Category: परिक्रमा

आनंद कुरेशी के कहानी संग्रह ‘औरतखोर’ का लोकार्पण

डूंगरपुर: बहुत सा श्रेष्ठ साहित्य भी विभिन्न कारणों से पाठकों तक पहुँच नहीं पाता। आनंद कुरेशी जैसे कथाकार को भी व्यापक हिन्दी पाठक वर्ग तक पहुंचाने के लिए हम सबको प्रयास करने होंगे। हिन्दी के प्रसिद्ध लेखक असग़र वजाहत ने डूंगरपुर के दिवंगत लेखक आनंद कुरेशी के ताजा प्रकाशित कहानी संग्रह ‘औरतखोर’ के लोकार्पण समारोह में कहा कि डूंगरपुर आकर उन्हें साहित्य की ऐसी गोष्ठियों की अर्थवत्ता का फिर से गहरा अहसास हुआ है। श्रोताओं के सवालों का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि साहित्य के भी अनेक स्तर होते हैं। आवश्यक नहीं कि लोकप्रिय समझे जाने वाले साहित्य का पाठक आगे जाकर गंभीर साहित्य का पाठक नहीं हो सकता। उन्होंने एक अन्य सवाल का जवाब देते हुए कहा कि श्रेष्ठ साहित्य मुद्दों की पहचान से ही नहीं बनता। इसके लिए अनेक कारक जिम्मेदार होते हैं। जिला पुस्तकालय के सभागार में हुए इस समारोह में राजस्थान विश्वविद्यालय की सहायक आचार्य  डॉ रेणु व्यास ने आनंद कुरेशी जी के संस्मरण सुनाए तथा पूना विश्वविद्यालय की डॉ शशिकला राय के कुरेशी की कहानी कला पर लिखे आलेख का वाचन किया। कुरेशी के अभिन्न मित्र और शायर इस्माइल निसार ने भावुक होकर कहा कि कुरेशी जी के साथ व्यतीत आत्मीय पलों को शब्दों में बयान कर पाना उनके लिए संभव नहीं है। वागड़ विभा के सचिव सत्यदेव पांचाल ने कहा कि आनंद कुरेशी जी आज भी अपनी कहानियों के माध्यम से जीवित हैं, जो बताता है कि साहित्यकार कभी नहीं मरता। पांचाल ने कहा कि कुरेशी जैसे लेखक हमारे लिए सदैव प्रेरणा स्रोत रहेंगे। चित्तौडगढ़ से आए कुरेशी जी के मित्र और ‘औरतखोर’ के सम्पादक डॉ. सत्यनारायण व्यास ने कहा कि अपने अभिन्न मित्र के बारे में बात करना जैसे अपने ही बारे में बात करना है। उन्होंने कुरेशी को याद करते हुए कहा कि उनका स्वाभिमान राजहंस की तरह गर्दन उठाए रहता है। स्थानीय महावि‍द्यालय में हिन्दी प्राध्यापक डॉ. हिमांशु पंडया ने सत्तर के दशक के एक हिन्दी कहानीकार की व्यापक जागरूकता को रेखांकित करते हुए कहा कि ऐसी दोस्तियाँ और साहित्यिक अड्डेबाजी बची रहनी चाहिए ताकि आनंद कुरेशी जैसे कई लेखक इस शहर को पहचान दिलाएं।

इससे पहले प्रो. असग़र वजाहत, उदयपुर विश्वविद्यालय के पूर्व आचार्य नवल किशोर, कवि-समालोचक डॉ. सत्यनारायण व्यास, वागड़ विभा के सचिव और स्थानीय कवि सत्यदेव पांचाल तथा दिल्ली से प्रकाशित साहित्यिक पत्रिका ‘बनास जन’ के सम्पादक डॉ. पल्लव ने आनंद कुरेशी के ताजा प्रकाशित कहानी संग्रह ‘औरतखोर’ का  लोकार्पण किया। डॉ. पल्लव ने मंच पर मौजूद सभी साहित्यकारों का सारगर्भित परिचय देते हुए कहा कि आनंद कुरेशी जैसे लेखक एक शहर, अंचल या राज्य की नहीं अपितु समूचे साहित्य की धरोहर होते हैं। कुरेशी जी के सुपुत्रों  हरदिल अजीज और इसरार ने आयोजन में अपने परिवार की तरफ से आभार दर्शाया।

अध्यक्षता कर रहे प्रो. नवल किशोर ने कहा कि हार एक सापेक्ष शब्द है। आनंद कुरेशी जिन्दगी की लड़ाई हार गए, पर लेखकीय जीवन में नहीं। आनंद कुरेशी को उन्होंने अभावग्रस्त समाज के लिए संघर्ष करने वाला लेखक बताते हुए कहा कि उनके जैसे लेखकों को आगे लाना चाहिए, जो अन्याय व अत्याचार का विरोध करने का साहस दर्शाते हैं। उन्होंने कहा कि आज संचार माध्यमों में शुद्ध मनोरंजन परोसा जा रहा है, जो मनुष्य को सोचने को विवश नहीं करता। प्रो. नवल किशोर ने कुरेशी की कुछ चर्चित कहानियों का भी उल्लेख किया। संयोजन प्रसिद्ध कहानीकार दिनेश पांचाल ने किया और अंत में कवि जनार्दन जलज ने धन्यवाद ज्ञापन किया। आयोजन में राजकुमार कंसारा, चंद्रकांत वसीटा, मधुलिका, हर्षिल पाटीदार, हीरालाल यादव, डॉ कपिल व्यास, प्रज्ञा जोशी, चन्द्रकान्ता व्यास तथा हेमंत सहित शहर अनेक साहित्य प्रेमी उपस्थित थे।

प्रस्तुति‍ : डॉ कपिल व्यास

मनुष्यता के पक्ष में है वजाहत का लेखन : प्रो बेनिवाल

अपने लेखन से जुड़े विविध प्रसंग सुनाते असग़र वजाहत।

नई दिल्ली : लेखक का सम्मान करना अकादमिकी का प्राथमिक कर्तव्य है। बड़े लेखक भाषाओं के दायरे में नहीं देखे जाते। असग़र वजाहत का लेखन उन्हें भारत के संदर्भ में सचमुच बड़ा लेखक बनाता है।  गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ वि‍श्‍वविद्यालय द्वारा आयोजित ‘बनास जन’ के लोकार्पण समारोह में मीडिया संकाय के अधिष्ठाता प्रोफेसर अनूप बेनिवाल ने कहा कि बहुत कम लेखक होते हैं जिन्हें पढ़कर सचमुच जीवन भर प्रेरणा मिलती हो। असग़र वजाहत ऐसे बड़े लेखक हैं जिन्होंने भारत विभाजन पर ‘जिस लाहौर नइ देख्या ओ जम्याइ नइ’ को मार्मिक कृति लिखकर मनुष्यता के पक्ष में एक महान कृति की रचना की है। आयोजन में मानविकी संकाय के अधिष्ठाता प्रोफेसर आशुतोष मोहन ने असग़र वजाहत के साथ अपने रंगमंच के अनुभव सुनाए और कहा कि उनके साथ रहकर ही जाना जा सकता है कि बड़ा लेखक जीवन में कितना सहज और सरल होता है। प्रोफेसर मोहन ने असग़र वजाहत के आख्यान ‘बाक़र गंज के सैयद’ को इधर लिखी गई सबसे महत्त्वपूर्ण कृति बताया। विश्वविद्यालय में रंगमंच के सलाहाकार अनूप त्रिवेदी ने ‘जिस लाहौर नइ देख्या ओ जम्याइ नइ’ के मंचन में प्रयुक्‍त दो गीत सुनाए तथा हबीब तनवीर के प्रसिद्ध तराने ‘अब रहिये बैठ इस जंगल में’ की प्रस्तुति से सबको मंत्रमुग्ध कर दिया।

‘बनास जन’ के सम्पादक पल्लव ने असग़र वजाहत पर विशेषांक निकालने के कारण रखते हुए कहा कि वे हमारी भाषा ही नहीं, हमारी संस्कृति के भी बड़े लेखक हैं, जिन्होंने चार विधाओं में प्रथम श्रेणी की रचनाएं लिखी हैं। उन्होंने कहा कि एक सच्‍चा लेखक असल में अपने समय और समाज से अभिन्न होता है और यह अभिन्नता उसे बेचैन बनाती है। असग़र वजाहत की बेचैनी हमारे भारतीय समाज की बेचैन आवाज़ ही तो है। अंगरेजी विभाग के प्रोफेसर विवेक सचदेव ने असग़र वजाहत के लेखन के महत्त्व पर कहा कि उनका लेखन पढ़ना भारत को सही अर्थों में जानना है।

इससे पहले उदयपुर से आए प्रोफेसर प्रदीप त्रिखा, रोहतक से आए प्रोफेसर जयवीर हुड्डा, प्रोफेसर अनूप बेनिवाल, शिक्षा अधिष्ठाता प्रोफेसर संगीता चौहान, अरबिंदो कालेज के प्रो राजकुमार वर्मा सहित अतिथियों ने अंक का विधिवत लोकार्पण किया। लेखकीय वक्तव्य देते हुए असग़र वजाहत ने अपने लेखन से जुड़े विविध प्रसंग सुनाए। अंगरेजी विभाग के डॉ समी अहमद खान ने असग़र वजाहत पर इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों द्वारा बनाया गया एक स्लाइड शो दिखाया। आयोजन में डॉ नरेश वत्स, डॉ राजीव रंजन, डॉ शुभांकु कोचर सहित बड़ी संख्या में विद्यार्थी, शोधार्थी तथा अध्यापक उपस्थित थे।

फोटो एवं रिपोर्ट – रोहित कुमार

अच्छी कविता समय की जटिलता को समेटती है : वि‍ष्णु नागर

काव्य-संग्रह ‘वह लड़की जो मोटरसाइकिल चलाती है‘ का लोकार्पण करते पल्ल्व, प्रेमचंद गांधी, वि‍ष्णु नागर और अनन्त भटनागर।

काव्य-संग्रह ‘वह लड़की जो मोटरसाइकिल चलाती है‘ का लोकार्पण करते पल्ल्व, प्रेमचंद गांधी, वि‍ष्णु नागर और अनन्त भटनागर।

अजमेर : ‘‘हमारी दुनिया में इतने रंग और जटिलताएं हैं कि उन्हें समेटना हो तो कविता करने से सरल कोई तरीका नहीं हो सकता। यह आवश्यक नहीं कि जो आसानी से समझ आ जाए, वह अच्छी और जो समझना जटिल हो, वह खराब कविता है या इसके विपरीत भी। जो कविता समय की जटिलता को समेटती है, वो अच्‍छी कविता है। सामाजिक परिवर्तनों को रेखांकित करना ही कविकर्म है।’’ ये विचार सुविख्यात कवि व व्यंग्यकार विष्णु नागर ने कवि व शिक्षाविद् डॉ. अनन्त भटनागर के नये काव्य-संग्रह ‘वह लड़की जो मोटरसाइकिल चलाती है’ के लोकार्पण समारोह में बतौर मुख्य अतिथि व्यक्त किये। रविवार 7 मई, 2017 को सूचना केन्द्र में आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि संग्रह की कविताएं सामाजिक चेतना से संबद्ध हैं और समझने में भी सरल हैं। सरल अभिव्यक्ति कौशल अत्यन्त कठिन कार्य है।

समारोह में विशिष्ट अतिथि युवा आलोचक डॉ. पल्लव ने कविता के सामाजिक सरोकारों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि अनन्त भटनागर की काव्यचेतना पर जन आन्दोलनों का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुए प्रतिष्ठित कवि-स्तंभकार प्रेमचन्द गांधी ने कहा कि इस संग्रह की कविताएं नये तेवर और प्रभावी शब्दावली को लिये हुए हैं।

चित्तौड़गढ़ से आये डॉ. राजेश चौधरी और वरिष्ठ काव्य आलोचक डॉ. बीना शर्मा ने पुस्तक पर विस्तृत आलेख पढ़ते हुए कहा कि वर्तमान की स्थितियों पर केन्द्रित होना इस संग्रह की विशेषता है। मोबाइल फोन, बाजार, नया साल और सेज में नयी सभ्यता के उपादानों को समझने की कोशिश की गई है। संग्रह का दूसरे खण्ड उम्र का चालीसवाँ में नितांत निजी अनुभूतियों के साथ रिश्तों में आते बदलाव को अभिव्यक्त करती कविताएं हैं। शीर्षक कविता कथ्य में अनूठी और सच्चे स्त्री विमर्श की कविता है। डॉ. रजनीश चारण, कालिंदनंदिनी शर्मा और दिव्या सिंहल ने अतिथियों का परिचय दिया। नगर निगम उपायुक्त ज्योति ककवानी, शचि सिंह और वर्षा शर्मा ने संग्रह की चुनिंदा कविताओं का पाठ किया।

स्वागत उद्बोधन में नाटककार उमेश कुमार चैरसिया ने कृति को मानवीय संवेदनाओं की अभिव्यक्ति बताया। समारोह का संचालन गीतकार कवयित्री पूनम पाण्डे ने किया। डॉ. बृजेश माथुर ने आभार अभिव्यक्त किया। इस अवसर पर नगर के अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

प्रस्तुति‍ : उमेश कुमार चैरसिया

आंतरिक हलचलों के कहानीकार हैं दिनेश कर्नाटक : डॉ शुक्ला

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हल्द्वानी:19 फ़रवरी 2017 को सत्यनारायण धर्मशाला में शैक्षिक दखल समिति के तत्वाधान में युवा कहानीकार दिनेश कर्नाटक के तीसरे कहानी संग्रह ‘मैकाले का जिन्न तथा अन्य कहानियां’ का लोकार्पण हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार लक्ष्मण सिंह बिष्ट ‘बटरोही’ ने की तथा इसमें विशिष्ट अथिति डा. तारा चन्द्र त्रिपाठी तथा डा.प्रयाग जोशी रहे।

आधार वक्तव्य देते हुए उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर डा. शशांक शुक्ला ने कहा कि वर्तमान दौर में ग्लोबलाइजेशन के प्रभाव से साहित्य को बचाना बड़ी चुनौती है और दिनेश कर्नाटक के साहित्य में जो स्थानीयता है, वह सांस्कृतिक हमले को झेलती है। लेखक यदि अपने अनुभव क्षेत्र से बाहर चला जाये तो उसकी साहित्यिक यात्रा ज्यादा लम्बी नहीं चल सकती, पर दिनेश जी के साथ ऐसा नहीं है। उनके इस कहानी संग्रह में ही पांच कहानियाँ उनके अनुभव क्षेत्र, माध्यमिक शिक्षा के तंत्र और उसकी समस्याओं पर चर्चा करती हैं।

उन्होंने कहा कि‍ दिनेश कर्नाटक भीष्म साहनी की तरह ही कहानी की शुरुआत में कोई वातावरण नहीं बनाते, बस बिना कोई औपचारिकता के कहानी कहना शुरू कर देते हैं। कहानी के परिवेश के स्थानीय होने के कारण पाठक आसानी से कहानी से जुड़ भी जाता है। वह व्यवस्था पर चोट करने के स्थान पर अपनी कहानियों में सांस्कृतिक चर्चा करते हैं। दिनेश जी आंतरिक हलचलों के कहानीकार हैं।

डा. शुक्ला ने कहा कि‍ दिनेश कर्नाटक की कहानियां प्रश्नों से भरी हुई होती हैं और इनमे पहाड़ का दर्द शामिल होता है। कम से कम तीन जगह मुझे ऐसा लगा कि कि वह पात्रों की अंतर्द्वन्दता का कोई मनोवैज्ञानिक उपचार नहीं करते, यह काम वह पाठक पर छोड़ देतें हैं। इनकी कहानियाँ सच से आँख मिलाने की कहानियाँ हैं जो पुरानी मान्यताओं पर चोट करती हैं और इनकी कहानियों का स्वर प्रतिरोध है।

इसके बाद दिनेश कर्नाटक ने अपनी एक कहानी ‘अच्छे दिनों की वापसी’ का वाचन किया। इसमें एक शिक्षक के अवसाद में जाने और फिर उससे लड़कर वापस आने का बड़ा मार्मिक चित्रण है। इस कहानी के माध्यम से कहानीकार ने यह बात उभारने का सफल प्रयास किया कि कैसे हमारे समाज में अवसाद को कोई रोग नहीं समझा जाता और यह भी कि इससे ग्रस्त व्यक्ति के प्रति समाज की प्रतिक्रिया कैसी रहती है। इस कहानी के वाचन से पूर्व दिनेश कर्नाटक ने कहा कि साहित्य की सबसे बड़ी खूबी है कि यह आपको जीवन के हर कोने में ले जाता है।”

युवा कथाकार खेमकरण सोमन ने कहा कि मेरा दिनेश कर्नाटक से सर्वप्रथम परिचय तब हुआ, जब मैंने उनकी कहानी ‘झाडियाँ’ को कथाक्रम नामक पत्रिका में पढ़ा था, जो सुअर के इंसान बन जाने की कहानी है। उन्‍होंने कहा कि‍ दिनेश कर्नाटक की सबसे अच्छी बात यह है कि वह सहजता और सरलता से कहानी कहते हैं। उनकी कहानियों में सामजिक जीवन, पर्यावरण, संस्कृति का विकृत रूप तथा उसका सही रूप भी दिखता है। उन्‍होंने कहा कि‍ ‘एक मूँछ प्रेमी का कुबुलनामा’ में परंपरा और आधुनिकता का गज़ब का संयोग है। इनके साहित्य को देखकर यह बात सही सिद्ध होती है कि साहित्यकार समाज के बारे में जितना चिंता करता है, उतना ही लिखता है।

कुमायूनी के ख्याति प्राप्त कवि और लेखक जगदीश जोशी ने कहानी संग्रह पर चर्चा करते हुए कहा कि‍ ये कहानियां मानवीय मूल्यों की स्थापना करती हैं और मैकाले के ज़माने से लेकर आज तक जारी शिक्षा प्रणाली का ‘मुआइना तदंतो’ मतलब पोस्टमॉर्टम करती हैं। उन्‍होंने कहा कि‍ यथार्थ दो प्रकार का होता है- एक देखा हुआ और दूसरा भोगा हुआ। दिनेश कर्नाटक की कहानियों में भोगा हुआ यथार्थ है।

शम्भूदत्त पाण्डेय, शैलेय ने कहा कि‍ दिनेश कर्नाटक व्यक्ति मन के कथाकार हैं। दिनेश को सलाह है कि जब भी वे अपनी रचनाओं में सांस्कृतिक पक्ष को उठायें तो उनकी मूल स्थितियों तक अवश्य पहुंचना चाहिए।

युवा कथाकार अनिल कार्की ने कहा कि‍ ‘मैकाले का जिन्न’ कहानी को पढ़ते हुए मुझे तब कि याद आती है, जब मैं गाँव से कक्षा ग्यारह में प्रवेश लेने मिशन स्कूल पिथौरागढ़ गया, तो अंग्रेजी के मासाब ने मेरी कमीज़ के पैन्ट से बाहर निकली होने के कारण मुझे एक झापड़ लगाया जिस कारण मैं आज तक अंग्रेजी नहीं सीख पाया। इसके बाद संस्कृत की कक्षा में भी जाति और वर्ण के आधार पर भेदभाव किया जाता था। उन्‍होंने ‘पीताम्बर मास्साब’ की चर्चा करते हुए कहा कि‍ इस कहानी को पढ़ते हुए मुझे अपने प्राइमरी के मासाब पान सिंह याद आते हैं कि कैसे वो स्कूल शराब पी कर पहुँचते थे और हम सब बच्चे उनके आने तक धारे से पानी भर के लाते थे। उन्‍होंने कहा कि‍ मेरी समझ में कहानी की सफलता इसमें है कि मैं उसे पढ़ते हुए कितना कहानी के साथ खुद को जोड़ पाता हूँ। दिनेश कर्नाटक की कहानियां मेरी इस कसौटी पर पास होती हैं। इनकी कहानियां समाज द्वारा खड़े किये गए फ्रेमों से टकराती हैं और अभिव्यक्ति को बंद करने के इस दौर में भी टिकी रहती हैं।

प्रयाग जोशी ने कहा कि दिनेश की कहानियाँ बहुत रसीली तथा सहज होती हैं जिन्हें पढ़कर मैं तनावमुक्त महसूस करता हूँ।

लोकार्पण कार्यक्रम के अध्यक्ष लक्ष्मण सिंह बिष्ट ‘बटरोही’ ने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि मुझे बड़ी ख़ुशी हुई कि दिनेश के इस कहानी संग्रह के बहाने मुझे उत्तराखंड के साहित्य का पुनरावलोकन करने का अवसर मिला है। बटरोही ने कहा कि‍ लेखक के सामने एक चुनौती यह होती है कि वो अपने परिवेश को अपनी कथा भाषा में लाये, दिनेश इस कसौटी पर खरे उतरते हैं। इन्होंने एक नई कथा भाषा शैली को जन्म दिया है।

कार्यक्रम में प्रभात उप्रेती, कस्तूरी लाल, तारा चन्द्र त्रिपाठी ने भी कहानी संग्रह पर वि‍चार व्‍यक्‍त कि‍ए।

कार्यक्रम की शुरुआत ‘शैक्षिक दखल‘ समिति के कोषाध्यक्ष डा. दिनेश जोशी ने समिति के बारे में जानकारी देकर की। उन्‍होंने दिनेश कर्नाटक के इस कहानी संग्रह के संदर्भ में कहा कि‍ लेखक अपने लिए नहीं,  समाज के लिए लिखता है।

अंत में शैक्षिक दखल समिति की ओर से डा. विवेक ने लोकार्पण कार्यक्रम में उपस्थित सभी लोगों को धन्यवाद ज्ञापित किया।

कार्यक्रम के संचालक डा. महेश बवाड़ी ने दिनेश कर्नाटक के इतनी कम उम्र में तीसरे कहानी संग्रह का छपने को पूरे हल्द्वानी के लिए गौरव की बात बताया।

कार्यक्रम में शशांक पाण्डेय, गिरीश पाण्डेय, बसंत कर्नाटक, गणेश खाती, नवेन्दु मठपाल, सुरेन्द्र सूरी, राजेंद्र पाण्डेय, कन्नू जोशी, हेम त्रिपाठी, हिमांशु पाण्डेय सहित शहर के कई साहि‍त्‍यप्रेमी उपस्थित रहे।

प्रस्तुति‍ : गिरीश पांडे 

‘मैकाले का जिन्न तथा अन्य कहानियां’ का लोकार्पण 19 को

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हल्द्वानी : कथाकार दि‍नेश कर्नाटक की लेखक मंच प्रकाशन से प्रकाशि‍त कहानी संग्रह ‘मैकाले का जिन्न तथा अन्य कहानियां’ का लोकार्पण 19 फरवरी को हल्द्वानी में सत्यनारायण धर्मशाला के हॉल में अपराह्न 03 बजे से होगा। कार्यक्रम की अध्यक्षता लक्ष्मण सिंह बि‍ष्ट ‘बटरोही’ जी करेंगे। मुख्य अति‍थि‍ इति‍हासवि‍द शेखर पाठक और वि‍शि‍ष्ट अति‍थि‍ डॉ तारा चन्द्र त्रि‍पाठी व डॉ प्रयाग जोशी होंगे। बीज वक्ता डॉ शशांक शुक्ला होंगे। इनके अलावा कहानी संग्रह पर डॉ प्रभात उप्रेती, जगदीश जोशी, शैलेय, जगमोहन रौतेला, डॉ महेश बवाड़ी, भास्कर उप्रेती, भूपेन सिंह, अनि‍ल कार्की, खेमकरण सोमन और सुधीर कुमार वि‍चार व्यक्त करेंगे।

दिनेश कर्नाटक 21वीं सदी के पहले दशक में हिन्दी कहानी के क्षेत्र में सामने आई पीढ़ी के महत्वपूर्ण कहानीकार हैं। हिन्दी की लगभग सभी महत्वपूर्ण पत्रिकाओं के युवा पीढ़ी विशेषांकों में इनकी कहानियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं। दिनेश कर्नाटक की कहानियों का फलक काफी विविधतापूर्ण तथा विस्तृत है। ‘पहाड़ में सन्नाटा’ तथा ‘आते रहना’ के बाद यह इनका तीसरा कहानी संग्रह है। वह बिना किसी शोरशराबे के कहानियाँ लिखने में लगे हैं। उनकी कहानियों को पढ़ते हुए लगता है कि वह लोगों को चौंकाने या आश्चर्यचकित करने के लिए नहीं लिखते। जीवन उनकी कहानियों में अपने वास्तविक रंगों के साथ सामने आता है। जीवन की विडम्बनाओं तथा अन्तर्विरोधों पर उनकी तीखी नजर रहती है। कहानी उनके लिए बेहतर दुनिया के निर्माण का औजार है। वह चाहते हैं कि कहानी पढक़र मनुष्य और अधिक मानवीय तथा सम्वेदनशील हो!

अपनी रचना यात्रा में यहाँ पर पहुँचकर वह अपनी कथाभूमि पर पूरे आत्मविश्वास के साथ खड़े नजर आते हैं। संग्रह की हर कहानी पाठक को एक नये अनुभव क्षेत्र की यात्रा पर ले जाती है। ये कहानियाँ भाषा, कथ्य तथा शिल्प की दृष्टि से लेखक के विकास के एक और सोपान की खबर देती हैं।

गीता गैरोला का लेखन सामूहिकता का निजी प्रतिरोध

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दिल्ली : हमारी जड़ें कहाँ हैं? हमारे बच्चों की जड़ें कहाँ हैं? हम बिना जड़ों के कब तक जी पाएंगे? हमारी पहचान क्या है? कहीं हम समाज के उस वंचित समूह की तरह ही तो नहीं हो गए, जिन्हें औरत कहते हैं। जो बिना जड़ों के, बिना खाद-पानी के, किसी भी जलवायु में पनपने का भ्रम पैदा करती हैं। सुप्रसिद्ध स्त्रीवादी कार्यकर्ता और लेखिका गीता गैरोला ने हिन्दू कालेज में उक्त विचार व्यक्त किये। कालेज के महिला विकास प्रकोष्ठ द्वारा ‘रचना और रचनाकार’ विषय पर आयोजित गोष्ठी में गैरोला ने अपनी चर्चित संस्मरण पुस्तक ‘मल्यो की डार’ से दो प्रसंग भी श्रोताओं को सुनाए। चकोर पक्षी पर लिखे ‘प्यारे चक्खू’ को श्रोताओं से विशेष सराहना मिली तो एक अन्य प्रसंग में पहाड़ की स्त्रियों की आत्मीय छवियाँ भी मन को मोहने वाली थीं। आयोजन में युवा कवि और ‘दखल’ के संपादक अशोक कुमार पांडेय ने पुस्तक पर टिप्पणी करते हुए कहा कि साहित्य स्मृतियों को जीवित रखने में मदद करता है। उसके सहारे हम जान पाते हैं कि मनुष्यों ने किस तरह संघर्ष कर अपना विकास किया है। उन्होंने सांप्रदायिक कट्टरता और धर्मान्धता को खतरनाक बताते हुए कहा कि रिवर्स गियर में चलकर कोई समाज आगे नहीं बढ़ सकता। उत्तराखंड के जन संघर्षों और स्त्रीवादी आन्दोलनों में गीता गैरोला की भूमिका को रेखांकित करते पांडेय ने कहा कि उनका लेखन रोशनी देने वाला है।

हिन्दी विभाग के अध्यापक डॉ पल्लव ने ‘मल्यो की डार’ पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि  हम सबके जीवन में ऐसे अनेक लोग आते हैं जो मामूली और साधारण हैं, लेकिन इनका लेखा करना हम सब के लिए सम्भव नहीं हो पाता। गीता गैरोला ऐसा करती हैं तो न केवल पहाड़ (और भारत भी) की सामासिक संस्कृति का निजी आख्यान रच देती हैं, अपितु जबड़े फैलाते उपभोक्तावाद के सामने सामूहिकता का निजी प्रतिरोध भी खड़ा करती हैं। साहित्य ऐसे ही तो अपने पाठकों को संस्कारवान बनाता है। उन्‍होंने कहा कि  स्त्री मुक्ति की छटपटाहट इन संस्मरणों में भी है और पितृसत्ता की जकड़न की प्रतीति भी।  फिर भी जो नहीं है, वह है स्त्री मुक्ति की वे तस्वीरें जो हिन्दी की स्त्री विमर्शवादी लेखिकाओं द्वारा बहुधा प्रयुक्त की गई हैं। यौन स्वतंत्रता और देह कामना भी जीवन से जुड़ी सचाइयां हैं लेकिन इन सचाइयों से गीता जी आक्रान्त नहीं हैं। आयोजन में बी ए प्रतिष्ठा संस्कृत के विद्यार्थी सत्यार्थ ग्रोवर ने पुस्तक पर समीक्षा प्रस्तुत की। इस आयोजन के दूसरे भाग में महिला विकास प्रकोष्ठ द्वारा प्रकाशित पत्रिका ‘सुबह’ के प्रवेशांक का लोकार्पण अतिथियों ने किया।

प्रकोष्ठ की परामर्शदाता डॉ रचना सिंह ने पत्रिका के बारे में जानकारी दी तथा बताया कि स्त्री विषय पर केंद्रित प्रवेशांक में मूर्धन्य कला चिंतक कपिला वात्स्यायन से साक्षात्कार तथा कवयित्री अनामिका की कवितायेँ विशेष सामग्री के रूप में प्रकाशित की गई हैं। समारोह का संयोजन प्रकोष्ठ की आकांक्षा ने किया तथा अध्यक्षा सिमरन ने गैरोला को शाल ओढाकर अभिनन्दन किया।

फोटो एवं रिपोर्ट – मोनिका शर्मा

बच्चों को पसंद आया कि‍ताबों का साथ

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ग़ाज़ियाबाद : इंदिरापुरम के रिहायशी इलाके ज्ञानखंड- 3 में 26 जनवरी को बच्चों के लिए घुमंतू पुस्तक मेले का आयोजन किया गया। इसमें एकलव्य, एनबीटी, सीबीटी, विज्ञान-प्रसार आदि विभिन्न प्रकाशनों की किताबों के लगभग दो सौ से ज्यादा ‘टाइटल’ प्रदर्शित किये गये।

घुमंतू पुस्तक मेले की संयोजक कोमल मनोहरे ने बताया, ‘इस तरह के आयोजन हम लगभग डेढ़ सालों से अलग-अलग स्कूलों, बस्तियों, ‘हाउसिंग सोसाइटी’ में कर रहे हैं। इस अभियान का मकसद किताबों से दूर हो रहे बच्चों को किताबों से दोस्ती कराना है और अच्छी किताबों को उन तक पहुँचाना है। जो भी हमारे इस अभियान को जानते हैं, वे हमें अपनी सोसाइटी या स्कूल में बुलाते हैं’।

बकौल कोमल अब यहाँ ही देख लीजिये रश्मि जी ने हमारे अभियान के बारे में सुना और हमें यहाँ बच्चों के बीच यह आयोजन करने का मौका मिला। इस कार्यक्रम की आयोजक रश्मि भरद्वाज पेशे से शिक्षिका हैं। वह कहती हैं, ‘किताबें बच्चों के परवरिश में सबसे ज्यादा सहायक हैं और इस टेलीवाइज्ड युग में किताबें कहाँ पढ़ी जाती हैं। हम तो इन बच्चों को किताबों की आदत डाल रहे है और बहुत हद तक सफल भी हुए हैं।’

इस कार्यक्रम में बच्चों को कहानी सुनायी गई। बच्‍चों ने अपने मन के विषयों के चित्र बनाये। उनके बनाए चि‍त्रों को कार्यस्‍थल पर प्रदर्शित कि‍या गया। उन्हें एक लघु फ़िल्म ‘कंचे और पोस्टकार्ड’ भी दिखाई गई, जिसे रिदम जानवे ने निर्देशित किया है।

बारिश और कड़ी ठंड के बावज़ूद मेले में ज्ञान खंड-3 व आसपड़ोस के लोगों का आना-जाना लगा रहा।

बच्चों ने उत्सुकता और दिलचस्पी से इस आयोजन में भाग लिया जिसके संयोजन में माही और स्नेहा की महत्वपूर्ण भागीदारी रही।

भाषा नहीं रहेगी तो हमारी पहचान भी लुप्त हो जाएगी : बिष्ट

कवयित्री देवकी मेहरा को शेर सिंह बिष्ट 'अनपढ़' कुमाउनी कविता पुरस्कार से सम्मानित करते हुए।

कवयित्री देवकी मेहरा को शेर सिंह बिष्ट ‘अनपढ़’ कुमाउनी कविता पुरस्कार से सम्मानित करते हुए।

अल्मोड़ा : ‘कुमाउनी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति प्रचार समिति’ और ‘पहरू’ पत्रिका ने संयुक्त रूप से 12, 13, व 14 नवम्बर को आठवाँ ‘राष्ट्रीय कुमाउनी भाषा सम्मलेन’ जिला पंचायत सभागार, अल्मोड़ा में आयोजि‍त कि‍या। इसमें दिल्ली, लखनऊ, संभल, सहारनपुर, चंदौसी, फरीदाबाद, देहरादून और कुमाऊँ मंडल के सभी जिलों से आए हुए लगभग 160 कुमाउनी के साहित्यकारों और कुमाउनी भाषा प्रेमियों ने भागीदारी की।

सम्मेलन में कहानी, कविता, गीत, लेख, हास्य, रिपोर्ताज, शब्दचित्र आदि विधाओं की कुल 10 पुस्तकों का लोकार्पण किया गया।

इस बार देवकी महरा को शेर सिंह बिष्ट ‘अनपढ़’ कुमाउनी कविता पुरस्कार, खुशाल सिंह खनी को बहादुर बोरा ‘श्रीबंधु’ कुमाउनी कहानी पुरस्कार, त्रिभुवन गिरि को शेर सिंह मेहता स्मृति कुमाउनी उपन्यास लेखन पुरस्कार तथा त्रिभुवन गिरि, श्याम सिंह कुटौला व पवनेश ठकुराठी को प्रेमा पंत स्मृति कुमाउनी खण्ड काव्य लेखन पुरस्कार प्रदान किया गया। कुमाउनी भाषा में हर विधा में साहित्य तैयार करने के लिए कुमाउनी भाषा प्रेमियों द्वारा दी गई आर्थिक मदद से चलाई जा रही लेखन पुरस्कार योजनाओं के अन्तर्गत इस वर्ष 21 रचनाकारों की कृतियों को पुरस्कृत किया गया।

सम्मेलन में हर वर्ष कुछ बुजुर्ग रचनाकारों को ‘कुमाउनी साहित्य सेवी सम्मान’, कुछ भाषा प्रेमियों को ‘कुमाउनी भाषा सेवी सम्मान’ तथा कुछ संस्कृतिकर्मियों को ‘कुमाउनी संस्कृति सेवी सम्मान’ से भी सम्मानित किया जाता है। इस वर्ष भी नौ लोगों को कुमाउनी साहित्य सेवी सम्मान, पांच लोगों को ‘कुमाउनी भाषा सेवी सम्मान’ तथा चार संस्कृतिकर्मियों को ‘कुमाउनी संस्कृति सेवी सम्मान’ से सम्मानित किया गया।

ज्ञातव्‍य है कि‍ 13, 14, व 15 नवम्बर 2009 को अल्मोड़ा के कुन्दनलाल साह स्मारक प्रेक्षागार में पहला तीन दिवसीय ‘कुमाउनी भाषा सम्मेलन’ आयोजित किया गया था। तब से अब तक हुए सम्मेलनों में नि‍म्‍न प्रस्ताव पारित किए गए हैं- 1. कुमाउनी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाए

  1. उत्तराखण्ड में स्कूली पाठ्यक्रम में कुमाउनी भाषा को एक विषय के रूप में शामिल किया जाए
  2. कुमाउनी भाषा के विकास के लिए उत्तराखण्ड में ‘कुमाउनी भाषा अकादमी’ गठित की जाए
  3. अल्मोड़ा नगर के सांस्कृतिक, साहित्यिक राजधानी स्वरूप को देखते हुए ‘कुमाउनी भाषा अकादमी’ का मुख्यालय अल्मोड़ा में बनाया जाए
  4. उत्तराखण्ड सरकार द्वारा कुमाउनी भाषा के आदि कवि गुमानी पंत जी की याद में कुमाउनी भाषा रचनाकारों के लिए समग्र योगदान पर एक लाख रुपये के सालाना पुरस्कार की घोषणा की जाए
  5. उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद वर्ष 2009 से आज तक के सालाना पुरस्कारों की एकमुश्त घोषणा की जाए
  6. कुमाउनी भाषा के विकास के लिए उत्तराखण्ड सरकार द्वारा पांच करोड़ धनराशि का एक कोष बनाया जाए। इसमें से रचनाकारों को पुरस्कृत-सम्मानित करने की योजना बनाई जाए
  7. कुमाउनी भाषा के रचनाकारों को किताब छपवाने के लिए अनुदान दिया जाए
  8. कुमाउनी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति प्रचार समिति कसारदेवी, अल्मोड़ा द्वारा कसारदेवी में प्रस्तावित ‘कुमाउनी भाषा संस्थान’ के सभागार, पुस्तकालय आदि निर्माण हेतु शासन स्तर से अनुदान दिया जाए
  9. कुमाउनी भाषा के तीन बुजुर्ग और नामी कवियों शेर सिंह बिष्ट ‘अनपढ़’, चारुचन्द्र पाण्डे व वंशीधर पाठक ‘जिज्ञासु’ को उत्तराखण्ड भाषा संस्थान देहरादून द्वारा सम्मान योजना में इसी बार ‘गुमानी पंत सम्मान’ या उससे भी बड़े सम्मान से सम्मानित किया जाए
  10. उत्तराखण्ड भाषा संस्थान देहरादून द्वारा कुमाउनी रचनाकारों को दिए जाने वाले सम्मानों में कुमाउनी भाषा के महत्वपूर्ण रचनाकारों गौरीदत्त पाण्डे ‘गौर्दा’, शेर सिंह बिष्ट ‘अनपढ़’, गिरीश तिवाड़ी ‘गिर्दा’ व बालम सिंह जनौटी के नाम पर सम्मान का नाम रखा जाए
  11. अगले वर्ष सन् 2012 से समिति द्वारा कुमाउनी भाषा के महत्वपूर्ण कहानीकार स्व. बहादुर बोरा ‘श्रीबंधु’ कुमाउनी कहानी पुरस्कार दिया जाएगा
  12. उत्तराखण्ड सरकार के उपक्रम ‘ उत्तराखण्ड हिन्दी अकादमी’ व ‘उत्तराखण्ड भाषा संस्थान’ में अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, निदेशक मंडल (कार्यकारिणी) में साहित्यकारों को शामिल किया जाए
  13. उत्तराखण्ड भाषा संस्थान द्वारा हर साल कुमाउनी साहित्यकारों को पुरस्कार/सम्मान और किताब छापने के लिए आर्थिक मदद दिए जाने की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। पुरस्कार/सम्मान तथा पुस्तक प्रकाशन सहायता के लिए अलग-अलग चयन समितियों का गठन किया जाए और इन चयन समितियों में कुमाउनी भाषा के साहित्यकारों को शामिल किया जाए
  14. उत्तराखण्ड भाषा संस्थान द्वारा पुस्तक प्रकाशन सहायता के रूप में वर्तमान में मात्र दस-पंद्रह हजार रुपये स्वीकृत किए जा रहे हैं, जो कि बहुत कम हैं। इतनी कम धनराशि में पुस्तक प्रकाशन संभव नहीं हैं। अतः पुस्तक प्रकाशन सहायता के रूप में कम से कम पच्चीस हजार रुपये की धनराशि का प्रावधान किया जाए।

सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में आधार व्याख्यान प्रस्तुत करते हुए जाने-माने इतिहासकार ताराचन्द्र त्रिपाठी ने कहा कि कुमाउनी भाषा तभी बच सकती है, जब यहाँ के बच्चे, युवा और आम जन इसका प्रयोग निरन्तर दैनिक बोलचाल में करेंगे। यदि इसे हमारी नई पीढ़ी उपयोग में नहीं लाती है तो फिर इसे संविधान की आठवीं अनुसूची में दर्ज करने की माँग की भी कोई सार्थकता नहीं रह जाएगी। अतः अपनी भाषा व संस्कृति को बचाने के लिए हमें सरकारों की ओर देखते रहने के बजाए स्वयं अधिक से अधिक प्रयत्न करने चाहिए। हमें सालभर विद्यार्थियों के बीच जाकर जगह-जगह अनेक ऐसे कार्यक्रम करने चाहिए, जिससे उनमें कुमाउनी भाषा के प्रति रुचि जाग्रत हो। फिर बच्चों को साल में एक बार होने वाले इस तरह के बड़े सम्मेलन में अवश्य बुलाया जाना चाहिए। भविष्य में हमारे सम्मेलनों में नई पीढ़ी की अधिकाधिक उपस्थिति बेहद जरूरी है।

डॉ. शमशेर सिंह बिष्ट का कहना था कि भाषा का सवाल बहुत महत्वपूर्ण सवाल है, क्योंकि हमारी भाषा ही नहीं रहेगी तो हमारी पहचान भी लुप्त हो जाएगी। आज जब उत्तराखण्ड राज्य बने सोलह साल बीत चुके हैं, तो यह अत्यंत शोचनीय स्थिति है कि हम आज भी अपने ही राज्य में अपनी पहचान के संकट से जूझ रहे हैं। पिछले इन सोलह सालों में हमारी कोई पहचान ही नहीं बन पाई है। उत्तराखण्ड राज्य की लड़ाई इसलिए लड़ी गई थी कि हमारा अस्तित्व बचा रहे और हमारी पहचान बनी रहे। कुछ विधायक, सांसद व मंत्री बना दिए जाने मात्र से हमारी पहचान नहीं बन सकती। हमारी पहचान तभी बनेगी, जब यहाँ के निवासियों की जिन्दगी और यहाँ की प्रकृति बची रहेगी तथा सामान्य जन को आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के साधान उपलब्ध होंगे। आज जब हमारे जीवन की सारी चीजों को राजनीति ही तय कर रही है तो ऐसे में प्राकृतिक संसाधनों की लूट-खसोट करने और आम जनता की घोर उपेक्षा करने वाली राजनीति पर सवाल उठाने के साथ-साथ जनहित की राजनीति को स्थापित करना भी बहुत जरूरी है।

उन्होंने उपस्थित साहित्यकारों का ध्यान इस ओर भी दिलाया कि केवल ढेरों रचनाएँ लिखने और प्रकाशित करते चले जाने से कोई विशेष बात नहीं बनती है। असली सवाल रचनाओं की दृष्टिसम्पन्नता और उत्कृष्टता का है। यदि हमारे द्वारा लिखी जा रही रचनाओं में बहुसंख्यक जनता के जीवन से जुड़े यथार्थ की सच्ची अभिव्यक्ति न हो पाए तो लोग ऐसे साहित्य को पढ़ेंगे भी नहीं। अतः आज ऐसा साहित्य लिखे जाने की आवश्यकता है जो वर्तमान जीवन की प्रमुख समस्याओं और उनके समाधान की सही समझ विकसित करने के साथ ही पाठक में एक अच्छे समाज के निर्माण के लिए सक्रिय होने की प्रेरणा भी जगा सके।

पी.सी. तिवारी ने कहा कि समाज को दिशा तो अन्ततः राजनीति ही देती है। उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद कितनी जमीन हमसे छिन गई, हमें इसके बारे में भी बात करनी पड़ेगी। अपनी कृषि भूमि, अपनी जमीन बचाने की बात मुख्य है। उन्होंने सवाल उठाया कि सरकारों द्वारा उद्योगपतियों व पूँजीपतियों को जिस तरह यहाँ की जमीन को कौड़ी के भाव दे दिए जाने का सिलसिला जारी है, क्या इससे हमारा सरोकार नहीं होना चाहिए। अपनी बोली-भाषा बचाने के लिए अपना परिवेश बचाना चाहिए, अपनी जमीन बचानी चाहिए, क्योंकि हमारा परिवेश बचेगा तो हमारी भाषा भी बचेगी। अतः भाषा के संकट पर सोचते हुए इसके राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक अन्तर्सम्बन्ध पर भी अवश्य विचार किया जाना चाहिए। जब तक हम गाँवों को अधिकार नहीं देंगे, विकेन्द्रित व्यवस्था नहीं बनाएंगे, तक तक मुकम्मल तौर पर भाषा के संकट को भी हल नहीं किया जा सकता।

सम्‍मेलन में यह भी एक महत्वपूर्ण बात रही कि सरकारों द्वारा कुमाउनी भाषा के विकास और इसके रचनाकारों की माँगों के संदर्भ में अपेक्षित सहयोग न किए जाने से नाराज होकर, ताराचन्द्र त्रिपाठी जी के सुझाव पर, सम्मेलन में उपस्थित लोगों ने समिति द्वारा कसारदेवी में निर्मित किए जा रहे ‘कुमाउनी भाषा संस्थान’ हेतु लगभग दो लाख रुप जमा किए जाने की घोषणा की।

ज्ञातव्य है कि‍  ‘जब भाषा बचेगी, आगे बढ़ेगी तभी हमारी संस्कृति भी बचेगी, वह भी आगे बढ़ेगी’ इसी सोच के तहत संस्कृति को बचाने के लिए भाषा को बचाना जरूरी समझते हुए सन् 2004 में ‘कुमाऊंनी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति प्रचार समिति’ कसारदेवी, अल्मोड़ा के नाम से संस्था का गठन कराया गया था। फिर भाषा के विकास के लिए उसे बोलना, उसमें लिखना-पढ़ना जरूरी समझते हुए लिखने-पढ़ने का माहौल बनाने के लिए तथा कुमाउनी भाषा में साहित्य की हर विधा में लेखन को बढ़ावा देने के लिए नवम्बर, 2008 से कुमाउनी मासिक पत्रिका ‘पहरू’ का प्रकाशन शुरू किया गया। तब से यह पत्रिका लगातार नियमित रूप से निकल रही है और अक्टूबर 2016 तक इसके 96 अंक प्रकाशित हो चुके हैं। इनमें 600 कुमाउनी रचनाकारों की रचनाएँ प्रकाशि‍त हो चुकी हैं और वर्तमान में लगभग 800 रचनाकार कुमाउनी में लिख रहे हैं।

संस्था द्वारा कहानी, कविता, बाल कविता, जनगीत, लोकगीत, जीवनी, यात्रावृत्तांत, उपन्यास, नाटक, देवगाथा आदि विधाओं की 29 कुमाउनी पुस्तकें भी प्रकाशित की जा चुकी हैं।

रेनबो में दिव्यांग बच्चों ने बि‍खेरे इंद्रधनुषी रंग

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नोएडा : कोठारी इंटरनेशनल स्कूल में दिव्यांग बच्चों को प्रोत्साहित करने व मुख्यधारा के विद्यालयों में दिव्यांग बच्चों की भागीदारी को बढ़ाने के लिए दो दिवसीय कार्यक्रम रेनबो-2016 का आयोजन किया गया। इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य दिव्यांग बच्चों को ऐसा मंच उपलब्ध कराना था, जहाँ वे अपने कौशल का प्रदर्शन कर सकें। इस कार्यक्रम में पहले दिन 8 दिसंबर को एकल गीत, ड्राइंग कलरिंग, कोलाज मेकिंग तथा पेंटिंग प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। इन प्रतियोगिताओं में दिल्ली-एनसीआर के 15 विद्यालयों के 67 बच्चों ने भागीदारी की। बच्चों ने अपने सुरों से एक नए इन्द्रधनुष की रचना कर दी।

चार घंटे चले इस कार्यक्रम में साक्षी एनजीओ की प्रबंधक-संस्थापक समाज सेविका डॉक्टर मृदुला टंडन तथा रोड सेफ्टी इमरजेंसी के प्रबंधक, मीडियाकर्मी व चर्चित शायर सुबोध लाल ने अपनी उपस्तिथि से बच्चों का मनोबल बढ़ाया।

कार्यक्रम में निर्णायक की भूमिका के लिए वरिष्ठ रंगकर्मी, चित्रकार व मूर्तिकार पंकज मोहन अग्रवाल तथा युवा चित्रकार सहर रज़ा को आमंत्रि‍त किया गया।  गीत प्रतियिगिता में निर्णायक की भूमिका ख्यातिलब्ध ग़ज़ल गायक उस्ताद शकील अहमद खान तथा सितार वादक व ग़ज़ल गायक अकील अहमद ने निभाई। बच्चों की बनायीं कलाकृतियां देख सहर बरबस ही कह पड़ीं कि‍ यदि ऐसा विद्यालय उन्हें मिले तो वे दोबारा छात्र जीवन में लौटने को तैयार हैं।

बच्चों के सुरों से शकील साहब इतना प्रभावित हुए कि‍ बजाय सम्मान लेने के वे बच्चों से सीधा मुखातिब हुए और कहा कि‍ जो भी मंच की चौखट पर चढ़ गया, वो हर बच्चा विजेता है।

कार्यक्रम का समापन पुरस्कार वितरण से किया गया। ड्राइंग-कलरिंग में रयान इंटरनेशनल स्कूल नोएडा, बाल भारती स्कूल नोएडा, सेठ आनंदराम जयपुरिया स्कूल को क्रमशः पहला, दूसरा और तीसरा स्थान मिला।  कोलाज मेकिंग में रयान इंटरनेशनल स्कूल नोएडा, डीएलफ स्कूल नोएडा तथा खेतान स्कूल नोएडा को क्रमशः पहला, दूसरा और तीसरा स्थान मि‍ला।

पेंटिंग में रयान इंटरनेशनल स्कूल नोएडा, कैम्ब्रिज स्कूल साहिबाबाद, खेतान स्कूल नोएडा को  क्रमशः  पहला,  दूसरा व तीसरा स्थान मि‍ला।

मन के गीत में रयान इंटरनेशनल स्कूल नोएडा, डीपीएस आरकेपुरम, डीएलएफ़ साहिबाबाद को क्रमशः पहला, दूसरा तथा तीसरा स्थान प्राप्त हुआ।

कार्यक्रम में विद्यालय की प्रधानाध्यापिका मंजू गुप्ता, उपप्रधानाचार्य जसवीर चौधरी,  हेडमिस्ट्रेस नीरजा चैथले तथा समन्वयक रुचि बिष्ट ने निर्णायकमंडल व अतिथियों को सम्मानित किया।

धन्यवाद ज्ञापन में प्रधानाध्यापिका मंजू गुप्ता ने इस कार्यक्रम को नियमित रूप से प्रतिवर्ष मनाने की योजना को साझा किया।

कार्यक्रम के दूसरे दिन विशेष शिक्षा से जुड़े पेशेवरों को एक मंच पर लाकर उनके द्वारा व्यवहार में लायी जा रही सर्वोत्तम विधियों तथा प्रक्रियाओं पर चर्चा की गई। दूसरे दिन की सेमीनार में 17 पेशेवरों ने भागीदारी की और आने वाली संभावनाओं और चुनौतियों पर चर्चा की।  सेमीनार में अमर ज्योति स्कूल की प्रधानाध्यापिका सम्मा तुली तथा प्रकृति स्कूल की संस्थापिका प्रियंका भाबू भी उपस्तिथि रहीं। सेमीनार  की अध्यक्षता जाने-माने बाल मनोचिकित्‍सक डॉक्टर नागपाल ने की। प्रधानाध्यापिका ने अंत में घोषणा की कि‍ प्रत्येक वर्ष 9 दिसम्बर को इसी तरह सेमीनार का आयोजन किया जाएगा।

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दून लिटरेचर फेस्टिवल 24-25 दिसम्बर को

नई दि‍ल्ली : टी.एस. इलियट ने कहा था, ‘जो लोग अपनी साहित्यिक विरासत की चिन्ता करना छोड़ देते हैं, वे जंगली तथा बर्बर हो जाते हैं और जो लोग साहित्य-सृजन करना छोड़ देते हैं, वो विचार और संवेदनशीलता को खो देते हैं।’ हिन्दी के क्षेत्र में यह संकट साफ़-साफ़ नजर आने लगा है। यहाँ के लोगों के जीवन की प्राथमिकता में बच्चों का कामयाब भविष्य, मकान तथा नये दौर के सुख-साधन तो हैं, लेकिन साहित्य, कला तथा संस्कृति से वे दूर होते जा रहे हैं। आबादी का एक बड़ा हिस्सा न तो अपनी साहित्यिक विरासत से परिचित होना चाहता है और न ही समकालीन सृजन से ही जुड़ना चाहता है। इस कारण न उसके पास कोई विचार है, न कोई आदर्श! न उसकी कोई प्रतिबद्धता रह गई है, न संघर्ष का माद्दा! सोशल मीडिया तथा स्मार्ट फ़ोन ने सारी दुनिया को लोगों की मुट्ठी में समेट दिया है। ऐसे में व्यक्ति भयानक तरीक़े से व्यस्त हो चुका है। वह त्वरित सूचनाओं के प्रभाव में है।
सोशल मीडिया के रूप में आया यह सामाजिक बदलाव विज्ञान और तकनीक से जुड़े वैश्विक परिवर्तन का एक चरण है जो समाज को परिवर्तित कर रहा है। आभासी दुनिया को अपने जीवन के अभिन्न अंग बना चुकी युवा पीढ़ी समाज की मुख्यधारा से किस प्रकार कट रही है, इसे हम अपने परिवेश को देखकर समझ सकते हैं। यद्यपि यह भी सत्य है कि साहित्य, सरोकार और संघर्ष की चर्चा के मंच के रूप में भी सोशल मीडिया का प्रयोग हो रहा है। मध्य-पूर्व में हुए जनसंघर्षों में सोशल मीडिया की भूमिका को पूरी दुनिया ने देखा है। शेष दुनिया की भाँति भारत भी तेज़ रफ़्तार से बदलाव के साथ क़दमताल कर रहा है। इसी क़दमताल के बीच परम्परावादी भारत और आधुनिक भारत के विरोधाभास भी हैं। भारत एक बहुसांस्कृतिक और बहुभाषी देश है। हमारी जीवनशैली, लोकपरम्पराओं, धार्मिक प्रथाओं और बहुभाषावाद में यह स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। सामाजिक मान्यता, प्रथा, इतिहास और संस्कृति जैसे तत्व मिलकर लोक परम्पराओं को समृद्ध करते हैं। लेकिन थ्री डायमेंसनल (3डी) के इस युग में घर के भीतर और बाहर लोक-परम्पराओं के सकारात्मक चिह्न निरन्तर धूमिल हो रहे हैं।
देवी-देवताओं के पूजन की प्राचीन लोक-प्रथाओं से लेकर सार्वजनिक समारोहों तथा मेलों का स्वरूप भी बदल गया है। विवाह समारोहों में गाये जाने वाले प्राचीन गीत अब लुप्तप्राय हो गये हैं। इसी प्रकार दादी-नानी के क़िस्से और कहानियाँ भी अब केवल चर्चाओं के अंग बनकर रह गये हैं। कुल मिलाकर दुनिया के इस बदलाव ने लोक-परम्पराओं को न सिर्फ कड़ी चुनौती दी है, बल्कि शहरीकरण और एकल परिवारों के मौजूदा ढाँचे ने सामाजिक व्यवस्था के इन परम्परागत तत्वों को समाप्त कर दिया है। सामाजिक व्यवस्था में आ चुका यह बदलाव हमें कला और साहित्य में भी स्पष्ट हो गया है। कहानी और कविता का कथ्य भी भूमंडलीकरण के साथ ही बदल रहा है। इस बदलाव को हम चाय और पान के नुक्कड़ों के गायब हो जाने के रूप में भी महसूस कर सकते हैं, जहाँ अपनी बात कहने और सुनने को लोग आया करते थे। कहानी अब पढ़ने से ज़्यादा देखने और सुनने के लिए लिखी जा रही है, ऐसा प्रतीत होता है। यह वही दौर है जहाँ फिल्मों और धारावाहिकों की तरह ही कहानियों से भी गाँव के गँवई पात्र गायब हो गए हैं।
इन सब स्थितियों-परिस्थितियों के बीच पहाड़ हैं और पहाड़ के रचनाकार हैं। पहाड़ से जुड़ी उनकी चिंतायें भी हैं। रोज़ी-रोज़गार के लिए टूट चुके पहाड़ के परिवार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और संचार के सवाल भी हैं। इनके सबके केन्द्र में कहीं वह लोक भी है जिसने दुनिया को मौजूदा स्वरूप प्रदान किया है। लोक के गीत, लोक की कथाओं और लोक की गाथाओं के बिना साहित्य के मौजूदा ढाँचे की चर्चा कैसे संभव है। इसी प्रकार दलित, स्त्री आदि मौजूदा दशकों के विमर्श लगातार जरूरी बने हुए हैं। इन सबके बीच भारत की बहुसांस्कृतिक, बहुभाषी, बहुलवादी व समृद्ध लोकपरम्परा को कला और साहित्य के माध्यम से समझने व समझाने के साथ ही साझा करने के प्रयास के रूप में ‘समय साक्ष्य’ (प्रकाशन) की ओर से क्रि‍श्चयन रि‍ट्रीट एंड स्टडी सेंटर, राजपुर रोड, देहरादून में दून लिटरेचर फेस्टिवल (डीएलएफ-2016) का आयोजन में किया जा रहा है। इस आयोजन की परिकल्पना निम्न उद्देश्यों के साथ की गई है-

-हिन्दी साहित्य के मौजूदा परिदृश्य पर विमर्श।
-पुस्तक लोकार्पण, पुस्तक चर्चा तथा पुस्तक प्रदर्शनी।
-लोक-साहित्य व लोक-कला की मौजूदा स्थिति पर चर्चा।
-साहित्यकारों, लोक कलाकारों, शिल्पियों, संस्थाओं, समूहों व पाठकों का एक मंच पर समागम।
-आंचलिक, स्थानीय व लोक-परम्पराओं से जुड़े रचनाकारों का एक मंच पर एकत्रीकरण।
-कार्यक्रम में साहित्य व कला से जुड़ी प्रदर्शनी, फिल्म स्क्रीनिंग आदि का आयोजन।

कार्यक्रम

प्रथम दिवस 24 दिसम्बर 2016
पंजीकरण 9-10 बजे
उद्घाटन सत्र 10 बजे 11.00 बजे
हिन्दी साहित्य का वर्तमान परिदृश्य और नया मीडिया
संबोधनः पुरुषोत्तम अग्रवाल, बटरोही
संयोजकः डॉ. सुशील उपाध्याय

प्रथम सत्र 11.00 बजे 1.00 बजे तक 
भूमण्डलीकरण और हिन्दी कहानी
(सन्दर्भः जाति, धर्म, स्त्री, साम्प्रदायिकता, गांव, बाजार, नया पाठ और तकनीक)
अध्यक्षः सुभाष पंत
बीज भाषणः जितेन ठाकुर
सहभागः कॉन्ता रॉय, मनीषा कुलश्रेष्ठ, दिव्य प्रकाश दुबे, अनिल कार्की
संयोजकः दिनेश कर्नाटक
खुली चर्चा/प्रश्नोत्तर
मध्याह्न भोजन 1.00-2.00 बजे

द्वितीय सत्र 2.00-4.00 बजे
हिन्दी कविताः चेतना और पक्षधरता
(सन्दर्भः खेत, किसान, गांव, शहर, पहाड़, घर, परिवार और समाज आदि)
अध्यक्षः मंगलेश डबराल
बीज भाषणः लीलाधर जगूड़ी
सहभागः राजेश सकलानी, शैलेय, प्रकृति करगेती, आशीष मिश्र
संयोजकः डॉ. अरुण देव
चाय: कार्यक्रम में ही खुली चर्चा/प्रश्नोत्तर

तृतीय सत्र 4.00-6.00 बजे
स्त्री और आधुनिकता
अध्यक्षः सुमन केसरी
बीज भाषणः शीबा असलम
मंच पर: सुजाता तेवतिया, सन्ध्या निवेदिता, निधि नित्या
संयोजकः मनीषा पांडे
खुली चर्चा/प्रश्नोत्तर
भोजन 8-9 बजे रात्रि

चतुर्थ सत्र: 9 बजे से 11 बजे
कवि और कविता
अध्यक्षः डॉ. अतुल शर्मा
आमंत्रित कविः स्वाति मेलकानी, डॉ. माया गोला, केशव तिवारी, चेतन क्रान्ति, डॉ. राम विनय सिंह, अंबर खरबंदा, मुनीश चन्द्र सक्सेना, राजेश आनन्द ‘असीर’, नदीम बर्नी, जिया नहटौरी, शादाब अली, रेखा चमोली, नदीम बिस्मिल, प्रतिभा कटियार, सुभाष तराण।
संयोजकः डॉ. प्रमोद भारतीय

द्वितीय दिवस, 25 दिसम्बर 2016

प्रथम सत्र 10.00-12.00 बजे
लोक साहित्य: अतीत, वर्तमान और भविष्य
(सन्दर्भः लोकगीत, लोककथाएं, लोकगाथाएं, वीरगाथाएं, कहावतें व किं‍वदंतियां)
अध्यक्षः डॉ. दाताराम पुरोहित
बीज भाषणः डॉ. प्रभा पंत
मंच पर: डॉ. प्रभात उप्रेती, महाबीर रवांल्टा, डॉ. शेर सिंह पांगती
संयोजक: डॉ. उमेश चमोला
खुली चर्चा/प्रश्नोत्तर
चाय: कार्यक्रम में ही

द्वितीय सत्र 12.00-2.00 
बाल साहित्यः चुनौतियां और संभावनाएं
(सन्दर्भः परिवार, समाज, संस्कृति, स्कूल, घर, किताबें, बस्ता, पुस्तकालय, वाचलनालय, विकास, परिवर्तन आदि)
अध्यक्षः उदय किरौला
बीज भाषणः राजेश उत्साही
मंच परः डॉ. दिनेश चमोला, मुकेश नौटियाल, डॉ. शीशपाल, डॉ. उमेश चन्द्र सिरतवारी
संयोजकः मनोहर चमोली ‘मनु’
खुली चर्चा/प्रश्नोत्तर

समानान्तर
द्वितीय सत्र 12.00-2.00
बाजार, मीडिया और लोकतंत्र
अध्यक्षः कुशल कोठियाल
बीज भाषणः सुन्दर चन्द्र ठाकुर
मंच परः अनुपम त्रिवेदी, पवन लाल चंद, लक्ष्मी पंत
संयोजकः भूपेन सिंह
खुली चर्चा/प्रश्नोत्तर
मध्याहन भोजन 2.00-2.30

तृतीय सत्र 2.30- 4.30 बजे
कथेतर साहित्यः समय और समाज
(यात्रा, संस्मरण, डायरी, पत्र, आत्मकथा, विज्ञान लेखन आदि पर संवाद)
अध्यक्षः देवेन्‍द्र मेवाड़ी
बीज भाषण- डॉ. शेखर पाठक
मंच परः तापस चक्रवर्ती, एस.पी. सेमवाल, आकांक्षा पारे कासिव
संयोजकः डॉ. सुशील उपाध्याय

चतुर्थ सत्र 4.30-6.30 बजे 
आंचलिक साहित्यः चुनौतियाँ एवं संभावनाएं
अध्यक्षः डॉ. अचलानंद जखमोला
बीज भाषणः डॉ. देब सिंह पोखरिया
मंच पर: मदन मोहन डुकलाण, नेत्र सिंह असवाल, डॉ. हयात सिंह रावत, रमाकांत बैंजवाल
संयोजकः गिरीश सुन्दरियाल

पंचम सत्र-6.30- 7.30 
विभिन्न पुस्तकों पर चर्चा
व्यावहारिक वेदान्त: सरला देबी, समीक्षकः शशि भूषण बडोनी
साहिर लुधियानवीः मेरे गीत तुम्हारेः सुनील भट्ट, समीक्षकः- मुकेश नौटियाल
मैकाले का जिन्न तथा अन्य कहानियां: दिनेश कर्नाटक, समीक्षकः- भाष्कर उप्रेती
खुली चर्चा/चाय
भोजनः  8-9.00 बजे

छठा सत्र 9-11 बजे 
समापन