Category: नाटक

भोजन का सफ़र : आशुतोष उपाध्‍याय

digestion

यह नाटक मनुष्य के भोजन की पाचन यात्रा पर आधारित है. क्या होता है जब हमारा भोजन हमारे मुंह के भीतर जाता है? भोजन की यात्रा के जरिये बच्चों को पाचन तंत्र और पाचन क्रिया से परिचय कराने का यह बड़ा मनोरंजक प्रयास है-

पात्र परिचय

भोजन     : पोषक व अपोषक

मुंह          : मुख्त्यार सिंह

भोजन नली  : इसोफेगस फिसलस

आमाशय : आमाशय महाशय

लिवर      : जिगर जरूराबादी

पित्ताशय  : पैन्क्री आज

छोटी आंत  :   छुटकी

रक्त वाहिनियां   : लाल सैनिक

बड़ी आंत : बड़की

मलाशय  : गोबर भंडारी

मलद्वार    : लू का

कोरस

भोजन खाने का नाम, खाते रहो सुबहो शाम… 2

के रस्ता कट जाएगा मितरा, पेट तेरा भर जाएगा मितरा

के भूखे रोना ना मितरा, के हर पल सोना ना मितरा

भोजन खाने का नाम, खाते रहो सुबहो शाम… 2

जो भोजन से हार मानता उसकी होगी छुट्टी

नाक चढ़ाकर कहे ज़िन्दगी तेरी मेरी हो गई कुट्टी

कि भूखा यार मना मितरा

यार को डटके खिला मितरा

कि पेट को साफ़ करा मितरा

बदन को  हिला-डुला मितरा

भोजन खाने का नाम, खाते रहो सुबहो शाम… 2

: सूत्रधार :

मेहरबान, कदरदान! लीजिये आपके मनोरंजन के लिए पेश है हमारा नया नाटक “भोजन का सफ़र”. इस नाटक में आप देखेंगे भोजन के दो जवान बेटे, माफ़ कीजिये दो हिस्से- यानी पोषक और अपोषक किस तरह पाचन तंत्र की यात्रा को अंजाम देते हैं. ये कहानी है पोषक और अपोषक की, जो शरीर को चुस्त-दुरुस्त रखने के लिए अपनी जान कुर्बान कर देते हैं. इस बेमिसाल सफ़र में उनका सामना होता है मुख्त्यार सिंह यानी मुंह से. इसोफेगस फिसलस यानी भोजन नली से, महाशय आमाशय से. जिगर ज़रूराबादी यानी लिवर व पेंक्री आज यानी पित्ताशय नाम के दो शायर पहलवानों से. फिर वे मिलते हैं छुटकी और बड़की दीदी यानी छोटी व बड़ी आंत से. इसके बाद पोषक और अपोषक बिछुड़ जाते हैं. पोषक को लाल सैनिक यानी रक्त वाहिनियां अपने साथ ले जाती हैं जबकि अपोषक गोबर भंडारी के किले यानी मलाशय तक पहुंच जाता है, जहां उसे लू का यानी मलद्वार धक्के मार के बाहर निकाल देता है.

दृश्य-1: मुंह

बड़ी-बड़ी मूंछों वाला मुख्त्यार सिंह एक हाथ में दांत वाली तलवार और दूसरे में लार की बोतल लेकर खड़ा है. पोषक और अपोषक सज-धजकर मुख्त्यार सिंह के दरवाजे पर आते दिखाई देते हैं.

मुख्त्यार सिंह       :        आओ दोस्तो आओ. कब से राह देख रहा हूं तुम दोनों की. हमारी छोटी और बड़की बड़ी देर से कुलबुला रही हैं तुम्हारे लिए. ये देखो दांत वाली मेरी तलवार और ये रही लार की बोतल. दोनों तैयार है.

  (पोषक-अपोषक के नजदीक पहुंचने पर उन्हें सूंघता और छूता है) ओहो.. आज तो बड़ी खुशबू बिखेर रहे हो तुम दोनों…! अरे.. बड़े गरमा-गरम भी लग रहे हो..!!

पोषक        : तसल्ली रखो मुख्त्यार भैया. ऐसी भी क्या जल्दी है. मगर एक रिक्वेस्ट है हमारी.

मुख्त्यार सिंह       :        रिक्वेस्ट? कैसी रिक्वेस्ट??

अपोषक    : इस बार खूब बारीक काटना हमें. बारीक काटे बिना निगलोगे तो आपके पड़ोसी मिस्टर इसोफेगस को बड़ी तकलीफ होगी.

पोषक        : और हां, लार फेंकने में भी कतई कंजूसी मत करना. पिसाई ठीक होगी तो हम फिसलते हुए मजे से लुढ़क जायेंगे.

अपोषक    : याद है, पिछली बार तुमने ठीक से लार नहीं फैंकी थी! जानते हो क्या हुआ? इसोफेगस सर हमसे उलझ गए. कितनी देर तक उन्होंने हमें अपनी चौकी पर रोके रखा!

पोषक        : वो तो अच्छा हुआ हिचकियां सुनकर किसी ने तुम्हारे दरवज्जे से खूब सारा पानी उड़ेल दिया. तब जाकर हम मिस्टर इसोफेगस की चौकी से निकल पाए.

मुख्त्यार सिंह       :        ये अच्छा याद दिलाया बेटा. आज मैं तुम्हें कायदे से काट-पीसकर भेजूंगा. लार का क्या कहना… एक नंबर की मूडी है. कभी-कभी तो खाने के नाम पर ही बरसने लगती है. और कभी मुंह ठूंस दो तो भी रिसने का नाम नहीं लेती. मैं तो कहता हूं तुम्हारे स्वाद में दम होगा तो खुद को वो रोक नहीं पाएगी.

अपोषक    : अबकी बार मम्मी ने हमें अच्छे से तैयार कर के भेजा है. मिर्च-मसाला डाल के खूब चटपटा बनाया है. देखते हैं कैसे नहीं निकलती लार की बच्ची!

पोषक        : बातें बहुत हो गईं मुख्त्यार भैया. हम ठंडे हुए जा रहे हैं. जल्दी से हाथ बढ़ाओ और हमें भीतर खींच लो.

मुख्त्यार सिंह दोनों को दरवाजे से भीतर खींचकर उनपर तलवार चलाता है और बीच-बीच में लार की बोतल उडेलता है. पोषक और अपोषक कचर-कचर की आवाज करते हुए नीचे गिर जाते हैं.

दृश्य-2: भोजन नली

पोषक और अपोषक घुटनों के बल चलते हुए इसोफेगस फिसलस की चौकी पर आते हैं. इसोफेगस अपने पांवों का गेट बनाकर खड़ा है. दोनों गेट के भीतर जाने को आतुर हैं.

पोषक-अपोषक        :         गुड मॉर्निंग मिस्टर इसोफेगस! प्लीज अलाऊ अस टू गो इनसाइड. यू नो, छुटकी एंड बड़की दीदीज आर ईगरली वेटिंग फॉर अस.

इसोफेगस   : वेलकम किड्स. दिस टाइम यू लुक फ्रेश एंड लुब्रिकेटेड. गुड, गुड, वैरी गुड! मेनी टाइम्स यू कम अनकट एंड ड्राई. इट पेन्स मी अ लॉट!

पोषक और अपोषक इसोफेगस के पांवों के नीचे से कठिनाई से निकलते हैं. वह उन्हें पीछे से लात मारकर आगे बढ़ाता है.

दृश्य-3: आमाशय

पोषक और अपोषक घुटनों के बल चलते हुए आमाशय महाशय के दरवाजे पर पहुंचकर उन्हें आवाज लगाते हैं.

पोषक        : महाशय जी… ओ महाशय जी… सो गए क्या?

आमाशय    : आया जी आया… अरे मैं तो जाने कब से तुम्हारी राह देख रहा था. इंतजार में मेरा जी खट्टा हो जाता है.

अपोषक     : खट्टा? वो क्यों महाशय जी?

आमाशय    : तुम्हें याद करते ही मेरे भीतर तेज़ाब के आंसू निकलने लगते हैं. ना जी ना, ये तो ख़ुशी के आंसू होते हैं. तुम दोनों से बड़ा प्यार है न मुझे.

पोषक        : हां. हमें भी आपके आंसुओं में डुबकी लगाने में बड़ा मज़ा आता है. तेज़ाब हमारे पोर-पोर में घुस जाता है.

अपोषक     : और महाशय जी आप हमें अपनी गोद में बिठाकर झुलाते भी तो हो. हमारा बदन मथकर मट्ठा हो जाता है.

आमाशय    : अच्छा.. अब और न तरसाओ. जल्दी से भीतर आकर तेज़ाब के तालाब में डुबकी लगा लो. आओ.. आओ.

पोषक और अपोषक आमाशय के घुटनों के नीचे से सरकते हुए आगे बढ़ते हैं. उनके मुंह से छपाक-छपाक की आवाजें निकलती हैं. वे तालाब में नहाने का अभिनय करते हैं.

 दृश्य-4: लिवर (जिगर) और पित्ताशय

आमाशय से बाहर निकलते ही पोषक और अपोषक को दो पहलवान- जिगर ज़रूराबादी और पैन्क्री आज मिलते हैं. दोनों पहलवान शायराना मिजाज़ के हैं.

जिगर       :           जिगर नाम है, ज़रूरी काम है अपना,

तले-भुनों को रसों से पचा के रखना.

जो पचे नहीं, वो सूरमा-ए-सफर निकले

ढाल बदबू में उन्हें भी बढ़ा के रखना.

पैन्क्री आज  :        वाह, वाह…! क्या शेर किल किया है ज़नाब! मगर एक ठो इधर वाला भी सुनिए:

जो मीठे होते हैं वो जानलेवा हो सकते हैं,

दाग जवानी के क्या बुढ़ापे में धो सकते हैं?

मीठी चीज़ों पे कंट्रोल हमारी ड्यूटी है

कड़वे बीज भी सेहत के लिए बो सकते हैं.

पोषक        : सलाम जिगर साहब, सलाम पैन्क्री साहब… आज तो महफिल सजा के बैठे हैं आप दोनों!

अपोषक    : अरे कुछ हमें भी तो सुनाइये हुज़ूर.

जिगर       : क्यों नहीं, क्यों नहीं… मुलाहिजा फरमाइए..

पोषक तत्वों के बिना नहीं भोज में जान,

चटपट खाना देखके क्यों होता अभिमान.

क्यों होता अभिमान जंक औ कचरा खाते,

बदन को कुछ ना लगता, सौ दफे टट्टी जाते.

पैन्क्री आज :        अपोषक की महिमा कोई कम नहीं है,

भोजन में इनके बिना दम नहीं है.

जो इनको नियम से चबा के न खाता,

सज़ा के तौर पे उसका पेट सूख जाता.

पोषक        : वाह, वाह… आज तो तबियत खुश कर दी आपने.

अपोषक    : लाइए अब जल्दी से हमें हमारी सौगात दीजिये ताकि हम छुटकी और बड़की दीदी के दीदार कर सकें.

दोनों पहलवान अपनी-अपनी बोतलों से पोषक और अपोषक पर कुछ छिड़कते हैं. छींटे पड़ते ही पोषक और अपोषक अँधेरे की ओर भाग जाते हैं.

दृश्य-5: छोटी आंत

पोषक और अपोषक छोटी आंत के दरवाजे पर खड़े हैं. छोटी आंत उन्हें देखकर ख़ुशी से नाचने लगती है.

छुटकी       : आखिर आ ही गए तुम दोनों. तुम्हारे इंतज़ार में मैं कब से कुलबुला रही हूं.

पोषक        : छुटकी दीदी, हम आ तो गए हैं. लेकिन मेरी एक शिकायत है. तुम हर बार हम दोनों को जुदा कर देती हो. यह ठीक नहीं. हम दोनों बहुत अच्छे दोस्त हैं. हम हमेशा साथ रहना चाहते हैं.

छुटकी       : मैं जानती हूं, लेकिन क्या करूं लाल सैनिक सिर्फ पोषक को ही अपने साथ ले जाते हैं. वे कहते हैं अपोषक उन्हें नहीं चाहिए.

अपोषक    : (चिढ़कर) आखिर मुझे ले जाने में उन्हें दिक्कत क्या है? क्या मैं भोजन का ज़रूरी हिस्सा नहीं हूं?

छुटकी       : कौन कहता है ज़रूरी हिस्सा नहीं हो? तुम्हारे बिना पाचन क्रिया पूरी नहीं होती. लेकिन खून में तुम्हारे लिए कोई जगह नहीं. अगर तुम खून में पहुंच गए तो नुकसान ही पहुंचाओगे. क्या तुम चाहते हो कि तुम्हारी वजह से शरीर बीमार पड़ जाय.

अपोषक    : नहीं नहीं मैं नहीं चाहता कि मेरी वजह से किसी को तकलीफ हो. मुझे बिछुड़ना  मंज़ूर है पर बदनामी नहीं.

(पोषक से) विदा दोस्त. हमारी जुदाई का समय आ गया है. तुम इन सैनिकों के साथ लाल सागर के सफ़र में निकलो. मुझे हमेशा की तरह बड़की दीदी के पास जाना होगा.

पोषक        : विदा मेरे दोस्त.

(दोनों गले मिलते हैं और गाते हैं.)

ये दोस्ती हम नहीं छोड़ेंगे

तोड़ेंगे दम मगर तेरा साथ न छोड़ेंगे…2

ऐ मेरी जीत तेरी जीत, तेरी हार मेरी हार

सुन ऐ मेरे यार

तेरा ग़म मेरा ग़म, मेरी जान तेरी जान

ऐसा अपना प्यार

जान पे भी खेलेंगे तेरे लिए ले लेंगे

जान पे भी खेलेंगे तेरे लिए ले लेंगे

सब से दुश्मनी

ये दोस्ती…

छुटकी       : आओ पोषक, लाल सैनिक तुम्हें लेने पहुंच गए हैं.

लाल सैनिक पोषक को अपने कंधों पर उठा के ले जाते हैं. अपोषक आगे बढ़ता है और बड़की के दरवाजे पर पहुँच जाता है.

दृश्य-6: बड़ी आंत

अपोषक बड़ी आंत के दरवाजे पर खड़ा है. बड़ी आंत उसका स्वागत करती है.

बड़की        : आओ अपोषक. तुम्हारे बिना मेरा घर खाली-खाली लग रहा था. यह तुम्हारे हाथ में क्या है?

अपोषक    : ओह… ये तो पोषक का पानी है. विदाई के वक्त मैं उसे लौटाना भूल गया. अब क्या करूं? पानी के बिना वह लाल सागर का सफ़र कैसे करेगा?

बड़की        : फिक्र मत करो अपोषक. इस पानी को मुझे दे दो. मैं उसे पोषक के पास पहुंचा दूंगी.

अपोषक    : बहुत बहुत धन्यवाद बड़की दीदी. अब मैं निश्चिन्त होकर आगे जा सकता हूं.

बड़की        : ज़रूर जाओ मगर थोड़ा ध्यान से. आगे का रास्ता अंधेरा और बदबूदार है. अपने आसपास के पानी का ध्यान रखना. गन्दे पानी में जाना तुम्हारी सेहत के लिए ठीक नहीं.

अपोषक    : हां, पिछली बार गंदे पानी के कारण मुझे दस्त बनाना पड़ा था. बार-बार निकलने से मेरी हालत खस्ता हो गयी थी. अच्छा दीदी अब चलता हूं. नमस्ते.

दृश्य-7: मलाशय व मलद्वार

अपोषक आगे बढ़कर गोबर भंडारी के घर पहुंचता है. हट्टे-कट्टे अपोषक को देखकर गोबर खुश हो जाता है.

गोबर भंडारी          :        आओ अपोषक. इस बार तुम बड़ी अच्छी सेहत लेकर आये हो!

अपोषक    : माफ़ करना भंडारी जी, पिछली बार मैंने आपको मुसीबत में डाल दिया था. इस बार मैं गंदे पानी से दूर ही रहा हूं. कोई तकलीफ नहीं होगी आपको.

गोबर भंडारी          :        पानी से ज्यादा दूर भी मत चले जाना. तुम ज्यादा कड़क हो गए तब भी मेरी मुसीबत बढ़ जाएगी.

(लू का को आवाज देता है) अरे लू का! कहां मर गया? जल्दी से आ और अपोषक को बाहर धकेल.

सिकुड़ता-फैलता लू का दौड़ता हुआ आता है और अपोषक का हाथ पकड़ता है.

लू का        : ठीक से पांव जमाकर कूदना अपोषक भाई. वरना बाहर गिरते ही तुम्हारा कचूमर निकल जाएगा.

अपोषक    : धन्यवाद लू का. तुम मेरा कितना ख़याल रखते हो. मुझे हल्का सा धक्का तो दो ताकि मैं हवा में कूद सकूं.

लू का अपोषक को धक्का देता है. धक्का देते ही जोरदार धमाका होता है और अपोषक एक ढेर बनकर ज़मीन पर गिर जाता है.

सारे कलाकार मंच पर वापस आते हैं और पहला वाला कोरस फिर से गाते हैं.

भोजन खाने का नाम, खाते रहो सुबहो शाम… 2

के रस्ता कट जाएगा मितरा, पेट तेरा भर जाएगा मितरा

के भूखे रोना ना मितरा, के हर पल सोना ना मितरा

भोजन खाने का नाम, खाते रहो सुबहो शाम… 2

जो भोजन से हार मानता उसकी होगी छुट्टी

नाक चढ़ाकर कहे ज़िन्दगी तेरी मेरी हो गई कुट्टी  

कि भूखा यार मना मितरा

यार को डटके खिला मितरा

कि पेट को साफ़ करा मितरा

बदन को  हिला-डुला मितरा

भोजन खाने का नाम, खाते रहो सुबहो शाम… 2

पाचन के इस किस्से को तुम याद हमेशा रखना

बॉडी पर जो ख़तरा लाये उसको कभी न चखना

कि पानी साफ़ पिला मितरा

कि पानी खूब पिला मितरा

कि सबके हाथ धुला मितरा

समय पर खूब सुला मितरा

भोजन खाने का नाम, खाते रहो सुबहो शाम… 2

कछुए के कान : आशुतोष उपाध्‍याय

Ashutosh Upadhyayहमारे मोहल्ले में इस बार स्वतंत्रता दिवस के मौके पर मंचन के लिए बच्चों ने मुझसे नाटक की मांग की। कुछ मिला नहीं तो मैंने उर्दू के मशहूर व्यंग्यकार इब्ने इंशा द्वारा किये गए पंचतंत्र की कहानियों के पाठांतर पर हाथ आजमाने का प्रयास किया। खरगोश और कछुए की दौड़ की जानी-पहचानी कहानी का विरूपित संस्करण ‘कछुए के कान’ नाम से नाटक के रूप में पेश है। इस बच्चों के साथ किया जा सकता है। अगर आप इसका मंचन अपने साइंस सेंटर या किसी स्कूल में करते हैं तो अनुभव साझा करना न भूलें।– लेखक

दृश्य 1

मंच पर दो सूत्रधार प्रवेश करते हैंएक के हाथ में डफली है और दूसरा बाजा बजा रहा है

सूत्रधार-1 :    (डफली बजाते हुए) सुनो-सुनो-सुनो… बच्चा लोग सुनो और बड़ा लोग सुनो… आधे लोग सुनो और पूरे लोग सुनो… इधर से सुना अब उधर से सुनो…

सूत्रधार-2     : (शत्रुध्न सिन्हा की तरह) खामोश..! आपको सुनाते हैं एक कहानी! जिसे सुनाती थी हमारी नानी!!

लेकिन माफ करना भाइयो और बहनो, हमने की है थोड़ी मनमानी!!

सूत्रधार-1 :    ये है कछुए और खरगोश की कहानी… बड़ी पुरानी.. मगर जानी-पहचानी!

लेकिन आपने जो सुनी वो नकली थी… हम जो सुनाएंगे वो असली है.. 100% देसी घी जितनी!!

सूत्रधार-2 :    बड़ी पुरानी बात है। बहुत-बहुत पुरानी…. जब धरती में इंसान का राज नहीं था।

सूत्रधार-1 :    इंसान भी बाकी जानवरों के साथ जंगल में रहता था।

सूत्रधार-2 :    यह कहानी हमारे परदादा के परदादा के परदादा परदादा…

सूत्रधार-1 :    इतने परदादा कि बोलते-बोलते सुबह हो जाय… तो उस परदादा ने अपने परदादा से सुनी थी।

सूत्रधार-2 :    और उसके पहले जाने कितने परदादाओं ने सुनी और सुनाई थी।

दर्शक    : अबे कहानी सुनाओगे या परदादाओं का हिसाब-किताब करते रहोगे?

दोनों सूत्रधार :  खामोश….! (मुस्कराकर) सुनाते हैं भाई, सुनाते हैं।

सूत्रधार-1 :    एक जंगल में दो दोस्त रहते थे। पहला खरगोश और दूसरा कछुआ। आपको तो पता ही है?

सूत्रधार-2 :    दोनों में एक बार रेस हुई। दौड़ाक खरगोश काफी आगे निकल गया। कछुए की चाल देख उसने सोचा क्यों न थोड़ा सुस्ता लूं। और जब वह रास्ते में बैठा तो उसे नींद आ गई। वैसे आप इस किस्से को जानते ही हैं!

सूत्रधार-1 :    कछुआ धीरे-धीरे लगातार चलता रहा। रास्ते में उसने खरगोश को सोते हुए देखा। मगर उसे उठाया नहीं, बस चुपचाप चलता रहा और आखिर में रेस जीत गया। आप कहोगे ये कहानी तो सुनी-सुनाई है। नहीं जनाब हमारी कहानी तो अब शुरू होती है।

सूत्रधार-2 :    दौड़ में हार जाने से खरगोशों की इज्ज़त पर दाग़ लग गया। उनके बच्चे इस दाग़ को धोने के सपने देखते थे। फिर बच्चों के बच्चों ने यह सपना देखा। आखिर वह दिन आया, जब खरगोशों को इस दाग़ से छुटकारा मिल गया।

दृश्य 2

मंच में एक खरगोश और एक कछुआ अलसाए से बैठे हुए हैं उनके चेहरे पर बोरियत छाई हुई है

खरगोश : कच्छप दादा, कुछ मजा नहीं आ रहा। अजी बोर हो रहे हैं। चल कोई गेम खेलते हैं।

कुछ टैम कटे, कुछ बोझ घटे। कड़वी यादों से कुछ ध्यान हटे।

कछुआ   :    देखो हमको फिर से दौड़ने को मत बोलना। भूल तो नहीं गए? हमारे दादाजी, तुम्हारे दादाजी को हराए थे! बोलो हराए कि नहीं? तुम खरगोश दौड़ते तेज हो मगर हम कछुओं की खोपड़ी ज्यादा तेज दौड़ती है।

खरगोश : ठीक है ठीक है। ज्यादा स्याणा मत बन। बड़ा आया टोकड़िया में खोपड़िया देने वाला! एक बार फिर क्यों नहीं दौड़ लेता? मिल्क का मिल्क और वाटर का वाटर हो जाएगा।

कछुआ  : लगता है अपनी बेजती खराब किए बिना मानोगे नहीं। चलो दौड़ लेते हैं.. मगर इस बार शरत लगानी पड़ेगी।

खरगोश :    कैसी शर्त?

कछुआ   :    जो जीतेगा, वो हारने वाले के कान काट लेगा। (अपने आप सेइस बार हम इसके लंबेलंबे कान अपनी बैठक में सजाएंगे बेटा ऐसी सुस्ती फैलाएंगे कि जन्नत में बैठे तुम्हारे दादाजी भी खर्राटे लेने लगेंगे)

खरगोश : मंज़ूर है। (अपने आप सेकछुए के बच्चे! तेरे कान तो गए इस बार मैं नींद उड़ाने वाली बूटी खाकर दौडूंगा!).

दृश्य 3

खरगोश और कछुआ दौड़ की लाइन पर खड़े हैं एक आदमी उन्हें दौड़ाने की तैयारी कर रहा है

आदमी के हाथ में एक बड़ा सा चाकू है

आदमी   :    भाइयो और बहनो! आपको यह जानकार खुशी होगी, आपके जंगल में, खरगोश और कछुए की मशहूर दौड़, फिर से होने जा रही है। वही दौड़ जिसके किस्से आपने बचपन में सुने थे। लेकिन अबकी बार, इस दौड़ में एक शर्त जोड़ दी गई है। जो जीतेगा, वो हारने वाले के कान काट कर अपने घर ले जाएगा।

तो श्रीमान खरगोश और कछुआ… अपनी-अपनी जगह पर पहुंचो। और दौड़ने के लिए तैयार हो जाओ.. ओके?

रेडी… वन… टू… थ्री… गो…!

दोनों दौड़ते हैं लेकिन इस बार खरगोश बिना पीछे देखे दौड़ता रहता है और जल्दी ही मंज़िल पर पहुंच जाता है

मंज़िल पर आदमी दोनों का इंतज़ार कर रहा है

खरगोश : हुर्रे! इंसान चाचा, मैं जीत गया। मैंने खरगोशों का इतिहास बदल दिया। आप अपना चाकू तेज कर लो, कछुआ आता ही होगा। उसके कान लक्कड़ में टांगकर अपनी बैठक में सजाऊंगा।

आदमी और खरगोश कछुए की राह देखते हैं लेकिन उसका दूरदूर तक पता नहीं है दोनों थककर सो जाते हैं

दृश्य 4

मंज़िल पर एक नया आदमी और खरगोश बैठे हैं तभी दूर से कछुआ आता दिखाई पड़ता है

दोनों चौकन्ने हो जाते हैं

कछुआ   :    (बूढ़ों की आवाज में) अरे बच्चो, सुनो तो… तुमने एक आदमी या खरगोश को यहां देखा था?

दोनों     : अंधे हो क्या? क्या हम आदमी और खरगोश नहीं लगते?

कछुआ   :    माफ करना! हम आप दोनों की बात नहीं कर रहे। वे दोनों हमारे पुराने दोस्त हैं।

आदमी  : कछुआ अंकल, वो तो हमारे दादाजी थे। आपका इन्तजार करते-करते दोनों मर गए।

खरगोश :    उनके मरने की बाद हमारे डैडी यहां बैठे-बैठे बुढ़ा गए।

आदमी : मरते वक्त उन्होंने हम दोनों को यहां बिठाया और कहा कि कछुआ आए तो उसके कान काट लेना।

खरगोश : हम यहां तुम्हारे कान काटने के लिए बैठे हैं। लाओ अपने कान बाहर निकालो।

कछुआ   :    अरे नहीं! हम अपने कान नहीं कटवाएंगे…!

आदमी आगे बढ़कर कछुए के कान काटने की कोशिश करता है

कछुआ अपने कान छुपाता है और अपने कवच में जा छुपता है

आदमी   :    अरे ये तो अपने कवच में छुप गया। (कछुए की पीठ ठोकता है) सुनो कच्छप महाराज! बाहर निकलो। हम तीन पीढ़ियों से तुम्हारे कानों की राह देख रहे हैं।

खरगोश : जाने दो चाचा, वर्ना इसके इन्तजार में हमारी ज़िंदगी भी यहीं बीत जाएगी।

आदमी सहमति में सर हिलाता है मंच पर सारे पात्र आते हैं कछुआ कवच में छुपा वहीं पड़ा रहता है

सारे पात्र :    अब पता चला कछुए अपने कान क्यों नहीं दिखाते! क्या आपने देखे हैं कछुए के कान?