Category: कविता

अनुप्रि‍या की बाल कवि‍ताएं

चि‍त्र: अनुप्रि‍या

कि‍ताब

काले अक्षर की माला में
गूंथा हुआ जवाब हूँ
मैं तो प्यारी मुनिया की
एकदम नयी किताब हूँ

मेरे भीतर कई कहानी
कितने सारे रंग
उड़ता बादल,चहकी चिड़िया
सब हैं मेरे संग

उड़नखटोला अभी उड़ा है
लेकर सपने साथ
आसमान की सैर करेंगे
दे दो अपना हाथ

प्यासा कौवा ढूँढ़ रहा है
पानी की एक मटकी
शेर आ रहा पास है अब तो
साँस हमारी अटकी

मुन्ना खाए आम रसीला
मुनिया देखे फूल
खेल-खेल में पढ़ते बच्चे
बातें सारी भूल।

चिड़िया रानी

चिड़िया रानी पल भर ठहरो
मुझको तुम एक बात बताओ
कैसे गाती इतना मीठा
आज पहेली यह सुलझाओ

कैसे नन्हे पंखों के बल
आसमान छू पाती हो
तुम्हें पकड़ने हम जो आएं
झट से तुम उड़ जाती हो

कैसे छोटी चोंच तुम्हारी
चुग जाती है दानों को
आज बताना होगा तुमको
हम नन्हे अनजानों को

एक दिन फुरसत में हमको भी
आसमान की सैर कराओ
चूं-चूं-चीं-चीं की भाषा में
नयी कहानी हमें सुनाओ।

सुबह सवेरा

हाथ थाम कर सूरज का
घर से चला सवेरा
चिड़ियों के पंखों ने डाला
आसमान में डेरा

धीमे-धीमे आँख मींचते
उठा है सारा बाग़
लहरों ने रच डाला  है
आज नया फिर राग

ढूंढ़ रहा है बादल कब से
खोयी हुई जुराब
भूल गया है मेज पे रख के
फिर वो नयी किताब

खिल आये हैं चेहरे फिर
फिर से सजे हैं खेल
जिससे कल झगड़ा कर आये
आज किया फिर मेल

अनंत भटनागर की कवि‍ताएं

अनंत भटनागर

वह लड़की जो मोटरसाइकिल चलाती है

संकरी सड़कों पर
दाएं-बाएं
आजू-बाजू से काट
वाहनों की भीड़ में
अक्सर
सबसे आगे
निकल जाती है
वह लड़की
जो
मोटरसाइकिल
चलाती है

सोचता हूँ
जब लड़कियों के लिए
दुनिया में
वाहन चलाने के
अनेकानेक
सुन्दर व कोमल
विकल्प मौजूद हैं
तब भी आखिर
वह लड़की
मोटरसाइकिल ही
क्यों चलाती है ?

कभी लगता है कि
यह उसके भाई ने
खरीदी होगी
और वह
छोड़ गया होगा
घर परिवार
या फिर
हो सकता है
यह उसके पिता की
अन्तिम निशानी हो
और,
बेचना उसे
नहीं हो
स्वीकार

हो सकता है
वह लड़की
एक्टिविस्ट हो
और मर्दों की दुनिया
के अभेद्य दुर्ग को
सुनाना चाहती ह
अपनी ललकार

कभी-कभी
सोचने लगता हूँ
क्या करती होगी
वह लड़की
जब कभी जाती होगी
अपने बॉयफ्रेंड के साथ
मोटरसाइकिल पर
पीछे बैठकर

क्या
बलखाती / मुस्काती
लतिका सी पुलकित
सिमट जाती होगी
अपने हर अंग में
हर वांछित/अवांछित
ब्रेक पर
या झुंझलाती/झल्लाती
रहती होगी
उसकी
धीमी रफ्तार पर

अवसरों की वर्षा में
दिनोंदिन
घुलती दुनिया में
जल, थल, वायु
के भेद भुलाकर
जब लड़कियां
चलाने लगी है
रेल, जहाज,
हवाई जहाज
एक लड़की
के मोटर साईकिल
चलाने पर इतना
सोच-विचार
आपको बेमानी लग
सकता है

मगर,
इन दकियानूसी सवालों
की गर्द
आप हटाएं
इससे पहले ही
पूछ लेना चाहता हूँ
एक सवाल

क्या
आप नहीं चौंके थे
उस दिन
जब आपने
पहली बार किसी
एक लड़की को
मोटरसाइकिल चलाते
हुए देखा था ?

विरासत में मिले
हजारों साल पुराने
खजाने को
मस्तिष्क में समेटते हुए
क्या आपको नहीं लगता
कि
आकाश-पाताल को
पाटने से
कठिन होता है
सोच की खाइयों को
भर पाना
जल थल
भेदने से
कठिन होता है
जड़ तन्तुओं को
सिल पाना
हाथ पैर
काटने से
कठिन होता ह
सड़े घावों
को चीर पाना

इसलिए
उस लड़की के
सामने से गुजरते हुए
सोचता हूँ अक्सर
क्या शादी के बाद भी
चला पाएगी वह
मोटरसाइकिल
क्या बदल पाएगी
वह
वक्त के पहिये की
रफ्तार
क्या
वह आगे बैठी होगी
और पति
होगा
पीछे सवार ?

मोबाइल फोन

अब नहीं रहा
वह समय/कि
लड़कियां भेजे
सन्देश
कबूतरों के हाथ
और/करती रहें
जवाब की
अनवरत प्रतीक्षा

अब नहीं रहा
वह समय/कि
लड़कियां जागें
रात-रात
और छिपकर
रेशमी कपड़ों पर
सिल दें
कोई एक नाम

अब नहीं रहा
वह समय/कि
लड़कियां लिखें
कविताएं
और/गुनगुनाती
इठलाती
गुजार दें
सुबह-शाम

प्रेम जैसी
सरल चीज के लि
इतनी कठिनाई
सहने का
समय नहीं है यह

प्रेम के लिए
अब उपलब्ध है
एक मोबाइल दुनिया
मोबाइल दुनिया
जहाँ
हर वक्त/हर जगह
किया जा सकता है
प्रेम
जहाँ हर क्षण
पलटी जा सकती है
प्रेमियों से
मनुहार
जहाँ हर रोज
बदले जा सकते है
प्रेमी

मोबाइल दुनिया में
प्रेम के लिए
शब्द ही नहीं
सम्पूर्ण शब्दावली है
प्रेम के लिए
क्षणिक चित्र नहीं
गति‍क दृश्‍यावली है
कविता ही नह
गीत है, स्वर है
ध्वनि गत्यावली है

इस गतिशील दुनिया में
प्रेम के लिए
लम्बी तपस्या/गहन
साधना करते रहन
का समय नहीं है
अब किसी के पास
इतने अन्तराल में तो
किए जा सकते हैं
अनेकानेक प्रेम
एक के बाद एक
या फिर
एक साथ

मोबाइल फोन
ने कर दिया हैं
प्रेम करना
बहुत आसान

सचमुच !
प्रेम की अनुपस्थिति में ही
होता है
प्रेम करन
बहुत आसान।

महात्माजी

महात्माजी
खाते नहीं हैं
अन्न
वस्त्र धारण नहीं करत
खुला ही रखते हैं
तन-बदन
वर्षों पहले त्याग चुके हैं
गृहस्थ जीवन

तुम्हारे जैसे नहीं हैं वह
पदार्थ-अपदार्थ के लिए
ललचाता नहीं है
उनका मन

पेट भरने के लिए
खा लेते हैं
सूखी मेवा
शि‍ष्यों ने करवा दिया है
आश्रम
वातानुकूलन
शि‍ष्यायें चंचल हैं
करती हैं
अविचल सम्पूर्ण सेवा

महात्माजी
परम त्यागी हैं।

शुक्र है

बाल खुशनसीब है
अब तक साथ निभा रही है
हिना

अपनी उम्र को
उम्र में मिलाते हुए
उसने भी गुजार दी है
एक लम्बी उम्र

डर है कि कुछ
भूरे-भूरे विभीषण
असलिय
बताने लगे हैं.

शुक्र है
पतझड़
अभी बहुत दूर है

अनामिका, अंकल!

हँसी की
हजारों वॉट
बरसाकर
धीरे से
उसने रख लिय
अपनी जींस की
पिछली पॉकेट में
सेलफोन

फिर लेपटॉप के
दोनो पंखों को फैलाकर
उड़ने लगी असीम
आकाश में

एयरपोर्ट के
वेटिंग लाऊंज में
मित्रता के तमाम
पर्यायवाचियों को
दुहराते हुए
मैंने उससे पूछा था
उसका नाम

मित्रता की तमा
संभावनाओं को खारिज
करते हुए
उसने कहा-
अनामिका, अंकल !

काँप रहा है मन

देहरी पर
रखते हुए
बाहर
काँपता है
जैसे दिया
काँप रहा हैं मन
मीत तुम्हें
स्कूल को सौंपते हुए.

फूल/तुम
घबरा ना जाना
अजनबी पंखुरियों के साथ
डरना मत
स्कूल की अनजानी
हवाओं से
न होना बेचैन
क्लासरूम की
अपरिचित गंध से

डर रहा हूँ मैं
कहीं टीचर के
रंगबिरंगी सूट में तुम्हें
दिखने न लगे गुब्बारे
बच्चों की खिलखिलाहट से
याद न आ जाएं
तुम्हें अपने
खासमखास खिलौने

कुछ कहना चाहो
तुम
और न कह पाने की
जुम्बिश में
फूट न पड़े
रूलाई

रोशन
जिन्दगी की आस में
दीप तुम्हें
सौंप रहा हूँ
दुनिया को

काँप रहा है मन

औरत एक सवाल है

धरती पर उसके
जमते कदम
बढ़ती गति
और
पंखिल परवान
जिनके लिए सवाल है
उन सबके लिए
औरत एक सवाल है

उसकी खिलखिलाहट
चहकती हँसी
महकती मुस्‍कान
उसकी खिलती आँख
खुलती हुई वाक्
दिन पर दिन
ऊँची उठती नाक
उसके कपड़ों की नाप
कर्मों की छाप
कदमों की थाप

उसकी आस
उसके अहसास
खुद पर बढ़ता
विश्‍वास
जिनि‍क लिए सवाल है
उन सबके लिए
औरत एक सवाल है

युग-युग से
मानस की कुन्द कारा में
द्रोपदी के केश
सीता का पुनर्प्रवेश
अहिल्या निर्निमेष
गार्गी के प्रश्‍न
मांडवी का मन
और
मीरा का नर्तन.
माधवी का मोल
गांधारी कर कौल
और
उर्मिला का अनबोल
जिनके लिए सवाल है
उन सबके लिए
औरत एक  सवाल है

आदिम इच्छाओं के तल
कुचलते आए हैं जो सपनों को
वे ही कि‍या करते है
सवाल
औरत को लेकर
वे ही दिया करते हैं
जवाब
अपने चेहरे बदलकर.

सिर्फ इन चेहरों से
पर्दा उठने तक
सिर्फ इन चेहरों के
गूंगा होने तक
सिर्फ इन चेहरों के
गुमनां बनने तक
औरत एक सवाल है

(कवि‍ता संग्रह ‘वह लड़की जो मोटरसाइकिल चलाती है’ से साभार)

मेरा जैसा मैं : गौरव सक्सेना

वैसे तो दुनि‍या का हर बच्चा बहुत खास है, लेकि‍न जि‍न बच्चों के  साथ मैं काम करता हूं, शायद वे इन सबमें भी सबसे कोमल-नि‍र्दोष-प्यारे हैं। हां, वि‍शेष अध्यापक होना सचमुच बहुत वि‍शेष है, कम से कम मेरे लि‍ए तो। ये बच्चे जि‍नके पास सीमि‍त शब्द हैं, कि‍तना कुछ बोलते हैं, जब वे मुस्कराते हैं, अचानक गले लग जाते हैं, रो देते हैं या जी खोल के हंसते हैं।

स्वलीनता (ऑटिज्म)  से ग्रसि‍त बच्चे ज्‍यादातर अपने परि‍वेश से सचेत संबंध स्‍थापि‍त नहीं कर पाते। अपनी बनाई दुनि‍या में वे जीते हैं और उस दुनि‍या में होने वाली गति‍वि‍धि‍यों में यदि‍ बदलाव हो या उनके क्रम को बदला जाए तो यह उनके लि‍ए एक भयावह समस्‍या हो जाती है।

मैं एक बात स्‍पष्‍ट कर दूं कि‍ स्‍वलीनता का संबंध बच्‍चे की बौद्धि‍क शक्‍ति‍ के साथ या उसके रचनात्‍मक कौशल से नहीं होता। ये बच्‍चे बडे़ ही हुनरमंद गायक, चि‍त्रकार, खि‍लाड़ी हो सकते है, यदि‍ इनकी संभावनाओं को सही तरह से आंका जाए।

बच्‍चों का व्‍यवहार कई अर्थों में अन्‍य बच्‍चों से अलग होता है। सबसे पहली समस्‍या होती है संवाद की- सब कुछ महसूस करने के बाद भी बच्‍चे खुद को ठीक से प्रस्‍तुत नहीं कर पाते। जो चीजें इनको अलग बनाती हैं वे हैं, समाज के नि‍यमों, परम्‍पराओं, संबंधों की जानकारी ने होना। इसके चलते कई बार ऐसा व्‍यवहार देखने को भी मि‍लता है, जो सामाजि‍क रूप से स्‍वीकार्य नहीं।

इन तमाम सारी सीमाओं के बावजूद ये बच्‍चे अपरि‍मि‍त कौशल के धनी होते हैं। आवश्‍यक नहीं है कि‍ प्रत्‍येक कौशल में ये अपनी उम्र के बच्‍चों जैसा प्रदर्शन करें, लेकि‍न जि‍स कौशल में रुझान होगा शायद उसमें बेहतर कोई दूसरा नहीं कर सकता।

जो एक बड़ी समस्‍या जिसका सामना ये बच्‍चे करते हैं, वह है- हमारे अंदर धैर्य और जानकारी का अभाव। यदि‍ बच्‍चों की आवश्‍यकताओं और वि‍शेषताओं को समझ, उसके आसपास की चीजों को परि‍वर्तित कर दि‍या जाए, तो ये बच्‍चे समाज के लि‍ए उतने की उपयोगी होंगे, जि‍तने अन्‍य बच्‍चे। इन बच्‍चों पर मैंने एक कवि‍ता लि‍खी है, जो आपके साथ साझा कर रहा हूं–

plane-by-amin-naqvi

जैसा मैंने देखा तुमको कभी कभी
कुछ उल्झा-सुलझा
कभी कभी कुछ कहते सुनते
कभी कभी चुप रहते सहते
कभी कभी कुछ सपने बुनते

जैसा मैंने देखा तुमको
कभी कभी पानी सा बहते
कभी कभी कुछ जड़ भी होते
कभी कभी मुस्काते हँसते
कभी कभी दुनिया से डरते
जैसा मैंने देखा तुमको
कभी कभी तुम कह न पाये
कभी कभी तुम सुन न पाये
कभी कभी क्या, ज़्यादातर ही
हम सब धीरज धर न पाये

कभी कभी तुम खुद बोले हो
कभी कभी ख़ामोशी बोली

जैसा मैंने तुमको देखा
कभी कभी रिश्ते जीते हो
कभी कभी खुद में जीते हो
कभी कभी जो आ जाती है
चेहरे पर मुस्कान तुम्हारे
कभी कभी जब बाँहों में भर
दिल आंखें सब भर देते हो

जैसा मैंने तुमको देखा

कभी कभी तुम काग़ज़ के कुछ

पंख लगा के उड़ जाते हो

कभी कभी तुम रंग सा घुल कर

सबके मन में बस जाते हो
कभी कभी जब दिल की बातें
टुकड़ों टुकड़ों बतलाते हो
कभी कभी तुम मीठी सरगम बनकर
उर में छिप जाते हो
जैसा मैंने तुमको देखा

संजीव ठाकुर की बाल कवि‍ताएं

sanjeev-thakur

संजीव ठाकुर

ताल

पंखा चलता हन-हन–हन
हवा निकलती सन-सन–सन।

टिक-टिक–टिक–टिक चले घड़ी
ठक-ठक–ठक–ठक करे छड़ी।

बूंदें गिरतीं टिप–टिप–टिप
आँधी आती हिप–हिप –हिप।

फू–फू–फू फुफकारे नाग
धू–धू–धू जल जाए आग।

कोयल बोले कुहू-कुहू
पपीहा बोले पिऊ-पिऊ।

धिनक-धिनक–धिन बाजे ताल
लहर–लहर लहराए बाल ।san

मुश्किल हो गई

पापा जी की टांग टूट गई
अब तो भाई मुश्किल हो गई!
कौन मुझे नहलाएगा ?
विद्यालय पहुंचाएगा ?
सुबह की सैर कराएगा ?
रातों को टहलाएगा ?
चिप्स –कुरकुरे लाएगा ?
कोल्ड –ड्रिंक पिलवाएगा ?
आइसक्रीम खिलाएगा ?
मार्केट ले जाएगा ?

सुबू ने खाई ढेर पकौड़ी

सुबू ने खाई ढेर पकौड़ी
एक छीन ली पापा से
एक झटक ली मामा से
मम्मी ने अपने हिस्से की
दे दी उसको एक पकौड़ी !

फिर आई उसकी थाली
जिसमें थी दस–बीस पकौड़ी
प्याज और आलू वाली
उसने न दी एक किसी को
खुद ही खा ली बीस पकौड़ी !

कौआ काका

कौआ काका क्या कहते हो
आएँगी मेरी नानी ?
सोच मिठाई की बातें
मुँह में भर आया पानी ।

न जाने क्या–क्या लेकर
आएँगी मेरी नानी
मैं तो तुमको एक न दूँगा
मुझे नहीं बनना दानी !

लेकिन काले कौए काका
अगर नहीं आईं नानी
कौन मुझे दिलवाएगा
प्यारी सी गुड़िया रानी

इस जाड़े को …

इस जाड़े को दूर भगाओ
सूरज भैया जल्दी आओ !

जाड़े में देखो तो कोयल
भूल गई गाना
चिड़ियों के बच्चों ने मुँह में
न डाला दाना !सूरज भैया आओ
थोड़ी गर्मी ले आओ
और हमारे साथ बैठकर
पिज्जा–बर्गर खाओ !साथ रहोगे तो जाड़े की
दाल रहेगी कच्ची
दादी का तो हाल बुरा है
हो जाएगी अच्छी !

गर्मी आ जाए तो चाहे
आसमान में जाना
जाड़े के मौसम में लेकिन
वापस आ जाना

अनुप्रिया की बाल कवि‍ताएं

anupriya-picबचपन

बचपन कच्ची पगडण्डी
मानो उड़ती धूल
घने अँधेरे जंगल में
ये उजास के फूल

बादल काला दौड़  लगाये
आसमान के पार
ताक -झाँक के  देख रहा है
धरती  का संसार

नए परिंदे ढूँढ़ रहे  हैं
असमानी वो रंग
छोड़ कहाँ  आये वो सपने
जाने किसके संग

नन्हे-मुन्ने बना रहे हैं
एक नयी पहचान
फ़ैल रही है हर  होठों पर
मीठी सी  मुस्कान।

एक कहानी प्यारी

सोच रहा हूँ लिख ही  डालूं
एक कहानी प्यारी
होंगे  उसमे भालू ,बन्दर
और गोरैया न्यारी

एक छोटा बागीचा होगा
होंगे उसमें फूल
मीठे फल और सुन्दर तितली
अरे! गया मैं भूल

एक नदी बहती होगी
और होगा उसमें  पानी
नन्हें बन्दर करते होंगे
फिर कोई शैतानी

भालू और गोरैया की
होगी पक्की यारी
भेदभाव ये नहीं जानते
ना ही दुनियादारी

गर्मी के दिन

ऊँघ रहा है सूरज ओढ़े
नीला आसमान
तितली के होठों पर आयी
मीठी सी मुस्कान

करे  ठिठोली  बादल प्यारा
हवा झूमकर गाए
कानाफूसी करे परिन्दे
गर्मी के दिन आये

घर की हर मुंडेर पर
लगी धूप सुस्ताने
धमाचौकड़ी करने बच्चे
ढूँढे़ नए ठिकाने

अरे  गिलहरी भागी देखो
कौवे करते शोर
जाग गए हैं सपने सारे
गर्मी की एक भोर।

हो गयी अब तो भोर

ब से बन्दर चढ़ा डाल पर
क से कोयल गाए
भ से भालू रहा देखता
म से मछली खाए

च से चमचा लेकर भागी
ग से गुड़िया रानी
घ से घोड़ा रहा हाँफता
दे दो  प से पानी

फ से सुन्दर फूल खिले
त से तितली मुस्काये
छ से छतरी पीली लेकर
ल से लड़की जाए

ख से खरहा झट से दौड़ा
ज से जंगल की ओर
न से नींद से जागो तुम सब
हो गयी अब तो भोर।

बरखा रानी

बरखा रानी अब तो आओ
गर्मी बहुत सताए
सबका अब है हाल बुरा
ये पल -पल बढती जाए

आकर अपनी रिमझिम बूंदें
हम पर तुम बरसाओ
काले बादल के कंधे पर
चढ़कर बस आ जाओ

झुलस रहे हैं पंछी ,पेड़
है उदास जग सारा
अपने हाथों से इनमे
भर दो जीवन दोबारा …..

बचपन

ढूँढा बहुत सलोना बचपन
लगता खेल खिलौना बचपन
सख्त हुई इस दुनिया में है
नरम -नरम बिछौना बचपन
उम्मीदों की पगडंडी पर
पीछे -पीछे छौना बचपन
घर की दीवारों के भीतर
प्यारा सा हर कोना  बचपन
मेरे -तेरे सबके भीतर
थोड़ा सा तो हो ना बन
कंप्यूटर की इस नगरी में
है पत्ते का  दोना  बचपन

बादल प्यारे

बादल प्यारे आसमान के
क्या तुम भी सुस्ताते हो
पंख नहीं है लेकिन फिर भी
कैसे तुम उड़ जाते हो

कोई परिंदा आकर तुमसे
करता भी है बात
या फिर यूँ ही अकेले ही
कट जाती है रात

काले बादल कहो जरा
है भीतर कितना पानी
तुम भी नटखट मेरे जैसे
करते हो शैतानी

डाँट  तुम्हें भी पड़ती क्या
अपनी अम्मा से बोलो
हम तो हैं अब दोस्त बने
मुझसे तो राज ये खोलो

सच कहता हूँ अम्मा

जब भी देखूं मुझको यह

संसार नया लगता है
सच कहता हूँ अम्मा ये
हर बार नया लगता है

रोज नया लगता है सूरज
और रात भी नयी-नयी
रोज चमकते तारों का
अंबार नया लगता है
सच कहता हूँ अम्मा ये
संसार नया लगता है

लगती नयी किताबें अपनी
जूते  और जुराबें अपनी
लगता है स्कूल नया
हर यार नया लगता है
सच कहता हूँ अम्मा ये
संसार नया लगता है

पापा की मुस्कान नयी
और दीदी का झुंझलाना
दादा -दादी का मीठा
दुलार नया लगता है
सच कहता हूँ अम्मा ये
संसार नया लगता है

कक्षा पहली के बच्चे : भास्कर चौधुरी

भास्कर चौधुरी

भास्कर चौधुरी

एक

आपने सुना कभी
किसी हिटलर को कहते
सुंदर है यह धरती
आओ इसे और सुंदर बनाएँ

कक्षा पहली के बच्चे
ऐसा हर रोज़ कहते हैं-
सुंदर है यह धरती
आओ इसे और सुंदर बनाएँ।

दो

कक्षा पहली के बच्चे ने
थाम रखा है सर
हथेलियों के बीच
बच्चे के गाल
महसूस कर रहे हैं
उंगलियों का दबाव
और ठोढ़ी टिकी हुई है
हथेलियों की जड़ों पर
कक्षा पहली के बच्चे ने
थाम रखा है सर
जैसे थामा हो पृथ्वी
हथेलियों के बीच !

तीन

कक्षा पहली के बच्चे
नहीं जानते सौदा
किस चिड़िया का नाम होता है
वे नहीं समझते गिव एंड टेक का अर्थ
कक्षा पहली के बच्चे
हमारे थोड़े से समय के बदले
ढेर सारा प्यार दे देते हैं।

चार

कक्षा पहली के बच्चे
कहीं भी कभी भी
गाने लगते हैं जन गण मन…
जब चाहे
उनका मनकक्षा पहली के बच्चे
सुबह की प्रार्थना सभा में
पैर के अंगूठे से
धरती पर आड़ी-तिरछी लकीरें खींचते हैं
जब और लोग गाते हैं जन गण मन…

पाँच

बहुत दिनों के बाद
अपनी कक्षा से बाहर आए हैं
कक्षा पहली के बच्चे
जैसे अपने नीड़ों से निकलकर मेमनें
चल पड़ते हैं भेड़ों के साथ
उनसे सटकर
कक्षा पहली के बच्चे
अपनी टीचर जी के साथ
तितलियाँ पकड़ने का खेल खेल रहे हैं
बहुत दिनों के बाद
खिली है धूप
तो जैसे शामिल हो गई हो
चुपके से बच्चों की दूधिया खुशी में…
पहली कक्षा के बच्चे जैसे
बादलों के पीछे से
सूरज की तरह निकले
और छा गए
धूप की तरह पूरे मैदान में..

छः

कक्षा पहली के बच्चे
मायूस दिखते हैं जब
टॉयलेट के सामने
निकर आधी ऊपर चढ़ाए
बटन या हूक लगाने का
सफल-असफल प्रयास करते हैं
वे नहीं चाहते
कोई उन्हें देख ले नंगा
पहली कक्षा के बच्चे
अपनी टीचरजी से सटकर खड़े होते हैं
वे टीचरजी के होंठों को देखकर
और छूकर सीखते हैं-
‘आ’ आम का, ‘ए’ से एप्पल
‘औ’ से औरतकक्षा पहली के बच्चे
उनकी टीचरजी के ज़रा देर करते ही
खुद बन जाते हैं टीचर
चॉक पकड़कर श्यामपट पर
बनाते आदमी मकान चिड़िया तितली
छड़ी पकड़कर नन्हें हाथों में
खेलने लगते मैडम-मैडम
कक्षा पहली में
कम अज कम पाँच बच्चे होते
कक्षा के मॉनीटर….कक्षा पहली के बच्चे
केवल अपने टीचर को पहचानते हैं
वे उन्हें ‘टीचरजी’ कहकर पुकारते हैं
टीचरजी के मुंह पर उंगली रखते ही
अपने मुंह पर उंगलियाँ रख लेते हैं
और इशारा होते ही उनका
नाचने लग जाते हैंकक्षा पहली के बच्चे
समझते हैं प्यार की भाषा !!

सात

मेरे सपनों में आते हैं
कक्षा पहली के बच्चे
आते हैं और गुदगुदाने लगते है
पत्नी कहती है
हँसता हूँ मैं नींद में…।

आठ

दौड़ता रहता हूँ मैं
बड़ी कक्षाओं के बच्चों के बीच
कि जैसे एक डर सा लगने लगा है
इन दिनों बड़ी कक्षाओं के बच्चों से
ज़रा सी देर हुई नहीं कि
घटी कोई दुर्घटना
कि जैसे बच्चे बच्चे नहीं रहे
बड़ी कक्षाओं के…

कि जैसे-
बड़ी कक्षाओं के बीच
झूलता रहता हूँ
दोनों हाथों के बल
हवा में लटके होते हैं
दोनों पैर…
कि जैसे-
फुरसत ही नहीं
सांस लेने की भी …

पर मिलते ही
पहली कक्षा के बच्चों को
सांसों को इत्मिनान आ जाता है।

नौ

कक्षा पहली के बच्चे
दौड़ रहे हैं/कूद रहे हैं
मचल रहे हैं
गिर रहे हैं/उठ रहे हैं
उड़ रहे हैं
कक्षा पहली के बच्चे
गा रहे हैं कोई गीत
समूह में नाच रहे हैं
खेल रहे हैं कित-कित
लूट रहे हैं मज़ा
हल्की-हल्की बारिश में भीगने का

कक्षा पहली के बच्चे को भूख लगी है
वे मिड डे मील खा रहे हैं…

कक्षा पहली के बच्चे
तड़प रहे हैं
पेट पकड़-पकड़ कर
उल्टियाँ कर रहे हैं
पास पड़ी हुई
खुली हुई किताबे है
हवा में पन्ने फड़फड़ा रहे हैं…

दस

कक्षा पहली का बच्चा
चलता है सड़क पर ज
सड़क पर नहीं होती उसकी आँखें
वह देखता है
फूल पत्ती तितली आसमान
बादल बिजली बरसात गाय और गोबर
चीटियाँ पिल्ले और कुत्ते और कौवें धूल धुआ
तेज रफ्तार गाड़ियाँ
बाइकों का शोर और
रिक्‍शे की पों पों
भले लगते हैं
कक्षा पहली के बच्चे को
पहली कक्षा का बच्चा
छूता है जब कागज़ की नाव
उंगलियों के पोरों से
तो वह चलने लगती है बेपाँव
पाँव की ठोकर लगते ही
छोटा गोलाकार पत्थर
फुटबाल बन जाता है
क्क्षा पहली का बच्चा नहीं होता

सड़क पर कभी अकेला-उदास!!

ग्यारह

वह बच्चा
कक्षा पहली का
पहुँच नहीं पाया
अपनी कक्षा में
अब तक
दरअसल
खोज रही है
उसकी आँखें
धरती पर कोई नई चीज़
जो काम की हो उसके
मसलन
चकमक पत्थर
लकड़ी का एक
अदद टुकड़ा-
चिकना और बेलनाकार
सुनहली मक पत्ती !!

बच्चों के लिए कविताएँ : संज्ञा उपाध्याय

संज्ञा उपाध्याय

संज्ञा उपाध्याय

उफ़ कबूतर! ये कबूतर !

उफ़ कबूतर! ये कबूतर!
गूँ गूँ गूँ गूँ गुटर गुटर कर
कितना शोर मचाते हैं!

सुबह-सुबह मेरी खिड़की पर
फड़ फड़ फड़ फड़ पंख फटककर
जबरन मुझे जगाते हैं!

बिना इजाज़त घर में घुसकर
शान से हर कमरे में फिरकर
हम पर रौब जमाते हैं!

आँख सदा रखते झाड़ू पर
चाहे कितनी रखो छिपाकर
सींकें ले उड़ जाते हैं!

फेंको तिनके झाड़-बुहारकर
पर जो भायी, उसी जगह पर
फिर-फिर उन्हें सजाते हैं!

डांटूं जब मैं हाथ झटककर
डरने का थोड़ा नाटक कर
गोल आँख मटकाते हैं!

आसमान में चक्कर भरकर
उड़े जहाँ से, वहीं बैठकर
गर्दन ख़ूब फुलाते हैं!

मकड़ी जाला बुनती है

मकड़ी जाला बुनती है
नहीं किसी की सुनती है
पूरे घर को देखभाल कर
कोने-अँतरे चुनती है
दम साधे जाले में बैठी
गुर शिकार के गुनती है
जाले पर झाड़ू फिरने पर
रोती है सिर धुनती है
किसे सुनाये दुखड़ा जाकर
दुनिया ऊँचा सुनती है.

बादल का वह नटखट बच्चा

बादल का वह नटखट बच्चा
हाथ छुड़ाकर अपनी माँ से
आगे-आगे दौड़ गया है
बादल का वह नटखट बच्चा!
घूम रहा है जाने कब से
तरह-तरह के रूप बदलके
भालू, हाथी, कछुआ बनके
मेरी खिड़की तक आया तो
मछली बनकर तैर गया है
बादल का वह नटखट बच्चा!

कैसे बतलाऊँ…

अक्सर पूछा करते हैं सब
चलते में इस तरह अचानक
यूँ तुम ठिठक क्यूँ रह जाती हो
खड़ी हुई तो खड़ी रह गई
कभी देखती कहीं एकटक रह जाती हो
कैसे यह समझाऊँ सबको
रस्ते में जब पेड़ कोई
या कोई बादल, कोई कौवा
बतियाने लगता है मुझसे
ठिठकी हुई नहीं होती हूँ, बह जाती हूँ…

सूरज का माथा गरमाया

सूरज का माथा गरमाया
चढ़ा है उसका पारा
होकर आगबबूला उसने
सब पर ताप उतारा
आसमान कोरे कागज़-सा
बिन पंछी बिन बदरा
पड़ा तार पर सूख रहा ज्यों
साफ़ धुला इक चदरा
हवा दुबक के जा बैठी है
छाया में कहीं छुपकर
कहीं बुखार ना हो जाये
इस तेज़ घाम में तपकर
पंछी मुँह लटकाये बैठे
कहाँ से पायें पानी
बच्चे उनके दाना माँगें
सुनते नहीं कहानी
तब धरती इक बड़े ताल में
पानी लायी भरकर
नंगे पाँव धूप में जल गये
भागी घर के अंदर
खिड़की से झाँका जो आयी
छप छप की आवाज़
ताल में सूरज नहा रहा था
छोड़ के सारे काज!

माँ : हरि‍श्चंद पाण्डे

चर्चित कवि‍ हरि‍श्चंद्र पाण्डे की कवि‍ता ‘माँ’ पर कवि‍ता पोस्टर। इसकी परि‍कल्पना और संरचना आशुतोष उपाध्यायजी ने की है-

mother.माँ

संजीव ठाकुर  की बाल कवि‍ताएं

रोते रहते

रोंदूमल जी रोंदूमल
रोते रहते रोंदूमल
बात कोई हो या न हो
बस रोएँगे रोंदूमल !

मम्मी ने कॉफी न दी
पापा ने टॉफी न दी
फिर तो बात बतंगड़ कर
रोएँगे ही रोंदूमल !

किसी से मुँह की खाएँगे
चाहे खुद धकियाएंगे
अपने मन की न कर पाए
तो रोएँगे रोंदूमल !

जा छुपते

चोर एक न उनसे भागे
भौंक –भौंक कर कुत्ते हारे
बच्चों को तो खूब डरा दें
क्योंकि वे होते बेचारे !

गली–मुहल्ले के कुत्ते
होते हैं बीमार
सड़ी-गली चीजें ही हरदम
वो खाते हैं यार !

घर में पलने वाले कुत्ते
ऐयाशी करते
ए सी में सोते हैं
नाज़ों –नखरों में पलते !

चोर देखकर उनकी भी
सिट्टी होती गुम
जा छुपते मालिक के पीछे
नीचे करके दुम !

बहुत मजा आता है

जाड़े की गुनगुनी धूप में
पैर पसारे लेटे
या फिर खाते मूँगफली के
दाने बैठे–बैठे
बहुत मजा आता है भाई 
बहुत मजा आता है !

मक्के की रोटी पर थोड़ा
साग सरसों का लेकर
या फिर गज़क करारे वाले
थोड़ा–थोड़ा खाकर
बहुत मजा आता है भाई
बहुत मजा आता है !

औ अलाव के चारों ओर
बैठे गप–शप करते
बुद्धन काका के किस्से
लंबे–लंबे सुनते
बहुत मजा आता है भाई
बहुत मजा आता है !

गधे का गाना

गधे ने गाया गाना
उल्लू ने पहचाना
बंदर ने उसे माना
मेंढक हुआ दीवाना ।

कोयल ने मारा ताना–
‘तुझे न म्यूजिक आना ‘
गधे को फर्क पड़ा न
गाता रह गया गाना !

चलो चलें हम मॉल

हम जाएंगे शिप्रा मॉल
कोकू ! रख दो अपनी बॉल

रिक्शे से हम जाएंगे
मैक्डोनल्ड में खाएंगेचलने वाली सीढ़ी पर
हम तुम चढ़ते जाएंगे
अंदर मिलती आइसक्रीम
दोनों जमकर खाएंगे ।चम-चम करती दुकानों से
मैं ले लूँगी सुंदर ड्रेस
ले लेना तुम दो–एक गाड़ी
खूब लगाना फिर तुम रेस ।कोकू ! जल्द सँवारो बाल
हम चल रहे शिप्रा मॉल !

मम्मी ! पानी नहीं आ रहा

मम्मी ! पानी नहीं आ रहा
अब कैसे नहलाओगी ?
क्या चावल धो पाओगी ?
दाल कहाँ से लाओगी ?
झाड़ू–पोंछा, बर्तन कपड़े
तुम कैसे कर पाओगी ?
सूख रहे जो पौधे बाहर
उनका क्या कर पाओगी ?
कहीं आ गया कोई घर पर
उनको क्या दे पाओगी ?
कितनी बार कहा पापा ने
बात कभी न मानोगी
हो जाएगी खाली टंकी
तब जाकर पछताओगी !

बाहर जाकर खेलो

खेल रहा है बाहर पिंटू
तुम भी घर से निकलो चिंटू !बाहर जाओ, दौड़ो, कूदो
क्या टी॰ वी से चिपके हो ?
कंप्यूटर से खेल रहे तुम
पके आम से पिचके हो !
बाहर खेल रहे हैं बच्चे
तुम उन सबसे छिपके हो ?बाहर जाकर खेलो चिंटू
बाहर खेल रहा है पिंटू !

मुझे सुहाता

मुझे सुहाता मेरी अम्मा
दीपों का त्योहार
अंधकार का दुश्मन होता
दीपों का त्योहार ।

लोग जलाते हैं दीये
घर में और गली में
तरह–तरह बल्ब लगते
घर में और गली में

‘दीपावली मुबारक हो ‘
सब कहते हैं सबको
‘आओ एक मिठाई खा लो ‘
सब कहते हैं सबको !

बस फट–फट आवाज़ पटाखों की
न सुहाती मुझको
बारूद की दुर्गंध ज़रा भी
नहीं सुहाती मुझको !

बच्चों का एक प्रेरणादाई गीत

बच्चों का एक प्रेरणादाई गीत आप सब के लिए (अटैचमेंट खोलें). बच्चों के साथ काम करने वाले सभी साथियों से आग्रह है कि समय निकालकर कभी इस गीत को बच्चों के साथ गा सकते हैं. आपकी सुविधा के लिए गीत के बोल नीचे दिए गए हैं. गीत और संगीत जाने-माने शिक्षाविद श्री आनंद द्विवेदी का है और इसे उनके निर्देशन में चलने वाले स्कूल- आश्रम पर्यावरण विद्यालय, अंजनीसैण (उत्तराखंड) के बच्चों और शिक्षकों ने गाया है.
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चलो मिटाएं नफरत इस संसार से
मिलजुल कर हम रहना सीखें प्यार से
धरती दबी हुई जुल्मों के भार से
सहमी है इन्सानी अत्याचार से
चलो मिटाएं……
मिलजुल कर….
सदियां बीतीं लड़ना हम छोड़ न पाए
नफरत की मजबूत बेडि़यां तोड़ न पाए
कभी धर्म के, भाषा के, रंग-जाति के
कभी देश के नाम पे खून बहाते आए
सीमाएं हैं धधक रही अहंकार से
टूट रहे हम अपने ही परिवार से
चलो मिटाएं……
मिलजुल कर….
यारो बहुत हो गया नफरत का रस्ता छोड़ें
आओ फिर से घरती के टुकड़ों को जोड़ें
सीमाएं हों प्रेम के पावन संगम
आओ मिलकर आज वक्त की धारा मोड़ें
हम न गुलामी झेलेंगे लाचार से
चलों संवारें धरती मां को प्यार से
चलो मिटाएं……
मिलजुल कर….
(आशुतोष उपाध्‍याय जी के सौजन्‍य से)