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ओ! फिर से जीना : महाश्‍वेता देवी

महाश्‍वेता देवी

महाश्‍वेता देवी

24 जनवरी को जयपुर साहित्योत्सव-2013 के शुभारम्भ पर प्रसिद्ध लेखिका महाश्‍वेता देवी का दिया उद्घाटन संभाषण-

शब्द। मैं नहीं जानती कि कहाँ से। एक लेखिका जो वेदना में है? शायद, इस अवस्था में पुनः जीने की इच्छा एक शरारतभरी इच्छा है। अपने नब्बेवें वर्ष से बस थोड़ी ही दूर पहुँचकर मुझे मानना पड़ेगा कि यह इच्छा एक सन्तुष्टि देती है, एक गाना है न  ‘आश्चर्य के जाल से तितलियाँ पकड़ना’। इसके अतिरिक्त उस ‘नुकसान’ पर नजर दौड़ाइए जो मैं आशा से अधिक जीकर पहुँचा चुकी हूँ।

अट्ठासी या सत्तासी साल की अवस्था में मैं प्रायः छायाओं में लौटते हुए आगे बढ़ती हूँ। कभी-कभी मुझ में इतना साहस भी होता है कि फिर से प्रकाश में चली जाऊँ। जब मैं युवती थी, एक माँ थी, तब मैं प्रायः अपनी वृद्धावस्था में चली जाती थी। अपने बेटे को यह बहाना करते हुए बहलाती थी कि मुझे कुछ सुनाई या दिखाई नहीं दे रहा है। अपने हाथों से वैसे टटोलती थी, जैसा अन्धों के खेल में होता है या याददाश्त का मजाक उड़ाती थी। महत्त्वपूर्ण बातें भूल जाना, वे बातें जो एक ही क्षण पहले घटी थीं। ये खेल मजेदार थे। लेकिन अब ये मजेदार नहीं हैं। मेरा जीवन आगे बढ़ चुका है और अपने को दुहरा रहा है। मैं स्वयं को दुहरा रही हूँ। जो हो चुका है, उसे आपके लिए फिर से याद कर रही हूँ। जो है, जो हो सकता था, हुआ होगा।

अब स्मृति की बारी है कि वह मेरी खिल्ली उड़ाए।

मेरी मुलाकात कई लेखकों, मेरी कहानियों के चरित्रों, उन लोगों के प्रेतों से होती है जिन्हें मैंने ‘जिया’ है, प्यार किया है और खोया है। कभी-कभी मुझे लगता है कि मैं एक ऐसा पुराना घर हूँ जो अपने वासियों की बातचीत का सहभागी है। लेकिन हमेशा यह कोई वरदान जैसा नहीं होता है! लेकिन ‘यदि कोई व्यक्ति अपनी शक्ति के अन्त पर पहुँच जाए तब क्या होगा’? शक्ति का अन्त कोई पूर्णविराम नहीं है। न ही यह वह अन्तिम पड़ाव है जहाँ आप की यात्रा समाप्त होती है। यह केवल धीमा पड़ना है, जीवनशक्ति का ह्रास। वह सोच जिस से मैंने प्रारम्भ किया था वह है ‘आप अकेले हैं ’।

उस परिवेश से जहाँ से मैं आयी हूँ, मेरा ऐसा बन जाना अप्रत्याशित था। मैं घर में सब से बड़ी थी। मैं नहीं जानती कि आप के भी वही अनुभव हैं कि नहीं, लेकिन उस समय प्रत्येक स्त्री का पहला यौन अनुभव परिवार से ही आता था। और युवावस्था से ही मुझ में प्रबल शारीरिक आकर्षण था, मैं इसे जानती थी, इसे अनुभव करती थी और ऐसा ही मुझे कहा गया था। उस समय हम सभी टैगोर से काफी प्रभावित थे। शांतिनिकेतन में थी, प्रेम में पड़ी, जो कुछ भी किया बड़े उत्साह से किया। तेरह से अठारह वर्ष की अवस्था तक मैं अपने एक दूर के भाई से बहुत प्रेम करती थी। उसके परिवार में आत्मघात की प्रवृत्ति थी, और उसने भी आत्महत्या कर ली। सभी मुझे दोष देने लगे, कहने लगे कि वह मुझे प्यार करता था और मुझे न पा सका इसीलिये उसने आत्मघात कर लिया। यह सही नहीं था। उस समय तक मैं कम्युनिस्ट पार्टी के निकट आ चुकी थी, और सोचती थी कि ऐसी छोटी अवस्था में यह कितना घटिया काम था। मुझे लगता था कि उसने ऐसा क्यों किया। मैं टूट गयी थी। पूरा परिवार मुझे दोष देता था। जब मैं सोलह साल की हुई, तभी से मेरे माता-पिता विशेषकर मेरे सम्बन्धी मुझे कोसते थे कि इस लड़की का क्या किया जाए। यह इतना ज्यादा बाहर घूमती है, अपने शारीरिक आकर्षण को नहीं समझती है। तब इसे बुरा समझा जाता था।

मध्यवर्गीय नैतिकता से मुझे घृणा है। यह कितना बड़ा पाखंड है। सब कुछ दबा रहता है।

लेखन मेरा वास्तविक संसार हो गया, वह संसार जिस में मैं जीती थी और संघर्ष करती थी। समग्रतः।

मेरी लेखन प्रक्रिया पूरी तरह बिखरी हुई है। लिखने से पहले मैं बहुत सोचती हूँ, विचार करती हूँ, जब तक कि मेरे मस्तिष्‍क में एक स्पष्ट प्रारूप न बन जाए। जो कुछ मेरे लिए जरूरी है वह पहले करती हूँ। लोगों से बात करती हूँ, पता लगाती हूँ। तब मैं इसे फैलाना आरम्भ करती हूँ। इसके बाद मुझे कोई कठिनाई नहीं होती है, कहानी मेरी पकड़ में आ चुकी होती है। जब मैं लिखती हूँ, मेरा सारा पढ़ा हुआ, स्मृति, प्रत्यक्ष अनुभव, संगृहीत जानकारियाँ सभी इसमें आ जाते हैं।

जहाँ भी मैं जाती हूँ, मैं चीजों को लिख लेती हूँ। मन जगा रहता है पर मैं भूल भी जाती हूँ। मैं वस्तुतः जीवन से बहुत खुश हूँ। मैं किसी के प्रति देनदार नहीं हूँ, मैं समाज के नियमों का पालन नहीं करती, मैं जो चाहती हूँ करती हूँ, जहाँ चाहती हूँ जाती हूँ, जो चाहती हूँ लिखती हूँ।

वह हवा जिस में मैं साँस लेती है, शब्दों से भरी हुई है। जैसे कि पर्णनर। पलाश के पत्तों से बना हुआ। इस का सम्बन्ध एक विचित्र प्रथा से है। मान लीजिए कि एक आदमी गाड़ी की दुर्घटना में मर गया है। उसका शरीर घर नहीं लाया जा सका है। तब उसके सम्बन्धी पुआल या किसी दूसरी चीज से आदमी बनाते हैं। मैं जिस जगह की बात कर रही हूँ, वह पलाश से भरी हुई है। इसलिए वे इसके पत्तों का उपयोग करते हैं एक आदमी बनाने के लिए।

पाप पुरुष। लोक विश्वास की उपज। शाश्वत जीवन के लिए नियुक्त। वह दूसरे लोगों के पापों पर नजर रखता है। वह कभी प्रकट होता है, कभी नहीं। उसने स्वयं पाप नहीं किया है। वह अन्य सभी के अतिचारों का लेखा-जोखा रखता है। उनके पापों का। अनवरत। और इसीलिए वह धरती पर आता है। छोटी-से-छोटी बातों को लिपिबद्ध करते हुए। एक बकरा। दण्डित। दहकते सूरज के नीचे अपने खूँटे से बँधा हुआ। पानी या छाया तक पहुँचने में असमर्थ। तब पाप पुरुष बोलता है, ‘यह एक पाप है। तुम ने जो किया है वह गलत है। तुइ जा कोरली ता पाप।’

वस्तुतः यह एक मनुष्य नहीं है। केवल एक विचार की अभिव्यक्ति है।

यह एक दण्ड हो सकता है। उसने कोई भीषण अपराध किया होगा। शे होयतो कोनो पाप कोरेछिलो। कोई अक्षम्य पाप। और अब वह कल्पान्त तक पाप पुरुष बनने के लिए अभिशप्त है। वस्तुतः केवल एक ही पाप पुरुष नहीं है, कई हैं। उसी तरह जैसे कि इस कथा को मानने वाले प्रदेश भी कई हैं।

इससे भी सुन्दर कई शब्द हैं। बंगाली शब्द। चोरट अर्थात् तख्ता। और फिर डाक संक्रान्ति। इसका सम्बन्ध चैत्र संक्रान्ति से है। डाक माने डेके डेके जाय। जो आत्माएँ अत्यन्त जागरूक और चैतन्य हैं, वे ही इस पुकार को सुन सकती हैं। पुराने साल की पुकार, जो जा रहा है, प्रश्‍न करते हुए। पुराना साल आज समाप्त हो रहा है। और नया साल कल प्रारम्भ हो रहा है। क्या है जो तुम ने नहीं किया है ? क्या है, जो अभी तुम्हें करना है ? उसे अभी पूरा कर दो।

गर्भदान। यह बड़ा रोचक है। एक स्त्री गर्भवती है। कोई उसे वचन देता है कि यदि बेटी का जन्म होता है, उसे यह-वह मिलेगा। यदि बेटा होता है तो कुछ और मिलेगा। गर्भ थाकते देन कोरछे। दान हो चुका है जब कि बच्चा अभी गर्भ में ही है। इस कथा का कहना है कि अजात शिशु इस वचन को सुन सकता है, इसे याद कर सकता है, और इसे अपनी स्मृति में सहेज सकता है। बाद में वह शिशु उस व्यक्ति से उस वचन के बारे में उस गर्भदान के बारे में पूछ सकता है जो अभी हुआ नहीं है।

हमारा भारत बड़ा विचित्र है। उदाहरण के लिए महाराष्ट्र के परधी समुदाय को लें। एक विमुक्त समुदाय। चूँकि वे आदिवासी समुदाय हैं, बच्चियों की बड़ी माँग है। किसी गर्भवती स्त्री का पति आसानी से अजन्मे बच्चे की नीलामी करा सकता है या बेच सकता है। पेट की भाजी, पेटे जा आछे। जो अभी गर्भ में ही है। नीलाम कोरे दीछे। गर्भ के फल को नीलाम कर देता है।

नरक के कई नाम हैं। नरकेर अनेक गुलो नाम आछे। एक नाम जो मुझे विशेष पसन्द है, वह है ओशि पत्र वन। नरक के कई प्रकार हैं। ओशि का अर्थ तलवार है। और पत्र अर्थात एक पौधा जिस के तलवार सरीखे पत्ते हों। ऐसे पौधों से भरा हुआ जंगल। और आप की आत्मा को इस जंगल से गुजरना होता है। तलवार सरीखे पत्ते उस में बिंध जाते हैं। आखिर आप नरक में अपने पापों के कारण ही तो हैं। इसलिए आप की आत्मा को इस कष्ट को सहना ही है।

जब भी मुझे कोई रोचक शब्द मिलता है, मैं उसे लिख लेती हूँ। ये सारी कापियाँ, कोटो कथा। इतने सारे शब्द, इतनी सारी ध्वनियाँ। जब भी उन से मिलती हूँ, मैं उन्हें बटोर लेती हूँ।

अन्त में मैं उस विचार के बारे में बताऊँगी जिस पर मैं आराम से समय मिलने पर लिखूँगी। मैं अरसे से इस पर सोचती रही हूँ। वैश्‍वीकरण को रोकने का एक ही मार्ग है। किसी जगह पर जमीन का एक टुकड़ा है। उसे घास से पूरी तरह ढँक जाने दें। और उस पर केवल एक पेड़ लगाइए, भले ही वह जंगली पेड़ हो। अपने बच्चे की तिपहिया साइकिल वहाँ छोड़ दीजिए। किसी गरीब बच्चे को वहाँ आकर उस से खेलने दीजिए, किसी चिड़िया को उस पेड़ पर रहने दीजिए। छोटी बातें, छोटे सपने। आखिर आप के भी तो अपने छोटे-छोटे सपने हैं।

कहीं पर मैं ने ‘दमितों की संस्कृति’ पर लिखने का दावा किया है। यह दावा कितना बड़ा या छोटा, सच्चा या झूठा है ? जितना अधिक मैं सोचती और लिखती हूँ, किसी निष्कर्ष पर पहुँचना उतना ही कठिन होता जाता है। मैं झिझकती हूँ, हिचकिचाती हूँ। मैं इस विश्‍वास पर अडिग हूँ कि समय के पार जीनेवाली हमारे जैसी किसी प्राचीन संस्कृतिके लिये एक ही स्वीकार्य मौलिक विश्‍वास हो सकता है वह है सहृदयता। सम्मान के साथ मनुष्य की तरह जीने के सभी के अधिकार को स्वीकार करना।

लोगों के पास देखनेवाली आँखें नहीं हैं। अपने पूरे जीवन में मैंने छोटे लोगों और उनके छोटे सपनों को ही देखा है। मुझे लगता है कि वे अपने सारे सपनों को तालों में बन्द कर देना चाहते थे, लेकिन किसी तरह कुछ सपने बच गये। कुछ सपने मुक्त हो गये। जैसे गाड़ी को देखती दुर्गा (पाथेर पांचाली उपन्यास में), एक बूढ़ी औरत, जो नींद के लिए तरसती है, एक बूढ़ा आदमी जो किसी तरह अपनी पेंशन पा सका। जंगल से बेदखल किये गये लोग, वे कहाँ जाएँगे। साधारण आदमी और उनके छोटे-छोटे सपने। जैसे कि नक्सली। उन का अपराध यही था कि उन्होंने सपने देखने का साहस किया। उन्हें सपने देखने की भी अनुमति क्यों नहीं है?

जैसा कि मैं सालों से बार-बार कहती आ रही हूँ, सपने देखने का अधिकार पहला मौलिक अधिकार होना चाहिए। हाँ, सपने देखने का अधिकार।

यही मेरी लड़ाई है, मेरा स्वप्न है। मेरे जीवन और मेरे साहित्य में।

मैं और मेरा लेखन : बालशौरि रेड्डी

अपने रचनाकर्म के बारे में बता रहे हिंदी और तेलुगु के बीच सेतु का काम करने वाले वरिष्‍ठ लेखक बालशौरि रेड्डी

मैं अपने गत बीस वर्ष की साहित्यिक सर्जनात्मक प्रक्रिया पर विचार करता हूँ, तो मेरे समक्ष कई मर्मस्पर्शी प्रसंगों का स्मरण ताज़ा हो उठता है। वे स्मरण मुझे पुलकित कर देते हैं।

बीस वर्ष का समय किसी भी लेखक के जीवन में कम महत्व का नहीं होता। यौवन के प्रांगण में पग धरते मैंने कुतूहल, जिज्ञासा और आश्‍चर्यजनक प्रकृति का निरीक्षण किया। प्रकृति के अनुपम सौन्दर्य के अवलोकन से मेरा हृदय संभ्रम एवम् हर्षातिरेक से भर उठा और उस वक्‍त मेरे हृदय में जो स्पन्दनशीलता हुई उसके कारण अनुभूतियाँ बहिर्गत होने को मचल उठीं। फलतः सर्जनात्मक प्रक्रिया साकार हो गई।

मैंने 1948 में लिखना शुरू किया। मेरी पहली रचना हिन्दी में प्रकाशित हुई।

प्रारम्भ में मेरी रुचि निबन्ध लिखने की रही। किसी विषय-विशेष से मैं प्रभावित होता अथवा तत्सम्बन्धी सम्यक्-ज्ञान प्राप्त करता, तभी मैं उस विषय के सम्बन्ध में अपने मन्तव्य व्यक्त करने के लिए लेखनी उठाता।

परिचयात्मक और ज्ञानवर्धक लेख मेरे काफी प्रकाशित हुए। प्रायः उन दिनों में जो भी मेरी रचनाएँ पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं, उनका विषय प्रधानतः सामयिक रहा। यद्यपि सामयिक घटनाओं के परिवेश में मैंने स्थायित्व का स्पर्श करने का अवश्य प्रयत्न किया है, इस कार्य में मुझे कहाँ तक सफलता प्राप्त हुई, कह नहीं सकता, परन्तु इससे मुझे आत्म-सन्तोष अवश्य प्राप्त हुआ है। यही मेरे लिए उस समय सबसे बड़ी उपलब्धि थी।

आत्म-प्रकाशन की जो मूल-प्रवृत्ति या सहज-वृत्ति स्वभावगत होती है उसी से मुझे लिखने की प्रेरणा मिली।

वैसे मेरी प्रेरणा के अनेक स्रोत हैं। मैं कह नहीं सकता, अभिव्यक्‍त‍ि की राह में किस स्रोत का प्राधान्य रहा, किन्तु इतना सत्य है कि विन्ध्याचल समीपवर्तिनी प्रकृति ने मेरे हृदय को आवश्यकता से अधिक अभिभूत किया, परिणामस्वरूप निसर्ग की उस अपूर्व सुषमा की अर्चना करते मेरी अनुभूतियाँ अभिव्यक्‍त होने को तड़प उठीं।

प्रकृति और हृदय के बीच में जो सौन्दर्य का सेतु बन गया, वह आदान-प्रदान का, आराधन-अर्चन का मार्ग प्रशस्त कर गया। हृदय का सुमन खिल उठा, अनुभूति रूपी भ्रमर गुंजार करने लगे। इस प्रकार नीरवता में निसर्ग संगीत की लहरी शून्य को ध्वनि प्रकम्पित करने लगी।

हृदयस्थ बालकवि गुनगुना उठा। तुकबन्दी हुई। उस कविता पर उछल पड़ा, उसे बार-बार पढ़ा, गुनगुनाया, उसे हृदय से लगाया।

मुझे लगा-आज नहीं तो कल, सफलता का द्वार अपने आप खुल जाएगा। गतिशील हूँ, लक्ष्य दूर नहीं है, किन्तु जब मैं मूर्धन्य कलाकारों की कृतियों का अध्ययन करता और अपनी अनुभूतियों के साथ मिलान करके देखता तो मुझे प्रतीत होता कि मेरी भावात्मक पूँजी अत्यल्प है और मैं उन महाकवियों के समक्ष निर्धन हूँ।

क्रमशः मुझे विदित हुआ कि मैं जिस रूप में अपने को अभिव्यक्‍त करना चाहता हूँ, कर नहीं पाता हूँ। यद्यपि दो-तीन मित्रों ने जो साहित्यिक हैं, मेरी कविता की प्रशंसा की, उत्साहवर्द्धक वचन कहे, लेकिन मुझे सन्तोष नहीं हुआ। मेरे मन के भीतर-ही-भीतर असन्तोष की आग सुलग रही थी। मैंने सोचा, यदि मैं इस असन्तोष को इसी प्रकार पालता रहूँ, तो एक दिन अवश्य पागल हो जाऊँगा। इसी संशयात्मा को लेकर मैं अपने आचार्य पण्डित गंगाधर जी मिश्र की सेवा में पहुँचा और उनसे अपनी आत्मग्लानि की बात बतायी। पण्डित जी ने बड़ी सहानुभूति, सहृदयता और वात्सल्य-भाव से मुझे समझाया-‘रेड्डी जी, मैं सच्ची बात कहूँगा, तुम निराश न होना। क्योंकि मैं तुम्हारा हित चाहता हूँ और तुम्हारी प्रतिभा से भी परिचित हूँ, इसीलिए मैं तुमको ग़लत राह पर छोड़ना नहीं चाहता। सत्य तो यह है कि जितना अच्छा गद्य लिख सकते हो, उतनी अच्छी कविता नहीं। मेरा अनुभव यह बताता है कि गद्य के प्रति तुम्हारी स्वाभाविक जो अभिरुचि है, जो झुकाव है, जो लगन है, वह कविता के प्रति चाहते हुए भी नहीं हो सकती। तुम जो अभिरुचि दिखाते हो या दिखाने की चेष्टा करते हो अथवा दिखाना चाहते हो वह कृत्रिम है। अतः तुम्हारे हितैषी के नाते मेरी यह सलाह है, तुम समय और सन्दर्भ के अनुरूप गद्य की विभिन्न विधाओं पर कलम चलाओ, अवश्य तुम्हें सफलता मिलेगी।’

पण्डित जी का यह सुझाव मेरी भावी साहित्यिक सर्जनात्मक यात्रा का पाथेय बना और सम्बल बना।

मैंने निबन्ध लिखना शुरू किया- उत्साह और अहम् के प्रकटीकरण के हेतु। मेरे उत्साह को उत्साहित किया श्री काशीनाथ उपाध्याय ‘भ्रमर’ तथा श्री कमलापति त्रिपाठी ने।

मेरी पहली रचना ‘ग्राम संसार’ में छपी। जिस दिन रचना छपी उस दिन मेरे अन्तर में ऐसा ज्वार उठा जिसने मुझे इतना प्रभावित किया कि मेरी रचना का कार्य निरन्तर गतिमान रहा। मैंने अपनी रचना को चार-पाँच बार पढ़ा, जो कोई सामने आया उस को दिखाया, सलाह एवं सुझाव माँगा।

युगाराध्य सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ ने मुझे अच्छे सुझाव दिये। मैं वाराणसी में गाय घट पर जहाँ रहता था, निराला जी भी आचार्य गंगाधर मिश्र जी के साथ वहीं रहते थे। निराला जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व का भी मुझ पर ऐसा प्रभाव पड़ा कि मैं उनसे प्रेरणा ग्रहण कर लिखता गया।

वाराणसी में रहते मैंने लिखा अत्यल्प, परन्तु अध्ययन अधिक किया। विभिन्न प्रकार की शैलियों से परिचित होता गया और अपनी प्रिय विधाओं के सूक्ष्म निरीक्षण में प्रवृत होता गया। उस प्रकार परोक्ष रूप में मेरे भीतर का लेखक बन रहा था।

कोई भी व्यक्‍त‍ि एकाध दिन में लेखक नहीं बन बैठता। यद्यपि सृजानात्मक प्रवृत्ति अभिव्यक्ति की राह ढूंढ़ती रहती है, तथापि अनुभूतियों के परिपक्व होने पर ही वे स्पष्ट रूप से बहिर्गत होती हैं। अध्ययन, सामाजिक अनुभव, चिन्तन-मनन, पर्यटन इत्यादि विचारों में गहनता, व्यापकता और सम्पन्नता लाते हैं।

मद्रास में साहित्य विभाग में कार्य करते विभिन्न विषयों के संकलन तैयार करने, लेख लिखने, भूमिका तथा टिप्पणियाँ लिखने में अच्छा अनुभव प्राप्त हुआ।

प्रारम्भ में कतिपय प्रमुख पत्रों में मैंने अपनी इच्छा से रचनाएँ भेजीं और वे प्रकाशित भी हुईं। तत्पश्‍चात् विविध पत्र-पत्रिकाओं के सम्पादकों ने रचनाएँ माँगते मेरा आह्वान किया, यथायोग्य पारिश्रमिक भी दिया। यहाँ से मेरा लेखन-व्यवसाय कुछ योजनाबद्ध हो गया। प्रतिदिन नियमित रूप से कुछ न कुछ लिखता गया, साथ ही साथ अध्ययन भी चालू रहा।

मैंने विभिन्न विषयों पर समीक्षात्मक लेख लिखे। उनका हिन्दी-जगत में अच्छा स्वागत भी हुआ। सम्पादक और पाठकों ने भी प्रशस्ति के पत्र भेजे। मैं कुछ और सँभल कर लिखने लगा।

रचना की मेरी दूसरी प्रक्रिया अनुवाद की रही है। मैंने कभी अपनी इच्छा से कोई अनुवाद नहीं किया। प्रायः मेरे सभी अनुवाद सम्पादकों की माँग पर ही किये गए हैं।

मेरे लेखन कार्य में अनुवाद की भी अच्छी परम्परा रही है और आज तक मैंने तेलुगु से हिन्दी में ढाई हजार पृष्ठों से अधिक अनुवाद किया है।

मेरी सर्जनात्मक रचनाएँ विविध रूपों में आई हैं। उनमें निबन्ध, उपन्यास, एकांकी, कहानी, जीवनियाँ, साहित्य, इतिहास, रेडिया-वार्ता, भाषण और अनुवाद मुख्य हैं।

पुस्तक रूप में प्रकाशित मेरी पहली कृति ‘पंचामृत’ है। इसके लेखन की प्रेरणा और योजना के सूत्रधार पण्डित श्रीराम शर्मा है। मुझसे सर्वथा अपरिचित होते हुए भी उपर्युक्‍त पुस्तक के लेखन का कार्य मुझे सौंपा और मैंने बड़ी ही निष्ठा और ईमानदारी से यह कार्य तीन महीने के अन्दर पूरा किया।

‘पंचामृत’ में तेलुगु के पाँच युग-प्रवर्तक कवियों के कृतित्व एवम् व्यक्तित्व पर विश्‍लेषणात्मक समीक्षा के साथ उनकी कृतियों के प्रमुख अंशों का हिन्दी रूपान्तर भी प्रस्तुत हुआ है। प्रारम्भ में तेलुगु साहित्य की धारा का संक्षिप्त परिचय तथा छन्द, अलंकार आदि का विवेचन भी हुआ है। अन्त में शब्दार्थ भी परिशिष्ट के रूप में जोड़ दिये गए हैं।

हिन्दी की प्रमुख पत्रिकाओं में इसकी अच्छी समीक्षा हुई। उद्भट विद्वानों की प्रशंसा प्राप्त हुई। यह कृति सन् 1954 में प्रकाशित हुई और 1956 में भारत सरकार के शिक्षा-मंत्रालय ने दो हजार रुपयों का पुरस्कार देकर इसे सम्मानित किया और उसी वर्ष उत्तर प्रदेश सरकार ने भी तीन सौ रुपये का पुरस्कार इसी ग्रन्थ के लिए प्रदान किया।

शासन द्वारा सम्मानित होने पर लेखक का दायित्व बढ़ गया। बड़ी जिम्मेदारी के साथ लिखने की आवश्यकता हुई।

पहली कृति के द्वारा मौलिक लेखन और अनुवाद-दोनों प्रक्रियाओं का सूत्रपात हुआ। ये दो धाराएँ समानान्तर होकर अबाध-गति से प्रवाहित होने लगीं।

उन धाराओं की पुष्टि ‘आन्ध्रभारती’ और ‘अटके आँसू’ कृतियों द्वारा हुई।

‘आन्ध्रभारती’ मेरे द्वारा समय-समय पर हिन्दी के विभिन्न पत्रों में प्रकाशित तेलुगु साहित्य सम्बन्धी विविध विधाओं पर प्रणीत गवेषणात्मक निबन्धों का संग्रह है। इसमें कुल बीस निबन्ध हैं। दो-चार तुलनात्मक भी हैं। यह ग्रन्थ सन् 1959 में कला निकेतन, पटना द्वारा प्रकाशित हुआ और 1960 में उ.प्र. शासन द्वारा पुरस्कृत हुआ। इसकी भूमिका हिन्दी के यशस्वी विद्वान् डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी तथा स्व. डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल ने लिखी। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने उस पर अच्छी सम्मति भेजकर लेखक को प्रोत्साहित किया था।

‘अटके आँसू’ तेलुगु की बारह उत्तम कहानियों का संग्रह है। विभिन्न लेखकों की ये कहानियाँ तेलुगु कहानी की प्रवृत्तियों और शैलियों का परिचय कराती हैं। इसकी भूमिका स्व. आचार्य शिवपूजन सहाय ने लिखी। उन्होंने मेरी पहली कृति ‘पंचामृत’ की समीक्षार्थ आई हुई देख, उसका बड़े प्रेम से अध्ययन ही नहीं किया अपितु उस पर ‘साहित्य’ में (अक्टूबर सन् 1955 के अंक में) सम्पादकीय भी लिखा था।

इन कृतियों के प्रकाशन के बाद लेखक को हिन्दी जगत से पर्याप्त प्रोत्साहन प्राप्त हुआ और साथ ही विभिन्न प्रकाशकों से पुस्तकों की माँग करते हुए कई पत्र भी मिले। उस समय से लेकर आज तक मेरी विविध विषयों पर अठारह पुस्तकें हिन्दी में प्रकाशित हुई हैं।

उनमें मौलिक और अनुवाद की संख्या समान कही जा सकती है।

अनुवादों में कहानी-संग्रहों की संख्या अधिक है। राष्ट्रभाषा-प्रचार समिति, वर्धा ने मेरी सोलह अनूदित कहानियों को ‘तेलुगु की उत्कृष्ट कहानियाँ’ नाम से प्रकाशित किया। ‘हिन्द पॉकेट बुक्स प्राइवेट लिमिटेड’, दिल्ली ने ‘तेलुगु की श्रेष्ठ कहानियाँ’ नाम से बारह कहानियाँ और आन्ध्र प्रदेश साहित्य अकादमी, हैदराबाद ने ‘तेलुगु की बीस कहानियाँ’ प्रकाशित कीं।

भारतीय ज्ञानपीठ, काशी से राष्ट्र-भारती ग्रन्थमाला के अन्तर्गत मेरे द्वारा अनूदित एकांकी संग्रह ‘नयी धरती’, ‘तेलुगु की प्रतिनिधि रचनाएँ’ नाम से प्रथम-पुष्प के रूप में प्रकाशित हैं। वह तेलुगु के विख्यात नाटककार, कवि एवम् निबन्ध लेखक श्री नाल वेंकटेश्‍वर राव, एम.पी. सम्पादक ‘दैनिक आन्ध्रज्योति’ के एकांकियों का अनुवाद ही है।

मद्रास उच्च न्यायालय के भूतपूर्व प्रधान न्यायाधीश श्री पी.वी. राजमन्नार के सुप्रसिद्ध सामाजिक नाटक ‘मनोरमा’ का हिन्दी रूपान्तरण किया जो ‘नेशनल पब्लिशिंग हाउस’ दिल्ली से प्रकाशित है।

तेलुगु के सुप्रसिद्ध कवि व लेखक श्री तोरि नरसिंह शास्त्री के ऐतिहासिक उपन्यास ‘रुद्रमा देवी’ का हिन्दी रूपान्तरण साहित्य अकादमी दिल्ली के लिए किया। अन्य मौलिक रचनाओं में ‘तेलुगु-साहित्य का इतिहास’ अपनी अलग विशिष्टता रखता है। मैंने गत दस-बारह वर्षों में तेलुगु साहित्य का जो अध्ययन एवम् अनुशीलन किया उसका सुन्दर फल यह ग्रन्थ है। साढ़े तीन सौ पृष्ठों में प्रकाशित यह ग्रन्थ हिन्द समिति, सूचना विभाग, उ.प्र. सरकार, लखनऊ द्वारा प्रकाशित है। इस ग्रन्थ के प्रणयन में मैंने जितना श्रम किया उतना शायद अन्य किसी ग्रन्थ के लिए नहीं किया।

ग्रन्थ के प्रारम्भ में मैंने तेलुगु प्रदेश का भौगोलिक स्वरूप प्रस्तुत किया है। तदुपरान्त आन्ध्र का वैदिककाल से लेकर भाषावार-प्रान्त रचना तक व इतिहास संक्षेप में दिया है। इसके बाद क्रमशः तेलुगु भाषा की प्रशस्ति, विकास का परिचय कराया है। इसके अनन्तर तेलुगु के समस्त साहित्य को छः युगों में विभाजित कर प्रत्येक युग की पृष्ठभूमि के साथ उस युगीन परिस्थितियों, कवियों तथा उनकी कृतियों का भी सम्यक् विवेचन किया है।

हिन्दी से भिन्न प्रवृत्तियों पर भी प्रकाश डालते हुए उन परम्पराओं का भी विश्‍लेषण कर गद्य और पद्य की विविध धाराओं का समग्र विकास संक्षिप्त में प्रस्तुत किया। यह ग्रन्थ तेलुगु और हिन्दी विद्वानों के द्वारा भी प्रशंसित है। इसकी भूमिका हिन्दी समिति के तत्कालीन सचिव श्री ठाकुर प्रसाद सिंह ने लिखी है। हिन्दी के महाकवि डॉ. रामधारी सिंह दिनकर ने आमुख लिखा है।

‘सत्य की खोज’ मेरे मौलिक बालकोपयोगी एकांकियों का संग्रह है। ‘आन्ध्र के महापुरुष’ और ‘तेलुगु की लोक-कथाएँ’ भी पर्याप्त लोकप्रिय हुई हैं।

इस समय मेरे लेखन की दिशा कथा-साहित्य की है।

उपन्यास लिखने की न मैंने कभी कल्पना की थी और न योजना ही बनायी थी। मैं इसे संयोग की ही संज्ञा दूँगा कि अचानक एक दिन राजपाल एण्ड सन्स, दिल्ली के अधिपति श्री विश्‍वनाथ मल्होत्रा जी से पत्र मिला कि मैं उन्हें एक उपन्यास लिख कर दूँ। पत्र पाते ही मैं चौकन्ना हो गया। सोचा कि लिख दूँ कि उपन्यास लिखना नहीं जानता हूँ। फिर मन में आया कि जब प्रकाशक यह विश्‍वास करते हैं कि मैं उपन्यास लिख सकता हूँ तो मुझे यह कहने का कोई अधिकार नहीं कि मैं नहीं लिख सकता।

वैसे मैंने हिन्दी के प्रायः सभी प्रमुख उपन्यासों का अध्ययन किया था, उनपर आलोचना पढ़ी थी, उपन्यास की कला की बारीकियों का सैद्धान्तिक ज्ञान भी रखता था। उपन्यास लिखने की रीति-नीतियों से परिचित था। फिर क्या था, मैं कथावस्तु का अन्वेषण करने लगा।

विचार करते-करते मेरे मस्तिष्क में यह बात आई कि शबरी का चरित्र जो रामायण में चित्रित है, उसकी पृष्ठभूमि तथा उस युगीन स्थितियों का उसमें वर्णन नहीं हुआ है। मुझे उन दिनों में तेलुगु के अनेक रामचरित सम्बन्धी काव्य ग्रन्थों का अनुशीलन करना पड़ा था। डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल ने राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त के अभिनन्दन ग्रन्थ के लिए ‘तेलुगु साहित्य में रामचरित’ शीर्षक पर एक निबन्ध लिख भेजने का आदेश दिया था। उस सन्दर्भ में शबरी के चरित्र से बहुत प्रभावित हुआ।

परिणामस्वरूप अध्यात्म रामायण तथा रामायण सम्बन्धी अनेक आलोचनाएँ और रामायणकालीन सांस्कृतिक एवं सामाजिक दशा का भी अध्ययन किया। शबर जाति से सम्बन्धित तेलुगु साहित्य में उपलब्ध ग्रन्थों के अवलोकन से मुझे विदित हुआ कि शबरी के जीवन के पूर्वी तथा परवर्ती सामाजिक परिवेश में एक कल्पनात्मक सुन्दर औपन्यासिक कृति प्रस्तुत की जा सकती है।

मैंने स्थानीय कॉलेज के एक प्राध्यापक को बुलाया। उन्होंने मुझे यह आश्‍वासन दिया कि आप बोलते जाइये, मैं लिखता जाऊँगा। मैंने उपन्यास की परिकल्पना कथावस्तु की रूपरेखा दस पृष्ठों में तैयार की। सुबह और शाम बोलता गया। तेईस दिनों में उपन्यास तैयार हुआ। मैंने पाण्डुलिपि को आद्यन्त एक बार पढ़ा। आवश्यक सुधार, काट-छांट करके टाइप के लिए दिया। टाइप की हुई एक प्रति प्रकाशनार्थ भेज दी।

‘शबरी’ पाठकों के हाथों में पहुँची। हिन्दी जगत् ने अच्छा स्वागत किया। देखते-देखते दो संस्करण निकल गए।

सुप्रसिद्ध कथाकार श्री आरिगपूड़ि ने ‘दक्षिण भारत’ (जनवरी 1960) में ‘शबरी’ की समीक्षा करते लिखा-‘शबरी’-जैसा कि नाम सूचित करता है, रामायण की पृष्ठभूमि में लिखा गया है, पर यह रामायण की एक भिन्न शैली व माध्यम में पुनरावृत्ति नहीं है। यह मौलिक है- कथावस्तु में और कथाशैली में भी। उपन्यासकार ने कल्पना की लम्बी और ऊँची उड़ान ली है, पर यथार्थता का साथ नहीं छोड़ा। शैली विषयोचित हैं। इसमें गम्भीरता है, गति है।

यह श्री रेड्डी का उपन्यास-क्षेत्र में प्रथम प्रयास है, पर इसमें प्रथम प्रयास की कदाचित् कोई त्रुटियाँ हों। विचारों की गम्भीरता है ही, अभिव्यक्ति की कला में भी वे सिद्धहस्त हैं।’

यह उपन्यास इस समय हिन्दी प्रचार सभा, मद्रास की विशारद परीक्षा की पाठ्य पुस्तक है।

राजपाल एण्ड सन्स ने मुझसे एक और उपन्यास माँगा। इस बार मैंने ‘जिन्दगी की राह’ लिखा। इस उपन्यास के कारण ही मुझे विशेष ख्याति मिली। भारत सरकार के शिक्षा-मन्त्रालय ने 1966 में पन्द्रह सौ रुपये का पुरस्कार देकर मेरा उत्साहवर्धन किया। इसके भी तीन-चार संस्करण निकल गए। और इस समय श्री वेंकटेश्‍वर विश्‍वविद्यालय, तिरुपति में बी.ए. की पाठ्य-पुस्तक के रूप में नियत है।

मेरा तीसरा मौलिक उपन्यास-‘यह बस्ती-ये लोग’ है, जो एस. चाँद एण्ड कं., दिल्ली द्वारा प्रकाशित है। यह भी सामाजिक उपन्यास है। नगरीय सभ्यता पर व्यंग्यात्मक चित्रण उपन्यास में हुआ है।

चौथा मौलिक उपन्यास-‘भग्न सीमाएँ’ है जो राजकमल प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित है। इस उपन्यास का भी हिन्दी पाठकों ने बड़ा अच्छा स्वागत किया। इसके दो संस्करण निकल गए हैं और इस वक़्त आन्ध्र विश्‍वविद्यालय, वालटेर में पी.यू.सी. में नियत है।

पाँचवाँ उपन्यास-‘बैरिस्टर’ है जो राजपाल एण्ड सन्स द्वारा इस मास में प्रकाशित होनेवाला है, छप कर तैयार है।

छठा मौलिक उपन्यास-‘एक स्वप्न: एक सत्य’ है। मेरे विचार में यह उपन्यास अपने ढंग का है। इसमें मैंने कुछ नवीनता दर्शाने का अवश्य प्रयास किया है। इस उपन्यास में सहायक पात्रों की संख्या कुछ अधिक है। प्रधान पात्रों के सम्पर्क में आने वाले कतिपय आंगिक पात्र सदा साथ नहीं चलते, अपितु घटना-चक्र के अनुरूप उभरते और लुप्त भी होते जाते हैं।

इस उपन्यास की अधिकांश घटनाएँ यथार्थ होते हुए भी काल्पनिक हैं और काल्पनिक होते हुए भी यथार्थ हैं। कल्पना और यथार्थ की क्रीड़ास्थली यह उपन्यास है। इस उपन्यास में स्वप्न आदर्श है और सत्य यथार्थ है। जीवन में द्वन्द्वात्मक अनुभूतियाँ स्वप्न और सत्य का उद्घाटन करती जाती हैं और उसे सहजता प्रदान करती हैं।

मैं इसे अपना सौभाग्य ही समझूंगा कि मुझे हिन्दी के अच्छे प्रकाशक मिले हैं। मेरी आदत रचना लिखकर रखने की कभी नहीं रही है। जब कभी कोई प्रकाशक रचना माँगता है, तभी मैं लिखकर देता हूँ। किन्तु मैं अब अनुभव करने लगा हूँ कि अवकाश के क्षणों में कुछ-न-कुछ लिखकर रखूँ ताकि उसका उपयोग अनुकूल वातावरण के मिलते ही कर सकूँ।

वैसे इस वक्‍त मेरी प्रवृत्ति उपन्यास लिखने की ओर अधिक है। इन दिनों में मुझे लिखने की प्रेरणा बहुधा समाज से ही प्राप्त होती है। नित्यप्रति होनेवाली घटनाओं, समाचार-पत्रों, कार्टूनों, मित्रों तथा परिचित व्‍यक्तियों की आप-बीती घटनाओं, यदा-कदा चित्रों से भी मुझे प्रेरणा मिलती है। ग्रन्थ तथा पत्रिकाओं के पठन के समय उनसे सम्बन्धित समानान्तर भावनाएँ जो कि मेरे अनुभव में सुनने तथा देखने में आई होती हैं, मेरी संवेदनशीलता द्वारा पुष्ट होकर अभिव्यक्‍त होने को मचलती हैं।

प्राकृतिक दृश्य, मूक-प्राणी, सिनेमा आदि भी मेरी प्रेरणा के स्रोत हैं। जब कभी विभिन्न व्यक्तियों के मुखमण्डलों का सूक्ष्म निरीक्षण करता हूँ तब उन पर प्रकट होने वाले भावों को पढ़ने का प्रयास करता हूँ और उनके अन्तःकरण में प्रविष्ट हो जाता हूँ, तब मेरे मस्तिष्क और हृदय में जो मन्थन होता है तथा उसके कारण मेरे मानस पर जो स्थाई प्रभाव पड़ता है, उससे प्रेरित होकर तटस्थ-बुद्धि से विचार करता हूँ और अपनी अनुभूतियों को परिष्कृत कर लेता हूँ।

मैं जब कभी कुछ लिखता हूँ, अथवा लिखाता हूँ, उस समय मैं इस बात का अवश्य ध्यान रखता हूँ कि मैं जिस भाव का चित्रण करूँ, वह केवल एक हृदय का न हो, असंख्य हृदयों का उसमें प्रतिबिम्ब हो। वह स्वाभाविक हो तथा पाठकों के हृदयों को उद्वेलित कर सके।

मैं अपनी रचनाओं के लिए अधिकांश घटनाओं का चयन अपने अनुभव, अध्ययन, यात्रा, चिन्तन-मनन द्वारा करता हूँ, तार्किक-बुद्धि से उन पर विचार करता हूँ। इस प्रकार श्रवण, दृश्य, मनन व अध्ययन के पश्‍चात कल्पना का सहारा पाकर मेरी अनुभूतियाँ कथा का रूप धारण करती हैं।

मैं अपने अध्ययन-कक्ष में लिखने या लिखाने बैठता हूँ तो बच्चों के कोलाहल, रेडियो की ध्वनि से भी मैं विचलित नहीं होता हूँ।

मेरे लिखने व लिखाने का समय प्रातःकाल साढ़े सात बजे से दस बजे तक, रात को छह से दस बजे तक। विशेष स्थिति में ही रात में बड़ी देर तक जाग कर लेखन-कार्य करता हूँ।

मैं समय पर भोजन व निद्रा के पालन का अधिक ध्यान रखता हूँ। यदि लिखने की रुचि नहीं रही तो कभी-कभी दो-तीन महीनों में केवल अध्ययन, यात्रा इत्यादि में ही समय बिता देता हूँ। कोई रचना शुरू करता हूँ तो उसके पूरा होने तक मैं कभी विराम नहीं लेता।

लिखने या बोलने के पूर्व मैं योजना-सूत्र बना लेता हूँ। संक्षेप में, लेखन के समय मेरा ध्यान इस दिशा में अवश्य रहता है कि उपन्यास का कलेवर इतने पृष्ठों से ज्यादा न हो। अनावश्यक कलेवर न बढ़े। संक्षेप में सारी बातें आ जाएँ। यही कारण है कि मैंने अपने प्रारम्भिक पाँच उपन्यास दो सौ पृष्ठों के लिखे हैं। छठा उपन्यास पाँच सौ पृष्ठों का योजनाबद्ध होकर ही बन सका है।

मेरी धारणा है एक लेखक के लिए साहित्यिक ज्ञान ही पर्याप्त नहीं है, अपितु जीवन से सम्बन्धित सभी क्षेत्रों एवं विषयों का प्राथमिक ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक है।

अनुवाद के सम्बन्ध मे मेरी मान्यता है कि अनुवाद में मूल-भावों के सौन्दर्य की रक्षा हो तथा अनूदित भाषा की प्रकृति का प्रतिबिम्ब हो।

प्रत्येक भाषा में उस प्रदेश की सांस्कृतिक, सामाजिक तथा जीवन शैली का दृष्टिकोण निहित रहता है। यदि अनुवाद करते समय उसका सजीव चित्रण नहीं होता तो दूसरी भाषा में उसका विकृत अथवा कृत्रिम स्वरूप ही उपस्थित नहीं होता, अपितु मूल लेखक के प्रति अन्याय भी होगा।

अनुवाद की शैली में गति हो। पढ़ते समय पाठक को यह प्रतीत न हो कि यह अनुवाद है। यदि अनुवाद में मूल तादात्म्य न हो तो वह उत्तम अनुवाद नहीं कहलाएगा। अनुवाद में शब्दों की ध्वनि तथा ध्यानिगर्भित विचारों को उसी रूप में उतारना आवश्यक है।

(अपने-अपने बालशौरि रेड्डी से साभार)

मेरा आत्मसंघर्ष : मणिकुंतला भट्टाचार्य

असमिया की चर्चित लेखिका के सृजनात्मक सफर की दास्तां…

कौन जानता है कि आनंद की तुलना में विषाद क्यों गहरा स्थायित्व प्राप्त करता है! खुद नहीं जानती, कब विषादग्रस्तता ने सीने में जगह बना ली थी। दोनों हाथों में शिशु बनकर लटकती फिरी थी शून्यता और निराशा। हजारों लोगों के बीच रहते हुए भी, साधारण जीवन गुजारती हुई भी, चुपके से समाती गई थी एकाकीपन के व्यूह में।
मेरे बंधु, पथ प्रदर्शक पिता ने मेरी हालत को शायद समझ लिया था। अनगिनत किताबें लाकर उन्होंने मेरे लिए ग्रंथशैया बना दी। वहीं सिर रखकर स्वप्न विभोर हुई थी, मेरे भीतर अंतहीन लहरें पैदा होने लगी थीं। आलोडि़त हृदय के साथ मैंने कलम थाम ली थी और 1981 से ही मैं एकाग्र होकर कविताएं लिखने लगी थी। जहां भी भेजती थी, प्रकाशित हो जाती थीं। दिनोंदिन पाठकों की तादाद बढऩे लगी और साथ ही लोग मेरी सराहना भी करने लगे। मगर आश्चर्य की बात थी कि तारीफों की तरफ मैं गौर नहीं कर पा रही थी। मैं ऐसी किसी खास भावना को उजागर करने की कोशिश कर रही थी, जो इस विशाल जगत और महाशून्य के बीच असंतुलन में एक अद़भुत स्थायित्व प्राप्त कर सके। मगर क्या थी वह भावना? गद्य-पद्य या दर्शन का विश्लेषण?
खुद ही रचे गए एकाकीपन के भीतर गुमसुम-सी रहने लगी। दिनोंदिन वह अव्यक्त यंत्रणा इस कदर बढ़ती गई कि कि उसका बोझ उठाते हुए मैं बार-बार कातर होने लगी। असहाय होने लगी। दिन के बाद दिन विषादग्रस्तता में डूबी रहने लगी।
1987 में पिताजी ने मुझे व्यक्तिगत संपत्ति की तरह किसी एक युवक के साथ ब्याह दिया। हां, कन्या संप्रदान के जरिए उन्होंने पिता के दायित्व का पालन किया और एक अचल संपत्ति की तरह, आर्य नारी की परंपरा के अनुसार पिता की छांव छोड़कर स्वामी के पास चली आई।… मानों जीवन ही बदल गया! पिता की बनाई ग्रंथशैया से उत्पन्न हुई भिन्न अनुभूतियों की जगह अब भौतिकवाद खड़ा हो गया था। पता ही नहीं चला कि कुछ भी किए बगैर किस तरह बारह साल गुजर गए। एक युग। आज के युग में किसी नारी की चाही गई हर चीज मुझे मिली, मगर सीने में कायम रही वही प्राचीन विषादग्रस्तता। मानों वह मेरी आजन्म सहचर हो। दोनों हाथों में शिशु बनकर लटक रही शून्यता और निराशा मानों अब मेरे कंधों पर सवार हो गईं! कुछ समझ नहीं पा रही थी। अद़भुत यंत्रणा!
मगर सारे दरवाजे बंद होने पर भी बाहर निकलने का कोई रास्ता निकल ही आता है। अनजाने में ही मैंने एक दिन कलम उठा ली और उस लंबी निस्तब्धता को तोड़ती हुई प्रवाहित हुई एक मायामय कविता। मनुष्य की कविता। यह 1991 के दिसंबर महीने के आखिरी हफ्ते की बात है। उस समय एक लोकप्रिय अखबार को कविता भेजी और वह प्रकाशित भी हो गई। उसके बाद फिर एक… उसके बाद फिर… और एक अन्य कविता। गुजरे हुए खामोश युग में कौन क्या रच रहा है, किधर जा रही है साहित्य की धारा, कुछ खबर नहीं थी मुझे। इस बार कुछ कविताएं पढ़कर ही एक-एक कर कई सराहना करने वाले लोग करीब आते गए। तीव्रता के साथ मैंने अध्ययन शुरू किया। कलम थामते ही स्वत: स्फूर्तता के साथ सिर्फ कविता ही नहीं रची जाती थीं, बल्कि गद्य भी निकलने लगा था।
धीरे-धीरे महसूस हुआ कि लिखते रहने से कई तरह से मेरे सीने का भार हल्का होता जाता है। हां, विषादग्रस्तता की भी जो भाषा होती है, जिसे अब तक बेवजह ढोते रहने के बारे में सोचती रही थी, वही अब विभिन्न रंग, सुर और भंगिमा के साथ मुझे सुख और आराम प्रदान करने में जुट गई थी।… आत्ममग्नता के साथ लिखने में मैं जुट गई। पूजा-अर्चना की तरह, ध्यान की तरह आश्चर्यजनक थी यह निमग्नता। अभिभूत हो उठी। भीतर से समझ गई कि जीवन के जिस महान और श्रेष्ठï चिंतन को व्यक्त करना चाहती हूं, उसके करीब जाने की यह महज सीढ़ी ही है, और कुछ नहीं। इसीलिए लोगों की प्रशंसा या अपने सुखानुभव को लेकर संतुष्ट या गौरवांवित होने की कोई जरूरत नहीं है। मैं कहानी भी लिखने लगी। हर रविवार दो-तीन अखबारों में लगातार कविताएं छप रही थीं, साथ ही कहानियां भी छपने लगीं। कोई भेद-भाव किए बिना या पत्र-पत्रिका के स्तर को अहमियत दिए बिना रचना मांगने आए किसी भी व्यक्ति को मैंने निराश नहीं किया। तेजी से मेरी रचनाएं प्रकाशित होने लगीं। इस तरह कलम रखने की फुरसत मेरे पास नहीं रह गई। याद है कि दो महीने के भीतर मैंने ग्यारह कहानियां लिखीं। इसके साथ ही समानांतर रूप से दो पत्रिकाओं और एक पत्र में स्तंभ लिखने की व्यस्तता भी बनी रही। जो भी लिखती, मन लगाकर लिखती। हृदय खोलकर, प्राण उड़ेलकर लिखती। मगर विषादग्रस्तता? वह मानों कभी साथ नहीं छोड़ेगी। मेरे बिलकुल अपने, सिर पर छतरी की तरह छांव देने वाले पिताजी का देहांत हो गया। मेरे हाथ की मुट़ठी में हाथ रखकर चले गए वे।… तड़पती रही मैं… और निरंतर कलम की व्यस्तता ने मुझे महान अनुभव से सराबोर कर दिया। इन रचनाओं के जरिए ही मानों मैं श्मशान के भस्म के बीच से ले आई हूं पिता को हाथ थामकर…। एक वास्तविक जीवन की समस्त प्राप्ति और समृद्धि के साथ इस अनुभव की कोई तुलना नहीं हो सकती। घटती गई सीने के भीतर जमी हुई यातना… कलम चलती रही।
मैंने जीवन का पहला उपन्यास ‘अरुंधती’ लिखा। क्या यह उपन्यास ही था? खुद ही जानती हूं कि किस तरह खुद को ‘अरुंधती’ के किरदार के साथ उजागर किया है मैंने। उसी समय, 2002 में मेरी पहली पुस्तक ‘प्रस्तर कन्या’ (कथा संकलन) प्रकाशित हुई। एक दैनिक पत्र के साप्ताहिक परिशिष्टï में ‘अरुंधतीÓ के प्रकाशन के साथ ही पाठक समाज में आलोडऩ आ गया। पत्र, फोन के अलावा उपन्यास की नायिका को देखने के लिए लोग मेरे घर आने लगे। नायिका को एक नया जीवन प्रदान करने का प्रस्ताव देने वालों में हाई स्कूल के छात्र भी शामिल थे। फिर वह उपन्यास दैनिक सेंटिनल में धारावाहिक रूप से प्रकाशित हुआ। असमिया पाठकों की तरह हिंदी पाठकों ने भी उपन्यास को अपनाया। फिलहाल इस उपन्यास का अंगे्रजी अनुवाद हो रहा है और इस पर फिल्म बनाने का भी विचार है।
‘अरुंधतीÓ की लोकप्रियता देखकर एक और पत्र के संपादक ने नया उपन्यास लिखने के लिए मुझ पर दबाव डाला। इस तरह एड्स की पृठभूमि में मैंने द्वितीय उपन्यास ‘स्वप्न संभव’ की रचना की। मगर दो अध्याय छापने के बाद प्रकाशन रोक दिया गया। आश्चर्यजनक रूप से इसके पीछे था संपादक की तरफ से मुझे दिया गया अशोभनीय प्रस्ताव। मनुष्य का ऐसा निर्लज्ज रूप देखकर मैं स्तब्ध रह गई। किंकत्र्तव्यविमूढ़ हो गई। क्रोधित होने की जगह उदास हो गई और एक दिन विनम्रता के साथ मैंने अप्रकाशित पांडुलिपि वापस मांग ली। उसी दौरान, 2004 में ‘प्रस्तर कन्या’ को असम का प्रसिद्ध साहित्यिक पुरस्कार ‘मुनीन बरकटकी पुरस्कार’ प्रदान किया गया। इसके साथ ही ‘स्वप्न संभव’ को भी छापने के लिए प्रकाशक तैयार हो गए और वह ‘संध्या’ के नाम से प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास को आकाशवाणी, गुवाहाटी ने भी धारावाहिक रूप से प्रसारित किया। इसके चार संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं और इस पर फिल्म बन रही है।
इसके बाद ठहर जाने का कोई सवाल ही नहीं था। कलम चल रही है। धीरे-धीरे मैं महसूस करने लगी कि कुछ चित्रण करते समय मैं असाधारण रूप से निर्भीक हो उठती हूं, सहज-सरल अथावा सीधे-सीधे लिख देती हूं मानव जीवन की रहस्यमयता के बारे में। एक परिपूर्ण परिवार की एक साधारण गृहिणी होकर भी लिखते समय कैसे इस तरह निर्भीक हो जाती हूं? मेरे अपने लिए यह एक चमत्कारिक अनुभव है। कोई दुविधा-संकोच नहीं, लज्जाबोध नहीं। मातृभाषा के निर्वाचित-उपयुक्त-सौजन्यमूलक शब्दों से वे वर्णन इतने जीवंत हो उठते हैं कि पाठक उनमें अपनी गोपनीयता ढूंढऩे लगते हैं। मैं समझ गई कि कोई भी ऐसे वर्णन को ऊपर-ऊपर से पढ़ नहीं सकता या उसकी अनदेखी नहीं कर सकता। मुक्त रचना और पोर्नोग्राफी के बीच की सीमा रेखा को भी अच्छी तरह पहचानती हूं। इसमें कुछ पाठक नाराज भी हुए हैं। वे मुझे शालीनता का पाठ पढ़ाने लगे और विनम्रता के साथ सिर झुकाए मैं सब कुछ सुनती रही। बहस नहीं करती, असंतुष्ट भी नहीं होती, सिर्फ सुनती रहती हूं। रोकती भी नहीं। मगर उस पाठ को ग्रहण नहीं कर पाती। ग्रहण कर भी नहीं सकती। मैं मनुष्य के बारे में लिखती हूं। मनुष्य में ही प्रकृति, ईश्वर, धर्म और त्रिलोक को ढूंढती हूं। मूलरूप से मनुष्य दो प्रकार के होते हैं- प्रेममय और दुर्बल। मुझे लगता है कि मनुष्य हमेशा प्रेम का आधार रहा है। प्रेम ही सबकुछ नियंत्रित करता है। जिसे व्यभिचार कहते हैं, जिसे हिंसा-द्वेष कहते हैं, वह है दुर्बल को खुद ही दमित न की जाने वाली रिपुजात प्रक्रिया। वैसी दुर्बल श्रेणी को पहले दया और फिर क्षमा का पात्र ही मानती हूं मैं। शायद इसीलिए समालोचक मेरी कहानी में जब विलेन को ढूंढते हैं, वैसे पात्र की कमजोरियों को भी मैं तर्क के साथ प्रस्तुत करती हूं। मैं खुद ही अपने साथ बार-बार बहस करती हूं और सशक्त तर्क के पक्ष में कलम चलाती हूं। किसी का पाठदान नहीं मानती। मानव जीवन के रहस्यमय खंडचित्रों के अंकन की प्रक्रिया से जुड़ती चली गई। बिलकुल स्वत:स्फूर्त रूप से वे सब बातें कलम से प्रवाहित होती हैं। श्मशान से उठकर आए पिता आजकल एक रोशनी बन गए हैं। स्वामी के चेहरे की तरफ देखती हूं, उत्साह और साहस पाती हूं। शायद लोगों की शालीनता की सीख मेरे कान में समा नहीं पाती, उसका वह अहम कारण हो सकते हैं।
मगर दो तरीके से इसके नतीजे सामने आए। एक वर्ग ने मेरी भर्त्‍सना की कि बेबाक लेखन से मैं बाजार में छा जाना चाहती हूं। दूसरी तरफ कुछ अवसर की खोज करने वाले पुरुष सामने आए। जिन्हें मैं ‘दुर्बल मनुष्य’ मानती हूं। बेहिचक वे लोग अपनी इच्छा मेरे सामने व्यक्त करने लगे, मगर सामने तो है पिता की रोशनी और स्वामी की सबल उपस्थिति। इसीलिए उन पुरुषों के आचरण को मैंने लेखन के कच्चे माल के रूप में ग्रहण किया। मेज के करीब बैठकर ही देखती रही आदमी के भीतर के आदमी को। भौतिकवादी जीवन की प्राप्ति के एकाकीपन से टूटे हुए पुरुषों को।… कलम के साथ रिश्ता गहरा होता गया। नहीं लिखने से सीने में जमने लगती है विषादग्रस्तता। सबके साथ ऐसा ही होता है क्या? इसके साथ-साथ एक अदृश्य प्रतिबद्धता भी खींचती रही मुझे। प्रत्येक कहानी के जरिए कोई संदेश देने की कोशिश करती हूं। मेहनत करती हूं। जुटी रहती हूं लगातार… जुटी रहती हूं। 2004 में दूरदर्शन धारावाहिक ‘गेटवे’ की कहानी लिखने का काम मुझे सौंपा गया। तथ्य बटोरने के लिए घूमते समय मेेरे विचारों की चकरी भी घूमने लगी। अपनी प्रेममय पृथ्वी के नेपथ्य में बर्बर घटनाओं ने मुझे अवाक कर दिया। मेरे कोमल कवित्व को मानों इस्पाती पोशाक पहना दी गई। इस तरह लेखन में यथार्थ बढ़ता गया। 2005 में पुस्तकाकार रूप में ‘अरुंधती’ का प्रकाशन हुआ, उसी वर्ष कविता संकलन ‘मणिकुंतलार कविताÓ भी प्रकाशित हुआ। वर्ष 2006 में असम की ग्रामीण पृष्ठभूमि पर ‘बरदोवानी’ नामक उपन्यास प्रकाशित हुआ। वैष्णव संत श्रीमंत शंकरदेव की जन्मभूमि बरदोवा से संबंधित पृष्ठभूमि पर इस उपन्यास को लिखना मेरे लिए एक चुनौती थी। पिता व स्वामी के कर्मजीवन में होते रहे तबादलों के चलते मेरा जीवन नगर केंद्रित रहा है। ग्रामीण परिवेश को महसूस करना आसान काम नहीं था। पाठकों की सराहना से लगता है कि मैं इस कोशिश में सफल हुई हूं। इसके बाद समकालिता विषय पर ‘मुक्ति’ नामक उपन्यास प्रकाशित हुआ। डायन प्रथा को केंद्र में रखकर मैंने ‘शामियाना’ नामक उपन्यास लिखा। इसी दौरान एक बाल उपन्यास ‘शांत पापूहंतर कथारे’ प्रकाशित हुआ। इसके आधार पर दूरदर्शन धारावाहिक का निर्माण हो रहा है।
एक मासिक पत्रिका में धारावाहिक उपन्यास ‘दस्तखत’ लिख रही हूं। असम के मोबाइल थियेटर की पृष्ठïभूमि पर एक उपन्यास ‘मई डेस्डिमोना होषो खोजो’ लिख रही हूं। यह भी प्रकाशित  होनेवाला है। ‘मां, मेकले साहब आस बाढैशाकर पिता’, ‘गेटवे’ उपन्यास भी प्रकाशित होने वाले हैं। एक और उपन्यास तथा एक बाल उपन्यास पर काम भी चल रहा है। संभवत: इसी वर्ष ये भी प्रकाशित हो जाएंगे।… ठिठकी नहीं हूं मैं। अगर बेबाक लेखन से समाज का नुकसान ही कर रही हूं तो क्यों मेरी रचनाओं के आधार पर दूरदर्शन-आकाशवाणी के कार्यक्रम बनाए जाते हैं? क्यों लेखकों की अग्रज पीढ़ी उम्मीद भरी नजरों से मुझे देखती है, जागरूक वर्ग गौर करता है और नए लेखक सराहना करते हैं?
जरूर ये सब संकेत करते हैं पिता द्वारा रोशन की गई राह की तरफ। इसीलिए मैं आगे बढ़ती हूं सांप्रतिक समय से कुछ आगे अधिक परिश्रम के साथ। गहरी एकाग्रता के साथ लिखती हूं मैं, हृदय खोलकर लिखती हूं- ईश्वर के साथ एकाकार होने की प्रार्थना की तरह…। 
                                                                                (अनुवाद : दिनकर कुमार, वरिष्ठ पत्रकार)