Category: चर्चा-ए-कि‍ताब

‘अनहद’ का भीष्म साहनी अंक और राजेश उत्साही की कवि‍ताएं

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चर्चा-ए-कि‍ताब-

17 मई 2016

आज ‘अनहद’ अंक-6 प्राप्त हुआ। हर बार की तरह विविध सामग्री से भरा हुआ है। ‘शताब्दी वर्ष’ के चलते पत्रिका का बड़ा हिस्सा भीष्म साहनी पर केन्द्रित है। ‘समालोचना’ खंड-1 में वरिष्ठ कवि हरीश चन्द्र पाण्डेय पर चार महत्वपूर्ण आलेख और उनकी पांच नयी कवितायें हैं, तो खंड-2 में प्रदीप सक्सेना पर आलोचनात्मक आलेख और उनका स्वयं का एक आलेख। विशेष प्रस्तुति के रूप में वरिष्ठ कवि-आलोचक विजेंद्र का लोकधर्मी चीनी कविता पर विस्तृत आलेख है। हमारे समय के महत्वपूर्ण कवि चंद्रकांत देवताले की डायरी के पन्ने हैं। ममता कालिया, भालचंद्र जोशी और योगिता यादव की कहानियां हैं। हरवंश मुखिया का इतिहास पर एक आलेख है। अमृता शेरगिल की चित्रकला पर अशोक भौमिक ने लिखा है। मधुरेश, बजरंग बिहारी तिवारी और विजय गौड़ ने अलग-अलग विषयों पर विमर्श किया है। रामजी तिवारी का यात्रा वृतांत है। साथ ही एक दर्जन से अधिक किताबें ‘कसौटी’पर कसी गयी हैं। इसके अलावा नीलकमल, शंकरानंद, जयप्रकाश फ़कीर और ज्ञान प्रकाश की कवितायेँ हैं।

आज सायंकालीन भ्रमण में इन कविताओं का ही पाठ किया गया और उन पर चर्चा हुई। जयप्रकाश फ़कीर की कविताओं ने सभी को विशेष रूप से प्रभावित किया। आज से हमारे एक और युवा साथी राजेश पन्त इस सायंकालीन भ्रमण का हिस्सा बने हैं। उनके शामिल होने से हम और अधिक समृद्ध हुए हैं। हम सभी उनकी साहित्य और समाज की गहरी समझ से लाभान्वित होंगे।

कल का सायंकालीन भ्रमण चर्चित कवि-संपादक राजेश उत्साही के कविता संग्रह ‘वह, जो शेष है’ के नाम रहा। कुछ दूर टकाडी गाड़ के किनारे चलने के बाद हम हरी-मुलायम घास पर बैठ गए। उत्साही जी की गाड़ की धारा और हरी घास की मानिंद जीवन से भरी कविताओं का आनंद लिया। सबसे पहले संग्रह की अंतिम और लम्बी कविता –‘नीमा’ का पाठ किया। यह मध्यवर्गीय जीवन के अंतर्विरोधों और संघर्षों को व्यक्त करती हुयी अनूठी कविता है। लगभग 18 पृष्ठों में फैली यह कविता जैसे-जैसे आगे बढती है, पाठक को अपने से जोड़ते चलती है। पता ही नहीं चलता है कि कब कविता पूरी हो गई। कवि-पत्नी को केंद्र में रखकर लिखी गयी यह कविता हर मध्यवर्गीय परिवार की दास्ताँ है। जिसमें यह विडंबना मुखरित होती है कि किस तरह एक स्त्री भावनात्मक, नैतिक और सामाजिक दबाव के चलते अपना पूरा जीवन परिवार के नाम कर देती है, लेकिन फिर भी हासिल आता है शून्य, तमाम कोशिशों के बावजूद वह बड़े-बूढों के आदर्शों पर खरी नहीं उतर पाती है कविता इतनी ईमानदारी से लिखी गई है कि हर पढने वाला उसमें अपना जीवन देखने लगता है। जब कविता पूरी हुई तो कवि मित्र चिंतामणि जोशीजी कहने लगे- इसे सुन मुझे अपना बीता जीवन याद आ गया। ऐसा ही कुछ मेरे साथ भी हुआ। बहुत कम कवि होंगे, जो आपबीती को इतनी बेबाकी से कह पाते हों। कहीं भी पुरुष का अहं आड़े नहीं आता है। पत्नी के प्रति इतना सम्मान उसी मन में हो सकता है, जो सच्चे अर्थों में पत्नी से प्रेम करता हो। इस कविता में पूरी बात अभिधा और सीधी-सरल भाषा में कही गई है। बावजूद इसके कहीं भी कविता लद्धड गद्य में नहीं बदलती। जीवन राग में डूबी होने के कारण काव्य की लय उसमें शुरू से अंत तक बनी रहती है। यह राजेश उत्साही की कविताओं की मुख्य विशेषता ही है कि उनकी कवितायेँ कला के बोझ से दबी हुई नहीं, बल्कि जीवन राग से भरी हुई हैं। उनमें जीवन धडकता हुआ मिलता है। इसका कारण है, उनकी कविताओं में जीवन की जद्दोजहद का होना है।

राजेश उत्साही की कविता के केंद्र में श्रम संलग्न दुनिया है, वे लोग हैं जिनके बिना उच्च और मध्यमवर्ग अपने आरामदायक जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकता है। इस दुनिया में कबाड़ खरीदते, गीत गाते, पालिश करते, झाड़ू लगाते बच्चे, चक्की पीसती स्त्री और तरह-तरह के श्रम करते जवान-बूढ़े सभी हैं। इस दुनिया के लोगों के दुःख-दर्दों और संघर्षों को कवि बहुत बारीकी से व्यक्त करता है। उनके साथ अभिजात्य दुनिया द्वारा किए जाने वाले अमानवीय और असंवेदनशील व्यवहार को रेखांकित करते हुए हमें उनके प्रति संवेदित करने की कोशिश करता है। साथ ही इस दुनिया के लोगों की आशा-आकांक्षाओं को स्वर देता है।

राजेश उत्साही के इस कविता संग्रह में प्रेम कवितायें भी हैं, सामाजिक सरोकारों की कवितायें भी और अपने व्यक्तिगत अनुभवों की कवितायें भी। व्यक्तिगत अनुभव की कवितायें इतनी सघन एवं सान्द्र हैं कि व्यक्तिगत न होकर हम सबकी जीवन की कवितायें हो जाती हैं। हर पाठक उनमें अपना जीवन देखने-महसूसने लगता है। उनके सुख-दुःख और संघर्ष में खुद को शामिल कर लेता है। यह इन कविताओं की सबसे बड़ी ताकत है।इन कविताओं को पढ़ते हुए लगता है कि कविता केवल वही नहीं होती है, जो कम शब्दों में अधिक बात कहती हैं, बल्कि कविता वहां भी होती है, जहाँ जीवन की सघनता और उसके ताजे विवरण होते हैं। राजेश उत्साही अपने आसपास जो अनुभव करते हैं, अपनी ज्ञानेन्द्रियों से और महसूस करते हैं अपने अन्तस् से उसे ही अपनी कविता में अभिव्यक्त करते हैं। इसलिए उनकी कवितायें सीधे दिल में उतर जाती हैं। हमें उनके नये कविता संग्रह का इन्तजार है।

आशा के बादलों की बरसात करतीं कवि‍ताएं

पढना बहुत लोगों का शौक होता है। अपने-अपने तरीके से लोग इसके लिए समय निकालते हैं। लेकिन घुमते हुए भी पढना और वह भी सामूहिक रूप से, ऐसा आपने  कम ही सुना होगा। घूमना  हो और  उसके साथ पढना, साथ ही पढ़े पर चर्चा इसके तो क्या कहने। उत्तराखंड के सीमान्त जनपद पि‍थौरागढ़ में कुछ शिक्षक-साहित्यकार साथी- महेश पुनेठा, चिंतामणि‍ जोशी, गि‍रीश पांडे, वि‍नोद उप्रेती, राजेश पंत, नवीन वि‍श्वकर्मा ‘गुमनाम’ आदि‍, जब सायंकालीन भ्रमण में जाते हैं, तो उनके हाथों में कोई-न-कोई पुस्तक होती है। वे उस पुस्तक को न  केवल पढ़ते हैं, बल्कि उस पर चर्चा भी करते हैं। उन्होंने इसे ‘चर्चा-ए-किताब’ नाम दिया है। इस अभियान की शुरुआत इस वर्ष (2016) मई से हुई। इसमें दो-तीन से लेकर कभी दस-बारह तक भी लोग हो जाते हैं। बाहर से  शहर में आने वाले साहित्यिक मित्र भी इसका हिस्सा बनते हैं। कभी-कभार पत्रिका या किताबों के लोकार्पण जैसे आयोजन भी इसमें होते है।

‘चर्चा-ए-किताब’ को ‘लेखक मंच’ पर इसी स्‍तंभ के तहत दि‍या जा रहा है। आप भी इस अनोखे ‘सायंकालीन भ्रमण’ का आनन्‍द लीजि‍ए। साथ ही अनुरोध है कि‍ आप भी जब अपने मि‍त्रों, परि‍चतों से मि‍लें तो इस पर चर्चा जरूर करें कि‍ पि‍छले दि‍नों कौन-सी अच्‍छी रचना या कि‍ताब पढ़ी। इससे समाज में रचनात्‍मक माहौल बनने में जरूर मदद मि‍लेगी।

9 मई 2016

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आज सायंकालीन भ्रमण के दौरान साथ में था, पिछले दिनों प्रकाशित रोहित कौशिक का काव्य संग्रह- ‘इस खंडित समय में’। संग्रह की कुछ  कविताओं का पाठ किया गया। इस संग्रह की कवितायें एक ऐसे समय को बारीकी से व्यंजित करती हैं, जिसमें ‘तार-तार हैं रिश्ते, तार-तार हैं संवेदनाएं, भरोसा तार-तार है, तार-तार हैं कल्पनाएँ और वहशीपन के  द्वारा मासूमियत को तार-तार किया जा रहा है।’ रोहित की कविता इस  तार-तार होते समय में जिसे वह खंडित समय कहते हैं, एक भरोसा पैदा करने की कोशिश करती हैं। वह दुःख-पीड़ा-करुणा, हर्ष-उल्लास के जीवद्रव्य से हृदयहीनता की बंजर जमीन पर कविता का पौधा पैदा करते हैं। यह कविता का पौधा उनके लोकजीवन के अनुभव और संवेदना से फलता-फूलता है। उसमें किसान-मजदूर का पसीना भी चमकता है और  कूड़ा बीनती फटेहाल बच्ची की करुणा भी फूटती है। उनकी कविता  अन्याय, शोषण और दमन के खिलाफ तनकर खडी हो जाती है। इस तरह निराशा के वातावरण में घिर आए आशा के बादलों की बरसात करती है। हमसे बढ़ती हमारी दूरी को ही ख़त्म करती है। साथ ही धर्म के हथियार से चेतना को कुंद करने की सत्ता की साजिश का पर्दाफाश करते हुए उसमें चोट भी करती है। अच्छी बात यह है कि रोहित अँधेरे के पसर जाने को जिंदगी का ख़त्म हो जाना नहीं मानते हैं, बल्कि वह मानते हैं कि अँधेरे से ही आती है रौशनी की लौ। हमारी जिंदगी को नयी राह दिखाता है अँधेरा। ऐसा वही कवि मान सकता है, जो जिंदगी के कागज़ पर अहसास की कलम से कविता लिखता है। वही गाँव से गायब होते गाँव को देख सकता है। अपने समय और समाज में घट रही समसामयिक घटनाओं को अपनी कविताओं का विषय बना सकता है। रोहित ने साम्प्रदायिकता, किसानों की आत्महत्या, उग्र राष्ट्रवाद, दामिनी बलात्कार काण्ड जैसे विषयों पर कवितायें लिखी हैं। उनका यह पहला ही संग्रह है और इसमें कथ्य और शिल्प के स्तर पर जैसी परिपक्वता दिखाई देती है, वह उनके भविष्य के प्रति हमें आश्वस्त करती है।