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लम्बी लकीर खींच गया रवांई साहित्य महोत्सव : प्रवीन कुमार भट्ट


रवांई साहित्य महोत्सव में वि‍चार व्‍यक्‍त करते वक्‍ता।

देहरादून : यमुना और टोंस नदियों से लगा प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर रवांई क्षेत्र अपने प्राचीन इतिहास व विशिष्ट संस्कृति के लिए जाना जाता है। क्षेत्र की भवन निर्माण कला व काष्ठशिल्प भी बेजोड़ है। इतिहासकारों का मत है कि हिमांचल व उत्तराखंड की सीमा में बसे रवांई क्षेत्र में पाए गए अनेक प्राचीन मंदिर व अन्य निर्माण 1000 वर्ष से भी अधिक पुराने हैं। इससे ही इस क्षेत्र की प्राचीन संस्कृति का सहज अंदाजा हो जाता है। कृषि और बागवानी के क्षेत्र में भी रवांई का कोई सानी नहीं है। रवांई का लाल चावल अपनी खूबियों के लिए दूर-दूर तक पहचाना जाता है। यमुना-टोंस के अलावा कमल और ऐसी ही अनेक छोटी नदियां रवांई क्षेत्र को सरसब्ज रखने में अपना योगदान देती हैं।

उत्तराखंड के देहरादून और टिहरी जनपद की सीमाओं से लगे उत्तरकाशी जनपद का रवांई क्षेत्र कृषि, बागवानी, पशुपालन व स्वरोजगार के लिए जाना जाता है लेकिन इस क्षेत्र में साहित्यिक गतिविधियां नगण्य रही हैं। रवांई क्षेत्र की साहित्यिक शून्यता को भरने की पहल सामाजिक संस्था अर्श व देहरादून की प्रकाशन संस्था समय साक्ष्य द्वारा प्रारंभ की गई। दोनों संस्थाओं ने मिलकर 29-30 जुलाई 2017 को रवांई क्षेत्र के केन्द्रीय नगर पुरोला में रवांई साहित्य महोत्सव का आयोजन किया। टीएचडीसी सेवा, टोंस वन प्रभाग पुरोला व होटल क्लासिक हिल व्यू के सहयोग व रवांई साहित्य महोत्सव आयोजन समिति के संयोजन में आयोजित दो दिवसीय आयोजन में कुल दस सत्र आयोजित किए गए।

रवांई घाटी में पहली बार आयोजित साहित्य महोत्सव महानगरों में आयोजित हो रहे साहित्य महोत्सवों से उन्नीस नहीं रहा। इस आयोजन के सत्र इस प्रकार रखे गए कि साहित्य महोत्सव में साहित्यकार, राजनीतिज्ञ, सामाजिक कार्यकर्ता, पर्यावरणविद्, व्यवसायी, इतिहासकार व किसान सभी एक साथ मंच पर नजर आए। साहित्य महोत्सव में न सिर्फ हिन्दी साहित्य में पहाड़ जैसे आंचलिकता व स्थानीयता से जुड़े सत्र आयोजित किए गए जिसमें हिन्दी साहित्य के साथ पहाड़ के रिश्ते और उसकी मौजूदगी पर बात हुई, बल्कि यमुना टोंस घाटी के इतिहास, समाज और संस्कृति जैसे सत्र भी हुए। जहां श्रोताओं को यमुना-टोंस घाटी के इतिहास और प्राचीन संस्कृति के विषय में इतिहासकारों से तथ्यपरक जानकारी हासिल हुई। दो दिवसीय रवांई साहित्य महोत्सव 2017 में राज्यसभा सांसद प्रदीप टम्टा, लोकसंस्कृति के पुरोधा प्रो. डी.आर. पुरोहित, जमना लाल बजाज व इन्दिरा गांधी पुरस्कार प्राप्त गांधीवादी विचारक व सामाजिक कार्यकर्ता राधा बहन, उत्तराखंड के पूर्व कैबिनेट मंत्री मोहन सिंह रावत ‘गांववासी’,  राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त किसान युद्धवीर सिंह रावत, बाल मनोविज्ञान विशेषज्ञ खजान सिंह, भारत में सबसे अधिक छह बार माउन्ट एवरेस्ट फतह कर चुके पर्वतारोही लवराज सिंह धर्मशत्तू,  पुस्तकों की दुनिया के जानकार रमाकांत बेंजवाल, बाल प्रहरी के सम्पादक व बाल साहित्यकार उदय किरौला, डॉ राधेश्याम बिजल्वाण, डॉ विजय बहुगुणा जैसे विषय विशेषज्ञ मौजूद रहे।

पुरोला के प्रथम नागरिक नगर पंचायत अध्यक्ष प्यारे लाल हिमानी ने सभी साहित्यकारों व उपस्थित नागरिकों का स्वागत किया। आयोजन के पहले दिन ‘यमुना टोंस घाटी- इतिहास, समाज और संस्कृति, ‘हिमालय और हम’, हिन्दी साहित्य में पहाड़, ‘कवि और कविताएं’ (स्थानीय कवियों का कविता पाठ) जैसे रोचक सत्र आयोजित किए गए। पहले दिन सायं साहित्यकारों को पुरोला से मठगांव व धुनधार होते हुए साहित्यकार महावीर रवांल्टा के गांव महरगांव का भ्रमण कराया गया। महरगांव में महाबीर रवांल्टा की अगुवाई में ग्रामीणों ने साहित्यकारों का जोरदार स्वागत किया। इस अवसर पर ग्रामीणों द्वारा तांदी गीत व नृत्य आयोजन के साथ ही साहित्यकारों को पहाड़ी व्यंजन अरसे, पकौड़ी व लाडू खाने को दिए।

आयोजन के दूसरे दिन का पहला सत्र ‘यमुना टोंस घाटीः स्थानीय आर्थिकी और उसकी चुनौतियाँ’ विषय पर आयोजित किया गया। इसके अतिरिक्त आयोजन का दूसरा सत्र ‘मैं और पहाड़’ विषय पर पर हुआ। इस एकल सत्र को प्रसिद्ध पर्वतारोही लवराज सिंह धर्मशत्तू ने संबोधित किया। दूसरे दिन का तीसरा सत्र ‘पुस्तकें कुछ कहना चाहती हैं’ विषय पर आयोजित किया गया। इस सत्र को राजभवन देहरादून के पुस्तकलाध्यक्ष रमाकांत बेंजवाल ने संबोधित किया। बाल साहित्य और बच्चे सत्र को बालसाहित्य के पारखी उदय किरोला ने संबोधित किया। आयोजन के दूसरे दिन दो पुस्तकों का लोर्कापण भी किया गया। पहली पुस्तक महाबीर रवांल्टा की रवांल्टी कविताओं की पुस्तक ‘गैणी जण आमार सुईन’ तथा दूसरी पुस्तक डॉ. सत्यानन्द बडोनी की ‘बस! इथगि चैन्दू’ रही। आयोजन के दौरान सांस्कृतिक कार्यक्रमों की भी धूम रही। इन कार्यक्रमों में कलाकारों द्वारा रवांई घाटी की लोकसंस्कृति को प्रदर्शित किया गया। जीआईसी पुरोला, शिवालिक पब्लिक स्कूल के छात्रों द्वारा रवांई क्षेत्र के लोकगीतों में नृत्य प्रस्तुत किए गए। आयोजन के दूसरे दिन की शाम रवांई के प्रसिद्ध लोकगायक अनिल बेसारी के नाम रही। बेसारी और उनकी टीम ने स्थानीय लोकगीतों का ऐसा शमा बाँधा कि आयोजन स्थल के आसपास लोग छतों पर चढ़कर कार्यक्रम का आनंद उठाते रहे। इस अवसर पर देहरादून से साहित्यकार शूरवीर सिंह रावत, पत्रकार राजेन्द्र जोशी, मनोज इष्टवाल, दिनेश कंडवाल, सुरेन्द्र पुण्डीर व सुन्दर बिष्ट भी पहुंचे।

रवांई साहित्य महोत्सव में सांस्‍कृति‍क कार्यक्रम पेश करते कलाकार।

‘इतिहास समाज और संस्कृति’सत्र में बोलते हुए राज्यसभा सांसद प्रदीप टम्टा ने कहा कि रवांई का इतिहास समूचे पर्वतीय भूभाग से अलग है। अलग-अलग अवसरों पर हुई पुरातात्विक खुदाई से भी यह संकेत मिल चुके हैं। प्रो. डी.आर. पुरोहित ने बताया कि रवांई क्षेत्र के लोकगीत व लोकनृत्य अपनी अलग ही छाप छोड़ते हैं और यहां संस्कृति अभी अपने मूलरूप में बची हुई है। रवांई क्षेत्र के इतिहास से जुड़े डॉ. राधेश्याम बिजल्वाण ने रवांई की प्राचीन धाड़ा प्रथा के बारे में बताया, जबकि डॉ. प्रहलाद रावत ने रवांई के ऐतिहासिक स्थलों व मंदिरों के बारे में बताया। इसी प्रकार डॉ. बिजय बहुगुणा ने रवांई की बोली की प्राचीनता पर अपनी बात कही। इस सत्र का संचालन इतिहास के प्रवक्ता सुभाष उनियाल ने किया।

‘हिमालय और हम’सत्र में राधा बहन, मोहन सिंह रावत गांववासी व अशोक वर्मा बतौर वक्ता शामिल रहे। राधा बहन ने इशारा किया कि‍ कि‍स प्रकार भारी व अनियोजित निर्माणों के कारण हिमालयी क्षेत्र के पर्यावरण व पारिस्थितिकी को नुकसान पहुंच रहा है। उन्होंने कहा कि विकास और पर्यावरण में संतुलन भविष्य को सुरक्षित रखने की पहली शर्त है। पूर्व मंत्री मोहन सिंह रावत गांववासी ने रवांई क्षेत्र की गई अपनी यात्राओं के साथ ही हिमालय के महत्व और उपयोगिता पर प्रकाश डाला। उत्तराखंड ओबीसी आयोग के पूर्व अध्यक्ष अशोक वर्मा ने कहा कि पर्यावरण और पारिस्थितिकी के साथ संतुलन बनाते हुए विकास भी जरूरी है। उन्होंने हिमालय में संघर्षपूर्ण जीवन जी रहे लोगों के लिए बेहतर नीतियां बनाने की वकालत की। इस सत्र का संयोजन युवा साहित्यकार सुभाष तराण द्वारा किया गया।

‘कवि और कविता’ सत्र में स्थानीय कवियों महावीर रवांल्टा, अर्जुन सिंह नेगी, नीरज उत्तराखंडी, खिलानन्द बिजल्वाण, चन्द्रमोहन नौडियाल, प्रवीन तिवारी, सुभाष तराण, बलदेव सिंह भंडारी, बसंती असवाल व चन्द्रभूषण बिजल्वाण आदि ने कविता पाठ किया।

आयोजन के दूसरे दिन का पहला सत्र ‘यमुना-टोंस घाटीः स्थानीय आर्थिकी और उसकी चुनौतियां’ विषय पर आयोजित किया गया। इस सत्र को कृषि पंडित की उपाधि से नवाजे गए क्षेत्र के प्रगतिशील किसान युद्धवीर सिंह, युवा होटल व्यवसायी हरिमोहन सिंह नेगी, पर्यटन व्यवसायी चैन सिंह रावत, दिनेश भट्ट,  डॉ. आशा राम बिजल्वाण व युवा नेता अमेन्द्र बिष्ट ने संबोधित किया। युद्धवीर सिंह रावत ने बताया कि किस प्रकार यमुना टोंस घाटी में खेती करने के तौर-तरीकों में बदलाव आया और किसान व्यवसायिक खेती की ओर उन्मुख हुए। उन्होंने खेती किसानी के प्रति नई पीढ़ी की उदासीनता और सरकार के रवैये को भी सामने रखा। हरिमोहन सिंह नेगी ने कहा कि यमुना-टोंस घाटी में देश ही नहीं वरन् दुनिया के कुछ खूबसूरत स्थान हैं। यहां वर्ष भर बहने वाली सुंदर नदियां हैं। यहां चांइसील और हर की दून जैसे बुग्याल हैं। फिर भी यहां पर्यटन का वैसा विकास नहीं हो पाया है। इसके लिए उन्होंने मिलकर प्रयास करने पर बल दिया। डॉ. आशा राम बिज्लवाण ने बताया कि यमुना टोंस घाटी की आर्थिकी को मजबूत करने के लिए व्यावसायिक रणनीतियों पर भी फोकस करना होगा, केवल उत्पादन से काम नहीं चलेगा। साहसिक पर्यटन से जुड़े चैन सिंह रावत ने बताया कि यमुना टोंस घाटी से 30 से अधिक ट्रेकिंग रूट हैं।

‘मैं और पहाड़’ सत्र में एकल संबोधन करते हुए पर्वतारोही लवराज सिंह धर्मशत्तू ने युवाओं का आह्वान किया कि वे अधिक से अधिक संख्या में पर्वतारोहण से जुड़ें। उन्होंने बताया कि पर्वतारोहण न सिर्फ आपको हौसला देता है, बल्कि रोजगार भी देता है।

‘पुस्तकें कुछ कहना चाहती हैं’सत्र में रमाकांत बेंजवाल ने उपस्थित श्रोताओं को बताया कि भले ही ऐसा प्रतीत हो रहा है कि पढ़ने की आदत कम हो रही है, लेकिन हकीकत यह है कि प्रकाशित हो रही पुस्तकों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इसी प्रकार ‘बाल साहित्य और बच्चे’ सत्र में उदय किरौला ने बाल साहित्य के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बच्चों में पढ़ने की आदत विकसित करने पर जोर दिया। इस सत्र का संयोजन प्रेम पंचोली द्वारा किया गया। आयोजन से जुड़ी रानू बिष्ट, राजेन्द्र लाल आर्या, सुभाष उनियाल आदि ने भी विभिन्न सत्रों में प्रतिभाग किया। इस अवसर पर पुस्तक प्रदर्शनी व स्थानीय उत्पादों का स्टॉल भी लगाया गया।

कुल मिलाकर दो दिनों का यह आयोजन यमुना-टोंस घाटी में साहित्य को लेकर एक अच्छी शुरुआत कर गया है जिसकी गूंज अगले आयोजन तक सुनाई देती रहेगी।

प्रेमचंद के बहाने समय-समाज को समझने की कोशि‍श  

रा.इ.का. टोटनौला में दीवार पत्रिका ‘नवांकुर’ के प्रेमचंद अंक का विमोचन किया गया।

पि‍थौरागढ़ : प्रेमचंद जयंती तथा उसकी पूर्व संध्या पार उनको याद करते हुए जगह-जगह विविध कार्यक्रम आयोजित किए गए। इसका उद्देश्य प्रेमचंद के बहाने अपने समय और समाज को जानना-समझना और पढ़ने की संस्कृति को आगे बढ़ाना रहा। इस बार पिथौरागढ़ में आरम्भ स्टडी सर्किल, रचनात्मक शिक्षक मंडल और लोकतान्त्रिक साहित्य-संस्कृति मंच द्वारा प्रेमचंद जयंती को एक अलग अंदाज में मनाया गया। प्रेमचंद जयंती की पूर्व संध्या पर एक ‘कथा चौपाल’ का आयोजन किया गया। इसके न किसी को औपचारिक आमंत्रण पत्र दिए गए, न किसी को अध्यक्षता के लिए कहा गया और न ही कोई मुख्य वक्ता तय किया गया। कथा पाठ हुआ। उसके बाद उपस्थित लोगों ने बिना किसी औपचारिकता के कहानी को लेकर अपनी-अपनी बात रखी। गिर्दा के जनगीतों से कार्यक्रम की शुरुआत और समापन हुए। लोग उसके बात भी चर्चा-परिचर्चा करते हुए देखे गए।

कार्यक्रम का एक विहंगम शब्द-चित्र ‘बाखली’ के संपादक गिरीश चन्द्र पाण्डेय ने अपने फेसबुक वाल पर कुछ यूँ खींचा है- बरसात का दिन, राम लीला फिल्ड,और मुंशी प्रेमचंद जयंती का पूर्व दिन शाम के साढ़े चार बजे के आसपास बरसात का रुक जाना और आरम्भ स्टडी सर्कल के कुछ युवा साथी अपने पोस्टरों और किताबों से भरे झोलों के साथ बाहर निकलते हैं। साथ में विनोद उप्रेती, राजीव जोशी, कमलेश उप्रेती, चिंतामणि जोशी, किशोर पाटनी, दिनेश भट्ट आदि का ओपन थियेटर की ओर आना पिथौरागढ़ के माहौल में आ रहे परिवर्तन की ओर इंगित कर रहा था। बस कुछ ही पलों में पोस्टर लहराने लगे और एक मेज पर सज गई थीं कुछ स्थूल और कुछ कृसकाय किताबें। अब तक कुछ भी तो नहीं था, दो-चार लोगों के सि‍वाय।लग रहा था कि‍ बस इतने ही लोग क्या बोलेंगे। क्या सुनेंगे। क्या विचार-विमर्श होगा। कुछ ही देर में महेश पुनेठा आदि का आना और सीढ़ियों पर बैठ जाना । एक-एक कर संख्या का बढ़ते जाना। और बिना औपचारिकता के आरम्भ के साथियों के संचालन में गिर्दा के जनगीत के साथ प्रेमचंद की दो बैलों की कथा का अभिनयात्मक वाचन । थोड़ी ही देर में शिक्षकों और छात्रों के समूह से सामने की सीढ़ियां भर गईं। थोड़ी दूर पर बैठे कुछ बच्चे पहले कुछ मजाकिया मूड में थे, कहानी के उतार-चढ़ाव के साथ खुद को जोड़ने से रोक नहीं पाए। चुपचाप आए और पीछे बैठ गए और कहानी में लीन हो गए। तहसील परिसर की दीवार पर कुछ लोग जो ऐसे ही खड़े थे, दीवार के सहारे खड़े होकर हीरा और मोती की बातें ऐसे सुन रहे थे मानो अपने गांव की सैर में चले गए हों। बीच-बीच में बज रहीं मोबाइल की घण्टियों से ऐसा लग रहा था मानो थियेटर में पार्श्व संगीत चल रहा हो। करीब पौन घण्टे चली कहानी अब पूर्णता की ओर थी । आखिर कहानी पूरी हुई । युवा संचालक का बातचीत को आगे बढ़ाना । खुले मंच को अपने विचारों को साझा करने को कहना । किसी कहानी को कौन किस तरह किन कोणों से पढ़ता और समझता है, कितना अपने से और समाज से जोड़ पाता है, तत्कालीन समाज और समय और आज के परिपेक्ष्‍य में कहानी उपादेयता, पात्रों का गठन और उनकी उपयोगिता पर खुल कर चर्चा परिचर्चा हुई । खास बात यह थी की बोलने वालों में सबसे मुखर युवा और बच्चे थे । सभी ने यह माना कि यह खुली चर्चा शहर में पढ़ने और पढ़ाने की संस्कृति को विकसित करने के लिए एक सार्थक पहल है। यह लगातार होनी चाहिए। रचनात्मक शिक्षक मंडल का योगदान भी सराहनीय रहा। युवाओं को अगर सही मर्गदर्शन मिले तो शहर की फिजा बदल सकती है। युवाओं का यह जोश भविष्य के प्रति आश्वस्त करता है। अंत में फिर जनगीत के साथ एक खूबसूरत खुले मंच का विसर्जन। और उसके बाद किशोर पाटनी, राजीव जोशी, चिंतामणि जोशी की औपचारिक बातें। कुल मिलाकर एक खूबसूरत शाम ।अब बारिश शुरू हो चुकी थी ।

कार्यक्रम में पोस्‍टर रहे आकर्षण का केंद्र।

इस कार्यक्रम के बारे में डीडीहाट से शामिल होने आए शिक्षक साथी कमलेश उप्रेती ने अपनी फेसबुक पोस्ट में लिखा है कि कुछ बेहतर करने के लिए बहुत बड़े तामझाम की जरूरत बिल्कुल नहीं होती। लगन हो और नीयत साफ तो खुले आसमान के नीचे भी शानदार आयोजन हो सकता है। इसका उदाहरण है पिथौरागढ़ में कालेज में पढ़ने वाले युवाओं का एक रचनात्मक समूह ‘आरंभ स्टडी सर्कल’। कल महान भारतीय साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद के जन्मदिन पर कथा चौपाल का अनौपचारिक आयोजन इन जोशीले युवाओं द्वारा किया गया। साथ में एक बुक स्टॉल भी, जहां पर प्रेमचंद साहित्य के साथ वैज्ञानिक विषयों पर किताबें खरीदने के लिए उपलब्ध, कितना सुखद है यह सब हमारे पिथौरागढ़ में हो रहा है।
कहानी ‘दो बैलों की कथा’ का वाचन नाटकीय संवाद शैली में किया गया तो आभास हुआ कि इस तरह सामूहिक वाचन से कथ्य के कितने सारे आयाम खुलते हैं!  दोस्तो, इस दौर में जब युवा राह चलते भी अपने स्मार्टफोन में घुसा रहता है, आपके किताब उठाकर सरेआम पचास लोगों को पढ़कर सुनाने के जज्बे को सलाम बनता है।

प्रेमचन्द जयंती की पूर्व संध्या पर रचनात्मक शिक्षक मण्डल रामनगर द्वारा एमपी इंटर कालेज में कार्यक्रम आयोजित किया गया । इस कार्यक्रम के बारे में कार्यक्रम के संयोजक नवेंदु मठपाल अपनी फेसबुक पोस्ट पर बताते हैं कि 38 विद्यालयों के 700 से अधिक बच्चे, मौका था प्रेमचन्द जयंती की पूर्व संध्या पर रचनात्मक शिक्षक मण्डल द्वारा एमपी इंटर कालेज में आयोजित कार्यक्रम का। ये बच्चे विगत एक महीने में 10 हजार बच्चों से विभिन्न तरीकों से कि‍ए गए सम्पर्क के परिणामस्वरूप आए। बोर्ड सचिव श्री वीपी सिमल्टी जी ने बतौर मुख्य अतिथि अपने स्कूली दिनों को प्रेमचन्द की कहानियों के बहाने याद किया, तो बतौर विशिष्ट अतिथि मौजूद कुमाउंनी साहित्यकार मथुरादत्त मठपाल जी ने भी वक्तव्य रखा। ललिता बिनवाल स्मारक समिति के अध्यक्ष बिनवाल जी, वरिष्ठ चित्रकार सुरेश लाल जी, रंगकर्मी रामपाल जी, कवि असगर जी, संजय रिखडी जी के नेतृत्व में भोर संस्था की नौजवान टीम के साथियों, अनेक प्रधानाचार्यों एसपी मिश्रा जी, राय जी, दिग्विजय सिंह जी, पुष्पा बुधानि जी, नलनी श्रीवास्तव जी, नीना सन्धु जी, जीतपाल जी के नेतृत्व में रोवर्स, रेंजर्स की टीम समेत 50 से अधिक शिक्षक-शिक्षिकाओं का रहा सक्रिय सहयोग। देघाट के शिक्षक साथी पाठक जी का विशेष धन्यवाद। बच्चों की एक टीम लेकर पहुंच गए।

अनौपचारि‍क कार्यक्रम में लोगों ने दि‍खाई खासी रुचि‍।

कार्यक्रम की शुरुआत भोर की टीम ने 1857 विद्रोह के प्रयाण गीत ‘हि‍म हैं इसके मालिक हिंदुस्तान हमारा’ एवं रामप्रसाद बिस्मिल के गीत ‘सरफरोशी की तमन्‍ना’ से हुई। प्रत्येक प्रतिभागी बच्चे को दिया गया- प्रेमचन्द साहित्य। आयोजक मण्डल द्वारा निकाली गई पुस्तिका ‘हमारी विरासत’ का भी विमोचन हुआ। कौन कहता है कि‍ बच्चे पढ़ना नही चाहते, शिक्षकों को तो सिर्फ वेतन और छुट्टी ही चाहिए। रचनात्मक मण्डल की टीम ने फिर गइस धारणा को गलत साबित किया।

गतवर्ष की भांति ही डॉ. डी.डी. पंत स्मारक बाल विज्ञान खोजशाला बेरीनाग में प्रेमचंद जयंती की पूर्व संध्या पर भव्य आयोजन किया गया। साथी कमलेश जोशी अपनी फेसबुक वॉल में बताते हैं कि  इस कार्यक्रम में विभिन्न स्कूलों के बच्चों ने प्रेमचंद की कहानियों पर पोस्टर बनाए, कहानियों का वाचन किया और नाटक किए। फ़िल्म ‘ईदगाह’ का प्रदर्शन भी किया गया। उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष प्रेमचंद जयंती के अवसर पर यहाँ एक बालिका द्वारा प्रेमचंद की कहानी ‘दो बैलों की कथा’ का कुमाउंनी भाषा में किया अनुवाद काफी चर्चित रहा था।

प्रेमचंद जयंती की पूर्व संध्या पर अज़ीम प्रेमजी फाउन्डेशन, टीएलसी गरुड़ में भी कार्यक्रम आयोजि‍त हुए। इसके बारे में युवा लेखक बिपिन जोशी अपनी  फेसबुक वॉल पर कुछ इस तरह बताते हैं-  मुंशी प्रेमचंद जयंती की पूर्व संध्या पर अज़ीम प्रेमजी फाउन्डेशन, टीएलसी गरुड़ में कहानी वाचन एवम काव्य गोष्‍ठी का आयोजन किया गया। प्रेमचंद जी की मशहूर कहानी ‘बड़े भाई साहब’ का वाचन किया गया । कहानी पर सारगर्भित चर्चा की गई । उक्त कार्यक्रम में शिक्षक साथियों सहित उत्तराखण्ड के लोक साहित्यकार गोपाल दत्त भट्ट, मोहन चन्द्र जोशी, चन्द्र शेखर बडशीला, ओम प्रकाश फुलारा, वरिष्ठ पत्रकार आनंद बिष्ट तथा जिला शिक्षा अधिकारी आकाश सारस्वत भी मौजूद रहे।

कार्यक्रम का संचालन करते हुए शिक्षक नीरज पन्त ने मुंशी जी के साहित्य पर उनके जीवन पर प्रकाश डाला। मुंशी जी के बहाने दलित साहित्य और नारी साहित्य पर भी बातचीत की गई । कहानी ‘बड़े भाई साहब’ का वाचन शिक्षक उमेश जोशी ने कि‍या।
कथा चर्चा के बाद कुमाउंनी लोक साहित्य के प्रख्यात हस्ताक्षर मोहन जोशी, वरिष्ठ साहित्यकार गोपाल दत्‍त भट्ट, ओमप्रकाश फुलारा ने अपनी रचनाओं का पाठ कि‍या।
साहित्य गोष्‍ठी को एक महत्वपूर्ण रचनात्मक कार्यक्रम बताते हुए डीईओ आकाश सारस्‍वत ने प्रेमचंद की कालजयी रचनाओं की प्रसंगिकता पर विचार रखे।

कुमाउं  मंडल  के विभिन्न स्कूलों में भी प्रेमचंद जयंती अपने-अपने तरीके से मनाई गई।  रा.इ.का. देवलथल में अनेक कार्यक्रम आयोजित किए गए। दीवार पत्रिका ‘मनोभाव’ के प्रेमचंद विशेषांक का प्रधानाचार्य अनुज कुमार श्रीवास्तव ने लोकार्पण किया। उन्होंने कहा कि‍ प्रेमचंद का साहित्य हमें साम्प्रदायिकता, जातिवाद, क्षेत्रवाद जैसी संकीर्णताओं से ऊपर उठने की प्रेरणा देता है। उन्होंने बच्चों द्वारा सम्पादित दीवार पत्रिका के इस विशेष अंक की प्रशंसा करते हुए कहा कि इस तरह के प्रयास अधिकाधिक होने चाहिए क्योंकि इससे बच्चों की रचनाशीलता और कल्पनाशीलता को नए आयाम मिलते हैं। इससे पूर्व कार्यक्रम का संचालन करते हुए दीवार पत्रिका के संपादक राहुल चन्द्र बड़ ने प्रेमचंद के व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डाला। शिक्षक रमेश चन्द्र भट्ट ने एक दि‍न पूर्व ‘प्रतिभा दिवस’ पर जूनियर कक्षाओं द्वारा तैयार की गई  दीवार पत्रिकाओं का बच्चों द्वारा समूहवार प्रस्तुतीकरण भी  किया गया।

इससे पूर्व प्रेमचंद जयंती पर कक्षावार निबंधों का पाठ किया गया। कक्षा-12 में उनके निबंध ‘प्राचीन और नवीन’ तथा कक्षा-10 में ‘आजादी की लडाई’ का वाचन किया गया। इन पर बच्चों ने लिखित रूप से अपनी प्रतिक्रिया दी। कक्षा-9 के बच्चों के साथ प्रेमचंद की प्रमुख कहानियों की चर्चा करते हुए उन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित किया गया। बच्चों को बताया गया कि कहानियां हमें केवल आनंद ही नहीं प्रदान करती हैं, बल्कि वे जिस कालखंड में रची गयी होती हैं, उस समय और समाज के बारे में बहुत कुछ बताती हैं।जैसे- प्रेमचंद के साहित्य को पढ़ते हुए वे आजादी की लडाई के बारे में तथा उस समय के समाज के बारे में बहुत कुछ जान और समझ सकते हैं। इससे हमारी भाषा भी मजबूत होती है। इसलिए पाठ्यपुस्तकों के साथ-साथ साहित्य की पुस्तकें भी पढ़ी जानी चाहिए। न केवल खुद, बल्कि दूसरों को भी पढ़ने के लिए प्रेरित करना चाहिए। इसके लिए पुस्तकालय खोलने के अभियान से जुड़ने की बच्चों से अपील की गई।  बच्चों ने लिखित रूप से संकल्प व्यक्त किया कि वे अपने-अपने गांव में छोटे-छोटे पुस्तकालय स्थापित करने की कोशिश करेंगे। साथ ही वे प्रेमचंद की अगली जयंती तक उनकी अधिक से अधिक रचनाएँ पढ़ेंगे।

रा.इ.का. टोटनौला में शिक्षक-साहित्यकार चिंतामणि जोशी के मार्गदर्शन में दीवार पत्रिका ‘नवांकुर’ के प्रेमचंद अंक का विमोचन किया गया। उन्‍होंने अपनी फेसबुक वाल लि‍खा है कि‍ आज मास का अंत था और चौथे वादन के बाद दीवार पत्रिका समूह द्वारा ‘नवांकुर’ के प्रेमचंद विशेषांक के लोकार्पण व प्रेमचंद जयंती मानाने की योजना भी थी। सुबह विद्यालय पहुंचे तो रात भर के बाद भी बरसात जारी थी। बच्चे पिछले लगभग 15 दिनों से अपने ढंग से प्रेमचंद को जानने-समझने में लगे थे। इस माह दीवार पत्रिका के भी दो अंक तैयार कर चुके थे। विद्यालय में बृहद कक्ष है नहीं। तीसरे वादन तक भी मौसम नहीं खुला तो कक्षा 11अ के बच्चों ने अपनी कक्षा का फर्नीचर बगल के कक्ष में शिफ्ट कर कक्षा में दरिया बिछा दीं और शिक्षकों के लिए कुर्सियां डालकर प्रधानाचार्य जी को सूचित कर दिया कि कार्यक्रम होगा और कक्षा कक्ष में ही होगा। वाह! जहाँ चाह वहां राह।

दीवार पत्रिका संपादक मंडल ने मध्यांतर के बाद विद्यार्थियों को बिना बैग के छोटे से कक्ष में बिठा दिया। मुख्य संपादक कविता कापड़ी ने आवश्यक निर्देशों के बाद प्रेमचंद जयंती पर कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत की कि नवांकुर का लोकार्पण, आलेख-कविताओं-कहानियों का वाचन, समीक्षा, प्रेमचंद के बहाने पढ़ने-लिखने की संस्कृति पर संवाद होगा और गणित अध्यापिका नीता अन्ना को बच्चों की ओर से विदाई भी दी जाएगी। कविता 100 बच्चों के भीतर स्व-अनुशासन रोपित कर चुकी थी।

प्रधानाचार्य कैलाश बसेड़ा जी के साथ श्रीमती अन्ना, पूनम, स्वाति व दीवार पत्रिका टीम ने नवांकुर का लोकार्पण किया। प्रधानाचार्य ने दीवार पत्रिका के महत्व को सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण मानते हुए बच्चों की खूब प्रशंसा की। छात्रा बबीता पाण्डेय ने स्वरचित कुमाउंनी कविता में प्रेमचंद की जीवनी और रचना संसार को व्यक्त किया। कमलेश पाण्डेय ने स्वरचित ‘प्रेमचंद जिन्होंने साहित्य में यथार्थ को निरूपित किया’ तथा आकांक्षा ने ‘प्रेमचंद की रचनाओं में स्त्री पक्ष’ आलेख का वाचन किया। तनुजा कापड़ी ने स्वरचित कहानी ‘शेरा की वापसी’ का पाठ कर सभी की संवेदना को झकझोरा। हिंदी शिक्षक राजेन्द्र बिष्ट, प्रकाश राम व विज्ञानं शिक्षक संतोष पन्त ने बच्चों को प्रेमचंद के विस्तृत रचना संसार की सैर कराई। मैंने प्रेमचंद के सम्बन्ध में बच्चों के प्रश्नों एवं जिज्ञासाओं के समाधान का प्रयास किया। उन्हें प्रेरित किया कि अच्छा साहित्य पढ़ने की आदत विकसित कर कैसे वे बेहतर इन्सान बन सकते हैं।

बागेश्वर जनपद के गरुड़ विकासखंड में स्थित राजकीय जूनियर हाईस्कूल रौल्याना में नवाचारी शिक्षक साथी नीरज पन्त के निर्देशन में  प्रेमचंद की जयंती मनाई गई। इस अवसर पर बच्चों ने मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘ईदगाह’ और ‘पूस की रात’ का वाचन किया एवं कहानी के तत्वों पर चर्चा की।  ग्राम प्रधान मदन गिरी की अध्यक्षता में विविध कार्यक्रम हुए।

क्रि‍एटि‍व उत्‍तराखंड द्वारा रुद्रपुर में संचालित सृजन पुस्‍तकालय में भी प्रेमचंद जयंती पर कार्यक्रम आयोजि‍त कि‍या गया। इस अवसर पर प्रेमचंद की जीवन पर प्रकाश डाला गया और ईदगाह और दो बैलों की कहानी का वाचन कि‍या गया। इसके साथ कवि‍ता पाठ भी हुआ।

राजकीय इंटर कॉलेज खरसाड़ा पालगेट टि‍हरी गढ़वाल में आयोजि‍त कार्यक्रम में दो बैलों की कहानी और कई अन्‍य कहानि‍यों का वाचन और चर्चा हुई। साथ ही प्रेमचंद की भाषा, जीवन दर्शन और सामाजि‍क सरोकारों पर चर्चा हुई। कार्यक्रम का संचालन मोहन चौहान ने कि‍या।

राजकीय प्राथमि‍क वि‍द्यालय नवीन चौरसौ बागेश्‍वर में प्रेमचंद जयंती पर बच्चों ने दीवार पत्रिका ‘मन की बात’ तैयार की। मुख्य का आकर्षण प्रेमचंद की कहानियों का वाचन, जीवन परिचय, स्वरचित कहानी पाठ और चित्रांकन रहा। कार्यक्रम प्रधानाध्‍यापि‍का रीता जोशी की देखरेख में संपन्‍न हुआ।

प्रेमचंद जयंती पर आयोजि‍त कार्यक्रम में बड़ी संख्‍या में बच्‍चों की भागेदारी बहुत कुछ कहती है।

प्रस्‍तुति‍ : महेश चन्द्र पुनेठा

चांदनी चन्दन सदृश’: / हम क्यों लिखें?

अजित कुमार

‘चांदनी चन्दन सदृश’: / हम क्यों लिखें? / मुख हमें कमलों सरीखे/क्यों दिखें? / हम लिखेंगे:/ चांदनी उस रुपये-सी है/ कि जिसमें/चमक है, पर खनक ग़ायब है।’

नयी कविता के ग़ैर-रूमानी मिज़ाज की ऐसी प्रतिनिधि पंक्तियां लिखनेवाले कवि-गद्यकार श्री अजित कुमार हमारे बीच नहीं रहे। आज (18 जुलाई 2017) सुबह 6 बजे लम्बी बीमारी से संघर्ष करते हुए 84 साल की उम्र में दिल्ली के एक अस्पताल में उनका निधन हो गया।

हिन्दी के साहित्यिक परिदृश्य को अपनी गरिमामय उपस्थिति से जीवंत रखनेवाले अजित जी ने लगभग छह दशकों की अपनी साहित्यिक सक्रियता से हिन्दी की दुनिया को यथेष्ट समृद्ध किया। देवीशंकर अवस्थी के साथ ‘कविताएँ 1954’ का सम्पादन करने के बाद 1958 में उनका पहला कविता संग्रह ‘अकेले कंठ की पुकार’ प्रकाशित हुआ था। तब से ‘अंकित होने दो’, ‘ये फूल नहीं’, ‘घरौंदा’, ‘हिरनी के लिए’, ‘घोंघे’ और ‘ऊसर’ – ये कविता-संग्रह प्रकाशित हुए। उपन्यास ‘दूरियां’, कहानी-संग्रह ‘छाता और चारपाई’ तथा ‘राहुल के जूते’, संस्मरण और यात्रा-वृत्त की पुस्तकें ‘दूर वन में’, ‘सफरी झोले में’, ‘निकट मन में’, ‘यहाँ से कहीं भी’, ‘अँधेरे में जुगनू’, ‘सफरी झोले में कुछ और’ और ‘जिनके संग जिया’, तथा आलोचना पुस्तकें ‘इधर की हिन्दी कविता’, ‘कविता का जीवित संसार’ और ‘कविवर बच्चन के साथ’ प्रकाशित हुईं। इनके अलावा नौ खण्डों में ‘बच्चन रचनावली’, ‘सुमित्रा कुमारी सिन्हा रचनावली’, ‘बच्चन निकट से’, ‘बच्चन के चुने हुए पत्र’, ‘हिन्दी की प्रतिनिधि श्रेष्ठ कविताएं’ समेत बीसियों पुस्तकें उनके सम्पादन में निकलीं। अभी-अभी उनकी किताब ‘गुरुवर बच्चन से दूर’ छप कर आयी है।

अपनी लम्बी बीमारी और शारीरिक अशक्तता के बावजूद अजित जी लेखन में लगातार सक्रिय रहे। कुछ समय से दिल्ली की साहित्यिक संगोष्ठियों में उनका आना-जाना थोड़ा कम अवश्य हो गया था, पर विभिन्न संचार-माध्यमों के ज़रिये साहित्यिक समुदाय के साथ उनका जीवंत संपर्क बना हुआ था।

श्री अजित कुमार का निधन हिन्दी की दुनिया के लिए एक बड़ी क्षति है. जनवादी लेखक संघ उनके योगदान को स्मरण करते हुए उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है।

मुरली मनोहर प्रसाद सिंह (महासचिव)
संजीव कुमार (उप-महासचिव)

आनंद कुरेशी के कहानी संग्रह ‘औरतखोर’ का लोकार्पण

डूंगरपुर: बहुत सा श्रेष्ठ साहित्य भी विभिन्न कारणों से पाठकों तक पहुँच नहीं पाता। आनंद कुरेशी जैसे कथाकार को भी व्यापक हिन्दी पाठक वर्ग तक पहुंचाने के लिए हम सबको प्रयास करने होंगे। हिन्दी के प्रसिद्ध लेखक असग़र वजाहत ने डूंगरपुर के दिवंगत लेखक आनंद कुरेशी के ताजा प्रकाशित कहानी संग्रह ‘औरतखोर’ के लोकार्पण समारोह में कहा कि डूंगरपुर आकर उन्हें साहित्य की ऐसी गोष्ठियों की अर्थवत्ता का फिर से गहरा अहसास हुआ है। श्रोताओं के सवालों का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि साहित्य के भी अनेक स्तर होते हैं। आवश्यक नहीं कि लोकप्रिय समझे जाने वाले साहित्य का पाठक आगे जाकर गंभीर साहित्य का पाठक नहीं हो सकता। उन्होंने एक अन्य सवाल का जवाब देते हुए कहा कि श्रेष्ठ साहित्य मुद्दों की पहचान से ही नहीं बनता। इसके लिए अनेक कारक जिम्मेदार होते हैं। जिला पुस्तकालय के सभागार में हुए इस समारोह में राजस्थान विश्वविद्यालय की सहायक आचार्य  डॉ रेणु व्यास ने आनंद कुरेशी जी के संस्मरण सुनाए तथा पूना विश्वविद्यालय की डॉ शशिकला राय के कुरेशी की कहानी कला पर लिखे आलेख का वाचन किया। कुरेशी के अभिन्न मित्र और शायर इस्माइल निसार ने भावुक होकर कहा कि कुरेशी जी के साथ व्यतीत आत्मीय पलों को शब्दों में बयान कर पाना उनके लिए संभव नहीं है। वागड़ विभा के सचिव सत्यदेव पांचाल ने कहा कि आनंद कुरेशी जी आज भी अपनी कहानियों के माध्यम से जीवित हैं, जो बताता है कि साहित्यकार कभी नहीं मरता। पांचाल ने कहा कि कुरेशी जैसे लेखक हमारे लिए सदैव प्रेरणा स्रोत रहेंगे। चित्तौडगढ़ से आए कुरेशी जी के मित्र और ‘औरतखोर’ के सम्पादक डॉ. सत्यनारायण व्यास ने कहा कि अपने अभिन्न मित्र के बारे में बात करना जैसे अपने ही बारे में बात करना है। उन्होंने कुरेशी को याद करते हुए कहा कि उनका स्वाभिमान राजहंस की तरह गर्दन उठाए रहता है। स्थानीय महावि‍द्यालय में हिन्दी प्राध्यापक डॉ. हिमांशु पंडया ने सत्तर के दशक के एक हिन्दी कहानीकार की व्यापक जागरूकता को रेखांकित करते हुए कहा कि ऐसी दोस्तियाँ और साहित्यिक अड्डेबाजी बची रहनी चाहिए ताकि आनंद कुरेशी जैसे कई लेखक इस शहर को पहचान दिलाएं।

इससे पहले प्रो. असग़र वजाहत, उदयपुर विश्वविद्यालय के पूर्व आचार्य नवल किशोर, कवि-समालोचक डॉ. सत्यनारायण व्यास, वागड़ विभा के सचिव और स्थानीय कवि सत्यदेव पांचाल तथा दिल्ली से प्रकाशित साहित्यिक पत्रिका ‘बनास जन’ के सम्पादक डॉ. पल्लव ने आनंद कुरेशी के ताजा प्रकाशित कहानी संग्रह ‘औरतखोर’ का  लोकार्पण किया। डॉ. पल्लव ने मंच पर मौजूद सभी साहित्यकारों का सारगर्भित परिचय देते हुए कहा कि आनंद कुरेशी जैसे लेखक एक शहर, अंचल या राज्य की नहीं अपितु समूचे साहित्य की धरोहर होते हैं। कुरेशी जी के सुपुत्रों  हरदिल अजीज और इसरार ने आयोजन में अपने परिवार की तरफ से आभार दर्शाया।

अध्यक्षता कर रहे प्रो. नवल किशोर ने कहा कि हार एक सापेक्ष शब्द है। आनंद कुरेशी जिन्दगी की लड़ाई हार गए, पर लेखकीय जीवन में नहीं। आनंद कुरेशी को उन्होंने अभावग्रस्त समाज के लिए संघर्ष करने वाला लेखक बताते हुए कहा कि उनके जैसे लेखकों को आगे लाना चाहिए, जो अन्याय व अत्याचार का विरोध करने का साहस दर्शाते हैं। उन्होंने कहा कि आज संचार माध्यमों में शुद्ध मनोरंजन परोसा जा रहा है, जो मनुष्य को सोचने को विवश नहीं करता। प्रो. नवल किशोर ने कुरेशी की कुछ चर्चित कहानियों का भी उल्लेख किया। संयोजन प्रसिद्ध कहानीकार दिनेश पांचाल ने किया और अंत में कवि जनार्दन जलज ने धन्यवाद ज्ञापन किया। आयोजन में राजकुमार कंसारा, चंद्रकांत वसीटा, मधुलिका, हर्षिल पाटीदार, हीरालाल यादव, डॉ कपिल व्यास, प्रज्ञा जोशी, चन्द्रकान्ता व्यास तथा हेमंत सहित शहर अनेक साहित्य प्रेमी उपस्थित थे।

प्रस्तुति‍ : डॉ कपिल व्यास

मनुष्यता के पक्ष में है वजाहत का लेखन : प्रो बेनिवाल

अपने लेखन से जुड़े विविध प्रसंग सुनाते असग़र वजाहत।

नई दिल्ली : लेखक का सम्मान करना अकादमिकी का प्राथमिक कर्तव्य है। बड़े लेखक भाषाओं के दायरे में नहीं देखे जाते। असग़र वजाहत का लेखन उन्हें भारत के संदर्भ में सचमुच बड़ा लेखक बनाता है।  गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ वि‍श्‍वविद्यालय द्वारा आयोजित ‘बनास जन’ के लोकार्पण समारोह में मीडिया संकाय के अधिष्ठाता प्रोफेसर अनूप बेनिवाल ने कहा कि बहुत कम लेखक होते हैं जिन्हें पढ़कर सचमुच जीवन भर प्रेरणा मिलती हो। असग़र वजाहत ऐसे बड़े लेखक हैं जिन्होंने भारत विभाजन पर ‘जिस लाहौर नइ देख्या ओ जम्याइ नइ’ को मार्मिक कृति लिखकर मनुष्यता के पक्ष में एक महान कृति की रचना की है। आयोजन में मानविकी संकाय के अधिष्ठाता प्रोफेसर आशुतोष मोहन ने असग़र वजाहत के साथ अपने रंगमंच के अनुभव सुनाए और कहा कि उनके साथ रहकर ही जाना जा सकता है कि बड़ा लेखक जीवन में कितना सहज और सरल होता है। प्रोफेसर मोहन ने असग़र वजाहत के आख्यान ‘बाक़र गंज के सैयद’ को इधर लिखी गई सबसे महत्त्वपूर्ण कृति बताया। विश्वविद्यालय में रंगमंच के सलाहाकार अनूप त्रिवेदी ने ‘जिस लाहौर नइ देख्या ओ जम्याइ नइ’ के मंचन में प्रयुक्‍त दो गीत सुनाए तथा हबीब तनवीर के प्रसिद्ध तराने ‘अब रहिये बैठ इस जंगल में’ की प्रस्तुति से सबको मंत्रमुग्ध कर दिया।

‘बनास जन’ के सम्पादक पल्लव ने असग़र वजाहत पर विशेषांक निकालने के कारण रखते हुए कहा कि वे हमारी भाषा ही नहीं, हमारी संस्कृति के भी बड़े लेखक हैं, जिन्होंने चार विधाओं में प्रथम श्रेणी की रचनाएं लिखी हैं। उन्होंने कहा कि एक सच्‍चा लेखक असल में अपने समय और समाज से अभिन्न होता है और यह अभिन्नता उसे बेचैन बनाती है। असग़र वजाहत की बेचैनी हमारे भारतीय समाज की बेचैन आवाज़ ही तो है। अंगरेजी विभाग के प्रोफेसर विवेक सचदेव ने असग़र वजाहत के लेखन के महत्त्व पर कहा कि उनका लेखन पढ़ना भारत को सही अर्थों में जानना है।

इससे पहले उदयपुर से आए प्रोफेसर प्रदीप त्रिखा, रोहतक से आए प्रोफेसर जयवीर हुड्डा, प्रोफेसर अनूप बेनिवाल, शिक्षा अधिष्ठाता प्रोफेसर संगीता चौहान, अरबिंदो कालेज के प्रो राजकुमार वर्मा सहित अतिथियों ने अंक का विधिवत लोकार्पण किया। लेखकीय वक्तव्य देते हुए असग़र वजाहत ने अपने लेखन से जुड़े विविध प्रसंग सुनाए। अंगरेजी विभाग के डॉ समी अहमद खान ने असग़र वजाहत पर इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों द्वारा बनाया गया एक स्लाइड शो दिखाया। आयोजन में डॉ नरेश वत्स, डॉ राजीव रंजन, डॉ शुभांकु कोचर सहित बड़ी संख्या में विद्यार्थी, शोधार्थी तथा अध्यापक उपस्थित थे।

फोटो एवं रिपोर्ट – रोहित कुमार

अच्छी कविता समय की जटिलता को समेटती है : वि‍ष्णु नागर

काव्य-संग्रह ‘वह लड़की जो मोटरसाइकिल चलाती है‘ का लोकार्पण करते पल्ल्व, प्रेमचंद गांधी, वि‍ष्णु नागर और अनन्त भटनागर।

काव्य-संग्रह ‘वह लड़की जो मोटरसाइकिल चलाती है‘ का लोकार्पण करते पल्ल्व, प्रेमचंद गांधी, वि‍ष्णु नागर और अनन्त भटनागर।

अजमेर : ‘‘हमारी दुनिया में इतने रंग और जटिलताएं हैं कि उन्हें समेटना हो तो कविता करने से सरल कोई तरीका नहीं हो सकता। यह आवश्यक नहीं कि जो आसानी से समझ आ जाए, वह अच्छी और जो समझना जटिल हो, वह खराब कविता है या इसके विपरीत भी। जो कविता समय की जटिलता को समेटती है, वो अच्‍छी कविता है। सामाजिक परिवर्तनों को रेखांकित करना ही कविकर्म है।’’ ये विचार सुविख्यात कवि व व्यंग्यकार विष्णु नागर ने कवि व शिक्षाविद् डॉ. अनन्त भटनागर के नये काव्य-संग्रह ‘वह लड़की जो मोटरसाइकिल चलाती है’ के लोकार्पण समारोह में बतौर मुख्य अतिथि व्यक्त किये। रविवार 7 मई, 2017 को सूचना केन्द्र में आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि संग्रह की कविताएं सामाजिक चेतना से संबद्ध हैं और समझने में भी सरल हैं। सरल अभिव्यक्ति कौशल अत्यन्त कठिन कार्य है।

समारोह में विशिष्ट अतिथि युवा आलोचक डॉ. पल्लव ने कविता के सामाजिक सरोकारों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि अनन्त भटनागर की काव्यचेतना पर जन आन्दोलनों का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुए प्रतिष्ठित कवि-स्तंभकार प्रेमचन्द गांधी ने कहा कि इस संग्रह की कविताएं नये तेवर और प्रभावी शब्दावली को लिये हुए हैं।

चित्तौड़गढ़ से आये डॉ. राजेश चौधरी और वरिष्ठ काव्य आलोचक डॉ. बीना शर्मा ने पुस्तक पर विस्तृत आलेख पढ़ते हुए कहा कि वर्तमान की स्थितियों पर केन्द्रित होना इस संग्रह की विशेषता है। मोबाइल फोन, बाजार, नया साल और सेज में नयी सभ्यता के उपादानों को समझने की कोशिश की गई है। संग्रह का दूसरे खण्ड उम्र का चालीसवाँ में नितांत निजी अनुभूतियों के साथ रिश्तों में आते बदलाव को अभिव्यक्त करती कविताएं हैं। शीर्षक कविता कथ्य में अनूठी और सच्चे स्त्री विमर्श की कविता है। डॉ. रजनीश चारण, कालिंदनंदिनी शर्मा और दिव्या सिंहल ने अतिथियों का परिचय दिया। नगर निगम उपायुक्त ज्योति ककवानी, शचि सिंह और वर्षा शर्मा ने संग्रह की चुनिंदा कविताओं का पाठ किया।

स्वागत उद्बोधन में नाटककार उमेश कुमार चैरसिया ने कृति को मानवीय संवेदनाओं की अभिव्यक्ति बताया। समारोह का संचालन गीतकार कवयित्री पूनम पाण्डे ने किया। डॉ. बृजेश माथुर ने आभार अभिव्यक्त किया। इस अवसर पर नगर के अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

प्रस्तुति‍ : उमेश कुमार चैरसिया

आंतरिक हलचलों के कहानीकार हैं दिनेश कर्नाटक : डॉ शुक्ला

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हल्द्वानी:19 फ़रवरी 2017 को सत्यनारायण धर्मशाला में शैक्षिक दखल समिति के तत्वाधान में युवा कहानीकार दिनेश कर्नाटक के तीसरे कहानी संग्रह ‘मैकाले का जिन्न तथा अन्य कहानियां’ का लोकार्पण हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार लक्ष्मण सिंह बिष्ट ‘बटरोही’ ने की तथा इसमें विशिष्ट अथिति डा. तारा चन्द्र त्रिपाठी तथा डा.प्रयाग जोशी रहे।

आधार वक्तव्य देते हुए उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर डा. शशांक शुक्ला ने कहा कि वर्तमान दौर में ग्लोबलाइजेशन के प्रभाव से साहित्य को बचाना बड़ी चुनौती है और दिनेश कर्नाटक के साहित्य में जो स्थानीयता है, वह सांस्कृतिक हमले को झेलती है। लेखक यदि अपने अनुभव क्षेत्र से बाहर चला जाये तो उसकी साहित्यिक यात्रा ज्यादा लम्बी नहीं चल सकती, पर दिनेश जी के साथ ऐसा नहीं है। उनके इस कहानी संग्रह में ही पांच कहानियाँ उनके अनुभव क्षेत्र, माध्यमिक शिक्षा के तंत्र और उसकी समस्याओं पर चर्चा करती हैं।

उन्होंने कहा कि‍ दिनेश कर्नाटक भीष्म साहनी की तरह ही कहानी की शुरुआत में कोई वातावरण नहीं बनाते, बस बिना कोई औपचारिकता के कहानी कहना शुरू कर देते हैं। कहानी के परिवेश के स्थानीय होने के कारण पाठक आसानी से कहानी से जुड़ भी जाता है। वह व्यवस्था पर चोट करने के स्थान पर अपनी कहानियों में सांस्कृतिक चर्चा करते हैं। दिनेश जी आंतरिक हलचलों के कहानीकार हैं।

डा. शुक्ला ने कहा कि‍ दिनेश कर्नाटक की कहानियां प्रश्नों से भरी हुई होती हैं और इनमे पहाड़ का दर्द शामिल होता है। कम से कम तीन जगह मुझे ऐसा लगा कि कि वह पात्रों की अंतर्द्वन्दता का कोई मनोवैज्ञानिक उपचार नहीं करते, यह काम वह पाठक पर छोड़ देतें हैं। इनकी कहानियाँ सच से आँख मिलाने की कहानियाँ हैं जो पुरानी मान्यताओं पर चोट करती हैं और इनकी कहानियों का स्वर प्रतिरोध है।

इसके बाद दिनेश कर्नाटक ने अपनी एक कहानी ‘अच्छे दिनों की वापसी’ का वाचन किया। इसमें एक शिक्षक के अवसाद में जाने और फिर उससे लड़कर वापस आने का बड़ा मार्मिक चित्रण है। इस कहानी के माध्यम से कहानीकार ने यह बात उभारने का सफल प्रयास किया कि कैसे हमारे समाज में अवसाद को कोई रोग नहीं समझा जाता और यह भी कि इससे ग्रस्त व्यक्ति के प्रति समाज की प्रतिक्रिया कैसी रहती है। इस कहानी के वाचन से पूर्व दिनेश कर्नाटक ने कहा कि साहित्य की सबसे बड़ी खूबी है कि यह आपको जीवन के हर कोने में ले जाता है।”

युवा कथाकार खेमकरण सोमन ने कहा कि मेरा दिनेश कर्नाटक से सर्वप्रथम परिचय तब हुआ, जब मैंने उनकी कहानी ‘झाडियाँ’ को कथाक्रम नामक पत्रिका में पढ़ा था, जो सुअर के इंसान बन जाने की कहानी है। उन्‍होंने कहा कि‍ दिनेश कर्नाटक की सबसे अच्छी बात यह है कि वह सहजता और सरलता से कहानी कहते हैं। उनकी कहानियों में सामजिक जीवन, पर्यावरण, संस्कृति का विकृत रूप तथा उसका सही रूप भी दिखता है। उन्‍होंने कहा कि‍ ‘एक मूँछ प्रेमी का कुबुलनामा’ में परंपरा और आधुनिकता का गज़ब का संयोग है। इनके साहित्य को देखकर यह बात सही सिद्ध होती है कि साहित्यकार समाज के बारे में जितना चिंता करता है, उतना ही लिखता है।

कुमायूनी के ख्याति प्राप्त कवि और लेखक जगदीश जोशी ने कहानी संग्रह पर चर्चा करते हुए कहा कि‍ ये कहानियां मानवीय मूल्यों की स्थापना करती हैं और मैकाले के ज़माने से लेकर आज तक जारी शिक्षा प्रणाली का ‘मुआइना तदंतो’ मतलब पोस्टमॉर्टम करती हैं। उन्‍होंने कहा कि‍ यथार्थ दो प्रकार का होता है- एक देखा हुआ और दूसरा भोगा हुआ। दिनेश कर्नाटक की कहानियों में भोगा हुआ यथार्थ है।

शम्भूदत्त पाण्डेय, शैलेय ने कहा कि‍ दिनेश कर्नाटक व्यक्ति मन के कथाकार हैं। दिनेश को सलाह है कि जब भी वे अपनी रचनाओं में सांस्कृतिक पक्ष को उठायें तो उनकी मूल स्थितियों तक अवश्य पहुंचना चाहिए।

युवा कथाकार अनिल कार्की ने कहा कि‍ ‘मैकाले का जिन्न’ कहानी को पढ़ते हुए मुझे तब कि याद आती है, जब मैं गाँव से कक्षा ग्यारह में प्रवेश लेने मिशन स्कूल पिथौरागढ़ गया, तो अंग्रेजी के मासाब ने मेरी कमीज़ के पैन्ट से बाहर निकली होने के कारण मुझे एक झापड़ लगाया जिस कारण मैं आज तक अंग्रेजी नहीं सीख पाया। इसके बाद संस्कृत की कक्षा में भी जाति और वर्ण के आधार पर भेदभाव किया जाता था। उन्‍होंने ‘पीताम्बर मास्साब’ की चर्चा करते हुए कहा कि‍ इस कहानी को पढ़ते हुए मुझे अपने प्राइमरी के मासाब पान सिंह याद आते हैं कि कैसे वो स्कूल शराब पी कर पहुँचते थे और हम सब बच्चे उनके आने तक धारे से पानी भर के लाते थे। उन्‍होंने कहा कि‍ मेरी समझ में कहानी की सफलता इसमें है कि मैं उसे पढ़ते हुए कितना कहानी के साथ खुद को जोड़ पाता हूँ। दिनेश कर्नाटक की कहानियां मेरी इस कसौटी पर पास होती हैं। इनकी कहानियां समाज द्वारा खड़े किये गए फ्रेमों से टकराती हैं और अभिव्यक्ति को बंद करने के इस दौर में भी टिकी रहती हैं।

प्रयाग जोशी ने कहा कि दिनेश की कहानियाँ बहुत रसीली तथा सहज होती हैं जिन्हें पढ़कर मैं तनावमुक्त महसूस करता हूँ।

लोकार्पण कार्यक्रम के अध्यक्ष लक्ष्मण सिंह बिष्ट ‘बटरोही’ ने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि मुझे बड़ी ख़ुशी हुई कि दिनेश के इस कहानी संग्रह के बहाने मुझे उत्तराखंड के साहित्य का पुनरावलोकन करने का अवसर मिला है। बटरोही ने कहा कि‍ लेखक के सामने एक चुनौती यह होती है कि वो अपने परिवेश को अपनी कथा भाषा में लाये, दिनेश इस कसौटी पर खरे उतरते हैं। इन्होंने एक नई कथा भाषा शैली को जन्म दिया है।

कार्यक्रम में प्रभात उप्रेती, कस्तूरी लाल, तारा चन्द्र त्रिपाठी ने भी कहानी संग्रह पर वि‍चार व्‍यक्‍त कि‍ए।

कार्यक्रम की शुरुआत ‘शैक्षिक दखल‘ समिति के कोषाध्यक्ष डा. दिनेश जोशी ने समिति के बारे में जानकारी देकर की। उन्‍होंने दिनेश कर्नाटक के इस कहानी संग्रह के संदर्भ में कहा कि‍ लेखक अपने लिए नहीं,  समाज के लिए लिखता है।

अंत में शैक्षिक दखल समिति की ओर से डा. विवेक ने लोकार्पण कार्यक्रम में उपस्थित सभी लोगों को धन्यवाद ज्ञापित किया।

कार्यक्रम के संचालक डा. महेश बवाड़ी ने दिनेश कर्नाटक के इतनी कम उम्र में तीसरे कहानी संग्रह का छपने को पूरे हल्द्वानी के लिए गौरव की बात बताया।

कार्यक्रम में शशांक पाण्डेय, गिरीश पाण्डेय, बसंत कर्नाटक, गणेश खाती, नवेन्दु मठपाल, सुरेन्द्र सूरी, राजेंद्र पाण्डेय, कन्नू जोशी, हेम त्रिपाठी, हिमांशु पाण्डेय सहित शहर के कई साहि‍त्‍यप्रेमी उपस्थित रहे।

प्रस्तुति‍ : गिरीश पांडे 

‘मैकाले का जिन्न तथा अन्य कहानियां’ का लोकार्पण 19 को

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हल्द्वानी : कथाकार दि‍नेश कर्नाटक की लेखक मंच प्रकाशन से प्रकाशि‍त कहानी संग्रह ‘मैकाले का जिन्न तथा अन्य कहानियां’ का लोकार्पण 19 फरवरी को हल्द्वानी में सत्यनारायण धर्मशाला के हॉल में अपराह्न 03 बजे से होगा। कार्यक्रम की अध्यक्षता लक्ष्मण सिंह बि‍ष्ट ‘बटरोही’ जी करेंगे। मुख्य अति‍थि‍ इति‍हासवि‍द शेखर पाठक और वि‍शि‍ष्ट अति‍थि‍ डॉ तारा चन्द्र त्रि‍पाठी व डॉ प्रयाग जोशी होंगे। बीज वक्ता डॉ शशांक शुक्ला होंगे। इनके अलावा कहानी संग्रह पर डॉ प्रभात उप्रेती, जगदीश जोशी, शैलेय, जगमोहन रौतेला, डॉ महेश बवाड़ी, भास्कर उप्रेती, भूपेन सिंह, अनि‍ल कार्की, खेमकरण सोमन और सुधीर कुमार वि‍चार व्यक्त करेंगे।

दिनेश कर्नाटक 21वीं सदी के पहले दशक में हिन्दी कहानी के क्षेत्र में सामने आई पीढ़ी के महत्वपूर्ण कहानीकार हैं। हिन्दी की लगभग सभी महत्वपूर्ण पत्रिकाओं के युवा पीढ़ी विशेषांकों में इनकी कहानियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं। दिनेश कर्नाटक की कहानियों का फलक काफी विविधतापूर्ण तथा विस्तृत है। ‘पहाड़ में सन्नाटा’ तथा ‘आते रहना’ के बाद यह इनका तीसरा कहानी संग्रह है। वह बिना किसी शोरशराबे के कहानियाँ लिखने में लगे हैं। उनकी कहानियों को पढ़ते हुए लगता है कि वह लोगों को चौंकाने या आश्चर्यचकित करने के लिए नहीं लिखते। जीवन उनकी कहानियों में अपने वास्तविक रंगों के साथ सामने आता है। जीवन की विडम्बनाओं तथा अन्तर्विरोधों पर उनकी तीखी नजर रहती है। कहानी उनके लिए बेहतर दुनिया के निर्माण का औजार है। वह चाहते हैं कि कहानी पढक़र मनुष्य और अधिक मानवीय तथा सम्वेदनशील हो!

अपनी रचना यात्रा में यहाँ पर पहुँचकर वह अपनी कथाभूमि पर पूरे आत्मविश्वास के साथ खड़े नजर आते हैं। संग्रह की हर कहानी पाठक को एक नये अनुभव क्षेत्र की यात्रा पर ले जाती है। ये कहानियाँ भाषा, कथ्य तथा शिल्प की दृष्टि से लेखक के विकास के एक और सोपान की खबर देती हैं।

गीता गैरोला का लेखन सामूहिकता का निजी प्रतिरोध

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दिल्ली : हमारी जड़ें कहाँ हैं? हमारे बच्चों की जड़ें कहाँ हैं? हम बिना जड़ों के कब तक जी पाएंगे? हमारी पहचान क्या है? कहीं हम समाज के उस वंचित समूह की तरह ही तो नहीं हो गए, जिन्हें औरत कहते हैं। जो बिना जड़ों के, बिना खाद-पानी के, किसी भी जलवायु में पनपने का भ्रम पैदा करती हैं। सुप्रसिद्ध स्त्रीवादी कार्यकर्ता और लेखिका गीता गैरोला ने हिन्दू कालेज में उक्त विचार व्यक्त किये। कालेज के महिला विकास प्रकोष्ठ द्वारा ‘रचना और रचनाकार’ विषय पर आयोजित गोष्ठी में गैरोला ने अपनी चर्चित संस्मरण पुस्तक ‘मल्यो की डार’ से दो प्रसंग भी श्रोताओं को सुनाए। चकोर पक्षी पर लिखे ‘प्यारे चक्खू’ को श्रोताओं से विशेष सराहना मिली तो एक अन्य प्रसंग में पहाड़ की स्त्रियों की आत्मीय छवियाँ भी मन को मोहने वाली थीं। आयोजन में युवा कवि और ‘दखल’ के संपादक अशोक कुमार पांडेय ने पुस्तक पर टिप्पणी करते हुए कहा कि साहित्य स्मृतियों को जीवित रखने में मदद करता है। उसके सहारे हम जान पाते हैं कि मनुष्यों ने किस तरह संघर्ष कर अपना विकास किया है। उन्होंने सांप्रदायिक कट्टरता और धर्मान्धता को खतरनाक बताते हुए कहा कि रिवर्स गियर में चलकर कोई समाज आगे नहीं बढ़ सकता। उत्तराखंड के जन संघर्षों और स्त्रीवादी आन्दोलनों में गीता गैरोला की भूमिका को रेखांकित करते पांडेय ने कहा कि उनका लेखन रोशनी देने वाला है।

हिन्दी विभाग के अध्यापक डॉ पल्लव ने ‘मल्यो की डार’ पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि  हम सबके जीवन में ऐसे अनेक लोग आते हैं जो मामूली और साधारण हैं, लेकिन इनका लेखा करना हम सब के लिए सम्भव नहीं हो पाता। गीता गैरोला ऐसा करती हैं तो न केवल पहाड़ (और भारत भी) की सामासिक संस्कृति का निजी आख्यान रच देती हैं, अपितु जबड़े फैलाते उपभोक्तावाद के सामने सामूहिकता का निजी प्रतिरोध भी खड़ा करती हैं। साहित्य ऐसे ही तो अपने पाठकों को संस्कारवान बनाता है। उन्‍होंने कहा कि  स्त्री मुक्ति की छटपटाहट इन संस्मरणों में भी है और पितृसत्ता की जकड़न की प्रतीति भी।  फिर भी जो नहीं है, वह है स्त्री मुक्ति की वे तस्वीरें जो हिन्दी की स्त्री विमर्शवादी लेखिकाओं द्वारा बहुधा प्रयुक्त की गई हैं। यौन स्वतंत्रता और देह कामना भी जीवन से जुड़ी सचाइयां हैं लेकिन इन सचाइयों से गीता जी आक्रान्त नहीं हैं। आयोजन में बी ए प्रतिष्ठा संस्कृत के विद्यार्थी सत्यार्थ ग्रोवर ने पुस्तक पर समीक्षा प्रस्तुत की। इस आयोजन के दूसरे भाग में महिला विकास प्रकोष्ठ द्वारा प्रकाशित पत्रिका ‘सुबह’ के प्रवेशांक का लोकार्पण अतिथियों ने किया।

प्रकोष्ठ की परामर्शदाता डॉ रचना सिंह ने पत्रिका के बारे में जानकारी दी तथा बताया कि स्त्री विषय पर केंद्रित प्रवेशांक में मूर्धन्य कला चिंतक कपिला वात्स्यायन से साक्षात्कार तथा कवयित्री अनामिका की कवितायेँ विशेष सामग्री के रूप में प्रकाशित की गई हैं। समारोह का संयोजन प्रकोष्ठ की आकांक्षा ने किया तथा अध्यक्षा सिमरन ने गैरोला को शाल ओढाकर अभिनन्दन किया।

फोटो एवं रिपोर्ट – मोनिका शर्मा

बच्चों को पसंद आया कि‍ताबों का साथ

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ग़ाज़ियाबाद : इंदिरापुरम के रिहायशी इलाके ज्ञानखंड- 3 में 26 जनवरी को बच्चों के लिए घुमंतू पुस्तक मेले का आयोजन किया गया। इसमें एकलव्य, एनबीटी, सीबीटी, विज्ञान-प्रसार आदि विभिन्न प्रकाशनों की किताबों के लगभग दो सौ से ज्यादा ‘टाइटल’ प्रदर्शित किये गये।

घुमंतू पुस्तक मेले की संयोजक कोमल मनोहरे ने बताया, ‘इस तरह के आयोजन हम लगभग डेढ़ सालों से अलग-अलग स्कूलों, बस्तियों, ‘हाउसिंग सोसाइटी’ में कर रहे हैं। इस अभियान का मकसद किताबों से दूर हो रहे बच्चों को किताबों से दोस्ती कराना है और अच्छी किताबों को उन तक पहुँचाना है। जो भी हमारे इस अभियान को जानते हैं, वे हमें अपनी सोसाइटी या स्कूल में बुलाते हैं’।

बकौल कोमल अब यहाँ ही देख लीजिये रश्मि जी ने हमारे अभियान के बारे में सुना और हमें यहाँ बच्चों के बीच यह आयोजन करने का मौका मिला। इस कार्यक्रम की आयोजक रश्मि भरद्वाज पेशे से शिक्षिका हैं। वह कहती हैं, ‘किताबें बच्चों के परवरिश में सबसे ज्यादा सहायक हैं और इस टेलीवाइज्ड युग में किताबें कहाँ पढ़ी जाती हैं। हम तो इन बच्चों को किताबों की आदत डाल रहे है और बहुत हद तक सफल भी हुए हैं।’

इस कार्यक्रम में बच्चों को कहानी सुनायी गई। बच्‍चों ने अपने मन के विषयों के चित्र बनाये। उनके बनाए चि‍त्रों को कार्यस्‍थल पर प्रदर्शित कि‍या गया। उन्हें एक लघु फ़िल्म ‘कंचे और पोस्टकार्ड’ भी दिखाई गई, जिसे रिदम जानवे ने निर्देशित किया है।

बारिश और कड़ी ठंड के बावज़ूद मेले में ज्ञान खंड-3 व आसपड़ोस के लोगों का आना-जाना लगा रहा।

बच्चों ने उत्सुकता और दिलचस्पी से इस आयोजन में भाग लिया जिसके संयोजन में माही और स्नेहा की महत्वपूर्ण भागीदारी रही।