, वैसा ही लिखता है। इसलिए साहित्य अपने समय की स्थितियों का प्रतिबिंब होता है। पांडेय ने कहा कि मातृभाषा ने ही तुलसी, सूर, मीरा और विद्यापति को महाकवि बनाया। इसलिए मातृभाषाओं के लिए संकट के इस समय में हमें मातृभाषाओं में सृजन करना चाहिए। बेहतर बात है कि राजस्थान में असंख्य लेखक हैं जो हिंदी के साथ-साथ मातृभाषा राजस्थानी में लिख रहे हैं। उन्होंने विजयदान देथा का स्मरण करते हुए कहा कि भाषा को जानना अपने अस्तित्व को जानना है। उन्होंने कहा कि आज के समय में जबकि दूसरे लोग अपनी सुख-सुविधाओं के लिए लड़ रहे हैं, आदिवासी अपने अस्तित्व के लिए, अपने जल, जंगल और जमीन को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उन्होंने ‘ग्रीन हंट’ का उदाहरण देते हुए कहा कि ब्रिटिश भारत में आदिवासियों के साथ जैसा व्यवहार होता था, वैसा ही आजाद भारत में उनके साथ बर्ताव किया जा रहा है। पंडिता रमाबाई को याद करने एक पुराने संघर्ष को याद करना है और यह स्त्री को यह याद दिलाना है कि वह किसी भी संघर्ष में अकेली नहीं है। उन्होंने कहा कि साहस के साथ अपनी बात कहने से आलोचना में जान आती है। उन्होंने कहा कि मनुष्य एक भाषिक प्राणी है और भाषा से ही परिवार व समाज की रचना होती है।

मुख्य वक्ता नारीवादी चिंतक शीबा असलम फहमी ने कहा कि कानून ने स्त्री को बराबरी का अधिकार दिया है, लेकिन समाज अपने अंदर से इसे स्वीकार नहीं कर पा रहा है। हम कितनी भी तरक्की कर जाएं, लेकिन यदि उपेक्षितों और वंचितों को बराबरी का अधिकार नहीं दे पाएं और यह तरक्की चंद लोगों तक ही सीमित रहती है तो इसका कोई अर्थ नहीं है। उन्होंने कहा कि हमारे भीतर बलात्कार के अपराधी के प्रति जो घृणा का भाव रहता है, वहीं घरेलू हिंसा जैसे अपराधों के लिए भी होना चाहिए। शरीर के साथ होने वाले अपराध को तो हम देखते हैं लेकिन मन के साथ होने वाले अपराध को हम नजरअंदाज कर देते हैं। औरत को औरत बनाए रखने के लिए जो किया जाता है, वह अपने आप में भयावह है। हमें अपने घर में एक मजबूत बेटी तैयार करनी चाहिए और उसे संपत्ति का अधिकार आगे बढ़कर देना चाहिए।

पुरस्कार से अभिभूत साहित्यकार पद्मजा शर्मा, दीप्ता भोग, पूर्वा भारद्वाज और गंगा सहाय मीणा ने अपनी सृजन प्रक्रिया, संघर्ष और अनुभवों को साझा किया। भंवर सिंह सामौर ने अतिथियों का स्वागत किया। प्रयास संस्थान के अध्यक्ष दुलाराम सहारण ने आभार उद्बोधन में आयोजकीय पृष्ठभूमि पर प्रकाश डाला। संचालन कमल शर्मा ने किया।

इस दौरान मालचंद तिवाड़ी, नरेंद्र सैनी, रियाजत खान, रामेश्वर प्रजापति रामसरा, मीनाक्षी मीणा, दलीप सरावग, रघुनाथ खेमका आदि‍ साहि‍त्‍य प्रेमी मौजूद थे।

गोरखपुर में बच्चों की मौत ने पूरे सिस्टम की संवेदनहीनता को बेपर्दा कर दिया है : मनोज कुमार सिंह

‘दिमागी बुखार: बच्चों की मौत और विफल स्वास्थ्य तंत्र’ पर व्‍याख्‍यान देते मनोज कुमार सिंह।

नई दि‍ल्‍ली : ‘‘गोरखपुर में आक्सीजन संकट के दौरान चार दिन में 53 बच्चों की मौत ने पूरे सिस्टम की संवेदनहीनता को बेपर्दा कर दिया। मौतों का सिलसिला उसके बाद भी जारी है। पूरे देश जनस्वास्थ्य और स्वास्थ्य सेवाओं की क्या स्थिति है, उसे इसके आईने में देखा जा सका है। कुल मिलाकर बहुत भयावह परिदृश्य है। सिर्फ बीआरडी मेडिकल कालेज में वर्ष 1978 से इस वर्ष तक 9907 बच्चों की मौत हो चुकी है। इस आंकड़े में जिला अस्पतालों, सीएचसी-पीएचसी और प्राइवेट अस्पतालों में हुई मौतें शामिल नहीं हैं। इंसेफेलाइटिस से मौतों के आंकड़े आईसवर्ग की तरह हैं। अब तो इस बीमारी का प्रसार देश के 21 राज्यों के 171 जिलों में हो चुका है। खासकर देश के 60 जिले और उत्तर प्रदेश के 20 जिले इससे बुरी तरह प्रभावित हैं।’’ 7 अक्टूबर 2017 को राजेंद्र भवन, दिल्ली में छठा कुबेर दत्त स्मृति व्याख्यान देते हुए चर्चित पत्रकार और जन संस्कृति मंच के महासचिव मनोज कुमार सिंह ने यह कहा। कवि-चित्रकार और टीवी के मशहूर प्रोड्यूसर कुबेर दत्त की स्मृति में हर साल एक व्याख्यान आयोजित होता है। इस बार व्याख्यान का विषय ‘दिमागी बुखार: बच्चों की मौत और विफल स्वास्थ्य तंत्र’ था।

मनोज कुमार सिंह ने कहा कि 40 वर्ष पुरानी बीमारी को अब भी अफसर, नेता और मीडिया रहस्यमय या ‘नवकी’ बीमारी बताने की कोशिश कर रहे हैं। यह दरअसल एक बड़़ा झूठ है। जिन  डॉक्टरों ने इसके निदान की कोशिश की, उन्हें अफसरों द्वारा अपमानित होना पड़ा। बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. केपी कुशवाहा ने बहुत पहले ही जब इस बीमारी को अज्ञात बताए जाने पर आपत्ति जाहिर की थी, तो उनकी नहीं सुनी गई। उनका स्पष्ट तौर पर मानना था कि यह बीमारी जापानी इंसेफेलाइटिस है।

मनोज ने बताया कि इंसेफेलाइटिस को समझने के लिए हमें जापानी इंसेफेलाइटिस और एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिन्ड्रोम को समझना पड़ेगा। चीन, इंडोनेशिया में भी टीकाकरण, सुअर बाड़ों के बेहतर प्रबन्धन से जापानी इंसेफेलाइटिस पर काबू कर लिया गया, लेकिन भारत में हर वर्ष सैकड़ों बच्चों की मौत के बाद भी सरकार ने न तो टीकाकरण का निर्णय लिया और न ही इसके रोकथाम के लिए जरूरी उपाय किए। जब उत्तर प्रदेश में वर्ष 2005 में जेई और एईएस से 1500 से अधिक मौतें हुई तो पहली बार इस बीमारी को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर हाय तौबा मची। उन्होंने कहा कि दिमागी बुखार किसी भी आयु के व्यक्ति को हो सकता है लेकिन 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में यह ज्यादा है। इस रोग में मृत्यु दर तथा शारीरिक व मानसिक अपंगता बहुत अधिक है।

इंसेफेलाइटिस के रोकथाम के दावे और हकीकत का जिक्र करते हुए मनोज कुमार सिंह ने कहा कि स्वास्थ्य विभाग के जिम्मे इंसेफेलाइटिस के इलाज की व्यवस्था ठीक करने, टीकाकरण और इस बीमारी पर शोध का काम था तो पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय को गांवों में शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के लिए इंडिया मार्का हैण्डपम्पों, नलकूपों की स्थापना तथा व्यक्तिगत शौचालयों का बड़ी संख्या में निर्माण कराना था। इसी तरह सामाजिक न्याय मंत्रालय को इस बीमारी से भीषण तौर पर विकलांग हुए बच्चों के पुनर्वास, शिक्षा व इलाज की व्यवस्था का काम था। इस योजना के पांच वर्ष गुजर गए लेकिन अभी तक इंसेफेलाइटिस से होने वाली मौतों व अपंगता को कम करने में सफलता मिलती नहीं दिख रही है। टीकाकरण में लापरवाही है, शुद्ध पेयजल उपलब्ध नहीं है, पानी का पूरा एक कारोबार विकसित हो गया है, शौचालय निर्माण के दावे निरर्थक हैं।

मनोज कुमार सिंह ने स्थापना के 45 वर्ष और गुजर जाने के बाद भी बीआरडी मेडिकल कालेज में एमबीबीएस की सीट 100 से ज्यादा न बढ़ पाने पर सवाल उठाया, जबकि इंसेफेलाइटिस के सर्वाधिक मरीज आते हैं। यहां हर वर्ष जेई एईएस के 2500 से 3000 मरीज आते हैं, लेकिन इस मेडिकल कालेज को दवाइयों, डाक्टरों, पैरा मेडिकल स्टाफ, वेंटीलेटर, आक्सीजन के लिए भी जूझना पड़ता है। इंसेफेलाइटिस की दवाओं, चिकित्सकों व पैरामेडिकल स्टाफ, उपकरणों की खरीद व मरम्मत आदि के लिए अभी तक अलग से बजट का प्रबंध नहीं किया गया है। इंसेफेलाइटिस मरीजों के इलाज में लगे चिकित्सकों, नर्स, वार्ड ब्वाय व अन्य कर्मचारियों का वेतन, मरीजों की दवाइयां तथा उनके इलाज में उपयोगी उपकरणों की मरम्मत के लिए लगभग एक वर्ष में सिर्फ 40 करोड़ की बजट की जरूरत है, पर केंद्र और राज्य की सरकार इसे देने में कंजूसी कर रही है। ये हालात बताते हैं कि मंत्रियों-अफसरों के दावों और उन्हें अमली जामा पहनाने में कितना फर्क हैं। उन्होंने तंज करते हुए कहा कि जापान ने 1958 में ही इस बीमारी पर काबू पा लिया था। जापान से बुलेट ट्रेन लाने से ज्यादा जरूरी यह था कि उसकी तरह हम इस बीमारी को रोक लगा पाते।

मनोज कुमार सिंह ने कहा कि जेई/एइएस से मरने वाले बच्चे और लोग चूंकि गरीब परिवार के हैं इसलिए इस मामले में चारों तरफ चुप्पी दिखाई देती है। डेंगू या स्वाइन फलू से दिल्ली और पूना में कुछ लोगों की मौत पर जिस तरह हंगामा मचता है, उस तरह की हलचल इंसेफेलाइटिस से हजारों बच्चों की मौत पर कभी नहीं हुई। गरीबी के कारण ये इंसेफेलाइटिस के आसान शिकार होने के साथ-साथ हमारी राजनीति के लिए भी उपेक्षा के शिकार है।

उन्होंने यह भी बताया कि चीन निर्मित वस्तुओं के बहिष्कार करने वाली राजनीति के बजाय सच यह है कि एक दशक से चीन में बना टीका ही देश के लाखों बच्चों को जापानी इंसेफेलाइटिस जैसी घातक बीमारी से बचा रहा है। सस्ता टीका मिलने के बावजूद हमारे देश की सरकार ने टीके लगाने का निर्णय लेने में काफी देर नहीं की होती तो सैकड़ों बच्चों की जान बचायी जा सकती थी। वर्ष 2013 में भारत में जेई का देशी वैक्सीन बना और इसे अक्टूबर 2013 में लांच करने की घोषणा की गई, लेकिन अभी देश की जरूरतों के मुताबिक यह वैक्सीन उत्पादित नहीं हो पा रही है।

मनोज कुमार सिंह ने कहा कि देश की सरकार सकल घेरलू उत्पाद का सिर्फ 1.01 फीसदी स्वास्थ्य पर खर्च कर रही है। बहुत से छोटे देश भी स्वास्थ्य पर भारत से ज्यादा खर्च कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य सेवा की हालत तो और खराब है। ग्रामीण स्वास्थ्य सांख्यिकी 2016 के अनुसार यूपी के सीएचसी में 3092 विशेषज्ञ डॉक्टरों सर्जन, गायनकोलाजिस्ट, फिजिशियन बालरोग विशेषज्ञ की जरूरत है, लेकिन सिर्फ 484 तैनात हैं यानी 2608 की जरूरत है। देश में भी यही हाल है। कुल विशेषज्ञ चिकित्सकों के 17 हजार से अधिक पोस्ट खाली हैं। यूपी के 773 सीएचसी में सिर्फ 112 सर्जन, 154 बाल रोग विशेषज्ञ, 115 स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ, 143 रेडियोग्राफर हैं। इस स्वास्थ्य ढांचे पर इंसेफेलाइटिस जैसी जटिल बीमारी तो क्या साधारण बीमारियों का भी मुकाबला नहीं किया जा सकता है। यही कारण है कि उत्‍तर प्रदेश में बच्चों की मौत सबसे अधिक है। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य को सिर्फ चिकित्सा से जोड़ कर नहीं देखना चाहिए, बल्कि इसका सीधा सम्बन्ध गरीबी और सामाजिक-आर्थिक कारण भी हैं। यदि गरीबी कम नहीं होगी और सभी लोगों को बेहतर रोजगार, स्वच्छ पेयजल, शौचालय उपलब्ध नहीं होगा तो देश को स्वस्थ रखना संभव नहीं हो पाएगा।

व्याख्यान के बाद गीतेश, सौरभ, आशीष मिश्र, नूतन, अखिल रंजन, इरफान और विवेक भारद्वाज के सवालों का जवाब देते हुए मनोज कुमार सिंह ने कहा कि रिसर्च के मामले में सरकारी या प्राइवेट स्तर पर सन्नाटे की स्थिति है, इसलिए कि इस बीमारी पर रिसर्च को लेकर किसी की ओर से कोई फंडिंग नहीं है। फंडिंग थी तो एचआइवी, एडस की बड़ी चर्चा होती थी, पर फंडिंग बंद होते ही लगता है कि वे बीमारी ही गायब हो गर्ईं।

मनोज कुमार सिंह ने दो टूक कहा कि इस बीमारी के निदान में सरकार की कोई रुचि नहीं है, इसलिए कि तब उसे स्वच्छ पानी, ठीक शौचालय और संविधान प्रदत्त अन्य अधिकारों को सुनिश्चित करना पड़ेगा। विडंबना यह है कि राजनीतिक पार्टियों के लोग जब विपक्ष में होते हैं, तो इसे मुद्दा बनाते हैं, पर सरकार में जाते ही इस पर पर्दा डालने लगते हैं। उन्होंने कहा कि बोलना और करना दो भिन्न बातें हैं। जब भाजपा विपक्ष में थी, तो योगी ने इस बीमारी को लेकर मौन जुलूस निकाला था, लेकिन नेशनल हाईवे पर नौ गायें कट जाने के बाद जिस तरह तीन दिन तक उन्होंने बंदी करवाई थी, वैसा बंद उन्होंने इंसेफेलाइटिस के लिए कभी नहीं करवाया। मनोज ने बताया कि अपनी जिम्मेवारी से बचने के लिए ही सरकार ने विगत 11 अगस्त को मरीजों की मदद करने वाले डॉ कफील को खलनायक बनाया। उन्होंने कहा कि बीमारी का दायरा बढ़ रहा है। शुद्ध पेयजल की समस्या बहुत गंभीर है, कम गहराई वाले हैंडपंपों के जरिए इंसेफेलाइटिस के बीमारी के संक्रमण होता है, वहीं ज्यादा गहराई वाले हैंडपंपों में आर्सेनिक और उससे होने वाले कैंसर का खतरा है। बच्चे वोटबैंक नहीं हैं, इसलिए राजनीतिक पार्टियों के लिए यह गंभीर मुद्दा नहीं है। उनके ज्यादातर अभिभावक गरीब और मजदूर हैं, भले ही रोजी-रोटी के लिए वे महानगरों में चले जाएं, पर इस इलाके से उनके पूरे परिवार का विस्थापित होकर कहीं दूसरी जगह चले जाना संभव नहीं है।

मनोज का मानना था कि सरकार पर आंदोलनात्मक दबाव बनाना जरूरी है। तत्काल तो बचाव पर ध्यान देना जरूरी है, प्रति मरीज लगभग 3000 रुपये की जरूरत है, प्राइवेट प्रैक्टिस वाले सुविधा देने को तैयार नहीं है। यह काम तो सरकार को ही करना होगा, पर मुख्यमंत्री की रुचि तो केरल में जाकर वहां के स्वास्थ्य सेवा पर टीका-टिप्पणी करने में ज्यादा है, जहां बच्चों की इस तरह की मौतें बहुत ही कम होती हैं।

मनोज ने बताया कि साहित्य में भी मदन मोहन के उपन्यास ‘जहां एक जंगल था’ और एक-दो कविताओं के अतिरिक्त इंसेफेलाइटिस की बीमारी का कोई प्रगटीकरण नहीं है।

संचालन करते हुए सुधीर सुमन ने इंसेफेलाइटिस से हुई बच्चों की मौतों में सरकार और स्वास्थ्य तंत्र की विफलताओं को ढंकने की कोशिश के विरुद्ध एक जनपक्षीय पत्रकार के बतौर मनोज कुमार सिंह के संघर्ष का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि मनोज लगातार इस बीमारी को लेकर लिखते रहे हैं, पर इस बार जिस लापरवाही और संवेदहीनता की वजह से बड़े पैमाने पर बच्चों की मौतें हुईं, जो कि एक किस्म की हत्या ही थी, उसके पीछे की वजहों और उसके लिए जिम्मेवार लोगों और उनके तंत्र का गोरखपुर न्यूज ऑनलाइन वेब पोर्टल के जरिए मनोज ने बखूबी पर्दाफाश किया। सच पर पर्दा डालने की सत्ता की कोशिशों के बरअक्स निर्भीकता के साथ उन्होंने जो संघर्ष किया, वह वैकल्पिक मीडिया में लगे लोगों के लिए अनुकरणीय है।

सवाल-जवाब के सत्र से पूर्व, चर्चित चित्रकार अशोक भौमिक ने व्याख्यानकर्ता मनोज कुमार सिंह को स्मृति-चिह्न के बतौर कुबेर दत्त द्वारा बनाई गई पेंटिंग दी। गोरखपुर में स्वास्थ्य तंत्र और सरकार की नाकामियों और संवेदनहीनता की वजह से मारे गए बच्चों की याद में जन संस्कृति मंच के कला समूह द्वारा पेंटिंग प्रदर्शनी लगाए जाने तथा उससे होने वाली आय के जरिए इंसेफेलाइटिस के निदान के लिए चलने वाले प्रयासों में मदद देने की घोषणा भी की गई।

व्याख्यान से पूर्व जसम, दिल्ली के संयोजक रामनरेश राम ने लोगों का स्वागत किया। उसके बाद प्रसिद्ध चित्रकार हरिपाल त्यागी ने कुबेर दत्त की कविताओं के नए संग्रह ‘बचा हुआ नमक लेकर’ का लोकार्पण किया। कवि-वैज्ञानिक लाल्टू द्वारा लिखी गई इस संग्रह की भूमिका का पाठ श्याम सुशील ने किया। सुधीर सुमन ने कहा कि इस संग्रह कविताओं में कुबेर दत्त की कविता के सारे रंग और अंदाज मौजूद हैं। उन्होंने कवि के इस संग्रह और अन्य संग्रहों में मौजूद बच्चों से संबंधित कविताओं का पाठ किया। कुबेर दत्त की कविताओं के हवाले से यह बात सामने आई कि नवउदारवादी अर्थव्यवस्था के असर में विकसित राजनीतिक-धार्मिक सत्ता की उन्मत्त तानाशाही बच्चों के लिए यानी मनुष्य के भविष्य के लिए भी खतरनाक है। नब्बे के दशक के शुरुआत में लिखी गई अपनी एक कविता में उन्होंने जिन सांप्रदायिक फासीवादी ताकतों की शिनाख्त की थी, वे आज हूबहू उसी रूप में हमारे सामने हैं। गोरखपुर में भी वहीं उन्मादी, नृशंस और जनता के प्रति संवेदनहीन प्रवृत्ति वाला चेहरा नजर आया।

अध्यक्षता करते हुए बनारस से आए साहित्यकार वाचस्पति ने कहा कि सरकार की जो आपराधिक लापरवाही और नेतृत्व का जो पाखंड है, उसे मनोज कुमार ने अपने व्याख्यान के जरिए स्पष्ट रूप से दिखा दिया। इस बीमारी से बचाव के लिए निरंतर संघर्ष की आवश्यकता है। उन्होंने कुबेर दत्त से जुड़े संस्मरण भी सुनाए।

आयोजन के आरंभ में मशहूर फिल्म निर्देशक कुंदन शाह और उचित इलाज के अभाव में मारे गए बच्चों को एक मिनट का मौन रखकर श्रद्धांजलि दी गई।

इस मौके पर वरिष्ठ कवि राम कुमार कृषक, रमेश आजाद, वरिष्ठ पत्रकार आनंद स्वरूप वर्मा, जसम के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेन्द्र कुमार, रामजी राय, दूरदर्शन आर्काइव्स की पूर्व निदेशक कमलिनी दत्त, कहानीकार महेश दर्पण, दिनेश श्रीनेत, कौशल किशोर, पत्रकार पंकज श्रीवास्तव, अभिषेक श्रीवास्तव, कवि मदन कश्यप, दिगंबर, रंगकर्मी जहूर आलम, कवि शोभा सिंह, कहानीकार योगेंद्र आहूजा, आलोचक प्रणय कृष्ण, आशुतोष कुमार, राधिका मेनन, पत्रकार भाषा सिंह, अशोक चौधरी, डॉ. एसपी सिन्हा, प्रभात कुमार, राजेंद्र प्रथोली, गिरिजा पाठक, अमरनाथ तिवारी, अनुपम सिंह, मनीषा, रविप्रकाश, बृजेश यादव, इरेंद्र, मृत्युंजय, तूलिका, अवधेश, मुकुल सरल, रविदत्त शर्मा, सोमदत्त शर्मा, संजय भारद्वाज, गीतेश, सुनीता, रूचि दीक्षित, अंशुमान, कपिल शर्मा, रामनिवास सिंह, सुनील चौधरी, सुजीत कुमार, कनुप्रिया, असद शेख, नौशाद राणा, शालिनी श्रीनेत, रोहित कौशिक, माला जी, दिवस, अतुल कुमार, उद्देश्य आदि मौजूद थे।

प्रस्‍तुति‍ : सुधीर सुमन

‘दि‍मागी बुखार- बच्‍चों की मौत और वि‍फल स्‍वास्‍थ्‍य तंत्र’ पर व्‍याख्‍यान 7 को  

नई दि‍ल्‍ली : इंसेफेलाइटिस यानी दिमागी बुखार से चार दिनों के भीतर पचास से अधिक बच्चों की मौत ने इस बार पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। जनता के भीतर सबसे ज्यादा गुस्सा उत्तर प्रदेश के मंत्रियों के बयानों से भड़का। यह बीमारी क्या है? इसके कितने प्रकार हैं? देश के कौन से इलाके इससे प्रभावित हैं? विगत 40 वर्षों में इसका समाधान न हो पाने की वजहें क्या हैं? किस तरह महज एक अस्पताल में ही 40 वर्षों में इस बीमारी से 9733 मौतें हुईं? क्यों पूरा तंत्र और सरकार बच्चों की मौतों को सामान्य मौतें बताने के लिए पूरा जोर लगाए रहा? ऐसे तमाम सवालों से संबंधित है इस बार का कुबेर दत्त स्मृति व्याख्यान।

यह बीमारी तो महज एक बानगी है इस देश में जनस्वास्थ्य के प्रति आपराधिक लापरवाही की। ऐसी कई बीमारियों की चपेट में है इस देश की जनता।

इंसेफलाइटिस की बीमारी से हुई बच्चों की मौतों और विफल स्वास्थ्य तंत्र पर छठा कुबेर दत्त स्मृति व्याख्यान देंगे मनोज कुमार सिंह, जो चर्चित युवा पत्रकार रहे हैं, जमीनी रिपोर्टों के लिए मशहूर हैं। गोरखपुर से प्रतिरोध का सिनेमा अभियान शुरू करने वाले मनोज कुमार सिंह वहां की बौद्धिक-सांस्कृतिक जगत की एक महत्वपूर्ण शख्सियत हैं। जन संस्कृति मंच के हालिया राष्ट्रीय सम्मेलन में उन्हें महासचिव की जिम्मेवारी दी गई है। फिलहाल वे गोरखपुर न्यूज लाइन नामक चर्चित वेबपोर्टल चला रहे हैं।

मनोज कुमार सिंह का मानना है कि इंसेफेलाइटिस से मौतों के जो आकंडे सामने आ रहे हैं, वे तो आईसवर्ग की तरह हैं। इन आंकड़ों में जिला अस्पतालों, सीएचसी-पीएचसी और प्राइवेट अस्पतालों में हुई मौतें शामिल नहीं हैं। अब तो यह बीमारी सिर्फ पूर्वांचल तक ही सीमित नहीं रह गई है। इसका प्रसार देश के 21 राज्यों के 171 जिलों में हो चुका है। इस बीमारी के दो प्रकार हैं- जापानी इंसेफलाइटिस और एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिन्ड्रोम। नेशनल वेक्टर बार्न डिजीज कंट्रोल प्रोग्राम के मुताबिक वर्ष 2010 से 2016 तक एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिन्ड्रोम से पूरे देश में 61957 लोग बीमार पड़े, जिसमें 8598 लोगों की मौत हो गई। इसी अवधि में जापानी इंसेफेलाइटिस से 8669 लोग बीमार हुए, जिनमें से 1482 की मौत हो गई। इस वर्ष अगस्त माह तक पूरे देश में एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिन्ड्रोम के 5413 केस और 369 मौतों के आंकड़े आए। जापानी इंसेफेलाइटिस से इसी अवधि में 838 केस और 86 मौत के मामले सामने आए। अभी भी मौतों की सूचनाएं आ ही रही हैं।

इंसेफेलाइटिस के मुद्दे पर मनोज पिछले कई वर्षों से लगातार लिखते रहे हैं।

गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में बच्चों की मौत के सवाल पर जनता के दुख-दर्द और उसके गुस्से के साथ वे अपने वेबपोर्टल के जरिए खड़े रहे, जबकि सरकार और स्वास्थ्य तंत्र के नकारेपन और आपराधिक संवेदनहीनता को ढंकने की हरसंभव कोशिश की जाती रही। आइए जनता के सच के साथ, उसकी व्यथा के साथ निर्भीकता से खड़े पत्रकार के अनुभव को हम सुनें। मौत बांटने वाले संवेदनहीन तंत्र के विरुद्ध जीवन के लिए विभिन्न स्तरों पर जारी संघर्षों में से एक संघर्ष के साझीदार बनें।

कार्यक्रम की रूपरेखा-

तारीख- 7 अक्टूबर 2017, समय- 5 बजे शाम

स्थान- राजेंद्र भवन, दीनदयाल उपाध्याय मार्ग, आईटीओ मेट्रो स्टेशन के पास, दिल्ली

चरित्रहीन परिवेश की कहानियां: स्वयं प्रकाश

नई दिल्ली: हमारे चरित्रहीन समय में बड़े चरित्रों का बनना बंद हो गया है इसलिए परिवेश ने अब चरित्रों का स्थान ले लिया है। ‘छबीला रंगबाज का शहर’ में ऐसे ही चरित्रहीन परिवेश की कहानियां हैं, जहाँ कथाकार वास्तविक पात्रों की काल्पनिक कहानियां दिखा रहा है। सुप्रसिद्ध कथाकार स्वयं प्रकाश ने साहित्य अकादेमी सभागार में 16 सि‍तंबर को युवा कथाकार प्रवीण कुमार के पहले कहानी संग्रह ‘छबीला रंगबाज का शहर’ का लोकार्पण करते हुए कहा कि आजकल कहानीकारों की उम्र कम होने लगी है। ऐसे में नए कहानीकार के लिए सबसे जरूरी शुभकामना यही होगी कि हम उनसे लम्बी सक्रियता की अपेक्षा करें।

युवा आलोचक संजीव कुमार ने ‘छबीला रंगबाज का शहर’ को यथार्थ के गढ़े जाने का पूरा कारोबार बताने वाला संग्रह बताया। उन्होंने कहा कि खबरों के निर्माण की कार्यशाला का हिस्सा हो जाने की इन कहानियों को पढ़ना विचलित करने वाला अनुभव है, जहाँ नए ढंग से कहन की वापसी हो रही है। संजीव कुमार ने कहा कि संयोग से वे इन कहानियों की रचना प्रक्रिया के भी साक्षी रहे हैं। ‘छबीला रंगबाज का शहर’ का एक वाक्य ‘हर जगह यही हो रहा है’ वस्तुत: आरा शहर ही नहीं, हमारे समूचे परिदृश्य की बात कहता है।

विख्यात पत्रकार और ‘जनसत्ता’ के पूर्व सम्पादक ओम थानवी ने प्रवीण कुमार की कहानियों की रचना शैली में नाटकीय तत्वों की प्रशंसा करते हुए कहा कि ये ऐसी कहानियां हैं, जहाँ चीज़ें मजे-मजे में बताई जा रही हैं, लेकिन कहने का ढंग अलहदा है। कहानी का यह नया ढांचा है, जहाँ यथार्थ वास्तव में ‘उघाड़ा’ हो रहा है।

प्रसिद्ध आलोचक और दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व सम कुलपति प्रोफेसर सुधीश पचौरी ने कहा कि प्रवीण कुमार की कहानियाँ विकास की आड़ में हो रही लूटखोरी को दिखाती हैं और विराट लुम्पेनाइजेशन का नया पाठ प्रस्तुत करती हैं। उन्‍होंने लुम्पेनाइजेशन को कहानी का विषय बनाकर बिल्कुल नए ढंग से लिखने के लिए प्रवीण कुमार को बधाई देते हुए कहा कि जिस प्रसन्न गद्य में वे लिखते हैं, वह सचमुच ‘रीडरली टेक्स्ट’ कहा जाएगा। उन्होंने कहा कि ‘छबीला रंगबाज का शहर’ में कथाकार विडम्बनामूलकता को नष्ट करते चले हैं और यही बात उन्हें सिविल सोसायटी का पक्षधर बनाती है।

इससे पहले संयोजन कर रही डॉ उमा राग ने अतिथियों का परिचय दिया और कथाकार प्रवीण कुमार ने ‘छबीला रंगबाज का शहर’ संग्रह के कुछ अंशों का पाठ कि‍या। संग्रह के प्रकाशक राजपाल एण्ड सन्ज़ की तरफ से मीरा जौहरी ने आभार प्रदर्शन करते हुए कहा कि नयी रचनाशीलता के लिए हिंदी का सबसे पुराना  प्रतिष्ठित प्रकाशन सदैव स्वागत करता है।

आयोजन में विचारक प्रो अपूर्वानंद, कवि अनामिका, कथाकार प्रियदर्शन, पाखी सम्पादक प्रेम भारद्वाज, बनास जन के सम्पादक पल्लव, हिन्दू कालेज के आचार्य डॉ रामेश्वर राय, डॉ रचना सिंह, डॉ मुन्ना कुमार पांडेय, डॉ अमितेश कुमार, डॉ नीरज कुमार सहित बड़ी संख्या में विद्यार्थी और युवा पाठक उपस्थित थे।

प्रस्‍तुति‍: प्रणव जौहरी

दिल और सोच को छूने वाली हैं गौहर रज़ा की कवितायें : अनामिका

‘खामोशी’ का लोकार्पण करतीं शर्मिला टैगोर और अन्‍य अति‍थि‍गण।

नई दिल्ली : कवि और सुपरिचित फिल्मकार गौहर रज़ा की सद्य प्रकाशित नज़्म पुस्तक ‘खामोशी’ का लोकार्पण 9 सि‍तंबर को इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में हुआ। इसका लोकार्पण जानी-मानी अभिनेत्री शर्मिला टैगोर ने किया। इस अवसर पर हिंदी के प्रसिद्ध कवि अशोक वाजपेयी ने कहा कि कविता एक तरह की ज़िद है उम्मीद के लिए और हमें कृतज्ञ होना चाहिए की ऐसी कविता हमारे बीच और साथ में है। उन्होंने कहा कि कविता और राजनीति की कुंडली नहीं मिलती, लेकिन गौहर रज़ा अपनी कविता में जीवन के छोटे-बड़े सभी पहलुओं को जगह देते हैं। कवयि‍त्री  अनामिका ने कहा की गौहर रज़ा की कवितायेँ दिल और सोच को छूने वाली है। सिर्फ देश में ही नहीं, बल्कि विदेश में होने वाली घटनाओं पर भी उनकी कड़ी नज़र है।

शर्मीला टैगोर ने पुस्तक का विमोचन करते वक़्त कहा की गौहर बेबाकी के साथ और बिना डरे नज़्में लिखते हैं और अपना सख़्त से सख़्त वि‍रोध भी हमेशा खूबसूरत ज़बान में लिखते हैं। उन्होंने कहा की गौहर की नज़्में हमारे उस ख़्वाब का हिस्सा हैं, जो हमने आज़ादी के वक़्त देखा था। एक ऐसा समाज बनाने का ख़्वाब जहाँ ख्यालों की विविधता हो, जहाँ बोलने की आज़ादी हो, जहां अपनी तरह से जीने का अधिकार हो। ऐसे वक़्त में जब उम्मीद का दामन तंग लगने लगे, तब गौहर की नज्में हम सब की आवाज़ बन कर हमेशा सामने आयी हैं। शायर गौहर रज़ा ने समारोह में अपनी पुस्तक से कुछ चुनिंदा ग़ज़लें और नज़्में सुनाईं।

आयोजन में आलोचक अपूर्वानंद, कथाकार प्रियदर्शन, पत्रकार कुलदीप कुमार, कथाकार प्रेमपाल शर्मा, क़व्वाल ध्रुव संगारी, सामाजिक कार्यकर्ता शबनम हाशमी, हिन्दू कॉलेज की डॉ रचना सिंह सहित बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमी, अध्यापक और लेखक उपस्थित थे।