Category: डायरी

मेरे वि‍द्यालय की डायरी : रेखा चमोली

REKHA CHAMOLI

प्राथमिक विद्यालय, उत्‍तरकाशी में कार्यरत संवेदनशील कवियत्री  रेखा चमोली बच्‍चों के साथ नवाचार के लि‍ए जानी जाती हैं। कक्षा-1 से कक्षा-5 तक बच्‍चों के अकेला पढ़ाना और साथ ही स्‍कूल की व्‍यवस्‍था को भी देखना बेहद श्रमसाध्‍य है। यहां उनकी डायरी के संपादि‍त अंश दे रहे है-

4-8-11

शब्दों से कहानी बनाना

हमारे पास कोई इतना बडा़ कमरा नहीं है कि कक्षा 1-5 तक के 53 बच्चे उस में एक साथ बैठ पाएं। कक्षा 3,4,5 वाले बच्चे बालसखा कक्ष में बैठे और कक्षा 1,2 वाले दूसरे कक्ष में। आज मैं घर से आते हुए पुरानें अखबार और बच्चों की आधी भरी हुई पुरानी कापियां साथ ले आयी थी ताकि कक्षा 1 व 2 वालों को थोडी देर व्यस्त रख पाऊॅ और इतने में 3, 4, 5 वालों को उनका काम समझा सकूं। कक्षा 1,2 वालों को बाहर ही एक गोला बनाकर कविताएं गाने को कहा और अपने आप कक्षा 3,4,5 के पास गई। आज हमें शब्दों से कहानी बनाने की गतिविधि करनी थी। मैंने श्यामपट पर कुछ शब्द लिखें- बस,  भीड़, सड़क,  ड्राइवर, तेज शोर, रास्ता, पेड़, लोग।

बच्चों को प्रारम्भिक बातचीत के बाद दिए गए शब्दों से कहानी लिखने को कहा।

मैं कक्षा 1-2 के साथ काम करने लगी। इन कक्षाओं में कुल मिलाकर 23 बच्चे हैं। मैंने श्यामपट पर कुछ शब्द लिखकर उनमें ‘न’ पर गोला बनाने की गतिविधि कुछ बच्चों को बुलाकर की।जैसे- नमक, कान, नाक,  जाना, जानवर आदि। फिर सभी बच्चों को अखबार का 1-1 पेज देकर कहा कि वे इसमें ‘न’ और ‘क’ पर गोला लगाएं व उन्हें गिनें कि वे अक्षर कितनी बार आए है। दरअसल बच्चे हमारी अनुपस्थिति में अपनी कापियों को बहुत खराब कर देते हैं। कक्षा 1 के बच्चे पेज बहुत फाड़ते हैं इसलिए मैंने उन्हें ये काम अखबार में करने को दिया जिससे वे कमरे और बरामदे में दूर-दूर भी बैठें और उन्हें कुछ नया भी करने को मिले। अखबार के अक्षर बहुत बारिक लिखे होते हैं। पर फिर भी मैंने देखा बच्चे अक्षर पर गोला बना रहे थे और जो ऐसा नहीं कर पा रहे थे, वे दूसरों को देख रहे थे। उसमें बने चित्र देख रहे थे।

इतने में ही दूसरे कमरे सें भवानी, जयेन्द्र, साधना आए और कहा कि‍ हमने अपनी कहानी लिख ली है। अच्छा, अब अपनी-अपनी कहानी का शीर्षक लिखो कहने पर उन्‍होंने कहा कि कहानी का शीर्षक भी लिख दिया है।

मैंने उनकी कहानियां पढी़ और कुछ सुझाव देकर एक बार फिर से लिखने को कहा। बच्चे मेरे पास आते रहे अपनी कहानी पर सुझाव लेते रहे और उसे ठीक किया।

करीब सवा नौ बजे हम एक बड़ा सा गोला बनाकर अपनी-2 कहानियां सुनाने को तैयार थे। तीनों कक्षाओं को मिलाकर आज कुल 27 बच्चे उपस्थित थे।

सबसे पहले शुभम् (कक्षा-3) ने अपनी कहानी सुनाई-

1- एक बस थी। जिसे चला रहा था ड्राइवर।अचानक एक आदमी बोला बस रोको आगे सड़क टूटी हुई है। ड्राइवर ने बस रोकी। सड़क पर पत्थर और पेड़ गिरे थे। लोगों ने मिलकर बस के लिए रास्ता बनाया और बस आगे चली । सब लोग अपने गांव पहुंचे ।

2- दीक्षा (कक्षा-3) ने अपनी कहानी में लिखा कि एक पेड़ के गिरने से सड़क बन्द हो गई। जब ड्राइवर पेड़ हटाने लगा तो जंगल से पेड़ काटने वालों की आवाज आई- ये हमारा पेड़ है। अपनी बस वापस ले जाओ। जंगल से पेड़ काटने वाले आए और सबने मिलकर पेड़ को हटाया। फिर लोग वापस अपने गांव गए। दीक्षा ने अपनी बस का नाम रखा ’मुनमुन’ और ड्राइवर का ’राहुल’।

3- साधना (कक्षा-5) – रमेश नौकरी की तलाश में शहर जाता है। वहां उसे ड्राइवर की नौकरी मिलती हैं। वह पहली बार बस चलाता है। रास्ते में बहुत सारे पेड़ थे। बस रुक जाती है। बस खराब हो जाती हैं। लोग डर जाते हैं कि हम कहां फंस गए। बाद में बस ठीक हो जाती है। रमेश सोचता है कि‍ मैं बस ठीक से चलाना सीखूंगा। बाद में वह ठीक से बस चलाना सीखता है। पैसे कमाता है। शादी करता हैं। घर बनाता है। उसके बच्चे होते हैं।

इसी तरह और बच्‍चों ने भी कहानी लि‍खी। ज्यादातर बच्चों की कहानियां मिलती-जुलती थीं, तो क्या हमने शब्दों पर ज्यादा खुलकर बातचीत की? या मेरी अनुपस्थिति में बच्चों ने एक- दूसरे से बातचीत की? मेरे मन में शंका हुई।

मैने नोट किया कि सभी बच्चों ने अपनी कहानी को आत्मविश्वास के साथ सुनाया। वे बीच में कहीं रुके नहीं। न ही किसी शब्द को पढ़ने में अटके । बच्चे अपना लिखा हुआ सुस्पष्ट व धाराप्रवाह पढ़ सकते हैं।

बच्चों ने अपना काम कर लिया था। मैंने उन्हें खाना-खाने जाने को कहा। बच्चों को हाथ धुलवाकर खाने के लिए बिठाया। भोजनमाता भोजन परोसने लगी। छोटे बच्चें अभी इधर-उधर ही घूम रहे थे। उन्हें बुलाया, खाना खाने बिठाया। भोजनमाता अपनी जरा सी भी जिम्मेदारी नहीं समझती है। बस किसी तरह काम निबटाना चाहती है। मध्यान्तर के बाद सारे बच्चों ने एक साथ बड़े गोले में गीत, कविताएं आदि गाईं और अपनी-अपनी कक्षा में बैठे।

कक्षा 3,4,5 को श्यामपट पर कुछ word-meaning पढ़ने व लिखने को दि‍ए। फिर कक्षा 3 को जोड़ के मिलान वाले सवाल हल करने को दिए और कक्षा 4,5 को क्षेत्रफल के सवाल। बच्चों को दो-दो के समूह में काम करने को कहा।

कक्षा 2 के सारे बच्चों ने अखबार में ‘न’ व ‘क’ पर गोले बनाए थे। कक्षा 1 के भी कुछ बच्चों ने अक्षर पहचाने थे। कुछ बच्चों के अखबार का बुरा हाल था। पर कोई बात नहीं अखबार का जितना प्रयोग होना था, हो चुका था। मैंने कक्षा 1 व 2 को उनकी कापी में गिनती व सरल जोड़ के सवाल हल करने को दिए। जैसे- एक पेड़ पर 25 पत्तियाँ बनानी या आसमान में 15 तारे बनाने। छोटे बच्चे हर समय कुछ न कुछ करने को उत्साहित रहते हैं। इसलिए इनमें से कुछ अपने आप बाहर चले गए और बाहर जमा हुए पत्थरों की पक्तियां बनाने लगे। एक-दो बच्चे चाक ले गए और जैसी आकृतियाँ मैं बनाती हूँ, उसी तरह की आकृतियाँ बनाकर उन पर पत्थर जमाने लगे।

जब सारे बच्चे कुछ न कुछ करने लगे तो मैं बच्चों का सुबह वाला काम देखने लगी। बच्चों ने तो अपना काम कर दिया था। अब मुझे अपना काम करना था। पहला काम तो बच्चों की मात्रात्मक गलतियाँ सुधारना था । कक्षा 3 के कुछ बच्चे बहुत गलतियाँ करते हैं। 4 व 5 में भी एक दो बच्चे ऐसे हैं। मैंने बच्चों की कापी में उनकी गलतियाँ ठीक की। फिर काम को fair करने के लिए 1 चार्ट के चार बराबर भाग किए। उनमें पेंसिल से लाइने खींची। इन्हीं चार्ट पेपर से हम अपनी किताबें बनाने वाले हैं। बच्चों को एक-एक चार्ट पेपर दिया, जिसमें वे घर से अपनी-अपनी कहानी लिखकर व बची जगह में कहानी से सम्बन्धित चित्र बनाकर आएँगे।

इस तरह आज के दिन का काम हुआ। मैं बच्चों के काम को देखकर बहुत खुश हूँ।

5-8-11

कविता लिखना

school.REKHA CHAMOLI

आज सुबह 7:15 पर विद्यालय पहुँची। साधना, मिथलेश व कुछ बच्चे आ गए थे। बच्चों ने मिलकर साफ-सफाई की। मैंने और साधना ने मिलकर बालसखा कक्ष की सफाई की। इसी बीच सारे बच्चे आ गए थे। हमने मिलकर प्रार्थना सभा शुरू की। प्रार्थना के बाद रोहित और दिव्या ने अपनी कल लिखी कहानी सबको सुनाई। और बच्चे भी अपनी कहानी सुनाना चाहते थे, पर समयाभाव के कारण ये संभव न था। ये बच्चे अपनी बारी आने पर किसी और दिन कहानी सुनाएँगे। कक्षा 1 से रितिका, सलोनी, राजेश ने आगे आकर कविता सुनाई जिसे सारे बच्चों ने दोहराया। उपस्थिति दर्ज कर बच्चे अपनी-अपनी कक्षा में गए।

जब तक कक्षा 3,4,5 के बच्चे बालसखा कक्ष में गोले में बैठे और अपना कल का काम निकाला, तब तक मैंने कक्षा 1 व 2 को 1-1 पेज देकर उसमें चित्र बनाने व उनका नाम लिखने का काम दिया। मैंने श्यामपट पर कुछ चित्र बनाए व उनके नाम लिखे और बच्चों से कहा वे इन चित्रों को भी बनाएं व अपनी मर्जी से अन्य चित्र भी बनाएं। बच्चों को एक बार बता दो क्या करना है फिर भी वे बार-बार पूछते है। सारे चित्र बनाने हैं जी, सबके नाम लिखने हैं? मुझे इसका नाम लिखना नहीं आता। रंग भी भरना है क्या? वगैरह-वगैरह। इन बच्चों को अपने काम की तैयारी में ही बहुत समय लग जाता है। पेंसिल नहीं है या छिली हुई नहीं है। toilet जाना है, पानी पीने जाना है। इसने मेरा page ले लिया, इसने नाम बिगाड़ कर पुकारा। पर जब काम शुरू होता है तो थोडी देर सिर्फ काम होता है, पर सिर्फ थोडी देर। मैंने बच्चों को उनका काम फिर से बताया और मैं थोड़ी देर में आती हूँ, कहकर बालसखा कक्ष में गई। गेट बन्द कर दिया। जिससे बच्चे बाहर आएँ तो रास्ते में न जाएँ। भोजन माताएँ आ चुकी थीं। खाना बना रही थीं। मैंने उनसे कहा कि‍ देखना बच्चे लड़-झगड़े नहीं। वैसे ये बच्चे कुछ भी करें, बगल के कमरे में साफ आवाज आती है।

जब मैं बालसखा कक्ष में पहुँची तो बच्चे अपना-अपना पेज एक-दूसरे को दिखा रहे थे, पढ़ रहे थे, चित्र देख रहे थे, अपना छूटा हुआ काम करे रहे थे। मैंने उनसे पेज जमाकर लिए। कुछ बच्चों के पेज मुड़-तुड़ गए थे। कुछ ने अच्छा लिखने या जल्दबाजी के कारण काटा-पीटी कर दी थी। मैंने बच्चों से इस बारे में बात की। लिखने का काम इतना अधिक नहीं था कि थकान लग जाए। हमें ये पेज संजो कर रखने हैं। इन्हें बाकि बच्चे भी पढे़गे। इसलिए मैंने सोचा आज से fair करने का काम भी विद्यालय में ही करना होगा।

आज कविता पर काम करना था। मैंने पिछले दिनों कक्षा में कहानी और कविता के स्वरूप को लेकर बच्चों से बात की थी । बच्चे कविता व कहानी में अन्तर पहचानते हैं, पर अभी उनके लिखने में ये ठीक से नहीं आ पाया है। शुरुआती लेखन के लिए मैंने बच्चों का ध्यान लय,  तुकान्त शब्द,  कम शब्दों का उपयोग व बिंबों की ओर दिलाने का प्रयास किया। मैं जानती हूं, कविता एक संवेदनशील हृदय की अभि‍व्‍यक्‍ति‍ है। एक अच्छी कविता हमारे मन को छू लेती है। हमें उर्जा से भर देती है या कुछ कर गुजरने को प्रेरित करती है। और हर व्यक्ति कविता नहीं लिख पाता, पर यहां अपनी कक्षा में मैं कविता को इस तरह देखती हूं कि बच्चे किसी चीज के प्रति अपने भावों को व्यक्त करना सीखें, अपने लिखे को मन से पढ़ पाएं। कक्षा 4 व 5 वाले बच्चे अपनी कक्षा में कुछ विषयों पर कविता लिखने का प्रयास कर चुके हैं। कुछ ने छोटी-छोटी कविताएं लिखी हैं। ये बहुत सी कविताओं को सुन-पढ़ चुके हैं।

मैंने कविता लिखने के लिए विषय चुना- पानी। बच्चों से पानी को लेकर बातचीत की। प्रत्येक बच्चे ने पानी को लेकर कुछ-न-कुछ बात कही।

जैसे- पानी नल से आता है

पानी को हम पीते हैं।

पानी नदी, धारे-पनियारे, बारिश से भी आता है।

पानी कहां से आता है ? उससे क्या-क्या करते हैं ? यदि पानी न हो तो क्या होगा। पानी हमारे किन-किन काम आता है? आदि के आसपास ही बच्चों की ज्यादातर बातें रहीं। कक्षा में बातों का दोहराव होता देख मैंने बच्चों से कहा,  मैं श्यामपट पर पानी शब्द लिखूंगी। तुम्हारे मन में पानी को लेकर जो भी बातें आती हैं, उन्‍हें एक शब्द में बताना है। जो शब्द एक बार आ जाएगा, उसे दुबारा नहीं बोलना है। बच्चे शब्द बोलते गए मैं उन्हें लिखती गई। कुल 50-60 शब्द हो गए।

उदाहरण- पानी-पीना, खाना बनाना,  मुंह धोना, नहाना,  प्यास,  मरना, मीठा, गंदा, गरम, ठंडा, चाय, स्वच्छ निर्मल, बादल, इन्द्रधनुष, पहाड़,  झरने, गौमुख,  नदी,  भागीरथी, गंगा,  गाड़, पनियारा, टंकी, बाल्टी,  कोहरा, बुखार,  भीगना,  सिंचाई,  बिजली,  बांध, जानवर, खेती, रोपाई,  बहना,  भाप निकलना, जीवन, मछली, सांप, मेंढक, आकाश, भरना, होली, सफाई आदि। अब मैंने बच्चों से तुकान्त शब्दों पर बात की। हमने पानी, काम, बादल,  जल,  भीगना,  गीला आदि शब्दों पर तुकान्त शब्द बनाए। फिर मैंने श्यामपट पर एक पंक्ति लिखी-

ठंडा-ठंडा निर्मल पानी।

पानी से मुंह धोती नानी।

इन पंक्तियों को बच्चों को आगे बढाने को कहा। बच्चों ने मिलजुल कर कविता को आगे बढाया-

पानी आता बहुत काम

इसके बिना न आता आराम

हमको जीवन देता पानी

बताती हमको प्यारी नानी।

इसके बाद मैंने बच्चों से एक और कविता पानी पर ही लिखने को दी।

इतने में पेंन्टर और बाकि मजदूर काम करने आ गए। खच्चर वाले भइया ने सुबह ही आंगन में बजरी डाल दी थी। प्रधानजी का बेटा अन्य सामान सीमेंट वगैरह लेकर आए। मैंने बच्चों की मदद से कल छुट्टी के बाद एक कमरा खाली किया था। आज उससे पेंटर को पेंट की शुरुआत करने को कहा। विद्यालय में अन्य लोगों को देख कक्षा 1, 2 के बच्चे बाहर आ गए। इधर-उधर दौड़ने लगे। कुछ बच्चे बजरी में खेलना चाहते थे। जब खच्चर वाले भइया दुबारा बजरी लेकर आए, तो मैंने उन्हें विद्यालय के पिछले हिस्से में बजरी डालने को कहा, पर जगह कम होने के कारण खच्चर ने वहाँ जाने से साफ मना कर दिया और खुद ही अपनी पीठ का भार गिरा दिया। अब एक काम बच्चों को इन पत्थर-बजरी से भी दूर रखना था। और ये भी ध्यान रखना था कि खच्चर हमारे फूलों की क्यारी से दोस्ती न कर पाएं।

अब तक बच्चे अपनी-अपनी कविताएं लिख चुके थे। बच्चों ने अपनी कविताएं सुनानी शुरू कीं। सरस्वती (कक्षा-5)  ने अपनी कविता में मीठा,  पर्वत व कहानी शब्द लिखे थे।

अनिल (कक्षा-5) ने मछली के जीवन व काम का उपयोग बताया था।

दीपक (कक्षा-5)  ने ठंडा, धरती से पानी का निकलना और पानी का कोई रंग ना होना बताया था। पूर्व की बातचीत में पानी के रंग पर कोई बात नहीं आयी थी। अंबिका (5)  ने धारे,  नदी व जीवन की बात कही थी। कुछ बच्चों ने बहुत सुंदर कविता लिखी थी।

जैसे- प्रवीन (5) ने-

इस पानी की सुनो कहानी

इसे सुनाती मेरी नानी

पानी में है तनमन

पानी में है जीवन

कहती थी जो वह बह जाता

कही ठोस से द्रव बन जाता।

मुझे प्रवीन की कविता में पहले पढ़ी किसी कविता का प्रभाव दिखा, जबकि इससे पहले पढ़ी कविताओं में कम सधापन था, पर उनमें मौलिकता अधिक थी। कुछ बच्चों ने पूरे-पूरे वाक्य लिख दिए थे। कुछ की पहली पंक्ति का दूसरी से सामंजस्य नहीं था। शब्दों की पुनरावृति अधिक थी।

मेरी स्वयं भी कविता के विषय में समझ कम है, पर मैं ये चाहती थी कि बच्चे अपनी बात को इस तरह लिखें कि कम शब्दों में ज्यादा बात कह पाएं और अगर उसमे लय भी हो तो मजा ही आ जाए।

बात आगे बढा़ते हुए मैंने श्यामपट्ट पर एक वाक्य लिखा।

पानी के बिना हमारा जीवन अधूरा है।

अब इसी पंक्ति को थोड़ा अलग तरीके से लिखा।

1- पानी बिन जीवन अधूरा

2- बिन पानी अधूरा जीवन

3- पानी बिन अधूरा जीवन

जब इन पंक्तियों में बच्चों से अंतर जानना चाहा, तो उन्होंने बताया कि‍ पहली पंक्ति कहानी या पाठ की है, जबकि बाद की पंक्तियां कविता की हैं। कारण पूछने पर बच्चों में से ही बात आई कि कविता छोटी होती है। शब्द कम होते हैं। उनका ज्यादा अर्थ निकालना पड़़ता है।

अब मैंने मनीषा से अपनी कविता पढ़ने को कहा, तो उसने उसे श्यामपट्ट पर लिख दिया। मनीषा ने लिखा था-

पानी आता है गौमुख से

पानी आता पहाड़ों से

पानी आता है नल से

पानी को हम पेड़ पौधों को देते हैं।

पानी का कोई रंग नहीं होता है।

मैंने बच्चों से पूछा कि‍ क्या इन पंक्तियों को किसी और तरीके से भी लिख सकते हैं?

‘हां जी’ कहने पर शिवानी ने कहा-

पहाडों से निकलता पानी

अरविन्द ने दूसरी पंक्ति जोड़ी-

गौमुख का ठंण्डा स्वच्छ पानी

इसी प्रकार पंक्तियां जुड़ती गईं-

नल से आता है स्वच्छ पानी

पेड़-पौधे भी पीते पानी

बिना रंग का होता पानी।

फिर हमने इस पर बात की कि पहली लिखी पंक्तियों व बाद की पंक्तियों में क्या अंतर है। कौन कविता के ज्यादा नजदीक है?

बच्चों के जबाव आए- दुबारा लिखी पंक्तियां।

क्यों ? क्योंकि कम शब्दों में ज्यादा बात कह रही हैं। अन्त के शब्द मिलते-जुलते हैं। मैंने बच्चों के कहा कि वे अपनी अभी लिखी हुई कविता को एक बार और ठीक करके लिखें।

इस बार बच्चों ने अपनी पंक्तियों को और परिष्कृत करके लिखा।

उदाहरण-  कक्षा 3 के बच्चों ने लिखा- (कुछ पंक्तियां)

प्रियंका- नदिया बहती कल-कल-कल

पानी करता छल-छल-छल

प्रीति- कैसे पानी पीते हम

पानी से जीते हम

शुभम्- जब मछली पानी से बाहर आती

इक पल भी वो जी न पाती।

दिव्या (4)- ठंडा ठंडा निर्मल पानी

कहानी सुनाती मेरी नानी

पानी बहुत दूर से आता

बर्फ से पानी जम जाता

पर्वत से आता पानी

धरती ने निकलता पानी।

इस तरह सभी बच्चों ने अपनी-अपनी कविताएं ठीक कीं। ज्यादातर बच्चों ने 12-15 पंक्तियां लिखीं।

आज मध्यान्तर थोड़ी देर से किया, क्योंकि हमारी बातचीत देर तक चली थी। मध्यान्तर के बाद कक्षा 3,4,5 वालों ने अपना काम fair करना चाहा, क्योंकि सुबह ही यह बात हो गई थी कि हमें स्कूल में ही यह काम करना है। बच्चों ने आज खेला नहीं। वे काम करने के लिए पेज मांगने लगे। मैंने अंजली, सरस्वती, प्रवीन की मदद से फटाफट चार्ट पेपर पर पेंसिल से लाइनें खीचीं ताकि बच्चे सीधा-सीधा लिख पाएं। बच्चे अपना काम करने लगे। मैं 1 व 2 वालों को देखने लगी। जिन बच्चों की मात्रात्मक गलतियाँ ना के बराबर थी, उन्होंने फटाफट अपना पेज तैयार कर लिया। मैंने उन्हें कक्षा 1व 2 के साथ काम करने को कहा। अपने आप बच्चों की कापियाँ चैक करने व पेज में किस तरह काम करना है आदि बातें बच्चों को बताने लगी। आज गणित में कम काम हो पाया। कक्षा 3 को श्यामपट पर घटाने के मिलान वाले सवाल दिए। 4 व 5 वालों को क्षेत्रफल के सवाल अपनी किताब से करने को दिए। आज भी बच्चों ने अपने समूह में काम किया व बीच-बीच में मुझे दिखाते रहे। मैंने कल पेंट करने के लिए जगह बनाई और आज का काम देखा। आज बच्चों को घर के लिए यह काम दिया कि वे अपने मनपसंद विषय पर कविता लिखकर आएं।

मनोहर चमोली ‘मनु’ की डायरी

Manohar Chamoli 'manu'

1 अगस्‍त 1973 को पलाम, टिहरी गढ़वाल, उत्‍तराखंड में जन्‍मे मनोहर चमोली ‘मनु’ की रचनाएं देश भर की सभी प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्‍होंने उत्‍तराखंड की विद्यालयी शिक्षा के पाठ्यक्रम से जुड़ी कई पुस्‍तकों के लेखन-संपादन में योगदान दिया है। वह नियमित रूप से डायरी लिखते हैं। इसमें उन्‍होंने शिक्षा और बच्‍चों से जुड़े हुए कई गंभीर सवाल खडे़ किए हैं। उनकी डायरी के कुछ अंश-

3 जुलाई 2010 :  जुलाई का महीना पढ़ाई का महीना माना जाता है। बच्चों पर काम का दबाव बढ़ जाता है। पर बच्चों की सुध किसे है? हर कोई काम-पर-काम देने पर आमादा है। क्या जरूरी है कि बच्चे प्रश्‍न-अभ्यास करके कल ही लाएं। आज जो पाठ पढ़ाया गया है तो आज ही वे हर विषय के पाठों का अभ्यास कैसे कर लें? ये तो कोई बात नहीं। मगर शिक्षक भी क्या करें। अधिकारी या जांच मुआयना वाले भी तो बच्चों की कॉपी ही देखते हैं। काम ठीक-ठाक है तो बढ़िया, काम कॉपी पर नहीं है तो बच्चा भी नकारा है और शिक्षक भी नकारा। मेरी राय में तो पढ़ाया गया पाठ बच्चे के समझ में आ जाना चाहिए। बच्चे ने पाठ से क्या सीखा। बच्चे को अनुभव क्या हुआ। ये महत्वपूर्ण है, न कि बच्चे ने कॉपी पर सारे प्रश्‍नों का हल किया है या नहीं, ये जांचना।

10 जुलाई 2010 :  ये हास्यास्पद है। नई शिक्षण विधियों में और नए तौर-तरीकों में भी अब ये माना जाता है कि आप बच्चे को लेख सुंदर बनाने पर अनावश्यक जोर न दें। हर बच्चे का लेख मोती जैसा आकर्षक और सुंदर हो ही नहीं सकता। चाहे कितना जोर लगा लें। पर ये क्या जरूरी है कि जिसका लेख बहुत सुंदर हो, वह शैक्षिक स्तर पर पर भी बेहद अच्छा होगा। क्या जिसका लेख अच्छा नहीं है, वो पिछड़ा होगा? लेख स्पष्ट पढ़ा जा रहा है, तो ठीक है न। बच्चों की कॉपी पर बार-बार लेख सुधारने की चेतावनी देने से क्या होगा। क्या बच्चा सिर पर पांव रखकर लेख सुधारेगा? कॉपी को लाल-काला करने से क्या होगा? क्या हर शिक्षक का लेख सुंदर है?

 17 जुलाई 2010 :  कक्षा-कक्ष में बैठक व्यवस्था के भी कई मायने हैं। बुनियादी शिक्षा से ही बच्चों को लड़का-लड़की के भेद के साथ बिठाया जाता है। क्या जरूरी है कि हम उन्हें अलग-अलग बिठाएं। छात्र-छात्राओं में बहुत सारी अनर्गल बातें इसलिए भी होती हैं कि उन्हें दूर-दूर बिठाया जाता है। यदि वे मिल-जुल कर बैठते हैं तो क्या भद्दी बातें वे कर पाएंगे। हम क्यों नहीं समझते जिस परिवार में सिर्फ दो ही लड़के हों, या दोनों ही लड़कियां हों या एक लड़का-एक लड़की हों तो बेहतर विकास किसका होगा। जाहिर है, जहां एक लड़का-एक लड़की है। तो फिर हम स्कूल की बैठक व्यवस्था को क्यों नहीं ठीक रखते। प्रार्थना सभा में भी ऐसा ही होता है। आखिर क्यों?

24 जुलाई 2010 :  मैंने कक्षा 9 की बैठक व्यवस्था में मेधावी, कम मेधावी और साधारण छात्रों को मिला-जुला कर बिठाया ताकि समूह में वे आपस में सहयोग से तेजी से सीखें। लेकिन दो दिन बाद वे अपनी इच्छानुसार पहले की स्थिति में बैठ गए। मैंने समझाया कि आखिर कुछ कारण ही रहा होगा कि मैंने ऐसा किया। मुझे अच्छा नहीं लगा कि आप लोगों ने अपनी दोस्ती, पसंद-नापसंद के हिसाब से अपनी सीटें बदल लीं। जबकि कक्षा में हम सब एक-दूसरे के दोस्त हैं, भाई हैं, बहिन हैं। यहां तक कि हम एक-दूसरे के शिक्षक भी हैं। हम एक-दूसरे से सीखते हैं और एक-दूसरे को सीखाते भी हैं।

31 जुलाई 2010 : आज अचानक कुछ पन्ने उलटे। कुछ अंश पढ़कर अच्छा लगा। लेकिन कुछ अंश पढ़कर मुझे यह भी लगा कि मैं आत्ममुग्धता में आकर अपने बारे में ही लिखने लगा हूं। पहले ही दिन तो यह सोचा था कि स्कूल बाल जीवन और बच्चों से जुड़कर जो कुछ अनुभव होंगे, उन्हें ही साझा करूंगा। लेकिन यह क्या? मैं तो अपना ही विवरण लिखने लगा। सोचा कि टाइप करते हटा दूं। फिर सोचा यह तो अपनी कमजोरी छिपाना भी तो होगा? अब आगे से ध्यान रखूंगा। यहां तक पढ़ते-पढ़ते पाठक को भी तो पता चले कि मेरी मनःस्थिति में अपने लिए क्या सोच है। मेरी समझ क्या है। आज इतना ही। विद्यालय से जुड़ी गतिविधियां बहुत कुछ सिखाती हैं। लेकिन जो कुछ सिखाती है, हम उसका उपयोग रोजमर्रा की कक्षा में क्यों नहीं कर पाते?

30 जुलाई 2010 : आज अपराह्न हमारे प्रधानाचार्य कार्यमुक्त हो गए। पाबौ स्थित बिडौली कॉलेज के लिए। मुक्त रूप से उनका विश्लेषण किया जाए तो अनुशासन प्रिय थे। मगर ऐसा अनुशासन जिससे वे खुद न बंधे हों तो? कक्षा-कक्ष में पढ़ाई होनी चाहिए। मगर जब उन्हें किसी शिक्षक से बात करनी हो या गप्पे लड़ाने का मन हो तो फिर कोई वादन क्या कोई क्लास क्या। दरअसल मैंने महसूस किया है कि बी.एड. की योग्यता एक अलग महत्व रखती है। ठीक उसी तरह जिस तरह एक राज्य सभा और लोक सभा सांसद में अंतर हो जाता है। यहां मैंने महसूस किया है कि जो अच्छा शिक्षक है, उसे किसी डिग्री की क्या आवश्यकता? जो अच्छा शिक्षक नहीं है, वह चाहे कितने प्रशिक्षण ले ले, कक्षा में बेहतर नवाचार नहीं कर सकता।

01 अगस्त 2010 : मैं परंपरागत शिक्षण को आज के संदर्भ में खारिज करता हूं। शु़द्ध उच्चारण की अनिवार्यता बुनियादी विद्यालयों में तो कतई नहीं होनी चाहिए। बच्चे स्थानीयता को छोड़ कर एकल स्वर लेकर आगे बढ़ेंगे तो सांस्कृतिक विविधता कहां रह जाएगी। हम आज किसी भी व्यक्ति को उसकी बोली-भाषा से ही पहचान पाते हैं कि ये जरूर उस क्षेत्र का है। इसके पीछे कारण है कि उसके संवाद में क्षेत्र की बोली-भाषा का पुट साफ झलकता है। मातृभाषा की उपेक्षा करना, उसे नजर अंदाज करने का कार्य हमारे स्कूल कर रहे हैं। हम ज्यादा जोर शुद्ध उच्चारण पर देते हैं। स्थानीय बोली-भाषा का कोई शब्द किसी बच्चे ने कह दिया तो उसका उपहास उड़ाते हैं। हम शिक्षकों को गहन प्रशिक्षण की आवश्यकता है।

3 अगस्त 2010 : कक्षा 9 में एक बालक बहुत शरारती था। अधिकांश शिक्षक उसे कक्षा 9 में रोकने के लिए सहमत थे। मैंने कहा भी कि यदि वो अपनी मेहनत से पास हो रहा है तो हम भला उसे कैसे रोक सकते हैं। बहरहाल सालाना परीक्षा में अपनी उदण्डता और शरारत के चलते भी उसने मेहनत की और अच्छे अंकों से पास हुआ। मैंने पूर्व में भी उसे कई बार समझाया। शिक्षा का महत्व बताया। एक दिन तो प्रार्थना स्थल पर ही वो साथी शिक्षक से उलझ पड़ा। शिक्षक ने उसे भगा दिया। गाली-गलोज करता हुआ वह फिर कभी स्कूल नहीं आया। प्रधानाचार्य भी उसे ढीठ की संज्ञा दे चुके थे। बहरहाल कक्षा दस में प्रवेश के बाद भी वो कई दिनों तक स्कूल नहीं आया। कक्षाध्यापक ने उसका नाम काट दिया। कई दिनों बाद पुनःप्रवेश की बाबत उसके अभिभावक आए। सभी शिक्षक इस पक्ष में नहीं थे कि उसे प्रवेश दिया जाए। अनुशासनहीनता के चलते उसकी टी.सी. काट दी गई। मैं कक्षा में था। अजीब सा लगा। पर क्या करता। एक दिन वही छात्र पौड़ी मिला। उसने पौड़ी के कॉलेज में प्रवेश ले लिया। अब स्कूल आते-जाते वह मिल जाता है। मुझे तो वह नमस्ते करता है पर बाकि शिक्षकों को वह नमस्ते नहीं करता। मैंने महसूस किया है कि बच्चे हमारे व्यवहार को याद रखते हैं। पर हम भूल जाते हैं कि बच्चे हमेशा बच्चे नहीं रहते। वे समझदार होने पर आपका आकलन कर ही लेते हैं। हम शिक्षक हैं, कोई तानाशाह नहीं।

20 अगस्त 2010  : बागेश्वर में स्कूल के पीछे मलबा आ जाने से 18 बच्चे काल कवलित हो गए। यह हादसा 17 अगस्त को हुआ। यह हादसा कहीं भी हो सकता है। किसी के साथ भी हो सकता है। अब सरकार चेती है कि विद्यालयी भवनों के लिए इतनी राशि उपलब्ध करायी जाएगी। ‘रोटी, कपड़ा और मकान’ ये राज्य के दायित्व होते हैं। मगर आज की सरकारें ये तीनों चीजे़ मुहैया कराने में असमर्थ हैं। कुछ जागरूक संस्थाओं और शिक्षाविदों ने भूखरहित भोजन का अधिकार आंदोलन चलाया। आज बुनियादी स्कूलों में मीड डे मील चल रहा है। इसे हाई स्कूल स्तर नहीं, इण्टर स्तर तक चलाया जाना चाहिए। बहरहाल, बच्चों की मौत पर तीन दिन का राज्य शोक मनाया गया। कई शिक्षकों को संवेदनाओं की चिंता नहीं, उन्हें तो यूं ही बैठे-ठाले अवकाश मिल गया। श्रद्धांजलि के छूटते ही छुट्टी की खुशी मास्टरों के चेहरे में साफ दिख रही थी। बच्चों की क्या कहें, बच्चे तो बच्चे हैं, छुट्टी का घंटा बजते ही बच्चे तो खुश होंगे ही।

25 अगस्त 2010 :  स्कूल हो या घर। शिक्षक, अभिभावक और समाज भी बच्चों में प्रतियोगिता की होड़ जगा रहे हैं। ऐसी प्रतियोगिता, जिससे हर बच्चा अव्वल आना चाहता है। प्रथम तो एक ही रहेगा। फिर पीछे रहने वालों के हाथ में लगती है,  मायूसी। ऐसी मायूसी जो उन्हें कुण्ठित करती है। गलत मनोभाव जगाती है। इससे यही बच्चे समाज में असामाजिक काम करने लगते हैं। ‘मैं’ का भाव जो बच्चों में तेजी से गहराता जा रहा है, उसके लिए हम शिक्षक भी तो जिम्मेदार हैं। हर कोई सौ फीसदी अंक क्यों लाए? हर कोई प्रथम, द्वितीय और तृतीय क्यों आए। तीसरा खुद को दूसरे से और दूसरा खुद को पहले से कमतर आंकता है। शीर्ष पर न रहने का दुख उसे लंबे समय तक व्यथित करता है।

26 अगस्त 2010 : हम शिक्षक ऐसा क्यों करते हैं कि जो बच्चे हमारी कक्षा पास कर बड़ी कक्षा में चले जाते हैं तो हम उन्हें नजरअंदाज करने लग जाते हैं। हमारा व्यवहार ऐसा हो जाता है कि अब हमारा आप लोगों से कोई मतलब नहीं। बच्चे इस व्यवहार को बड़ी हैरानी से महसूस करते हैं। हमारी उदासीनता अच्छी नहीं। ये क्या बात हुई कि हम जिन कक्षाओं को नहीं पढ़ाते तो उन कक्षाओं में पढ़ने वाले बच्चे हमारे नहीं हैं। ये व्यवहार हमें कहां ले जाएगा, यह बात दूसरी है। मगर बच्चे ऐसे व्यवहार से कहां पहुंचेंगे,  इस पर विचार करने की आवश्यकता है।

28 अगस्त 2010 : जजों को नकल करते पकड़ा गया। क्या होगा इनका, जिनके हाथ पर न्याय करने की जिम्मेदारी दी गई है, वे ही नकल करके अव्वल आना चाहते हैं। अब बताइए, हम स्कूलों में बच्चों को परीक्षा में, कक्षा में अपना-अपना करने की घुट्टी पिलाते हैं। बच्चे नकल की प्रवृत्ति कहां से सीखते हैं? नकल करने का भाव ही क्यों आता है? क्या ऐसा तो नहीं कि परीक्षा और मूल्यांकन ही दोषपूर्ण है। या परीक्षार्थी का आत्मविश्वास कमजोर है। पर ये जज जिनका आत्मविश्वास बड़े-बड़े अपराधियों को सलाखों के पीछे भेजने के लिए होना चाहिए, बेकसूर को बाइज्जत बरी का निर्णय देने का विश्वास इन जजों में होना चाहिए, ये नकलची हैं। उफ क्या होगा। भावी पीढ़ी क्या करेगी। क्या दिशा लेकर ये नौनिहाल नागरिक बनेंगे?

29 अगस्त 2010 : कक्षा में बच्चे नजरें झुकाएं रहते हैं। शिक्षकों से नजरें नहीं मिलाते। क्या यह ठीक है? सब जगह नहीं होता तो बहुत जगह होता ही है। उस पर शिक्षकों का तुर्रा यह है कि यह संस्कार है। बच्चे हैं शिक्षकों से कैसे नजर मिलाएंगे।

30 अगस्त 2010 : संस्कृत अकादमी द्वारा संस्कृत के प्रचार-प्रसार के लिए खण्ड विकास स्तरीय प्रतियोगिता में निणार्यकों में मैं भी रहा। आशुभाषण, वाद-विवाद प्रतियोगिता, समूह गान, सामान्य ज्ञान प्रतियोगिता, नृत्य एवं नाटक प्रतियोगिता आदि। पौड़ी नगर और उसके आस-पास के विद्यालयों ने प्रतिभाग किया। मैंने साफ महसूस किया कि नगर के विद्यालयों के बच्चों के पास संसाधनों की कमी नहीं थी। वे हर चीज से खुद को परिपूर्ण किये हुए थे। वहीं ग्रामीण विद्यालयों के बच्चे स्कूली गणवेश में ही अपनी प्रस्तुतियां दे रहे थे। उनके चेहरे में पूर्व से ही झिझक, अपने को कमतर समझ लेने का भाव पहले से ही था। दिलचस्प बात यह है कि अधिकांश निर्णायक भी प्रदर्शन में बच्चों की आत्माभिव्यक्ति को कम और बाहरी दिखावे को ही महत्वपूर्ण मान रहे थे। एक शिक्षक तो नृत्य नाटिका और नृत्य गीत को एक ही चीज बताने पर तुले हुए थे। कुल मिलाकर इन प्रतियोगिताओं का मकसद भी बच्चों में और हीन भावना जगाने के साथ अव्वल आने के लिए साम-दाम-दण्ड-भेद की भावना को जमाने का रहता है। पूर्व से चली आ रही इस प्रकार की अस्वस्थ प्रतियोगिताओं को बंद किया जाना चाहिए। आखिर 15-20 विद्यालयों को बुलाकर उनमें से अव्वल टीमों को छांटने का जो तरीका है यह बच्चों में प्रतिस्पर्धा की जगह नकल, हथकण्डे और दूसरों को कमतर आंकने का भाव ज्यादा जगाता है।

31 अगस्त 2010 : आज राजकीय बालिका इंटर कालेज में संस्कृत अकादमी द्वारा आयोजित विभिन्न प्रतियोगिता के आयोजन में निर्णायक की भूमिका में था। वाद-विवाद, आशुभाषण, सामान्य ज्ञान, नृत्य, समूह गान और नाटक गतिविधियों में थे। ठीक है, कुछ अव्वल आते हैं। कुछ को छोड़कर बाकि पीछे ही रह जाते हैं। उनमें मायूसी, हताशा, निराशा, कुण्ठा नहीं रह जाती। आखिर श्रेष्ठ को सर्वश्रेष्ठ बनाने की दौड़ में ही तो इन प्रतियोगिताओं को देखा जाता है। हम स्कूल में मेधावी छात्रों को ही इन प्रतियोगिताओं में प्रतिभाग करवाते हैं। वे अन्य विद्यालयों से होड़ करते हैं। ऐसे खण्ड स्तर पर, जनपद स्तर पर, राज्य स्तर पर और अखिल भारतीय स्तर पर होड़ मची रहती है। अंत में प्रथम, द्वितीय, और तृतीय का चयन होता है। कुछ सांत्वना पुरस्कार। आखिर इन सबका क्या मतलब है। यह कहना कि जो पीछे रह गए वो कल आगे आएंगे। जो सिर्फ दर्शक रहे, वे कल प्रतिभाग करेंगे। आखिर स्वस्थ प्रतिस्पर्धा होती है? नहीं। मुझे तो लगता है कि ऐसी प्रतियोगिताएं हों, जो हमें सहभागिता, सामुदायिकता, सहयोग, प्रेरणा और प्रेम का पाठ पढ़ाए। जरा टटोलिए खुद को क्या ऐसा होता है?

3 सितंबर : 5 सितंबर को शिक्षक दिवस है। मैं तो संस्कृत अकादमी द्वारा आयोजित प्रतियोगिताओं में जीजीआईसी में व्यस्त रहा। कल पांच दिन बाद स्कूल जाना है। लेकिन सुना है कि 5 को संडे है तो 4 को ही शिक्षक दिवस मनाया जा रहा है। ये क्या बात हुई ?

4 सितंबर 2010 : कल रात से बारिश लगी है। आज सुबह का ही स्कूल रहा। बहरहाल। बच्चों को शिक्षक दिवस मनाने की बात कही तो वे 10 मिनट की तैयारी में ही शुरू हो गए। आज कई शिक्षक नहीं थे। मगर जो भी थे, बच्चों ने हर किसी शिक्षक की नकल की। हमारे आचरण, आदत की नकल की। अन्य बच्चों ने पहचाना कि अमुक शिक्षक की नकल की जा रही है। बच्चों ने हमारे हाव-भाव को, हमारी आदतों को और हमारे द्वारा अक्सर दोहराए जाने वाले वक्तव्यों को अभिनय में शामिल किया। जिससे अन्यों ने पहचाना कि अमुक की नकल की जा रही है। अच्छा लगा और एक बात समझ में आई कि बच्चे कक्षा-कक्ष में छोटी-छोटी बातों को बड़ी गंभीरता से सुनते-समझते हैं। हमें बच्चों को हलके ढंग से नहीं लेना चाहिए।

9 सितंबर 2010 : आज राजकीय बालिका इंटर कॉलेज पौड़ी संस्कृत अकादमी हरिद्वार द्वारा आयोजित जनपदीय संस्कृत छात्र प्रतियोगिता का आयोजन हुआ। अत्यधिक बारिश और भूस्खलन के कारण कई ब्लॉक तो आ ही नहीं पाए। खैर 1 बजे शुरू हुआ। मैं निर्णायक सदस्य के रूप में था। आशु भाषण में। बच्चों ने अच्छा किया। एक बालिका अपने विचार दिए गए विषय पर नहीं रख सकी। रो पड़ी। मैंने उसका हौसला बढ़ाया। फिर भी वह संयत नहीं हो पाई। बाद में मैंने उसे बुलाया। समझाया। कहा-‘‘ये प्रतियोगिताएं हर किसी को अव्वल नहीं बनाती। तुमने प्रतिभाग किया यह बड़ी बात है। मगर जीवन के संघर्ष और प्रतियोगिता में तुम अव्वल रहोगी। मेरा विश्वास है।’’ यह कहने पर वो फफक-फफक कर रो पड़ी। फिर जाकर उसे कुछ आराम-सा मिला। ये प्रतियोगिता मेधावी छात्रों को ओर अलग-थलग कर देती है, सामान्य बच्चों से। ऐसी प्रतियोगिता क्यों नहीं हो सकती, जिसमें अधिक से अधिक बच्चों का प्रतिभाग हो सके।

25 सितंबर 2010 : आजकल गढ़देवा के 60 वर्ष पूर्ण हो जाने के अवसर पर एक स्मारिका का प्रकाशन पर काम कर रहे हैं। राजकीय बालिका इंटर कालेज में। आज एक बालिका मेरे पास आई। कहने लगी-‘‘सर। मैं भाषण प्रतियोगिता में थी। मैं जनपद स्तर की प्रतियोगिता में कोई स्थान प्राप्त नहीं कर सकी। मुझे मैडम ने डांटा-भला बुरा कहा। अब मैं आगे से कभी कोई प्रतियोगिता में शामिल नहीं होंगी।’’ मैंने समझाया। मगर वह रोने लगी। हालांकि बाद में वह समझ गई और मान गई कि प्रतियोगिताओं में शिरकत करना भी एक तरह से बड़ी उपलब्धि है। पर क्या ऐसा मैडम को करना चाहिए था। हम शिक्षक ही बच्चों में अव्वल आने की दौड़ करवाते हैं। पिछड़ने पर उन्हें डांटते हैं। वे हमारी बातों को गहराई से लेते हैं। शायद जीवन भर भूलते भी नहीं। हमें ऐसा करना चाहिए? नहीं न?

सभ्यतागत निकष का साक्ष्य : ओमा शर्मा

oma sharma

ओमा शर्मा

एक छोटे, लेकिन कई मामलों में अनोखे देश स्विटजरलैंड की सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और भौगोलिक विशेषताओं से परिचय करती लेखक ओमा शर्मा की स्विटजलैंड की डायरी-  

स्विटजरलैंड की चर्चा हमारे यहाँ कई सन्दर्भों में होती है। स्विस बैंकों का जिक्र जन्तर-मन्तर से लेकर संसद तक बरसों से ही भारतीय राजनेताओं-कारोबारियों-नौकरशाहों के काले धन की शरणस्थली के रूप में होता रहा है। प्राकृतिक-वैभव के स्तर पर कुछ जानकार कश्मीर को भारत का स्विटजरलैंड कह देते हैं। स्विस घड़ियाँ और चॉकलेट्स भी खूब मशहूर हैं। इधर के दशकों में आई कुछ बम्बइया फिल्मों ने स्विटजरलैंड के पर्यटकीय सौन्दर्य को भारतीय जनमानस के बीच यूँ सुलभ कर दिया है कि वह अपने कुल्लू-मनाली जैसे घरेलू हिल-स्टेशनों का विस्तार सा लगता है। बहरहाल, स्विटजरलैंड की शौहरत इतनी और ऐसी है कि आपके पास यूरोप में किसी एक जगह जाने का प्रस्ताव हो तो इटली, फ्राँस, जर्मनी, इंग्लैंड और मिस्र की पुरातन-ऐतिहासिक-कलागत सशक्त दावेदारी के बावजूद स्विटजरलैंड को चयनित करने में किसी को हिचक नहीं होगी। और वाकई, जिनेवा की जमीन पर कदम रखने से पूर्व ही हम उसके आकर्षण में बंधने लगे थे। यह मई का महीना था। हमारे यहाँ गर्मी की क्रूरता इसी महीने ज्यादा असहनीय हो उठती है जबकि स्विटजरलैंड के पहाड़ों पर आच्छादित बर्फ इसी समय पिघलने लगती है जिससे वहाँ की सर्दी सहनीय और सुहावनी हो जाती है। जिनेवा एयरपोर्ट की हवाई पट्टी की तरफ क्रमश: उतरते विमान से नीचे का वह अलसाया सफेद सौन्दर्य इसी कारण अपने विस्तार से नैसर्गिक खिंचाव जगाने लगा था।

स्कूल के दिनों से ही हम जिनेवा को अनेक कारणों से जानते आए हैं जिसमें प्रमुख है यहां यूनेस्को और विश्‍व स्वास्थ्य संगठन जैसी संस्थाओं के मुख्यालयों का होना। ऐसी दो सौ संस्थाओं के मुख्यालय जिनेवा में बताए जाते हैं। जेहन में यह बात भरी थी तो जिनेवा शहर के विस्तार और भीड़-भाड़ के बारे में मन कयास लगाने लगा। लेकिन उसके एयरपोर्ट पर उतरते ही एहसास हो गया कि यह तो अलग ही दुनिया है। अपने यहाँ तीसरे पायदान पर विराजमान नागपुर, जोधपुर या गोहाटी भी ज्यादा भीड़ भरे हैं। यहाँ तो भीड़ जैसा कुछ भी नहीं और होगा भी क्यों जब शहर की कुल आबादी सत्रह लाख है। इमिग्रेशन की औपचारिकताएं पूरी होते ही एयरपोर्ट का लाउंज अपनी कर्फ्यूनुमा मुद्रा में लौट गया तो हम अपने पहले पड़ाव यानी मोन्त्रो (जिसे ज्यादातर भारतीय मोन्ट्रेक्स कहते हैं) जाने के लिए एयरपोर्ट के निकास द्वार पर आ गए। स्विटरजरलैंड के सभी एयरपोर्ट रेलमार्ग से जुड़े हैं। रेल यहाँ के यातायात का प्रमुख साधन है जो अमरीकी यातायात व्यवस्था के एकदम उलट है। अमरीका में ज्यादातर लोग या तो अपनी कारों में चलते हैं या हवाई जहाज से (निजी आजादी के इस मूल्य को अमरीकी ऑटो कम्पनियों ने बड़े कारोबारी तरीके से भुनाया है)। स्विस-पास एक ऐसी सहूलियत है जिसकी बिना पर आप यहाँ रेल, बस या मोटरबोट किसी पर मनमाफिक सवारी कर सकते हैं। स्विस-पास का मूल्य रोजाना या प्रवास अवधि के मुताबिक तय होता है जिसे स्विस एजेन्सियों से भारत में भी खरीदा जा सकता है। हमने यही किया था इसलिए जिनेवा एयरपोर्ट के निकास द्वार से जुड़े रेलवे स्टेशन पर आ गए और मोन्त्रो जाने वाली ट्रेन में बैठ गए।

जिनेवा से कोई डेढ़ सौ किलोमीटर दूर है मोन्त्रो लेकिन समय के लिहाज से फकत पौने दो घन्टे दूर। और उस पर स्विस रेलें? मानो पूरे देश में दिल्ली मेट्रो बिछी है। भीड़ जैसी चिड़िया जो अपने यहाँ हरदम और हर जगह आजिज किए रहती है, यहाँ पर भी नहीं मारती दिखती है इसलिए आप गंतव्य तक यात्रा का आनन्द उठाते हुए जा सकते हैं। बल्कि लगता है स्विटरजरलैंड में रेल से यात्रा करना अपने आप में पर्यटकीय प्रयोजन है…अत्याधुनिक साफ-शफ्फाक कोच, हर प्लेटफार्म पर एलिवेटर, स्वचालित दरवाजे… रास्ते की गैलरी के दोनों तरफ आमने-सामने दो-दो व्यक्तियों के लिए सोफेनुमा सीटें इस मिजाज से लगी हैं कि लगे आप घर की बैठक में आ बैठे हैं। दोनों तरफ खिड़कियों के शीशे जानबूझकर विशालकाय बनाए गए हैं ताकि रास्ते के विपुल प्राकृतिक सौन्दर्य की अनदेखी न हो। टिकट कन्डक्टर जब मुआइना करने आया तो लग रहा था कि वह अपनी नौकरी का फ़र्ज अदा करने नहीं, अपने मुल्क के पर्यटक-प्रेमी होने के खजाने में अपनी तरफ से कुछ इजाफा करने आया है। टिकटों को झूठ-मूठ को देखते हुए ही वह कयास लगाकर पूछता है कि क्या हम ‘इंडिया’ से आए हैं? इंडिया में कहाँ से? मुम्बई, ओके…बॉलीवुड…अभी कहाँ-कहाँ घूम चुके हैं? कब तक रहेंगे? आगे कहाँ जाने का इरादा है। छोटी बेटी की तरफ एक वात्सल्य मुस्कान बिखेरता है और शुभकामनाएं देता हुआ आगे बढ़ जाता है।

जिनेवा से बाहर निकलते ही एक तरफ जिनेवा झील का विस्तार शुरू हो गया। यह झील दुनिया की सबसे बड़ी और लम्बी झीलों में गिनी जाती है और मोन्त्रो तक साथ चलती है। मुझे अचानक स्टीफन स्वाइग की कहानी ‘भगोड़ा’ याद हो आयी जिसे बरसों पहले मैंने झीलों के अपने शहर भोपाल से निकलने वाली एक पत्रिका ‘अक्षरा’ के लिए अनुदित किया था। विश्‍वयुद्ध (प्रथम) की फिजूलियत तले एक सामान्य नागरिक (अनिवार्य सैनिक सेवा के चलते जिसे किसी अन्जान मुल्क के खिलाफ लड़ने भेज दिया जाता है) को टिपाई मर्मांतक लाचारी को रेखाँकित करती कहानी का ‘बोरिस’ इसी झील के किनारे दम तोड़ता है। पाउलो कोल्हो का ‘इलेवन मिनट्स’ भी जिनेवा में घटित होता है लेकिन उसमें जिनेवा का राग-रंग कहीं नहीं आया है। अपने ज्यादातर लोमहर्षक उपन्यासों की तर्ज पर नायिका मारिया के बहाने यहाँ भी लेखक जीवन, प्यार और अध्यात्म की ऐसी लुगदी तैयार करता है कि क्षोभ होता है। कैसे-कैसे उम्दा लेखक और उनकी नायाब कृतियां अंधेरे में धूल खा रही हैं और इधर…। लेखकी का एक मजेदार पक्ष यह भी तो है, यह भी अच्छे-खराब से नहीं, माँग-आपूर्ति की शक्तियों से संचालित होती है। विदेशी लोमहर्षक लेखकों में इरविंग वालेस इकलौता होगा जो गम्भीर और लोकप्रिय साहित्य के दोनों छोरों को समान प्रवीणता से सम्‍भाल ले जाता प्रतीत होता है हालाँकि गम्भीर साहित्य वाले इसे मानने से परहेज करेंगे।

भारतीय पर्यटकों के लिए मोन्त्रो बहुत परिचित या पोपूलर स्थल नहीं है लेकिन छुट्टियाँ बिताने का अपने आप में यह आदर्श हो सकता है– छोटा, सुविधा-सम्पन्न, शान्त और प्राकृतिक सौन्दर्य से सराबोर, बर्फ ढके पहाड़ों के पैताने बैठी जिनेवा झील के दूसरे छोर पर बसा हुआ। मुम्बई की तरह एक रैखिक- बमुश्किल पाँच किलोमीटर फैला- और आबादी महज बीस-बाइस हजार। झील के साथ लगे प्रोमिना (यानी अपना माल रोड) पर जीवन की उपस्थिति और उत्साह दिखते हैं लेकिन एक वीरानापन (या एकान्त !) हर तरफ पसरा ही होता है। रेल के जिस डिब्बे में हम थे वह पूरे वक्त दो-तिहाई खाली रहा लेकिन इस बिना पर ट्रेनों की न आवृति कम की जाएगी न आकार। जिस रेस्त्राँ में हमने पहले रोज खाना खाया उसमें हमारे अलावा सिर्फ एक दम्पत्ति और था लेकिन इससे वहाँ परोसे जाने वाले शाकाहारी एवं माँसाहारी सलादों और व्यंजनों के वैविध्य (स्प्रैड) पर असर नहीं पड़ेगा। दिन चाहे रात के साढ़े-नौ बजे मुंदता हो (निकलता वही छ्ह बजे है) मगर ज्यादातर लोगों और सेवाओं के कार्य करने के घन्टे तय हैं। यानी सुबह दस-ग्यारह बजे खोले गए रेस्त्राँ में भी सात बजे के बाद कुर्सियों को मनाही स्वरूप आढ़ा कर दिया जाएगा। सबके अपने ठीये-ठिकाने और घर-परिवार हैं जिनकी अपनी अहमियत है। प्रति व्यक्ति आय के लिहाज से (सत्तर हजार डॉलर) स्विटरजरलैंड दुनिया के सबसे अमीर देशों में गिना जाता है लेकिन जीवन में लोगों के संतोष और संतुष्टि के नजरिए से यह दुनिया में अव्वल आता है। यानी दौलत होने के बावजूद उसे ‘और’ हासिल करने की पूँजीवादी हवस यहाँ के लोगों में नहीं है। शायद इसीलिए यहाँ के औसत आदमी की उम्र अस्सी बरस से भी ज्यादा है। अभी ब्राजील के रियो शहर में जलवायु पर हुए अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन की रिपोर्टिंग के सन्दर्भ में मैंने जाना कि पर्यावरण के हिसाब से स्विटरजरलैंड दुनिया का उत्कृष्ठतम देश है। यूरोप-अमरीका के होटलों में बाथरूम की टोंटी से आने वाला पानी आमतौर पर पीने योग्य होता है मगर स्विटरजरलैंड में तो झील का पानी पीने योग्य घोषित है। आँकडों के अनुसार बारिश और बर्फ यहाँ के बाशिन्दों की जरूरत से बीस गुना ज्यादा पानी मुहैया करा देते हैं। मोन्त्रो की पचास फीसदी जमीन पर जंगल हैं, पच्चीस फीसदी पर कृषि होती है और बाकी पर घर-होटल या उद्योग चलते हैं। मेरा मन हो आया कि वहाँ के खेतिहर जीवन से साबका हो जाये और पता लगाऊँ कि वहाँ के किसान की दिनचर्या, रवैया और आकांक्षाएं क्या हैं? परिवार के साथ जाने पर इस तरह की गुंजाइश नामुमकिन हो जाती है। दूसरे, कुल श्रमशक्ति का फकत चार प्रतिशत भाग ही कृषि में कार्यरत होने से यह समझा जा सकता है कि वहाँ के किसान का जीवन एक औसत भारतीय किसान के जीवन से कितना भिन्न और बेहतर होगा। थोड़ी आँखिन देखी और थोड़ी तहकीकात से यह तो फिर भी ज्ञात हो जाता है कि पूरे स्विटजरलैंड में गाँव-शहर के विभाजन जैसा ज्यादा कुछ नहीं है। शहरों में बड़े-बड़े और खुले-खुले घर हैं तो तथाकथित गाँव में बाकायदा हर वह सुविधा-सहूलियत है जो किसी शहर में।फिर शहर भी कैसे होंगे जब पूरे मुल्क की आबादी सिर्फ अठहत्तर लाख है (जिसमें सत्रह लाख विदेशी हैं)। राजधानी बर्न कुल बारह लाख की बस्ती है। पाँच-छह शहरों को जाने दें तो बाकी सब नामचीन पर्यटकीय आकर्षण पचास हजार की आबादी के पेटे में रहेंगे, जैसे स्विस रिवेरा (कुलीनों की बस्ती) के अन्तर्गत आने वाला मोन्त्रो है। लेकिन ऐसे सभी कस्बे-शहर मुख्य मार्गों से जुड़े हैं। रेल या जन-परिवहन की बसें यहाँ के यातायात की रीढ़ हैं। अपने मुल्क में निजी वाहनों में घूमने-फिरने के अभ्यस्त भारतीयों को भी इसमें जरा असुविधा नहीं होती है। यहाँ बसें लम्बी और रेलें छोटी होती हैं और बिजली से चलती हैं। सब की आवृत्तियाँ और आने-जाने का समय तय है। किसी आँधी-तूफान या असामान्य कारण से इसमें कुछ आगा-पीछा हो जाए तो हो जाए वर्ना एक मिनट की भी हेर-फेर नहीं होगी। हर बस-स्टैंड पर बना इलैक्ट्रॉनिक बोर्ड वहाँ से अगले आधे घन्टे में गुजरने वाली बसों की प्रतिक्षावधि दिखाता रहता है। बस स्टैण्ड पर ही स्वचालित टिकट कि किओस्क बने हैं जिनमें क्रेडिट कार्ड और नकद दोनों की सुविधा है। बस आपको सिर्फ लाने ले-जाने के लिए हैं, उसमें सिर्फ चालक होगा, कण्डकटर नहीं। आपको अगले किसी स्टॉप पर उतरना है तो सहारे के लिए जगह-जगह बने खंबों में लगे बटन को दबा दीजिए, यही घन्टी की मार्फत चालक को बस रोकने का आदेश होगा। किसी स्टॉप पर विकलाँग सवारी को चढ़ना- उतरना है तो उसे बाइज्जत सहारा देने की जिम्मेदारी चालक वहन करता है। यह कोई संयोग नहीं है। पूरे यूरोप और अमरीका में विकलाँगों को एक सामाजिक मूल्य के स्तर पर खास मित्रवत निगाह से देखा जाता है। हर दुकान-बाजार या पार्किंग में उनके लिए विशेष इन्तजाम रहते हैं ताकि उन्हें लाचार या दोयम जैसा कुछ न लगे।

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रॉक गायक फ्रेडी मर्करी की मूर्ति के पास ओमा शर्मा।

रॉक गायक फ्रेडी मर्करी की मूर्ति के पास ओमा शर्मा।

अंग्रेजी में प्रयुक्त ‘कासल’ शब्द का हिन्दी में क्या समकक्ष हो सकता है? गढ़, किला या महल? मगर सांस्कृतिक स्तर पर ये तीनों ही ‘कासल’ से इतर पड़ते हैं। कुछ रियासतों में नवाबों द्वारा बनाई- अब लुप्तप्राय- ‘गढ़ी’रौब-रुतबे में शायद इसके निकटतम पड़े। स्विटजरलैंड में कई स्थलों पर कासल बने हुए हैं…गुए, ग्रांडसन, थुन, मोंविलो, मुनोट वगैरा वगैरा । ज्यादातर चार सौ-पाँच सौ वर्ष पुराने हैं और किसी पहाड़ी या झील के किनारे बने हैं। बहुर भव्य न होते हुए भी अपने भीतर अपने अस्तित्व का इतिहास समेटे हुए…चारों तरफ से घिरी तीन-चार मंजिला इमारत अपने दरवाजों, दीवारों, सीढ़ियों, छतों आतिशखानों और वास्तु स्वरूप में अतीत की अनकही दास्तानें समेटे हुए हैं। इनकी बुनियाद आड़े वक्त सुरक्षा प्रदान करने की नीयत से ही रखी गयी होगी लेकिन कुछ को छोड़कर सभी खास किस्म के कैदियों-विद्रोहियों की बामशक्कत करने के काम आती थीं। स्विटजरलैंड की सबसे मशहूर कासल- शीयोह- मोन्त्रो में ही मानी जाती है, शायद इसलिए कि यह सबसे पुरानी होगी- कोई आठ सौ साल पहले बनी। कवि बायरन ने इसके ऊपर सन् 1816 में कोई चार सौ पंक्तियों की ‘प्रिजनर ऑफ शीयोह’ नामक कविता लिखकर तो जैसे इसे अमरत्व ही प्रदान कर दिया। चित्रकार विलियम टर्नर और गुस्तव कोर्बेट ने इसको अपने-अपने केनवास पर उतारा तो वहीं रूसो और ड्यूमा ने इस पर अपनी कलम चलाई है। स्विटजरलैंड की दूसरी किसी ऐतिहासिक यादगार की तुलना में शियोह की गढ़ी सबसे ज्यादा पर्यटकों को आकर्षित करती बताई जाती है। मोन्त्रो की झील के सहारे एक-डेढ़ किलोमीटर चलती सड़क-पट्टी जैसे इस कस्बे में आने का हासिल है। सामने रंग बिरंगी बेंचें लगी हैं जिन पर बैठकर आप सामने पसरे बर्फ-आच्छादित चमकते पहाड़ों में मन भरमा लें, बीयर या और कुछ पीने का मन है तो झील के सहारे बने नीम-सुनसान पड़े रेस्त्राओं को आबाद कर दें या फिर शिराओं की तह को सहलाती सर्द शुद्ध वायु का प्रचुर सेवन करते हुए जगह के वातावरण की इन्तिहा पर मन ही मन फिदा होते रहें। और ध्यान रहे, यह सब नजारा या व्यवस्था सदियों पुरानी है। इसी कारण कभी चार्ली चैप्लिन ने इसे अपनी आरामगाह बनाया था। यहीं पर उन्होंने अपनी आत्मकथा लिखी थी। चैप्लिन का स्मारक मोन्त्रो के जुड़वाँ कस्बे वेवी में है। लेकिन मोन्त्रो की झील के किनारे टहलते हुए एक कद्दावर बुत से आपका मुकाबला जरूर होगा…मंच पर गीत-प्रस्तुति देता, दर्शकों के भीतर अपने जज्बे और जोश से जान फूँकने की अदा में हवा में उर्ध्वाधर लहराते एक हाथ की संगति से गायन पर एकाग्र करता अश्‍वेत युवक…। यह फ्रेडी मर्करी है। रॉक संगीत का अपने समय का बेहद लोकप्रिय और चर्चित स्टार-गायक। वह ‘क्वीन’ नामक बैंड से सम्बद्ध था जिसके एलबम दुनिया भर में लाखों बिकते थे (हैं)। एक समय उसकी लोकप्रियता ऐसी थी कि ‘टाइम’ पत्रिका ने उसे ब्रिटेन के सौ सबसे ताकतवर व्यक्तियों में शामिल किया था। फ्रेडी को मोन्त्रो बहुत पसन्द था। ‘आपको सुकून चाहिए तो मोन्त्रो आओ’ वह कहता था। मोन्त्रो जैसे कस्बे की खूबी यह भी है कि यहाँ बड़े से बड़ा सेलिब्रिटी आम आदमी की तरह घूम फिर और रह सकता है। अपने बैंड की दुनिया भर में होने वाली नशीली प्रस्तुतियों से थक-हारकर फ्रेडी यहीं आकर आराम और अगली एलबमों के गीत तैयार करता था। मोन्त्रो का यह सपूत सन् 1991 में मात्र पैंतालीस वर्ष की उम्र में एड्स का शिकार हो गया। वह समलिंगी था जो उसके बैंड के ‘क्वीन’ से भी संकेत देता है । एड्स जैसी बीमारी के ऊपर दुनिया का ध्यान उसकी मृत्यु के कारण यकीनन और केन्द्रित हुआ। सन् 1996 से मोन्त्रो का शासन सितम्बर के पहले सप्ताह में उसकी स्मृति मनाता है। मुझे बाद में पता चला कि फ्रेडी मर्करी का भारत से गहरा ताल्लुक था। उसकी पैदाइश भले तंजानिया में हुई हो मगर उसके पारसी माँ-बाप गुजरात के वलसाड जिले के रहने वाले थे। फ्रेडी का बचपन का नाम था फारूख बलसारा। पता नहीं वह अपनी जड़ों का दौरा करने भारत आया था या नहीं, लेकिन यह देखकर अच्छा लगा कि संगीत की चाहत के चलते किसी जगह के लोग एक परदेशी कलाकार को अपने खून की तरह ही चाहते और याद करते हैं।

राष्ट्रीयता के हर चालू और संकीर्ण ढर्रे से परे हटकर सोचना और देखना दरअसल स्विटजरलैंड की खास पहचान भी रही है। यह निर्विवाद रूप से दुनिया का सबसे गैर-राजनीतिक देश है। पहले और दूसरे विश्‍वयुद्धों के दौरान- और उसके बाद भी- जब छोटी-बड़ी हर किस्म की राष्ट्रीयता आत्मरक्षा या सुरक्षावश किसी न किसी खेमे में मोर्चाबन्द थी, स्विटजरलैंड किसी में शामिल नहीं हुआ। ‘दूसरों के फटे में अपनी टाँग मत डालो’ पंद्रहवीं सदी के सन्त निकोलस फ्लू का यह फलसफा सन् 1815 से ही स्विस जीवन और राजनीति का प्रेरक रहा है। सन् 1945 में जब संयुक्त राष्ट्र की स्थापना हुई तो उसके अनेक मुख्यालय यहीं पर स्थापित किए गए क्योंकि जिन महत्तर उद्देश्यों की खातिर संयुक्त राष्ट्र की नींव रखी गयी थी उन्हें यह मुल्क पहले से ही साधे हुए था( जबकि वह उसका सदस्य नहीं था)। अपने-अपने मुल्कों की सत्ताओं के सताए लेखक-कलाकारों को स्विटजरलैंड ने हमेशा खुले दिल से पनाह दी है। स्वाइग के नाटक ‘येरेमिहा’ की पहली प्रस्तुति सन् 1917 में ज्यूरिख में ही हुई थी। अपनी आत्मकथा में उसने लिखा भी है…उस प्रदेश के प्रवास में मुझे हर बार ही लुत्फ आता था…छोटे से रकबे में कितना भव्य मगर फिर भी कितने अकूत वैविध्य से अटा हुआ…यह स्विटजरलैंड में ही मुमकिन था कि अलग-अलग मुल्क बेअदावत एक जगह मिल बैठें और भाषाई-राष्ट्रीय मत-मतांतरों को आपसी सम्मान और नेकनीयत लोकतन्त्र की मार्फत बिरादरानेपन में बदल दें। पूरे गमज़दा यूरोप के लिए क्या खूब मिसाल ! शान्ति और स्वतन्त्रता का सदियों पुराना यह बसेरा मजलूमों की पनाह था। अपने वजूद की खूबी को बखूबी बरकरार रखते हुए भी यह हर तरह के विचार के स्वागत में उमड़ता था…यहाँ कोई अजनबी नहीं था…। यह वही समय था जब एक बीहड़ आयरिश लेखक जेम्स जॉयस स्विटजरलैंड में घुमक्कड़ी करते हुए ‘यूलीसिस’ जैसी कृति को अंजाम दे रहा था तो लोजान जैसे कस्बे में ईलियट ‘वेस्टलैंड’ को।

राजनीतिक निरपेक्षता से स्विटजरलैंड की विदेश नीति ही नहीं जन जीवन भी संचालित होता है। स्विस राष्ट्र की स्थापना सन् 1848 में हुई थी और तब से ही इसके राजनीतिक-समाजिक स्वरूप में विशेष परिवर्तन नहीं आया है। कुल तेईस राज्यों (केंटन) का संघ है स्विटजरलैंड। सभी राज्य पर्याप्त स्वायत्त ढंग से कार्य करते हैं। चार राष्ट्रीय पार्टियाँ केन्द्र सरकार के सात प्रतिनिधि चुनती हैं जो मिलकर केन्द्रीय मंत्रीमंडल बनाते हैं। यानी केन्द्रीय सरकार में विपक्ष जैसा कुछ नहीं है क्योंकि पार्टी के स्तर पर सभी सरकार के अंग हैं। किसी एक पार्टी के प्रस्ताव पर सभी बहस-मुबाहिसा करते हैं और लोकतांत्रिक ढँग से उसे खारिज या पारित करते हैं। प्रस्ताव खारिज होने की स्थिति में अपने यहाँ की तरह सरकार के ऊपर संकट नहीं आ जाता है। स्विटजरलैंड के लोकतंत्र की बड़ी विशेषता है यहाँ के लोगों की उसमें सतत भागेदारी। यहाँ का लोकतंत्र आमजन को हर चार साल बाद वोट डालने वाली मशीन के रूप में नहीं देखता है। आमजन मानो हर समय एक मजबूत निगहबान के रूप में मुस्तैद रहता है। पारित किए जाने वाले बहुत से कानूनों में जनमत करना लाजमी होता है। पचास हजार लोग हस्‍ताक्षर करके संसद द्वारा पारित किसी भी प्रस्तावित कानून को चुनौती दे सकते हैं; एक लाख लोगों के हस्ताक्षर के बाद तो किसी भी नए मसले पर जनमत जरूरी हो जाएगा। अपने यहाँ अन्ना टीम के लोग इसी नजीर को अपने यहाँ रोपना चाहते हैं जो सोच के स्तर पर सही है मगर यह किसी विशाल मशीन में एक पुर्जा बदलने जैसा होगा। एक दिलचस्प बात यह भी है कि स्विटजरलैंड की राजनीतिक व्यवस्था में पूर्णकालिक राजनेता लगभग नहीं होते हैं। ज्यादातर राजनेता कारोबारी या किसी और काम-धन्धे या पेशे से जुड़े हुनरमंद बा-रोजगार होते हैं। यानी वे जो जीविका के लिए राजनीति का ‘धन्धा’ नहीं करते हैं। एक और गौरतलब बात यह है कि सांसदों को मिलने वाला भत्ता उनके द्वारा संसद में गुजारे वक्त पर निर्भर करता है। उनकी तनख्वाह और भत्तों को बढ़ाने की माँग वहाँ भी जब-तब आयी है लेकिन जनमत द्वारा मँजूरी न मिल पाने के कारण उसे कामयाबी नहीं मिली है (क्या आपको अपनी संसद का इस मामले में सत्र के आखिरी पलों में बिना किसी बहस के सर्वसम्मति से सांसदों के भत्तों में तीन गुना बढो़त्तरी करने का रवैया याद आया)। राजनीतिकप्रतिनिधियों को अर्थलाभ या अर्थ से जुड़े मुद्दों पर मनमानी करने की बहुत कम गुंजाइश रहती है। नेता और आमजन के बीच फाँक या फासला-सा रहता ही नहीं है। किसी नेता को आप पहचानते हों तो हो सकता है वह बिना किसी सुरक्षाई ताम-झाम के अपने ‘पैट’ के साथ सुबह की सैर करता या नुक्कड़ के ‘कूप’ (वहाँ सर्वत्र फैली परचूरन सामान की दुकान) स्टोर में फल-भाजी खरीदता दिख जाए। राजनीति और लोकतंत्र का ऐसा सपाट और सादगी भरा रूप किसी के भीतर आहें भर सकता है। यह अकारण नहीं है कि प्रति व्यक्ति आय के लिहाज से विश्‍व के दस समृद्धतम देशों में शामिल होते हुए भी आय की असमानताएं स्विटजरलैंड में सबसे कम हैं जो इस बात से भी जाहिर है कि विश्‍व के सबसे अमीर खरबपतियों (बिलियनेएर्स) में स्विटजरलैंड का एक भी व्यक्ति नहीं है, जबकि भारत जैसे अपेक्षाकृत गरीब देश (जिसकी अमीर देशों में कहीं कोई गिनती नहीं है) के कम से कम तीन व्यक्ति बड़े ताब से हरदम उस सूची में बने रहते हैं।

क्या राज है स्विटजरलैंड की ऐसी स्वप्निल तरक्की का? पहाड़, बर्फ और झीलों की अकूत सम्पदा जरूर इसके पास है लेकिन क्या ये ऐसी मोहक और स्पृहणीय खुशहाली के कारक हो सकते हैं? यह सच है कि अपने प्राकृतिक, सामाजिक और राजनीतिक वातावरण के चलते दुनिया भर के करोड़ों पर्यटक यहाँ आते हैं जिससे कई खरब स्विस फ्रैंक का सीधा ही नहीं, होटल, एयरलाइन्स, ट्रैन और मनोरंजन जैसे उद्योगों को काफी सहारा मिलता है। लेकिन गौर से देखने-समझने पर लगता है कि यहाँ की खुशहाली और चौतरफा संतुलन के पीछे डेढ़ सदी से ज्यादा की राजनीतिक स्थिरता और आला दर्जे की राजनीतिक तटस्थता ही नहीं, बल्कि आर्थिक, सामाजिक और लोकतांत्रिक शक्तियों का ऐसा सोचा-समझा मॉडल कार्यरत है जो विकास के किसी साम्यवादी मॉडल के लिए तो कल्पनातीत होगा ही, पूँजीवादी मॉडल के लिए किसी दिवास्वप्न से कम नहीं होगा। स्विटजरलैंड में जरा भी खनिज संसाधन नहीं हैं जो आमतौर पर किसी भी उद्योग की धुरी होते हैं। लेकिन इसी प्रतिकूलन को वहाँ का अर्थतन्त्र अपने पक्ष में इस्तेमाल करता है(सिंगापुर और दुबई भी अपनी तरह से करते हैं)। स्विटजरलैंड ने ऐसे गुणकारी उद्योगों को अपनाया है जहाँ आयतित खनिजों से कई गुना मूल्य की निर्यात की जाने वाली चीजें बनाई जाती हैं। मसलन घड़ी को गुणवत्ता का पर्याय बनाने का श्रेय सिर्फ स्विटजरलैंड को जाता है। दुनिया में सबसे ज्यादा बिकने वाली ‘स्वाच’ नामक घड़ी ही नहीं, राडो, रोलेक्स, ओमेगा, पटेक फिलिप, जीटन, टैग, टिसो, रोमा गोथ और बोम एण्ड मर्सीअर समेत और भी कई हाई-एण्ड ब्रांड्स हैं जो दुनिया में अपनी गुणवन्ता, विश्‍वसनीयता और समयबद्धता पर शत-प्रतिशत खरा उतरने के लिए ख्यात हैं। पूरे विश्‍व में बनने वाली घड़ियों का पचास फीसदी उत्पादन इस नन्हे से मुल्क में होता है। उत्पादन की गयी घड़ियों का पिचानवें प्रतिशत निर्यात हो जाता है। अमूमन यही हालत कंप्यूटर के साथ इस्तेमाल होने वाले ‘माउस’ की है। दुनिया के हर तीसरे कंप्यूटर के साथी ‘माउस’ का निर्माता (लॉजीटैक) स्विटजरलैंड है। यही हाल बाल पैन के ‘पॉइंट’ का है। स्विटजरलैंड में उत्पादन की जाने वाली चीजों की खास बात यह भी है कि यह छोटी या मझली इकाइयों द्वारा होता है। यानी उत्पादन करने वाले निनयानवें प्रतिशत इंडस्ट्रीज में ढाई सौ या उससे कम पूर्णकालिक मजदूर होते हैं। रसायनों पर आधारित एक भी उद्योग यहाँ नहीं है जबकि विश्‍व की एक बड़ी फार्मा कम्पनी(नोवार्टिस) स्विस है। मेरे मन में सवाल आया कि जिस मुल्क में हर वर्ष करोड़ों पर्यटक आते हों, वहाँ झीलों का पानी पेय कैसे रह सकता है? लेकिन यहाँ पर ऐसा इसलिए है कि आधुनिक तकनीकी के सहारे मल-निर्यास की ऐसी व्यापक व्यवस्था है कि वह उत्पादन, पर्यटन या इनसे जुड़े किसी व्युत्पन्न को प्रकृति प्रदन्त संसाधनों के साथ छेड़खानी नहीं करने देती है। और यह एक ऐतिहासिक तथ्य है जो लोगों के समष्टिगत मूल्यबोध से उपजा है।

स्विस बैंकों की जग-जाहिर प्रणाली ने भी देश की खुशहाली में बड़ा योगदान दिया है। यूबीसी और क्रेडिट-स्विस यहाँ के दो बड़े बैंक हैं तो ज्यूरिख, जिनेवा और लुगानो प्रमुख वित्तीय केंद्र। अपने गैर-राजनीतिक और निरपेक्ष स्वरूप तथा आचारण में ईमानदारी की पराकाष्ठा के चलते दुनिया के हर मुल्क का धन यहाँ के बैंकों को मुहैया रहता है जिसमें बहुत सा अवैध भी होता है। इस व्यवस्था को यहाँ के बैंकिंग कानूनों ने और दृढ़ता प्रदान की है। स्विस जन-मानस में चूँकि किसी राजनीतिक विचारधारा का रंग शामिल नहीं रहता है इसलिए तन्त्र में मुद्रा का भी रंग शुमार में नहीं आता है। जहाँ से आए, जितना आए, मुद्रा तो मुद्रा है। दूसरों का अवैध धन चूँकि ब्याज रहित मिल जाता है इसलिए उससे आमदनी और ज्यादा होती है। सन् 1995 में यहूदी लोगों द्वारा कोहराम मचाने पर स्विस बैंकों ने स्वीकारा कि उनके पास सन् 1945 के पहले के बहुत सारे सुप्त खाते हैं जो हो सकता है नाजियों द्वारा हत्या कर दिए यहूदियों के रहे हों। इसे एक स्विस खूबी ही कहा जाएगा कि उजागर किए जाने पर इन बैंकों ने होलोकास्ट पीड़ितों के परिजनों को खरबों का मुआवजा दिया(कहने वाले अलबत्ता कहते हैं कि यह ऊँट के मुँह में जीरे जैसा था)। इसी के चलते सन् 2004 में स्विस बैंक कानून में यह तब्दीली लायी गयी कि खातों को सनाम रखना होगा। अरसे तक ये सिर्फ संख्या से चलते थे ताकि जमाकर्ता की पहचान गुप्त रहे। इसी के चलते उम्मीद है कि भारत सरकार भारतीयों के उस बेहिसाबी काले धन (जिसका अनुमान सैकड़ों खरबों में कूता जाता है) को अपनी जब्त में कर सकेगी जो हमारे लोगों ने अवैध तरीकों से कमाकर-हड़पकर यहाँ की तिजोरियों में रख छोडा़ है। स्विस बैंकों के ग्लोबल आकार में वह रकम ऊँट के मुँह में जीरा (आधा प्रतिशत) सरीखी हो मगर भारतीय अर्थतन्त्र और राजतन्त्र में अपेक्षित सुधारों को यह करिश्माई धक्का लगा सकती है, यह हर आम भारतीय सोचता है। हम भारतीय पता नहीं इतने गहरे आस्थावादी क्यों हैं जो बार-बार लुढ़कने-ठोकर खाने के बाद भी किसी नामुमकिन करिश्मे के होने में अपनी तमाम सामाजिक व्याधियों-परेशानियों का बीमा होता देखते रहते हैं जबकि निजी स्तर पर उसके निदान के लिए कुछ करना तो दूर, यह भरम भी नहीं पालते हैं कि बूँद-बूँद से ही समुद्र बनता है जो यदि नहीं भी बने तो अपने प्रयास की सत्यनिष्ठा की आँच में एक दिली तसल्ली का बायस तो बना ही देता है ! लेखक, पत्रकार, अध्यापक, समाज सेवी, न्यायधीशों- सभी के आचरण में तो वह घुन लगा है तो नौकरशाह, कारोबारी और राजनेताओं की तिकड़ी की फसाद की जड़ ठहराना और उसी में मुक्ति की सम्‍भावना एकाग्र करना कहाँ तक वाजिब है?

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पत्नी  और बेटी के साथ ओमा शर्मा।

पत्नी और बेटी के साथ ओमा शर्मा।

भारत जैसे मुल्क से इतने सारे लोग स्विटजरलैंड घूमने क्यों जाते हैं? गर्मी और उमस भरे माहौल से निकलकर सर्दी और प्रकृति के आगोश में निजात पाने, यह महसूस करने कि हाड़-मास के लोगों से ही बना कोई तन्त्र कितनी मानवीय गरिमा के साथ तरक्की कर सकता है, राजनीति और विचारधारा की फिजूलियत की अहसास करने…या…इसी तरह के मिले-जुले दूसरे जायज कारण। ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’तथा दूसरी कई बम्बइया फिल्मों के बाद से इन्टरलाकन, जुंगफ्राउ (यंगफ्राउ…कमसिन!), टिटलिस और ग्लेशियर-3000 भारतीय उपमहाद्वीप से आने वाले हर सैलानी की प्राथमिकता में शामिल रहते हैं। और सचमुच इनके सुरम्य जलवों से बावस्ता होने पर इनकी शौहरत का राज मालूम हो जाता है। मई का अतिरिक्त लाभ यह भी है कि इन दिनों स्विटजरलैंड भारतमय हो रहा होता है। टूर ऑपरेटरों की मेहरबानी कोने-कोने से सैकड़ों भारतीय सैलानियों को यहाँ पहुँचा देती है- ज्यादातर अपनी चीख-चिचियाहट के साथ लेकिन सभी अपेक्षित मस्ती के आलम को  अपने तईं जीने की तत्पर। मेजबान भी उनकी मिजाज-पुर्सी करने में पीछे नहीं रहता है…कई जगह सूचनापटों पर हिन्दी जड़ी होगी तो कुछ जरूरी पड़ावों पर बाकायदा भारतीय व्यंजनों की आवभगत दिल खुश करने को मुस्तैद।

ग्लेशियर-3000 पर जाने के लिए स्ताद स्टेशन के सामने गली के नुक्कड़ पर यहूदी मेनुहिन की उक्ति ने बरबस मेरा ध्यान खींचा… ‘वह जीवन जिसमें अज्ञात या रहस्यमय के लिए जगह नहीं है कभी पूरा जीने लायक नहीं हो सकता है।’ मेनुहिन इस कस्बे में जिसकी आबादी आज भी ढाई हजार से ज्यादा नहीं है अक्सर समय बिताते थे। यहूदी मेनुहिन के माता-पिता अमरीका में बसे विस्थापित रूसी यहूदी थे। गौरतलब हो कि मेनुहिन को बीसवीं सदी का सबसे बड़ा वायलिन वादक माना जाता है। उन्होंने ही आयंगर की योग शिक्षा से पश्चिम का परिचय करवाया था और उन्होंने ही पंडित रविशंकर की जुगलबन्दी में ‘वैस्ट मीट्स ईस्ट’ जैसी नायाब एलबम सन् 1966 में निकाली थी। उनके नाम को लेकर एक रोचक वाकया हाथ लगा। जब वह गर्भ में थे तब उनके माँ-बाप रहने के लिए भाड़े का घर तलाश रहे थे। एक मकान जो जँचा उसका सब कुछ तय हो जाने के बाद मेनुहिन उपनाम से अन्जान उस मकान मालकिन ने एहतियातन कहा कि वह यहूदियों को मकान नहीं देती है। बस, यहूदी स्वाभिमान से भरी माँ ने तय कर लिया कि अपने होने वाले बच्चे का नाम वह ऐसा रखेंगी कि किसी को शक की गुंजाइश ही न रहे। इस तरह जन्म के बाद गर्भस्त बच्चे का नाम यहूदी हो गया।

खैर, केबल-कार पकड़कर हम बर्फ से पूरी तरह आच्छादित उस पहाड़ के शिखर पर जा लगे जो इतनी देर से हमारे भीतर पुचकार मचा रहा था। वहाँ के पूरे इंतजाम में इतनी योजनाबद्धता है कि बर्फ के समुन्दर में उन सरकने-फिसलने वाली ट्यूब्स पर गोते खा-खाकर एक तरफ पूरे प्रयोजन की सार्थकता महसूस होती है तो ‘अपने यहाँ ऐसा कुछ क्यों नहीं है’ वाला आदिम सवाल और तल्खी से सालने लगता है। हिमाचल प्रदेश के रोहतांग पास पर एक बार मित्रों के साथ जाना हुआ था। मनाली से निकलते ही चढ़ाई भर वह सड़क इतनी तंग और टूटी बनी रही कि लगातार ईश्‍वर को याद करना लाजमी हो गया। बीच रास्ते में मिले ट्रैफिक जाम ने धड़कनें और बढ़ा दीं…पहुँच भी पाएंगे, पहुँच गए तो लौटेंगे कब? खुदा-खुदा करके जब बर्फ के पास पहुँचे तो सब कुछ इतना बिखरा-बिखरा और साधारण। घोड़ों की लीद से जनी गंध पूरे माहौल पर कब्जा किए पसरी थी। खाने-पीने के नाम पर कुछ पटरी-ठेले वाले थे जो वहाँ व्यवसाय नहीं दोहन करने को जमे थे जबकि यहाँ की हर चीज अमन-चैन और पर्यटकीय चयन का हिस्सा थी। मैं सोच भी नहीं सकता था कि बर्फ के बीच आँखे ऐसे चौंधिया सकती हैं कि काला चश्मा पहनना अनिवार्य हो जाए। केबल-कार से नीचे उतरते हुए हमारे समूह में कोलकाता से पधारे मारवाड़ियों की बहुतायत थी। भारतीय मानकों पर तन्दुरूस्त दिखती महिलाओं ने दुनिया की इकलौती रिवोलविंग केबल-कार के प्रति सरासर बदगुमानी दिखाते हुए ‘जेहि बिधि रखे राम तेहि बिधि रहिए, राधे-श्याम राधे-श्याम राधे-श्याम भजिए’ का वृंदगान उठा लिया। राम और श्याम की अटपटी संगत को साथ चल रहे दूसरे भारतीय पर्यटकों की तालियों ने और तूल दे दी तो उस दूरस्थ शीतप्रदेश में उस मुखड़े ने कदाचित राष्ट्रीय गान की सी एकता और उल्लास संचरित कर दिया। भौंचक खड़े जापानी सैलानियों ने जानना चाहा कि यह क्या गाया जा रहा है…कोलावरी दी जैसा कुछ या…। एक सदस्य ने टूटे-फूटे अनुवाद में उसके मायने बताए तो उन्हें कुछ भी सारगर्भित नहीं लगा। सच भी है, मस्ती का मायने से कितना क्षीण रिश्ता होता है। फिल्मी गीतों की धुनों पर श्रद्धास्वरूप शेराँवाली की भेंटें गायी जा सकती हैं तो भजनों की मार्फत मस्ती क्यों नहीं की जा सकती है?

हमारा अन्तिम पड़ाव लूसर्न था जहां चैपल ब्रिज के पास रहने का ठिकाना था। रीयस नदी पर बना यह दुनिया का सबसे लम्बा और लकड़ी का ढका हुआ सबसे पुराना पुल है। इसे चौदहवीं सदी में बनवाया गया था। सन् 1614 के आसपास इसमें त्रिकोणाकार पेन्टिंग्स लगा दी गयीं जिनमें मुल्क के इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाएं दर्ज हैं। सन् 1993 में इस पुल में जबरदस्त आग लग गयी थी। लकड़ी के पुल को तो खैर नया रूप दे दिया गया मगर कई पेन्टिंग्स हमेशा के लिए नष्ट हो गयीं। वह आग और उससे हुआ नुकसान भी अब इस पुल के इतिहास का हिस्सा है। आग से जलकर नष्ट हुई पेन्टिंग्स के तिकोने क्षेत्र को आज भी खाली छोड़ा हुआ है।

लूसर्न स्टेशन के बाहर पार्क की गई साइकिलों के झुंड ने मेरा ध्यान आकर्षित किया। यहाँ बच्चे-बड़े सभी साइकिलों से खूब आते-जाते हैं। दूसरी किसी जगह साइकिल का इतना चलन मुझे नहीं दिखा। यह यहाँ के लोगों की पर्यावरण चेतना का एक और प्रमाण है। जन-परिवहन की बसें और रेलें तो बिजली से चलती ही हैं जो पन-बिजली पर आधारित हैं। साइकिल नागरीय प्रशासन में कितनी आदरणीय है यह इस बात से जान सकते हैं कि मुख्य सड़क की तीन फुट चौड़ी पट्टी साइकिल सवारों के लिए आरक्षित रहती है जिसे गेरूए रंग से चिन्हित किया होता है। क्या अजीब देश है जिसने ग्लोबलाइजेशन की तमाम अफवाहों के बीच जीने-रहने और खाने-कमाने की तमाम आचार संहिता अपनी जरूरतों और मूल्यों के मद्देनजर बना रखी है न कि अमरीका से प्रेरित या घबराकर। इस बात का इससे पुख्ता सबूत और क्या होगा कि पूरे प्रवास में मुझे कहीं कोई मॉल या मल्टीप्लैक्स नजर नहीं आया। अलावा इसके कम से कम कामकाजी जीवन में तो अंग्रेजी का जरा भी दबदबा नहीं दिखा। ऑस्ट्रिया, इटली, फ्राँस और जर्मनी से घिरा होने के कारण स्विटजरलैंड में जर्मन, फ्रैंच और इतालवी का ही बोलबाला रहता है। फ्राँस के सीमावर्ती इलाकों में फ्रैंच अधिक चलती है तो जर्मनी से सटे इलाकों में जर्मन। आमजीवन में कोई भाषाई तुष्टिकरण काम नहीं करता है। इतनी विविध राष्ट्रीयताओं के पर्यटकों की आवाजाही के बावजूद कोई अपने भाषाई संस्कारों का संप्रेषण की सहूलियत के बरक्स भी अंग्रेजीकरण नहीं करता दिखता है। मोन्त्रो रेलवे स्टेशन के लिए फ्रैंच का सिर्फ GARE था तो लूसर्न में जर्मन BAHNHAUF था। मुझे मुम्बई के चर्चगेट स्टेशन की नाम पट्टी याद आयी जो अपनी न्यायपरकता में क्या खूब भाषाई मजाक है। वहाँ ‘चर्चगेट’ दो बार लिखा है। आपसे ताकीद की जाती है कि एक को आप हिन्दी की आँख से पढ़ें और दूसरे को मराठी से, भले देवनागरी में वे हूबहू हों !

ऐसे साफ-सुथरे, उन्नत गैर-राजनैतिक, शान्तिप्रिय और प्रगतिशील समाज में कला की जरूरत और हैसियत क्या हो सकती है? जहाँ बेरोजगारी फकत एक प्रतिशत हो (और सामाजिक सुरक्षा योजना के चलते जो अपने नख-दंत गँवा चुकी हो, भिखारी जैसा शब्द जहाँ परिवेश से गायब हो चुका हो क्योंकि वे सब स्ट्रीट-आर्टिस्ट के रूप में किसी चौराहे या सब-वे में स्टैच्यू बनकर या किसी वाद्ययंत्र से मनोरंजन करके ही अतिरिक्त आय ‘अर्जित’ करते हैं), आर्थिक विकास का क्षेत्रीय एवं अन्तरक्षेत्रीय संतुलन सधा हुआ हो और भौगोलिक-सामाजिक पर्यावरण किसी सभ्यतागत हासिल की तरह विराजमान हो, जहाँ दुख-दर्द, संघर्ष-शोषण, जात-पाँत, रंगभेद या लैंगिक झमेले हैरत करने की हद तक नदारद हों…वहाँ किसी लेखक-कलाकार की प्रेरणाएं और बेचैनियाँ कैसी उड़ान भरती होंगी? यह भी प्रश्‍न उठता है कि कलाकृतियों का सृजन महत्वपूर्ण है या उन विषम मानवीय स्थितियों का तिरोहित होना जिनकी उपस्थिति से एक लेखक के भीतर ऐसे कलागत आवेश उत्पन्न होते हैं जो रचना में रूपांतरित हो जाने के बाद,भाषा और अन्तरनिहित संवेदनाओं के माध्यम से उन विषमताओं पर कुठाराघात करते हैं? यह सत्य है कि किसी भी समाज में सम्पूर्ण बराबरी कभी नहीं आ सकती है लेकिन यदि विषमताएं मानवीय गरिमा के साथ तारतम्य बिठा चुकी हों या मोटे तौर पर स्वीकृत हों, या राज्य की प्रतिकारी कार्रवाई के कारण अधिक सहनीय-पचनीय हो गयी हों, तब? इसी तरह यह माना जाता है कि सत्ता मूलत: क्रूर एवं निरंकुश होती है और रचना के माध्यम से कलाकार इसी क्रूरता और निरंकुशपने का प्रतिपक्ष रचता है। लेकिन एक अभिनव राजनीतिक विन्यास में सत्ता के भीतर से यदि उसका यही सर्वग्राही दंश भौंथरा हो चुका हो तो रचे जाने की क्या सार्थकता-वैधता हो सकती है। उन्नीसवीं सदी में रचा महान रूसी साहित्य या विश्‍वयुद्ध की विभीषिका को उजागर करती दूसरी महान यूरोपीय रचनाएं अन्तत: उस ‘यथार्थ’ के ‘चित्रण’ स्वरूप ही तो शाश्वत हो सकीं जो अपने नग्न स्वरूप में घिनौना, जटिल और घोर अमानवीय था। अपनी एक कहानी ‘टोनियो क्रूगर’ में टामस मान ने कहा भी है कि पूरी तरह से स्वस्थ और सामान्य व्यक्ति को कुछ भी लिखने रचने की जरूरत नहीं है। वह समाज जो कला के इस कच्चे माल से अमूमन मुक्त या अछूता हो, उसे किसी महान कृति के न होने का गिला क्यों कर हो? यही कारण है कि स्विटजरलैंड के पास इतना कुछ है मगर महान-कालजयी साहित्य लगभग नहीं है। जीवन की चौतरफा संगति ने महान कला के अभाव को भरपूर क्षतिपूर्ति कर दी है। या हो सकता है अभी स्विस साहित्य के बारे में मुझे बहुत कुछ पढ़ना-जानना बाकी हो जिसके लिए वहाँ फिर से जाना बनता है!

केवल खबर नहीं है डेंगू : देवेंद्र मेवाड़ी

उपचार के दौरान देवेंद्र मेवाड़ी

डेंगू पर इतनी गंभीर बहस शायद इससे पहले कभी नहीं हुई। न इस जानलेवा रोग का खतरा इतनी शि‍द्दत से कभी महसूस किया गया था। हालाँकि हर साल सैकड़ों लोगों का जीवन इस रोग के कारण दाँव पर लगता रहा है, लेकिन अब तक महज एक खबर था डेंगू। इसके डंक का असली पता तो तब लगता है जब अपने-आप पर बीतती है। मुझ पर 2009 में बीत चुकी है यह। इसलिए कह सकता हूँ, महज खबर नहीं है डेंगू-

अभी देर शाम गुड़गाँव के आर्टमेस अस्पताल से डिस्चार्ज होकर चार दिन बाद घर लौटा हूँ। आते ही, सबसे पहले ‘आर्टमेस’ का अर्थ खोजा। पता लगा, यह यूनानी पौराणिक कथाओं में चंद्रमा की देवी का नाम है। बेहद कमजोरी महसूस कर रहा हूँ, पर तीन-चार दिन पहले जैसा शरीर तोड़ बुखार और बेचैनी थी, अब नहीं है। डॉक्टरों ने डेंगू (वे इसे डेंगी कहते हैं) के शिकंजे से मेरी जान बचा ली है। मेरे लिये भी अब तक तो डेंगू केवल अखबार में छपी खबर था, लेकिन अब अच्छी तरह जानता हूँ कि यह केवल खबर नहीं है। किसी को हो जाये तो जान पर बन आती है। डेंगू फैलाने वाले मच्छरों का डंक जानलेवा भी हो सकता है। न जाने मुझे किस नामकूल मच्छर ने कब और कहाँ डंक मार दिया था।

17 अक्टूबर को दीपावली थी। दिन में लगा बुखार चढ़ रहा है। बहुत प्यास लगी और शरीर में अजीब-सी टूटन के साथ जोड़ों और पेशियों में पीड़ा होने लगी। समझ में नहीं आ रहा था कि हो क्या गया है। 18,19 और 20 अक्टूबर को भी 103 डिग्री फारेनहाइट तक तेज बुखार में तपता रहा। दर्द ऐसा कि पूरा शरीर जैसे किसी ने कपड़े धोने की मुंगरी से पीट दिया हो। नजदीक के डॉक्टर को दिखाया। उन्होंने फीस ली, बुखार की दवा दे दी। लेकिन,  न बुखार घटा, न दर्द कम हुआ। दिल्ली में डेंगू के मामले बढ़ते जा रहे हैं। इसलिये मैं डर रहा था। डॉक्टर से खून की जाँच के लिये कहता रहा, लेकिन वह समझाते रहे पहले दवा तो खाइए, फिर देखेंगे। जब देखा कि बुखार और शरीर का दर्द किसी तरह कम नहीं हो रहा है तब जाकर खून की जाँच के लिये लिखा। 23 तारीख को सुबह जाँच के लिये खून का नमूना दिया। शाम को रिपोर्ट लेने श्रीमती जी गईं। लौट कर बताया, ‘‘रिपोर्ट दिखाई तो डॉक्टर घबराए हुए से लगे। पूछने लगे कि मसूडों से खून तो नहीं आ रहा है? शरीर पर लाल पित्त तो नहीं दिखाई दे रहे हैं। फिर बोले- अगर रात को तबियत ज्यादा खराब हो जाए तो उन्हें अस्पताल ले जाइए।’’ श्रीमती जी हैरान। घबराकर कह आईं, ‘‘आपसे हफ्ते भर से कह रहे थे, खून की जाँच करा दीजिए। अब आप रात में अस्पताल ले जाने की बात कर रहे हैं। कहाँ ले जाऊँगी?’’

खैर, वापस आकर उन्होंने कहा, ‘‘सुनो, अभी अस्पताल चल पड़ते हैं।’’ मैंने पूछा, ‘‘क्यों?’’ तो डॉक्टर की बात बताई। रिपोर्ट देखी तो मैं भी सकते में आ गया। मेरे खून में प्लेटलेट संख्या 1.50-4.0 लाख से घट कर केवल 22,000 रह गई थी। यह खतरनाक स्थिति थी।

हमने बेटी और दामाद को फोन किया। वे भागे आए। श्रीमती जी, बेटी मानसी और दामाद राहुल के साथ अस्पताल जाने की तैयारी की। लेकिन, कहाँ और किस अस्पताल में जाएँ? राहुल ने इसी बीच गुड़गाँव में बहू सोनिया से बात की तो उसने बिना समय बर्बाद किए, फौरन सैक्टर-51 के आर्टमेस अस्पताल की ओर आने की राय दी। आर्टमेस? मैं चौंका था। चलो, अर्थ बाद में खोज लूँगा।….

हम ऑर्टमेस की ओर भागे। रास्ते में सोनिया मिल गई। वह ऑर्टमेस में ले गई। डॉक्टर रमन अभि से फोन पर पहले ही बात कर चुकी थी। वह सैर छोड़ कर ट्रैक सूट में ही अस्पताल आ गये। मुझे इमर्जेंसी में भेज कर खून का नमूना लिया और फिर ‘इन पेशेंट’ के रूप में अस्पताल में भर्ती करके दूसरी मंजिल पर वार्ड नंबर 2502 में भेज दिया। नर्सों ने हाथ में फटाफट नली जोड़ कर स्टैंड में टंगी बोतल से ग्लूकोज का घोल ड्रिप कराना शुरू कर दिया। वे कभी खून का नमूना ले जातीं और कभी रक्तदाब व शरीर का तापमान मापतीं।

इस बीच कई परीक्षण किए गये- खून का परीक्षण, मूत्र का परीक्षण, मलेरिया परीक्षण (थिक एंड थिन स्मियर टेस्ट), यकृत क्रियाशीलता, वृक्कीय (रीनल) क्रियाशीलता, टाइफी डॉट, डेंगी एनएस1, एंटिजन कैप्चर टेस्ट, क्रॉस मैंचिंग, आटोमेटेड प्लेटलेट काउंट, ए बी ओ टाइपिंग, आर एच टाइपिंग आदि।

राहुल ने प्लेटलेट चढ़ाने के लिये रात में रक्तदान किया। सौभाग्य से उसका और मेरा रक्त ग्रुप एकसमान यानी ‘ए प्लस’ निकला।

कम्प्यूटर से मिले परीक्षणों के परिणाम से पता चलाः रक्त ग्रुप ‘ए’ टाइप, आर एच पॉजिटिव, प्लेटलेट संख्या 20000, मलेरिया एंटिजन निगेटिव (प्लाज्मोडियम वाइवैक्स तथा प्लाज्मोडियम फैल्सिपेरम दोनों के लिये)। डेंगू एनएस1 एंटिजन कैप्चर टेस्ट भी निगेटिव निकला, लेकिन इस हिदायत के साथ कि एनएस1 एंटिजन असंरचनात्मक प्रोटीन है जिसे डेंगू की गंभीर अवस्था का सूचक माना जाता है। लेकिन, निगेटिव टेस्ट का मतलब यह नहीं है कि हाल ही में संक्रमण नहीं हुआ। डेंगू एनएस1 एजी स्ट्रिप टेस्ट का गुणात्मक परीक्षण है और नमूने में एनएस1 एंटिजन की मात्रा नहीं दर्शाता है। नमूनों के साथ तुलना करने पर डेंगू एनएस1 एजी स्ट्रिप की अतिसंवेदनशीलता से पुष्टि हुई कि आर टी-पी सी आर तथा वायरल कल्चर 92.3 प्रतिशत व 100 प्रतिशत थी। टाइफी डॉट परीक्षण भी निगेटिव था।

टैक्नोलॉजिस्ट ने राय दी कि ‘निगेटिव’ परिणाम से हाल ही में हुए या वर्तमान संक्रमण की संभावना खत्म नहीं हो जाती क्योंकि ‘पॉजिटिविटी’ पर बुखार शुरू होने से लेकर अब तक के समय और मरीज की प्रतिरक्षात्मक क्षमता का असर पड़ता है। इसलिए, यदि अब भी एस. टाइफी संक्रमण का संदेह हो तो 5-7 दिन बाद दूसरा नमूना लेकर उसके पुनः परीक्षण की संस्तुति की जाती है।

सुबह-सुबह मेरे भतीजे यशवंत ने ‘आर्टमेस’ में आकर रक्तदान किया जिससे प्लेटलेट निकाल कर बाद में मेरे शरीर में चढ़ाई गईं। उसका रक्त ग्रुप भी मेरी तरह ‘ए प्लस’ था।

इतना कुछ करने के बाद भी अगले दिन यानी 24 तारीख को मेरे खून में प्लेटलेट घट कर 18,000 हो गईं। डॉक्टर को शक था कि कहीं तो कुछ है। वह मेरे शरीर पर लाल पित्त खोजते रहे। पूछते रहे कि मसूड़ों से खून तो नहीं निकला। इसके साथ ही उन्होंने किसी प्रयोगशाला से पुनः मेरे खून के नमूने की जाँच कराई। प्लेटलेट चढ़ाने के बाद 25 तारीख को सुबह मेरे खून में प्लेटलेट संख्या बढ़ कर 38,000 हो गई। लेकिन, शाम को लगभग 6 बजे वह फिर घट कर 30,000 हो गई।

प्रयोगशाला से रिपोर्ट आने पर अब तक छिपे डेंगू के वायरस का पता लग गया। सीरम के एस एस डी ई जी और एस एस डी ई एम परीक्षणों का परिणाम यह रहा-

डेंगू वायरस आईजीएम …….मौजूद है
डेंगू वायरस आई जी जी……..मौजूद है

यानी, प्राइमरी और सेकेंडरी दोनों प्रकार के डेंगू का संक्रमण है। रिपोर्ट में दी गई टिप्पणी के अनुसारः ‘डेंगू बुखार का वायरस लेविविरडी परिवार का वायरस है। इसके 4 सीरोटाइप हैं। इसका संक्रमण होने पर हल्का बुखार और शरीर में पीड़ा हो सकती है। लेकिन, गंभीर रूप से संक्रमण होने पर हेमोरेजिक यानी रक्तस्रावी बुखार आ सकता है। यह वायरस एडीज ग्रुप के मच्छरों से फैलता है। इस परीक्षण से प्राइमरी और सेकेंडरी संक्रमण का पता लग जाता है। आईजी एम एंटिबॉडी का पता बुखार आने के 3-5 दिन के भीतर लग जाता है। ये 30 से 90 दिन तक मौजूद रहती हैं। कभी-कभी तो आईजीएम पॉजिटिविटी का आठ माह बाद भी पता लगता है। सेकेंडरी संक्रमण में आईजी जी का स्तर बहुत बढ़ जाता है जिसके साथ-साथ आईजी एम का स्तर भी बढ़ा हुआ हो सकता है।

25 तारीख को सुबह मेरा बड़ा भतीजा मदन मोहन भी बंगलुरु के दौरे से लौट आया। आते ही उसने प्लेटलेट निकालने के लिए रक्तदान किया जिसे इमरजेंसी के लिए रख लिया गया।

26 तारीख की सुबह खून की जाँच से पता चला कि प्लेटलेट बढ़ कर 50,000 हो गई हैं। डॉ. रमन अभि ने मुस्कुरा कर कहा, ‘‘अगर प्लेटलेट इसी तरह बढ़ती गईं तो कल डिस्चार्ज कर देंगे। आप फिर घर पर आराम कर सकते हैं।’’

वही हुआ। अगले दिन यानी 27 अक्टूबर की सुबह प्लेटलेट 1,25,000 हो गईं। डॉक्टर ने मेरी जाँच करके इस हिदायत के साथ अस्पताल से छुट्टी देने का निर्देश दे दिया कि घर पर पूरी तरह आराम करें, रोज कम से कम 5 लीटर पानी व अन्य पेय पिएं और औषधियाँ लें।

अस्पताल से डिस्चार्ज होने की औपचारिकताएं पूरी करके बाहर निकला तो शाम ढल रही थी। बाहर खुली हवा में गहरी साँस ली। सामने ‘ऑर्टेमेस’ अस्पताल की भव्य इमारत खड़ी थी। कृतज्ञता के साथ उसकी ओर देखा। उसकी ऊपरी मंजिलों के गहरे रंग के कुछ काँच ढलते सूरज की किरणों से सहसा चमक उठे। नीड़ की ओर लौटते दो-एक पंछी चहचहाए। हवा का एक पुरसुकून ठंडा झौंका मुझे छू कर आगे बढ़ गया। लगा- ‘आह! कितनी सुंदर है हमारी यह दुनिया, जिसमें मैं बच कर वापस लौट आया हूँ!’

3 नवंबर 2009

प्लेटलेट की पहेली

कल शाम 6 बजे डॉ. रमन अभि से मिला। प्लेटलेट संख्या की जाँच के लिये खून का नमूना दिया। आज रिपोर्ट मिल गई है। प्लेटलेट संख्या अब 3,09,000 हो गई है। डॉक्टर की शुभकामनाएं और पुनः प्रतिदिन कम से कम पाँच लीटर पानी पीने की हिदायत लेकर लौट आया हूँ। बेहद कमज़ोर अनुभव कर रहा हूँ, लेकिन डॉक्टर ने कहा है कि‍ कमजोरी धीरे-धीरे ही दूर होगी।

पुनश्‍च, 3 नवंबर 2009

डेंगू के कारण अठारह दिन से बीमार हूँ। इस बीच जिस चीज की सबसे अधिक चर्चा सुनी वह है- प्लेटलेट। आखिर यह क्या बला है? लेकिन, इसे बला भी कैसे कह सकता हूँ? इसने तो मेरे प्राण बचाने में मदद की। मेरे खून में इनकी कमी हो गई तो पहले राहुल और अगले दिन यशवंत के ताजा दान किए गये खून में से प्लेटलेट निकाल कर मेरे शरीर में चढ़ाई गईं। ग्लूकोज की बोतल उतार कर नर्स ने उसकी जगह प्लेटलेट का सैचेट लगा दिया था। प्लास्टिक के पारदर्शी सैचेट में भरी वह लाल-नारंगी चीज मैंने देखी थी। घट कर 18,000 तक हो गई मेरी प्लेटलेट संख्या को बढ़ाने के लिये मेरे शरीर में इनका ट्रांसफ्यूजन किया गया। तभी से जानने की बड़ी इच्छा है कि आखिर ये हैं क्या?

किताबें और इंटरनेट टटोला तो पता लगा, ये रक्त में पाई जाने वाली सूक्ष्म कणिकाएं हैं। अक्सर हम दो तरह की रक्त कोशिकाओं के ही नाम सुनते हैं- लाल रक्त कोशिकाएं और श्‍वेत रक्त कोशिकाएं। लाल रक्त कोशिकाओं में लाल रंग का हीमोग्लोबिन होता है। ये कोशिकाएं शरीर के हर हिस्से में ऑक्सीजन पहुँचाती हैं। श्‍वेत रक्त कोशिकाएं दुश्मनों से शरीर की रक्षा करती हैं। ये संख्या में तो लाल रक्त कोशिकाओं से कम होती हैं लेकिन इनका आकार उनसे बड़ा होता है। ये रक्त में पहुँचने वाले जीवाणुओं आदि को हड़प कर जाती हैं। इनके अलावा खून में इन से भी छोटी कणिकाएं होती हैं जो प्लेटलेट कहलाती हैं। इनका काम है खून का थक्का जमाना। कहीं कोई काँटा या सुई चुभ जाए या चाकू से कट जाए तो ये फौरन वहाँ खून का थक्का जमा कर उसे बहने से रोक देती हैं। हमारे शरीर में इनकी संख्या आमतौर पर एक माइक्रो लीटर खून में 1,50,000 से 4,00,000 तक होती है।

डॉक्टर ने मेरी पर्ची में रोग का नाम लिखा थाः ‘थ्रोम्बोसाइटोपेनिया’ यानी प्लेटलेटों की संख्या असामान्य रूप से कम। और,  पूछा था, ‘‘क्या हाथ-पैरों में छोटी-छोटी पित्तियां उभरीं? आंखें और चेहरा लाल हुआ? मसूढ़ों से खून तो नहीं निकला?’’ अब पढ़ कर समझ में आ रहा है कि शरीर में प्लेटलेट संख्या कम हो जाने पर ये लक्षण दिखाई देते हैं। पैरों की पिंडलियों से नीचे के भाग में चमड़ी पर तमाम लाल-लाल बिंदियाँ निकल आती हैं। चोट लगने पर चमड़ी लाल पड़ जाती है। मसूढ़ों से खून निकलने लगता है। मल-मूत्र में भी खून आ सकता है। कहीं पर कट-फट जाने से खून मुश्किल से रुकता है। प्लेटलेट 20,000 से कम हो जाने पर आँतों या दिमाग में बिना चोट के भी खून निकल सकता है। यह हालत जानलेवा हो सकती है।

और, मेरी प्लेटलेट संख्या 24 तारीख को 18,000 हो गई थी! प्लेटलेट संख्या 50,000 से कम होने पर लोग डॉक्टर की राय लेकर अस्पताल चले जाते हैं। यह संख्या 20,000 से कम होने पर तो हर हालत अस्पताल में होना चाहिए ताकि डॉक्टर शरीर में प्लेटलेट चढ़ा सकें। पढ़ने पर यह भी पता लगा कि हेपॉरिन जैसी कुछ दवाइयों से भी प्लेटलेट कम हो जाती हैं। कई बार तिल्ली भी प्लेटलेटों को हड़पने लगती हैं। तब तिल्ली को ही आपरेट करके शरीर से बाहर निकाल देते हैं।

डेंगू का प्रकोप होने पर तो प्लेटलेट कम होती ही हैं। कुछ और कारणों का भी पता चला। ये अस्थि मज्जा में बनती हैं। इसलिए अस्थि मज्जा के किसी विकार के कारण भी इनकी संख्या में कमी हो सकती है। ल्यूकेमिया और एचआइवी का संक्रमण होने और शराब अधिक पीने पर भी इनकी संख्या घट सकती है।

फिलहाल तो मुझे संतुलित आहार से अपनी प्लेटलेट संख्या को सामान्य स्तर तक बढ़ाना है। और हाँ, मच्छरों से भी बच कर रहना है।

(लेखक की आपबीती ‘मेरी विज्ञान डायरी’ के पन्नों से)

कथाकार संजीव- कुछ नोट्स : प्रेमपाल शर्मा

कथाकार संजीव

6 जुलाई, 2012 को कथाकार संजीव 65 वर्ष के हो गये । प्रेमचंद की विरासत थामे इस उपन्‍यासकार का हाल ही में प्रकाशित उपन्‍यास ‘रह गयी दिशायें इसी पार’ उनकी कथा यात्रा का महत्‍वपूर्ण पड़ाव है । इससे पहले उनके प्रकाशित उपन्‍यास हैं:- ‘किशनगढ़ के अहेरी’, ‘सर्कस’, ‘सावधान ! नीचे आग है’, ‘धार’, ‘पाँव तले की दूब’, ‘जंगल जहाँ शुरू होता है’ और ‘सूत्रधार’ ।

‘तीस साल का सफ़रनामा’, ‘आप यहाँ हैं’, ‘भूमिका और अन्‍य कहानियाँ’, ‘दुनिया की सबसे हसीन औरत’, ‘प्रेत मुक्ति और अन्‍य कहानियाँ’, ‘ब्‍लैकहोल’, ‘खोज’, ‘दस कहानियाँ’, ‘गति का पहला सिद्धांत’, ‘गुफा का आदमी’ और ‘आरोहण’ उनके कहानी संग्रह हैं ।

वरि‍ष्‍ठ लेखक प्रेमपाल शर्मा की डायरी के अंश संजीव के रचना कर्म को समझने के लि‍ये महत्‍वपूर्ण हैं-

डायरी : 1991

सारिका के जनवरी 1980 के पुरस्‍कार अंक में ‘अपराध’ कहानी छपी थी- प्रथम पुरस्‍कृत । तब से आज तक सैंकड़ों कहानियाँ पढ़ीं होंगी किन्‍तु बहुत कम ऐसी हैं जिन्‍हें लौट-लौट कर पढ़ने को मन करता है । रामचन्‍द्र शुक्‍ल के शब्‍दों में- प्रेम में हम एकाधिकार चाहते हैं जबकि श्रद्धा में हम चाहते हैं कि दूसरे लोग भी उसे प्‍यार करें । शायद एकमात्र कहानी जिसकी मैंने बीसियों प्रतियाँ कराके उनको दी हैं जो हिन्‍दी कहानी की दरिद्रता को रोते हैं या जिनकी नजरों में आने से यह कहानी रह गयी । नक्‍सलवाद को मैंने पहली बार उसी कहानी के माध्‍यम से अनुभव किया था । इससे पहले पता नहीं मैंने नक्‍सलवाद नाम सुना भी था या नहीं । किन्‍तु उसके बाद इस विचारधारा को न मैं निगल पाया, न अस्‍वीकार कर पाया और यह सब असर है ‘अपराध’ कहानी के पात्र बुलबुल और सचिन का । लोहे की भट्टी में तपे हुए दहकते अंगारे से पात्र ।

यूनिवर्सिटी में किसी को रिसर्च करते देखता हूँ तो याद आता है- ‘अपराध’ कहानी पर किया जाने वाला शोध । लाइब्रेरी ढूँढ़ते, खोजते, हर शोधार्थी की हर थीसिस मुझे ऐसा प्रयास लगती है कि जिसका कोई उपयोग नहीं इस सामाजिक व्‍यवस्‍था में । मात्र डिग्री के लिये- किसी पिता के मंसूबों को साधने, तो कभी किसी रिश्‍तेदार की नाक को लम्‍बा करने के लिये । जब भी किसी बड़ी नदी को मैंने रेलगाड़ी में पार किया है, मेरी आँखों में ‘अपराध’ पर लिखी थीसिस छपाक से पानी में गिरती है और सारी नदी में कागज छितराने लगते हैं । और बुलबुल भी । बुलबुल डॉक्‍टर थी । सचिन कहता है- दीदी तुमी बुझवैना । ये सामंतोवादी शिक्षा व्‍योवस्‍था । तो अगले ही पल प्‍यार की ठंडी फुहार छोड़ती बुलबुल । ऐसो ! हमार राजकुमार ।

कहानी में सचिन को दारोगा के मुँह पर थूकने का प्रसंग कितना सार्थक है । दारोगा जी । तुम नहीं समझोगे । अपने बेटे को भेज देना- उसे समझा दूंगा । कितनी गहरी पकड़ है- वक्‍त के साथ हम सभी सुभाष, नेहरू बनते हुए अंत में गांधी में तब्‍दील हो जाते हैं । सचमुच गर्म खून की भाषा गर्म खून ही समझ सकता है ।

साहित्यिक आलोचना की परिधियों से परे यह कहानी कुछ बड़े सीधे-सीधे प्रश्‍न खड़ा करती है । क्‍या हिंसा को और बड़ी हिंसा और नफरत को नफरत से दबाया जा सकता है ? जो व्‍यवस्‍था स्‍वयं अपराध को पैदा करती हो, उसके कारणों को जानने और लीपापोती के लिए अनुसंधान या आयोग, कमेटियाँ बनाने का कोई अर्थ है ? आखिर कौन सी मजबूरी है जिसके चलते डॉक्‍टरी पढ़ रही संघमित्रा, जो मुर्दे की चीरफाड़ से भी बेहोश हो जाती थी, परिस्थितियों के वश में स्‍वयं शातिर अपराधी बन जाती है ? सिद्धार्थ और सचिन जो एक छत के नीचे मार्क्‍स, लेनिन और ‘सामन्‍तोवादी शिक्षाव्‍योवस्‍था’ को समझने की कोशिश कर रहे हैं; उनमें से एक अपराध की दुनिया से गुजरता हुआ जेल के सीखंचों के पीछे पहुँच जाता है और दूसरा उन्‍हीं प्रवृत्तियों पर तथाकथित शोध करके फलता-फूलता है । क्‍योंकि सिद्धार्थ, सेशन जज-पिता, एस.पी.-बड़े भैय्या, जिलाधीश- छोटे भैय्या और गृह सचिव जीजाजी की बदौलत ऐन वक्‍त पर सचिन से ठीक विपरीत साँचे में फिट कर दिया जाता है । सुविधा भोगी ये सब वही चेहरे हैं जिनके लिए ‘न्‍याय तथ्‍य सापेक्ष है, सत्‍य सापेक्ष नहीं । तथ्‍य का प्रमाण स्‍वयं में सामर्थ्‍य सापेक्ष है । अत: निर्णय लचीला होता है । पुलिस एफ.आई.आर. प्रस्‍तुत करती है । चार्जशीट पेश करती है । गवाह होते हैं अपराध के सबूत । वकील होते हैं, कानून की किताबें होती है । इन सबमें से पर्त-दर-पर्त जो निष्‍कर्ष छन-छन कर आता है, हम वहीं निर्णय तो दे सकते हैं । और फिर तुम जिसकी सिफारिश करने आये हो उसका तो मुकाबला ही सत्‍ता से है जो हमेशा न्‍यायपालिका पर हावी रहती है ।’ सेसन जज पिता का सचिन के पिता को यह कहना है तो बेटे सिद्धार्थ के लिए यह कि ‘सी.बी.आई. वाले कब के तुम्‍हारे विरुद्ध कदम उठा चुके होते । बचते आये हो तो अपने जीजाजी के चलते । लेकिन यही रवैया रहा तो आई फाइनली वार्न यू….यानि कि बड़े-बड़े सिद्धान्‍तों की दुहाई देता हुआ न्‍याय ऐसा तरल पदार्थ जिसे जिस पात्र में ढाल दें वैसा ही ढल जायें । और सिद्धार्थ आ गया सुधार के रास्‍ते, उस साँचे की बदौलत जो उसे मिला और सचिन बना खूँखार नक्‍सलवादी उसी व्‍यवस्‍था के दूसरे साँचे में ढलकर ।

सेशन जज पिता और एस.पी. भाई के सामने टी.वी. के सेनिटोरियम से सचिन के पिता हाँफते-हाँफते दौड़े आये । किन्‍तु न सचिन के पिता की याचना का कोई असर पड़ा, न सचिन का अपनी सफाई में एक शब्‍द न कहने का । उल्‍टे नक्‍सलवाद को खत्‍म करने के लिए नक्‍सलवादी गाँव को जलाने के पुरस्‍कार स्‍वरूप उनका प्रोमोशन हो गया ।

लेकिन उसी सचिन की सिफारिश यदि राजनेता, एम.एल.ए., एम.पी. या व्‍यवस्‍था का बड़ा अफसर एस.पी., जज, सेक्रेटरी करता या इनके किसी आदमी का आदमी निकल आता तो भी क्‍या दंड वही रहता ? यह सच केवल बिहार या बंगाल का सच नहीं है, आज पूरे देश का सच बन चुका है । कन्‍याकुमारी से लेकर कश्‍मीर और आसाम से सोमनाथ तक गाया जाने वाला राग इस दोगली व्‍यवस्‍था का क्रूर चेहरा है ।

1967 में बंगाल के नक्‍सलवाड़ी गाँव से शुरू हुए इस आंदोलन ने देश के विभिन्‍न हिस्‍सों में अनेक उतार-चढ़ाव देखे हैं और इसके पक्ष-विपक्ष में चली आ रही मीलों लम्‍बी बहस का अभी भी कोई सिरा नहीं नजर आ रहा । अनेकानेक गुटों में फलता-फूलता यह आन्‍दोलन स्‍वाधीन भारत के इतिहास में आज भी उतना प्रासंगिक बना हुआ है जितना सत्‍तर के दशक में । लेकिन जो निष्‍कर्ष, निर्णय लाखों करोड़ों पन्‍नों में नहीं मिलेंगे वे इस छोटी सी कहानी में बहुत संतुलित ढंग से रखे गये हैं- एक सहज पारदर्शी भाषा में । इतनी गुरु गम्‍भीर विचारधारा का इतना पठनीय प्रस्‍तुतीकरण । नक्‍सलवाद पर यूँ तो और भी कहानियाँ, उपन्‍यास आये हैं पर इतनी खूबसूरती के साथ समस्‍या को शायद ही किसी ने उठाया हो । संजीव यहीं बाजी मार ले गये हैं । शुरू से अंत तक अदृश्‍य, बारीक धागों में बुनी सचिन और संघमित्रा की प्रेम कहानी- बिल्‍कुल ‘उसने कहा था’ की तर्ज पर । किन्‍तु सौ वर्ष बाद के सामाजिक यथार्थ के अनुकूल व अनुरूप । मौजूदा भारत की मुकम्मिल तस्‍वीर जिसमें अपने समय का सब कुछ बोलता है- प्‍यार, नाते-रिश्‍ते, व्‍यवस्‍था, जेल, विचारधारा । हिन्‍दी साहित्‍य जिन कहानियों के बूते विश्‍व साहित्‍य को टक्‍कर दे सकता है ‘अपराध’ उनमें से एक है ।

कहानी की एक अद्वितीय विशेषता उसका शिल्‍प पक्ष भी है । एकदम लचीला-फंतासी का ऐसा प्रयोग जिसमें घटनाओं को मनमर्जी पाठकों के सामने रखा जा सकता है । उसका प्रवाह कहानी खत्‍म होने से पहले भी पाठक को नहीं छोड़ता और न खत्‍म होने के बाद ।

हिन्‍दी की सर्वश्रेष्‍ठ कहानियों में से एक । यहीं कुछ कारण हैं जिससे मैं बार-बार इसकी प्रतियाँ कराता हूँ और दोस्‍तों को देता हूँ- देखो हिन्‍दी कहानी क्‍या चीज  है ? मेरे मित्रों ने कहा कि यह कहानी बहुत भावुक है । मैं चुप रहता हूँ । यदि समाज का इतना वास्‍तविक यथार्थ घिनौना रूप भी आपको भावुक नहीं बना सकता है तो साहित्‍य आखिर क्‍या बला है ? मैंने यह कहानी 1980 में पढ़ी थी और आज 1991 में भी मुझे भावुक बनाती है तो मैं ऐसी भावुकता की कद्र करता हूँ ।

साहित्‍य का अधिकांश क्‍या भावुकता के बिना सम्‍भव हो पाता ?

डायरी : 3 मार्च 2011

यह देश का दुर्भाग्‍य है कि 60 सालों के बाद भी सत्‍ता उन लोगों के पास सरकती चली गई जिसमें समाजवादी संविधान के बावजूद एक आदमी पाँच हजार करोड़ का मकान मुम्‍बई में बनवा रहा है । दो-चार किलोमीटर की यात्रा भी हेलीकॉप्‍टर से करते हैं और गरीब मुल्‍क का इतना पैसा उनके गुप्‍त नामों से विदेशी बैंकों में जमा है, जिसे अगर बाँट दिया जाए तो पूरे देश में खुशहाली लौट आए । इसी दुर्भाग्‍य की परछाई साहित्‍य को घेरे है । वैसे भी साहित्‍य, समाज या राष्‍ट्र का दर्पण ही तो होता है । नतीजा यह हुआ कि वह कहानी और उपन्‍यास जो दिल्‍ली या महानगरों में पहुँचे साहित्‍यकार पश्‍चि‍म, लैटिनी लेखकों के वक्‍तव्‍य, अंग्रेजी अदा के तड़के और स्‍त्री स्‍वतंत्रता के नाम पर मनोवैज्ञानिक फ्राइड की आड़ में जरा साहित्यिक अंदाज में सैक्‍स के चित्रण में रहे, उन्‍हें मीडिया या परजीवी आलोचक बुद्धिजीवियों के बैंड बाजे ने सारे देश के लिए आदर्श माना । जब आदर्श ऐसा हो तो संजीव जैसा ग्राम, कस्‍बाई, मजदूर संवेदना का कथाकार कहाँ टिकता ? बंगाल की कुलटी जैसी छोटी-सी जगह में दिन-रात अपनी नौकरी करते हुए जो लिखता रहा उसे दिल्‍ली में बैठे आलोचकों ने शायद ही कभी जिक्र करने लायक समझा हो ।

सैंकड़ों कहानियॉं संजीव ने लिखी हैं और हर कहानी एक नयी जमीन तोड़ती है । ‘तीस साल का सफरनामा’ से बात शुरू की जाए तो यह कहानी आजादी के बाद चकबंदी के नाम पर जो कुछ हुआ उसकी व्‍यथा कथा है । 1977 में यह कहानी लिखी गई थी तो ‘सुरजा’ आजादी की तरह तीस साल का था लेकिन ‘तीस की उम्र में ही उसके निचुड़े चेहरे, उस पर उगी बेतरतीब दाड़ी एक ऐसा चलता-फिरता दस्‍तावेज है जिस पर तीस साल की आजादी का इतिहास भूगोल सब कुछ पढ़ा जा सकता है ।’ श्रीलाल शुक्‍ल के ‘राग दरबारी’ में भी ऐसे ही गाँव के स्‍कूल प्रधान, पंचायत के सैंकड़ों चित्र उभरते हैं लेकिन संजीव की कहानियाँ कभी-कभी उस पर भी भारी पड़ती हैं । नयी पीढ़ी तो गाँव की भी, चकबंदी में हुए अन्‍याय को नहीं समझ सकती शहर की तो बात छोड़ो । उन्‍हें जिन्‍हें यह नहीं पता कि दूध मदर डेयरी से आता है या गाय-भैंस भी देती हैं । गाँव के जमींदार पैसे वाले जिनके यहाँ चकबंदी की लूट का चित्र देखिए । ‘जी ! …….. लूट शब्‍द पर आपको आपत्ति है ? चकों को देखकर आप ही कोई उचित शब्‍द सुझाइये । यह रहा सरजू पांडे का चक । जमीन आठ आने मालियत की थी । कानूनगो साहब को प्रसन्‍न कराकर चौदह आने मालियत की बनी और फिर नहर के बगल दो आने मालियत की ऊसर में आकर सात गुनी बन गयी । समय पर खरबूजे और दशहरी आम न पहुँचा पाने के कारण सन्‍तोखी कोइरी और मैकू कुरमी के द्वार पर के खेत और बाग का स्‍वामित्‍व खटाई में पड़ गया । गणेसी बढ़ई थोड़ा टेंटिया गया था । दो ही कुर्सियाँ तो माँगी थीं साहब ने ! फल यह हुआ कि उसकी सिंचित गोंअड़ एक बीघे जमीन सोलह से दस आने मालियत की हो गयी । गणेसी गिड़गिड़ाया तो कानूनगो ने कानून की बारीकी समझायी – बाग की छाया पड़ रही थी उस खेत पर (पृष्‍ठ 110)।

हजारों गरीब छोटे किसान इस चकबंदी ने बरबाद कर दिए तो वहीं भ्रष्‍ट, नौकरशाही, रिश्‍वत के बल पर नये अमीर सामंत पैदा हुए । धीरे-धीरे इन्‍होंने लोकतंत्र के नाम पर सत्‍ता पर भी कब्‍जा किया । और सत्‍ता पर कब्‍जा होने के बाद अगला अध्‍याय शुरू होता है यानि कि रामहरख पांडे, लोटन यादव और रमाशंकर सिंह जैसे समृद्ध किसान सामंती कागजों पर भूमिहीन बन गये और हरखू, लोटू और शंकर हरिजन के नाम से बंजर जमीन इन्‍हें मिल गई । ऐसे चरित्र, चित्र, भाषा शायद ही इधर के किसी लेखक के पास हों ।

पिछले दिनों 60 साल की आजादी के बाद माओवाद, नक्‍सलवाद की आवाजें फिर उठ रही हैं । सुरजा की जमीन तो गई ही गई उसे एक चोरी के आरोप में जेल भी भिजवा दिया गया और सत्‍ता का चमत्‍कार देखिए जिस नंबरदार ने उसे जेल भिजवाया था उसी ने उसको बाहर निकलवाकर वाहवाही लूटी । इन स्थितियों में कौन पागल नहीं हो जाएगा और वही सुरजा के साथ हुआ । ऐसे प्रसंगों पर अखबारों में ऐसी खबरें आने पर बुद्धिजीवियों के बीच बहस चल पड़ी । ‘ब्‍लैक पैंथर ! मार्क्‍स का वर्ग-संघर्ष !…. नहीं-नहीं, लोहिया का वर्ण-संघर्ष ! किसी ने हेगेल के ‘फेनो-मेनोलॉजी ऑफ़ माइंड’ से प्रभावित बता डाला तो किसी ने फेनन की ‘द रैचेड ऑफ़ द अर्थ’ में ही इसका स्रोत ढूँढ निकाला । बड़े तर्क-वितर्क के बाद यह मान लिया गया कि सुरजा नक्‍सलपंथी है ।’

यदि इस कहानी को ‘तीस साल का सफरनामा’ के बजाय साठ साल का सफरनामा कह कर फिर से छापा जाए तब भी चमकते भारत की चकबंदी में पाठक पाएंगे कि सुरजा की तकदीर में कोई अंतर नहीं आया । उसे सत्‍ता अभी भी नक्‍सलवादी या माओवादी बता रही हैं । लेखक की कल्‍पना की उड़ान देखिए जो वह कहानी की अंतिम लाइन में कहता है ‘और जनाब कुसुमपुर की नियति को फुला दीजिये तो यह पूरे देश की नियति हो जाएगी ।’ मात्र तीस साल की उम्र में संजीव ने ऐसी ढेरों कहानियॉं हिन्‍दी साहित्‍य को दी । उनको बड़े बुद्धिजीवियों के बड़े समारोहों में वह कुर्सी भले ही न मिली हो लेकिन हिन्‍दी पट्टी के गाँव के अधिकतर नौजवान उनकी एक-एक कहानी को छाती से चिपकाए फिरते हैं ।

एक और कहानी है उनकी ‘भूखे रीछ’ । तीस साल का सफरनामा यदि चकबंदी, गाँव के किसान की विकट स्थितियों का बयान है तो ‘भूखे रीछ’ मिलों, फैक्‍ट्रि‍यों में काम करने वाले मजदूरों की । राम लाल एक आयरन की फैक्‍ट्री में काम करता है । सायरन की आवाज उठते ही चटपट फैक्‍ट्री की तरफ दौड़ लगाता है । दिन के भुकभुके की तरह कहानी की शुरूआत होती है । राम लाल दातौन फाड़कर ‘ओ-ओ’ करते हुए जीभ साफ करके बंगले की फालतू नल पर दो-एक कुल्‍ली करने के बाद हर-हर गंगे करता हुआ नल के नीचे नहाने बैठ जाता है । फिर देह का पानी पोंछे बिना ही बसाती बनियान पर कालिख-पुती कमीज डालकर बेडौल पतलून-जूते से लैस होकर आवाज लगाता है, रज्‍जो sss ! रज्‍जो sss ! अरी ओ तुरकानी, आज फिर लेट करायेगी क्‍या !’ (पृष्‍ठ 56) सूदखोर सिर्फ गाँव के सिमाने के अंदर ही नहीं मिलों के अंदर भी बैठे हैं । बलदेव राय जैसे सैंकड़ों बिना कोई काम किये तनख्‍वाह भी पाते हैं और औने-पोने सूद का पैसा भी बटोरते हैं । राम लाल सोचता है कि सूदखोर लोगों को गेट के अन्‍दर ढुका लिया जाता है । सारे नियम कायदे हम छोटे लोगों के लिये ही हैं । ये ‘वाचन वार्ड’ लोग कॉय को हैं……. खाली इसलिए कि सरकार के हाथ में जाने से पहले कारखाने का सारा माल बाहर बेच दें !’ …..वह कुछ और बोलने वाला है मगर यह सोचकर सिटपिटा जाता है कि कहीं साले झूठी चोरी के इल्‍जाम में फँसा दें तो….. ? (पृष्‍ठ 63)

दिल्‍ली में बैठे आलोचक कहानी में गाँव तलाशते हैं ? कहाँ मिलेगा उन्‍हें   गाँव ? कौन गाँव, देहात, कस्‍बा फैक्‍ट्री में रहता है आज या काम करता है ? लेखन में पूरी की पूरी पीढ़ी, आलोचक समेत शहर में आ चुकी है । चंद कथाकार जिनकी कहानियों में गाँव जिंदा हैं उनमें हैं काशीनाथ सिंह, संजीव… । ‘चाकरी’, ‘मरोड़’, ‘भूखे रीछ’ कहानियों में कहानी उतनी नहीं चलती जितनी कथाकार के अन्‍दर । ‘भूखे रीछ’ में मजदूर बस्‍ती का पूरा जीवन है । नल की लाइन में खड़ा रामलाल, ओवरटैम की इच्‍छा में किसी साथी की मौत, बीमारी मांगता, सूदखोर राय से बचकर निकलने की कोशिश में गेट पर अचानक राय आवाज से पकड़ा जाता । बसाती, बनियान, कमीज पतलून में फैक्‍ट्री में छह बजे से पहले घुसने की कोशिश करना । संजीव ने यह जीवन जिया है इसीलिये यह सब लिख पाये ।

सन् अस्‍सी के आसपास मिल मालिकों के शोषण की तरकीबों और उनके खिलाफ उठने वाली सभी आवाजों को इस कहानी में सुना जा सकता है । किसी भी मुद्दे पर हड़ताल हो, हड़ताल शुरू तो होती है लेकिन पैसे के बूते मालिक उसे तोड़ने में भी कोई देर नहीं लगाते । पिछले तीस साल पहले के समय पर नजर डालिये, तो इस कहानी में प्रतिरोध की कुछ प्रतिध्‍वनियाँ बहुत साफ हैं । साठ साल के बाद तो यूनियन जैसे चीजें ही नहीं बचीं ।

सन् अस्‍सी में ‘अपराध’ कहानी ने संजीव को उस दौर का नायक कथाकार बना दिया था । वह कहानी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है । दुर्भाग्‍य बस यही है कि हिन्‍दी कहानी का वह नायक आज हिन्‍दी और हिन्‍दी की दुनिया की राजनीति के चलते वैसे ही किसी अंधेरे, एकांत की तरफ बढ़ रहा है जहाँ ‘तीस साल के सफरनारमा’ का सुरजा या ‘भूखे रीछ’ का राम लाल या ‘अपराध’ कहानी का सचिन पहुँचा था । यदि देश की सत्‍ता उनके हाथों में पहुंचती जो वाकई इस देश का पेट भर रहे हैं, तो संजीव, प्रेमचंद के बाद सबसे प्रमाणिक कथाकार होते ।