Category: पुस्तक संसार

आदर्शवाद का ओवरडोज : संजीव ठाकुर

साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित परशुराम शुक्ल की यह किताब एक शिक्षक दीनदयाल के आदर्श जीवन और उसके कर्म को दिखलाने का काम करती है। अपनी मेहनत और लगन से आई.ए.एस. बनने वाले दीनदयाल अपने सहयोगियों, अधिकारियों और नेताओें के भ्रष्टाचार से तंग आकर नौकरी छोड़ देते हैं और गाँव में जाकर मास्टरी करने लगते हैं। मास्टरी करते हुए ही वह जाति-पाति के खिलाफ काम करते हैं, गाँव को नशा-मुक्त करवाते हैं, बिगड़े हुए बच्चों को सुधारते है, किसी साहूकार को ईमानदार बनाते है, प्रौढ़-शिक्षा कार्यक्रम चलाते है। आगे चलकर वह आदिवासियों के बीच काम करते हैं और उनकी संगीत-मंडली को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाते हैं। अपने कामों के कारण वह राष्ट्रपति से सम्मान पाते हैं तो आदिवासियों की संस्कृति पर किताब लिखकर ‘बुकर पुरस्कार’ पाते हैं यानी हर तरह की सफलता वह पाते हैं। सवाल उठता है कि एक साथ इतने-इतने काम करने वाले मास्टर दीनदयाल क्या असली पात्र हो सकते हैं? बच्चों को पाठ पढ़ाने के उद्देश्य से लिखी गई इस किताब को नकलीपन बच्चों से भले ही छुपा रह जाए, लेकिन क्या वे इससे जुड़ाव महसूस कर पाएँगे? इससे प्रेरणा ग्रहण कर पाएँगे? क्या आदर्शवाद के इस ओवरडोज को वे पचा पाएँगे? सच्चाई तो यह है कि बच्चे वैसे ही पात्रों से तादात्म्य स्थापित कर पाते हैं, जो उनके आस-पास के हों? उनके जैसे हों!

इस किताब के जरिए परशुराम शुक्ल ने ‘बाल धारावाहिक’नाम की एक ‘नई’ विधा को स्थापित करने का प्रयास किया है, लेकिन दुर्भाग्यवश ऐसा हो नहीं पाया है। ‘बाल धारावाहिक’ को परिभाषित करते हुए भूमिका में उन्होंने लिखा है- ‘बाल धारावाहिक को एक विशिष्ट संरचना वाली ऐसी कहानी शृंखला के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जिसकी प्रत्येक कहानी अपने पीछे की कहानियों और आगे की कहानियों से स्वतंत्र होती है और संबद्ध भी!’ उनकी इसी परिभाषा के आधार पर इस किताब की परीक्षा करें तो हम पाएँगे कि इस ‘धारावाहिक’के कुछ अध्याय अन्य अध्यायों से सर्वथा स्वतंत्र हो गए हैं। ‘झूठे का बोलबाला’ और ‘पश्चाताप के आँसू’ ऐसे ही दो अध्याय हैं। ‘झूठे का बोलबाला’ तो एक लोककथा को परिवर्तित कर इस धारावाहिक में घुसा दिया गया है। इसको पढ़कर पाठक अचरज में पड़ सकते है कि किसी ठाकुर के सेवकों के द्वारा धकेलकर बाहर कर दिए गए दीनदयाल क्या वही दीनदयाल हैं, जो इतने बड़े-बड़े काम करते हैं? इसी तरह ‘पश्चाताप के आँसू’में बेचारे मास्टर दीनदयाल को जिस तरह आध्यात्मिक विषयों का प्रवचनकर्ता बना दिया गया है और किसी दूसरे कथावाचक की दुष्टता का शिकार दिखा दिया गया है, वह हास्यास्पद ही नहीं अनर्गल भी लगता है। और कोई गलत नहीं कि ऐसी अनर्गल बातें इस किताब में एक नहीं अनेक हैं।

इस किताब को पढ़कर जो सवाल सबसे अधिक मुखरता से सिर उठाता है वह यह कि क्या साहित्य अकादेमी जैसी संस्था के पास अच्छी और बुरी चीज को परखने को कोई पैमाना नहीं है? इस स्तरहीन किताब को छपवाकर साहित्य अकादेमी हिन्दी के व्यापक पाठक-वर्ग को आखिर क्या संदेश देना चाहती है?

पुस्तक: मास्टर दीनदयाल, परशुराम शुक्ल

प्रकाशक : साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, 60  रुपये

गागर में सागर : स्मिता

vigyan aur hum

विज्ञान को अगर रोचक तरीके से लिखा जाए, तो किशोर छात्रों के लिए यह विषय जानकारीपरक होने के साथ-साथ मजेदार भी हो सकता है। विज्ञान को कुछ ऐसा ही बनाने का प्रयास किया है वरिष्ठ विज्ञान लेखक देवेन्द्र मेवाड़ी ने। देवेन्द्र लगभग 25 पुस्तकें लिख चुके हैं, जिनमें से ज्‍यादातर विज्ञान पर आधारित हैं। ‘विज्ञाननामा’, ‘सूरज के आंगन में’, ‘विज्ञान बारहमासा’, ‘सौरमंडल की सैर’ आदि प्रमुख किताबें हैं, जो किशोरों के बीच बेहद लोकप्रिय हैं। विज्ञान को सरल और रोचक अंदाज में लिखने के लिए उन्हें कई राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित भी किया जा चुका है। लेखक उत्तराखंड के नैनीताल जिले से हैं। जो व्यक्ति प्रकृति के बीच ही पला-बढ़ा है, उससे बेहतर प्रकृति को और कौन समझ सकता है?

देवेन्द्र ने ‘वि‍ज्ञान और हम’ में कम शब्दों में विज्ञान के कई पहलुओं को खेल-खेल में बताया है। ‘सुनो मेरी बात’ अध्याय में लेखक ने अपने स्कूल और कॉलेज के दिनों को याद करते हुए विज्ञान के प्रति अपनी रुचि के पनपने की बात बताई है। आसमान में चमकते सूरज, चांदनी बिखेरते चांद, आकाश में अनगिनत तारों, पहाड़, घाटियों, मैदानों, नदियों, पेड़-पौधों के बारे में भी ढेरों सवाल रहते हैं। अमीर खुसरो की एक पहेली ‘एक थाल मोती भरा..’ की मदद से लेखक ने सौरमंडल के बारे में बड़े ही रोचक अंदाज में बताया है। उन्होंने एक पत्र के माध्यम से पृथ्वी के बारे में कुछ खास जानकारियां दी हैं, जिससे जटिल टॉपिक भी पठनीय बन जाता है। आगे एलियन के माध्यम से पृथ्वी, उसकी गोलाई, लंबाई, भार, केंद्र के तापमान आदि के बारे में बिल्कुल अलग तरीके से पेश किया है। इसके अलावा, समुद्र की अनोखी दुनिया, धरती के तपने और पर्यावरण और पर्यावरण संरक्षण के उपायों के बारे में बड़े ही आकर्षक ढंग से बताया है।

‘ताबीज’ नाटक के माध्यम से उन्होंने अंधविश्वासों के पीछे के सत्य को उजागर करने की कोशिश की है। इस किताब की जान है महान गणितज्ञ आर्यभट्ट, वैज्ञानिक मेघनाद साहा और माइकेल फैराडे के जीवन की झलकियों की दिलचस्प अंदाज में प्रस्तुति। यदि कहानी के फॉर्मेट और सरल भाषा में बात कही जाए, तो कठिन विषय भी आसानी से समझा जा सकता है। माता-पिता अपने बच्‍चों के लिए यह किताब खरीद कर उनका ज्ञानवर्धन कर सकते हैं।

(दैनि‍क जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण्‍, 08 मई 2016 से साभार)

पुस्‍तक- वि‍ज्ञान और हम
लेखक- देवेन्‍द्र मेवाड़ी
मूल्य – अजि‍ल्‍द-140 रुपये, सजि‍ल्‍द – 260 रुपये
प्रकाशक – लेखक मंच प्रकाशन
433, नीति‍खंड-3, इंदि‍रापुरम
गाजि‍याबाद-201014
ईमेल-anuraglekhak@gmail.com

बच्‍चों का विज्ञान-बोध : विवेक भटनागर

apne bachche ko den vigyan drishti

आमतौर पर विज्ञान के बारे में धारणा है कि यह बड़ा ही कठिन विषय होता है। यह सिर्फ एक भ्रामक धारणा है। जो ज्ञान हमारी जिंदगी से जुड़ा हो, वह कठिन कैसे हो सकता है? उठते-बैठते, खाते-पीते, सोते-जागते यानी हर वक्‍त, हर गतिविधि में हम विज्ञान को ही जीते हैं। विज्ञान के कठिन होने की धारणा बनने के पीछे हमारी शिक्षा पद्धति की भूमिका हो सकती है, जो बच्चों का मनोविज्ञान समझे बिना उसे विज्ञान पढ़ाने की कोशिश करती है। बच्चा शुरू से ही कुछ-न-कुछ सीखना शुरू कर देता है। वह जो कुछ भी देखता है, उसे जानने की कोशिश करता है। उसकी उत्सुकता ही उसका वह ज्ञान-बोध है, जो उसमें प्राकृतिक रूप से मौजूद होता है। बच्चा जैसे-जैसे बढ़ता जाता है, उसके सवाल भी बढ़ते जाते हैं। कुछ का मतलब वह स्वयं समझता है, लेकिन कुछ बातों में जब उसे संशय होता है, तो वह सवाल करता है। इसी में उसके विज्ञान को समझने की दृष्टि छिपी होती है। ऐसे में बच्चे को, उसके सवालों को सुलझाने में अभिभावकों को बड़ी समझदारी से काम लेना होगा, तभी बच्चे की विज्ञान-दृष्टि बन पाएगी। हाल ही में नैन्सी पाउलू और मोर्गेरी मार्टिन की पुस्तक हिंदी में अनूदित होकर आई है- अपने बच्चे को दें विज्ञान दृष्टि। आशुतोष उपाध्याय ने इस पुस्तक का बड़ा ही सरल और सुबोध अनुवाद किया है।

आज के बच्चे अलग हैं। हम कह सकते हैं कि उनमें विज्ञान एवं तकनीक का सहज-ज्ञान इन्बिल्ट होता है। लेकिन हम गलती यह करते हैं कि उन्हें अपने बचपन की तरह ट्रीट करते हैं। पुस्तक में लिखा है- ‘माता-पिता के रूप में हमें अपने बच्चों को एक ऐसी दुनिया के लिए तैयार करना है, जो हमारे अपने बचपन से बिल्कुल अलग है। इकीसवीं सदी में इस देश को ऐसे नागरिकों की जरूरत पड़ेगी, जिन्हें प्राथमिक कक्षाओं में विज्ञान एवं टेक्नोलॉजी का हमसे ज्यादा प्रशिक्षण मिला होगा।’

पुस्तक कहती है कि विज्ञान महज तथ्यों का अंबार नहीं है। तथ्य महज उसका एक हिस्सा हैं। विज्ञान में चार चीजें शामिल हैं। पहली, जो कुछ घट रहा है, उसे गौर से देखना। दूसरा- घटना की वजह का अंदाजा लगाना। तीसरा, अपने अंदाजे को सही या गलत सिद्ध करने के लिए जांच करना। चौथा, जांच में आए परिणाम का मतलब निकालना। पुस्तक में बच्चों के लिए छोटे-छोटे कई प्रयोग दिए गए हैं, जो घर में ही किए जा सकते हैं और जिनसे विज्ञान के बड़े-बड़े सिद्धांतों को समझा जा सकता है। इन प्रयोगों में अभिभावकों को क्‍या करना चाहिए और बच्चों को क्‍या करना चाहिए, विस्तार से बताया गया है। कुल मिलाकर यह पुस्तक बच्चों में विज्ञान-दृष्टि और विज्ञान-बोध को बढ़ाने का बेहद सरल प्रयास है, जिसका स्वागत होना चाहिए।

पुस्‍तक : अपने बच्‍चे को दें विज्ञान दृष्टि
लेखक : नैन्‍सी पाउलू और मार्गेरी मार्टिन
अनुवाद: आशुतोष उपाध्‍याय

मूल्‍य (अजिल्‍द) : 40 रुपये
(सजिल्‍द) : 75 रुपये

प्रकाशक – लेखक मंच प्रकाशन
433 नीतिखंड-3, इंदिरापुरम-201014
गाजियाबाद

ईमेल : anuraglekhak@gmail.com

(दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण, 11 जनवरी 2014 से साभार)

अतीत से लेकर वर्तमान तक की एक सैर : महेश चंद्र पुनेठा

Daxin bharat Me Solah Dinयात्राएं हमारे जीवनानुभव को समृद्ध करती हैं। नई ताजगी और स्फूर्ति से भरती हैं। आदमी का नजरिया विस्तृत करती हैं। अनेक पूर्वाग्रहों और धारणाओं को तोड़ती हैं। यांत्रिकता और एकरसता को भंग करती हैं। युवा कथाकार दिनेश कर्नाटक के शब्दों में कहें, तो- ‘यात्रा हमारी जानकारी का ही विस्तार नहीं करती है, बल्कि हमारे भीतर की ग्रहण करने की शक्ति के बारे में हमें बताती है। इसमें हमें वर्तमान की ही खबर नहीं होती, वरन अतीत से भी रू-ब-रू होते हैं। शायद इसलिए यात्रा हमें न सिर्फ वर्तमान से अतीत की ओर ले जाती है, बल्कि अतीत से वर्तमान की ओर आने की तमीज भी सिखाती है।’ इसलिए यात्राओं के लिए हमें समय निकालना ही चाहिए, लेकिन जहां जीवन की तमाम आपाधापी के बीच यात्रा हर आदमी के लिए संभव नहीं होती है, वहीं मुझ जैसे यात्राभीरू चाहकर भी यात्रा में नहीं जा सकते हैं। ऐसे में यात्रा वृत्तांत यात्रा न कर पाने की कमी को कुछ हद तक पूरी करते हैं। हमें उन जगहों से परिचित कराते हैं, जहां हम सशरीर नहीं पहुंच पाते हैं। हिंदी साहित्य में यात्रा वृत्तांतों की एक लंबी परम्परा रही है। सद्य प्रकाशित ‘दक्षिण भारत में सोलह दिन’ नामक यात्रा वृत्तांत इस परम्परा का विकास है, जिसके लेखक हैं हिंदी के युवा कथाकार दिनेश कर्नाटक।

सोलह दिनों की यह यात्रा दक्षिण भारत के कुछ चुनिंदा शहरों में की गई। ये शहर हैं- चेन्नई, काँचीपुरम, महाबलीपुरम, पाँडिचेरी, चिदम्बरम, तंजौर, तिरुच्ची, कन्याकुमारी, शुचीन्द्रम, नेडुमगाड, तिरूअनंतपुरम, कोच्चि, मैसूर तथा बैंगलूर। इन स्थानों पर लेखक अधिकतर मंदिरों के दर्शन करने गया, पर इसका मतलब यह नहीं कि वह किसी धार्मिक आस्था से प्रेरित होकर इस यात्रा में गया था। जैसा कि वह स्वयं कहते हैं- ‘हमारे लिए यह यात्रा पुण्य कमाने से ज्यादा दक्षिण के इतिहास, जीवन तथा संस्कृति से रू-ब-रू होने का माध्यम थी। तीनों चीजों को जानने के लिए मंदिरों से बढिय़ा कौन-सी जगह हो सकती है?’ इसलिए यह यात्रा वृत्तांत इन स्थानों के ऐतिहासिक और दर्शनीय स्थलों का वर्णन ही नहीं करता है, बल्कि वहां की भाषा, संस्कृति और सामाजिक व्यवहार से भी हमें परिचित करता है। लेखक ने जो देखा और जैसा देखा उस पर अपनी बेवाक प्रतिक्रिया तो व्यक्त की है, साथ ही विभिन्न स्थानों की ऐतिहासिक-राजनीतिक पृष्ठभूमि से भी संक्षेप में अवगत कराने की सफल कोशिश की गई है। इस पुस्तक को पढ़ते हुए लगता है कि हम भी लेखक के साथ-साथ उन स्थानों की यात्रा कर रहे हैं। बहुत सहज-सरल शैली में गहरी रसात्मकता के साथ यह वर्णन किया गया है। यह किताब कथा का सा आनंद देती है। लेखक छोटे-छोटे प्रसंगों को किस्सागोई के अंदाज में बहुत रोचकता के साथ पाठकों के सामने प्रस्तुत करता जाता है। लेखक के भीतर और बाहर दोनों के दर्शन इस वृत्तांत में होते हैं। लेखक का पूरा व्यक्तित्व और सोच सामने उभर आती है। जैसे एक स्थान पर वह दक्षिण भारतीयों के संस्कृति एवं आधुनिकता के समन्वय के बारे में बात करते हुए आधुनिकता के बारे में कहते हैं-‘आधुनिकता का संबंध पहनावे, भाषा तथा फैशन से नहीं होता है, उसका असर हमारी सोच तथा व्यवहार में भी पडऩा चाहिए। अगर व्यक्ति सहृदय, मानवीय तथा बड़ी सोच वाला नहीं है, तो वह कितना ही समृद्ध क्यों न हो जाए, उसके द्वारा लपेटे हुए बाहरी तामझाम का कोई अर्थ नहीं रह जाता।’ इसी तरह वह ‘अरविंद की भावभूमि में’ अरविंद दर्शन को याद करते हुए आध्यामिता के बारे में कहते हैं कि ‘आध्यामिकता व्यक्ति के अन्तर्जगत, जीवन की अनिश्चिंता, विडंबना तथा अंतर्विरोधों से जुड़े सवालों के उत्तर तलाशने की कोशिश करती है। आध्यामिकता तेजी से लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है। देखते ही देखते आध्यात्मिक गुरुओं के अनुयायिओं और उनके साम्राज्य में आशातीत वृद्धि हो जाती है। लेकिन एक सवाल मुझे लगातार सोचने को मजबूर करता है कि बहुत जल्दी हर नई आध्यात्मिक धारा एक सम्प्रदाय में बदल जाती है। उस सम्प्रदाय के लोग अपने सोचने के तरीके को सब से श्रेष्ठ घोषित करने में लग जाते हैं। समाज को उसके बारे में पता नहीं चल पाता। जिस प्रकार साहित्य, सिनेमा, संगीत तथा कला किसी भी व्यक्ति के पास बेरोक-टोक पहुंचकर उसे अपना बना लेते हैं, वैसा आध्यात्मिकता के साथ नहीं होता। उस धारा के प्रतिनिधि दावा करते हैं कि इसे समझने के लिए तुम्हें हमारी शरण में आना होगा, हमारा शिष्य बनना होगा। शायद यही आध्यात्मिकता की सीमा भी है। वरना इतने गुरुओं तथा शिष्यों के होने के बावजूद, वे अपने समय को प्रभावित क्यों नहीं कर पाते हैं?’ वहां के मंदिरों में उमडऩे वाली भीड़ को देखकर लेखक के मन में बड़ा महत्वपूर्ण सवाल पैदा होता है जो तमाम धार्मिक प्रवृत्ति के लोगों के लिए विचारणीय है- ‘मंदिर-तीर्थस्थानों में तिल रखने की जगह नहीं मिलती, लेकिन शायद ही धर्म इनके व्यवहार को प्रभावित करता हो? यह सबसे बड़ी विडंबना है। यही लोग ऑफिस में जाकर घूस लेते हैं, घर में जाकर मानसिक तथा शारीरिक हिंसा करते हैं। थोड़ी-सी बात में आपा खोकर लडऩे-मरने को तैयार हो जाते हैं। यह सवाल किसी एक धर्म का नहीं, सभी धर्मों को माननेवालों के जीवन में यह फांक दिखाई देती है।’

यह वृत्तांत दक्षिण की पुरानी यादों से शुरू किया गया है, जब पहली बार लेखक ऑटोमोबाइल कंपनी टीवीएस में नौकरी के दौरान एक प्रशिक्षण कार्यक्रम में भाग लेने एक माह के लिए मदुरै गया था। इस यात्रा वृत्तांत की खासियत है कि दक्षिण भारत का वर्णन करते हुए लेखक को बार-बार अपना उत्तराखंड याद हो आता है। विशेषकर वहां के लोगों के आचार-व्यवहार के संदर्भ में। दिनेश कर्नाटक मानते हैं कि भाषा तथा संस्कृति के मामले में कुछ स्थूल भेद होने के बावजूद संस्कृति की आधारभूमि एक ही है, जो हमारी राष्ट्रीय एकता को बनाए रखती है।

कोई उत्तर भारतीय दक्षिण भारत की यात्रा करे और भाषा का सवाल उसके मन में पैदा न हो, ऐसा नहीं हो सकता। दिनेश कर्नाटक भी उसके अपवाद नहीं हैं, बल्कि एक संवेदनशील शिक्षक व लेखक होने के नाते यह सवाल उनके मन में बार-बार और बड़ी शिद्दत से उठता है और भाषा को लेकर उनकी एक स्पष्ट राय उभर कर सामने आती है। भाषा विमर्श को अच्छा खास स्थान इस पुस्तक में मिला है। दिनेश कर्नाटक तमिलनाडु में हिंदी विरोध के पीछे के राजनीतिक कारणों तथा दक्षिण भारतीयों के मन में हिंदी के भय के कारणों को रेखांकित करते हैं और यह मानते हैं कि ‘उस समय के नेतृत्व द्वारा भाषा के मसले को बड़े दृष्टिकोण के साथ नहीं निपटा गया। कुछ लोगों द्वारा राष्ट्रीय एकता के लिए ‘हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तानी’ को अनिवार्य माने जाने की भूल की जा रही थी। यह माना जा रहा था कि स्थानीयताएं देश की एकता के मार्ग में बाधा हैं।’ वास्तव में यही दृष्टिकोण भारतीय भाषाओं को हाशिए में धकेलने और अंग्रेजी को इतना अधिक प्रभावशाली बनाने का कारण बना। इसी के चलते आज भाषा की यह पूरी लड़ाई अंग्रेजी बनाम हिंदी की लड़ाई बनकर रह गई है, जबकि हिंदी की तरह अन्य भारतीय भाषाएं भी अंग्रेजी के चलते आज उपेक्षित होती जा रही हैं। दिनेश कर्नाटक का यह तर्क बिल्कुल सही है कि ‘अंग्रेजी के सामने भारतीय भाषाओं की दुर्गत होती जा रही है। अंग्रेजी वर्चस्व, सत्ता तथा सफलता की भाषा बनी हुई है। मजे की बात यह है कि अंग्रेजी के इस वर्चस्व से सभी भारतीय भाषाओं के लोग उबरना चाहते हैं, लेकिन वे इस गलतफहमी से आज तक मुक्त नहीं हो पाए हैं कि हिंदी के बजाय उन्हें अंग्रेजी से कम खतरा है।’ दिनेश कर्नाटक त्रिभाषा फार्मूले को भाषा के सवाल का सबसे अच्छा समाधान मानते हैं। एक भाषा के रूप में अंग्रेजी से उन्हें कोई दिक्कत नहीं है। वह इस बात से सहमत हैं कि हमें भारत की एक भाषा के रूप में अंग्रेजी को स्वीकार कर लेना चाहिए, लेकिन बराबरी के तौर पर। अंग्रेजी सहित सभी भारतीय भाषाओं का कद एक समान होना चाहिए। उनका स्पष्ट मानना है कि ‘हर राज्य की राजभाषा को वहां के हर स्कूल की पढ़ाई का माध्यम होना चाहिए। अंग्रेजी को एक विषय के रूप में पढ़ाया जाना चाहिए, न कि पढ़ाई के माध्यम के रूप में।’ इस यात्रा वृत्तांत में हिंदी के प्रचार-प्रसार में हिंदी फिल्मों के योगदान को भी रेखांकित किया गया है।

इसके अलावा यह पुस्तक बाजार और पूंजीवाद के चलते हमारे आचार-व्यवहार में आ रहे परिवर्तनों की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करती है। बाजारवाद के बढ़ते प्रभाव ने दक्षिण हो या उत्तर, गांव हों या शहर, सभी जगह आदमी के आचरण और सोच को बदला है। शिक्षा तक को इसने अपनी जरूरत के अनुसार बदल दिया है।

कुल मिलाकर समीक्ष्य पुस्तक यात्रा के बहाने जीवन के विविध आयामों को छूती है और खट्टी-मीठी अनेक वास्तविकताओं से पाठक का परिचय कराती है। अतीत से वर्तमान तक की सैर कराती है। सबसे बड़ी बात मुझ जैसे यात्राभीरू व्यक्ति को भी यात्रा के लिए प्रेरित करती है। प्रस्तुत पुस्तक की ये पंक्तियां झकझारे जाती हैं- ‘दूरी का ख्याल एक तरह की मानसिक बाधा है। देखा जाए, तो न कुछ दूर होता है और न कुछ पास। कई बार हम पास की जगह से दूर हो सकते हैं, जबकि दूर की जगह से नजदीक।’

पुस्तक : दक्षिण भारत के सोलह दिन(यात्रा वृत्तांत)
लेखक : दिनेश कर्नाटक

प्रकाशक : लेखक मंच प्रकाशन

433 नीतिखंड-3, इंदिरापुरम

गाजियाबाद-201014

ईमेल : anuraglekhak@gmail.com

पुस्तक का मूल्य (अजि‍ल्द ) : 120 रुपये
(सजि‍ल्द) : 300 रुपये

यह किताब निम्न जगहों पर उपलब्ध है-

1:पीपीएच बुक शॉप
जी-18, आउटर सर्किल
मेरि‍ना आर्कड, कनाट सर्कस, नई दि‍ल्ली -1
2: पाण्डेय बुक शॉप
एच-169, शॉप नंबर-12, नजदीक पानी की टंकी
सेक्टेर-12, नोएडा-201301
3: कि‍ताबघर
जीआईजी रोड, पाण्डे गांव
पि‍थौरागढ़- 262501
मोबाइल नं- 9411707450
4: बुक वर्ल्ड
10-ए, एस्ले हॉल (परेड ग्राउंड के पास)
देहरादून, उत्तराखंड5: Thougths
मुखानी चौराहे के निकट, हल्द्वानी

अपने बच्चे को दें विज्ञान दृष्टि : नैन्सी पाउलू

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‘लेखक मंच’ प्रकाशन की चौथी पुस्‍तक ‘अपने बच्चे को दें विज्ञान दृष्टि’ अंग्रेजी पुस्‍तक का अनुवाद है। इसके लेखक नैन्सी पाउलू और मार्गेरी मार्टिन हैं। इसका अनुवाद आशुतोष उपाध्याय ने किया है। बच्‍चों को विज्ञान को लेकर जिज्ञासू बनाने की दिशा में यह महत्‍वपूर्ण पुस्‍तक है। इस पुस्‍तक की भूमिका यहां दी जा रही है-

‘क्यों?’

एक ऐसा सवाल, जिसका जवाब देने का प्रयास हम माता-पिता हमेशा से करते आए हैं। यह अच्छी बात है कि बच्चे सवाल पूछते हैं– सीखने का इससे बढिय़ा कोई और तरीका नहीं हो सकता। सभी बच्चों के पास सीखने के दो आश्चर्यजनक स्रोत होते हैं– कल्पनाशीलता और उत्सुकता। माता-पिता के रूप में आप अपने बच्चे की कल्पनाशीलता व उत्सुकता को बढ़ावा देकर उसे सीखने के आनन्द से सराबोर कर सकते हैं।

‘अपने बच्चे को दें वैज्ञानिक दृष्टि’ विभिन्न शैक्षिक विषयों पर अभिभावकों के लिए लिखी गई पुस्तक शृंखला की एक कड़ी है, ताकि वे बच्चों की सहज उत्सुकता का जवाब दे सकें। शिक्षण और सीखना महज स्कूल की चारदीवारी के भीतर सम्पन्न होने वाली रहस्यमय गतिविधियाँ नहीं हैं। वे तब भी होती हैं, जब माता-पिता और बच्चे बेहद आसान चीजों को साथ-साथ करते हैं।

उदाहरण के लिए–आप और आपका बच्चा सीखने के लिए किस तरह की गतिविधियाँ कर सकते हैं– धुलने वाले कपड़ों के ढेर से मोजों को उनके जोड़ों के हिसाब से छाँटकर गणित और विज्ञान की गुत्थियाँ सुलझा सकते हैं। साथ मिलकर खाना बना सकते हैं, क्योंकि खाना बनाने से गणित और विज्ञान के अलावा अच्छी सेहत की भी सीख मिलती है। एक-दूसरे को कहानियाँ सुना सकते हैं। कहानी सुनाना पढऩे और लिखने का आधार है (इसके अलावा बीते दिनों की कहानियों को ही तो इतिहास कहते हैं)। आप अपने बच्चे के साथ स्टापू खेल सकते हैं। उछल-कूद वाले इन खेलों से बच्चे गिनती सीखते हैं और जीवनपर्यंत अच्छी सेहत का पाठ भी पढ़ते हैं।

बच्चों के साथ मिलकर कुछ करने से आप समझ जाएँगे कि सीखना मनोरंजक और बेहद महत्वपूर्ण क्रियाकलाप है। ऐसा करके आप अपने बच्चे को पढऩे, सीखने और स्कूल में रहने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।

 

पुस्‍तक : अपने बच्‍चे को दें विज्ञान दृष्टि

लेखक : नैन्‍सी पाउलू और मार्गेरी मार्टिन

अनुवाद : आशुतोष उपाध्‍याय

प्रकाशक : लेखक मंच प्रकाशन

433 नीतिखंड-3, इंदिरापुरम

गाजियाबाद-201014

ईमेल : anuraglekhak@gmail.com

मूल्‍य(अजिल्‍द) : 40 रुपये

(सजिल्‍द) : 75  रुपये

हिंदी रुकने वाली नहीं है : अरविंद कुमार

अरविंद कुमार

हिंदी की अपरिहार्य और अनवरोध्य प्रगति के प्रति माधुरी तथा सर्वोत्तम रीडर्स जाइजेस्ट जैसी पत्रिकाओं के पूर्व संपादक तथा हिंदी के पहले शब्‍दकोश समांतर कोश के रचियता और शब्देश्वरी तथा पेंगुइन हिंदी-इंग्लिश/इंग्लिश-हिंदी थिसारस द्वारा भारत में कोशकारिता को नई दिशा देने वाले अरविंद कुमार। वह हिंदी को आधुनिक तकनीक से लैस करने के हिमायती हैँ और आजकल इंटरनेट पर पहले सुविशाल हिंदी-इंग्लिश-हिदी ई-कोश को अंतिम रूप देने में लगे हैं-

हिंदी के उग्रवादी समर्थक बेचैन हैं कि आज भी इंग्लिश का प्रयोग सरकार में और व्यवसाय मेँ लगभग सर्वव्यापी है। वे चाहते हैं कि इंग्लिश का प्रयोग बंद कर के हिंदी को सरकारी कामकाज की एकमात्र भाषा तत्काल बना दिया जाए। उनकी उतावली समझ में आती है, लेकिन यहाँ यह याद दिलाने की ज़रूरत है कि एक समय ऐसा भी था जब दक्षिण भारत के कुछ राज्य, विशेषकर तमिलनाडु, हिंदी की ऐसी उग्र माँगोँ के जवाब में भारत से अलग होकर अपना स्वतंत्र देश बनाने को तैयार थे। तब ‘हिंदी वीरों’ का कहना था कि चाहे तो तमिलनाडु अलग हो जाए, हमें हिंदी चाहिए… हर हाल, अभी, तत्काल… उस समय शीघ्र होने वाले संसद के चुनावोँ में उन्होँने नारा लगाया कि वोट केवल उस प्रत्याशी को देँ जो हिंदी को तत्काल लागू करने के पक्ष मेँ हो। सौभाग्य है कि भारत के लोग इतने नासमझ न थे और न आज हैं कि एकता भंग होने की शर्त पर हिंदी को लागू करना चाहेँ।

मैँ समझता हूँ कि पूरी राजनीतिक और भाषाई तैयारी के बिना हिंदी को सरकारी कामकाज की प्रथम भाषा बनाना लाभप्रद नहीं होगा। हिंदी पूरी तरह आने मेँ देर लग सकती है, पर प्रजातंत्र और राष्ट्रीय एकता के लिए यह देरी बरदाश्त करने लायक़ है। तब तक हमें चाहिए कि सरकारी कामकाज में हिंदी प्रचलन बढ़ाते रहें और साथ-साथ अपने आप को और हिंदी को आधुनिक तकनीक से लैस करते रहेँ।

इंग्लिश के विरोध की नीति हमेँ अपने ही लोगोँ से भी दूर कर सकती है। आम आदमी इंग्लिश सीखने पर आमादा है तो एक कारण यह है कि आज आर्थिक और सामाजिक प्रगति के लिए इंग्लिश का ज्ञान आवश्यक है। दूसरा यह कि संसार का सारा ज्ञान समेटने के लिए देश को इंग्लिश में समर्थ बने रहना होगा, वरना हम कूपमंडूक रह जाएँगे। यही कारण था कि 19वीं सदी मेँ जब मैकाले की नीति के आघार पर इंग्लिश शिक्षा का अभियान चला था, तब राजा राम मोहन राय जैसे देशभक्त और समाज सुधारक ने उस का डट कर समर्थन किया था। वह देश को दक़ियानूसी मानसिकता से उबारना चाहते थे। राममोहन राय ने कहा था, ‘एक दिन इंग्लिश पूरी तरह भारतीय बन जाएगी और हमारे बौद्धिक सामाजिक विकास का साधन।’ स्वामी विवेकानंद ने भी अमरीका में भारतीय संस्कृति का बिगुल इंग्लिश के माध्यम से ही फूँका था।

इसके माने यह नहीँ हैँ कि आज हम लोग हिंदी का महत्त्व नहीँ जानते या हिंदी की प्रगति और विकास रुक गया है या रुक जाएगा। मैं समझता हूँ कि हिंदी के विकास का राकेट नई तेज़ी से उठता रहेगा। हिंदी अब रुकने वाली नहीं है, हिंदी रुकेगी नहीं। कारण है हिंदी बोलने समझने वालोँ की भारी तादाद और उन के भीतर की उत्कट आग।

भाषा विकास क्षेत्र से जुड़े वैज्ञानिकों का तथ्याधारित अनुमान हिंदी प्रेमियों के लिए उत्साहप्रद है कि आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय महत्त्व की जो चंद भाषाएँ होंगी उन में हिंदी अग्रणी होगी।

संसार में 60 करोड़ से अधिक लोग हिंदी बोलते, पढ़ते और लिखते हैं। फ़िजी, मारीशस, गयाना, सूरीनाम की अधिकतर और नेपाल की कुछ जनता हिंदी बोलती है। अमरीकी, यूरोपीय महाद्वीप और आस्ट्रेलिया आदि देशोँ में गए हमारे तथाकथित एनआरआई कमाएँ चाहे इंग्लिश के बल पर, लेकिन उनका भारतीय संस्कृति और हिंदी के प्रति प्रेम बढ़ा ही है। कई बार तो लगता है कि वे हिंदी के सब से कट्टर समर्थक हैँ।

अकेले भारत को ही लें तो हिंदी की हालत निराशाजनक नहीं, बल्कि अच्छी है। आम आदमी के समर्थन के बल पर ही पूरे भारत में 10 शीर्ष दैनिकों में हिंदी के पाँच हैँ (दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हिंदुस्तान, अमर उजाला, राजस्थान पत्रिका),  तो इंग्लिश का कुल एक (टाइम्स आफ़ इंडिया) और मलयालम के दो (मलयालम मनोरमा और मातृभूमि), मराठी का एक (लोकमत), तमिल का एक (दैनिक थंती)। इसी प्रकार सब से ज़्यादा बिकने वाली पत्रिकाओँ में हिंदी की पाँच, तमिल की तीन, मलयालम की एक है, जबकि इंग्लिश की कुल एक पत्रिका है। हिंदी के टीवी मनोरंजन चैनल न केवल भारत मेँ बल्कि बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफ़गानिस्तान में भी लोकप्रिय हैं और हिंदी के साथ-साथ हमारे सामाजिक चिंतन का प्रसार कर रहे हैँ।

जहाँ तक हिंदी समाचार चैनलोँ का सवाल है इंग्लिश के सर्वाधिक प्रतिष्ठित न्यूज़ वीकली इकोनमिस्ट ने 14 अगस्त 2010 अंक मेँ पृष्ठ 12 पर ­‘इंटरनेशल ब्राडकास्टिंग’ पर लिखते हुए कहा है कि अमरीका और ब्रिटेन के विदेशी भाषाओँ में समाचार प्रसारित करने वाले संस्थानोँ को अपना धन सोच’समझ कर बरबाद करना चाहिए। उदाहरण के लिए भारत की अपनी भाषाओँ के न्यूज़ चैनलोँ से प्रतियोगिता करना कोई बुद्धिमानी का काम नहीं है।

हमारी ताक़त है हमारी तादाद…

यह परिणाम है हमारी जनशक्ति का। यही हिंदी का बल है। बहुत साल नहीं हुए जब हम अपनी विशाल आबादी को अभिशाप मानते थे। आज यह हमारी कर्मशक्ति मानी जाती है। भूतपूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने सही कहा है: ‘अधिक आबादी अपने आप में कोई समस्या नहीं है, समस्या है उस की ज़रूरियात को पूरा न कर पाना। अधिक आबादी का मतलब है अधिक सामान की, उत्पाद की माँग। अगर लोगों के पास क्रय क्षमता है तो हर चीज़ की माँग बढ़ती है।’ आज हमारे समृद्ध मध्य वर्ग की संख्या अमरीका की कुल आबादी जितनी है। पिछले दिनोँ के विश्वव्यापी आर्थिक संकट को भारत हँसते खेलते झेल गया तो उस का एक से बड़ा कारण यही था कि हमारे उद्योगोँ के उत्पाद मात्र निर्यात पर आधारित नहीँ हैँ। हमारी अपनी खपत उन्हें ताक़त देती है और बढ़ाती है।

इसे हिंदी भाषियोँ की और विकसित देशोँ की जनसंख्या के अनुपातोँ के साथ साथ सामाजिक रुझानोँ को देखते हुए समझना होगा। दुनिया की कुल आबादी आज लगभग चार अरब है। इसमेँ से हिंदुस्तान और चीन के पास 60 प्रतिशत लोग हैँ। कुल यूरोप की आबादी है 73-74 करोड़, उत्तर अमरीका की आबादी है 50 करोड़ के आसपास। सन 2050 तक दुनिया की आबादी 9 अरब से ऊपर हो जाने की संभावना है। इसमेँ से यूरोप और अमरीका जैसे विकसित देशों की आबादी बूढ़ी होती जा रही है। (आबादी बूढ़े होने का मतलब है किसी देश की कुल जनसंख्या मेँ बूढे लोगोँ का अनुपात अधिक हो जाना।) चुनावी नारे के तौर पर अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा कुछ भी कहें, बुढाती आबादी के कारण उन्हेँ अपने यहाँ या अपने लिए काम करने वालोँ को विवश हो कर, मजबूरन या तो बाहर वालोँ को आयात करना होगा या अपना काम विदेशों में करवाना होगा।

इस संदर्भ मेँ संसार की सब से बड़ी साफ़्टवेअर कंपनी इनफ़ोसिस के एक संस्थापक नीलकनी की राय विचारणीय है। तथ्यों के आधार पर उनका कहना है कि ‘किसी देश में युवाओँ की संख्या जितनी ज़्यादा होती है, उस देश में उतने ही अधिक काम करने वाले होते हैँ और उतने ही अधिक नए विचार पनपते हैं। तथ्य यह है कि किसी ज़माने का बूढ़ा भारत आज संसार में सबसे अधिक युवा जनसंख्या वाला देश बन गया है। इस का फ़ायदा हमें 2050 तक मिलता रहेगा। स्वयं भारत के भीतर जनसंख्या आकलन के आधार पर 2025 मेँ हिंदी पट्टी की उम्र औसतन 26 वर्ष होगी और दक्षिण की 34 साल।’

अब आप भाषा के संदर्भ में इस का मतलब लगाइए। इन जवानों में से अधिकांश हिंदी पट्टी के छोटे शहरोँ और गाँवोँ में होंगे। उन की मानसिकता मुंबई, दिल्ली, गुड़गाँव के लोगोँ से कुछ भिन्न होगी। उनके पास अपनी स्थानीय जीवन शैली और बोली होगी।

नई पहलों के चलते हमारे तीव्र विकास के जो रास्ते खुल रहे हैँ (जैसे सबके लिए शिक्षा का अभियान), उनका परिणाम होगा असली भारत को, हमारे गाँवोँ को, सशक्त कर के देश को आगे बढ़ाना। आगे बढ़ने के लिए हिंदी वालोँ के लिए सबसे बड़ी ज़रूरत है अपने को नई तकनीकी दुनिया के साँचे मेँ ढालना, सूचना प्रौद्योगिकी में समर्थ बनना।

यही है हमारी नई दिशा। कंप्यूटर और इंटरनेट ने पिछ्ले वर्षों मेँ विश्व मेँ सूचना क्रांति ला दी है। आज कोई भी भाषा कंप्यूटर तथा अन्य इलैक्ट्रोनिक उपकरणों से दूर रह कर पनप नहीं सकती। नई तकनीक में महारत किसी भी काल में देशोँ को सर्वोच्च शक्ति प्रदान करती है। इसमेँ हम पीछे हैँ भी नहीँ… भारत और हिंदी वाले इस क्षेत्र मेँ अपना सिक्का जमा चुके हैँ।

इस समय हिंदी में वैबसाइटेँ, चिट्ठे, ईमेल, चैट, खोज, ऐसऐमऐस तथा अन्य हिंदी सामग्री उपलब्ध हैं। नित नए कम्प्यूटिंग उपकरण आते जा रहे हैं। इनके बारे में जानकारी दे कर लोगों मेँ  जागरूकता पैदा करने की ज़रूरत है ताकि अधिकाधिक लोग कंप्यूटर पर हिंदी का प्रयोग करते हुए अपना, देश का, हिंदी का और समाज का विकास करें।

हमेँ यह सोच कर नहीँ चलना चाहिए कि गाँव का आदमी नई तकनीक अपनाना नहीं चाहता। ताज़ा आँकड़ोँ से यह बात सिद्ध हो जाती है। गाँवोँ मेँ रोज़गार के नए से नए अवसर खुल रहे हैँ। शहर अपना माल गाँवोँ में बेचने को उतावला है। गाँव अब ई-विलेज हो चला है। तेरह प्रतिशत लोग इंटरनेट का उपयोग खेती की नई जानकारी जानने के लिए करते हैँ। यह तथ्य है कि ‘गाँवोँ में इंटरनेट का इस्तेमाल करने वालोँ का आंकड़ा 54 लाख पर पहुँच जाएगा।

इसी प्रकार मोबाइल फ़ोन दूरदराज़ इलाक़ोँ के लिए वरदान हो कर आया है। उस ने कामगारोँ कारीगरोँ को दलालोँ से मुक्त कर दिया है। यह उनका चलता फिरता दफ़्तर बन गया है और शिक्षा का माध्यम। अकेले जुलाई 2010 में 1 करोड़ सत्तर लाख नए मोबाइल ग्राहक बने और देश में मोबाइलोँ की कुल संख्या चौबीस करोड़ हो गई। अब ऐसे फ़ोनोँ का इस्तेमाल कृषि काल सैंटरों से नि:शुल्‍क  जानकारी पाने के लिए, उपज के नवीनतम भाव जानने के लिए किया जाता है। यह जानकारी पाने वाले लोगोँ में हिंदी भाषी प्रमुख हैँ। उनकी सहायता के लिए अब मोबाइलों पर इंग्लिश के कुंजी पटल की ही तरह हिंदी का कुंजी पटल भी उपलब्ध हो गया है।

हिंदी वालोँ और गाँवोँ की बढ़ती क्रय शक्ति का ही फल है जो टीवी संचालक कंपनियाँ इंग्लिश कार्यक्रमोँ पर अपनी नैया खेना चाहती थीँ, वे पूरी तरह भारतीय भाषाओँ को समर्पित हैँ। आप देखेंगे कि टीवी पर हिंदी के मनोरंजन कार्यक्रमोँ के पात्र अब ग्रामीण या क़स्बाती होते जा रहे हैँ।

सरकारी कामकाज की बात करेँ तो पुणेँ में प्रख्यात सरकारी संस्थान सी-डैक कंप्यूटर पर हिंदी के उपयोग के लिए तरह तरह के उपकरण और प्रोग्राम विकसित करने मेँ रत है। अनेक सरकारी विभागोँ की निजी तकनीकी शब्दावली को समो कर उन मंत्रालयोँ के अधिकारियोँ की सहायता के लिए मशीनी अनुवाद के उपकरण तैयार हो चुके हैँ। अभी हाल सी-डैक ने ‘श्रुतलेखन’ नाम की नई विधि विकसित की है जिस के सहारे बोली गई हिंदी को लिपि में परिवर्तित करना संभव हो गया है। जो सरकारी अधिकारी देवनागरी लिखने या टाइप करने में अक्षम हैं, अब वे इसकी सहायता से अपनी टिप्पणियाँ या आदेश हिंदी में लिख सकेंगे। यही नहीं इस की सहायता से हिंदी में लिखित कंप्यूटर सामग्री तथा ऐसऐमऐस आदि को सुना भी जा सकेगा।

निस्संदेह एक संपूर्ण क्रांति हो रही है।