Category: कविता

बच्चों का एक प्रेरणादाई गीत

बच्चों का एक प्रेरणादाई गीत आप सब के लिए (अटैचमेंट खोलें). बच्चों के साथ काम करने वाले सभी साथियों से आग्रह है कि समय निकालकर कभी इस गीत को बच्चों के साथ गा सकते हैं. आपकी सुविधा के लिए गीत के बोल नीचे दिए गए हैं. गीत और संगीत जाने-माने शिक्षाविद श्री आनंद द्विवेदी का है और इसे उनके निर्देशन में चलने वाले स्कूल- आश्रम पर्यावरण विद्यालय, अंजनीसैण (उत्तराखंड) के बच्चों और शिक्षकों ने गाया है.
………………………………………………….
चलो मिटाएं नफरत इस संसार से
मिलजुल कर हम रहना सीखें प्यार से
धरती दबी हुई जुल्मों के भार से
सहमी है इन्सानी अत्याचार से
चलो मिटाएं……
मिलजुल कर….
सदियां बीतीं लड़ना हम छोड़ न पाए
नफरत की मजबूत बेडि़यां तोड़ न पाए
कभी धर्म के, भाषा के, रंग-जाति के
कभी देश के नाम पे खून बहाते आए
सीमाएं हैं धधक रही अहंकार से
टूट रहे हम अपने ही परिवार से
चलो मिटाएं……
मिलजुल कर….
यारो बहुत हो गया नफरत का रस्ता छोड़ें
आओ फिर से घरती के टुकड़ों को जोड़ें
सीमाएं हों प्रेम के पावन संगम
आओ मिलकर आज वक्त की धारा मोड़ें
हम न गुलामी झेलेंगे लाचार से
चलों संवारें धरती मां को प्यार से
चलो मिटाएं……
मिलजुल कर….
(आशुतोष उपाध्‍याय जी के सौजन्‍य से)

कि‍ताबों की दुनि‍या

book fair

आजकल देश की राजधानी दि‍ल्‍ली के प्रगति‍ मैदान में वि‍श्‍व पुस्‍तक मेला चल रहा है। पढ़ि‍ए पुस्‍तकों से संबंधि‍त कुछ कवि‍ताएं-

किताबें कुछ कहना चाह्ती हैं

सफ़दर हाशमी

किताबें करती हैं बातें

बई ज़मानों की

दुनिया की, इन्सानों की

आज की, कल की, एक-एक पल की्।

खुशियों की, गमों की, फ़ूलों की, बमों की

जीत की, हार की, प्यार की, मार की,

क्या तुम नहीं सुनोगे इन किताबों की बातें?

किताबें कुछ कहना चाह्ती हैं

तुम्हारे पास रहना चाह्ती हैं।

किताबों मे चिड़ियां चह्चहाती हैं

किताबों मे खेतियां लहलहाती हैं।

कितबों मे झरने गुनगुनाते हैं

परियों के किस्से सुनाते हैं।

किताबों मे राकेट का राज है

किताबों मे साइंल की आवाज है।

किताबों क कितना बड़ा संसार है

किताबों मे ज्ञान की भरमार है।

क्या तुम इस संसार में

नहीं जाना चाहोगे?

किताबें कुछ कहना चाह्ती हैं

तुम्हारे पास रहना चाह्ती हैं।

 

हम किताब के साथ पढे है

डा. श्रीप्रसाद

हम किताब के साथ पढे है

लेकर इसे पहाड़ चढे हैं

यही नदी है यह सागर है

सभी ज्ञान की यह गागर है

यह तुलसी है यह कबीर है

सच्चा मित्र अचूक तीर है

धोखा झूठ फ़रेब नहीं है

किसी तरह का ऐव नहीं है

यह मन मे सपने बुन्ती है

यह मन की बातें सुनती है

हम इस्को लेकर खुश रहते

खेल-खेल अनचाहा सहते

इससे जब कर्ते हैं बातें

हंसता दिन, हंसती हैम रातें

हम किताब के क्या गुण गाएं

इसको बस हम पढें पढाएं

खुली किताब

दामोदर अग्रवाल

यह जग सारा खुली किताब

चंदा-तारा खुली किताब

फ़ेन फ़ेंकती हुई नदी

जल की धारा खुली किताब

 

जाल फ़ेंक तट पर बैठा

हर मछूआरा खुली किताब

उतर घास पर एक मैना

चुगती चारा टहनियों मे

करे इशारा खुली किताब

पढ़ना अच्छा लगता है

देवेंद्र कुमार

हंसकर मिले किताब तो

पढ़ना अच्छा लगता है।

इसमें कितनी कथा-कहानी

रातों मे कहती हैं नानी

पढ़ने का हो चाव, तो

पढ़ना अच्छा लगता है।

पुस्तक मेरी फ़ूलों जैसी

बातें इसमें कैसी-कैसी

मां बोले शाबास! तो

पढ़ना अच्छा लगत

पुस्तक मेरी फ़ूलों जैसी

बातें इसमें कैसी-कैसी

मां बोले शाबास! तो

पढ़ना अच्छा लगता है।

पढ़ने से उजला होता मन

मिलता ज्ञान किताबों से छन

जागे यह अह्सास तो

पढ़ना अच्छा लगता है।

पुस्तक

दिविक रमेश

मुझको तो पुस्तक तुम सच्ची

अपनी नानी / दादी लगती

ये दोनों तो अलग शहर में

पर तुम तो घर में ही रहती

 

जैसे नानी दुम दुम वाली

लम्बी एक कहानी कहती

जैसे चलती अगले भी दिन

दादी एक कहानी कहती

मेरी पुस्तक भी तो वैसी

ढेरों रोज कहानी कहती

 

पर मेरी पुस्तक तो भैया

पढ़ी-लिखी भी सबसे ज़्यादा

जो भी चाहूँ झट बतलाती

नया पुराना ज़्यादा-ज़्यादा

 

मैं तो कहता हर मौक़े पर

ढेर पुस्तकें हमको मिलती

सच कहता हूँ मेरी ही क्या

हर बच्चे की बाँछे खिलती

किताबें

श्याम सुशील

शब्दों का सुंदर

घर हैं किताबें

चिड़ियों के पंखों-सी

फ़र-फ़र किताबें

 

किताबें हैं दोस्त

करती हैं बातें

किताबों की दुनिया मे

आओ हम झांकें

पुस्तक मेरी सहेली

डा. शकुंतला कालरा

सबसे अच्छी सबसे प्यारी

पुस्तक मेरी सहेली।

मौन रहे, लेकिन बतियाए।

महापुरुषों से मुझे मिलाए।

भरे गुणों को चुपके-चुपके।

ऐसी है अलबेली

पुस्तक मेरी सहेली।

माँ जैसा मुझको दुलराए।

नई भोर मुझको दिखलाए।

ज्ञान गुरु सा देती मुझको

मैं हूँ इसकी चेली।

पुस्तक मेरी सहेली।

यह जीवन की राह दिखाए

सत्य-झूठ का ज्ञान कराए

जो चाहूँ सब कुछ बतलाए

बूझे कठिन पहेली

पुस्तक मेरी सहेली।

किताबों की दुनिया

क्षमा शर्मा

हमारी ये दुनिया, तुम्हारी ये दुनिया

किताबें जो कहती हैं किस्से कहानी

कहानी में नानी और नानी की नानी

न बम का धमाका न गोली न गाली

हवाओं में गूँजे सरगम और ताली

ना कोई रोए और ना ही रुलाए

हँसने की दुनिया, हँसाने की दुनिया

चलो आओ, हम इसको बेह्तर बनाएँ

रोने को भूलें और हँसते ही जाएँ

कहीं कोई मिल जाए रोता जो हमको

आँसू भी पोंछें और उसको हँसाएं

किताबों की दुनिया, ये कविता की दुनिया

ये इनकी, ये उनकी, ये सबकी है दुनिया

हमारी ये दुनिया, तुम्हारी ये दुनिया

नटखट किताबें

रमेश तैलंग

बस्ते के अंदर हैं नटखट किताबें

करती हैं आपस में खटपट किताबें

हिंदी की इंग्लिश से बिल्कुल न बनती

किसी दिन  तो  दोनोन मे बस ऐसी ठनती

हो जाती हैं गुत्थमगुत्था दो पल में

मेल नहीं हो पाता जब इनके दल में

लगती हैं तब जैसे झंझट किताबें

कहो कुछ तो इनकी समझ में न आता

बिना बात ही इनको गुस्सा चढ़ आता

कहाँ तक कहें कोई इनकी कहानी

वही नोच-नोची, वही खींचा-तानी

उड़ती हैं पन्नों मे फ़ट-फ़ट किताबें

अकेली गणित ही है इन सबमें सीधी

न करती किसी से लड़ाई कभी भी

सदा साफ़ रहती नई ज़िल्द पहने

अगर बाकी सब भी लगें ऐसे रहने

सहेली बनें सारी झट-पट किताबें

 

पुस्तक

घमंडीलाल अग्रवाल

पुस्तक मे है असली ग्यान

पुस्तक का करना सम्मान

मत इसके पन्ने फ़ाड़ो

इस पर चढ़ी धूल झाड़ो

पुस्तक बिन जीवन रीता

कहती है पुस्तक “गीता”

पुस्तप पर्वों, मेलों की

पुस्तक ले लो खेलों की

चाहे कैस युग आए

पुस्तक की महिमा गाए

पुस्तक पढ़ विद्वान बनो

भारत की मुस्कान बनो

अमनदीप कौर की तीन कविताएँ

amandeep kaur

हाथ

हाथ होना ही तो

हाथ होना नहीं

कुछ हाथ किसी चेहरे के मोहताज़ नहीं

वो ख़ुद एक मुकम्म्ल शख्सियत हैं

जो भरते हैं रंग क़लम से

बनाते हैं आशियाने

बरतन

वस्त्र

कागज़

माटी में रंग गूँथते, धागा बुनते,

पत्थर पर नक्श उकेरते हैं

उँगलिया महज़ तोहमत ही नहीं लगाती

कुछ उंगलियां दुनियां में यूँ भी हैं

जिन्हें पकड़ कर सभ्यताऐं यहाँ तक पहुंची हैं

ये हाथ कोई आम हाथ नहीं

ये हाथ कामगरों के हाथ हैं …//

वो आँखें

वो आँखें
जिन्होंने
दो क़ौमों की मोहब्बत देखी थी
जिन्होंने
ढोले, माहिये, सम्मियाँ देखे थे
वो आँखें
जिनके दरिया में तैर-तैर कर मुटियरें
राह-ए-मुहब्बत पर रवाँ होती थीं
टोपी, दस्तार, चोटी वाली
वो तमाम आँखें
जिन्होंने
मौलवी से हर्फ़ पढ़े थे
वो आँखें
जिन्होंने
जीती, सकीना, नूरां,सबा, पूरो, तेजी को पींगें झूलते देखा था
वो आँखें
जिन्होंने
जंग-ए-आज़ादी देखी
जिन्होंने
लाशों के टीलों में से लाशें पहचानी थीं
अपने मजहब के लोगों की

वो आँखें
जिन्होंने
ज़मीन पर लकीरें खिंचती देखी थीं
और
देखे थे न जाने कितने
टोबा टेक सिंह
अब
ऐसी चंद जोड़ी आँखें
इस पार रहती हैं
चंद जोड़ी आँखें उस पार
अब सूरत-ए-हाल
ये है कि
अर्सों से अपने साथ रही
आँखों में इन्हें
ख़ौफ़ दिखने लगा है।

नाले पार के इंसान से दिखने वाले

वो जो
इंसानों से दिखने वाले
नाले पार की बस्ती में हैं
सुना है
बरसों पहले किसी ने
आह्वान किया था इन्हें
एक हो जाओ !
हक़ के लिए एक हो जाओ !
तब से अब तक
तमाम सियासतें
सहमी सी हैं
कि कहीं
इक्क्मुट्ठ न हो जायें ये
नाले पार के
इंसानों से दिखने वाले
तमाम सरकारें
झोंक डालतीं हैं
अपना सारा का सारा तंत्र
कि बिखरे
कुचले
अशिक्षित
कुपोषित
हाथ बाँधे इनके सामने
फ़र्माबरदारी करें
बिना हक़ मांगे
अपने स्वाभिमान की
अपनी मेहनत की
लूट का तमाशा देखें
इंसानों से दिखने वाले
नाले पार के ये लोग
तख़्त डोलने लगते हैं
सत्ता के गलियारों में
मात्र सोच भर कर
ग़र
नाले पर के इन
इंसान से दिखने वालों को
वास्तव में यकीं हो गया
कि वो इंसान ही हैं
तो क्या होगा ?…

प्रतिभा गोटीवाले  की पांच कविताएँ 

Pratibha gotiwale

अंतरिक्ष

अंतरिक्ष में घूमती पृथ्वी

पृथ्वी पर

एक छोटा-सा घर…

मेरा…

घर में… फिर अंतरिक्ष…!

उड़ान

आसमान से बरसते

विश्‍वास के साथ,

उड़ान का

हौंसला लिए

उगते हैं पंख

उनके भी  …

और फड़फड़ा कर

भरते हैं उड़ान

इन्ही हवाओं में

बस ज़रा…

छूकर तो देखो

ये हरी भरी हवाएँ

उड़ाने हैं… पेड़ों की।

प्रायद्वीप 

अनुशासन ,

संस्कार

और मर्यादाएँ

घिरी हुई

तीन दिशाओं से

अजब सी पहेली हैं !!

स्त्री.हैं या …प्रायद्वीप !!!

(प्रायद्वीप- तीन ओर से पानी से घिरा भू-भाग)

संतुलन

सुनो….

तुम्हें याद हैं?

बचपन की वो लंगड़ी रेस

अपना एक एक पैर

साथ बाँधकर

दौड़ना होता था

एक-दूसरे का संतुलन

बनाते हुए।

ज़रूरी था जीतने के लिये

एक-दूसरे को संभाल लेना।

मुझे लगता हैं

हम आज भी

उसी खेल में हैं,

हमारे पैर आज भी

साथ बँधे हैं

न मेरे बिना

तुम आगे बढ़ पाओगे

न तुम्हारे बिना मैं रुक पाऊँगी

इसलिए आओ

फिर हाथ थामो

और ले चलो साथ मुझे

मेरी तमाम ख़ामियों

और कमज़ोरियों के साथ

या थम जाओ

यही… पास मेरे

अपने  सारे क्षोभ और क्रोध समेत

कि संतुलन ज़रूरी हैं

हमारे मिलने के लिये…

विस्तार

दो दूर जाती हुई

आकाशगंगाओं के बीच

विस्तृत होता जाता है… अंतरिक्ष

तुम कहते हो ब्रह्माण्‍ड का विस्तार

मैं कहती हूँ दूरियों का…।

प्रस्तुति -नित्यानंद गायेन

प्रशांत विप्लवी की कविताएँ

prashant viplavi

कुंवारी लडकियाँ

कुंवारी लडकियाँ…
गिनती हैं पिता के माथे की शिकन
और फिर गिनती हैं अपनी उम्र
हाथ के उँगलियों पर कई बार
हर बार चूक समझकर
दुहराने लगती हैं अपनी ही गिनती
माँ से पूछती हैं अपने जन्म की सही तारीख
और दर्ज कर लेती हैं एक और अनचाहा सच
हमउम्र सहेलियां जब लौट आती हैं मायके
तो घनघना उठता है उसका फोन
और वो चहक कर पूछती है हाल
नव-विवाहिता एक सांस में
बोलती हैं ढेर सारा झूठ
और लडकियाँ देखने लगती हैं
उस झूठ से भी बड़ा कोई स्वप्न
देर रात माँ-बाप की फुसफुसाहट पर
पाते रहती हैं अपना कान
बगुले-सी लपक लेती हैं
बाप की चिंता और माँ की चुप्पी
मन मसोस कर पूछती हैं
छोटे भाई से आज की तारीख
फिर बैठ जाती है खोलकर अपनी ही डिग्रियां
कुछ पुरानी धूमिल तस्वीरें
जो झांक रही होती हैं
स्कूल/कॉलेज के परिचय-पत्र से
कुछ चिट्ठियां कच्चे हाथों से लिखी गईं
अपनी ही प्रवासी सहेलियों की
कुछ ग्रीटिंग्स, कुछ अबूझ चिट
पलटते-पलटते पहुँच जाती हैं
अपने ही सुन्दर अतीत के दिनों में
देखती हैं वैवाहिक रेखा का स्थान अपनी हथेली पर
रेखाओं की तीक्ष्णता को खरोंच कर
आश्वस्त होती हैं…
फिर खुली आँखों में पड़ी रहती हैं बिस्तर पर घंटों
हर सुबह इस उम्मीद में उठती हैं
कि पिता मांग ले उससे उसी की कोई अच्छी-सी तस्वीर
माँ हिदायत दे कि लगाया करे हल्दी चेहरे पर कभी-कभी
भाई जिद करे “दीदी अब तो बुन दो एक स्वेटर”
लगने लगे मजलिश पडोसी औरतों की
प्यारी लगने लगे चिढा़ने वाली बुढिया भी
कुंवारी लडकियाँ इन दिनों
कई-कई स्वप्न देखती हैं
हर स्वप्न झूठा भी नहीं होता
कुछ स्वप्न झूठ से भी सुन्दर होते हैं
कुछ स्वप्न..निरा स्वप्न की तरह रहता है कायम
स्वप्न का टूटना
एक घरौंदे के टूटने-सा नहीं होता है
एक उफनती नदी के बाँध के टूटने-सा होता है
जहाँ लडकियाँ बहा देती हैं अपनी सारी उम्मीदें
ताकि उम्मीद बची रहे नदी में
और नदी बची रहे उम्मीदों में

यात्रा

यात्रा के लिए निकल पड़ना ..
मेरे लिए किसी घटना में दर्ज होने जैसा नहीं है
मेरे साथ कुछ सामान
जो शायद मुझसे भी ज्यादा अभ्यस्त हैं
घर के किसी कोने में पड़े रहते हैं
एक नई यात्रा के इंतज़ार में
एक आदमी जो मेरे अन्दर है
उसकी देह गंध पाकर
प्रतीक्षारत सामान कुलबुलाने लगता है
कभी बेमन से
कभी उत्साह से
कभी कौतूहल से
मैं बढ़ जाता हूँ सामान को कंधे पर डाले
एक यात्रा पर
एक घर…अपने तमाम आपत्तियों के बावजूद
वहीँ टिका रहता है
कि मेरा लौट आने का उसका भरोसा
मेरे अपनों से ज्यादा है
लेकिन मेरे अपने मेरे लौट आने तक
घर में एक बेचैन यात्रा पर होते हैं
लौट आना या नहीं लौटने जैसा कोई भी प्रमाण
सिर्फ आश्वस्त होने के लिए होता है
लेकिन घर तब भी वहीँ टिका होता है
अपने तमाम आपत्तियों के साथ

पिता

झुर्रियों से निर्मित पिता
जब मुस्कुराते
दर्द एक कोने फंसा ही रहता

जैसे स्वाद छोड़ता
ओठ के कोने में दबा तम्बाकू
का होना न होना

माथे पर चिंताओं की शिकन
पसीनों को लरजने से रोकती
जैसे कातर मेढ
रोकता है बारिश का पानी

पीठ पर पसीने से बनी
संघर्ष की तस्वीर
जैसे बुरे समय में दिख जाता है
बंगाली तांत्रिक का इश्तेहार भी

पिता का चुपचाप पड़े रहना खाट पर
और ताकते रहना सीलन भरी छत
दुह्स्वप्न का थककर बैठ जाना
जैसे डर टूटता है मन में किसी रोज़

उनके फटे तलवे की रगड़ चप्पल पर
उम्मीद पाले हुए किसी अनावश्यक संगीत का
जैसे दुनिया खिलाफ है
और पिता गा रहे हैं अपना ही गीत

झुर्रियों से निर्मित पिता
जब भी लेते हैं एक दीर्घनि‍श्‍वास
हम मुस्कुराते हैं
जैसे उन्हें किसी दुरूह यात्रा से निवृति मिली हो…

सर्वज्ञानी

हवा का रुख बता देता है
थोड़ी-सी धूल उड़ाकर
आसमान का नब्ज़ टटोल लेता है
बादलों की बेचैनी देखकर
गीली हुई थी कब धरती
मिट्टी की सोंधी महक से जान लेता है
दरख्तों से लिपटकर जो बता दे
उम्र ..खोखलापन और उसकी जात
मैना के चोंच पर पिली धारी से बता दे
नर-मादा का भेद
हैरान है, सर्वज्ञाता को पता नहीं चलता
मंडी का भाव क्या है?

बेटी जब फ्राक की गोद में अनाज नहीं उठाती
वो निकल पड़ता है सुयोग्य वर की खोज में
मुखिया जब बिठा लेता है पास प्यार से
उसे उस रात किसी भी करवट नींद नहीं आती
बैंक का मनीजर पूछता है जब उसका हाल
वो कर्ज जल्द चुकता करने की बात करता है
हैरान है, सर्वज्ञ को पता नहीं चलता
कब वो अपने आलू का चिप्स खरीदता है

बेटे के साइकि‍ल में डालता है तेल
बीबी को दिखाता है बेटे के यूनिफॉर्म की मैल
सोचता है आने वाले पवनी के बारे में
बीबी से कहता है लोन माफ़ हो गया

बेचन से पूछता है दिल्ली का हाल
शायद नौकड़ी बचा ले खेत
खेत के मचान पर लौटकर
महीनों को गिनता है उँगलियों पर कई-कई बार
बेटे के हाँक पर जगाता है खुद को
बेटे के कंधे से नापता है अपना कंधा
शेक्सपियर की वो कविता
जो पसंदीदा रही उसको ‘ए लवर्स कम्प्लेंट’
बेटे से सुनना चाहता है
घुप्प अँधेरे में भी
वो गिन रहा गॉंव की पसलियाँ
लम्बी कवितायें
अभी और बांकी है
जैसे सन्नाटा बचा है कुत्तों के पास
बिल्कुल महफूज
जुगनू प्रार्थना कर रहे हैं अच्छी फसल की
कोई उल्का अचानक गिरा हो
वहीं उसी आसमान में कहीं
बंद आँखों से लहलहाता खेत मांगता है
कुछ भी हो–
इस फसल तक इंतज़ार करते हैं
उम्मीद एक हाथ की तरह है
जो टिका है बेटे के कंधे पर
दिल्ली के दुह्स्वप्न से निकलकर
घुसता है घर के अन्दर
अंतिम निर्णय सुनाकर
देखता है पत्नी का चेहरा
उसकी आँखें ख़ुशी से लहलहाई ऐसे
जैसे गेहूं की सुनहरी बाली

लिजलिजा जहर

चंपा के मन में कई प्रश्न हैं
अपनी पहली माहवारी पर

वो मिटाना चाहती है अपने मन का घिन्न

देह के अंदर का ये मैल
उसके मन में आ बैठा है

माँ, खटिया पर पड़ी-पड़ी कुहरते हुए पूछती है
उसके चेहरे पर सरकते पसीनों के बारे में
उसके अस्वाभाविक चाल के बारे में

मगर सोचती है चंपा
और सिहर उठती है

एक बार फिर चुप रह जाना होगा उसे
कौंधते प्रश्नों को सुलाकर
ये लिजलिजा-सा जहर
उसने देखे हैं कई बार- फटती आँखों से
बिलबिलाई थी
जब चाचा ने मुँह पर हाथ रख दिया
माँ पूछती रही थी तब भी
टॉफी और गुड़ियों के बारे में
तपते बुखार में कब सो गई थी
बड़बड़ाते हुए…

आज उसे घिन आ रही है अपने पर
चाचा पर
माँ पर
टॉफी पर
गुड़िया पर
उसे सबकुछ लिजलिजा जहर जैसा लग रहा है

भूत-प्रेत/गुनी-ओझा 

(एक अवलोकन सामाजिक विवेक से )
चार साल के वैवाहिक जीवन में
नैयकी को दौड़ा पड़ा पूरे सात बार
ओझा– गुनी सब उम्र-दराज
हार गया नैयकी के भूत से
मगर मंतरिया जानता है देह-गंध
ब्रह्म-डाकिनी और चुरैल का

देह सूंघ के कुछ देर तो चुप रहा
फिर कलाई को आहिस्ते से दबाकर
मिलाया आँख-से-आँख
भयानक आंच से डरा
एक लम्बी सांस छोड़कर जाहिर किया
ऐसा-वैसा नहीं बड़का पीपर वाली ब्रह्म-डाकिनी है
नैयकी आश्वस्त हुई
मंतरिया के आँखों की लाली देख
पक्का इलाज़ इसी के पास है

(एक अवलोकन कवि के विवेक से )
हर रात जब भी संजोती कोई रंगीन ख्वाब
पिटती और रोकर गुजार देती रात
नवेली दुल्हन की टीस
और पियक्कड़ दूल्हा
दोनों बिछावन के दो तरफ

बंधन में बंधी लड़की
बनाती है योजना ..
बाल खुलते ही
सुर्ख लाल हो जाती है आँखें
भवें तन जाती है
और घृणा से भर उठता है मन
पहले आहट पर गुर्राई
कलाई पकड़ते ही चिल्लाई
उठा-पटक में पियक्कड़ था बिल्कुल नीचे
बैठ उसके छाती चीखती रही
तृष्णा और अतृप्त देह की चीत्कार से
गूंज उठा पूरा मुहल्ला
किसी चुरैल का साया है
या है ब्रह्म-डाकिनी की ये डाक

उस रात …
बेसुध सोई नवेली
और पियक्कड़ रतजगा बैठा
सेवता रहा
देह का उत्पीडन तो खत्म हुआ चुड़ैल की
मगर यौवन के प्यास में
तड़पती रही नवेली कई-कई रात

मन्तरिया का स्नेहिल स्पर्श
जगा गई है एक क्षीण उम्मीद
गाँव की सहमति है
कई-कई रात कटे मन्तरिया संग अकेले
तब जायेगी ब्रह्म-डाकिनी
मगर उसकी आस्था जाग उठी है बुझते रिश्ते पर
रोई लिपटकर पति से
इस दुर्गन्ध से मुक्ति लो जल्दी
वर्ना जायेगी नहीं ब्रह्म-डाकिनी

फिर उस रात के बाद
न मन्तरिया आया ..न ब्रह्म-डाकिनी
न महकी शराब की गंध
न उठा कोई कायर हाथ
कोख में पैर पटक रही है
कोई नई प्राणी बार-बार //

 

61, अशोक भौमिक: वीरेन डंगवाल  

चि‍त्रकार-लेखक अशोक भौमि‍क

चि‍त्रकार-लेखक अशोक भौमि‍क

हमारे प्रि‍य चि‍त्रकार-लेखक अशोक भौमि‍क का आज 61वां जन्‍मदि‍न है। इस अवसर पर वरि‍ष्‍ठ कवि‍ वीरेन डंगवाल द्वारा लि‍खी गई कवि‍ता-  

तो हजरत !

इस जवान जोश के बावजूद

आप भी हो चुके 61 के

और कल ही तो नीलाभ प्रकाशन की उस दुछत्‍ती पर

आपके साथ हम भी रचते थे कभी-कभी

अपनी वो वि‍चि‍त्र नृत्‍य नाटि‍कायें

जैसे एक वि‍लक्षण नशे में डूबे हुए,

या आपका वो

 

एक जुनून में डूबकर कवि‍ता पोस्‍टर बनाना

सस्‍ते रंगों और कागज से

खाते हुए बगल के कॉफी हाउस से मंगाये

बड़ा-सांभर, नींबू की चाय के साथ

अभी तक बसी हुई है नाक और आत्‍मा की

वे सुगंधें प्रेम और परि‍वर्तन की चाहत से

लबालब और गर्मजोश।

हिन्दी प्रांतर में तो वह एक नयी सांस्‍कृतिक शुरुआत हो रही थी तब

 

क्‍या उम्‍दा इत्‍तेफाक है

कि‍ इकत्‍तीस जुलाई प्रेमचन्द का

भी जन्‍मदि‍न है, आपसे बार-बार

कहा भी गया होगा

 

आप भी तो रचते हैं

अपने चि‍त्रों और लेखों में

भारतीय जीवन की वे दारुण कथायें

जो पि‍छले कुछ दशकों में

गोया और भी अभि‍शापग्रस्‍त हो गई हैं

बीते इन तीसेक बरसों में

बहुत कुछ बदला है

देश-दुनि‍या में

हमारे इर्द-गि‍र्द और आप-हम में भी।

 

वे ति‍लि‍स्‍मी जि‍न्‍नात-यातुधान-जादूगर

और खतरनाक बौने आपके चि‍त्रों के

स्‍याह ज्‍यामि‍तीय रेखाओं

और कस्‍बों की तंग गलि‍यों से नि‍कलकर

महानगरों-राजधानि‍यों तक नि‍र्बाध आवाजाही कर रहे हैं

अपने मनहूस रंगों को फड़फड़ाते हुए।

 

अब खुद बाल बच्‍चेदार हो रहे हैं

हमारे बेटे-बेटि‍यां जो तब बस

खड़े होना सीखे ही थे,

और आप भी तो अपने टाई-सूट और

बैग को छोड़कर

पूरी तरह कुर्ता-पाजामा की

कलाकार पोशाक पर आ गये हैं।

 

हां, कुछ अब भी नहीं बदला है

मसलन शब्‍दों और भाषा के ि‍लए

आपका पैशन, लोहे के कवच पहना आपका नाजुक भाव जगत

गुस्‍सा, जो कि‍सी मक्‍खी की तरह

आपकी नाक पर कभी भी आ बैठता है

और थोड़ा सा खब्‍तीपन भी जनाब,

आपकी अन्‍यथा मोहब्‍बत से चमकती

आंखों और हंसी में।

मगर वह सब काफी उम्‍दा है, कभी-कभी जरूरी भी

और इन दि‍नों

हथौड़ा-छेनी लेकर कैनवास पर आप

गढ़ रहे हैं एक पथराई दुनि‍या की तस्‍वीरें

जि‍न्‍हें देखकर मन एक साथ

शोक-क्रोध-आशा और प्रतीक्षा से

भर उठता है।

ये कैसी अजीब दुनि‍या है

पत्‍थर के बच्‍चे, पत्‍थर की पतली डोर से

पत्‍थर की पतंगें उड़ा रहे हैं

गली-मोहल्‍लों की अपनी छतों पर

जो जाहि‍र है सबकी सब

पत्‍थरों से बनी हैं।

यो वे परि‍न्‍दे

जो पथराई हुई आंखों से देखते हैं

पथरीले बादलों से भरे आकाश जैसा कुछ

अपने पत्‍थर के डैनो को बमुश्‍कि‍ल फड़फड़ाते

मगर आमादा फि‍र भी

परवाज़ के लि‍ये।

 

हमें आपकी छेनी के लि‍ए खुशी है अशोक,

हमें खुशी है कि‍ आप

महान चि‍त्रकार नहीं हैं

हालांकि‍ बाज़ार आपकी अवहेलना भी नहीं कर सकता

अपने भरपूर अनोखे और सुवि‍चारि‍त कृति‍त्‍व से

ख़ुद के लि‍ए वह जगह बनाई है आपने, और अपनी मेहनत से,

हमें खुशी है कि‍ हमारे समय में आप हैं

हमारे साथ और सम्‍मुख

जन्‍मदि‍न मुबारक हो !

अनुप्रि‍या की बाल कवि‍तायें

अनुप्रि‍या

अनुप्रि‍या

सुपौल, बिहार में जन्‍मीं अनुप्रि‍या की बाल कवि‍तायें नंदन, स्नेह, बाल भारती, जनसत्ता, नन्हे सम्राट, जनसंदेह टाइम्स, नेशनल दुनिया, बाल भास्कर, साहित्य अमृत, बाल वाटिका, द्वीप लहरी, बाल बिगुल आदि‍ पत्र-पत्रि‍काओं में प्रकाशि‍त हो चुकी हैं। उनकी चार बाल कवि‍तायें-

मुस्कान पुरानी

होठों पर आ जाये फिर से
वो मुस्कान पुरानी
भीगा मन बहता जाए
वो बचपन की  शैतानी

पगडंडी की दौड़ हो
या छुक-छुक वो रेल
झगड़ा छोटी बात पर
मीठी-मीठी   मेल

झूला आम की डाल का
नीम की ठंडी छाँव
नटखट सी  नादानियाँ
अपनेपन सा गाँव

कच्चे-पक्के  बेर की
खट्टी -मीठी चाह
थाम के वो परछाईयाँ
चल दूँ फिर उस राह।

नींद

चँदा बादल संग खेलता
शोर मचाते तारे
तू भी सो जा कहती मम्मा
सो गए अब तो सारे

आसमान ने ओढ़ लिया है
काला सा क्यूँ रंग
नींद बाँटती सबको देखो
सपने रंग-बिरंग

ऊँघ रहे हैं परदे-खिड़की
तकिया और रजाई
सोने चला मैं भी अब तो
नींद मुझे भी आई।

जन्मदिन

आजा चंदा तू  संग मेरे
खा ले हलवा पूरी
करनी है तुमसे मुझको
बातें बहुत जरूरी

पापा लाए कई किताबें
मम्मी गुड़िया प्यारी
और भैया ने जन्मदिन की
कर ली हर तैयारी

आकर देखो जरा यहाँ
है कितना हंगामा
अब न देर करो तुम बस
आ जाओ न मामा।

किस्सा

मुनिया सुना रही है किस्सा
मुन्ना सुनता ध्यान से
एक कबूतर उड़कर आया
बनिए की दुकान से

उसके पंजे में था थैला
और थैले में दाने
रखकर थैला भूल गया वो
किसके घर में जाने

चल मम्मी से लेकर चावल
उसको दे दें थोड़े
हाथ पकड़ कर एक दूजे का
मुनिया मुन्ना  दौड़े।

नए साल पर : कमल जोशी

kamal joshi. new year
इस बार मत सोचना
अपने और अपनों के बारे में।
सोचना कुछ
उदास आँखोंवाले भूखे बचपन के बारे में।
खाली हाथ जवानी के बारे में।
जीने, और थोड़ा और बेहतर जीने के
सपने देखनेवाली लड़की के बारे में।
दिन-भर हाड़ तुड़ाती, मेहनत करती
फिर भी भूखी रहती व पिटती औरत के बारे में।
बंधती, बिकती और लुटती नदी के बारे में।
पानी के बारे में, हवा के बारे में, जंगल के बारे में
और गौरय्या के बारे में।

और हाँ! सोचना जरूर,
इन नेताओं के बारे में,
अपने गुस्से के बारे में
अपने निश्चय के बारे में !

अनवर सुहैल की कविताएं

 अनवर सुहैल

अनवर सुहैल

1-

बताया जा रहा हमें
समझाया जा रहा हमें
कि हम हैं कितने महत्वपूर्ण

लोकतंत्र के इस महा-पर्व में
कितनी महती भूमिका है हमारी

ईवीएम के पटल पर
हमारी एक ऊँगली के
ज़रा से दबाव से
बदल सकती है उनकी किस्मत

कि हमें ही लिखनी है
किस्मत उनकी
इसका मतलब
हम भगवान हो गए…

वे बड़ी उम्मीदें लेकर
आते हमारे दरवाज़े
उनके चेहरे पर
तैरती रहती है एक याचक-सी
क्षुद्र दीनता…
वो झिझकते हैं
सकुचाते हैं
गिड़गिडाते हैं
रिरियाते हैं
एकदम मासूम और मजबूर दिखने का
सफल अभिनय करते हैं

हम उनके फरेब को समझते हैं
और एक दिन उनकी झोली में
डाल आते हैं…
एक अदद वोट…

फिर उसके बाद वे कृतघ्न भक्त
अपने भाग्य-निर्माताओं को
अपने भगवानों को
भूल जाते हैं….

2-

उनकी न सुनो तो
पिनक जाते हैं वो

उनको न पढो तो
रहता है खतरा
अनपढ़-गंवार कहलाने का

नज़र-अंदाज़ करो
तो चिढ़ जाते हैं वो

बार-बार तोड़ते हैं नाते
बार-बार जोड़ते हैं रिश्ते

और उनकी इस अदा से
झुंझला गए जब लोग
तो एक दिन
वो छितरा कर
पड़ गए अलग-थलग
रहने को अभिशप्त
उनकी अपनी चिडचिड़ी दुनिया में…

3-

उन अधखुली
ख्वाबीदा आँखों ने
बेशुमार सपने बुने

सूखी भुरभरी रेत के
घरौंदे बनाए

चांदनी के रेशों से
परदे टाँगे

सूरज की सेंक से
पकाई रोटियाँ

आँखें खोल उसने
कभी देखना न चाहा
उसकी लोलुपता
उसकी ऐठन
उसकी भूख

शायद
वो चाहती नहीं थी
ख्वाब में मिलावट
उसे तसल्ली है
कि उसने ख्वाब तो पूरी
ईमानदारी से देखा

बेशक
वो ख्वाब में डूबने के दिन थे
उसे ख़ुशी है
कि उन ख़्वाबों के सहारे
काट लेगी वो
ज़िन्दगी के चार दिन…

4-

वो मुझे याद करता है
वो मेरी सलामती की
दिन-रात दुआएँ करता है
बिना कुछ पाने की लालसा पाले
वो सिर्फ सिर्फ देना ही जानता है
उसे खोने में सुकून मिलता है
और हद ये कि वो कोई फ़रिश्ता नही
बल्कि एक इंसान है
हसरतों, चाहतों, उम्मीदों से भरपूर…

उसे मालूम है मैंने
बसा ली है एक अलग दुनिया
उसके बगैर जीने की मैंने
सीख ली है कला…

वो मुझमें घुला-मिला है इतना
कि उसका उजला रंग और मेरा
धुंधला मटियाला स्वरूप एकरस है

मैं उसे भूलना चाहता हूँ
जबकि उसकी यादें मेरी ताकत हैं
ये एक कडवी हकीकत है
यदि वो न होता तो
मेरी आँखें तरस जातीं
खुशनुमा ख्वाब देखने के लिए

और ख्वाब के बिना कैसा जीवन…
इंसान और मशीन में यही तो फर्क है……

5-

जिनके पास पद-प्रतिष्ठा
धन-दौलत, रुआब-रुतबा
है कलम-कलाम का हुनर
अदब-आदाब उनके चूमे कदम
और उन्हें मिलती ढेरों शोहरत…

लिखना-पढ़ना कबीराई करना
फकीरी के लक्षण हुआ करते थे
शबो-रोज़ की उलझनों से निपटना
बेजुबानों की जुबान बनना
धन्यवाद-हीन जाने कितने ही ऐसे
जाने-अनजाने काम कर जाना

तभी कोई खुद को कहला सकता था
कि जिम्मेदारियों के बोझ से दबा
वह एक लेखक है हिंदी का
कि देश-काल की सीमाओं से परे
वह एक विश्‍व-नागरिक है
लिंग-नस्ल भेद वो मानता नहीं है
जात-पात-धर्म वो जानता नहीं ही

बिना किसी लालच के
नोन-तेल-कपडे का जुगाड़ करते-करते
असुविधाओं को झेलकर हंसते-हंसते
लिख रहा लगातार पन्ने-दर-पन्ने
प्रकाशक के पास अपने स्टार लेखक हैं
सम्पादक के पास पूर्व स्वीकृत रचनायें अटी पड़ी हैं

लिख-लिख के पन्ने सहेजे-सहेजे
वो लिखे जा रहा है…
लिखता चला जा रहां है…

इतनी सस्ती नही थी आज़ादी : नित्यानंद गायेन

नित्यानंद गायेन

नित्यानंद गायेन

क्रांति तो दूर की बात है
आज तो वे याद भी नही करना चाहते हैं
आज़ादी की जंग में
शहीद किसी भी क्रांतिकारी को
मंगल पाण्डेय
भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु
या अशफाक़उल्ला और चंद्रशेखर की
संघर्षगाथा
इस माटी का धरोहर है
बिरसा मुंडा , मातुनगिनी हाजरा और खुदीराम
कितनो को याद है आज ?
यह सूची लम्बी है
गदर पार्टी का इतिहास
कब पढ़ा हमने ?
इतनी सस्ती नही थी
आज़ादी जो आज हम समझ रहे हैं
यह कुर्बानियों का एक लम्बा इतिहास है
इसे पढ़ना मतलब
संघर्ष और यातनाओं से रू-ब-रू होना है
मतलब हमारा जिन्दा रहना है।